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भारतीय सैनिक और सरकार

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सरदार पटेल ने भारतीय सैनिक और सरकार के बीच समझौता करवाया

जब कांग्रेस द्वारा देश को आजाद करवाए जाने के लिए चलाए जा रहे समस्त आंदोलन विफल हो गए और कांग्रेस ने अंग्रेजों के साथ मिलकर नेताजी सुभाषचंद्र बोस के विरुद्ध मोर्चा खोल लिया तो भारतीय सैनिक और सरकार सीधे ही एक-दूसरे से भिड़ गए। इसके कारण कांग्रेसियों एवं अंग्रेजों दोनों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया।

अंग्रेज जाति में एक मुहावरा प्रचलित था कि गोरी जाति केवल जीतने और शासन करने के लिये बनी है। जीत हासिल करने के लिये वे किसी प्रकार की नैतिकता का पालन नहीं करते थे। इसलिये द्वितीय विश्वयुद्ध में जब जर्मनी द्वारा घुटने टेक दिये जाने पर भी जापान का विजय रथ निरंतर आगे बढ़ता गया तो अमरीका ने 6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा पर तथा 9 अगस्त 1945 को नागासाकी पर एटोमिक बम डाले।

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इन बमों से जापान में लाखों लोग एक साथ मर गये। मानवाता पर यह बड़ा संकट था। जापान के सम्राट ने गोरे दैत्यों से, जापान की निरीह जनता के प्राणों की रक्षा करने के लिये 15 अगस्त 1945 को हार स्वीकार कर ली। इसके तीन दिन बाद 18 अगस्त 1945 को एक हवाई दुर्घटना में नेताजी सुभाषचंद्र बोस का निधन हो गया। इस प्रकार भारत सरकार, जापानी सेनाओं तथा आजाद हिन्द फौज दोनों की ओर से निश्चिंत हो गई। जापान के घुटने टेक देने और नेताजी की आकस्मिक मृत्यु हो जाने के बाद आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों की बड़ी दुर्दशा हुई। भारत सरकार की सेनाएं जंगलों में शिविर लगाकर बैठे आजाद हिन्द फौज के बहुत से सिपाहियों को पकड़कर दिल्ली ले आईं। उन्हें युद्ध बंदियों की तरह रखा गया तथा उन पर लाल किले में मुकदमे चलाये गये। उन्हें फांसी की सजा दी गई। इस पर भारत की जनता ने उनकी रिहाई के लिए आन्दोलन चलाया। कांग्रेस ने इन सिपाहियों को हिंसा में विश्वास रखने वाला बताकर उनका साथ देने से मना कर दिया।

इस पर 20 जनवरी 1946 को कराची में वायुसेना के सैनिकों ने आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों के समर्थन में हड़ताल कर दी जो बम्बई, लाहौर और दिल्ली स्थित वायुसेना मुख्यालयों पर भी फैल गई। 19 फरवरी 1946 को भारतीय नौ-सैनिकों ने भी हड़ताल कर दी। 21 फरवरी 1946 को यह हड़ताल क्रांति के रूप में बदलने लगी तथा बम्बई के साथ-साथ कलकत्ता, कराची और मद्रास में भी फैल गई।

अँग्रेज अधिकारियों ने इस क्रांति का दमन करने के लिए गोलियां चलाईं। क्रांतिकारी सैनिकों ने गोलियों का जवाब गोलियों से दिया और कुछ अंग्रेज अधिकारियों को मार डाला। इस प्रकार भारतीय सैनिक और सरकार सीधे ही एक दूसरे के निशाने पर आ गए। इससे ब्रिटिश सरकार घबरा गई। बड़ी कठिनाई से सरदार पटेल ने गोरी सरकार और नौ-सैनिकों के बीच समझौता करवाया।

जब कांग्रेस को लगने लगा कि भारत में आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों के साथ बहुत बड़ी संख्या में लोगों की सहानुभूति है तब कांग्रेस ने इन सिपाहियों के लिये दिल्ली में राहत शिविर लगाये। इस विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार को अनुमान हो गया कि अब उनके लिये भारत पर शासन करना संभव नहीं रह गया है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पटेल प्रधानमंत्री नहीं बने

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सरदार पटेल ने जीवन भर गांधीजी का साथ दिया था किंतु गांधीजी को सरदार पटेल के स्थान पर जवाहर लाल नेहरू अधिक पसंद थे। संभवतः इसका कारण यह था कि नेहरू और गांधी दोनों का झुकाव औरतों की तरफ अधिक था जबकि सरदार पटेल योगियों की तरह जीवन जीते थे। इस कारण गांधीजी ने नेहरू को प्रधानमंत्री बनाने की ठान ली तथा पटेल प्रधानमंत्री नहीं बने!

