Sunday, July 14, 2024
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10. परमबनन शिव मंदिर समूह

मध्य जावा में स्थित परमबनन शिव मंदिर समूह, इंडोनेशिया का सबसे बड़ा और विशाल हिंदू मंदिर समूह है। यह मंदिर समूह मुख्यतः भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा को समर्पित है। यह मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित है। परमबनन मंदिर विश्व भर के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। मंदिर परिसर में काले रंग के चौकोर, आयातकार एवं विभिन्न आकृतियों में तराशे हुए, सुगढ़ एवं विशालाकाय पत्थरों के सैंकड़ों विशाल ढेर स्थित हैं जो नौवीं शताब्दी इस्वी के विशाल मंदिर समूह की उपस्थिति को दर्शाते हैं। पत्थरों के इन ढेरों के नीचे मूल मंदिरों के आधार दबे पड़े हैं। इस मंदिर समूह का विनाश किसी शक्तिशाली भूकम्प के दौरान हुआ।

परमबनन शिव मंदिर समूह का निर्माण नौवीं शताब्दी ईस्वी में हुआ। उस समय कुल 240 मंदिरों का निर्माण किया गया था जिनमें केन्द्रीय भाग में स्थित तीन मंदिर त्रिमूर्ति मंदिर कहलाते हैं और ये शिव, विष्णु एवं ब्रह्मा को समर्पित हैं। इन त्रिमूर्ति भवनों के सामने इन देवताओं के वाहनों अर्थात् नन्दी, गरुड़ एवं हंस के मंदिर हैं। त्रिमूर्ति मंदिरों एवं वाहन मंदिरों के बीच में उत्तर एवं दक्षिण की ओर एक-एक आपित मंदिर है। इन मंदिरों के चार मुख्य द्वारों के भीतरी क्षेत्र में चार दिशाओं में एक-एक केलिर मंदिर तथा चारों कोनों पर एक-एक पाटोक मंदिर हैं। मुख्य मंदिर योजना के चारों ओर चार पंक्तियों में कुल 224 मंदिरों के अवशेष स्थित हैं। इस प्रकार कुल यहाँ कुल 240 मंदिर स्थित थे किंतु 16वीं शती ईस्वी में प्रबल भूकम्प से ये मंदिर गिर गए। लगभग 400 साल तक ये मंदिर खण्डहरों के रूप में स्थित रहे।

बौद्ध धर्म एवं शैव धर्म की प्रतिस्पर्द्धा

भारत से आए कई हिन्दू राजकुमारों ने जावा द्वीप के अलग-अलग क्षेत्रों पर छोटे-छोटे राज्य स्थापित किए। सातवीं-आठवी शताब्दी ईस्वी में मध्य जावा क्षेत्र में संजय राजवंश के वंशज राज्य करते थे। यह राजवंश मूलतः हिन्दू धर्म को मानने वाला था किंतु बाद में किसी काल में बौद्ध धर्म का अनुयायी हो गया था। आठवीं शताब्दी ईस्वी में शैलेन्द्र वंश के राजाओं ने संजय वंश के शासकों को परास्त करके मध्य जावा से परे धकेल दिया और मेदांग राज्य की स्थापना की। संजय वंश पूर्वी जावा पर शासन करने लगा। शैलेन्द्र वंश के राजा भी महायान बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। उन्होंने बोरोबुदुर एवं सेवू के विशाल एवं गगनचुम्बी महायान बौद्ध मंदिरों का निर्माण किया। शैलेन्द्र वंश के राजा लगभग एक शताब्दी तक मध्य जावा पर शासन करते रहे।

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हिन्दू धर्म की जय तथा मंदिर का निर्माण

