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चण्डी बोरोबुदुर (13)

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चण्डी बोरोबुदुर - www.bharatkaitihas.com
चण्डी बोरोबुदुर

इंडोनेशिया में प्राचीन मंदिरों को चण्डी कहा जाता है। इस कारण बोरोबुदुर बौद्ध स्मारक को ” चण्डी बोरोबुदुर ” भी कहा जाता है। जावा में चण्डी शब्द प्राचीन बनावट के द्वार और स्नान से सम्बन्धित रचनाओं के लिए प्रयुक्त होता है। बोरोबुदुर शब्द का अर्थ ज्ञात नहीं है।

इस शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख अंग्रेज इतिहासकार सर थॉमस रैफल्स की पुस्तक History of Jawa में हुआ था किंतु इस नाम का इससे पुराना कोई उल्लेख किसी शिलालेख अथवा ग्रंथ में उपलब्ध नहीं होता है। ई.1365 के एक तालपत्र (ताड़पत्र) में कहा गया है कि ”पवित्र बौद्ध पूजा स्थल नगरकरेतागमा” को ”बुदुर” कहा जाता है। यह तालपत्र मजापहित राजदरबारी एवं बौद्ध विद्वान मपु प्रपंचा द्वारा ई.1365 में लिखा गया था। संभवतः थॉमस रैफल्स ने (ई.1814 में) उसी तालपत्र के आधार पर इस बौद्ध स्मारक का नाम बोरो बुदुर लिखा।

कुछ विद्वानों के अनुसार बोरोबुदुर, बोरे-बुदुर का अपभ्रंश है जिसका अर्थ ”बोरे गाँव के निकट बुदुर (बुद्ध) का मंदिर” था। इण्डोनेशिया में अधिकांश मंदिरों के नाम निकटतम गाँवों के नाम पर रखे हुए हैं। जावा भाषा के अनुसार इस स्मारक का नाम ”बुदुरबोरो” होना चाहिए। रैफल्स ने यह भी सुझाव दिया कि बुदुर सम्भवतः आधुनिक जावा भाषा के शब्द बुद्ध से बना है।

अन्य पुरातत्त्ववेत्ताओं के अनुसार नाम का दूसरा घटक (बुदुर)  जावा भाषा के ”भुधारा” शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है- ”पहाड़”। ध्यान देने की बात है कि भारत में भूधर का अर्थ पहाड़ होता है। अन्य सम्भावित शब्द-व्युत्पतियों के अनुसार बोरोबुदुर ”बुद्ध उहर” अर्थात् बुद्ध-विहार है और यह जावा भाषा के ”बियरा बेदुहुर” शब्द का अपभ्रंश उच्चारण है।

बुद्ध-उहर का अर्थ ”बुद्ध का नगर” भी हो सकता है। जावा भाषा में बेदुहुर शब्द का अर्थ ”एक उच्च स्थान” भी होता है। कसपरिस के अनुसार बोरोबुदूर का मूल नाम भूमि सम्भार भुधार है जो एक संस्कृत शब्द है और इसका अर्थ ”बोधिसत्व के दस चरणों के संयुक्त गुणों का पहाड़” है।

धार्मिक बौद्ध इमारत का निर्माण और उद्घाटन

चण्डी बोरोबुदुर के निर्माण एवं उद्घाटन के सम्बन्ध में दो शिलालेख मिले हैं। ये दोनों शिलालेख तमांगगंग रीजेंसी में केदु नामक स्थान पर मिले हैं। ई.824 के कायुमवुंगान शिलालेख के अनुसार राजा समरतुंग की पुत्री प्रमोदवर्द्धिनी ने जिनालया (उन लोगों का क्षेत्र जिन्होंने सांसारिक इच्छा और और अपने आत्मज्ञान पर विजय प्राप्त कर ली) नामक धार्मिक भवन का उद्घाटन किया।

ई.824 के ही त्रितेपुसन शिलालेख में लिखा है कि क्री कहुलुन्नण (प्रमोदवर्द्धिनी को कहुलुन्नण भी कहते हैं) ने भूमिसम्भार नामक कमूलान को धन और रख-रखाव सुनिश्चित करने के लिए (कर-रहित) भूमि प्रदान की। कमूलान का अर्थ ”उद्गम स्थल” होता है। यह पूर्वजों की याद में बनाया गया एक धार्मिक स्थल है जो शैलेन्द्र राजंवश से सम्बंधित है।

बोरोबुदुर, पावोन और मेंदुत का रहस्य

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बोरोबुदुर बौद्ध मंदिर, योग्यकर्ता नगर से लगभग 40 किलोमीटर दूर और सुरकर्ता नगर से 86 किलोमीटर दूर स्थित है। यह दो जुड़वां ज्वालामुखियों, सुंदोरो-सुम्बिंग और मेर्बाबू-मेरापी एवं दो नदियों प्रोगो और एलो के बीच एक ऊंचे क्षेत्र में स्थित है। इस क्षेत्र को केदू का मैदान भी कहा जाता है। स्थानीय मिथकों एवं दंतकथाओं के अनुसार केदू का मैदान, जावा के पवित्र स्थलों में से एक है। इस क्षेत्र की उच्च कृषि उर्वरता के कारण इसे The Garden of Jawa अर्थात् जावा का बगीचा भी कहा जाता है। 20वीं सदी में मरम्मत कार्य के दौरान यह पाया गया कि इस क्षेत्र के तीनों बौद्ध मंदिर, बोरोबुदुर, पावोन और मेंदुत, एक सीधी रेखा में स्थित हैं। ऐसा माना जाता है कि तीनों मंदिर किसी धार्मिक कारण से एक सीध में बनाए गए थे, यह कारण क्या था, इसके बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं है। विश्व में अनेक स्थानों पर ऐसे पिरामिड पाए गए हैं जो एक सीधी रेखा में स्थित हैं और यह माना जाता है कि ये पिरामिड धरती के मुनष्यों ने नहीं बनाए थे अपितु दूसरे ग्रहों से धरती पर आए परग्रही इंसानों ने बनाए थे।

झील में तैरता पुष्प कमल था चण्डी बोरोबुदुर

चण्डी बोरोबुदुर अर्थात् बोरोबुदुर मंदिर का निर्माण समुद्र तल से 265 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक झील में खड़ी 49 फुट ऊंची  चट्टान पर किया गया था। इस प्राचीन झील का अस्तित्व, 20वीं सदी के आरम्भ में पुरातत्वविदों के बीच गहन चर्चा का विषय था। ई.1931 में हिंदू और बौद्ध वास्तुकला के डच विद्वान डब्ल्यू ओ. जे. नियूवेनकैम्प द्वारा विकसित सिद्धांत के अनुसार ”केदू मैदान” प्राचीन काल में एक झील हुआ करता था और बोरोबुदुर अपने निर्माण के समय इसी झील में कमल पुष्प के समान तैरता था।

चण्डी बोरोबुदुर के निर्माण का समय मंदिर में उत्कीर्णित उच्चावचों और 8वीं तथा 9वीं सदी के दौरान सामान्य रूप से प्रयुक्त शाही पात्रों के अभिलेखों की तुलना से अनुमानित किया जाता है। बोरोबुदुर सम्भवतः ई.800 के लगभग स्थापित हुआ। यह मध्य जावा में शैलेन्द्र राजवंश के शिखर काल ई.760 से 830 से मेल खाता है। इस समय यह श्रीविजय राजवंश के प्रभाव में था। इसके निर्माण का अनुमानित समय 75 वर्ष है और निर्माण कार्य ई.825 के लगभग समरतुंग के कार्यकाल में पूर्ण होना अनुमानित है।

जावा में हिन्दू और बौद्ध शासकों के समय में भ्रम की स्थिति है। शैलेन्द्र राजवंश को बौद्ध धर्म का कट्टर अनुयायी माना जाता है। यद्यपि सोजोमेर्टो में प्राप्त प्रस्तर शिलालेखों के अनुसार वे हिन्दू थे। उनके काल में केदु मैदान के निकट स्थित मैदानों और पहाड़ों में हिन्दू मंदिरों एवं बौद्ध स्मारकों का निर्माण हुआ।

ई.720 में शैव राजा संजय ने बोरोबुदुर से 10 कि.मी. पूर्व में स्थित वुकिर पहाड़ी पर परमबनन शिव मंदिर का निर्माण आरम्भ करवाया। कुछ विद्वानों के अनुसार उस काल में बोरोबुदुर सहित इस क्षेत्र के अन्य बौद्ध मंदिरों का निर्माण इसलिए सम्भव था क्योंकि संजय के उत्तराधिकारी राकाई पिकातान ने बौद्ध अनुयाइयों को इस तरह के मंदिरों के निर्माण की अनुमति प्रदान कर दी थी। ई.778 के कलसन राजपत्र के अनुसार, पिकातान ने बौद्धों के प्रति अपना सम्मान प्रदर्शन करने के लिए बौद्ध समुदाय को कलसन नामक गाँव दिया।

कुछ पुरातत्वविदों का मत है कि एक हिन्दू राजा द्वारा बौद्ध स्मारकों की स्थापना में सहायता करना, इस बात का प्रमाण है कि जावा में कभी भी बड़ा धार्मिक टकराव नहीं था। यद्यपि इस समय वहाँ दो विरोधी राजवंश राज्य कर रहे थे जिनमें से शैलेन्द्र राजवंश बौद्ध धर्म का अनुयाई था और संजय राजवंश शैव धर्म का।

इन दोनों राजवंशों में आगे चलकर रातु बोको महालय को लेकर ई.856 में युद्ध हुआ। भ्रम की स्थिति परमबनन परिसर के रारा जोंग्गरंग मंदिर के बारे में भी मौजूद है जो संजय राजवंश के बोरोबुदुर के प्रत्युत्तर में शैलेन्द्र राजवंश के विजेता रकाई पिकातान ने स्थापित करवाया। अन्य मतों के अनुसार वहाँ पर शान्तिपूर्वक सह-अस्तित्व का वातावरण था जहाँ ”रारा-जोंग्गरंग” शैलेन्द्र राजवंश की राजकुमारी होकर भी संजय राजवंश में रानी बनकर आई और शिव मंदिर के निर्माण में भागीदार रही।

गुमनामी के अंधेरों में गुम चण्डी बोरोबुदुर

ई.928 से 1006 के बीच मेरापी पहाड़ में शृंखलाबद्ध ज्वालामुखियों के फूट पड़ने के कारण राजा मपु सिनदोक ने माताराम राजवंश (इसे संजय राजवंश भी कहते हैं) की राजधानी को पूर्वी जावा में स्थानान्तरित कर दिया। इस कारण बोरोबुदुर का क्षेत्र निर्जन हो गया और यह मंदिर कई सदियों तक ज्वालामुखीय राख तथा जंगल के बीच छिपा रहा।

चण्डी बोरोबुदुर का अस्पष्ट उल्लेख मध्यकाल में ई.1365 के लगभग मपु प्रपंचा की पुस्तक नगरकरेतागमा में मिलता है जो मजापहित काल में लिखी गई। इसमें ‘बुदुर में विहार’ होने का उल्लेख है। मनुष्यों की दृष्टि से ओझल हो जाने के बाद भी यह स्मारक लोक कथाओं में जीवित रहा और इसके साथ कई दंतकथाएं जुड़ गईं।

14वीं सदी में जावा में हिन्दू राजवंश का पतन हो गया और जावाई लोगों को इस्लाम स्वीकार करना पड़ा। इस कारण चौदहवीं शताब्दी में इस द्वीप पर समस्त निर्माण कार्य बन्द हो गए। अधिकतर लोग मुसलमान बन चुके थे तथा बचे हुए बौद्ध जान बचाकर बाली द्वीप तथा भारत आदि देशों को भाग गए थे। इसलिए बोरोबुदुर की सुधि लेने वाला भी कोई नहीं रहा। इस बीच जावा द्वीप पर कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव आए और सत्ताओं के परिवर्तन होते रहे।

18वीं सदी के दो प्राचीन ”बाबाद” (जावाई वृत्तांत) में इस स्मारक के साथ जुड़ी हुई असफलताओं की कथा का उल्लेख मिलता है। ”बाबाद तनाह जावी” (अथवा जावा का इतिहास) के अनुसार ई.1709 में माताराम साम्राज्य के राजा ”पकुबुवोनो प्रथम” के प्रति विद्रोह करना ”मास डाना” के लिए घातक सिद्ध हुआ।

इसमें लिखा है कि ”रेडी बोरोबुदुर” पहाड़ी की घेराबंदी की गई। इसमें विद्रोहियों की पराजय हुई तथा राजा ने उन्हें मौत की सजा सुनाई। ”बाबाद माताराम” (माताराम साम्राज्य का इतिहास) में बोरोबुदुर बौद्ध स्मारक को ई.1757 में योग्यकार्ता सल्तनत के युवराज ”मोंचोनागोरो” के दुर्भाग्य से जोड़ा गया है।

इसके अनुसार चण्डी बोरोबुदुर में प्रवेश निषेध होने पर भी वह एक छिद्रित स्तूप के भीतर छिपकर इसके भीतर गया। अपने महल में वापस आने के बाद वह बीमार हो गया और अगले दिन उसका निधन हो गया। सोक्मोनो नामक एक लेखक ने ई.1976 में लौकिक मत का उल्लेख करते हुए लिखा है कि जब 15वीं सदी में जावा के लोगों ने इस्लाम स्वीकार किया तो इस मंदिर को उजाड़ना आरम्भ कर दिया।

अंग्रेजों द्वारा चण्डी बोरोबुदुर की खोज

ई.1811-16 की अवधि में जावा द्वीप ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधीन रहा। जावा के ब्रिटिश प्रशासक लेफ्टिनेंट गवर्नर जनरल थॉमस स्टैमफोर्ड रैफल्स ने जावा के इतिहास में गहरी रुचि ली। उसने जावा द्वीप का दौरा किया तथा द्वीप पर उपलब्ध प्राचीन वस्तुओं को आधार बनाकर एवं स्थानीय निवासियों से चर्चा करके जावा का इतिहास तैयार किया।

उसके समय में जावा द्वीप पर कई प्राचीन स्मारकों को खोज निकाला गया। ई.1814 में सेमारंग के निरीक्षण दौरे पर, बुमिसेगोरो गाँव के निकट के जंगल में एक बड़े स्मारक के बारे में जानकारी प्राप्त हुई। वह स्वयं इसकी खोज करने में असमर्थ था। अतः उसने एच. सी. कॉर्नेलियस नामक एक अभियंता को अन्वेषण का काम सौंपा।

कॉर्नेलियस तथा उसके 200 साथियों ने यहाँ फैले जंगल के पेड़ों को काट डाला तथा दूर-दूर तक फैली घास को जलाकर मैदान की तरह साफ कर दिया। बोरोबुदुर स्मारक ज्वालामुखीय राख के नीचे दबा हुआ था, उसे भी खोदकर बाहर निकाला गया। स्मारक के ढहने के खतरे को देखते हुए उन्होंने खुदाई का काम बहुत अधिक नहीं किया। इस प्रकार रैफल्स को इस स्मारक के पुनरुद्धार का श्रेय प्राप्त है।

डच ईस्ट-इण्डीज सरकार द्वारा संरक्षण

1816 ई. में ब्रिटिश प्रशासक लेफ्टिनेंट गवर्नर जनरल थॉमस स्टैमफोर्ड रैफल्स को जावा छोड़ देना पड़ा और जावा द्वीप पर नीदरलैण्ड की ”डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी” का अधिकार हो गया। इसके बाद जावा को ”ईस्टइण्डीज कॉलॉनी” कहा जाने लगा। केदु के डच प्रशासक हार्टमान ने कॉर्नेलियस के कार्य को आगे बढ़ाया और 1835 ई. में पूरे परिसर को भूमि से बाहर निकाल लिया।

बोरोबुदुर के पुनरुत्थान में उसने व्यक्तिगत दिलचस्पी ली। उसने इस बारे में कोई लेखन कार्य नहीं किया किंतु दंतकथाओं को आधार बनाकर स्मारक स्थल की खुदाई को जारी रखा तथा मुख्य स्तूप में बुद्ध की बड़ी मूर्ति को खोज निकाला। 1842 ई. में हार्टमान ने मुख्य गुम्बद का अन्वेषण किया, हालांकि उसके द्वारा खोजा गया कार्य अज्ञात है।

जावा की डच ईस्ट-इण्डीज सरकार ने डच अभियंता एफ. सी. विल्सन तथा जे. एफ. जी. ब्रुमुण्ड को स्मारक के अध्ययन का कार्य सौंपा। विल्सन ने इस स्मारक की प्रस्तर शिलाओं पर उत्कीर्ण मूर्तियों (Reliefs) के सैकड़ों रेखाचित्र बनाए तथा ब्रुमुण्ड ने राइटअप तैयार किए। ब्रुमुण्ड का कार्य 1859 ई. में पूरा हुआ।

डच सरकार विल्सन के रेखाचित्रों को साथ जोड़कर ब्रुमुण्ड के कार्य पर आधारित लेख प्रकाशित करना चाहती थी लेकिन ब्रुमुण्ड ने सहयोग नहीं किया। सरकार ने बाद में एक अन्य शोधार्थी सी. लीमान्स को यह कार्य सौंपा। उसने विल्सन के स्रोतों और ब्रुमुण्ड के कार्य पर आधारित निबन्ध लिपिबद्ध किए।

ई.1873 में ”बोरोबुदुर का निबंधात्मक अध्ययन” अंग्रेजी भाषा में में प्रकाशित हुआ और उसके एक वर्ष बाद इसका फ्रांसीसी भाषा में अनुवाद प्रकाशित किया गया। स्मारक का प्रथम चित्र 1873 ई. में डच-फ्लेमिश तक्षणकार इसिडोर वैन किंस्बेर्गन ने लिया।

धीरे-धीरे इस स्थान की चर्चा होने लगी और यह विश्व भर के शोधार्थियों के आकर्षण का केन्द्र बन गया। ई.1882 में सांस्कृतिक कलाकृतियों के मुख्य निरीक्षक ने स्मारक की कमजोर स्थिति के कारण प्रस्तर शिलाओं पर उत्कीर्ण मूर्तियों (Reliefs) को किसी अन्य स्थान पर संग्रहालय में स्थानान्तरित करने का आग्रह किया।

इसके परिणामस्वरूप सरकार ने पुरातत्वविद् ग्रोयन वेल्ड्ट को स्थान का अन्वेषण करने और परिसर की वास्तविक स्थिति ज्ञात करने के लिए नियुक्त किया। उसने अपने प्रतिवेदन में कहा कि यह डर अनुचित है इसलिए इसे इसी स्थिति में बनाए रखा जाए।

चण्डी बोरोबुदुर की शिल्प सामग्री

जब इस स्मारक की प्रसिद्धि होने लगी तो देशी-विदेशी लोगों ने बोरोबुदुर की शिल्प सामग्री को स्मृतिचिह्न के रूप में चुराना आरम्भ कर दिया और इसकी मूर्तियों तथा कलात्मक पत्थरों को लूट लिया। इनमें से कुछ भाग तो औपनिवेशिक सरकार की सहमति से भी लूटे गए। 1886 ई. में श्यामदेश के राजा चुलालोंगकॉर्न ने जावा की यात्रा की और बोरोबुदुर से कुछ मूर्तियाँ अपने देश ले जाने का आग्रह किया।

