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गांधी-इरविन पैक्ट से देश में उत्तेजना फैल गई

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गांधी-इरविन पैक्ट के समय जनता को आशा थी कि गांधीजी सरदार भगतसिंह, सुखदेव तथा राजगुरु की फांसी रोकने के लिए वायसराय से बात करेंगे किंतु गांधीजी ने इस सम्बन्ध में कोई बात नहीं की जिससे देश में गांधीजी के आचरण एवं व्यवहार के प्रति असंतोष फैल गया।

अंग्रेज सरकार किसी भी कीमत पर कांग्रेस को द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में ले जाना चाहती थी। इसलिये तेजबहादुर सपू्र तथा जयकर के प्रयत्नों से 5 मार्च 1931 को वायसराय लॉर्ड इरविन एवं गांधीजी के बीच एक समझौता हुआ जो गांधी-इरविन पैक्ट कहलाता है। गोलमेज सम्मेलन की छाया के कारण कांग्रेस का पलड़ा भारी था। इसलिये इस पैक्ट से देश को बहुत आशायें थीं।

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जिन दिनों, गांधीजी और इरविन की वार्त्ता चल रही थी, उन दिनों भगतसिंह, राजगुरु एवं सुखदेव जेल में बंद थे और उन्हें फांसी की सजा सुनाई जा चुकी थी। अतः देश के कौने-कौने से यह मांग उठी कि गांधीजी को वायसराय पर दबाव बनाकर इन तीनों की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदलवाना चाहिये किंतु गांधीजी ने अहिंसा के सिद्धांत पर चलते हुए, वायसराय से क्रांतिकारियों के सम्बन्ध में कोई बात नहीं की।

17 फरवरी से 5 मार्च 1931 तक चली इस वार्त्ता में गांधीजी ने यह स्वीकार किया कि कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस ले लेगी तथा इरविन ने यह स्वीकार किया कि सरकार ने सत्याग्रहियों के विरुद्ध अब तक जो कार्यवाहियां की हैं, उन्हें निरस्त कर दिया जायेगा तथा लोगों को जेल से छोड़कर उनकी जमीनें तथा नौकरियां लौटा दी जायेंगी। इस प्रकार इस समझौते में कांग्रेस को वस्तुतः कुछ नहीं मिला था, देश अपनी पुरानी स्थिति पर लौट आया था और देश की आजादी का मुद्दा पूरी तरह गौण हो गया था। क्रांतिकारियों को उनके भाग्य पर अकेला छोड़ दिया गया था। सुभाषचंद्र बोस तथा विट्ठलभाई उस समय विदेश में थे। उन्होंने वहीं से गांधी की कार्यवाही का विरोध किया। सुभाषचंद्र बोस ने घोषणा की कि इस पैक्ट से स्पष्ट है कि गांधी एक राजनीतिज्ञ के रूप में असफल सिद्ध हो चुके हैं।

देश को लगा कि गांधीजी ने अचानक ही और अकारण ही हथियार डाल दिये हैं तथा जिन लोगों ने अब तक बलिदान दिया है, वह सब व्यर्थ चला गया है। कांग्रेसी युवाओं में बहुत नाराजगी थी। स्वयं जवाहरलाल नेहरू इस समझौते से अत्यंत क्षुब्ध थे। गांधी-इरविन पैक्ट के बाद कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस ले लिया और घोषणा की कि वह दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेगी।

सरकार ने कांग्रेस पर से प्रतिबंध हटा लिया और समस्त सत्याग्रहियों को रिहा कर दिया। इस पैक्ट के कुछ दिन बाद मार्च 1931 के अंतिम दिनों में, कांग्रेस का कराची अधिवेशन हुआ। उस समय भारत का राजनैतिक वातावरण अत्यंत उत्तेजित था। अधिवेशन से ठीक एक दिन पहले भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी गई थी।

करोड़ों भारतीयों के मन में यह प्रश्न था कि गांधीजी ने अचानक सविनय अवज्ञा आंदोलन क्यों बंद किया ? भारतीय युवा चाहते थे कि आंदोलन तब तक जारी रखा जाये जब तक भारत स्वतंत्र न हो जाये। वे ये भी चाहते थे कि अंग्रेज सरकार से कोई समझौता न किया जाये। इस विरोध के कारण यह साफ दिखाई देने लगा कि कराची सम्मेलन में गांधी-इरविन पैक्ट को पारित नहीं कराया जा सकेगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कराची सम्मेलन की अध्यक्षता

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सरदार को कराची सम्मेलन की अध्यक्षता का कांटों भरा ताज मिला

जिस समय कांग्रेस का कराची सम्मेलन आयोजित हुआ, उस समय देश के युवा वर्ग में गांधीजी के विरुद्ध भयंकर आक्रोश था। गांधीजी को आशंका हो गई कि कुछ उत्तेजित युवा कांग्रेस के सम्मेलन पर हमला करके गांधीजी को पीट सकते हैं। इसलिए सरदार पटेल को कराची सम्मेलन की अध्यक्षता का कांटों भरा ताज दिया गया! गांधाजी ने सरदार पटेल के प्रति यह चालाकी जीवन भर की।

जब गांधीजी और अन्य कांग्रेसी नेता कराची सम्मेलन में भाग लेने कराची पहुंचे तो हजारों युवकों ने उनके विरोध में नारे लगाये। इस विकट स्थिति का सामना करना सरल नहीं था। संकट की इस घड़ी में गांधीजी ने पटेल को कांटों का ताज पहनाते हुए सम्मेलन की अध्यक्षता का दायित्व सौंपा। सरदार ने अपने पहले ही भाषण में उन हजारों युवकों का गुस्सा ठण्डा कर दिया जो नेताओं को सुनने को तैयार नहीं थे।

