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अकबर की धार्मिक नीति

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अकबर की धार्मिक नीति

अकबर की धार्मिक नीति एक वैचारिक रूप से सुदृढ़ शासक की नीति थी। जीवन की पाठशाला में हुए अनुभवों ने उसे सिखा दिया था कि सभी धर्मों में अच्छाइयाँ एवं कमियाँ हैं। कोई भी धर्म पूरी तरह अच्छा या बुरा नहीं है।

अकबर अपने युग के मुस्लिम बादशाहों से बिल्कुल उलट, उदार तथा व्यापक दृष्टिकोण का बादशाह था। वह वैचारिक संकीर्णता से परे था। उसने अपने राज्य एवं शासन में धार्मिक सहिष्णुता की नीति को अपनाया। ऐसा करने के कई कारण थे-

अकबर की धार्मिक नीति पर विभिन्न कारकों का प्रभाव

(1.) जीवन की वास्तविकताओं का प्रभाव

अकबर की धार्मिक नीति पर जीवन की वास्तविकताओं का बड़ा प्रभाव था। अकबर का बाल्यकाल संकटों, षड़यंत्रों तथा मुसीबतों से भरा हुआ था। इस कारण जीवन तथा धर्म के प्रति उसका दृष्टिकोण, एक सामान्य बादशाह से भिन्न होना स्वाभाविक था।

अकबर को कामरान तथा अन्य चाचाओं की धूर्तता तथा राज्य लिप्सा के लिये किये गये षड़यंत्रों से अच्छी तरह अनुभव हो गया था कि अपने ही धर्म के लोग तथा अपने ही रक्त सम्बन्धी, राज्य तथा सम्पत्ति के लिये किसी भी निर्दोष के प्राण लेने के लिये उद्धत हो जाते हैं।

इसलिये अकबर ने धर्म तथा रक्त सम्बन्धों को ही सब-कुछ मानने के स्थान पर व्यक्ति के भीतर बसने वाले गुणों को प्रमुखता दी तथा हर धर्म में बसने वाली अच्छी बात को स्वीकार किया।

(2.) पिता हुमायूँ का प्रभाव

यद्यपि अकबर को अपने प्रारंभिक जीवन में अपने पिता हुमायूँ के साथ रहने का अवसर नहीं मिला था किंतु समझ विकसित होने से लेकर हुमायूँ की मृत्यु तक अकबर, अपने पिता के ही साथ रहा। हुमायूँ को अपने भाइयों से कदम-कदम पर धोखे और विश्वासघात मिले थे जो कि हुमायूँ की ही तरह सुन्नी मुसलमान थे।

जबकि काफिर समझे जाने वाले शियाओं ने हुमायूँ को अपने यहाँ रखकर उसे अपने खोये हुए राज्य को फिर से प्राप्त करने का अवसर दिया था। इस कारण हुमायूँ में उतना धार्मिक कट्टरपन तथा उन्माद नहीं था जितना उसके पूर्वज चंगेजखाँ, तैमूर लंग तथा बाबर में था।

हुमायूँ सुसंस्कृत, उदार, दयालु तथा सहिष्णु बादशाह था। उसके व्यक्तित्त्व का अकबर पर गहरा प्रभाव पड़ा। इस कारण अकबर अन्य धर्मों को मानने वालों को भी अपने धर्म वालों के ही समान समझने लगा।

(3.) माता हमीदा बानू का प्रभाव

अकबर की धार्मिक नीति पर उसकी माता हमीदा बानू का बड़ा प्रभाव था। अकबर की माता हमीदा बानू का जन्म सूफी मत को मानने वाले शिया परिवार में हुआ था। इस प्रकार अकबर की धमनियों में शियाओं, सुन्नियों तथा सूफियों का मिश्रित रक्त प्रवाहित हो रहा था। अकबर की एक विमाता भी फारस के शाह की बहिन की पुत्री थी। ऐसी स्थितियों में अकबर का दूसरे धर्मों के प्रति उदार तथा सहिष्णु हो जाना स्वाभाविक ही था।

(4.) शिक्षकों का प्रभाव

अकबर की धार्मिक नीति पर उसके शिक्षकों का भी बड़ा प्रभाव पड़ा। उसके शिक्षकों में बयाजद तथा मुनीमखाँ सुन्नी थे जबकि बैरमखाँ तथा अब्दुल लतीफ शिया थे। अब्दुल लतीफ इतने उदार विचारों का व्यक्ति था कि वह फारस में सुन्नी और भारत में शिया समझता जाता था। उसने अकबर के मस्तिष्क को उदार सूफी विचारों से प्रभावित किया।

(5.) विधर्मियों से मिला सहयोग

अकबर को अपने धर्म के लोगों की बजाय अलग धर्म के लोगों से अधिक सहयोग मिला। बैरमखाँ ने शिया होते हुए भी सुन्नी मत को मानने वाले अकबर के लिये नये सिरे से राज्य की रचना की। हिन्दू अमीरों राजा टोडरमल तथा बीरबल ने अकबर को पूरा विश्वास, समर्थन तथा सहयोग दिया तथा उसके राज्य को उस युग के विश्व के लिये आदर्श बना दिया। यहाँ तक कि उसके लिये अपने प्राण न्यौछावर कर दिये। इस कारण भी अकबर में धार्मिक सहिष्णुता का भाव निरंतर बना रहा।

(6.) आम्बेर की राजकुमारी से विवाह

जिस समय अकबर ने सुलह-कुल की नीति का निर्माण नहीं किया था, उस समय आम्बेर के राजा भारमल ने अपनी पुत्री हीराकंवर का विवाह अकबर के साथ किया। इस विवाह ने अकबर के धार्मिक विचारों में बहुत परिवर्तन किया। उसने काफिर एवं घृणास्पद समझे जाने वाले हिन्दुओं की अच्छाइयों, आदर्शों एवं नैतिक जीवन को अत्यंत निकटता से देखा। इससे अकबर में हिन्दू धर्म के प्रति आदर का जो भाव उत्पन्न हुआ, वह जीवन भर बना रहा।

(7.) विद्वानों की संगति का प्रभाव

अकबर को फैजी, अबुल फजल, अब्दर्रहीम खानखाना तथा तानसेन जैसे विद्वानों की संगति पसंद थी। इस कारण उसके हृदय से संकीर्णताएं दूर होती चली गईं तथा उदारता आती गई। अकबर विद्वानों को अपने हृदय के इतने अधिक निकट पाता था कि फैजी की हत्या का समाचार सुनकर वह दो दिन तक बेहोश पड़ा रहा।

बैरम खाँ के पुत्र अब्दुर्रहीम खानखाना को वह इतना पसंद करता था कि अकबर ने उसे खान-ए-खानान अर्थात् अपनी सेना का सर्वोच्च सेनापति नियुक्त किया। यही रहीम अपनी कृष्णभक्ति के हिन्दुओं में तुलसी और सूर के समान समझे जाते हैं। इस प्रकार अकबर का धर्म के प्रति दृष्टिकोण काल्पनिक आदर्श पर आधारित न होकर जीवन की वास्तविक पाठशाला में विकसित हुआ था।

(8.) धार्मिक व्यक्तियों का प्रभाव

अकबर पर धार्मिक व्यक्तियों की संगति का भी गहरा प्रभाव पड़ा। जब वह बैरमखाँ के संरक्षण में था तभी से धार्मिक व्यक्तियों के सम्पर्क में आने लगा था। जब बैरमखाँ का संरक्षण समाप्त हो गया तब उसका शेखों, सन्तों, फकीरों, साधुओं तथा योगियों के साथ सम्पर्क पहले से भी अधिक बढ़ गया।

साधुओं में उसका विश्वास इतना अधिक था कि किसी भी महत्त्वपूर्ण कार्य को करने से पहले वह उनका आशीर्वाद लेने जाता था तथा दिवंगत फकीरों एवं दरवेशों की दरगाहों पर उपस्थिति देता था। चिश्ती सम्प्रदाय के संतों, विशेषकर शेख सलीम चिश्ती में अकबर का बड़ा विश्वास था।

(9.) धार्मिक आन्दोलनों का प्रभाव

भारत में तेरहवीं शताब्दी से लेकर सोलहवीं शताब्दी तक हिन्दुओं तथा मुसलमानों दोनों में ही धार्मिक तथा आध्यात्मिक आन्दोलन चले। इन आंदोलनों का भी अकबर के विचारों पर बड़ा प्रभाव पड़ा। इस काल के धर्म सुधारकों ने अपने-अपने धर्म के बाह्याडम्बरों का खण्डन किया और धर्म के आंतरिक तत्त्वों पर बल दिया।

विभिन्न धर्म सुधारक सब धर्मों के बीच लौकिक एकता की खोज तथा धार्मिक समन्वय स्थापित करने का प्रयत्न कर रहे थे। इस कारण देश के सामाजिक तथा धार्मिक जीवन में उदारता तथा सहिष्णुता के भाव उत्पन्न हो रहे थे। अकबर भी उन महान विचारों के प्रभाव से मुक्त न रह सका।

(10.) आत्म-चिन्तन का प्रभाव

अकबर चिंतनशील व्यक्ति था तथा आत्म-चिन्तन के माध्यम से सही-गलत में भेद कर सकता था। विभिन्न धर्मों के अग्रणी लोगों के घिसे-पिटे तर्कों तथा कुतर्कों से ऊबकर कर वह ऐसे मार्ग की खोज कर रहा था जो उसकी प्रजा में ईर्ष्या, द्वेष तथा घृणा को दूर करके प्रेम, सहयोग, एकता तथा सद्भावना का संचार करे। इसके लिये आवश्यक था कि वह स्वयं उदारता तथा सहिष्णुता की नीति अपनाये तथा प्रजा के समक्ष उच्चादर्श प्रस्तुत करे।

अकबर की धार्मिक नीति में दान का महत्व

अकबर की धार्मिक नीति में दान का बड़ा महत्व था। हालांकि जब से भारतवर्ष में मुस्लिम राज्य की स्थापना हुई थी तभी से राज्य द्वारा मुस्लिम आलिमों, फकीरों, दरवेशों, दीन-दुखियों, लूले-लँगड़ों, अपाहिजों, अनाथों, विधवाओं आदि की सहायता की जाती थी। उन्हें राज्य की ओर से नकद रुपया और भूमि दी जाती थी।

नकद राशि वजीफा कहलाती थी और दान की भूमि मिल्क, मदादीमाश या सपुरगल कहलाती थी। ये सुविधाएं केवल मुस्लिम रियाया के लिए उपलब्ध थीं क्योंकि इस्लामिक राज्य में विधर्मियों को बादशाह की प्रजा नहीं माना जाता था।

जब भारत में मुगलों की राज्य संस्था स्थापित हुई तब उन्होंने भी दान व्यवस्था को बनाये रखा। अकबर ने दान का अलग विभाग खोला जिसका अध्यक्ष सद्र कहलाता था। बैरमखाँ के शासन काल में, अफगानों को पूर्व में मिली हुई माफी की जमीनें उनसे छीनकर अपने आदमियों को दे दी गईं। माफी की कुछ भूमि अफगानों से छीन कर राजकीय भूमि में परिवर्तित कर दी गई।

कालान्तर में दान व्यवस्था में कई दोष आ गये। कुछ लोगों के पास दान की भूमि आवश्यकता से अधिक हो गई और कुछ लोगों को बिल्कुल नहीं मिली थी। कहीं-कहीं पर राजकीय भूमि तथा दान की भूमि मिली-जुली रहती थी जिससे दान प्राप्त करने वालों तथा सरकारी अधिकारियों में प्रायः झगड़ा होता था।

कुछ लोग बेईमानी से कई स्थानों पर दान की भूमि हड़प बैठे थे। अकबर ने इन दोषों को दूर करने का निश्चय किया। जिन लोगों के पास दान की भूमि पाँच सौ बीघा से अधिक थी, उन्हें अकबर ने अपने पास बुलाया तथा उनकी भूमि का आवश्यकतानुसार पुनर्वितरण किया। अकबर ने वृद्धों के साथ बड़ी उदारता का व्यवहार किया किंतु जो लोग अकबर के सामने नहीं आये उनकी दान की भूमि का कुछ अंश छीन लिया गया।

अकबर की धार्मिक नीति में सत्य का महत्व

1576 ई. में अकबर गुजरात से वापस लौटा। इस अवसर पर शेख मुबारक ने अकबर से अनुरोध किया कि उसने जिस प्रकार राजनीति में अपनी प्रजा का पथ-प्रदर्शन किया है, उसी प्रकार धार्मिक मामलों में भी वह अपनी प्रजा का पथ प्रदर्शक बने। अकबर ने शेख मुबारक के आग्रह को स्वीकार कर लिया तथा उसने धर्म-गुरु बनने की योग्यता प्राप्त करने का निश्चय किया। इसके लिये यह आवश्यक था कि भारतवर्ष में प्रचलित समस्त धर्मों के मूल-तत्त्वों का ज्ञान प्राप्त किया जाये।

(1.) इस्लाम के मूल तत्त्वों का अध्ययन

अकबर ने सबसे पहले इस्लाम के मूल तत्त्वों की जानकारी प्राप्त करने का निश्चय किया। उसने भारत के बड़े-बड़े इस्लामिक विद्वानों की सहायता से इस्लाम का सांगोपांग अध्ययन किया परन्तु अकबर की जिज्ञासा शान्त नहीं हुई।

(2.) इबादतखाने की स्थापना

1575 ई. में अकबर ने सत्य की खोज के उद्देश्य से सीकरी में इबादतखाना का निर्माण करवाया। इबादतखाना का अर्थ पूजा घर होता है परन्तु इस इबादतखाने में पूजा नहीं की जाती थी अपितु इसमें धार्मिक विषयों पर विचार-विमर्श तथा वाद-विवाद होते थे ताकि धर्म के मूल-तत्त्वों की बारीक बातों की जानकारी हो जाये।

इबादतखाना चार भागों में विभक्त था। पश्चिम की ओर सैयद लोग बैठते थे। दक्षिण की ओर उलेमा बैठते थे। उत्तर की ओर शेख तथा पूर्व की ओर अकबर के वे अमीर तथा दरबारी बैठते थे जो अपनी विद्वता तथा अलौकिक प्रतिभा के लिए प्रसिद्ध थे। इबादतखाने में दो वर्ष तक केवल इस्लाम धर्म के विद्वान एकत्रित होते रहे।

उनकी बैठक प्रत्येक बृहस्पतिवार की रात्रि को होती थी। इस बैठक में अकबर उपस्थित रहकर इस्लामिक विद्वानों के व्याख्यान सुनता था। अकबर ने इस्लामिक विद्वानों से कहा कि इबादतखाना की स्थापना करने का उद्देश्य सत्य की खोज करना, सच्चे धर्म के सिद्धान्तों का अन्वेषण करना, सच्चे धर्म का प्रचार करना और सच्चे धर्म की दैवी उत्पत्ति का पता लगाना है।

इसलिये कोई भी विद्वान सत्य पर पर्दा डालने का प्रयास नहीं करे परन्तु मुल्ला मौलवी, अपनी वैचारिक संकीर्णता को नहीं छोड़ सके। इस कारण इबादतखाना की कार्यवाही संतोषजनक सिद्ध नहीं हुई। उसमें जो वाद-विवाद होते थे उनमें संयम तथा मर्यादा का बड़ा अभाव था। वाद-विवाद करते समय विद्वान आपस में लड़ने लगते थे।

इस कारण कटुता तथा पारस्परिक मनोमालिन्य बढ़ जाता था। इस कारण कुछ समय बाद इबादतखाना विवादखाना बन गया। अकबर को यह देखकर बड़ी निराशा हुई कि प्रतिष्ठत विद्वान् भी विवाद के समय संयम खो बैठते थे। बहुत से गम्भीर तथा वयोवृद्ध विद्वानों ने झगड़े से बचने के लिये इबादतखाने की बैठकों में भाग लेना बंद कर दिया।

(3.) इबादतखाने में विभिन्न धर्मों के आचार्यों को आने की छूट

1578 ई. में अकबर ने इबादतखाने का द्वार हिन्दू, जैन, ईसाई, पारसी आदि समस्त धर्मों के आचार्यों एवं विद्वानों तथा नास्तिकों के लिये भी खोल दिया। यदि विभिन्न धर्मों के आचार्य अकबर के वास्तविक उद्देश्य को समझ गये होते और सत्य के अन्वेषण की भावना से बहस करते तो इबादतखाना एक धार्मिक संसद का रूप धारण कर लेता।

इससे मानवता का बड़ा कल्याण हुआ होता परन्तु दुर्भाग्यवश अन्य धर्मों के आचार्र्यों के आगमन से भी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ और इबादतखाना पूर्ववत् निरर्थक विवादों का रण-स्थल बना रहा जिसमें संयम, धैर्य तथा मर्यादा का अभाव था। इबादतखाना में आत्म-संयम तथा आत्म-नियंत्रण का इतना अभाव था कि यदि अकबर उपस्थित नहीं रहता तो मार-पीट की संभावना उत्पन्न हो जाती थी।

(4.) इबादतखाने बैठकों पर रोक

इबादतखाना की कार्यवाहियों से अकबर को बड़ी निराशा हुई। उसने सोचा था कि विभिन्न धर्मों के आचार्य परस्पर विचार-विमर्श करके एक-दूसरे के धर्म के वास्तविक ध्येय तथा उसके मौलिक सिद्धांतों का पता लगायेंगे परन्तु वे आपस में लड़-झगड़ कर मनोमालिन्य तथा साम्प्रदायिक संकीर्णता की भावना को और अधिक पुष्ट कर रहे थे। निराश होकर अकबर ने 1582 ई. में इबादतखाना की बैठकों को बंद कर दिया।

