Monday, September 20, 2021

अध्याय – 28 (अ) : शाहजहाँ (1628-1658 ई.)

प्रारम्भिक जीवन

शाहजहाँ का वास्तविक नाम खुर्रम था। उसका जन्म 5 जनवरी 1592 को लाहौर में हुआ। उसकी माता का नाम जोधाबाई था जिसे जगत गोसाइन भी कहते थे। वह मारवाड़ के राजा उदयसिंह की पुत्री थी। खुर्रम का पालन-पोषण उसकी दादी सुल्ताना बेगम ने बड़े लाड़ से किया था। वह अपने बाबा अकबर का प्रिय था। जब खुर्रम ने दक्षिण में उल्लेखनीय सफलताएँ प्राप्त कीं तब जहाँगीर ने उसे शाहजहाँ की उपाधि दी। शाहजहाँ अपने पिता का तीसरा पुत्र था। वह अपने भाइयों में सबसे योग्य तथा महत्त्वाकांक्षी था। उसे बौद्धिक तथा व्यावहारिक दोनों प्रकार की शिक्षा मिली। इस कारण उसने कम आयु से ही योग्यता का परिचय देना आरम्भ किया। शहजादे खुसरो के विद्रोह कर देने से शाहजहाँ को उन्नति करने का अवसर प्राप्त हो गया। वह जहाँगीर तथा नूरजहाँ दोनों का प्रिय बन गया जिसके फलस्वरूप उसे महत्त्वपूर्ण युद्धों में भेजा जाने लगा। शाहजहाँ को इन युद्धों में विजय प्राप्त हुई और सम्पूर्ण मुगल सल्तनत में उसकी प्रसिद्धि हो गई। 1618 ई. में शाहजहाँ का विवाह नूरजहाँ के बड़े भाई आसफखाँ की पुत्री अर्जुमन्द बानू बेगम से हुआ। इस कारण शाहजहाँ को अपने पिता जहाँगीर की चहेती बेगम नूरजहाँ, नूरजहाँ के पिता एतिमादुद्दौला जो प्रधानमन्त्री के पद पर आसीन था और नूरजहाँ के भाई आसफखाँ, जो साम्राज्य का दीवान था, का समर्थन प्राप्त हो गया।

तख्त की प्राप्ति

बाबर के बाद से ही मुगल शहजादों में तख्त के उत्तराधिकार के लिये युद्ध होते आये थे। शाहजहाँ में भी अन्य शहजादों की भांति बादशाह बनने की इच्छा प्रबल थी। ज्यों-ज्यों जहाँगीर का स्वास्थ्य गिरता गया त्यों-त्यों शाहजहाँ में तख्त प्राप्त करने की इच्छा तीव्र होती गई। उसका पहला प्रतिद्वन्द्वी शाहजादा खुसरो था। शाहजहाँ ने बुरहानपुर के दुर्ग में खुसरो की हत्या करवा दी। शाहजहाँ का दूसरा प्रतिद्वन्द्वी परवेज था जिसे महाबतखाँ का समर्थन प्राप्त था किंतु वह अत्यधिक मदिरापान करने से मर गया। शाहजहाँ का तीसरा प्रतिद्वन्द्वी शहरियार था, जो नूरजहाँ का दामाद होने के कारण काफी शक्तिशाली था परन्तु शाहजहाँ की तुलना में अयोग्य था। परवेज की मृत्यु तथा महाबतखाँ के विद्रोह के बाद महाबतखाँ को शाही समर्थन समाप्त हो गया और वह शाहजहाँ से मिल गया। इससे शाहजहाँ का पक्ष प्रबल हो गया।

शाहजहाँ का ससुर आसफखाँ चालाक राजनीतिज्ञ था। वह शाहजहाँ को मुगलों के तख्त पर बैठाने के लिये निरंतर प्रयास करता रहा। जहाँगीर के आँख बंद करते ही आसफखाँ ने शाहजहाँ के प्रतिद्वन्द्वियों को उन्मूलित करना आरम्भ कर दिया और शाहजहाँ के आगरा पहुँचने के पहले ही वह उसके लिये तख्त का समस्त प्रबंध कर दिया। इस प्रकार शाहजहाँ अपने भाइयों तथा भतीजों का नृशंसतापूर्वक वध करके 6 फरवरी 1628 को आगरा में तख्त पर बैठा। उसने अपने नाम का खुतबा पढ़वाया और अपने नाम की मुद्राएँ चलवाईं। इस अवसर पर उसने अपने सम्बन्धियों तथा अमीरों को उपहार दिये तथा अपने समर्थकों को पदों एवं उपाधियों से पुरस्कृत किया। आसफखाँ का मनसब बढ़ाकर उसे प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त किया। महाबतखाँ का भी मनसब बढ़ाया गया और उसे खानखाना की उपाधि दी गई। यह उपाधि मुगल सल्तनत के प्रधान सेनापति को दी जाती थी। महाबतखाँ के पुत्र खान-ए-जहाँ को मालवा का शासक बना दिया गया। अन्य समर्थकों को भी इसी प्रकार पुरस्कृत किया गया।