नौवीं शताब्दी ईस्वी में एक बार पुनः शैलेन्द्र वंश का पतन हो गया एवं उनके स्थान पर पुनः संजय वंश का उत्थान हुआ और उन्होंने माताराम राज्य की स्थापना की। इस समय तक इस वंश के राजाओं ने पुनः शैव-हिन्दू धर्म स्वीकार कर लिया था। इसलिए ई.850 के आसपास माताराम राज्य के संजय वंशीय राजा राकाई पिकातान ने हिन्दू धर्म की विजय के रूप में इस मंदिर समूह का निर्माण कराना आरम्भ किया ताकि शैलेन्द्र वंश के शासकों को उनकी ही भाषा में विशाल मंदिरों के निर्माण के माध्यम से जवाब दिया जा सके। इतिहासकारों के अनुसार इन मंदिरों का निर्माण इस बात की घोषणा थी कि अब मध्य जावा में माताराम साम्राज्य (मेदांग साम्राज्य) बौद्ध-महायान धर्म के स्थान पर हिन्दू-शैव धर्म में परिवर्तित हो गया है।

राकाई पिकातान के उत्तराधिकारी राजाओं- लोकपाल तथा बालीतुंग महाशंभु ने मंदिरों का निर्माण निरंतर जारी रखा। ई.856 के शिवगढ़ शिलालेख के अनुसार इस मंदिर को मूलतः भगवान शिव को समर्पित किया गया था तथा इस मंदिर का मूल नाम शिवगढ़ था। जिस स्थान पर आज यह मंदिर समूह स्थित है, उसके ठीक निकट से नौवीं शताब्दी ईस्वी में ओपाक नामक नदी बहती थी। मंदिर को सुरक्षित करने के लिए इस नदी का रुख मोड़ा गया। अब यह नदी मंदिर के पश्चिम में है तथा उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है। भगवान शिव की प्रतिमा की स्थापना राजा बालितुंग द्वारा की गई। इसके बाद से राज परिवार के समस्त धार्मिक आयोजन इसी मंदिर में होने लगे। बालितुंग के उत्तराधिकारी राजाओं- दक्ष एवं तुलोडोंग द्वारा भी मंदिर का विस्तार किया गया। उस काल में इस मंदिर के बाहरी क्षेत्र में सैंकड़ों ब्राह्मण परिवार निवास करते थे। 

मंदिर का विघटन

ई.930 के बाद के किसी वर्ष में मपू सिंदोक नामक राजा ने जावा में इस्याना वंश की स्थापना की तथा जावा की राजधानी को मध्य जावा से पूर्वी जावा में स्थानांतरित कर दिया। ऐसा परमबनन के उत्तर में स्थित मेरापी पहाड़ में ज्वालामुखी के सक्रिय हो जाने के कारण किया गया। राज्याश्रय हट जाने के बाद से मंदिर का विघटन आरम्भ हो गया। फिर भी यह हिन्दू प्रजा की आस्था का प्रमुख केन्द्र बना रहा। सोलहवीं शताब्दी में आए एक भयंकर भूकम्प में इस मंदिर समूह के समस्त मंदिर धरती पर गिर गए। ई.1755 में माताराम साम्राज्य का विभाजन हुआ तथा यह योग्यकार्ता (जोगजा) एवं सुराकार्ता (सोलो) राज्यों में विभक्त हो गया। इन दोनों राज्यों के सीमा इसी मंदिर पर आकर समाप्त होती थी। अब उन राज्यों की पहचान योग्यकार्ता एवं सेंट्रल जावा के रूप में की जाती है।

मंदिर की जीर्णोद्धार यात्रा

जब डच लोग इस द्वीप पर आए तो ई.1811 में उनकी दृष्टि इस मंदिर समूह के खण्डहरों पर पड़ी। उन्होंने खजाने की लालसा में इस मंदिर को और भी खोद डाला। बाद में डच लोगों द्वारा इस पूरे क्षेत्र का सर्वे किया गया। तब पाया गया कि आस-पास के लोग इन मंदिरों के पत्थरों को उठाकर अपने घरों की नीवों में डालते थे तथा घरों की चिनाई करते थे। ई.1918 में डच लोगों ने इन मंदिरों का पुनर्निर्माण आरम्भ किया। ई.1930 में जीर्णोद्धार के काम में तेजी आई तथा यह कार्य आज भी जारी है।