इबादतखाना बंद कर देने के बाद भी अकबर का धार्मिक चिन्तन समाप्त नहीं हुआ। वह निरंतर सत्य की खोज में लगा रहा। उसने विभिन्न धर्मों के विद्वानों तथा विशेषज्ञों को अपने महल में बुलवाकर उनके साथ सत्य की खोज के लिए धार्मिक चर्चाएं जारी रखीं।

उसने पुरुषोत्तम नामक हिन्दू विद्वान तथा देवी नामक हिन्दू विदुषी को अपने महल में आमंत्रित कर तथा हिन्दू साधुओं एवं योगियों से सम्पर्क स्थापित करके हिन्दू-धर्म का ज्ञान प्राप्त किया। 1578 ई. में उसने महयार्जी राना को आमन्त्रित कर पारसी धर्म के सिद्धान्तों को समझा और गोवा से दो पादरियों को बुलाकर ईसाई धर्म के मूल तत्त्वों के जानने का प्रयत्न किया।

अकबर इन विद्वानों से धार्मिक चर्चाओं के साथ-साथ सामाजिक समस्याओं पर भी विचार-विमर्श करता था। इन चर्चाओं से अकबर के ज्ञान-कोष में विपुल वृद्धि हो गई तथा उसका दृष्टिाकोण अत्यन्त व्यापक, उदार और सहिष्णु हो गया। अब वह किसी एक धर्म के दायरे में बँधकर नहीं रह सकता था।

वह समस्त धर्मों से ऊपर उठ गया था। वह जान गया था कि हर धर्म में कुछ न कुछ बाह्याडम्बर हैं और हर धर्म में कुछ न कुछ विशेषता है। इतना होने पर भी समस्त धर्मों का ध्येय एक है। समस्त धर्मों के मौलिक तत्त्व एक जैसे हैं।

हैवल ने लिखा है- ‘वास्तव में अकबर द्वारा इस्लाम धर्म का नेतृत्व ग्रहण करने की समस्या पर विचार करते हुए केवल इस बात का ही ध्यान नहीं रखना है कि वह उलेमा लोगों की धृष्टता पर नियन्त्रण रखना चाहता था वरन् उसकी दूरदर्शी राजनीतिज्ञता पर भी ध्यान रखना है जिसने हिन्दुस्तान की शान्ति तथा मुगल राज्यवंश की सुरक्षा के लिये इस नीति के अनुसरण हेतु प्रेरित किया।

अकबर के धार्मिक विश्वास

अकबर का जन्म इस्लाम के सुन्नी सम्प्रदाय को मानने वाले परिवार में हुआ था। उसकी माता शिया मत के परिवार से थी जो एक सूफी सम्प्रदाय में विश्वास करता था। इस प्रकार अकबर के विचारों पर इन तीन सम्प्रदायों का प्रत्यक्ष प्रभाव था किंतु राजनीतिक परिस्थितियों के चलते वह हिन्दू मंत्रियों तथा हिन्दू सेनापतियों के भी प्रत्यक्ष सम्पर्क में रहा। उसकी पत्नी हीराकंवर भी हिन्दू धर्म को मानने वाली थी।

अकबर ने उस काल में भारत में निवास करने वाले जैनों, बौद्धों, ईसाइयों एवं पारिसयों के धर्मगुरुओं से भी लम्बा विचार विमर्श करके उनके धर्मों के मूल तत्वों को जाना। इस प्रकार अकबर के धार्मिक विश्वासों पर भारत भूमि पर विद्यमान लगभग समस्त प्रमुख धर्मों का प्रभाव पड़ा। इस कारण अकबर के धार्मिक विश्वास किसी एक सम्प्रदाय से प्रतिबद्ध न होकर एक शाश्वत मानव धर्म के प्रतीत होते हैं।

(1.) इस्लाम में विश्वास

अकबर एकेश्वरवादी था और अवतारवाद में उसका विश्वास नहीं था। उसने इस्लाम के किसी भी सिद्धांत की कभी भी उपेक्षा नहीं की। इससे स्पष्ट है कि अकबर का इस्लाम में पूर्ण विश्वास था।

(2.) भौतिक जगत से परे की सत्ता में विश्वास

अकबर का मानना था कि भौतिक जगत् के अतिरिक्त एक आन्तरिक वास्तविकता है जो चर्म-चक्षुओं को दिखाई नहीं देती वरन् जिसका अनुभव अन्तःप्रेरणा तथा तर्क से किया जा सकता है।

(3.) प्रकाश ईश्वर की सबसे बड़ी देन

अकबर का विश्वास था कि यद्यपि वायु, जल तथा पृथ्वी मनुष्य के लिए आवश्यक हैं परन्तु प्रकाश ईश्वर की सबसे बड़ी देन है जो दो रूपों में प्रकट होता है। प्रथम तो वह अन्तरात्मा, तर्क तथा आध्यात्मिक प्रकाश के रूप में और दूसरा सूर्य, अग्नि, भौतिक प्रकाश तथा गर्मी के रूप में।

(4.) पुनर्जन्म में विश्वास

अकबर का विश्वास था कि मनुष्य बार-बार जन्म लेता है और उसके पूर्व-जन्म का भावी जीवन पर प्रभाव पड़ता है।

(5.) समस्त प्राणियों की पवित्रता में विश्वास

अकबर समस्त प्राणियों के जीवन को पवित्र मानता था। इसे वह दैवीय देन मानता था क्योंकि अन्य किसी में जीवन-दायिनी शक्ति नहीं होती। अतः जीवन को आदर की दृष्टि से देखना चाहिये।

(6.) सब तरह की स्वच्छता में विश्वास

अकबर का मानना था कि मनुष्य के लिए आवश्यक है कि वह अपने शरीर, मस्तिष्क तथा अपनी आत्मा को स्वच्छ और पवित्र रखे और सदाचरण तथा सद्व्यवहार के साधारण नियमों का पालन करे।

(7.) सूर्य उपासना में विश्वास

अकबर सूर्य का उपासक था परन्तु वह सूर्य की उपासना ईश्वर के रूप में नहीं करता था क्योंकि वह एकेश्वरवादी था। कहा जाता है कि पारसियों से प्रभावित होकर उसने सूर्य उपासना आरम्भ की। बदायूनी के विचार में अकबर ने बीरबल तथा अन्तःपुर की हिन्दू रानियों से प्रभावित होकर सूर्य पूजा आरम्भ की थी। मुगलों का विश्वास था कि राजाओं का भाग्य सूर्य से सम्बन्धित होता है। अकबर का भी विश्वास था कि सूर्य उपासना से मनोवांछित फल मिलता है।

(8.) जीव अहिंसा में विश्वास

अकबर का मानना था जीवों की हत्या उचित नहीं हैं। कुछ इतिहासकारों की धारणा है कि हरि विजय सूरी, विजय सेनसूरी, भानुचन्द्र उपाध्याय आदि जैन आचार्यों के सम्पर्क में आने से अकबर उनकी अहिंसा वृत्ति  से प्रभावित हुआ था परन्तु वास्तविकता यह है कि जैन आचार्यों के सम्पर्क में आने से पहले ही अकबर में अहिंसा की भावना ने जन्म ले लिया था।

1578 ई. से ही उसकी शिकार करने में रुचि कम हो गई थी और वह अहिंसा की ओर झुक गया था। सम्भवतः हिन्दू साधुओं, मुस्लिम दरवेशों तथा कुछ सूफी संतों के प्रभाव से अकबर में अहिंसा की मनोवृत्ति ने जन्म लिया तथा जैन आचार्यों के सम्पर्क में आने से अहिंसा की भावना अधिक बलवता हो गई। अकबर ने मांस-भक्षण का पूर्ण त्याग नहीं किया था अपतिु कुछ दिवसों पर पशु-हत्या का निषेध करके मांस-भक्षण को हतोत्साहित करने का प्रयत्न किया था।

(9.) गौ-हत्या का निषेध

अकबर ने अपने राज्य में गौ हत्या का निषेध कर दिया था। अबुल फजल के अनुसार अकबर ने आर्थिक तथा राजनीतिक कारणों से गौवध का निषेध किया। गाय उपयोगी पशु है और इसकी हत्या से हिन्दुओं के हृदय पर चोट लगती है। इस कारण अकबर ने गौवध का निषेध कर दिया था।

(10.) ईश्वरीय सत्ता में विश्वास

अकबर का विश्वास था कि मनुष्य अपने प्रत्येक कार्य के लिए उस ईश्वर के प्रति उत्तरदायी है जो सर्व-शक्तिमान्, सर्व-द्रष्टा तथा सर्व-व्यापक है और जिसकी आँख में कोई धूल नहीं डाल सकता। इसलिये अकबर प्रत्येक कार्य को धार्मिक तथा पवित्र समझता था।

अकबर को इस बात का बड़ा दुःख था कि लोग इस महान् सत्य को नहीं समझ पाते कि सबको मेल-जोल से रहना चाहिये। सबको सद्भावना के साथ ईश्वर की खोज में आगे बढ़ना चाहिए और स्वच्छता तथा पवित्रता का जीवन व्यतीत करना चाहिये।

(11.) दूसरों के लिये जटिल पहेली

उस युग के लोगों के लिये अकबर अपने विचारों, धार्मिक विश्वासों तथा व्यवहारों के कारण एक जटिल पहेली बन गया जो उसके धर्म के विषय में विभिन्न प्रकार के अनुमान लगाते थे। अकबर के मित्र अबुल फजल के विचार में अकबर एक सच्चा मुसलमान था परन्तु अकबर के आलोचक बदायूनी के विचार में अकबर एक विधर्मी था जो शेख मुबारक, उसके पुत्रों तथा अन्य चाटुकारों के प्रभाव में आकर इस्लाम को नष्ट कर देना चाहता था।

निष्कर्ष

अकबर जीवन पर्यन्त मुसलमान बना रहा परन्तु उसने मौलवियों के कठमुल्लापन को अस्वीकार कर दिया। सूर्य उपासना, गौ-हत्या निषेध एवं जीव अहिंसा में विश्वास करने के कारण कट्टर पन्थियों की दृष्टि में अकबर मुसलमान नहीं था। जबकि वास्तविकता यह है कि उसने इस्लाम के मौलिक सिद्धान्तों की कभी उपेक्षा नहीं की।

इस्लाम के साथ-साथ वह शाश्वत मानव धर्म में विश्वास करता था। उसका मानना था कि हर धर्म का मूल तत्व लगभग एक ही है, केवल उसके बाह्य रूप में अंतर है जिसे आधार बनाकर लोग परस्पर लड़ते हैं।

हैवेल ने अकबर के उच्च धार्मिक सिद्धान्तों की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘राजनीति में उच्चतम धार्मिक सिद्धान्तों को समाविष्ट करके अकबर ने भारतीय इतिहास में अपना नाम अमर बना दिया है।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – मुगल सल्तनत की पुनर्स्थापनाजलालुद्दीन मुहम्मद अकबर

अकबर का प्रारम्भिक जीवन

पानीपत का दूसरा युद्ध

बैरम खाँ का विद्रोह

अकबर के शासन सम्बन्धी उद्देश्य

अकबर का साम्राज्य विस्तार

अकबर की राजपूत नीति

अकबर की राजपूतों पर विजय

अकबर की शासन व्यवस्था

अकबर का सैन्य प्रबन्धन

अकबर का भूमि प्रबन्धन

अकबर की शासन व्यवस्था

अकबर के सामाजिक सुधार

अकबर की धार्मिक नीति

दीन-ए-इलाही

अकबर के शासन की विशेषताएँ

अकबर का व्यक्तित्व

इतिहासकारों की दृष्टि में अकबर

दीन-ए-इलाही

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दीन-ए-इलाही

दीन-ए-इलाही का शाब्दिक अर्थ, ‘ईश्वर का धर्म’ होता है परन्तु वास्तव में दीन-ए-इलाही कोई धर्म नहीं था। यह ऐसे लोगों की एक गोष्ठी थी जो अकबर के विचारों तथा विश्वासों से सहमत थे और जो उसे अपना पीर या गुरु मानने को तैयार थे।

अकबर जानता था कि न तो समस्त धर्मों को जोड़कर एक किया जा सकता है और न नया धर्म चलाया जा सकता है परन्तु वह अपने विचारों तथा विश्वासों को उन लोगों में प्रचलित करना चाहता था जो उनका स्वांग करना चाहते थे। फलतः अकबर ने उन लोगों की एक गोष्ठी बनाने का निश्चय कर लिया जो उसके धार्मिक विचारों तथा आध्यात्मिक सिद्धान्तों से प्रभावित थे और उसे पीर या गुरु मानकर उसके पद चिह्नों पर चलने के लिए को तैयार थे। इसी गोष्ठी का नाम दीन-ए-इलाही पड़ गया। इसे दीन-इलाही भी कहा जाता था।

दीन-ए-इलाही की स्थापना

दीन-इलाही के सदस्य

दीन-इलाही की सदस्यता अत्यन्त सीमित थी। अकबर जानता था कि उसे प्रसन्न करने अथवा अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिये बहुत बड़ी संख्या में लोग इसका सदस्य बनने के लिए उद्यत हो सकते थे। अकबर नहीं चाहता था कि लोग भय अथवा प्रलोभन वश इसके सदस्य बनें।

बदायूनी भी इस बात को स्वीकार करता है कि दीन-ए-इलाही का सदस्य बनाने के लिए धन अथवा शक्ति का प्रयोग नहीं किया गया। एक भी ऐसा उदाहरण उपलब्ध नहीं है कि दीन-इलाही का सदस्य बनने से किसी के पद में वृद्धि हुई हो अथवा इसका सदस्य बनने से मना कर देने पर किसी प्रकार की क्षति पहुँची हो अथवा दण्ड मिला हो।

इसमें केवल वही लोग सम्मिलित हो सकते थे जो स्वेच्छा से इसका सदस्य बनना चाहते थे और जिन्हें अकबर इसका सदस्य बनने योग्य समझता था। बिना अकबर की स्वीकृति के कोई इसका सदस्य नहीं बन सकता था। इतने सारे प्रतिबन्धों के होते हुए भी कई हजार लोग इसके सदस्य बन गये।

अब लगभग बीस सदस्यों के नाम उपलब्ध हैं। बीरबल के अतिरिक्त शेष समस्त सदस्य मुसलमान थे। इनमें से कुछ बड़े ही योग्य, चरित्रवान् तथा स्वतन्त्र विचार के व्यक्ति थे। राज्य के बड़े-बड़े हिन्दू मंत्रियों में से, जो अकबर के बड़े विश्वासपात्र थे, यथा भगवानदास, मानसिंह, टोडरमल आदि कोई भी दीन-ए-इलाही का सदस्य नहीं बना।

सदस्य बनने की प्रक्रिया

दीन-इलाही का सदस्य बनने के लिए अकबर ने रविवार को दीक्षा देने का दिन निर्धारित किया। उसी दिन लोग इसके सदस्य बन सकते थे। जो व्यक्ति दीक्षा लेना चाहता था वह अपने हाथों में एक पगड़ी लेकर अपने सिर को अकबर के चरणों पर रख देता था। अकबर उसे उठाकर उसकी पगड़ी उसके सिर पर रख देता था।

तब अकबर शिस्त शब्द का उच्चारण करता था। शिष्य भी इस शब्द को दोहराता था। शिस्त शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है- कटिया, जिससे मछलियाँ पकड़ी जाती हैं या कटिया लगाना परन्तु यहाँ पर इसका अर्थ है शिष्यता ग्रहण करना। एक पत्र पर शिस्त शब्द अंकित रहता था जिस पर ‘अल्ला-हो-अकबर’ अर्थात् ईश्वर महान् है भी लिखा रहता था। नये शिष्य को अकबर का एक लघु चित्र भी मिलता था जिसे वह प्रायः अपनी पगड़ी में रखता था।

सिद्धांत

दीन-इलाही के सदस्यों को निम्नलिखित सिद्धांतों का पालन करना होता था-

(1.) दीन-इलाही के सदस्य आपस में मिलने पर अल्ला-हो-अकबर अर्थात् ‘ईश्वर महान् है’ कहकर प्रणाम करते थे और जल्ला-जलाल-हू अर्थात् ‘महान् है उसका ऐश्वर्य’ कहकर प्रणाम का उत्तर देते थे।

(2.) दीन-इलाही के सदस्यों को मांस-भक्षण से बचने का यथा-सम्भव प्रयत्न करना चाहिये था और अपने जन्म के महीने में तो स्पर्श भी नहीं करना चाहिये था।

(3.) वन्ध्या, गर्भवती स्त्रियों तथा रजस्वला होने के पूर्व कन्याओं के साथ मैथुन करने का निषेध था।

(4.) दीन-इलाही का न कोई धर्मग्रन्थ था, न कोई आचार्य थे, न कोई देवालय या पूजागृह था और दीक्षा के अतिरिक्त न कोई त्यौहार या अनुष्ठान था।

(5.) बदायूनी ने लिखा है कि दीन-ए-इलाही के अनुयायियों को लिखित वचन देना पड़ता था कि वे इस्लाम को त्याग देंगे।

(6.) त्याग की चार कोटियाँ थीं- सम्पत्ति का त्याग, जीवन का त्याग, सम्मान का त्याग तथा धर्म का त्याग।

दीन-इलाही के उद्देश्य

अकबर द्वारा दीन-ए-इलाही को आरम्भ करने के निम्नलिखित उद्देश्य थे-

(1.) अकबर किसी नये धर्म का प्रचार नहीं करना चाहता था और न किसी धर्म को नष्ट करना चाहता था। वह घृणा, ईर्ष्या, द्वेष, कलह तथा पारस्परिक संघर्ष के जगत् में प्रेम, सहयोग तथा सद्भावना का राज्य स्थापित करना चाहता था।

(2.) अकबर अपने राज्य से वैचारिक संकीर्णता तथा धार्मिक असहिष्णुता को दूर करके सब लोगों में सुलह, शान्ति तथा सद्भावना स्थापित करना चाहता था।

