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दो ऑगस्टस तथा दो सीजर (12)

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दो ऑगस्टस तथा दो सीजर

डियोक्लेटियन ने ‘चार राजाओं के शासन’ का सिद्धांत बनाया जिसके तहत दो ऑगस्टस तथा दो सीजर की नियुक्ति की गई। सम्राट डियोक्लेटियन ने स्वयं को ऑगस्टस की उपाधि दी तथा ई.286 में अपने पुराने एवं विश्वस्त सैनिक साथी मैक्सीमियन को अपने अधीन सह-सम्राट (दूसरा ऑगस्टस) नियुक्त किया।

नवम्बर 284 से अप्रेल 305 तक डियोक्लेटियन रोम का राजा हुआ। वह रोमन मिलिट्री के एक साधारण सिपाही से बढ़ता हुआ सम्राट कारुस की सेना में कमाण्डर बना था। इम्परेटर नुमेरियन की मृत्यु हो जाने के बाद डियोक्लेटियन ने स्वयं को रोम का शासक घोषित कर दिया।

डियोक्लेटियन ने ऑगस्टस की उपाधि धारण की तथा रोमन शासन में कई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए। उसने अनुभव किया कि रोम के कई अति-महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति रोम का सम्राट बनना चाहते हैं। इस कारण वे सम्राट की हत्या करने के षड़यंत्र रचते रहते हैं।

इस कारण पिछली तीन शताब्दियों से भी अधिक समय से सम्राटों की हत्या होती आ रही है। एक सम्राट के राज्यासीन होते ही दूसरे महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति उसकी हत्या का प्रयास आरम्भ कर देते हैं। इस घृणित कार्य में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका साम्राज्य के मुख्य सेनापति एवं सम्राट की अपनी अंगरक्षक सेनाओं की होती है।

इसलिए डियोक्लेटियन ने राज्य के अति-महत्त्वाकांक्षी व्यक्तियों को शासन में भागीदारी देने का अनोखा उपाय खोजा ताकि उन्हें सम्राट की हत्या का षड़यंत्र रचने का समय ही नहीं मिले और वे अपना पद सुरक्षित करने की चिंता में व्यस्त रहें।

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इतना ही नहीं, नई व्यवस्था के तहत वे लोग अपने-अपने क्षेत्रों में शांति एवं सुरक्षा बनाए रखने तथा अपनी-अपनी सीमाओं पर आक्रमण कर रहे शत्रुओं की तरफ ध्यान केन्द्रित करने में व्यस्त हो जाएं। डियोक्लेटियन ने ‘चार राजाओं के शासन’ का सिद्धांत बनाया जिसके तहत दो ऑगस्टस तथा दो सीजर की नियुक्ति की गई। सम्राट डियोक्लेटियन ने स्वयं को ऑगस्टस की उपाधि दी तथा ई.286 में अपने पुराने एवं विश्वस्त सैनिक साथी मैक्सीमियन को अपने अधीन सह-सम्राट (दूसरा ऑगस्टस) नियुक्त किया। डियोक्लेटियन स्वयं तो पूर्वी रोमन साम्राज्य पर शासन करने लगा तथा उसने मैक्सीमियन को पश्चिमी प्रांतों का शासक नियुक्त किया। 1 मार्च 293 को डियोक्लेटियन ने गैलेरियस तथा कॉन्स्टेन्टियस नामक दो सामंतों को दो अलग-अलग क्षेत्रों का सीजर नियुक्त किया। ये सीजर, सम्राट ऑगस्टस डियोक्लेटियन तथा सह-सम्राट ऑगस्टस मैक्सीमियन के अधीन ‘कनिष्ठ सह-सम्राट’ थे। इस प्रकार रोमन साम्राज्य चार महाप्रांतों में विभक्त हो गया। इसके बाद सम्राट डियोक्लेटियन जितने भी दिन जीवित रहा, उसे अपने राज्य के भीतर षड़यंत्रों का सामना नहीं करना पड़ा। अब वह अपना ध्यान साम्राज्य के विस्तार पर केन्द्रित कर सकता था।

डियोक्लेटियन ने ई.285 से 299 के बीच महान् रोमन साम्राज्य पर आक्रमण करने वाली सरमाटियन्स तथा कार्पी कबीलों की सेनाओं को कई बार पराजित किया।

ई.288 में उसने अलामन्नी कबीले को भी परास्त किया। ई.297 से 298 के बीच उसने मिस्र को अपने अधीन कर लिया। उसने कनिष्ठ सह-सम्राट गैलेरियस के साथ मिलकर सेसेनिड पर्सिया को भी परास्त किया तथा ई.299 में उनकी राजधानी क्टेसीफोन पर अधिकार कर लिया।

डियोक्लेटियन ने सैन्य एवं नागरिक प्रशासन के अधिकारियों को अलग-अलग किया तथा केन्द्र एवं समस्त प्रांतों में सुव्यवस्थित प्रशासनिक सरकारों का निर्माण किया। उसने रोमन साम्राज्य की सीमाओं के निकट निकोमेडिया, मेडियोलानम, सिरमियम तथा ट्रेवोरम में प्रशासनिक केन्द्र स्थापित किए ताकि सीमावर्ती प्रजा को अच्छा प्रशासन दिया जा सके।

ई.297 में डियोक्लेटियन ने प्रजा पर करों में वृद्धि की तथा समस्त प्रजा पर एक जैसे कर लगाए ताकि विभिन्न मोर्चों पर लड़ रही सेनाओं तथा इटली में चल रहे निर्माण कार्यों के लिए लगातार राजस्व की प्राप्ति हो सके। उसने क्रोशिया में अपने लिए एक भव्य राजधानी का निर्माण करवाया।

इस  प्रकार सम्राट, सह-सम्राट तथा कनिष्ठ सम्राटों की त्रिस्तरीय व्यवस्था करके डियोक्लेटियन 20 वर्ष से अधिक समय तक रोम का शासक बने रहने में सफल रहा। 67 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो गई। मैक्सीमियन भी लगभग 19 साल तक रोम पर शासन करता रहा। डियोक्लेटियन तथा मैक्सीमियन की मृत्यु का काल लगभग एक ही था।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ईसाइयों को प्राणदण्ड (13)

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ईसाइयों को प्राणदण्ड

रोमन लोग ईसाइयों को झगड़ालू और संकीर्ण मनोवृत्ति वाला समझने लगे। सम्राट की मूर्ति के समक्ष सिर नहीं झुकाना राजद्रोह समझा गया तथा इसके लिए बहुत से ईसाइयों को प्राणदण्ड दिया गया। ईसाई लोग मनोरंजन के उद्देश्य से होने वाली पशुओं और मनुष्यों की लड़ाइयों का भी विरोध करते थे।

यीशू के भयग्रस्त अनुयायियों ने राज्याधिकारियों के भय से यीशू के अंतिम क्षणों में उन्हें अपना मानने से मना कर दिया था किंतु यीशू की मृत्यु के कुछ समय बाद ईसा मसीह के बारह प्रमुख शिष्यों ने ईसाई मत का प्रचार करना आरम्भ किया। इन शिष्यों ने एक दूसरे से लगभग स्वतंत्र रहकर ईसा मसीह के संदेश यहूदियों एवं गैर यहूदियों में पहुँचाए।

इस कारण ईसा मसीह की शिक्षाओं के कई रूप प्रचलित हो गए। इन 12 शिष्यों ने अपने-अपने उत्तराधिकारी नियुक्त किए जिन्हें ‘बिशप’ कहा जाता था। उन्हीं दिनों सेंट पॉलुस अथवा संत पॉल नामक एक ईसाई संत हुआ। वह ईसा मसीह के 12 शिष्यों में सम्मिलित नहीं था किंतु उसे यहूदी जगत में ‘गोस्पल‘ का प्रचार करने में सर्वाधिक सफलता प्राप्त हुई। गोस्पल उस शुभ संदेश को कहते हैं जो ईसा मसीह ने दिया था। यह शुभ संदेश यह है कि- ‘धरती पर ईश्वर का राज्य आ रहा है।’

बहुत से लोगों का विचार है कि संत पॉल ने जिस ईसाइयत का प्रचार किया वह यीशू के उपदेशों से बहुत भिन्न है। संत पॉल एक योग्य एवं विद्वान व्यक्ति था किंतु वह यीशू की तरह सामाजिक विद्रोही नहीं था। अर्थात् पॉल ने यहूदियों की सामाजिक परम्पराओं एवं मान्यताओं की आलोचना नहीं की तथा स्वयं को केवल धर्मिक शिक्षाओं पर केन्द्रित किया।

पॉल को अपने उद्देश्य में सफलता मिली और ईसाई मत के प्रचार का काम आगे बढ़ने लगा। कुछ ही समय में ईसाई धर्म जेरूसलम से निकलकर रोम तक जा पहुँचा। हालांकि ईसा मसीह के प्रमुख शिष्य सेंट पीटर ने रोम में चर्च की स्थापना की थी तथा सेंट पीटर ने अपने एक शिष्य को वहाँ का बिशप नियुक्त किया था। फिर भी रोम में जिस ईसाइयत का प्रचार हुआ, वह संत पॉल द्वारा प्रचारित की गई थी।

बाइबिल की रचना

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यहूदियों के तीन प्रमुख धार्मिक ग्रन्थ हैं जिन्हें तनख़, तालमुद तथा मिद्रश कहा जाता है। तनख की रचना ईसा से लगभग 1300 साल पहले की गई थी तथा समय-समय पर इसमें परिवर्तन होते रहे थे। इस पुस्तक का बहुत बड़ा हिस्सा मूसा ने लिखा था। बाइबिल की रचना तनख पर आधारित है जिसे बाइबिल का ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ अर्थात् पुराना नियम कहा जाता है। इसे ‘तालमुद’ एवं ‘तौरा’ भी कहते हैं। ई.50 से ई.100 के बीच बाइबिल का नवविधान अर्थात् ‘न्यू टेस्टामेंट’ लिखा गया। इसे ‘इंजील’ भी कहा जाता है। इसमें ईसा मसीह का जीवन परिचय और उनके उपदेशों का वर्णन है। इसकी मूल भाषा ‘अराम’ तथा ‘ग्रीक’ थी। न्यू टेस्टामेंट को ईसा मसीह के चार शिष्यों ने लिखा था जिनके नाम इस प्रकार हैं- मत्ती, लूका, यूहन्ना और मरकुस। ईसाई धर्म का आरम्भ ‘न्यू टेस्टामेंट’ से माना जाता है। न्यू टेस्टामेंट, बाइबिल का दूसरा भाग या उत्तरार्ध है जिसमें यीशु मसीह की जीवनी, शिक्षाएं, और उनके शिष्यों द्वारा किया गया धर्म-प्रचार सम्मिलित हैं। न्यू टेस्टामेंट में 27 पुस्तकें हैं जो तीन भागों में विभक्त हैं- (1.)  सुसमाचार- चार, (2) कार्य- एक और (3.) पत्रियाँ- बाईस। बाईस पत्रियों में 14 पॉल से 7-कैथोलिक से तथा 1 इल्हाम से सम्बन्धित हैं। न्यूटेस्टामेंट की इन 27 पुस्तकों को ईसाई धर्म में लगभग सर्वमान्य रूप से मान्यता दी गई है।

ई.400 में संत जेरोम ने बाइबिल का ‘लैटिन’ भाषा में अनुवाद प्रस्तुत किया। इसे ‘वुलगाता’ कहा जाता है। शताब्दियों तक बाइबिल का यही रूप प्रचलित रहा। कैथोलिक बाइबिल के ओल्डटेस्टामेंट में 46 तथा न्यू टेस्टामेंट में 27 ग्रंथ हैं। प्रोटेस्टेंट बाइबिल के ओल्डटेस्टामेंट में 39 तथा न्यू टेस्टामेंट में 27 ग्रंथ हैं। ऑर्थोडॉक्स बाइबिल के ओल्डटेस्टामेंट में 49 तथा न्यूटेस्टामेंट में 27 ग्रंथ सम्मिलित हैं।

सुसमाचार

ईसाई धर्म में, सुसमाचार या गॉस्पेल, जिसे इस्लाम में इंजील भी कहा जाता है, परमेश्वर के शासन के आगमन के समाचार को कहते हैं। यह मूलतः एक वर्णनात्मक कथा है जिसमें यीशु मसीह, उनके जन्म, उनके जीवन, सूली पर चढ़ाये जाने और पुनरुत्थान की कथा बताई गई है। बाइबल के विभिन्न अनुवादों में इसे शुभसंदेश भी कहा गया है, जो कि यूनानी शब्द ‘यूआनजेलिऑन’ का पुरानी अंग्रेजी में किया गया अनुवाद है। सुसमाचार की कथा का सार, बाइबल क उन चार प्रारम्भिक संस्करणों में पाया जाता है जिन्हें ईसा के चार शिष्यों मत्ती, मरकुस, लुका तथा यूहन्ना ने लिखा है।

ईसाइयों को प्राणदण्ड

रोमन लोगों ने आरम्भ में ईसाई धर्म पर कोई ध्यान नहीं दिया। उन्होंने समझा  कि यह भी यहूदी धर्म का कोई सम्प्रदाय होगा। धीरे-धीरे ईसाइयों का साहस बढ़ने लगा। वे दूसरे समस्त मतों के विरोधी बन गए। उन्होंने प्राचीन रोमन देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की पूजा करने से मना कर दिया। यहाँ तक कि रोम के सम्राट की मूर्ति की पूजा करने से भी मना कर दिया।

इसलिए रोमन लोग ईसाइयों को झगड़ालू और संकीर्ण मनोवृत्ति वाला समझने लगे। सम्राट की मूर्ति के समक्ष सिर नहीं झुकाना राजद्रोह समझा गया तथा इसके लिए बहुत से ईसाइयों को प्राणदण्ड दिया गया। ईसाई लोग मनोरंजन के उद्देश्य से होने वाली पशुओं और मनुष्यों की लड़ाइयों का भी विरोध करते थे।

जबकि यह रोमन लोगों की हजारों साल पुरानी परम्परा थी तथा इस काल तक आते-आते रोमन लोगों के लिए धर्म का रूप धारण कर चुकी थी। इस कारण ईसाई प्रचारकों को राज्य एवं प्रजा दोनों की तरफ से सताया जाने लगा और उनकी सम्पत्तियां जब्त की जाने लगीं। बहुत से ईसाइयों को शेरों के सामने फैंक दिया गया।

एण्ड्रोक्लस एण्ड लॉयन

रोमन ईसाई साहित्य में एक यवन साधु और एक सिंह की कथा मिलती है जिसे ब्रिटिश लेखक जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने अपने सुप्रसिद्ध नाटक ‘एण्ड्रोक्लस एण्ड लॉयन’ में बहुत मार्मिक ढंग से लिखा है। यह कथा उस काल की रोमन सभ्यता पर प्रकाश डालती है और ईसा की प्रथम तीन शताब्दियों में रोमन साम्राज्य में ईसाइयों पर हुए अत्याचारों को भी दर्शाती है।

इस कथा के अनुसार एण्ड्रोक्लस नामक ईसाई साधु को एक बार जंगल में एक सिंह मिला जिसके अगले पैर में काँटा गड़ा हुआ था जिसके कारण वह लंगड़ाता हुआ चल रहा था और पीड़ा से कराह रहा था। एण्ड्रोक्लस को सिंह से भय लगा किंतु जब उसने सिंह को बार-बार अपना पंजा चाटते और पीड़ा से कराहते देखा तो एण्ड्रोलक्स ने साहस करके शेर के पंजे से कांटा निकाल दिया।

