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राजपूतों का सैन्य प्रबन्धन

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राजपूतों का सैन्य प्रबन्धन

राजपूतों का सैन्य प्रबन्धन परमपरागत हिन्दू सैन्य प्रबन्धन पर आधारित था जिसके कारण वे मुगलों का सामना तो करते थे किंतु उन्हें पराजित नहीं कर पाते थे।

राजपूतों का सैन्य प्रबन्धन

सेना का गठन

मध्यकालीन राजपूत राज्यों में सेना का रख-रखाव सामान्तों द्वारा किया जाता था। राजा को जब सेना की आवश्यकता होती थी तब सामन्त निश्चित संख्या में सैनिकों के साथ राजा की सेवा में उपस्थित होते थे। राजा के पास अपने अंगरक्षकों के रूप में एक छोटी सैनिक टुकड़ी के अतिरिक्त प्रायः स्थाई सेना नहीं होती थी।

सेना का सर्वोच्च अधिकारी राजा ही होता था, परन्तु मुगलों के सम्पर्क में आने के बाद बख्शी की भी नियुक्ति की जाने लगी जो महाराज तथा सामन्तों की सेना का निरीक्षण एवं प्रबंधन करता था। वह सामन्तों की सेना तथा उनकी सेवाओं का विवरण राजा को देता था। बख्शी के पद पर उसी को नियुक्त किया जाता था जिसे घोड़ों की अच्छी जानकारी हो।

युद्ध सामग्री तथा सैनिक साज-सज्जा

राजपूत सैनिक परम्परागत रूप से तलवार, तीर-कमान तथा भालों का प्रयोग करते थे। वे कमर में म्यान बांधते थे जिसमें तलवार रखी जाती थी। पीठ पर तीरों के लिये तरकष एवं शरीर की रक्षा के लिये ढाल बांधते थे। सिर पर लोहे के शिरस्त्राण पहनते थे।

मुगलों से सम्पर्क होने के बाद राजपूत सैनिक भी तोप, बारूद के गोले तथा बन्दूकों का प्रयोग करने लगे थे। मुगलों से सम्पर्क होने के बाद राजपूत सैनिकों की पोशाकों में भी बड़ा परिवर्तन हुआ। वे भी मुगल सैनिकों की तरह बख्तरबंद पहनने लगे थे।

सेना के अंग

राजपूतों की सेना परम्परागत रूप से चतुरंगिणी होती थी अर्थात् इसमें रथ, हाथी, घुड़सवार और पैदल सेना रूपी चार अंग होते थे। मुगलों के सम्पर्क में आने के बाद रथों का प्रयोग समाप्त-प्रायः हो गया। हाथियों का प्रयोग अब भी आवश्यक रूप से होता था किंतु हाथियों की अपेक्षा घुड़सवारों को अधिक महत्त्व दिया जाता था।

पैदल और घुड़सवार, सेना के प्रमुख अंग थे। जिन प्यादों के पास बन्दूकें होती थीं, वे बन्दूकची कहलाते थे। बन्दूकचियों की संख्या में धीरे-धीरे काफी वृद्धि हो गई थी। तोपखाने का महत्त्व भी अपने चरम पर पहुँच गया था। किलों की रक्षा के लिए बड़ी बड़ी तोपें रखी जाती थीं। रणक्षेत्र में प्रयोग के लिये हल्की तोपें बनवाई जाती थीं।

गजनाल (जो हाथियों पर ले जाई जाती थी) और शतुरनाल (ऊँटों पर लादी जाती थी) जैसी छोटी तोपें होती थीं। इनसे बड़ी तोपों को बैलगाड़ियों में ले जाया जाता था। तोपखाने का अधिकारी दरोगा-ए-तोपखाना होता था। उसके अधीन छोटे पदाधिकारी होते थे। राजपूत तोपची अथवा गोलन्दाज बनना पसन्द नहीं करते थे, इसलिए मुल्तान, गोडवाना, बुहरानपुर आदि स्थानों से प्रशिक्षित गोलन्दाज बुलाकर सेना में रखे जाते थे।

सैनिक पदाधिकारी

राजपूत राज्यों में सेना के विभिन्न विभागों की व्यवस्था की देखरेख के लिए अलग-अलग पदाधिकारी नियुक्त किये जाते थे जिन्हें पैदलपति, गजपति, अश्वपति आदि कहते थे। मुगलों के प्रभाव से सैनिक अधिकारियों को दरोगा-ए-पोलखाना, दरोगा-ए-सिलहपोसेखाना (अस्त्र-शस्त्र), दरोगा-ए-शुतरखाना, शमशेरबाज, बन्दूकची, किलेदार आदि कहने लगे थे।

बीकानेर राज्य में दरोगा के स्थान पर फौजदार होता था। फौजदार की सहायता के लिए तथा हवलदार और दरोगा नियुक्त किये जाते थे। पश्चिमी राजस्थान में ऊँट सवारी के दस्तों का काफी महत्त्व था, क्योंकि रेगिस्तानी क्षेत्र में वे प्रभावशाली सिद्ध होते थे। ऊँटों की सेना का प्रबन्ध शुतरखाना विभाग करता था।

साहसी और रणकुशल सामन्तों व सैनिकों को प्रोत्साहन दिया जाता था। उन्हें समय-समय पर सम्मानित किया जाता था। रणक्षेत्र में यदि कोई पदाधिकारी मारा जाता तो उसकी अन्त्येष्टि राजकीय सम्मान के साथ की जाती थी। यदि राजकीय सेवा करते हुए किसी सामन्त की मृत्यु हो जाती तो उस सामन्त के उत्तराधिकारी को अतिरिक्त जागीर और कुछ विशेषाधिकार दिये जाते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – राजपूत राज्यों का प्रशासन, समाज एवं अर्थव्यवस्था

राजपूत राज्यों का प्रशासन

राजपूतों का राजस्व प्रशासन

राजपूतों की न्यायिक व्यवस्था

राजपूतों का सैन्य प्रबन्धन

राजपूत राज्यों की अर्थव्यवस्था

राजपूत राज्यों में समाज

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राजपूत राज्यों में समाज

राजपूत राज्यों में समाज भारत के अन्य क्षुत्रों की जनता की तुलना में अधिक परम्परावादी थी। सामाजिक परम्पराओं में परिवर्तन की गति बहुत धीमी थी। राजपूत राज्यों में समाज का शैक्षिक स्तर बहुत निम्न था और लोगों में राजा के विरुद्ध आवाज उठाने को विद्रोह एवं पाप माना जाता था।

राजपूत राज्यों में समाज

मध्यकालीन समाज

भारत का सामाजिक ढांचा परम्परागत रूप से ऊँच-नीच, पद-प्रतिष्ठा तथा वंशोत्पन्न जातियों के आधार पर संगठित था। मध्यकालीन राजपूताने में यह व्यवस्था और अधिक दृढ़ हो गई थी। समाज में जातियों का महत्त्व उनके द्वारा किये जाने वाले कार्यों एवं व्यवसायों पर निर्भर करता था।

युद्ध, पूजा-पाठ एवं व्यापार आदि उच्च व्यवसायों को अपनाने वाली जातियों को सामाजिक संगठन में सम्मानजनक स्थान प्राप्त था। परिश्रम आधारित कार्यों में संलग्न जातियों को समाज में निम्न स्थान प्राप्त था। मृत पशुओं की खाल निकालने, मैला ढोने, जूते बनाने आदि हेय समझे जाने वाले कार्यों को करने वाले अछूत समझे जाते थे।

अछूत समझी जाने वाली जातियों को अपने जातीय कर्त्तव्यों का पालन करने अथवा बेगार के मामलों में छूट नहीं मिलती थी। जाति-व्यवस्था को दृढ़ बनाये रखने में सामंती व्यवस्था एवं जाति-पंचायतों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। जाति पंचायतें जातियों को व्यवस्थित रूप से संचालित करने के लिये खान-पान, शादी-विवाह तथा रीति-रिवाजों से सम्बन्धित नियम बनाती थी तथा उनकी पालना करवाती थीं।

जातीय नियमों को भंग करने वाले व्यक्तियों को दण्ड देने की व्यवस्था थी। उच्च समझी जाने वाली जातियों अर्थात् ब्राह्मण, राजपूत तथा महाजनों को समाज में आदर के साथ-साथ राज्य द्वारा विशेष सुविधाएँ दी जाती थीं।

राजपूत राज्यों में समाज – विविध जातियाँ और व्यवसाय

जातियों की विविधता और उनकी विभिन्नताओं के मामले में राजस्थान आज की तरह मध्यकाल में भी एक समृद्ध प्रदेश था। जातियों का निर्माण, उनकी सामाजिक प्रथायें तथा उनके आर्थिक क्रिया कलाप इतिहास में गहराई तक जड़ें जमाये हुए हैं। मध्यकालीन राजपूताने में जाति प्रथा का परम्परागत स्वरूप बना रहा किंतु मुगलों के प्रभाव के कारण सामाजिक विन्यास में आर्थिक परिवर्तन आने लग गये थे। इस कारण लोगों को परम्परागत जातीय व्यवसायों के साथ-साथ विविध व्यवसाय अपनाने पर विवश होना पड़ा।

ब्राह्मण

परम्परागत सामाजिक ढांचे में ब्राह्मणों का स्थान सर्वोपरि था। ब्राह्मण जाति अनेक उप जातियों में विभाजित थी। समाज में नैतिक जीवन का आधार ब्राह्मण ही माना था। अध्ययन-अध्यापन, धार्मिक कर्मकाण्डों का सम्पादन, पुरोहिताई आदि उनके परम्परागत जातीय पेशे थे। कुछ ब्राह्मण का व्यवसाय मन्दिरों में पूजा-पाठ करना था।

कुछ पढ़े-लिखे ब्राह्मणों ने अध्ययन-अध्यापन को अपना व्यवासय बनाये रखा। ऐसे ब्राह्मणों को राज्य से भूमि अनुदान में दी जाती थी। कई ब्राह्मणों ने कथा-वाचन, ज्योतिष तथा वैदिक अध्यापन को व्यवसाय बना लिया था। ब्राह्मणों के कुछ परिवार, राजकुलों तथा सामन्तों के पारिवारिक पुरोहित बने हुए थे। उन्हें राजगुरू तथा राजव्यास आदि उपाधियों से सम्मानित किया जाता था।

गाँवों में रहने वाले अधिकांश ब्राह्मणों ने कृषि कर्म को अपना लिया था। प्रमुख व्यापारिक मार्गों पर स्थित नगरों तथा कस्बों के कुछ सम्पन्न ब्राह्मणों ने व्यापार-वाणिज्य तथा साहूकारी का व्यवसाय अपना लिया था। ब्राह्मणों को विभिन्न महत्वपूर्ण राजकीय सेवाओं में भी नियुक्त किया जाता था। उन्हें कूटनीतिक तथा प्रशासनिक दायित्व दिये जाते थे।

विभिन्न व्यवसायों को अपनाने के उपरांत भी ब्राह्मण अपनी पुरानी परम्पराओं को कायम बनाये रखने पर जोर देते थे। इसीलिए हिन्दू प्रजा उन्हें हिन्दू संस्कृति का संरक्षक समझती थी तथा उन्हें पर्याप्त सम्मान देती थी। कुछ ब्राह्मणों ने निर्धनता के कारण भोजन बनाने का कार्य करना आरम्भ कर दिया था। ऐसे ब्राह्मण समाज में कम आदर से देखे जाते थे। वे ब्राह्मण जो किसी के मरने पर भोजन, कपड़ा व दान स्वीकार करते थे, उनका भी ब्राह्मण समाज में नीचा स्थान माना जाता था।

राजपूत

परम्परागत भारतीय समाज में ब्राह्मणों के बाद क्षत्रियों का स्थान आता था। मध्यकालीन राजपूताना में प्राचीन क्षत्रियों का स्थान राजपूतों ने ले लिया। राजवंश से  सम्बन्धित होने एवं शासक जाति के सदस्य होने के कारण राजपूतों को समाज में विशेष आदर प्राप्त था। उनके पास वंशानुगत रूप से छोटी-बड़ी जागीरें थीं।

इस काल के राजपूत अपनी मान-मर्यादा के प्रति अत्यधिक सजग थे। राजकीय सेवा, सैनिक सेवा अथवा सामान्तों की सेवा करने के अतिरिक्त अन्य किसी भी व्यवसाय को अपनाना वे अपने कुल मर्यादा के प्रतिकूल समझते थे। नागरिक प्रशासन एवं सैनिक व्यवस्था में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान होता था।

पद्मनाभ कृत कान्हड़दे प्रबन्ध में राजपूत जाति के 36 कुलों का उल्लेख है। ये कुल अनेक उपकुलों व परिवारों में विभाजित हो गये थे। राजपूत कुल चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो गया अथवा कितनी ही पीढ़ियाँ बीत चुकी हों, समान गोत्र में विवाह नहीं हो सकता था। एक गोत्र, एक परिवार ही समझा जाता था।

राजपूतों की शादी में लड़की के पिता को टीके व दहेज के रूप में धन देना पड़ता था। इस कारण निर्धन राजपूतों में नवजात कन्या को मार देने की कुप्रथा प्रचलित हो गई।

वैश्य

वैश्यों को समाज में महाजन कहकर आदर दिया जाता था। वाणिज्य कर्म में संलग्न होने के कारण उन्हें बनिया भी कहा जाता था। ब्राह्मणों और राजपूतों की भाँति वैश्य भी अनेक जातियों एवं उपजातियों में विभाजित थे। राजपूताने में मुख्यतः अग्रवाल, ओसवाल, माहेश्वरी, पोरवाल आदि वैश्य जातियाँ निवास करती थीं।

ये लोग व्यापार-वाणिज्य के साथ-साथ साहूकारी का काम अर्थात् सम्पत्ति गिरवी रखकर उसके बदले में नगद राशि ब्याज पर देते थे। इस कारण वैश्य समुदाय अत्यंत धन-सम्पन्न था। समाज में उसकी अत्यंत प्रतिष्ठा थी। समृद्ध वैश्य गांवों एवं नगरों में तालाब, कुएं, धर्मशाला, प्याऊ, पाठशाला एवं मंदिरों का निर्माण एवं जीर्णोद्धार करवाते थे। बहुत से सेठ सदाव्रत एवं दानशाला चलाते थे।

ऐसे प्रतिभा सम्पन्न एवं धन सम्पन्न वैश्यों को प्रशासन में उच्च पद दिये जाते थे। राज्यों में हाकिम, दीवान, मुसाहिब, दरोगा, वकील आदि पदों पर अधिकांशतः वैश्य वर्ग के व्यक्ति ही नियुक्त किये जाते थे। प्रतिष्ठित वैश्य मंत्री युद्धक्षेत्र में सैन्य-संचालन का काम भी करते थे।

राज्य के बड़े-बड़े सामंत अपनी सेनाओं के साथ युद्ध क्षेत्र में उपस्थित रहकर वैश्य मंत्री के निर्देशन में युद्ध लड़ते थे। वैश्य समुदाय का मुख्य व्यवसाय व्यापार-वाणिज्य तथा रुपयों का लेन-देन करना था। वे मुख्यतः थोक व्यापारी थे और सामान को एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त में लाने-ले जाने और क्रय-विक्रय का काम करते थे।

कई वैश्य परिवार खालसा भूमि के राजस्व तथा सायर (चुंगी) की वसूली का इजारा (ठेका) लेते थे तथा साधारण किसान से लेकर शासकों तक को ब्याज पर कर्ज देते थे।

कायस्थ

कायस्थों का समाज में महत्वपूर्ण स्थान था। राजपूताने में भटनागर एवं माथुर कायस्था अधिक प्रभावशाली थे। मुगलों के आगमन के पश्चात् कायस्था कों राजस्व अभिलेख रखने, शासकीय अभिलेख तैयार करने एवं पत्राचार आदि करने के काम में विशेष प्रसिद्धि मिली। वे फारसी के जानकार एवं प्रशासनिक कार्य में दक्ष माने जाते थे।

शासन व्यवस्था पर उनका अच्छा प्रभाव होता था इसलिये उन्हें कई बार युद्धों का नेतृृृत्व करने का भी अवसर दिया जाता था। जोधपुर एवं जयपुर राज्य में भी कायस्थों को विशेष महत्व दिया जाता था। उन्हें राजपूत राज्यों की ओर से दूसरे राज्यों में  वकील नियुक्त किया जाता था।

चारण

मध्यकालीन राजपूत शासित समाज में चारणों का भी प्रमुख स्थान था। वे भी काव्य रचना करने, राजा के संदेश वाहक का काम करने, तथा विभिन्न भूमिकाएं निभाने में सिद्धहस्त थे। चारणों को अवध्य माना जाता था। जो राजा चारण का अपमान करता था अथवा हत्या करता था, उसके शासन को पापयुक्त माना जाता था।

