Wednesday, February 21, 2024
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अध्याय – 92 : भारत विभाजन के बाद साम्प्रदायिक उन्माद

लॉर्ड माउण्टबेटन ने रैडक्लिफ आयोग की रिपोर्ट 15 अगस्त के बाद प्रकाशित करने का निर्णय लिया था। जिस समय रैडक्लिफ की रिपोर्ट प्रकाशित हुई उस समय भारत से ब्रिटिश सेना लगभग जा चुकी थी। इस कारण जब रैडक्लिफ आयोग की रिपोर्ट प्रकाशित होने के पश्चात् पंजाब में सांप्रदायिक उन्माद भड़क उठा तो उसे रोकने वाला कोई नहीं था। पंजाब बाउंड्री फोर्स के सैनिक अपना कर्त्तव्य भूलकर अपने संप्रदाय के लोगों के साथ हो गये।

रैडक्लिफ द्वारा खींची गयी रेखा ने पचास लाख हिन्दुओं और सिखों को पाकिस्तानी पंजाब में छोड़ दिया जबकि भारतीय पंजाब में पचास लाख मुसलमान छूट गये थे। इस कारण लाखों मुस्लिम भारत से पाकिस्तान गये तथा लाखों हिन्दू पाकिस्तान से भारत आये। माइकल ब्रीचर ने इसकी संख्या बताते हुए लिखा है- ‘अफवाह, भय तथा उन्माद के कारण लगभग 12 मिलियन (एक करोड़ बीस लाख) लोगों की अदला बदली हुई जिनमें से आधे हिन्दू तथा आधे मुसलमान थे। एक साल समाप्त होने से पूर्व लगभग आधा मिलियन (पाँच लाख) लोग या तो मर गये या मार डाले गये। दिल्ली की गलियां शरणार्थियों से भर गयीं। इन शरणार्थियों ने दिल्ली में रहने वाले मुसलमानों पर हमले किये जिनसे कानून व्यवस्था भंग हो गयी।’

मोसले ने लिखा है- ‘इस अदला बदली में छः लाख लोग मारे गये, एक करोड़ चालीस लाख लोग घरों से निकाले गये तथा एक लाख जवान लड़कियों का अपहरण हुआ या जबर्दस्ती उनका अपहरण हुआ या उनको नीलाम किया गया। बच्चों की टांगों को पकड़ कर दीवारों पर पटक दिया गया, लड़कियों के साथ बलात्कार हुआ और उनकी छातियां काट दी गयीं। गर्भवती औरतों के पेट चीर दिये गये।’

लैरी कांलिंस व दॉमिनिक लैपियर ने लिखा है- ‘केवल तीन माह की अवधि में एक करोड़ पाँच लाख लोग बेघरबार हो गये।’

 खुशवंतसिंह ने अपनी पुस्तक ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ की भूमिका में देश की आजादी की तिथि की घोषणा के बाद हिन्दु-मुस्लिम सांप्रदायिक तनाव के पूर्व से पश्चिम में खिसक आने का उल्लेख करते हुए लिखा है- ‘कलकत्ते से बढ़कर दंगे उत्तर, पूर्व और पश्चिम की ओर फैलने लगे। पूर्वी बंगाल में नोआखाली तक, जहाँ मुसलमानों ने हिंदुओं का कत्ल किया और इधर बिहार तक जहाँ हिंदुओं ने मुसलमानों का। मुल्ले; पंजाब, सरहदी सूबों तथा बिहार में मारे गये मुसलमानों की खोपड़ियां संदूकों में भर-भर कर घूमने लगे। सदियों से देश के उत्तर-पश्चिमी सरहदी इलाकों में रहते आ रहे हिंदू और सिख अपना घर-बार छोड़कर सुरक्षा के लिये पूरब की तरफ (हिंदू और सिखों की बहुतायत वाले इलाकों की तरफ) भागने लगे। कोई पैदल ही चल पड़े, कोई बैलगाड़ियों में, कोई ठसाठस भरी लारियों में लदे, तो कोई रेलगाड़ियों से लटके या उनकी छतों पर पटे। रास्तों में उनकी मुठभेड़ें वैसे ही त्रस्त मुसलमानों से हुई जो सुरक्षा के लिये पश्चिम की तरफ भाग रहे थे। दंगे भगदड़ में बदल गये थे। 1947 की गर्मियों तक जबकि पाकिस्तान के नये राज्य के निर्माण की विधिवत् घोषणा की जा चुकी थी, लगभग एक करोड़ हिंदू, मुसलमान और सिख इसी भगदड़ में फँसे थे। मानसून के आगमन तक दस लाख के करीब लोग मारे जा चुके थे। पूरे उत्तरी भारत में हथियार तने हुए थे, लोग भय-त्रस्त थे और लुक छिप रहे थे।’

