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जोधपुर नरेश जसवंतसिंह राठौड़ (27)

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जोधपुर नरेश जसवंतसिंह राठौड़ - bharatkaitihas.com
जोधपुर नरेश जसवंतसिंह राठौड़

जोधपुर नरेश जसवंतसिंह राठौड़ (Maharaja Jaswantsingh) शाहजहाँ एवं औरंगजेब (Aurangzeb) कालीन मुगल राजनीति (Mughal Politics) में एक बहुप्रतिष्ठित एवं बुद्धिमान राजा हुआ है किंतु मुगलिया राजनीति की चौसर ने उसे ऐसा जकड़ लिया कि लाख चाहने पर भी जसवंतसिंह उस चौसर से स्वयं को अलग नहीं कर सका।

दारा शिकोह (Dara Shikoh) आगरा से भागकर दिल्ली पहुंचा था। उसका विचार था कि वह दिल्ली में मोर्चा बांधकर बैठ जाएगा किंतु इस समय दारा के साथ इतनी सेना नहीं थी कि वह दिल्ली की मोर्चाबंदी कर सकता। इसलिए उसने महाराजा जसवंतसिंह के पास अपना संदेशवाहक भिजवाया तथा उनसे सेना लेकर आने को कहा।

महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) ने दारा को प्रत्युत्तर भिजवाया कि वह दिल्ली छोड़कर अजमेर आ जाए ताकि दारा शिकोह (Dara Shikoh) को अजमेर के चारों तरफ स्थित राजपूत राज्यों से सहायता मिल सके। महाराजा जसवंतसिंह की सलाह पर दारा अपने हरम, खजाने तथा सेना को लेकर अजमेर आ गया। इस समय तक दारा के कुछ विश्वस्त सेनापति भी अपनी सेनाएं लेकर दारा की सहायता के लिए आ गए थे।

अजमेर का नाजिम तरबियात खाँ, दारा का मुकाबला करने में असमर्थ था। इसलिये उसने दारा शिकोह (Dara Shikoh) के पहुँचने से पहले ही अजमेर खाली कर दिया और औरंगजेब (Aurangzeb) के पास आगरा चला गया। जब दारा अजमेर आ गया तो महाराजा जसवंतसिंह भी जोधपुर से रवाना होकर रूडियावास पहुँच गया।

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उधर जब औरंगजेब (Aurangzeb) को ज्ञात हुआ कि महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) ने दारा शिकोह को सहयोग देने का आश्वासन दिया है तो उसने आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह से कहा कि वह महाराजा जसवंतसिंह को दारा शिकोह से अलग करे। जब दारा शिकोह (Dara Shikoh) को महाराजा जयसिंह की गतिविधियों के बारे में ज्ञात हुआ तो दारा ने पुनः महाराजा जसंवतसिंह से सहायता उपलब्ध कराने का अनुरोध भिजवाया।

उन दिनों फ्रैंच लेखक बर्नियर भारत में ही था। उसने लिखा है कि महाराजा जयसिंह ने महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) को पत्र लिखकर सूचित किया कि यदि जसवंतसिंह दारा का साथ छोड़ दे तो बादशाह अर्थात् औरंगजेब, महाराजा जसवंतसिंह के अब तक के अपराधों को क्षमा कर देगा तथा महाराजा ने खजुआ में मुगलों के डेरे से जो धन लूटा है, उसकी भी मांग नहीं करेगा। बादशाह, महाराजा को पुनः गुजरात का सूबेदार नियुक्त कर देगा जहाँ वह पूरे स्वाभिमान के साथ शासन कर सकेगा तथा शांति एवं सुरक्षा के साथ रह सकेगा।

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इस पर जोधपुर नरेश जसवंतसिंह राठौड़ ने अपने विश्वस्त अनुचर आसा माधावत को मिर्जाराजा जयसिंह के पास भेजा। मिर्जाराजा जयसिंह (Mirza Raja Jaisingh), आसा माधावत को बादशाह के पास लेकर गया। बादशाह ने अपने पंजे का निशान लगाकर एक फरमान जसवंतसिंह के नाम जारी किया जिसके अनुसार जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) को उसका राज्य लौटा दिया गया तथा उसका पुराना मनसब बहाल कर दिया गया। जब यह फरमान जसवंतसिंह के पास पहुँचा तो जसवंतसिंह रूडियावास से पुनः जोधपुर लौट गया। इस पर दारा ने एक संदेशवाहक जसवंतसिंह के पास भेजा। उस समय जसवंतसिंह जोधपुर से 40 मील दूर रह गया था। जसवंतसिंह ने दारा शिकोह (Dara Shikoh) के संदेशवाहक को स्पष्ट मना कर दिया। जब संदेशवाहक ने अजमेर लौटकर इसकी सूचना दी तो दारा ने शहजादे सिपहर शिकोह को एक सौ आदमियों के साथ जोधपुर नरेश जसवंतसिंह राठौड़ (Maharaja Jaswantsingh) की सेवा में भेजकर सहायता का अनुरोध दोहराया किंतु यह अनुरोध भी बेकार चला गया। शहजादा खाली हाथ अजमेर लौट आया। निराश होकर दारा शिकोह ने अपनी सेना के भरोसे ही युद्ध लड़ने का निर्णय लिया। उधर आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह (Mirza Raja Jaisingh) तथा जम्मू नरेश राजा रामरूप राय की सेनाएं औरंगजेब की सहायता के लिये अजमेर की तरफ बढ़ रही थीं।

दारा ने तारागढ़ दुर्ग की तलहटी में अपनी सेना की व्यूह रचना की। उसने अजमेर की तरफ आने वाले रास्तों को पत्थरों और मिट्टी की दीवारों से बंद करवा दिया तथा स्थान-स्थान पर मोर्चे खड़े करवा दिए।

दारा शिकोह (Dara Shikoh) ने प्रत्येक मोर्चे पर एक प्रमुख व्यक्ति को तैनात किया। दारा के दाहिनी ओर पहला मोर्चा सयैद इब्राहीम, अस्कर खान, जान बेग तथा उसके पुत्र के अधीन था। यह मोर्चा तारागढ़ के ठीक निकट था। इस मोर्चे से अगला मोर्चा फिरोज मेवाती के अधीन था जो दारा के सर्वाधिक योग्य एवं विश्वस्त सेनापतियों में से था।

इसके आगे के मार्ग पर बड़े अवरोध खड़े किये गये तथा इसी के निकट दारा ने अपना निवास नियत किया। दारा के बाईं ओर एक और बड़ा मोर्चा स्थापित किया गया जिसमें सिपहर शिकोह का मंत्री शाहनवाज खाँ नियुक्त किया गया।

इसी स्थान पर मुहम्मद शरीफ को नियुक्त किया गया जिसे किलीज खान का खिताब प्राप्त था और जिसे मुख्य खजांची तथा बरकंदाज नियुक्त किया गया था। इस मोर्चे के पीछे शहजादे सिपहर शिकोह को रखा गया जहाँ तारागढ़ की पहाड़ी स्थित थी। 

अजमेर से चार मील दक्षिण में तारागढ़ की पहाड़ियाँ एक तंग घाटी में बदल जाती हैं, इसे नूर-चश्मा कहते हैं। यहाँ से एक मार्ग इंदरकोट की घाटी होता हुआ अजमेर नगर की ओर जाता था। तारागढ़ के पश्चिम में देवराई गांव था। दारा शिकोह (Dara Shikoh) की सेना ने इस चश्मे के दोनों ओर फैलकर तंग घाटी का रास्ता रोक लिया।

दारा की सेना का बायां पार्श्व गढ़ बीठली की पहाड़ी पर टिका था तथा दाहिना पार्श्व कोकला नामक दुर्गम पहाड़ी पर टिका हुआ था। उसके सामने पत्थरों की एक विशाल एवं मजबूत दीवार थी जो प्राचीन इंदरकोट दुर्ग का बचा हुआ अवशेष थी। इस दीवार के क्षतिग्रस्त हिस्से को मजबूत चट्टानों से भर दिया गया।

इस प्रकार की मोर्चाबंदी के कारण औरंगजेब के पास दारा तक पहुँचने के लिए, चश्मे की तंग घाटी वाला मार्ग ही शेष रह गया। आसपास की गढ़ियों पर तोपें चढ़ा दी गईं तथा उनके चारों ओर खाइयां खुदवा दी गईं। समस्त गढ़ियों को अजमेर से आवागमन करने के लिये जोड़ दिया गया ताकि अजमेर में स्थित रसद सामग्री तक उसकी सेनाओं का संचार बना रहे। इस प्रकार दारा शिकोह (Dara Shikoh) औरंगजेब (Aurangzeb) से अपनी आखिरी लड़ाई की तैयारियां करके बैठ गया।