उसे मूर्तियों के आठ छकड़े भरकर ले जाने की अनुमति मिल गई। इस सामग्री में विभिन्न स्तंभों से उतारे गए तीस मूर्ति-शिलापट्ट, पांच बुद्ध प्रतिमाएं, दो सिंह मूर्तियाँ, एक व्यालमुख प्रणाल, कुछ सीढ़ियों और दरवाजों के कला अनुकल्प और एक द्वारपाल प्रतिमा सम्मिलित थीं। इनमें से कुछ प्रमुख कलाकृतियाँ, जैसे शेर, द्वारपाल, काल, मकर और विशाल जलस्थल (नाले) आदि, बैंकॉक राष्ट्रीय संग्रहालय के जावा कला कक्ष में प्रदर्शित की गई हैं।

चण्डी बोरोबुदुर मंदिर का पुनर्स्थापन

1885 ई. में योग्यकार्ता की पुरातत्व सोसाइटी के अध्यक्ष यजेर्मन ने बोरोबुदुर स्मारक में एक छुपे हुए पैर को खोजा। प्रस्तर शिलाओं पर उत्कीर्ण मूर्तियों (Reliefs) के छुपे हुए पैर व्यक्त करने वाले चित्र 1890-91 ई. में बने। जावा की डच ईस्टइण्डीज सरकार ने इस खोज के बाद बोरोबुदुर बौद्ध स्मारक के संरक्षण देने की दिशा में काम आगे बढ़ाया।

1890 ई. में सरकार ने इसके सरंक्षण हेतु योजना तैयार करने के लिए एक तीन सदस्यीय आयोग बैठाया। इसमें डच कलाविद् एवं इतिहासकार ब्रांडेस, डच सैन्य अभियंता थियोडोर वैन एर्प और डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लोक निर्माण विभाग के निर्माण अभियंता वैन डी कमर को सम्मिलित किया गया।

इस आयोग ने 1902 ई. में ईस्टइण्डीज सरकार के सामने तीन प्रस्तावों वाली योजना रखी। पहले प्रस्ताव में स्मारक के कोनों को पुनः स्थापित करने, अव्यवस्थित पत्थरों को हटाने, वेदिकाओं को सुदृढ़ करने और झरोखे, महराब (तोरण), स्तूप तथा मुख्य गुम्बद को पुनर्स्थापित करने के सुझाव सम्मिलित थे ताकि तत्काल होने वाली संभावित दुर्घटनाओं को रोका जा सके। दूसरे प्रस्ताव में प्रकोष्ठ को हटाने, उचित रखरखाव करने, तलों (छतों) और स्तूपों की मरम्मत करके जल-निकासी में सुधार करने के सुझाव सम्मिलित थे। उस समय इस कार्य की अनुमानित लागत लगभग 48,800 डच गिल्डर थी।

1907 से 1911 ई. के मध्य थियोडोर वैन एर्प के सुझावों के अनुसार मरम्मत का कार्य किया गया। इस कार्य के पहले चरण में प्रथम सात माह तक स्मारक के आसपास खुदाई की गई ताकि बुद्ध की मूर्तियों के सिर और स्तम्भों के पत्थर खोजे जा सकें। इसके बाद वैन एर्प ने तीनों ऊपरी वृत्ताकार चबूतरों और स्तूपों को ध्वस्त करके उनका पुनः निर्माण करवाया।

इसी बीच, वैन एर्प ने स्मारक में सुधार हेतु अन्य विषयों की खोज की जिनके आधार पर 34,600 गिल्डर की लागत के नए कार्य स्वीकृत किए गए। वैन एर्प ने मुख्य स्तूप के शिखर पर छत्र (तीन स्तरीय छतरी) का पुनर्निर्माण का कार्य आरम्भ करवाया किंतु बाद में उसने छत्र को पुनः हटा दिया क्योंकि शिखर के निर्माण के लिए मूल पत्थर पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं थे तथा बोरोबुदुर के शिखर की मूल बनावट ज्ञात नहीं थी। हटाया गया छत्र अब बोरोबुदुर से कुछ सौ मीटर उत्तर में स्थित कर्म विभांगगा संग्रहालय में रखा है।

पुनर्स्थापन के कार्य को सामान्यतः मूर्तियों की सफाई पर केन्द्रित रखा गया तथा वैन एर्प ने जलनिकासी की समस्या का समाधान नहीं किया। इसका परिणाम यह हुआ कि पन्द्रह वर्षो में स्मारक के गलियारों की दीवारें झुकने लगी और प्रस्तर शिलाओं पर उत्कीर्ण मूर्तियों (Reliefs)  में दरारें दिखने लगीं।

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वैन एर्प ने मरम्मत कार्य में कंकरीट का उपयोग किया था जिससे क्षारीय लवण तथा कैल्शियम हाइड्रॉक्साइड का घोल बाहर आने लगा और उसका बहाव शेष हिस्सों पर भी होने लगा। 1939 ई. में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया और उसके समाप्त होते ही 1945 ई. में इंडोनेशियाई राष्ट्रीय क्रांति आरम्भ हो गई जो 1949 ई. तक चली। इन कारणों से बोरोबुदुर का पुनर्स्थापन कार्य बीच में ही रुक गया।

इस दौरान चण्डी बोरोबुदुर स्मारक को मौसम की प्रतिकूलता तथा जल-निकासी की समस्या का सामना करना पड़ा जिसके कारण पत्थरों की मूल बनावट खिसकने लगी और दीवारें धरती में धँसने लगीं। 1950 के दशक तक बोरोबुदुर ढहने की कगार पर पहुँच गया। 1965 ई. में इंडोनेशिया ने यूनेस्को से बोरोबुदुर सहित अन्य स्मारकों का अपक्षय रोकने के लिए सहायता मांगी। 1968 ई. में इंडोनेशिया के पुरातत्व सेवा के प्रमुख प्रोफेसर सोेक्मोनो ने ”बोरोबुदुर सरंक्षण अभियान” आरम्भ किया और बड़े पैमाने पर मरम्मत परियोजना आरम्भ की।

1960 के दशक के उत्तरार्द्ध में इंडोनेशिया सरकार ने अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय से बोरोबुदुर स्मारक को बचाने के लिए बड़ा नवीनीकरण कराने का अनुरोध किया। इण्डोनेशिया सरकार के इस अनुरोध पर ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, साइप्रस, फ्रांस तथा जर्मनी ने इस कार्य के लिए धन उपलब्ध कराया।

इस धन से इंडोनेशिया सरकार और यूनेस्को ने 1975-82 ई. तक बड़ी नवीनीकरण परियोजना के अंतर्गत चण्डी बोरोबुदुर स्मारक का जीर्णोद्धार करवाया। नवीनीकरण के दौरान दस लाख से भी अधिक पत्थर हटाकर उन्हें एक तरफ विशाल आरे के आकार में जमाकर रखा गया जिससे उन्हें अलग-अलग पहचाना जा सके तथा सूचीबद्ध रूप से सफाई और परिरक्षण के काम किए जा सकें।

पत्थरों को सूक्ष्मजीवियों से मुक्त करने के लिए कीटनाशकों से उपचारित किया गया। स्मारक की नींव को सुदृढ़ बनाया गया तथा समस्त 1460 स्तम्भों की सफाई की गई। पुनर्स्थापन में पाँच वर्गाकार चबूतरों को हटाकर वापस लगाने तथा जल-निकासी प्रणाली में सुधार लाने का कार्य भी सम्मिलित था। इस विशाल परियोजना में लगभग 600 लोगों ने कार्य किया और कुल 69,01,243 अमीरीकी डॉलर व्यय हुए। नवीनीकरण का कार्य पूर्ण होने के बाद यूनेस्को ने 1991 ई. में बोरोबुदुर को विश्व विरासत स्थलों में सूचीबद्ध किया। वर्तमान में बोरोबुदुर स्मारक तीर्थ-यात्रियों एवं विश्व भर के पर्यटकों के लिए खुला हुआ है।

धार्मिक समारोह

यूनेस्को द्वारा विशाल नवीनीकरण के बाद, बोरोबुदुर को पुनः तीर्थयात्रा और पूजास्थल के रूप में काम में लिया जाने लगा। वर्ष में एक बार, मई या जून माह में पूर्णिमा के दिन इंडोनेशिया में बौद्ध धर्म के लोग गौतम बुद्ध के जन्म, निधन और शाक्यमुनि के रूप में ज्ञान प्राप्त करने के उपलक्ष्य में वैशाख उत्सव मनाते हैं। वैशाख का यह दिन इंडोनेशिया में राष्ट्रीय छुट्टी के रूप में मनाया जाता है तथा तीन बौद्ध मंदिरों मेदुत से पावोन होते हुए बोरोबुदुर तक समारोह मनाया जाता है।

बम विस्फोटों से उड़ाने का षड़यंत्र

21 जनवरी 1985 को चण्डी बोरोबुदुर स्मारक में अचानक हुए नौ बम विस्फोटों से स्मारक के नौ स्तूप बूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गए। यह षड़यंत्र कुछ मुस्लिम उग्रवादियों ने रचा था। एक मुस्लिम धर्मोपदेशक हुसैन अली अल हब्स्याई को पकड़ लिया गया तथा लगभग 6 साल तक चले मुकदमे के बाद उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। बम ले जाने वाले उग्रवादी समूह के दो अन्य सदस्यों को 20 वर्ष के कारावास की एवं एक अन्य व्यक्ति को 13 वर्ष के कारावास की सजा मिली।

पर्यटकों की संख्या में वृद्धि

चण्डी बोरोबुदुर बौद्ध स्मारक इंडोनेशिया में विश्व भर के पर्यटकों के लिए मुख्य आकर्षण का केन्द्र है। 1974 ई. में स्मारक को देखने के लिए 2 लाख 60 हजार पर्यटक आए जिनमें से 36 हजार विदेशी पर्यटक थे। देश में अर्थव्यवस्था संकट से पूर्व 1990 के दशक के मध्य तक यह संख्या बढ़कर 25 लाख प्रति वर्ष तक पहुँच गई जिनमें से 80 प्रतिशत घरेलू पर्यटक थे।

भूकम्प से अप्रभावित

27 मई 2006 को मध्य जावा के दक्षिणी तट पर रिक्टर पैमाने पर 6.2 तीव्रता का भूकम्प आया। इस घटना से योग्यकर्ता नगर के निकट के क्षेत्रों में गंभीर क्षति के साथ बहुत से लोग हताहत हुए किंतु चण्डी बोरोबुदुर इससे अप्रभावित रहा।

मेरापी पर्वत में ज्वालामुखी विस्फोट

वर्ष 2010 के अक्टूबर और नवम्बर माह में बोरोबुदुर मंदिर से लगभग 28 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित मेरापी पर्वत में भयानक ज्वालामुखी विस्फोट हुए जिनसे बोरोबुदुर स्मारक को भारी क्षति पहुंची तथा ज्वालामुखीय राख मंदिर पर आकर गिरी। 3 से 5 नवम्बर तक मंदिर की मूर्तियों पर राख की 2.5 सेंटीमीटर मोटी परत चढ़ गई। आस-पास के पेड़-पौधों को भी हानि पहुंची।

5 से 9 नवम्बर तक मंदिर परिसर को राख की सफाई करने के लिए बन्द रखा गया। यूनेस्को ने मेरापी पर्वत से ज्वालामुखी विस्फोट के बाद बोरोबुदुर के पुनर्स्थापन की लागत के रूप में 30 लाख अमरीकी डॉलर की सहायता प्रदान की। मंदिर की जल निकासी प्रणाली में ज्वालामुखीय राख भर गई थी जिसे हटाने के लिऐ फिर से 55 हजार से अधिक प्रस्तर शिलाएं हटाई गईं। इस पूरे कार्य में लगभग एक साल लग गया।

जर्मनी द्वारा संरक्षण कार्य

जनवरी 2012 में जर्मनी की सरकार के दो प्रस्तर सरंक्षण विशेषज्ञों ने 10 दिन मंदिर में रहकर मन्दिर की स्थिति का अध्ययन किया। इस अध्ययन के आधार पर जून 2012 में जर्मनी ने द्वितीय चरण के पुनर्स्थापन कार्यों के लिए यूनेस्को को 1,30,000 अमीरी डॉलर की सहायता देने का प्रस्ताव किया।

अक्टूबर 2012 में पत्थर सरंक्षण, सूक्ष्मजैविकी, सरंचना अभियांत्रिकी और रासायनिक अभियान्त्रिकी के छः विशेषज्ञों ने एक सप्ताह तक बोरोबुदुर में रहकर इसका पुनः निरीक्षण किया। इसके बाद यहाँ एक बार फिर से संरक्षण कार्य करवाए गए। जून 2012 में बोरोबुदुर को विश्व के सबसे बड़े पुरातत्व स्थल के रूप में गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में शामिल किया गया। अगस्त 2014 में इस स्मारक की सीढ़ियों पर लकड़ी का आवरण लगाया गया ताकि मूल सीढ़ियों को जूतों से घिसने से बचाया जा सके।

केलुड पर्वत में ज्वालामुखी विस्फोट

13 फरवरी 2014 को योग्यकार्ता से 200 किलोमीटर पूर्व में स्थित पूर्वी जावा के केलुड पर्वत में ज्वालामुखी विस्फोट हुआ जो योग्यकर्ता तक सुनाई दिया। इससे निकली राख से प्रभावित होने के कारण बोरोबुदुर, परमबनन और रातु बोको सहित योग्यकर्ता और मध्य जावा के बड़े पर्यटन स्थल कुछ दिनों के लिए बन्द कर दिये गये। इस दौरान बोरोबुदुर की सरंचना को ज्वालामुखीय राख से बचाने के लिए प्रतिष्ठित स्तूपों और मूर्तियों को ढक दिया गया।

आईसिस के निशाने पर चण्डी बोरोबुदुर

अगस्त 2014 में आईएसआईएस (आईसिस) की इंडोनेशियाई शाखा ने सोशियल मीडिया पर धमकी दी कि वह बोरोबुदुर सहित इंडोनेशिया की अन्य मूर्ति परियोजनाओं को शीघ्र ही ध्वस्त करेगा। इसके बाद इंडोनेशियाई पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा बोरोबुदुर मंदिर की सुरक्षा बढ़ाई गई। सरकार ने मंदिर परिसर में सीसीटीवी लगाए और रात में सुरक्षा पहरा बढ़ा दिया।

जावाई स्थापत्य स्मारक घोषित

जब जावा में रह रहे भारतीय बौद्धांे और हिन्दुओं को इस स्मारक के बारे में ज्ञात हुआ तो उन्होंने बोरोबुदुर की पहाड़ी पर बड़ी संख्या में निर्माण कार्य आरम्भ कर दिये। इण्डोनेशिया की मुस्लिम सरकार को इस स्थान से कोई भी हिन्दू अथवा बौद्ध पुण्य स्थान संरचना नहीं मिली। इस कारण सरकार ने इसे हिन्दू अथवा बौद्ध स्थल न मानकर स्थानीय जावा संस्कृति का स्मारक घोषित किया है।

बौद्ध चैत्य एवं स्मारक का प्रारूप

बोरोबुदुर को एक बड़े स्तूप की तरह निर्मित किया गया है ऊपर से देखने पर यह विशाल तांत्रिक बौद्ध मंडल जैसा दिखाई देता है। यह बौद्ध ब्रह्माण्ड विज्ञान और मन के स्वभाव को निरूपित करता है। इसका मूल आधार वर्गाकार है जिसकी प्रत्येक भुजा 118 मीटर है।

इसमें नौ मंजिलें हैं। निचली छः मंजिलें वर्गाकार तथा ऊपरी तीन मंजिलें वृत्ताकार हैं। ऊपरी मंजिल के मध्य में एक बड़े स्तूप के चारों ओर घण्टी के आकार के 72 छोटे स्तूप हैं जो सजावटी छिद्रों से युक्त है। बुद्ध की मूर्तियाँ इन छिद्रयुक्त सहस्रपात्रों के अन्दर स्थापित हैं।

बोरोबुदुर का स्वरूप पिरामिड से प्रेरित है। पश्चिम जावा के प्रागैतिहासिक ऑस्ट्रोनेशियाई महापाषाण संस्कृति के स्थल पुंडेन बेरुंडक, पंग्गुयांगां, किसोलोक और गुनुंग पडंग नामक स्थानों पर विभिन्न स्थल दुर्ग और पत्थरों से निर्मित सोपान-पिरामिड संरचनाएं पाई गई हैं।

पत्थर से बने पिरामिडों के निर्माण के पीछे स्थानीय विश्वास है कि पर्वतों और ऊँचे स्थानों पर पैतृक आत्माओं अथवा ह्यांग का निवास होता है। बोरोबुदुर स्मारक की आधारभूत बनावट को पुंडेन बेरुंडक पिरमिड से प्रेरित माना जाता है तथा महायान बौद्ध विचारों और प्रतीकों के साथ निगमित पाषाण परंपरा का विस्तार माना जाता है।

चण्डी बोरोबुदुर का आध्यात्मिक महत्व

स्मारक के तीन भाग प्रतीकात्मक रूप से तीन लोकों को निरूपित करते हैं। ये तीन लोक क्रमशः कामधातु (इच्छाओं की दुनिया), रूपधातु (रूपों की दुनिया) और अरूपधातु (रूपरहित दुनिया) हैं। साधारण मनुष्य का जीवन इनमें से निम्नतर जीवन स्तर, अर्थात् इच्छाओं की दुनिया में रहता है।

जो लोग अपनी इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर लेते हैं, वे प्रथम स्तर से उपर उठकर वहाँ पहुँच जाते हैं जहाँ से रूपों को देख तो सकते हैं लेकिन उनकी इच्छा नहीं होती। अंत में मनुष्य उन्नति करता हुआ पूर्ण बुद्धत्व को प्राप्त करता है। यह मानव का मूल एवं विशुद्ध स्तर होता है। इसमें वह रूपरहित निर्वाण को प्राप्त होता है।

संसार के जीवन चक्र से ऊपर हो जाता है, जहाँ प्रबुद्ध आत्मा शून्य के समान, सांसारिक रूप के साथ संलग्न नहीं होती, उसे पूर्ण शून्य अथवा अपने आप अस्तित्वहीन रखना आता है। बोरोबुदुर स्मारक में कामधातु को आधार से निरूपित किया गया है, रूपधातु को पाँच वर्गाकार मंजिलों (सरंचना) से और अरूपधातु को तीन वृत्ताकार मंजिलों तथा विशाल शिखर स्तूप से निरूपित किया गया है।

