Home Blog Page 118

शुनःशेप का पिता कौन

0

शुनःशेप ने ऋषियों से पूछा कि मेरा पिता कौन है, मुझे बेचने वाला या खरीदने वाला! शुनःशेप का पिता कौन ? इस प्रश्न के माध्यम से मानव सम्बन्धों की जटिल व्याख्या की गई है। इस कहानी का निष्कर्ष भारतीय संस्कृति का निरूपण है।

पिछली कड़ी में हमने देखा था कि महर्षि विश्वामित्र द्वारा दिए गए मंत्र से अग्नि आदि देवताओं ने प्रकट होकर ऋषि अजीगर्त के पुत्र शुनःशेप के प्राणों की रक्षा की। ऋषियों एवं देवताओं के प्रयासों से ऋषिकुमार शुनःशेप और राजकुमार रोहित के प्राण तो बच गए, यज्ञ भी पूर्ण हो गया और वरुण भी संतुष्ट होकर चला गया किंतु ऋषि विश्वामित्र और ऋषि अजीगर्त के जीवन में एक नई समस्या उत्पन्न हो गई।

जब यज्ञ सम्पूर्ण हो गया तो ऋषि विश्वामित्र के 100 पुत्र अपने पिता को घृणा और क्रोध से देखने लगे क्योंकि यज्ञ के दौरान विश्वामित्र ने अपने पुत्रों को पितृ-आज्ञा का उल्लंघन करने के अपराध में चाण्डाल बनकर एक सहस्र वर्ष तक पृथ्वी पर कुत्तों का मांस खाने का श्राप दिया था।

इसी प्रकार जब ऋषि अजीगर्त ने बलि यूप से मुक्त हुए अपने पुत्र शुनःशेप को गले लगाना चाहा तो शुनःशेप ने उन्हें अपना पिता मानने से मना कर दिया और कहा कि आपने मेरे बदले में दो सौ गौएं प्राप्त कर ली हैं। इसलिए अब आप मेरे पिता नहीं रहे। ऋषि अजीगर्त ने कहा कि मैंने पृथ्वीपालक राजा अंबरीष के पुत्र के प्राणों की रक्षा के लिये तेरी बलि देने का निश्चय किया था न कि गौओं की प्राप्ति के लोभ से।

इस पर शुनःशेप ने ऋत्विजों से ही प्रश्न किया कि आप ही बतायें कि क्या ये मेरे पिता हैं जिन्होंने मुझे अपने हाथों से बलियूप से बांध दिया और मेरे वध के लिये कुठार लेकर प्रस्तुत हुए? अथवा राजा अंबरीष मेरे पिता हैं जिन्होंने दो सौ गौओं के बदले में मेरा जीवन क्रय कर लिया है?

शुनःशेप के प्रश्न पर ऋषियों में विवाद छिड़ गया। कुछ ऋषियों का मानना था कि अब भी ऋषि अजीगर्त ही शुनःशेप का पिता है जबकि कुछ ऋषियों के अनुसार राजा अंबरीष द्वारा अजीगर्त को उसके पुत्र का मूल्य चुका दिए जाने के कारण अंबरीष ही शुनःशेप का पिता हो गया है। शुनःशेप ने इन दोनों को ही अपना पिता मानने से मना कर दिया।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

ऋषि कुमार शुनःशेप ने अजीगर्त को यह कहकर पिता मानने से मना कर दिया कि इन्होंने मुझे दो सौ गौओं के बदले विक्रय कर दिया था। इसी प्रकार शुनःशेप ने अंबरीष को भी यह कहकर पिता मानने से अस्वीकार कर दिया कि राजा अंबरीष ने उसे पालने के लिए नहीं अपितु बलि देने के लिये क्रय किया था।

 शुनःशेप ने ऋषियों से कहा- ‘महर्षि विश्वामित्र ने मंत्र देकर, अग्नि ने ओज देकर और इंद्र ने हिरण्यमय रथ देकर मेरे प्राणों की रक्षा की है। इनमें से किसी एक को मैं अपना पिता स्वीकार कर सकता हूँ किंतु इनमें से मेरा पिता होने का वास्तविक अधिकारी कौन है?’

अंततः महर्षि वसिष्ठ ने निर्णय दिया- ‘मंत्र से ही शुनःशेप के प्राण बचे हैं। इसलिये विश्वामित्र शुनःशेप के पिता होने के अधिकारी हैं।’

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

इस पर शुनःशेप विश्वामित्र के अंक में जाकर बैठ गया। इस पर विश्वामित्र ने शुनःशेप को ‘देवरात’ अर्थात् देवताओं का पुत्र घोषित किया। शुनःशेप की यह कथा विभिन्न पुराणों में कुछ अंतर के साथ मिलती है। एक स्थान पर यह उल्लेख आया है कि महर्षि विश्वामित्र के कहने पर शुनःशेप ने बलियूप से मुक्त होने के लिए ऊषा देवता का स्तवन किया। प्रत्येक ऋचा के साथ शुनःशेप का एक-एक बंधन टूटता गया और अंतिम ऋचा के साथ शुनःशेप स्वयं ही बलियूप से मुक्त हो गया।

कुछ और ग्रंथों के अनुसार शुनःशेप कौशिक ऋषियों के कुल मे उत्पन्न ऋषि विश्वामित्र के पुत्र विश्वरथ और विश्वामित्र के शत्रु शम्बर की पुत्री उग्र की खोई हुई सन्तान था जिसे लोपमुद्रा ने भरतों अर्थात् कौशिकों के डर से ऋषि अजीतगर्त के पास छिपा दिया था। भरतों ने उग्र को मार दिया। कुछ ग्रंथों के अनुसार ऋषि अजीगर्त अत्यंत निर्धन था इसलिए उसने अपने परिवार का पेट पालने के लिए अपना पुत्र राजा अंबरीष के हाथों बेच दिया था। कुछ ग्रंथों में यह भी लिखा है कि राजकुमार रोहित अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध जंगलों में भाग गया था ताकि वरुण उसे न पकड़ सके तथा उसी ने अन्न की खोज में अपने परिवार सहित भटक रहे ऋषि अजीगर्त को इस बात के लिए तैयार किया था कि यदि वह अपने तीन पुत्रों में से किसी एक की बलि चढ़ाने को तैयार हो जाए तो वह अपने पिता राजा अंबरीष से कहकर ऋषि को इतनी गौएं दिलवा देगा जिससे ऋषि के परिवार को भूखा नहीं मरना पड़ेगा।

कुछ पुराणों के अनुसार जब शुनःशेप बलि से बचने के लिए करुण क्रंदन कर रहा था तब महर्षि विश्वामित्र ने अपने प्रथम पचास पुत्रों को बुलाया और उनसे कहा कि वे शुनःशेप को ज्येष्ठ-बन्धु के रूप में स्वीकार कर लें परन्तु उन पुत्रों ने पितृ-आज्ञा नहीं मानी। अतः विश्वामित्र ने उन पचास पुत्रों का ‘अपुत्र’ कहकर उनका त्याग कर दिया। वे ऋषि-सम्पत्ति के देय भाग से वंचित हो गए।

इस के बाद विश्वामित्र के पुत्र मधुच्छन्दा और उससे छोटे पुत्रों ने शुनःशेप को अपना ज्येष्ठ भ्राता मान लिया किंतु जब ऋषि ने मधुच्छंदा और शेष पुत्रों से कहा कि वे शुनःशेप के स्थान पर बलि-पशु बन जाएं तो उन्होंने भी अपने पिता की आज्ञा मानने से मना कर दिया।

कुछ ग्रंथों में लिखा है कि जब राजकुमार रोहित अपने प्राण बचाने के लिए पिता का महल छोड़कर जंगलों में भाग आया तब एक बार उसे ज्ञात हुआ कि उसका पिता जलोदर नामक रोग से ग्रस्त होकर भयानक वेदना का सामना कर रहा है। इस पर रोहित फिर से पिता के पास लौटने को उद्धत हुआ किंतु जब यह बात देवराज इन्द्र को ज्ञात हुई तो इन्द्र ने रोहित को वापस लौटने से मना कर दिया क्योंकि देवराज इन्द्र नहीं चाहता था कि वरुण को बलिभाग प्राप्त हो।

एक पुराण में आए आख्यान के अनुसार इन्द्र ने रोहित को उपदेश देते हुए कहा- ‘चरैवेति चरैवेति, चराति चरतो भगश्चरैवेति।’ अर्थात् चलते चलो, चलते चलो। चलने वाले का भाग्य भी चलता रहता है।

ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में कुछ मंत्रों का दृष्टा यही शुनःशेप नामक ऋषि है। कुछ पुराणों में बलियूप से बंधे हुए शुनःशेप द्वारा देवताओं के आह्वान के लिए पढ़े जाने वाले मंत्रों में ऋग्वेद के चतुर्थ एवं पंचम मण्डलों के मंत्र दिए गए हैं। कुछ पुराणों में यह निर्देश किया गया है कि जब किसी आर्य राजा का अभिषेक किया जाए तब शुनःशेप का प्रसंग सुनाया जाए। ऐसा संभवतः इसलिए किया गया था ताकि राजा अपने पुत्र के मोह में प्रजा के पुत्रों के प्राण लेने का साहस न करे।

कुछ पुराणों में यह आख्यान राजा अम्बरीष के पुत्र रोहित का न बताकर इसी वंश के राजा हरिश्चंद्र के पुत्र रोहित के सम्बन्ध में दिया गया है। इस आख्यान से यह भी स्पष्ट होता है कि पौराणिक काल में राजा से लेकर ऋषि और देवता तक सभी यज्ञ में नरबलि को उचित नहीं मानते थे।

इसीलिए यह आख्यान वरुण को केन्द्र में रखकर रचा गया क्योंकि वरुण पहले असुर था और बाद में देवताओं ने वरुण को देवत्व प्रदान करके देव बना लिया था किंतु चूंकि देवताओं को सोम मिलना बंद हो गया था इसलिए जहाँ अन्य देवता बलहीन होते जा रहे थे, वहीं वरुण में आसुरी भाव पुनः प्रकट होने आरम्भ हो गए थे। आगे चलकर कुछ पुराणों में अंबरीष के वंशज वेन की कथा मिलती है जिसमें पशुबलि का भी विरोध किया गया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजा वेन

0

राजा वेन को ऋषियों ने अपनी हुंकार से मार डाला!