कुछ समय बाद वह साधु ‘ईसाई’ होने के आरोप में रोमन सैनिकों द्वारा पकड़ लिया गया तथा गुलामों की टोली के रूप में रोम ले जाया गया। यहाँ रोमन सम्राट अपने सामंतों के साथ कोलेाजियम में बैठकर गुलामों की लड़ाई देखता था। इस लड़ाई के दौरान गुलामों के शरीरों से रक्त की धार बह निकलती थी तथा उनके जीवित रहने तक उनके अंग-अंग कटकर भूमि पर गिरते रहते थे।

रोमन सम्राट एवं नागरिक उन गुलामों को तड़पते हुए देखकर बहुत आनंदित होते थे। यदि कोई गुलाम लड़ने से मना कर देता था तो उसे अखाड़े में भूखे शेर के समक्ष छोड़ दिया जाता था और रोमनवासी शेर को गुलाम-मनुष्य पर झपटते और उसके चीथड़े करके खाते हुए देखते। ईसाई साधु एण्ड्रोक्लस को भी इसी कोलोजियम में लाया गया तथा उसे किसी दूसरे आदमी से लड़ने के लिए कहा गया।

दुबले-पतले एण्ड्रोक्लस ने लड़ने से मना कर दिया। इस पर एण्ड्रोक्लस को भूखे सिंह के समक्ष धकेला गया। पिंजरे में बंद भूखा सिंह दहाड़कर अखाड़े में कूदा किंतु जैसे ही सिंह ने उस साधु को देखा तो वह शांत होकर अपने पंजे सिकोड़कर बैठ गया और अपना वही पंजा साधु की ओर बढ़ा दिया।

इस दृश्य को देखकर सम्राट बहुत अचम्भित हुआ उसने एण्ड्रोक्लस तथा सिंह को मुक्त कर दिया। ईसाई साधु उस सिंह को लेकर जंगल की तरफ चला गया।

धर्म के लिए बलिदान

ईसाई प्रचारकों ने रोमन शासकों द्वारा किए जा रहे इन अत्याचारों को धर्म के लिए आवश्क बलिदान माना और वे सहर्ष अपने प्राणों का उत्सर्ग करने को तैयार हो गए। ईसाई प्रचारकों के इस धैर्य-पूर्ण आचरण ने रोम के लोगों को प्रभावित किया और वे ईसाइयों की बातों को सुनने लगे जिसका परिणाम यह हुआ कि बहुत से रोमनवासी अपना प्राचीन धर्म छोड़कर ईसाई बनने लगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रोमन साम्राज्य का विभाजन (14)

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रोमन साम्राज्य का विभाजन

चौथी शताब्दी ईस्वी के अंत तक पूर्वी रोमन साम्राज्य के सम्राट द्वारा पश्चिमी रोमन साम्राज्य के शासक को सह.शासक के रूप में नियुक्त किया जाता था किंतु पश्चिमी साम्राज्य पर पूर्वी सम्राट का नियंत्रण नाम मात्र का ही था। धीरे-धीरे रोमन साम्राज्य का विभाजन हो गया।

ई.305 में कॉन्स्टेंटीन (प्रथम) रोम का शासक हुआ। उसे कॉन्स्टेंटीन द ग्रेट भी कहा जाता है। वह 14 वर्ष की आयु से सम्राट डियोक्लेटियन के साथ सैन्य-अभियानों में भाग लेने लगा था। पूर्ववर्ती सम्राट डियोक्लेटियन के समय से ही महान् रोमन साम्राज्य दो महाप्रांतों- पूर्वी रोमन साम्राज्य एवं पश्चिमी रोमन साम्राज्य में विभक्त हो चुका था तथा सम्राट डियोक्लेटियन रोम में न रहकर पूर्वी रोमन साम्राज्य में स्थित क्रोएशिया रहा करता था।

महान् रोमन साम्राज्य की राजधानी का स्थानान्तरण

जब कॉन्स्टेंटीन महान् रोमन साम्राज्य का स्वामी हुआ तो वह ई.324 में अपनी राजधानी रोम से हटाकर अपने साम्राज्य की पूर्वी सीमा पर काला सागर एवं भूमध्य सागर के बीच दर्रे-दानियाल के किनारे पर स्थित ‘बिजैन्तिया’ (बैजेन्टाइन) नामक नगर में ले गया ताकि वह अपने साम्राज्य की पूर्वी सीमाओं पर लड़ रही सेनाओं का नेतृत्व कर सके और उन्हें नियंत्रण में रख सके। कुछ समय बाद उसने बिजैन्तिया के निकट ‘कांस्टेंटिनोपल’ नामक नवीन नगर की आधारशिला रखी और उसी को अपनी राजधानी बनाया। आगे चलकर यह नगर कुस्तुंतुनिया कहलाया। सम्राट कॉन्सटैन्टाइन ने कैथोलिक चर्च और उसके पादरियों को करों से मुक्त कर दिया और उन्हें कई विशेषाधिकार दिए।

कुस्तुंतुनिया द्वारा रोम के लिए सह-शासकों की नियुक्ति

राजधानी के रोम से हटकर बैजेन्टाइन अथवा कुस्तुंतुनिया चले जाने से रोमन साम्राज्य के विभाजन की संभावनाएं प्रबल हो गईं। हालंकि कुस्तुंतुनिया के सम्राटों द्वारा पश्चिमी रोमन साम्राज्य के लिए सह-शासकों की नियुक्ति की जाती रही। ई.306 में सम्राट कॉन्स्टेंटीन द्वारा वेलेरियस सेवेरस को रोम का कनिष्ठ सम्राट (सीजर) घोषित किया गया।

मैक्सेण्टियस द्वारा रोम पर बलपूर्वक अधिकार

ई.307 में उसे मैक्सेण्टियस नामक एक रेामन सामंत ने रोम के अधिकृत शासक वेलेरियस सेवेरस को पकड़ लिया तथा उसे आत्मघात करने के लिए विवश कर दिया। इसके बाद मैक्सेण्टियस ने राजधानी रोम तथा पश्चिमी रोमन साम्राज्य पर जबर्दस्ती अधिकार कर लिया।

कॉन्स्टेन्टीन द्वारा ईसाई धर्म ग्रहण

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ई.308 में कुस्तुंतुनिया के सम्राट कॉन्सटैन्टाइन (प्रथम) ने अपने मामा लिसिनियस (प्रथम) को रोम का सम्राट घोषित किया किंतु मैक्सेण्टियस ने रोम खाली नहीं किया। अंत में ई.312 में सम्राट कॉन्सटैन्टाइन ने मैक्सेण्टियस को मिलिवियान ब्रिज के युद्ध में मार डाला।सम्राट कॉन्स्टेंटीन ईसाई धर्म के प्रति सहिष्णु था किंतु वह स्वयं पेगन धर्म को मानता था। इस काल तक ईसाई धर्म के कुछ प्रचारक शासन तंत्र में अपना प्रभाव जमाने में सफल हो गए थे। कुछ इतिहासकारों के अनुसार ई.337 में सम्राट कॉन्स्टेंटीन को मृत्यु-शैय्या पर जबर्दस्ती ईसाई बनाया गया था। इसके बाद ईसाई धर्म को राजकीय धर्म के रूप में मान्यता दी गई। इसके बाद न केवल पूर्वी रोमन साम्राज्य में अपितु पश्चिमी रोमन साम्राज्य एवं राजधानी रोम में भी ईसाई धर्म का प्रभाव बढ़ने लगा तथा प्राचीन काल से प्रचलित बहुदेववादी एवं मूर्ति-पूजक रोमन धर्म (पेगन धर्म) पर रोक लगा दी गई। राज्य द्वारा की गई जबर्दस्ती के कारण कुछ ही सालों में प्राचीन बहुदेववादी रोमन धर्म, रोमन साम्राज्य से विलुप्त हो गया। इस प्रकार लगभग तीन सौ साल की प्रारम्भिक उपेक्षा के बाद रोम के बिशप की शक्ति धर्माध्यक्ष के रूप में बढ़ गई तथा पोप के रूप में वह रोम के शासन-तंत्र को प्रभावित करने की शक्ति भी प्राप्त कर गया।

कॉन्सटैन्टाइन के उत्तराधिकारी

ई.337 में सम्राट कॉन्सटैन्टाइन (प्रथम) की मृत्यु के बाद उसका पुत्र कॉन्सटैन्टाइन (द्वितीय) रोम का शासक बना। ई.340 में वह अपने भाई कॉन्स्टेन्स (प्रथम) के विरुद्ध युद्ध करता हुआ मारा गया। ई.340-56 तक कॉन्सटैन्टाइन (प्रथम) का पुत्र कॉन्स्टेन्स (प्रथम) और  ई.356-61 तक कॉन्सटैन्टाइन (प्रथम) का अन्य पुत्र कॉन्स्टेन्टियस (द्वितीय) पश्चिमी रोमन साम्राज्य का स्वामी हुआ। उसके बाद इसी परिवार का राजकुमार जूलियन रोम का राजा हुआ।

सम्राट जूलियन ई.363 में एक युद्ध में मृत्यु को प्राप्त हुआ। इसके बाद से रोमन साम्राज्य का तेजी से पतन होता चला गया। जूलियन के बाद जूलियन की सेना का सेनापति जोवियन रोम का राजा हुआ किंतु वह आठ माह बाद ही 33 वर्ष की आयु में आग एवं धुएं में घिर जाने से दम घुट जाने के कारण मर गया। ये समस्त राजा पूर्वी रोमन साम्राज्य एवं पश्चिमी रोमन साम्राज्य दोनों के शासक थे। आगे चलकर पूर्वी एवं पश्चिमी साम्राज्य के शासक पुनः अलग-अलग शासकों में विभक्त हो गए।

हालांकि पूर्वी सम्राट द्वारा पश्चिमी साम्राज्य के शासक को सह-शासक के रूप में नियुक्त किया जाता रहा किंतु पश्चिमी साम्राज्य पर पूर्वी सम्राट का नियंत्रण नाम मात्र का ही था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पश्चिमी रोमन साम्राज्य (15)

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पश्चिमी रोमन साम्राज्य

ई.379 से ई.392 तक पश्चिमी रोमन साम्राज्य में वेलेण्टाइन (द्वितीय) तथा मैग्नस मैक्सीमस नामक दो शासक अस्तित्व में थे, इन्होंने साम्राज्य के अलग-अलग हिस्सों पर अपनी सत्ता बनाए रखी।

वेलेण्टाइन राजवंश

ई.364 से 392 तक पश्चिमी रोमन साम्राज्य में वेलेण्टाइन राजवंश की सत्ता रही जिसकी राजधानी रोम थी। जूलियन की मृत्यु के बाद ई.364 में रोम की सेना द्वारा वेलेण्टाइन (प्रथम) को राजा चुना गया। वह लगभग 12 साल तक राज्य करता रहा। ई.367 से 383 तक वेलेण्टाइन (प्रथम) का पुत्र ग्रेटियन रोम का राजा हुआ। उसके शासन काल में दो महत्त्वपूर्ण घटनाएं हुईं।

पहली यह कि ई.375 में रोमन सेना के दूसरे गुट ने वेलेण्टाइन (प्रथम) के अन्य पाँच वर्षीय पुत्र वेलेण्टाइन (द्वितीय) को राजा घोषित कर दिया। इस प्रकार पश्चिमी साम्राज्य भी दो भागों में बंट गया। सम्राट ग्रेटियन के समय दूसरी महत्त्वपूर्ण घटना यह हुई कि ई.378 में विसिगोथ कबीले ने रोम पर भीषण आक्रमण किया। विभाजित रोमन शक्ति विसिगोथों का वेग सहन नहीं कर पाई।

एड्रिअनोपल के युद्ध में रोमन सेना की हार हो गई। विसिगोथ रोम में घुस गए और उन्होंने रोम को जमकर लूटा-खसोटा। ई.383 में रोमन सम्राट ग्रेटियन को उसकी स्वयं की सेना के एक विद्रोही गुट ने मार डाला। उसके बाद वेलेण्टाइन (द्वितीय) सम्राट हुआ। वह सोलह वर्ष से अधिक समय तक अपने क्षेत्र पर राज्य करता रहा किंतु ई.392 में मात्र 21 वर्ष की आयु में या तो उसे आत्मघात करना पड़ा या विद्रोही सेनाओं द्वारा मार दिया गया।

वैधानिक एवं अवैधानिक शासक

ई.379 से ई.392 तक थियोडोसियस (प्रथम) पूर्वी  रोमन साम्राज्य का स्वामी हुआ। उसने ई.383 से 388 तक मैग्नस मैक्सीमस तथा उसके पुत्र विक्टर को पश्चिमी रोमन साम्राज्य के सम्राट एवं सह-सम्राट के रूप में मान्यता दी तथा उन्हें इंग्लैण्ड और गॉल (फ्रांस) का शासक भी स्वीकार कर लिया।

इस प्रकार ई.379 से ई.392 तक पश्चिमी रोमन साम्राज्य में वेलेण्टाइन (द्वितीय) तथा मैग्नस मैक्सीमस नामक दो शासक अस्तित्व में थे, इन्होंने साम्राज्य के अलग-अलग हिस्सों पर अपनी सत्ता बनाए रखी। यह स्थिति और भी शासकों के समय में देखने को मिलती है। इसलिए रोमन इतिहास में वैधानिक शासक एवं अवैधानिक शासक का प्रश्न बार-बार खड़ा होता है तथा इतिहासकार उसी शासक को वैधानिक दिखाने की चेष्टा करते हैं जिसे कुस्तुंतुनिया के शासक द्वारा मान्यता दी गई हो किंतु ऐसे भी बहुत से शासक हुए जिन्हें कुस्तुंतुनिया द्वारा मान्यता नहीं दी गई किंतु वे रोम पर अपना एकल अधिकार बनाए रखने में सफल रहे तथा वे वैधानिक कहे जाने वाले शासकों की तुलना में अधिक प्रभुत्व सम्पन्न शासक थे।

थियोडोसियस राजवंश

ई.392 में थियोडोसियस (प्रथम) ने गोथों एवं अन्य बर्बर कबीलों पर आक्रमण करके उनका दमन किया तथा पश्चिमी रोमन साम्राज्य को फिर से पूर्वी रोमन साम्राज्य के अधीन कर लिया। ई.395 में उसकी मृत्यु हो गई किंतु उसके वंशज ई.455 तक रोम पर शासन करते रहे। ई.395 में होनोरियस तथा उसके बाद ई.409 में कॉन्स्टेन्टाइन (तृतीय) रोम के राजा हुए।

गोथों द्वारा रोम का विध्वंस

24 अगस्त 410 को विसिगॉथ नामक जर्मन कबीले के राजा ऑलारिक ने रोम पर चढ़ाई करके रोम में इतना विध्वंस मचाया कि रोम में गॉथिक शब्द को अंधकार, नकारात्मकता और कालिमा का  पर्याय कहा जाने लगा। रिनेसां नामक रोमन कवि ने ‘गॉथ’ शब्द का प्रयोग बर्बर, असभ्य तथा क्रूर के पर्यायवाची की तरह किया है।

पाँच साल की आयु में रोम का सम्राट

ई.421 में कॉन्स्टेन्टियस (तृतीय), ई.423 में जोआनस तथा ई.424 में वेलेन्टेनियन (तृतीय) रोम के सम्राट हुए। वेलेन्टेनियन (तृतीय) पाँच साल की आयु में राजा बना तथा उसने 31 साल तक शासन किया। वह पश्चिमी रोमन साम्राज्य पर सर्वाधिक अवधि तक शासन करने वाला राजा था। उसके शासन काल में रोम और अधिक कमजोर हो गया।

वाण्डालों का ताण्डव

उत्तरी इटली में वाण्डाल नामक एक बर्बर कबीला रहता था। यह अत्यंत प्राचीन काल में जर्मनी से आया था। ई.429 से 435 के बीच वाण्डालों ने रोमन सेनाओं को परास्त करके उनसे उत्तरी अफ्रीका छीन लिया। वाण्डालों ने कई बार रोमन साम्राज्य पर आक्रमण किया किंतु प्राचीन रोमन राजा उन्हें रोम से दूर रखने में सफल रहे। फिर भी वाण्डालों ने रोमन राज्य को बुरी तरह से लूटा-खसोटा और नष्ट किया।

