Thursday, February 22, 2024
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4. रोम में तीसरा दिन – 19 मई 2019

सवेरे ढाई बजे आंख खुली। भारत में इस समय छः बज रहे होंगे। मैं शौच से निवृत्त होकर फिर से सो गया। दुबारा नींद आने की कोई संभावना नहीं थी। फिर भी लेटा रहा। बाकी सब सदस्य भी भारतीय समय के अनुसार उठ गए। मधु और भानु ने सुबह की चाय के आयोजन के बाद, नाश्ते और भोजन का उपक्रम किया ताकि आज थोड़ी जल्दी निकल सकें और 10 बजे की बस पकड़ सकें।

आज रविवार था। प्रातः आठ बजे गिरजाघर से आती घण्टे की आवाज दूर-दूर तक हवा में फैल गई। हमने अनुमान लगाया कि यह अवश्य ही सेंट पीटर्स गिरिजाघर से आ रही होगी। सुबह का नाश्ता करके और दोपहर का भोजन लेकर प्रातः 10 बजने से पाँच मिनट पहले ही घर से निकल गए।

हम फिर बस चूके!

हम जब तक अपनी बिल्डिंग के बाहर निकलकर सड़क पर आए, तब तक बस आ चुकी थी। हमें सड़क पार करके बस तक पहुँचना था किंतु सड़क पर तेज ट्रैफिक चल रहा था, रैडलाइट होने से पहले नहीं निकल सकते थे। हमारे देखते ही देखते बस निकल गई। उसे रोका नहीं जा सकता था। न चिल्लाकर, न हाथ के संकेत से। यह भारत नहीं था, यह तो हमें पता था किंतु अभी हमें इटली के हिसाब से चलना सीखने में कुछ समय लगने वाला था!

कल वाली बरसात फिर से चालू!

कुछ ही मिनटों में कल की तरह बरसात आरम्भ हो गई और कल की तरह हम फिर भीगने लगे। ऐसा लगता था कि जैसे शहर की बसें घड़ी देखकर चल रही हैं, वैसे ही बरसात भी घड़ी देखकर आरम्भ होती है। कल संग्रहालय में हुई आपा-धापी की मानसिक थकान में छतरी खरीदने का ध्यान नहीं रहा। मिस एंजिला ने अपने अपार्टमेंट में दो छतरियां रख रखी थीं, वे पर्यटकों के प्रयोग के लिए ही थीं किंतु आदत नहीं होने के कारण हम वे छतरियाँ भी नहीं ले पाए। पिताजी को बरसात में भीगने के बाद प्रायः बुखार आ जाता है किंतु अब भीगने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं था।

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रोम की सड़क व्यवस्था और बस-स्टॉप

यहाँ की ट्रैफिक व्यवस्था और बस-स्टॉप की स्थिति भारत से बिलकुल अलग है। सड़क के दोनों तरफ चौड़े फुटपाथ बने होते हैं तथा उनके बीच में स्थित मुख्य सड़क तीन भागों में बंटी हुई होती है। एक तरफ के किनारे का हिस्सा कार, साइकिल एवं दो-पहिया वाहनों के लिए किसी एक दिशा में जाने के लिए होता है तथा सड़क के दूसरी तरफ का हिस्सा कार, साइकिल एवं दो-पहिया वाहनों के लिए दूसरी अर्थात् विपरीत दिशा में जाने के लिए है।

बीच के चौड़े हिस्से के दोनों तरफ पुनः फुटपाथ जैसी जगह बनी होती है जिस पर बस स्टैण्ड बने होते हैं और यह हिस्सा बस एवं ट्राम के आने-जाने के लिए होता है। इस प्रकार जब हम बस स्टॉप पर खड़े होते हैं तो हमारे एक तरफ बसें तथा दूसरी तरफ कारें बड़ी तेजी से चल रही होती हैं और दोनों तरफ के वाहन बस-स्टॉप पर खड़े यात्रियों पर बरसात का पानी उछालते हुए चलते हैं। इस कारण हम न केवल बरसात में भीग रहे थे अपितु दोनों तरफ से आ रहे सड़क के पानी की बौछारों से भी भीग रहे थे।

मत पधारो म्हारे देस!