इस युद्ध में दारा शिकोह की तरफ से लड़ने के लिए न तो मिर्जा राजा जयसिंह (Mirza Raja Jaisingh) था, न महाराजा रूपसिंह राठौड़ (Maharaja Roopsingh Rathore) था, न जसवंतसिंह राठौड़ (Maharaja Jaswantsingh) था और न बूंदी का हाड़ा राजा छत्रसाल (Raja Chhatrsal) था। यहाँ तक कि जम्मू का राजा रामरूप राय (Raja Ramroop Rai) भी औरंगजेब की तरफ से लड़ रहा था। उस काल में हिन्दू राजाओं की सहायता के बिना मुगल शहजादे एक भी युद्ध नहीं जीत सकते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दौराई का युद्ध (28)

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दौराई का युद्ध

दौराई का युद्ध (Battle of Daurai) मुगलों के इतिहास में वैसा ही महत्व रखता है जैसा कि शामूगढ़ का युद्ध (War Of Shamugarh)। इन दोनों युद्धों ने न केवल औरंगजेब (Aurangzeb) का अपितु भारत का भी भाग्य पलट दिया। औरंगजेब का भाग्य बन गया और भारत का बिगड़ गया।

दारा शिकोह (Dara Shikoh) की तरफ से अजमेर में बांधा गया मोर्चा प्राकृतिक दृष्टि से काफी मजूबत था किंतु व्यावहारिक दृष्टि से, चश्मे के मुंह के दोनों तरफ फैले हुए होने से, दोनों तरफ के योद्धाओं का एक दूसरे तक पहुँचना अत्यंत कठिन था। ऐसी स्थिति में चश्मे के एक तरफ की सेना के कमजोर पड़ जाने पर दूसरी ओर से सहायता नहीं पहुँचाई जा सकती थी।

इधर दारा मोर्चा जमाने में व्यस्त था और उधर औरंगजेब (Aurangzeb), अजमेर की ओर तेजी से बढ़ा चला आ रहा था। औरंगजेब अब तक की विजयों से इतना उत्साहित था तथा सेना, सामग्री और अनुभव की दृष्टि से इतना समृद्ध था कि उसे अपनी स्थिति की कमजोरी और शक्ति पर ध्यान देने की आवश्यकता ही अनुभव नहीं हुई।

औरंगजेब अपनी विजय के प्रति इतना आश्वस्त था कि उसकी सेना ने रामसर से दौराई तक की 22 मील की दूरी दो दिन में पूरी कर ली। दौराई को उन दिनों देवराई कहा जाता था। औरंगजेब ने यहीं पर अपना डेरा लगाया, अब वह दारा से केवल दो मील दूर रह गया।

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मिर्जाराजा जयसिंह (Mirza Raja Jaisingh) ने औरंगजेब (Aurangzeb) के दाहिनी ओर मोर्चा जमाया। पुर्दिल खाँ को 150 आदमियों की एक टुकड़ी के साथ, रात्रि में ही शत्रु से सम्पर्क करने के लिये भेजा गया। उसने एक मील आगे चलकर रात्रि में एक नीची पहाड़ी पर अपना मोर्चा जमाया। यहाँ से दारा शिकोह (Dara Shikoh) का शिविर केवल एक मील रह गया था।

जब प्रातः होने पर दारा के आदमियों ने पुर्दिल खाँ को पहाड़ी पर मोर्चा जमाये हुए देखा तो उन्होंने पुर्दिल खाँ पर आक्रमण किया। इसी के साथ दौराई का युद्ध आरम्भ हो गया। इस पर औरंगजेब ने शफ्शकिन खाँ को पुर्दिल खाँ की सहायता के लिये भेजा। शफ्शकिन खाँ ने पुर्दिल खाँ के पास पहुँचकर दारा के आदमियों पर गोलाबारी आरंभ कर दी। इस पर दारा के आदमी मुड़कर पीछे चले गये।

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शफ्शकिन खाँ ने पहाड़ियों पर तेजी से अपने आदमी फैला दिये। इसके बाद उसने दारा के मोर्चों की तरफ लम्बी दूरी की फायरिंग आरंभ कर दी। शफ्शकिन खाँ ने अपने मोर्चे की रक्षा के लिये शेख मीर तथा दिलेर खाँ के नेतृत्व में रक्षा टुकड़ियां तैनात कीं जो इन्हें आकस्मिक हमलों से बचा सके। अब तक औरंगजेब (Aurangzeb) की सेना ने सामान्य आक्रमणों के लिये स्वयं को व्यवस्थित कर लिया। अमीर उल उमरा तथा राजा जयसिंह को औरंगजेब के बाएं हिस्से में नियुक्त किया गया, उनका मुंह कोकला पहाड़ी की तरफ था। दाहिनी ओर नियुक्त असद खाँ तथा होशदाद खाँ को घाटी के बाईं ओर आक्रमण करने के निर्देश दिये गये जो बीठली गढ़ की तरफ की एक खड़ी चट्टान से लगी हुई थी। इसके बाद शफ्शकिन खाँ अपनी तोपों को तीन सौ गज और आगे ले गया। 11 मार्च 1659 की शाम को दोनों तरफ से भारी बमबारी आरंभ हुई जो पूरी रात चलती रही। अगले दिन का काफी हिस्सा भी इसी बमबारी में गुजर गया। वातावरण में धुंए का गुब्बार आंधी की तरह छा गया। तोपों से निकले गोलों की चिंगारियां बिजली की तरह चमकती थीं। पूरी घाटी में गंधक, आग और लपटें फैल गईं। दौराई का युद्ध (Battle of Daurai) परवान चढ़ गया।

इस धुएं की ओट में छिपकर दोनों ओर के सिपाही, शत्रु तोपों तक पहुंच गए और उन्होंने द्वंद्व युद्ध करके तोपचियों को काबू में कर लिया। इस कारण तोपें कुछ देर के लिये बंद हो गईं किंतु शीघ्र ही इन सिपाहियों को पीछे से आये शत्रु सैनिकों की बंदूकों की गोलियों, तलवारों तथा बर्छियों ने वापस धकेल दिया। औरंगजेब की सेना की तरफ से फायरिंग जारी रही।

औरंगजेब (Aurangzeb) की सेनाएं, दारा शिकोह (Dara Shikoh) के मोर्चे की तरफ इंदरकोट की जिस प्राचीन दीवार को गिराने के लिये तोप के गोले दाग रही थी, वह अब भी मजबूती से खड़ी हुई थी। इस पर औरंगजेब ने अपनी सेनाओं को आगे बढ़कर हमला करने को कहा किंतु औरंगजेब के सेनापतियों ने ऐसा करने से मना कर दिया तथा कहा कि जब तक तोपें अपना काम पूरा नहीं कर लेतीं, तब तक हमें आगे नहीं बढ़ना चाहिये।

दारा शिकोह (Dara Shikoh) की सेना इस दीवार की आड़ में से औरंगजेब (Aurangzeb) की सेना पर आग बरसाती रही। दारा के सिपाही ऊँचाई पर थे तथा मोर्चों एवं दीवार की आड़ में थे इसलिये उन्हें कम हानि पहुँच रही थी जबकि औरंगजेब की सेना निचाई पर थी और खुले मैदान में होने से अधिक हानि उठा रही थी।

इस प्रकार दूसरा दिन बीत जाने पर भी युद्ध में कोई प्रगति नहीं हो सकी। दारा की ओर से की गई मजबूत मोर्चाबंदी के कारण औरंगजेब की सेना को यह विश्वास हो चला था कि दारा शिकोह (Dara Shikoh) के शिविर में घुस पाना असंभव है। औरंगजेब (Aurangzeb) के सिपाही डगमगाने लगे थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जम्मू का राजा रामरूपराय (29)

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जम्मू का राजा रामरूपराय

जम्मू का राजा रामरूपराय (Raja Ram Roop Rai) औरंगजेब (Aurangzeb) के लिए अपने पुत्रों सहित कट मरा। वह मुगलिया राजनीति (Mughal Politics) की चौसर का ऐसा गुमनाम मोहरा है जिसे सर्वस्व लुटा देने पर भी इतिहास में कोई यश नहीं मिला।

दारा शिकोह (Dara Shikoh) की मोर्चाबंदी इतनी मजबूत थी कि दो दिन तक आग और बारूद बरसाने के बावजूद औरंगजेब की सेना दो कदम भी आगे नहीं बढ़ सकी थी। इसलिए औरंगजेब (Aurangzeb) के सेनापति अब दूसरी तरह सोचने लगे थे। उनमें से बहुत से तो औरंगजेब के साथ केवल इसलिये हुए थे क्योंकि उन्हें विश्वास था कि युद्ध में जीत औरंगजेब की ही होगी।

उन्हें लगता था कि दारा दुर्भाग्यशाली है और वह कभी जीत नहीं सकता किंतु भीतर से वे दारा के सद्गुणों के प्रशसंक थे। अब जबकि दारा औरंगजेब पर भारी पड़ रहा था तो उन्हें भीतर ही भीतर पछतावा होने लगा था।

तीसरे दिन प्रातः औरंगजेब (Aurangzeb) ने एक गंभीर प्रयास करने का निश्चय किया। उसने अपने सेनापतियों को एकत्रित किया, उन्हें जोशीला भाषण देकर उनमें नई ऊर्जा का संचार किया तथा उन्हें बिना कोई क्षण गंवाये सम्मिलित होकर लड़ने के लिये प्रेरित किया।