रोम पर हूणों का कहर

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हूण मध्य- एशिया के मंगोलिया नामक देश के रहने वाले थे। उन्होंने डेन्यूब नदी पार करके पूर्वी रोमन साम्राज्य में प्रवेश किया तथा साम्राज्य के उत्तरी एवं पश्चिमी भाग में बलपूर्वक निवास करने लगा। हूणों का नेता अतिला पूर्वी रोमन साम्राज्य के एम्परर को केवल धमकियां देकर ही उससे बड़ी-बड़ी रकमें ऐंठ लेता था। ई.440 से 445 के बीच हूणों के कई आक्रमण हुए किंतु वेलेन्टेनियन (तृतीय) की सेनाएं उनका सामना नहीं कर सकीं। हूणों ने रोमन साम्राज्य के काफी बड़े हिस्से पर अधिकार कर लिया। वे तेजी से पूरी दुनिया में फैल रहे थे तथा हिंसा और बर्बरता की नई परिभाषा लिख रहे थे। ई.451 में हूणों ने अतिला के नेतृत्व में पश्चिमी रोमन साम्राज्य को घेर लिया। इस समय गोथ एवं फ्रैंक नामक बर्बर जर्मन कबीलों ने रोम की शाही सेना का का साथ दिया। इस प्रकार इस लड़ाई ने एक विशाल युद्ध का रूप धारण कर लिया जिसमें लगभग डेढ़ लाख मनुष्य काम आए। अंत में अतिला हार गया और हूणों को पीछे धकेल दिया गया। कुछ समय बाद अतिला ने फिर से हूणों की शक्ति को एकत्रित किया और उसने इटली पर हमला कर दिया। वहाँ उसने उत्तर के बहुत से नगर लूटे और जला दिए। इस आक्रमण के कुछ ही दिनों बाद वह मर गया।

आज भी यूरोप में उसे बेरहमी एवं क्रूरता के लिए उसी प्रकार याद किया जाता है जिस प्रकार भारत में मंगोल आक्रांता तैमूर लंग को उसके हिंसक कृत्यों के लिए अत्यंत घृणा के साथ याद किया जाता है।

अतिला की मृत्यु के बाद इटली के हूण ठण्डे पड़ गए। उनकी सेनाएं बिखर गईं और वे खेती-बाड़ी करने लगे। सैंकड़ों साल की अवधि में वे इटली के लोगों में घुल-मिलकर उनके जैसे ही हो गए। गोथ, विसिगोथ, फ्रैंक, वाण्डाल और हूण बड़े असभ्य एवं निर्दयी लोग थे। उनके आक्रमणों से पश्चिमी रोमन साम्राज्य इतना कमजोर हो गया कि समय आने पर ताश के पत्तों के महल की तरह बिखर गया।

दो रोमन सम्राटों की हत्या

ई.455 में रोमन सम्राट वेलेन्टेनियन (तृतीय) को केवल 35 वर्ष की आयु में उसकी अंगरक्षक सेना द्वारा मार दिया गया। उसके बाद पैट्रोनियस मैक्सीमस रोम का राजा हुआ किंतु केवल 75 दिन बाद ही उसे रोम की जनता ने पत्थरों से पीट-पीट कर मार डाला। इसी के साथ रोम से थियोडोसियस वंश के शासन का दुःखःद अंत हो गया। यह वही राजवंश था जिसने ई.392 में गोथों एवं अन्य बर्बर कबीलों को रोम से बाहर निकाल कर रोम का उद्धार किया था किंतु राजनीति पिछले उपकारों को याद नहीं रखा करती।

विदेशी कबीलों को रोमन सीनेट में स्थान

9 जुलाई 455 को रोमन सीनेटर एविटस रोम का नया सम्राट हुआ। वह नागरिक-प्रशासन एवं सैन्य-प्रशासन में उच्च पदों पर नियुक्त रहा था तथा पियासेंजा के चर्च का बिशप भी था। वह बुद्धिमान एवं अनुभवी राजनीतिज्ञ था। उसकी योजना थी कि उत्तरी इटली में रह रहे बर्बर जर्मन एवं फ्रैंच कबीलों से मित्रता स्थापित करके रोम में शांति स्थापित की जाए।

इस उद्देश्य से एविटस ने फ्रैंक कबीले के कुछ लोगों को रोम का सीनेटर बनवा दिया। इससे रोम की जनता और सेना, नए सम्राट एविटस के विरुद्ध हो गई। रोमन जनता कुछ ही समय पहले रोम में वाण्डालों द्वारा किए गए विध्वंस एवं अपमान को इतनी आसानी से नहीं भुला सकती थी।

मैजिस्टर रिसिमेर का उदय

जिन दिनों हूणों एवं वाण्डालों ने रोमन साम्राज्य की हालत पतली कर रखी थी तथा रोम में कोई सम्राट अपनी सत्ता एवं जिंदगी को सुरक्षित नहीं रख पा रहा था, उन्हीं दिनों फ्लैवियस रिसिमेर नामक एक अत्यंत महत्त्वाकांक्षी युवक पश्चिमी रोमन साम्राज्य की राजनीति में बड़ी शक्ति बनकर उभरा।

वह उत्तरी इटली में विगत सैंकड़ों साल से निवास कर रहे एक जर्मन कबीले का सेनापति था जिन्हें रोमन साम्राज्य में शत्रुवत् माना जाता था किंतु रिसिमेर पश्चिमी रोमन साम्राज्य के कुछ उच्च अधिकारियों का कृपापात्र बनने में सफल हो गया तथा साम्राज्य में मैजिस्टर मिलिटम के सम्माननीय पद पर नियुक्त हो गया। यहाँ से उसने अपने राजनीतिक जीवन की नई शुरुआत की।

सम्राट एविटस की हत्या

रिसिमेर किसी बड़े राजनीतिक अवसर की तलाश में था जो उसके कद को रोमन साम्राज्य में बढ़ा दे। शीघ्र ही उसे इसका अवसर मिल गया। ई.455 में सीनेटर एविटस रोम का सम्राट हुआ। जैसे ही एविटस ने कुछ फ्रैंच लोगों को रोम की सीनेट का सदस्य बनाया तथा रोमन सीनेटरों में उसके विरुद्ध असंतोष उभरा, तो रिसिमेर ने अपना दांव चला। उसने मेजोरियन नामक एक रोमन सेनापति को उकसाया कि वह एविटस को हटाकर स्वयं सम्राट बन जाए। मेजोरियन इस कार्य के लिए तैयार हो गया तथा ई.456 में उसने नए सम्राट के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।

इस विद्रोह में रिसिमेर ने मेजोरियन का पूरा साथ दिया। मेजोरियन की सेना सम्राट के महल में घुस गई तथा सम्राट एविटस को बंदी बना लिया। एविटस ने मेजोरियन तथा रिसिमेर के सामने प्रस्ताव रखा कि यदि उसके प्राण नहीं लिए जाएं तो वह स्वयं ही सम्राट का पद छोड़कर पियासेंजा के चर्च में चला जाएगा तथा अपना शेष जीवन बिशप के रूप में बिताएगा।

मेजोरियन तथा रिसिमेर ने सम्राट एविटस का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया तथा उसे सम्राट के पद से मुक्त करके पियासेंजा भेज दिया। कुछ ही माह बाद रिसेमेर ने उसकी हत्या करवा दी।

सम्राट मेजोरियन की हत्या

ई.456 में मेजोरियन सम्राट बन गया। वह ई.461 तक रोम पर शासन करता रहा। रिसिमेर चाहता था कि मेजोरियन रिसिमेर के नियंत्रण में रहकर काम करे किंतु मेजोरियन रिसिमेर से छुटकारा पाकर उसकी जगह, पूर्वी रोमन सम्राट की छत्रछाया चाहता था।

मेजेरियन की प्रार्थना पर पूर्वी रोमन साम्राज्य के सम्राट ने मेजोरियन को रोम का अधिकृत राजा घोषित कर दिया। कुछ दिन बाद मेजोरियन ने अपने कुछ संदिग्ध अंगरक्षकों को हटा दिया जो जर्मन मूल के थे तथा रिसिमेर द्वारा नियुक्त किए गए थे। इस पर रिसिमेर, सम्राट मेजोरियन से कुपित हो गया और उसने इरिया नदी के किनारे सम्राट से मिलने का समय मांगा।

जब सम्राट मेजोरियन सेनापति रिसिमेर से मिला तो रिसिमेर के सैनिकों ने सम्राट को पकड़ लिया। सम्राट को बुरी तरह पीटा गया, उसके शाही कपड़े और चिह्न छीन लिए गए और उसे बुरी तरह अपमानित करके बंदी बना लिया गया। पाँच दिन बाद सम्राट का सिर धड़ से अलग कर दिया गया। जिस स्थान पर पूर्ववर्ती सम्राट एविटस की हत्या की गई थी, वह स्थान भी यहाँ से अधिक दूर नहीं था।

सम्राट लिबियस सेवेरस को जहर

अब तक रिसिमेर रोम के दो सम्राटों का सफाया कर चुका था। अब वह किसी ऐसे व्यक्ति की खोज में जुटा जो रिसिमेर के नियंत्रण में रहकर शासन करे। तीन माह बाद उसने रोमन सीनेटर लिबियस सेवेरस को सम्राट बनाने का निर्णय लिया। लिबियस सेवेरस लुसियानिया का रहने वाला था। उसे 19 नवम्बर 461 को पश्चिमी रोमन साम्राज्य का सम्राट बनाया गया। वह ईसाई धर्म को मानने वाला दयालु शासक था किंतु अपने शासन पर दृढ़ता से अधिकार नहीं कर पाया। उसके काल में शासन की बागडोर मैजिस्टर रिसिमेर के हाथों में रही।

इससे अन्य सीनेटर, लिबियस के विरुद्ध हो गए तथा रोमन गवर्नर भी उसके आदेशों की अवहेलना करने लगे। इस कारण रोम में अशांति फैल गई तथा वाण्डालों के भीषण आक्रमण फिर से आरम्भ हो गए। फिर भी सम्राट लिबियस सेवेरस मैजिस्टर मिलिटम रिसिमेर की सहायता से 15 अगस्त 465 तक रोम पर शासन करता रहा। ई.465 में रिसिमेर ने लिबियस सेवेरस को जहर दे दिया तथा स्वयं रोम का वास्तविक शासक बन गया।

जर्मन मूल के बर्बर कबीले का सेनापति होने के कारण उसकी हिम्मत नहीं पड़ती थी कि वह स्वयं को रोम का सम्राट घोषित करे। इसलिए वह घोषित रूप से अब भी मैजिस्टर मिलिटम था किंतु उसने रोमन टकसाल में कुछ सिक्के ढलवाए जिन पर उसने अपना चित्र सम्राट की तरह अंकित करवाया।

सम्राट एंथमियस की हत्या

ई.467 में रिसिमेर ने एंथमियस को पश्चिमी रोमन साम्राज्य का सम्राट बनवाया। उसके समय में विसिगोथों का नेता ‘यूरिक’ तथा वाण्डालों का नेता ‘जिसेरिक’ रोमन साम्राज्य के लिए सिरदर्द बने हुए थे। सम्राट एंथमियस ने इन दोनों शत्रुओं से भयानक मोर्चा लिया किंतु अप्रेल 472 में रिसीमेर ने एंथमियस की हत्या कर दी तथा ऑलिब्रियस नामक एक रोमन सेनापति को रोम का सम्राट बनवा दिया।

गुण्डोबैड की गुण्डागर्दी

ऑलिब्रियस धार्मिक विचारों का व्यक्ति था। उसे राजनीति में अधिक रुचि नहीं थी किंतु भाग्य के लेख से वह रोम का सम्राट बन गया। उसके समय में शासन की सारी शक्ति रिसीमेर और उसके भतीजे गुण्डोबैड के हाथों में रही। गुण्डोबैड इतना बुरा व्यक्ति था कि इटैलियन औंर अंग्रेजी भाषाओं में ‘गुण्डा’ एवं ‘बैड’ शब्द ‘बुराई’ के अर्थ में प्रयुक्त होने लगे।

कुस्तुंतुनिया के सम्राट लियो (प्रथम) ने ऑलिब्रियस को रोम के शासक के रूप में मान्यता नहीं दी। रोम के दुर्भाग्य से केवल छः माह बाद अक्टूबर 472 में सम्राट ऑलिब्रियस की मृत्यु हो गई। इस घटना के कुछ दिन बाद ही रिसीमेर भी मर गया।

जूलियस नीपो

ऑलिब्रियस की मृत्यु के बाद एक बार फिर सीनेट के सदस्यों में सत्ता के लिए संघर्ष हुआ तथा ग्लाइसेरियस नामक एक रोमन सामंत बलपूर्वक रोम का राजा बन गया। कुस्तुंतुनिया के सम्राट लियो (प्रथम) ने उसे भी रोम के शासक के रूप में मान्यता नहीं दी तथा जूलियस नीपो को विशाल सेना के साथ रोम पर चढ़ाई करने के लिए भेजा।

नीपो ने ग्लाइसेरियस को रोम से बाहर निकाल दिया तथा स्वयं रोम का शासक बन गया। चूंकि ग्लाइसेरियस कुस्तुंतुनिया का पुराना और विश्वस्त सामंत था इसलिए उसे क्षमा कर दिया गया और सालोना के चर्च में बिशप नियुक्त कर दिया गया। वहीं पर शांतिपूर्वक काम करते हुए उसने अंतिम सांस ली।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पूर्वी रोमन साम्राज्य (16)

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पूर्वी रोमन साम्राज्य

चौथी शताब्दी ईस्वी के अंत में रोमन साम्राज्य दो भागों में बँट गया! पश्चिमी रोमन साम्राज्य की राजधानी रोम थी और पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी कुस्तुन्तुनिया थी।

जब सम्राट कॉन्स्टेन्टीन अपनी राजधानी रोम से बिजैन्तिया ले आया तब उसकी माँ ने फिलीस्तीन की राजधानी जेरूसलम में ईसा की समाधि के पास एक बड़ा चर्च बनवाया। इस काल में रोमन लैटिन भाषा का प्रयोग करते थे किंतु पूर्वी साम्राज्य में यूनानी भाषा बोली जाती थी। इन दोनों क्षेत्रों की संस्कृतियां भी अलग-अलग थीं।

रोमन संस्कृति स्वयं को श्रेष्ठतम् मानती थी इसलिए उसने बिजैन्तिया क्षेत्र की संस्कृति को दबाने का प्रयास किया किंतु रोमन संस्कृति इस कार्य में पूरी तरह सफल नहीं हो सकी। रोमन साम्राज्य की नई राजधानी ‘कांस्टेंटिनोपल’ को  भारत में कुस्तुन्तुनिया तथा मुस्लिम देशों में ‘रोम’ की तर्ज पर ‘रूम’ एवं ‘रोमानिया’ कहा जाता था।

कई शताब्दियों तक यही नाम प्रचलन में रहने के कारण आज भी विश्व के कई देशों में कुस्तुन्तुनिया को ‘रूम’ एवं ‘रोमानिया’ कहा जाता है। रोमन साम्राज्य की यह नई राजधानी यूरोप की पूर्वी सीमा पर स्थित थी जहाँ से एशिया महाद्वीप की ओर आसानी से झांका जा सकता था।

रोम के महत्त्व में कमी

रोमन साम्राज्य के राजधानी परिवर्तन से विश्व का राजनैतिक एवं धार्मिक मानचित्र बदल गया। पुराना रोम तथा उसका प्राचीन धर्म लगभग महत्त्वहीन हो गए और उनके स्थान पर नई राजधानी कुस्तुन्तुनिया एवं नया ईसाई धर्म सर्वोपरि हो गए। उस समय यूरोप एवं एशियाई देशों के बीच होने वाले व्यापार का अधिकांश माल इसी रास्ते से होकर निकलता था।