विद्रोहों का दमन

जुझारसिंह बुन्देला का विद्रोह

शाहजहाँ के शासन काल में पहला विद्रोह जुझारसिंह बुन्देला ने किया। वह ओरछा के राजा वीरसिंह का पुत्र था, जिसने जहाँगीर के कहने से अबुल फजल की हत्या की थी। इस कारण जुझारसिंह, जहाँगीर का विशेष कृपा पात्र था। 1628 ई. में वीरसिंह की मृत्यु हो गई और उसके स्थान पर उसका ज्येष्ठ पुत्र जुझारसिंह ओरछा का राजा बना। शाहजहाँ के राज्याभिषेक के समय जुझारसिंह बादशाह का अभिनन्दन करने के लिए आगरा आया। अपनी अनुपस्थिति में वह अपने राज्य का प्रबन्ध अपने पुत्र विक्रमादित्य को सौंप गया था। विक्रमादित्य ने प्रजा पर अत्याचार किये। जब इन अत्याचारों की सूचना शाहजहाँ के पास पहुँची तो उसने इन शिकायतों की जांच करने का आदेश दिया। इस आदेश से जुझारसिंह घबरा गया और चुपके से आगरा से भाग कर ओरछा राज्य के पर्वतीय प्रदेश में चला गया। इससे कुपित होकर बादशाह ने जुझारसिंह को दण्डित करने का निश्चय किया। उसने महाबतखाँ, खान-ए-जहाँ लोदी तथा अब्दुल्ला खाँ को यह कार्य सौंपा। महाबतखाँ ने ग्वालियर से, खान-ए-जहाँ लोदी ने मालवा से और अब्दुल्ला खाँ ने कालपी से अपनी सेनाओं के साथ ओरछा के लिये प्रस्थान किया। बादशाह ने स्वयं भी सेना लेकर ग्वालियर में अपना पड़ाव डाला। मुगलों की विपुल तैयारी से जुझारसिंह घबरा गया। उसने लड़ना व्यर्थ समझकर बादशाह से क्षमा याचना कर ली। बादशाह ने उसे क्षमा कर दिया और उसे दक्षिण के मोर्चे पर भेज दिया।

खान-ए-जहाँ लोदी का विद्रोह

दूसरा विद्रोह खान-ए-जहाँ लोदी का था, जो दक्षिण में नियुक्त था। वह जहाँगीर का बड़ा कृपा पात्र था। जहाँगीर ने उसे मुगल सल्तनत के प्रधान सेनापति के पद पर नियुक्त करके खानखाना की उपाधि दी। महाबतखाँ तथा शाहजादा खुर्रम पर कड़ी दृष्टि रखने के लिए उसे दक्षिण का गवर्नर बनाया गया। शाहजहाँ ने तख्त प्राप्त करने के जो प्रयत्न किये उनमें खान-ए-जहाँ ने न तो किसी प्रकार का प्रोत्साहन दिया और न किसी प्रकार की बाधा पहुँचाई। वह तटस्थ बना रहा। शाहजहाँ ने बादशाह बनने पर, महाबतखाँ को खानखाना की उपाधि दी। कुछ समय बाद शाहजहाँ ने महाबतखाँ को मालवा का प्रान्त भी दे दिया। इससे खान-ए-जहाँ को अपनी वास्तविक स्थिति का पता लग गया। बुन्देला युद्ध के समाप्त होने पर खान-ए-जहाँ को दरबार में बुलाया गया। उसे वहाँ का वातावरण अपने अनुकूल दिखाई नहीं दिया तथा अपमान का अनुभव किया। बादशाह तथा आसफखाँ के आशवासन देने पर भी उसका सन्देह दूर नहीं हुआ। फलतः अक्टूबर 1629 में वह आगरा से भाग खड़ा हुआ और दक्षिण भारत चला गया। बादशाह ने तुरन्त एक सेना उसका पीछा करने के लिए भेजी। खान-ए-जहाँ ने दक्षिण में जाकर अहमदनगर के शासक के साथ गठबन्धन कर लिया परन्तु वह गठबन्धन अधिक दिनों तक नहीं चला। इसलिये खान-ए-जहाँ दक्षिण छोड़कर बुन्देलखण्ड चला आया। राजा विक्रमादित्य तथा शाही सेना ने उसका पीछा किया। अन्त में खान-ए-जहाँ लोदी परास्त हो गया और मार डाला गया।