1946 में कांग्रेस प्रेसीडेंसी के चुनावों में 16 प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों में से 13 ने सरदार पटेल को, 2 ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को तथा 1 ने गांधीजी को अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव भेजा किंतु गांधीजी ने पटेल की बजाय नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने का निर्णय लिया। यह निर्णय कांग्रेस को हैरान करने वाला था।

गांधीजी पहले भी चार बार इसी तरह का उल्टा-पुल्टा कर चुके थे। 1927 में पटेल के नाम के प्रस्ताव आये थे किंतु उनके स्थान पर मुख्तार अहमद अंसारी को अध्यक्षता दी गई। 1929 में पटेल के स्थान पर नेहरू को अध्यक्षता दी गई। 1936 में पटेल के स्थान पर नेहरू को अध्यक्षता दी गई।

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1939 में सुभाषचंद्र बोस के नाम पर प्रस्ताव आये किंतु गांधीजी ने पट्टाभि सीतारमैया को अध्यक्ष बनाने की ठान ली। सुभाष ने सीतारमैया के विरुद्ध चुनाव लड़कर जीत प्राप्त की किंतु गांधीजी ने नाराज होकर कांग्रेस छोड़ दी। इस पर सुभाषचंद्र खिन्न होकर कांग्रेस छोड़ गये।

1946 में भी गांधीजी ने पटेल के स्थान पर नेहरू को अध्यक्ष बनाने का निर्णय लिया। इस बार अध्यक्ष पद में विशेष बात यह थी कि कुछ ही दिनों बाद भारत में अंतरिम सरकार का गठन किया जाना था। वायसराय द्वारा उसी व्यक्ति को सरकार का गठन करने के लिये आमंत्रित किया जाना था जो कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर हो।

इसलिये गांधीजी चाहते थे कि पटेल के स्थान पर नेहरू को अध्यक्ष बनाया जाये ताकि वही भारत के प्रधानमंत्री बन सकें। गांधीजी की इच्छा का आदर करते हुए पटेल ने अपनी दावेदारी त्याग दी और नेहरू का समर्थन किया। वायसराय ने नेहरू को प्रधानमंत्री बनने के लिये आमंत्रित किया और पटेल देखते ही रह गये। पटेल प्रधानमंत्री नहीं बने!

आजादी के बाद भी नेहरू को प्रधानमंत्री और पटेल को उपप्रधानमंत्री बनवाया गया। नेहरू ने विदेश मंत्रालय अपने पास रखा और पटेल को गृह मंत्रालय दिया गया।

गांधीजी ने नेहरू के स्थान पर पटेल को प्रधानमंत्री पद के लिये क्यों चुना इस पर इतिहासकार एवं आलोचक बहुत माथापच्ची करते रहे हैं। अधिकांश लोगों का मानना है कि गांधीजी को लगता था कि नेहरू हैरो, कैम्ब्रिज तथा लंदन से पढ़े हुए थे, जबकि पटेल भारत की गंवई पाठशालाओं के विद्यार्थी थे।

इसलिये पटेल की बजाय नेहरू, अंग्रेंजों से बात करने में अधिक सक्षम थे। दुर्गादास ने लिखा है कि गांधीजी को लगता था कि नेहरू ने यूरोप, चीन, रूस आदि देशों की यात्रा की थी इसलिये अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी से बात करने में नेहरू अधिक सक्षम थे।

कुछ लोगों का मानना है कि गांधीजी को लगता था कि मुसलमानों से सहानुभूति के मामले में पटेल की बजाय नेहरू, गांधीजी के विचारों के अधिक निकट थे। इसलिये पटेल की बजाय नेहरू को प्रधानमंत्री बनाकर देश उनके हाथों में सौंपा गया।

पटेल प्रधानमंत्री नहीं बने तो इसके पीछे एकमात्र कारण गांधजी का अहंकार था। इसके अतिरिक्त और कोई कारण नहीं था क्योंकि भारत की जनता ने तो पटेल को प्रधानमंत्री बनाने की इच्छा व्यक्त की थी न कि नेहरू को!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सरदार पटेल और चर्चिल

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सरदार पटेल और चर्चिल का व्यक्तित्व बहुत से मामलों में एक जैसा था। जिस प्रकार सरदार पटेल मातृभूमि की सेवा करने वाले अनन्य राष्ट्रभक्त थे, उसी प्रकार विंस्टन चर्चिल भी अपनी पितृभूमि की सेवा करने वाला राष्ट्रवादी था। दोनों नेताओं के हित अलग-अलग देशों से बंधे हुए होने के कारण वे आपस में एक-दूसरे को पसंद नहीं करते थे।

बीसवीं सदी में वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध हुए महान नेताओं में विंस्टन चर्चिल का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। वे 1940 से 1945 तक तथा 1951 से 1955 तक इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री रहे। द्वितीय विश्व युद्ध उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा गया था और वे द्वितीय विश्वयुद्ध के विजेता थे। जिस समय भारत को आजादी मिली, वे इंग्लैण्ड की संसद में नेता प्रतिपक्ष थे तथा भारत की आजादी एवं भारतीय नेताओं के घोर विरोधी थे।

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वे कांग्रेस के समस्त नेताओं सहित मोहनदास गांधी के लिये भी कटु शब्दों का प्रयोग करने से नहीं चूकते थे। जब भारत में अंतरिम सरकार का गठन हुआ तथा सत्ता के वास्तविक हस्तांतरण की प्रक्रिया आरम्भ हुई तो चर्चिल ने भारतीय नेताओं के विरुद्ध अत्यंत कटु वक्तव्य दिया। चर्चिल ने कहा- ‘सत्ता बदमाशों, दुष्टों एवं लुटेरों के हाथ में चली जायेगी….. ये व्यक्ति घास के पुतले हैं जिनका कुछ वर्षों बाद एक तिनका भी नहीं मिलेगा।’