(3.) अकबर की धारणा थी कि लोग अपने-अपने धर्म का पालन करते हुए भी कुछ समान आदर्शों तथा सिद्धान्तों के सूत्र में बंधकर भ्रातृत्व का संचार कर सकते थे।

(4.) अकबर अपने चिंतन तथा सत्संग से कुछ महान् आदर्शों का सृजन कर सका था, उन्हें वह अपने व्यावहारिक जीवन में चरितार्थ करके दिखाना चाहता था।

(5.) अकबर प्रजा की राजभक्ति को सुदृढ़ बनाना चाहता था।

दीन-इलाही का महत्व

(1.) अकबर की मृत्यु के साथ ही दीन-ए-इलाही समाप्त हो गया परन्तु अकबर ने जिन आदर्शों तथा सिद्धान्तों को स्थापित किया, उसके वंशज दो पीढ़ियों तक उनका पालन करते रहे।

(2.) शहजादा खुसरो तथा शहजादा दारा अकबर की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते रहे। यदि राज-सत्ता उनके हाथों में चली गई होती तो अकबर की विचारधारा आगे भी जीवित रहती।

(3.) राजनीतिक दृष्टि से दीन-इलाही को विशेष महत्त्व नहीं है क्योंकि बहुत थोड़े से लोग ही इसके सदस्य बने परन्तु इसने एक ऐसे वर्ग को जन्म दिया जिसका ईश्वर तथा अकबर में ध्रुव विश्वास था और जो अकबर के लिये अपना सर्वस्व निछावर करने के लिये उद्यत था।

(4.) दीन-ए-इलाही ने इस बात को सिद्ध कर दिया कि राजनीतिक, सामाजिक तथा धार्मिक मतभेद होते हुए भी लोगों के लिये यह सम्भव था कि वे ईश्वर तथा बादशाह की सेवा एक सूत्र में बँध कर करें।

(5.) यदिदीन-ए-इलाही सफल हुआ होता तो यह जन सामान्य में अकबर के प्रति अटल विश्वास उत्पन्न कर देता।

(6.) औरंगजेब के बादशाह बनते ही मुगल शासकों में उदारता का विलोपन हो गया तथा राज्य से दीन-ए-इलाही का प्रभाव पूर्णतः समाप्त हो गया।

दीन-ए-इलाही की आलोचना

(1.) मुस्लिम तथा ईसाई इतिहासकारों ने दीन-इलाही की तीव्र आलोचना की है। बदायूनी के अनुसार दीन-ए-इलाही का प्रचार इस्लाम को नष्ट करने के लिये किया गया था।

(2.) विन्सेन्ट स्मिथ ने इसे अकबर की मूर्खता का द्योतक बताया है। स्मिथ के अनुसार दीन-ए-इलाही, अकबर के हास्यास्पद दम्भ तथा अनियन्त्रित अधिनायकतन्त्र के दानवीय विकास का फल था।

(3.) हेग ने लिखा है- दीन-ए-इलाही वास्तव में लज्जाजनक असफलता रही। वह हिन्दू, मुसलमान तथा ईसाई किसी को भी अच्छा नहीं लगा।

दीन-इलाही की प्रशंसा

अधिकांश हिन्दू इतिहासकारों ने दीन-ए-इलाही की प्रशंसा की है। डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने दीन-इलाही की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘यह एक ऐसा धर्म था जिसमें समस्त धर्मों के गुण विद्यमान थे। इसमें रहस्यवाद, दर्शन तथा प्रकृति पूजा के तत्त्व संयुक्त थे। यह तर्क पर आधारित था। इसने किसी अन्ध-विश्वास को नहीं अपनाया, किसी ईश्वर या पैगम्बर को स्वीकार नहीं किया। अकबर ही इसका मुख्य प्रवर्तक था।’

प्रो. श्रीराम शर्मा ने लिखा है- ‘दीन-इलाही अकबर की राष्ट्रीय आदर्श की उच्च-कोटि की अभिव्यंजना थी।’

एक अन्य इतिहासकार ने लिखा है- ‘जो लोग अकबर की धार्मिक खोज में यह देखते हैं कि उसने राजनीतिक ध्येय से एक ऐसे धर्म को स्थापित करने का प्रयास किया जिसमें उसकी प्रजा एकता के सूत्र में बँध जाती, वे सत्य के केवल धरातल को ही देख सके हैं और वे भी बिनयॉन की भाँति उस व्यक्ति के अन्तःस्थल तक नहीं पहुँच सके हैं।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – मुगल सल्तनत की पुनर्स्थापनाजलालुद्दीन मुहम्मद अकबर

अकबर का प्रारम्भिक जीवन

पानीपत का दूसरा युद्ध

बैरम खाँ का विद्रोह

अकबर के शासन सम्बन्धी उद्देश्य

अकबर का साम्राज्य विस्तार

अकबर की राजपूत नीति

अकबर की राजपूतों पर विजय

अकबर की शासन व्यवस्था

अकबर का सैन्य प्रबन्धन

अकबर का भूमि प्रबन्धन

अकबर की शासन व्यवस्था

अकबर के सामाजिक सुधार

अकबर की धार्मिक नीति

दीन-ए-इलाही

अकबर के शासन की विशेषताएँ

अकबर का व्यक्तित्व

इतिहासकारों की दृष्टि में अकबर

अकबर के शासन की विशेषताएँ

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अकबर के शासन की विशेषताएँ

अकबर के शासन की विशेषताएँ उसके सम्पूर्ण शासनकाल में दिखाई देती हैं। उसने निरकुंश एवं एकच्छत्र शासक होते हुए भी प्रजा के विभिन्न वर्गों के हित के लिए कार्य किए।

महान साम्राज्य निर्माता

भारत में जिस प्रकार दो अफगान साम्राज्यों की स्थापना हुई थी। ठीक उसी प्रकार तीन मुगल साम्राज्यों की स्थापना हुई थी। पहले मुगल साम्राज्य की स्थापना बाबर ने की थी जिसे हुमायूँ ने चौसा तथा बिलग्राम की लड़ाई में खो दिया। दूसरे साम्राज्य की स्थापना हुमायूँ ने की थी किंतु उसकी स्थापना का काम अधूरा छोड़कर ही वह मृत्यु को प्राप्त हुआ।

तीसरे साम्राज्य की स्थापना अकबर के संरक्षक बैरमखाँ ने की थी। अकबर ने युवा होते ही बैरमखाँ से पीछा छुड़कार तीसरे मुगल साम्राज्य को काबुल और कश्मीर से लेकर खानदेश तक और बंगाल से लेकर गुजरात तक विस्तृत कर लिया था। इस विस्तृत राज्य के समक्ष बाबर तथा हुमायूँ द्वारा स्थापित राज्य कुछ भी नहीं थे। अतः अकबर एक महान् साम्राज्य निर्माता था।

अकबर के शासन की विशेषताएँ

प्राचीन भारतीय शासन पद्धति में शासक प्रजा के भौतिक एवं आध्यात्मिक कल्याण को सर्वोपरि रखकर शासन करते थे किंतु मुस्लिम बादशाहों के शासन काल में केवल मुस्लिम प्रजा के कल्याण को ही ध्यान में रखा जाता था। अकबर ने मध्यकाल के अन्य बादशाहों से उलट, अपनी समस्त प्रजा को एक समान समझा और सबके लिये एक जैसी शासन व्यवस्था स्थापित की। अकबर के शासन की विशेषताएँ इस प्रकार से थीं-

(1.) कुशल प्रशासक

अकबर अपने युग का कुशल प्रशासक था। उसने शासन व्यवस्था को उच्च आदर्शों पर स्थापित किया। वह भारत का पहला मुस्लिम शासक था, जिसने वास्तव में लौकिक शासन की स्थापना की। उसने राजनीति को धर्म से अलग कर दिया। इस कारण शासन में मुल्ला-मौलवियों तथा उलेमाओं का प्रभाव नहीं रहा।

स्मिथ ने उसकी प्रशासकीय प्र्रतिभा तथा शासन सम्बन्धी सिद्धान्तों की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘अकबर में संगठन की अलौकिक प्रतिभा थी। प्रशासकीय क्षेत्र में उसकी मौलिकता इस बात में पाई जाती है कि उसने इस सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया कि हिन्दुओं तथा मुसलमानों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए।’

(2.) धार्मिक सहिष्णुता को प्रमुखता

अकबर ने अपने शासन को धार्मिक सहिष्णुता तथा धार्मिक स्वतन्त्रता के सिद्धान्त पर आधारित किया था। वह ऐसे देश का बादशाह था जिसमें विभिन्न जातियों तथा धर्मों के लोग निवास करते थे। अकबर ने अपनी समस्त प्रजा को धार्मिक स्वतन्त्रता दे दी। जो हिन्दू दरबारी एवं मनसबदार उसके दरबार में रहते थे, उन्हें भी अपने धार्मिक आचारों तथा अनुष्ठानों को करने की पूरी स्वतन्त्रता थी।

अकबर के हरम में अनेक हिन्दू स्त्रियाँ थीं जिन्हें हिन्दू धर्म के अनुसार तीज त्यौहार मनाने तथा पूजा पाठ करने की पूरी छूट थी। अकबर स्वयं भी हिन्दुओं के त्यौहारों में सम्मिलित होता था। अकबर ने अपनी समस्त प्रजा को समान कानूनी अधिकार दिये।

(3.) धर्म अथवा जाति के स्थान पर प्रतिभा को प्रमुखता

अकबर ने सरकारी नौकरियों के द्वार समस्त लोगों के लिए खोल दिये। जाति अथवा धर्म के स्थान पर प्रतिभा तथा योग्यता के आधार पर नौकरियां दी जाने लगीं। राज्य को योग्यतम व्यक्तियों की सेवाएँ प्राप्त होने लगीं और राज्य की नींव सुदृढ़ हो गई।]

(4.) प्रजा के कल्याण को प्रमुखता

अकबर का शासन सैन्य बल पर आधारित न होकर प्रजा के कल्याण की भावना पर आधारित था तथा पूर्ववर्ती समस्त मुस्लिम शासकों की अपेक्षा उदार तथा लोक मंगलकारी था। उसका मानना था कि जब उसकी प्रजा सुखी तथा सम्पन्न होगी, तभी राज्य में शान्ति तथा स्थायित्व रहेगा और उसका राजकोष धन से परिपूर्ण रहेगा जिसके फलस्वरूप मुगल साम्राज्य की नींव सुदृढ़ हो जायेगी। इसलिये अकबर ने प्रजा के भौतिक, बौद्धिक तथा आध्यात्मिक विकास के प्रयास किये।

(5.) योग्य सेनापतियों की नियुक्ति

अकबर ने प्रत्येक अभियान के लिये योग्य सेनापतियों का चुनाव किया। उसने परम्परागत सेनापतियों के साथ-साथ प्रशासनिक काम करने वाले मंत्रियों को भी सैनिक अभियानों पर भेजा। वह सदैव दो सेनापतियों को एक साथ भेजता था ताकि विश्वासघात की संभावना न रहे। उसने राजा टोडरमल तथा बीरबल जैसे असैनिक मंत्रियों को भी सैनिक अभियानों पर भेजा।

अकबर के अन्तिम दिन

अकबर ने विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी। उसका राज्य कश्मीर से असीरगढ़ तक विस्तृत हो गया था परन्तु उसके अन्तिम दिन सुख से नहीं बीते। उसके दो पुत्र मुराद तथा दानियाल अधिक शराब पीने से अकबर के जीवन काल में ही मर गये थे। सबसे बड़ा पुत्र सलीम भी शराबी तथा विद्रोही प्रकृति का था। वह अकबर के आदेशों की पालना नहीं करता था।

इस कारण अकबर बहुत निराशा तथा दुःखी रहता था। इसी चिंता में अकबर बीमार रहने लगा। अकबर ने सलीम को सुधारने का बहुत प्रयास किया किंतु सलीम में कोई सुधार नहीं हुआ। वह अकबर के आदेशों तथा अपने कर्त्तव्यों की उपेक्षा करता रहा।

अकबर को बीमार जानकार सलीम ने राजधानी के निकट बने रहने का निश्चय कर लिया ताकि अकबर के मरने के बाद सलीम को मुगलों का तख्त प्राप्त करने में कोई कठिनाई न हो। अकबर जब भी सलीम को पश्चिमोत्तर प्रदेश अथवा दक्षिण भारत में जाने का आदेश देता तो सलीम वहाँ जाने से मना कर देता।

इस कारण अकबर स्वयं दक्षिण के युद्धों का संचालन करने के लिए गया। अकबर की अनुपस्थिति से लाभ उठाकर सलीम इलाहाबाद को अपना निवास स्थान बनाकर स्वतन्त्र रूप से शासन करने लगा। उसके इस आचरण से अकबर को बड़ी चिन्ता हुई। 21 अप्रैल 1601 को अकबर ने बुरहानपुर से आगरा के लिए प्रस्थान किया।

इस पर सलीम ने प्रकट विद्रोह कर दिया परन्तु अकबर ने धैर्य से काम लेते हुए, शाहजादे के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की। अकबर ने सलीम की समस्या सुलझाने के लिये अबुल फजल को दक्षिण से आगरा बुलवाया परन्तु सलीम ने मार्ग में ही ओरछा के सरदार वीरसिंह देव बुन्देला के द्वारा अबुल फजल की हत्या करवा दी।

जब अकबर को इसकी सूचना मिली तो वह बेहोश हो गया। होश में आने पर वह कई दिनों तक रोता और छाती पीटता रहा। अबुल फजल की हत्या से अकबर के स्वास्थ्य पर और भी बुरा प्रभाव पड़ा। वह इस कार्य के कारण सलीम से और अधिक अप्रसन्न हो गया परन्तु हरम की स्त्रियों के प्रयास से पिता-पुत्र में समझौता हो गया।

सलीम फतेहपुर में अकबर के पास आया और उसके चरणों का चुम्बन किया। अकबर ने अपनी पगड़ी सलीम के सिर पर रख दी और उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। इस समझौते के बाद भी सलीम की आदतों तथा व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं हुआ और अकबर का दुःख समाप्त नहीं हुआ। वह पेट की पीड़ा से ग्रस्त हो गया। यह रोग असाध्य संग्रहणी रोग बन गया। तेईस दिन की बीमारी के उपरान्त 16 अक्टूबर 1605 को अकबर की मृत्यु हो गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – मुगल सल्तनत की पुनर्स्थापनाजलालुद्दीन मुहम्मद अकबर

अकबर का प्रारम्भिक जीवन

पानीपत का दूसरा युद्ध

बैरम खाँ का विद्रोह

अकबर के शासन सम्बन्धी उद्देश्य

अकबर का साम्राज्य विस्तार

अकबर की राजपूत नीति

अकबर की राजपूतों पर विजय

अकबर की शासन व्यवस्था

अकबर का सैन्य प्रबन्धन

अकबर का भूमि प्रबन्धन

अकबर की शासन व्यवस्था

अकबर के सामाजिक सुधार

अकबर की धार्मिक नीति

दीन-ए-इलाही

अकबर के शासन की विशेषताएँ

अकबर का व्यक्तित्व

इतिहासकारों की दृष्टि में अकबर

अकबर का व्यक्तित्व

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अकबर का व्यक्तित्व

अकबर का व्यक्तित्व मध्यकालीन मुसलमान शासकों की तुलना में अधिक उदार एवं बड़ा था। वह बड़ी सल्तनत का शासक था और उसके व्यक्तित्व में बड़ी सल्तनत पर शासन करने के समस्त आवश्यक गुण विद्यमान थे।

 अकबर की गणना भारत के महान् शासकों में की जाती है। उसके व्यक्तित्व के सम्बन्ध में विद्वानों ने इतना अधिक लिख दिया है कि वास्तविकता का पता लगाना कठिन हो गया है।

अबुल फजल जैसे प्रशंसकों ने उसके व्यक्तित्व को अत्यन्त अतिरंजित करके उसे एक आदर्श शासक बताया है परन्तु बदायूनी जैसे आलोचकों ने उसे इस्लाम का शत्रु घोषित करके उसके व्यक्तित्व को अश्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास किया है। उपलब्ध साक्ष्यों का अध्ययन करने पर अनुमान होता है कि उसका व्यक्तित्व अपने युग के मुस्लिम बादशाहों से कहीं

अधिक श्रेष्ठ था। उसमें ऐसे अनेक गुणों का समावेश था जिनके बल पर वह अपने राज्य का अभूतपूर्व विस्तार कर सका, उसे स्थायित्व दे पाया तथा अपने वंशजों के लिये मार्ग दर्शक सिद्धांतों का निर्माण करने में सफल रहा।

अकबर का व्यक्तित्व

(1.) शारीरिक गठन

अकबर का कद मझोला और शरीर गठीला था। उसकी भुजायें लम्बी तथा आँखें चमकीली थीं। उसका रंग गेहुँआ और आवाज बुलन्द थी। वह परिश्रमशील तथा जिज्ञासु प्रकृति का व्यक्ति था।

(2.)  स्वभाव

अकबर का स्वभाव कोमल था। अहंकार तथा दम्भ से उसे घोर घृणा थी, क्रोध आने पर वह भयंकर रूप धारण कर लेता था किन्तु उसके क्रोध को शान्त होने में अधिक समय नहीं लगता था।

(3.) व्यवहार

अकबर व्यवहार कुशल शासक था। मधुर वाणी तथा सद्व्यवहार से वह अपने सम्पर्क में आने वाले व्यक्ति को वशीभूत कर लेता था। वह प्रजा में लोकप्रिय शासक था। जेसुइट पादरी जेवियर के कथनानुसार उसका व्यवहार महान् के साथ महान् और तुच्छ के साथ तुच्छ था। वह सदैव न्याय का पक्ष लेता था।