प्राचीन हिन्दू धर्मग्रंथों में राजा वेन की कथा मिलती है। इन कथाओं के आधार पर यह निश्चित करना कठिन हो जाता है कि वह कौनसे मनु का वंशज था। अलग-अलग कथाओं में उसे अलग-अलग मनु का वंशज बताया गया है। अलग-अलग कथाओं के अनुसार राजा वेन को कम से कम तीन मनुओं का वंशज ठहराया गया है।

श्रीमद्भागवत के अनुसार महाराज ध्रुव की चौथी पीढ़ी में वेन का जन्म हुआ। इस दृष्टि से वेन आदि मनु का वंशज था। कुछ पुराणों के अनुसार वेन ‘मृत्यु’ की मानसी कन्या ‘सुनीथा’ के गर्भ से उत्पन्न राजा अंग का पुत्र था तथा चाक्षुष मनु का प्रपौत्र था। इस दृष्टि से राजा वेन छठे मनु का वंशज सिद्ध होता है।

जबकि कुछ पुराणों के अनुसार वेन राजा ईक्ष्वाकु का वंशज था तथा राजा पृथु का पिता था। इस दृष्टि से राजा वेन वैवस्वत मनु का वंशज सिद्ध होता है।

कुछ पुराणों में कहा गया है कि महाराज ध्रुव के वन गमन के पश्चात उनके पुत्र उत्कल को राजसिंहासन पर बैठाया गया, लेकिन वे ज्ञानी एवम विरक्त पुरुष थे, अतः प्रजा ने उन्हें मूढ़ एवं विक्षिप्त समझकर राजगद्दी से हटा दिया और उनके छोटे भाई भ्रमिपुत्र वत्सर को राजा बनाया। राजा वत्सर तथा उनके पुत्रों ने दीर्घ काल तक पृथ्वी पर शासन किया। इसी वंश में अंग नामक राजा हुआ।

अंग ने अपनी प्रजा को सुखी रखा। एक बार राजा अंग ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया किंतु देवताओं ने यज्ञ-भाग ग्रहण करने से मना कर दिया क्योंकि राजा अंग के कोई पुत्र नहीं था।

इस पर राजा अंग ने पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ किया। यज्ञ में आहुति देते समय यज्ञकुण्ड में से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुआ जिसने राजा को खीर से भरा एक पात्र दिया। राजा ने खीर का पात्र लेकर सूँघा, फिर अपनी रानी को दे दिया। रानी ने उस खीर को ग्रहण किया।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

समय आने पर रानी के गर्भ से एक पुत्र हुआ किन्तु राजा अंग की रानी एक अधर्मी वंश की पुत्री थी, इस कारण उसे अधर्मी सन्तान की प्राप्ति हुई जिसका नाम ‘वेन’ रखा गया।

राजकुमार वेन अत्यंत दुष्ट था। प्रजा उसके उपद्रवों से त्राहि-त्राहि करने लगी। महाराज अंग ने वेन को कई बार दण्डित किया किंतु वेन की प्रवृत्तियों में सुधार नहीं हुआ। इस पर महाराज अंग को जीवन से वैराग्य हो गया और वे एक रात अपना राज्य त्यागकर अज्ञात वन में चले गए। जब भृगु आदि ऋषियों ने देखा कि राजा के न होने से प्रजा की रक्षा करने वाला कोई नहीं रह गया है तो ऋषियों ने माता सुनीथा की सम्मति से, मन्त्रियों के सहमत न होने पर भी वेन को भूमण्डल के राजपद पर अभिषिक्त कर दिया।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

राजा वेन अत्यंत क्रूरकर्मा था। वह किसी भी प्रजाजन द्वारा छोटा सा अपराध किए जाने पर मृत्यु-दण्ड जैसे कठोर दण्ड देता था। इस कारण जब राज्य के चोर-डाकुओं को वेन के राजा बनने की जानकारी मिली तो वे राज्य छोड़कर भाग गए। इससे राज्य में चोर-डाकुओं के उपद्रव तो बंद हो गए। वेन क्रूरकर्मा होने के साथ-साथ घनघोर नास्तिक भी था। उसने ब्राह्मणों तथा सम्पूर्ण प्रजा को आज्ञा दी कि वे कोई यज्ञ न करें तथा किसी देवता का पूजन नहीं करें। एकमात्र वेन ही प्रजा का आराध्य है! इसलिए सभी लोग वेन की पूजा करें। जो लोग इस आज्ञा को भंग करेंगे उन्हें कठोर दण्ड मिलेगा।

जब राजा ने यह घोषणा करवाई तो समस्त ऋषिगण मिलकर वेन को समझाने के उसके पास गए। ऋषियों ने कहा कि राजन! यज्ञ से यज्ञपति भगवान विष्णु संतुष्ट होंगे! उनके प्रसन्न होने पर आपका और प्रजा का कल्याण होगा! इसलिए आप प्रजा को एवं ऋषियों को यज्ञ करने दें। वेन ने ऋषियों के इस परामर्श की अवज्ञा की। इस पर ऋषियों ने हुंकार भरकर एक कुश राजा की ओर फैंका जिसके प्रहार से राजा वेन मर गया। वेन की माता सुनीथा ने अपने पुत्र का शरीर स्नेहवश सुरक्षित रख लिया।

राजा वेन के कोई पुत्र नहीं था, इसलिए ऋषियों ने वेन के शरीर को मथना आरम्भ किया। सबसे पहले वेन की बाईं जांघ को मथा गया जिससे एक काले रंग और नाटे कद का कुरूप पुत्र उत्पन्न हुआ। अत्रि ऋषि ने उससे कहा ‘निषीद!’ अर्थात् बैठ जाओ। इससे उसका नाम ‘निषाद’ पड़ गया और उसके वंशज निषाद कहलाए।

अब ऋषियों ने वेन का दाहिना हाथ मथना आरम्भ किया जिससे अत्यंत सुंदर बालक का जन्म हुआ। ऋषियों ने उसका नाम पृथु रखा तथा उसके शुभ लक्षण देखकर उसे राजा बना दिया। अब ऋषियों ने वेन का बांया हाथ मला जिससे लक्ष्मी-स्वरूपा आदि-सती अर्चि प्रकट हुई।

पद्म पुराण के अनुसार राजा वेन नास्तिक था एवं जैनियों का अनुयायी हो जाने के कारण ऋषियों से तिरस्कृत हुआ तथा पीटा गया, जिससे उसकी जाँघ से निषाद और दाहिने हाथ से पृथु का जन्म हुआ था। पद्म पुराण के अनुसार राजा वेन ने तपस्या करके अपने पापों से मुक्ति पाई।

कुछ पुराणों में वर्णन मिलता है कि राजा वेन यज्ञ में पशुओं की बलि देता था। ऋषियों ने यज्ञों में हिंसा करने का विरोध किया किंतु वेन ने ऋषियों की बात नहीं मानी। इस कारण परमपिता ब्रह्मा बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने नारद मुनि को राजा वेन के पास भेजा ताकि वे वेन को पशुबलि न देने के लिए समझाएं। नारदजी ने राजा से कहा- ‘हे राजन्! यज्ञ में पशुबलि क्यों देते हो? किंचित् आकाश की तरफ देखो!’

जब वेन ने आकाश की तरफ सिर उठाया तो देखा कि जिन पशुओं की राजा ने बलि चढ़ाई थी, वे पशु आकाश में स्थित हैं तथा राजा को घूर रहे हैं। नारद मुनि बोले- ‘देखा राजन्! ये तुम्हारे पाप हैं। तुमने मूक एवं निरपराध पशुओं को देवपूजन के नाम पर मार डाला। तुम्हें लज्जा नहीं आई! क्या इंद्र या अन्य आदित्य पशु-बलि स्वीकार कर लेंगे?

कभी नहीं, वे देवता हैं ….दैत्य नहीं। हे महापापी वेन, पशुओं का रक्त बहाकर तुमने घोर पाप किया है। स्वयं को मनुष्य कहने वाले तुम वास्तव में नरपशु हो! जो सभी जीवों पर करुणा करता है, वही धर्मात्मा है। वह धर्मात्मा हो ही नहीं सकता जो पशुओं का रक्त बहाए। ईश्वर ने सब प्राणियों को जीने का अधिकार दिया है।

किसी मनुष्य को यह अधिकार नहीं है की वह किसी पशु की हत्या करे। जिस तरह तुम अपने परिजनों की हत्या नहीं कर सकते, उसी तरह पशुओं की हत्या मर करो। ईश्वर तुम्हें इस अपराध का दण्ड अवश्य देंगे।’ ऐसा कहकर देवऋषि नारद चले गए किन्तु वेन ने पशु-बलि बंद नहीं की। इस कारण ऋषियों ने कुपित होकर राजा वेन को मार डाला।

राजा पृथु ने पिता बनकर पृथ्वी का पालन किया (6)

0
राजा पृथु - www.bharatkaitihas.com
राजा पृथु ने पिता बनकर पृथ्वी का पालन किया

पिछली कड़ी में हमने चर्चा की थी कि ईक्ष्वाकु राजा अंग के अत्याचारी पुत्र वेन को ऋषियों ने अपनी हुंकार से मार डाला तथा वेन की माता सुनीथा ने मन्त्रा के बल से अपने पुत्र के शव की रक्षा की।

जब धरती पर कोई राजा नहीं रहा तो चारों ओर अव्यवस्था होने लगी। चोर-डाकू और आत्ताई लोग प्रजा को संत्रास देने लगे। वेन के कोई संतान नहीं थी जिसे राजा बनाया जा सके। इसलिए समस्त ऋषियों ने एकत्रित होकर वेन के शव के अंगों का मथन किया। उसकी बाईं जांघ से निषाद का, दाहिनी भुजा से पृथु नामक पुरुष का तथा बाईं भुजा से अर्चि नामक स्त्री का जन्म हुआ।

पृथु के चरण में कमल का और हाथ में चक्र का चिन्ह था। ऋषियों ने पृथु का विवाह अर्चि से कर दिया तथा पृथु को धरती का राजा बना दिया। इस प्रकार अधिकांश पुराण पृथु को वेन का पुत्र मानते हैं जबकि वाल्मीकि रामायण में इन्हें अनरण्य का पुत्र तथा त्रिशंकु का पिता कहा गया है। पृथु ने वेन को ‘पुम’ नामक नरक से छुड़ा लिया।

कुछ पुराणों में पृथु को विष्णु का अंशावतार कहकर उसकी वंदना की है। उनके अनुसार राजा पृथु का अभिषेक करने के लिए समुद्र विभिन्न प्रकार के रत्न और नदियां अपना जल लेकर स्वयं ही उपस्थित हुए। प्रजापति ब्रह्मा, अंगिरस ऋषि, समस्त देवताओं एवं समस्त चराचर भूतों ने उपस्थित होकर राजा पृथु का राज्याभिषेक किया।

महाभारत के शान्ति पर्व के ‘राजधर्मानुशासन पर्व’ में भी राजा पृथु के चरित्र का वर्णन किया गया है। राजा पृथु धरती का पालक सिद्ध हुआ। उसने धरती की इतनी सेवा की कि उसके नाम पर धरती को पृथ्वी अर्थात् ‘पृथु की पुत्री।’ कहा जाने लगा। जिस समय पृथु राजा बना उस समय धरती अन्नविहीन थी तथा प्रजा भूख से त्रस्त थी।

प्रजा का करुण क्रंदन सुनकर राजा पृथु अत्यंत दुखी हुए। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि धरती माता ने अन्न एवं औषधियों को अपने उदर में छिपा लिया है तो वे धनुष-बाण लेकर धरती को मारने दौड़े।

धरती एक स्त्री का रूप धरकर राजा पृथु की शरण में आई और राजा को नमस्कार करके जीवन दान की याचना करती हुई बोली- राजन्! ‘मुझे मारकर अपनी प्रजा को जल पर कैसे रख पाओगे?’

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

पृथु ने कहा- ‘स्त्री पर हाथ उठाना अनुचित है किंतु जो पालनकर्ता अन्य प्राणियों के साथ निर्दयता का व्यवहार करता है उसे दंड अवश्य देना चाहिए।’

धरती ने कहा- ‘मेरा दोहन करके आप सब कुछ प्राप्त करें। आपको मुझे जोतने के लिए मेरे योग्य बछड़े और दोहन-पात्र का प्रबन्ध करना पड़ेगा। मेरी सम्पूर्ण सम्पदा को दुराचारी चोर लूट रहे थे, इसलिए वह सामग्री मैंने अपने गर्भ में सुरक्षित रखी है। मुझे आप समतल बना दीजिये।’

धरती के उत्तर से राजा पृथु सन्तुष्ट हुए। उन्होंने मन को बछड़ा बनाया एवं स्वयं अपने हाथों से पृथ्वी का दोहन करके अपार धन-धान्य प्राप्त किया। फिर देवताओं तथा महर्षियों को भी पृथ्वी के योग्य बछड़ा बनाकर विभिन्न वनस्पतियों, अमृत, सुवर्ण आदि इच्छित वस्तुएं प्राप्त कीं। राजा पृथु ने धरती को अपनी कन्या के रूप में स्वीकार किया तथा धरती को समतल बनाकर पृथु ने स्वयं पिता की भांति धरती एवं उस पर रहने वाली प्रजा का पालन किया। महाभारत में लिखा है कि कि विभिन्न मन्वन्तरों में पृथ्वी ऊँची-नीची हो जाती है। इसलिए राजा पृथु ने धनुष की कोटि द्वारा चारों ओर से शिला-समूहों को उखाड़ डाला और उन्हें एक स्थान पर संचित कर दिया। इससे पर्वतों की लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई बढ़ गयी।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