मंदिरों के पुनर्निर्माण का कार्य आसान नहीं था। अधिकतर अलंकृत पत्थर दूरस्थ क्षेत्रों में ले जाकर भवन निर्माण में लगा दिए गए थे। ऐसे में सरकार ने निर्णय लिया कि केवल उन्हीं मंदिरों का पुनर्निर्माण किया जाएगा जिनकी कम से कम 75 प्रतिशत सामग्री उपलब्ध है तथा जिनका कोई डिजाइन, चित्र अथवा नक्शा उपलबध है। मंदिर के पुननिर्माण के लिए इसके चारों ओर खड़े हो गए बाजार एवं मानव बस्तियों को अन्यत्र स्थानांतरित किया गया।

रामकथा के मंचन हेतु स्टेडियमों का निर्माण

मंदिर परिसर में ही ओपाक नदी के तट पर ओपन एयर तथा इण्डोर स्टेडियमों का निर्माण किया गया ताकि वहाँ रामकथा का मंचन किया जा सके। जावा द्वीप पर रामकथा नृत्य नाटिकाएं हजारों साल से मंचित की जाती रही हैं। उन विभिन्न नृत्य नाटिकाओं को ढूंढकर फिर से इन स्टेडियमों तक लाया गया। चंद्र ज्योत्सना के प्रकाश में इन नाटिकाओं का मंचन किया जाता है तो विश्व भर के पर्यटक मंत्र-मुग्ध रह जाते हैं। गलुंगन, तावुर केसंगा तथा नायेपी आदि हिन्दू पर्वों पर इस मंदिर परिसर में हिन्दू श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। उस दौरान बहुत से दल रामकथाओं का मंचन करते हैं।

सुन्नी मुसमलान द्वारा शिव मंदिर का उद्घाटन

ई.1953 में मुख्य शिव मंदिर के जीर्णोद्धार का काम पूरा हो गया। इण्डोनेशिया के प्रथम राष्ट्रपति सुकार्णो ने इस मंदिर का उद्घाटन किया जो इस्लाम की सुन्नी शाखा का मुसलमान था। इस समय तक जावा की 80 प्रतिशत जनसंख्या सुन्नी मुसलमान थी किंतु उन्हें इस हिन्दू मंदिर को फिर से खड़ा करने, उसका उद्घाटन करने और उसके दरवाजे पूरे संसार के पर्यटकों के लिए खोलने में कोई परहेज नहीं था, अपितु वे गर्व की अनुभूति करते थे कि उन्होंने अपनी सैंकड़ों साल पहले खोई हुई सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित कर लिया था। भारत में जहाँ कि 80 प्रतिशत हिन्दू जनसंख्या निवास करती है, श्रीकृष्ण जन्म भूमि मथुरा, श्री राम जन्म भूमि अयोध्या और विश्वनाथ मंदिर काशी के मंदिरों को राजनीति का अखाड़ा बना दिया गया है, इन मंदिरों पर राजनीति करके, कुछ राजनीतिक दल मुसलमानों के और कुछ राजनीतिक दल हिन्दुओं के वोट प्राप्त करते हैं। मुझे जावा में सरदार पटेल का स्मरण हो आया जिन्होंने जवाहरलाल नेहरू के धर्मनिरपेक्षी इरादों को विफल करके सोमनाथ के मंदिर का पुनर्निर्माण करवा दिया था। अन्यथा आज उसकी दशा भी अयोध्या, मथुरा और काशी विश्वनाथ के मंदिरों जैसी ही होती।