अपने कुटुम्बियों तथा सम्बन्धियों के साथ उसका व्यवहार प्रेम-पूर्ण था। अपने भाई हकीम द्वारा विद्रोह किये जाने पर भी अकबर ने उसके साथ उदारता का व्यवहार किया और उसे क्षमा कर दिया। अपने पुत्र सलीम के द्वारा अनेक बार आज्ञा का उल्लंघन करने तथा विद्रोह करने पर भी अकबर ने उसके साथ जीवन भर स्नेह-सिक्त व्यवहार किया तथा उसे अपना उत्तराधिकारी स्व्ीकार कर लिया।

(4.) बुद्धिमत्ता

यद्यपि अकबर पढ़ा-लिखा नहीं था परन्तु वह कुशाग्र बुद्धि का धनी था। उसकी स्मरण-शक्ति बहुत अच्छी थी। उसकी कल्पना शक्ति बड़ी उच्च-कोटि की थी। उसे कल्पनाओं का शाहजादा कहा गया है किंतु वह कोरा काल्पनिक नहीं था। उसमें व्यावहारिकता तथा प्रयोगात्मक बुद्धि भी थी।

(5.) रुचि

अकबर को आखेट खेलने का शौक था। उसे जंगली पशुओं का पीछा करने में बड़ा मजा आता था। आसव पीकर मस्त हुए हाथियों के युद्ध देखने का भी उसे बड़ा चाव था। पोलो खेलने में उसकी विशेष रुचि थी। वह कभी-कभी रात्रि में भी प्रकाश करवा कर पोलो खेलता था।

(6.) घुड़सवारी

अकबर अपने समय का अच्छा घुड़सवार था। एक बार उसने अजमेर से आगरा तक की 240 मील की दूरी घोड़े पर बैठकर केवल 24 घण्टे में तय की। इसी प्रकार वह सीकरी से अहमदाबाद जो 450 मील दूर है, घोड़े पर सवार होकर ग्यारह दिन में पहुँच गया था।

(7.) निशोनेबाजी

अकबर अच्छा निशानेबाज था। चित्तौड़ दुर्ग के घेरे में उसने बन्दूकचियों के प्रधान इस्माइल खाँ तथा राठौड़ सरदार जयमल पर दूर से ही बंदूक से निशाना साधकर घायल कर दिया जिससे इस्माइल खाँ की मृत्यु हो गई तथा राठौड़ सरदार जयमल बुरी तरह घायल हो गया।

(8.) धार्मिक प्रवृत्ति

अकबर बड़ी धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति था। ईश्वर की सत्ता तथा महानता में उसकी पूर्ण आस्था थी। वह मानव के भ्रातृत्व में विश्वास रखता था तथा धर्म को सत्य की खोज का साधन समझता था। उसने इबादत खाना की स्थापना करके विभिन्न धर्मों के आचार्यों एवं उपदेशकों के प्रवचन और शास्त्रार्थ करवाकर सत्य की खोज करने का प्रयास किया।

अकबर में धर्मान्धता अथवा धार्मिक कट्टरता न होकर उच्चकोटि की धार्मिक सहिष्णुता थी। सुलह-कुल की नीति में उसका पूर्ण विश्वास था। वह समस्त धर्म वालों के साथ दया तथा सहानुभूति का व्यवहार करता था।

(9.) चिश्ती सम्प्रदाय में विश्वास

धार्मिक प्रवृत्ति का होने के कारण अकबर साधु-सन्तों तथा फकीरों का बड़ा आदर करता था। चिश्ती सम्प्रदाय के सूफियों, विशेषतः शेख सलीम चिश्ती में उसका बड़ा विश्वास था। किसी भी महत्त्वपूर्ण कार्य को करने से पहले वह उनका आशीर्वाद प्राप्त करता था।

(10.) सत्य से प्रेम

यद्यपि अकबर पढ़ा-लिखा नहीं था परन्तु उसकी निरक्षरता उसके ज्ञानार्जन में किसी प्रकार बाधक सिद्ध नहीं हुई। अपनी विलक्षण प्रतिभा तथा स्मरणशक्ति के बल पर उसने अपार ज्ञान अर्जित कर लिया था। इस कारण उसे सत्य से बहुत प्रेम था। वह किसी भी धर्म की मान्यताओं को ज्यों की त्यों स्वीकार करने की बजाय उसे सत्य की कसौटी पर कसना चाहता था। प्रत्येक धर्म की अच्छी बात को स्वीकार करने में उसे किंचित् भी परहेज नहीं था।

(11.) साहित्य तथा कला से अनुराग

यद्यपि अकबर पढ़ा-लिखा नहीं था परन्तु उसे साहित्य तथा कला से बड़ा अनुराग था। वह साहित्यकारांे तथा कलाकारों का आश्रयदाता था। उन्हें हर प्रकार की सहायता तथा प्रोत्साहन देता था। उसका दरबार बड़े-बड़े विद्वानों से सुशोभित था।

अब्दुर्रहीम खानखाना, अबुल फजल, फैजी, तानसेन, मानसिंह, टोडरमल, बीरबल, मुल्ला तथा हकीम हुमाम उसकी सभा के नौ-रत्न थे। अकबर बड़ा ही जिज्ञासु था और उसे ज्ञानार्जन का चाव था। वह विद्वानों का सत्संग अपने ज्ञान-कोष की वृद्धि के लिए करता था।

(12.) श्रेष्ठ योद्धा तथा महान सेनानायक

अकबर में एक जुझारू सैनिक तथा योग्य सेनापति के गुण विद्यमान थे। भयानक संकट आ जाने पर भी उसका धैर्य भंग नहीं होता था। रणक्षेत्र में वह निर्भय होकर अपने प्राणों की बाजी लगा देता था। वर्षा-ऋतु में वह उमड़ी हुई नदियों में अपना घोड़ा डाल देता था और पार कर जाता था। युद्ध में उसने स्वयं को अजेय सिद्ध कर दिया था।

(13.) महान् साम्राज्य निर्माता

अकबर एक महान् साम्राज्य निर्माता था। मुगल साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक वही था। उसने अपने पिता के मृतप्राय साम्राज्य को न केवल फिर से जीवित कर दिया था अपितु उसे विशाल तथा संगठित साम्राज्य में परिवर्तित कर दिया। जिस समय हुमायूँ का निधन हुआ उस समय अकबर के पास न तख्त था और न साम्राज्य।

इन दोनों ही के लिए उसे भीषण संघर्ष करना पड़ा। अपने बाहु-बल से उसने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। उसका राज्य पूर्व में अफगानिस्तान के हेरात तथा कंदहार से लेकर पूर्व में चिटगांव तक एवं उत्तर में कश्मीर से लेकर दौलताबाद तथा नांदेड़ तक विस्तृत हो गया।

(14.) महान् शासक

एक शासक के रूप में अकबर की सफलताएं श्लाघनीय थीं। वह उदार, सहृदय तथा धर्म सहिष्णु शासक था। उसने अपने राज्य में शान्ति की स्थापना की तथा भूमि का समुचित प्रबन्ध करके अपनी प्रजा को संतुष्ट करने का प्रयास किया। उसने अपनी हिन्दू-प्रजा से वे समस्त कर हटा लिये जो मुसलमान प्रजा पर नहीं लगते थे।

उसने हिन्दुओं के लिये भी सरकारी नौकरियों के द्वार खोल दिये। अकबर ने उस युग में सुलह-कुल की नीति का अनुसरण करके अपने शासन को समन्वयकारी बनाया। उसने सामाजिक कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया।

धार्मिक सहिष्णुता की नीति का अनुसरण कर दीन-इलाही चलाने का प्रयास किया। उसमें भी किसी के साथ जोर जबरदस्ती नहीं की उसने अनेक फारसी ग्रन्थों का संस्कृत में और संस्कृत ग्रन्थों का फारसी में अनुवाद कराकर सांस्कृतिक समन्वय स्थापित करने का प्रयत्न किया।

निष्कर्ष

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में हम इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि अकबर का व्यक्तित्व विभिन्न गुणों से सम्पन्न था। वह प्रतिभावान, धर्म-सहिष्णु, साहित्य एवं कलाप्रेमी शासक था। वह एक अच्छा योद्धा, साम्राज्य निर्माता तथा अच्छा शासक था। उसमें प्रजा के कल्याण की भावना थी। उसके ये गुण उसे मध्य-युग के इतिहास में अन्य मुस्लिम शासकों से अलग स्थान प्रदान करते हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – मुगल सल्तनत की पुनर्स्थापनाजलालुद्दीन मुहम्मद अकबर

अकबर का प्रारम्भिक जीवन

पानीपत का दूसरा युद्ध

बैरम खाँ का विद्रोह

अकबर के शासन सम्बन्धी उद्देश्य

अकबर का साम्राज्य विस्तार

अकबर की राजपूत नीति

अकबर की राजपूतों पर विजय

अकबर की शासन व्यवस्था

अकबर का सैन्य प्रबन्धन

अकबर का भूमि प्रबन्धन

अकबर की शासन व्यवस्था

अकबर के सामाजिक सुधार

अकबर की धार्मिक नीति

दीन-ए-इलाही

अकबर के शासन की विशेषताएँ

अकबर का व्यक्तित्व

इतिहासकारों की दृष्टि में अकबर

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इतिहासकारों की दृष्टि में अकबर
इतिहासकारों की दृष्टि में अकबर

इतिहासकारों की दृष्टि में अकबर का स्थान बहुत ऊँचा है। चाहे भारतीय इतिहासकार हों या विदेशी इतिहासकार सभी ने अकबर के शासन की प्रशंसा की है। जवाहर लाल नेहरू ने अकबर को भारत के दो महान राजाओं में से एक बताया है।

मध्यकालीन इतिहासकारों से लेकर आधुनिक इतिहासकारों ने अकबर के बारे में बहुत कुछ लिखा है। बदायूनी जैसे अधिकांश लेखकों ने भावनाओं के साथ बहकर लेखन किया गया है। आधुनिक यूरोपीय एवं भारतीय इतिहासकारों ने भी स्वयं को धर्मनिरपेक्ष सिद्ध करने के लिये अकबर को काल्पनिक गुणों का स्वामी बताया है। इस सारे मिथ्या लेखन के बीच अकबर के वास्तविक चरित्र एवं सफलताओं का विश्लेषण करना कठिन हो जाता है।

इतिहासकारों की दृष्टि में अकबर

यहाँ अकबर के सम्बन्ध में कुछ इतिहासकारों के विचार दिये जा रहे हैं-

विन्सेट स्मिथ ने अकबर की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘वह मनुष्य का जन्मजात शासक था और इतिहास में परिज्ञात सर्वशक्तिशाली शासकों में स्थान पाने का वस्तुतः अधिकारी है। यह अधिकार निःसंदेह उसके अलौकिक एवं प्राकृतिक गुणों, उसके मौलिक विचारों तथा उसकी शानदार सफलताओं पर आधारित है।’

के. टी. शाह ने अकबर के बारे में लिखा है- ‘मुगलों में अकबर सबसे महान् था और यदि मौर्यों के काल से नहीं तो कम से कम एक सहò वर्षों में वह सबसे बड़ा भारतीय शासक था।’

लेनपूल ने अकबर की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘वह भारत का भद्रतम शासक था…..वह साम्राज्य का सच्चा संस्थापक तथा संगठनकर्ता था…..वह मुगल साम्राज्य के स्वर्ण-युग का प्रतिनिधित्व करता है।’

एडवडर््स तथा गैरेट ने अकबर की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘अकबर ने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी योग्यता को सिद्ध कर दिया है। वह एक निर्भीक सैनिक, एक महान् सेनानायक, एक बुद्धिमान प्रबन्धक, एक उदार शासक और चरित्र का सही मूल्यांकन करने वाला था। वह मनुष्यों का जन्मजात नेता था और इतिहास का सर्वशक्तिमान् शासक कहलाने का वास्तव में अधिकारी है।’

हेग ने अकबर की प्रशंसा करने हुए लिखा है, ‘वास्तव में वह एक महान् शासक था क्योंकि वह जानता था कि अच्छा शासक वही है जिसका उसकी प्रजा आज्ञा-पालन के साथ-साथ आदर-सम्मान और प्यार करती हो न कि भयभीत रहती हों। वह ऐसा राजकुमार था जिसे समस्त लोग प्यार करते थे, जो महान् व्यक्तियों के साथ दृढ़, निम्न-स्थिति के लोगों के प्रति उदार और जो छोटे-बड़े परिचित अपरिचित समस्त लोगों के साथ न्याय करता था।’

मुगल सल्तनत का वास्तविक संस्थापक

 मुगल सल्तनत का आरम्भिक संस्थापक बाबर था परन्तु इसका वास्तविक संस्थापक अकबर ही था। यह सत्य है कि पानीपत के युद्ध में इब्राहीम लोदी को और खनवा के युद्ध में राणा सांगा को परास्त करके बाबर ने भारत में मुगल सल्तनत की स्थापना कर दी थी परन्तु न तो अफगानों को और न राजपूतों की ही शक्ति को पूर्ण रूप से नष्ट-भ्रष्ट कर सका था।

अफगान लोग बगाल एवं बिहार में और राजपूत लोग राजस्थान में अपनी बिखरी हुई शक्ति को संगठित करने में संलग्न थे। उन्होंने अपने को इतना प्रबल बना लिया कि वे नव-निर्मित मुगल सल्तनत के लिये भयानक चुनौती बन गये।

बाबर की भारतीय विजय कोरी सैनिक विजय थी। उसने अपने सैनिक बल तथा रण-कौशल से भारतीय साम्राज्य को प्राप्त किया था। यह साम्राज्य शक्ति पर आधारित था और शक्ति द्वारा ही यह सुरक्षित रखा तथा स्थायी बनाया जा सकता था। बाबर में अलौकिक सैनिक प्रतिभा थी और नेतृत्व ग्रहण करने की अदभुत् क्षमता थी।

अतः जब तक वह जीवित रहा तब तक वह अपने भारतीय साम्राज्य को सुरक्षित रख सका। परन्तु दुर्भाग्यवश वह केवल चार वर्ष तक जीवित रहा और उसके आँख बंद करते ही शक्ति का पलड़ा उलट गया। अब शक्ति अफगानों के हाथ में चली गई और वे संगठित होकर मुगलों का सामना करने के लिए उद्यत हो गये।

बाबर में सैनिक प्रतिभा तो थी परन्तु उसमें प्रशासकीय प्रतिभा की कमी थी। वह अपने साम्राज्य को संगठित तथा सुव्यवस्थित नहीं बना सका। न उसने शासन सम्बन्धी कोई सुधार किये और न वह नई शासन संस्थाओं की स्थापना कर सका। अतः उसके द्वारा निर्मित साम्राज्य निराधार तथा निर्मूल था जो स्थायी सिद्ध नहीं हो सकता था।

साम्राज्य को स्थायी बनाने के लिये आर्थिक सुदृढ़ता की आवश्यकता होती है। अर्थ शक्ति का बहुत बड़ा स्रोत होता है। शक्ति से साम्राज्य को स्थायित्व प्राप्त होता है। अभाग्यवश बाबर की आर्थिक नीति अदूरदर्शिता पूर्ण थी। उसने धन का अपव्यय कर अपना कोष खाली कर दिया जिससे साम्राज्य का आधार कमजोर पड़ गया था।

बाबर की भारतीय विजय नैतिक-बल से भी रिक्त थी। मुगल लोग भारत में विदेशी, बर्बर एवं रक्त-पिपासु समझे जाते थे। अफगान तथा हिन्दू दोनों ही उन्हें घृणा की दृष्टि से देखते थे तथा  दोनों ही मुगल सल्तनत को उन्मूलित करने की ताक में  रहते थे। भारतीय प्रजा की सहानुभूति मुगलों के साथ नहीं थी।

भारतीय प्रजा मुगलों को उन्मूलित करने में किसी के भी साथ सहयोग कर सकती थी। इस प्रकार नैतिक-बल विहीन नव-निर्मित मुगल साम्राज्य रेत के दुर्ग के समान था जिसे एक हल्का सा आघात नष्ट कर सकता था।

रशब्रुक विलियम्स ने लिखा है- ‘बाबर ने अपने पुत्र को ऐसा साम्राज्य प्रदान किया जो केवल युद्ध की परिस्थितियों में चल सकता था और शान्ति के समय के लिए निर्बल तथा निराधार था।’

इस दुर्बलता के कारण इस साम्राज्य का नष्ट हो जाना अनिवार्य था। हुमायूँ के तख्त पर बैठते ही विद्राहों की भंयकर आँधियाँ चलने लगीं और मुगल सल्तनत की जड़ें हिलने लगीं। हुमायूँ का अफगानों के साथ भीषण संग्राम आरम्भ हो गया जिसका अन्तिम परिणाम यह हुआ कि जिस साम्राज्य की स्थापना बाबर ने की थी वह उन्मूलित हो गया और उसके स्थान पर द्वितीय अफगान साम्राज्य की स्थापना हो गई।

शेरशाह ने बाबर के समस्त पुत्रों को हिन्दुस्तान से मार भगाया। हुमायूँ ने भागकर फारस के शाह के यहाँ शरण ली और उसके अन्य भाई अफगानिस्तान भाग गये और वहीं शासन करने लगे। मुगल सल्तनत को उन्मूलित करने के बाद पन्द्रह वर्षों तक अफगानों ने फिर भारत पर शासन किया।

पन्द्रह वर्ष बाद हुमायूँ ने फारस के शाह की सहायता से भारत की पुनर्विजय का प्रयत्न किया। पहले उसने अपने भाइयों को नत-मस्तक किया। इसके बाद उसने अफगानों को परास्त कर दिल्ली तथा आगरा पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार एक बार फिर वह भारत में मुगल सत्ता स्थापित करने में सफल हो गया।