चारण का पेट भरना शासन का कर्त्तव्य माना जाता था। इसलिये उन्हें ब्राह्मणों की तरह दान दिया जाता था। चारणों को दान में दी गई जागीर राज्य द्वारा वापस नहीं ली जाती थी। चारणों की बारहठ, वीठू, आशिया, दधवाड़िया, खिड़िया, सिंढायच आदि शाखाएं बहुत प्रसिद्ध थीं।

चारण स्वामिभक्त जाति होती थी जो युद्ध क्षेत्र में राजा के साथ रहकर उसके मनोबल उन्नयन का कार्य करती थी। चारण जाति ने मध्यकाल में विपुल डिंगल साहित्य की रचना की।

भाट

मध्यकालीन समाज में राजपूताने में हर जाति का भाट होता था। वह परिवार की वंशावली लिखता था। विवाह आदि पर्वों पर भाट उस जाति एवं परिवार का विरुद बखानते थे जिसके बदले उन्हें पुरस्कार मिलता था। भाटों का मुख्य व्यवसाय मांग कर खाना होता था किंतु भाट केवल अपने जजमान के यहां से ही मांगकर खाता था। 

कुछ भाट किसान हो गये थे तथा कुछ किसान छोटा-मोटा व्यवसाय भी करते थे। मारवाड़ राज्य में पचपद्रा से नमक ले जाने का काम करने वाले भाट व्यापारियों को बल्दिया कहते थे। जजमान इस बात का ध्यान रखता था कि भाट नाराज होकर सामाजिक रूप से अपने जजमान की बदनामी न कर दे।

राव

चारणों, भाटों की तराह राव जाति के लोग भी वंशावलियां लिखते थे। उन्होंने अपनी बहियों के माध्यम से प्रदेश के इतिहास और रीति रिवाजों को लेखनी बद्ध करके उसे सदियों तक जीवित रखा। रावों ने पिंगल भाषा में काव्य कृतियों एवं लोक गीतों की रचनाएं करके प्रदेश के शासक एवं जन सामान्य वर्ग की आवश्यकताओं की पूर्ति की।

कृषक जातियाँ

मध्यकाल में राजपूताने की प्रमुख कृषक जाति जाट थी जो कृषि कर्म में अत्यंत निष्णात मानी जाती थी। जाटों से ही विश्नोई अलग हुए। विश्नोइयों का मुख्य कार्य कृषि कर्म ही था। कृषक वर्ग में कुनबी, कलबी, कीर, धाकड़, गूजर, माली, अहीर आदि जातियां भी थीं।

मुसलमानों के आने से पहले भारत की कृषि जातियों में सम्पन्नता थी। मुसलमानों के आक्रमण के बाद किसानों की हालत खराब होने लगी किंतु राजपूताने के कृषक 17वीं शताब्दी तक अपेक्षाकृत अच्छी स्थिति में बने रहे। अठारहवीं शताब्दी में मराठों की लूटमार आरम्भ होने के कारण राजपूताने की कृषि उजड़ने लगी तथा किसानों पर ऋण चढ़ने लगा। अब राजपूताने की कृषक जातियां भी दो आब की जातियों की तरह दुखी हो गईं।

हाथ से काम करने वाली जातियाँ

मध्यकाल में राजपूताने में सैंकड़ों ऐसी जातियां निवास करती थीं जो अपने अलग कार्य के लिये जानी जाती थीं। नाई बाल काटता था। लुहार लोहे के हथियार, उपकरण एवं अन्य सामग्री बनाता था। धुनिया कपास धुनता था। जुलाहा कपड़े बुनता था। छींपा अथवा रंगरेज कपड़े रंगता था।

दर्जी कपड़े सिलता था। खाती लकड़ी का काम करता था। धोबी कपड़े धोता था। कुम्हार मिट्टी के बर्तन, मटके, दिये आदि बनाता था। सुनार सोने-चांदी के आभूषण बनाता था। तेली बीजों से तेल निकालता था। लखारा, मणियार, भडभूंजा, कलाल, मोची, भांभी, मेघवाल, सरगरा आदि जातियां अपना-अपना निर्धारित करती थीं।

आभूषण बनाने वाली जातियाँ

मध्यकाल में लखारा, सुनार तथा मणिहार आदि जातियों ने आभूषणों के निर्माण एवं उनके व्यवसाय का विकास किया। राजस्थान में सोने का उत्पादन नहीं होता था, इसलिये सोना बाहर से मंगावाया जाता था। मेवाड़ की खानों से चांदी का उत्पादन होता था। इस कारण चांदी के आभूषण बहुतायत से बनते थे। आदिवासी लोग ताम्बे, सीप, रंगीन पत्थर एवं मिट्टी से बने मनकों के आभूषण भी पहनते थे।

गायक जातियाँ

राजस्थान में रहने वाली गायक जातियों में कलावंत, ढाढ़ी, मिरासी, ढोली, रावल, डोम, राणा, लंगा, भोपा, सांसी, कंजर, जोगी तथा भवई आदि प्रमुख थीं। कालबेलिया, कठपुतली नट, लखारा तथा भाट आदि जातियाँ भी गाकर एवं नाचकर अपना पेट भरती थीं।

घुमक्कड़ जातियाँ

मध्यकाल की प्रमुख घुमक्कड़ जातियों में बनजारे तथा गाड़िया लुहार थीं। बनजारे एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर सामान बेचते थे। गाड़िया लुहार जाति राजपूतों से निकली थी। सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में जब अकबर ने चित्तौड़ पर अधिकार किया तब जो राजपूत वीर युद्ध में काम नहीं आ सके उन्होंने अकबर की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया और प्रण किया कि जब तक चित्तौड़ पर पुनः हिंदुओं का अधिकार नहीं हो जाता तब तक चित्तौड़ की भूमि पर पैर नहीं रखेंगे।

अकबर से चित्तौड़ की पराजय का बदला लेंगे। बसे-बसाये घरों में नहीं रहेंगे। जब चित्तौड़ दुर्ग में हिंदुओं का दिया नहीं जलेगा तब तक रात में दिया नहीं जलायेंगे। कुंओं से पानी भरने के लिये रस्सी नहीं रखेंगे तथा पलंग पर नहीं सोयेंगे। जब तक जियेंगे हथियार बनायेंगे। उन्होंने चित्तौड़ की धरती को वचन दिया कि वे फिर आयेंगे।

यही क्षत्रिय गाड़िया लुहार कहलाने लगे। उनका परिवार बैल गाड़ियों पर रहता था तथा। ये लोग दूर-दूर तक घूमते रहते थे। चार सौ वर्ष बीत जाने पर भी गाड़िया लुहार पुनः चित्तौड़ नहीं लौट पाये। गाड़िया लुहार लोहे के छोटे-मोटे उपकरण, कृषि के औजार एवं घरेलू बर्तन बनाकर आजीविका कमाने लगे। आज भी वे यही कार्य कर रहे हैं।

चरवाहा जातियाँ

मध्यकाल में रेबारी, राजपूताने की प्रमुख चरवाहा जाति थी। ये लोग राजा एवं जमींदार के पशु चराया करते थे। कुछ रेबारियों के पास अपने पशु झुण्ड भी थे। भेड़ों एवं ऊँटों के टोले लेकर ये दूर-दूर तक के चारागाहों की यात्रा करते थे। अकाल पड़ने पर मारवाड़ एवं ढूंढाढ़ आदि प्रदेशों से मालवा की ओर चले जाते थे। ये लोग राजा के घोड़े चराने के काम पर भी रखे जाते थे। यह एक उच्च आर्य जाति थी तथा अपनी अलग संस्कृति का निर्वहन करती थी।

आदिवासी जातियाँ

मध्यकालीन राजपूताना में भील, मीणा, गरासिया, काथोड़िया, सहरिया तथा गमेती आदि आदिवासी जातियाँ निवास करती थीं। मेवाड़, आम्बेर, सिरोही, टोंक, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, कोटा, बूंदी तथा झालावाड़ आदि क्षेत्रों में आदिवासी काफी संख्या में निवास करते थे।

राजस्थान का दक्षिणी क्षेत्र विशेष रूप से कोटड़ा, झाड़ौल, सलूम्बर, सराड़ा, खेरवाड़ा तहसीलें और सम्पूर्ण डूंगरपुर राज्य आदिवासियों से भरे पड़े थे। आदिवासी लोग जंगलों और पहाड़ों में छितराये हुए मैदानों में खेती करते थे। कृषि वर्षा पर निर्भर थी। जंगलों से घास, चारा, लकड़ी, गोंद, कंदमूल, तेंदूपत्ते, जानवारों की खाल,  आदि एकत्र कर उसे कस्बों और शहरों में लाकर बेचना इनका मुख्य व्यवसाय था।

भील जाति मेवाड़ में सैनिक जाति के रूप में भी प्रख्यात थी। मीणा जाति आम्बेर राज्य में जागीरदार एवं चौकीदार के रूप में विख्यात थी। जमींदार मीणा प्रायः खेती एवं पशुपालन करते थे। कुछ लोग लूट-पाट भी करते थे। बारां जिले के शाहबाद और किशनगंज आदि क्षेत्रों में सहरिया जनजाति परम्परागत रूप से निवास करती थी।

राजपूत राज्यों में समाज – दास वर्ग

प्राचीन आर्यों के समय से भारत में दास प्रथा प्रचलन में थी। मौर्य काल में दासों की स्थिति बहुत ही खराब थी। वे समाज में रहते हुुए भी अन्य नागरिकों की तरह जीवन यापन नहीं करते थे। उनका जीवन कष्टों और अभावों से भरा हुआ था। मध्यकाल में मुस्लिम आक्रमणों के पश्चात् यह स्थिति और अधिक विकट हो गई।

मुसलमान आक्रांता किसी भी व्यक्ति, स्त्री अथवा बच्चे को पकड़कर ले जाते थे और मध्य एशियाई देशों में ले जाकर बेच देते थे। जब मुस्लिम आक्रांताओं ने भारत में अपनी राजसत्ता स्थापित की तो देश में दासों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी। राजपूताना भी इससे अछूता नहीं रहा।

राजपूताने के दास किसी जाति अथवा वर्ग से सम्बन्धित नहीं थे। न ही वे बाजारों में बेचे अथवा खरीदे गये थे। राजपूताने में दास प्रथा का जन्म शासक परिवारों की अवैध संतानों के रूप में हुआ। राजाओं एवं जमींदारों के महलों में काम करने वाली सेविकाएं इन संतानों की माता हुआ करती थीं।

ये संतानें बड़ी होकर महल में सेवा चाकरी करने लगती थीं जिन्हें दास माना जाता था। इन्हें अछूत नहीं माना जाता था। कुछ प्रतिभाशाली दासों की नियुक्ति किलेदारों एवं दरोगा आदि के पदों पर की जाती थी। दासियांे को डावड़ी कहा जाता था। सुंदर दासियां महलों में अच्छा-खासा प्रभाव रखती थीं।

राजपूत राज्यों में समाज – अछूत समझी जाने वाली जातियाँ

आर्यों ने श्रम आधारित जिस चार वर्णीय सामाजिक व्यवस्था का निर्माण किया था, उस व्यवस्था में मुसलमानों के प्रभाव से बहुत बड़ी विकृति उत्पन्न हुई। निम्न समझे जाने वाले कार्यों को करने वाली जातियां अछूत समझी जाने लगीं। इनमें मैला ढोने वाली, चमड़े का काम करने वाली तथा मृत पशुओं की खाल उतारने वाली जातियां सम्मिलित थीं। इस वर्ग में सम्मिलित जातियों में निरंतर विस्तार होता चला गया।

राजपूत राज्यों में समाज – मुसलमान

मध्यकाल में राजपूताने के विभिन्न राज्यों में मुसलमान भी निवास करने लगे थे। इनमें से कुछ मुसलमान शाही सैनिकों एवं अधिकारियों के रूप में राजपूताने के राज्यों एवं मुस्लिम शासित क्षेत्रों में रहते थे किंतु अधिकांश मुसलमान वे थे जो ना-ना कारणों से हिन्दू धर्म त्यागकर मुसलमान हो गये थे।

मुसलमानों की विभिन्न शाखाएं मध्यकाल में ही विकसित होने लगी थीं जिनमें कायमखानी, मेव, सैयद, पठान, काजी आदि सम्मिलित थे। इनमें भी जातियां बनने लगी थीं। छींपा जाति के मुसलमान भी राजपूताने में बड़ी संख्या में निवास करते थे। मुसलमानों के साथ ही कसाई भी बसने लगे थे।

निष्कर्ष

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि मध्यकाल का समाज जटिल जातीय व्यवस्था में विभक्त था। हर जाति का अपना काम था। इस काम के आधार पर ही उन्हें समाज में अधिक या कम आदर प्राप्त होता था। ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्यों को समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त था।

हाथ से काम करने वाली जातियों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति सन्तोषजनक नहीं थी। सतत युद्धों के उपरान्त भी राज्यों की अर्थव्यवस्था संतोषजनक थी किंतु मुगलों के सम्पर्क में आने के बाद समाज की अर्थव्यवस्था में तेजी से परिवर्तन आया। इस कारण विभिन्न जातियों को अपने परम्परागत कार्यों के साथ-साथ विभिन्न कार्य अपनाने पड़ रहे थे। जाति व्यवस्था को बनाये रखने में सामंती व्यवस्था एवं जातीय पंचायतें प्रमुख भूमिका निभा रही थीं।

राजपूत राज्यों में समाज – सामाजिक जीवन

राजपूत राज्यों में प्राचीन आर्यों द्वारा विकसित पितृ-सत्तात्मक संरचना वाले संयुक्त परिवार निवास करते थे। परिवार का मुखिया अपनी तीन-चार और यहां तक कि पांच-पांच पीढ़ियों के साथ रहता था। भूमि का बंटावारा नहीं किया जाता था इसलिये सब भाई तथा उनकी संतानें मिलकर खेती, पशुपालन एवं विविध कार्य किया करते थे। इसके कारण कुटीर उद्योग एवं पारिवारिक व्यवसाय का प्रचलन था।

सोलह संस्कार

मनुष्य के जीवन के लिये सोलह संस्कार आवश्यक माने जाते थे। इनमें नामकरण, अन्न-प्राशन, चूड़ाकरण (झड़ूला), उपनयन, विवाह, अंत्येष्टि आदि प्रमुख थे।

विवाह

समाज की संरचना बहुत सरल थी। कन्या का विवाह कम आयु में ही कर दिया जाता था। इसके पीछे धारणा यह थी कि कन्या को अपने पिता के घर में राजस्वला नहीं होना चाहिये। विवाह अपनी ही जाति में होता था किंतु एक ही रक्त वाले स्त्री-पुरुष परस्पर भाई-बहिन समझे जाते थे और उनका परस्पर विवाह नहीं होता था।

इसलिये गोत्र आधारित विवाह किये जाते थे। राजपूतों एवं वैश्यों में बहु-विवाह प्रचलित था। राजपूत एवं अन्य धनी लोग उपपत्नियां भी रखते थे जिन्हें उनकी हैसियत के अनुसार रखैल, पासवान, पडदायत अथवा खवास कहा जाता था। विवाह के अवसर पर कुनबे वालों को भोज दिया जाता था।

ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य जातियों में विधवा विवाह प्रचलन में नहीं था। जाट, माली, गूजर, कुम्हार आदि श्रम आधारित जातियों में नाता प्रथा प्रचलित थी जिसमें विधवा स्त्री का विवाह उसके ससुराल पक्ष के अथवा किसी अन्य परिवार के पुरुष से कर दिया जाता था। जाति से बाहर विवाह करने वालों को जाति से बहिष्कृत कर दिया जाता था।

मृतक संस्कार

मृतक संस्कार को आवश्यक धार्मिक कर्त्तव्य समझा जाता था। शव को अग्नि में जलाया जाता था। उसकी राख एवं हड्डियों को नदियों में प्रवाहित किया जाता था। मृत्यु भोज देना अनिवार्य था। मृतक की आत्मा की शांति के लिये ब्राह्मणों एवं भूखों को भोजन दिया जाता था। समय-समय पर श्राद्ध कर्म भी किया जाता था।

वस्त्राभूषण

मनोरंजन प्रिय संस्कृति होने के कारण राजपूताने में विविध प्रकार के चटख रंगों के वस्त्र पहने जाते थे। शासक एवं सामंत वर्ग के लोग बड़ी धोती, लम्बी अंगरखी तथा रंग-बिरंगी पगड़ियां पहनते थे। कपड़ों पर सोने-चांदी के तारों एवं कसीदे का काम किया जाता था। मध्यम वर्ग के लोग धोती, अंगरखी, दुपट्टा, साफा या पगड़ी पहनते थे।

निर्धन लोग कमर में ऊँची धोती तथा सिर पर पोतिया बांधते थे। औरतें घेरदार घाघरा, लम्बी आस्तीन वाली कुर्ती तथा ओढ़नी पहनती थीं। मुगलों के सम्पर्क के बाद बहुत से पुरुष जामा, कमरबंद और पाजामा पहनने लगे थे। स्त्री तथा पुरुष दोनों ही आभूषणों के शौकीन थे।

