Wednesday, May 22, 2024
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मुस्लिम लीग की दुष्टता का लिनलिथगो ने फायदा उठाया

दिसम्बर 1940 में जिन्ना ने पाकिस्तान योजना के पक्ष में यह तर्क दिया कि जिस प्रकार किसी एक सम्मिलित परिवार में दो भाइयों के लिए मिलकर रहना असम्भव हो जाने की स्थिति में सम्पत्ति विभाजन के पश्चात् वे शांति पूर्वक रह सकते हैं उसी प्रकार भारत विभाजन भी लाभदायक होगा किंतु जब ई.1944 में गांधीजी ने यही तर्क प्रस्तुत किया तो जिन्ना ने उसे स्वीकार नहीं किया क्योंकि तब मुसलमानों को एक केन्द्रीय व्यवस्था के अधीन रहना पड़ता।

सितम्बर 1944 में गांधीजी भारत को दो राष्ट्रों का देश मानने को तैयार नहीं थे। वे इसे एक संयुक्त परिवार मान सकते थे जिसके वे मुसलमान सदस्य जो उत्तर-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी भागों में बहुमत में थे, अलग रहना चाहते थे। गांधीजी मुस्लिम लीग के लाहौर प्रस्ताव को निम्नलिखित शर्तों पर स्वीकार करना चाहते थे –

(1) निर्धारित क्षेत्रों के निवासियों की इच्छा किसी निर्वाचन अथवा अन्य पद्धति द्वारा जान ली जाए।

(2) यदि उनका उत्तर हाँ में हो तो भारत को स्वतंत्रता मिलने के पश्चात् उन्हें अलग स्वतंत्र राज्यों में संगठित कर दिया जाए।

(3) एक संधि द्वारा बाह्य सुरक्षा, आंतरिक संचार साधन, आयात-निर्यात आदि विषयों का संचालन किया जाए।

इस प्रकार लाहौर प्रस्ताव के परिणाम स्वरूप जो व्यवस्था उत्पन्न हो सकती थी, उसे गांधीजी ने स्वीकार तो किया किंतु वे दो राष्ट्रों के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करते थे। जिन्ना ने गांधीजी के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। इस समय तक जिन्ना के लाहौर प्रस्ताव में एक परिवर्तन आ चुका था।

वह अब उत्तर-पूर्वी और उत्तर-पश्चिमी भागों को पाकिस्तान के दो क्षेत्र मानने लगा था तथा दोनों भागों को दो पृथक् राज्य बनाने के विरुद्ध हो चुका था। जिन्ना उपरोक्त विभाजन के बाद एक केन्द्रीय व्यवस्था के भी विरुद्ध था क्योंकि वह इस प्रकार के सम्मिलित प्रबन्धों का उत्तरदायित्व दोनों देशों की अलग संवैधानिक सभाओं को देना चाहता था।

कांग्रेस विगत पचास सालों से भी अधिक समय से भारत की आजादी के लिए संघर्ष कर रही थी। उसकी इस मांग को न केवल पूरे भारत में अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक समर्थन मिल रहा था। इस मांग का एक ही अर्थ था कि अंग्रेज सरकार कांग्रेस को सत्ता सौंप कर यहाँ से चली जाये।  

किंतु मुस्लिम लीग द्वारा पाकिस्तान की मांग का फच्चर फंसा देने से तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने अगस्त 1940 के अपने प्रसिद्ध प्रस्ताव में कहा- ‘बिना कहे यह स्पष्ट है कि ब्रिटिश सरकार भारत की शांति और कल्याण की अपनी वर्तमान जिम्मेदारियां किसी ऐसी सरकार को नहीं सौंप सकतीं जिसके प्रभुत्व को भारत के राष्ट्रीय जीवन में विशाल और महत्वपूर्ण तत्वों द्वारा अस्वीकार कर दिया गया हो।’ वायसराय की इस घोषणा से मुस्लिम लीग को अपनी पाकिस्तान की मांग के प्रति नैतिक समर्थन मिल गया।

ई.1941 में पाकिस्तान की मांग और पुष्ट हो गयी

मुस्लिम लीग के ई.1941 के मद्रास वार्षिक सत्र में पाकिस्तान की मांग और भी जोरदार तरीके से की गयी। इस सत्र में जिन्ना द्वारा इस मांग की विस्तृत व्याख्या भी की गयी।

 उसने कहा कि- “ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग का लक्ष्य है कि हम भारत के उत्तर-पश्चिम और पूर्वी क्षेत्रों में पूर्ण रूप से स्वतंत्र, अलग राष्ट्र की स्थापना करें जिसमें रक्षा, विदेश मामलों, संचार, कस्टम, मुद्रा विनिमय आदि पर पूरा हमारा नियंत्रण रहेगा। हम किसी भी परिस्थिति में एक केन्द्रीय सरकार के साथ संपूर्ण भारतीय संविधान नहीं चाहते। हम इसके लिये कभी सहमत नहीं होंगे।”

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