वर्ष 2006 में पुनः भूकम्प से क्षति

 अभी मंदिर को खुले लगभग 53 वर्ष ही हुए थे कि वर्ष 2006 में मध्य जावा में पुनः जोर का भूकम्प आया। मंदिर को फिर से क्षति पहुंची और इण्डोनेशिया के आर्कियोलोजी विभाग द्वारा मंदिर का पुनः जीर्णोद्धार करके इसे दर्शकों के लिए सुरक्षित बनाया गया। इस दौरान मंदिर कई महीनों तक बंद रहा।

सोलह मुख्य मंदिरों एवं दो लघु मंदिरों का पुनर्निर्माण

वर्ष 2009 में नंदी मंदिर के पुनर्निर्माण का कार्य पूरा हो गया और यह दर्शकों के लिए खोल दिया गया। यह मंदिर भगवान शिव के मुख्य मंदिर के ठीक सामने स्थित है। इसके बाद एक-एक करके मंदिरों का पुनर्निर्माण होता गया और वे दर्शकों के लिए खोले जाते रहे। वर्तमान में भीतरी मुख्य क्षेत्र के सभी 8 मुख्य मंदिरों एवं सभी 8 लघु मंदिरों का पुनर्निर्माण पूरा कर लिया गया है। बाहरी क्षेत्र के 224 पेरवारा मंदिरों में से केवल 2 मंदिरों का पुनर्निर्माण किया जा सका है।

वर्ष 2010 में परमबनन सेंचुरी घोषित

वर्ष 2010 में इण्डोनेशियाई सरकार ने परमबनन, रातू बोको, कालासन, सारी तथा प्लाओसान मंदिरों के समस्त क्षेत्रों को घेरते हुए परमबनन सेंचुरी घोषित किया। यह सेंचुरी 30 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में स्थित है।

वर्ष 2014 में ज्वालामुखी की राख का सामना

परमबनन शिव मंदिर को दुबारा से खोले हुए आठ वर्ष भी नहीं बीते थे कि 13 फरवरी 2014 को योग्यकार्ता से 200 किलोमीटर पूर्व में स्थित केलुड ज्वालामुखी फट पड़ा जिसका धमाका दो किलोमीटर दूर तक सुनाई दिया। इस  ज्वालामुखी से बड़ी मात्रा में निकली काली और गर्म राख उड़कर इन मंदिरों तक भी आई और इन मंदिरों को भारी नुक्सान पहुंचा। इस कारण इस मंदिर सहित आसपास के समस्त मंदिरों को श्रद्धालुओं, दर्शकों एवं पर्यटकों के लिए बंद कर दिया गया। इसे काफी दिनों बाद, राख हटाए जाने के पश्चात् ही फिर से खोला जा सका।

रारा जोंग्गरांग की कथा

परमबनन शिव मंदिर को जावा द्वीप वासी रारा जोंग्गरांग मंदिर कहते हैं। रारा जोंग्गरांग का अर्थ होता है- पतली कुमारी। जावा द्वीप की एक दंत कथा के अनुसार किसी समय जावा द्वीप पर पेंगिंग तथा बोको नामक दो राज्य थे। पेंगिंग राज्य समृद्ध एवं खुशहाल राज्य था जिस पर राजा प्रबु डामार मोयो का शासन था जिसके बंडुंग बोण्डोवोसो नामक पुत्र था। बोको राज्य पर मानवभक्षी क्रूर राक्षस प्रबु बोको का शासन था। उसका एक सहयोगी पातिह गुपोलो नामक राक्षस भी बड़ा क्रूर था।