राजा पृथु की प्रशस्ति में कहा जाता है कि वे इतने प्रतापी थे कि जब वे समुद्र में चलते थे तो समुद्र स्थिर हो जाता था और जब वे पर्वतों पर चलते थे तो पर्वत उनके मार्ग से स्वयं हटकर उन्हें मार्ग प्रदान करते थे। राजा पृथु ने सरस्वती नदी के तट पर पर 100 यज्ञ किए। उस काल में यह क्षेत्र ब्रह्मावर्त प्रदेश कहलाता था। स्वयं भगवान् श्री हरि विष्णु समस्त देवताओं सहित उन यज्ञों में आए।

राजा पृथु के इस उत्कर्ष को देखकर देवराज इंद्र को ईर्ष्या हुई। उसे सन्देह हुआ कि कहीं राजा पृथु इंद्रपुरी न प्राप्त कर ले। इसलिए इन्द्र ने सौवें अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा चुरा लिया। जब इंद्र घोड़ा लेकर आकाश मार्ग से जा रहा था तब अत्रि ऋषि ने उसे देख लिया। अत्रि ने राजा पृथु से कहा- ‘इंद्र यज्ञ का घोड़ा लेकर भाग गया है।’

इस पर राजा पृथु ने अपने पुत्र को आदेश दिया कि वह इंद्र से यज्ञ का घोड़ा छुड़ाकर लाए। राजा पृथु के पुत्र ने इंद्र का पीछा किया। इंद्र ने वेश बदल रखा था। पृथु के पुत्र ने जब देखा कि यज्ञ के घोड़े को लेकर भागने वाला व्यक्ति जटाजूट एवं भस्म लगाए हुए है तो राजकुमार ने उस व्यक्ति को साधु समझकर उस पर बाण चलाना उपयुक्त नहीं समझा और बिना घोड़ा लिए ही वापस लौट आया।

तब अत्रि मुनि ने राजकुमार से कहा- ‘वह साधु नहीं है, साधु के वेश में इन्द्र है।’

इस पर राजकुमार फिर से इन्द्र के पीछे गया। पृथु-कुमार को पुनः आया देखकर इंद्र घोड़े को वहीं छोड़कर अंतर्धान हो गया। पृथु-कुमार अश्व को यज्ञशाला में ले आया। समस्त ऋषियों ने पृथु के पुत्र के पराक्रम की स्तुति की। अश्व को पशुशाला में बाँध दिया गया। अवसर पाकर इंद्र ने पुनः अश्व को चुरा लिया। अत्रि ऋषि ने पुनः पृथु कुमार को सूचित किया। इस पर पृथु के पुत्र ने इंद्र पर बाण चलाया। इंद्र पुनः अश्व छोड़कर भाग गया।

जब राजा पृथु को देवराज इंद्र के इस कृत्य की जानकारी मिली तो उसे बहुत क्रोध आया। ऋषियों ने राजा को शांत किया और कहा कि आप व्रती हैं, यज्ञ के दौरान आप किसी का वध नहीं कर सकते किंतु हम मन्त्र के द्वारा इंद्र को यज्ञकुंड में भस्म किए देते हैं। यह कहकर ऋत्विजों ने मन्त्र से इंद्र का आह्वान किया।

 ऋषिगण यज्ञकुण्ड में आहुति अर्पित करना ही चाहते थे कि प्रजापति ब्रह्मा प्रकट हुए। उन्होंने राजा पृथु से कहा- ‘तुम और इंद्र दोनों ही परमात्मा के अंश हो। तुम तो मोक्ष के अभिलाषी हो। तुम्हें इन यज्ञों की क्या आवश्यकता है? तुम्हारा यह सौवां यज्ञ सम्पूर्ण नहीं हुआ है, चिंता मत करो। यज्ञ को रोक दो। इंद्र के पाखण्ड से जो अधर्म उत्पन्न हो रहा है, उसका नाश करो।’

प्रजापति ब्रह्माजी की यह बात सुनकर भगवान् श्री हरि विष्णु इंद्र को अपने साथ लेकर पृथु की यज्ञशाला में प्रकट हुए। उन्होंने पृथु से कहा- ‘मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। यज्ञ में विघ्न डालने वाले इंद्र को तुम क्षमा कर दो। राजा का धर्म प्रजा की रक्षा करना है। तुम तत्त्वज्ञानी हो। भगवत्-प्रेमी व्यक्ति शत्रु को भी समभाव से देखते हैं। तुम मेरे परम भक्त हो। तुम्हारी जो इच्छा हो, वह माँग लो।’

राजा पृथु ने भगवान् से कहा- ‘भगवन्! मुझे सांसारिक भोगों का वरदान नहीं चाहिए। यदि आप देना ही चाहते हैं तो मुझे एक सहस्र कान दीजिये, जिससे मैं आपका कीर्तन, कथा एवं गुणगान हजारों कानों से सुनता रहूँ!’

भगवान् विष्णु ने कहा- ‘राजन! मैं तुम्हारी अविचल भक्ति से अभिभूत हूँ। तुम धर्म से प्रजा का पालन करो।’ राजा पृथु की बात सुनकर देवराज इंद्र को लज्जा आई और वह राजा पृथु के चरणों में गिर पड़ा। पृथु ने देवराज को उठाकर गले से लगा लिया।

महाराज पृथु तथा उनकी पत्नी अर्चि के पाँच पुत्र हुए- विजिताश्व, धूम्रकेश, हर्यक्ष, द्रविण और वृक। दीर्घकाल तक राज्य करने के पश्चात् राजा पृथु अपना राज्य अपने पुत्र को सौंपकर रानी अर्चि के साथ वन में जाकर तपस्या करने लगे। भगवान् श्री हरि विष्णु के चरणों में ध्यान लगाकर उन्होंने देह त्याग कर दिया। महारानी अर्चि राजा की देह के साथ अग्नि में भस्म हो गई। श्री हरि की कृपा से दोनों को परम-धाम प्राप्त हुआ।

विभिन्न पुराणों में आए राजा पृथु के इस आख्यान से अनुमान होता है कि यह राजा आज से लगभग 10 हजार साल पहले हुआ होगा। क्योंकि वैज्ञानिकों के अनुसार धरती पर कृषि का आरम्भ आज से लगभग 10 हजार साल पहले हुआ। वैज्ञानिकों का मानना है कि आज से 12 हजार वर्ष पहले धरती पर ‘होलोसीन काल’ आरंभ हुआ जो आज तक चल रहा है। इस युग में ही आदमी ने तेजी से अपना मानसिक विकास किया और उसने कृषि तथा पशुपालन आरम्भ करके समाज को व्यवस्थित किया। पौराणिक साहित्य में पृथु नामक अन्य राजाओं का वर्णन भी मिलता है। वृष्णिवंश में उत्पन्न राजा चित्ररथ के पुत्र का नाम भी पृथु था जिसे भगवान श्री कृष्ण ने मथुरापुरी के उत्तरी द्वार का  रक्षक नियुक्त किया था। प्रभास तीर्थ में यादव-वंश के विनाश के समय वह भी मारा गया था। 

राजा धुंधुमार ने धुंधु राक्षस मार दिया (7)

0
राजा धुंधुमार - www.bharatkaitihas.com
राजा धुंधुमार ने धुंधु राक्षस मार दिया

महाभारत के वन पर्व सहित अनेक पुराणों में राजा धुंधुमार की कथा मिलती है। यह कथा किसी प्राकृतिक घटना की ओर संकेत करती है। पुराणों में ईक्ष्वाकु वंश की वंशावली को बहुत ही विकृत कर दिया गया है। इस कारण राजाओं के क्रम का वास्तविक ज्ञान नहीं हो पाता।

कुछ स्थानों पर उल्लेख मिलता है कि राजा त्रिशंकु के पुत्र धुन्धुमार हुये। जबकि कुछ पुराणों के अनुसार ईक्ष्वाकु वंशी राजा कुवलाश्व ने धुंधु नामक दैत्य का वध करके धुंधुमार नाम से ख्याति प्राप्त की।

महाभारत के अनुसार ईक्ष्वाकु वंशी राजा बृहदश्व के पुत्र का नाम कुवलाश्व था। उसने धुंधु नामक दैत्य का वध करके धुंधुमार नाम से ख्याति प्राप्त की। राजा कुवलाश्व ने अपने इक्कीस हजार पुत्रों के साथ मिलकर महर्षि उत्तंक का अपकार करने वाले धुंधु नामक दैत्य को मारा था इसलिए राजा कुवलाश्व का नाम धुंधुमार हुआ।

महाभारत में आई कथा इस प्रकार से है- अत्यंत प्राचीन काल में मरु प्रदेश में रहकर तपस्या करने वाले उत्तंक नामक ऋषि ने भगवान विष्णु की तपस्या करके भगवान श्री हरि को प्रसन्न किया। भगवान ने ऋषि को यह वरदान दिया कि धुंधु नामक दैत्य तीनों लोकों का विनाश करने के लिए घनघोर तपस्या कर रहा है किंतु तुम्हारी आज्ञा से ईक्ष्वाकु वंशी राजा बृहदश्व का पुत्र कुवलाश्व मेरे योगबल का सहारा लेकर उस धुंधु नामक अत्यंत शक्तिशाली दैत्य का वध करेगा।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

इधर तो भगवान ने महर्षि उत्तंक को यह वरदान दिया कि अयोध्या के राजा बृहदश्व का पुत्र धुंधु नामक दैत्य का वध करेगा किंतु उधर अयोध्या का राजा बृहदश्व तपस्या करने के लिए वन में जाने की तैयारी करने लगा। जब यह बात महर्षि उत्तंक को ज्ञात हुई तो उन्होंने अयोध्या पहुंच कर राजा से भेंट की तथा राजा बृहदश्व को समझाया कि असमय ही राज्य त्यागकर वन में नहीं जाना चाहिए। प्रजा की रक्षा करना और उसका पालन करना आपका कर्त्तव्य है। मरुप्रदेश में मेरे आश्रम के निकट रेत से भरा हुआ एक समुद्र है जिसका नाम उज्जालक सागर है। उसकी लम्बाई एवं चौड़ाई अनेक योजन है। वहाँ धुंधु नामक एक बड़ा बलवान दैत्य रहता है। वह मधु-कैटभ का पुत्र है। वह सदैव पृथ्वी के भीतर छिपकर रहता है। बालू के भीतर छिपकर रहने वाला वह महाक्रूर दैत्य वर्ष में एक बार सांस लेता है। जब वह सांस छोड़ता है तो पर्वत और वनों के सहित यह पृथ्वी डोलने लगती है। उसकी श्ंवास से उठी आंधी से रते का इतना ऊंचा बवंडर उठता है कि उससे सूर्य भी ढक जाता है। सात दिनों तक भूचाल होता रहता है। अग्नि की लपटें चिनगारियां और धुएं उठते रहते हैं। महाराज! इन उत्पातों के कारण हमारा आश्रम में रहना अत्यंत कठिन हो गया है। मनुष्यों का कल्याण करने के लिए आप उस दैत्य का वध कीजिए।’

राजा बृहदश्व ने हाथ जोड़कर मुनि से कहा- ‘हे ब्राह्मण! आप जिस उद्देश्य से यहाँ पधारे हैं, वह निष्फल नहीं होगा। मेरा पुत्र कुवलाश्व इस भूमण्डल में अद्वितीय वीर है। यह बड़ा धैर्यवान और फुर्तीला है। आपका अभीष्ट कार्य वह अवश्य पूर्ण करेगा। इसके बलवान् पुत्र भी अस्त्र-शस्त्र लेकर इस युद्ध में उसका साथ देंगे। आप मुझे छोड़ दीजिए क्योंकि अब मैंने शस्त्रों को त्याग दिया और और मैं युद्ध से निवृत्त हो गया हूँ।’

महर्षि उत्तंक ने कहा- ‘बहुत अच्छा!’