जिस समय चर्चिल का यह वक्तव्य आया, सरदार पटेल बीमार थे तथा देहरादून में थे। ऐसे नाजुक समय में जबकि इंग्लैण्ड की संसद में भारतीय स्वतंत्रता के बिल पर चर्चा होनी थी तथा इसमें नेता प्रतिपक्ष विंस्टन चर्चिल का सहयोग अत्यंत आवश्यक था, भारतीय नेता चर्चिल के विरुद्ध कुछ भी नहीं बोल सके। स्वाभिमानी सरदार से चर्चिल की यह अशोभनीय वाणी सहन नहीं हुई। वे जानते थे कि भारत को सत्ता भीख में नहीं मिल रही है, इसके लिये लाखों भारतीयों ने संघर्ष किया है और अपने प्राण न्यौछावर किये हैं। पटेल, भारत की अंतरिम सरकार में उपप्रधानमंत्री थे। चर्चिल द्वारा अंतरिम सरकार पर प्रत्यक्ष रूप से आक्रमण किया गया था।

इसलिये पटेल ने उसी दिन देहरादून से एक वक्तव्य जारी करते हुए चर्चिल को खरीखोटी सुनाई तथा उनके लिये ‘एक बेशर्म साम्राज्यवादी, वो भी ऐसे समय में जब सम्राज्यवाद अपने अंतिम पड़ाव पर खड़ा हुआ है………एक ऐसा लोकप्रसिद्ध भगोड़ा जिसके लिये अक्खड़पन तथा नासमझ सामंजस्य, तर्क, सोच विचार और प्रज्ञा से अधिक महत्त्वपूर्ण है।’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया।

चर्चिल की लानत-मलानत करने के साथ ही सरदार पटेल ने इंग्लैण्ड की सरकार को भी चुनौती दी-

‘मैं महामहिम की सरकार को यह बताना चाहूंगा कि यदि वे भारत और ग्रेट ब्रिटेन के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाने के अभिलाषी हैं तो उन्हें इस बात पर विशेष ध्यान देना होगा कि उस पर इस तरह के घृणित और जहरीले आक्रमण न किये जायें और ब्रिटिश राजनीतिज्ञ एवं अन्य लोग इस देश के बारे में मित्रतापूर्वक एवं सदभावना के साथ बोलना सीखें।’

सरदार पटेल के शब्दों ने विंस्टन चर्चिल को भीतर तक हिला दिया।

वे समझ गये कि समय का पहिया तेजी से घूम रहा है, यदि समझदारी नहीं दिखाई गई तो इंग्लैण्ड को भारत की मित्रता से हाथ धोना पड़ सकता है। इसलिये चर्चिल ने विदेश सचिव ऐंथनी हेडन के द्वारा पटेल को यह संदेश भिजवाया- ‘मुझे पटेल के प्रत्युत्तर से बड़ा आनंद हुआ।

नए अधिराज्य को अपने कार्यों तथा उत्तरदायित्वों को इस निपुणता से संभालते हुए देखकर, विशेष रूप से अन्य राज्यों से सम्बन्धित, मेरे मन में पटेल के प्रति आदर और प्रशंसा के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।……. सरदार को स्वयं को भारत की चारदीवारी में सीमित नहीं रखना चाहिये, पूरे विश्व को उन्हें देखने और सुनने का अधिकार एवं उसकी आवश्यकता है।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुस्लिमलीग को गृह-मंत्रालय न देने पर अड़ गये सरदार पटेल

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मुहम्मद अली जिन्ना ने जवाहरलाल नेहरू की अंतरिम सरकार को विफल करने के लिए गृहमंत्रालय की मांग की किंतु सरदार पटेल और माउण्ट बेटन दोनों ही जिन्ना की कुत्सित चाल को समझ गए। इस कारण मुस्लिमलीग को गृह-मंत्रालय न देने पर अड़ गये सरदार पटेल!

12 अगस्त 1946 को वायसराय ने कांग्रेस के अध्यक्ष पं. जवाहरलाल नेहरू को अन्तरिम सरकार बनाने का निमन्त्रण भेजा और नेहरू ने अंतरिम सरकार का गठन कर लिया। सरदार पटेल को गृह मंत्री बनाया गया। नेहरू ने कांग्रेस का अध्यक्ष पद छोड़ दिया तथा आचार्य कृपलानी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। नेहरू ने एक बार पुनः जिन्ना को मनाने के लिये उससे भेंट की तथा उसे सरकार में सम्मिलित होने का निमंत्रण दिया।

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जिन्ना को विश्वास नहीं था कि कांग्रेस अकेले सरकार बना लेगी किंतु अब सरकार बन चुकी थी जिससे अलग रहना मूर्खता थी। इसलिये अब जिन्ना ने सरदार पटेल से गृह मंत्रालय छीनने की चाल चली। उसने नेहरू से कहा कि यदि गृहमंत्री मुस्लिम लीग का बने तो मुस्लिम लीग अंतरिम सरकार में सम्मिलित हो जायेगी। मुस्लिमलीग को गृह-मंत्रालय देने का अर्थ पूरे देश को फांसी देने के निर्णय से कम नहीं होता। इसलिए जब पटेल को यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने जिन्ना के प्रस्ताव का तीव्र विरोध किया। वे नहीं चाहते थे कि जिस मुस्लिम लीग ने सड़कों पर खून की होली खेलकर हजारों निर्दोष लोगों को मार दिया है, उस मुस्लिम लीग को गृह मंत्रालय देकर देश की कानून व्यवस्था उसके हाथों गिरवी रख दी जाये।