उसी समय जम्मू का राजा रामरूपराय (Raja Ram Roop Rai) ने औरंगजेब (Aurangzeb) को सूचित किया कि उसके पहाड़ी लड़ाकों ने, तारागढ़ की पहाड़ी में एक गुप्त मार्ग ढूंढ निकाला है। इस मार्ग से वे दक्षिण-पश्चिम दिशा से घुसकर कोकला पहाड़ी पर ठीक दारा के पीछे पहुँच सकते हैं तथा इस प्रकार वे दारा के दाहिने पार्श्व को तोड़ सकते हैं।

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औरंगजेब (Aurangzeb) ने बिना कोई समय गंवाये, शाही सेना के खास बंदूकची तथा पैदल सिपाही उस मार्ग से कोकला पहाड़ी के पीछे भेज दिये। जम्मू का राजा रामरूपराय (Raja Ram Roop Rai) दारा का ध्यान बंटाने के लिये कोकला पहाड़ी के सामने जा धमका। रामरूप राय का यह कदम औरंगजेब के लिये तो विजयकारी सिद्ध हुआ किंतु राजा रामरूप राय अपने पूरे सैनिक दल के साथ रणक्षेत्र में ही काट दिया गया। इस प्रकार एक और बड़ा हिन्दू राजा मुगलिया राजनीति की चौसर पर बलिदान हो गया।

जब तक दारा शिकोह (Dara Shikoh) के सिपाहियों ने जम्मू का राजा रामरूपराय (Raja Ram Roop Rai) मारकर खत्म किया, तब तक औरंगजेब के खास बंदूकची तथा हजारों पैदल सिपाही कोकला पहाड़ी पर से नीचे उतरने लगे। अब दृश्य उलट चुका था। औरंगजेब (Aurangzeb) के बंदूकची तथा पैदल सिपाही ऊँचाई पर थे जबकि दारा के सिपाही नीचे की ढलान पर थे। औरंगजेब के बंदूकचियों ने दारा के सिपाहियों को तड़ातड़ गोलियों की बरसात करके मार डाला। दारा के खेमे में अफरा-तफरी मच गई।

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ठीक उसी समय दिलेर खाँ तथा शेख मीर ने सामने से दारा के खेमे पर धावा बोला। दिलेर खाँ चश्मे की दक्षिणी दिशा से तथा शेख मीर उत्तरी दिशा से आगे बढ़ा ताकि वे दारा शिकोह (Dara Shikoh) की तोपों की मार से बच सकें। ठीक उसी समय बाईं ओर से महाराजा जयसिंह (Mirza Raja Jaisingh) तथा अमीर-उल-उमरा तथा दाईं ओर से असद खाँ एवं होशाबाद धावा बोलने के लिये आगे बढ़े। दिलेर खाँ तथा शेख मीर आगे बढ़ते हुए दारा की मोर्चाबंदी के सबसे कमजोर बिंदु पर पहुँच गये जहाँ औरंगजेब का श्वसुर शाहनवाज खाँ मोर्चा संभाले हुए था। इस बिंदु से झरने का एक रास्ता उन्हें दीवार के ऊपरी हिस्से तक ले गया। शाही सिपाही इंदरकोट की मजबूत दीवार पर चढ़ गये। शाहनवाज खाँ के सिपाही दारा के सिपाहियों को औरंगजेब (Aurangzeb) तक पहुँचने से रोकने के लिये तोपों से गोले बरसाने लगे। दारा के आदमियों ने भी अपनी तोपों के मुंह उनकी तरफ मोड़ दिये। इस अस्तव्यस्त गोलाबारी के बीच शाहनवाज खाँ तोप के गोले से मारा गया और उसका पुत्र सयैद खाँ भी घायल हो गया। शेख मीर औरंगजेब की ओर से लड़ रहा था। वह हाथी पर सवार होकर अपनी सेना का नेतृत्व कर रहा था। पहाड़ी के ऊपर से आए तोप के एक गोले से वह भी मारा गया।

हाथी के हौदे में सवार महावत ने शेख मीर के मृत शरीर को हौदे में इस तरह बिठा दिया मानो वह जीवित हो। शेख मीर के मारे जाने की बात युद्ध की समाप्ति के बाद ही प्रकट हो सकी।

दारा शिकोह (Dara Shikoh) अपने पुत्र सिपहर शिकोह के साथ एक ऊँचे स्थान पर खड़ा होकर युद्ध देख रहा था। उसने देखा कि उसके दाहिने पार्श्व पर दिलेर खाँ ने सफलता प्राप्त कर ली है और राजा जयसिंह (Mirza Raja Jaisingh) भी आगे बढ़ रहा है। दारा को लगा कि युद्ध का परिणाम उसके विरुद्ध जा रहा है।

इस समय दारा शिकोह (Dara Shikoh) की स्थिति नाजुक तो थी किंतु चिंताजनक नहीं थी। उसकी सेना का मध्य भाग तथा उत्तरी भाग अब भी पूरी तरह सुरक्षित था। उसके पास सात हजार सिपाही अब भी सुरक्षित खड़े थे। एक तीव्र प्रत्याक्रमण दिलेर खाँ को पीछे धकेल सकता था।

यहाँ तक कि मिर्जा राजा जयसिंह (Mirza Raja Jaisingh) की आगे बढ़ने की गति इतनी धीमी थी कि वह आवश्यकता पड़ने पर दिलेर खाँ को सहायता नहीं पहुँचा सकता था किंतु युद्धों के अनुभव से शून्य दारा अपनी स्थिति का सही आकलन नहीं कर सका।

भले ही जम्मू के ने इस युद्ध में औरंगजेब के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया हो किंतु मुगलिया राजनीति रामरूपराय के बलिदान को इतिहास के क्रूर पन्नों में दर्ज करने वाली नहीं थी।

भले ही औरंगजेब को आज की विजय जम्मू के राजा रामरूपराय (Raja Ram Roop Rai) के कारण मिली थी और राजा रामरूपराय ने इस युद्ध में औरंगजेब के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था किंतु मुगलिया राजनीति रामरूपराय के बलिदान को इतिहास के क्रूर पन्नों में दर्ज करने वाली नहीं थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

उत्तराधिकार का युद्ध (30)

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उत्तराधिकार का युद्ध

उत्तराधिकार का युद्ध (Uttaradhikar Ka Yuddh or War of Succession) इस बात की गवाही देता है कि मुगल काल की राजनीति में हिन्दु राजाओं ने गलत निर्णय लिए। अधिकांश हिन्दू राजा दारा शिकोह (Dara Shikoh) एवं औरंगजेब (Aurangzeb) में अंतर नहीं कर सके। इस कारण व्यर्थ ही कट मरे।

तारागढ़ की तलहटी में खड़ा दारा शिकोह दारा शिकोह (Dara Shikoh) अभी बदली हुई स्थिति पर विचार कर ही रहा था कि कोकला पहाड़ी पर कोलाहल हुआ तथा वहाँ से घोषणा की गई कि शत्रु ने पहाड़ी के सबसे सुरक्षित स्थान को छीन लिया है। इस नये संकट ने दारा को तत्काल निर्णय लेने पर विवश कर दिया। दारा में औरंगजेब (Aurangzeb) की तरह सर्वोच्च प्रयास करने का हौंसला नहीं था जो हारी हुई बाजी को पलट सके।

तीन दिन की लगातार लड़ाई के दबाव ने दारा को हतोत्साहित कर दिया था। वह अपनी सेना को उसके भाग्य पर छोड़कर युद्ध के मैदान से निकल गया। इसी के साथ दारा ने अपने दुर्भाग्य पर अपने ही हाथों से मोहर लगा दी। अब उसे हारने से कोई नहीं रोक सकता था! सत्य तो यह है कि जिस दिन से मारवाड़ नरेश जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) ने दारा की सहायता करने से मना कर दिया था, उसी दिन से दारा ने मन ही मन अपनी पराजय स्वीकार कर ली थी।

दारा शिकोह (Dara Shikoh) इतना भयभीत हुआ कि वह युद्ध के मैदान से भागकर अजमेर नगर में नहीं गया, जहाँ उसका हरम तथा उसका खजाना किसी भी बुरी परिस्थिति में पलायन के लिये ऊंटों एवं हाथियों पर लदा हुआ तैयार खड़ा था। दारा तारागढ़ की पहाड़ी से ही पश्चिम दिशा में मेड़ता की पहाड़ियों की तरफ भाग गया। जब शहजादे दारा शिकोह के हरम और खजाने के अधिकारियों तक यह सूचना पहुंची तो वे भी दारा के भागने की दिशा में पीछे-पीछे भाग लिए। इसी बीच रात हो गई।

औरंगजेब (Aurangzeb) के सेनापतियों को अचानक मिली इस जीत पर विश्वास नहीं हुआ। वे समझ ही नहीं पाए कि जीत इतनी जल्दी कैसे मिल गई! दिलेर खाँ यद्यपि दारा की सेना की घेराबंदी को तोड़ चुका था तथापि उसकी स्थिति नाजुक थी। शेख मीर के सिपाहियों को शेख की मृत्यु के बारे में ज्ञात हो चुका था और वे सारा अनुशासन भंग करके लूटपाट करने में लगे हुए थे। उनका ध्यान युद्ध की तरफ बिल्कुल नहीं था।