ऐसा लगता था मानो रोम के लोग विदेशी पर्यटकों को देखकर नाराज थे और अपने वाहनों से हम पर पानी की तेज बौछारें डालकर हमें संदेश दे रहे थे– ‘क्यों आए हो हमारे देश! शांति से जीने दो हमें, वापस चले जाओ।’

इटली के लोगों के चेहरों पर हमारे प्रति बेरुखी देखकर यह तो हमें कल ही अनुमान हो गया कि जिन लोगों की आजीविका पर्यटकों से चलती है, उन्हें छोड़कर यहाँ आम आदमी विदेशी पर्यटकों को देखकर प्रसन्न नहीं होता। ऐसा होना स्वाभाविक ही लगता था। यह सही है कि पर्यटकों के आगमन से नगर की आय बढ़ती है किंतु नागरिकों की शांति एवं सुरक्षा भी भंग होती है!

दीपा का खेल!

दीपा को हर ओर से आती पानी की बौछारें किसी रोचक खेल जैसी लगीं। अपने भीग जाने की चिंता से बेपरवाह, वह उस खेल का आनंद उठाने लगी। लगभग आधे घण्टे यही स्थिति रही। सौभाग्य से बस स्टॉप एक घने पेड़ के नीचे बना हुआ था, इसलिए उसकी थोड़ी-बहुत आड़ मिल गई।

नो टिकट!

अगली बस ठीक साढ़े दस बजे आ गई। मैंने फिर बस के ड्राइवर से टिकट मांगा और उसने कहा- ‘नो टिकट!’ मुझे यह सुनकर बहुत अच्छा लगा। मुझे उससे इसी उत्तर की आशा थी, क्योंकि आज रविवार था और मेरे हिसाब से आज के दिन विदेशी पर्यटकों से टिकट नहीं लिया जाना था।

वृद्धों का देश

इटली की जनसंख्या बहुत कम है, इटली के लोग बहुत शांति के साथ रहते हैं। उनके पास धन-सम्पत्ति की कोई कमी नहीं है। बहुत कम लोग ही वहाँ विवाह करते हैं, करते भी हैं तो अधिक बड़ी आयु में ताकि वे अधिक समय तक स्वतंत्रता पूर्वक जी कर देख सकें। उन्हें विवाह और परिवार जैसी पवित्र और आवश्यक संस्थाएं अनावश्यक एवं बन्धनकारी लगती हैं। यही कारण है कि यदि पर्यटकों को छोड़ दें तो रोम की सड़कों पर वृद्ध स्त्री-पुरुष अधिक दिखाई दे रहे थे।

जिस प्रकार भारत में बच्चों के झुण्ड स्कूल जाते और लौटते हुए दिखाई देते हैं, उस प्रकार के झुण्ड रोम में दिखाई नहीं दे रहे थे। जिस क्षेत्र में हम ठहरे हुए थे, वहाँ पाँच-छः मंजिल वाले इतने विशाल भवन थे कि उनमें से प्रत्येक के भीतर पचास से सौ की संख्या में फ्लैट बने हुए थे। उन फ्लैट्स की बालकनी से प्रायः वृद्ध महिलाएं झांकती हुई दिखाई देती थीं।

सड़कों पर भी जो वृद्ध महिलाएं सामान खरीदने निकलती थीं, वे अपने साथ एक छोटी और हल्की ट्रॉली रखती थीं ताकि उन्हें सामान उठाकर न चलना पड़े। युवा लोग वृद्धों को रास्ता देते हैं तथा तेजी से चलते हुए वाहन, सड़क पार कर रहे पैदल यात्री को रास्ता देते हैं। अधिकतर वृद्धों के पास कुत्ते होते हैं जिनका ‘मल’ उठाने के लिए उनके पास प्लास्टिक की थैलियां और खुरपी होती हैं।

बस का रूट डाइवर्ट

अभी बस दस मिनट ही चली होगी कि हमारी बस एक चौरोहे से वापस मुड़ गई। ड्राइवर ने इटैलियन भाषा में घोषणा की कि आज इस क्षेत्र में पर्यावरण चेतना सम्बन्धी रैली निकल रही है, इसलिए बस का रूट डाइवर्ट किया जा रहा है। हमने कुछ शब्दों के सहारे तथा बस से बाहर लड़के-लड़कियों के हाथों में लगी तख्तियों को देखकर यह समझ लिया कि बस का मार्ग बदला गया है, और इस कारण बदला गया है।