इन तीन स्तरों के स्थापत्य गुणों में लाक्षणिक अन्तर हैं। उदाहरण के लिए रूपधातु में मिलने वाले वर्ग और विस्तृत अलंकरण, अरूपधातु के सरल वृत्ताकार मंजिल में लुप्त हो जाते हैं, जिससे रूपों की दुनिया को निरूपित किया जाता है। जहाँ लोग नाम और रूप से जुड़े रहते हैं और रूपहीन दुनिया में परिवर्तित हो जाते हैं।

बोरोबुदुर में सामूहिक पूजा इस तरह की जाती है मानो किसी तीर्थ में भ्रमण कर रहे हों। मंदिर की सीढ़ियां और गलियारा तीर्थ यात्रियों को शिखर तक जाने के लिए मार्गदर्शन करते हैं। प्रत्येक मंजिल आत्मज्ञान के एक स्तर को निरूपित करती है। तीर्थ यात्रियों का मार्गदर्शन करने वाला पथ बौद्ध ब्रह्माण्ड विज्ञान को प्रतीकात्मक रूप में परिकल्पित करता है।

1885 ई. में इस स्मारक के आधार में छिपी हुई एक संरचना आकस्मिक रूप से खोजी गई। छुपे हुये पैर में, प्रतिमा उत्कीर्णित शिलापट्ट ;त्मसपमद्धि भी शामिल हैं, जिनमें से 160 वास्तविक कामधातु के विवरण की व्याख्या करते हैं। शिलालेखित चौखटों पर भी शिल्पकारों द्वारा नक्काशियों के बारे में कुछ आवश्यक अनुदेश लिखे हुए थे।

वास्तविक आधार के ऊपर झालरदार आधार बना हुआ है जिसका उद्देश्य आज भी रहस्य बना हुआ है। माना जाता है कि यह झालर पहाड़ी में विनाशकारी आपदा आने की स्थिति में वास्तविक आधार को आच्छादित करने के लिए है। अन्य मतों के अनुसार झालरदार आधार बनाने का कारण, स्मारक के मूल आधार की बनावट के उन दोषों को छिपाना है, जो प्राचीन भारतीय वास्तु शास्त्र का उल्लंघन करते हैं।

पांच सौ चार बुद्ध प्रतिमाएं

चण्डी बोरोबुदुर मंदिर में भगवान बुद्ध की विभिन्न प्रकार की मूर्तियाँ उपलब्ध हैं। पाँच वर्गाकार चबूतरों (रूपधातु स्तर) के साथ-साथ ऊपरी चबूतरे (अरूपधातु स्तर) पर पद्मासन मूर्तियाँ स्थित हैं। रूपधातु स्तर पर देवली में बुद्ध की प्रतिमाएं स्तंभ वेष्टन (वेदिका) के बाहर पंक्तियों में क्रमबद्ध हैं। ऊपरी स्तर पर मूर्तियों की संख्या लगातार कम होती जाती है।

प्रथम वेदिका में 104 देवली, दूसरी में 88, तीसरी में 72, चौथी में 72 और पाँचवी में 64 देवली हैं। कुल मिलाकर रूपधातु स्तर तक 432 बुद्ध मूर्तियाँ हैं। अरूपधातु स्तर (तीन वृत्ताकार चबूतरों) पर बुद्ध की मूर्तियाँ स्तूपों के अन्दर स्थित हैं।

प्रथम वृत्ताकार चबूतरे पर 32 स्तूप, दूसरे पर 24 और तीसरे पर 16 स्तूप हैं जिनका योग 72 स्तूप होता है। मूल 504 बुद्ध मूर्तियों में से 300 से अधिक क्षतिग्रत हैं जिनमें से अधिकतर मूर्तियों के सिर गायब हैं। कुल 43 मूर्तियाँ गायब हैं। स्मारक की खोज होने से पहले, इन मूर्तियों के सिरों को मूर्ति-तस्करों ने चुराया और पश्चिमी देशों के संग्राहलयों को बेच दिया।

बुद्ध मूर्तियों के इन सिरों में से कुछ एम्स्टर्डम के ट्रोपेन म्यूजियम और कुछ लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय सहित विभिन्न संग्राहलयों में देखे जा सकते हैं। बुद्ध की समस्त मूर्तियाँ दूर से देखने में एक जैसी प्रतीत होती हैं किंतु इनकी मुद्रा अथवा हाथों की स्थिति में भिन्नता है।

मुद्रा के पाँच समूह हैं- उत्तर, पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और शिरोबिंदु। ये सभी मुद्राएं महायान के अनुसार पाँच क्रममुक्त दिक्सूचक को निरुपित करती हैं। प्रथम चार वेदिकाओं में पहली चार मुद्राएं (उत्तर, पूर्व, दक्षिण और पश्चिम) में प्रत्येक मूर्ति कम्पास की एक दिशा को निरुपित करती है।

पाँचवी वेदिका में बुद्ध की मूर्ति और ऊपरी चबूतरे के 72 स्तूपों में स्थित मूर्तियाँ समान मुद्रा (शिरोबिंदु) में हैं। प्रत्येक मुद्रा, पाँच ध्यानी बुद्ध में से किसी एक को निरूपित करती है जिनमें प्रत्येक का अलग आध्यात्मिक कारण है।

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

जकार्ता के मंदिर (14)

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जलमहल का मुख्य द्वार

जकार्ता के मंदिर मुख्यतः भगवान शिव को समर्पित हैं जिनसे ज्ञात होता है कि आज से कई हजार साल पहले से लेकर सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी तक जकार्ता में शैव मत को मानने वाले हिन्दू बड़ी संख्या में निवास करते थे।

जकार्ता शहर जावा द्वीप में स्थित है। जावा द्वीप से उन आदिम मानवों के अस्थि अवशेष भी मिले हैं जो होमो-सेपियन जाति के अस्तित्व में आने से पहले ही इस द्वीप में मानव बस्तियों के होने के प्रमाण देते हैं।

जकार्ता शहर का वास्तविक नाम जयकार्ता है। यह पश्चिमी जावा में स्थित है तथा इंडोनेशिया की राजधानी है। जकर्ता में 17 प्रमुख हिन्दू मंदिर पाए गए हैं जिनमें नौवीं शताब्दी ईस्वी में निर्मित विशाल शिव मंदिर, 926 ई. में बना तीर्थ एम्पुल मंदिर, 11वीं सदी में बना गोवा गजह (शिव मंदिर), 14वीं शताब्दी में निर्मित बेसैख का माता मंदिर और 1633 ई. में निर्मित पुरा उलुंदनु ब्रतन (शिव मंदिर) प्रमुख हैं।

जकार्ता के मंदिर इस द्वीप के प्राचीन राजनीतिक इतिहास एवं हिन्दू संस्कृति के प्रसार पर भी प्रकाश डालते हैं।

योग्यकार्ता के मंदिर

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योग्यकार्ता शहर मध्य-जावा द्वीप में स्थित है। फरवरी 2010 में योग्यकर्ता में स्थित एक निजी मुस्लिम विश्वविद्यालय के परिसर में दो मंदिरों के अवशेष मिले जब विश्वविद्यालय ने वहाँ बनी एक मस्जिद के पास पुस्तकालय बनाने के लिए खुदाई आरम्भ की। ये मंदिर लगभग 1100 साल पुराने हैं तथा विशाल और अद्वितीय हैं। ऐसे मंदिर इंडोनेशिया के इतिहास में पहले कभी नहीं देखे गए। इन मंदिरों में भगवान् शिव के शिवलिंगों के साथ-साथ भगवान् गणेश की प्रतिमाएं मिली हैं। एक अन्य स्थान पर हुई खुदाई में पुरातत्व विभाग को भगवान् शिव के वाहन नंदी की प्रतिमा मिली। नंदी की यह प्रतिमा, सामान्य नंदी प्रतिमाओं से काफी अलग है और दूसरी मूर्तियों की तरह चौड़ी भी नहीं है। इन मंदिरों की प्राप्ति से स्पष्ट है कि इस द्वीप पर भगवान शिव के और भी बहुत से मंदिर धरती के भीतर दबे पड़े होंगे जिन्हें खोज कर निकाले जाने की आवश्यकता है। इनमें से बहुत से मंदिर तो भूकम्प एवं ज्वालामुखी जैसी प्राकृतिक आपदाओं के कारण नष्ट हुए होंगे तथा बहुत से मंदिर को मुसलमान आक्रांताओं ने नष्ट किया होगा।

आवश्यकता इस बात की है जकार्ता के मंदिर ढूंढ कर निकाले जाएं। पर्याप्त संभव है कि उन मंदिरों से कुछ शिलालेख भी प्राप्त हों जो इस द्वीप के प्राचीन इतिहास पर और अधिक प्रकाश डाल सकें।

सिंघसरी शिव मंदिर

13वीं शताब्दी में बना सिंघसरी शिव मंदिर पूर्वी-जावा के सिंघसरी नामक स्थान पर बना हुआ है। यह विशाल शिव मंदिर अपनी भव्यता के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। मंदिर में भगवान शिव की एक विशाल प्रतिमा है जिसके पूजन के लिए प्रतिदिन बड़ी संख्या में भक्त आते हैं। भगवान शिव से सम्बन्धित समस्त पर्व बड़ी धूम-धाम से मनाए जाते हैं।

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

बाली द्वीप के मंदिर (15)

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बाली द्वीप के मंदिर

बाली द्वीप के मंदिर हिन्दू देवी-देवताओं को समर्पित हैं। इनमें भगवान विष्णु, शिव, माता दुर्गा, सरस्वती तथा गणेश प्रमुख हैं। बाली में मंदिरों को पुरा कहा जाता है जो कि संस्कृत भाषा के ‘पुर’ शब्द से बना हुआ है जिसका आशय नगर एवं दुर्ग दोनों से लिया जाता है। बाली भाषा में ”पुरा” का अर्थ मंदिर होता है।

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अक्टूबर 2012 में इंडोनेशिया के पुरातत्व विभाग ने बाली द्वीप का सर्वेक्षण किया तथा चौदहवीं शताब्दी ईस्वी के एक विशाल हिन्दू मंदिर को खोज निकालने का दावा किया। पुरातत्वविदों ने देश को सूचित किया कि पूर्वी देन्पासार में नदी बेसिन में हो रही खुदाई में धरती से तीन फुट नीचे उन्हें एक विशालकाय पत्थर मिला तथा आगे हुई खुदाई में पाया गया कि यह वास्तव में एक विशाल मंदिर की आधारशिला है। ऐसे पत्थर बड़ी संख्या में मिले जो यह प्रमाणित करते हैं कि चौदहवीं सदी में इस नदी क्षेत्र में बड़ी संख्या में मंदिरों का निर्माण हुआ। बाली के हिंदू मंदिर यद्यपि सांस्कृतिक रूप से दक्षिण भारत के हिन्दू मंदिरों की ही परम्परा का प्रसार हैं तथापि बाली के हिन्दू मंदिरों की मूल संरचना एवं दक्षिण भारत के हिंदू मंदिरों की मूल संरचना एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है। दक्षिण भारत के हिन्दू मंदिरों में गोपुरम एक अनिवार्य संरचना है किंतु बाली के मंदिरों में इस प्रकार की संरचना नहीं पाई जाती है। भारतीय मंदिरों को भीतर से बहुत अलंकृत किया जाता है जबकि बाली के मंदिरों को जटिल रूप से सजाए गए छत वाले द्वार और विभाजित द्वारों की शृंखला से युक्त किया जाता है।

इण्डोनेशिया में सामान्यतः तीन प्रकार के हिंदू मंदिर देखने को मिलते हैं-

  1. कैंडी: इन्हें जावा के प्राचीन हिंदू मंदिरों के रूप में देखा जा सकता है।
  2. पुरा: इन्हें बाली के हिन्दू मंदिरों के रूप में देखा जा सकता है।र
  3. कुइल: इन्हें बाली एवं जावा के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों में भी देखा जा सकता है। बोलचाला की भाषा में इन्हें काला कहा जाता है।

पुरा तमन अयुन (सरस्वती मंदिर)

तमन अयुन मंदिर बाली के प्रमुख मंदिरों में से है। यह बाली में दूसरा सबसे बड़ा मंदिर है। यह मेंगवी राजवंश का पारिवारिक मंदिर था जो बाली पर शासन करने वाले नौ राज्यों में से एक था। तमन अयुन मंदिर का निर्माण ईस्वी 1632 में हुआ था। देवी सरस्वती को समर्पित यह मंदिर बाली के उबुद नगर में है।

देवी सरस्वती को हिन्दू धर्म में विद्या, ज्ञान और संगीत की देवी माना जाता हैं, इसलिए यहाँ पर भी देवी सरस्वती की पूजा ज्ञान और विद्या की देवी के रूप में ही की जाती है। यहाँ पर एक सुन्दर कुंड भी बना है, जो इस मंदिर का मुख्य आकर्षण है। यहाँ प्रतिदिन संगीत के कार्यक्रम होते हैं। संस्कृत में अयन का अर्थ होता है- घर। बाली द्वीप का अयुन शब्द संस्कृत के अयन शब्द से ही बना है।

पुरा बेसकिह मंदिर

बाली द्वीप के माउंट अगुंग में स्थित यह मंदिर प्रकृति की गोद में बसा इंडोनेशिया का सबसे सुन्दर मंदिर है। यह बाली का सबसे बड़ा और पवित्र मंदिर भी है, जो बाली के महत्वपूर्ण मंदिरों की शृंखला में सम्मिलित किया गया है। 1995 ई. में इस मंदिर को यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया। मंदिर में विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं।

गिन्यार क्षेत्र के मंदिर

बाली द्वीप के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में स्थित गिन्यार में 1986 ई. में हुई खुदाई में वासा मदिर सामने आया जो 11 मीटर चौड़ा है। 2010 ई. तक इंडोनेशिया के पुरातत्वविद, गिन्यार में धरती के नीचे दबे हुए 16 और मंदिरों को ढूँढ़ने में सफल हो गए।

तनाहलोट मंदिर (विष्णु मंदिर)

बाली द्वीप पर स्थित विशाल समुद्री चट्टान पर भगवान विष्णु को समर्पित तनाहलोट मंदिर 15वीं में निर्मित हुआ। यह अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है तथा इण्डोनेशिया के मुख्य आकर्षणों में से एक है। यह मंदिर बाली द्वीप के हिन्दुओं की आस्था का बड़ा केंद्र है।

जब समुद्र में ज्वार आता है तो मंदिर में जाने का मार्ग बंद हो जाता है तथा भाटा आने पर यह मार्ग खुल जाता है जिससे मंदिर तक जा सकते हैं। पर्यटकों को मंदिर के भीतर जाने की अनुमति नहीं होती है। वे बाहर की रेलिंग से भीतर का दृश्य देख सकते हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

उबुद-वानर-वन के मंदिर एवं देव प्रतिमाएं (16)

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उबुद-वानर-वन

बाली द्वीप के पडंग्टेगल गांव में स्थित उबुद-वानर-वन लगभग 12 हैक्टेयर क्षेत्र में स्थित है जिसमें लाल मुंह, अपेक्षाकृत छोटी काया एवं सफेद रंग की बड़ी मूंछो वाले लगभग 700 बंदर निवास करते हैं। यह संसार के प्राचीनतम वनों में से एक है तथा इस छोटे से वन में वृक्षों की 186 प्रजातियां चिह्ति की गई हैं। उबुद-वानर-वन में तीन प्रमुख मंदिर स्थित हैं-

(1.) पुरा दालेम अगुंग पडंग्टेगल : यह मंदिर मृत्यु के महान देवता अर्थात् शिव को समर्पित है। (बाली के हिन्दू भगवान शिव को मृत्यु का महान देवता मानते हैं।)

(2.) पुरा बेजी : यह मंदिर पाप नाशिनी देवी गंगा को समर्पित है।

(3.) पुरा प्रजापति : यह मंदिर जन्म देने वाले देवता ब्रह्मा को समर्पित है।

ये मंदिर लगभग 1000 साल पुराने हैं। स्वाभाविक है कि इस क्षेत्र में देवी-देवताओं की बहुत सी मूर्तियां पाई जाएं किंतु इन मंदिरों के निर्माण से पहले भी इस क्षेत्र में सैंकड़ों मूर्तियां बनाई गईं जो आज भी देखी जा सकती हैं। उबुद-वानर-वन परिसर में विभिन्न प्रकार के मनुष्यों, पशु-पक्षियों तथा जलचरों की अति प्राचीन प्रस्तर-प्रतिमाएं उपलब्ध हैं।

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अनेक मनुष्याकार प्रतिमाओं के चेहरे, मनुष्यों की बजाय, बंदरों, चिम्पांजियों एवं औरंगुटानों जैसे दिखाई देते हैं। इन्हें देखकर ऐसा आभास होता है कि इस द्वीप पर कभी इस प्रकार के चेहरों वाले मनुष्य निवास करते थे। इनके शरीर पर नाम मात्र के वस्त्र तथा सिर पर वनवासियों जैसी पगड़ियां हैं। इनके चेहरे फूले हुए हैं जिन पर बनी गोल एवं मोटी नाक दूर से ध्यान आकर्षित करती है। होंठों के भीतर अथवा बाहर निकले हुए बड़े-बड़े दांत इन्हें आधुनिक मनुष्यों से अलग प्रदर्शित करते हैं। इनकी भुजाएं मांसल, जंघाएं पुष्ट तथा चेहरों पर विचित्र भाव दिखाई देते हैं। बहुत सी नर-नारी प्रतिमाओं की आंखें गेंद की तरह बिल्कुल गोल हैं। यहाँ यह समझा जाना आवश्यक है कि भारत में भी श्रीराम कथा के काल में दक्षिण भारत के वनों में बहुत सी ऐसी मानव बस्तियां थीं जिनके चेहरे वानरों, रीछों एवं भालुओं से मिलते थे। लम्बे दांतों वाले मानवों की बस्तियां भी तब अस्तित्व में रहे होने का अनुमान है जिन्हें राक्षस कहा जाता है। पर्याप्त संभव है कि उबुद वानर वन परिसर की विचित्र प्रतिमाएं इसी काल के मानवों से सम्बन्धित हों।

उबुद-वानर-वन में स्थित प्रतिमाओं की बनावट, उनका अंग वैशिष्ट्य तथा प्रतिमाओं की वर्तमान अवस्था को देखकर कहा जा सकता है कि इन प्रतिमाओं का निर्माण किसी एक सभ्यता द्वारा नहीं किया जाकर, कम से कम दो सभ्यताओं द्वारा किया गया है। इन प्रतिमाओं का कई प्रकार से वर्गीकरण किया जा सकता है-

(अ.) सभ्यताओं के आधार पर वर्गीकरण

1. प्राचीन सभ्यता की प्रतिमाएं

इनका निर्माण आधुनिक ”होमो सेपियन-सेपियन” प्रजाति के ”क्रोमैग्नन मानव” के समय में ही हुआ है किंतु उस युग में इन द्वीपों पर निवास करने वाला मानव आज के मानव जैसा चेहरा विकसित नहीं कर पाया था क्योंकि इन प्रतिमाओं के चेहरे मानवों की बजाय बंदर, चिम्पैंजी तथा ओरंगुटान से अधिक मिलते हैं। पर्याप्त संभव है कि ये प्रतिमाएं उन आदि मानवों को देखकर किन्हीं परग्रही जीवों ने बनाई हों! गोल आंखों वाली तथा टेलिस्कोप जैसी आंखों वाली प्रतिमाएं इसी काल की हैं।