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महाराजा जयसिंह (Mirza Raja Jaisingh) की आगे बढ़ने की गति अब भी धीमी थी। उसके दाहिनी तरफ असद खाँ एवं होशदाद खाँ अब भी कुछ नहीं कर पाये थे। उनकी टुकड़ियां दर्शक बनकर व्यर्थ खड़ी थीं किंतु दारा शिकोह (Dara Shikoh) के भाग जाने से इन सबकी कमजोरियों एवं गलतियों पर पर्दा पड़ गया। औरंगजेब की इस अप्रत्याशित जीत और दारा की कायरता पूर्ण पराजय का श्रेय यदि किसी एक व्यक्ति को जाता था तो वह केवल जम्मू का राजा रामरूप राय था जिसने औरंगजेब (Aurangzeb) जैसे नराधम के लिए अपने प्राणों और सैनिकों की बलि दे दी थी।

जैसे ही औरंगजेब को ज्ञात हुआ कि दारा शिकोह (Dara Shikoh) युद्ध का मैदान छोड़कर भाग गया तो उसने युद्ध रोक दिया। राजा जयसिंह ने आगे बढ़कर तंग घाटी का रास्ता रोक लिया ताकि दारा के सिपाही जान बचाकर न भाग सकें। अब औरंगजेब के मुस्लिम सेनापतियों ने मोर्चा संभाला और दारा के सिपाहियों का कत्लेआम शुरु कर दिया। यह कत्लेआम देर रात तक चलता रहा। इस प्रकार 11 मार्च की शाम को आरंभ हुआ अजमेर का युद्ध 13 मार्च की रात में थम गया।

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दारा शिकोह (Dara Shikoh) की सेना किसी भी तरह से औरंगजेब की सेना से कम नहीं थी किन्तु दारा का मनोबल बढ़ाने वाला कोई मित्र उसके साथ नहीं था जबकि औरंगजेब (Aurangzeb) के मित्रों की कमी नहीं थी और उसे नित नई सहायता प्राप्त हो रही थी। उत्तराधिकार का युद्ध (Uttaradhikar Ka Yuddh or War of Succession) अब बड़ी तेजी से एक तरफ झुकता जा रहा था। दुर्भाग्य से हिन्दू राजाओं ने गलत निर्णय लिये। उन्होंने अपने भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए, अच्छे दारा को छोड़कर बुरे औरंगजेब का साथ दिया। इसकी शुरुआत चम्पतराय (Champatrai Hada) ने की थी जिसने औरंगजेब को चुपके से चम्बल नदी पार करवाई थी। महाराजा जसवंतसिंह भी कभी औरंगजेब के विरुद्ध तो कभी औरंगजेब के साथ खड़े हुए दिखाई दिए। जम्मू नरेश रामरूप राय (Raja Ram Roop Rai) स्वयं भी नष्ट हो गया और उसने दारा को भी नष्ट कर दिया। यदि आम्बेर नरेश जयसिंह (Mirza Raja Jaisingh) औरंगजेब का साथ न देता तो दारा परास्त न हुआ होता। यदि जोधपुर नरेश जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) दारा के पक्ष में लड़ने के लिये आ गए होते, तो भी दारा परास्त न हुआ होता।

यदि किशनगढ़ नरेश महाराजा रूपसिंह (Maharaja Roop singh Rathore) और बूंदी नरेश महाराजा छत्रसाल (Maharaja Chhatrasal) शामूगढ़ के मैदान (War of Shamugarh) में शहीद न हुए होते तो भी दारा परास्त नहीं होता। उत्तराधिकार का युद्ध (Uttaradhikar Ka Yuddh or War of Succession) हिन्दू राजाओं के प्राणों की बलि ले रहा था।

मध्यकाल के हिन्दू नरेश लगभग हर मोर्चे पर इतने ही अदूरदर्शी एवं असफल सिद्ध हुए थे जितने वे धरमत, शामूगढ़, खजुआ और अजमेर युद्ध के दौरान थे। इस अदूरदर्शिता एवं असफलता का कारण स्पष्ट था। जहाँ सारे हिन्दू नरेश दारा शिकोह (Dara Shikoh) की तरफ थे वहीं आम्बेर नरेश जयसिंह दुष्ट औरंगजेब की तरफ था और वह बार-बार महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) को गलत निर्णय लेने पर उकसाता था।

इस युद्ध में अजमेर की वीसल झील नष्ट हो गई तथा तारागढ़ एवं अजमेर नगर के परकोटों को गंभीर क्षति पहुंची। प्राचीन इंदरगढ़ के अवशेष पूरी तरह नष्ट हो गए।

जब दारा शिकोह (Dara Shikoh) मेड़ता की ओर भाग रहा था तब फ्रैंच यात्री बर्नियर भी दारा के साथ ही चल रहा था। उन दिनों दारा की एक बेगम के पैर में विसर्प लग जाने से वह बीमार थी तथा दारा उसकी सेवा कर रहा था। जब दारा को ज्ञात हुआ कि बर्नियर नामक एक फिरंगी चिकित्सक पास में ही है तो दारा ने बर्नियर को अपने तम्बू में बुलवा लिया।

बर्नियर दारा शिकोह (Dara Shikoh) के तम्बू में गया और उसने बीमार बेगम की चिकित्सा की। बर्नियर तीन दिन तक दारा के साथ यात्रा करता रहा ताकि उसकी बेगम की देखभाल की जा सके। और भी कुछ विदेशियों ने शाहजहां (Shahjahan) के पुत्रों में हुए उत्तराधिकार का युद्ध (Uttaradhikar Ka Yuddh or War of Succession) के बारे में लिखा है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दारा शिकोह की गिरफ्तारी (31)

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दारा शिकोह की गिरफ्तारी

मुगलिया राजनीति (Mughal Politics) की चौसर पर एक ही नियम काम करता था और उस नियम का नाम था विश्वासघात! दारा शिकोह (Dara Shikoh) विश्वासघात के रूप में दी गई शह से मात खा गया। दारा शिकोह की गिरफ्तारी विश्वासघात का सबसे बड़ा सबूत था! दारा के ही एक पुराने अमीर ने दारा को औरंगजेब (Aurangzeb) के हाथों बेच दिया!

दौराई के युद्ध में औरंगजेब की सेना से परास्त होकर दारा शिकोह मेड़ता चला गया। औरंगजेब ने महाराजा जयसिंह (Mirza Raja Jaisingh) तथा बहादुर खाँ को महाराजा के पीछे भेजा तथा समस्त मुगल सूबेदारों को पत्र भिजवाए कि जो भी सूबेदार, अमीर, उमराव या हिन्दू राजा दारा शिकोह का साथ देगा या अपने यहाँ आश्रय देगा, उसे बागी समझा जाएगा।

जब मिर्जाराजा जयसिंह (Mirza Raja Jaisingh) तथा बहादुर खाँ की सेनाएं मेड़ता के निकट पहुंचीं तो दारा शिकोह (Dara Shikoh) अपने दो हजार सिपाहियों, हरम की औरतों तथा अपने खजाने के साथ अहमदाबाद के लिए रवाना हो गया। उसने अपना एक संदेशवाहक अहमदाबाद भेजकर वहाँ के सूबेदार को सूचित किया कि हम अहमदाबाद आ रहे हैं।

इस पर अहमदाबाद के सूबेदार ने कहलवाया कि यदि दारा अहमदाबाद आएगा तो उसे पकड़कर औरंगजेब (Aurangzeb) को सौंप दिया जाएगा। इस पर दारा ने अपने समस्त घोड़ों एवं हाथियों को त्याग दिया तथा ऊंटों पर जितने आदमी, खजाना एवं रसद आ सकता था, उन्हें लेकर सिंध के रेगिस्तान (Desert of Sindh) की तरफ रवाना हो गया।

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मुगलिया इतिहास अपने आप को दोहरा रहा था। दारा के सिंध में पहुंचने से लगभग सवा सौ साल पहले दारा का पूर्वज हुमायूँ (Humayun) भी एक दिन अजमेर से भागकर सिंध पहुंचा था तथा दारा के परबाबा अकबर (Akbar) का जन्म सिंध के इसी रेगिस्तान में हुआ था।

जिस समय दारा सिंध पहुंचा, उस समय उसके पास केवल एक घोड़ा, एक बैलगाड़ी तथा पांच-सात ऊंट बचे थे। जो दारा एक दिन मुगलों के अकूत खजाने का मालिक था, आज मुट्ठी भर अनाज और बाल्टी भर पानी को भी तरस रहा था।