इस पर राजा बृहदश्व ने अपने पुत्र कुवलाश्व को बुलाया और उसे आज्ञा दी कि वह इस ब्राह्मण का अभीष्ट पूर्ण करे। यह आज्ञा देकर राजा बृहदश्व तप करने के लिए वन में चला गया।

महाभारत में लिखा है कि धुंधु नामक इस महाबली दैत्य ने एक पैर से खड़े होकर बहुत काल तक तपस्या की थी। जब प्रजापति ब्रह्मा उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए तो ब्रह्माजी ने धुंधु को वर मांगने के लिए कहा। धुंधु बोला कि आप मुझे ऐसा वर दीजिए जिसके कारण मेरी मृत्यु किसी देवता, दानव, गंधर्व, यक्ष, राक्षस और सर्प से न हो। ब्रह्माजी ने उससे कहा कि अच्छा ऐसा ही होगा। इस प्रकार धुंधु दैत्य अभय होकर महर्षि उत्तंक के आश्रम के निकट अपनी श्वास से आग की चिनगारियां छोड़ता हुआ रेत में रहने लगा।

इक्ष्वाकु वंशी राजा बृहदश्व के आदेश से उसका पुत्र कुवलाश्व उत्तंक मुनि के साथ सेना और सवारी लेकर मरुस्थल में आया। उसके इक्कीस हजार पुत्र भी उसकी सेना के साथ थे। महर्षि उत्तंक की प्रार्थना पर भगवान श्री हरि विष्णु ने अपना तेज राजा कुवलाश्व में स्थापित कर दिया। कुवलाश्व ज्यों ही युद्ध के लिए आगे बढ़ा, त्यों ही आकाशवाणी हुई कि राजा कुवलाश्व स्वयं अवध्य रहकर धुंधु को मारेगा और धुंधुमार नाम से विख्यात होगा। देवताओं ने राजा कुवलाश्व पर पुष्पों की वर्षा की। देवताओं के बजाए बिना ही, देवताओं की दुंदुभियां बज उठीं। ठण्डी हवाएं चलने लगीं और पृथ्वी की उड़ती हुई धूल को शांत करने के लिए इन्द्र धीरे-धीरे वर्षा करने लगा।

भगवान श्री हरि विष्णु के तेज से बढ़ा हुआ राजा कुवलाश्व शीघ्र ही समुद्र के किनारे पहुंचा और अपने पुत्रों से चारों ओर की रेत खुदवाने लगा। सात दिनों तक खुदाई होने के पश्चात् महाबलवान् धुंधु दैत्य दिखाई पड़ा। बालू के भीतर उसका बहुत बड़ा विकराल शरीर छिपा हुआ था जो प्रकट होने पर अपने तेज से दीदीप्यमान होने लगा, मानो सूर्य ही प्रकाशमान हो रहे हों।

धुंधु दैत्य प्रलयकाल की अग्नि के समान पश्चिम दिशा को घेरकर सो रहा था। कुवलाश्व के पुत्रों ने उसे सब ओर से घेर लिया और वे तीखे बाण, गदा, मूसल, पट्टिश, परिघ और तलवार आदि अस्त्र-शस्त्रों से उस पर प्रहार करने लगे। उन लोगों की मार खाकर वह महाबली दैत्य क्रोध में भरकर उठा और उनके चलाए हुए शस्त्रों को गालर-मूली की तरह खा गया। इसके बाद वह संसंवर्तक अग्नि के समान आग की लपटें उगलने लगा और अपने तेज से उन सब राजकुमारों को एक क्षण में भस्म कर दिया जैसे पूर्वकाल में सगर के साठ हजार पुत्रों को कपिल मुनि ने भस्म कर डाला था।

जब समस्त इक्ष्वाकु राजकुमार धुंधु की क्रोधिाग्नि में स्वाहा हो गए तब महातेजस्वी कुवलाश्व उसकी ओर बढ़ा। उसके शीरर से जल की वर्षा होने लगी जिसने धुंधु के मुख से निकलती हुई आग को पी लिया। इस प्रकार योगी कुवलाश्व ने योगबल से उस आग को बुझा दिया और स्वयं ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करके समस्त जगत् का भय दूर करने के लिए उस दैत्य को जलाकर भस्म कर दिया। धुंधु को मारने के कारण वह धुंधुमार नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस युद्ध में राजा कुवलाश्व के समस्त इक्कीस हजार पुत्र धुंधु के मुख से निकली निःश्वासाग्नि से जलकर मर गए किंतु तीन पुत्र दृढ़ाश्व, कपिलाश्व और चंद्राश्व जीवित बच गए। 

राजा धुंधुमार के हाथों धुंधु के वध की कथा निश्चय ही किसी बड़ी प्राकृतिक घटना की ओर संकेत करती है। यह घटना काफी बाद की प्रतीत होती है क्योंकि इस काल तक हिमालय से निकलने वाली नदियों द्वारा लाई गई रेत के कारण समुद्र के किनारे पर विशाल रेगिस्तान उत्पन्न हो चुका था और समुद्र अपने मूल स्थान से काफी दूर खिसक चुका था।

अवश्य ही उस काल में इस क्षेत्र में टिक्टोनिक्स प्लेटें खिसककर आपस में टकराती होंगी जिनके कारण विशाल भूकम्प आते रहे होंगे यहाँ तक कि पृथ्वी के गर्भ में दबा हुआ गर्म लावा भी धरती की सतह को फूटकर बाहर निकलता होगा। संभवतः इन्हीं भूगर्भीय हलचलों के कारण धरती के ऊपर आकाश में दूर तक धूल और धुंआं फैल जाते होंगे और भूकम्प आया करते होंगे। जब इस क्षेत्र की टिक्टोनिक्स प्लेटें शांत हो गई होंगी तब धुंधुमार के आख्यान की कल्पना की गई होगी।

त्रेता युग लंगड़ाता हुआ आ गया (78)

0
त्रेता युग - www.bharatkaitihas.com
त्रेता युग लंगड़ाता हुआ आ गया

सत्युग को कृत युग भी कहा जाता है तथा कहा जाता है कि गणितीय गणना के अनुसार कृतयुग के बाद द्वापर को, द्वापर के बाद त्रेता युग को और त्रेता के बाद कलियुग को आना चाहिए था किंतु कृतयुग के समाप्त होते ही द्वापर के स्थान पर त्रेता आ गया।

पिछली कड़ियों में हमने ईक्ष्वाकु वंश के जिन राजाओं की कथा कही है, वे सत्युग के राजा थे। राजा धुंधुमार के बाद सत्युग में ईक्ष्वाकु वंश के सात राजा और भी हुए किंतु उनके काल की बड़ी घटनाएं पौराणिक साहित्य में प्राप्त नहीं होती हैं। युवनाश्व (द्वितीय) को सत्युग का अंतिम ईक्ष्वाकु वंशीय राजा कहा जाता है।

यद्यपि विभिन्न पुराणों में ईक्ष्वाकुओं की वंशावलियां अलग-अलग दी गई हैं तथापि हम युवनाश्व को ही सत्युग का अंतिम ईक्ष्वाकुवंशीय राजा मान रहे हैं क्योंकि यह माना जाता है कि युवनाश्व का पुत्र मांधाता त्रेतायुग का पहला ईक्ष्वाकुवंशीय राजा था।

सत्युग को कृत युग भी कहा जाता है तथा कहा जाता है कि गणितीय गणना के अनुसार कृतयुग के बाद द्वापर को, द्वापर के बाद त्रेता युग को और त्रेता के बाद कलियुग को आना चाहिए था किंतु कृतयुग के समाप्त होते ही द्वापर के स्थान पर त्रेता आ गया।

पुराणों में वर्णित कथाओं में त्रेता से पहले द्वापर के आगमन का कारण यह बताया जाता है कि सतयुग में धर्म रूपी वृषभ चारों पैरों पर मजबूती से खड़ा रहता है जबकि त्रेतायुग में केवल तीन पैरों पर और द्वापर में दो पैरों पर खड़ा रहता है।

कलियुग में धर्म रूपी बैल का एक ही पैर शेष रह जाने के कारण वह चलने में असमर्थ हो जाता है अर्थात् इस युग में धर्म महत्वहीन हो जाता है। इस मान्यता के अनुसार एक महायुग में क्रमशः सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग आते हैं।

चूंकि त्रेता में धर्म रूपी वृषभ चार पैरों के स्थान पर तीन पैरों पर चलता है इसलिए वह लंगड़ाते हुए चलता है।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

पुराणों के अनुसार जब तक ब्रह्माजी का दिन रहता है, तब तक पृथ्वी पर सृष्टि रहती है और जब ब्रह्माजी की रात होती है तब महाप्रलय हो जाती है। ब्रह्माजी के इस दिन को 1000 महायुगों में बांटा गया है तथा प्रत्येक महायुग को चार युगों में बांटा गया है जिन्हें सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलियुग कहा जाता है।

त्रेता युग मानव सृष्टि का द्वितीय युग है। इस युग में भगवान श्री हरि विष्णु के पाँचवे अवतार अर्थात् वामन, छठे अवतार अर्थात् परशुराम और सातवें अवतार अर्थात् श्री राम प्रकट हुए थे। यह काल इक्ष्वाकु वंशी राजा मांधाता के जन्म से आरम्भ होता है तथा इक्ष्वाकु वंशी राजा श्रीरामचंद्र की लौकिक लीलाओं के समापन के साथ पूर्ण होता है।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

विभिन्न पुराणों के अनुसार सतयुग 17 लाख 28 हजार सौर वर्ष का होता है। त्रेता 12 लाख 96 हजार सौर वर्ष का होता है, द्वापर 8 लाख 64 हजार सौर वर्ष का होता है। अंतिम युग अर्थात् कलियुग 4 लाख 32 हजार सौर वर्ष का होता है। जब द्वापर युग में गंधमादन पर्वत पर महाबली भीमसेन हनुमानजी से मिले तो हनुमानजी ने भीमसेन को बताया कि सबसे पहले सतयुग आया, उस युग में मनुष्य के मन में जो भी कामना आती थी वह पूर्ण हो जाती थी, इसलिए उसे क्रेता युग और सतयुग कहते थे। इसमें धर्म की कभी हानि नहीं होती थी। उसके बाद त्रेता युग आया। इस युग में लोग कर्म करके कर्मफल प्राप्त करते थे। फिर द्वापर युग आया जिसमें लोग सत्य एवं धर्म से दूर हो गए और अधर्म का बोलबाला हो गया। इसके समाप्त होने पर कलियुग आएगा जिसमें चारों और अधर्म का साम्राज्य दिखाई देगा और मनुष्य को उसकी इच्छा के अनुसार फल नहीं मिलेगा। पुराणों में मान्याता है कि सतयुग के नायक महाराज मनु हैं। त्रेता के नायक श्री रामचंद्र हैं। द्वापर के नायक भगवान श्रीकृष्ण हैं। कलियुग में भी भगवान विष्णु का एक अवतार होगा, वही इस युग के नायक होंगे।

पुराणों में मान्यता है कि सतयुग में मनुष्य की लम्बाई 32 फुट और आयु 1 लाख वर्ष हुआ करती थी। इस युग का सबसे बड़ा तीर्थ पुष्कर है। जबकि इस युग में भगवान श्री हरि के अवतार मत्स्य, हयग्रीव, कूर्म, वाराह और नृसिंह हैं। इस युग में पाप शून्य प्रतिशत और पुण्य 100 प्रतिशत फलीभूत होता है।

इस युग में मुद्रा रत्न की होती थी और पात्र स्वर्ण के होते थे। त्रेतायुग में मनुष्य की आयु 10 हजार वर्ष और लंबाई 21 फुट थी। इस युग का तीर्थ नैमिषारण्य और अवतार वामन, परशुराम और श्रीरामचंद्र हैं। इस युग में पापकर्म 25 प्रतिशत थे और पुण्य कर्म 75 प्रतिशत थे। इस युग में मुद्रा स्वर्ण की होती थी तथा पात्र चांदी के होते थे।

द्वापर में मनुष्य की आयु 1 हजार वर्ष और लंबाई 11 फुट बताई गई है। इस युग का तीर्थ कुरुक्षेत्र और अवतार भगवान श्रीकृष्ण हैं। इस युग में पाप कर्म और पुण्य कर्म  बराबर-बराबर थे। इस युग की मुद्रा चांदी की होती थी और पात्र ताम्र के होते थे।

कलियुग में मनुष्य की आयु 100 वर्ष और लंबाई 5 फुट पांच इंच बताई गई है। इसका तीर्थ गंगाजी हैं। इसके अवतार बुद्ध एवं कल्कि हैं। इस युग में पाप कर्म 75 प्रतिशत और पुण्य कर्म 25 प्रतिशत होते हैं। इस युग की मुद्रा लोहे की और पात्र मिट्टी के हैं।