गुरु हरगोविंद से संघर्ष

शाहजहाँ के शासन काल के आरम्भ में 1628 ई. में सिक्खों के छठे गुरु हरगोविंद के साथ शाहजहाँ का संघर्ष आरम्भ हुआ। इस संघर्ष का कारण एक बाज था। एक बार बादशाह अमृतसर के निकट आखेट खेल रहा था। उसका एक बाज गुरु के डेरे में चला गया। जब बादशाह के सिपाहियों ने सिक्खों से बाज लौटाने की मांग की तो सिक्खों ने शरण में आये हुए बाज को लौटाने से मना कर दिया। इस पर बादशाह की सेना ने सिक्खों पर आक्रमण कर दिया परन्तु गुरु के नेतृत्व में सिक्खों ने मुगल सेना को मार भगाया। इस पर वजीरखाँ तथा गुरु के अन्य शुभचिंतकों ने किसी तरह बादशाह के क्रोध को शान्त किया।

कुछ समय बाद गुरु हरगोविंद ने पंजाब में व्यास नदी के किनारे एक नये नगर का निर्माण आरम्भ किया जो आगे चल कर श्री हरगोविन्दपुर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। पंजाब के मध्य में इस नगर का निर्माण मुगल सल्तनत के लिये हितकर नहीं समझा गया। इसलिये बादशाह ने गुरु को आदेश दिया कि वे नगर का निर्माण नहीं करें किंतु सिक्खों ने इस आदेश की उपेक्षा करके नगर का निर्माण पूर्ववत् जारी रखा। सिक्खों के विरुद्ध पुनः एक सेना भेजी गई जिसे गुरु हरगोविंद के सिक्खों ने मार भगाया। इस बार पुनः मामला किसी तरह शांत किया गया।

गुरु का मुगलों के साथ तीसरा संघर्ष एक चोरी के कारण हुआ। बिधीचन्द्र नामक एक कुख्यात डाकू गुरु का परम भक्त था। उसने शाही अस्तबल से दो घोड़े चुराकर गुरु को भेंट कर दिये। गुरु ने अनजाने में वे घोड़े स्वीकार कर लिये। इसलिये 1631 ई. में एक प्रबल मुगल सेना गुरु के विरुद्ध भेजी गई परन्तु गुरु की सेना ने उसे भी खदेड़ दिया।

मुगलों से निरन्तर संघर्ष के कारण सिक्ख गुरु द्वारा किये जाने वाले धर्म-प्रचार के कार्य में बाधा उत्पन्न होने लगी तथा सिक्खों को बड़ा कष्ट उठाना पड़ा। गुरु हरगोविंद जानते थे कि सिक्खों की शक्ति एवं साधन अत्यंत सीमित हैं जबकि मुगल सल्तनत की शक्ति एवं साधन असीमित हैं। इसलिये सिक्ख बहुत दिनों तक इस संघर्ष में नहीं टिक सकेंगे। इसलिये गुरु हरगोविंद आध्यात्मिक चिन्तन के लिए काश्मीर की पहाड़ियों में चले गए और कीरतपुर नामक स्थान पर निवास करने लगे। वहीं पर उन्होंने धर्म प्रचार करते हुए शान्तिपूर्वक शेष जीवन व्यतीत किया। माना जाता है कि गुरु हरगोविन्द ने ही सिक्खों को मांस खाने की अनुमति प्रदान की। 1645 ई. में गुरु हरगोविंद का निधन हो गया।