हमें आश्चर्य हुआ, जब हम अंग्रेजी भाषा के ज्ञान के सहारे इटैलियन भाषा में दिए गए संदेश को समझ सकते हैं तो यहाँ के लोग हमारे द्वारा अंग्रेजी में पूछी गई बात का जवाब क्यों नहीं दे पाते हैं। हमें वहीं उतर जाना पड़ा क्योंकि हमें अगले बस स्टॉप से दूसरी बस पकड़नी थी और वह स्थान गूगल पर बताई जा रही दिशा के अनुसार आगे की ओर ही पड़ता था तथा यहाँ से अधिक दूर भी नहीं था।

घटिया छतरी की खरीद!

बस से उतरते ही मुझे एक छतरी वाला दिखाई दिया। मैंने उससे एक छतरी खरीद ली। हालांकि मैं महसूस कर रहा था कि यह छतरी बहुत घटिया बनी हुई है तथा हवा के तेज झौंके को सहन नहीं कर पाएगी। फिर भी हमारे पास और कोई चारा नहीं था। कम से कम एक छतरी तो पिताजी के लिए लेनी ही थी क्योंकि बरसात अब भी हो रही थी।

छतरी वाले ने पाँच यूरो मांगे, मैंने ढाई यूरो में देने को कहा। छतरी वाला कुछ ना-नुकर के बाद तीन यूरो में बेचने को तैयार हो गया। दो सौ चालीस भारतीय रुपए में छतरी महंगी नहीं थी, यदि उसकी कमानियों में कुछ ताकत होती। भारत में इतनी नाजुक छतरी बिकती हुई मैंने कभी नहीं देखी थी। यह छतरी जरा सी तेज हवा चलते ही दूसरी ओर मुड़ जाती थी।

‘यूरीनल’ नहीं ‘टॉयलेट’

दूसरी बस से उतरते ही सबसे पहले मैंने वहाँ खड़े एक ‘वेण्डर’ से ‘यूरीनल’ के बारे में पूछा। मौसम ठण्डा था, बरसात में भीग भी चुके थे और अब हमें घर से निकले हुए कम से कम डेढ़ घण्टे हो चुके थे। इसलिए लघुशंका की इच्छा होना स्वाभाविक ही था। वैसे भी डाइबिटीज होने के कारण मुझे बार-बार पेशाब जाना पड़ता है। वह वेण्डर मेरी बात नहीं समझ पाया। मैंने कई लोगों से पूछा किंतु कोई व्यक्ति यह नहीं जान पाया कि आखिर मैं चाहता क्या था!

अंत में विजय ने मुझे बताया कि यहाँ से सौ मीटर चलकर बाईं ओर एक ‘मॉल’ बना हुआ है, उसमें यूरीनल की सुविधा है। मैंने उससे पूछा कि- ‘तुझे कैसे पता चला?’ विजय ने बताया कि- ‘उस आदमी ने मुझे बताया।’ उसने अंगुली से एक दुकानदार की ओर संकेत किया। मुझे हैरानी हुई, मैंने कहा कि इस व्यक्ति से तो मैंने दो-तीन बार पूछा था किंतु यह यूरीनल समझ ही नहीं पाया। विजय ने कहा कि- ‘मैंने टॉयलेट के बारे में पूछा था।’ हम समझ गए कि इटैलियन भाषा में ‘टॉयलेट’ शब्द तो है किंतु ‘यूरीनल’ नहीं है।

मेरूलाना प्लाजो

दूसरी बस से उतरकर हमें लगभग सवा किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। हमें मेरूलाना प्लाजो जाना था, जहाँ से हमें अगले दिन के लिए कोलोजियम तथा रोमन फोरम के खण्डहरों को देखने के लिए बोर्डिंग पास लेने थे। कल के लिए टिकटों की बुकिंग तो विजय ने भारत में ही ऑन लाइन करवा ली थी किंतु यहाँ भुगतान करके बोर्डिंग पास लेने थे। यहाँ जाते ही मुझे फिर से लघुशंका के लिए जाना पड़ा। सौभाग्य से वहाँ पर यह सुविधा उपलब्ध थी। हम सभी ने इस सुविधा का उपयोग किया। मेरूलाना प्लाजो एक महंगा रेस्टोरेंट था। वहाँ देश-विदेश से आए धनी-पर्यटकों की हल्की-भीड़ थी।