हुमायूँ ने अपने पिता के साम्राज्य को खो देने के लांछन को तो धो दिया परन्तु जिस साम्राज्य की उसने पुनर्स्थापना की वह पहले से अधिक निर्बल था। पंजाब में अभी असन्तोष की आग व्याप्त थी। दिल्ली तथा आगरा पर भी दृढ़ता से मुगलों की शक्ति स्थापित न हो पाई थी।

अफगान लड़ाके चारों और सक्रिय थे और अपनी सत्ता की पुनर्स्थापना के लिये संग्राम लड़ रहे थे। इन्ही परिस्थितियों में हुमायूँ का निधन हो गया। न वह अपने राज्य को संगठित कर सका और न शासन की समुचित व्यवस्था कर सका। वह अकबर के लिए असुरक्षित, अव्यवस्थित तथा असंगठित राज्य छोड़ गया जो विपत्ति के एक ही झोंके में समाप्त हो सकता था। अतः हुमायूँ को भी मुगल सल्तनत का वास्तविक संस्थापक नहीं कहा जा सकता।

वस्तुतः मुगल साम्राज्य की वास्तविक स्थापना का भार अकबर के ही कन्धों पर पड़ा जिसकी अवस्था उस समय केवल तेरह वर्ष चार महीने थी। यद्यपि अकबर अल्प-वयस्क, अनुभव शून्य तथा साधनहीन था परन्तु सौभाग्य से उसे बैरम खाँ जैसे योग्य, स्वामिभक्त, अनुभवी तथा सैनिक एवं प्रशासकीय प्रतिभा-सम्पन्न संरक्षक की सेवाएँ प्राप्त हो गईं।

बैरम खाँ की सहायता से अकबर ने दिल्ली तथा आगरा पर दृढ़ता से अधिकार स्थापित कर लिया। इसके बाद उसने साम्राज्य निर्माण का कार्य आरम्भ कर दिया। उसने एक अत्यन्त सुसज्जित तथा सुसंगठित सेना का निर्माण करके उत्तरी-भारत के बहुत बड़े भाग पर प्रभुत्व स्थापित किया। उसने इस विशाल साम्राज्य की सुरक्षा की पूरी व्यवस्था की।

अकबर की विजयें कोरी सैनिक विजयें न थीं। उसने अत्यंत संगठित तथा सुव्यवस्थित शासन की व्यवस्था भी की। उसने ऐसी लोकप्रिय शासन व्यवस्था स्थापित की जिसने उसके साम्राज्य को सुदृढ़ बना दिया। उसने राजनीति में नये सिद्धान्तों का प्रयोग किया जिससे वह अत्यन्त लोकप्रिय बन गया। उसने राजनीति में उदारता, सहिष्णुता, धार्मिक स्वतंत्रता, न्याय एवं निष्पक्षता की नीति का अनुसरण किया जिससे उसका शासन लोकप्रिय बन गया।

अकबर का साम्राज्य शक्ति अथवा भय पर आधारित नहीं था। उसने अपनी प्रजा के हृदय पर विजय प्राप्त कर उसकी शुभकामनायें प्राप्त कर लीं। इससे अकबर के साम्राज्य को नैतिक-बल प्राप्त हो गया। इससे अकबर का राज्य स्थाई हो गया। लगभग तीन सौ वर्षों तक उसके वंशज भारत में शासन करते रहे। अतः अकबर को ही मुगल साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक मानना चाहिए।

पेन ने लिखा है- ‘मुगल सल्तनत का आरोपण सर्वप्रथम बाबर ने किया था। शेरशाह ने उसे ने उसे उन्मूलित कर दिया, हुमायूँ ने उसे फिर आरोपित किया और अन्त में अकबर ने उसे वास्तव में अच्छी प्रकार आरोपित किया।’

स्मिथ ने लिखा है- ‘यह नहीं कहा जा सकता कि सिंहासनारोहण के समय अकबर के पास कोई साम्राज्य था। यह अकबर की अलौकिक प्रतिभा तथा बैरमखाँ की स्वामि-भक्ति थी जिसने एक विशाल सल्तनत की प्राप्ति की।’

जेम्स टॉड ने लिखा है- ‘मुगलों के साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक अकबर था जिसने सर्वप्रथम राजपूतों की स्वतन्त्रता पर सफलतापूर्वक विजय प्राप्त की……..वह उस रज्जु को तैयार कर सका जिसमें उसने उसको बांध दिया।’

हण्टर ने लिखा है- ‘जब 1556 ई. में अकबर तख्त पर बैठा तब भारत उसे छोटे-छोटे हिन्दू तथा मुसलमान राज्यों में विभक्त मिला जिनमें संघर्ष व्याप्त था। 1605 ई. में जब वह मरा तो एक संगठित साम्राज्य छोड़ गया।’

पनिक्कर ने लिखा है- ‘जब अकबर मरा तब अपने पुत्र के लिए एक व्यवस्थित साम्राज्य और राजवंश के प्रति भक्ति रखने वाली प्रजा छोड़ गया।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – मुगल सल्तनत की पुनर्स्थापनाजलालुद्दीन मुहम्मद अकबर

अकबर का प्रारम्भिक जीवन

पानीपत का दूसरा युद्ध

बैरम खाँ का विद्रोह

अकबर के शासन सम्बन्धी उद्देश्य

अकबर का साम्राज्य विस्तार

अकबर की राजपूत नीति

अकबर की राजपूतों पर विजय

अकबर की शासन व्यवस्था

अकबर का सैन्य प्रबन्धन

अकबर का भूमि प्रबन्धन

अकबर की शासन व्यवस्था

अकबर के सामाजिक सुधार

अकबर की धार्मिक नीति

दीन-ए-इलाही

अकबर के शासन की विशेषताएँ

अकबर का व्यक्तित्व

इतिहासकारों की दृष्टि में अकबर

नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर

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नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर

नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर ने ईस्वी 1605 से 1627 तक शासन किया। वह अकबर के चार पुत्रों में सबसे बड़ा था। जिस समय अकबर की मृत्यु हुई, उस समय अकबर के पुत्रों में अकेला वही जीवित बचा था।

नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर का प्रारम्भिक जीवन

नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर का बचपन का नाम सलीम था। उसकी माता हीराकंवर आम्बेर के राजा भारमल (बिहारीमल) की कन्या थी। सलीम का जन्म बड़ी प्रार्थनाओं तथा तीर्थ-यात्रओं के उपरान्त शेख सलीम चिश्ती के आशीर्वाद से हुआ था। सलीम चिश्ती के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए अकबर ने अपने पुत्र का नाम सलीम रखा।

कुछ बड़े हो जाने पर सलीम की शिक्षा-दीक्षा का भार बैरमखाँ के पुत्र अब्दुर्रहीम खानखाना को सौंपा गया। खानखाना के संरक्षण में सलीम ने तुर्की, फारसी तथा हिन्दी का ज्ञान प्राप्त किया। सलीम को बौद्धिक शिक्षा के साथ-साथ व्यावहारिक तथा शस्त्र संचालन की शिक्षा भी दी गई।

ससे वह युद्ध विद्या में भी निपुण हो गया। 1585 ई. में जब सलीम पन्द्रह साल का था तब उसका विवाह आम्बेर के राजा भगवानदास (भगवंतदास) की कन्या मानबाई के साथ हुआ जो शाह बेगम के नाम से प्रसिद्ध हुई। 

तख्त की प्राप्ति

अकबर की मृत्यु के उपरान्त 25 अक्टूबर 1605 को सलीम आगरा में नूरूद्दीन मुहम्मद जहाँगीर के नाम से तख्त पर बैठा। नूरूद्दीन का अर्थ होता है- ‘धर्म का प्रकाश’ तथा जहाँगीर का अर्थ होता है- ‘संसार को पकड़ने वाला अर्थात् संसार का स्वामी। जहाँगीर का राजतिलक बड़ी धूम-धाम से हुआ। इस अवसर पर अनेक बंदियों को कारागार से मुक्त किया गया।

जिन लोगों ने जहाँगीर को बादशाह बनने में बाधा पहुँचाई थी, उन्हें भी क्षमा कर दिया गया। प्रजा पर बहुत से कर हटा दिया गया। अधिकांश अफसरों को उनके पदों पर बने रहने दिया गया। बादशाह के समर्थकों को उच्च पद दिये गये। राज्य से शराब के उत्पादन तथा विक्रय का निषेध कर दिया गया।

सड़कों के किनारे सराय बनवाने के आदेश दिये गये और नगरों में औषधालयों के निर्माण की आज्ञा दी गई। आगरा में राज-प्रासाद के समक्ष सोने की जंजीर से एक घंटी लटकाई गई जिसका नाम न्याय की घंटी रखा गया। कोई भी परिवादी इस जंजीर को खींचकर अपनी फरियाद बादशाह तक पहुँचा सकता था परन्तु सम्भवतः कभी किसी को यह जंजीर खींचने का दुस्साहस नहीं हुआ।

नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर की जहाँगीर की सामरिक सफलताएँ

खुसरो का विद्रोह

शहजादा खुसरो नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर का सबसे बड़ा पुत्र था। उसकी माँ राजा मानसिंह की बहिन थी। खुसरो का विवाह अजीज कोका की कन्या से हुआ था। खुसरो प्रतिभावान, रूपवान् तथा लोकप्रिय युवक था। मधुर-भाषी तथा व्यवहार कुशल होने से उसके व्यक्तित्व में सहज स्वाभाविक आकर्षण था।

वह अपने पितामह अकबर का सबसे प्रिय शहजादा था। सलीम की विद्रोही प्रवृत्ति तथा विलासप्रियता के कारण अकबर खुसरो को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहता था। अकबर के बीमार पड़ने पर खुसरो के मामा राजा मानसिंह तथा दरबार के कुछ अमीरों ने खुसरो को अकबर का उत्तराधिकारी बनाने का प्रयास किया परन्तु ये लोग सफल नहीं रहे तथा सलीम को ही तख्त प्राप्त हो गया।

यद्यपि जहाँगीर तथा खुसरो में मेल हो गया परन्तु खुसरो में तख्त प्राप्त करने की लालसा बनी रही। जहाँगीर भी उसकी तरफ से निश्चिंत नहीं हो सका। इसलिये जहाँगीर ने उसे आगरा के दुर्ग में रखकर उस पर पहरा लगा दिया। खुसरो इस अपमान को सहन नहीं कर सका।

5 अप्रेल 1606 को वह 340 अश्वारोहियों के साथ दुर्ग से निकल भागा और मथुरा की ओर चला गया। मथुरा में हुसेन बेग बदख्शी 300 अश्वारोहियों के साथ उसकी सहायता करने के लिये उद्धत हो गया। अब खुसरो ने पंजाब के लिये प्रस्थान किया। जब खुसरो पंजाब पहुँचा तब दीवान अब्दुल रहीम भी उससे मिल गया।

तरन-तारन नामक स्थान पर सिक्ख गुरु अर्जुनदेव भी शहजादे से मिले और उसे धन तथा आशीर्वाद दिया। लाहौर पहुँचते-पहुँचते खुसरो के पास बारह हजार सैनिकों की सेना तैयार हो गई परन्तु लाहौर के हाकिम दिलावर खाँ ने नगर का द्वार बन्द कर लिया और खुसरो को घुसने नहीं दिया।

नौ दिन के भीतर जहाँगीर भी एक विशाल सेना तथा तोपखाने के साथ वहाँ आ पहुँचा। व्यास तथा सतलज नदियों के संगम के निकट भैरोवाल नामक स्थान पर दोनों पक्षों में भीषण संग्राम हुआ। खुसरो की सेना परास्त हो गई और खुसरो जान बचाकर भाग खड़ा हुआ।

जब वह एक नाव में बैठकर चिनाब नदी पार कर रहा था, तब उसकी नाव पानी में डूब गई और महाबतखाँ ने उसे कैद कर लिया। खुसरो को बड़ी-बड़ी जंजीरों में बाँधकर लाहौर लाया गया और जहाँगीर के सामने उपस्थित किया गया। उस समय शहजादे के नेत्रों से आँसू बह रहे थे।

खुसरो को कारागार में डाल दिया गया तथा उसके साथियों को निर्दयतापूर्ण यातनाएं दी गईं। गुरु अर्जुनदेव पर ढाई लाख रुपये का जुर्माना किया गया। जुर्माना न देने पर उनकी हत्या कर दी गई। इस कारण मुगल साम्राज्य तथा सिक्ख गुरुओं के बीच संघर्ष आरम्भ हुआ।

थोड़े दिनों बाद खुसरो पर जहाँगीर के प्राण लेने का षड्यन्त्र रचने का आरोप लगाया गया तथा उसे अंधा करने की सजा दी गई। महाबतखाँ ने अपने हाथ से खुसरो की आँखों में तार घुसेड़कर उसे अंधा किया। इसके बाद जहाँगीर ने हकीमों से उसका उपचार करवाया।

इससे खुसरो की एक आँख में पूरी और दूसरी में थोड़ी सी रोशनी आ गई। खुसरो कारागार में पड़ा रहा। 1622 ई. में शाहजादा खुर्रम के षड्यन्त्र से बुरहानुपर के दुर्ग में खुसरो की हत्या हुई। जब जहाँगीर को इसकी सूचना मिली तो उसने शजहादे के शव को इलाहाबाद मँगवाकर दफनाया। यह स्थान खुसरोबाग कहलाने लगा।

मेवाड़ के विरुद्ध संघर्ष

मेवाड़ से मुगलों का संघर्ष बाबर के भारत में प्रवेश के समय से ही चला आ रहा था। अकबर ने महाराणा उदयसिंह से चित्तौड़ का दुर्ग छीन लिया था किंतु वह मेवाड़ राजवंश को अपने अधीन नहीं कर पाया था। जहाँगीर ने इस कार्य को पूरा करने का निश्चय किया। इन दिनों मेवाड़ में राणा प्रतापसिंह का पुत्र राणा अमरसिंह शासन कर रहा था।

1606 ई. में जहाँगीर ने शाहजादा परवेज की अध्यक्षता में एक विशाल सेना राणा अमरसिंह के विरुद्ध भेजी। देवेर नाम स्थान पर मुगल सेना का राजपूतों से भीषण किंतु अनिर्णित युद्ध हुआ। खुसरो के विद्रोह के कारण जहाँगीर ने परवेज को वापस बुला लिया और उसके स्थान पर महाबतखाँ को भेज दिया परन्तु उसे भी विशेष सफलता नहीं मिली।

इस कारण महाबतखाँ को वापस बुला लिया गया और 1609 ई. में ख्वाजा अब्दुल्लाखाँ को अमरसिंह के विरुद्ध भेजा गया। अब्दुल्ला ने बड़े वेग तथा भयंकरता के साथ हमला किया तथा अमरसिंह को पहाड़ियों में चले जाने के लिये विवश कर दिया। इस पर भी अब्दुल्ला आगे नहीं बढ़ सका। कुछ समय बाद उसे मेवाड़ से हटाकर दक्खिन भेज दिया गया।

इस बार शाहजादा खुर्रम तथा अजीज कोका को मेवाड़ पर आक्रमण करने भेजा गया। वे दोनों सहयोग के साथ काम नहीं कर सके। इस कारण अजीज कोका को वापस बुला लिया गया। शाहजादा खुर्रम ने अमरसिंह के विरुद्ध युद्ध जारी रखा। खुर्रम ने मेवाड़ को उजाड़ना आरम्भ किया तथा अमरसिंह को चारों ओर से घेर लिया।

इसी समय मेवाड़ में अकाल तथा महामारी का प्रकोप हुआ। इस कारण अमरसिंह की  सेना में रसद की कमी हो गई। अतः कुंअर कर्णसिंह तथा राजपूत सरदारों ने महाराणा अमरसिंह को सलाह दी कि वह मुगलों से सन्धि कर ले। अमरसिंह ने सरदारों की सलाह मानकर खुर्रम से संधि की बात चलाई।

वह स्वयं, शाहजादे खुर्रम के खेमे में गया। शाहजादे ने राणा का सम्मान किया और संधि का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। इस पर अमरसिंह ने कुंअर कर्णसिंह को खुर्रम के साथ जहाँगीर के पास भेज दिया।

जहाँगीर ने भी कर्णसिंह का बड़ा स्वागत किया और कुछ महीने बाद ही उसे पाँच हजार का मनसब दे दिया। जहाँगीर ने चित्तौड़ तथा मेवाड़ का वह सब भाग जो अकबर तथा जहाँगीर के समय में जीता गया था, राणा को लौटा दिया। उसने राणा अमरसिंह तथा कर्णसिंह की संगमरमर की मूर्तियाँ बनवाकर आगरा में रखवाईं। इस संधि के बाद राणा ने राज्य अपने पुत्र कर्णसिंह को सौप दिया और स्वयं एकान्तवास में रहने लगा।

अहमदनगर के विरुद्ध संघर्ष

इन दिनों दक्षिण की राजनीति का संचालन मलिक अम्बर कर रहा था। वह मूलतः अबीसीनिया का रहने वाला था। उसे कासिम ख्वाजा नामक एक व्यक्ति ने बगदाद के बाजार से गुलाम के रूप में खरीदा था। बगदाद से वह अहमदनगर लाया गया। वहाँ उसे मुर्तजा निजामशाह के मन्त्री ने खरीद लिया।

जब बरार तथा खानदेश मुगलों के अधिकार में चले गये तब मलिक अम्बर बीजापुर चला गया और वहाँ के शासक के यहाँ नौकरी करने लगा परन्तु थोड़े दिन बाद अम्बर फिर अहमदनगर लौट आया। इस बार उसे डेढ़-सौ से अधिक मनसब पर नियुक्त मिली। वह अपनी योग्यता तथा प्रतिभा के बल से उन्नति करने लगा।