पुराणों की मान्यता है कि एक एक युग में एक एक वर्ण का शासन होता है। सतयुग में ब्राह्मणों अर्थात् ऋषि-मुनियों का शासन था। उस समय जप, तप, पूजा-पाठ और वैदिक नियमों का पालन किया जाताथा। त्रेता में क्षत्रिय वंश का शासन हुआ। इस युग में धरती पर युद्धों की भरमार थी। द्वापर में वैश्यों की अधिकता हुई। इस युग में व्यापार एवं वाणिज्य ने खूब वृद्धि की।

कलियुग को शूद्रों का अर्थात् नौकरी करने वालों का युग कहा गया है। कलियुग का वर्णन इन शब्दों में किया जाता है-

दस हजार बीते बरस, कलि में तजि हरि देहि।

तासु अर्द्ध सुर नदी जल, ग्रामदेव अधि तेहि।

अर्थात्- जब कलियुग के दस हजार वर्ष शेष रह जाएंगे तब भगवान विष्णु पृथ्वी छोड़ देंगे। जब पांच हजार वर्ष शेष रह जाएंगे तब गंगाजी का जल पृथ्वी को छोड़ देगा और जब ढाई हजार वर्ष शेष रहेंगे तब ग्राम देवता गांवों को त्याग देंगे।

पुराणों के अनुसार कलियुग में अधर्म इतना बढ़ जाएगा कि चारों ओर पाप और अत्याचार होते हुए दिखाई देंगे। पृथ्वी पर सूर्य की गर्मी बढ़ जाएगी। धरती के समस्त जल स्रोत सूख जाएंगे। शास्त्रों के अनुसार चारों युगों का क्रम अनवरत चलता है और कलियुग के बाद प्रलय होता है। भगवान शिव प्रलय के देवता माने गए हैं और उन्हीं के द्वारा सृष्टि का प्रलय किया जाता है। पूरी सृष्टि का नाश होने के बाद पुनः सृष्टि रची जाती है।

राजा मांधाता को दिव्य त्रिशूल से नष्ट कर दिया लवणासुर ने (9)

0
राजा मांधाता - www.bharatkaitihas.com
राजा मांधाता को दिव्य त्रिशूल से नष्ट कर दिया लवणासुर ने

राजा मांधाता की कथा वायुपुराण, विष्णु पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, भागवत पुराण, मत्स्य पुराण, वाल्मीकि रामायण, महाभारत आदि ग्रंथों में मिलती है। इन कथाओं के अनुसार ईक्ष्वाकुवंशी राजा युवनाश्व सतयुग का अंतिम राजा था।

विष्णु पुराण के अनुसार अयोध्या नरेश युवनाश्व निःसंतान था। च्यवन ऋषि की सलाह पर राजा युवनाश्व ने पुत्रेष्टि यज्ञ किया। जब यज्ञ सम्पन्न हुआ, तब तक बहुत रात्रि व्यतीत हो चुकी थी। अतः समस्त ऋषिगण यज्ञ से अभिमंत्रित जल को एक घड़े में रख कर सो गये।

रात्रि में राजा युवनाश्व को प्यास लगी और उन्होंने घड़े में से जल लेकर पी लिया। उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि इस घड़े में अभिमंत्रित जल है। जब ऋषियों की आंख खुली तो उन्होंने देखा कि घड़ा पूर्णतः रिक्त है तथा उसमें अभिमंत्रित जल नहीं है।

ऋषियों ने वहाँ उपस्थित समस्त लोगों से जल के बारे में पूछा। इस पर राजा युवनाश्व ने बताया कि वह जल मैंने पी लिया! ऋषियों ने राजा से कहा कि अब उन्हीं की कोख से एक बालक जन्म लेगा।

जब इस घटना को एक सौ साल बीत गए, तब अश्विनीकुमारों ने राजा युवनाश्व की बायीं कोख फाड़कर एक बालक को बाहर निकाला। इस अवसर पर स्वर्ग के अन्य देवता भी उपस्थिति हुए।

देवताओं ने कहा कि यह तो एक पुरुष से उत्पन्न बालक है, यह क्या पिएगा? इस पर देवराज इंद्र ने अपनी तर्जनी अंगुली बालक के मुंह में डालकर- माम् अयं धाता। अर्थात् यह मुझे ही पीयेगा। इस कारण बालक का नाम मांधाता पड़ गया।

देवराज इन्द्र की अंगुली पीते-तीते वह बालक तेरह हाथ जितना बड़ा हो गया। इस दिव्य बालक ने चिंतनमात्र से धनुर्वेद सहित समस्त वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया। इंद्र ने उसका राज्याभिषेक किया।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

राजा मांधाता ने अपने धर्म से तीनों लोकों को नाप लिया। एक बार जब उसके राज्य में बारह वर्ष तक वर्षा नहीं हुई तो राजा ने देवराज इन्द्र से वर्षा करने के लिए कहा किंतु देवराज इन्द्र ने राजा मान्धाता के तप-बल की परीक्षा करने के लिए धरती पर वर्षा नहीं की। इस पर राजा मांधाता ने इंद्र के सामने ही धरती पर वर्षा करके अपनी प्रजा के प्राणों की रक्षा की।

राजा मांधाता ने अंगार, मरूत, असित, गय तथा बृहद्रथ आदि अनेक राजाओं को परास्त करके अपने राज्य का विस्तार किया। उसका राज्य इतना बड़ा हो गया कि सूर्याेदय होने से लेकर सूर्यास्त होने तक सूर्य भगवान जितने प्रदेश में गमन करते थे, उतना प्रदेश राजा मांधाता के अधीन था। राजा मांधाता ने सौ अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ करके दस योजन लंबे और एक योजन ऊंचे रोहित नामक सोने के मत्स्य बनवाकर ब्राह्मणों को दान दिए।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

राजा मांधाता ने दीर्घकाल तक धर्मपूर्वक राज्य करने के उपरांत भगवान श्री हरि विष्णु के दर्शनों के निमित्त घनघोर तपस्या की। भगवान विष्णु ने इंद्र का रूप धारण करके तथा मरुतों को अपने साथ लेकर, राजा मांधाता को दर्शन दिए। राजा ने कहा कि मैं अब राज्य त्यागकर वन में जाना चाहता हूँ। इस पर भगवान विष्णु ने राजा मांधाता को क्षत्रियोचित कर्म का निर्वाह करते रहने का उपदेश दिया तथा मरुतों सहित अंतर्धान हो गए। ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार मांधाता राजा भगवान श्री हरि विष्णु के मनुष्य-अवतार थे। कुछ पुराणों में आई कथाओं के अनुसार वे महाराज युवनाश्व और महारानी गौरी के पुत्र थे। यदुवंशी नरेश शशबिंदु की राजकन्या बिंदुमती राजा मांधाता की रानी थीं जिसे चैत्ररथी भी कहते थे। रानी बिंदुमती से मुचकुंद, अंबरीष और पुरुकुत्स नामक तीन पुत्र और 50 कन्याएँ उत्पन्न हुईं। पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा मांधाता की पचास पुत्रियों का विवाह सौभरि नामक ऋषि से हुआ था। सौभरि ऋषि ने अपने योगबल से अपनी पत्नियों के निवास के लिए स्फटिक के महल बनवाए तथा उन महलों में सब प्रकार के सुख-संसाधन उपलब्ध करवाए। सौभरि ऋषि अपने योग बल से अपनी समस्त पत्नियों के साथ कुछ न कुछ दिन अवश्य व्यतीत करते थे। इन राजकन्याओं से सौभरि ऋषि को 150 संतानें प्राप्त हुईं।

एक पौराणिक कथा के अनुसार राजा मांधाता संपूर्ण पृथ्वी को जीतकर स्वर्ग भी जीतना चाहते थे। राजा के इस विचार से देवराज इंद्र सहित समस्त देवता चिंतित हुए। उन्होंने राजा मांधाता को आधे स्वर्ग का राज्य देना चाहा परन्तु उन्होंने आधे देवलोक का राज्य स्वीकार नहीं किया। वे संपूर्ण इंद्रलोक के राजा बनने के इच्छुक थे।

देवराज इंद्र ने कहा- ‘हे राजन! अभी तो सम्पूर्ण पृथ्वी भी आपके अधीन नहीं है, मधुवन का राजा लवणासुर आपका आदेश नहीं मानता और आप सम्पूर्ण देवलोक पर आधिपत्य मांग रहे हैं!’

देवराज का यह उपालम्भ सुनकर राजा मांधाता लज्जित होकर मृत्युलोक में लौट आए। उन्होंने दैत्यराज लवणासुर के पास दूत भेजकर कहलवाया कि या तो लवणासुर राजा मान्धाता की अधीनता स्वीकार करे अन्यथा युद्ध के लिए तैयार रहे। लवणासुर ने राजा मांधाता के दूत का भक्षण कर लिया। इस पर दोनों ओर की सेनाओं में भीषण युद्ध आरम्भ हो गया।

लवणासुर के पास उसके पिता दैत्यराज मधु द्वारा दिया गया एक दिव्य त्रिशूल था जो मधु को भगवान शिव से प्राप्त हुआ था। राजा मांधाता को इस दिव्य त्रिशूल की जानकारी नहीं थी, इसलिए उसने बिना सोचे-समझे लवणासुर पर आक्रमण कर दिया और वह धोखे से मार दिया गया।

लवणासुर ने अपने त्रिशूल से न केवल राजा मांधाता को अपितु उसकी सम्पूर्ण सेना को भी भस्म कर दिया। इस प्रकार देवराज इन्द्र ने युक्ति से काम लेकर राजा मांधाता को नष्ट करवा दिया जो सम्पूर्ण देवलोक पर आधिपत्य करने का आकांक्षी था।

पुराणों में ऐसी बहुत सी कथाएं हैं जिनमें यह बताया गया है कि जिस किसी भी मनुष्य ने सशरीर स्वर्ग में प्रवेश करने का प्रयास किया अथवा स्वर्ग पर विजय प्राप्त करने का उद्यम किया, उसका शीघ्र ही सर्वनाश हो गया। राजा मांधाता के काल की सबसे बड़ी घटना यह है कि उसके शासन काल में ही धरती पर सतयुग समाप्त होकर त्रेता युग आरम्भ हुआ था।

राजा सत्यव्रत के लिए नया स्वर्ग बना दिया ऋषि विश्वामित्र ने (10)

0
राजा सत्यव्रत - www.bharatkaitihas.com
Banner of Blog Post राजा सत्यव्रत के लिए नया स्वर्ग बना दिया ऋषि विश्वामित्र ने

ईक्ष्वाकु वंश में राजा मांधाता के वंशजों में से सातवां वंशज राजा सत्यव्रत था। उसे पुराणों में त्रिशंकु के नाम से जाना जाता है। राजा त्रिशंकु की कहानी का वर्णन वाल्मीकि रामायण के बाल काण्ड में भी किया गया है।

इस कथा के अनुसार राजा सत्यव्रत ईक्ष्वाकु वंशी राजा पृथु के पुत्र और राजा रामचंद्र के पूर्वज हैं। राजा सत्यव्रत जब वृद्ध होने लगे तो उन्हें राज-पाट त्याग कर अपने पुत्र हरिश्चंद्र को अयोध्या का राजा घोषित कर दिया। राजा सत्यव्रत एक धार्मिक पुरुष थे इसलिए उनकी आत्मा स्वर्ग के योग्य थी परंतु उनकी इच्छा सशरीर स्वर्ग जाने की थी। इस इच्छा की पूर्ति के लिए उन्होने अपने गुरु ऋषि वशिष्ठ से यज्ञ करने की प्रार्थना की। ऋषि वशिष्ठ ने यज्ञ करने से मना कर दिया कि स-शरीर स्वर्ग में प्रवेश की कामना प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है।

सत्यव्रत अपनी ज़िद पर अड़े रहे और इच्छा की पूर्ति के लिए ऋषि वशिष्ठ के ज्येष्ठ पुत्र शक्ति को यज्ञ करने के लिए धन एवं प्रसिद्धि का लालच दिया। सत्यव्रत के इस दुस्साहस ने ऋषिपुत्र शक्ति को क्रोधित कर दिया और शक्ति ने सत्यव्रत को चाण्डाल होने का श्राप दे दिया। इस पर राजा सत्यव्रत दुखी होकर वनों में भटकने लगा।