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मिर्जाराजा जयसिंह (Mirza Raja Jaisingh) अब भी दारा के पीछे लगा हुआ था। लाहौर से खलीलुल्ला खाँ अपनी सेनाएं लेकर भक्खर आ गया। सिंध में नियुक्त मुगल हाकिम सिंध के निचले हिस्से से दारा को घेरने लगे। इस प्रकार दारा के लिए पूर्व, उत्तर तथा दक्षिण दिशा में जाना संभव नहीं रहा किंतु ईरान जाने का रास्ता अब भी खुला था। इसलिए वह भी अपने पूर्वज हुमायूँ की तरह ईरान के लिए रवाना हो गया। यहाँ से दारा उत्तर-पश्चिम की ओर मुड़ा और सिंधु नदी (Sindhu River) पार करके सेहवान पहुंच गया। जब तक महाराजा जयसिंह, शहजादे दारा का पीछा करता हुआ सिंधु नदी तक पहुंचा तब तक दारा भारत की तथा मुगलों के राज्य की सीमा पार कर चुका था। जयसिंह यहाँ से लौट गया। दारा की बेगम नादिरा बानू (Nadira Banu Begum) अब भी बीमार थी। वह ईरान जाने के पक्ष में नहीं थी। इसलिए दारा बोलन घाटी पार करके भारतीय सीमा से नौ मील पश्चिम में स्थित दादर नामक छोटे से जागीरदार के पास पहुंच गया किंतु दादर पहुंचने से पहले ही बेगम नादिरा बानूं का निधन हो गया। दादर का जागीरदार मलिक जीवां किसी समय शाहजहाँ के दरबार में अमीर हुआ करता था।

एक बार शाहजहाँ (Shahjahan) ने किसी बात से नाराज होकर मलिक जीवां को मृत्यु-दण्ड की सजा दी थी। तब दारा शिकोह (Dara Shikoh) ने अपने बाप के कदमों में गिरकर मलिक जीवां के प्राणों की रक्षा की थी। इस पर शाहजहाँ ने मलिक जीवां को मुगल सल्तनत (Mughal Sultanate) से बाहर चले जाने का आदेश सुनाया था।

तब से मलिक जीवां मुगल सल्तनत की सीमा के उस पार रहता था। यहीं उसने स्थानीय शासक से छोटी सी जागीर प्राप्त कर ली थी। 6 जून 1661 को दारा वहाँ पहुंचा। मलिक जीवां ने शहजादे का स्वागत किया तथा बड़े आदर से अपने घर में शहजादे के रहने का प्रबंध किया।

कुछ समय बाद जीवां के मन में पाप आ गया। उसने सोचा कि वह दारा शिकोह को पकड़कर औरंगजेब (Aurangzeb) को सौंप दे तो वह फिर से मुगल दरबार में बड़ा पद पा सकता है। इस लालच में आकर पापी मलिक जीवां ने दारा को उसके छोटे पुत्र सिपहर शिकोह तथा दो पुत्रियों सहित गिरफ्तार कर लिया और दुष्ट बहादुर खाँ के हाथों में सौंप दिया जो अजमेर से अब तक दारा का पीछा कर रहा था।

दारा शिकोह (Dara Shikoh) की गिरफ्तारी से पूरे भारत में हा-हाकर मच गया। दुष्ट और छली षड़यंत्रकारियों की विजय हो गई तथा हिन्दुओं का एक मित्र उनसे हमेशा के लिए छिन गया।

शाही बंदियों को पकड़कर दिल्ली लाया गया। दिल्ली का लाल किला (Red Fort) एक बार फिर दारा की आंखों के सामने था। जिसके लिए यह सारी मारकाट मची थी। बहादुर खाँ की सिफारिश पर औरंगजेब (Aurangzeb) ने विश्वासघाती मलिक जीवां को एक हजार का मनसब दिया तथा उसका नाम बख्तियार खाँ रख दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शहजादी रौशन आरा (32)

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शहजादी रौशन आरा

शहजादी रौशन आरा (Roshanara Begum) ने अपने भाई दारा शिकोह (Dara Shikoh) के लिए प्राणदण्ड की मांग की! दरअसल वह अपने आप को उत्तराधिकार के युद्ध की वास्तविक विजेता मानती थी। उसे पता नहीं था कि यही उसके जीवन की सबसे बड़ी पराजय है।

29 अगस्त 1661 को औरंगजेब (Aurangzeb) के आदेश से दारा शिकोह (Dara Shikoh) तथा उसके 14 वर्षीय पुत्र सिपहर शिकोह को फटे हुए कपड़े पहनाए गए तथा उनके सिरों पर मैले-कुचैले कपड़ों की पगड़ियां बांधी गईं और बाप-बेटों को एक छोटे कद की कुरूप सी हथिनी पर बैठाकर दिल्ली की सड़कों पर घुमाया गया।

भयंकर शक्ल वाला तातारी गुलाम नजरबेग इस समय दिल्ली के कैदखाने का मुखिया था। वह हाथ में नंगी तलवार लेकर एक ऊंची सी हथिनी पर सवार हुआ तथा दुर्भाग्यशाली शहजादों के पीछे-पीछे चला।

लकदक करते रेशमी कपड़ों, रत्न-जड़ित पगड़ियों, चमचमाते हीरे-जवाहरातों से लदे हुए दारा शिकोह (Dara Shikoh) और उसके पुत्र जाने कितनी ही बार दिल्ली की सड़कों पर सिंहल द्वीप के पेरू हाथियों पर बैठकर निकले थे। दारा ने न जाने कितने मन अशर्फियां इन्हीं सड़कों पर दीन-दुखियों को लुटाई थीं। आज दिल्ली की जनता उन्हें इस हालत में देखकर हाहाकार कर उठी।

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अपमान की इस घड़ी में दारा सिर झुकाए हुए बैठा था, लोग उसकी जय बोलते थे किंतु दारा आंख उठाकर भी उनकी ओर नहीं देखता था। कितने ही लोग फूट-फूट कर रोने लगे और औरंगजेब (Aurangzeb) पर लानत भेजने लगे। हालांकि बादशाह पर लानत भेजना दण्डनीय अपराध था किंतु दारा के दुर्भाग्य को देखकर वे अपने ऊपर आने वाली विपत्ति को भी भूल गए थे।

शाम के समय दारा तथा सिपहर शिकोह को खवासपुरा ले जाया गया और वहाँ अंधेरी कोठरी में डाल दिया गया।

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दारा शिकोह (Dara Shikoh) की इस लोकप्रियता को देखकर औरंगजेब विचलित हो गया। उसी शाम उसने अपने दरबारियों की एक बैठक बुलाई तथा दारा के भविष्य के बारे में उनकी राय पूछी। दानिशमंद खाँ नामक एक अमीर ने साहस करके औरंगजेब (Aurangzeb) से प्रार्थना की कि दारा की जान बख्श दे किंतु शहजादी रौशन आरा (Roshanara Begum) तथा दारा के मामा शाइस्ता खाँ (Shaista Khan) ने दारा शिकोह के लिए भयानक मौत की मांग की। शहजादी रौशन आरा दुनिया की पहली बहिन होगी जिसने अपने भाई के प्राणों की रक्षा करने के स्थान पर उसके प्राण लेने की इच्छा व्यक्त की। इसी प्रकार शाइस्ता खाँ दुनिया का पहला मामा होगा जिसने अपने भांजे के प्राणों की रक्षा करने के स्थान पर उसके प्राण लेने में रुचि दिखाई जबकि दारा ने शायद ही कभी अपनी बहिन शहजादी रौशन आरा (Roshanara Begum) और मामा शाइस्ता खाँ को कोई नुक्सान पहुंचाया था। जब औरंगजेब के दरबार में दारा को लेकर दो मत हो गए तो औरंगजेब ने एक न्याय समिति गठित की जिसमें इस्लाम के उच्च जानकारों को लिया गया। इस समिति ने एक स्वर से दारा को काफिर तथा इस्लाम का गुनहगार घोषित किया तथा उसका सिर कलम किए जाने की सिफारिश की।

जब यह समाचार दिल्ली में फैल गया कि दारा शिकोह (Dara Shikoh) का सिर कलम किया जाएगा तो 30 अगस्त 1659 को जनता ने विश्वासघाती मलिक जीवां को दिल्ली की सड़कों पर घेर कर उस पर हमला कर दिया। औरंगजेब (Aurangzeb) समझ गया कि दारा को एक भी दिन जीवित रखना खतरे को आमंत्रण देना है। इसलिए उसी रात भयानक शक्ल वाला नजरबेग हाथ में नंगी तलवार लेकर दारा की कोठरी में घुस गया। दारा ने भयभीत होकर अपने पुत्र सिपहर शिकोह को अपनी छाती से चिपका लिया।

दुष्ट नजरबेग और उसके साथियों ने दारा के हाथों से सिपहर शिकोह को छीन लिया और दारा के टुकड़े-टुकड़े कर डाले।

कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि दारा शिकोह (Dara Shikoh) का कटा हुआ सिर शाहजहाँ के पास आगरा भेज दिया गया किंतु शाहजहाँ (Shahjahan)ने दारा का सिर देखने से मना कर दिया। दारा के धड़ को हाथी पर रखकर दिल्ली की सड़कों तथा गलियों में घुमाया गया और अन्त में हुमायूँ के मकबरे (Tomb of Humayun) में दफना दिया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सुलेमान शिकोह (33)