पटेल ने कहा कि जब आपने एक साधारण किसान को इस सम्मेलन का अध्यक्ष चुन ही लिया है तो मेरी आपसे प्रार्थना है कि गुजरात ने अब तक स्वतंत्रता आंदोलन में जो कुछ किया है, आप भी उससे प्रेरणा लेकर देश को आजाद करवाने के काम में लग जायें। सशस्त्र क्रांति में विश्वास रखने वाले युवकों की तरफ संकेत करते हुए सरदार ने कहा कि मैं उनके काम करने के तरीकों के बारे में यहाँ कुछ नहीं कहूंगा किंतु उनकी देशभक्ति, साहस और बलिदान के आगे मैं अपना शीश नवाता हूँ।

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सरदार ने कहा कि हमें गांधी-इरविन पैक्ट के कुछ अच्छे परिणाम निकलने की आशा है किंतु यदि ऐसा नहीं हुआ तो आंदोलन पुनः आरम्भ किया जायेगा। इस बात पर बहुत से युवक खड़े होकर कहने लगे कि आंदोलन स्थगित करने से आजादी लेने में विलम्ब होगा। इस पर सरदार ने कहा कि इस समय गांधीजी की आयु 63 वर्ष और मेरी आयु 56 वर्ष है। हम लोग अपने जीवन में ही देश को स्वतंत्र देखना चाहते हैं, इसलिये आपसे अधिक व्यग्र हम हैं। सरदार के इन शब्दों से युवकों का गुस्सा ठण्डा हुआ। वे बैठ गये और सम्मेलन की कार्यवाही सुचारू रूप से चल पड़ी।

गांधी ने देश की आवाज को अनसुना करके और बहुत कुछ खोकर, इरविन से समझौता किया था किंतु साम्राज्यवादी अंग्रेजों ने कांग्रेसियों को जेल से निकालकर इसलिये वार्त्ता की थी ताकि लंदन में चल रहे गोलमेज सम्मेलन में भारत संघ के निर्माण का प्रस्ताव पारित कराकर भारतीयों पर एक नया संविधान लादा जा सके जिसके माध्यम से गोरी सरकार को सम्पूर्ण भारत का संवैधानिक तरीके से शोषण करने का लाइसेंस मिल जाये।

इस सम्मेलन में गांधीजी कांग्रेस के अकेले प्रतिनिधि थे। सम्मेलन में डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तावित संघीय संसद में दलित वर्गों के लिए तथा जिन्ना द्वारा मुसलमानों के लिये सीटें आरक्षित करने की मांगों पर अड़ जाने के कारण 1 दिसम्बर 1931 को यह सम्मेलन, बिना किसी समाधान के समाप्त हो गया।

देशी रियासतों के शासक भी अब भारत संघ का निर्माण नहीं चाहते थे क्योंकि इससे उनके राज्यों के समाप्त हो जाने का भय था। इस गोलमेज सम्मेलन की विशेषता यह रही कि इसमें भावी भारत संघ के लिये संविधान बनाने का निर्णय लिया गया। जब कांग्रेस ने गोलमेज सम्मेलन में सरकार के पक्ष का समर्थन नहीं किया तो भारत में दमन चक्र फिर से आरम्भ हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लौह निर्मित हैं सरदार

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गोरों को पता नहीं था कि हाड़-मांस से नहीं, लौह निर्मित हैं सरदार!

अंग्रेजी सरकार वल्लभभाई को अन्य नेताओं की तरह मानकर व्यवहार कर रही थी किंतु सरकार को पता नहीं था कि हाड़-मांस से नहीं, लौह निर्मित हैं सरदार!

गोलमेज सम्मेलन के बाद गांधी ने लंदन में भारत मामलों के मंत्री होरे से भेंट की तथा उनसे अनुरोध किया कि वे भारत की समस्या का समाधान करें। होरे ने गांधीजी को दो टूक जवाब दिया कि आपको कुछ नहीं दिया जायेगा और अब हम कांग्रेस को टिकने भी नहीं देंगे।

इस प्रकार 28 दिसम्बर 1931 को गांधीजी अंग्रेजों के दरवाजे से एक बार फिर खाली हाथ लौट आये। नये वायसराय लॉर्ड विलिंगडन ने कांग्रेस को अवैधानिक संस्था घोषित कर दिया। 4 जनवरी 1932 को सरकार ने बिना कोई कारण बताये सरदार पटेल और गांधीजी को यरवदा जेल में ठूंस दिया। सरदार पटेल ने गांधीजी के साथ यरवदा जेल में 16 महीने बिताये। गांधीजी चाय तथा चावल का सेवन नहीं करते थे।

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इसलिये इस दौरान सरदार पटेल ने भी न तो चाय पी और न चावल खाये। वे हर समय गांधीजी का पूरा ध्यान रखते और उनके छोटे-छोटे कार्य करते थ्रे। गांधीजी प्रातः चार बजे उठते थे, पटेल भी चार बजे उठ जाते। यदि गांधीजी उससे पहले उठते तो पटेल भी उसी समय उठ जाते। गांधीजी कहते कि आप थोड़ा और सो लें तो पटेल का जवाब होता कि यह कैसे हो सकता है कि आप जागें और मैं सोऊं ? जेल से रिहा होने के बाद गांधीजी ने अपनी डायरी में लिखा कि सरदार ने जेल में मेरी इतनी सेवा की कि मुझे अपनी माँ की याद आ गई।

जेल जाने के कुछ समय बाद ही सरदार पटेल की माता का निधन हो गया। सरकार ने सरदार को कुछ शर्तों पर रिहा करने का प्रस्ताव दिया किंतु पटेल ने बिना शर्त रिहा होने की मांग की। सरकार ने पटेल को बिना शर्त रिहा करने से मना कर दिया। पटेल ने अपनी माता के निधन का शोक जेल में ही सहन किया। सरकार अब भी नहीं समझ सकी कि हाड़-मांस नहीं, लौह निर्मित हैं सरदार!