2. आधुनिक सभ्यता की प्रतिमाएं

इनका निर्माण वर्तमान मानव सभ्यता के क्रोमैग्नन मानव द्वारा बहुत बाद के युगों में अर्थात् आज से 1100-1200 वर्ष पहले किया गया है, जब हिन्दू राजकुमार इन द्वीपों पर अपने राज्य स्थापित कर चुके थे। इनमें मनुष्यों के चेहरों वाली एवं पशुओं के चेहरों वाली प्रतिमाएं मिलती हैं। इन मूर्तियों को लम्बी एवं पतली आंखों से पहचाना जा सकता है।

(ब.) आंखों के आधार पर वर्गीकरण

1. गोल आंखों वाली प्रतिमाएं जिन पर पलकें नहीं हैं : ये प्रतिमाएं किसी अति प्राचीन सभ्यता की प्रतीत होती हैं। इस वर्ग की प्रतिमाओं में ओरंगुटान जैसे मनुष्यों, राक्षसों एवं बंदरों  की प्रतिमाएं हैं तथा इन सब के चेहरे एवं नथुने फूले हुए हैं।

2. टेलिस्कोप जैसी आंखों वाली प्रतिमाएं, जिन पर पलकें नहीं हैं : उबुद-वानर-वन में ऐसी केवल एक ही प्रतिमा देखने को मिली, यह किसी परग्रही देवता की जान पड़ती है। यह प्रतिमा क्रोमैग्नन मानव द्वारा बनाई गई नहीं है। इसे किसी परग्रही जीव द्वारा ही बनाया गया होगा।

3. आधुनिक मनुष्यों जैसी लम्बी आंखों वाली प्रतिमाएं जिन पर पलकें बनी हुई हैं : इस वर्ग में मनुष्यों के चेहरों वाली एवं पशुओं के चेहरों वाली, दोनों प्रकार की प्रतिमाएं देखने को मिलती हैं।

(स.) मुखाकृति के आधार पर वर्गीकरण

1. राक्षसी चेहरों वाली प्रतिमाएं

2. मनुष्यों के मुख वाली प्रतिमाएं

3. पशुओं के मुख वाली प्रतिमाएं

उबुद-वानर-वन में प्राचीन सभ्यता एवं आधुनिक सभ्यता के लोगों द्वारा इन तीनों ही प्रकार की मुखाकृतियों वाली प्रतिमाओं का निर्माण किया गया, जिन्हें स्पष्ट रूप से अलग-अलग पहचाना जा सकता है।

(द.) जीभ के आधार पर वर्गीकरण

1. लम्बी जीभ वाली प्रतिमाएं : इस प्रकार की प्रतिमाओं में अधिकांश प्रतिमाएं गोल आंखों वाली तथा अत्यंत प्राचीन हैं। ये प्रतिमाएं प्राकृतिक शक्तियों पर नियंत्रण रखने वाले देवी-देवताओं यथा अग्नि देव, वायु देव आदि की प्रतीत होती हैं। लम्बी जीभ वाली कुछ प्रतिमाओं की आंखें लम्बी एवं पतली हैं जो आधुनिक सभ्यता के मानवों द्वारा बनाई गई हैं तथा प्राचीन प्रतिमाओं का आधुनिक संस्करण हैं।

2. सामान्य जीभ वाली प्रतिमाएं : उबुद-वानर-वन में कुछ प्रतिमाएं प्राचीन सभ्यता के लोगों द्वारा बनाई गई प्रतीत होती हैं तथा कुछ, प्राचीन प्रतिमाओं का नवीन संस्करण जान पड़ती हैं जिनका निर्माण आधुनिक सभ्यता के मानवों द्वारा किया गया है।

प्रतिमाओं के इस संक्षिप्त वर्गीकरण के बाद उबुद वानर वन की कुछ प्रमुख प्रतिमाओं का परिचय दिया जाना उचित होगा।

टेलिस्कोपिक आंखों वाले देवता की प्रतिमा

उबुद-वानर-वन में धरती में लगी एक देव-प्रतिमा का मुंह सामने से पूरी तरह चपटा है जिस पर आखें इस तरह बनाई गई हैं मानो वहाँ दूरबीन की नलियां रखी हुई हों। दोनों आंखों के बीच में एक मणि जैसी रचना है। इस मूर्ति में दिखाई दे रहा देवता अपने पैरों पर उकडूं बैठा है तथा घुटनों पर हाथ रखकर उठ खड़े होने अथवा उड़ने की तैयारी की मुद्रा में है। इस तरह की आखों वाली और कोई प्रतिमा इस परिसर में नहीं दिखी।

ऐसा लगता है कि इस प्रतिमा के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देने का प्रयास किया गया है कि यहां कभी दूसरे ग्रह के लोग आए थे जो देखने के लिए टेलिस्कोप जैसे यंत्रों का प्रयोग करते थे। इसके वक्ष पर आधुनिक क्रॉस बेल्ट जैसा कवच धारण किया हुआ है। सिर पर गोल टोप है जिससे खोपड़ी पूरी तरह ढंक गई है। यह मूर्ति एक हजार साल अथवा उससे अधिक प्राचीन प्रतीत होती है। इसकी ठोड़ी और नाक काफी घिस गई है।

हंसती हुई नागकन्या

उबुद-वानर-वन में एक नागकन्या का अद्भुत अंकन किया गया है। यह नागकन्या आंखें बंद किये हुए बहुत ही प्रसन्न मुद्रा में बैठी है जिसके लम्बे और वलयाकार केश आगे वक्ष तक लटके हुए हैं। इसके पेट पर बने हुए शल्कों से ज्ञात होता है कि यह मानवी नहीं है, अपितु नागकन्या है। इस नागकन्या की देहयष्टि, अन्य प्रतिमाओं के विपरीत अर्थात् कृशकाय है। इसके दोनों हाथों और दोनों पैरों में चार-चार अंगुलियों का अंकन किया गया है। किसी भी हाथ या पैर में अंगूठा नहीं बनाया गया है।

विचित्र आंखों वाली एक और प्रतिमा

उबुद-वानर-वन की बावड़ी के पास ही एक मनुष्य की प्रतिमा लगी है जिसकी आंखें पूरी तरह गोल हैं किंतु ये आंखें अन्य गोल आंखों वाली प्रतिमाओं से बिल्कुल भिन्न हैं। दोनों आंखें पूरी तरह चेहरे से उभर कर बाहर आई हुई हैं। पलकें नहीं होने से पता नहीं लगता कि ये आंखें खुली हैं या बंद।

प्रतिमा के कान बहुत विशाल हैं। इस प्रतिमा ने अपने दोनों हाथों की मुट्ठियां बंद करके अपने वक्ष के पास बगल में ही रखी हुई हैं। मोटे-मोटे दांत स्पष्ट दिखाई देते हैं जिनमें से ऊपर वाली पंक्ति में से दोनों तरफ का एक-एक दांत बाहर आया हुआ है। इस प्रतिमा के मुख्य पत्थर में ही सिर पर छोटी सी पगड़ी तथा टांगों पर छोटी सी लंगोटी उत्कीर्ण की गई है।

बावड़ी में गणेश एवं गंगा

उबुद-वानर-वन में एक चौकोर बावड़ी है, जो अधिक गहरी नहीं है। इसकी एक दीवार पर भगवान गणेश की सैंकड़ों साल पुरानी, पत्थर की प्रतिमा लगी हुई है। इसके पास ही एक देवी प्रतिमा भी है, जो स्पष्ट पहचानने में नहीं आती किंतु यह देवी गंगा की प्रतिमा है जिसके हाथ में लिए गए पत्थर के कलश से जल की अविरल धारा आज भी बह रही है। इस जल को गंगाजल के समान ही पवित्र माना जाता है। इस बावड़ी एवं प्रतिमाओं का निर्माण भारतीय हिन्दू राजकुमारों के बाली द्वीप पर पहुंच जाने के बाद हुआ है।

गीदड़ मुखी मनुष्य का आकाशीय प्राणियों से वार्तालाप

एक मनुष्याकार प्रतिमा में एक ऐसे मनुष्य का अंकन किया गया है जिसका मुख गीदड़ अथवा कुत्ते की तरह है तथा उसने अपना मुंह पूरी तरह खोलकर आकाश की तरफ उठा रखा है। ऐसा लगता है कि वह आकाश में स्थित प्राणियों को कोई संदेश दे रहा है। उसने एक हाथ में एक यंत्र उठा रखा है तथा दूसरा हाथ इस प्रकार की मुद्रा में है मानो वह अपनी अंगुलियों से इस यंत्र को संचालित करेगा।

इस प्रतिमा की आंखें लम्बी और पतली हैं जिनसे स्पष्ट है कि यह पश्चवर्ती सभ्यता के लोगों द्वारा निर्मित है तथा संभव है कि किसी प्राचीन सभ्यता द्वारा बनाई गई प्रतिमा की अनुकृति है जिसमें गोल आंखों के स्थान पर लम्बी एवं पतली आंखों का अंकन किया गया है।

गीदड़ के मुख वाली स्त्री प्रतिमा

एक अन्य प्रतिमा में एक ऐसी बैठी हुई स्त्री का अंकन किया गया है जिसका मुख मादा-गीदड़ जैसा है। इसका मुख आकाश की तरफ होते हुए भी पहली वाली प्रतिमा की अपेक्षा नीचा है। इसके हाथों की अंगुलियां अपेक्षाकृत अधिक लम्बी एवं पतली हैं। इसके गले में सुंदर हार है जिस पर जटिल अलंकरण किया गया है।

हाथों में कंगन, पैरों में पायजेब एवं कंधों पर अंगद भी देखे जा सकते हैं। अंगद का अंकन भुजाओं पर किया जाता है किंतु इस प्रतिमा में कंधों पर दिखाई दे रहा है। इसने अपना दायां हाथ दायें घुटने पर एवं बायां हाथ बायें घुटने पर रखा हुआ है। इसके अधो भाग पर किसी वस्त्र का अंकन किया गया है जबकि वक्ष पूरी तरह खुला हुआ है।

स्तन सामान्य आकार के एवं आकर्षक बनाए गए हैं। इसकी आंखें भी लम्बी एवं पतली हैं, चेहरा एवं होठ पतले हैं। इस अंकन के आधार पर कहा जा सकता है कि इसे आधुनिक सभ्यता के लोगों द्वारा निर्मित किया गया है।

पथ्य तैयार करते हुए मनुष्य की प्रतिमा

उबुद-वानर-वन में एक वटवृक्ष के नीचे स्थित चबूतरे पर एक भरी हुई देहयष्टि वाले व्यक्ति की प्रतिमा है जो पालथी लगाए हुए प्रसन्न मुद्रा में बैठा है। उसके सामने एक शिला रखी हुई है जिस पर एक गोल पत्थर रखा हुआ है।

यह एक वैद्य की प्रतिमा प्रतीत होती है जो किसी जड़ी-बूटी से दवा बनाने की तैयारी में है। इस वैद्य की आकृति मनुष्य से कम, औरंगुटान से अधिक मिलती है। ऐसा लगता है कि यह किसी अन्य ग्रह से आया हुआ प्राणी है जिसने बाली-वासियों को चिकित्सा शास्त्र का ज्ञान दिया है। इस प्रतिमा में एक बात और ध्यान देने की है कि यह मनुष्य आंखें बंद किये हुए है और इसके दोनों हाथ प्रार्थना के भाव से जुड़े हुए हैं जिससे प्रतीत होता है कि यह दवा तैयार करने से पहले किसी देवता अथवा दिव्य शक्ति का आह्वान कर रहा है।

लम्बी जीभ वाला विचित्र मनुष्य

उबुद-वानर-वन में लगभग पांच फुट की एक ऐसी मनुष्य प्रतिमा रखी हुई है जिसकी जीभ कई फुट लम्बी है तथा पेट तक लटकी हुई है। इस जीभ पर एवं उसके आसपास पानी की लहरें बनी हुई हैं जिससे अनुमान होता है कि यह जल का देवता है। इसकी आंखें गोल हैं तथा लगभग चेहरे से बाहर आई हुई हैं। इस मनुष्य के पैर बहुत छोटे हैं। यह प्राचीन सभ्यता के लोगों द्वारा निर्मित जान पड़ती है।

पैरों में नक्षत्र वाला विचित्र मनुष्य

उबुद-वानर-वन में लगी एक मनुष्य प्रतिमा ने अपने दोनों हाथों में कोई गोला ले रखा है तथा एक पैर से वह उस गोले पर आघात करने की मुद्रा में है। मनुष्य के दांत बाहर दिख रहे हैं तथा चेहरे पर प्रसन्नता मिश्रित विचित्र भाव हैं जो किसी भी तरह सौम्य नहीं कहे जा सकते।

इस मनुष्य के हाथ और पैरों के अग्र भाग विशेष ध्यान देने योग्य हैं। इन पर अंगुलियों की जगह विशिष्ट प्रकार का अलंकरण है। मानो उसने किसी धातु ऐ बने ग्लव्ज (दस्ताने) पहन रखे हैं। गोले पर टिका हुआ पैर मछली जैसा दिखता है तथा हाथ किसी पक्षी के मजबूत पंजे की तरह दिखाई देता है।

गोले पर छिद्रनुमा केन्द्र का अंकन किया गया है तथा इस छिद्र से किरणें निकल रही हैं जिससे आभास होता है कि यह गोला कोई नक्षत्र है। इस मनुष्य की आंखें पूरी तरह गोल हैं जिन पर मोटी-मोटी भौंहों का अंकन किया गया है। गालों और ठोढ़ी पर हल्की दाढ़ी है तथा सिर पर पतली सी पगड़ी है।

पशु चर्म लपेटने वाली स्थूल स्त्री

निकट ही एक स्थूलकाय स्त्री की प्रतिमा है जिसने कमर पर मृगछाला की तरह किसी पशु की चर्म लपेट रखी है तथा उसकी नाभि पर एक नाग बंधा हुआ है। यह स्त्री घुटनों के बल बैठी हुई है तथा इसकी जीभ नाभि तक लटकी हुई है। वक्ष पर दिखाये गए स्तन सामान्य आकार के किंतु बेडौल हैं। सिर के बाल खुले हुए हैं।

इसने बायां हाथ अपने सिर पर रखा हुआ है जिसके कारण बाईं बगल खुली हुई दिखाई देती है तथा कंधे पर पड़े हुए एक सांप का मुख इस बगल में झांक रहा है। स्त्री का दायां हाथ दिखाई नहीं देता किंतु दायें हाथ की अंगुलियां दायें स्तन पर रखी हुई हैं। इसकी आंखें काफी बड़ी और गोल हैं जो एक गोलक में रखी हुई हैं। होठ काफी मोटे हैं तथा चेहरे की भाव भंगिमा अपेक्षाकृत शांत है। यह मूर्ति भी कई शताब्दियों पुरानी प्रतीत होती है। इसकी लम्बी जीभ यह संकेत करती है कि यह किसी प्राकृतिक शक्ति पर नियंत्रण रखने वाली देवी की प्रतिमा है। अंकन के आधार पर अनुमान किया जा सकता है कि यह तूफान की देवी है।

अग्निदेव एवं उनकी पत्नी

उबुद-वानर-वन में एक चबूतरे के कौने पर एक स्त्री-पुरुष की युगल प्रतिमा बनी हुई है जिसमें उनके सिर एवं मुख दिखाई दे रहे हैं। यह प्रतिमा किसी और स्थान से लाकर इस चबूतरे पर स्थापित की गई है। दोनों चेहरों पर बनी आंखें पतली एवं सुंदर हैं। यह प्रतिमा काफी बाद के काल की है तथा यहां रखी अन्य प्रतिमाओं की शैली से मेल नहीं खाती है।

पुरुष की आंखें स्पष्ट रूप से खुली हुई हैं जबकि स्त्री की आंखें बंद हैं। दोनों की जिह्वाएं मुख से बाहर निकलकर लटकी हुई हैं और आपस में मिल रही हैं। पुरुष की जिह्वा अधिक चौड़ी, अधिक बड़ी है। इस जिह्वा पर अग्नि की लम्बी लपटों का अंकन किया गया है। स्त्री की जिह्वा पर अपेक्षाकृत छोटी ज्वालाओं का अंकन है।

ये संभवतः अग्निदेव तथा उनकी पत्नी हैं। दोनों मुखों के होंठ, आंख, नाक, कान, दांत सभी कुछ आज के मनुष्य के समान बहुत सुंदर बनाए गए हैं। दोनों के ही चेहरों के भाव सौम्य हैं। दोनों चेहरे मुस्कुरा रहे हैं जिसके कारण इनकी दंतपक्तियां स्पष्ट और लुभावनी बन पड़ी हैं।

दोनों के कानों में आभूषणों का अलंकरण है। दोनों के गले में बारीक एवं मोटे मनकों की कई-कई मालाएं हैं जो वक्षों तक लटक रही हैं। स्त्री के केश वेणी के रूप में बांधे गए हैं जिन पर अच्छा अलंकरण किया गया है। स्त्री के बाएं कान का कर्णफूल बहुत सुंदर है तथा सूर्य की तरह गोल है। पुरुष की भौहें ऊपर उठकर सिर के बालों से मिल गई हैं तथा सिर के केश अग्नि की ज्वाला की तरह ऊर्ध्वगामी हैं।

स्त्री के माथे पर सुंदर मुकुट बांधा गया है। मुकुट का अंकन एक मेखला के रूप में किया गया है जिसके बीच में एक कलात्मक पैण्डल बांधा हुआ है। स्त्री के बालों का जूड़ा कलात्मक रूप देकर बांधा गया है। यह प्रतिमा भी भारतीय राजकुमारों के बाली द्वीप पर पहुंचन के बाद की प्रतीत होती है क्योंकि भारतीय पुराणों में वर्णित अग्निदेव का इस प्रतिमा पर पूरा प्रभाव दृष्टिगत होता है।

बड़े स्तनों वाली स्त्री प्रतिमा

राक्षस प्रतिमा के निकट ही एक स्त्री प्रतिमा रखी हुई है जिसका केवल धड़ एवं ऊपरी भाग दिखाई देता है। इस स्त्री प्रतिमा में स्थूलकाय स्तन बने हुए हैं। स्तनों को आगे की ओर लम्बा बनाने के लिए उनमें वलय बनाए गए हैं। इन स्तनों की तुलना आधुनिक काल की बकरियों के स्तनों से की जा सकती है। इस स्त्री की मुखमुद्रा में प्रसन्न्ता के स्थान पर पीड़ा का भाव अधिक है। ऐसे स्तनों वाली और भी प्रतिमाएं बाली द्वीप पर देखने को मिलीं। बाली के कुछ प्राचीन चित्रों में भी ऐसे स्तनों वाली स्त्रियां दिखाई गई हैं।