पटेल का विरोध देखते हुए नेहरू ने जिन्ना का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। इस पर जिन्ना ने वायसराय से सम्पर्क करके सरकार में सम्मिलित होने की इच्छा जताई और गृह मंत्रालय न मिलने पर वित्त मंत्रालय सहित पांच महत्त्वपूर्ण विभाग ले लिये। वित्त मंत्रालय हाथ आते ही जिन्ना ने भारत सरकार को पंगु बनाने का काम आरम्भ कर दिया। मंत्रिमण्डल के मुस्लिम लीगी सदस्य प्रत्येक कदम पर सरकार के कार्यों में बाधा डालते थे।

वे सरकार में थे और फिर भी सरकार के विरुद्ध थे। वास्तव में वे इस स्थिति में थे कि सरकार के प्रत्येक कदम को ध्वस्त कर सकें। लियाकतअली खां ने जो प्रथम बजट प्रस्तुत किया, वह कांग्रेस के लिये नया झटका था। कांग्रेस की घोषित नीति थी कि आर्थिक असमानताओं को समाप्त किया जाये और पूंजीवादी समाज के स्थान पर समाजवादी पद्धति अपनायी जाये।

जवाहरलाल नेहरू भी युद्धकाल में व्यापारियों और उद्योगपतियों द्वारा कमाये जा रहे मुनाफे पर कई बार बोल चुके थे। यह भी सबको पता था कि इस आय का बहुत सा हिस्सा आयकर से छुपा लिया जाता था।

आयकर वसूली के लिये भारत सरकार द्वारा सख्त कदम उठाये जाने की आवश्यकता थी। लियाकत अली ने जो बजट प्रस्तुत किया उसमें उद्योग और व्यापार पर इतने भारी कर लगाये कि उद्योगपति और व्यापारी त्राहि-त्राहि करने लगे। इससे न केवल कांग्रेस को अपितु देश के व्यापार और उद्योग को स्थाई रूप से भारी क्षति पहुंचती।

अनुमान लगाया जा सकता है कि यदि पटेल ने इतने खतरनाक इरादों वाली मुस्लिमलीग को गृह-मंत्रालय सौंप दिया होता तो भारत की कैसी दुर्दशा होती!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लॉर्ड वैवेल भारत को और दस वर्ष और गुलाम रखेगा

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इसमें कोई संदेह नहीं है कि लॉर्ड वैवेल भारत के लोगों के प्रति सद्भावना रखता था किंतु वह हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सद्भाव उत्पन्न करके ही देश को आजादी देना चाहता था ताकि विभाजन के समय निर्दोष लोगों का रक्तपात न हो। लॉर्ड वैवेल का उद्देश्य तो सही था किंतु वह इस बात को नहीं समझ पाया कि हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सद्भावना कभी भी उत्पन्न नहीं हो सकती क्योंकि इस्लाम के उद्देश्य पूरी दुनिया को एक दिन मुसलमान बनाना है जबकि हिन्दू अपने धर्म और संस्कृति को जी-जान से अधिक प्रेम करते थे।

जैसे-जैसे भारत की आजादी निकट आ रही थी, वैसे-वैसे भारत में चारों तरफ अविश्वास का वातावरण बनता जा रहा था। जिन्ना और मुस्लिम लीग कांग्रेस पर अविश्वास करते थे तथा कांग्रेस वायसराय वैवेल पर अविश्वास करती थी।

वायसराय को इंगलैण्ड की सरकार पर अविश्वास था और प्रधानमंत्री एटली, वायसराय पर विश्वास नहीं करता था। भारतीय नेताओं में भी परस्पर अविश्वास का वातावरण था। सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू भारत के विभाजन को अनिवार्य मानते थे!

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कांग्रेस के अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम तथा गांधीजी हर हाल में विभाजन रोकना चाहते थे। जिन्ना चाहता था कि आजादी मिलने से पहले विभाजन की घोषणा हो। वायसराय चाहता था कि भारत विभाजन के बाद देश में साम्प्रदायिक उन्माद न फैले। सरदार पटेल का मानना था कि देश में गृह-युद्ध की संभावना रोकने और हिंदू-मुसलमानों के बीच सद्भावना पनपने की चिंता में लॉर्ड वैवेल, भारत को और दस वर्ष तक अँग्रेजी शासन के तले रखेगा। कांग्रेस अँग्रेजों पर आरोप लगा रही थी कि भारत के अँग्रेज, जानबूझ कर मुस्लिम लीग की मदद कर रहे हैं ताकि झगड़ा बना रहे और उनका राज भी। अंग्रेज कांग्रेस पर आरोप लगा रहे थे कि कांग्रेस, मुस्लिम लीग से कोई समझौता नहीं कर पा रही है।

उधर 20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली घोषित कर चुका था कि जून 1948 तक हर हालत में भारतीयों को सत्ता सौंप दी जायेगी। यदि भारतीय मिलकर इसका समाधान नहीं निकालते हैं कि सत्ता किसे सौंपी जाये तो सरकार जिसे उचित समझेगी, भारत का शासन सौंप देगी।