सम्पन्न लोग सोने के, मध्यम लोग चांदी के, निर्धन लोग ताम्बे एवं पीतल के आभूषण पहनते थे। स्त्रियां शुभ अवसरों पर हाथ-पैरों पर मेहंदी लगाती थीं। वे आंखों में काजल, माथे पर बिंदी तथा सिर में मांग लगाती थीं।

आमोद प्रमोद

मध्यकालीन राजपूताना में घरों के भीतर एवं चौराहों आदि पर सार्वजनिक रूप से चौपड़, शतरंज, गंजीफा, चर-भर, आदि खेल खेले जाते थे। कुश्ती, पट्टेबाजी, पतंगबाजी, कबूतरबाजी, मुर्गों की लड़ाई, तैराकी, हाथियों की लड़ाई, भैंसों की लड़ाई, आदि मनोरंजन के प्रमुख साधन थे।

गायन, वादन एवं नृत्य के आयोजन पारिवारिक एवं सामाजिक स्तर पर आयोजित किये जाते थे। राजपूत लोग शिकारों का आयेाजन करते थे। झूला झूलना, नाटक आयोजित करना, विभिन्न प्रतियोगिताओं तथा मेलों का आयोजन करना भी मनोरंजन के प्रमुख साधन थे।

खान-पान

समाज में शाकाहार एवं मांसाहार का प्रचलन था। वैश्य एवं ब्राह्मण शाकाहारी थे। अन्य जातियों में प्रायः मांसाहार होता था। दैनिक भोजन में गेहूँ, बाजरा, मक्का, चावल, जौ, चना आदि अनाजों एवं अनेक प्रकार की दालों एवं हरी सब्जियों का प्रयोग होता था। विवाह आदि अवसरों पर अफीम से मनुहार की जाती थी।

शराब का भी प्रचलन था। सात्विक प्रवृत्ति के लोग शराब नहीं पीते थे। भोजन के बाद एवं चौपालों पर हुक्के पीने का प्रचलन था। सामान्य दिनों में दाल-रोटी, सब्जी रायता आदि खाया जाता था। विवाह, त्यौहार एवं अतिथि आगमन पर खीर, पुए, लड्डू, गुलगुले आदि बनाये जाते थे। मुरब्बे, अचार, चटनी आदि भी प्रचलन में थे।

दूध, दही, घी, छाछ एवं मक्खन का प्रयोग आर्थिक स्थिति के अनुसार होता था। मांसाहारी लोग हिरण, बकरा, भेड़ एवं सूअर आदि पशुओं तथा मुर्गा एवं बत्तख आदि पक्षियों का मांस खाते थे। समस्त राजपूताना में हिन्दू राज्य होने गाय का मांस पूरी तरह निषिद्ध था।

धर्म

मध्यकालीन रापजूताने में वैदिक एवं पौराणिक धर्म का प्रचलन था। विष्णु, लक्ष्मी, शिव, सूर्य, दुर्गा, गणेश, हनुमान आदि देवी-देवताओं की पूजा होती थी। दान करना, यज्ञ करना, तीर्थ यात्राओं पर जाना, कीर्तन एवं रतजगा करना श्रेष्ण धार्मिक कर्त्तव्य माने जाते थे। मंदिर, प्याऊ एवं धर्मशाला बनाना, सदाव्रत बांटना, तालाब खुदवाना भी धार्मिक कर्म के रूप में प्रचलित थे।

अमावस्या एवं संक्रांति के अवसरों पर नदियों एवं तालाबों में स्नान करने का महत्व था। समाज में विभिन्न व्रत एवं उपवास भी प्रचलन में थे। वैष्णव धर्म के साथ-साथ शैव एवं शाक्त मत भी प्रचलन में थे। शाक्त लोग देवी को भैंसे एवं बकरे की बलि चढ़ाते थे। शैव धर्म की नाथ शाखा राजपूताने में विशेष रूप से सक्रिय थी।

राजपूताने के विभिन्न राज्यों में जैन धर्म का भी प्रभाव था। विभिन्न तीर्थंकरों के मंदिर बने हुए थे जिनमें पूजा होती थी। लोकदेवताओं की भी पूजा प्रचलन में थी। गोगा, पाबू, हड़बू, रामदेव, मल्लीनाथ, वीर तेजा, मांगलिया मेहा आदि लोक देवताओं की पूजा होती थी तथा उनके जन्मदिन एवं निर्वाण दिन पर मेले लगते थे।

संतों एवं गुरुओं को विशेष आदर दिया जाता था। समाज पर कबीर, दादू, रैदास, मीरां आदि संतों के भजनों का प्रभाव था। रामस्नेही सम्प्रदाय भी प्रसिद्ध हो गया था। मुस्लिम लोग इस्लाम को मानते थे। अजमेर एवं नागौर में सूफियों के बड़े केन्द्र स्थापित हो गये थे।

राजपूत राज्यों में समाज – सामाजिक एवं धार्मिक पर्व

मध्यकालीन राजपूताना में हिन्दुओं के समस्त छोटे-बड़े सामाजिक एवं धार्मिक पर्व मनाये जाते थे। होली, दीपावली, रक्षा बंधन, गणगौर, तीज, दशहरा, अक्षय तृतीया, नवरात्रि, प्रमुख त्यौहार थे। विभिनन त्यौहारों के अवसर पर मेलों का आयोजन किया जाता था। मुसलमानों में ईदुलफितर, ईदुलजुहा, बारा-बफात, मुहर्रम आदि मनाये जाते थे।

राजपूत राज्यों में समाज – सामाजिक बुराइयाँ

मध्यकालीन राजपूताने में सती प्रथा सबसे बड़ी सामाजिक बुराई थी। यह राजपूतों में अधिक प्रचलन में थीं। राजपूतों में पति के मरने पर उसकी पत्नियां प्रायः सती हो जाती थीं। कई बार अग्रवाल आदि वैश्य स्त्रियां भी सती होती थीं। किसी के मरने पर मृत्युभोज आयोजित किया जाता था। दहेज प्रथा किसी न किसी रूप में हर जाति एवं वर्ग में प्रचलित थी।

राजपूत परिवारों द्वारा अपनी पुत्रियों के विवाह के अवसर पर दास-दासी भी दहेज में दिये जाते थे। डाकन-प्रथा का बहुत ही बुरा प्रचलन था। किसी भी आयु की औरत को डाकन घोषित करके उसे जान से मार डाला जाता था। राजपूत जातियों में कन्या-वध का प्रचलन था।

राजपूत परिवारों में विवाह के अवसर पर चारणों, ढोलियों तथा भाटों को त्याग दिया जाता था। इस प्रथा को त्याग-प्रथा कहा जाता था। त्याग प्राप्त करने वाले, अपने जजमानों से झगड़ा करके अधिक से अधिक त्याग प्राप्त करने की चेष्टा करते थे। इस भय के कारण भी कन्या वध अधिक संख्या में होता था।

कुछ लोग लड़कियों से वेश्यावृत्ति करवाने, गृह दासी बनाने के लिये लड़कियों को खरीदते एवं बेचते थे। साधु लोग अपने चेले-चेली बनने के लिये भी लड़के-लड़कियां खरीदते थे। इसे चेला प्रथा कहते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजपूत राज्यों की अर्थव्यवस्था

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राजपूत राज्यों की अर्थव्यवस्था

राजपूत राज्यों की अर्थव्यवस्था प्राचीन हिन्दू जीवन शैली पर आधारित थी और अत्यंत सरल कार्यकलापों से युक्त थी। राजपूत राज्यों की अर्थव्यवस्था प्राचीन हिन्दू जीवन शैली पर आधारित थी और अत्यंत सरल कार्यकलापों से युक्त थी। प्रजा से उनके द्वारा अर्जित किए जाने वाले धन पर राजा केवल उतना ही कर लेता था जितना कि उसे राज्य के संचालन के लिए आवश्यक होता था।

मध्यकाल में राजपूत राज्यों की अर्थव्यवस्था जटिल नहीं हुई थी। कृषि, पशुपालन, कुटीर उद्योग, खनिज उत्पादन, जंगल के साथ-साथ वाणिज्य एवं व्यापार भी उस काल की अर्थ व्यवस्था में प्रमुख योगदान देते थे।

कृषि

राजपूत राज्यों की अर्थव्यवस्था में राजा समस्त भूमि का सैद्धांतिक स्वामी था। व्यवहार में काश्तकार तब तक कृषि भूमि का स्वामी था जब तक वह लगान देता रहता था। राजा किसी को भी राज्य की भूमि जागीर, दान एवं अनुदान में दे सकता था। वह जागीर अथवा दान में दी हुई भूमि को वापस भी ले सकता था। राज्य की समस्त भूमि खालसा, जागीर, भोम, सासण के रूप में बंटी हुई थी।

खालसा भूमि पर राजा का प्रत्यक्ष नियंत्रण होता था। लगान निर्धारित करने तथा उसकी वसूली का काम राज्य के कर्मचारी करते थे। सामंतों एवं जागीरदारों को राजकीय सेवा के बदले में भूमि जागीर में दी जाती थी। ऐसी भूमि का बेचान अथवा हस्तांतरण राजा की स्वीकृति से ही हो सकता था।

भोमिया को दी गई जमीन भोम और ब्राह्मणों, भाटों, चारणों आदि को पुण्यार्थ दी गई भूमि सासण एवं माफी के नाम से जानी जाती थी। पशुओं के लिये रिक्त रखी गई भूमि चरणोत या गोचर कहलाती थी। इस पर पूरे गांव का अधिकार होता था।

भूमि की ऊर्वरता के आधार पर उसका श्रेणीकरण एवं वर्गीकरण किया गया था तथा उसी के आधार पर लगान अथवा भोग तय किया जाता था। एक चमड़े के पात्र (चड़स) से से सींची जाने वाली भूमि को कोशवाहक कहते थे। तालाब की भूमि को तलाई, नदी के किनारे वाली भूमि को कच्छ, कुएं के पास वाली भूमि को डीमडू, गांव के पास वाली भूमि को गोरमो, कहा जाता था।

उपज के हिसाब से भी भूमि के अलग-अलग नाम होते थे। सिंचाई वाली भूमि को पीवल, पानी से भरी हुई को गलत हांस, जोती जाने वाली भूमि को हकत-बहत, काली उपजाऊ भूमि को माल, पहाड़ी जमीन को मगरो, गांव से दूर की भूमि को कांकड़, बागवानी में प्रयुक्त भूमि को बाड़ी कहा जाता था।

भूमि के टुकड़ों को कातका या बतका कहते थे। खेती के लिये लोहे एवं लकड़ी के हल, कुदाल, फावड़ा, कस्सी एवं जेई आदि उपकरणों का प्रयोग होता था। हल खींचने का काम मुख्यतः बैल करते थे। ऊँटों से भी हल खींचा जाता था।

राजपूताना के राज्यों में सर्दी में होने वाली फसल को सियालू (रबी) एवं गर्मी में होने वाली फसल को उनालू (खरीफ) कहा जाता था। सियालू में गेहूं, जौ, चना तथा उन्हालू में बाजरा, ज्वार, मूंग, मोठ प्रमुखता से होते थे। मालवा से लगने वाले पठारी क्षेत्र में थोड़ा बहुत चावल, गन्ना, कपास एवं उड़द भी पैदा किया जाता था। 

प्रतापगढ़ तथा माल की भूमि में अफीम भी पैदा होती थी। सिंचाई के साधन सीमित थे। तालाबों, कुंओं एवं नहरों के माध्यम से सिंचाई होती थी। कुंओं एवं बावड़ियों से रहट, चड़स अथवा ढीकली के माध्यम से पानी खींचकर खेतों में पहुंचाया जाता था।

खालसा भूमि में राजा की ओर से तथा जागीर भूमि में जागीरदार की ओर से भू-राजस्व वसूल किया जाता था। सामान्यतः उपज का एक तिहाई अथवा एक चौथाई कर वसूल किया जाता था। कर निर्धारण की अलग-अलग पद्धतियां प्रचलित थीं। इनमें से लाटा, कूंता, बंटाई आदि अधिक लोकप्रिय थीं।

मुगलों से सम्पर्क होने के बाद राहदारी, बाब, पेशकश, जकात, गनीम आदि अनेक नये कर प्रचलन में आ गये थे। अकाल में किसानों की हालत बहुत खराब हो जाती थी। मुगलों से सम्पर्क के बाद राजपूताना राज्यों में इजारेदारी प्रथा आरंभ हो गई थी।

इस प्रथा में राज्य द्वारा एक निश्चित अवधि के लिये एक निश्चित राशि के बदले में लगान वसूली का अधिकार किसी भी व्यक्ति को सौंप दिया जाता था। इसे मुकाता भी कहते थे। इजारा उस व्यक्ति को दिया जाता था जो इजारे की राशि की अधिक से अधिक बोली लगाता था।

उद्योग धंधे

राजपूत राज्यों की अर्थव्यवस्था में उद्योगों के लिए कच्चा माल, सस्ता श्रम तथा सस्ती खनिज सम्पदा राजपूताने में ही उपलब्ध थी। इस कारण तैयार माल अपेक्षाकृत सस्ता पड़ता था। उस काल में सूती वस्त्र, ऊनी वस्त्र, सूतली, सन की रस्सी, मूंझ की रस्सी टाटपट्टी, गलीचे, कम्बल, लकड़ी का सामान, मिठाई, कपड़ा, कागज, नमक, खार, सज्जी आदि के उद्योग अच्छे चलते थे।

उद्योगों का स्वरूप प्रायः कुटीर उद्योग था जिसमें परिवार के सब सदस्य मिलकर काम करते थे। भरतपुर, मारवाड़, जयपुर, बीकानेर, मेवाड़ आदि राज्यों में कई जगहों पर नमक बनता था।

सूती कपड़ा उद्योग

देलवाड़ा, पाली, सिरोंज, अजमेर, सांगानेर, आकोला, भरतपुर, उदयपुर, चित्तौड़, कोटा, कैथून, मांगरोल, बूंदी आदि स्थान सूत कातने, कपड़ा बुनने, रंगाई, छपाई और बंधाई के बड़े केन्द्र बन गये। कोटा में मलमल बनाने का काम होता था। यहां की चूंदड़ी और कसूमल पगड़ियां प्रसिद्ध थीं।

बूंदी राज्य में डोरिया, शैला, जोड़ा और अंगोछे बनते थे। मारवाड़ राज्य के मारोठ और जालोर परगनों में हाथ से कती और बुनी रेजी (गाढ़ा कपड़ा) बनता था। आम्बेर राज्य में सांगानेर और बगरू की छपाई एवं रंगाई प्रसिद्ध थी। कोटा की सुनहरी-रूपहरी छपाई एवं बारां की चूंदड़ी और पोमचा की बंधाई प्रसिद्ध थी। जयपुर और जोधपुर में भी बंधेज का काम होता था जिससे चूंदड़ी बनती थी।

ऊनी कपड़ा उद्योग

राजपूत राज्यों की अर्थव्यवस्था में जैसलमेर, मारवाड़, बीकानेर तथा शेखावाटी में ऊनी वस्त्र उद्योग उन्नत अवस्था में था।

लोहे का सामान

नागौर में मुलतान से आये कारीगर लोहे के हथियार, सुनारी एवं लुहारी के उपकरण, खेती के औजार, तराजू के बाट आदि बनाते थे। सिरोही में भी अच्छी तलवारें बनती थीं। बूंदी में कटार, उस्तरे, चाकू तथा तलवारें बनती थीं। जोधपुर, पाली और सोजत में भी लोहे की सामग्री बनती थी। पाली में लोहे के संदूक, कड़ाहियां और बड़े-बड़े कड़ाह बनते थे।

आभूषण उद्योग

जयपुर में हीरे-जवाहरातों से जड़े आभूषण एवं लाल रंग की मीनाकार का काम होता था। जोधपुर में आभूषणों की घड़ाई तथा पटवे का काम (आभूषणों को रेशमी एवं सूती डोरी से बांधने का काम) होता था। जोधपुर में हाथी दांत की चूड़ियां बनती थीं।

बर्तन उद्योग

जयपुर आदि कई नगरों में पीतल, ताम्बे, कांसे एवं लोहे के बर्तन बनते थे। जयपुर में पीतल के बर्तनों पर नक्काशी का काम बहुत सुंदर होता था। नागौर में पीतल के बर्तन बनते थे।

चर्म उद्योग

राजपूत राज्यों की अर्थव्यवस्था में चर्म उद्योग काफी विकसित अवस्था में था। चमड़े से मशक, जूते, तिरपाल, तम्बू, पैकिंग थैले, घोड़े की जीन, रस्से, चड़स आदि बनते थे जो देश के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ दूसरे देशों को निर्यात किये जाते थे। भीनमाल तथा जोधपुर आदि कई नगरों में जूतों पर कसीदाकारी की जाती थी।

काष्ठ उद्योग

राजपूताने के जंगलों में कई प्रकार की इमारती लकड़ी उपलब्ध होने से काष्ठ उद्योग भी विकसित अवस्था में था। लकड़ी के कृषि उपकरण, बैल गाड़ियां, ऊँट गाड़ियां, कोठियां, बक्से, पलंग, खाट एवं घर में काम आने वाली कई प्रकार की सामग्री बनती थी।