त्रास्तेवेरा

मेरूलाना से निकलकर हम फिर से बस-स्टॉप पर जाकर खड़े हो गए। आधे घण्टे खड़े रहने पर भी कोई ट्राम नहीं आई। हमने किसी नौजवान दम्पत्ति से बस नहीं आने का कारण पूछा तो उसने बताया कि आज शहर में विशाल पर्यावरण रैली निकल रही है। इस कारण संभवतः इस रूट की बस-सर्विस सस्पैण्ड कर दी गई होगी। आप इस गली में घूमकर चले जाएं, वहाँ आपको मैट्रो मिल सकती है। काफी देर बाद हमें एक मैट्रो मिली। उसने हमें त्रास्तेवेरा उतार दिया। यह रोम का सबसे धनी आवासीय-क्षेत्र है। यहाँ की चौड़ी-चौड़ी सड़कें, उनके दोनों ओर खड़े फूलों के वृक्ष तथा बड़े-बड़े आवासीय भवन बरसात में भीगकर छायाचित्रों एवं कलैण्डरों में दिखने वाले दृश्य उत्पन्न कर रहे थे। विजय ने गूगल पर देखकर बताया कि यह क्षेत्र रोम के पुराने क्षेत्रों में से एक है तथा यहाँ रोम के सर्वाधिक धनी लोग निवास करते हैं। यदि वर्षा नहीं हो रही होती तो हम थोड़ी देर और पैदल चलकर इस क्षेत्र में घूमकर आते।

पियाजा वेनेजिया (वेनिस चौक)

त्रस्तेवेरा से हम पुनः एक ट्राम पकड़कर पियाजा वेनेजिया गए तथा इस क्षेत्र में स्थित एक शिाल चौक में उतरे। संभवतः यह रोम का सबसे सुंदर और भव्य स्थान है तथा इसे रोम का ‘सेंट्रल हब’ कहा जा जाता है। यहाँ कई दिशाओं से सड़कें आकर मिल जाती हैं, इनमें ‘विया डेल फोरी’ ‘इम्पीरियलाई’ तथा ‘विया डेल क्रोसो’ प्रमुख हैं। ‘ट्राजन्स फोरम’ यहाँ से अधिक दूर नहीं है। यहाँ से एक मुख्य गली कोलोजियम की तरफ जाती है, इस गली को ‘विया डे फोरी इम्पीरियलाई’ कहते हैं।

रोम में किसी एक स्थान पर यदि सर्वाधिक पर्यटक एक साथ दिखाई देते हैं, तो वह स्थान यही है। यहाँ ‘कैपिटोलाइन हिल’ नामक पहाड़ी की तलहटी में एक विशाल चौराहे के बीच में सफेद रंग का एक विशाल भवन है जिसे ‘पलाज्जो वेनेजिया’ कहा जाता है। इस भवन का निर्माण वेनेटियन कार्डिनल पिएत्रो बार्बो (बाद में पोप पॉल द्वितीय) ने करवाया था।

कहने को यह एक भवन है किंतु आकार में इतना बड़ा है कि किसी मौहल्ले से कम नहीं है। रियासती काल में यह भवन वेनिस गणतंत्र का दूतावास था। ई.1920 से 40 के दशक में मुसोलिनी इस भवन की सीढ़ियों पर खड़े होकर रोम की जनता को सम्बोधित किया करता था।

पलाज्जो वेनेजिया के निकट ही, वेनिस के महान् संत मार्क के नाम पर ‘सेंट मार्क चर्च’ बना हुआ है। पलाज्जो वेनेजिया के निकट ‘ऑल्टेयर डेल्ला पैट्रिया’ में इटली के प्रथम राजा विट्टोरिया एमेनुएल (द्वितीय) का स्मारक बना हुआ है जिसके एक हिस्से में इटली के किसी अज्ञात प्रमुख योद्धा की कब्र स्थित है। ई.2009 में जब यहाँ मैट्रो  रेल बनाने के लिए धरती की खुदाई की गई तो रोमन सम्राट हैड्रियन के पुस्तकालय के अवशेष प्राप्त हुए थे।