मुर्तजा निजामशाह (द्वितीय) के शासन काल में राज्य की वास्तविक शक्ति मलिक अम्बर के हाथों में चली गई। मलिक अम्बर ने राजा टोडरमल के भूमि-सूधार के आधार पर दक्षिण में भूमि सुधार किया तथा भूमि की नाप करवा कर लगाना निश्चित कर दिया। सरकार उपज का एक-तिहाई भाग, लगान के रूप में लेती थी।

अहमदनगर राज्य में लगान अनाज के रूप में लिया जाता था किंतु मलिक अम्बर ने नकद रुपये में लगान लेना आरम्भ किया। लगान का प्रबंध प्रायः हिन्दू कर्मचारियों से करवाया जाता था परन्तु उनके कार्यों का निरीक्षण करने के लिए मुसलमान अफसर रखे गये थे।

अहमदनगर के शासन को व्यवस्थित करने के उपरान्त मलिक अम्बर ने मुगलों की ओर ध्यान दिया। वह मुगल साम्राज्य की प्रबल सैनिक शक्ति तथा उसके प्रचुर साधनों से परिचित था। इसलिये उसने मुगलों के विरुद्ध छापामार रणनीति का उपयोग किया।

1605 ई. में जहाँगीर ने अब्दुर्रहीम खानखाना की अध्यक्षता में एक विशाल सेना मलिक अम्बर पर आक्रमण करने भेजी। खानखाना ने जहाँगीर को वचन दिया कि वह दो वर्ष के भीतर मलिक अम्बर को पराजित कर देगा परन्तु उसे कोई सफलता नहीं मिली और विवश होकर मलिक अम्बर के साथ सन्धि करनी पड़ी।

खानखाना के विफल हो जाने पर जहाँगीर ने खान-ए-जहाँ लोदी को अम्बर के विरुद्ध भेजा। जहाँगीर ने अब्दुल्लाखाँ को भी मेवाड़ के मोर्चे से हटाकर गुजरात भेज दिया ताकि वह नासिक की ओर से मलिक अम्बर पर आक्रमण कर सके। खान-ए-जहाँ तथा अब्दुल्लाखाँ भी मलिक अम्बर से परास्त हो गये।

अब जहाँगीर ने एक बार फिर अब्दुर्रहीम खानखाना को मलिक अम्बर के विरुद्ध भेजा। इस बार खानखाना ने सैनिक बल के साथ कूटनीति से भी काम लिया। उसने मलिक अम्बर के कुछ अफसरों को अपनी ओर मिला लिया और फिर उस पर प्रहार करना आरम्भ किया परन्तु मलिक अम्बर का साहस भंग नहीं हुआ और वह निरन्तर मुगलों से युद्ध करता रहा। शाहजादा खुर्रम भी एक सेना के साथ खानखाना की सहायता करने के लिए दक्षिण भेजा गया। उसने बड़ी सावधानी तथा सतर्कता से युद्ध का संचालन किया। अंत में मुगल सेना ने अहमदनगर राज्य की राजधानी पर अधिकार कर लिया और दौलताबाद की ओर बढ़ी। अब मलिक अम्बर आतंकित हो गया। 1621 ई. में उसने मुगलों से सन्धि कर ली। उसने मुगलों से जो भू-भाग जीत लिया था, उसके साथ थोड़ा और भू-भाग भी मुगलों को दे दिया। मुगलों की सेनाएं अहमदनगर से पीछे हट गईं।

बिहार विद्रोह का दमन

शाहजादा खुसरो के असफल हो जाने के बाद भी बहुत से लोगों की उसके साथ सहानुभूति बनी रही। 1610 ई. में बिहार में कुतुबुद्दीन नामक एक व्यक्ति ने स्वयं को खुसरो घोषित करके पटना पर अधिकार कर लिया। उन दिनों बिहार का गर्वनर अफजलखाँ गोरखपुर में था। जब उसे विद्रोह की सूचना मिली तो वह पटना पहुँचकर कुतुबुद्दीन को परास्त किया तथा उसका और उसके साथियों का वध करवा दिया।

बंगाल विद्रोह का दमन

बंगाल में अफगान लोग, उस्मानखाँ की अध्यक्षता में उपद्रव मचा रहे थे और मुगलों को बंगाल से बाहर निकालने का प्रयत्न कर रहे थे। 1608 ई. में जहाँगीर ने बिहार के गवर्नर इस्लामखाँ को बंगाल का गवर्नर बनाकर भेजा। इस्लामखाँ ने ढाका को आधार बनाकर अफगानों का दमन करना आरम्भ किया। उस्मानखाँ परास्त हो गया और युद्ध में मारा गया। इस प्रकार बंगाल में फिर से मुगल सत्ता स्थापित हो गई। इस्लामखाँ ने 1613 ई. में कामरूप को जीतकर मुगल साम्राज्य में मिला लिया।

काँगड़ा विजय

काँगड़ा का दुर्ग पंजाब में स्थित था और राजपूतों के अधिकार में था। यह पंजाब का सबसे सुदृढ़ दुर्ग था और अभेद्य समझा जाता था। जहाँगीर ने 1615 ई. में पंजाब के गवर्नर मुर्तजाखाँ को काँगड़ा पर आक्रमण करने भेजा परन्तु मुर्तजाखाँ दुर्ग को नहीं जीत सका और उसकी मृत्यु हो गई। इस पर जहाँगीर ने सुन्दरदास को भेजा जो राजा विक्रमादित्य बघेला के नाम से भी प्रसिद्ध है। उसने अक्टूबर 1620 में दुर्ग का घेरा डाला तथा दुर्ग की रसद आपूर्ति बंद कर दी। दुर्ग में अनाज का एक दाना भी नहीं रहा। इस पर दुर्ग के भीतर स्थित लोगों ने कई दिनों तक सूखी घास को उबाल कर खाया परन्तु रक्षा की कोई आशा नहीं देखकर अन्त में आत्म समर्पण कर दिया। इस प्रकार नवम्बर 1620 में काँगड़ा दुर्ग पर जहाँगीर का अधिकार हो गया।

कन्दहार का हाथ से निकलना

जहाँगीर के समय, फारस में शाह अब्बास शासन कर रहा था। उसकी दृष्टि बहुत दिनों से कन्दहार पर लगी हुई थी परन्तु तुर्की के विरुद्ध युद्ध में संलग्न होने से वह मुगलों के विरुद्ध मोर्चा नहीं खोलना चाहता था। इसलिये उसने कूटनीति से काम लेत हुए जहाँगीर के पास बड़ी मूल्यवान भेंटें भेजीं और अपनी सद्भावना प्रकट की।

इससे जहाँगीर ने कन्दहार की सुरक्षा की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। अवसर पाकर 1622 ई. में शाह अब्बास ने कन्दहार पर आक्रमण कर दिया। इन दिनों मुगल दरबार में बड़ा षड्यन्त्र तथा कुचक्र चल रहा था। इसलिये कन्दहार की सुरक्षा की नहीं की जा सकी तथा कन्दहार जहाँगीर के हाथ से निकल गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर एवं नूरजहाँ

नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर

नूरजहाँ का उत्थान

खुर्रम का विद्रोह

महाबत खाँ का विद्रोह

जहाँगीर का चरित्र एवं कर्यों का मूल्यांकन

नूरजहाँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

नूरजहाँ का उत्थान

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नूरजहाँ का उत्थान

नूरजहाँ का उत्थान जहाँगीर कालीन राजनीति की प्रमुख घटना थी। जहाँगीर के शासनकाल में नूरजहाँ ही मुगललिया सल्तनत की वास्तविक शासक थी।

नूरजहाँ का बचपन का नाम मेहरुन्निसा था। फारसी में मेहर प्रेम को कहते हैं तथा अरबी में निसा स्त्री को कहते हैं। इस प्रकार मेहरुन्निसा का शाब्दिक अर्थ प्रेम करने योग्य स्त्री होता है। जब मेहरुन्निसा का विवाह जहाँगीर के साथ हुआ तब उसका नाम नूरमहल रखा गया जिसका अर्थ प्रकाश का भवन होता है। आगे चल कर जहाँगीर ने उसे नूरजहाँ की उपाधि से विभूषित किया जिसका अर्थ विश्व की ज्योति होता है। भारत के इतिहास में वह इसी नाम से प्रसिद्ध है।

मेहरुन्निसा की माता का नाम अस्मत बेगम और पिता का नाम मिर्जा गयासुद्दीन मुहम्मद या गयासबेग था जो तेहरान का रहने वाला था। गयासबेग के पिता का नाम मिर्जा मुहम्मद शरीफ या ख्वाजा शरीफ था जो खुरासान के शासक के यहाँ वजीर था। दुर्भाग्यवश ख्वाजा शरीफ के दुर्दिन आ गये और वह बहुत गरीब हो गया। 1576 ई. वह अपने परिवार को दुःख तथा दारिद्रय में छोड़कर असार संसार से चल बसा। अब परिवार के पालन-पोषण का भार गयासबेग पर आ पड़ा।

नूरजहाँ का जन्म

गयासबेग, तेहरान में अपनी स्थिति सुधरने की संभावना नहीं देखकर अपनी गर्भवती स्त्री तथा बच्चों को लेकर एक काफिले के साथ भारत के लिए चल पड़ा। मार्ग में इस काफिले को डाकुओं ने लूट लिया परन्तु गयासबेग काफिले के साथ आगे बढ़ता रहा।

1576 ई. में जब गयासबेग कन्दहार पहुँचा तब उसकी स्त्री ने एक कन्या को जन्म दिया जिसका नाम मेहरुन्निसा रखा गया। कन्या के जन्म से गयासबेग की मुसीबतें बढ़ गईं परन्तु काफिले के प्रधान मलिक मसऊद ने उसकी सहायता की। उसने उसे तथा उसके परिवार को फतेहपुर सीकरी तक सुरक्षित पहुँचा दिया और बाहशाह अकबर से उसका परिचय करा दिया। बादशाह गयासबेग की योग्यता से बहुत प्रभावित हुआ और उसे अपनी सेना में रख लिया।

नूरजहाँ का बचपन

गयासबेग अपनी योग्यता, कार्य कुशलता तथा परिश्रम के बल पर उन्नति करने लगा। 1595 ई. में बादशाह ने उसे काबुल का वजीर बना दिया। जब जहाँगीर तख्त पर बैठा तब उसने अपने शासन के प्रथम वर्ष में ही गयासबेग को संयुक्त दीवान बना दिया और उसे ऐतिमादुद्दौला की उपाधि दी जिसका अर्थ होता है राज्य का विश्वासपात्र।

मेहरुन्निसा सुंदर लड़की थी। पिता गयासबेग ने उसकी शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया। अच्छी शिक्षा ने उसमें व्यवहार कुशलता तथा कई गुण उत्पन्न कर दिये जिनके कारण उसका स्वाभाविक सौन्दर्य कई गुना हो गया। इस कारण वह कुलीन तथा राजवंश की स्त्रियों की संगति के योग्य हो गई।

नूरजहाँ का पहला विवाह

जब मेहरुन्निसा की अवस्था केवल 16 वर्ष की थी तब उसका विवाह अली कुली नामक एक ईरानी नवयुवक के साथ हो गया जो अकबर की सेना में नौकर था। अली कुली वीर तथा साहसी व्यक्ति था। जिस समय शाहजादा सलीम मेवाड़ के विरुद्ध युद्ध करने जा रहा था, उस समय अकबर ने अली कुली को भी उसके साथ भेज दिया।

सलीम ने उसकी वीरता से प्रभावित होकर उसे शेर अफगान की उपाधि दी। इस प्रकार वह शाहजादे का कृपापात्र बन गया। आगे चलकर जब सलीम ने अकबर के विरुद्ध विद्रोह किया तब अली कुली ने अकबर का साथ दिया। इससे सलीम उससे नाराज हो गया।

जब सलीम को तख्त प्राप्त हो गया तब उसने शेर अफगान को बर्दवान का हाकिम बना कर भेज दिया जो बंगाल के पूर्वी किनारे पर स्थित था। वहाँ का जलवायु अस्वास्थ्यकर था इस कारण वहाँ कोई भी जाना पसन्द नहीं करता था। शेर अफगन भी अपनी नियुक्त से प्रसन्न नहीं था परन्तु उसने बादशाह की आज्ञा का पालन किया और अपनी पत्नी के साथ बर्दवान चला गया परन्तु वहाँ उसने अफगानों के विद्रोहों के दबाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसलिये जहाँगीर ने शेर अफगन को वापस बुला लेना ही अधिक उचित समझा।

जहाँगीर ने कुतुबुद्दीन खाँ को बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया और उसे निर्देश दिये कि वह शेर अफगन को वापस भेज दे। कुतुबुद्दीन ने शेर अफगन को अपने निवास पर बुलवाया। शेर अफगन ने सूबेदार के निवास पर जाने से मना कर दिया। इस पर कुतुबुद्दीन ने स्वयं बर्दवान जाने और शेर अफगन को दण्डित करने का निश्चय किया।

जब वह बर्दवान पहुँचा तब उसने शेर अफगन को बुलाया। शेर अफगन दो आदमियों को साथ लेकर कुतुबुद्दीन के पास गया जिससे उसकी स्वामि भक्ति पर संदेह न हो परन्तु इसका परिणाम उलटा हुआ। सूबेदार ने इसे सदाचार के विरुद्ध समझा और इसमें अपना अपमान समझा।

इसलिये उसने अपने आदमियों से कहा कि वे उसे चारों ओर से घेर लें। शेर अफगन इस अपमान को सहन नहीं कर सका। उसने सूबेदार को खूब फटकारा और अपनी तलवार से प्रहार करके उसे बुरी तरह घायल कर दिया। सूबेदार के सेवकों ने शेर अफगन के टुकड़े-टुकड़े कर दिये। यह घटना 30 मार्च 1607 को घटी।

जहाँगीर से विवाह

शेर अफगन की मृत्यु से मेहरुन्निसा के पिता तथा उसके भाई जो राज्य में उच्च पदों पर आसीन थे, बड़ी चिन्ता हुई। जहाँगीर ने बंगाल के अधिकारियों के पास आदेश भेजा कि शेर अफगन का परिवार तुरन्त सुरक्षित आगरा भेज दिया जाये। मेहरुन्निसा के शेर अफगान से एक कन्या उत्पन्न हुई थी जिसका नाम लाडली बेगम था।

बादशाह की आज्ञा का तुरन्त पालन किया गया और मेहरुन्निसा अपनी लड़की के साथ आगरा लाई गई तथा राजमहल की सबसे वयोवृद्ध महिला सलीमा बेगम की सेवा में रख दी गई, जो हकीम मिर्जा की लड़की तथा अकबर की प्रथम पत्नी थी। सलीमा बेगम ने मेहरुन्निसा को बड़े स्नेह के साथ अपने पास रखा।

इस प्रकार राजमाता की सेवा तथा सुरक्षा में मेहरुन्निसा के चार वर्ष व्यतीत हुए। अपने शासन के छठे वर्ष में नौरोज के उत्सव के अवसर पर मीना बाजार में जहाँगीर की दृष्टि मेहरुन्निसा पर पड़ी। यद्यपि उस समय मेहरुन्निसा की अवस्था चौंतीस वर्ष की हो चुकी थी परन्तु उसके रूप लावण्य में कोई कमी नहीं आई थी।

उसके अनुपम सौन्दर्य को देखकर जहाँगीर उस पर आसक्त हो गया और मार्च 1611 ई. में उसने मेहरुन्निसा से विवाह कर लिया। उसके अलौकिक सौन्दर्य के कारण जहाँगीर ने उसे पहले नूरमहल और बाद में नूरजहाँ की उपाधि दी। इस विवाह के बाद नूरजहाँ का उत्थान होना आरम्भ हो गया। नूरजहाँ सदैव जहाँगीर की प्रीतपात्री बनी रही। 1612 ई. में नूरजहाँ के भाई आसफ खाँ की पुत्री अर्जुमन्द बानू बेगम का विवाह शाहजादा खुर्रम के साथ हो गया।

नूरजहाँ का उत्थान

दरबारी राजनीति के चलते जहाँगीर के दरबार में नूरजहाँ के सम्बन्धियों का एक प्रबल गुट बन गया। इस गुट में नूरजहाँ, उसका पिता एतिमादुद्दौला, नूरजहाँ का भाई आसफखाँ और शहजादा खुर्रम सम्मिलित थे। नूरजहाँ ने खुर्रम का समर्थन करना आरम्भ किया और उसकी प्रतिष्ठा तथा प्रभाव को बढ़ाने में योग देना आरम्भ किया।

यह गुट इतना प्रबल हो गया और राज्य में इसका प्रभाव इतना बढ़ गया कि अन्य अमीर आशंकित हो उठे। इस कारण नूरजहाँ के गुट के विरोध में एक विरोधी दल खड़ा हो गया। विरोधी दल का नेता महावत खाँ था। महावत खाँ को नूरजहाँ का उत्थान अच्छा नहीं लगा। इसलिए महावत खाँ के गुट ने शाहजादा खुसरो का समर्थन करना आरम्भ किया।

नूरजहाँ का गुट अपने उद्देश्यों में अत्यधिक सफल रहा परन्तु धीरे-धीरे परिस्थितियाँ बदलने लगीं। जहाँगीर के पुत्रों में खुर्रम सर्वाधिक योग्य तथा महत्त्वाकांक्षी था। उसकी दृष्टि शाही तख्त पर लगी हुई थी जबकि जहाँगीर का सबसे बड़ा पुत्र खुसरो अधिक लोकप्रिय था।

इसलिये जहाँगीर के बाद उसी के बादशाह बनने की सर्वाधिक सम्भावना थी किंतु खुसरो ने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा खड़ा करके अपनी स्थिति खराब कर ली। इस प्रकार खुर्रम का मार्ग प्रशस्त हो गया और उसमें तख्त प्राप्त करने की कामना और अधिक प्रज्वलित हो उठी।