भारत के पूर्व विदेश सचिव जे. एन. दीक्षित ने लिखा है- ‘वास्तव में यह बहुत आश्चर्य जनक होता यदि इतने वर्षों से मुस्लिम लीग द्वारा भारतीय मुसलमानों को पढ़ाये जा रहे नफरत के सबक के बाद ये दंगे और उनके साथ आतंक और विनाश उत्पन्न न हुए होते।’

न्यायाधीश जी. डी. खोसला ने जनसंख्या की अदला बदली के दौरान मरने वाले लोगों के बारे में पाँच लाख का आंकड़ा बताया है। इंगलैण्ड के दो प्रमुख इतिहासकारों पेण्डरल मून और एच. वी. हडसन ने क्रमशः दो लाख और ढाई लाख मौतें होने का अनुमान लगाया है। जहाँ कुल मिलाकर एक लाख पाँच हजार लोगों की अदला बदली हुई वहीं बंगाल की सीमा पर कुल दस लाख लोगों की ही अदला बदली हुई। जे. एन. दीक्षित के अनुसार अक्टूबर 1948 में पूर्वी पाकिस्तान से पंद्रह लाख हिंदू अप्रवासी आये। यहाँ तक कि सरदार पटेल को यह धमकी देनी पड़ी कि यदि पाकिस्तान सरकार ने पूर्वी बंगाल से हिंदुओं के प्रस्थान को नहीं रोका तो भारत सरकार हिंदू अप्रवासियों की पुनर्व्यवस्था के लिये पूर्वी बंगाल से आनुपातिक क्षेत्र का दावा कर सकती है।

मोसले ने लिखा है- ‘हिन्दुस्तान की आजादी के प्रारंभिक दिनों में ही लगभग साढ़े सात लाख पंजाबियों ने एक दूसरे का कत्ल किया। दंगों के उस माहौल में शायद ही किसी अँग्रेज को कुछ भुगतना पड़ा हो। वे अपने क्लबों में उसी तरह शराब पी रहे थे, संगीत की धुनों पर भी उसी तरह नाच रहे थे।’

पंजाब बाउंड्री फोर्स हिंसा को बड़े पैमाने पर घटित होने से नहीं रोक सकी। लैरी कांलिंस व दॉमिनिक लैपियर ने लिखा है- ‘पंजाब के दंगे चाहे कितने भी प्रचण्ड रहे किंतु उन्होंने कुल मिलाकर भारत की संपूर्ण आबादी के केवल दसवें हिस्से को प्रभावित किया और वे पंजाब के अतिरिक्त किसी और अन्य प्रांत में नहीं फैल सके।’

मोसले ने लिखा है- ‘यदि रैडक्लिफ रिपोर्ट आजादी से पहले प्रकाशित हो जाती तथा नेहरू, जिन्ना और जनरल रीस को इसकी सूचना पहले दे दी जाती कि कौनसा हिस्सा कहाँ जा रहा है तो फौज की तैनाती अधिक व्यवस्थित तरीके से की जा सकती थी। माउण्टबेटन ने रैडक्लिफ आयोग की रिपोर्ट के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया। खुद अपने कलेजे से चिपकाये रहा। स्वतंत्रता दिवस तो खुशी-खुशी बीत गया किंतु इससे लाखों लोगों का सर्वस्व चला गया।’

माईकल एडवर्ड्स ने लिखा है- ‘माउण्टबेटन भारत में सांप्रदायिक स्थिति से निबटने में पूरी तरह असक्षम रहा। उसने जितना समय दोनों उपनिवेशों के ध्वज तैयार करने तथा भारतीय नेताओं के नाम के आगे स्क्वायर लगाने या न लगाने जैसे मसलों पर व्यर्थ किया, उतना समय देश की वास्तवकि समस्याओं पर व्यय नहीं किया गया।’

मोसले ने पाकिस्तान में हुए सिक्खों के नरसंहार के लिये पश्चिमी पंजाब के गवर्नर सर फ्रांसिस मुडी पर खुला आरोप लगाया है। मुडी ने जिन्ना को एक पत्र लिखकर सूचित किया कि मैं तो सभी से यह कहता रहा हूँ कि सिक्ख पाकिस्तान के बाहर किस तरह जाते हैं इसकी मुझे परवाह नहीं। बड़ी बात है उनसे छुटकारा पा जाना।

जब देश आजाद हुआ तो सांप्रदायिक हिंसा अपने चरम पर थी। गांधीजी ने इस आग को बुझाने के लिये पाकिस्तान और मुसलमानों की जिन मांगों को मानने के लिये भारत सरकार पर दबाव डाला, उसे कई लोगों ने तुष्टिकरण की नीति माना।

Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohan Lal Gupta is a renowned historian from India. He has written more than 100 books on various subjects.

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