द्वितीय बुन्देला युद्ध

प्रथम बुन्देला युद्ध के बाद ओरछा के राजा जुझारसिंह को उसके पुत्र जगराज (विक्रमादित्य) के साथ दक्षिण भेज दिया गया था। उसने महाबतखाँ की अधीनता में पाँच वर्ष तक मुगल सल्तनत की सेवा की। महाबतखाँ के मरने के बाद राजा जुझारसिंह अपने पुत्र को दक्षिण में छोड़कर ओरछा चला आया। थोड़े ही दिन बाद उसने गोंडवाना के राजा प्रेम नारायण पर, जो मुगल बादशाह का मनसबदार था, आक्रमण किया और उसकी राजधानी चौरागढ़ पर घेरा डाला। प्रेम नारायण युद्ध में मारा गया। जुझारसिंह के सैनिकों ने उसकी राजधानी को खूब लूटा। जब शाहजहाँ को इसकी सूचना मिली तो उसके क्रोध की सीमा नहीं रही। उसने आदेश दिया कि जुझारसिंह ने गोंडवाना का जितना भाग जीता है उतना ही भूभाग अपने राज्य में से और लूटे हुए माल में से दस लाख रुपये उसके हवाले कर दे। जुझारसिंह ने इस आदेश की उपेक्षा की और अपने पुत्र जगराज को भी दक्षिण से बुला लिया। इस पर शाहजहाँ ने जुझारसिंह के विरुद्ध सेना भेजी।

22 नवम्बर 1634 को मुगल सेना ने ओरछा पर अधिकार कर लिया। जुझारसिंह के प्रतिद्वन्द्वी देवीसिंह को ओरछा का राजा बनाया गया। इसके बाद मुगल सेना ने जुझारसिंह का बुरी तरह पीछा किया। जुझारसिंह के तीन पुत्र, एक पौत्र और जुझारसिंह की रानी मुगलों के हाथ लगे। जुझारसिंह और जगराज जंगलों में चले गए, जहाँ पर गौंड लोगों ने उनकी हत्या कर दी और उनके सिर काटकर मुगल बादशाह के पास भेज दिये। शाहजहाँ ने जुझारसिंह के परिवार के साथ अत्यंत बुरा व्यवहार किया। जीवित पकड़ी गई राजपूत महिलाओं को शाही हरम तथा अमीरों के घरों में सेवा करने के लिए बाध्य किया गया। जुझारसिंह के दो पुत्रों और एक पौत्र को मुसलमान बनाया गया। जब जुझारसिंह के एक पुत्र उदयभान तथा जुझारसिंह के मंत्री श्याम ने मुसलमान बनने से मना किया तो उनकी हत्या कर दी गई। इसके बाद शाहजहाँ ने ओरछा में प्रवेश किया। इस अवसर पर वीरसिंह के विशाल मन्दिर को ध्वस्त करके उसके स्थान पर एक मस्जिद बनवाई गई।

शाहजहाँ की दक्षिण नीति

शाहजहाँ कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उसे दक्षिण के शिया राज्यों से बड़ी घृणा थी। ये राज्य मुगल सल्तनत के विद्रोहियों की शरणस्थली बन जाते थे। शाहजहाँ ने स्वयं अपने पिता के विरुद्ध जब विद्रोह किया था तब दक्षिण में ही शरण पाने का प्रयत्न किया था। मरहठों को भी, जो मुगल साम्राज्य पर छापा मारा करते थे, इन राज्यों से बड़ी सहायता मिलती थी। शाहजहाँ को दक्षिण के राज्यों की सैनिक स्थिति का पूरा ज्ञान प्राप्त था। इन दिनों दक्षिण में तीन प्रधान राज्य थे- अहमदनगर, बीजापुर तथा गोलकुण्डा। इन राज्यों की दशा बड़ी शोचनीय थी। योग्य शासकांे के अभाव में इन राज्यों में अस्थिरता व्याप्त थी। उनके साथ किये गये किसी समझौते पर भी विश्वास नहीं किया जा सकता था। इस कारण शाहजहाँ ने इन राज्यों को नष्ट करने का निर्णय लिया। 1629 ई. में शाहजहाँॅ ने शाही सेना का संचालन करने के लिए अबुल हसन तथा आजम खाँ आदि अधिकारियों को नियुक्त किया। प्रधानमंत्री आसफखाँ की भी दक्षिण में नियुक्ति कर दी गई और बादशाह ने स्वयं बुरहानपुर में जाकर अपना पड़ाव डाला।

अहमदनगर अभियान

मुगल सेनाओं ने सबसे पहले अहमदनगर पर आक्रमण किया क्योंकि विद्रोही खान-ए-जहाँ अहमदनगर में शरण लिये हुए था। जब शाही सेना ने अहमदनगर पर आक्रमण किया तो खान-ए-जहाँ पंजाब की ओर चला गया किंतु मुगल सेना ने अहमदनगर के विरुद्ध युद्ध जारी रखा। इन दिनों अहमदनगर की दशा अत्यंत शोचनीय थी। अहमदनगर का शासक मुर्तजाखाँ एक निर्बल शासक था। उसके राज्य में दलबन्दी चरम पर थी। उसने अपने प्रभावशाली मराठा जागीरदार जादो रास की हत्या करवा दी थी। इस कारण जगदेव, शाहजी भोंसले तथा मालोजी जैसे प्रभावशाली मराठा सरदार मुर्तजाखाँ को छोड़कर मुगलों से जा मिले। मुर्तजाखाँ के बहुत से मुसलमान अमीर भी अप्रसन्न होकर अहमदनगर से चले गये और उन्होंने शाही सेना में नौकरी कर ली। इन्हीं दिनों दक्षिण में भयंकर अकाल पड़ा जिससे राज्य में भोजन तथा चारे की कमी हो गई।