लम्बी जीभ और सुंदर चेहरे वाली स्त्री

उबुद-वानर-वन में रखी एक स्त्री प्रतिमा में, वर्तमान मानव सभ्यता में दिखाई देने वाली नारी का अंकन किया गया है जिसकी गर्दन के दोनों ओर से गुंथी हुई चोटियां सामने आ रही हैं। इन चोटियों को सजाने के लिए बड़े मनकों का प्रयोग किया गया है। सिर के पीछे के केश खुले हुए हैं और कंधों के दूसरी तरफ दिखाई दे रहे हैं। स्त्री का चेहरा प्रसन्नता से दमक रहा है, दांतों की सुंदर पंक्तियां दूर से दिखाई देती हैं, आंखें पतली, नुकली एवं आनुपतिक हैं और पूरी तरह खुली हुई हैं।

स्त्री के वक्ष पर साड़ी जैसे किसी वस्त्र का अंकन किया गया है। चेहरे पर सौम्य भाव हैं तथा पूरा चेहरा प्रसन्नता से दमकता हुआ प्रतीत होता है। यह प्रतिमा, गोल आंखों वाली प्रतिमा से कई सौ साल बाद की प्रतीत होती है। इसके चेहरे के भाव आज की स्त्रियों से मिलते जुलते हैं किंतु बाली की स्त्रियों से नहीं, भारतीय देवियों के चेहरों से।

दो दांतों वाली राक्षस प्रतिमा

उबुद-वानर-वन में एक स्थूलाकाय पुरुष प्रतिमा के मुंह से दोनों तरफ एक-एक दांत बाहर निकला हुआ है। चेहरे पर दाढ़ी है तथा मुख के भाव अपेक्षाकृत क्रूर हैं। यह बैठी हुई मुद्रा में है जिसने अपने दोनों पैर आगे की ओर सिकोड़ कर हाथों की तरह मिला लिए हैं। इसकी बाईं भुजा कंधे के ऊपरी हिस्से से निकलती हुई है जबकि दाईं भुजा सामान्य से कुछ नीचे से निकल रही है। इस राक्षस ने अधो-वस्त्र धारण कर रखा है तथा ऊपरी हिस्सा नग्न है।

आंखों का गोलक पूरी तरह गोल बनाया गया है जिसके ऊपरी आधे हिस्से को पलकों से ढंक दिया गया है तथा नीचे का आधा हिस्सा खुला हुआ है जिसमें से आखों का रैटीना एवं कोर्निया वाला भाग इस तरह बनाया गया है कि दोनों के रंग अलग दिखाई देते हैं मानो यह मूर्ति न होकर चित्र हो।

इस तरह की आँखों वाली यह अकेली प्रतिमा यहां देखेने को मिली। इस राक्षस का बायां हाथ उसके बायें घुटने पर है तथा दायां हाथ दायीं बगल के पास इस प्रकार रखा हुआ है मानो अभय मुद्रा में रखना चाहता हो किंतु हाथों की अंगुलियां आगे की ओर मुड़ी हुई हैं।

गांधार शैली के वस्त्रों वाली प्रतिमाएं

उबुद-वानर-वन में कुछ प्रतिमाओं के वस्त्र गांधार शैली की तरह लहरदार बनाए गए हैं। इन प्रतिमाओं में मनुष्य शरीर भरे हुए तथा आधुनिक मनुष्यों की आकृतियों से मिलते हैं। सहज ही समझा जा सकता है कि इन प्रतिमाओं पर बौद्धों का प्रभाव है। ऐसी ही एक स्त्री प्रतिमा के सिर पर बंदर का सुंदर अंकन किया गया है। स्त्री के स्तन अपेक्षाकृत छोटे बनाए गए हैं जो कि वस्त्र से ढंके हुए हैं। स्त्री की लम्बी एवं पतली आंखें बंद हैं, चेहरे का भाव सौम्य नहीं है। यह बौद्ध भिक्षुणी जान पड़ती है।

कौन थे औरंगुटान जैसी मानव प्रतिमाओं को बनाने वाले

जावा द्वीप पर मानव की उपस्थिति लगभग 10 लाख वर्ष पुरानी है। यहाँ से ”होमो इरैक्टस” (अर्थात् सीधे खड़े होने में दक्ष) मानव प्रजाति के 10 लाख वर्ष पुराने जीवाश्म प्राप्त किये गये हैं। इसे ”पिथेकेंथ्रोपस इरैक्टस” (अर्थात् सीधा खड़ा होने वाला बंदर जैसा मानव) भी कहते हैं। बड़े मस्तिष्क वाला हमारा यह पूर्वज काफी घुमक्कड़ था।

वह प्रथम प्राचीन मानव था जो अफ्रीकी महाद्वीप से बाहर निकलकर पूरे विश्व में अपनी जाति का प्रसार करने लगा। यह आज के मनुष्य और प्राचीन बंदर के मध्य की अंतिम कड़ी थी। इस मानव प्रजाति में से ही आज से लगभग डेढ़ लाख साल पहले ”होमो सैपियन सैपियन” प्रजाति विकसित हुई। आज से लगभग 40 हजार साल पहले ‘होमो सैपियन सैपियन” का आधुनिक संस्करण अर्थात् ”क्रोमैग्नन मैन” प्रकट हुआ।

उबुद-वानर-वन में स्थित प्राचीनतम प्रतिमाएं उस काल की हैं जब क्रौमैग्नन का चेहरा पूर्णतः आज के मानव जैसा नहीं बन पाया था। एक संभावना यह भी है कि इन प्रतिमाओं का निर्माण उस काल में धरती पर आने वाले परग्रही जीवों द्वारा किया गया हो क्योंकि पर्याप्त संभव है कि उस काल का मानव, मूर्ति निर्माण करने में असक्षम हो किंतु उन्हें देखकर परग्रही जीवों ने उनकी प्रतिमाएं इस वन प्रांतर में बनाई हों ताकि भविष्य का मानव इस सभ्यता के बारे में जान सके।

इन्हीं मूर्तियों में एक मूर्ति उन्होंने अपनी भी बनाई जिसकी आंखों पर दूरबीन की नलियां लगी हुई हैं। इस मूर्ति का चेहरा न तो औरंगुटान जैसी शक्लों वाले मोटे आदमियों से मिलता है, न राक्षसों की शक्लों वाले आदमियों से मिलता है न वहाँ मौजूद परवर्ती काल की मूर्तियों के देवताओं से मिलता है। बाली एवं जावा द्वीप में खड़े विशाल मंदिर समूह भी इन द्वीपों पर परग्रही जीवों के आने का साक्ष्य देते हैं तथा इन द्वीपों की दंत कथाएं भी इस बात की पुष्टि करती हैं कि इन द्वीपों पर कभी राक्षस राजा राज्य करते थे जो एक रात में 1000 प्रतिमाएं बनाने में सक्षम थे। 

गाय-बछड़े की अद्भुत वात्सल्य प्रतिमा

जहाँ से हम उबुद-वानर-वन में प्रवेश करते हैं, वहीं लगभग 100 मीटर की दूरी पर चलते ही दीवार पर गाय-बछड़े की अद्भुत प्रतिमा रखी हुई दिखाई देती है। इस प्रतिमा में गाय अपने बछड़े को अपने वक्ष से चिपका कर मनुष्य की तरह बैठी हुई है। उसका एक खुर बछड़े की गर्दन पर इस तरह रखा हुआ है मानो वह बछड़े को इसी खुर के सहारे संभाले हुए हो। गाय तथा बछड़े, दोनों के कान लम्बे हैं, दोनों की आंखें बहुत सुंदर हैं तथा खुली हुई हैं।

गाय के सिर पर छोटे-छोटे सींग हैं। सिर पर दोनों तरफ दो-दो सींग उकेरे गए हैं। गाय एवं बछड़े की लम्बी आंखों से स्पष्ट पहचाना जा सकता है कि इस प्रतिमा का निर्माण आधुनिक सभ्यता के लोगों द्वारा किया गया है न कि आदिम सभ्यता के लोगों द्वारा।

ड्रैगन प्रतिमाएं

कभी इस द्वीप पर विशालाकाय कोमोडो ड्रैगन रहे होंगे। कुछ प्राचीन कोमोडो ड्रैगन प्रतिमाएं उबुद-वानर-वन में बावड़ी के निकट दिखाई पड़ती हैं। कोमोडो ड्रैगन से हटकर भी कुछ ड्रैगन प्रतिमाएं हैं जो चीनी ड्रैगन जैसी दिखाई देती हैं। इनमें से कुछ प्रतिमाएं सर्प की तरह लेटी हुई मुद्रा में हैं तो कुछ मनुष्य की तरह खड़ी हुई मुद्रा में हैं।

एक ड्रैगन प्रतिमा के मुख में एक बंदर बैठा हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है मानो वह ड्रैगन के मुंह को फाड़ने का प्रयास कर रहा हो। इस ड्रैगन के शरीर पर अन्य ड्रैगन उत्कीर्ण किया हुआ है जो किसी अन्य बंदर को निकट आने से रोकता हुआ प्रतीत होता है। यह आधुनिक काल के मानवों द्वारा निर्मित सैंकड़ों साल पुरानी प्रतिमा है।

तलवार एवं ढाल वाले योद्धा की प्रतिमा

उबुद-वानर-वन में एक स्तम्भ पर भरे हुए शरीर वाले योद्धा की मनुष्याकर प्रतिमा खड़ी है जिसने बाएं हाथ में ढाल एवं दायें हाथ में तलवार ले रखी है। इसकी आंखें लम्बी, मूछें बड़ी एवं भाव-भंगिमा कठोर है। यह पश्चवर्ती सभ्यता के लोगों द्वारा बनाई गई प्रतिमाओं में से है। इसके सिर पर छोटा मुकुट है तथा कान किसी धातु की चद्दर से ढके हुए प्रतीत होते हैं। यह प्रतिमा बहुत बाद की जान पड़ती है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाली एवं जावा द्वीपों पर ग्यारह दिन (17)

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बाली एवं जावा - www.bharatkaitihas.com
बाली द्वीप में भगवान राम एवं सीताजी

बाली एवं जावा द्वीपों पर लेखक ने अपने परिवार के साथ ग्यारह दिन का प्रवास किया। इस प्रवास में लेखक को इन द्वीपों पर हिन्दू संस्कृति की छाप दिखाई दी। लेखक ने अपनी पुस्तक हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया नाम पुस्तक में बाली एवं जावा द्वीपों पर वर्तमान समय में हिन्दू धर्म की स्थिति का आंखों देखा विवरण लिखा है।

यद्यपि इण्डोनेशिया संसार का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है तथापि इण्डोनेशियाई रुपयों एव डाक टिकटों पर हिन्दू देवी देवताओं के चित्र देखने को मिलते हैं जिनमें धर्नुधारी श्रीराम, सर्पधारी भगवान शिव, शुंडधारी भगवान गणेश, देवी लक्ष्मी, विष्णु के वाहन गरुड़ आदि प्रमुख हैं।

इण्डोनेशिया के साढ़े सत्रह हजार द्वीपों में बाली नामक एक ऐसा द्वीप भी है जहाँ 90 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या हिन्दू धर्मावलम्बी है तथा अनेक प्राचीन हिन्दू मंदिर स्थित हैं। संसार का सबसे बड़ा कहा जाने वाला बोरोबुदुर मंदिर भी इण्डोनेशिया के जावा द्वीप में स्थित है जो कि एक बौद्ध मंदिर है।

हमारे मन में सात समंदर पार के इन हिन्दुओं की संस्कृति एवं उनके मंदिरों को देखने की लालसा थी। इसी कारण हमने अपनी ग्यारह दिवसीय पारिवारिक यात्रा के लिए इण्डोनेशिया का चयन किया। इण्डोनेशिया में सत्रह हजार से अधिक द्वीप हैं, इनमें से हमने केवल दो द्वीपों बाली एवं जावा का चयन किया।

सामान की ऊहापोह

हमारे इस पारिवारिक दल में छः सदस्य थे जिनमें मेरे पिता श्री गिरिराज प्रसाद गुप्ता, मेरी पत्नी मधुबाला, पुत्र विजय, पुत्र-वधू भानुप्रिया एवं डेढ़ वर्षीय पौत्री दीपा सम्मिलित थी। हमारा परिवार विशुद्ध शाकाहारी है जो मांस, मछली, अण्डा किसी भी चीज का प्रयोग नहीं करता।

बाली एवं जावा द्वीपों पर कुल 11 दिन की यात्रा में छः व्यक्तियों के लिए शाकाहारी भोजन एवं अल्पाहार की व्यवस्था करना किसी चुनौती से कम नहीं था। हमें अनुमान था कि इण्डोनेशिया के बाली द्वीप में शाकाहारी भोजन मिलने में कोई कठिनाई नहीं होगी क्योंकि वहाँ 90 प्रतिशत हिन्दू रहते हैं किंतु हम इस बात को लेकर आशंकित थे कि जावा द्वीप में शाकाहारी भोजन मिलना कठिन है क्योंकि वहाँ 90 प्रतिशत जनसंख्या इस्लाम को मानने वालों की है जिनमें शायद शाकाहार के प्रति आग्रह न हो।

हम इस बात को लेकर भी आशंकित थे कि बाली एवं जावा द्वीपों पर मछली और अण्डा को मांसाहार नहीं माना जाता जबकि हमारे लिए तो ये वस्तुएं मांसाहार ही हैं। इसलिए हमने भोजन बनाने के लिए प्रेशर कुकर, तवा, बेलन, चाकू तथा अन्य आवश्यक बर्तन और कच्ची सामग्री यथा गेहूं का आटा, घी, मसाले एवं दालें आदि अपने साथ ले लीं।

चूंकि बहुत से देशों में साबुत बीज तथा लिक्विड नहीं ले जाया जा सकता, इसलिए हमने तेल तथा चावल अपने साथ नहीं लिए। इसका खामियाजा हमें पूरी यात्रा में भुगतना पड़ा। इस कच्ची भोजन सामग्री के कारण सामान का वजन बढ़ जाने की समस्या उत्पन्न हो गई, इसका समाधान हमने कपड़ों में कमी करके किया। ओढ़ने-बिछाने के लिए कुछ नहीं लिया तथा पहनने के कपड़े भी कम से कम लिए।

समय की घालमेल और शरीर की जैविक घड़ी

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यह 13 अप्रेल की शाम थी जब हम मलिण्डो एयर फ्लाइट से दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से कुआलालम्पुर के लिए रवाना हुए। 13 अप्रेल की रात 10.05 बजे दिल्ली से रवाना होकर यह फ्लाईट 14 अप्रेल को प्रातः 6 बजे कुआलालम्पुर पहुंची। वस्तुतः हम विमान में कुल साढ़े पांच घण्टे ही बैठे थे। इस हिसाब से भारत में सुबह के साढ़े तीन बज रहे थे किंतु मलेशिया, भारत के दक्षिण-पूर्व में स्थित होने के कारण वहाँ का समय भारत से ढाई घण्टे आगे चल रहा था, इसलिए वहाँ सुबह के छः बज चुके थे। डेढ़ घण्टे बाद अर्थात् प्रातः 7.30 बजे हमें कुआलालम्पुर एयरपोर्ट से बाली देनपासार के लिए फ्लाइट मिली जो इण्डोनिशयाई समय के अनुसार प्रातः 10.30 बजे बाली की प्रांतीय राजधानी देनपासार पहुंची। समय की घालमेल इण्डोनेशिया से भारत वापसी के समय भी हुई। हम 23 अप्रेल को प्रातः 11.30 बजे इण्डोनेशिया एयर एशिया फ्लाइट द्वारा जकार्ता से चलकर दोपहर ढाई बजे कुआलालम्पुर पहुंचे। कुआलालम्पुर का समय जकार्ता से एक घण्टा आगे होने के कारण हमें इस यात्रा में वास्तव में तीन घण्टे नहीं अपितु दो घण्टे ही लगे।

23 अप्रेल को मलेशियाई समय के अनुसार सायं 7.00 बजे हम एयर एशिया की फ्लाइट द्वारा कुआलालम्पुर से चलकर रात्रि 10.00 बजे नई दिल्ली पहुंचे। भारत का समय कुआलालम्पुर से ढाई घण्टे पीछे होने के कारण हमें इस यात्रा में वास्तव में साढ़े तीन घण्टे नहीं अपितु 5.30 घण्टे लगे।

यह आश्चर्य-जनक बात थी कि केवल एयरपोर्ट की घड़ियों में ही समय का हेरफेर नहीं हो रहा था। हमारे शरीर की जैविक घड़ी भी अपने भीतर का समय उसी प्रकार बदल रही थी और हमें दिन या रात्रि की अनुभूति स्थानीय समय के अनुसार हो रही थी। यह संभवतः उन चुम्बकीय तरंगों के कारण था जो हर स्थान पर अपना अलग प्रभाव रखती हैं।

मलिण्डो और एयर एशिया की एयर होस्टेस

मलिण्डो एयर फ्लाइट सर्विस मलेशिया की है। मलिण्डो फ्लाइट की एयर होस्टेस विशेष प्रकार की ड्रेस पहनती हैं। गले से लेकर कमर तक कसा हुआ कोट तथा कमर से नीचे छींटदार खुली हुई तहमद होती है जो कमर पर केवल एक बार लपेटी हुई होती है। इस तहमद में लगभग पूरी टांगें दिखाई देती हैं। इण्डोनेशिया एयर एशिया एयर फ्लाइट सर्विस इण्डोनेशिया देश की है।

इस फ्लाइट की एयर होस्टेस गले से कमर तक खुले कॉलर वाला एक कोट पहनती हैं तथा कमर से नीचे एक अत्यंत कसी हुई मिनी स्कर्ट धारण करती हैं। मुझे यह देखकर हैरानी थी कि जहाँ भारत, पाकिस्तान और बांगलादेश की अधिकांश मुस्लिम महिलाएं बुर्के में रहने को अनिवार्य मजहबी रस्म मानती हैं, वहीं मलेशिया एवं इण्डोनेशिया जो कि दोनों ही मुस्लिम देश हैं, की एयर होस्टेस बुर्का डालना तो दूर, अपनी टांगों को खुला रखने में भी बहुत सहजता का अनुभव करती हैं।

दोनों ही देशों की एयर होस्टेस को देखकर तब तो और भी अधिक हैरानी होती है जब वे यात्रियों का स्वागत भारतीयों की तरह दोनों हाथ जोड़कर तथा मुस्कुराकर करती हैं। उनका व्यवहार विशेष रूप से विनम्र तथा सहयोग एवं सेवा की भावना वाला है। वे यात्रियों की सीट बैल्ट बांधने-खोलने, उन्हें गर्म-ठण्डा पेयजल देने, उनका सामान रैक में लगाने जैसी छोटी-छोटी सेवाएं मुस्कुरा कर करती हैं। अपनी बात विनम्रता से कहती हैं तथा यात्रियों को विदा देते समय पुनः हाथ जोड़कर अभिवादन करती हुई उन्हें आगे की यात्रा के लिए शुभकामनाएं देती हैं।