प्रबु बोको की कन्या रारा जोंगरांग बहुत सुंदर थी। प्रबु बोको पेंगिंग राज्य को जीतकर अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था। इसलिए उसने विशाल सेना का निर्माण किया। एक दिन अचानक उसकी सेनाओं ने पेंगिंग रज्य पर आक्रमण कर दिया। पेंगिंग का राजकुमार बंडुंग बोण्डोवोसो अपनी सेना लेकर उस राक्षस राजा से लड़ने के लिए चला। एक भयानक युद्ध के बाद राजकुमार बंडुंग बोण्डोवोसो ने अपनी रहस्यमयी शक्तियों से राक्षस राजा प्रबु बोको को मार डाला। प्रबु बोको का सहयोगी राक्षस पातिह गुपोलो बची हुई सेना को युद्ध क्षेत्र से लेकर भाग गया। वह मृत राजा की राजधानी बोको पहुंचा और राजमहल में जाकर राजकुमारी रारा जोंगराग को सूचित किया कि उसका पिता युद्ध में मर गया है। उसी समय पेंगिंग की सेना आ पहुंची और उन्होंने मृतराजा की राजधानी एवं उसके महल पर अधिकार कर लिया।

राजकुमार बंडुंग बोण्डोवोसो ने राजकुमार रोरो जोंगराग को देखा तो वह उस पर मोहित हो गया। उसने राजकुमारी के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा किंतु राजकुमारी ने विवाह करने से मना कर दिया। जब राजकुमार ने राजकुमारी पर बार-बार जोर डाला तो राजकुमारी ने राजकुमार के समक्ष दो शर्तें रखीं। पहली तो यह कि उसे जलतुण्ड नामक एक विशाल कूप बनाना पड़ेगा तथा दूसरी शर्त यह कि राजकुमार को अपनी शक्तियों के बल पर एक रात में 1000 मंदिरों का निर्माण करना पड़ेगा। राजकुमार ने दोनों शर्तें स्वीकार कर लीं तथा तुरंत ही एक कूप का निर्माण करना आरम्भ कर दिया। राजकुमार ने अपनी दिव्य शक्तियों के बल पर शीघ्र ही कुआं खोद डाला तथा राजकुमारी को कुआं देखने के लिए बुलाया। राजकुमारी ने राजकुमार को कुएं में उतरकर दिखाने के लिए कहा।

जब राजकुमार कुएं में उतरा तो राजकुमारी के पिता के साथी राक्षस पातिह गुपोलो ने कुंए को मिट्टी एवं पत्थरों से बंद कर दिया। बड़ी कठिनाई से राजकुमार उसे कुएं से बाहर निकल सका। इस धोखे के बाद भी राजकुमारी के प्रति राजमकुमार का प्रेम कम नहीं हुआ। अब राजकुमारी ने राजकुमार से दूसरी शर्त पूरी करने के लिए कहा।

राजकुमार ने उन दिव्य आत्माओं का आह्वान किया जो उसकी सहायता करती थीं। वे आत्माएं जब 999 मंदिर बना चुकीं और 1000 वें मंदिर का निर्माण करने लगीं तो राजकुमारी ने अपने राक्षस साथियों की सहायता से पूर्व दिशा में चावल के खेतों और भूसे में भयानक आग लगा दी जिससे मंदिर बना रही आत्माओं को लगा कि सूर्य निकल आया है और वे काम छोड़कर फिर से धरती में प्रवेश कर गईं। इस प्रकार एक हजारवां मंदिर अधूरा ही रह गया। जब राजकुमार को इस छल के बारे में ज्ञात हुआ तो उसने राजकुमारी जोंग्गरांग को श्राप दिया कि वह पत्थर की मूर्ति में बदल जाए। राजकुमारी तत्काल ही पत्थर की मूर्ति में बदल गई और राजकुमार ने अधूरे पड़े मंदिर का निर्माण पूरा करके उस मूर्ति को वहाँ स्थापित कर दिया। वही मूर्ति अब दुर्गा के रूप में पूजी जाती है जिसे स्थानीय लोग रारा जोंग्गरांग कहते हैं। यही मूर्ति शिव मंदिर के उत्तर वाले प्रकोष्ठ में लगी हुई है।