विविध उद्योग

राजपूताने के विविध नगरों में सुगन्धित तेल एवं इत्र बनाने का काम होता था। मुगलों के सम्पर्क के बाद इस काम में और तेजी आई। शरबत और शराब बनाने का उद्योग भी विस्तार पा चुका था। किशनगढ़, सांगानेर, जयपुर, जोधपुर आदि बहुत से स्थानों पर मोटा कागज बनता था। जयपुर एवं जोधपुर में लाख की चूड़ियां बड़े स्तर पर बनती थीं।

व्यापार एवं वाणिज्य

मध्यकाल में स्थानीय, अंतर्राज्यीय एवं अंतर्प्रादेशिक व्यापार खूब उन्नति कर गया था। विश्व के बहुत से देशों से विभिन्न सामग्री भारत लाई जाती थी और यहाँ से दूसरे देशों को ले जाई जाती थी। भारत की राजधानी दिल्ली तथा बहुत से उत्तरी राज्यों को दक्षिण में जाने के लिये राजपूताने से होकर निकलना पड़ता था। इस कारण राजपूताने के विभिन्न राज्यों में व्यापार एवं वाणिज्य की स्थिति बहुत अच्छी थी।

प्रमुख व्यापारिक मार्ग

उन दिनों में सड़कें पक्की नहीं होती थीं। कच्चे मार्गों पर यात्रा करना बहुत कठिन था। वर्षा एवं आंधी के कारण यात्रा बहुत थकाने वाली होती थी। डाकुओं और लुटेरों का खतरा भी बना रहता था। फिर भी पूरे देश में विभिन्न व्यापारिक मार्ग विकसित हो गये थे जिनमें से अनेक मार्ग राजपूताने के विभिन्न राज्यों से होकर निकलते थे।

दिल्ली-आगरा से गुजरात और मालवा होकर दक्षिण जाने वाले राज्य राजपूताना से होकर गुजरते थे। दिल्ली से अजमेर के लिये दो प्रमुख मार्ग थे। एक दिल्ली से आगरा, भरतपुर एवं आमेर होकर था और दूसरा दिल्ली से अलवर और आमेर होकर। अजमेर से अहमदाबाद के दो प्रमुख मार्ग थे।

एक अजमेर से माण्डलगढ़, चित्तौड़, उदयपुर तथा डूंगरपुर होकर था और दूसरा अजमेर से पुष्कर, पाली तथा पालनपुर होकर था। मुल्तान से अहमदाबाद का मार्ग भावलपुर, लोद्रवा तथा जैसलमेर होकर था। बीकानेर से अहमदाबाद का मुख्य मार्ग नागौर, मेड़ता, पाली और पालनपुर होकर था। दिल्ली से सिन्धु नदी का मुख्य मार्ग बीकानेर होकर था।

उदयपुर से बांसवाड़ा और डूंगरपुर होकर भी मालवा जाने का मार्ग था। जयपुर से उज्जैन का मार्ग सांगानेर, टोंक, बूंदी, कोटा और झालरापाटन होकर था। राजपूत राज्यों की समस्त राजधानियां सहायक मार्गों द्वारा प्रमुख मार्गों से जुड़ी हुई थीं। राजपूताने के प्रमुख व्यापारिक केन्द्र या तो मुख्य मार्गों पर स्थित थे अथवा सहायक मार्गों से सम्बन्न्धित थे। मुख्य तथा सहायक मार्गों पर व्यापारियों तथा अन्य यात्रियों की सुविधा के लिये सराय, कुएं तथा विश्राम स्थल बने हुए थे।

प्रमुख व्यापारिक केन्द्र

राजपूताना के आम्बेर राज्य में मालपुरा, सीकर और चिड़ावा, मारवाड़ में पाली, नागौर और भीनमाल, मेवाड़ में भीलवाड़ा, कमलमीर और रायपुर, बीकानेर राज्य में चूरू, नोहर और राजगढ़, कोटा राज्य में अंता, बारां और मांगरोल प्रमुख मण्डियां थीं। पाली नगर समस्त सम्पूर्ण भारत के प्रमुख व्यापारिक केन्द्रों में से था।

यहां भारत की बनी हुई वस्तुओं के साथ-सााथ अफ्रीका, यूरोप तथा चीन से भी सामान पहुंचता था। पाली के मार्ग से ही मालवा की अफीम चीन और पश्चिमी एशिया को निर्यात की जाती थी। अफीम से लदे हुए लगभग दो हजार ऊँट प्रति वर्ष पाली से होकर निकलते थे।

टीन के बक्सों में बंद किया हुआ यूरोप का माल भावनरगर एवं अन्य बंदरगाहों पर उतारकर पाली भेजा जाता था। व्यापारिक करों तथा राहदारी शुल्क द्वारा पाली मण्डी से मारवाड़ राज्य को प्रतिवर्ष अच्छी आय होती थी। बीकानेर राज्य के राजगढ़ में भी प्रमुख व्यापारिक केन्द्र विकसित हो गया था जहाँ विभिन्न दिशाओं से आने वाले व्यापारिक काफिले ठहरते थे।

कश्मीर, पंजाब, हांसी, हिसार आदि से माल आता था। दिल्ली की ओर से रेशम, चीनी, लोहा, तम्बाखू मालवा की ओर से अफीम, सिंध की ओर से गेहूँ, चावल, गुजरात की ओर से मसाले, टिन, दवाइयाँ, नारियल, हाथी दांत लेकर व्यापारी यहां से होकर गुजरते थे।

मुल्तान और शिकारपुर से जैसलमेर के मार्ग से छुआरा, गेहूँ, चावल, सूखे मेवे आदि आते थे। जैसलमेर- मुल्तान, शिकारपुर, हैदराबाद (सिन्ध), अमरकोट, खैरपुर, रौरी, बेकर अहमदपुर, भावलपुर आदि व्यावसायिक नगरों से जुड़ा हुआ था। पाली, नागौर, फलौदी, पोकरण, पूगल, बीकानेर, बाड़मेर, शिव, कोटड़ा,  आदि नगरों से हुए हुए व्यापारी जैसलमेर पहुंचते थे।

जैसलमेर नगर के मध्य में पूंजीपति लोग व्यापारिक लेन-देन के लिये बनजारों से घिरे हुए रहते थे। वस्त्र, मिष्ठान, आभूषण आदि विभिन्न सामग्रियों के क्रय-विक्रय के अलग-अलग स्थान निर्धारित थे। जैसलमेर में विभिन्न दिशाओं से अनाज से लदे हुए ऊँट आते थे।

व्यापारिक परिवहन

राजपूताना के विभिन्न राज्यों से विविध प्रकार की सामग्री का दुनिया भर के देशों में निर्यात किया जाता था। इसके लिये राजपूताना से सामग्री खरीद कर व्यापारिक काफिले विभिन्न बंदरगाहों तक पहुंचते थे जहां से यह सामग्री अन्य देशों तक पहुंचती थी।

स्थलीय परिवहन के लिये बैलगाड़ियों, ऊँटों, ऊँट गाड़ियों, घोड़ों, टट्टुओं, गधों, हाथियों और रथों का उपयोग किया जाता था। व्यापारिक सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने का काम बनजारे करते थे। एक सामान्य बनजारे के पास 200 से 500 तक मालवाहक पशु होते थे।

बड़े बनजारों के पास इनकी संख्या 2000 तक होती थी। बनजारों के काफिले को बालद कहा जाता था। राजपूत राज्यों के राजा एवं जागीरदार, व्यापारियों से कर एवं शुल्क लेकर उन्हें सुरक्षा प्रदान करते थे। अधिकांश व्यापारी अपने काफिलों के साथ चारणों को रखते थे क्योंकि उस काल में चारणों को अवध्य माना जाता था, उन्हें लूटा नहीं जाता था तथा आदर दिया जाता था।

इस कारण बहुत से लुटेरे चारणों का कहना मानकर काफिले को लूटे बिना ही चले जाते थे। व्यापारिक काफिलों के साथ सशस्त्र रक्षक भी चलते थे। फिर भी स्थानीय शासक अथवा जागीरदार से अभय प्राप्त किये बिना व्यापारिक परिवहन संभव नहीं था।

निर्यात

राजपूताना के विभिन्न राज्यों से कपास, सूती कपड़ा, छींट का कपड़ा, रंगा हुआ कपड़ा, चूंदड़ी का कपड़ा, चमड़ा, चमड़े की सामग्री, ऊन, ऊन से बने हुए कम्बल एवं गलीचे, रस्से, नमक, अफीम, भांग, गांजे, विभिन्न प्रकार के उपयोगी पशु तथा पशुओं की खालें, घी, तिलहन, तेल, अनाज आदि विभिन्न प्रकार की जिंसों का निर्यात किया जाता था। मुल्तानी मिट्टी तथा संगमरमर पत्थर भी बंदरगाहों तक पहुंचाये जाते थे।

सांभर झील से प्राप्त नमक सांभरी नमक कहलाता था। इसकी मांग उत्तर प्रदेश तथा हरियाणा में अधिक थी। पचपद्रा का नमक कोसिया कहलाता था। इसकी मांग मध्यप्रदेश में अधिक थी। डीडवाना का नमक डीडू कहलाता था। इसकी मांग पंजाब, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश में थी। हाड़ौती तथा मेवाड़ में पोस्त की खेती की जाती थी।

इसके रस से अफीम तैयार की जाती थी। जैसलमेर, मारवाड़, बीकानेर तथा शेखावाटी के मरुक्षेत्रों में भेड़पालन बहुतायत से होता था। इन क्षेत्रों से ऊन, ऊनी कम्बल, ऊनी दरियां, ऊन के मोटे रस्से, जहाजों पर बिछाने के लिये मोटे ऊनी गलीचे निर्यात किये जाते थे। आम्बेर राज्य के मालपुरा से ऊनी टोपियां, ऊनी लोई (पतली ऊनी चद्ददर) और कम्बलों का निर्यात होता था। नागौर तथा ओसियां भी ऊन तथा ऊन से बनी सामग्री का बड़ी मात्रा में निर्यात होता था।

आयात

मध्यकाल में मालवा, पंजाब, कश्मीर तथा गुजरात आदि विभिन्न क्षेत्रों के बड़े व्यापारियों की दुकानें मारवाड़ के विभिन्न राज्यों में खुली हुई थीं, उसी प्रकार राजपूताने के व्यापारियों की दुकानें भारत के विभिन्न क्षेत्रों में खुली हुई थीं। इन दुकानों पर दुनिया भर की सामग्री बिकने के लिये आती थी।

समय-समय पर हाट बाजारों एवं मेलों का भी आयोजन होता था जिनमें समुद्रों के किनारे एवं पहाड़ी क्षेत्रों में पैदा होने वाली विभिन्न सामग्री यथा खजूर, सूखा मेवा, शराब, दाख, नारियल, नारियल की चटाइयां, मखमल, बुरहानपुरी साड़ियां, बनारसी साड़ियां, गुजराती रेशम, कश्मीरी शॉल, औरंगाबादी कपड़े, सारंगपुर की पगड़ियां, हाथी, घोड़े बिकने के लिये आते थे। इस सामग्री की राजपूताने में भारी मांग थी।

चुंगी एवं राहदारी

मध्यकाल में व्यापारिक आयात-निर्यात पर चुंगी तथा राहदारी लगती थी। विभिन्न राज्यों के महत्त्वपूर्ण स्थानों पर चुंगी चौकियां स्थापित की हुई थी। राज्य में उत्पादित माल जब राज्य की सीमा से बाहर जाता था तो उसे निकासू कहते थे। इस पर अधिक चुंगी देनी होती थी। इसे सायर कहते थे।

राज्यों की सीमा से गुजरने वाले सामान को बहतीवान कहा जाता था। इस पर बहुत कम शुल्क लगता था जिसे राहदारी कहते थे। राज्य में आने वाले माल को आमद कहा जाता था इस पर निकासू माल की अपेक्षा कम चंुगी लगती थी। इनके अतिरिक्त मापा, दलाली तथा परगना शुल्क भी लगता था।

जागीरदारों को भी शुल्क देना पड़ता था। हर राज्य में अपनी चुंगी पद्धति होती थी। अनाज आदि वस्तुओं पर प्रति बैल, ऊँट अथवा खच्चर पर लदे हुए बोझ के हिसाब से चुंगी ली जाती थी, न कि सामान के मूल्य के आधार पर। किराणा सम्बन्धी वस्तुओं पर भी सामान के वजन के हिसाब से चुंगी ली जाती थी। मनिहारी के सामान पर सामान के मूल्य के आधार पर चुंगी ली जाती थी।

मुद्रा

व्यापार एवं विपणन के लिये राजपूताने में मुद्रा का प्रयोग अत्यंत प्राचीन काल से होता आया है। मध्यकाल में विभिन्न राज्यों में विभिन्न प्रकार की मुद्राएं प्रचलित थीं। इनके आकार, तोल एवं मूल्य में भिन्नताएं थीं। महारणा कुंभा के समय से पहले भी राजपूताने में सोने, चांदी और ताम्बे के सिक्के प्रचलन में थे जिन्हें टक्का कहते थे।

इनका वजन चार माशा होता था। तुर्कों और मुगलों के समय में दिल्ली सल्तनत और मुगलों के सिक्के चलन में आ गये जिनको फिरोज आलमशाही, शालमशाही, नौरंगशाही और अकबरी सिक्के कहते थे। इनमें चांदी की मात्रा अधिक होती थी। उस समय में ताम्बे के पैसे को फदिया, ढीगला तथा ढब्बूशाही सिक्का कहा जाता था।

मुगल शासकों के समय में लगभग समस्त राजपूत राजाओं के पास सिक्का ढालने का अधिकार नहीं रहा किंतु मुगलों के कमजोर पड़ते ही समस्त राज्यों ने अपने-अपने सिक्के ढालने आरम्भ कर दिये। बड़े राज्यों में कुछ बड़े जागीरदारों को भी सिक्का ढालने की अनुमति दे दी गई।

मेवाड़ में सलूम्बर के जागीरदार को तथा मारवाड़ राज्य में कुचामन के जागीरदार को सिक्का ढालने का अधिकार दिया गया। समस्त राज्यों में राजपूताने के समस्त राज्यों के सिक्कों को स्वीकार किया जाता था किंतु उनकी विनिमय दर अलग-अलग होती थी तथा एक्सचेंज के बदले में सिक्के के वास्तविक मूल्य में से बट्टा काट लिया जाता था। विनिमय दर समय-समय पर घटती-बढ़ती रहती थी। इसका मूल कारण सट्टा होता था। साहूकारों द्वारा सिक्का विनिमय किये जाने के अवसर पर लोगों को ठगा जाता था।

हुण्डी

वस्तुओं के आयात-निर्यात का भुगतान हुण्डी प्रथा से होता था। इसे आज के बैंकरर्स चैक अथवा ड्राफ्ट की तरह समझा जा सकता है। जब एक स्थान से दूसरे स्थान पर रुपयों की आवश्यकता होती थी तब हुण्डी के द्वारा भुगतान भेजा जाता था। इस राशि पर 16 प्रतिशत मासिक ब्याज देना होता था। हुण्डी प्रायः मुद्दती होती थी इस कारण उस पर ब्याज अधिक लिया जाता था।

ब्याज

उस अवधि में सामान्यतः 9 से 12 प्रतिशत ब्याज दर प्रचलित थी। साहूकार बढ़ी हुई दरों पर कर्ज देकर मूल से देकर मूल से भी अधिक ब्याज वसूल कर लेते थे। और गरीब किसाना का सर्वस्व लूट लेते थे। परंतु कहीं-कहीं आध रुपया तो कहीं एक रुपया प्रति सैंकड़ा के हिसाब से काटा लिया जाता था और कटवामिति ब्याज लिया जाता था। बड़े मंदिरों के पुजारी भी ब्याज पर रुपया उधार दिया करते थे।

निष्कर्ष

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि राजपूत राज्यों की अर्थव्यवस्था में कई प्रकार के उद्योग धंधे विकसित अवस्था में थे जिसके कारण लोगों को रोजगार की विशेष कठिनाई नहीं थी तथा लोगों की आय भी संतोषजनक थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य आलेख – राजपूत राज्यों का प्रशासन, समाज एवं अर्थव्यवस्था

राजपूत राज्यों का प्रशासन

राजपूतों का राजस्व प्रशासन

राजपूतों की न्यायिक व्यवस्था

राजपूतों का सैन्य प्रबन्धन

राजपूत राज्यों की अर्थव्यवस्था

जनपद राज्य और प्रथम मगधीय साम्राज्य (अध्याय 10)

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जनपद राज्य

जनपद राज्य

वैदिक आर्यों ने जन अर्थात् कबीलों की स्थापना की थी। जन का आकार बढ़ने एवं नगरीय जीवन का प्रादुर्भाव होने से, बड़े राज्यों अर्थात् जनपद राज्य का उदय हुआ। धीरे-धीरे लोगों की निष्ठा जन अथवा अपने कबीले के प्रति नहीं रहकर उस जनपद राज्य के प्रति हो गई जिसमें वे बसे हुए थे। एक जनपद पर एक राजा का शासन होता था।