इस कारण नई राजधानी को बहुत सा कर मिलने लगा किंतु नई राजधानी की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि रोम, गॉल और ब्रिटेन सहित यूरोप के प्रमुख शहर इस नई राजधानी से बहुत दूर थे।

रोमन साम्राज्य का विभाजन

काफिर जूलियन

कॉन्स्टेन्टीन के ‘जूलियन’ नामक चौथे उत्तराधिकारी ने ईसाई धर्म को छोड़कर फिर से प्राचीन रोमन धर्म अर्थात् पैगन धर्म की तरफ लौटना चाहा जो कि प्राचीन रोमन देवी-देवताओं की मूर्ति-पूजा वाला धर्म था किंतु वह जनता को पुराने धर्म की तरफ लौटने के लिए तैयार नहीं कर सका। इस समय तक ईसाइयत तेजी से हावी हो रही थी। ईसाइयों ने इस एम्परर का नाम ‘काफिर जूलियन’ रख दिया। आज भी इतिहास में उसे इसी नाम से जाना जाता है।

थियोदोसी महान

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साम्राज्य का शासन सुगमता से चलाने के के लिए रोम एवं कुस्तुन्तुनिया में दो अलग-अलग एम्परर की व्यवस्था की गई जो संयुक्त रूप से सम्पूर्ण रोमन साम्राज्य पर शासन करते थे। इनमें से कुस्तुंतुनिया के शासक को एम्परर तथा रोम के शासक को को-एम्परर कहा जाता था। ई.395 में रोम के सह-सम्राट थियोडियस (प्रथम) ने रोम को कुस्तुंतुनिया से अलग कर लिया। उस समय कुस्तुंतुनिया पर कॉन्स्टेन्टीन का दूसरा या तीसरा उत्तराधिकारी शासन कर रहा था। इस प्रकार रोमन साम्राज्य दो भागों में बँट गया- पश्चिमी रोमन साम्राज्य जिसकी राजधानी रोम थी और दूसरा था पूर्वी रोमन साम्राज्य जिसकी राजधानी कुस्तुन्तुनिया थी। ई.395 से ई.480 तक पूर्वी रोमन साम्राज्य के सम्राट पश्चिमी रोमन साम्राज्य के शासकों को मान्यता प्रदान करते रहे। जूलियन के बाद ‘थियोदोसी महान्’ पूर्वी रोमन साम्राज्य का शासक हुआ। हुआ। वह प्राचीन रोमन धर्म से घृणा करता था। इसलिए उसने प्राचीन धर्म के देवी-देवताओं की मूर्तियों एवं मंदिरों को बड़ी संख्या में नष्ट करवाया। इसी कारण ईसाइयों ने उसे महान् कहा। थियोदोसी ने न केवल गैर-ईसाई लोगों को ही मौत के घाट उतारा अपितु उन ईसाइयों को भी मौत के घाट उतार दिया जो थियोदोसी की दृष्टि में कट्टर ईसाई नहीं थे।

ई.392 में थियोदोसी ने पूर्वी एवं पश्चिमी रोमन साम्राज्यों को जोड़कर फिर से एक कर दिया किंतु ई.395 में सम्राट थियोदोसी ने राज्य का अपने दो पुत्रों में विभाजन कर दिया। इस कारण पश्चिमी रोमन साम्राज्य एवं पूर्वी रोमन साम्राज्य पुनः प्रकट हो गए।

सम्राट जस्टीनियन की संहिता

ई.527 में जस्टीनियन नामक राजा पूर्वी रोमन साम्राज्य का स्वामी हुआ। उसने उत्तरी अफ्रीका के समृद्ध क्षेत्रों और इटली की प्राचीन रोमन भूमि के साथ-साथ हिस्पैनीसिया के कुछ हिस्सों को जीत लिया। उसने गोथों को इटली से निकाल दिया तथा कुछ समय के लिए इटली एवं सिसली को अपने साम्राज्य में मिला लिया किंतु बाद में गोथों ने फिर से इटली पर अधिकार कर लिया। कुछ समय बाद सिसली भी पूर्वी रोमन साम्राज्य के अधिकार से बाहर हो गया।

जस्टीनियन ने कुस्तुन्तुनिया में सांक्ता सोफिया का सुंदर गिरिजाघर बनवाया। जस्टीनियन ने अपने काल में प्रचलित समस्त रोमन कानूनों को एक जगह एकत्रित करवाया तथा योग्य वकीलों की सहायता से उन्हें क्रमबद्ध रूप में जमाया। इस पुस्तक को ‘कन्स्टीट्यूटिओनम ऑफ जस्टीनियन’ तथा Code Constitutionum कहा जाता है।

यह संहिता आधुनिक यूरोपीय विधि का प्रमुख स्रोत बनी। यह संहिता मनु के धर्मशास्त्र की तुलना में नागरिकों को कम अधिकार प्रदान करती है। रोमन विधि लगभग निर्बाध अधिकार (Patria potesta) घर अथवा कुटुंब के मुखिया (pater familias) को देती थी।

वही सभी सम्पत्ति एवं गुलामों का स्वामी था। पत्नी एवं पुत्री को सम्पत्ति तथा गुलामों पर कोई अधिकार नहीं था। पुत्री भी विवाह होने तक पिता के अधिकार में थी और विवाह के बाद पति के अधिकार में चली जाती थी। रोमन संहिता में गुलाम वर्ग को कुछ भी अधिकार नहीं दिए गए थे और वे अपने स्वामी की संपत्ति मात्र थे।

यह मनु की मूल धारणाओं के बिलकुल विपरीत बात थी। मनु संहिता में पुत्र को संयुक्त परिवार की संपत्ति में स्वत्व प्राप्त था और स्त्री-धन की व्यवस्था थी। यहाँ तक कि सेवक की सम्पत्ति पर सेवक का ही अधिकार था। मनु के अनुसार सभी नागरिक बराबर थे।

नागरिकों के अधिकारों का यह अंतर इसलिए था कि रोमन विधि सम्राट-रचित थी न कि ऋषि-मुनियों या विद्वानों द्वारा। जबकि मनु का धर्मशास्त्र एक ऋषि द्वारा रचा गया था। जस्टीनियन ने कुस्तुन्तुनिया में प्लेटो (अफलातून) द्वारा एक हजार साल पहले स्थापित प्राचीन यूनानी दर्शनशास्त्र की शिक्षण संस्था को बंद करके उसके स्थान पर ईसाई धर्म की शिक्षाओं पर आधारित एक नया विश्वविद्यालय बनवाया। यह एक आश्चर्यजनक बात थी कि इस युग में कुस्तुन्तुनिया रोम के विचारों से काफी दूर हो चुका था तथा यूनानी वैचारिक साम्राज्य का हिस्सा बन गया था किंतु वह यूनान के एक हजार साल साल पुराने दर्शनशास्त्र से पीछा छुड़ाकर पाँच सौ साल पहले अस्तित्व में आए ईसाई दर्शन की ओर तेजी से बढ़ रहा था।

लालची राजाओं एवं रानियों का जमावड़ा

कुस्तुन्तुनिया के राजपरिवार में सत्ता प्राप्ति के लिए गहरे षड़यंत्र चला करते थे। ई.780 में एम्परर ‘लियो चतुर्थ’ का नौ वर्षीय पुत्र ‘कॉन्स्टेन्टीन षष्ठम्’ पूर्वी रोमन साम्राज्य का शासक हुआ। उसकी माता आयरीन ई.790 तक रीजेंसी के माध्यम से पूर्वी रोमन साम्राज्य पर शासन करती रही।

वह एथेंस की राजकुमारी थी तथा कॉन्स्टेन्टीन षष्ठम् उसका इकलौता पुत्र था किंतु आयरीन को सत्ता का इतना चस्का लगा कि जब राजा 26 साल का था, तब ई.797 में आयरीन ने उसे बंदी बना लिया तथा उसे अंधा कर दिया। आंखों के घावों के कारण कुछ ही दिनों में राजा की मृत्यु हो गई तथा आइरीन कुस्तुन्तुनिया की साम्राज्ञी बनी।

संसार में संभवतः यह एकमात्र उदाहरण है जब किसी माता ने अपने पुत्र को मारकर उसकी गद्दी हथियाई हो। अंत में इस रानी को भी मार डाला गया। ऐसी बहुत से घटनाओं के उपरांत भी पूर्वी रोमन साम्राज्य अगले सात सौ साल तक और चलता रहा किंतु चूंकि हमारा केन्द्रीय विषय रोम है, इसलिए हमें पूर्वी रोमन साम्राज्य की कहानी किंचित् संक्षेप में समेटनी पड़ेगी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ईसाई धर्म का अंतर्द्वन्द्व (17)

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ईसाई धर्म का अंतर्द्वन्द्व

ईसाई धर्म का अंतर्द्वन्द्व अपने आप में एक लम्बा इतिहास लिए हुए है। इसी अंतर्द्वन्द्व के कारण ईसाई धर्म को अनेक गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ा। इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि ईसाई धर्म का इतिहास रक्त रंजित है।

ईसाई धर्म अपने जन्म के साथ ही अंतर्द्वन्द्वों में फंसा हुआ था। यह एक स्वाभाविक बात ही थी क्योंकि किसी श्रेष्ठ संस्था, श्रेष्ठ विचार, श्रेष्ठ रचना या व्यवस्था का परिष्कार अंतर्द्वन्द्वों के बाद ही हो सकता है। किसी भी विषय के सम्बन्ध में मनुष्य के हृदय में उत्पन्न होने वाला विचार, आवश्यक नहीं है कि वह इतना श्रेष्ठ हो कि उसमें किसी परिष्कार की संभावना मौजूद ही न हो।

ईसा मसीह ने स्वयं को प्रभु का पुत्र बताया था तथा कभी भी किसी देवत्व का दावा नहीं किया था। वे अंतिम क्षणों में भी ईश्वर से अपने शत्रुओं के लिए क्षमा मांगते रहे थे। अतः यह निश्चित था कि उन्होंने कभी स्वयं ईश्वर होने का दावा नहीं किया।

जब वे इस संसार से चले गए तब मनुष्यों में उन्हें देवत्व प्रदान करने की होड़ लगी। इसके पीछे कई कारण एवं भावनाएं काम कर रही थीं। कुछ लोग किसी मनुष्य की महानता तब स्वीकार करते हैं जब वह मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। इस भावना के कारण बहुत से लोगों को यीशू अब महान् लगने लगे थे।

कुछ लोग इसलिए यीशू को देवत्व का स्तर प्रदान करना चाहते थे ताकि वे प्रचलित धर्मों के पुजारियों एवं ठेकेदारों के समक्ष नई चुनौती खड़ी कर सकें। कुछ लोगों को अपने अंतःकरण की शुद्ध भावनाओं के कारण यीशू में देवत्व दिखाई देने लगा था तो कुछ लोग अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए एक नया धर्म खड़ा करने के लिए उतावले हो रहे थे।

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इसमें कोई संदेह नहीं कि अपने जीवन काल में यीशू देवत्व के गुणों से युक्त थे किंतु सूली के बाद कुछ सौ सालों में करोड़ों लोगों को यीशू के देवत्व में विश्वास हो गया। अब वे ईश्वर के पुत्र होने के साथ-साथ इतने गरिमा युक्त हो गए थे कि ईश्वर की जगह उन्हें ही पूजा जाने लगा। ईसा की चौथी शताब्दी ईस्वी के आरम्भ में जब रोम के राजा ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया तो ईसाई धर्म उपेक्षित और जन-सामान्य का धर्म नहीं रह गया। वह राज्य-संरक्षण के गौरव से अनुप्राणित हो उठा। ईसाई धर्म के प्रचारकों के लिए अब अपने विरोधियों से हिसाब चुकता करने का समय आ गया था किन्तु इसी समय ईसाई धर्म एक नए अंतर्द्वन्द्व में उलझ गया। ईसाई प्रचारक यीशू के उपदेशों को समझने और उन्हें व्यवहार में लाने की बजाय यीशू के देवत्व और क्रिश्चियन ट्रिनिटी (ईसाई त्रिपुटी) को लेकर तर्क-वितर्क में फंस गए। ईसाई धर्म में फादर, सन और होली घोस्ट (पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा) को ट्रिनिटी कहते हैं। इस विषय पर उनके अलग-अलग समूह बन गए और वे एक दूसरे को काफिर कहने लगे, एक-दूसरे पर अत्याचार करने लगे और यहाँ तक कि एक-दूसरे का गला काटने लगे। एक बार ईसाइयों के कुछ सम्प्रदायों में ‘होमो आउजिन’ शब्द के उच्चारण को लेकर झगड़ा हुआ।

कुछ समुदाय कहते थे कि प्रार्थना के समय होमो आउजिन शब्द उच्चारित किया जाना चाहिए जबकि कुछ समुदाय इस मत पर अड़ गए कि होमोई आउजिन शब्द उच्चारित किया जाना चाहिए। यह शब्द ईसा मसीह के देवत्व से सम्बन्ध रखता है। इस विवाद को सुलझाने के लिए दोनों पक्षों में भयंकर युद्ध हुआ जिसमें बहुत से लोग मारे गए।

ईसाई प्रचारकों के झगड़े इतने अधिक थे कि वह रोम के राजा का धर्म बन जाने के उपरांत भी उससे तत्काल लाभ नहीं उठा सका। रोमन राजा के रोम छोड़कर कुस्तुंतुनिया चले जाने से रोम और कुस्तुंतुनिया के ईसाईयों में यह झगड़ा उठ खड़ा हुआ कि उनमें से बड़ा और असली ईसाई कौन है! इस कारण रोमन सामा्रज्य का ईसाई समुदाय दो समुदायों में विभक्त हो गया। कुस्तुंतुनिया का ईसाई समुदाय स्वयं को यूनानी सम्प्रदाय कहने लगा और रोम का ईसाई समुदाय स्वयं को लैटिन सम्प्रदाय कहने लगा।

रोमन चर्च कैथोलिक चर्च कहलाने लगा और कुस्तुंतुनिया का चर्च ऑर्थोडॉक्स चर्च कहलाने लगा। रोमन कैथोलिक चर्च का बिशप लैटिन ईसाई समुदाय का प्रमुख बन गया जो बाद में सेंट पीटर का उत्तराधिकारी होने के कारण विशिष्ट माना जाने लगा। कुछ समय बाद विशिष्टता का यह भाव इतना अधिक बढ़ा कि रोम के कैथोलिक चर्च का बिशप ‘पोप’ अर्थात् ‘पिता’ कहलाने लगा। यह एक विस्मयकारी स्थिति थी। प्रभु के पुत्र यीशू के शिष्य का उत्तराधिकारी सारे संसार के ईसाइयों का पिता बन गया था! रोम में राजा की अनुपस्थिति से पोप की हैसियत दिन पर दिन बढ़ती चली गई।

छठी शताब्दी ईस्वी में भी ईसाई धर्म की लड़ाइयां गैर ईसाइयों से न होकर, अन्य ईसाई सम्प्रदायों से हुआ करती थीं। ये सम्प्रदाय एक दूसरे के प्रति अत्यंत असहिष्णु थे।

समस्त उत्तरी अफ्रीका, पश्चिमी एशिया और यूरोप में भी ईसाइयों ने अपने ईसाई भाइयों को घूंसों, डण्डों और तलवारों से धर्म का मर्म समझाने का प्रयास किया। इस काल में ईसाइयत तुर्किस्तान, चीन और एबीसीनिया (हब्श) तक फैल गई थी तथा रोम और कुस्तुन्तुनिया की ईसाइयत से पूरी तरह कट गई।