इन दोनों शहजादों के समर्थन में दरबारी अमीर दो गुटों में विभक्त होने लगे। खुर्रम के पक्ष में नूरजहाँ तथा उसका पूरा परिवार था। खुर्रम का श्वसुर आसफखाँ खान-ए-सामान के पद पर था और आसफखाँ का पिता एतिमादुद्दौला प्रधानमन्त्री के पद पर था। नूरजहाँ का प्रभाव बादशाह पर दिन-प्रति-दिन बढ़ता जा रहा था। इस प्रकार खुर्रम का पलड़ा अधिक भारी पड़ने लगा। खुर्रम स्वयं भी अपनी योग्यता का पूरा परिचय दे रहा था।

खुर्रम से विवाद

1620 ई. में नूरजहाँ ने शेर अफगन से उत्पन्न हुई पुत्री लाडली बेगम का विवाह जहाँगीर के सबसे छोटे पुत्र शहरियार के साथ कर दिया। यहीं से नूरजहाँ तथा शाहजहाँ के बीच खाई उत्पन्न हो गई। अब नूरजहाँ खुर्रम की बजाय शहरियार का प्रभाव बढ़ाने और उसे उसे तख्त पर बैठाने का प्रयत्न करने लगी।

दूसरी तरफ आसफ खाँ अपने दामाद खुर्रम का मार्ग प्रशस्त करने का प्रयास करने लगा। इस प्रकार नूरजहाँ, शाहजहाँ तथा आसफ खाँ का एक गुट में रहना सम्भव नहीं रहा। 1620 ई. नूरजहाँ की माँ अस्मत बेगम और 1621 ई. नूरजहाँ के पिता एतिमादुद्दौला की मृत्यु हो गई। इस प्रकार नूरजहाँ का गुट समाप्त हो गया और नूरजहाँ तथा खुर्रम के बीच मनोमालिन्य तथा विरोध बढ़ने लगा। इस विवाद के बाद से नूरजहाँ का उत्थान रुक गया।

उन्हीं दिनों खुर्रम को मेवाड़ तथा दक्षिण भारत के अभियानों में अच्छी सफलता मिली और सल्तनत में उसे अधिक सम्मान की दृष्टि से देखा जाने लगा। इस सफलता के कारण खुर्रम उद्दण्ड हो गया। उधर एतिमादुद्दौला के मरने के बाद वकील का पद नूरजहाँ को प्राप्त हो गया जिससे उसके भी प्रभाव तथा प्रतिष्ठा में वृद्धि हो गई। इस प्रकार नूरजहाँ तथा शाहजहाँ दोनों एक दूसरे के प्रबल प्रतिद्वंद्वी हो गये।

खुर्रम को तख्त तक पहुँचने के लिये दो प्रमुख प्रतिद्वन्द्वियों पर विजय प्राप्त करनी थी। पहला था खुसरो तथा दूसरा था शहरियार। खुर्रम ने पहले खुसरो को समाप्त करने का निश्चय किया। 1620 ई. में जब जहाँगीर ने खुर्रम को दक्षिण राज्यों के विरुद्ध युद्ध करने का लिये भेजना चाहा तब खुर्रम इस शर्त पर जाने के लिए तैयार हुआ कि खुसरो उसे सौंप दिया जाय।

जहाँगीर ने इस माँग को स्वीकार कर लिया और अभागे शाहजादे को शाहजहाँ को सौंप दिया। इस प्रकार अपने एक प्रतिद्वन्द्वी को अपने अधिकार में करके खुर्रम ने अपनी स्थिति को सुदृढ़ बना लिया। 22 फरवरी 1621 ई. को बुरहानपुर के दुर्ग में खुर्रम ने खुसरो की हत्या करवा दी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर एवं नूरजहाँ

नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर

नूरजहाँ का उत्थान

खुर्रम का विद्रोह

महाबत खाँ का विद्रोह

जहाँगीर का चरित्र एवं कर्यों का मूल्यांकन

नूरजहाँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

खुर्रम का विद्रोह

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खुर्रम का विद्रोह

खुर्रम का विद्रोह जहाँगीर की दरबारी गुटबंदी का परिणाम थी। यह गुटबंदी नूरजहाँ ने आरम्भ की थी। जब जहाँगीर के पुत्रों को लगा कि नूरजहाँ अपने पुत्र को अगला बादशाह बनाना चाहती है, तब खुर्रम ने बगावत का झण्डा बुलंद कर दिया।

जब जहाँगीर बीमार पड़ा तो खुर्रम में, तख्त प्राप्त करने की आतुरता बढ़ गई।  नूरजहाँ, शहरियार के पक्ष में अपने प्रभाव का प्रयोग कर रही थी। 1622 ई. में फारस के शाह ने कन्दहार पर अधिकार कर लिया। जब जहाँगीर को इसकी सूचना मिली तो उसने खुर्रम को आज्ञा दी कि वह दक्षिण से सेनाओं के साथ कन्दहार के लिये प्रस्थान करे।

चूँकि राजधानी में खुर्रम के शत्रु षड्यन्त्र रच रहे थे, इसलिये खुर्रम ने राजधानी से बहुत दूर जाना हितकर नहीं समझा। वह माण्डू चला आया और वहीं से बादशाह को, कन्दहार जाने के लिये अपनी शर्तें लिख भेजीं।

शहजादे ने मांग की कि रणथम्भौर का दुर्ग उसे दे दिया जाय, जिसमें वह अपने परिवार को रख दे। पंजाब का प्रान्त उसे दे दिया जाय, जिसे वह अपना आधार बना ले और वर्षा ऋतु माण्डू में ही व्यतीत करने की अनुमति दी जाये। जहाँगीर को खुर्रम की तीनों शर्तें मान्य नहीं हुईं। इसलिये कन्दहार की सुरक्षा का काम शहरियार को सौंप दिया गया।

खुर्रम ने जहाँगीर से प्रार्थना की थी आगरा के निकट स्थित धौलपुर की जागीर उसे दे दी जाये परन्तु बादशाह ने यह जागीर पहले ही शहरियार को दे दी थी। शहरियार ने उस पर अपना अधिकार भी जमा लिया था। जब खुर्रम को इसकी सूचना मिली तो उसने अपने आदमियों को धौलपुर भेजकर वहाँ से शहरियार के आदमियों को मार भगाया और बलपूर्वक धौलपुर तथा नूरजहाँ की जागीर के कुछ भाग पर अधिकार कर लिया।

खुर्रम का विद्रोह खुर्रम का विद्रोह जहाँगीर के लिए बड़ी चेतावनी था। जब जहाँगीर को इसकी सूचना मिली तो उसने खुर्रम को दण्ड देने की धमकी दी और खुर्रम से दोआब तथा हिसार फिरोजा की जागीर छीनकर शहरियार को दे दी। इस प्रकार खुर्रम के प्रतिद्वन्द्वी शहरियार को प्रोत्साहन मिलने लगा। इससे खुर्रम का धैर्य भंग हो गया और उसने खुल्लमखुल्ला विरोध करने का निश्चय कर लिया।

उधर नूरजहाँ भी चुप नहीं बैठी थी। वह खुर्रम की गतिविधियों पर दृष्टि रख  रही थी। उसने महाबतखाँ को अपनी ओर मिला लिया और शाही सेना का संचालन उसी को सौंप दिया। महाबतखाँ नूरजहाँ का सबसे बड़ा आलोचक था किंतु वही अब उसका सबसे बड़ा समर्थक बन गया। महाबत खाँ का झुकाव शहजादे परवेज की ओर था। इसलिये महाबत खाँ तथा परवेज को खुर्रम का सामना करने का कार्य सौंपा गया।

इस पर खुर्रम विद्रोह पर उतर आया और वह आगरा लूटने के लिये माण्डू से चलकर फतेहपुर सीकरी पहुँच गया परन्तु एतबारखाँ ने खुर्रम की सेना को आगरा में नहीं घुसने दिया। खुर्रम ने निराश होकर दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। महाबतखाँ भी लाहोर से दिल्ली की ओर चल पड़ा।

बिलोचपुर नामक स्थान पर खुर्रम तथा महाबतखाँ की सेनाओं में युद्ध हुआ जिसमें खुर्रम परास्त होकर माण्डू भाग गया। महाबतखाँ ने उसका पीछा किया। शाहजादा परवेज भी उसके साथ था। एक सेना खुसरो के पुत्र दावरबख्श की अध्यक्षता में, जिसे बुलाकी भी कहते हैं, गुजरात की ओर भेजी गई।

जहाँगीर स्वयं भी एक सेना के साथ अजमेर पहुंच गया। खुर्रम घबराकर माण्डू से भाग खड़ा हुआ। उसने नर्मदा नदी को पार कर लिया। खुर्रम ने मलिक अम्बर तथा बीजापुर के सुल्तान से सहायता मांगी परन्तु किसी ने उसे शरण नहीं दी। दक्षिण में अब्दुर्रहीम खानखाना की सहानुभूति खुर्रम के साथ थी, अतः उसी के माध्यम से खुर्रम ने जहाँगीर के पास सन्धि का प्रस्ताव भेजा परन्तु खानखाना शाहजादा परवेज से मिल गया जिससे सन्धि वार्ता समाप्त हो गई। इस कारण खुर्रम का विद्रोह समाप्त नहीं हो सका।

महाबत खाँ तथा परवेज बड़ी तेजी से खुर्रम का पीछा कर रहे थे। गुजरात पर शाही सेना का अधिकार हो गया। वहाँ का हाकिम अब्दुल्ला खाँ भी खुर्रम के साथ शरण खोज रहा था। अब खुर्रम ने गोलकुण्डा के सुल्तान के यहाँ शरण ली। वहाँ से खुर्रम ने उड़ीसा के मार्ग से बंगाल में प्रवेश किया।

अब्दुल्ला खाँ ने बर्दवान जीत लिया परन्तु नूरजहाँ के भाई इब्राहीम खाँ ने, जो उन दिनों बंगाल का सूबेदार था, राजमहल के निकट खुर्रम की सेना का सामना किया। इब्राहीम खाँ युद्ध में परास्त हो गया और मारा गया। ढाका पर खुर्रम का अधिकार हो गया।

मेवाड़ का राणा कर्णसिंह खुर्रम की सहायता कर रहा था। उसने पटना पर अधिकार कर लिया। अब खुर्रम की सेना आगे बढ़ी और उसने रोहतास के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। जौनपुर पर भी खुर्रम का अधिकार हो गया। यहाँ से एक सेना अब्दुल्ला खाँ की अध्यक्षता में इलाहाबाद के किले का घेरा डालने के लिये भेजी गई और दूसरी सेना खुर्रम के साथ बनारस होती हुई आगे बढ़ी।

इसी बीच महाबत खाँ तथा परवेज दक्षिण से आ पहुँचे। उन्होंने शाहजहाँ की प्रगति को रोक दिया। अब्दुल्ला इलाहाबाद के दुर्ग का घेरा उठा लेने के लिये विवश हो गया और राणा भीमसिंह जौनपुर के निकट मारा गया। खुर्रम की सेना भी इलाहाबाद जिले में दमदम नामक स्थान पर बुरी तरह परास्त हुई।

अब खुर्रम का महाबत खाँ तथा परवेज के सामने ठहरना कठिन हो गया। फलतः वह पीछे हटने लगा और अपनी स्त्री तथा लड़कों को रोहतास दुर्ग में छोड़कर दक्षिण की ओर चला गया। दक्षिण में मलिक अम्बर, खुर्रम की सहायता करने के लिए उद्यत हो गया क्योंकि उन दिनों उसका मुगल सल्तनत से संघर्ष चल रहा था।

खुर्रम ने बुरहानपुर का घेरा डाला परन्तु महाबत खाँ तथा परवेज अपनी सेनाओं के साथ पहुँच गये। खुर्रम को विवश होकर घेरा उठा लेना पड़ा। इस विपत्ति में अब्दुल्ला खाँ ने भी खुर्रम का साथ छोड़कर संन्यास ले लिया। अतः खुर्रम के पास जहाँगीर से क्षमा माँगने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं बचा। वह बादशाह को क्षमादान की अर्जी भेजकर बालाघाट चला गया।

जहाँगीर ने शहजादे की क्षमा याचना स्वीकार कर ली। नूरजहाँ ने भी क्षमादान में कोई बाधा उत्पन्न नहीं की, क्योंकि वह, महाबतखाँ तथा परवेज के बढ़ते हुए प्रभाव से आतंकित हो रही थी। जहाँगीर ने इस शर्त पर खुर्रम को क्षमा किया कि वह रोहतास तथा असीरगढ़ के दुर्ग समर्पित कर दे और अपने दो पुत्रों दारा तथा औरंगजेब को बन्धक स्वरूप में शाही दरबार में भेज दे। खुर्रम ने इन शर्तों को स्वीकार कर लिया। जहाँगीर ने खुर्रम को क्षमा करके उसे बालाघाट की जागीर दे दी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर एवं नूरजहाँ

नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर

नूरजहाँ का उत्थान

खुर्रम का विद्रोह

महाबत खाँ का विद्रोह

जहाँगीर का चरित्र एवं कर्यों का मूल्यांकन

नूरजहाँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

महाबत खाँ का विद्रोह

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महाबत खाँ का विद्रोह

महाबत खाँ का विद्रोह नूरजहाँ के भाई आसफ खाँ के षड़यंत्रों एवं का परिणाम था। नूरजहाँ ने आसफ खाँ ने महाबत खाँ के लिए ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दीं जिनके कारण महाबत खाँ को बगावत करनी पड़ी।

खुर्रम के विद्रोह के समय खुर्रम का श्वसुर आसफ खाँ चुपचाप विद्रोह की गतिविधियों को देखता रहा। उसने इस विद्रोह में विशेष रुचि नहीं दिखाई ताकि उस पर किसी प्रकार का संदेह नहीं किया जा सके परन्तु जब विद्रोह समाप्त हो गया तब आसफ खाँ, महाबत खाँ की जड़ खोदने में लग गया।

इस कार्य में आसफ खाँ को अपनी बहिन नूरजहाँ का भी सहयोग प्राप्त हो गया। नूरजहाँ अपने भाई आसफ खाँ का बड़ा विश्वास करती थी। वह उसकी कूटनीति को समझ नहीं सकी और सरलता से उसके जाल में फँस गई।

यद्यपि महाबत खाँ ने खुर्रम के विरोध का दमन कर साम्राज्य की बहुत बड़ी सेवा की थी परन्तु इस सेवा में ही उसके विनाश का बीजारोपण हो गया। इस समय उसके पास एक विशाल विजयी सेना थी। साम्राज्य में उसकी प्रतिष्ठा तथा उसका प्रभाव बहुत बढ़ गया और शाहजादा परवेज के साथ उसका गठबंधन हो गया।

यह स्थिति साम्राज्य के लिए खतरे से खाली नहीं थी। किसी भी शक्तिशाली सेनापति का किसी शहजादे के साथ गठबंधन हो जाना भावी विद्रोह की संभावना प्रकट करता था। इस बात की सम्भावना थी कि आगे चलकर महाबतखाँ के उम्मीदवार परवेज, नूरजहाँ के उम्मीदवार शहरियार तथा आसफखाँ के उम्मीदवार खुर्रम के बीच शाही तख्त के लिये संघर्ष हो।

अतः नूरजहाँ तथा आसफखाँ दोनों ने परवेज को मार्ग से हटाने का निश्चय किया। इस कार्य में सफलता पाने के लिये परवेज को महाबतखाँ से अलग करना आवश्यक था। अब्दुर्रहीम खानखाना ने भी इस योजना में सहयोग देना आरम्भ किया।

1625 ई. में महाबत खाँ को बंगाल का गवर्नर नियुक्त किया गया तथा उसे निर्देश दिये गये कि वह परवेज को गुजरात के गवर्नर खान-ए-जहाँ लोदी के संरक्षण में दे दे। यद्यपि बंगाल की अस्वास्थ्यकर जलवायु के कारण न तो महाबतखाँ बंगाल जाना चाहता था और न शाहजादा परवेज खान-ए-जहाँ लोदी के संरक्षण में जाना चाहता था परन्तु अन्त में दोनों ने शाही आज्ञा का पालन करने का निश्चय किया। इस प्रकार महाबतखाँ तथा परवेज को एक दूसरे से अलग कर दिया गया।

महाबत खाँ ने बादशाह से प्रार्थना की कि उसके पुत्र खानजाद खाँ को, जो काबुल में था, नायब बनाकर बंगाल भेज दिया जाये, बादशाह ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। बंगाल की गवर्नरी महाबतखाँ के हाथ में रही। खुर्रम के विद्रोह के समय महाबतखाँ को लूट का माल मिला था। उसका उसने अभी तक कोई हिसाब नहीं दिया था और न हाथी भेजे थे।

अतः आसफखाँ ने दीवाने-रियासत की हैसियत से महाबत खाँ से लूट के माल का हिसाब तथा युद्ध संचालन के लिये दिये गये धन का हिसाब मांगा और हाथी समर्पित करने के लिये कहा। इसी समय अब्दुर्रहीम खानखाना ने बादशाह से शिकायत की कि महाबतखाँ ने मेरे पुत्र तथा परिवार के सदस्यों की हत्या कर दी है और मेरी सम्पत्ति छीन ली है।

यद्यपि नूरजहाँ कूटनीति में निपुण थी परन्तु वह अपने भाई आसफखाँ की कूटनीति को नहीं समझ सकी। उसने आसफ खाँ की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। आसफखाँ, महाबतखाँ के विरुद्ध बादशाह के कान भरता गया।