हम पहले उल्लेख कर आए हैं कि रोमन सम्राट नेरवा के दत्तक पुत्र ट्राजन को महान् विजेता माना जाता है। उसके समय रोमन सेनाओं ने डेसिया, अरब, मेसोपोटामिया और आर्मेनिया पर विजय प्राप्त की तथा उसके काल में महान् रोमन साम्राज्य अपने चरम विस्तार को प्राप्त कर गया था। उसे सीनेट ने सर्वश्रेष्ठ एम्परर का सम्मान दिया था। वह लगभग 20 साल तक रोम पर शासन करता रहा।

 7 अगस्त 117 को 63 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हुई। ट्राजन के उत्तराधिकारी हैड्रियन के काल में रोम में वास्तुकला अपने चरम पर पहुँच गई थी। उसके समय में रोम में विशाल भवनों का निर्माण हुआ तथा भवनों के नए डिजाइन विकसित हुए। यह पूरा क्षेत्र वस्तुतः उसी काल के रोमन सम्राटों से सम्बद्ध है। इस बहु-मंजिला भवन में प्रवेश करने के लिए बहुत सी सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।

इस भवन में अब सैनिक संग्रहालय स्थापित कर दिया गया है। इस भवन के चारों ओर तथा ऊपर रोम के प्राचीन राजाओं-रानियों, विख्यात धनी-सामंतों, योद्धाओं, दार्शनिकों आदि की बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं एवं शिल्प लगे हैं। इनमें से अधिकांश शिल्प फ्लोरेंस एवं रोम के महान् मूर्तिकारों ने गढ़े हैं जिनमें लियोनार्डो दा विंची (ई.1452-1519), माइकेल एंजिलो (ई.1475-1564) तथा राफिएलो सैंजिओ आदि सम्मिलित हैं।

इस स्थान पर पहुँचते-पहुँचते बरसात रुक गई थी किंतु तेज और ठण्डी हवा चल रही थी। हमने इसी चौक के एक हिस्से में बने हुए पार्क में लगी बेंचों पर बैठकर दोपहर का खाना खाया जो भानु और मधु घर से बनाकर अपने साथ लाई थीं। रोम में इस स्थान पर बैठकर लंच करना इतिहास के दो हजार साल पुराने पन्नों में प्रवेश करने जैसा था। भवन के पीछे की तरफ ईटों से निर्मित कुछ पुराने खण्डहर दिखाई दे रहे थे जिनमें बहुत बड़ी संख्या में छोटी-छोटी कोठरियां बनी हुई थीं।

संभवतः उनका प्रयोग प्राचीन रोमन सम्राटों के सेवकों के निवास के रूप में होता होगा। कौन जाने कभी ग्लेडिएटर्स इनमें रहे हों! इस चौराहे पर एक ओर बस स्टैण्ड तथा ट्राम स्टैण्ड बना हुआ है। हम एक बस पकड़कर सेंट पीटर्स चर्च के लिए रवाना हो गए। आज के लिए हमारा निर्धारित लक्ष्य केवल यही बचा था।

विदाउट टिकट होते-होते बचे

कल से हम रोम की बसों और ट्रामों में घूम रहे थे किंतु हमें कहीं भी टिकट नहीं लेना पड़ा था। जब भी हम बस के ड्राइवर से टिकट मांगते थे तो वह कहता था कि ‘नो टिकट!’ हम सोचते थे कि शनिवार और रविवार होने से विदेशी पर्यटकों के लिए टिकट की अनिवार्यता नहीं थी किंतु जैसे ही हम पियाजा वेनेजिया से बस में सवार हुए, एक टिकट चैकर बस में चढ़ा।

उसने हमसे टिकट मांगा। विजय ने अपनी जेब से वे पाँचों पास निकालकर टिकट चैकर की तरफ बढ़ा दिए जो हमने मेरूलाना प्लाजो से प्राप्त किए थे। टिकट-चैकर ने वे पास बस में लगी एक मशीन के स्कैनर के पास ले जाकर स्कैन किए और हमें लौटा दिए। टिकट-चैकर की इस कार्यवाही से मैं चक्कर में पड़ गया। अभी रविवार समाप्त कहाँ हुआ था! आज तो हमसे टिकट मांगा ही नहीं जाना चाहिए था! कुछ दिन बाद जब पीसा की मीनार देखने गए तब हमें यह बात समझ में आई कि हम क्या गलती कर रहे थे!