इन्हीं विषम परिस्थितियों में मुगल सेना ने कई दिशाओं से अहमदनगर पर आक्रमण किया। 1630 ई. में अबुल हसन ने अहमदनगर की सेना को परास्त करके नगर को लूट लिया। आजम खाँ ने धरवर पर अधिकार कर लिया। वह दौलताबाद के सुदृढ़ दुर्ग पर भी घेरा डालने की योजना बना रहा था किंतु अकाल पड़ जाने के कारण वह ऐसा न कर सका। बीजापुर प्रकटतः अहमदनगर की सहायता कर रहा था। इस कारण आजम खाँ ने परेन्दा के दुर्ग पर आक्रमण किया किंतु असफल होकर अपनी छावनी को लौट गया।

इन्ही दिनों अहमदनगर में अबीसीनिया वालों की सहायता प्राप्त करने के लिये मलिक अम्बर के पुत्र फतेह खाँ को कैदखाने से मुक्त करके उसे प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त कर दिया गया परन्तु इसके परिणाम अच्छे नहीं हुए। मुकर्रबखाँ, जो मुगलों का घोर विरोधी था, अहमदनगर के शासक से नाराज होकर मुगलों से जा मिला। मुगलों ने उसका स्वागत किया और उसे रूस्तमखाँ की उपाधि से पुरस्कृत किया। फतेहखाँ की स्वामिभक्ति भी संदिग्ध ही रही। वह भी मुगलों से मिल गया। उसने मुर्तजाखाँ को विष दिलवाकर उनकी हत्या करवा दी और उसके दस वर्षीय पुत्र को अहमदनगर के तख्त पर बैठा दिया। फतेहखाँ ने शाहजहाँ को विपुल धन तथा हाथी भेंट के रूप में भिजवाये तथा शाहजहाँ के नाम से खुतबा पढ़वाकर उसके नाम की मुद्राएँ चलवाईं। इससे शाहजहाँ संतुष्ट हो गया। 7 जून 1631 को शाहजहाँ की बेगम मुमताज की मृत्यु हो गई। इस कारण कुछ समय के लिये शाहजहाँ की दक्षिण में रुचि समाप्त हो गई। उसने अनुभव किया कि अहमदनगर की विजय का काम पूरा हो गया था। अतः मार्च 1632 में उसने बुरहानपुर से आगरा के लिए प्रस्थान कर दिया।

शाहजहाँ और फतेहखाँ का समझौता बहुत दिनों तक नहीं टिका। शाहजहाँ ने उन मराठा सरदारों को अपनी सेवा में रख लिया था, जिनसे फतेहखाँ की शत्रुता थी। इसलिये फतेहखाँ ने मुगलों से अंसतुष्ट होकर मुगलों के विरुद्ध बीजापुर के सुल्तान से गठबन्धन कर लिया। इस कारण दक्षिण के गवर्नर महाबतखाँ ने मार्च 1633 में अहमदनगर पर आक्रमण कर दिया तथा अम्बरकोट, महाकोट, दौलताबाद आदि दुर्गों पर अधिकार जमा लिया। फतेहखाँ को आत्मसमर्पण करना पड़ा। सितम्बर 1633 में फतेहखाँ तथा अहमदनगर के अन्तिम सुल्तान हुसैनशाह को शाहजहाँ के पास आगरा भेज दिया गया। शाहजहाँ ने फतेहखाँ को दो लाख रुपये सालाना की पेन्शन देकर उसकी सारी जायदाद लौटा दी। हुसैनशाह को ग्वालियर भेज दिया गया और अहमदनगर को मुगल सल्तनत में मिला लिया गया।