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सुलेमान शिकोह

सुलेमान शिकोह (Suleman Shikoh) अपने पिता दारा शिकोह (Dara Shikoh) का बड़ा पुत्र था। सबको लगता था कि शाहजहाँ (Shahjahan) के बाद दारा शिकोह और दारा शिकोह के बाद सुलेमान शिकोह हिन्दुस्तान का बादशाह तथा लाल किलों (Red Forts of Agra and Delhi) का मालिक होगा। इसलिए सुलेमान बड़े उत्साह से राजकाज एवं युद्धों में भाग लेता था।

जब दारा ने सुलेमान (Suleman Shikoh) को शाहशुजा (Shah Shuja) का दमन करने के लिए बनारस की तरफ भेजा था तो सुलेमान शिकोह ने बड़ी बुद्धिमानी से काम लिया था तथा अपने चाचा शाहशुजा को ऐसे स्थान पर घेर लिया था जहाँ से शाहशुजा का बचना कठिन था किंतु शाहशुजा ने संधि का प्रस्ताव करके अपनी जान बचा ली।

इसके बाद सुलेमान को तुरंत आगरा लौट आने का शाही फरमान मिला था क्योंकि औरंगजेब (Aurangzeb) तथा मुरादबक्श दक्किन की ओर से आगरा की तरफ बढ़े चले आ रहे थे। उस समय आम्बेर नरेश जयसिंह (Mirza Raja Jaisingh) भी सुलेमान शिकोह के साथ ही था।

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जब सुलेमान शिकोह (Suleman Shikoh) तथा महाराजा जयसिंह (Mirza Raja Jaisingh) इलाहाबाद से 105 मील पश्चिम में थे तब उन्हें सामूगढ़ की पराजय के समाचार मिले। इन समाचारों के मिलते ही महाराजा जयसिंह ने सुलेमान को छोड़ दिया तथा महाराजा जयसिंह भागकर औरंगजेब (Aurangzeb) की तरफ चला गया। कृतघ्न दिलेर खाँ तथा बहुत से अन्य शाही अमीर एवं हाकिम भी वहीं से औरंगजेब के पक्ष में चले गए।

जब सुलेमान शिकोह (Suleman Shikoh) आगरा पहुंचा तो उसे ज्ञात हुआ कि उसका पिता तो रात्रि में तीन बजे ही अपने हरम एवं खजाने को लेकर दिल्ली की तरफ चला गया है तो सुलेमान भी दिल्ली के लिए रवाना हो गया। जब वह दिल्ली जा रहा था तो उसे ज्ञात हुआ कि उसका पिता दारा शिकोह पंजाब चला गया है। इस पर सुलेमान दिल्ली न जाकर पंजाब के लिए मुड़ गया।

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मार्ग में ही उसे समाचार मिले कि दारा शिकोह पंजाब से गुजरात की तरफ चला गया है तो सुलेमान गढ़वाल चला गया। गढ़वाल के हिन्दू राजा पृथ्वीसिंह ने सुलेमान शिकोह को इस शर्त पर शरण दी कि वह अपनी सेना को गढ़वाल राज्य की सीमा पर ही छोड़ दे तथा केवल अपने परिवार एवं 17 नौकरों के साथ राजधानी श्रीनगर में प्रवेश करे। कुछ समय बाद जब औरंगजेब (Aurangzeb) ने दारा शिकोह को मार डाला तब औरंगजेब का ध्यान सुलेमान की ओर गया। इस समय तक सुलेमान को श्रीनगर में रहते हुए एक साल हो चुका था। औरंगजेब ने राजा पृथ्वीसिंह को आदेश भिजवाए कि वह सुलेमान को पकड़कर हमारे पास भेज दे। राजा पृथ्वीसिंह ने शरणागत शहजादे के साथ विश्वासघात करने से मना कर दिया परंतु पृथ्वीसिंह के पुत्र मेदिनी सिंह ने सुलेमान शिकोह को पकड़कर औरंगजेब को सौंपने का निश्चय किया ताकि मुगलिया सल्तनत का विश्वासपात्र बन सके। जब सुलेमान शिकोह को राजकुमार मेदिनी सिंह के इस निश्चय के बारे में ज्ञात हुआ तो सुलेमान शिकोह श्रीनगर से भाग खड़ा हुआ। उसका विचार लद्दाख जाने का था। राजकुमार मेदिनीसिंह की सेना ने सुलेमान और उसके आदमियों का पीछा किया तथा सुलेमान को पकड़ लिया।

राजकुमार मेदिनीसिंह के सैनिकों से हुए युद्ध में शहजादा सुलेमान बुरी तरह घायल हो गया। उसी घायल अवस्था में सुलेमान को औरंगजेब (Aurangzeb) की सेना के हाथों में सौंप दिया गया। औरंगजेब की सेना शहजादे को पकड़कर औरंगजेब के पास दिल्ली ले आई।

6 जनवरी 1661 को सुलेमान शिकोह (Suleman Shikoh) अपने चाचा औरंगजेब के समक्ष प्रस्तुत किया गया। सुलेमान ने अपने चाचा से अपने प्राणों की भीख मांगी तथा अनुरोध किया कि मुझे पोस्ता नहीं पिलाया जाए। उन दिनों मुगल बादशाह अपने कुल के शहजादों को अत्यधिक मात्रा में पोस्ता पिलाते थे जिससे शहजादा अपनी शारीरिक एवं मानसिक शक्ति खोने लगता था तथा कुछ ही दिनों में कमजोर होकर मर जाता था। औरंगजेब (Aurangzeb) ने सुलेमान से बहुत मीठे शब्दों में बात की तथा उसे वचन दिया कि उसे पोस्ता नहीं पिलाया जाएगा।

इसके बाद सुलेमान शिकोह (Suleman Shikoh) को ग्वालियर के दुर्ग में ले जाकर बंद कर दिया गया। वहाँ सुलेमान को प्रतिदिन बड़ी मात्रा में अफीम पिलाई जाती थी। इस अफीम के कारण मई 1662 में सुलेमान स्वयं ही मर गया। इस प्रकार चार वर्ष की अवधि में औरंगजेब (Aurangzeb) ने अपने समस्त भाइयों तथा भतीजों की नृशंसता पूर्वक हत्या करवा दी। उसका यह काम ठीक वैसा ही था जैसा शाहजहाँ (Shahjahan) ने अपने भाइयों तथा भतीजों के साथ किया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जहानआरा के अहसान (34)

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जहानआरा के अहसान

औरंगजेब (Aurangzeb) ने अपने पिता शाहजहाँ (Shahjahan) के साथ अपनी बड़ी बहिन जहानआरा बेगम (Jahanara Begum) को बंदी बना तो लिया था किंतु औरंगजेब पर जहानआरा के अहसान इतने थे कि औरंगजेब उन्हें चाह कर भी भुला नहीं सकता था।

शहजादी जहानआरा का जन्म 23 मार्च 1614 को अजमेर में हुआ था। वह शाहजहाँ (Shahjahan) एवं मुमताज महल बेगम (Mumtaz Begum) की सबसे बड़ी संतान थी। उसे ऊपर वाले ने जितना सुंदर रूप और लावण्य दिया था, उतना ही सुंदर दिल, उठने-बैठने का सलीका और गरिमामय व्यक्तित्व भी दिया था। इस कारण जहानआरा बचपन से ही सबकी लाड़ली थी।

जहानआरा (Jahanara Begum) ने अरबी, फारसी तथा तुर्की भाषाओं का अध्ययन किया और अपने परबाबाओं हुमायूँ (Humayun) एवं अकबर (Akbar) द्वारा बनाई गई लाइब्रेरी की सैंकड़ों पुस्तकें पढ़ डालीं। इस कारण वह विभिन्न भाषाओं एवं विषयों में निष्णात हो गई थी। उसने भारतीय संस्कृत साहित्य एवं सूफी साहित्य का भी अच्छा अध्ययन किया था।

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जहानआरा बेगम (Jahanara Begum) ने कुरान का भी बहुत गहन अध्ययन किया था किंतु वह भी अपने परबाबा अकबर (Akbar) तथा भाई दारा शिकोह (Dara Shikoh) की तरह सूफी मत से अधिक प्रभावित थी। जहानआरा को चिकित्सा शास्त्र का बहुत अच्छा ज्ञान था। वह कशीदाकारी करने, चित्रकारी करने तथा गृहसज्जा करने में भी बहुत रुचि लेती थी।

जहानआरा बेगम (Jahanara Begum) अपनी माँ मुमताज महल बेगम (Mumtaz Begum) की तरह शतरंज बहुत अच्छा खेलती थी। उसे घुड़सवारी करने, पोलो खेलने तथा शिकार पर जाने का भी बड़ा शौक था। यदि उस जमाने में औरतों को उत्तराधिकार के रूप में बादशाहत करने का अवसर दिया जाता तो निःसंदेह शहजादी जहानआरा ही शाहजहाँ की पहली पसंद होती।