मार्च 1947 में लॉर्ड माउण्टबेटन को भारत का गवर्नर जनरल एवं वायसराय बनाकर भेजा गया। उसका काम भारत का शासन भारतीयों को सौंपकर अंग्रेजों को भारत से सुरक्षित रूप से निकालना था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुस्लिम लीग का बजट

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मुस्लिम लीग जवाहरलाल नेहरू की अंतरिम सरकार में गृहमंत्रालय चाहती थी किंतु जब सरदार पटेल ने मुस्लिमलीग को गृहमंत्रालय देने से मना कर दिया तब मुस्लिमलीग को वित्त मंत्रालय दिया गया। मुस्लिम लीग ने वित्तमंत्रालय के माध्यम से नेहरू की अंतरिम सरकार को विफल करने का षड़यंत्र रचा। मुस्लिम लीग का बजट भारत के उद्योगपतियों की कमर तोड़ने के लिए पर्याप्त था।

मुस्लिम लीग ने नेहरू की अंतरिम सरकार के विरुद्ध षड़यंत्र रचने के लिए जवाहर लाल नेहरू के पुराने भाषणों का सहारा लिया। जवाहर लाल नेहरू समाजवादी चिंतन के व्यक्ति थे तथा पूंजीवादियों के विरुद्ध कुछ न कुछ बोलते रहते थे। नेहरू को पता नहीं था कि समाजवादी चिंतन एवं साम्यवादी नारों से देश नहीं चलता, देश की रीढ़ देश की वह पूंजी होती है जिसका निर्माण पूंजीपति करते हैं।

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अंतरिम सरकार के मुस्लिम लीगी सदस्य लियाकत अली ने बजट भाषण में एक आयोग बैठाने का प्रस्ताव किया जो उद्योगपतियों और व्यापारियों पर आयकर न चुकाने के आरोपों की जांच करे और पुराने आयकर की वसूली करे। उसने घोषणा की कि ये प्रस्ताव कांग्रेसी घोषणा पत्र के आधार पर तैयार किये गये हैं। कांग्रेसी नेता, उद्योगपतियों और व्यापारियों के पक्ष में खुले रूप में कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं थे। लियाकत अली ने बहुत चालाकी से काम लिया था। उसने मंत्रिमण्डल की स्वीकृति पहले ही प्राप्त कर ली थी कि बजट साम्यवादी नीतियों पर आधारित हो। उसने करों आदि के विषय में मंत्रिमण्डल को कोई विस्तृत सूचना नहीं दी थी।

जब उसने बजट प्रस्तुत किया तो कांग्रेसी नेता भौंचक्के रह गये। मुस्लिम लीग का बजट प्रकटतः पूंजीपतियों के विरुद्ध दिखता था किंतु यह देश का सत्यानाश करने वाला था। सरदार पटेल और राजगोपालाचारी ने अत्यंत आक्रोश से इस बजट का विरोध किया। वित्तमंत्री की हैसियत से लियाकत अलीखां को सरकार के प्रत्येक विभाग में दखल देने का अधिकार मिल गया था। वह प्रत्येक प्रस्ताव को या तो अस्वीकार कर देता था या फिर उसमें बदलाव कर देता था। मंत्रिगण, लियाकत अलीखां की अनुमति के बिना एक चपरासी भी नहीं रख सकते थे।

लार्ड माउण्टबेटन भी समझ गए कि मुस्लिम लीग का बजट कितना विनाशकारी है!अंत में कांग्रेस के अनुरोध पर लार्ड माउण्टबेटन ने लियाकत अली से बात की और करों की दरें काफी कम करवाईं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पटेल और नेहरू ने गांधीजी का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया

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जब मुहम्मद अली जिन्ना भारत के विभाजन के लिए अड़ गया तो गांधीजी भारत का विभाजन नहीं होने देने पर अड़ गए। गांधीजी ने वायसराय लॉर्ड माउण्टबेटन से कहा कि वे भारत का विभाजन नहीं करें, पूरा भारत ही जिन्ना को दे दें। इस पर पटेल और नेहरू ने गांधीजी का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया!

जिन्ना पाकिस्तान के लिये छटपटा रहा था और उससे कम कुछ भी लेने को तैयार नहीं था किंतु गांधीजी और मौलाना अबुल कलाम उसे किसी भी कीमत पर पाकिस्तान नहीं देना चाहते थे। इसलिये माउण्टबेटन तय नहीं कर पा रहे थे कि वह अखण्ड भारत को शासन के अधिकार देकर यहाँ से चले जायें या फिर जिन्ना को पाकिस्तान देकर, दोनों देशों को अलग-अलग सत्ता सौंपें!