यूरोप में अंधकार का युग आरम्भ हो गया। ईसाइयों ने तब तक लिखी गई पुस्तकों को ढूंढ-ढूंढकर नष्ट किया क्योंकि उनमें प्राचीन यूनानी दर्शन था, प्राचीन रोमन धर्म था और प्राचीन देवी-देवताओं की पूजा सम्बन्धी बातें लिखी हुई थीं। इन पुस्तकों के साथ प्राचीन काल की चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत कला आदि को भी उस काल के ईसाइयों के हाथों बड़ा नुक्सान उठाना पड़ा। उन्हें ढूंढ-ढूंढ कर नष्ट किया गया। क्योंकि ये कलाकृतियां निःसंदेह प्राचीन रोमन देवी-देवताओं का निरूपण करती थीं।

कुछ ईसाई पादरी एवं पुजारी अपने दूसरे भाइयों की तरह अनुदार नहीं थे। वे अतीत को अपने पुरखों की विरासत समझते थे। इसलिए कुछ ईसाई आश्रमों, गिरिजाघरों एवं मठों में पुरानी पुस्तकों का चोरी-छिपे भण्डारण किया गया और उन्हें नष्ट होने से बचाया गया। इसी प्रकार कुछ प्राचीन चित्र भी बचा लिए गए। इस काल में कुछ ईसाई दरवेश मानव बस्तियों से दूर रेगिस्तानी क्षेत्रों में चले जाते थे।

वहाँ ये लोग जंगली हालत में रहते थे तथा स्वयं को पीड़ा पहुँचाया करते थे। ये नहाते-धोते नहीं थे और अधिक से अधिक कष्ट सहने का प्रयास करते थे। यह बात मिस्र में विशेषतः पाई जाती थी जहाँ इस प्रकार के बहुत से दरवेश रेगिस्तान में रहा करते थे। उनका विचार था कि- ‘वे जितना स्वयं को पीड़ा पहुँचाएंगे, नहाने-धोने से दूर रहेंगे, उतने ही पवित्र हो जाएंगे।’

एक दरवेश तो बहुत वर्षों तक एक खम्भे के ऊपर बैठा रहा। ये लोग अपना हाथ ऊपर उठाए रहते थे। यहाँ तक कि यह हाथ सूख कर बेकार हो जाता था। या लोहे की कीलों पर बैठे रहते थे। इन दरवेशों की यह जीवन-पद्धति बहुत कुछ भारतीय हठ-योगियों से साम्य रखती थी। धीरे-धीरे इन ईसाई-दरवेशों की परम्परा समाप्त हो गई किंतु बहुत दिनों तक बहुत से ईसाईयों का यह विश्वास था कि- ‘आनंद मनाना पाप है।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पोप का प्राकट्य एवं उसका शक्ति विस्तार (18)

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पोप का प्राकट्य - bharatkaitihas.com
पोप का प्राकट्य एवं उसका शक्ति विस्तार

रोम का सेंट पीटर्स लातीनी चर्च आगे चलकर कैथोलिक चर्च के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस चर्च का बिशप लातीनी सम्प्रदाय का प्रमुख माना गया। बाद में बिशप रोम का पोप कहलाने लगा। पोप का अर्थ पापा अर्थात् पिता से था। इस प्रकार रोम में पोप का प्राकट्य हुआ।

ईसाई धर्म के विभिन्न सम्प्रदाय

ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियों में ईसा मसीह के विभिन्न शिष्यों द्वारा फैलाए गए ईसाइयत के विचारों के कारण ईसाई धर्म में विभिन्न सम्प्रदाय विकसित हो गए जो आगे चलकर ईसाई धर्म की सबसे बड़ी कमजोरी बन गए। इन सम्प्रदायों में परस्पर खूनी संघर्ष होते थे। रोम में ईसाई धर्म का लातीनी सम्प्रदाय अधिक लोकप्रिय हुआ। लातीनी सम्प्रदाय के कुछ लोग ईसा मसीह, विभिन्न ईसाई संतों और ईसा की माता मैरी की मूर्तियां बनाकर उनकी पूजा करते थे जबकि इसी सम्प्रदाय के कुछ अन्य सदस्य, मूर्ति-पूजा का विरोध करते थे।

रोम के बिशप के प्रभाव में वृद्धि

जब सम्राट कॉन्स्टेन्टीन रोम छोड़कर कुस्तुन्तुनिया चला गया तब रोम के लोगों पर पीटर्स चर्च के बिशप का प्रभाव बढ़ने लगा। जब कॉन्स्टेन्टीन ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया तथा ईसाई धर्म को राजधर्म घोषित कर दिया तब रोम के राजाओं को अनिवार्य रूप से बिशप का सहयोग करना होता था और उसका आदेश स्वीकार करना होता था।

कैथोलिक चर्च एवं ऑर्थोडॉक्स चर्च

कुछ समय बाद रोम तथा कुस्तुन्तुनिया के लातीनी सम्प्रदाय के अनुयाइयों में मूर्ति-पूजा को लेकर परस्पर विरोध इतना बढ़ गया कि अंततः लातीनी सम्प्रदाय के दो टुकड़े हो गए। इस विभाजन के बाद रोम के ईसाई स्वयं को पूर्ववत् लातीनी सम्प्रदाय अथवा कैथोलिक सम्प्रदाय कहते रहे जबकि कुस्तुंतुनिया के ईसाई स्वयं को यूनानी सम्प्रदाय बताने लगे।

रोम के लोगों ने कुस्तुंतुनिया के चर्च को ‘ऑर्थोडॉक्स चर्च’ कहना आरम्भ कर दिया क्योंकि कुस्तुंतुनिया का चर्च, रोम के बिशप द्वारा की जा रही धार्मिक व्याख्याओं को स्वीकार करने को तैयार नहीं था तथा ईसाई धर्म के प्राचीन सिद्धांतों में किसी भी तरह के परिवर्तन को अनुचित मानता था।

रोम में पोप का प्राकट्य

रोम का सेंट पीटर्स लातीनी चर्च आगे चलकर ‘कैथोलिक चर्च’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ जो अपेक्षाकृत खुले विचारों का स्वामी था। इस चर्च का बिशप, लातीनी सम्प्रदाय का प्रमुख माना गया। बाद में यही बिशप रोम का पोप कहलाने लगा। पोप के नेतृत्व में लातीनी चर्च का प्रभाव उत्तरी और पश्चिमी यूरोप में फैला। पोप का अर्थ ‘पापा’ अर्थात् पिता से था। वह जिन धार्मिक दायित्वों का निर्वहन करता था, उन्हें ‘पापेसी’ कहा जाता था।

धीरे-धीरे पोप का प्रभाव रोमन साम्राज्य में इतना बढ़ गया कि यदि कोई व्यक्ति पोप के आदेश की पालना नहीं करता था अथवा उसके द्वारा की गई धार्मिक व्यख्याओं से हटकर कुछ कहने का प्रयास करता था तो पोप उस व्यक्ति को ईसाई संघ से बाहर का रास्ता दिखा देता था।

चाहे वह व्यक्ति कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो अथवा किसी राज्य का राजा ही क्यों न हो! ऐसे राजा को धर्म में पुनः प्रवेश करने के लिए भारी प्रायश्चित करना होता था तथा पोप को भारी धन देना पड़ता था। कुछ समय बाद पोप स्वयं को इतना शक्तिशाली समझने लगा कि अवसर मिलने पर कुस्तुंतुनिया के सम्राट को भी चुनौती देने लगा।

कुस्तुंतुनिया में पात्रिआर्क का प्राकट्य

संभवतः कुस्तुंतुनिया के सम्राटों के बढ़ावा देने से ही रोमन कैथोलिक चर्च के मुकाबले में कुस्तुंतुनिया के चर्च का प्राकट्य हुआ ताकि रोम के पोप के प्रभाव को कम किया जा सक। इसे यूनानी सम्प्रदाय भी कहा जाता था जिसका प्रमुख केन्द्र कुस्तुन्तुनिया में रहा। यह चर्च पूर्वी यूरोप के देशों में फैल गया। ऑर्थोडॉक्स चर्च का बिशप अथवा पूर्वी ईसाइयों का धर्म-अध्यक्ष पात्रिआर्क कहलाने लगा। पात्रिआर्क के रहते रोम का पोप, कुस्तुंतुनिया के सम्राट के विरुद्ध कोई धार्मिक कार्यवाही नहीं कर सकता था, न उसे धर्म से बाहर का रास्ता दिखाकर सम्राट के पद से हटाने का साहस कर सकता था।

एनक्वीजिशन

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चूंकि ईसाई धर्म का उदय ईसा मसीह की मृत्यु के बाद हुआ तथा उनके शिष्यों को भी बहुत दिनों तक शासन की दृष्टि से छिपकर रहना पड़ा, इसलिए ईसाई धर्म के आरम्भ में इसके निश्चित दार्शनिक विचारों, सिद्धांतों, नियमों एवं परम्पराओं का निर्माण नहीं किया जा सका। जैसे-जैसे इस धर्म के अनुयाइयों की संख्या बढ़ी, वैसे-वैसे उनमें वैचारिक एवं सैद्धांतिक मतभेद उत्पन्न होने लगे। रोमन कैथोलिक चर्च ने यह घोषणा की कि ईसाई धर्म के तात्विक विवेचन एवं व्याख्याओं का अधिकार केवल पोप के पास है। यदि पोप से हटकर कोई व्यक्ति ईसाई धर्म की दार्शनिक व्याख्याएं प्रस्तुत करता है, तो वह मान्य नहीं होंगी। ऐसा करने के पीछे मुख्य धारणा यह थी कि यदि ऐसा नहीं किया गया तो ईसाई धर्म में तरह-तरह के विचार पनप जाएंगे जो धर्म के मूल स्वरूप को धूमिल कर देंगे। धर्म के पवित्र स्वरूप को बचाए रखने के लिए एक कानूनी संस्था का निर्माण किया गया जिसे ‘एनक्वीजिशन’ कहा गया। यह एक तरह का धार्मिक न्यायालय था। इसका कार्य धार्मिक अविश्वास को रोकना तथा धर्म के सम्बन्ध में मनमाने विचार फैलाने वालों को दण्ड देना था। पहले यह संस्था फ्रांस में स्थापित हुई और उसके बाद इटली, स्पेन पुर्तगाल जर्मनी इत्यादि में फैल गई।

जब कुछ लोग अपनी मर्जी के मुताबिक धार्मिक एवं दार्शनिक व्यखयाएं करने एवं अपने स्वतंत्र विचार प्रकट करने से बाज नहीं आए तो ‘एनक्वीजिशन’  नामक संस्था के विधानों में कठोरता आती चली गई।

धीरे-धीरे यह संस्था इतनी कठोर हो गई कि किंचित्-मात्र और महत्त्वहीन स्वतंत्र विचारों के लिए भी यह संस्था लोगों को जीवित ही जला देती थी। इस न्यायालय ने सैंकड़ों स्त्रियों को चुड़ैल घोषित करके उन्हें मौत के घाट उतार दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रोमन साम्राज्य का अंत (19)

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रोमन साम्राज्य का अंत - bharatkaitihas.com
रोमन साम्राज्य का अंत

महान् रोमन साम्राज्य का अंत बड़ा दुःखद था। ईसाई धर्म ने उस प्राचीन रोमन धर्म को कुचल कर नष्ट कर दिया था जिस प्राचीन रोमन धर्म की पृष्ठभूमि में महान् रोमन साम्राज्य का जन्म हुआ था।

रोमुलस ऑगुस्टस द्वारा पश्चिमी साम्राज्य का विभाजन

ई.474 में कुस्तुंतुनिया के सम्राट लिओ (प्रथम) ने जूलियस नीपो को रोमन साम्राज्य के सह-सम्राट के रूप में मान्यता दी तथा उसे रोम का शासक नियुक्त किया किंतु कुछ ही समय बाद जूलियस नीपो बीमार हो गया तथा इस अवसर का लाभ उठाकर ई.475 में  फ्लेवियस रोमुलस ऑगुस्टस नामक एक रोमन धनी-सामंत ने नीपो के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। नीपो किसी तरह अपने परिवार के साथ रोम से बाहर चला गया तथा उसके प्राण बच गए। रोमुलस ऑगुस्टस ने रोम तथा उसके आसपास के क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया किंतु कुछ क्षेत्र अब भी नीपो के अधिकार में बने रहे।

नए रोमन शासक रोमुलस ऑगुस्टस का पिता ओरेस्टेज, हूण-आक्रांता अतिला का सचिव रहा था। बाद में किसी समय रोमुलस, जूलियस नीपो की सेवा में आ गया था। रोमुलस ऑगुस्टस ने 31 अक्टूबर 475 से 4 सितम्बर 476 तक रोम पर शासन किया किंतु कुस्तुंतुनिया का सम्राट ई.480 तक जूलियस नीपो को ही रोम के सम्राट के रूप में मान्यता देता रहा जो अब पश्चिमी रोमन साम्राज्य के खण्डित हिस्से पर शासन करता था।

कुस्तुंतुनिया का सम्राट पश्चिमी रोमन साम्राज्य पर विदेशी बर्बर कबीलों के खतरे को भांपने में असमर्थ रहा। वह अपने अहंकार में इतना डूबा हुआ था कि उसने रोमन रक्त के सामंत रोमुलस ऑगुस्टस को रोम के सम्राट के रूप में मान्यता देना उचित नहीं समझा। इस कारण कुछ ही समय में गोथ धड़धड़ाते हुए रोम में घुस आए और उन्होंने हमेशा के लिए रोम से प्राचीन रोमन रक्त वंश के शासकों की शृंखला को सदैव के लिए नष्ट कर दिया।

ओडोवेकर द्वारा रोम पर अधिकार

ई.476 में गोथ रोम में घुस आए और उनके सेनापति फ्लेवियस ओडोवेकर (ओडोसर) ने रोमुलस ऑगुस्टस को हराकर रोम पर अधिकार कर लिया। यही प्राचीन रोमन साम्राज्य का आधिकारिक रूप से दयनीय अंत था। रोम की प्रतिष्ठा ही अब तक उसे बचाए हुए थी किंतु उसके भीतर का खोखलापन अब पूरी दुनिया के सामने आ चुका था।

ई.480 में कुस्तुंतुनिया के सम्राट लियो (प्रथम) की मृत्यु हो गई तथा उसकी जगह जेनो पूर्वी साम्राज्य का राजा बना। इस काल में रोमन साम्राज्य पूरी तरह से दो भागों में बंट गया। पश्चिमी रोमन साम्राज्य की राजधानी रोम तथा पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी कुस्तुन्तुनिया रही। रोम, इटली के प्रदेश एवं पश्चिमी यूरोप पश्चिमी रोमन साम्राज्य के अधीन रहे जबकि कुस्तुंतुनिया, यूनान, अनातोलिया तथा बैजेन्टाइन आदि क्षेत्र पूर्वी रोमन साम्राज्य के अधीन रहे। बहुत से इतिहासकार पूर्वी रोमन साम्राज्य को बैजेन्टाइन एम्पायर कहना अधिक पसंद करते हैं।