बीजापुर अभियान

बीजापुर का सुल्तान मुहम्मद आदिलशाह कभी मुगलों के पक्ष में हो जाता था और कभी उनका विरोध करने लगता था। 1631 ई. में शाहजहाँ ने आसफखाँ को बीजापुर पर आक्रमण करने की आज्ञा दी किंतु आसफखाँ बीजापुर के विरुद्ध सफल नहीं हुआ। इस पर शाहजहाँ ने आसफखाँ को दक्षिण से वापस बुला लिया और उसके स्थान पर महाबतखाँ को भेज दिया। महाबतखाँ ने पहले अहमदनगर को पराजित किया और उसके बाद बीजापुर पर आक्रमण किया। परेन्दा के दुर्ग का घेरा डाल दिया गया परन्तु मुगल अफसरों के आपसी झगड़ों के कारण तथा रसद की कमी होने के कारण घेरा उठा लेना पड़ा। 1634 ई. में महाबतखाँ की मृत्यु हो गई और शाहजहाँ को दक्षिण में नई व्यवस्था करनी पड़ी।

इन दिनों दक्षिण में मुगलों का सबसे घोर विरोधी शाहजी भोंसले नामक मराठा सरदार था। यद्यपि उसने शाहजहाँ द्वारा दिया गया मनसब स्वीकार कर लिया था परन्तु जब शाहजहाँ ने उसकी जागीर का कुछ हिस्सा फतेहखाँ को दे दिया तब उसने शाहजहाँ का मनसब त्यागकर बीजापुर के सुल्तान के यहाँ नौकरी कर ली। शाहजहाँ ने शाहजी भौंसले तथा बीजापुर के सुल्तान दोनों को दण्डित करने का निश्चय किया। मुगल सेना ने तीन ओर से बीजापुर पर आक्रमण किया। बीजापुर के लिए इस भयंकर आक्रमण का सामना करना सम्भव नहीं था। इसलिये शाहजी भौंसले बीजापुर से भाग खड़ा हुआ और बीजापुर के सुल्तान ने मुगलों की अधीनता स्वीकर कर ली। उसने मुगल बादशाह को बीस लाख रुपये की पेशकश दी तथा यह वचन दिया कि गोलकुण्डा के विरुद्ध किसी प्रकार की सैनिक कार्यवाही नहीं करेगा और न अहमदनगर में किसी के उत्तराधिकार का समर्थन करेगा। उसने यह भी जिम्मेदारी ली कि यदि शाहजी भौंसले जुन्नर तथा त्रिम्बक के दुर्गों को समर्पित नहीं करेगा तो वह उसका दमन करेगा। इस सन्धि के बाद बीजापुर के सुल्तान ने अपनी शक्ति को बढ़ाना आरम्भ किया तथा कर्नाटक में अपने राज्य का विस्तार किया। 1656 ई. में बीजापुर केे सुल्तान मोहम्मद आदिलशाह की मृत्यु हो गई और उसके स्थान पर उसका कथित पुत्र अली आदिलशाह सुल्तान बना।

मुहम्मद आदिलशाह के कोई पुत्र नहीं था। जब शाहजहाँ को इसकी सूचना मिली तब उसने बीजापुर की शक्ति को नष्ट करने के लिये बीजापुर पर तीन आरोप लगाये- (1.) कर के बकाया होने का, (2.) गोलकुण्डा को सैनिक सहायता देने का और

(3.) कर्नाटक के मीर जुमला की जायदाद में हस्तक्षेप करने का। इसके बाद बादशाह ने शहजादे औरंगजेब को बीजापुर पर आक्रमण करने भेजा और मीर जुमला तथा शाइस्ताखाँ को उसकी सहायता के लिए भेजा।

1657 ई. में मुगल सेना ने दक्षिण के लिये अभियान किया। सबसे पहले उसने बीदर के दुर्ग पर अधिकार किया। इसके बाद कल्याणी के दुर्ग पर भी उसका अधिकार हो गया। मुगल सेना ने आगे बढ़कर बीजापुर का घेरा डाला। युद्ध चलता रहा परन्तु साथ ही साथ सन्धि की वार्ता भी आरम्भ की गई। अन्त में दोनों पक्षों में समझौता हो गया जिसके अनुसार बीजापुर का सुल्तान एक लाख वार्षिक कर देने को तैयार हो गया। बीदर, कल्याणी तथा परेन्दा के दुर्ग तथा कुछ अन्य भू-भाग भी बादशाह को मिल गये। इस पर बादशाह ने औरंगजेब को युद्ध बन्द करके बीजापुर से मुगल सेना को हटा लेने और मीर जुमला को दिल्ली भेज देने का आदेश दिया। औरंगजेब ने इन आदेशों का पालन किया।