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दोनों ही स्थितियों में उन्हें दो बातों का ध्यान रखना था। एक तो यह कि अंग्रेजी सेनाएं और अंग्रेज अधिकारी अपने परिवारों को लेकर सुरक्षित रूप से भारत से निकल जायें और दूसरी बात यह कि भारत में साम्प्रदायिक दंगे न फैल जायें और अंग्रेज जाति पर करोड़ों निर्दोष भारतीयों की हत्या का आरोप न आ जाये। वायसराय की अपनी नौकरी तथा प्रतिष्ठा पूरी तरह से खतरे में थी।

उन्हीं दिनों माउण्टबेटन की पत्नी एडविना माउण्टबेटन ने भारत के साम्प्रदायिक दंगाग्रस्त क्षेत्रों का दौरा किया। एडविना की आंखें, दंगों में मारे गये लोगों के शवों को देखकर पथरा गयीं। एडविना ने दंगाग्रस्त क्षेत्रों से लौटकर अपने पति को समझाया कि कांग्रेस कभी भी भारत का विभाजन स्वीकार नहीं करेगी किंतु यदि अँग्रेज जाति को करोड़ों लोगों की हत्या का आरोप अपने सिर पर नहीं लेना है तो आप जबर्दस्ती भारत का विभाजन कर दें तथा कांग्रेसी नेताओं को इसके लिये तैयार करें। एडविना से सहमत होकर माउण्टबेटन ने गांधी, नेहरू और पटेल से, भारत के विभाजन के लिये बात की। गांधीजी किसी भी हालत में भारत का विभाजन नहीं चाहते थे।

3 मार्च 1947 को गांधीजी ने कहा कि भारत का विभाजन मेरे शव पर होगा किंतु पटेल और नेहरू ने साम्प्रदायिक दंगों को देखते हुए भारत विभाजन की अनिवार्यता को स्वीकार कर लिया। इस पर गांधीजी ने माउण्टबेटन के साथ 6 बैठकें कीं जिनमें कुल 14 घंटे का समय लगा। लैरी कांलिंस एवं दॉमिनिक लैपियर ने लिखा है-

‘गांधीजी ने माउण्टबेटन से बार-बार यह कहा कि भारत को तोड़ियेगा नहीं। ……. विभाजन को रोकने के लिये गांधीजी इस सीमा तक आतुर थे कि उन्होंने वही सोच रखा था जो कभी राजा सोलोमन ने सोचा था। बच्चे को काट कर आधा न बांटो। पूरा देश ही जिन्ना को दे दो। जिन्ना अपनी मुस्लिम लीग के साथ सामने आयें, सरकार बनायें। देश के तीस करोड़ नागरिकों पर राज्य करें।’

इस पर माउण्टबेटन ने गांधीजी को जवाब दिया कि यदि आप इस प्रस्ताव पर कांग्रेस की औपचारिक स्वीकृति लाकर दे सकें तो मैं भी विचार करने को राजी हूँ।

माउण्टबेटन से मिलने के बाद गांधीजी ने पटेल और नेहरू से बात की। पटेल और नेहरू दोनों ने ही गांधीजी के प्रस्ताव का विरोध किया और कहा कि वे अपना प्रस्ताव वापिस ले लें। इस पर 3 जून 1947 को माउण्टबेटन ने भारत विभाजन की योजना प्रस्तुत की। जिन्ना मारे खुशी के उछल पड़ा। जीवन भर की पराजयों के बाद अंत में उसी की जीत हुई थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

देश का विभाजन नहीं होता तो हमारे हाथ से सबकुछ चला जाता

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गांधाजी को यह किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं था कि देश का विभाजन हो किंतु सरदार पटेल का मानना था कि यदि देश का विभाजन नहीं होता तो हमारे हाथ से सबकुछ चला जाता!

14 जून 1947 को कांग्रेस के अधिवेशन में माउन्टबेटन योजना पर विचार प्रकट करते हुए गोविन्द वल्लभ पंत ने कहा- ‘3 जून, 1947 की योजना की स्वीकृति ही स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए एकमात्र मार्ग है…….आज कांग्रेस को या तो इस योजना को स्वीकार करना है अथवा आत्महत्या करनी है।’

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सरदार पटेल ने भारत विभाजन के प्रस्ताव की अनिवार्यता बताते हुए कहा- ‘यदि शरीर का एक भाग खराब हो जाये तो उसको शीघ्र हटाना ठीक है, ताकि सारे शरीर में जहर न फैले। मैं मुस्लिम लीग से छुटकारा पाने के लिए भारत का कुछ भाग देने के लिए तैयार हूँ।’

इस प्रकार देशवासियों ने भारी मन से भारत विभाजन का निर्णय स्वीकार कर लिया। 7 अगस्त 1947 को जिन्ना ने सदा-सदा के लिये भारत छोड़ दिया और वह कराची चला गया। जिन्ना के जाने के अगले दिन सरदार पटेल ने वक्तव्य दिया- ‘भारत के शरीर से जहर अलग कर दिया गया। हम लोग अब एक हैं और अब हमें कोई अलग नहीं कर सकता। नदी या समुद्र के पानी के टुकड़े नहीं हो सकते। जहाँ तक पाकिस्तान में जाने वाले मुसलमानों का सवाल है, उनकी जड़ें, उनके धार्मिक स्थान और केंद्र यहाँ हैं। मुझे पता नहीं कि वे पाकिस्तान में क्या करेंगे। बहुत जल्दी वे हमारे पास लौट आयेंगे।’ आजादी मिलने के बाद सरदार ने कहा- ‘यदि पाकिस्तान स्वीकार नहीं किया जाता तो प्रत्येक दफ्तर में पाकिस्तान की एक इकाई स्थापित हो जाती।’

सरदार पटेल को पूरी तरह स्पष्ट हो गया था कि जिन्ना को पूरा भारत देकर भी भारत को बचाया नहीं जा सकता। जितना भी भारत बच रहा है, उसे ले लिया जाये अन्यथा पूरा भारत हाथ से निकल जायेगा।