महाजनपद

छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व में अधिकांश जनपद राज्य अपना आकार बढ़ाने लगे जिससे महाजनपदों की स्थापना हुई। छोटे-छोटे जनपद राज्य बड़े महाजनपदों में समाहित होने लगे। अधिकतर महाजनपद विंध्य के उत्तर में स्थित थे और भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा से लेकर पूर्व में बिहार तक फैले हुए थे। इनमें मगध, कोसल, वत्स और अवन्ति काफी शक्तिशाली राज्य थे। सबसे पूर्व की ओर अंग जनपद था जो बाद में मगध में समाहित हो गया।

महात्मा बुद्ध के जीवन काल (563 ई.पू. से 483 ई.पू.) में भारत में 16 महाजनपद थे। इनके नाम इस प्रकार से हैं- (1) अंग, (2) मगध, (3) काशी, (4) कोसल, (5) वज्जि, (6) मल्ल, (7) चेदि, (8) वत्स, (9) कुरु, (10) पांचाल, (11) मत्स्य, (12) सूरसेन, (13) अश्मक, (14) अवन्ति, (15) गान्धार, (16) काम्बोज।

महाजनपदों का थोड़ा-बहुत इतिहास पुराणों में यत्र-तत्र मिलता है किंतु वह शृंखलाबद्ध नहीं है। पुराणों में मिलने वाली बहुत सी सूचनाएं विरोधाभासी हैं। महाजनपदों के साथ-साथ अनेक छोटे-छोटे स्वतंत्र एवं अर्द्धस्वतंत्र राज्य एवं गणराज्य भी अस्तित्व में थे जिनमें परस्पर द्वेष होने के कारण प्रायः युद्ध हुआ करते थे। भारत में महाजनपद छठी शताब्दी ई.पू. से लेकर चौथी शताब्दी ई.पू. तक अपना अस्तित्व बनाये रहे।

(1) अंग

यह राज्य मगध के पश्चिम में था। मगध और अंग के बीच में चम्पा नदी बहती थी। अंग की राजधानी चम्पा भी चम्पा नदी के तट पर स्थित थी। बुद्ध कालीन छः बड़े नगरों में चम्पा की गणना की जाती थी। पहले राजगृह भी अंग राज्य का ही हिस्सा था किंतु बाद में अंग राज्य, मगध में मिल गया।

(2) मगध

मगध राज्य में आधुनिक पटना तथा गया जिले और शाहाबाद जिले के कुछ भाग सम्मिलित थे। यह अपने समय का सबसे प्रमुख राज्य था। बुद्ध से पूर्व, बृहद्रथ तथा जरासंध इस राज्य के प्रसिद्ध राजा हुए। प्रारंभ में मगध की राजधानी गिरिब्रज थी किंतु बाद में पाटलिपुत्र हो गई।

(3) काशी

वैशाली के पश्चिम में काशी जनपद था जिसकी राजधानी वाराणसी थी। राजघाट में की गई खुदाई से पता चलता है कि यह बस्ती 700 ई.पू. के आसपास बसनी आरम्भ हुई। ईसा पूर्व छठी सदी में इस नगरी को मिट्टी की दीवार से घेरा गया था। अनुमान होता है कि आरम्भ में काशी सबसे शक्तिशाली राज्य था परन्तु बाद में इसने कोसल की शक्ति के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।

(4) कोसल

कोसल जनपद के अंतर्गत पूर्वी उत्तर प्रदेश का समावेश होता था। इसकी राजधानी श्रावस्ती थी। इसे उत्तर-प्रदेश के गोंडा और बहराइच जिलों की सीमा पर स्थित सहेठ-महेठ स्थान के रूप में पहचाना गया है। खुदाई से जानकारी मिली है कि ईसा पूर्व छठी सदी में यहाँ कोई बड़ी बस्ती नहीं थी।

कोसल में एक महत्त्वपूर्ण नगरी अयोध्या भी थी, जिसका सम्बन्ध रामकथा से जोड़ा जाता है किंतु इस स्थान पर अब तक हुए उत्खनन में, ईसा पूर्व छठी सदी की किसी भी बस्ती का पता नहीं चलता है। कोसल में शाक्यों का कपिलवस्तु गणराज्य भी सम्मिलित था। यहीं बुद्ध पैदा हुए थे। राजधानी कपिलवस्तु की खोज, बस्ती जिले के पिपरहवां स्थान पर हुई है। उनकी दूसरी राजधानी पिपरहवा से 15 किलोमीटर दूर नेपाल में लुम्बिनी स्थान पर थी।

(5) वज्जि संघ

गंगा के उत्तर में तिरहुत संभाग में वज्जियों का राज्य था। वह आठ जनों का संघ था। इनमें लिच्छवि सर्वाधिक शक्तिशाली थे। इनकी राजधानी वैशाली थी। वैशाली को आधुनिक वैशाली जिले के बसाढ़ गांव के रूप में पहचाना जाता है। पुराण, वैशाली को अधिक प्राचीन नगरी घोषित करते हैं परन्तु पुरातात्त्विक साक्ष्यों के अनुसार बसाढ़ की स्थापना ईसा पूर्व छठी शताब्दी के पहले नहीं हुई थी।

(6) मल्ल

कोसल के पड़ोस में मल्लों का गणराज्य था, इसकी सीमा वज्जी राज्य की उत्तरी सीमा से जुड़ी हुई थी। मल्लों की एक राजधानी कुसीनारा में थी जहाँ बुद्ध का निधन हुआ था। कुसीनारा की पहचान देवरिया जिले के कसियां स्थान से की गई है। मल्लों की दूसरी राजधानी पावा में थी।

(7) चेदि

आधुनिक बुंदेलखण्ड तथा उसका सीमपवर्ती प्रदेश इसके अंतर्गत था। इसकी राजधानी शक्तिमती थी। जातकों में वर्णित सोत्थवती यही नगरी थी। चेदि राज्य का महाभारत में भी उल्लेख है। शिशुपाल यहीं का राजा था जिसका भगवान श्रीकृष्ण ने शिरोच्छेदन किया था।

(8) वत्स

पश्चिम की ओर, यमुना के तट पर, वत्स जनपद था जिसकी राजधानी कौशाम्बी थी। वत्स लोग वही कुरुजन थे जो हस्तिनापुर छोड़कर प्रयाग के समीप कोशाम्बी में आकर बसे थे। कौशाम्बी को इसलिए पसंद किया गया क्योंकि यह स्थल गंगा-यमुना के संगम के निकट था। उत्खननों से ज्ञात हुआ है कि ईसा पूर्व छठी सदी में राजधानी कौशाम्बी की मजबूत किलेबन्दी की गई थी।

(9) कुरु

वर्तमान दिल्ली तथा मेरठ के समीपवर्ती प्रदेश कुरुराज्य के अंतर्गत थे। इसकी राजधानी इन्द्रप्रस्थ थी। महमूतसोम जातक के अनुसार इस राज्य में तीन सौ संघ थे। पाली ग्रंथों के अनुसार यहाँ के शासक युधिष्ठिता गोत्र के थे। हस्तिनीपुर नामक एक अन्य प्रमुख नगर भी इसी राज्य में था।

संभवतः महाभारत कालीन हस्तिनापुर ही अब हस्तिनीपुर कहलाने लगा था। जैनों के उत्तराध्ययन सूत्र में इक्ष्वाकु नामक राजा का नाम मिलता है जो कुरु प्रदेश का राजा था। इस राज्य में पहले राजतंत्रात्मक शासन था किंतु बाद में यहां गणतंत्र की स्थापना हो गई।

(10) पांचाल

वर्तमान रुहेलखण्ड तथा उसके समीप के जिले पांचाल प्रदेश में आते थे। यह दो भागों में विभक्त था। इनमें से उत्तर-पांचाल की राजधानी अहिच्छत्र थी तथा दक्षिण-पांचाल की राजधानी काम्पिल्य थी।

(11) मत्स्य

इसकी राजधानी विराट नगर थी। यह यमुना के पश्चिम में तथा कुरु देश के दक्षिण में स्थित था। पहले तो चेदि राज्य ने मत्स्य राज्य पर अपना अधिकार जमाया, उसके बाद मगध ने मत्स्य राज्य को अपने अधीन कर लिया।

(12) सूरसेन

सूरसेन राज्य यमुना के किनारे था। मथुरा इसकी राजधानी थी। बुद्ध के समय अवन्तिपुत्र मथुरा का राजा था। यहां पहले गणतंत्र राज्य था किंतु बाद में इसमें राजतंत्र की स्थापना हुई। मेगस्थनीज के समय तक सूरसेन वंश के राजा शांति से शासन करते थे।

(13) अश्मक

दक्षिण भारत की प्रमुख नदी गोदावरी के तट पर अश्मक राज्य स्थित था। यह भारत का प्रमुख राज्य था तथा पोतन इसकी राजधानी थी। पुराणों के अनुसार इस राज्य के राजा इक्ष्वाकु वंश के थे। एक जातक के अनुसार किसी समय यह राज्य काशी के निकट था।

(14) अवन्ति

मध्य मालवा और मध्य प्रदेश के सीमावर्ती नगरों में अवन्ति राज्य स्थित था। इस राज्य के दो भाग थे, उत्तरी भाग की राजधानी उज्जैन में थी और दक्षिण भाग की महिष्मती में। उत्खननों से जानकारी मिली है कि ईसा पूर्व छठी सदी से ये दोनों नगर महत्त्व प्राप्त करते गए। अंततोगत्वा उज्जैन ने महिष्मती को पछाड़ दिया। उज्जैन में बड़े पैमाने पर लौहकर्म का विकास हुआ और इसकी मजबूत किलेबन्दी की गई।

(15) गांधार

गांधार राज्य में तक्षशिला, काश्मीर तथा पश्चिमोत्तर प्रदेश सम्मिलित थे। कुंभकार जातक के अनुसार तक्षशिला इसकी राजधानी थी। बुद्ध के समय पुमकुसाती गांधार का राजा था।

(16) काम्बोज

यह गांधार के पड़ौस में स्थित था। हाटक इसकी राजधानी थी। कुछ समय पश्चात् यहां भी गणतंत्र की स्थापना हुई।

ब्राह्मण धर्म के प्रति क्षत्रियों का विद्रोह

महाजनपद काल में क्षत्रियों का ब्राह्मण धर्म के प्रति विद्रोह हुआ। इस विद्रोह के चलते बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म का प्रादुर्भाव हुआ। इन धर्मों की स्थापना करने वाले क्षत्रिय राजकुमार थे। इन धर्मों की स्थापना के फलस्वरूप भारत में वैदिक चिंतन से अलग, नये रूपों में धार्मिक चिंतन की परम्पराएं आरम्भ हुईं। बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म के उत्थान का इतिहास अन्य पुस्तक में यथा-स्थान लिखा गया है।

मगध साम्राज्य की स्थापना और विस्तार

ईसा पूर्व छठी सदी के आगे का भारत का राजनीतिक इतिहास जनपद राज्यों में प्रभुता के लिए हुए संघर्ष का इतिहास है। मगध राज्य ने इस संघर्ष में प्रमुख भूमिका निभाई। अंततः मगध राज्य ने कई जनपदों को परास्त कर अपने भीतर मिला लिया तथा वह भारत का सबसे शक्तिशाली राज्य बन गया। इस प्रकार मगध साम्राज्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हो गया।

हर्यक वंश

इतिहासकारों के अनुसार हर्यक वंश के राजा बिम्बिसार ने मगध साम्राज्य की स्थापना की। इस वंश के तीन प्रमुख राजाओं- बिम्बिसार, अजातशत्रु तथा उदायिन् के पश्चात् कुछ निर्बल शासकों ने भी मगध पर शासन किया।

बिम्बिसार

बिम्बिसार के शासनकाल में मगध ने पर्याप्त उन्नति की। वह महात्मा बुद्ध का समकालीन था। उसके द्वारा विजय और विस्तार की नीति आरम्भ की गई। बिम्बिसार ने अंग देश पर अधिकार कर लिया और अंग देश का शासन अपने पुत्र अजातशत्रु को सौंप दिया।

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बिम्बिसार ने वैवाहिक सम्बन्धों से भी अपनी स्थिति को मजबूत बनाया। उसने तीन विवाह किए। उसकी प्रथम पत्नी कोसल के राजा की पुत्री और प्रसेनजित की बहन थी। कोसलदेवी के साथ दहेज के रूप में प्राप्त काशी ग्राम से उसे एक लाख रुपये की आय होती थी। इससे पता चलता है कि उस काल में राजस्व, मुद्राओं में वसूल किया जाता था। इस विवाह से कोसल के साथ उसकी शत्रुता समाप्त हो गई और दूसरे राज्यों से निबटने के लिए उसे छुट्टी मिल गई। उसकी दूसरी पत्नी वैशाली की लिच्छवि राजकुमारी चल्हना थी और तीसरी रानी पंजाब के मद्रकुल के मुखिया की पुत्री थी। विभिन्न राजकुलों से वैवाहिक सम्बन्धों के कारण बिम्बिसार को अत्यधिक राजनीतिक प्रतिष्ठा मिली। इससे मगध राज्य के पश्चिम और उत्तर की ओर विस्तार का मार्ग प्रशस्त हुआ। मगध की असली शत्रुता अवन्ति से थी। उस समय चण्डप्रद्योत महासेन अवन्ति का राजा था। मगध के राजा बिम्बिसार ने उस पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध का संभवतः कोई परिणाम नहीं निकला इस पर दोनों राजाओं ने मित्र बन जाना ही उपयुक्त समझा। बाद में चण्डप्रद्योत जब पीलिया से पीड़ित हुआ तो बिम्बिसार ने अपने राजवैद्य जीवक को उज्जैन भेजा।

चण्डप्रद्योत को गांधार के राजा के साथ हुए युद्ध में भी विजय नहीं मिली किन्तु गांधारराज ने बिम्बिसार के पास एक पत्र और दूत-मंडली भेजकर उससे मित्रता कर ली। इस प्रकार विजय और कूटनीति से बिम्बिसार ने मगध को ईसा पूर्व छठी सदी में सर्वशक्तिमान राज्य बना दिया। उसके राज्य में 80,000 गांव थे।

मगध की आरंभिक राजधानी राजगीर में थी, उस समय इसे गिरिव्रज कहते थे। यह स्थल पांच पहाड़ियों से घिरा हुआ था और इनके खुले भागों को पत्थरों की दीवारों से चारों ओर से घेर दिया गया था। इन पहाड़ियों ने राजगीर को अजेय बना दिया। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार बिम्बिसार ने 544 ई.पू. से 492 ई.पू. तक (लगभग बावन साल) शासन किया।

अजातशत्रु

बिम्बिसार के बाद उसका पुत्र अजातशत्रु (492 ई.पू. से 460 ई.पू.) मगध के सिंहासन पर बैठा। उसने अपने पिता बिम्बिसार की हत्या करके सिंहासन पर अधिकार किया। उसके शासनकाल में मगध के राजकुल का वैभव अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच गया। उसने दो लड़ाइयाँ लड़ीं और तीसरी के लिए तैयारियां कीं।

अजातशत्रु ने विस्तार की आक्रामक नीति से काम लिया। उसकी इस नीति का काशी और कोसल ने मिलकर प्रतिरोध किया। मगध ओर कोसल के बीच लंबे समय तक संघर्ष जारी रहा। अंत में अजातशत्रु की विजय हुई। कोसल नरेश को अजातशत्रु के साथ अपनी पुत्री का विवाह करने और अपने जामाता को काशी सौंपकर समझौता करने के लिए विवश होना पड़ा।

अजातशत्रु ने वैवाहिक सम्बन्धों का कोई लिहाज नहीं रखा। यद्यपि उसकी माँ लिच्छवि राजकुमारी थी तथापि उसने वैशाली पर आक्रमण किया। बहाना यह ढूंढा गया कि लिच्छवि कोसल के मित्र हैं। उसने लिच्छवियों में फूट डालने के लिए षड्यंत्र रचा, और अंत में उन पर आक्रमण करके उनके स्वातंत्र्य को नष्ट कर दिया।

वैशाली को नष्ट करने में उसे सोलह साल का लंबा समय लगा। अंत में उसे इसलिए सफलता मिली क्योंकि उसने पत्थरों को फेंक सकने वाले प्रस्तर-प्रक्षेपक जैसे एक युद्ध-यंत्र का उपयोग किया। उसके पास एक ऐसा रथ था, जिसमें गदा जैसा हथियार जुड़ा हुआ था। इससे युद्ध में लोगों को बड़ी संख्या में मारा जा सकता था।