वन में भटकते हुये सत्यव्रत की भेंट ऋषि विश्वामित्र से हुई। ऋषि विश्वामित्र ने राजा सत्यव्रत से पूछा कि वनों में क्यों भटक रहे हैं? इस पर राजा ने ऋषि को सम्पूर्ण वृत्तांत बताया।

ऋषि विश्वामित्र को राजा सत्यव्रत पर दया आ गई। उन्होंने पहले भी राजा सत्यव्रत के पूर्वज रोहित के प्राणों की रक्षा की थी। ऋषि विश्वामित्र ने राजा को सांत्वना दी और कहा कि आप निराश न हों, मैं आपके लिए यज्ञ करूंगा और आपको सशरीर स्वर्ग पहुंचाउंगा।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

ऋषि की बात सुनकर राजा सत्यव्रत बहुत प्रसन्न हुआ और ऋषि द्वारा बताए गए अनुष्ठान करने लगा। विश्वामित्र ने अपने चार पुत्रों से कहा कि वे यज्ञ की सामग्री एकत्रित करें तथा वन में निवास कर रहे समस्त ऋषि-मुनियों को यज्ञ में भाग लेने के लिए आमंत्रित करें।

बहुत से ऋषि-मुनियों ने विश्वामित्र के निमन्त्रण को स्वीकार कर लिया किन्तु महर्षि वसिष्ठ के पुत्रों ने यह कहकर उस निमन्त्रण को अस्वीकार कर दिया कि जिस यज्ञ में यजमान चाण्डाल और पुरोहित क्षत्रिय हो उस यज्ञ का भाग हम स्वीकार नहीं कर सकते। यह सुनकर विश्वामित्र ने वसिष्ठ के पुत्रों को श्राप दिया कि वे कालपाश में बँधकर यमलोक जाएं और सात सौ वर्षों तक चाण्डाल योनि में विचरण करें। विश्वामित्र के शाप से महर्षि वसिष्ठ के पुत्र यमलोक चले गए।

जब आसपास के वनों के बहुत से ऋषि आ गए तब विश्वामित्र ने यज्ञ आरम्भ किया। यज्ञ की समाप्ति पर विश्वामित्र ने समस्त देवताओं के नाम ले-लेकर उन्हें यज्ञ-भाग ग्रहण करने के लिये आह्वान किया किन्तु कोई भी देवता अपना भाग लेने नहीं आया। इस पर क्रुद्ध होकर विश्वामित्र ने अर्घ्य हाथ में लेकर कहा- हे सत्यव्रत! मैं आपको अपनी तपस्या के बल से स्वर्ग भेजता हूँ।’

इतना कह कर विश्वामित्र ने मन्त्र पढ़ते हुए आकाश में जल छिड़का और राजा त्रिशंकु शरीर सहित आकाश में चढ़ता हुआ स्वर्ग जा पहुँचा।

राजा सत्यव्रत को सशरीर देवलोक में आया जानकर स्वर्ग में खलबली मच गयी। इन्द्र ने क्रोध में भरकर राजा से कहा- ‘रे मूर्ख! तुझे तेरे गुरु ने शाप दिया है इसलिये तू स्वर्ग में रहने योग्य नहीं है।’

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

इन्द्र के ऐसा कहते ही त्रिशंकु सिर के बल पृथ्वी पर गिरने लगा। स्वर्ग से धकेले जाने पर राजा सत्यव्रत करुण पुकार लगाता हुआ धरती की तरफ गिरने लगा। इस पर विश्वामित्र ने जोर से कहा- ‘तत्रैव तिष्ठ!’ अर्थात्- वहीं पर ठहरो। विश्वामित्र के आदेश से राजा सत्यव्रत का धरती पर गिरना रुक गया और वह त्रिशंकु की तरह अंतरिक्ष में औंधा लटक गया। तभी से इस राजा का नाम त्रिशंकु पड़ गया। आकाश में उलटे लटके हुए त्रिशंकु ने ऋषि विश्वामित्र से सहायता करने की प्रार्थना की। विश्वामित्र ने अपनी दिव्य शक्तियों का प्रयोग करके धरती एवं स्वर्ग के बीच में एक नया स्वर्ग बना दिया और त्रिशंकु को श्राप से मुक्त करते हुये इस नए स्वर्ग में रहने के लिए भेज दिया। मान्यता है कि विश्वामित्र ने नए स्वर्ग के साथ नए तारों का निर्माण किया तथा दक्षिण दिशा में नया सप्तर्षि मण्डल भी बना दिया। विश्वामित्र ने नए स्वर्ग के लिए कुछ नवीन प्राणियों एवं वनस्पतियों की रचना की। उन्होंने जौ के स्थान पर गेहूँ, गाय के स्थान पर भैंस, हाथी के स्थान पर ऊंट तथा फलों के स्थान पर नारियल की रचना की। कुछ ग्रंथों की मान्यता है कि विश्वामित्र द्वारा बनाए गए नवीन स्वर्ग को देवताओं ने नष्ट कर दिया किंतु विश्वामित्र के अनुरोध पर गेहूं, भैंस, ऊंट तथा नारियल को नष्ट नहीं किया गया।

इसी प्रकार विश्वामित्र द्वारा निर्मित त्रिशंकु नक्षत्र मण्डल भी सप्तऋषि मण्डल के दक्षिण में आज भी देखा जा सकता है।

कुछ पुराणों के अनुसार जब विश्वामित्र ने राजा सत्यव्रत को नवीन स्वर्ग का इन्द्र बनाने के लिए तप आरम्भ किया तब इस तप से चिंतित देवताओं ने विश्वामित्र को समझाया कि वे यह तप न करें। देवताओं ने विश्वामित्र की अवज्ञा नहीं की है, अपितु उन्होंने किसी भी मनुष्य के स-शरीर स्वर्ग में प्रवेश की अप्राकृतिक घटना को रोका है।

महर्षि विश्वामित्र ने देवताओं की प्रार्थना स्वीकार कर ली तथा उनसे कहा कि मैं अपनी तपस्या रोक दूंगा किंतु देवताओं को भी वचन देना होगा कि वे राजा सत्यव्रत को नए स्वर्ग में सुख से रहने देंगे। इस पर देवताओं ने राजा सत्यव्रत से वचन लिया कि वह कभी भी स्वयं इन्द्र नहीं बनेगा तथा देवराज इन्द्र की आज्ञा की अवहेलना नहीं करेगा।

इस प्रकार राजा सत्यव्रत को स्वर्ग में तो प्रवेश नहीं मिला किंतु उसे रहने के लिए एक नया स्वर्ग मिल गया। मान्यता है कि राजा त्रिशंकु अपने स्वर्ग के साथ आज भी वास्तविक स्वर्ग और पृथ्वी के बीच में लटका हुआ है।

राजा हरिश्चंद्र ने रानी से शमशान का कर मांगा (11)

0
राजा हरिश्चंद्र - www.bharatkaitihas.com
राजा हरिश्चंद्र ने रानी से शमशान का कर मांगा

राजा हरिश्चंद्र ने अपनी रानी तारामती से कहा कि वह अपनी साड़ी फाड़कर आधी साड़ी से शमशान का कर चुकाए। शमशान का कर चुकाए बिना वह अपने पुत्र का संस्कार शमशान में नहीं कर पाएगी।

ईक्ष्वाकु वंशी राजाओं में जितने भी प्रसिद्ध राजा हुए हैं उनमें महाराज हरिश्चंद्र का नाम भी अत्यधिक आदर से लिया जाता है। हिन्दू धर्म में सत्य को ईश्वरीय गुण माना गया है। परमात्मा को सत्यवादी प्रिय होता है और असत्यवादी अप्रिय।

भारत वर्ष में जब भी सत्यवादियों की चर्चा होती है, तब ईक्ष्वाकुवंशी महाराज हरिश्चन्द्र का नाम सबसे पहले लिया जाता है। महाराज हरिश्चंद्र उसी राजा सत्यव्रत के पुत्र थे जिन्हें भारतीय पौराणिक इतिहास में त्रिशंकु के नाम से जाना जाता है।

राजा हरिश्चंद्र त्रेता युग में ईक्ष्वाकु वंश के नौवें राजा थे। उनकी राजधानी अयोध्या थी। महाराज हरिश्चंद्र के बहुत काल तक कोई संतान नहीं हुई। अतः उन्होंने अपने कुलगुरु महिर्ष वशिष्ठ के आदेश से वरुण की उपासना की। वरुण ने राजा को एक पुत्र का वरदान दिया। समय आने पर राजा हरिश्चंद्र की रानी तारामती ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम रोहिताश्व रखा गया। कुछ ग्रंथों में रानी तारामती का नाम शैव्या भी मिलता है।

राजा हरिश्चंद्र सत्य भाषण और वचन पालन के लिए प्रसिद्ध हुए। ऋषि विश्वामित्र ने भी राजा हरिश्चंद्र की प्रसिद्धि सुनी और उन्होंने राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा लेने का निश्चय किया। महर्षि के तप बल के प्रभाव से राजा हरिश्चन्द्र ने स्वप्न में देखा कि उनके पास एक ऋषि आए हैं तथा राजा से उसका राजपाट मांग रहे हैं। राजा ने ऋषि को राजपाट देने का वचन दिया। कुछ देर बाद राजा की नींद खुल गई और वे स्वप्न के बारे में भूल गए।

जब प्रातः हुई तो महर्षि विश्वामित्र राजा हरिश्चंद्र के महल में आए। उन्होंने राजा हरिश्चंद्र से कहा कि आपने अपना समस्त राज्य मुझे देने का वचन दिया है। अपना वचन पूरा कीजिए। राजा को रात में देखे हुए स्वपन की याद आ गई और उसने महर्षि विश्वामित्र को स्वप्न में दिए गए वचन के अनुसार अपना समस्त राज्य उन्हें सौंप दिया।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

जब राजा हरिश्चंद्र अपनी रानी तारामती एवं पुत्र रोहिताश्व के साथ महल छोड़कर जाने लगे तो महर्षि विश्वामित्र ने राजा से दान के पश्चात् दी जाने वाली दक्षिण मांगी तथा दक्षिणा में पांच सौ स्वर्ण मुद्राओं की मांग की।

अब राजा के पास ऋषि को देने के लिए कुछ भी नहीं था, वे अपना राजपाट एवं राजकोष सभी महर्षि विश्वामित्र को दान कर चुके थे। इस पर राजा ने ऋषि से अनुरोध किया- ‘मुझे कुछ समय दीजिए, मैं आपको दक्षिणा अवश्य दे दूंगा।’

ऋषि ने राजा का अनुरोध स्वीकार कर लिया। इसके बाद राजा हरिश्चंद्र अपनी रानी एवं पुत्र के साथ अयोध्या छोड़कर काशी चले गए तथा उन्होंने स्वयं को दास के रूप में बेचकर पांच सौ स्वर्ण मुद्राएं प्राप्त करनी चाहीं किंतु काशी में किसी ने भी राजा को दास के रूप में नहीं खरीदा। इस पर राजा हरिश्चंद्र ने अपनी रानी तारामती और पुत्र रोहिताश्व को बेचकर स्वर्ण मुद्राएं प्राप्त कीं किंतु वे भी पांच सौ नहीं हो पाईं। इस पर राजा हरिश्चंद्र ने स्वयं को काशी नगर से बाहर शमशान में निवास करने वाले एक डोम के हाथों बेच दिया। इस प्रकार पांच सौ स्वर्ण मुद्राएं एकत्रित करके राजा ने ऋषि की दक्षिणा चुका दी।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