इसीलिये सरदार पटेल ने अपने वक्तव्य में कहा- ‘भारत को मजबूत और सुरक्षित करने का यही तरीका है कि शेष भारत को संगठित किया जाये। …….बंटवारे के बाद हम कम से कम 75 या 80 प्रतिशत भाग को शक्तिशाली बना सकते हैं, शेष को मुस्लिम लीग बना सकती है।’

आजादी मिलने के बाद नवम्बर 1947 में सरदार पटेल ने नागपुर में वक्तव्य दिया- ‘हम उस समय ऐसी अवस्था पर पहुँच गये थे कि यदि हम देश का विभाजन न मानते तो सब-कुछ हमारे हाथ से चला जाता।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुसलमानों के दुश्मन नहीं थे सरदार पटेल

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बहुत से इतिहासकारों ने सरदार पटेल को पाकिस्तान एवं मुसलमानों के दुश्मन माना है किंतु वास्तविकता इससे उलट थी। सरदार पटेल मुसलमानों के दुश्मन नहीं थी, अपितु वे यह मानते थे कि मुसलमान कभी भी किसी भी अन्य धर्म या अन्य संस्कृति के लोगों के साथ नहीं रह सकते। इसी कारण मुसलमान देश का विभाजन चाहते हैं।

15 अगस्त 1947 को जवाहरलाल नेहरू ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली तो सरदार पटेल को उपप्रधानमंत्री बनाया गया तथा उन्हें गृहमंत्रालय का चार्ज दिया गया। जवाहरलाल के पास विदेश मंत्रालय रखा गया। इस प्रकार देश के आजाद होते ही सरदार पटेल के हिस्से में गृहमंत्री के रूप में तीन बड़ी समस्याएं आईं- भारत की 562 देशी रियासतों को समझा-बुझा कर भारत में सम्मिलित करना, देश में मची भगदड़ को रोककर साम्प्रदायिक दंगों पर नियंत्रण करना तथा पाकिस्तान से आ रहे शरणार्थियों के पुनर्वास की व्यवस्था करना। ये कोई आसान कार्य नहीं थे किंतु भगवान ने सरदार पटेल को बनाया ही कठिन कार्यों के लिये था।

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इसलिये सदार इन तीनों कामों पर एक साथ लग गये। पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थी वहाँ बड़ी संख्या में हिन्दुओं के मारे और लूटे जाने के समाचार ला रहे थे जिनके कारण अमृतसर से लेकर दिल्ली तक साम्प्रदायिक हिंसा अपने चरम पर पहुंच गई। इस स्थिति को काबू में लाने के लिये उच्च मानवीय संवेदनाओं तथा दृढ़ इच्छा शक्ति की आवश्यकता थी।

सरदार पटेल ने पंजाब का दौरा किया तथा अमृतसर में एक विशाल जनसभा का आयोजन करके सिक्खों को समझाया कि यदि आपने हिंसा बंद नहीं की तो पाकिस्तान में हिंसाओं का दौर और लम्बा चलेगा। इस कारण आपके भाइयों को वहाँ से निकलकर आना और कठिन हो जायेगा। सरदार पटेल के पंजाब दौरे के बाद पंजाब में हो रही हिंसाओं की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आई।

इसके साथ ही सरदार पटेल ने दिल्ली में हो रहे दंगों को सख्ती से दबाया। सरदार पटेल ने पाकिस्तान निर्माण से पहले जिन्ना तथा उसके साथियों के हठधर्मी रवैये की बहुत कड़ी आलोचना की थी, इस कारण बहुत से कांग्रेसी नेताओं ने सरदार पटेल पर मुस्लिम विरोधी होने का आरोप लगाया। इस पर गांधीजी ने एक पत्रकार से इंटरव्यू में कहा कि सरदार पटेल को समझने में भूल इसलिये होती है, क्योंकि हिन्दू-मुस्लिम समस्या को सुलझाने का उनका तरीका मुझसे और सरदार से अलग है किंतु उन्हें मुस्लिम विरोधी कहना, सच्चाई को ठुकराना होगा।

गांधीजी के परम सहयोगी प्यारेलाल ने लिखा है- ‘कई बार सरदार पटेल को मुसलमानों और पाकिस्तान के दुश्मन के तौर पर देखा जाता है किंतु इससे बड़ा अपराध और कोई हो नहीं सकता। सरदार ने ही यह फैसला किया था कि जिन मुसलमानों ने भारत को अपना घर मानकर यहीं रहने का निश्चय किया है, उनके साथ अच्छा व्यवहार किया जाना चाहिये और उन्हें न्याय मिलना चाहिये।

‘ आगे चलकर भारत के प्रधानमंत्री बने मोरारजी देसाई ने लिखा है- ‘मुझे लगभग 20 वर्ष तक सरदार के नेतृत्व में कार्य करने का अवसर मिला निजी अनुभव के आधार पर मैं दावे से कह सकता हूँ कि सरदार एक मात्र व्यक्ति थे जो साम्प्रदायिक, जातिगत या धार्मिक पूर्वाग्रह से मुक्त थे और सभी धर्मों तथा समुदायों के प्रति सद्भाव रखते थे।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शरणार्थियों का पुनर्वास करने के लिये दिन-रात एक कर दिये सरदार पटेल ने!