काशी और वैशाली को मिला लेने के बाद मगध साम्राज्य का और अधिक विस्तार हुआ। अजातशत्रु की तुलना में अवन्ति का शासक अधिक शक्तिशाली था। अवन्तों ने कौशाम्बी के वत्सों को हराया था और अब वे मगध पर आक्रमण करने की धमकी दे रहे थे। इस खतरे का सामना करने के लिए अजातशत्रु ने राजगीर की किलेबन्दी की, इन दीवारों के अवशेष आज भी देखने को मिलते हैं परन्तु अजातशत्रु के जीवनकाल में अवन्ति को मगध पर आक्रमण करने का अवसर नहीं मिला।

उदायिन्

अजातशत्रु के बाद उदायिन् (460-444 ई.पू.) मगध की गद्दी पर बैठा। उसने पटना में गंगा और सोन के संगम पर एक दुर्ग बनवाया। पटना, मगध साम्राज्य के केन्द्र में स्थित था। मगध का साम्राज्य अब उत्तर हिमालय से लेकर दक्षिण में छोटा नागपुर की पहाड़ियों तक फैला हुआ था। पटना की स्थिति, सामरिक दृष्टि से बड़े महत्त्व की थी।

शिशुनाग वंश

मगध के राज्याधिकारियों द्वारा हर्यक वंश के अंतिम शासक नागदासक को सिंहासन से उतार कर बनारस के प्रांतपति शिशुनाग को मगध का शासक बनाया गया। उसने 18 वर्ष तक मगध पर शासन किया। उसका वंश शिशुनाग के नाम से प्रसिद्ध हुआ। अवन्ति की शक्ति को तोड़ देना शिशुनाग की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

इसके बाद से अवन्ति राज्य, मगध साम्राज्य का भाग बन गया और मौर्य साम्राज्य के अंत समय तक बना रहा। शिशुनाग के बाद कालाशोक अथवा काकवर्ण मगध का राजा हुआ। उसने 28 वर्ष शासन किया। कालाशोक के शासन के 10वें वर्ष में दूसरी बौद्ध संगीति हुई। कालाशोक की हत्या गले में छुरा मारकर की गई।

कालाशोक के बाद उसके 10 पुत्रों ने एक-एक करके कुल 22 वर्ष तक मगध पर शासन किया। शिशुनाग राजा अपनी राजधानी को कुछ समय के लिए वैशाली ले गए।

नंद वंश

शिशुनागों के बाद नन्दों का शासन आरम्भ हुआ। इस वंश का संस्थापक महापद्म था जिसके बारे में इतिहासकारों की धारणा है कि वह शूद्र माता के गर्भ से उत्पन्न हुआ था। जैन ग्रंथ परिशिष्टपर्वन् के अनुसार वह नापित पिता तथा वेश्या माता के गर्भ से उत्पन्न हुआ था।

माना जाता है कि उसने शिशुनागवंश के अंतिम राजा की धोखे से हत्या करके मगध के शासन पर अधिकार जमा लिया। कर्टिअस आदि इतिहासकारों के अनुसार महापद्म नंद ने कालाशोक की ही हत्या की थी तथा कालाशोक के दस पुत्रों ने महापद्म नंद के संरक्षण में 22 वर्ष तक शासन किया।

बाद में महापद्मनंद ने मगध का शासन हथिया लिया। महाबोधि वंश में महापद्मनंद का नाम उग्रसेन भी मिलता है। महापद्मनंद ने 28 साल तक शासन किया। उसके बाद उसके 8 पुत्रों ने 12 वर्ष तक शासन किया।

नंद मगध के सबसे शक्तिशाली शासक सिद्ध हुए। इनका शासन इतना शक्तिशाली था कि सिकंदर ने, जो उस समय पंजाब पर आक्रमण कर चुका था, पूर्व की ओर आगे बढ़ने का साहस नहीं किया। नन्दों ने कलिंग को जीतकर मगध की शक्ति को बढ़ाया, विजय के स्मारक रूप में वे कलिंग से जिन की मूर्ति उठा लाए थे।

ये समस्त घटनाएं महापद्म नन्द के शासन काल में घटित हुईं। उसने अपने को एकराट् कहा है। अनुमान होता है कि उसने न केवल कलिंग पर अधिकार किया, अपितु उसके विरुद्ध विद्रोह करने वाले कोसल को भी हथिया लिया।

नन्द शासक अत्यंत धनी और बड़े शक्तिशाली थे। उनकी सेवा में 2,00,000 पदाति, 60,000 घुड़सवार और 6,000 हाथी थे। इतनी विशाल सेना का रख-रखाव एक अच्छी और प्रभावी कराधान प्रणाली से ही सम्भव है। परवर्ती नन्द शासक दुर्बल और अप्रिय सिद्ध हुए।

मगध की सफलता के कारण

मौर्यों के उत्थान के पहले की दो सदियों में मगध साम्राज्य के रूप में भारत में सबसे बड़े राज्य की स्थापना बिम्बिसार, अजातशत्रु और महापद्मनंद जैसे कई साहसी और महत्त्वाकांक्षी शासकों के प्रयासों से हुई। उन्होंने अपने राज्यों का निरंतर विस्तार किया और उसे सशक्त बनाया परन्तु मगध के विस्तार का यही एक कारण नहीं था। कुछ दूसरे महत्त्वपूर्ण कारण भी थे।

लोहे के समृद्ध भण्डार मगध की आरंभिक राजधानी राजगीर के निकट स्थित थे। इस कारण मगध के शासक अपनी सेना के लिये लिए प्रभावी हथियार बनवा सके। उनके शत्रु सरलता से ऐसे हथियार प्राप्त नहीं कर सकते थे। लोहे की खानें पूर्वी मध्यप्रदेश में भी मिलती हैं, जो उज्जैन के अवन्ति राज्य से अधिक दूर नहीं थी।

500 ई.पू. के आसपास उज्जैन में निश्चय ही लोहे को गलाने और तपाकर ढालने का भी काम होता था। वहाँ के लौहार अच्छी किस्म के हथियार तैयार करते थे। यही कारण है कि उत्तर भारत की प्रभुता के लिए अवन्ति और मगध के बीच कड़ा संघर्ष हुआ। उज्जैन पर अधिकार करने में मगध को लगभग सौ साल का समय लगा।

मगध के लिए कुछ और भी अनुकूल परिस्थितियाँ थी। मगध की दोनों राजधानियाँ- पहली राजगीर और दूसरी पाटलिपुत्र, सामरिक दृष्टि से अत्यंत सुरक्षित स्थानों पर थीं। राजगीर पांच पहाड़ियों के एक समूह से घिरा होने के कारण दुर्भेद्य थी। तोपों का आविष्कार बहुत बाद में हुआ। उन दिनों राजगीर जैसे दुर्ग को तोड़ना सरल काम नहीं था।

ईसा पूर्व पांचवीं सदी में मगध के शासक अपनी राजधानी पाटलिपुत्र ले गए। केन्द्र भाग में स्थित इस स्थल के साथ समस्त दिशाओं से संचार-सम्बन्ध स्थापित किए जा सकते थे। पाटलिपुत्र गंगा, गंडक और सोन नदियों के संगम पर स्थित था। पाटलिपुत्र से थोड़ी दूरी पर सरयू नदी भी गंगा से मिलती थी।

पूर्व-औद्योगिक दिनों में, जब संचार में बड़ी कठिनाइयाँ थीं, नदी मार्गों का अनुसरण करते हुए सेना उत्तर, पश्चिम, दक्षिण, और पूर्व की ओर आगे बढ़ती थी। इसके अतिरिक्त लगभग चारों ओर से नदियों द्वारा घिरे होने के कारण पटना की स्थिति भी अभेद्य बन गई थी।

सोन और गंगा इसे उत्तर तथा पश्चिम की ओर से घेरे हुए थीं, तो पुनपुन इसे दक्षिण और पूर्व की ओर से घेरे हुए थी। इस प्रकार, पाटलिपुत्र सही अर्थों में एक जलदुर्ग था। उन दिनों इस नगर पर अधिकार करना सरल नहीं था।

मगध राज्य मध्य गंगा के मैदान में स्थित था। इस अत्यधिक उपजाऊ प्रदेश से जंगल साफ हो चुके थे। भारी वर्षा होती थी, इसलिए सिंचाई के बिना भी इलाके को उत्पादक बनाया जा सकता था। प्राचीन बौद्ध ग्रंथों के उल्लेखों के अनुसार इस प्रदेश में कई प्रकार के चावल पैदा होते थे। प्रयाग के पश्चिम की ओर के प्रदेश की अपेक्षा यह प्रदेश कहीं अधिक उपजाऊ था। परिणामतः यहाँ के किसान काफी अतिरिक्त अनाज पैदा करते थे जिसे शासक अपनी सेना के लिये एकत्रित कर लेते थे।

मगध के शासकों ने नगरों के उत्थान और मुद्राचलन से भी लाभ उठाया। उत्तर-पूर्वी भारत में व्यापार-वणिज्य की वृद्धि के कारण शासक पण्य-वस्तुओं पर मार्ग-कर लगा सकते थे और इस प्रकार अपनी सेना के खर्च के लिए धन एकत्र कर सकते थे। सैनिक संगठन के मामले में मगध को एक विशेष सुविधा प्राप्त थी।

भारतीय राज्य घोड़े और रथ के उपयोग से भलीभांति परिचित थे किंतु मगध ही पहला राज्य था जिसने अपने पड़ोसियों के विरुद्ध हाथियों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया। देश के पूर्वी भाग से मगध के शासकों के पास हाथी पहुंचते थे। यूनानी स्रोतों से जानकारी मिलती है कि नन्दों की सेना में 6000 हाथी थे।

दुर्गों को भेदने, सड़कों तथा यातायात की दूसरी सुविधाओं से रहित प्रदेशों और कच्छी क्षेत्रों में हाथियों का उपयोग किया जा सकता था। इन्हीं सब कारणों से मगध को दूसरे राज्यों को हराने और भारत में प्रथम साम्राज्य स्थापित करने में सफलता मिली।

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

पश्चिमी देशों से भारत का सम्पर्क (अध्याय 11)

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पश्चिमी देशों से भारत का सम्पर्क

मानव सभ्यता के प्रथम चरण में घुमक्कड़ प्रवृत्ति का था। वह छोटे-छोटे समूहों में दूर-दूर तक यात्राएं किया करता था और शिकार करके अपना पेट भरता था। इस कारण पश्चिमी देशों से भारत का सम्पर्क अत्यंत प्राचीन काल से था।

उत्तर-पूर्व भारत के छोटे रजवाड़ों और गणराज्यों का विलयन धीरे-धीरे मगध साम्राज्य में हो गया परन्तु उत्तर-पश्चिम भारत की स्थिति ईसा पूर्व छठी शताब्दी के पूर्वार्र्द्ध के दौरान भिन्न थी। कम्बोज, गांधार और मद्र आदि अनेक छोटे-छोटे राज्य परस्पर संघर्षरत रहते थे।

इस क्षेत्र में मगध जैसा कोई शक्तिशाली साम्राज्य नहीं था जो इन परस्पर संघर्षरत राज्यों को एक संगठित साम्राज्य के अधीन कर सके। यह क्षेत्र पर्याप्त समृद्ध था तथा हिन्दुकुश के दर्रों से इस क्षेत्र में बाहर से सरलता से घुसा जा सकता था।

ईरानी राजाओं का भारत पर अधिकार

530 ई.पू. से कुछ पहले, ईरान के हखामनी सम्राट साइरस ने हिन्दुकुश पर्वत को पार करके काम्बोज तथा गांधार को अपने अधीन किया। ईरानी शासक दारयवह (देरियस) प्रथम 516 ई.पू. में उत्तर-पश्चिम भारत में घुस गया। उसने पंजाब, सिन्धु नदी के पश्चिमी क्षेत्र और सिन्धु को जीत कर अपने साम्राज्य में मिला लिया।

हखमानी अभिलेखों में गांधार और हिंदुश (सिंधु) का उल्लेख क्षत्रपियों (प्रांतों) के रूप में हुआ है। हेरोडोटस ने लिखा है कि गांधार हखामनी साम्राज्य का बीसवां क्षत्रपी था। फारस साम्राज्य में कुल अट्ठाईस क्षत्रपी थे। भारतीय क्षत्रपी में सिन्ध, उत्तर-पश्चिम सीमावर्ती इलाका तथा पंजाब का सिन्धु नदी के पश्चिम वाला हिस्सा सम्मिलित था।

यह क्षेत्र फारस साम्राज्य का सर्वाधिक जनसंख्या वाला तथा उपजाऊ हिस्सा था। यह क्षेत्र 360 टैलण्ट (मुद्रा तथा भार का एक प्राचीन माप) सोना भेंट देता था, जो फारस के समस्त एशियायी प्रांतों से मिलने वाले मूल राजस्व का एक तिहाई था। पांचवी शताब्दी ई.पू. में फारसी सेना को यूनानियों के विरुद्ध सैनिकों की आवश्यकता होती थी जिसकी पूर्ति गांधार से की जाती थी।

दायबहु के उत्तराधिकारी क्षयार्ष (जरसिस) ने यूनानियों के खिलाफ लम्बी लड़ाई लड़ने के लिये भारतीयों को अपनी सेना में सम्मिलित किया। भारत पर सिकन्दर के आक्रमण तक उत्तर-पश्चिम भारत के हिस्से ईरानी साम्राज्य का अंग बने रहे।

ईरानी सम्पर्क के परिणाम

भारत और ईरान का यह सम्पर्क लगभग 200 सालों तक बना रहा। इसने भारत और ईरान के बीच व्यापार को बढ़ावा दिया। इस सम्पर्क के सांस्कृतिक परिणाम और भी महत्त्वपूर्ण थे। ईरानी लेखक (कातिब) भारत में लेखन का एक विशेष रूप ले आये थे जो आगे चलकर खरोष्ठी लिपि के नाम से विख्यात हुआ। यह लिपि अरबी की तरह दायीं से बायीं ओर लिखी जाती थी।

ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में उत्तर-पश्चिमी भारत में अशोक के कुछ अभिलेख इसी लिपि में लिखे गए। यह लिपि तीसरी शताब्दी ईस्वी तक देश में प्रयोग की जाती रही। उत्तर-पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्र में ईरानी सिक्के भी मिलते हैं जिनसे ईरान के साथ व्यापार होने का संकेत मिलता है। 

मौर्य वास्तुकला पर ईरानी प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखलाई पड़ता है। अशोक कालीन स्मारक, विशेषकर घंटी के आकार के शीर्ष, कुछ सीमा तक ईरानी प्रतिरूपों पर आधारित थे। अशोक की राजाज्ञाओं की प्रस्तावना और उनमें प्रयोग किए गए शब्दों में भी ईरानी प्रभाव देखा जा सकता है।

उदारहण के लिए फारसी शब्द- दिपि के लिए अशोक कालीन लेखकों ने शब्द- लिपि का प्रयोग किया। ईरानियों के माध्यम से ही यूनानियों को भारत की महान् सम्पदा के बारे ज्ञात हुआ। इस जानकारी से भारतीय सम्पदा के लिए उनका लालच बढ़ गया और अन्ततोगत्वा भारत पर सिकंदर ने आक्रमण कर दिया।

सिकंदर का भारत पर आक्रमण

चौथी शताब्दी ई.पू. में विश्व पर आधिपत्य को लेकर यूनानियों और ईरानियों के बीच संघर्ष हुए। मकदूनिया (मेसीडोनिया) वासी सिकंदर के नेतृत्व में यूनानियों ने ईरानी साम्राज्य को नष्ट कर दिया। सिकंदर ने न सिर्फ एशिया माइनर (तुर्की) और ईराक को अपितु ईरान को भी जीत लिया।

ईरान पर विजय प्राप्त करने के बाद सिकन्दर काबुल की ओर बढ़ा, जहाँ से 325 ई.पू. में खैबर दर्रा पार करते हुए वह भारत पहुंचा। सिंधु नदी तक पहुँचने में उसे पांच महीने लगे। स्पष्टतः वह भारत के महान् वैभव से आकर्षित था। हेरोडोटस जिसे इतिहास का पिता कहा जाता है तथा अन्य यूनानी लेखकों ने भारत का वर्णन अपार वैभव वाले देश के रूप में किया था।

इस वर्णन को पढ़कर सिकन्दर भारत पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित हुआ। सिकन्दर में भौगोलिक अन्वेषण और प्राकृतिक इतिहास के लिए तीव्र ललक थी। उसने सुन रखा था कि भारत की पूर्वी सीमा पर कैस्पियन सागर ही फैला हुआ है। वह विगत विजेताओं की शानदार उपलब्धियों से भी प्रभावित था।

वह उनका अनुकरण कर उनसे भी आगे निकल जाना चाहता था। उत्तर-पश्चिमी भारत की राजनीतिक स्थिति उसकी योजना के लिए उपयुक्त थी। यह क्षेत्र अनेक स्वतंत्र राजतंत्रों और कबीलाई गण-राज्यों में बंटा हुआ था, जो अपनी भूमि से घनिष्ठ रूप से बंधे हुए थे और जिन रजवाड़ों पर उनका शासन था उनसे उन्हें बड़ा गहरा प्रेम था।