अगले वर्ष 1933 में सरदार को समाचार मिला कि उनके अग्रज विट्ठलभाई का विदेश में निधन हो गया है। उनका पार्थिव शरीर अंतिम संस्कार के लिये बम्बई लाया गया। सब लोगों की इच्छा थी कि वल्लभभाई उनके अंतिम संस्कार में सम्मिलित हों किंतु सरकार ने उन्हें फिर से कुछ शर्तों पर रिहा करने का प्रस्ताव दिया और वल्लभभाई ने इस बार भी सरकार की शर्तें मानने से मना कर दिया। सरकार संभवतः अब तक नहीं समझी थी कि यह इंसान हाड़-मांस से नहीं, लोहे से बना था।

जेल में वल्लभभाई का स्वास्थ्य खराब हो गया। उनकी नाक की तकलीफ बहुत बढ़ गई। इस कारण सांस लेना कठिन हो गया। डॉक्टरों के एक दल ने सरदार के स्वास्थ्य की जांच की तथा उन्हें तुरंत ऑपरेशन करवाने की सलाह दी। अंततः गोरी सरकार उन्हें बिना शर्त रिहा करने को तैयार हो गई। ई.1934 में सरकार ने पटेल को रिहा कर दिया। पटेल यरवदा से बम्बई पहुंचे। इस प्रकार लम्बा कष्ट झेल चुकने के बाद उन्होंने अपनी नाक का ऑपरेशन करवाया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सोने का सरदार

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निःस्वार्थ सेवा से लोहे का सरदार, सोने का सरदार हो गया!

मनुष्य हाड़-मांस से निर्मित है किंतु वह उच्च मनोबल के कारण तथा कठोर परिश्रम के बल पर लोहे से अधिक मजबूत बन जाता है। सरदार पटेल में ये दोनों विशेषताएं तो थी हीं, साथ ही उनमें मानव मात्र की सेवा करने का इतना बड़ा गुण था कि वल्लभ भाई नामक महापुरुष हाड़-मांस या लोहे का नहीं, सोने का सरदार बन चुका था।

सरदार पटेल के जेल से निकलने के कुछ समय बाद ही बोरसद तहसील के 27 गांवों में प्लेग का प्रकोप हो गया। यह क्षेत्र पहले भी इस महामारी को झेल चुका था किंतु इस बार इसकी विभीषिका अत्यंत प्रबल थी। प्लेग का नाम सुनकर सगे सम्बन्धी भी बीमार को मरने के लिये छोड़कर भाग जाते थे। सरदार पटेल को अनुमान था कि गोरी सरकार पहले की तरह इस बार भी उदासीन रहेगी। इसलिये उन्होंने स्वयं सेवकों के दल गठित किये जो गांव-गांव घूमकर लोगों की सेवा करते, मृतकों का दाह संस्कार करते तथा ग्रामीणों को प्लेग से बचने और उससे लड़ने के तरीके बताते।

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सरदार ने बोरसद में एक अस्पताल स्थापित किया जहाँ प्लेग का उपचार किया जाने लगा। सरदार स्वयं गांव-गांव घूमकर बीमारों की सेवा करते तथा राहत कार्यों का नेतृत्व एवं संचालन करते। प्लेग के डर से सरकारी कर्मचारी गांवों में जाते ही नहीं थे। केवल ये स्वयं सेवक ही अपनी जान पर खेलकर लोगों को बचा रहे थे। इस निःस्वार्थ सेवा ने सरदार पटेल को कुंदन की तरह निखार दिया। लोहे का सरदार अब सोने का सरदार हो गया था। आज इस घटना को हुए 79 वर्ष हो चुके हैं किंतु आज भी यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि यदि पटेल और उनके स्वयंसेवकों ने अपनी जान पर खेलकर प्लेग से मुकाबला न किया होता तो निश्चय ही हजारों घरों के दीपक हमेशा के लिये बुझ गये होते।

जब सरदार के स्वयं सेवक गांव-गांव घूमने लगे और गोरी सरकार की थू-थू होने लगी तो सरकार ने वक्तव्य जारी किया कि कुछ लोग निजी तौर पर प्लेग का मुकाबला करने की कोशिश कर रहे हैं, यह कदापि उचित नहीं है। इस कार्य में दक्ष चिकित्सक की आवश्यकता होती है और यह काम सरकारी स्वास्थ्य विभाग ही कर सकता है। अपरिपक्व ज्ञान के साथ इस कार्य को करना खतरनाक है।

इस पर वल्लभभाई ने समाचार पत्रों में वक्तव्य दिया कि सरकार बताये कि उसने अब तक क्या किया है ? इसी के साथ सरदार ने अपने स्वयंसेवकों द्वारा किये गये कार्य का विवरण भी भिजवाया। इस पर नागरिकों द्वारा एक स्वतंत्र जांच समिति की स्थापना की गई। इस समिति ने गांवों में जाकर सच्चाई का पता लगाया और निष्कर्ष दिया कि यह महामारी सरकार की गलती के कारण फैली।

सरकारी विभाग ने इसकी रोकथाम के लिये कुछ नहीं किया और लोग मरते रहे। यदि सरदार पटेल तथा उनके स्वयं सेवकों ने सही समय पर मोर्चा न संभाला होता तो न जाने क्या हुआ होता। सरदार पटेल के स्वयं सेवकों द्वारा की गई सेवा के कारण ही इस महामारी को उन्मूलित किया जा सका है। जब यह रिपोर्ट समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई तो पहले से ही बदनामी झेल रही गोरी सरकार की और अधिक थू-थू हुई तथा निःस्वार्थ सेवा के बल पर लोहे का सरदार, सोने का सरदार हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चुनावी टिकटों का बंटवारा करने के लिए मार्गदर्शी सिद्धांत