जिस डोम ने राजा हरिश्चंद्र को क्रय किया था, उसने राजा को शवदाह के लिए आने वाले शवों से ‘शमशान-कर’ एकत्रित करने के काम पर लगा दिया। इधर राजा शमाशान में रहकर अपने दिन व्यतीत कर रहे थे और उधर नगर में दासी के रूप में काम कर रही रानी तारामती के पुत्र रोहिताश्व को एक दिन सर्प ने डंस लिया जिससे राजकुमार रोहिताश्व की मृत्यु हो गयी। रानी तारामती अपने पुत्र रोहिताश्व की मृत्यु पर संताप करने लगीं। रानी को भय था कि राजा हरिश्चंद्र अपने पुत्र के शव को देखकर दुःख से कातर हो जाएंगे। इसलिए वह रात होने की प्रतीक्षा करने लगी। जब रात का अंधेरा घिर आया तब रानी अपने पुत्र के शव को लेकर शमशान पहुंची। रानी ने अपना मुंह अपनी साड़ी से ढंक लिया तथा अपने पुत्र के मुंह पर भी कपड़ा डाल दिया ताकि राजा हरिश्चंद्र अपनी रानी एवं पुत्र को इस संकट में देखकर दुःखी न हों। रानी संकटों में घिरे अपने पति के दुःखों को और नहीं बढ़ाना चाहती थी तथा राजकुमार की मृत्यु का समाचार राजा से छिपाना चाहती थी। शमशान पहुंचकर रानी तारामती अपने पुत्र की मृत-देह की चुपचाप अंत्येष्टि करने की चेष्टा करने लगी।

तभी डोम का सेवक अर्थात् राजा हरिश्चंद्र वहाँ आ गए और उन्होंने अपने पुत्र का शवदाह करने वाली स्त्री से शमशान का कर मांगा। रानी के पास देने के लिए कुछ नहीं था। इसलिए उसने शमशान का कर देने में असमर्थता प्रकट की।

राजा ने कहा- ‘मैं शमशान का कर लिए बिना आपको इस बालक का शवदाह नहीं करने दूंगा।’

उसी समय आकाश में बिजली चमकी तथा हवा के झौंके से रानी के मुंह से कपड़ा हट गया। राजा हरिश्चंद्र ने अपनी पत्नी को पहचान लिया। वह समझ गए कि जिस बालक का शवदाह किया जाना है, वह उनका अपना पुत्र रोहिताश्व है। राजा हरिश्चंद्र को अपनी रानी एवं पुत्र की यह दशा देखकर बहुत बहुत दुःख हुआ।

उस दिन राजा और रानी का एकादशी का व्रत था और उन दोनों ने ही पूरे दिन में पानी की एक बूंद तक ग्रहण नहीं की थी। उस पर यह घनघोर विपत्ति आन पड़ी थी। फिर भी राजा ने रानी को दुःख की इस घड़ी में धैर्य से काम लेने का उपदेश दिया तथा उससे शमशान का कर मांगा ताकि रानी अपने पुत्र की अंत्येष्टि कर सके। रानी ने पुनः कहा कि मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है।

इस पर राजा ने कहा कि शमशान का कर तो तुम्हें देना ही होगा। उससे कोई मुक्त नहीं हो सकता। यदि मैं किसी को छोड़ दूँ तो यह अपने स्वामी के प्रति विश्वासघात होगा। यदि तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है तो अपनी साड़ी का आधा भाग कर के रूप में दे दो।

राजा ने कहा- जिस सत्य की रक्षा के लिए हमने अपना महल और राजपाट त्याग दिए, स्वयं को और अपने पुत्र को बेच दिया, उसी सत्य की रक्षा के लिए हमें प्राण भी त्यागने पड़ें तो भी हम पीछे नहीं हटेंगे।’

राजा का यह संकल्प सुनकर आकाशवाणी हुई और महर्षि विश्वामित्र सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र एवं रानी तारामती के समक्ष प्रकट हुए और उन्होंने कहा- ‘हरिश्चन्द्र! तुमने सत्य को जीवन में धारण करने का उच्चतम आदर्श स्थापित किया है। तुम्हारी कर्त्तव्य-निष्ठा महान् है, तुम कोई वर मांगो!’

इस पर राजा ने कहा- ऋषिवर! मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए किंतु यदि आप देना ही चाहते हैं तो इस स्त्री के पुत्र को जीवित कर दीजिए। यह पुत्र ही इसके जीवन का आधार है।’ राजा के इच्छा व्यक्त करते ही राजकुमार रोहिताश्व जीवित हो उठा।

महर्षि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र से कहा- ‘राजन्! मुझे तुम्हारा राजपाट नहीं चाहिए, यह तो मैं तुम्हारी सत्यनिष्ठा की परीक्षा ले रहा था। तुम धन्य हो जिसने स्वप्न में दिए गए वचन का भी पूरी सत्यनिष्ठा से पालन किया। तुम ही अपनी प्रजा के राजा हो, जाओ धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करो।

ऋषि की आज्ञा पाकर राजा और रानी राजकुमार रोहिताश्व के साथ फिर से अपनी राजधानी अयोध्या में चले गए और उन्होंने दीर्घकाल तक राज्य किया तथा अपनी प्रजा को सुखी बनाया। राजा हरिश्चंद्र के बारे में यह दोहा कहा जाता है-

चन्द्र टरे सूरज टरे, टरे जगत व्यवहार।

पै दृढ़व्रत हरिश्चन्द्र को, टरे न सत्य विचार।

राजा सगर ने यवनों के सिर मूंड कर उन्हें धर्म से वंचित कर दिया (12)

0
राजा सगर - www.bharatkaitihas.com
राजा सगर ने यवनों के सिर मूंड कर उन्हें धर्म से वंचित कर दिया

ईक्ष्वाकु वंशी राजाओं में राजा बाहुक का नाम बहुत प्रसिद्ध है। वे राजा हरिश्चंद्र के बाद की लगभग सातवीं पीढ़ी के राजा हैं। चूंकि अलग अलग पुराणों, वाल्मीकि रामायण एवं महाभारत में सगर के पिता का नाम अलग-अलग दिया हुआ है, इसलिए यह निश्चित कर पाना संभव नहीं है कि राजा बाहुक हरिश्चंद्र की पीढ़ी में कौनसा था।

हरिवंश पुराण के अनुसार राजा सगर के पिता का नाम बाहुक था। वह आखेट एवं द्यूतक्रीड़ा का अत्यंत शौकीन था। इसलिए हैहय, तालजंघ, तथा शक राजाओं ने बाहुक के राज्य पर आक्रमण करके उसके राज्य को नष्ट कर दिया। यवन, पारद काम्बोज, खस और पह्लव नामक पांच गणों ने भी इस कार्य में हैहय एवं तालजंघों का साथ दिया था।

इस पर राजा बाहुक दुखी होकर वन में चला गया और उसने वहीं अपने प्राण त्याग दिए। इस पर राजा बाहुक की यदुवंशी रानी भी सती होने लगी। रानी उस समय गर्भवती थी इसलिए वन में रहने वाले भृगुवंशी ऋषि और्व ने रानी के प्राणों की रक्षा की।

रानी को उसकी सौत ने विष दे दिया था जिससे रानी के गर्भ में बालक के साथ विष भी था। और्व ऋषि ने रानी के गर्भ में स्थित बालक और विष दोनों को निकाल दिया। यही बालक आगे चलकर सगर कहलाया। संस्कृत में विष को गर भी कहते हैं चूंकि यह बालक गर के साथ उत्पन्न हुआ था इसलिए इसे सगर कहा गया।

कुछ पुराणों के अनुसार सगर के पिता का नाम असित था। राजा असित अत्यंत पराक्रमी था। हैहय, तालजंघ, शूर और शशबिन्दु नामक राजा उनके शत्रु थे। राजा असित को उनसे युद्ध करते-करते अपना राज्य त्यागकर अपनी दो रानियों  के साथ हिमालय चले जाना पड़ा। वहाँ कुछ काल बाद राजा असित की मृत्यु हो गयी।

उस समय उसकी दोनों रानियां गर्भवती थीं। उनमें से एक का नाम कालिंदी था। कालिंदी की संतान को नष्ट करने के लिए उसकी सौत ने उसको विष दे दिया। कालिंदी अपनी संतान की रक्षा के निमित्त भृगुवंशी महर्षि च्यवन के पास गयी। महर्षि ने उसे आश्वासन दिया कि उसकी कोख से एक प्रतापी बालक विष के साथ जन्म लेगा। अतः उसके पुत्र का नाम सगर पड़ा।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

भृगुवंशी ऋर्षि और्व ने बालक सगर के जातकर्म संस्कार किए तथा उन्हें वेद एवं शास्त्र पढ़ाए। ऋर्षि और्व ने सगर को अस्त्र-शस्त्र एवं युद्ध-नीति की भी शिक्षा दी तथा देवताओं के लिए दुर्लभ महाघोर आग्नेय अस्त्र प्रदान किया। जब बालक सगर बड़ा हुआ तो उसने क्रोध में भरकर हैहयों का संहार कर डाला।

इसके बाद उसने यवन, शक, काम्बोज, पारद और पह्लवों को भी निःशेष कर दिया तथा अपने पिता के खोए हुए राज्य एवं इक्ष्वाकुओं की प्राचीन राजधानी अयोध्या पर भी अधिकार कर लिया। जब राजा सगर ने यवन, शक, काम्बोज, पारद और पह्लवों का मूल नाश करने का निश्चय किया तो ये समस्त राजा भागकर महर्षि वसिष्ठ के चरणों में जा गिरे। महर्षि वसिष्ठ इक्ष्वाकुओं के कुलगुरु थे। उन्होंने राजा सगर से कहकर इन राजाओं को मारने से रोक दिया।

राजा सगर ने गुरु की आज्ञा का सम्मान करते हुए यवन, शक, काम्बोज, पारद और पह्लवों का संहार तो नहीं किया किंतु उनके धर्म को नष्ट कर दिया तथा उनका वेश बदल दिया। उन्होंने शकों के आधे सिर को मूंडकर छोड़ दिया। यवनों के सारे सिर को मूंड दिया और काम्बोजों को भी सिर मूंडकर उन्हें जीवित ही छोड़ दिया।

राजा सगर ने पारदों के सिर को मुक्तकेश अर्थात् खुले बालों वाला बना दिया और पह्लवों को श्मश्रुधारी अर्थात् बड़ी-बड़ी दाढ़ी-मूंछ वाला बना दिया। राजा सगर ने इन सब जातियों को धर्म से वंचित करके उनके द्वारा किए जाने वाले धर्मग्रंथों के अध्ययन पर रोक लगा दी।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

हरिवंश पुराण के अनुसार शक, यवन, काम्बोज, पादर, कोलिसर्प महिष, दर्द, चोल और केरल आदि क्षत्रिय ही थे। महर्षि वसिष्ठ के वचन पर राजा सगर ने इन सबका संहार नहीं करके उनके धर्म को नष्ट कर दिया। उस धर्म विजयी राजा ने अश्वमेध की दीक्षा लेकर खस, तुषार, चोल, मद्र, किष्किन्धक, कौन्तल, वंग, साल्व तथा कोंकण देश के राजाओं को जीता। सगर अयोध्या नगरी का राजा हुआ। उसकी बड़ी रानी विदर्भ नरेश की पुत्री केशिनी थी और छोटी रानी का नाम सुमति था। महाभारत के अनुसार सगर की रानियों के नाम वैदर्भी एवं शैव्या थे। उन दोनों को अपने रूप तथा यौवन का बहुत अभिमान था। जब दीर्घकाल तक दोनों रानियों के कोई पुत्र नहीं हुआ तो राजा सगर ने दोनों रानियों के साथ हिमालय के प्रस्रवण गिरि पर तप किया। बड़ी रानी ने एक पुत्र की और छोटी रानी ने साठ हजार पुत्रों की कामना की। राजा एवं रानियों की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने राजा सगर को वरदान दिया कि उसकी एक रानी को राजा सगर का वंश चलाने वाले एक पुत्र की प्राप्ति होगी और दूसरी रानी के गर्भ से साठ हजार वीर एवं उत्साही पुत्र जन्म लेंगे। कुछ समय पश्चात् रानी केशिनी के गर्भ से असमंजस नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ और रानी सुमति के गर्भ से एक तूंबा निकला।

राजा ने इस तूंबे को फैंकने की आज्ञा दी किंतु उसी समय आकाशवाणी हुई कि इस तूम्बे में साठ हजार बीज हैं। इन बीजों को घी में रखो, जिनसे समय आने पर साठ हजार राजकुमारों का जन्म होगा। राजा ने ऐसा ही किया।