सिकंदर के आक्रमण के समय पश्चिमोत्तर भारत में निम्नलिखित राज्य थे-

अस्पेसियन

यह जाति अबिसंग, कुनार और वजौर नदियों की घाटियों में रहती थी। भारत में इन्हें अश्वक कहते थे।

गरेइअन

यह जाति पंजकौर नदी की घाटी में रहती थी।

अस्सेकेनोज

यह सिंधु नदी के पश्चिम में थी। कुछ विद्वानों ने इसे अश्वक कहा है। मस्सग इनकी राजधानी थी।

नीसा

यह राज्य काबुल नदी और सिंधु नदी के बीच स्थित था।

प्यूकेलाटिस

इसका समीकरण पुष्करावती से किया जाता है। जो पश्चिमी गांधार की राजधानी थी।

तक्षशिला

यह राज्य सिंधु और झेलम नदियों के बीच स्थित था।

असकेज

यह उरशा राज्य था। इसके अंतर्गत आधुनिक हजारा आता है।

अभिसार

इसके अंतर्गत काश्मीर का पश्चिमोत्तर भाग सम्मिलित था।

पुरु राज्य

यह झेलम और चिनाब नदियों के बीच स्थित था। यहां के राजा को यूनानियों ने पोरस कहा है।

ग्लौगनिकाई

इस जाति का राज्य चेनाब नदी के पश्चिम में था।

गैण्डरिस

यह राज्य चेनाब और राबी नदियों के बीच में स्थित था।

अड्रेस्टाई

यह रावी नदी के पूर्व में था।

कठ

यह झेलम और चेनाव के बीच में अथवा रावी और चेनाव के बीच में स्थित था।

सौभूमि राज्य

यह झेलम के तट पर था।

फगलस

यह रावी और व्यास के बीच में था। इसका समीकरण भगल से किया गया है।

सिबोई

यह शिवि जाति थी। यह झेलम और चेनाब के बीच रहती थी।

क्षुद्रक

यह जाति झेलम और चेनाब के संगम के नीचे की भूमि में रहती थी।

मालव

यह रावी के निचले भाग के दाहिनी ओर रहती थी।

अम्बष्ठ

यह मालवों की पड़ौसी जाति थी।

जैथ्राइ

इसका समीकरण क्षत्रि से किया गया है। यह चेनाव और रावी के बीच में रहती थी।

ओस्सेडिआइ

यह वसाति जाति थी जो चिनाव और सिंधु नदियों के बीच में रहती थी।

मौसिकेनोज

यह मूषिक जाति थी जो आधुनिक सिंध में बसी थी।

पैटलीन

यह नगर सिंधु नदी के डेल्टा पर स्थित था।

भारतीय राजाओं में द्वेष

उपरोक्त राज्यों में से अधिकांश राज्य गणराज्य थे। राजतंत्रात्मक राज्यों में तक्षशिला, अभिसार और पुरु राज्य प्रमुख थे। तक्षशिला तथा पुरु राज्य में अत्यधिक द्वेष भाव था। अभिसार नरेश पुरु का मित्र था। अतः अभिसार नरेश की तक्षशिला के राजा अम्भि से शत्रुता थी।

पुरु तथा उसके भतीजे (जो कि उसका पड़ौसी राजा था) में भी अनबन थी। राजतंत्रतात्मक तथा गणतंत्रात्मक राज्यों में भी शत्रुता थी। पुरु और अभिसार नरेशों ने क्षुद्रकों तथा मालव राज्यों से भी शत्रुता कर रखी थी। शाम्ब जाति तथा मूषिक जाति में वैमनस्य था। ऐसी स्थिति में सिकंदर का कार्य सरल हो गया। इस प्रकार सिकंदर ने भारत का प्रवेश द्वार खुला पाया।

सिकंदर का विजयअभियान

327 ई.पू. के बसंत में सिकंदर ने हिन्दुकुश पर्वत को पार कर कोही दामन की शस्य-श्यामला घाटी में प्रवेश किया। बैक्ट्रिया पर आक्रमण करने से पूर्व सिकंदर ने अलेक्जेण्ड्रिया नगर की स्थापना की। यहां से वह निकाई नामक नगर की ओर गया। यहीं पर उसने अपनी सेना का विभाजन किया।

पर्डिक्क्स को पर्याप्त सैन्यबल के साथ काबुल नदी की घाटी के द्वारा सिंधु नदी तक सीधे पहुंचने का आदेश मिला। मार्ग में हस्ती को छोड़कर प्रायः समस्त कबीलों के प्रधानों ने आत्म समर्पण कर दिया। पर्डिक्कस को इस कार्य में तक्षशिला नरेश अम्भी से पर्याप्त सहायता मिली। जब सिकंदर निकाई में ही था, उसी समय तक्षशिला नरेश अम्भी ने हाथियों सहित अनेक बहुमूल्य उपहार नतमस्तक होकर सिकंदर को अर्पित किये और बिना किसी संकोच के उसकी अधीनता स्वीकार कर ली।

दूसरी सेना के साथ सिकंदर ने दुर्गम पार्वतीय पथ का अनुसरण किया। कुनर की विशाल घाटी में स्थित अज्ञात नगर में अज्ञात जाति के लोग रहते थे। उन्होंने सिकंदर का सामना किया तथा एक तीर सिकंदर की बांह में भी लगा। इसके बाद सिकंदर के सेनापति क्रेटरस की सेना ने समस्त नगर वासियों को तलवार के घाट उतार दिया।

वहां से चलकर सिकंदर ने अश्वकों पर आक्रमण किया। अश्वक अपनी राजधानी त्याग कर गिरि कंदराओं में जा छिपे। इसके बाद सिकंदर ने बजौर की घाटी में प्रवेश किया। दूसरे मार्ग से भेजे गये सैन्यदल का भी यहीं पर सिकंदर से मिलन हुआ। इसके बाद सिकंदर न्यासा नगर की ओर बढ़ा। यहां भी सिकंदर का विरोध नहीं हुआ।

न्यासा के लोगों ने सिकंदर की सेना में भर्ती होने की इच्छा प्रकट की। न्यासा के नेता अकुफिस ने सिकंदर को बताया कि मैं तो स्वयं ही यूनानी राजा डियानिस का रक्तवंशी हूँ। इस कारण सिकंदर मेरा सम्राट है। सिकंदर ने न्यासा के पदाति सैनिकों को अपनी सेना में भर्ती करने से मना कर दिया किंतु उसके तीन सौ अश्वारोही अपनी सेना में भरती कर लिये।

इसके बाद सिकंदर कोहेमूर नामक पर्वत की ओर बढ़ा। गौरी नदी (पंजकौर) अपनी गहराई तथा गति की तीव्रता के कारण सिकंदर का मार्ग रोक कर खड़ी हो गई। बड़ी कठिनाई से सिकंदर इस नदी को पार करके मस्सग पहुंचा। मस्सग नगर उस तरफ का सबसे बड़ा नगर था। मस्सग पर चार दिनों तक घेरा पड़ा रहा।

यहां सिकंदर के पैर में तीर लगा। चौथे दिन यूनानियों ने अपने शस्त्रों से मस्सग के राजा को मार गिराया। अपने राजा की मृत्यु के बाद मस्सग के सात सहस्र सैनिकों ने युद्ध क्षेत्र त्याग कर अपने घर जाने का निश्चय किया। सिकंदर ने इन्हें घर लौट जाने की अनुमति दे दी किंतु जब वे सैनिक मस्सग से बाहर निकले तो सिकंदर की सेना ने उनका पीछा करके उन्हें मार डाला। मस्सग की महारानी तथा राजकुमारी को बंदी बना लिया गया।

स्वाात की घाटी का अंतिम युद्ध बजिरा (वीरकोटि) तथा ओरा (उदेग्रम) पर केन्द्रित था। जिस पर अधिकार करके सिकंदर ने सिंधु के पश्चिम पर पूरी तरह अधिकार कर लिया। सिंध के पश्चिम का समस्त भारतीय क्षेत्र निकेनार को देने के बाद सिकंदर पेशावर की घाटी की ओर अग्रसर हुआ। वहां उसे गांधार की राजधानी पुष्कलावती द्वारा अधीनता स्वीकार कर लिये जाने का समाचार मिला।

सिंधु को पार करने से पूर्व सिकंदर को आर्नो पर्वत पर स्थित अस्सकेनोई लोगों से निबटना था। यह स्थान 6600 फुट ऊँची चट्टान पर स्थित था। इसका घेरा 22 मील था। इसकी दक्षिणी सीमा पर सिंधु बहती थी। सिकंदर इस चट्टान को देखकर हताश हो गया किंतु उसके पड़ौस में रहने वाले लोगों ने सिकंदर की अधीनता स्वीकार करके आर्नोस पर सिकंदर का अधिकार करवाना स्वीकार कर लिया।

सिकंदर ने आर्नोस पर्वत के निकट मिट्टी का एक विशाल टीला तैयार किया तथा उस पर चढ़कर सेना आर्नोस तक पहुंचने में सफल हो गई। अब आर्नोस वासियों ने सिकंदर से संधि वार्ता चलाई। सिकंदर ने उनका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। जब आर्नोस के लोग संधि करके रात्रिकाल में अपने नगर को लौट रहे थे, तब सिकंदर के सात सौ सैनिकों ने उन पर आक्रमण कर उन्हें मार दिया और नगर में घुसकर आर्नोस पर भी अधिकार कर लिया। सिकंदर ने वहां पर यूनानी देवताओं की पूजा की।

यहां से सिकंदर ने ओहिन्द के तट पर एक माह का विश्राम किया। यहीं पर तक्षशिला के राजा अम्भि ने सिकंदर को 200 रजत मुद्रायें, 3090 बैल, 1000 भेडें, 700 अश्वारोही एवं 30 हाथी उपहार में भेजे। तक्षशिला का सहयोग मिल जाने से सिकंदर के लिये सिंधु नदी पार करना सुगम हो गया। सिंधु को पार करके सिकंदर निर्भय चलता हुआ तक्षशिला के निकट तक आ गया।

तक्षशिला के द्वार पर उसने रणभेरी बजाने की आज्ञा दी किंतु अम्भि तो पहले से ही उसके स्वागत के लिये खड़ा हुआ था, वह सैन्य रहित होकर अपने मंत्रियों के साथ सिकंदर के शिविर में पहुंचा और उसकी अधीनता स्वीकार कर ली। तीन दिन तक सिकंदर तक्षशिला के राजमहल में बैठकर भोग विलास करता रहा।

तक्षशिला से ही सिकंदर ने पोरस के पास संदेश भेजा कि वह सिकंदर से आकर साक्षात्कार करे। इस पर पोरस ने संदेश भिजवाया कि वह सिकंदर से साक्षात्कार अवश्य करेगा किंतु युद्ध के मैदान में। सिकंदर ने फिलिप को तक्षशिला का क्षत्रप बनाया तथा अपनी सेना को आज्ञा दी कि सिंधु नदी का पुल तोड़कर झेलम पर लगाया जाये।

इसके बाद वह अम्भि के पांच सहस्र सैनिकों को लेकर झेलम की तरफ चल पड़ा। मार्ग में उसने पोरस के भतीजे स्पिटेसीज को पराजित किया तथा झेलम के तट पर जा पहुंचा। झेलम के पूर्वी तट पर सिकंदर की सेना ने अपना शिविर स्थापित किया तथा तट के दूसरी ओर दूर तक पोरस ने अपनी समस्त सेना को एकत्रित किया।

पौरव की सेना 4 सहस्र अश्वारोही, 300 रथ, 200 हाथी तथा 30 हजार पदाति थी। उसके पुत्र की सेना में 2000 पदाति और 120 रथ थे। इस सेना के अतिरिक्त उसकी काफी सेना पीछे के शिविर में थी। सिकंदर की सेना में 35 हजार सिपाही थे जिनमें अश्वारोहियों की संख्या अधिक थी। उस समय पर्वतों पर हिम पिघलने के कारण नदी उफान पर थी। सिकंदर ने पोरस की सेना को भ्रमित किया कि वह नदी में पानी कम होने पर ही नदी पार करेगा।

एक रात जब बहुत वर्षा हो रही थी तब रात्रि में सिकंदर ने अपनी सेना के दो हिस्से किये। एक सेना क्रेटरस के नेतृत्व में नदी के इस ओर पोरस के शिविर के समक्ष खड़ा कर दिया तथा स्वयं 12 हजार सैनिकों को लेकर नदी के किनारे पर स्थित 16 मील दूर चला गया जहां से नदी मुड़ती थी। इससे पोरस की सेना भ्रम में पड़ गई। सिकंदर आराम से 12 हजार सैनिकों को लेकर झेलम के उस पार उतर गया।

वर्षा और रात्रि के कारण पोरस के रथ और धनुष सिकंदर के भाला-धारियों के समक्ष कुछ काम न आ सके। भालों की मार से बचने के लिये पोरस ने राजकुमार के नेतृत्व में अपने हाथियों को सिकंदर के सामने बढ़ाया किंतु सिकंदर के अश्वारोही इस स्थििति के लिये पहले से ही तैयार थे। वे हाथियों के सामने से हट गये तथा दोनों ओर से पार्श्व में आकर पोरव की सेना पर टूट पड़े।

पोरस का पुत्र इस युद्ध में मारा गया। जब यह युद्ध चल ही रहा था तब तक क्रेटरस भी नदी पार करके पोरस की सेना पर टूट पड़ा। हाथियों की जो सेना पोरस ने क्रेटरस का मार्ग रोकने के लिये सन्नद्ध की थी, वे हाथी रात्रि में अचानक आक्रमण हुआ देखकर घबरा गये और पीछे मुड़कर भागे तथा पोरस की सेना को रौंद डाला।

इस पर पोरस ने युद्ध क्षेत्र छोड़ने का निर्णय किया। सिकंदर ने अम्भि को भेजा कि वह पोरस को सम्मान पूर्वक मेरे पास ले आये। अम्भि को देखते ही हाथी पर बैठे पोरस ने उस पर प्रहार किया। इस पर सिकंदर ने अपने यूनानी दूतों को भेजा। उन्होंने पोरस को सिकंदर का संदेश पढ़कर सुनाया। पोरस ने हाथी से नीचे उतर कर पानी पिया। इसके बाद उसे सिकंदर के समक्ष लाया गया।

जिस साहस और विश्वास के साथ पोरस सिकंदर के समक्ष उपस्थित हुआ, उसे देखकर सिकंदर दंग रह गया। सिकंदर ने पूछा कि आपके साथ किस तरह का व्यवहार किया जाये। इस पर पोरस ने जवाब दिया कि जिस तरह का व्यवहार एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है।

सिकंदर ने प्रसन्न होकर उसका राज्य लौटा दिया तथा कुछ अन्य प्रदेश भी उसी को सौंप दिये। यहां पर सिकंदर ने देवों को बलि प्रदान की तथा निकाई एवं बुकेफेला नामक दो नगरों की स्थापना की। उसने क्रेटरस को इस स्थान पर छोड़ दिया ताकि वह यूनानी शासकों के लिये इस स्थान पर एक भव्य दुर्ग का निर्माण कर सके।

चिनाब के तट पर ग्लौचुकायन जाति 37 नगरों में निवास करती थी। सिकंदर ने उन पर आक्रमण करके उन्हें पोरस के अधीन कर दिया। अभिसार के राजा ने अपने भ्राता को उपहारों सहित सिकंदर की सेवा में भेजा किंतु सिकंदर ने निर्देश दिया कि वह स्वयं उपस्थित हो। यहीं पर सिकंदर को संदेश मिला कि अस्सकेनोइ लोगों ने विद्रोह करके वहां के गवर्नर निकेनार को मार डाला।

इस पर सिकंदर ने टिरिस्पेज तथा फिलिप को आदेश दिया कि वह विद्रोह का दमन करे। यहां से सिकंदर ने चिनाब को पार किया। यह नदी काफी चौड़ी थी तथा तीव्र गति से बहती थी। इसलिये इस नदी को पार करने में सिकंदर को भयानक हानि उठानी पड़ी। सिकंदर ने कोनोस को इस क्षेत्र में ही छोड़ दिया। उसने राजा पोरस को आदेश दिया कि वह अपने राज्य को जाये तथा वहां से पांच हजार उत्तम अश्वारोही लेकर आये। इसके बाद सिकंदर रावी की ओर बढ़ा। यह भी काफी चौड़ी नदी थी।

रावी को पार करने के बाद अधृष्ट लोगों ने सिकंदर की अधीनता स्वीकार कर ली। इसके बाद सिकंदर की मुठभेड़ कठों से हुई। कठ लोग प्रसिद्ध योद्धा थे। वे अपनी राजधानी संगल की रक्षा करने के लिये अपने मित्रों के साथ सिकंदर का मार्ग रोकने के लिये तैयार खड़े थे। सिकंदर ने संगल को घेर लिया। इसी समय पोरस अपने 5000 सैनिकों के साथ आ पहुंचा।

इस पर संगल के नागरिकों ने विचार किया कि वे रात्रि के अंधेरे में झील के रास्ते से जंगलों में भाग जायें। सिकंदर ने रात्रि में भागते हुए नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया तथा नगर पर आक्रमण बोल दिया। इस युद्ध में कठों ने यूनानियों को अच्छी तरह भारतीय तलवार का स्वाद चखाया।