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चुनावी टिकटों का बंटवारा राजनीतिक दलों के लिए बहुत बड़ा संकट रहा है। जो लोग निःस्वार्थ भाव से जनता की सेवा करते हैं, वे अपने लिए कभी पद नहीं मांगते किंतु जो लोग सत्ता एवं शक्ति प्राप्त करने के लिए राजनीतिक दलों में घुस जाते हैं, वे चुनावी टिकटों का बंटवारा होते समय चालाकियां दिखाकर टिकट पा जाते हैं। पटेल ने केन्द्रीय एवं प्रांतीय सभाओं में चुनावी टिकटों का बंटवारा करने के लिए मार्गदर्शी सिद्धांतों का निर्माण किया।

तीन गोलमेज सम्मेलनों के आयोजन के बाद सरकार ने भारत सरकार अधिनियम 1935 का निर्माण किया तथा केन्द्र एवं ब्रिटिश भारतीय प्रांतों में विधान सभाओं का गठन करने के लिये आम चुनाव करवाये। कांग्रेस ने भी विधान सभाओं के चुनाव लड़ने का निर्णय लिया तथा वल्लभभाई की अध्यक्षता में एक संसदीय उपसमिति का गठन किया। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद तथा मौलाना अबुल कलाम आजाद को इसका सदस्य बनाया गया।

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आगामी चुनावों के लिये प्रत्याशियों के नाम तय करने की जिम्मेदारी सरदार पटेल को दी गई। सरदार पटेल ने कुछ मानदण्ड निर्धारित किये तथा उन्हीं के अनुसार प्रत्याशियों का चयन किया। जो लोग स्वयं को पटेल के निकट समझते थे, उनमें से बहुतों को टिकट नहीं मिले। इस कारण वे लोग, पटेल से नाराज हो गये। जब कुछ कांग्रेसियों ने उन्हें हिटलर कहा तो पटेल ने केवल इतना ही जवाब दिया कि निर्धारित मानदण्ड के अनुसार जिनमें पात्रता थी, केवल उन्हीं को टिकट दिये गये हैं।

इस प्रकार सरदार पटेल ने भारत के लिये उन मार्गदर्शी सिद्धांतों का निर्माण किया जिनके आधार पर राजनैतिक दलों द्वारा लोकसभा, राज्यसभा और विधान सभाओं के टिकट दिये जाने चाहिये। केंद्रीय विधान सभा में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिला। फरवरी 1937 में हुए प्रांतीय विधान सभा चुनावों में कांग्रेस को छः प्रांतों- मद्रास, बम्बई, बिहार, उड़ीसा, संयुक्त प्रान्त और मध्य प्रान्त में स्पष्ट बहुमत मिला। तीन प्रान्तों- बंगाल, असम और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी रही।

दो प्रान्तों- पंजाब और सिन्ध में कांग्रेस को बहुत कम सीटें मिलीं। सरदार पटेल का विचार था कि जिन प्रांतों में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिला था, वहाँ उसे सरकार बनानी चाहिये तथा पार्टी को यह जिम्मेदारी संभालने से हिचकना नहीं चाहिये। मदनमोहन मालवीय आदि बहुत से नताओं ने सरदार पटेल के विचार का तीव्र विरोध किया। उनका कहना था कि गवर्नर जनरल यह आश्वासन दे कि प्रान्तों के गवर्नर, मंत्रियों के काम में हस्तक्षेप नहीं करेंगे तो कांग्रेस, सरकार बनाये अन्यथा विपक्ष में बैठे। गवर्नर जनरल लॉर्ड लिनलिथगो ने ऐसा आश्वासन देने से मना कर दिया। गांधीजी कोई निर्णय नहीं ले सके और अंततः कांग्रेस ने सरकार बनाने से मना कर दिया।

इस पर अन्य दलों को प्रान्तीय सरकारें बनाने के लिए आमंत्रित किया गया तथा समस्त प्रांतों में अल्पमत की सरकारों का गठन हुआ। इस कारण प्रांतों में कोई काम नहीं हो सका। 21 जून 1937 को गवर्नर जनरल द्वारा सहयोग करने का आश्वासन दिये जाने पर 7 जुलाई 1937 को बहुमत वाले प्रान्तों में कांग्रेस ने अपने मंत्रिमण्डल बनाये।

अगले वर्ष कांग्रेस ने दूसरे दलों के सहयोग से असम और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त में भी अपने मंत्रिमण्डल बना लिये। कांग्रेस ने मुस्लिम लीग से किसी भी प्रांत में समझौता नहीं किया। बंगाल, पंजाब और सिन्ध में गैर-कांग्रेसी मन्त्रिमण्डल बने। ई.1939 तक प्रान्तीय मंत्रिमण्डल सुचारू रूप से कार्य करते रहे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सरदार पटेल साम्प्रदायिक हैं!

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नरीमन ने आरोप लगाया कि सरदार पटेल साम्प्रदायिक हैं!

सरदार पटेल ने केन्द्रीय एवं प्रांतीय विधानसभाओं के चुनावों में कांग्रेस के सदस्यों को टिकट बंटावारा करने हेतु मार्गदर्शी सिद्धांतों का निर्माण किया था। सरदार पटेल इन्हीं सिद्वांतों के आधार पर टिकट देना चाहते थे, इस पर नरीमन सहित कुछ पारसी एवं मुस्लिम नेताओं ने पटेल पर आरोप लगाए कि सरदार पटेल साम्प्रदायिक हैं!