बड़ी रानी का पुत्र असमंजस बहुत दुष्ट प्रकृति का था। वह पुरवासियों के दुर्बल बच्चों को गर्दन से पकड़कर मार डालता था। एक बार उसने अयोध्या नगरी के बच्चों को एकत्रित करके सरयू नदी में डाल दिया। अतः राजा सगर ने राजकुमार असमंजस का परित्याग कर दिया। इस पर असमंजस ने राजा से कहा- ‘मैंने पूर्वजन्म में मिले किसी श्राप के वशीभूत होकर ऐसा किया है। मैं अपने योगबल से अयोध्या के समस्त बच्चों को फिर से जीवित कर दूंगा।’

राजकुमार असमंजस ने समस्त बच्चों को अपने योगबल से पुनर्जीवित कर दिया तथा स्वयं तपस्या करने के लिए वन में चला गया। राजकुमार असमंजस को अयोध्या छोड़कर जाते देखकर अयोध्यावासियों को बहुत पश्चात्ताप हुआ। कालांतर में राजकुमार असमंजस के एक पुत्र हुआ जिसका नाम अंशुमान था। वह वीर, मधुरभाषी और पराक्रमी था। वह अपने पिता को छोड़कर अपने पुरखों की राजधानी अयोध्या लौट आया।

दूसरी रानी के गर्भ से उत्पन्न तूंबे से समय आने पर साठ हजार पुत्रों ने जन्म लिया।  महाभारत के अनुसार राजा सगर को साठ हजार उद्धत पुत्रों की प्राप्ति हुई। वे क्रूरकर्मी बालक आकाश में भी विचरण कर सकते थे तथा प्रजा को बहुत तंग करते थे।                       

राजा सगर के पुत्र (13)

0
राजा सगर के पुत्र - www.bharatkaitihas.com
राजा सगर के पुत्र

राजा सगर के पुत्र बड़े पराक्रमी एवं वीर थे किंतु दुष्ट स्वभाव एवं क्रूर कर्मा होने के कारण उन्होंने धरती एवं समुद्र को बहुत कष्ट दिया।

पिछली कड़ी में हमने राजा सगर की बड़ी रानी केशिनी के गर्भ से असमंजस नामक दुष्ट पुत्र की तथा छोटी रानी सुमति के गर्भ से एक तूम्बे का जन्म होने की कथा की चर्चा की थी जिससे राजा सगर के साठ हजार पुत्रों ने जन्म लिया। जिस तरह रानी केशिनी का पुत्र असमंज अत्यंत दुष्ट था उसी तरह रानी सुमति के साठ हजार पुत्र भी अत्यंत दुष्ट एवं क्रूर कर्मा थे।

एक बार राजा सगर ने विंध्याचल पर्वत और हिमालय पर्वत के मध्य किसी स्थान पर अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। राजा सगर ने अपने पौत्र अंशुमान को यज्ञ के घोड़े की रक्षा का दायित्व सौंपा। अभी यज्ञ चल ही रहा था कि यज्ञ का घोड़ा सहसा अदृश्य हो गया। वस्तुतः देवराज इन्द्र राक्षस का रूप धारण करके यज्ञ का घोड़ा चुराकर ले गया और उसे पाताल लोक में ले जाकर बांध दिया।

राजा सगर ने अपने साठ हज़ार पुत्रों को आज्ञा दी कि वे पृथ्वी को खोदकर घोड़े को ढूंढ़ लायें। जब तक वे नहीं लौटेंगे, तब तक राजा सगर और राजकुमार अंशुमान यज्ञ पूर्ण करने के लिए यज्ञशाला में ही रहेंगे। सगर-पुत्रों ने समुद्र के निकट पूर्व दिशा की ओर धरती में एक स्थान पर दरार देखी।

सगर के पुत्रों ने वहीं से पृथ्वी को खोदना आरम्भ किया जिसके कारण समुद्र को बहुत कष्ट हुआ तथा समुद्र के भीतर निवास करने वाले हजारों नाग एवं असुर आदि प्राणियों का नाश होने लगा। वे सब अपने प्राण बचाने के लिए देवताओं से करुण पुकार लगाने लगे।

इस पर समस्त देवता गण एकत्रित होकर पितामह ब्रह्मा के पास पहुंचे और उन्हें बताया कि राजा सगर के पुत्रों के कारण पृथ्वी और समुद्र के जीव-जंतु किस तरह चिल्ला रहे हैं। ब्रह्मा ने कहा कि आप चिंता न करें, पृथ्वी विष्णु भगवान की स्त्री है। अतः भगवान विष्णु ही कपिल मुनि का रूप धारण करके पृथ्वी की रक्षा करेंगे।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

सगर के पुत्रों ने एक सहस्र योजन भूमि खोद डाली। वहाँ उन्हें पृथ्वी को धारण करने वाले विरूपाक्ष नामक दिग्गज को देखा। राजा सगर के पुत्रों ने विरूपाक्ष का बहुत सम्मान किया और फिर वहाँ से आगे बढ़े। सगर के पुत्रों ने दक्षिण दिशा में महापद्म दिग्गज, उत्तर दिशा में श्वेतवर्ण भद्र दिग्गज तथा पश्चिम दिशा में सोमनस दिग्गज को देखा। इस प्रकार चारों दिशाओं को देखते हुए सगर-पुत्रों ने पाताल लोक में प्रवेश किया जहाँ कपिल मुनि तपस्या कर रहे थे। उनके निकट ही यज्ञ का अश्व बंधा हुआ था। इन्हीं कपिल मुनि ने सांख्य दर्शन का प्रणयन किया था जो भारतीय षड़्दर्शन के छः दर्शनों में से एक है।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

हरिवंश पुराण के अनुसार सगर के पुत्रों ने श्री हरि विष्णु को कपिल मुनि के रूप में समाधि लगाए हुए देखा। सगर के पुत्रों ने समझा कि कपिल मुनि ने ही यज्ञ का अश्व चुराया है। अतः सगर के पुत्रों ने कपिल मुनि का निरादर किया। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार कपिल मुनि के कोप के कारण सगर के साठ हजार पुत्रों के अपने शरीरों से आग निकलने लगी जिसमें जलकर वे भस्म हो गए। केवल चार राजकुमार बर्हकेतु, सुकेतु, धर्मरथ और पंचजन ही जीवित बचे। इधर जब राजा सगर ने देखा कि उसके पुत्रों को गए हुए बहुत दिन हो गए हैं तो राजा सगर ने अपने पौत्र अंशुमान को अपने चाचाओं तथा यज्ञ के अश्व को ढूंढ़ने के लिए भेजा और स्वयं यज्ञशाला में बैठा रहा। अंशुमान यज्ञ के अश्व तथा अपने चाचाओं को ढूंढता हुआ पाताल लोक में स्थित कपिल मुनि के आश्रम में पहुंचा। उसने वहाँ पर यज्ञ के अश्व तथा अपने चाचाओं की भस्म के ढेर को देखा। राजकुमार अंशुमान ने अपने चाचाओं की मुक्ति के लिए जल से तर्पण करना चाहा किंतु वहाँ कोई जलाशय नहीं मिला। उसी समय पक्षीराज गरुड़जी वहाँ आए। गरुड़जी ने अंशुमान को बताया कि यह सब कपिल मुनि के शाप से हुआ है, अतः साधारण जलदान से कुछ नहीं होगा। तुम्हारे चाचाओं की मुक्ति गंगाजी के जल से तर्पण करने पर होगी। इस समय तो तुम अश्व लेकर जाओ और अपने पितामह का यज्ञ पूर्ण करवाओ।

राजकुमार अंशुमान ने गरुड़जी की बात मान ली। राजकुमार अंशुमान ने कपिल मुनि को प्रणाम करके उन्हें प्रसन्न किया। मुनि ने प्रसन्न होकर उसके आने का कारण पूछा।

अंशुमान ने उन्हें बताया कि उसका पितामह यज्ञशाला में बैठा हुआ अपने पुत्रों एवं यज्ञ के अश्वों की प्रतीक्षा कर रहा है। मुनि ने राजकुमार अंशुमान से कहा कि वह यज्ञ के अश्व को ले जाए। मेरे द्वारा भस्म किए गए तुम्हारे पितृव्यों की मुक्ति तुम्हारे पौत्र भगीरथ के हाथों होगी जब वह भगवान शिव को प्रसन्न करके भगवती गंगा को धरती पर लाएगा और उनके जल से इनका तर्पण करेगा। राजा सगर का कुल अक्षय कीर्ति प्राप्त करेगा तथा आज से समुद्र को सागर अर्थात् राजा सगर का पुत्र कहा जाएगा।

कपिल मुनि के आदेश से राजकुमार अंशुमान यज्ञ का अश्व पुनः धरती पर ले आया और राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ पूर्ण किया। यदि पौराणिक साहित्य में आए वर्णन एवं धरती की भौगोलिक बनावट को मिलाकर देखा जाए तो पुराणों में जिसे पाताल लोक कहा जाता है, वस्तुतः वह आज के दक्षिण-पूर्वी एशियाई द्वीप हैं जिनमें आज के इण्डोनेशियाई द्वीप एवं ऑस्ट्रेलिया भी शामिल हैं।

राजा सगर के पुत्रों ने समुद्र के पूर्व की ओर खुदाई आरम्भ की थी। अतः पर्याप्त संभव है कि कपिल मुनि इन्हीं द्वीपों में से किसी द्वीप पर तपस्या करते हों। भारतीय पुराणों में पाताल लोक में जिन दैत्यों एवं असुरों के छिपने का स्थान माना गया है, वे यही द्वीप हैं। पौराणिक काल में इन द्वीपों की कतार लंका से आरम्भ होकर ऑस्ट्रेलिया पर जाकर समाप्त होती थी। आज तो धरती का मानचित्र बदल गया है तथा द्वीपों की स्थिति में बहुत परिवर्तन आ गया है।

हम जानते हैं कि बहुत सी पौराणिक कथाओं में प्राकृतिक घटनाओं का मानवीकरण किया गया है। वस्तुतः राजा सगर की कथा भी किसी प्राकृतिक घटना की ओर संकेत करती हुई दिखाई देती है। इस घटना का सम्बन्ध समुद्र के भारत की मुख्य धरती से पूर्व अथवा दक्षिण-पूर्व की ओर विस्तृत होने से लगता है।

प्रागैतिहासिक काल में विश्व दो भूखण्डों- अंगारालैण्ड तथा गौंडवाना लैण्ड में बंटा हुआ था। इन दोनों भूखण्डों के बीच में टेथिस महासागर स्थित था। जबकि आज धरती सात महाद्वीपों में विभक्त है तथा ये महाद्वीप समुद्रों के बीच में स्थित हैं। सगर के पुत्रों द्वारा धरती को खोदकर समुद्र को दुःख देने का रूपक समुद्र के विस्तार पाने अथवा दो भूखण्डों के टूटकर सात महाद्वीपों में बंटने जैसी किसी घटना की ओर संकेत करती है।

‘पउम चरित’ नामक जैन ग्रंथ में इस पौराणिक कथा के स्वरूप में बहुत परिवर्तन कर दिया गया है तथा अंत में राजा सगर को जैन धर्म में दीक्षित होते हुए दिखाया गया है।

- Advertisement -

Latest articles

डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

0
चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

0
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...
पुष्पक विमान - www.bharatkaitihas.com

पुष्पक विमान विभीषण को क्यों नहीं लौटाया था श्रीराम ने?

0
रावण का वध करने के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो उन्होंने पुष्पक विमान लंका के नए राजा विभीषण को क्यों नहीं लौटाया?...
एनीमल फार्म - www.bharatkaitihas.com

एनीमल फार्म और भारतीय राजनीति

0
क्या आपने उस किताब का नाम सुना है जिसने 1950 के दशक में पूरी दुनिया में आग लगा दी थी! क्या आपने एनीमल फार्म...
हरम बेगम का कपट जाल - www.bharatkaitihas.com

हरम बेगम का कपट जाल (69)

0
बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है...