महाबत खाँ ने सारे हाथी लौटा दिये और बुरहानपुर से रणथम्भौर चला गया जो उसकी जागीर थी। अब उसे आदेश मिला कि वह दरबार में उपस्थित हो। महाबत खाँ दरबार में हाजिर होने के लिये पहुँचा तो बादशाह ने कहला भेजा कि जब तक वह दीवान को सारा हिसाब नहीं दे देगा तब तक बादशाह उससे नहीं मिलेगा।

महाबत खाँ को अपमानित करने के लिये उसके दामाद बर्खुरदार खाँ को पीटा गया और जेल में बंद कर दिया गया। जो सम्पत्ति महाबत खाँ ने बर्खुरदार को दहेज में दी थी वह भी छीन ली गई और उस पर आरोप लगाया गया कि यह विवाह बादशाह की स्वीकृति के बिना हुआ था। इसी समय यह भी खबर फैल गई कि आसफ खाँ, महाबत खाँ को कैद करने की योजना बना रहा है।

जिस समय महाबत खाँ, बादशाह के खेमे के पास पहुँचा उस समय बादशाह काबुल के लिये प्रस्थान कर रहा था। नूरजहाँ, आसफखाँ तथा अन्य लोग झेलम नदी के उस पार जा चुके थे परन्तु जहाँगीर अभी इस पार ही था। महाबतखाँ ने इस परिस्थिति से लाभ उठाया।

वह बादशाह के खेमे में घुस गया और उसके सामने गिरकर प्रार्थना की कि आसफखाँ उसे अपमानित कर रहा है, बादशाह महाबतखाँ की रक्षा करे। बादशाह को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि शाही कैम्प महाबतखाँ के आदमियों के हाथ में था। जब नूरजहाँ को इसकी सूचना मिली तो उसके क्रोध की सीमा न रही।

उसने फिर नदी को पार कर वापस लौटने का प्रयत्न किया परन्तु वह बादशाह को मुक्त नहीं करवा सकी। इस पर उसने स्वयं को भी महाबतखाँ को समर्पित कर दिया। आसफखाँ ने भागकर अटक के दुर्ग में शरण ली। महाबतखाँ ने अपने पुत्र विहरोज को अटक भेजकर आसफखाँ को भी हिरासत में ले लिया।

अब महाबत खाँ जहाँगीर, नूरजहाँ तथा अन्य लोगों के साथ काबुल की ओर बढ़ा। शाही कैम्प काबुल पहुँचा। यहाँ बादशाह को पूरी आजादी थी परन्तु नूरजहाँ इसे बड़ा अपमानजनक समझती थी कि बादशाह अपने एक मनसबदार की देख-रेख में रहे। धीरे-धीरे महाबत खाँ अलोकप्रिय होने लगा। नूरजहाँ ने इस स्थिति से लाभ उठाने का प्रयत्न किया। वह लोगों को महाबत खाँ के खिलाफ भड़काने लगी।

इसी समय 1626 ई. में बादशाह को सूचना मिली कि खुर्रम ने दक्षिण से राजधानी के लिए प्रस्थान कर दिया है। इससे शाही कैम्प काबुल से हिन्दुस्तान की ओर चल पड़ा। मार्ग में शाही सैनिकों की संख्या बढ़ती गई और महाबतखाँ की स्थिति खराब होती गई। जब शाही खेमा रोहतास पहुँचा तो बादशाह ने महाबतखाँ को आदेश दिया कि वह आगे बढ़े, शाही खेमा पीछे आयेगा।

महाबत खाँ स्थिति को समझ गया। वह आगे बढ़ा और फिर रुका नहीं। वह मेवाड़ की पहाड़ियों की ओर चला गया और वहीं से खुर्रम के साथ वार्ता आरम्भ की। खुर्रम बहुत प्रसन्न हुआ और उसे सेना में लेने के लिए तैयार हो गया। यद्यपि नूरजहाँ, बादशाह तथा अपने भाई को महाबतखाँ के चंगुल से मुक्त कराने में सफल हो गई परन्तु उसने अपने लिए आपत्ति के बीज बो दिए।

जब खुर्रम गुजरात में था तब उसे सूचना मिली कि अत्यधिक मद्यपान के कारण परवेज की मृत्यु हो गई है। इस प्रकार खुर्रम के मार्ग से उसका एक और प्रतिद्वन्द्वी हट गया। महाबत खाँ, जो परवेज का समर्थक था, बादशाह का कोप भाजन बन चुका था। अतः महाबत खाँ से भी दरबार को कोई सहायता मिलने की संभावना नहीं थी। महाबत खाँ के खुर्रम की सेवा में आ जाने से खुर्रम का पक्ष बड़ा प्रबल हो गया। अब तख्त के लिए खुर्रम तथा शहरियार ही दावेदार रह गये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर एवं नूरजहाँ

नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर

नूरजहाँ का उत्थान

खुर्रम का विद्रोह

महाबत खाँ का विद्रोह

जहाँगीर का चरित्र एवं कर्यों का मूल्यांकन

नूरजहाँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

जहाँगीर का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

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जहाँगीर का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

इतिहासकारों के लिए जहाँगीर का चरित्र किसी पहेली से कम नहीं है। जब तक अकबर जीवित रहा, जहाँगीर ने कई बार अपने पिता से विद्रोह किया तथा अपनी पत्नी मानबाई और अपने पिता के मित्र अबुल फजल की हत्या जैसे गंभीर अपराध किए किंतु जब वह बादशाह बना तो वह न्यायप्रिय शासक एवं कलाओं का संरक्षक बन गया।

जहाँगीर का चरित्र

व्यक्ति के रूप में

जहाँगीर की चारित्रक दुर्बलताएँ उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर हावी थीं। उसे मदिरापान तथा अफीम के सेवन का दुर्व्यसन था, जिसका उसके स्वास्थ्य तथा उसकी मानसिक क्षमताओं पर बुरा प्रभाव पड़ा। वह चाटुकारों तथा अपने सम्बन्धियों के प्रभाव में सरलता से आ जाता था, जिससे वह अपने विवेक से काम नहीं ले पाता था।

इस कारण जहाँगीर का चरित्र उसे विलासी, अवज्ञाकारी एवं क्रोधी व्यक्ति सिद्ध करती हैं। उसने कभी भी अपने पिता की आज्ञा का पालन नहीं किया तथा शराब के नशे में अपनी बेगम मानबाई को कोड़ों से पीट-पीटकर जान से मार डाला। जहाँगीर ने अपने पुत्र खुसरो के प्रति भी अत्यंत क्रूरता दिखाई।

उसे अंधा बनाकर कारागृह में डाल दिया तथा बाद में उसे निरीह अवस्था में खुर्रम को सौंप दिया जिसने उसकी हत्या करवा दी। जहाँगीर ने शेरखाँ की विधवा नूरजहाँ से विवाह करके अपनी कामांधता का परिचय दिया तथा उसके रूप पाश में बंधकर राज्य का सारा भार उस पर छोड़ दिया।

शासक के रूप में

जहाँगीर को अपने पिता से सुव्यवस्थित, सुसंगठित एवं विशाल सल्तनत मिली थी। इसके निर्माण के लिये उसे जंग के मैदान में नहीं उतरना पड़ा था। न ही नये सिरे से प्रशासनिक व्यवस्थाएँ करनी पड़ी थीं। अकबर ने सल्तनत की सुरक्षा के लिये विशाल सैनिक व्यवस्था कर दी थी जिसके बल पर जहाँगीर अपने पिता से प्राप्त सल्तनत पर मृत्युपर्यंत शासन करता रहा।

जहाँगीर में अकबर जैसी कार्य-कुशलता और नीति-निपुणता नहीं थी इस कारण वह शासन में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं कर पाया। जहाँगीर की विलासिता तथा अकर्मण्यता के कारण शासन का वास्तविक संचालन नूरजहाँ तथा उसके परिवार के हाथ में चला गया जो सल्तनत के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ।

इससे गुटबन्दी का सूत्रपात हुआ जो उसके शासन में अन्त तक चलती रही। सल्तनत में षड्यन्त्र तथा कुचक्र का प्रकोप बढ़ जाने से प्रान्तीय शासक मनमानी करने लगे। इस कारण जन-साधारण की सुरक्षा खेतरे में पड़ गई।

विजेता के रूप में

बादशाह बनने से पहले एवं बादशाह बनने के बाद जहाँगीर ने कोई उल्लेखनीय विजय प्राप्त नहीं की। उसने मेवाड़ को झुकने पर विवश अवश्य किया किंतु मलिक अम्बर के विरुद्ध असफल होने से साम्राज्य की सैनिक प्रतिष्ठा को गहरा धक्का लगा। जहाँगीर नये क्षेत्र नहीं जीत सका। कन्दहार उसके हाथ से निकल गया। इस प्रकार एक भी ऐसी विजय नहीं है जो जहाँगीर को विजेता सिद्ध कर सके।

न्यायकर्ता के रूप में

अनेक समकालीन इतिहासकारों ने जहाँगीर को असफल किंतु उच्च कोटि का न्यायप्रिय शासक बताया है। विचारणीय है कि उच्च कोटि का विलासी व्यक्ति जो अपने पिता, पुत्र एवं पत्नी के साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर सका हो, उच्च कोटि का न्यायप्रिय शासक कैसे हो सकता है ?

मद्यपान का व्यसनी, राज्यकार्य से विमुख, युद्ध के मैदान से विमुख बादशाह, न्यायप्रिय कैसे हो सकता है ? फिर भी समकालीन दरबार मुस्लिम इतिहासकारों द्वारा लिखी गई बातों का अनुकरण करके बहुत से आधुनिक इतिहासकार स्वयं को धर्मनिरपेक्ष सिद्ध करने की लालसा में जहाँगीर को उसकी न्याय-प्रियता के लिये याद करते हैं तथा जहाँगीर का बचाव करते हुए तर्क देते हैं कि अपनी न्याय-शीलता के कारण ही वह कभी-कभी अपराधियों को कठोर दण्ड दे देता था।

इन इतिहासकारों के अनुसार यद्यपि जहाँगीर का स्वभाव बड़ा ही उदार, दयालु तथा क्षमाशील था परन्तु वह कभी-कभी बड़ा क्रूर, निर्दयी तथा हृदयहीन हो जाता था। इसी से कुछ विद्वानों ने उसे कोमलता तथा क्रूरता का सम्मिश्रण कहा है। वस्तुतः जहाँगीर में कोमलता जैसा कोई गुण विद्यमान हो, ऐसा उसके जीवन चरित्र के किसी भी हिस्से में दिखाई नहीं देता।

उसने अपनी पत्नी मानबाई की हत्या की, अबुल फजल की हत्या की, पिता अकबर के प्रति जीवन भर अवज्ञा का प्रदर्शन किया तथा विद्रोह करके राज्य प्राप्त करने का प्रयास किया। उसने अपने पुत्र खुसरो को अंधा बनाकर जेल में डाल दिया, ऐसा व्यक्ति कोमल और न्यायप्रिय कैसे हो सकता है ?

धर्म-सहिष्णु शासक के रूप में

जहाँगीर का झुकाव सूफी धर्म की ओर अधिक था। वह अपने पिता अकबर से कम और अपने पुत्र खुर्रम से अधिक धर्म-सहिष्णु था। यद्यपि वह भी अकबर की भांति दीपावली, शिवरात्रि, रक्षाबन्धन आदि हिन्दू त्यौहार मनाता था तथापि उसके शासन काल में धार्मिक अत्याचारों का फिर से बीजारोपण किया गया।

उसके शासन काल में गुरु अर्जुनदेव की बेरहमी से हत्या की गई जिससे सिक्ख समुदाय सदैव के लिए मुगल सल्तनत का शत्रु बन गया। जहाँगीर के आदेश से और उसकी उपस्थिति में काँगड़ा में एक बैल का वध किया गया, जिससे हिन्दुओं की भावना को बहुत ठेस पहुँची। उसके शासन काल के आठवें वर्ष में उसी की आज्ञा से अजमेर में पुष्कर के हिन्दू मन्दिरों को नष्ट किया गया। आगे चलकर शाहजहाँ के शासन काल में इस धार्मिक अत्याचार ने और अधिक उग्र रूप धारण कर लिया।

साहित्य संरक्षक के रूप में

जहाँगीर साहित्यकारों तथा कलाकारों का आश्रयदाता था। उसे स्वयं भी फारसी का अच्छा ज्ञान था और वह फारसी भाषा में कविताएँ लिखता था। हिन्दी, कविता से उसे बड़ा प्रेम था। वह हिन्दी कवियों को पुरस्कार देता था। उसकी आत्म-कथा तुजके जहाँगीरी उसकी अनुपम कृति मानी जाती है। इस ग्रन्थ से उसकी वैज्ञानिक जिज्ञासा तथा उसके प्रकृति-प्रेम का परिचय मिलता है। जहाँगीर की आत्मकथा में जहाँगीर के गुणों तथा अवगुणों दोनों का परिचय मिलता है।

भवन एवं उपवन निर्माता के रूप में

यद्यपि जहाँगीर के शासन काल में बहुत कम इमारतें बनी थीं परन्तु इस काल में उपवन लगवाने की नई शैली विकसित हुई। काश्मीर में जहाँगीर द्वारा बनवाया हुआ शालीमार बाग और आसफखाँ का बनवाया हुआ निशात बाग आज भी प्रसिद्ध हैं। आगरा में यमुना नदी के तट पर श्वेत संगमरमर का नूरजहाँ द्वारा बनवाया हुआ एतिमादुद्दौला का मकबरा दर्शनीय है।

आगरा के बाहर सिकन्दरा में निर्मित अकबर का मकबरा, अकबर ने बनवाना आरम्भ करवाया था, उसे जहाँगीर ने पूरा करवाया। लाहौर के निकट जहाँगीर का अपना चबूतरा जिसे नूरजहाँ ने बनवाया था और दिल्ली में बना हुआ खानखाना का मकबरा जहाँगीर के काल की अन्य इमारतें हैं।

चित्रकला के संरक्षक के रूप में

जहाँगीर के शासन काल में चित्रकला की बड़ी उन्नति हुई। अबुल हसन तथा मन्सूरी उसके दरबार के प्रसिद्ध चित्रकार थे। जहाँगीर को प्रकृति से बहुत प्रेम था इसलिये उसके काल में चित्रकारों ने पक्षियों, पशुओं तथा फूल-पत्तियों का अच्छा चित्रण किया। उसकी मुद्राओं पर भेड़ों, साँड़ों आदि के सुन्दर चित्र मिलते हैं।

इतिहासकारों की दृष्टि में जहाँगीर का चरित्र

जफर ने जहाँगीर के कार्यों का मूल्यांकन करते हुए लिखा है- ‘जहाँगीर एक महान् शासक था जिसमें बहुत बड़ी कार्य-क्षमता थी। यदि नूरजहाँ के गुट से वह प्रभावित न हुआ होता तो अपने पिता के ही समान कुशल शासक सिद्ध हुआ होता। उसके शासन का गौरव दो महान् बादशाहों- अकबर महान् तथा शाहजहाँ शानदार के बीच में आने से मंद पड़ गया है।’

डॉ. बेनी प्रसाद ने भी जहाँगीर के बारे में इसी तरह की भावना व्यक्त करते हुए लिखा है- ‘उसकी ख्याति उसके पिता के महान् गौरव और उसके पुत्र की चमत्कार पूर्ण शान के सामने मन्द पड़ गई है।’

निष्कर्ष

इसमें कोई संदेह नहीं कि जहाँगीर की चारित्रिक दुर्बलताएँ उस पर हावी थीं जिनके कारण न वह अपने परिवार वालों के साथ न्याय कर सका, न नये राज्य जीत सका, न शासन में नई व्यवस्थायें आरम्भ कर सका किंतु दूसरी ओर यह भी सत्य है कि उसके शासन काल में अकबर द्वारा स्थापित शासन व्यवस्था बहुत अंशों में उसी प्रकार चलती रही।

कंदहार के अतिरिक्त और कोई क्षेत्र जहाँगीर के हाथ से नहीं निकला। मलिक अम्बर के अतिरिक्त और किसी से उसकी सेनाओं को हार का मुख नहीं देखना पड़ा। जहाँगीर धर्म-सहिष्णु नहीं था किंतु कुछ घटनाओं को छोड़कर उसने हिन्दुओं पर वैसे अत्याचार नहीं किये जैसे उसके पूर्ववर्ती दिल्ली सल्तनत के मुस्लिम शासकों के काल में अथवा पश्चवर्ती औरंगजेब के काल में हुए।

जहाँगीर का चरित्र विभिन्नताओं का मिश्रण था। स्मिथ ने भी जहाँगीर को विभिन्नताओं का सम्मिश्रण बतलाते हुए उचित ही  लिखा है- ‘जहाँगीर में दयालुता तथा क्रूरता, न्याय-प्रियता तथा झक्कीपन, सभ्यता तथा निर्बलता, बुद्धिमत्ता तथा बचपने का अद्भुत मिश्रण था।’

जहाँगीर की मृत्यु    

1627 ई. की ग्रीष्म ऋतु में जहाँगीर का स्वास्थ्य बहुत खराब हो गया। वह लाहौर की गर्मी सहन नहीं कर सका। अतः वह काश्मीर चला गया परन्तु वहाँ भी उसके स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ। जब वह काश्मीर से लाहौर लौट रहा था। तब उसकी दशा शोचनीय हो गई। 29 अक्टूबर 1627 को 60 वर्ष की आयु में उसका निधन हो गया। नूरजहाँ उसके मृत शरीर को लाहौर ले गई और वहीं पर दिलकुशा नामक बगीचे में दफना दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल आलेख – नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर एवं नूरजहाँ

नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर

नूरजहाँ का उत्थान

खुर्रम का विद्रोह

महाबत खाँ का विद्रोह

जहाँगीर का चरित्र एवं कर्यों का मूल्यांकन

नूरजहाँ का चरित्र एवं कार्यों का मूल्यांकन

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