प्रांतीय विधान सभाओं से पहले केन्द्रीय विधान सभा के चुनाव हुए। बम्बई से दो सीटें थीं जिन पर कांग्रेस ने के. एफ. नरीमन तथा डॉ. देशमुख को टिकट दिये। नरीमन उस समय बम्बई कांग्रेस समिति के अध्यक्ष थे। वे चाहते थे कि एक सीट पर तो कांग्रेस नरीमन को टिकट दे तथा दूसरी सीट गैर-कांग्रेसी उम्मीदवार सर कावसजी जहांगीर के लिये छोड़ दे। नरीमन ने खुले आम वक्तव्य दिया कि कांग्रेस बम्बई की एक ही सीट पर चुनाव लड़े तो बेहतर होगा। पटेल ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया।

जब नामांकन भरने का समय आया तो नरीमन ने पर्चा भरने में आनाकानी की। इस पर केंद्रीय संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष वल्लभभाई पटेल ने नरीमन के व्यवहार को अनुचित तथा पार्टी विरोधी मानते हुए नरीमन की उम्मीदवारी निरस्त कर दी और कन्हैयालाल मुंशी को कांग्रेस का प्रत्याशी घोषित कर दिया। नरीमन ने नाराज होकर पार्टी से भीतरघात किया जिससे मुंशी बहुत कम मतों के अंतर से हार गये।

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केन्द्रीय विधानसभा के बाद प्रांतीय विधान सभाओं के चुनाव हुए। इन चुनावों में नरीमन, बम्बई से जीतकर आये। उन्हें पूरी आशा थी कि विधान सभा में कांग्रेस के नेता वही बनाये जायेंगे किंतु सरदार पटेल तथा पार्टी के शीर्ष नेता, नरीमन की पार्टी विरोधी गतिविधि को भूले नहीं थे। इसलिये नरीमन के स्थान पर बाला साहब खेर को पार्टी का नेता चुना गया।

नरीमन ने इसे अपना अमान समझा और अपने प्रभाव वाले अखबारों में सरदार पटेल के विरुद्ध बहुत सी अनर्गल बातें छपवाईं जिनका सीधा-सीधा अर्थ यह होता था कि सरदार पटेल साम्प्रदायिक हैं इसलिये उन्होंने पारसी धर्म के नरीमन को बम्बई विधान सभा में कांग्रेस का नेता नहीं बनने दिया। इसके बाद नरीमन ने अखबारों की कतरनों के साथ कांग्रेस के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू को शिकायत भिजवाई और इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की।

जवाहरलाल ने जवाब दिया कि मैं इसमें सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकता, आप चाहें तो मैं इसे कांग्रेस कार्यसमिति में प्रस्तुत कर सकता हूँ। इस पर नरीमन ने जवाहरलाल को लिखा कि कार्यसमिति का निर्णय निष्पक्ष होगा, इसमें मुझे संदेह है। इस पर नेहरूजी ने नरीमन को लिखा कि तब आप अपना प्रकरण लीग ऑफ नेशन्स, प्रिवी काउंसिल या उससे भी ऊपर की किसी संस्था में ले जा सकते हैं। नरीमन ने हार नहीं मानी और सारा प्रकरण गांधीजी को लिख भेजा। गांधीजी को सारी बात पहले से ही ज्ञात थी किंतु उन्होंने नरीमन को सुझाव दिया कि यदि नरीमन चाहें तो मैं (गांधीजी) और डी. एन. बहादुर (एक पारसी नेता) जांच करने को तैयार हैं।

नरीमन ने गांधीजी का प्रस्ताव मान लिया। जब गांधीजी और डी. एन. बहादुर ने निर्णय सुनाया कि सरदार पटेल की कोई गलती नहीं है, तो नरीमन की हवा खराब हो गई। नरीमन ने पहले तो इस निर्णय को स्वीकार कर लिया किंतु बाद में उसे मानने से मुकर गये। इस पर गांधीजी ने जवाहरलाल को लिखा कि नरीमन के पूरे व्यवहार से स्पष्ट है कि उनमें किसी पद को धारण करने की क्षमता नहीं, इसलिये उन्हें भविष्य में कोई पद नहीं दिया जाये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गांधीजी को समर्थन

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संकट की घड़ी में एक बार फिर सरदार पटेल ने गांधीजी को समर्थन दिया!

गांधीजी और सरदार पटेल के बीच बड़े विचित्र सम्बन्ध थे। सरदार पटेल प्रायः गांधीजी की बातों से सहमत नहीं होते थे किंतु गांधीजी जब कांग्रेस पर अथवा सरदार पटेल पर अपना व्यक्तिगत निर्णय थोप देते थे तो सरदार आंख मूंदकर उसे स्वीकार कर लेते थे। सुभाषचंद्र बोस का विरोध करने पर जब गांधीजी संकट में आ गए तब सरदार पटेल ने गांधीजी को समर्थन दिया!

ई.1939 में कांग्रेस का अधिवेशन त्रिपुरा में होना तय हुआ। त्रिपुरा सम्मेलन की अध्यक्षता के लिये अधिकांश प्रांतों से सुभाषचंद्र बोस का नाम प्रस्तावित हुआ। सुभाषचंद्र बोस पिछले साल के अधिवेशन की अध्यक्षता कर चुके थे और उनकी लोकप्रियता इस समय चरम पर थी। कांग्रेस के गांधीवादी नेता चाहते थे कि त्रिपुरा अधिवेशन की अध्यक्षता मौलाना आजाद करें। इस समय पूरी दुनिया में द्वितीय विश्व युद्ध का वातावरण बन रहा था।

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इसलिये सुभाषबाबू चाहते थे कि त्रिपुरा अधिवेशन की अध्यक्षता सुभाषबाबू स्वयं करें ताकि कांग्रेस कोई ढिलाई बरतते हुए वायसराय से कोई अनुचित समझौता न कर ले और त्रिपुरा अधिवेशन में कोई अनुचित प्रस्ताव पारित न कर ले। यदि सुभाषबाबू कांग्रेस के दुबारा अध्यक्ष बन जाते तो कम से कम एक साल के लिये उन्हें कांग्रेस का नेतृत्व और मिल जाता जिसका उपयोग वे द्वितीय विश्वयुद्ध की छाया में वायसराय से देश की आजादी के लिये मोलभाव करने में करते।