दरअसल टिकट बस में नहीं मिलता था। इसलिए हर ड्राइवर कहता था- ‘नो टिकट!’ और हम समझते थे कि हमें टिकट लेना जरूरी नहीं है। जबकि हमें बस में बैठने से पहले बस या ट्राम का टिकट बसस्टॉप के आसपास स्थित किसी दुकान से खरीदना था तथा उसे बस या ट्राम में लगी मशीन के स्कैनर पर स्कैन करके उसे वेलिडेट करना था, ऐसा किए बिना हम बस में वैध-यात्री नहीं थे, हम विदाउट टिकट थे किंतु बस का ड्राइवर इस बात को अंग्रेजी में नहीं बोल सकता था, इसलिए प्रत्येक ड्राइवर केवल ‘नो टिकट!’ बोलकर चुप हो जाता था।

कुछ दिन बाद जब वेनेजिया गए तब जाकर यह समझ में आया कि ऐसा तो संभव ही नहीं था कि इटली में किसी विदेशी पर्यटक से भारी शुल्क और भारी कर वसूल किए बिना उसे कोई सुविधा उपलब्ध करा दी जाती। हमें तो ईश्वर का धन्यवाद देना चाहिए कि हम दो दिन की यात्रा में विदाउट टिकट नहीं पकड़े गए थे अन्यथा हमसे कितनी पैनल्टी वसूल की जाती इसका हम अनुमान भी नहीं लगा सकते थे! एक ऐसे अपराध की पैनल्टी जिसे हमने किया नहीं था किंतु हमसे हो गया था!

सेंट पीटर चौक

सायं लगभग साढ़े तीन बजे हम सेंट पीटर्स चौक पहुँचे। यह एक विशाल वृत्ताकार क्षेत्र है जो चारों ओर विशाल वर्तुलाकार प्रस्तर-स्तम्भों एवं बारामदों से घिरा हुआ है। इसी चौक में सेंट पीटर्स बेसिलिका बनी हुई है। चौक के मध्य में एक विशाल स्तम्भ है। उसके निकट ही कुर्सियां लगी हुई हैं जहाँ पोप महीने में कुछ दिन देशी-विदेशी पर्यटकों, श्रद्धालुओं एवं जिज्ञासुओं से मिलते हैं।

इस समय ये कुर्सियां खाली थीं। चौक के एक तरफ मनुष्यों की एक साथ तीन-चार लम्बी कतारें लगी हुई थीं जिनमें देश-विदेश से आए हजारों पर्यटक खड़े थे। इन कतारों में लगकर ही बेसिलिका में प्रवेश किया जा सकता था। हम इतने थके हुए थे कि हमारे लिए इन कतारों में खड़े होना संभव नहीं था।

दिन भर बरसात में भीगते रहने से शरीर बहुत थक गया था तथा इस समय तक लघु-शंका की इच्छा भी बहुत प्रबल हो चुकी थी किंतु आस-पास कहीं भी पेशाबघर नहीं बना हुआ था। हमने कुछ लोगों से पूछा भी किंतु वहाँ सब हमारे जैसे थे। कौन बता सकता था! अतः हम लगभग एक घण्टा सेंट पीटर चौक में रुककर अपने सर्विस अपार्टमेंट के लिए रवाना हो गए।

यहाँ से हमारा घर लगभग डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर था। फिर भी हमें बस की सहायता लेनी ही पड़ी जिसने हमें ठीक हमारे अपार्टमेंट के सामने उतार दिया। बाकी का दिन हमने सर्विस अपार्टमेंट में ही व्यतीत किया। इस समय का उपयोग मैंने विगत दो दिन की यात्रा का विवरण लिखने में किया।

Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohan Lal Gupta is a renowned historian from India. He has written more than 100 books on various subjects.

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