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भारत विभाजन के समय बड़ी संख्या में हिन्दू प्रजा एवं सिक्ख जाति पश्चिमी पाकिस्तान एवं पूर्वी पाकिस्तान से भारत की तरफ भागी। वे इस देश की प्रजा थे किंतु उन्हें अपने ही देश में शरणार्थी कहा गया। इन शरणार्थियों का पुनर्वास करने के लिये सरदार पटेल ने दिन-रात एक कर दिये! जहाँ गांधीजी का पूरा ध्यान मुसलमानों को पाकिस्तान जाने से रोकने पर केन्द्रित था, वहीं सरदार पटेल का पूरा ध्यान शरणार्थियों का पुनर्वास करने पर था।

गृहमंत्री के रूप में सरदार पटेल के लिये दूसरी सबसे बड़ी चुनौती थी, पूर्वी पाकिस्तान एवं पश्चिमी पाकिस्तान की ओर से आ रहे शरणार्थियों के लिये त्वरित व्यवस्था करना।  माइकल ब्रीचर ने भारत-पाकिस्तान के बीच हुई जनसंख्या की अदला-बदली के बारे मे लिखा है कि अफवाह, भय तथा उन्माद के कारण लगभग एक करोड़ बीस लाख लोगों की अदला बदली हुई जिनमें से आधे हिन्दू तथा आधे मुसलमान थे।

मोसले ने यह संख्या एक करोड़ चालीस लाख तथा खुशवंतसिंह ने एक करोड़ बताई है। अतः माना जा सकता है कि पचास से साठ लाख लोग पाकिस्तानी क्षेत्रों से भागकर भारत आये और इतने ही लोग भारत से पाकिस्तान गये। इतने लोगों का पुनर्वास करना, बड़ी समस्या थी।

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जब पूर्वी पाकिस्तान से बहुत बड़ी संख्या में शरणार्थी भारत आने लगे तो सरदार पटेल ने पाकिस्तान को धमकी दी कि यदि वहाँ से लोगों का आना नहीं रुका तो इस जनसंख्या के अनुपात में पाकिस्तान से धरती की मांग की जायेगी। इस धमकी का पाकिस्तान पर न कोई असर पड़ना था, न पड़ा। भारत की राजधानी दिल्ली, पश्चिमी एवं पूर्वी पाकिस्तान से आये शरणार्थियों से पट गई। जहाँ शाम को खाली मैदान दिखाई देते थे, सुबह उठकर लोग देखते थे कि उन मैदानों में रातों-रात हजारों शरणार्थियों ने डेरे जमा लिये हैं। ये लोग भूख-प्यास, सर्दी, बरसात और बीमारियों के सताये हुए थे और अपना सर्वस्व पाकिस्तान में छोड़कर आये थे।

जो भी इन्हें देखता, दया से पसीज जाता। इनमें से बहुतों के सम्बन्धी पाकिस्तान में मार दिये गये थे इसलिये ये लोग बहुत गुस्से में भी थे। पाकिस्तान में इन पर जो अत्याचार हुए थे, वे उनका बदला भारत में लेने का प्रयास करते थे। इसलिये सरदार पटेल ने दिल्ली में बड़ी संख्या में पुलिस एवं सेना की नियुक्ति की ताकि दिल्ली में दंगे न फैल जायें। सरदार पटेल का गृह मंत्रालय शरणार्थियों का पुनर्वास करने के लिये दिन-रात काम में जुटा रहता।

यह इतना बड़ा संकट था कि इसने आजादी का सारा आनंद तिरोहित कर दिया था। शरणार्थियों के लिये स्थान-स्थान पर तम्बू गड़वाये गये, पीने के पानी की व्यवस्था की गई और अस्थाई शौचालयों तथा चिकित्सालयों का निर्माण किया गया। सरदार पटेल ने देश के प्रतिरक्षा मंत्री सरदार बलदेवसिंह से कहा कि वे खाली पड़ी वैवेल कैंटीन शरणार्थियों के अस्थाई प्रवास के लिये दे दें। सरदार बलदेवसिंह ने न केवल वैवेल कैंटीन गृह मंत्रालय को दे दी अपितु आचिनलेक विश्राम स्थल भी दे दिया जिसमें बहुत बड़ी संख्या में शरणार्थी रह सकते थे।

सरदार पटेल को ज्ञात हुआ कि अंग्रेज सिपाहियों के चले जाने के बाद बहुत बड़ी संख्या में सैनिक बैरकें खाली पड़ी हुई हैं, वल्लभभाई ने वे बैरकें भी सरदार बलदेवसिंह से मांग लीं। उदार-मना सरदार पटेल, गुजरात के आंदोलनों में जनता से कई बार चंदा एकत्र करके प्रजा का उद्धार कर चुके थे, इसलिये अब भी उन्होंने मांगने में शर्म नहीं की तथा जहाँ कहीं से सहायता मिल सकती थी, जुटाकर शरणार्थियों को दे दी।

वे हिन्दू और सिक्ख जो अब अपने ही देश में शरणार्थी कहे जा रहे थे उनके लिए गांधजी को छोड़कर हर किसी का हृदय दुख रहा था, गांधीजी अब भी नोआखाली में बैठकर पाकिस्तान जाने वाले मुसलमानों के लिए आंसू बहा रहे थे। नेहरू असमंजस में थे कि गांधीजी की बात मानी जाए या माउण्टबेटन की जबकि पटेल शरणार्थियों का पुनर्वास करने में जुटे हुए थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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