गोलकुण्डा अभियान

जहाँगीर के समय से ही गोलकुण्डा तथा मुगलों के बीच मनोमालिन्य चल रहा था क्योंकि गोलकुण्डा के सुल्तान ने सदैव मुगल साम्राज्य के विरुद्ध मलिक अम्बर की सहायता की थी। जिस समय शाहजहाँ ने अपने पिता के शासन काल में विद्रोह किया था उस समय उसे भी गोलकुण्डा में शरण दी गई थी। जब बीजापुर तथा अहमदनगर ने मुगलों के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा बनाया तब गोलकुण्डा इस गुट से अलग रहा इसलिये मुगलों ने उसके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की परन्तु गोलकुण्डा का सुल्तान मुगल बादशाह को पेशकश या कर देने को तैयार नहीं था और न उसकी अधीनता स्वीकार करने को तैयार था। शाहजहाँ ने गोलकुण्डा के सुल्तान को आदेश दिये कि वह शाहजहाँ के नाम से खुतबा पढ़वाये तथा शाहजहाँ के नाम की मुद्राएँ चलवाये। शाहजहाँ ने उससे बहुत बड़ी पेशकश की भी माँग की और अपनी सेना को गोलकुण्डा की सीमा पर नियुक्त कर दिया। इस पर गोलकुण्डा के सुल्तान अब्दुल्ला कुतुबशाह ने भयभीत होकर शाहजहाँ की समस्त मांगों को स्वीकार कर लिया। इसके बदले में शाहजहाँ ने बीजापुर तथा मराठों के आक्रमणों से गोलकुण्डा की रक्षा करने का वचन दिया।

जब औरंगजेब दक्षिण का गवर्नर नियुक्त हुआ तब गोलकुण्डा तथा मुगलों में फिर से युद्ध प्रारम्भ हो गया। गोलकुण्डा ने बहुत दिनों से कर नहीं दिया था। औरंगजेब ने उससे कर माँगा। इसके अतिरिक्त गोलकुण्डा के सुल्तान ने कर्नाटक के हिन्दू राजा पर आक्रमण कर दिया था। कर्नाटक के राजा ने मुगल बादशाह से रक्षा करने की याचना की और बदले में बड़ी धन राशि देने और इस्लाम स्वीकार करने का वचन दिया परन्तु समय पर राजा की सहायता नहीं हो सकी और उसका राज्य समाप्त हो गया। इससे शाहजहाँ को बड़ी चिन्ता हुई। इसी समय गोलकुण्डा का प्रधानमंत्री मीर जुमला शाहजहाँ की शरण में आ गया। मीर जुुमला मूलतः फारस का रहने वाला था। वह योग्य तथा महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति था। अपनी प्रतिभा के बल पर वह गोलकुण्डा राज्य का प्रधानमंत्री बन गया। उसने कर्नाटक के कुछ भाग पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया और उसे अपनी निजी सम्पत्ति बना लिया। इससे गोलकुण्डा का सुल्तान अप्रसन्न हो गया तो मीर जुमला मुगलों से मिल गया और शाहजहाँ ने उसे अपना संरक्षण दे दिया।

इन सब कारणों से शाहजहाँ ने औरंगजेब को गोलकुण्डा पर आक्रमण करने का आदेश दिया। औरंगजेब ने अपने पुत्र मुहम्मद की अध्यक्षता में एक सेना गोलकुण्डा पर आक्रमण करने भेजी। औरंगजेब स्वयं भी एक सेना के साथ गोलकुण्डा पहुँचा और उसका घेरा डाल दिया। गोलकुण्डा का सुल्तान घबरा गया परन्तु शाहजादी जहाँआरा के कहने से शाहजहाँ द्वारा यह युद्ध रोक दिया गया। फिर भी शाहजहाँ के उद्देश्य की पूर्ति हो गई। उसे गोलकुण्डा के सुल्तान से बकाया कर मिल गया। मीर जुमला की कर्नाटक की जागीर भी बादशाह को मिल गई। औरंगजेब के पुत्र मुहम्मद का विवाह गोलकुण्डा के सुल्तान की कन्या से हो गया। इस प्रकार गोलकुण्डा राज्य की रक्षा हो गई।