जवाहरलाल, जमनालाल, गांधीजी, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद तथा अन्य बड़े नेताओं ने सुभाषबाबू से कहा कि वे अपना नाम वापस ले लें। सुभाषबाबू ने कहा कि अधिकांश प्रांतों से मेरा नाम प्रस्तावित हुआ है, इसलिये मैं अध्यक्ष पद का चुनाव अवश्य लड़ूंगा। मौलाना जानते थे कि सुभाषबाबू के सामने चुनाव लड़ने का क्या अर्थ है। इसलिये उन्होंने बीमारी का बहाना करके अपना नाम वापस ले लिया। गांधीजी ने डॉ. पट्टाभि सीतारमैया को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। अब चुनाव टल नहीं सकता था। चुनाव से पहले गांधीजी और उनके अनुयायी नेताओं ने बहुत परिश्रम किया ताकि गांधीजी के प्रत्याशी को जीत मिल सके।

चुनाव से पहली रात को गांधीजी सोये नहीं और कांग्रेसियों के घर जाकर उन्हें अपने उम्मीदवार के पक्ष में वोट करने के लिये मनाते रहे। जब चुनाव का परिणाम आया तो सुभाषबाबू भारी मतों से जीत गये। गांधीजी ने तिलमिलाकर घोषणा की कि यह मेरी हार है। संयम का पाठ पढ़ाने वाले गांधीजी इस हार में अपना संयम खो बैठे और उन्होंने कांग्रेस में बगावत खड़ी कर दी।

गांधीजी के कहने पर कार्यसमिति के 15 सदस्यों ने कार्यसमिति से त्यागपत्र दे दिये। सुभाषबाबू ने कांग्रेस का विघटन रोकने का प्रयास किया परन्तु गांधीजी तथा उनके समर्थकों ने सुभाषबाबू से नाता तोड़ने का निर्णय कर लिया। सुभाषबाबू ने कांग्रेस को टूटने से बचाने के लिये अध्यक्ष पद त्याग दिया। गांधीजी के समर्थकों ने तत्काल डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को अध्यक्ष चुन लिया।

इस नाजुक अवसर पर बहुत से कांग्रेसियों को आशा थी कि सरदार पटेल गांधीजी का साथ छोड़कर नेताजी सुभाषचंद्र बोस का साथ देंगे किंतु सरदार पटेल इस पूरे प्रकरण के दौरान मौन साधे रहे। उन्होंने गांधी को अपना सेनापति चुन रखा था और वे जब तक देश की प्रतिष्ठा पर आंच न आये, सेनापति का साथ छोड़ने को तैयार नहीं थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गांधीजी का अंधानुकरण

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वास्तविकता से आंखें मूंदकर गांधीजी का अंधानुकरण करते थे पटेल

सरदार पटेल का व्यक्तित्व इतना महान् था कि उसमें कोई कमी ढूंढना संभव नहीं है किंतु उनकी अच्छाई ही कई बार उनके व्यक्तित्व का दोष बन गई प्रतीत होती है। सरदार पटेल ने स्वयं को गांधीजी का अनुयायी बना लिय था और वे वास्तविकता से आंखें मूंदकर गांधीजी का अंधानुकरण करते थे। गांधीजी निजी जीवन में तो अव्यवहारिक थे ही, सार्वजनिक जीवन में भी अव्यवहारिक थे किंतु पटेल ने उनका कभी भी विरोध नहीं किया। गांधजी के कारण ही भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी पटेल की बजाय नेहरू को चली गई तथा पटेल ने इसे भी स्वीकार कर लिया। पटेल के व्यक्तित्व की इस अच्छाई ने देश का बहुत नुक्सान किया।

जर्मनी पहले विश्वयुद्ध में मिली अपनी भयानक पराजय का बदला लेने के लिये ई.1939 में हिटलर के नेतृत्व में भयंकर हथियार लेकर अंग्रेजों तथा उनके मित्र देशों पर चढ़ बैठा। जब उसकी सेनाएं पौलेण्ड को रौंदकर आगे बढ़ीं तो जर्मनी को रोका जाना अनिवार्य हो गया। इंग्लैण्ड तथा उसके मित्र देशों ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी तथा भारत को भी उसमें जबर्दस्ती घसीट लिया।

कांग्रेस की विचित्र स्थिति थी। पहले विश्वयुद्ध में भी अंग्रेजों ने भारत के लोगों से पूछे बिना भारत को विश्वयुद्ध में धकेल दिया था और गांधीजी ने वायसराय से समझौता करके भारतीय नौजवानों को सेना में भरती होने का अभियान चलाया था। इस बार भी पहली बातों की ही पुनरावृत्ति होने जा रही थी।

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गोरी सरकार के इस कदम से नाराज होकर कांग्रेस की सरकारों ने समस्त प्रांतों में इस्तीफे दे दिये। सरदार पटेल ने स्पष्ट घोषणा की कि अंग्रेज भारत को तत्काल आजाद करें, उसके बाद भारत से द्वितीय विश्वयुद्ध में सहयोग मांगें। जैसे ही सरदार पटेल ने यह घोषणा की, गांधीजी, पटेल के विरोध में उतर आये। गांधीजी ने कहा कि संकट की घड़ी में भारत, बिना किसी शर्त के अंग्रेजों को सहयोग दे। अंग्रेजी सरकार समझ गई कि गांधीजी भले ही अपनी बात कहते रहें किंतु इस बार वे पटेल के रवैये के कारण, कांग्रेस से इस बात को नहीं मनवा पायेंगे कि भारत को विश्वयुद्ध में बिना शर्त के सहयोग देना चाहिये। इसलिये 16 अक्टूबर 1939 को वायसराय ने चालाकीपूर्ण घोषणा की कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद, भारत को पूर्ण स्वायत्तता देने पर विचार किया जा सकता है।