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ई.1631 में जब मुमताज महल बेगम (Mumtaz Begum) अपनी चौदहवीं संतान गौहरआरा को जन्म देते समय मृत्यु को प्राप्त हुई तब जहानआरा 17 साल की युवती थी। मुमताज महल की मौत से शाहजहाँ को इतना गहरा सदमा लगा कि उसने दरबार में जाना बंद कर दिया और अपनी ख्वाबगाह के शमांदान और फानूस बुझाकर दिन-रात आंसू बहाने लगा। शहजादी जहानआरा ने अपनी स्नेहशील वाणी और पुस्तकीय ज्ञान के बल पर अपने पिता को शोक के गहरे खड्डे से बाहर निकाला तथा फिर से राजकाज संभालने के लिए प्रेरित किया। इतना ही नहीं, जहानआरा ने अपनी मरहूम माँ के सात छोटे बच्चों को भी माँ का प्यार दिया जिनमें से औरंगजेब (Aurangzeb) भी एक था जो अपनी बहन जहानआरा से लगभग पांच साल छोटा था। औरंगजेब पर जहानआरा बेगम (Jahanara Begum) के अहसान यहीं से आरम्भ हो गए थे। जिद्दी और हठी स्वभाव का किशोरवय औरंगजेब सदा अपने भाई-बहिनों से झगड़ता रहता था, जहानआरा उसके झगड़ों को सुलझाती थी और औरंगजेब को संतुष्ट करने का प्रयास करती थी। शाहजहाँ तो अपनी बेटी जहानआरा के अहसान की कीमत समझता था किंतु चारों शहजादे कृतघ्नता के वातावरण में पलकर बड़े हुए थे इसलिए वे अहसान शब्द से कभी परिचित ही नहीं हो सके।

जहानआरा के इस ममत्व को देखकर शाहजहाँ (Shahjahan) ने अपनी इस समझदार बेटी को ही शाह बेगम (Shah Begum) घोषित कर दिया। मुगलिया सल्तनत में इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था!

अकबर (Akbar) के जमाने में शाह-बेगम (Shah Begum) का खिताब अकबर की बेगम मरियम जमानी के पास था जो आम्बेर के कच्छवाहों की राजकुमारी थी। जहांगीर के जमाने में यह खिताब जहांगीर की बेगम नूरजहां के पास रहा जो एक ईरानी अमीर की बेटी थी। शाहजहाँ के बादशाह बनने पर यह खिताब उसकी चहेती मुमताज महल बेगम (Mumtaz Begum) को दिया गया जो शाहजहाँ की ममेरी बहिन भी थी।

परम्परा की दृष्टि से मुमताज महल की मृत्यु के बाद शाह-बेगम (Shah Begum) का खिताब शाहजहाँ (Shahjahan) की किसी अन्य बेगम को मिलना चाहिए था किंतु बादशाह ने अपनी बेटी जहानआरा (Jahanara Begum) को यह खिताब दे दिया जो न केवल बुद्धिमती एवं व्यवहार-कुशल थी अपितु राजकाज चलाने में भी चतुर थी। वह मुगलिया अमीरों एवं हिन्दू राजाओं से पूरे आत्मविश्वास के साथ बात करती थी जिन्हें मुगलिया सल्तनत में सूबेदार एवं जमींदार कहा जाता था।

जहानआरा बेगम (Jahanara Begum) ने अपने पिता के उत्तराधिकारी के रूप में भले ही दारा शिकोह (Dara Shikoh) का चयन किया था किंतु वह अपने चारों भाइयों से प्रेम करती थी। ई.1644 में जब औरंगजेब 26 साल का था, तब उसने अपने पिता शाहजहाँ (Shahjahan) के आदेशों की अवहेलना करके उसे नाराज कर दिया तथा शाहजहाँ ने औरंगजेब (Aurangzeb) से उसका मनसब और पद छीन लिए। ऐसी स्थिति में जहानआरा ने अपने पिता को प्रसन्न करके औरंगजेब को माफी दिलवाई थी तथा उसके मनसब और पद फिर से बहाल करवाए थे।

जहानआरा बेगम (Jahanara Begum) के कहने पर शाहजहाँ (Shahjahan) ने औरंगजेब को भले ही क्षमा कर दिया था किंतु वह कभी भी औरंगजेब को दिल से माफ नहीं कर सका। उसने औरंगजेब को राजधानी दिल्ली से दूर रखने का निर्णय लिया तथा उसे फिर से दक्षिण के मोर्चे पर चले जाने के आदेश दिए।

पिता के इस कठोर रुख से औरंगजेब (Aurangzeb) को निराशा ने घेर लिया। ऐसी स्थिति में जहानआरा ने उद्दण्ड औरंगजेब को सल्तनत में पुनर्प्रतिष्ठित करवाया। जहानआरा द्वारा औरंगजेब पर किया गया यह उपकार इतना बड़ा था कि औरंगजेब उसे कभी भुला नहीं सकता था।

आज वही जहानआरा बेगम (Jahanara Begum) औरंगजेब की बंदी थी। यह सोचकर औरंगजेब (Aurangzeb) का दिल भर आता था किंतु वह परिस्थितियों के आगे विवश था। जहानआरा किसी भी स्थिति में अपने पिता शाहजहाँ (Shahjahan) को अकेला नहीं छोड़ना चाहती थी और औरंगजेब किसी भी स्थिति में पिता को आजाद नहीं कर सकता था!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शहजादी जहानआरा (35)

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शहजादी जहानआरा

आग की लपटों में घिर गई शहजादी जहानआरा (Shahzadi Jahanara Begum) ! किसी भी मुगल शहजादी ने इससे पहले या इसके बाद इस तरह की आग स्वप्न में भी नहीं देखी होगी।

शहजादी जहानआरा (Jahanara Begum) औरंगजेब (Aurangzeb) की कैद में थी, यह सोच-सोचकर स्वयं औरंगजेब ही हैरान हो जाता था। उसे पुराने दिन याद आते थे जब वह अपने भाई-बहिनों से झगड़ा हो जाने पर अपनी बहिन के आंचल में पनाह पाता था। उसे वे दिन भी रह-रहकर याद आते थे जब जहानआरा द्वारा औरंगजेब को शाहजहाँ से माफी दिलाए जाने के बाद औरंगजेब राजधानी दिल्ली छोड़कर अपने मामा शाइस्ता खाँ के साथ दक्षिण के मोर्चे पर जा रहा था।

औरंगजेब (Aurangzeb) अभी दिल्ली से अधिक दूर नहीं गया था कि उसे राह में शाही फरमान मिला कि शहजादी जहानआरा (Jahanara Begum) बीमार है, इसलिए वह चाहे तो अपनी बहिन से मिलने के लिए दिल्ली आ सकता है।

इस परवाने के मिलते ही औरंगजेब (Aurangzeb) अपने मामा शाइस्ता खाँ (Shaista Khan) को लेकर बीच रास्ते से ही दिल्ली के लिए लौट लिया था। जब उसने अपनी बहिन की यह हालत देखी तो वह सन्न रह गया। संसार में और किसी से न सही, वह अपनी बहिन जहानआरा से बहुत प्रेम करता था। उसकी नेकदिल बहिन पर कुदरत ने इतना बड़ा जुल्म किया था कि औरंगजेब का नेकी पर से विश्वास ही उठ गया।

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हुआ यह था कि जहानआरा (Jahanara Begum) के महल में एक दासी नृत्य कर रही थी। इस दौरान वह एक शमादान के काफी निकट चली गई और उसके कपड़ों में लगे इत्र के तेल ने आग पकड़ ली। रहमदिल जहानआरा ने जब दासी के कपड़ों से लपटें निकलती हुई देखीं तो वह आग बुझाने के लिए दौड़ी। नर्तकी का तो पता नहीं क्या हुआ क्योंकि इतिहास में उसका उल्लेख नहीं मिलता किंतु इस प्रयास में जहानआरा के स्वयं के कपड़ों में लगे इत्र के तेल ने आग पकड़ ली और जहानआरा भयानक लपटों में घिर गई।

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जहानआरा (Jahanara Begum) का शरीर बुरी तरह जल गया जिससे पूरे शरीर पर जख्म हो गए। आग की लटपों ने जहानआरा की छाती पर बुरी तरह कहर ढाया था तथा आंच की गर्मी उसके हृदय तक पहुंच गई थी। इस कारण शहजादी के बचने की कोई संभावना नहीं रही। इस अप्रत्याशित दुर्घटना से शाहजहाँ (Shahjahan) बुरी तरह घबरा गया। उसने बेटी की सलामती के लिए मस्जिदों, मजारों एवं आस्तानों पर दुआएं करवाईं। सैंकड़ों कैदियों को रिहा किया, गरीबों में धन-सम्पत्ति, भोजन और कपड़ा बंटवाया तथा देश-विदेश के विख्यात हकीमों को शहजादी के इलाज के लिए बुलवाया। जहानआरा कभी भी मर सकती थी, इसलिए औरंगजेब (Aurangzeb), मुरादबक्श (Murad Bakhsh) तथा शाहशुजा (Shah Shuja) को दिल्ली बुलवाया गया ताकि वे अपनी बहिन से अंतिम बार मिल सकें। दारा तो सदा से बादशाह के पास नियुक्त था ही। बेटी की ऐसी हालत देखकर शाहजहाँ गहरे शोक में डूब गया। उसने राजकाज त्याग दिया और दरबार में जाना बंद कर दिया। वह हर समय बेटी के पास बैठकर आंसू बहाता रहता। एक साल तक देश-विदेश से आए हकीम और वैद्य शाह-बेगम जहानआरा (Jahanara Begum) का इलाज करते रहे।