शाहजहाँ की मध्य एशिया नीति

तैमूर लंग ने मध्य एशिया के काफी बड़े हिस्से पर अधिकार किया था। इसलिये उसके वंशज मध्य एशिया को अपना पैतृक राज्य समझते थे और उस पर अधिकार जमाने के लिये लालायित रहते थे। शाहजहाँ से पहले के मुगल बादशाह भारत के भीतर ही समस्याओं में उलझे रहे इस कारण उन्हें मध्य एशिया की ओर ध्यान देने का अवसर नहीं मिला। शाहजहाँ ने उत्तर तथा दक्षिण भारत में जो अभूतपूर्व सफलताएँ प्राप्त कीं उनसे उसका उत्साह बढ़ गया और वह मध्य एशिया पर अधिकार स्थापित करने के लिए लालायित हो उठा। उधर उजबेग भी काबुल तथा कन्दहार पर दृष्टि लगाये रहते थे। बल्ख तथा बदख्शाँ काबुल तथा मध्य एशिया के बीच में पड़ते थे। काबुल, मुगल सल्तनत का एक अंग था। अतः मध्य एशिया में पहुँचने के लिए बल्ख तथा बदख्शाँ पर अधिकार करना आवश्यक था।

मध्य एशिया अभियान की विफलता

1641 ई. में शाहजहाँ को मध्य एशिया पर आक्रमण करने का अवसर प्राप्त हो गया। इस वर्ष बल्ख के गवर्नर नजर मुहम्मद ने अपने बड़े भाई इमामकुली खाँ को हटाकर समरकन्द के तख्त पर अधिकार कर लिया। इससे मध्य एशिया में हलचल मच गई। शाहजहाँ ने इस अवसर से लाभ उठाने के लिये शहजादे मुराद तथा अली मर्दान खाँ की अध्यक्षता में एक सेना भेजी। इस सेना ने बल्ख तथा बदख्शाँ पर अधिकार कर लिया किंतु शाहजादा मुराद इससे आगे बढ़ने को तैयार नहीं हुआ इसलिये मुगल सेना वहाँ से हिन्दुस्तान लौट आई। इसके बाद शाहजहाँ ने शाहजादा औरंगजेब को एक विशाल सेना के साथ मध्य एशिया अभियान पर भेजा। औरंगजेब को प्रारम्भ में कुछ सफलता मिली परन्तु मध्य एशिया में अकाल पड़ जाने से रसद की कमी पड़ने लगी। उजबेगों ने छापामार रणनीति का प्रयोग करके मुगलों को छकाना आरम्भ कर दिया। औरंगजेब उजबेगों के विरुद्ध कुछ नहीं कर सका और वह बल्ख का प्रभार कासिम खाँ को सौंपकर अक्टूबर 1647 में काबुल के लिए रवाना हो गया। इस प्रकार शाहजहाँ की मध्य एशिया योजना असफल रही। दोनों पक्षों की धन तथा जन की भारी क्षति हुई तथा किसी भी पक्ष को लाभ नहीं हुआ।

कन्दहार अभियान की विफलता

कन्दहार जहाँगीर के शासन काल में मुगलों के हाथ से निकलकर फारस के अधिकार में चला गया था। इन दिनों अली मर्दानखाँ फारस के शाह अब्बास (द्वितीय) की ओर से कन्दहार पर शासन कर रहा था। कुछ कारणों से शाह अब्बास, अली मर्दानखाँ से अप्रसन्न हो गया और उसने अली मर्दानखाँ को हटाकर नया सूबेदार नियुक्त कर दिया। इससे पहले कि नया गवर्नर कन्दहार पहुँचे, अली मर्दानखाँ ने कन्दहार का अधिकार फरवरी 1638 में मुगलों को सौंप दिया। शाहजहाँ ने अली मर्दानखाँ को 6,000 का मनसब प्रदान करके काश्मीर का गवर्नर बना दिया। कन्दहार की सुरक्षा के लिये एक विशाल सेना भेजी गई। फारस का शाह कन्दहार को छोड़ने के लिये तैयार नहीं था। इसलिये कन्दहार को फिर से जीतने का प्रयास आरम्भ हो गया। शाह अब्बास (द्वितीय) ने एक विशाल सेना कन्दहार पर आक्रमण करने के लिए भेजी। 16 सितम्बर 1648 को फारस की सेना ने कन्दहार का घेरा डाल दिया। मुगल सूबेदार दौलतखाँ दुर्ग की रक्षा नहीं कर सका। उसने 11 फरवरी 1649 को दुर्ग शाह अब्बास को समर्पित कर दिया। शाहजहाँ ने पहले औरंगजेब को और बाद में दारा को कन्दहार पर पुनः विजय प्राप्त करने के लिये भेजा परन्तु मुगल सेनाओं को सफलता नहीं मिल सकी और कन्दहार सदैव के लिए मुगलों के हाथ से निकल गया।

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