ओडोवेकर की हत्या

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फ्लेवियस ओडोवेकर ने 17 साल तक रोम को अपने अधिकार में रखा। वह एरियन ईसाई था किंतु रोम के कैथोलिक चर्च के मामलों में उसने विशेष हस्तक्षेप नहीं किया। ई.493 में पूर्वी रोमन सम्राट जेनो के आदेश से पूर्वी रोमन सम्राट के सामंत  थियोडोरिक ने इटली पर आक्रमण किया। वह भी जर्मनी के एक गोथ कबीले का मुखिया था किंतु कुस्तुंतुनिया के सम्राट जेनो का अत्यंत विश्वसनीय एवं दायाँ हाथ माना जाता था। फ्लेवियस ओडोवेकर तथा थियाडोरिक के बीच कई युद्ध हुए। अंत में दोनों के बीच एक संधि हुई जिसके तहत दोनों ने इटली तथा प्राचीन रोमन साम्राज्य के क्षेत्र आधे-आधे बांट लिए। संधि होने के उपलक्ष्य में एक उत्सव का आयोजन किया गया। उत्सव के दौरान थियोडोरिक ने अपनी तलवार निकाल कर ओडोवेकर का गला काट दिया। ओडोवेकर की मृत्यु हो गई तथा इटली पर थियोडोरिक का शासन हो गया। उसने इटली में ढाई लाख सैनिक नियुक्त किए तथा इटली के रवेन्ना शहर में ऑस्ट्रोगोथ वंश के राज्य की नींव रखी। थियोडोरिक ने उत्तरी इटली में छोटे-छोटे क्षेत्रों पर शासन कर रहे बर्गुण्डियन एवं वाण्डाल सरदारों की पुत्रियों से विवाह करके उन्हें अपना मित्र बना लिया। इस प्रकार महान् रोमन साम्राज्य की राजधानी रोम से पुराने रोमन शासकों का शासन समाप्त हो गया तथा विदेशी बर्बर कबीलों के राज्य की शुरुआत हुई।

महान् रोमन साम्राज्य के पतन के कारण

पाँचवीं सदी में महान् रोमन साम्राज्य का पतन हो गया। यह विश्व के सबसे विशाल साम्राज्यों में से एक था। इसका विस्तार दक्षिणी यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और अनातोलिया तक विस्तृत हो गया था। फारस का साम्राज्य इसका प्रतिद्वंद्वी था जो फुरात नदी के पूर्व में स्थित था। रोमन साम्राज्य में अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग भाषाएँ बोली जाती थीं जिनमें लैटिन और यूनानी प्रमुख थीं।

रोम की पराजय के बहुत से कारण थे। सबसे बड़ा कारण रोमन राजकुमारों, राजकुमारियों, रानियों तथा सेनापतियों की हिंसक एवं स्वार्थी प्रवृत्ति थी जो किसी रोमन सम्राट को शांति से शासन नहीं करने देती थी। रोमन सेनापति एवं अंगरक्षक सेनाएं इतनी भ्रष्ट थीं कि वे किसी से भी धन लेकर अपने सम्राट की हत्या कर डालती थीं।

कोई भी व्यक्ति सम्राट की अंगरक्षक सेनाओं को उत्कोच देकर उनकी निष्ठा को क्रय कर सकता था। यही कारण था कि रोम के बहुत कम शासक ऐसे थे जो प्राकृतिक मृत्यु से मरे हों। मृत्यु और हत्या, रक्त और हिंसा रोम-वासियों के स्वभाव में प्रवेश कर गया था, इसलिए वे इन बातों को बहुत स्वाभाविक समझते थे।

रोमन सामंत तथा उनके युवा पुत्र विलासी एवं मद्यपायी होकर सेनाओं में शामिल होकर लड़ने के योग्य नहीं रह गए थे। यह काम उन्होंने अफ्रीकी तटों से पकड़े गए गुलामों पर छोड़ दिया था। धनी सामंतों के साथ ही रोम का मध्यम-वर्गीय समाज भी सरकार की तरफ से दी जाने वाली मुफ्त की रोटियां तोड़ने का आदी हो चुका था।

जबकि रोमन किसानों एवं श्रमिकों की जिंदगी इतनी बुरी थी कि उन्हें इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता था कि उन पर कौन शासन कर रहा है! रही बात रोमन सेनाओं की तो उनकी स्थिति तो सब से बुरी थी। सेनाओं के श्रेष्ठ सैनिक एवं सेनापति पूर्वी रोमन साम्राज्य के पास थे। पश्चिमी रोमन साम्राज्य की सेनाएं अफ्रीकी गुलाम सैनिकों एवं उत्तरी यूरोप के बर्बर कबीलाई सैनिकों से भरी पड़ी थी। उन्हें भला ऐसे जर्जर और पतनशील राज्य के लिए अपने प्राण संकट में डालने में क्या लाभ था?

इन सबका मिला-जुला परिणाम यह हुआ कि जिस रोम की तूती दुनिया भर में बोलती थी, उसकी तरफ से लड़ने के लिए कोई आगे नहीं आया। पाँचवी शताब्दी ईस्वी तक पोप भी रोम की एक बड़ी शक्ति बन चुका था किंतु वह भी महान् रोम की रक्षा नहीं कर सका। महान् रोमन साम्राज्य ध्वस्त हो गया।

रोम की अधिकांश सम्पत्ति और शक्ति एम्परर कॉन्स्टेन्टीन के साथ ही कुस्तुन्तुनिया चली गई थी। इसलिए असली रोम बहुत कमजोर हो गया था किंतु पश्चिमी रोमन साम्राज्य अपनी पुरानी और असली राजधानी रोम पर पहले की भांति गर्व करता रहा। उसे अपनी वास्तविक स्थिति का भान ही नहीं हुआ। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि जिन लोगों को रोमवासी बर्बर कहते आए थे, अब वही बर्बर लोग, रोम में घुस गए। बर्बर लोगेों के कई कुख्यात कबीले थे जिनमें गोथ और फ्रैंक अधिक प्रबल थे।

अलेक्जैंडर डिमांट नामक इतिहासकार ने महान् रोमन साम्राज्य के पतन के अनेक कारण बताए हैं। कई इतिहासकार इसके पतन के बीज ईसा की पहली शताब्दी में देखते हैं तो कुछ का मानना है कि रोमन साम्राज्य के पतन के लक्षण तीसरी शताब्दी ईस्वी से प्रकट होने आरंभ हो गए थे। रोमन सेनाएं वाण्डाल, गॉथ, विसिगॉथ और हूण जैसे भयानक आक्रांताओं को नहीं रोक पाईं जबकि ये शक्तियां कई सौ सालों से रोम के लिए खतरा बनी हुई थीं।

रोमन सम्राट ट्राजन के शासनक काल (ई.98-117) में रोमन साम्राज्य का विस्तार अपने चरम पर पहुँचा था किंतु उसके बाद से ही साम्राज्य के क्षेत्रों का संकुचन होना आरम्भ हो गया था। ई.235-84 के बीच रोमन साम्राज्य की पूर्वी सीमाओं पर ससानिड साम्राज्य का तेजी से विस्तार हुआ तथा ससानिड सेनाओं ने रोम पर आक्रमण करने आरम्भ किए।

ई.268 से ई.270 के बीच गृहयुद्ध और प्लेग ने रोमन सेना की संख्या और कोष दोनों को कमजोर कर दिया तथा रोमन साम्राज्य गैलिक, पामेरीन और रोमन नामक तीन भागों में विभक्त हो गया। ई.274 में ऑरेलियस ने इन तीनों खण्डों को फिर से एक किया किंतु उसके बाद महान् रोमन साम्राज्य फिर से गृह-युद्ध में घिर गया तथा यह पुनः दो भागों में टूट गया।

चौथी शताब्दी ईस्वी में डियोक्लेटियन तथा कॉन्स्टेन्टीन ने रोमन साम्राज्य की एकता पुनः स्थापित की। ऑरेलियस (ई.270-75) तथा उसके बाद के रोमन शासकों ने रोम की पुरानी परम्पराओं को भुला दिया जिसमें धनी-जमींदार वर्ग को सत्ता में भागीदारी प्राप्त थी।

ऑरेलियन तथा उसके बाद के सम्राटों ने स्वयं को ‘डोमस एट डेस’ अर्थात्  ‘लॉर्ड एंड गॉड’ कहना आरम्भ कर दिया जिसके कारण राजा और प्रजा का सम्बन्ध स्वामी एवं दास जैसा हो गया। डियोक्लेटियन के शासन काल के आते-आते सम्राट और प्रजा के सीधे संम्पर्क का दौर लगभग समाप्त हो गया।

सम्राट को जनता के सुख-दुःख की सूचना अपने दरबारियों के माध्यम से मिलती थी। इस कारण शासन तंत्र में क्रूरता, करों की कठोर वसूली और भ्रष्टाचार का बोलबाला हो गया। इस कारण अब प्रजा को कोई अंतर नहीं पड़ता था कि उस पर कौन शासन कर रहा है!

रोम के धनी सीनेटर परिवार, शासकों की कमजोरी का लाभ उठाकर कराधान से मुक्त हो गए। उन का ध्यान राज्य एवं प्रजा की सेवा करने से पूरी तरह हट गया और वे धन-सम्पत्ति एवं पद प्राप्त करने के लिए षड़यंत्र रचने लगे। रोम के बड़े किसान अपने खेतों में काम करने के लिए सस्ते में खरीदे गए गुलामों का उपयोग करते थे। जब किसानों पर कर बढ़ा दिए गए तो उन्हें बड़ी संख्या में अपने गुलामों को छोड़ देना पड़ा। इस कारण रोम में बेरोजगार हब्शियों की संख्या बहुत बढ़ गयी।

मार्कस ऑरेलियस के बाद, रोमन सम्राटों ने अपने साम्राज्य का विस्तार करना बंद कर दिया था तथा महान् रोमन साम्राज्य की सीमाएं निरंतर संकुचित होती चली गईं। इस कारण साम्राज्य में स्वर्ण का उत्पादन घट गया। इस कारण रोमन-मुद्राओं में सोने की मात्रा कम कर दी गई जिससे रोमन-मुद्रा का मूल्य कम हो गया। एक तरफ राज्य की सीमाएं, राज्य का राजस्व तथा राज्य का स्वर्ण-उत्पादन घट रहा था किंतु दूसरी तरफ विशाल सैन्य-व्यय अब भी बना हुआ था तथा इटली में विशाल भवनों के निर्माण का काम रुकने का नाम नहीं ले रहा था।

इस कारण रोमन सम्राटों का कोष तेजी से रीतने लगा। ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियों में रोमनवासी सिविल इंजीनियरिंग की दृष्टि से महान् इंजीनियर थे तथा विशाल भवनों का निर्माण करने के अभ्यस्त थे। धनी लोगों की आय का अधिकतर भाग इसी काम पर खर्च होता रहा तथा अन्य प्रकार के उद्योग-धंधे उपेक्षित कर दिए गए। इस कारण राजाओं के लिए राजस्व एवं कर संग्रहण के नए स्रोत विकसित नहीं हो सके।

ई.284 में जब डियोक्लेटियन रोम का राजा हुआ तो उसने साम्राज्य को चार महाप्रांतों में बांटकर दो ऑगस्टस एवं दो सीजर की व्यवस्था आरम्भ की तथा अगला शासक कॉन्स्टेंटीन अपनी राजधानी रोम से हटाकर बिजैन्तिया ले गया। इन निर्णयों ने रोमन साम्राज्य के विभाजन एवं पतन की गति को तेज कर दिया। सम्राट कॉन्स्टेंटीन पेगन धर्म को मानता था।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार उसे मृत्यु-शैय्या पर जबर्दस्ती ईसाई बनाया गया था। इसके बाद ईसाई धर्म को राजकीय धर्म के रूप में मान्यता दी गई। ईसाई धर्म ने राजा के देवता होने और दैवीय शक्तियों से सम्पन्न होने आदि मान्यताओं को अस्वीकार कर दिया। इस कारण लोगों में राजा के प्रति आस्था और भी कम हो गई।

पश्चिमी रोमन साम्राज्य के लोग लैटिन भाषा बोलते थे और कैथोलिक ईसाई हो गए थे जबकि पूर्वी साम्राज्य की भाषा ग्रीक थी और वे पूर्वी ऑर्थोडॉक्स चर्च के अनुयाई हो गए थे। इसलिए साम्राज्य के दोनों भागों में दूरियां बढ़ती चली गईं। रोमन साम्राज्य के पश्चिमी भाग के पतन के बाद, पूर्वी रोमन साम्राज्य, सैकड़ों वर्षों तक बैजेन्टाइन साम्राज्य के रूप में अस्तित्व में रहा।

इसलिए महान् रोमन साम्राज्य का पतन वास्तव में साम्राज्य के पश्चिमी आधे हिस्से का विदेशी शक्तियों के हाथों में चले जाने की घटना को दर्शाता है। शेष रोमन साम्राज्य अब बैजेन्टाइन एम्पायर के रूप में जीवित था। वह भी स्वयं को रोमन साम्राज्य कहता था तथा स्वयं को उसी प्रकार महान् मानता था जिस प्रकार किसी समय अखण्ड रोमन साम्राज्य स्वयं को महान् रोमन साम्राज्य कहता था और रोम को दुनिया की स्वामिनी कहता था।

रोमन साम्राज्य के महान् होने का भ्रम

रोमवासियों द्वारा रोम को ‘संसार की स्वामिनी’ माना जाता था। रोम के लोग मानते थे कि सम्पूर्ण विश्व रोम के सीजर के अधीन है। रोमन साम्राज्य इतना बड़ा था कि राजधानी रोम के लोग मानते थे कि एक समय में दुनिया का एक ही ‘एम्परर’ हो सकता है। इसी कारण रोमन साम्राज्य को महान् रोमन साम्राज्य कहा जाता था। जबकि वास्तविकता यह थी कि रोमन साम्राज्य भूमध्यसागर के किनारों के देशों तक ही सीमित था। पूर्व दिशा में इसकी सीमा ईराक से आगे कभी नहीं बढ़ी।

रोमन साम्राज्य के काल में तथा उससे भी सैंकड़ों साल पहले से चीन और भारत में विशाल साम्राज्य स्थापित होते रहे थे जो रोमन साम्राज्य से कहीं अधिक सुसंस्कृत, शक्तिशाली एवं बड़े थे किंतु पश्चिमी दुनिया के लोग पूर्व की दुनिया के साम्राज्यों, लोगों एवं उनकी संस्कृतियों से अनभिज्ञ थे। उनके लिए संसार वहीं तक सीमित था, जहाँ तक रोमन साम्राज्य का विस्तार था।

रोम के शासकों में ‘संसार का स्वामी होने की भावना’ अहंकार के रूप में व्याप्त थी। उनका मानना था कि वे पूरे संसार पर राज्य कर रहे हैं। इसलिए वे अजेय हैं। जब कभी रोमन साम्राज्य के पतन के लक्षण उत्पन्न होते तो यही अहंकार उन्हें अत्यधिक क्रियाशील बना देता था और उन्हें नष्ट होने से बचा लेता था। यहाँ तक कि जब रोम साम्राज्य नष्ट हो गया तथा उसकी छाया ही कुछ रूपों में रोमन साम्राज्य के होने का आभास कराती रही, तब भी रोम यही समझता रहा कि वह पूरी दुनिया पर शासन कर रहा है।

इस काल में रोमन व्यापारियों का भारत के साथ तटीय-व्यापार अपने चरम पर था। पश्चिमी भारत में इस समय कुषाणों का शासन था। एक कुषाण शासक ने रोम के पहले सम्राट ऑगस्टस सीजर के दरबार में अपना राजदूत मण्डल भेजा था। इन दोनों देशों में स्थल-मार्ग एवं जल-मार्ग से व्यापार होता था।

भारत से रोम को इत्र, चंदन, रेशम, विभिन्न प्रकार के मसाले, मलमल, जरी के कपड़े, कीमख्वाब तथा जवाहरात भेजे जाते थे। इसके बदले में रोम का सोना भारत आता था। प्लिनी नामक एक रोमन लेखक के अनुसार इस काल में रोम भारत से प्रतिवर्ष 10 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं की विलासिता की सामग्री खरीदता था।

क्या रोमन साम्राज्य वास्तव में महान् था? रोम का यह दावा उस समय धराशायी होने लगता है जब हम देखते हैं कि महान् कहे जाने वाले रोमन साम्राज्य में एक के बाद एक करके तिनकों की तरह राजा अवतरित होते थे और शीघ्र ही अपनी अंग-रक्षक सेना द्वारा, या जन-सामान्य की भीड़ द्वारा या सीनेट के सदस्यों द्वारा या रोमन गवर्नरों द्वारा मौत के घाट उतार दिए जाते थे। ई.पू.27 से लेकर ई.455 तक सम्राटों की हत्याओं का यह सिलसिला तब तक जारी रहा, जब तक कि रोम की महानता का दावा पूरी तरह धरती पर नहीं आ गिरा।