परमबनन परिसर के मुख्य मंदिरों की आयोजना

सम्पूर्ण मंदिर परिसर लगभग 17 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में विस्तृत है। मंदिर परिसर के केन्द्रीय भाग में मुख्यतः ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश के अलग-अलग मंदिर स्थित हैं। तीनों देवों की प्रतिमाओं के मुख पूर्व दिशा में हैं। प्रत्येक प्रधान मंदिर के सम्मुख पश्चिम दिशा में मुंह करके उसी देव से संबंधित एक मंदिर स्थित हैं जो तीनों देवों के वाहनों को समर्पित हैं। ब्रह्मा मंदिर के सामने हंस का, विष्णु मंदिर के सामने गरुड़ का और शिव मंदिर के सामने नन्दी का मंदिर स्थित है।

शिव मंदिर बहुत बड़ा और सुंदर है। यह मंदिर तीनों प्रमुख मंदिरों के मध्य में है। शिव मंदिर के उत्तर में भगवान विष्णु का और दक्षिण में भगवान ब्रह्मा का मंदिर है। यूनेस्को ने इस मंदिर को विश्व धरोहर के रूप में संरक्षित किया है। रोरो जोंग्गरंग मंदिर या परमबनन मंदिर दुनिया भर के हिंदुओं के साथ-साथ, स्थानीय लोगों के लिए भी भक्ति एवं अध्यात्म का महत्वपूर्ण केन्द्र है।

परमबनन परिसर के मुख्य मंदिरों की प्रतिमाएं

परमबनन परिसर का मुख्य मंदिर अर्थात् शिव मंदिर 47 मीटर ऊंचा है तथा आधार पर 34 मीटर लम्बा एवं 34 मीटर चौड़ा है। मंदिर के पूर्व में बनी सीढ़ियों से होकर ऊपर जाया जाता है जहाँ एक के बाद एक करके चारों ओर कुल चार कक्ष बने हुए हैं जिनमें से पूर्व दिशा की ओर के मुख्य कक्ष में भगवान शिव की प्रतिमा खड़ी है। उत्तर की तरफ वाले कक्ष में महिषासुर मर्दिनी दुर्गा प्रतिमा है। एक कक्ष में भगवान गणेश एवं एक कक्ष में अगस्त्य ऋषि की प्रतिमा है। ब्रह्मा मंदिर में केवल एक ही कक्ष है जिसमें केवल ब्रह्मा की प्रतिमा है। इसी प्रकार विष्णु मंदिर में भी केवल एक कक्ष है जिसमें केवल भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित है।

श्रीराम कथा प्रसंगों की अद्भुत प्रतिमाएं

मुख्य मंदिरों के पूजा कक्षों की बाहरी दीवारों पर प्रदक्षिणा अथवा परिक्रमा करने के पथ बने हुए हैं। इन प्रदक्षिणा पथों के दोनों ओर की दीवारों पर रामकथा एवं श्रीकृष्ण लीला के प्रसंगों की प्रतिमाएं उत्कीर्ण की गई हैं। रामकथा प्रसंग के मूर्ति फलक शिव मंदिर से आरम्भ होते हैं तथा ब्रह्मा मंदिर में जाकर पूर्ण होते हैं। इन दीवारों पर लोकपालों एवं विविध देवताओं की प्रतिमाएं भी उत्कीर्ण हैं। राक्षसों द्वारा ऋषियों का उत्पीड़न, रावण द्वारा सीता का हरण, जटायु द्वारा सीता को बचाने की चेष्टा, भगवान द्वारा मारीच का वध, रावण द्वारा कैलास पर्वत को उठाने के दृश्य बहुत सुंदर बन पड़े हैं। एक पैनल में अशोक वाटिका में सीता माता के समक्ष हनुमानजी द्वारा रामकथा के निवेदन का बड़ा ही जीवन्त दृश्य अंकित किया गया है इस चित्र में माता सीता और हनुमानजी के चेहरे के भाव एवं मुद्राएं इतनी भाव प्रवण बनाई गई हैं कि संसार में इस दृश्य का ऐसा अद्भुत अंकन शायद ही कहीं और हुआ हो। यह बीच में से एक टूटा हुआ पैनल है किंतु सौभाग्य से दोनों चेहरे पूरी तरह सुरक्षित हैं। जीर्णोद्धार के दौरान इस पैनल को फिर से जोड़कर खड़ा किया गया है।