सरदार पटेल ने इस पर तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि युद्ध का क्या परिणाम होगा, कौन जानता है ? यदि महायुद्ध के बाद भारत भूमि पर किसी अन्य जाति का कब्जा हुआ तो अंग्रेज अपने वचन को कैसे निभायेंगे ? इसलिये कुछ देना ही है तो आज ही दे दें। महात्मा गांधी ने फिर पटेल का विरोध किया।

इस पर पटेल ने व्यथित होकर कहा कि मुझे पूर्ण स्वायत्तता की अपनी मांग में किसी तरह की कमी दिखाई नहीं देती, फिर भी यदि बापू मेरे आग्रह के उपरांत भी सहमत नहीं होते हैं तो मैं इसे भी भूलकर उनका हर आदेश मानने को तैयार हूँ, लेकिन तब तक पूरी कांग्रेस, गांधीजी के तर्क को छोड़कर पटेल के तर्क से सहमत हो चुकी थी।

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने एक बार कहा था कि मैं गांधीजी का अंधभक्त हूँ किंतु पटेल उनके ऐसे विलक्षण भक्तों में से हैं, जिनके विशाल नेत्र हैं जिनसे वह सब कुछ स्पष्ट देखने की क्षमता रखते हैं। पर फिर भी वह कई बार वास्तविकता से आंखें मूंदकर गांधीजी का अंधानुकरण करते हैं।

एक बार पुनः राजाजी की बात सही सिद्ध होने जा रही थी। पटेल स्पष्टतः सही थे किंतु वे गांधीजी का आदेश मानने के लिये पूरी तरह तैयार थे। ऐसा लगता था कि सरदार नहीं चाहते थे कि कांग्रेस में नेतृत्व करने वाला कोई दूसरा सिर भी तैयार हो।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत छोड़ो आंदोलन में जनता की प्रतिक्रिया पर सरदार पटेल को गर्व था

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भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा कांग्रेस ने की थी किंतु इसकी घोषणा के कुछ घण्टे भीतर ही अंग्रेज सरकार ने कांग्रेस के सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। इस कारण भारत छोड़ो आंदोलन पूरी तरह जनता द्वारा चलाया गया। यही कारण था कि इस आंदोलन के परिणाम कांग्रेस द्वारा चलाए गए समस्त अभियानों से बहुत अच्छे थे।

जैसे-जैसे द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान का पलड़ा भारी हो रहा था, वैसे-वैसे अंग्रेज, भारतीयों के समक्ष स्वतंत्रता के आश्वासन दोहराते जा रहे थे। गोरी सरकार ने मार्च 1942 में क्रिप्स कमीशन को भारत भेजा। इस कमीशन द्वारा दिये गये प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जाता तो देश के कई टुकड़े हो जाते, इसलिये कांग्रेस ने क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों को मानने से मना कर दिया।

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एक तरफ अंग्रेज अपनी चालबाजियों से बाज नहीं आ रहे थे और दूसरी ओर जापान का विजय रथ तेजी से आगे बढ़ रहा था। कांग्रेस की ढुलमुल और गलत नीतियों से दुःखी होकर सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज का गठन किया तथा बर्मा की तरफ से भारत में प्रवेश कर लिया। एक समय ऐसा भी आया जब लगने लगा कि आजाद हिन्द फौज के बमवर्षक दिल्ली तक आ धमकेंगे। उस स्थिति की कल्पना करके कांग्रेस की हालत खराब हो गई। इसलिये कांग्रेस ने कहा कि अंग्रेज तुरंत भारत छोड़कर चले जायें ताकि सुभाषबाबू, भारत पर आक्रमण करने का नैतिक अधिकार खो दें।

8 अगस्त 1942 की रात्रि में कांग्रेस ने बम्बई में अंग्रेजों भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया। गांधीजी ने इसी सम्मेलन में करो या मरो (डू ऑर डाई), अभी नहीं तो कभी नहीं (नाउ ऑर नेवर) जैसे नारे दिये। आश्चर्य इस बात पर था कि अहिंसावादी नेताओं के मन में जमा हुआ, अहिंसा का हिमालय पूरी तरह पिघल गया प्रतीत होता था। जब कांग्रेस ने ऐसी हिंसात्मक भाषा का प्रयोग किया तो 9 अगस्त का सूर्योदय होने से पूर्व ही सरकार ने गांधी, नेहरू एवं पटेल सहित लगभग समस्त बड़े नेताओं को बंदी बना लिया तथा कांग्रेस को पुनः असंवैधानिक संस्था घोषित कर दिया।

गांधीजी और सरोजिनी नायडू को पूना के आगा खाँ पैलेस में नजरबंद किया गया। पटेल, नेहरू तथा मौलाना आजाद आदि नेता अहमद नगर के दुर्ग में नजरबन्द किये गये।

नेताओं की गिरफ्तारी से जनता भड़ककर विप्लव करने पर उतर आई। कांग्रेस द्वारा 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की कोई तैयारी नहीं की गई थी और न ही आन्दोलन के संचालन की कोई रूपरेखा तैयार की गई थी। यह एक ऐसा आंदोलन था जिसकी घोषणा करने वाले जेल चले गये थे और जनता अपनी मर्जी से इसका संचालन कर रही थी। जनता ने रेल की पटरियां उखाड़ डालीं, रेलवे स्टेशनों पर तोड़-फोड़ की, पोस्ट ऑफिस तथा सरकारी कार्यालय जला दिये। टेलिफोन एवं टेलिग्राफ लाइनें काट डालीं।