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अपनी पुस्तक विश्व इतिहास की झलक में रोमन साम्राज्य के ध्वस्त होने पर टिप्पणी करते हुए लिखा है-

‘बहुत लम्बे समय तक रोम का रौब ही उसकी ताकत थी। उसके पुराने इतिहास से प्रभावित होकर लोग उसे सारी दुनिया का शासक समझने लगे थे और उसकी इज्जत करते रहे थे। रोम का डर करीब-करीब अंध-विश्वास बन गया था। इस तरह रोम प्रकट रूप में शक्तिशाली साम्राज्य का स्वामी बना रहा किंतु वास्तव में उसके पीछे कोई शक्ति नहीं थी। बाहर से शांति थी और उसके नाटकघरों में, बाजारों में और अखाड़ों में मनुष्यों की भीड़ लगी रहती थी किंतु वह निश्चित रूप से पतन की ओर जा रहा था। सिर्फ इसलिए नहीं कि वह कमजोर था, अपितु इसलिए भी कि उसने जनता की गुलामी और संकटों की नींव पर धनिकों की सभ्यता का महल खड़ा किया था।’

 रोम के पतन के साथ ही अमीरों की तड़क-भड़क और विलासिता का भी अंत हो गया। रोम का विनाश इतनी भयावह विधि से हुआ था कि उनके द्वारा सदियों से संचित ज्ञान भी नष्ट हो गया। इस समय जर्मन जाति ‘गोथ’, ‘विसिगोथ’ एवं ‘वाण्डाल’ कबीलों के रूप में तथा फ्रैंच जाति ‘फ्रैंक’ कबीले के रूप में अर्धसभ्य एवं लड़ाकू समूहों की स्थितियों में जी रही थीं। रोम जैसी महान् सभ्यता के नष्ट हो जाने के बाद इन्हें अब अपने बल पर सभ्यता की सीढ़ियां चढ़नी थीं।

रोम के पतन से यूरोप में अंधकार युग का आगमन

यद्यपि जवाहर लाल नेहरू ने रोमन साम्राज्य के अंत को साम्राज्य का ध्वंस न मानकर ‘रोम’ नगर का ध्वंस माना है क्योंकि रोमन साम्राज्य तो कुस्तुंतुनिया के नेतृत्व में तब भी जीवित था तथापि यह रोमन साम्राज्य के ध्वंस से भी बड़ी घटना थी। ‘रोम’ जैसी रहस्यमय एवं अद्भुत शक्ति का उत्तरी यूरोप की बर्बर जातियों के हाथों पतन होना, निश्चित ही समूचे यूरोप, समूचे प्राचीन रोमन धर्म एवं समूचे ईसाई धर्म के लिए एक बड़ी राजनीतिक एवं सांस्कृतिक घटना थी।

क्योंकि  रोम और यूनान के प्राचीन दार्शनिकों के चिंतन से बनी वह पुरानी दुनिया लगभग पूरी ही नष्ट हो गई थी। इन अर्थों में यह एक महान् युग का अंत था। कहा जा सकता है कि जो सभ्यता एक हजार साल से भी अधिक समय में अंकुरित, पल्लवित एवं पुष्पित हुई थी, अचानक ही पककर मुरझा गई थी।

यह एक आश्चर्य की बात थी कि रोम वासियों द्वारा धर्म, दर्शन, अध्यात्म, चिकित्सा एवं अन्य विषयों के सम्बन्ध में जो ज्ञान अर्जित किया गया था, वह भी काल के गाल में समा गया। यद्यपि यूरोप के बहुत से देशों में रोम का संचित ज्ञान फुटकर रूप में याद रखा गया और आगे बढ़ाया गया किंतु उसका अधिकांश हिस्सा भुला दिया गया। निष्कर्ष रूप में यह निर्विावाद रूप से कहा जा सकता है कि रोमन साम्राज्य के पतन के बाद यूरोप में अंधकार का युग लौट आया।

रोम के पतन में ईसाई धर्म की भूमिका

बहुत से आलोचकों का मानना है कि रोमन साम्राज्य के पतन एवं यूरोप में अंधकार के युग के आगमन का कारण ईसाई धर्म था। अब यह वह धर्म नहीं रहा था जिसका प्रचार ईसा मसीह ने अथवा सेंट पीटर आदि शिष्यों ने अथवा प्रथम शताब्दी ईस्वी के ईसाई संत पॉल ने किया था अपितु यह राजकीय ईसाइयत थी जो एम्परर कॉन्स्टेन्टीन के ईसाइयत स्वीकार कर लिए जाने के बाद पश्चिम में फैली थी।

चौथी शताब्दी ईस्वी में सम्राट कॉन्स्टेन्टीन के ईसाइयत स्वीकार कर लेने के बाद यूरोप में एक हजार वर्ष का एक ऐसा युग आरम्भ हुआ जिसमें  मनुष्य के ‘विवेक’ को जंजीरों में जकड़ दिया गया तथा ‘विचार’ को गुलाम बना दिया गया।

 इस कारण इस काल में ज्ञान और विज्ञान ने कोई उन्नति नहीं की। ईसाइयत में पनपी इस प्रवृत्ति के कारण न केवल अत्याचार, कट्टरपन एवं असहिष्णुता ने ही जोर पकड़ा अपितु इससे लोगों के लिए विज्ञान और बहुत सी बातों में आगे बढ़ना कठिन हो गया।

इस युग में मनुष्य का चिंतन एवं विज्ञान जब भी ऐसी बातें कहने का प्रयास करते थे जो बाइबिल में लिखी बातों से अलग होती थीं तो धर्म एवं विज्ञान में संघर्ष उत्पन्न हो जाता था जिसमें प्रायः विज्ञान की पराजय हो जाती और धर्म जीत जाता। इस कारण कुछ लोग यूरोप में अंधकार छा जाने के लिए ईसाइयत को दोषी ठहराने लगते हैं।

जबकि कुछ अन्य लोगों का मानना है कि उस अन्धकार युग में ज्ञान के दीपक को जलाए रखने वाले ईसाइयत और ईसाई पादरी तथा पुजारी ही थे। उन्होंने कला और चित्रकारी को जीवित रखा, अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुस्तकों को सुरक्षित रखा और उनकी प्रतिलिपियां तैयार कीं।

वस्तुतः यूरोप में अंधकार के युग के आगमन के लिए ईसाइयत को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा, इसके लिए तो रोम की वह प्राचीन विलासिता पूर्ण संस्कृति ही जिम्मेदार थी जिसने नवीन ज्ञान उत्पन्न होने के सारे मार्ग अवरुद्ध करके भोग-विलास को ही जीवन का एकमात्र सत्य मान लिया था!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

द्वितीय रोमन साम्राज्य (20)

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द्वितीय रोमन साम्राज्य

फ्रैंक कबीले ने ऑस्ट्रोगोथों को रोम से बाहर निकला दिया। पोप ने फ्रैंक सरदार क्लोविस को रोम का शासक स्वीकार कर लिया। इसी के साथ रोम में द्वितीय रोमन साम्राज्य की स्थापना हो गई।

इटली का बिखराव

ई.493 में पूर्वी रोमन साम्राज्य के सम्राट जेनो के आदेश से उसके सामंत  थियोडोरिक ने इटली पर आक्रमण किया था तथा रोम के शासक ओडोवेकर को मारकर स्वयं रोम का शासक बन गया था। थियोडोरिक जर्मनी के ऑस्ट्रोगोथ कबीले का मुखिया था किंतु रोमन सम्राट जेनो का विश्वसनीय माना जाता था।

यद्यपि थियोडोरिक को रोम पर अधिकार करने के आदेश स्वयं रोमन सम्राट ने दिए थे तथापि इटली के धनी-सामंत एक गैर-रोमन-रक्तवंशी को अपना शासक मानने के लिए तैयार नहीं हुए और स्थान-स्थान पर विद्रोह हो गए। इस कारण इटली के बिखराव की प्रक्रिया बहुत तेजी से घटित हुई।

अगले लगभग एक हजार वर्षों तक इटली छोटे-छोटे नगर-राज्यों के रूप में बिखरा रहा और विभिन्न विदेशी शक्तियों के अधीन चला गया। इटली के कुछ भागों पर स्पेन का अधिकार हो गया, कुछ पर ऑस्ट्रिया का तथा कुछ भागों पर फ्रांस का अधिकार हो गया किन्तु ‘होली सी’ अर्थात् वेटिकन सिटी का रोम पर नियन्त्रण बना रहा।

नए रोमन साम्राज्य का उदय

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ऑस्ट्रोगोथ कबीला तथा उसका राजा ईसाई ही था किंतु वह ईसाइयों के ‘यूरोपीय एरियन’ सम्प्रदाय से सम्बन्ध रखता था जिसे रोम का पोप ईसाई धर्म के अंतर्गत नहीं मानता था। इसलिए पोप गोथ राजवंश को हटाकर कोई ऐसा राजवंश लाना चाहता था जो कैथोलिक ईसाई धर्म का अनुसरण करे। जब गोथ कबीले को रोम पर शासन करते हुए कुछ पीढ़ियां बीत गईं तो रोम के पोप ने दूसरे बर्बर कबीले के राजा क्लोविस से मदद मांगी। क्लोविस भी कैथोलिक ईसाई सम्प्रदाय का नहीं था। वह ईसाइयों के ‘अरियासवाद सम्प्रदाय’ का अनुयाई था किंतु पोप के कहने से उसने कैथोलिक सम्प्रदाय स्वीकार कर लिया। राजा क्लोविस का कबीला मूलतः उत्तरी यूरोप में रहने वाला एक जर्मन कबीला था जो फ्रैंक कहलाता था। फ्रैंक कबीले ने ऑस्ट्रोगोथों को रोम से बाहर निकला दिया। पोप ने फ्रैंक सरदार क्लोविस को रोम का शासक स्वीकार कर लिया। इसी के साथ रोम में एक नवीन रोमन साम्राज्य की स्थापना हो गई। इसे भी ‘रोमन साम्राज्य’ कहा गया। इस नए राज्य का यद्यपि पुराने रोमन साम्राज्य से काई सम्बन्ध नहीं था किंतु इस नए राज्य को पुराने राज्य का ही सिलसिला तथा द्वितीय रोमन साम्राज्य माना गया। इस नए राजवंश के राजाओं ने भी इम्परेटर, सीजर और ऑगस्ट जैसी प्राचीन रोमन उपाधियां धारण कीं।

रोम पर उत्तरी यूरोप के बर्बर कबीलों के सरदारों का कई पीढ़ियों तक अधिकार एवं शासन रहा किंतु वे भी प्रायः कुस्तुंतुनिया के ‘एम्परर’ को स्वामी मानते रहे। वास्तव में नया रोमन साम्राज्य, पुराने रोमन साम्राज्य की छाया मात्र ही था।

प्राचीन रोमन साम्राज्य की छाया या उसका भूत!

प्राचीन महान् रोमन साम्राज्य के दर्दनाक विध्वंस के बाद भी न तो रोमवासियों के घमण्ड में कोई कमी आई और न उसकी महानता का नशा यूरोप के दिमाग से उतरा। पं. नेहरू ने लिखा है- ‘रोम के पतन के बाद भी यूरोप रोम की ही भाषा में बोलता रहा किन्तु उसके पीछे जो भाव और अर्थ थे, वे बदल गए थे। रोम का भूत, रोम के पतन के लगभग चौदह सौ साल बाद तक यूरोप के अस्तित्व पर मण्डराता रहा।’

लोम्बार्डी राजाओं का रोम पर शासन

ई.565 में लोम्बार्डी वंश के सरदार एलबोइन ने रोम से फ्रैंक राजाओं को निकाल बाहर किया तथा रोम में लोम्बार्डी राजवंश की स्थापना की। लोम्बार्डी शासक किसी एक वंश से सम्बन्धित नहीं थे। वे अलग-अलग परिवारों के लोग थे जो एक के बाद एक इटली एवं रोम के शासक बनते चले गए। ई.565 से ई.774 तक इस वंश में 24 राजा हुए। ये लोग पोप की कृपा से राजा नहीं बने थे इसलिए पोप एवं लोम्बार्डी राजाओं के सम्बन्ध अच्छे नहीं रहे।

पोप और लोम्बार्डी शासकों में झगड़ा

जूलिसय सीजर के समय से ही रोम के राजा को देवता मान लिया गया था तथा उसे धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि स्वीकार कर लिया गया था किंतु ईसाई धर्म, राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि नहीं मानता था। जब से रोम के कैथोलिक चर्च का बिशप पोप के रूप में प्रभावशाली हुआ था तथा प्राचीन रोमन साम्राज्य के राजाओं का सिलसिला समाप्त हुआ था, तब से पोप भी स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि कहने लगा था।

इस अधिकार से पोप और एम्परर दोनों बराबर हो गए थे किंतु इन दोनों में कौन बड़ा है, इस बात को लेकर पोप एवं एम्परर के बीच शीत-युद्ध की स्थिति पैदा हो गई। समय के साथ यह विवाद बढ़ता ही चला गया। ई.727 में पोप ग्रिगोरी (द्वितीय) ने पूर्वी रोमन साम्राज्य के सम्राट लियो (तृतीय) द्वारा जारी किए गए आदेशों को मानने से मना कर दिया। इस पर सम्राट ने रोम के विरुद्ध सेना भेजी तथा रोम पर अधिकार कर लिया। पोप को सम्राट के आदेश मानने पड़े तथा उसके बाद पोप ग्रिगोरी (द्वितीय) ने सम्राट का विरोध नहीं किया।

ई.730 में रोम के स्थानीय लोम्बार्ड शासक ने पोप को अपने संकेतों पर चलाना चाहा किंतु पोप ने उसके आदेश मानने से मना कर दिया। इस पर लोम्बार्ड शासक ने रोम तथा वेटिकन सिटी में बड़ी मार-काट मचाई। यद्यपि पोप अपने महल की ऊंची दीवारों के बीच सुरक्षित रह गया तथा इस कार्य में उसे कुस्तुंतुनिया की सेना से भी कुछ सहायता मिली तथापि पोप लोम्बार्डियों के विरुद्ध कुछ अधिक नहीं कर सका। ई.739 में ग्रिगोरी (तृतीय) ने फ्रैंक शासक चार्ल्स मार्ते से सहायता मांगी।

पापल स्टेट का उदय

ई.754 में पोप स्टीफन (द्वितीय) फ्रांस गया। उसने फ्रैंक कबीले के सबसे युवा राजा पीपीन (प्रथम) को ‘पैट्रीसियस रोमानोरम’ अर्थात् ‘रोम का संरक्षक’ की उपाधि दी। अगस्त 1754 में राजा पीपीन (प्रथम) तथा पोप स्टीफन (द्वितीय) ने एल्प्स पर्वत को पार करके पाविया नामक स्थान पर लोम्बार्ड शासक एस्टुल्फ को परास्त कर दिया। लोम्बार्ड शासक ने वचन दिया कि अब वह रोम में हस्तक्षेप नहीं करेगा तथा रोम का क्षेत्र पोप को सौंप देगा जिसका शासन पोप के ही अधीन होगा।

इस संधि के बाद पीपीन पुनः अपने राज्य को लौट गया और पोप रोम चला आया किंतु लोम्बार्ड शासक ने अपने किसी भी वचन का पालन नहीं किया तथा ई.756 में उसने रोम को घेर लिया। पूरे 56 दिन तक यह घेरा चला किंतु जब उसने सुना कि फ्रैंक राजा पीपीन अपनी सेना लेकर आ रहा है तो लोम्बार्ड शासक एस्टुल्फ रोम से घेरा उठाकर चला गया।