मलिण्डो की आवभगत

मलेशिया की एयर फ्लाइट सर्विस ‘मलिण्डो’ की आवभगत हमारे लिए अविस्मरणीय घटना बन गई है। 13 अप्रेल की रात्रि का भोजन हमने बुक करवा रखा था तथा विशेष हिदायत दे रखी थी कि हमें ‘जैन-भोजन’ उपलब्ध कराया जाए। यह हमारी अपेक्षा के अनुरूप था लेकिन हैरानी तब हुई जब 14 अप्रेल को प्रातः नौ बजे एयर होस्टेस गर्म नाश्ता लेकर उपस्थित हुई। हमने यह सोचकर मना कर दिया कि यह अवश्य ही नॉनवेज होगा किंतु एयर होस्टेस ने आग्रह पूर्वक कहा कि यह पूरी तरह वैजीटेरियन है तथा इसमें केवल गेहूं के आटे के परांठे एवं अरहर की दाल है।

यह नाश्ता हमने बुक नहीं करवा रखा था किंतु एयर सर्विस द्वारा अपनी ओर से उपलब्ध कराया गया था। उन गर्म परांठों और भारतीय तरीके से छौंक लगी हुई अरहर की दाल इतनी स्वादिष्ट थी कि भारतीयों को भी हैरानी में डाल दे। हिन्द महासागर के ऊपर से उड़ते हुए यह अनपेक्षित दाल-परांठों का नाश्ता जीवन भर याद रखने योग्य था। मलिण्डो जैसी सदाशयता और आवभगत हमें अपनी यात्रा के दौरान इण्डिोनेशिया एयर एशिया की तीनों फ्लाईट्स में देखने को नहीं मिली।

सर्विस अपार्टमेंट्स की बुकिंग

चूंकि होटलों में खाना नहीं बनाया जा सकता इसलिए हमारे सामने समस्या यह थी कि हमारे रहने की व्यवस्था किसी शाकाहारी हिन्दू परिवार में हो जाए। यह कार्य सरल नहीं था, ऐसे परिवार को भारत में बैठे हुए ढूंढ निकालना, समुद्र में से किसी सुईं को ढूंढ निकालने जैसा था। इस समस्या का समाधान किया आधुनिक समय में प्रचलन में आई सर्विस अपार्टमेंट्स की सुविधा ने।

विश्व के बहुत से देशों में विशेषकर उन देशों में जहाँ पर्यटन, अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है, बहुत से परिवार अपने घर का खाली हिस्सा पर्यटकों को उपलब्ध करा रहे हैं। इन्हें सर्विस अपार्टमेंट्स कहा जाता है। कुछ वैबसाइट्स ने इन सर्विस अपार्टमेंट्स को अपने तंत्र पर जोड़ रखा है, विश्व भर में बैठे पर्यटक इनका लाभ उठा सकते हैं। हमने उन सर्विस अपार्टमेंट्स का चयन किया जिनमें भोजन बनाने के लिए अलग से रसोई-घर हो।

सौभाग्य से बाली में एक ऐसा परिवार हमें मिल गया जिसमें पति का नाम पुतु तथा पत्नी का नाम पुतु एका था। यह एक हिन्दू परिवार है और इसने पर्यटकों के लिए अलग से एक पांच सितारा होटल जैसी सुविधाओं वाला और कांच की दीवारों से घिरा हुआ एक अत्यंत रमणीय और आरामदायक फ्लैट चावल के खेतों के बीच बना रखा है। यह ऐसा ही था जैसे भारत में आकर कोई किसी छोटी से ढाणी में रहे तथा सुविधाजनक आवास का आनंद उठाए।

हमारे मन में एक आशंका अपनी सुरक्षा को लेकर थी। खेतों के बीच अनजान देश में इस प्रकार अकेले परिवार का निवास करना, कहीं किसी संकट को आमंत्रण देना तो नहीं था! फिर भी जब हमें ज्ञात हुआ कि श्रीमती पुतु एका बहुत पढ़ी-लिखी हैं और प्रायः अंतर्राष्ट्रीय सेमीनारों में भाग लेने के लिए मलेशिया, सिंगापुर तथा अन्य देशों को जाती रहती हैं तो हमने पांच दिन के लिए इस सर्विस फ्लैट को बुक करवा लिया।

योग्यकार्ता में निवास करने वाले मासप्रियो नामक एक मुस्लिम शिक्षक ने हमें अपनी वैबसाइट के माध्यम से भरोसा दिलाया कि हम उनके द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे दो कमरों और एक रसोई के सर्विस अपार्टमेंट में अपना प्रवास आनंददायक रूप से व्यतीत कर सकेंगे। यहाँ तक कि मासप्रियो की पत्नी ने भरोसा दिलाया कि वे हमारे लिए शाकाहारी भोजन बना देंगी। इस परिवार से हमारी यह सारी बातचीत ऑनलाइन हुई थी। हमने यह सर्विस अपार्टमेंट बुक कर लिया।

बाली और योग्यकार्ता में तो यह व्यवस्था हो गई किंतु जकार्ता में ऐसा किया जाना संभव नहीं था क्योंकि जकार्ता विश्व के सर्वाधिक भीड़भाड़ वाले शहरों में से है जहाँ लगभग हर समय जाम लगा रहता है। चूंकि सर्विस अपार्टमेंट्स प्रायः शहर के कुछ दूर ही मिलते हैं इसलिए उनका चयन करना इस खतरे को आमंत्रण देता था कि हम अपनी यात्रा के अंतिम दिन प्रातः साढ़े ग्यारह बजे की फ्लाइट ट्रैफिक जाम में फंसने के कारण चूक जाएं। अतः हमने अपने प्रवास की अंतिम बुकिंग जकार्ता एयर पोर्ट के निकट ही किसी होटल में करने का निर्णय लिया।

होटल में किसी तरह का भोजन बनाया जाना संभव नहीं था इसलिए हमने योजना बनाई कि जब हम 21 अप्रेल की सुबह को योग्यकार्ता से चलेंगे तो 22 और 23 के भोजन भी व्यवस्था कर लेंगे। आपात्कालीन व्यवस्था के तहत हमने जोधपुर से लड्डू, मठरी, शकरपारे और खाखरे आदि अपने साथ ले लिए।

समुद्र के किनारे दौड़

14 अप्रेल की प्रातः लगभग सवा दस बजे हमें विमान की खिड़की से बाली द्वीप का किनारा दिखाई देने लगा और 15 मिनट पश्चात् अर्थात् प्रातः साढ़े दस बजे हम बाली द्वीप की प्रांतीय राजधानी देनपासार में उतर गए। यह एयरपोर्ट किसी बंदरगाह की तरह समुद्र तट पर बना हुआ है।

हवाई जहाज कुछ समय तक समुद्र के किनारे बने विशाल रनवे पर दौड़ता रहा। यह एक बहुत ही अद्भुत दृश्य था। राजस्थान में रेलगाड़ी और बसें रेगिस्तान के किनारों पर दौड़ती हैं और हम यहाँ समुद्र के किनारे सरपट भागे जा रहे थे। बाली का समुद्र बहुत शांत, साफ और निर्मल है जिसके किनारे नारियल के झुरमुट इसे बहुत आकर्षक बनाए हुए हैं। इस समुद्र के जल का रंग भी सहज ही आकर्षित करने वाला है।

खाली हाथ

इण्डोनेशिया में पर्यटकों के लिए वीजा निःशुल्क है तथा पर्यटकों के वहाँ पहुंचने पर ही हाथों-हाथ दिया जाता है। वीजा लेने, आव्रजन (इमीग्रेशन) की औपचारिकताएं पूरी करने तथा एयरपोर्ट अथॉरिटी से अपना सामान प्राप्त करने में हमें लगभग एक घण्टे का समय लग गया। इतना सब कर लेने के बाद भी हमारी हिम्मत एयरपोर्ट से बाहर निकलने की नहीं हो रही थी। इण्डोनेशियाई मुद्रा की दृष्टि से हम खाली हाथ जो थे।

हमारी जेब में भारतीय मुद्रा तथा अमरीकी डॉलर थे जिनकी व्यवस्था हमने दिल्ली में ही कर ली थी। चूंकि भारत में कानूनन इण्डोनेशिया की मुद्रा उपलब्ध नहीं होती, इसलिए हमें एयरपोर्ट से बाहर निकलने से पहले इण्डोनेशियाई मुद्रा की व्यस्था करनी थी। सौभाग्य से एयर पोर्ट के निकास पर ही कुछ मनीचेंजर एजेंट बैठते हैं, उन्होंने हमारी चिंता दूर की।

देखते ही देखते मालामाल

भारतीय मुद्रा से इण्डोनेशियाई रुपया खरीदना घाटे का सौदा था। इसलिए हमने भारत में 64.54 रुपए की दर से अमरीकी डॉलर खरीद लिए थे। यहाँ हमें अमरीकी डॉलर से इण्डोनेशियाई रुपया खरीदना था। डॉलर में इण्डोनेशियाई रुपया खरीदना लाभ का सौदा था। इस अल्टा-पल्टी में हमें भारत के 1 रुपए के बदले 205 इण्डोनेशियाई रुपए मिल गए।

हमने 700 डॉलर एक्सचेंज करवाये जिनके लिए हमने भारत में 45,178 रुपए चुकाये थे। यहाँ हमें 700 डॉलर के बदले 92 लाख 61 हजार 490 इण्डोनेशियाई रुपए प्राप्त हुए। भारत में 92 लाख रुपए की रकम बहुत बड़ी होती है। इतने रुपए में भारत में कोई आदमी पूरी जिंदगी निकाल सकता है जबकि हमें इण्डोनेशिया में केवल 10 दिन निकालने थे।

इस बड़ी राशि के बारे में सोचकर हमें बहुत ही अटपटा लग रहा था कि हमारी जेब में 92 लाख रुपए हैं। जो भी हो, हम देखते ही देखते मालामाल तो हो ही गए थे। बाली एवं जावा द्वीपों पर ग्यारह दिन हमें इसी राशि के बल पर बिताने थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाली द्वीप पर पांच दिन (18)

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बाली द्वीप पर पांच दिन - www.bharatkaitihas.com
मेंगवी गांव में बांस की खपच्चियों से टोकरियां बुनते हिन्दू!

इण्डोनेशिया देश में हमारी ग्यारह दिनों की यात्रा में से बाली द्वीप पर पांच दिन निर्धारित थे। वस्तुतः भारत के लोगों के लिए इण्डोनेशिया में सबसे बड़ा आकर्षण बाली द्वीप ही है।

पुतु से भेंट

अब हम एयरपोर्ट से बाहर जा सकते थे। हमने बाली द्वीप के मैंगवी नामक एक छोटे से गांव में अपना सर्विस अपार्टमेंट बुक कराया था जो देनपासार से लगभग 25 किलोमीटर दूर है। इसी अपार्टमेंट का मालिक पुतु स्वयं पर्यटकों को वाहन उपलब्ध कराता है तथा ड्राइविंग भी स्वयं ही करता है।

हमें आशा थी कि पुतु हमें लेने आएगा किंतु एयरपोर्ट पर हमें बहुत विलम्ब हो गया था, इसलिए मन में आशंका भी थी कि कहीं लौट नहीं गया हो किंतु सौभाग्य से पुतु, विजय तायल के नाम की कागज की पट्टी लिए एयरपोर्ट के बाहर ही खड़ा मिल गया।

यह एक अच्छे-खासे डील-डौल वाला लम्बा चौड़ा, हंसमुख और गौर-वर्ण नवयुवक था जिसने बड़े करीने से अपने बाल बना रखे थे और बेहद साफ सुथरे पैण्ट-शर्ट पहन रखे थे। उसने हमारा स्वागत दोनों हाथ जोड़कर तथा होठों पर लम्बी मुस्कान के साथ किया। उसने हमें नमस्ते कहा तथा हमसे हाथ भी मिलाया। उसके चेहरे से स्पष्ट ज्ञात होता था कि जितनी प्रसन्नता हमें उसे देखकर हुई है, उससे कहीं अधिक प्रसन्नता उसे अपने भारतीय अतिथियों को देखकर हुई है।

पुतु काफी बड़ी वातानुकूलित कार लेकर आया था जिसमें हम छः सदस्य मजे से बैठ सकते थे तथा हमारा सामान भी आराम से आ सकता था। हमारे भाग्य से वह अंग्रेजी भाषा अच्छी तरह से समझ सकता था। उसने न केवल हमारा सामान अपनी कार के पिछले हिस्से में जमाया अपितु हमारे लिए कार के दरवाजे भी खोले। भारत में ऐसे विनम्र एवं अनुशासित टैक्सी चालक शायद ही देखने को मिलें।

पुतु ने कार स्टार्ट करते ही पूछा- क्या आप लोग हिन्दू हैं?

जब हमने कहा कि हाँ हम हिन्दू हैं, तो पुतु के चेहरे की मुस्कान और भी चौड़ी हो गई। उसने विनम्रता से कहा कि मैं भी हिन्दू हूँ तथा मेरी वाइफ भी हिन्दू है। ऐसा कहते समय उसके चेहरे पर गर्व और आनंद के जो भाव थे, उनका वर्णन किया जाना कठिन है, केवल कल्पना ही की जा सकती है। लगे हाथों उसने बता दिया कि उसकी पत्नी जिसका नाम पुतु एका है, पूरी तरह शाकाहारी है। मैं अभी शाकाहारी होने का प्रयास कर रहा हूं तथा सप्ताह में दो दिन चिकन या अन्य प्रकार का मांस नहीं खाता।

देनपासार एयरपोर्ट से मैंगवी गांव तक लगभग डेड़ घण्टे का समय लगने वाला था। अधिकांश मार्ग, देनपासार शहर से होकर जाता था। इस समय का उपयोग हमने शहर के बाजारों, घरों तथा सड़क के ट्रैफिक को देखने में किया।

शोर और गंदगी से पूरी तरह मुक्त

हमारे आश्चर्य का पार नहीं था। शहर की सड़कों पर ट्रैफिक तो था किंतु वाहन चालकों में किसी तरह की भागमभाग, बेचैनी, प्रतिस्पर्द्धा नहीं थी। सब अपनी लेन में चल रहे थे। दुपहिया वाहनों के लिए सड़क के बाईं ओर का हिस्सा निर्धारित था। कोई वाहन एक दूसरे से आगे निकलने का प्रयास नहीं कर रहा था। न कोई हॉर्न बजा रहा था। सड़कें पूरी तरह साफ थीं। कचरे का ढेर दिखाई देना तो दूर, कहीं कागज या पेड़ों के पत्ते तक दिखाई नहीं दे रहे थे। सड़कों के किनारे कचरापात्र लगे थे, लोग अपने हाथों का कचरा, कचरापात्रों में ही फैंकने के अभ्यस्त थे।

घास-फूस का दूध तीस हजार रुपए किलो

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हमने पुतु से पूछा कि क्या सर्विस अपार्टमेंट में दूध की व्यस्था हो जायेगी। तो उसने साफ कह दिया कि नहीं, यहाँ आपको कहीं भी दूध नहीं मिलेगा। आप चाहें तो पैक्ड मिल्क खरीद सकते हैं। हमें झटका तो लगा किंतु अन्य कोई उपाय नहीं था। एक जनरल स्टोर के सामने पुतु ने अपनी कार रोकी तथा हमें दूध खरीदने के लिए कहा। स्टोर में जाकर मुझे एक और बड़ा झटका लगा। मैं किसी भी तरह दुकानदार को यह नहीं समझा पाया कि मैं क्या खरीदना चाहता हूँ। न ही मैं स्वयं, स्टोर में दूध की थैलियां खोज सका। पुतु की कार मुझसे काफी दूर थी। इसलिए उसकी सहायता लेने के लिए मुझे काफी चलना पड़ता। अंत में एक अन्य ग्राहक ने मेरी बात समझी और मुझे एक फ्रिज में से कागज का एक डिब्बा दिखाया। मैंने डिब्बे को पढ़ा तो एक झटका और खा गया। यह न्यूजीलैण्ड से आया हुआ दूध था जिसका निर्माण वनस्पतियों, वनस्पति तेलों और कई तरह के प्रोटीनों से मिलकर हुआ था। मुझे विवश होकर यही दूध खरीदना पड़ा।

एक बड़ा झटका उस समय और लगा जब दुकानदार ने मुझसे एक लीटर दूध के लिए तीस हजार इण्डोनेशियन रुपयों की मांग की। मैंने तत्काल भारतीय रुपयों में हिसाब लगाया कि यह डेढ़ सौ रुपया लीटर पड़ा। मुझे समझ में आने लगा था कि मालामाल हो जाने की खुशी अधिक समय तक टिकी नहीं रहने वाली है।

बीस हजार रुपए का नारियल

दूध की दुकान के बाहर पानी वाले नारियलों की एक थड़ी थी। पिताजी ने वहाँ से एक नारियल खरीदा। मैंने पूछा कितने रुपए दूं तो थड़ी पर बैठी औरत ने अपने गल्ले में से बीस हजार रुपए का नोट दिखाया। मैंने फिर भारतीय रुपयों में हिसाब लगाया। यह 100 रुपए का था।

भारत में जहाँ पानी वाला नारियल 25-30 रुपए में मिल जाता है, बाली में यह 100 रुपए का था। बाली में वस्तुओं का मूल्य भारत की तुलना में कहीं अधिक था। इण्डोनेशियाई रुपयों के बल पर मालामाल होने का उत्साह अब काफी कम पड़ गया था। अब तो यह सोचना आरम्भ हो गया था कि बाली द्वीप पर पांच दिन बिताने के लिए क्या हमारी धनराशि पर्याप्त होगी?