भागवत पुराण के प्रसंगों का अंकन

हिंदू धर्मावलम्बियों के लिए परमबनन मंदिर आस्था का केंद्र है। परमबनन मंदिर इतना सुंदर है की इसकी बनावट किसी को भी अपने मोहपाश में बांध ले। मंदिर की दीवारों पर रामकथा के प्रसंग मूर्तियों के रूप में अंकित हैं। विष्णु मंदिर के परिक्रमा पथ में भागवत पुराण के आधार पर श्रीकृष्ण लीला के प्रसंग शिलापट्टों पर उत्कीर्ण हैं। बाल कृष्ण की लीलाओं के अंकन को देखकर दर्शक सम्मोहित सा खड़ा रह जाता है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कंस का वध और कृष्ण-बलराम द्वारा कालिय वध के प्रसंग इतने सुंदर बने हुए हैं जिन्हें देखकर दर्शक, मूर्तिकारों की समझ और कला के प्रति अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकता।

कमल-पुष्प पर मानव खोपड़ी

पास में ही एक शिव प्रतिमा है जिसमें शिव ध्यानस्थ हैं। उनके दाहनी ओर बहुत सुंदर त्रिशूल खड़ा हुआ है और बाईं ओर कमल नाल पर लगे पुष्प के ऊपर एक खोपड़ी रखी हुई दिखाई दे रही है। भगवान के शरीर पर विविध प्रकार के आभूषण एवं अलंकरण सुशोभित हैं। भगवान के हाथों में रुद्राक्ष की माला है किंतु आश्चर्य की बात यह है कि इस प्रतिमा में कोई सर्प दिखाई नहीं दे रहा है।

पशु-पक्षियों एवं कल्पतरू का अंकन

इन मंदिरों की बाहरी दीवारों की ताकों में सिंह, हिरण, खरगोश, बिल्ली आदि का अंकन है। साथ ही तोते, मोर, हंस, लोकपाल, अप्सराएं एवं अन्य मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। एक ताक में हंस अपनी चोंच लम्बी करके पानी पीने का प्रयास कर रहा है।

एक ताक में दो मादा तोते बैठे हैं जिनके मुंह के स्थान पर स्त्रियों के सुंदर चेहरे बने हुए हैं जिन्होंने विविध प्रकार के आभूषण एवं मुकुट धारण कर रखे हैं। एक अन्य ताक में एक मादा तोता तथा एक नर तोता बैठे हुए हैं जिनमें मुंह के स्थान पर नर एवं नारी के मुख बने हुए हैं। मादा तोते में मानवीय आकृति का समावेश करते हुए स्तन भी बनाए गए हैं।

परग्रही प्राणी जैसे गरुड़

शिव मंदिर के बाहर के प्रदक्षिणा पथ में एक प्रतिमा में भगावान विष्णु की सेवा में गरुड़ विराजमान हैं, गरुड़ का सिर अपेक्षाकृत लम्बा बनाया गया है जिसे देखकर मिश्र देश के उन लम्बी खोपड़ियों वाले देवताओं का स्मरण होता है जिनके लिए माना जाता है कि ये परग्रही मानव थे और दूसरे लोक से धरती पर आए थे। गरुड़ के सिर पर जटाओं एवं उनसे बंधे हुए जूड़े का भी अंकन किया गया है। गरुड़ के नीचे जल में तैरती हुई मछलियां दिखाई गई हैं जिनसे ज्ञात होता है कि भगवान विष्णु इस समय क्षीर सागर में विश्राम कर रहे हैं, गरुड़ उनकी सेवा में हैं तथा हाथों में कमल पुष्प सुशोभित है।

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