अंत में शाहजहाँ के भाग्य से दुआएं और दवाएं असर लाईं तथा जहानआरा मौत के मुंह से बाहर आ गई। लगभग एक साल में उसके शरीर के जख्म भर पाए। इसके बाद शाहबेगम जहानआरा जियारत करने के लिए ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर अजमेर गई।

अपने परबाबा अकबर (Akbar) की तरह जहानआरा भी जिंदगी भर मुइनुद्दीन चिश्ती (Muiniddin Chishti) की अहसानमंद रही और इस घटना के बाद जियारत करने के लिए कई बार अजमेर आई। 

शाह-बेगम के स्वस्थ होने की खुशी में शाहजहाँ (Shahjahan) ने अपने खजाने के मुंह खोल दिए। गरीब जनता में धन बंटवाया गया और फकीरों की झोलियां चांदी के सिक्कों से भर दी गईं। जब जहानआरा बिस्तर से उठी तो बादशाह ने अपने खजाने के सबसे कीमती हीरे और जवाहरात उसे भेंट किए तथा सूरत के बंदरगाह (Surat Bandargah) से होने वाली आय भी उसी के नाम कर दी।

यदि कोहिनूर हीरा, तख्ते ताउस और दिल्ली तथा आगरा के लाल किले (Red forts of Delhi and Agra) छोड़े दिए जाएं तो दुनिया की ऐसी कोई महंगी चीज नहीं थी जो उस समय जहानआरा (Jahanara Begum) के पास नहीं थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जहानआरा की दौलत (36)

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जहानआरा की दौलत

मुगलिया सल्तनत की सबसे अमीर औरत थी जहानआरा बेगम (Jahanara Begum) ! जहानआरा की दौलत इतनी अधिक थी कि उसकी वास्तविक दौलत का सही अनुमान तो स्वयं जहानआरा को भी नहीं था।

शाह बेगम (Shah Begum) की पदवी मिल जाने के कारण जहानआरा को शासन में सीधे हस्तक्षेप करने के अधिकार मिल गए थे। इसी कारण उसे बेगम-साहिब भी कहा जाता था। जबकि दूसरी शहजादियां उनके नामों से बुलाई जाती थीं। बादशाह की जो शाही मुहर पहले मुमताज महल (Mumtaz Mahal) के पास रहती थी, अब जहानआरा (Jahanara) के पास रहने लगी। वह लोगों की जिंदगी का फैसला करने लगी। बहुत से लोगों को उसने शाही कहर तथा अमीरों के अत्याचारों से बचाया और उनकी जान बख्शी।

शाहजहाँ (Shahjahan) ने जहानआरा की बुद्धिमत्ता और शासन दक्षता से प्रसन्न होकर उसे ‘साहिबात अल जमानी’ का खिताब दिया था जिसका अर्थ होता है ‘अपने युग की महिला, ….. लेडी ऑफ द एरा।’ सल्तनत में उसका रुतबा इतना बड़ा था कि जहानआरा ने आगरा के लाल किले (Red Fort of Agra) से बाहर अपना महल बना रखा था जिसमें वह सुल्तानों की तरह शान से रहा करती थी।

जहानआरा (Jahanara) के इस रुतबे के कारण उससे ईर्ष्या रखने वाली मुगलिया हरम की बेगमें और शहजादियां, जहानआरा के बारे में कुत्सित अफवाहें फैलाती थीं तथा उसे बादशाह की रखैल तक कहने में नहीं चूकती थीं! जहानआरा की दौलत के किस्से पूरी सल्तनत में चटखारे लेकर कहे जाते थे।

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जब शाहजहाँ अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली ले आया तब भी जहानआरा (Jahanara), लाल किले (Red Fort of Delhi) में स्थित शाही महलों से अलग महल बनाकर रहा करती थी ताकि सल्तनत के अमीर-उमराव उससे निश्चिंत होकर मिल सकें।

जब तक शाहजहाँ (Shahjahan) बादशाह था, तब तक जहानआरा ही मुगललिया सल्तनत (Mughal Sultanate) की सबसे ताकतवर औरत थी। उसके प्रयासों का ही फल था कि शाहजहाँ ने अपने चार पुत्रों में से दारा शिकोह (Dara Shikoh) को अपना उत्तराधिकारी अर्थात् वली-ए-अहद घोषित किया था जिसने एक भी युद्ध नहीं जीता था।

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जब से शाहजहाँ (Shahjahan) बादशाह बना था, उसने अपने बच्चों में सबसे अधिक धन जहानआरा (Jahanara) को ही दिया था। इस कारण मुगललिया सल्तनत में बादशाह के बाद जहानआरा ही सबसे अधिक धनवान थी। 6 फरवरी 1628 को जब शाहजहाँ बादशाह बना था, उसी दिन शाहजहाँ ने जहानआरा को सोने की एक लाख ईरानी अशर्फियां, सोने की चार लाख मुगलिया अशर्फियां तथा 6 लाख रुपए सालाना आय वाली जागीरें प्रदान की थीं। इस कारण वह बहुत धनी हो गई थी। ई.1631 में जब मुमताजमहल की मृत्यु हुई तो मुमताज महल (Mumtaz Mahal) के पास सोने की एक लाख ईरानी अशर्फियां, सोने की 6 लाख मुगलिया अशर्फियां तथा 10 लाख रुपए वार्षिक आय वाली जागीरें थी। शाहजहाँ ने मुमताज महल की सम्पत्ति में से आधी सम्पत्ति शाह बेगम जहानआरा को दे दी तथा शेष आधी सम्पत्ति मुमताज महल के बाकी के बच्चों में बांट दी। इस सम्पत्ति के अलावा भी जहानआरा के पास कई गांव, हवेलियां, बाग, महल आदि थे जिनसे उसे प्रतिवर्ष अच्छी आय होती थी। अचरोल, फरजाहरा, बाछोल, सफापुरा तथा दोहारा आदि सरकारें जहानआरा की व्यक्तिगत जागीर में थीं। सूरत का बंदरगाह और पानीपत का परगना भी उसकी जागीर में था।

जहानआरा (Jahanara) के जहाज सूरत (Surat Ka Bandargah) से लेकर एशिया एवं अफ्रीका महाद्वीपों के बीच स्थित लाल सागर तक जाते थे जिनके माध्यम से नील, सूती कपड़ों तथा मसालों का व्यापार होता था। अंग्रेजों एवं डच व्यापारियों के जहाज भारत से माल भरकर सूरत बंदरगाह से यूरोप के लिए जाते थे। इस बंदरगाह की मालकिन होने के कारण इस माल पर ली जाने वाली चुंगी से वह मालामाल हो गई थी।

यदि यह कहा जाए कि जहानआरा की दौलत के सामने कारूं का खजाना भी फीका था, तो इसमें कोई अतिश्याक्ति नहीं होगी। इस धन का उपयोग जहानआरा (Jahanara) निर्धनों की सहायता करने तथा मस्जिदें बनवाने में किया करती थी। वह हर साल अपने जहाजों में चावल भरकर मक्का और मदीना भिजवाया करती थी जहाँ उसे गरीबों में बांट दिया जाता था। कहने की आवश्यकता नहीं कि मुगल सल्तनत में निर्धन जनता का आशय केवल निर्धन मुसलमान व्यक्ति से होता था। जहानआरा भी निर्धन जनता के नाम पर निर्धन मुसलमान परिवारों की सहायता करती थी।

ई.1658 में शाहजहाँ (Shahjahan) के पुत्रों में हुए उत्तराधिकार के युद्ध में जहानआरा (Jahanara) ने पूरी शक्ति के साथ दारा शिकोह (Dara Shikoh) का साथ दिया था किंतु भाग्य के लेखे, भाइयों के धोखे तथा दारा की अयोग्यताओं के कारण दारा शिकोह औरंगजेब (Aurangzeb) से परास्त हो गया। औरंगजेब ने अपने तीनों भाइयों को मार डाला, पिता को बंदी बना लिया और जहानआरा से शाह बेगम (Shah Begum) की पदवी छीनकर रौशनआरा (Roshanara Begum) को दे दी जिसने उत्तराधिकार (Uttaradhikar Ka Yuddh or war of succession) के युद्ध में औरंगजेब का पक्ष लिया था।

इस समय जहानआरा 44 साल की प्रौढ़ हो चुकी थी। जब औरंगजेब (Aurangzeb) ने शाहजहाँ (Shahjahan) को बंदी बना लिया तो जहानआरा (Jahanara) ने अपने समस्त ऐश्वर्य का त्याग करके आगरा के लाल किले (Red Fort of Agra) में बंदी की तरह रहना स्वीकार किया। वह उन दिनों को कैसे भूल सकती थी जब उसका पिता अपनी बादशाहत छोड़कर अपनी बीमार बेटी के सिराहने बैठा हुआ रोता रहता था!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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