मेंगवी गांव का वह कांच का बंगला

देनपासार से लगभग 25 किलोमीटर दूर मेंगवी गांव का सर्विस अपार्टमेंट देखते ही हमारी मंत्र मुग्ध होने जैसी स्थिति हो गई। यह एक शानदार छोटा सा बंगला था जिसके आरामदेह कमरों में बड़े-बड़े पलंग, सफेद सूती चद्दरें, आधुनिक शैली में बने शावर युक्त बाथरूम और आदमकद शीशों वाले ड्रेसिंग रूम तो मन को मोहते ही थे, साथ ही बंगले का बरामदा एक बड़े और खुले लॉन में खुलता था जो सीधा चावल के विशाल खेतों से जुड़ा हुआ था।

यहाँ शानदार बोगनविलिया और तरह-तरह के फूलों वाली झाड़ियां लगी हुई थीं जिनके बीच में बैठने के लिए आरामदायक कुर्सियां और सेंट्रल टेबल का प्रबंध किया गया था। बंगले में एयर कण्डीशनर, गीजर, इलेक्ट्रिक आयरन, वाई-फाई जैसी सारी आधुनिक सुख-सुविधाएं दिल खोलकर जुटाई गई थीं। बंगले का बाहरी बरामदा शीशे की दीवारों से बना हुआ था। यहाँ से बैठकर चावल के खेतों का दृश्य देखते ही बनता था। एक छोटी सी लाइब्रेरी का भी प्रबंध किया गया था।

इस बंगले की सबसे बड़ी विशेषता थी इसका रसोई-घर। यह भी आधुनिक शैली में बनी हुई रसोई थी जिसमें फ्रिज, कुकिंग गैस, रोस्टर, आर ओ से साफ किया गया पानी आदि सभी सुविधाएं मौजूद थीं। यदि इसमें कुछ नहीं था तो वे थे चकला, बेलन और तवा जिनका प्रबन्ध हम भारत से ही करके लाए थे। हमारे बाली द्वीप पर पांच दिन इसी बंगले में निकलने वाले थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाली द्वीप में पहला दिन (19)

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बाली के एक मंदिर प्रांगण में नुक्कड़ नाटक

14 अप्रेल 2017 को हम अपने सर्विस अपार्टमेंट में लगभग एक बजे पहुंच गए। इसी के साथ हमारा बाली द्वीप में पहला दिन आरम्भ हो गया। रास्ते में हमने एक सब्जी मण्डी देखी जिसे देखकर तबियत प्रसन्न हो गई और निर्णय लिया गया कि संध्या काल में इस सब्जी मण्डी से सब्जियां खरीदी जाएंगी।

हम लम्बी यात्रा की थकान से बुरी तरह थके हुए थे। इसलिए हमने बाली द्वीप में पहला दिन आराम करने, चाय पीने और लॉन में बैठकर चावल के खेतों को देखने में बिताया। पुतु ने हमें बताया कि कल बाली द्वीप पर हिन्दुओं का सबसे बड़ा त्यौहार है। इसलिए वह अगले दिन थोड़ा विलम्ब से आएगा।

हमें इसमें कोई आपत्ति नहीं थी क्योंकि हमें भी अपनी दैनंदिनी से निवृत्त होने और अपना भोजन तैयार करने में प्रातः के साढ़े दस तो बजने ही थे। हमें पुतु ने एक दुपहिया स्कूटर दे दिया ताकि हम यदि आसपास कहीं जाना चाहें तो जा सकें।

फूलों का अनोखा संसार

शाम के समय मैं और विजय, पुतु का दुपहिया स्कूटर लेकर तरकारी और दूध खरीदने के लिए उसी सब्जी मण्डी में पहुंचे जो प्रातः काल में हमने मैंगवी आते समय देखी थी। यह पुरा तमन अयुन टेम्पल का निकटवर्ती क्षेत्र था। हमारे लिए यह एक और झटका खाने वाला समय था। वहाँ सब्जी मण्डी नहीं थी, केवल फूलों की थड़ियां और दुकानें थीं, जिन्हें हम सुबह हरी सब्जियां समझ बैठे थे।

कई तरह के फूल, कई रंगों के फूल। चारों तरफ फूल ही फूल। प्राकृतिक रूप से उत्पन्न फूलों के साथ-साथ बांस की खपच्चियों से बने हुए दर्जनों प्रकार के फूल सजे हुए थे। ये सारे फूल हिन्दुओं के अगले दिन के बड़े त्यौहार में उपयोग लिए जाने हेतु बिकने आए थे।

मण्डी में भीड़-भाड़ थी किंतु हिन्दुस्तान की भीड़ की तुलना में कुछ भी नहीं। बहुत से लोग अपने परिवारों के साथ फूल खरीदने आए थे। वे फूल खरीदते थे, मोलभाव भी करते थे किंतु कहीं कोई बहस नहीं थी, कोई भी जोर-जोर से नहीं बोल रहा था। लोग आपस में हंस-बोल रहे थे किंतु एक शालीनता जैसे विद्यमान थी।

फल एवं सब्जी मण्डी की वे महिला दुकानदार

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फूलों की मण्डी से सटी हुई एक पतली गली थी जिसमें जाने पर हमें वास्तव में एक फल और सब्जी मण्डी दिखाई दी। इस मण्डी में भारत की तरह छोटी-छोटी दुकानें बनी हुई थीं और लकड़ी के बने हुए ठेले भी देखे जा सकते थे। हमें यह देखकर प्रसन्नता हुई कि वहाँ कई तरह के फल मौजूद थे किंतु यह देखकर मन उदास भी हुआ कि सब्जियां बहुत ही कम थीं। सेब थे किंतु चालीस से पचास हजार रुपए किलो अर्थात् भारतीय मुद्रा में दो सौ से ढाई सौ रुपए किलो। केले थे किंतु चार हजार रुपए का एक केला। अर्थात् भारतीय मुद्रा में बीस रुपए का एक केला। हजारों में भाव सुनकर ही मुझे पसीना आ जाता था। हालांकि भारतीय मुद्रा में हिसाब लगाकर कुछ तसल्ली मिलती थी, किंतु समस्त फल एवं सब्जियां भारत की तुलना में बहुत महंगी थीं। कुछ ठेलों पर सब्जियां थीं जिनमें आलू, प्याज, लौकी, पत्ता गोभी, बैंगन और तुरई ही प्रमुख थीं। एकाध सब्जियां स्थानीय प्रवृत्ति की थीं जिनके नाम पूछने पर भी हमें याद नहीं रहे। उनका उपयोग कैसे किया जा सकता था, यह जानने में तो हम पूरी तरह असफल रहे। क्योंकि समस्त दुकानदार जो कि शत-प्रतिशत महिलाएं थीं, अंग्रेजी का एक भी अक्षर नहीं जानती थीं। वे हमें बाट और रुपए दिखाकर समझाने का प्रयास करती थीं कि कितनी सब्जी के लिए हमें कितने रुपए देने पड़ेंगे।

हम जहाँ भी रुक जाते, आस-पास की दुकानों की महिलाएं भी उठकर हमारे पास आ जातीं। वे यह देखना और सुनना चाहती थीं कि हम तरकारी कैसे खरीदते हैं, उनकी बात को कैसे समझते हैं और हम किस प्रकार बोलते हैं!

सब्जी बेचने वाली उन महिलाओं को देखकर सहज ही जाना जा सकता था कि वे बहुत निर्धन हैं, भारतीय सब्जी बेचने वाली महिलाओं से भी अधिक निर्धन। भले ही उनके द्वारा बोला जा रहा एक भी शब्द हमारे पल्ले नहीं पड़ रहा था किंतु उनकी वाणी और मुखमुद्रा हमें यह बता रही थी कि वे हमें अपने बीच पाकर प्रसन्न थीं और किसी न किसी बहाने से हमसे बात करना चाहती थीं।

हमने किसी तरह आलू, प्याज और टमाटर खरीदे तथा यह निर्णय लिया कि अगले दिन सुबह आकर ताजी तरकारी खरीदेंगे। इसी के साथ हमारा बाली द्वीप में पहला दिन पूरा हो गया।

विदेशियों को पहचानने वाले कुत्ते

यद्यपि इस समय संध्या के सात ही बजे थे किंतु अंधेरा बहुत घिर आया था हम लौट पड़े। सर्विस अपार्टमेंट पहुंचते-पहुंचते तो गहरी रात हो गई। यद्यपि अभी साढ़े सात ही बजे थे। मार्ग में हमें यह भय भी लगा कि हमें विदेशी और असुरक्षित जानकर कोई हम पर आक्रमण न कर दे।

यद्यपि ऐसा कुछ नहीं हुआ। हाँ, मैंगवी गांव के उन कुत्तों ने हमें फिर से पहचान कर भौंकना आरम्भ कर दिया था। कुत्तों की आंखें हमें स्पष्ट रूप से धमका रही थीं कि हम जानते हैं कि तुम विदेशी हो, इसलिए अपने अपार्टमेंट में ही रहो, इधर-उधर मत घूमो। मुझे याद आया कि भारत में भी गलियों के कुत्ते विदेशी पर्यटकों को देखकर इसी प्रकार भौंकते हैं। स्वयं के लिए विदेशी शब्द सोच पाना भी बड़ा अटपटा सा था।

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

बाली द्वीप में दूसरा दिन (20)

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बाली द्वीप में दूसरा दिन

15 अप्रेल 2017 को दूसरे दिन प्रातः पांच बजे ही आंख खुल गई। आज हमारा बाली द्वीप में दूसरा दिन था। इस समय भारत में तो रात के ढाई ही बजे होंगे किंतु हमारे शरीर में लगी जैविक घड़ी ने स्थानीय समय से पूरी तरह से तालमेल बैठा लिया था। चावल के खेतों के बीच बने उस लॉन में पूरे परिवार के साथ बैठकर सुबह की चाय पीना, अपने आप में एक अलग ही अनुभव था। इसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता।

मैं और विजय जल्दी ही तैयार होकर, पुतु का स्कूटर लेकर प्रातः आठ बजे फिर से उसी सब्जी मण्डी की ओर चल पड़े ताकि दूध और तरकारी खरीदी जा सकें। इस शांत प्रातः बेला में चावल के खेतों के बीच से निकलना एक सुखद अनुभव था। सड़क के दोनों किनारों पर फलों से लदे हुए केले, पपीते, खजूर और नारियल के वृक्ष सहज ही ध्यान आकर्षित करते थे।

नृत्यलीन बारोंग

अभी हम कुछ दूर ही चले थे कि मार्ग में हमें एक जुलूस आता हुआ दिखाई दिया। हमने स्कूटर सड़क के किनारे खड़ा कर दिया तथा उसकी तस्वीरें उतारने लगे। जुलूस के बीच कपड़े का एक विशालाकाय जानवर नृत्य कर रहा था जिसके मुंह पर वाराह (शूकर) का मुखौटा लगा हुआ था।

कपड़े के भीतर दो आदमी थे जो अपने हाथों और पैरों से इस प्रकार की भंगिमाएं बना रहे थे जिनसे वह विशालाकाय वाराह नृत्य करता हुआ दिखाई देता था और उसके गले में पड़ी पीतल की बड़ी सी घण्टी से सुमधुर ध्वनि निकल रही थी। उसके चारों ओर चल रहे कुछ श्रद्धालु अपने हाथों में ढोल, मंजीरे तथा स्थानीय वाद्य बजा रहे थे जिससे चारों ओर का वातावरण धार्मिक श्रद्धा से आप्लावित हो रहा था। एक महिला बांस की खपच्चियों पर कपड़े से बनी छतरी उठाए हुए एब शूकर के साथ चल रही थी।

हमें बताया गया कि यह बारोंग है जो धरती पर बुरी आत्माओं के सफाए के लिए आया है और घर-घर जाकर वहाँ से बुराइयों का सफाया कर रहा है। एक अन्य कथा के अनुसार बारोंग एक बुरी ”रांग्डा” अर्थात् विधवा स्त्री से युद्ध कर रहा है जो समस्त बुराइयों की जड़ है। यह कथा जावा की राजकुमारी महेन्द्रदत्ता से भी जुड़ी हुई है जो बाली द्वीप की महारानी थी तथा उसी ने बाली द्वीप के आदिवासियों में हिन्दू धर्म का प्रचलन किया था।

एक क्षेपक के अनुसार रानी महेन्द्रदत्ता तंत्र-मंत्र करती थी इसलिए बाली के राजा धर्मोदयाना ने उसे अपने महल से निकाल दिया। वह जंगल में जाकर रहने लगी। राजा धर्मोदयाना के मरने पर रानी विधवा हो गई। इसे बाली में ”रांग्डा” कहा जाता है। यह शब्द उत्तर भारत में विधवा स्त्री के लिए मध्यकाल में प्रचलित ”रांड” शब्द से काफी मिलता जुलता है।

हमने देखा कि वह जुलूस बारी-बारी से प्रत्येक घर के सामने जाकर रुकता था, बारोंग का नृत्य और भी तेज हो जाता था तथा गृहस्थ लोग घर से बाहर आकर, जुलूस के साथ चल रहे पुजारी को रुपए देते थे। शूकर के नृत्य की भाव-भंगिमा तथा जुलूस के द्वारा बजाया जा रहा संगीत, दोनों ही अपने आप में विशिष्ट थे।

हमें याद आया कि पुतु ने बताया था कि आज हिन्दुओं का बड़ा त्यौहार है जिसे गुलंगान कहते हैं। हमें स्वतः स्पष्ट हो गया कि यह जुलूस गुलंगान का हिस्सा है। हमें ज्ञात हुआ कि वाराह के चेहरे वाले बारोंग की तरह बाघ तथा शेर के मिले जुले रूप वाला बारोंग भी आता है। वह शिव की शक्ति का प्रतीक माना जाता है। वह भी धरती पर से बुरी आत्माओं को नष्ट करने वाला माना जाता है।

स्वर्ग से आती हैं आत्माएं

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बालीवासी गुलंगान का त्यौहार अधर्म पर धर्म की विजय के उत्सव के रूप में मनाते हैं। मान्यता है कि इस दिन स्वर्ग से पूर्वजों की आत्माएं भी उत्सव मनाने धरती पर आती हैं। इस त्यौहार की तुलना विश्व भर के हिन्दुओं द्वारा मनाये जाने वाली दीपावली त्यौहार से की जा सकती है। हमें बताया गया कि यह उत्सव, मुख्य दिवस के तीन दिन पहले आरम्भ होकर मुख्य उत्सव के ग्यारह दिन बाद तक चलता है। मुख्य दिवस के तीन दिन पहले पेन्येकेबान मनाया जाता है। इस दिन हर हिन्दू के घर में केले का प्रसाद बनाकर देवता को अर्पित किया जाता है। अगले दिन अर्थात् मुख्य दिवस के दो दिन पहले पेन्याजान का आयोजन किया जाता है। इस दिन तले हुए चावलों का केक बनाकर देवताओं को अर्पित किया जाता है जिसे जाजा कहते हैं। इसके अगले दिन अर्थात् मुख्य त्यौहार से एक दिन पहले पेनाम्पाहान का आयोजन किया जाता है। इस दिन दावत का आयोजन किया जाता है जिसमें सूअर तथा मुर्गे काटे जाते हैं। मुख्य दिवस के अगले दिन परिवार के पुरुष सदस्य, बारोंग के साथ नाचते-गाते हुए जुलूस के रूप में घर-घर जाते हैं। गृहस्थ जन अपने घरों के आगे सजावट करते हैं तथा एक दूसरे के घर जाकर त्यौहार की बधाई देते हैं और मिठाई खाते हैं।

त्यौहार के आयोजन के दस दिन बाद विशेष रूप से सामूहिक प्रार्थनाओं का आयोजन किया जाता है तथा स्वर्ग से धरती पर आई पूर्वजों की आत्माओं को विदाई दी जाती है। पूर्वज आत्माओं के जाने के एक दिन बाद लोग मौज-मस्ती करते हैं। हंसी-ठट्ठा होता है, आनंद मनाया जाता है। चूंकि बाली का परम्परागत कलैण्डर 210 दिन का होता है इसलिए यह त्यौहार हर दस माह बाद मनाया जाता है।

बांस ही बांस

हम थोड़ी दूर और गए तो हमारा ध्यान घरों के आगे लगे हुए लम्बे से बांस की ओर गया जो लगभग 15-20 फुट की ऊँचाई पर जाकर फिर से धरती की तरफ मुड़ता था। इन्हें पेंजोर कहा जाता है। प्रत्येक बांस रंगीन कपड़ों, कागजों और फूलों से ढंका हुआ था। बांस के साथ ही धरती से लगभग पांच-छः फुट की ऊंचाई पर बांस की खपच्चियों से बना हुआ लघु देवालय लटका हुआ था।

इसके भीतर देवता के प्रतीक के रूप में कोई प्रतिमा थी जिसके समक्ष कई रंगों के पुष्प, फल और अण्डे आदि रखे हुए थे। कुछ बांसों को तो इतनी अच्छी तरह से और इतने भव्य प्रकार से सजाया गया था कि दर्शक बांसों की कलाकृतियों को देखकर दांतों तले अंगुलियां दबा लें।

हम समझ गए कि हर घर के आगे की गई यह सजावट भी आज के गुलंगान त्यौहार की अभिन्न आयोजना है। यह ठीक वैसा ही है जैसा कि भारत में दीपावली के अवसर पर घरों के बाहर कण्डीलों की सजावट की जाती है तथा रात्रि में दीप जलाकर देवी लक्ष्मी का आह्वान किया जाता है। पेंजोर पर लगे इन्द्रब्लाका में भी रात्रि के समय दीप जलाकर प्रकाश किया जाता है।

सब्जी मण्डी में फिर से निराशा

हम लगभग 9.30 बजे सब्जी मण्डी पहुंचे किंतु तब तक सब्जी मण्डी खुली नहीं थी। एकाध दुकानें ही खुली थीं जिन पर फल रखे थे। हमने बाली द्वीप पर उत्पन्न होने वाले दो स्थानीय फल खरीदे जिनके नाम हम याद नहीं रख सकते थे। इनमें से पहला फल बाहर से लगभग भारतीय लीची की तरह दिखाई देता था किंतु इसके भीतर एक बड़ा सा बीज था जिसके चारों ओर पीले रंग का सुगंधित और मीठा गूदा था। इसमें से पके हुए कटहल के बीज की सी सुगंध आ रही थी।

दूसरा फल बाहर से तो चीकू की तरह दिखाई देता था किंतु उसके भीतर छोटे-छोटे बीजों वाला रसीला गूदा भरा हुआ था जो स्वादिष्ट तथा हल्का खट्टा था। चूंकि सब्जियां प्राप्त करना संभव नहीं था, इसलिए हम वे फल खरीद कर ही वापस लौट लिए। हमने कुछ जनरल स्टोर्स पर दूध का डिब्बा खरीदने का प्रयास किया किंतु वह किसी भी स्टोर पर उपलब्ध नहीं हुआ।

कौए की आकृति वाली पगड़ी

ठीक साढ़े दस बजे पुतु अपनी गाड़ी लेकर आ गया। आज वह कल वाली पोषाक में नहीं था। उसने स्थानीय परम्परागत वस्त्र धारण किये थे जो गुलंगान त्यौहार पर विशेष रूप से पहने जाते थे। उसने सफेद कोटनुमा एक शर्ट धारण कर रखी थी। कमर के नीचे विशेष शैली में बांधी हुई तहमद थी और सिर पर एक टोपी थी जिसमें आगे की ओर कुछ गांठें लगाकर ऐसी आकृति बनाई गई थी कि वहाँ किसी पक्षी के बैठे होने का आभास होता था। मैंने अनुमान लगाया कि इस पक्षी की आकृति भारतीय कौए से मिलती है।

दुर्गा पूजा

पुतु के साथ एक और दम्पत्ति आया था। महिला के हाथ में बांस की खपच्चियों से बनी हुई बड़ी सी टोकरी थी जिसमें बांस से बनी हुई छोटी-छोटी गोल थालियां रखी हुई थीं। इन थालियों में केला तथा सेब आदि फल, चावल से बनाई हुई दलिया जैसी कोई डिश और कई तरह के फूल रखे हुए थे। महिला ने बहुत ही सुसंस्कृत ढंग के आकर्षक कपड़े पहने हुए थे।

वह एक मंझले कद की गौर-वर्ण महिला थी जिसकी आयु कठिनाई से 25 साल रही होगी। उसने अपनी टोकरी में से एक गोल थाली निकाली और उसे लॉन के एक कौने में काले रंग के पत्थरों से बने एक मंदिरनुमा स्तम्भ के सबसे ऊपरी आले में रख दिया। फिर उसी आले के समक्ष दो अगरबत्तियां जलाईं तथा मंदिर के समक्ष हाथ जोड़कर अपना मस्तक झुकाया।