उसने रोम तथा उसके आसपास के कुछ क्षेत्र पोप को प्रदान कर दिए जो पोप के प्रत्यक्ष शासित क्षेत्र हो गए। इस प्रकार ‘पापल स्टेट’ (धार्मिक राज्य अथवा पवित्र राज्य) का उदय हुआ। इससे पहले पोप केवल कैथोलिक चर्च का बिशप मात्र था किंतु अब वह स्वयं एक छोटे से राज्य का राजा बन गया।

लोम्बार्डियों की सत्ता का समापन

ई.771 में नए लोम्बार्ड शासक डेसीडेरियस ने कैथोलिक चर्च की तीर्थयात्रा करने के बहाने रोम को जीतने तथा पोप स्टीफन (तृतीय) को पकड़ने की एक योजना बनाई तथा वह अपने कुछ सैनिकों सहित वेटिकन में घुस गया। उसका मुख्य सहायक पौलुस एफिआर्ता पहले से ही लोम्बार्डियों की एक टुकड़ी सहित रोम में उपस्थित था।

डेसीडेरियस ने रोम को अपने अधिकार में ले लिया किंतु वह पोप को नहीं पकड़ सका। लोम्बार्डियों की इस कुचेष्टा ने फ्रैंक राजा शार्लमैन को कुपित कर दिया जो अपने पिता पीपीन (प्रथम) के स्थान पर फ्रांस का शासक बना था।

इस राजा को यूरोप के इतिहास में ‘चार्ल्स महान्’ भी कहा जाता है। ई.772 में स्टीफन (तृतीय) के स्थान पर हैड्रियन (प्रथम) पोप हुआ। उसने फ्रैंक शासक शार्लमैन को सहायता के लिए बुलाया। ई.773 में शार्लमैन के तृतीय पुत्र पीपीन (द्वितीय) ने लोम्बार्ड राजा डेसीडेरियस को परास्त कर दिया। डेसीडेरियस के अंत के साथ ही रोम से लोम्बार्डियों की सत्ता समाप्त हो गई तथा रोम में नए युग की शुरुआत हुई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पवित्र रोमन साम्राज्य का प्रथम संस्करण (21)

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पवित्र रोमन साम्राज्य का प्रथम संस्करण

पच्चीस दिसम्बर 800 के दिन सेंट पीटर्स बेसिलिका में फ्रैंक राजा शार्लमैन का पापल कोरोनेशन किया गया अर्थात् उसे पवित्र रोमन ताज पहनाया गया तथा उसे ऑगस्टस ऑफ रोमन्स की उपाधि दी गई। इसके साथ ही रोम में  पवित्र रोमन साम्राज्य की स्थापना हो गई।

फ्रैंक राजा शार्लमैन द्वारा पोप का अपमान

ई.772 में पोप एड्रियन (प्रथम) के निमंत्रण पर रोम से लोम्बार्डियों की सत्ता समाप्त करने वाला फ्रैंक शासक शार्लमैन एक शक्तिशाली राजा था। इसलिए उसे रोम में अपना दबदबा स्थापित करने में कोई कठिनाई नहीं हुई। पोप ने सोचा था कि लोम्बार्डियों से मुक्ति मिल जाने के बाद पोप ही रोम का असली एवं एकमात्र शासक होगा किंतु शार्लमैन ने पोप की यह इच्छा पूरी नहीं की तथा उसने कुछ ही समय बाद पोप पर अपना दबदबा स्थापित कर लिया।

शार्लमैन को यह शक्ति उसके साम्राज्य के वैराट्य से मिलती थी। उसके साम्राज्य में केवल फ्रांन्स और रोम ही नहीं थे, अपितु नीदरलैण्ड, स्वीजरलैण्ड, आधी जर्मनी और आधा इटली भी उसके साम्राज्य का अंग थे। पोप को दबाने के बाद शार्लमैन स्वेच्छाचारी हो गया जिससे रोम में स्थितियाँ पहले से भी अधिक खराब हो गईं।

पोप के साथ अभद्रता

एक आयातित सम्राट ने पहले से ही बर्बाद रोम की रही-सही शांति भी छीन ली। रोम में सम्राट के मुंह-लगे स्त्री-पुरुषों का एक झुण्ड तैयार हो गया जो पोप से अभद्रता करता था और एक पोप को हटाकर किसी दूसरे पादरी या बिशप को पोप बना देता था। उस काल में ईसाई पादरी भी सामंत व्यवस्था के अंग हो गए थे। वे धर्म-पुरोहित और सामन्ती-सरदार दोनों थे। अतः इस युग में सामंतवाद चर्च और पोप दोनों पर हावी हो गया।

साम्राज्य की आधी धरती और सम्पत्ति बिशपों, एबेटों, कार्डिनलों एवं सामान्य पादरियों के हाथों में चली गई थी। इस युग का पोप स्वयं एक बड़ा सामंती-सरदार था। इसलिए शार्लमैन ने उसे आसानी से दबा लिया।

पीपीन (द्वितीय) को राज्याधिकार

शार्लमैन ने ई.781 में अपने तीसरे पुत्र पीपीन को रोम का शासक नियुक्त किया। पोप पहले से ही शार्लमैन से छुटकारा पाने की सोच रहा था। पोप ने ई.781 में रोम में आयोजित एक भव्य समारोह में पीपीन (द्वितीय) को ताज पहनाया। इसके बाद शार्लमैन ने इटली में अपनी शक्ति का तेजी से विस्तार किया।

उसने इटली के अन्य क्षेत्रों से भी लोम्बार्डियों का सफाया कर दिया। ई.782 तक शार्लमैन पश्चिमी यूरोप के राजाओं में सबसे ताकतवर ईसाई शासक हो गया था। इस काल में रोम, फ्रांस साम्राज्य का एक छोटा सा प्रांत मात्र बन गया था।

पोप लियो (तृतीय) का रोम से पलायन

26 दिसम्बर 795 को लियो (तृतीय) ‘पापल स्टेट ऑफ वेटिकन’ का राजा और रोम के कैथोलिक चर्च का पोप हुआ। वह रोम में फ्रांस के राजा शार्लमैन के हस्तक्षेप को पसंद नहीं करता था। शार्लमैन भी इस बात को समझ गया। उसने पोप को रास्ते पर लाने का एक उपाय सोचा।

25 अप्रेल 799 को पोप लियो (तृतीय) ने लैटेरन से लूसियाना स्थित सान लॉरेंजो चर्च तथा विया फ्लेमिनिया तक  परम्परागत जुलूस निकाला। इस जुलूस में, रोम के पूर्ववर्ती पोप एड्रियन के दो शिष्यों ने पोप लियो (तृतीय) पर प्राणघातक हमला किया क्योंकि वे पोप द्वारा सम्राट शार्लमैन के प्रति अपनाई जा रही नीति को पसंद नहीं करते थे।

एड्रियन के ये दोनों शिष्य रोम के शक्तिशाली सामंत थे तथा सम्राट शार्लमैन के विश्वस्त थे। इस हमले में पोप लियो (तृतीय) बुरी तरह घायल हो गया किंतु किसी तरह जान बचाकर फ्रांस भाग गया ताकि फ्रैंक-शासक शार्लमैन से सहायता ली जा सके। शार्लमैन यही चाहता था।

पोप की रोम में वापसी

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नवम्बर 800 में शार्लमैन ने विशाल सेना के साथ रोम में प्रवेश किया। रोम में उसे रोकने वाला कोई नहीं था। उसका पुत्र रोम का शासक था। शार्लमैन के साथ बड़ी संख्या में फ्रैंच बिशप भी थे। पोप लियो (तृतीय) भी इन बिशपों के साथ रोम आ गया। शार्लमैन ने रोम में एक दरबार का आयोजन करके पोप लियो (तृतीय) तथा उसके हमलावरों के बीच हुए विवाद को मुकदमे के रूप में सुना। ऐसा करके वह इस बात का प्रदर्शन करना चाहता था कि सम्राट को पोप के खिलाफ भी उसी तरह मुकदमे सुनने और सजा देने का अधिकार है, जिस तरह वह अन्य लोगों को देता है। रोम के लोगों को विश्वास था कि इस मुकदमे के बाद पोप को हटा दिया जाएगा तथा दोनों सामंतों को दोष-मुक्त कर दिया जाएगा किंतु रोमवासियों तथा यूरोप के अन्य देशों के कैथोलिक ईसाइयों को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि मुकदमे की सुनवाई पूरी करने के बाद राजा शार्लमैन ने निर्णय दिया कि लियो (तृतीय) रोम के वैधानिक पोप हैं तथा रोम के सामंतों को उन पर हमला करने का कोई अधिकार नहीं है। शार्लमैन ने हमलावर सामंतों को रोम से निष्कासित कर दिया। इतिहासकारों का मानना है कि यह न्यायिक प्रक्रिया पोप तथा राजा के बीच एक पूर्व निर्धारित सौदेबाजी थी जिसमें पोप को चर्च प्राप्त हो गया और शार्लमैन को रोम पर शासन करने का अबाध अधिकार।

अब रोम शार्लमैन की शक्ति को नमन् करने के लिए पूरी तरह तैयार था।

पवित्र रोमन सम्राट की ताजपोशी

25 दिसम्बर 800 के दिन सेंट पीटर्स बेसिलिका में फ्रैंक राजा शार्लमैन का ‘पापल कोरोनेशन’ किया गया अर्थात् उसे ‘पवित्र रोमन ताज’ पहनाया गया तथा उसे ‘ऑगस्टस ऑफ रोमन्स’ की उपाधि दी गई। इसके साथ ही रोम में  ‘होली रोमन एम्पायर’ (Sacrum Imperium Romanum) की स्थापना हो गई। यह पवित्र रोमन साम्राज्य का प्रथम संस्करण था जो ई.888 तक चलता रहा।

सुप्रसिद्ध विचारक वॉल्टेयर ने पवित्र रोमन साम्राज्य को परिभाषित करते हुए लिखा है- ‘यह एक ऐसी चीज थी जो न पवित्र थी, न रोमन थी और न साम्राज्य थी।’

रोम का बगदाद की तरफ दोस्ती का हाथ

फ्रैंक राजा शार्लमैन ने कुस्तुंतुनिया से रोम का सम्बन्ध पूरी तरह तोड़ दिया। इस पर कुस्तुंतुनिया के सम्राट ने शार्लमैन को युद्ध की धमकी दी। शार्लमैन ने बगदाद के खलीफा हारून रशीद की सहायता से कुस्तुंतुनिया के पूर्वी रोमन साम्राज्य को नष्ट करने की एक योजना तैयार की। इस योजना में रोम और बगदाद मिलकर रोम के शत्रु कुस्तुंतुनिया से और बगदाद के शत्रु स्पेन के सरासीनों से युद्ध करने का प्रस्ताव था।

यह एक ऐसा प्रस्ताव था जो उस युग से लेकर आज तक के किसी भी युग में स्वीकार्य नहीं हो सकता था जिसमें कुछ ईसाइयों और मुसलमानों को मिलकर दूसरे ईसाइयों एवं मुसलमानों से लड़ने का प्रस्ताव किया गया था। रोम और बगदाद को जोड़ने के लिए जिस प्रबल योजक तत्व की आवश्यकता थी, वह इस प्रस्ताव में उपलब्ध नहीं था।

दो देशों के मुसलमान शासक मिलकर दो देशों के ईसाई शासकों के विरुद्ध तो लड़ सकते थे किंतु एक ईसाई और एक मुसलमान देश मिलकर दूसरे ईसाई और दूसरे मुसलमान देश से नहीं लड़ सकते थे। इसलिए यह योजना विफल हो गई।

शार्लमैन के वंशज

शार्लमैन का पुत्र पीपीन (द्वितीय) ई.810 तक रोम पर शासन करता रहा। उसके बाद बर्नार्ड को रोम का शासक बनाया गया जिसने ई.818 तक रोम पर शासन किया। ई.814 में सम्राट शार्लमैन की मृत्यु हो गई तथा उसके वंशजों में साम्राज्य के बंटवारे के लिए झगड़े खड़े हो गए। उसके वंशज ‘कार्लोविजियन’ कहलाते थे। यह लैटिन भाषा का शब्द है, जिसका आशय ‘चार्ल्स के वंशजों’ से है। उसके तीन वंशजों में से एक मोटा, एक गंजा और एक दीनदार कहलाता था।

ई.818-39 तक लोथियर तथा ई.839-75 तक लुईस (द्वितीय) शासन करता रहा। इन्हें ‘पापल एम्परर’ कहा जाता था। यह उपाधि ई.888 तक शार्लमैन के वंशजों के पास रही। इसके बाद शार्लमैन के वंशजों का रोम एवं इटली से पूरी तरह सफाया हो गया। उनके समापन के साथ ही ‘पवित्र रोमन साम्राज्य’ के प्रथम संस्करण का अंत हो गया।

रोम में अराजकता

ई.888में शार्लमैन के वंशजों में राज्य के अधिकार को लेकर संघर्ष  छिड़ गया। इस कारण पोप द्वारा किसी भी राजा को ‘पापल एम्पपर’ की उपाधि नहीं दी गई। इटली की सड़कों पर गृहयुद्ध छिड़ गया। नागरिक एवं समंतों के समूह अपनी-अपनी पसंद के व्यक्ति को रोम का राजा बनाना चाहते थे। इस कारण रोम में शासन व्यवस्था पूरी तरह नष्ट हो गई तथा लगभग सम्पूर्ण इटली में अराजकता व्याप्त हो गई।

कैथोलिक चर्च पर रोम के धनी-सामंतों का बोलबाला था। उनमें से अधिकतर धार्मिक वृत्ति के लोग नहीं थे, वे राजनीतिक लोग थे तथा पद एवं सत्ता के लिए किसी के प्राण लेना उनके लिए साधारण बात थी। इसलिए एक पोप की ताजपोशी होते ही दूसरा व्यक्ति उसे हटाकर स्वयं को पोप बनाने में लग जाता था। इस कारण बहुत सी हत्याएं होती थीं तथा अन्य जघन्य अपराध भी कारित हो जाते थे।

ई.897 में रोम की भीड़ ने कब्र में से स्वर्गीय पोप फोरमोसस के शव को बाहर निकाला तथा फोरमोसस द्वारा की गई बेइमानियों के लिए उसके शव के विरुद्ध पोप स्टीफन (षष्ठम्) के न्यायालय में मुकदमा चलाया। ई.924 में रोम के सिंहासन का अंतिम दावेदार बेरेन्जर (प्रथम) भी मर गया गया। अराजकता की यह स्थिति ई.962 तक चलती रही। रोम में एक के बाद एक कई सामंतों ने राज्य पर अधिकार करना चाहा किंतु वे सभी एक-एक करके मारे गए।

दुनिया की स्वामिनी बन गई रास्ते की भिखारिन

इस काल में मगयार कबीले की सेनाओं ने उत्तरी इटली पर आक्रमण कर उसके उपजाऊ प्रदेशों को वीरान बना दिया। मगयारों के आक्रमणों के बाद इटली पर निरंतर उत्तर से जनजातीय कबीलों और दक्षिण से अरबों के आक्रमण होते रहे। इन आक्रमणों के कारण रोम की हालत इतनी खराब हो गई कि रोम सिमटकर एक गांव जैसा रह गया और रोम की शान समझे जाने वाले कोलोजियम में वन्य-पशुओं का बसेरा हो गया।

रोम को विगत एक सौ वर्षों से किसी शक्तिशाली राजा की आवश्यकता थी किंतु रोम वासियों का अहंकार किसी भी रोमन रक्तवंशी को इस कार्य में सफल नहीं होने देना चाहता था तथा विदेशी शासक इस जर्जर और निर्धन रोम में हाथ नहीं डालना चाहता था। संसार की स्वामिनी कही जाने वाली रोम नगरी, रास्ते की भिखारिन जैसी दिखाई देने लगी थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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