ऐसा लगता था जैसे देश ने अहिंसा का मार्ग छोड़कर हिंसा का मार्ग अपना लिया है। जब पुलिस भारत छोड़ो आंदोलन के आंदोलनकारियों पर नियंत्रण न पा सकी तो उन पर हवाई जहाज से बम बरसाये गये। इस कारण बड़ी संख्या में आंदोलनकारी मारे गये। जेल जाते समय सरदार पटेल बीमार थे। इसलिये सुचेता कृपलानी उन्हें बाहर से दवायें भेजने लगीं।

तीन साल बाद ई.1945 में जेल से बाहर निकलकर सरदार पटेल ने भारत छोड़ो आंदोलन के सम्बन्ध में कहा- ‘भारत में ब्रिटिश राज के इतिहास में ऐसा विप्लव कभी नहीं हुआ, जैसा पिछले तीन वर्षों में हुआ। लोगों ने जो प्रतिक्रिया की, हमें उस पर गर्व है।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शिमला सम्मेलन 1945 में भाग लेने के लिये पटेल को जेल से रिहा किया गया

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शिमला सम्मेलन 1945 वायसराय लॉर्ड वैवेल की तरफ से की गई एक अच्छी पहल थी किंतु गांधीजी और जिन्ना की जिद के कारण यह सम्मेलन विफल हो गया। गांधीजी मौलाना अबुल कलाम आजाद को भारत सरकार में मंत्री बनवाना चाहता था किंतु मुहम्मद अली जिन्ना मौलाना के नाम पर सहमत नहीं था।

मई 1945 में लॉर्ड लिनलिथगो के स्थान पर लॉर्ड वैवेल भारत का गवर्नर जनरल एवं वायसराय बनकर आया। वह भारत की समस्या को सुलझाने के लिये नये सिरे से प्रयास करने लगा।

समस्या यह थी कि कांग्रेस चाहती थी कि गोरे, भारत को जैसा है, वैसा ही छोड़कर तत्काल चले जायें। जिन्ना के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग चाहती थी कि अंग्रेज भारत को आजादी देने से पहले इसके दो टुकड़े करें तथा मुसलमानों के लिये पाकिस्तान नामक अलग देश बनायें। डॉ. भीमराव अम्बेडकर चाहते थे कि स्वतंत्र भारत में दलित जातियों को उचित स्थान दिया जाये। अंग्रेज चाहते थे कि भारत को पूर्ण स्वतंत्रता न देकर डोमिनियन स्टेटस दिया जाये।

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डोमिनियन स्टेटस का मतलब यह था कि आंतरिक शासन के मामले में भारत सरकार पूरी तरह स्वतंत्र रहे किंतु वैश्विक स्तर पर वह ब्रिटिश ताज की अध्यक्षता वाली कॉमनवैल्थ नामक संस्था का सदस्य रहे। कांग्रेस 31 दिसम्बर 1929 को पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित कर चुकी थी इसलिये वह डोमिनियन स्टेटस के नाम से भड़कती थी। इस प्रकार समस्त पक्ष अपने-अपने तर्कों पर अड़े हुए थे और भारत की आजादी का रास्ता साफ नहीं हो रहा था।

इंग्लैण्ड दो मुंहे सांप की तरह व्यवहार कर रहा था। एक ओर तो द्वितीय विश्वयुद्ध में उसके नौजवान इतनी बड़ी संख्या में मार दिये गये थे कि अब उसके पास भारत जैसे विशाल देश में कलक्टर और कमिश्नर नियुक्त करने के लिये अंग्रेज लड़के नहीं मिल रहे थे जबकि वह तहसीलदारों के पद भी अंग्रेज लड़कों को देना चाहता था। जिन जहाजों में बैठकर इंग्लैण्ड के नौजवान, भारत पर शासन करने के लिये आते थे, इंग्लैण्ड के पास उन जहाजों में कोयला डालने तक के पैसे नहीं बचे थे। इसलिये वह चाहता था कि किसी तरह भारत की आजादी को साम्प्रदायिक प्रश्न में उलझा दिया जाये ताकि वह कुछ और वर्षों तक भारत पर शासन करके अपनी गरीबी दूर कर सके।

नये वायसराय वैवेल ने अंतरिम सरकार के गठन पर विचार करने के लिये 25 जून 1945 को शिमला सम्मेलन बुलाया। इसलिये पटेल सहित जेलों में बंद समस्त कांग्रेसी नेता रिहा किये गये। गांधीजी बीमार होने के कारण 6 मई 1945 को ही रिहा किये जा चुके थे। कांग्रेस को विश्वास था कि वह 100 प्रतिशत हिन्दू, सिख एवं अन्य मतों के लोगों का तथा 90 प्रतिशत मुसलामनों का नेतृत्व करती है। मुस्लिम लीग मानती थी कि लीग को देश के 90 प्रतिशत मुसलामनों का समर्थन प्राप्त है। जिन्ना कहता था कि मुस्लिम लीग ही मुसलमानों का प्रतिनिधित्व कर सकती है।

जबकि गांधीजी का कहना था कि कांग्रेस, हिन्दू और मुसलमान दोनों का प्रतिनिधित्व करती है। गांधीजी ने शिमला सम्मेलन में कांग्रेस की ओर से मौलाना अबुल कलाम को सम्मिलित किया। इस पर जिन्ना अड़ गया कि अंतरिम सरकार में केवल चार मुस्लिम प्रतिनिधि होंगे और वे चारों, मुस्लिम लीग के होंगे।

कांग्रेस को केवल हिन्दुओं को अपना प्रतिनिधि बनाने का अधिकार है। जिन्ना के फच्चर फंसा देने पर शिमला सम्मेलन विफल हो गया।

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