हमने देवालय के भीतर रखी पूजा की थाली में झांककर देखा तो हमें फूलों के बीच मुर्गी का भूरे रंग का एक अण्डा भी दिखाई दिया। हमने पुतु को बताया कि भारत में देवताओं की पूजा में अण्डा काम में नहीं लिया जाता। केवल पुष्प, फल एवं मिठाइयां अर्पित की जाती हैं।

नेपाल के हिन्दू भी, बाली के हिन्दुओं की तरह मुर्गी का अण्डा, भगवान की पूजा में चढ़ाते हैं। हमने उस महिला से जानने का प्रयास किया कि इस आले को क्या कहते हैं! किंतु वह अंग्रेजी का एक भी शब्द नहीं समझती थी। उसका पति भी अंग्रेजी नहीं जानता था। पुतु ने हमें बताया कि इस स्तम्भनुमा लघु देवालय को टुडुकरंग कहते हैं। यह प्रत्येक घर के भीतर, सामने वाले हिस्से में बना हुआ होता है। यह देवी दुर्गा की पूजा के निमित्त है। देवी दुर्गा प्रत्येक घर की रक्षा करती हैं। यह पूजा उन्हीं के निमित्त हो रही है।

धरती माता की पूजा

टुडुकरंग की पूजा करने के बाद उस महिला ने पूजा की एक थाली, लॉन के एक कौने में नीचे धरती पर रखी तथा वहाँ भी दो अगरबत्तियां जलाईं। इस गोल थाली में भी पहले वाली थाली के समान ही पूजन सामग्री रखी हुई थी। पुतु ने बताया कि पूजा की जो थाली धरती पर रखी गई है वह धरती माता की पूजा के लिए है, जो हर समय हमारी रक्षा करती है।

काल पूजन

अब बारी थी काल पूजन की। जिस प्रकार गृह परिसर में देवी दुर्गा की पूजा के निमित्त टुडुकरंग बना हुआ होता है, ठीक उसी प्रकार बाली द्वीप पर प्रत्येक घर के बाहर, मुख्य द्वार के निकट कालराऊ बना हुआ होता है। यह भी काले पत्थर से निर्मित एक स्तम्भ देवालय होता है जिसमें काल की पूजा होती है। बाली में इसे मृत्यु का देवता माना जाता है। यह घर के मुख्य द्वार के साथ-साथ पूरी गली की रक्षा करता है।

मैंने अनुमान लगाया कि घर के भीतर दुर्गा का तथा घर के बाहर शिव का मंदिर है। भारत में भी शिव को महाकाल कहते हैं, वही महाकाल यहाँ आकर कालराऊ बन गया है। भारत में राऊ, राजा को कहते हैं। यहाँ भी पूजा करने वाली उस युवती ने कालराऊ के समक्ष बांस की एक थाली अर्पित की तथा दो अगरबत्तियां जलाईं। इस थाली में भी फल-फूल तथा चावलों से बनी हुई कोई डिश थी। कालराऊ के देवालय के बाद उसने पहले की ही तरह फल-फूलों से युक्त एक थाली धरती पर रखी तथा यहाँ भी दो अगरबत्तियां जलाईं।

इन्द्राब्लाका

कालराऊ के बाद महिला ने पास ही लगे लम्बे बांस के साथ लटके लघु देवालय में पूजा की एक थाली अर्पित की। पुतु ने बताया कि इसे इन्द्राब्लाका कहते हैं। यह इन्द्र भगवान की पूजा के निमित्त बनाया गया है। भगवान इन्द्र पूरे मौहल्ले की रक्षा करते हैं। गुलंगान के त्यौहार पर लगने वाले बांस पर तो इन्द्राब्लाका बनाया ही जाता है, यह प्रत्येक मौहल्ले भी स्थाई रूप से रहता है। 

सातू को पहचाना पुतु ने

हमने सर्विस अपार्टमेंट परिसर में बने मंदिरों में पूजा करने आई उस महिला, उसके पति एवं पुतु को लड्डू खाने के लिए दिए जो हम भारत से अपने साथ बनाकर ले गए थे। वे तीनों, इस भारतीय मिठाई को खाकर बड़े प्रसन्न हुए। हमने उनके चेहरों की प्रसन्नता से अनुमान लगाया कि उनके लिए यह क्षण किसी उत्सव से कम नहीं था।

लड्डू खाने के बाद पुतु ने हमें बताया कि इण्डोनेशिया में इस डिश को सातू कहा जाता है। मुझे स्मरण हुआ कि राजस्थान में तीज के अवसर पर जो सातू बनाया जाता है, उसे लड्डू की तरह ही बांधा जाता है। पुतु ने इसे वही सातू समझा था।

आज बाली द्वीप में दूसरा दिन प्रातःकाल से ही बाली की संस्कृति के दर्शन करवाने में जुट गया था।

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

तमन राम सीता (21)

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तमन राम सीता

तमन राम सीता में भगवान राम और सीता माता की विशाल प्रतिमाएं थीं जिनकी ऊंचाई लगभग 15 फुट रही होगी। ये दोनों प्रतिमाएं उसी हल्के नीले रंग के एक भव्य रथ में खड़ी हैं जिसमें चार घोड़े जुते हुए हैं। ये घोड़े भी हल्के नीले रंग के हैं।

दुर्गा और इन्द्र का पूजन देखने के बाद हम लोग पुतु के साथ तमन अयुन पुराडेसा के लिए रवाना हो गए। मार्ग में सड़क के किनारे एक पार्क दिखाई दिया जिसमें खड़ी हल्के नीले रंग की दो प्रतिमाएं दूर से ही दिखाई दे रही थीं। हमने पुतु से अनुरोध किया कि वह गाड़ी रोके।

तमन राम सीता

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यह स्थान तमन राम सीता कहलाता है। यहाँ भगवान राम और सीता माता की विशाल प्रतिमाएं थीं जिनकी ऊंचाई लगभग 15 फुट रही होगी। ये दोनों प्रतिमाएं उसी हल्के नीले रंग के एक भव्य रथ में खड़ी हैं जिसमें चार घोड़े जुते हुए हैं। ये घोड़े भी हल्के नीले रंग के हैं। भगवान राम और देवी सीता की इतनी सुंदर, इतनी भव्य एवं इतनी विलक्षण प्रतिमाओं का वर्णन करना कठिन है। दोनों प्रतिमाओं को विविध प्रकार के आभूषणों से अलंकृत किया गया है जिन पर सुनहरी रंग किया गया है जिसके कारण प्रतिमाओं का आकर्षण कई गुना बढ़ गया है। सीता अभय मुद्रा में हैं और राम इस मुद्रा में खड़े हैं मानो बाली द्वीपवासियों को सम्बोधित कर रहे हों! भगवान के रथ के अश्वों को भी स्वर्णिम आभा युक्त आभूषणों से सजाया गया है। रथ में आगे की ओर एक सारथी है जो रथ के जुए के ठीक मध्य में बैठा है और अश्वों को हांक रहा प्रतीत होता है। उसके निकट एक योद्धा हाथ में तलवार और ढाल लिए बैठा है। वह इतना जीवंत है, मानो अभी राक्षसों पर अपने हथियार लेकर टूट पड़ेगा। इन प्रतिमाओं के निकट एक काले ग्रेनाइट पर बड़े-बड़े अक्षरों में रोमन लिपि में लिखा है- तमन राम सीता।

गदाधारी भीम

तमन राम सीता से थोड़ी ही दूरी पर तमन अयुन पुराडेसा स्थित है। यह मंदिर एक दोहरे परकोटे के भीतर स्थित है। बाहरी परकोटा इतना बड़ा है मानो इसके भीतर पूरा नगर समाया हो। इस परकोटे के प्रवेश द्वार पर राम सीता की प्रतिमा की शैली की ही एक विशाल प्रतिमा स्थित है। यह भी हल्के नीले रंग की प्रतिमा है जिसकी ऊंचाई लगभग 15 फुट है।

महाबली भीम के कंधे पर भारी-भरकम गदा, सिर पर मुकट, शरीर पर कवच तथा वस्त्र, सभी कुछ विलक्षण शैली में बने हुए हैं। यहाँ भी आभूषणों को सुनहरे रंग से पोता गया है, जिससे उनकी आभा कई गुणा बढ़ गई है। इस प्रतिमा के अंग सौष्ठव पर विशेष ध्यान दिया गया है जिससे भीम के महाबली होने का अनुमान स्वतः ही हो जाता है।

द्वार पाल युग्म

तमन अयुन पुराडेसा के बाहरी परकोटे के मुख्य द्वार के दोनों ओर (दाईं और बाईं) तथा दोनों तरफ (बाहर और भीतर) विशिष्ट शैली में द्वारपाल की प्रतिमाएं खड़ी दिखाई देती हैं। इनके मुख, भारत की कथकली नृत्य-कलाकारों के मुखौटों जैसे चौड़े और फैले हुए हैं जबकि मुख के भाव विकराल एवं उग्र हैं।

इनके एक कंधे पर भारी-भरकम दण्ड बना हुआ होता है जो इनके द्वारपाल होने का साक्ष्य देता है। बाली में एक भी ऐसा प्रमुख सार्वजनिक महत्व का स्थान, मंदिर अथवा धार्मिक स्थल नहीं होगा जहाँ मुख्य द्वार पर यह द्वारपाल युग्म दिखाई नहीं दे।

हमने अनेक मंदिरों में भीतरी परिसर में भी जहाँ-तहाँ इन द्वारपाल प्रतिमाओं को खड़े हुए देखा। वस्तुतः ये भैंरव हैं। एकाध स्थान पर तो हमने इन्हें काले एवं सफेद रंग में भी देखा, ठीक वैसे ही जैसे भारत में काला और गोरा भैंरू पाए जाते हैं।

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

तमन अयुन पुराडेसा (22)

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तमन अयुन पुराडेसा
तमन अयुन पुराडेसा

तमन अयुन पुराडेसा में प्रवेश करते ही एक बड़ा सा मण्डप है। इसमें प्रतिमाओं के माध्यम से बाली की सांस्कृतिक झांकी प्रस्तुत की गई है।

तमन अयुन पुराडेसा मंदिर में प्रवेश के लिए प्रत्येक व्यक्ति को बीस हजार इण्डोनेशियन रुपए मूल्य का टिकट खरीदना होता है। हमने पांच टिकट खरीदे इसलिए एक लाख रुपए खर्च हो गए। यदि यह मुद्रा हमसे भारतीय रुपए में ली जाती तो हमें पांच सौ रुपए देने पड़ते जो कि इतने नहीं अखरते किंतु एक लाख रुपए सुनकर हमारा मन बैठ गया।  

यह बाली के प्राचीन राजवंश का मंदिर है। इसके भीतर प्राचीन झौंपड़ीनुमा मंदिर बने हुए हैं। ये एक मंजिल से लेकर ग्यारह मंजिले तक हैं तथा इन्हें मेरू कहा जाता है। इनकी ऊंचाई लगभग चालीस-पचास फुट है। आधार वाली झौंपड़ी का आकार एवं छज्जा सबसे चौड़ा होता है, इसके ऊपर हर मंजिल की चौड़ाई कम होती जाती है। सबसे ऊपर की झौंपड़ी का आकार एवं छज्जा सबसे कम चौड़ा होता है। इनके छज्जों पर काले रंग की लम्बी-लम्बी घास जैसी सजावट की गई है।

 पर्यटकों को बाहर से ही मंदिर देखने की अनुमति है। पर्यटकों की सुविधा के लिए मुख्य मंदिर परिसर के चारों ओर एक पक्का गलियारा बनाया गया है। पर्यटक इस गलियारे में चारों ओर घूम कर मंदिर के बाहरी हिस्से में बनी देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के चित्र उतार सकते हैं। मंदिर परिसर में कुछ लोग समूह के रूप में बैठकर पूजा कर रहे थे। यह एक सुंदर प्राकृतिक स्थान है तथा सघन वनस्पति से आच्छादित है।

जनजीवन की झांकी

तमन अयुन मंदिर के प्रवेश द्वार में प्रवेश करते ही एक बड़ा सा मण्डप स्थित है। इसमें प्रतिमाओं के माध्यम से बाली की सांस्कृतिक एवं जन-जीवन की झांकी प्रस्तुत की गई है। एक दृष्य में दो पुरुष मुर्गा लड़ाते हुए दिखाए गए हैं तथा दो मनुष्य उन्हें मुर्गा लड़ाते हुए देख रहे हैं।

इनमें से एक धनी मनुष्य कुर्सी पर बैठा है जिसने हाथ में चिलम जैसी कोई चीज उठा रखी है। दूसरा व्यक्ति हाथ ऊपर करके लड़ाई प्रारम्भ करने का संकेत कर रहा है। एक तरफ बैलों की एक जोड़ी है जिसके कंधों पर हल रखा हुआ है। इनमें से एक बैल काले रंग का है और दूसरा बैल सफेद रंग का है। पास ही एक नृत्यांगना नृत्य की मुद्रा में है।

देव प्रतिमाओं का खुला संग्रहालय

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तमन अयुन पुराडेसा मंदिर परिसर में स्थान-स्थान पर सैंकड़ों प्रतिमाएं रखी हुई हैं जिनमें से पत्थर से निर्मित बहुत सी प्रतिमाएं सैंकड़ों साल पुरानी प्रतीत होती हैं तो क्ले से निर्मित कुछ प्रतिमाएं आधुनिक काल की हैं। इन मूर्तियों के हाथों में तरह-तरह के पुष्प, वाद्ययंत्र एवं अस्त्र-शस्त्र लगे हुए हैं। बहुत सी अप्सराओं के वस्त्र भारतीय तथा यूनानी देवियों से मिलते-जुलते हैं। इनमें कुछ प्रतिमाएं पंखों वाले सिंहों की हैं तो कुछ प्रतिमाएं पंखों वाली अप्सराओं की भी हैं। यहाँ स्थित बहुत सी मनुष्याकार प्रतिमाओं चेहरे मनुष्यों जैसे होते हुए भी बंदरों, चिम्पांजियों एवं औरंगुटानों से मिलते हैं। इन्हें देखकर ऐसा आभास होता है कि इस द्वीप पर कभी इस प्रकार के चेहरे वाले मनुष्य पाए जाते होंगे! ऐसे मनुष्यों की आकृतियां हमने बाली द्वीप पर और भी कई स्थानों पर देखीं। उबुद वानर वन में ऐसी मूर्तियों का खुला संग्रहालय ही प्रतीत होता है। इनके शरीर पर नाम मात्र के वस्त्र, सिर पर वनवासियों जैसी पगड़ियां, चेहरे फूले हुए, नाक गोल एवं मोटी, होंठों के भीतर स्थित बड़े-बड़े दांत, मांसल भुजाएं, पुष्ट जंघाएं तथा चेहरों पर हंसी दिखाई देती है।

गोल आंखों वाले देवता

मंदिर परिसर में स्थान-स्थान पर छोटे चबूतरे बने हुए हैं जिन पर तरह-तरह की आकृतियों एवं आकारों वाले देवी-देवताओं की मूर्तियां लगी हुई हैं। इनमें से कुछ देवताओं की आंखे गेंद की तरह बिल्कुल गोल हैं। ये अत्यंत प्राचीन जान पड़ती हैं, लगभग एक हजार साल पुरानी भी हों तो आश्चर्य नहीं। इन मूर्तियों के माध्यम से मूर्तिकार, भविष्य के मानवों के लिए क्या संदेश छोड़कर गए, कुछ कहा नहीं जा सकता! पत्थर-नुमा जिन चबूतरों पर ये मूर्तियां खड़ी हैं, वे भी बहुत पुराने हैं। कुछ चबूतरों पर रखी मूर्तियां वर्षा, आंधी एवं समय के थपेड़ों से घिस-टूटकर, भारत में रखे जाने वाले शिवलिंगों की तरह, गोल-लम्बी पिण्डियों में बदल गई हैं।

दीपा की शैतानियां

मंदिर परिसर में ही रंग-बिरंगे पक्षियों का एक छोटा सा चिड़ियाघर बना हुआ है। अलग-अलग आकार और रंगों वाले पक्षी अपने-अपने पिंजरे में भांति-भांति की किल्लोल कर रहे थे। मेरी डेढ़ वर्षीय पौत्री दीपा इन पक्षियों को देखकर बड़ी प्रसन्न हुई। सभी पक्षी अलग-अलग प्रकार की आवाजें निकाल रहे थे। दीपा ने भी पक्षियों की नकल उतारने का प्रयास किया तथा अपने हाव-भाव से हमें यह समझाने का प्रयास किया कि देखो यहाँ कितनी तरह के पक्षी हैं।

बाली वासियों से दोस्ती

हम बड़ी कठिनाई से दीपा को पक्षियों वाले खण्ड से निकाल कर बाहर लाए। यहाँ कुछ पुरुष और महिलाएं एक तरफ छाया में बैठकर बांस की खपच्चियों की टोकरियां बुन रहे थे। दीपा ने इस तरह का काम होते हुए पहली बार देखा था। वह गोद से उतरकर उन लोगों की तरफ भाग गई और टोकरी बुनने वाली एक महिला की गोद में जाकर बैठ गई।

उसने अपनी अटपटी शब्दावली में उन लोगों से बात करने का प्रयास किया मानो पूछना चाहती हो कि इतनी सुंदर टोकरियां आप कैसे बुन लेती हैं! हम भी हैरान थे, वातावरण का बच्चों पर कितना शीघ्र और कितना गहरा प्रभाव होता है!

रंगीन घोंघे, कछुए, चिड़ियाएं और मछलियां

 मंदिर से बाहर निकले तो हमने मंदिर के बाहर एक अच्छा-खासा मेला लगा हुआ पाया। यह मेला गुलंगान के अवसर पर लगा था। इसका स्वरूप किसी भारतीय मेले जैसा ही दिखाई देता था किंतु इसमें बिकने वाली सामग्री भारतीय मेलों की अपेक्षा बहुत अलग थी। इसमें रंग-बिरंगे घोंघे, कछुए, चिड़ियाएं, मछलियां और कई प्रकार के पक्षियों के चूजे बिकने आए थे।

इनमें से बहुत से पक्षी एवं मछलियां प्राकृतिक तौर पर ही चटख रंगों की थीं किंतु अधिकांश घोंघे, कछुए, चिड़ियाएं और मछलियां कृत्रिम रूप से रंगे गए थे। दीपा ने जब उन्हें देखा तो उसकी प्रसन्नता का पार न रहा। दीपा को वे सब पक्षी, घोंघे और कछुए खेलने के लिए चाहिये थे और हम उनमें से एक भी दिलवाने को तैयार नहीं थे।

काफी देर तक छोटी चिड़ियाओं के एक पिंजरे को ध्यान से देखते रहने के बाद दीपा ने उनकी ही तरह चीं-चीं की आवाज लगानी शुरु कर दी। तमन अयुन पुराडेसा का भ्रमण याद रखने वाला बन गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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