कठ तो नष्ट हो गये किंतु यूनानी भी बड़ी संख्या में मारे गये। क्रोध की अग्नि में जलते हुए सिकंदर ने संगल नगरी को जला कर राख कर दिया। मकदूनिया से जो सैनिक अब तक सिकंदर के साथ थे उनमें से अधिकांश संगल में ही मारे गये। इससे मकदूनिया के शेष सिपाहियों का हृदय कांप उठा।

यहां से सिकंदर व्यास नदी के तट पर पहुंचा। इस नदी के उस पार नंदों का विशाल साम्राज्य स्थित था। सिकंदर इस क्षेत्र पर आक्रमण करने को आतुर था किंतु मकदूनिया से आये सिपाहियों ने आगे बढ़ने से मना कर दिया। कोनोस ने इन सिपाहियों का नेतृत्व किया।

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उसने सिकंदर तथा सेना के समक्ष लम्बा भाषण देते हुए कहा कि मकदूनिया से आये सिपाहियों को घर छोड़े हुए छः साल हो चुके हैं। उनमें से अधिकांश मर चुके हैं। बहुत से मकदूनियावासी नये बसाये गये नगरों में छोड़ दिये गये हैं। कई घायल हैं तथा कई बीमार हैं इसलिये वे अब आगे नहीं बढ़ सकते। यदि इन सिपाहियों को उनकी इच्छा के विरुद्ध युद्ध के मैदान में धकेला गया तो सिकंदर को अपने सिपाहियों में पहले वाले वे सैनिक देखने को नहीं मिलेंगे जो मकदूनिया से उसके साथ चले थे। सिकंदर ने अपनी सेना को बहुत समझाया किंतु यूरोप से आये सिपाहियों ने आगे बढ़ने से मना कर दिया। इस पर सिकंदर ने कहा कि वह अकेला ही आगे बढ़ेगा। जिसे लौटना हो लौट जाये तथा जाकर अपने देशवासियों को बताये कि वे अपने राजा को शत्रु के सम्मुख अकेला छोड़कर लौट आये हैं। इस पर भी सेना टस से मस नहीं हुई। सिकन्दर ने दुःख भरे स्वर में कहा- ‘मैं उन दिलों में उत्साह भरना चाहता हूँ जो निष्ठाहीन और कायरतापूर्ण डर से दबे हुए हैं।’ पूरे तीन दिन तक सिकंदर अपने शिविर में बंद रहा किंतु सेना अपने निर्णय पर अड़ी रही। अंत में हारकर सिकंदर को प्रत्यावर्तन की घोषणा करनी पड़ी।

व्यास का तट छोड़कर सिकंदर चिनाव पार करके झेलम पर लौटा। यहां पर वह सौभूति नामक राज्य में गया जो कि कठों के पड़ौसी थे। वहां के शिकारी कुत्तों ने सिकंदर को बहुत प्रभावित किया। झेलम के तट पर सिकंदर ने आठ सौ नौकायें तैयार करवाईं। इसी समय कोनोस बीमार पड़ा और मर गया।

यहां सिकंदर ने अपनी सेना के तीन टुकड़े किये। पहला टुकड़ा जल सेना का था जिसे नियार्कस के नेतृत्व में जल मार्ग से रवाना किया गया। दूसरा टुकड़ा हेफशन के नेतृत्व में था जो सिकंदर की सेना के आगे चलता था। जब सिकंदर किसी सुरक्षित पड़ाव पर पहुंच जाता था तो हेफशन की सेनायें आगे बढ़ जाती थीं। जल सेना सिकंदर के साथ-साथ नदी मार्ग से आगे बढ़ती रहती थी। तीसरा टुकड़ा टालेमी के नेतृत्व में था जो हेफशन की सेना के पीछे-पीछे चलता था और सिकंदर के पृष्ठ भाग को सुरक्षित बनाता था।

झेलम के किनारे-किनारे तीन दिन चलने के बाद सिकंदर क्रेटरस और हिफेशन के शिविरों के निकट पहुंचा। वहीं पर फिलिप भी उससे मिलने के लिये आ गया। यहां से चलकर पांच दिन बाद सिकंदर झेलम और चिनाब के संगम पर आ गया। दोनों नदियों के जल ने भीषण रूप धारण कर रखा था जिससे दो नौकायें डूब गईं।

नियार्कस को मालवों की सीमा पर पहुंचने का आदेश मिला। मालवों की सीमा पर पहुंचने से पहले शिबि लोग सिकंदर से मिले और उन्होंने आत्म समर्पण कर दिया। अलगस्सोई (अग्रश्रेणी) लोगों ने 40 हजार पदाति तथा 3 हजार अश्वारोही सेना के साथ जमकर सिकंदर से मोर्चा लिया। इस युद्ध में भी मकदूनिया के बहुत से सिपाही मरे। उसने अग्रश्रेणी नगर में आग लगवा दी तथा नागरिकों को मार डाला। 3 हजार लोगों ने जीवित रहने की इच्छा व्यक्त की। इस पर उन्हें दास बना लिया गया।

अग्रश्रेणियों को नष्ट करके सिकंदर पचास मील मरुभूमि पार करके मालवों पर जा धमका। मालव गण अचम्भित रह गये। निःशस्त्र लोग निर्दयता पूर्वक तलवार के घाट उतार दिये गये। बहुत से मालवों ने भागने का प्रयास किया। उन्हें पर्डिक्कस ने घेर कर मार डाला। बहुत से मालव भाग कर ब्राह्मणों के नगर ब्राह्मणक में छिप गये।

सिकंदर ने इस नगर पर भी आक्रमण करके बहुत से मालवों एवं ब्राह्मणों को मार डाला। यहां से सिकंदर ने रावी की ओर बढ़ा। सिकंदर ने सुना कि 50 हजार मालव सैनिक रावी के दक्षिणी तट पर खड़े हैं। सिकंदर अपने थोड़े से सैनिकों के साथ रावी को पार करके उस तट पर जा पहुंचा।

मालव उसे देखते ही भाग कर एक दुर्ग में चले गये। दूसरे दिन सिकंदर ने दुर्ग पर आक्रमण किया और दुर्ग को तोड़कर उस पर अधिकार कर लिया। दुर्ग की दीवार पार करते समय सिकंदर मालवों के बाणों की चपेट में आकर घायल हो गया। पर्डिक्क्स ने सिकंदर के शरीर में धंसा बाण खींचकर बाहर निकाला।

इस उपक्रम में इतना रक्त बहा कि सिकंदर मूर्च्छित हो गया। सिकंदर के सैनिकों ने कुपित होकर दुर्ग के भीतर स्थित समस्त पुरुषों, स्त्रियों एवं बच्चों को मार डाला। सिकंदर के ठीक होने के उपरांत भी अफवाह फैल गई कि सिकंदर मर गया। इस पर सिकंदर को घोड़े पर बैठकर अपने सैनिकों के समक्ष आना पड़ा।

इसके बाद सिकंदर के सैनिकों को क्षुद्रकों का सामना करना पड़ा। अंत में क्षुद्रक परास्त हुए। क्षुद्रकों ने एक सौ रथारूढ़ दूतों को सिकंदर से संधि करने के लिये भेजा। प्रत्यावर्तन मार्ग पर अम्बष्ठ, क्षत्रप तथा वसाति लोगों ने सिकंदर की अधीनता स्वीकार की। फिलिप जिस भाग का क्षत्रप नियुक्त किया गया था, उसकी दक्षिणी सीमा पर सिंध और चिनाव का संगम था।

यहां पर एक नगर की स्थापना की गई। इसके बाद सिकंदर ने सिंध प्रदेश में प्रवेश किया। यहां का राजा मुसिकेनस मारा गया। अंत में पाटल नरेश का राज्य आया। सिकंदर का आगमन सुनकर नागरिक पाटल छोड़कर भाग गये।

यहां से सिकंदर दक्षिणी जड्रोशिया (मकरान) गया। सिंध से मकरान तक के रेगिस्तान को पार करने में सिकंदर के और भी बहुत से सैनिक भूख, प्यास एवं बीमारी से मारे गये। जेड्रोशिया की राजधानी पुरा पहुंचकर सिकंदर के सैनिकों ने आराम किया।

जब वह कर्मानिया पहुंचा तो उसे समाचार मिला कि उसके क्षत्रप फिलिप की हत्या कर दी गई। यह सुनकर सिकंदर ने तक्षशिला के राजा अम्भि तथा थ्रेस निवासी यूडेमस को फिलिप के स्थान पर काम संभालने के आदेश भिजवाये। इसी समय क्रेटरस अपनी सैन्य शाखा तथा हाथियों सहित आ मिला। नियार्कस की चार नौकाऐं मार्ग में ही नष्ट हो गईं। वह भी सिकंदर से आ मिला। अंत में समस्त सेनाओं सहित सिकंदर 324 ई.पू. में सूसा पहुंचा।

सिकंदर की मृत्यु एवं राज्य का विभाजन

323 ई.पू. में बेबीलोनिया में अचानक ही सिकंदर की मृत्यु हो गई। सिकंदर ने जिन क्षेत्रों पर अधिकार किया, उस क्षेत्रों को उसने अपनी मृत्यु से पहले पांच भागों में विभक्त किया- पहला पैरोपेनिसडाइ, दूसरा अम्भी का राज्य तथा काबुल की निम्न घाटी का प्रदेश जिसका क्षत्रप फिलिप था। तीसरा पौरव का विस्तृत राज्य था। चतुर्थ पश्चिम में हब नदी तक विस्तृत सिंधु की घाटी का राज्य था जिसका क्षत्रप पैथान था। पांचवा काश्मीर स्थित अभिसार का राज्य था।

सिकन्दर के भारत आक्रमण के परिणाम

यद्यपि अधिकांश भारतीय इतिहासकारों ने सिकंदर केे भारत अभियान के प्रभावों को उल्कापात की तरह क्षणिक तथा महत्वहीन बताया है किंतु सिकंदर के भारत आक्रमण के कुछ परिणाम अवश्य निकले थे जिनमें से कुछ इस प्रकार से हैं-

(1.) सिकंदर तथा उसकी सेनाओं द्वारा अपनाये गये चार अलग-अलग जल एवं थल मार्गों के माध्यम से पश्चिमी जगत से भारत का व्यापारिक सम्पर्क बढ़ गया तथा भारत में यूनानी मुद्राओं का प्रचार हो गया।

(2.) यूनानियों से हुए सम्पर्क के कारण भारत में बहुत से यूनानी शब्दों यथा पुस्तक, कलम, फलक, सुरंग आदि का संस्कृत भाषा में समावेश हो गया।

(3.) यूनानियों के सम्पर्क से भारतीयों ने यूनानी चिकित्सा पद्धति भी सीखी।

(4.) यूनानी मूर्तिकला के प्रभाव से पश्चिमोत्तर भारत में नवीन शैली का विकास हुआ जो गांधार शैली के नाम से विख्यात हुई। इस कला की विशेषता यह है कि इसमें मूल प्रतिमा तो भारतीय है किंतु उसकी बनावट, सजावट तथा विधि यूनानी है।

(5.) पंजाब में रहने वाली बहुत सी जातियां विशेषकर मालव, अर्जुनायन, शिबि अपने मूल स्थानों को छोड़कर दक्षिण दिशा अर्थात् राजस्थान में भाग आईं। इन जातियों ने राजस्थान में अनेक जनपदों की स्थापना की।

(6.) सीमांत प्रदेश, पश्चिमी पंजाब तथा सिंध में कुछ यूनानी उपनिवेश स्थापित हो गये। इनके माध्यम से भारत में क्षत्रपीय शासन व्यवस्था का प्रादुर्भाव हुआ। इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण काबुल क्षेत्र में सिकंदरिया, झेलम के तट पर बुकेफाल और सिंध क्षेत्र में सिकंदरिया प्रमुख थे। ये उपनिवेश चंद्रगुप्त और अशोक के समय में भी अस्तित्व में रहे किंतु उसके बाद नष्ट हो गये।

(7.) सिकंदर के द्वारा भारत में कुछ नये नगरों की स्थापना की गई। इन नगरों में बहुत से यूनानी सैनिक तथा उनके परिवारों को बसाया गया। इन यूनानी परिवारों के माध्यम से भारत में यूनानी संस्कृति का प्रसार हुआ।

(8.) सिकंदर के साथ आये लेखकों ने अपनी पुस्तकों में भारतीय विवरण अंकित किये जिससे भारत के तत्कालीन तिथिबद्ध इतिहास का निर्माण करने में सहायता मिली।

(9.) सिकंदर के साथ आये लेखकों ने महत्वपूर्ण भौगोलिक विवरण अंकित किये जिनका लाभ आने वाली पीढ़ियों को मिला।

(10.) सिकंदर ने भारत से 2 लाख बैल यूनान भेजे। भारत से बहुत से बढ़ई भी यूनान ले जाये गये जो नाव, रथ, जहाज तथा कृषि उपकरण बनाते थे। इससे भारतीय हस्तकला का यूनान में भी प्रसार हो गया।

(11.) चंद्रगुप्त मौर्य ने सिकंदर की सेना की युद्ध-प्रणाली का अध्ययन किया तथा उसके आधार पर अपनी सेनाओं का संगठन तैयार किया। इस युद्ध-प्रणाली का थोड़ा-बहुत उपयोग उसने नंदों की शक्तिशाली सेना के विरुद्ध किया।

(12.) सिकंदर के जाने के बाद पश्चिमोत्तर भारत में राजनीतिक शून्यता व्याप्त हो गई। इस क्षेत्र की कमजोर राजीनतिक स्थिति का लाभ उठाकर विष्णुगुप्त चाणक्य तथा उसके शिष्य चंद्रगुप्त मौर्य ने भारत में मौर्य वंश की स्थापना की तथा मगध के शक्तिशाली नंद साम्राज्य को उखाड़ फैंका। मौर्य वंश की स्थापना से भारत में पहली बार राजनीतिक एकता की स्थापना संभव हो सकी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चंद्रगुप्त मौर्य (अध्याय 12)

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मौर्य कालीन संगीत

इस अध्याय में चंद्रगुप्त मौर्य के इतिहास के साथ-साथ उसकी विजयें एवं प्रशासनिक व्यवस्थाओं का वर्णन किया गया है। चंद्रगुप्त मौर्य ही वह पहला राजा है जिसके समय से भारतीय राजाओं की प्रशासनिक व्यवस्थाओं के लिखित प्रमाण मिलने आरम्भ होते हैं।

मौर्य वंश

मौर्य साम्राज्य के संस्थापक सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य का प्रारम्भिक जीवन अन्धकार में है। यूनानी इतिहासकारों ने उसे भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा है। स्ट्रेबो, एरियन तथा जस्टिन ने उसे ‘सैण्ड्रोकोटस’ लिखा है जबकि एपिअन तथा प्लूटार्क ने उसे ‘ऐण्ड्रोकोटस’ लिखा है। फिलार्कस ने उसे ‘सैण्ड्रोकोप्टस’ कहा है।

भारतीय ग्रंथ उसे प्रायः चंद्रगुप्त मौर्य लिखते हैं। विशाखदत्त के नाटक ‘मुद्राराक्षस’ में उसे चन्दसिरि (चंद्रश्री), पि अदर्सन (प्रिय दर्शन) और वृषल (राजाओं में प्रधान) कहा गया है। कुछ विद्वानों के अनुसार उसके लिये ‘वृषल’ शब्द का प्रयोग उसकी सामजिक हेयता का द्योतक है।

कतिपय ब्राह्मण-ग्रन्थों के अनुसार ‘मौर्य’ शब्द व्यक्ति-वाचक संज्ञा ‘मुरा’ से बना है जो नन्द-राज की नाइन जाति की शूद्रा पत्नी थी। चूंकि मौर्य-साम्राज्य का संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य इसी मुरा के पेट से उत्पन्न हुआ था। इसलिये वह तथा उसके वंशज मौर्य कहलाये। इस व्याख्या के अनुसार ‘मौर्य’ शूद्र तथा निम्न कुल के ठहरते हैं।

इस मत को स्वीकार करने में दो बहुत बड़ी कठिनाइयाँ है। पहली कठिनाई तो व्याकरण सम्बन्धी है। संस्कृत व्याकरण के नियमानुसार मुरा शब्द से, जो स्त्री-लिंग है, मौरेय शब्द बनेगा न कि मौर्य, अर्थात् मुरा की सन्तान मौरेय कहलायेगी, मौर्य नहीं। इसलिये मौर्यों को मुरा नामक शूद्र वंश का वंशज बताना, संस्कृत व्याकरण के नियम के विपरीत है।

मौर्यों को शूद्र-वंशीय स्वीकार करने में दूसरी कठिनाई यह है कि यदि मौर्य साम्राज्य का संस्थापक अर्थात् चन्द्रगुप्त शूद्र-वंश का होता तो कौटिल्य, जो एक ब्राह्मण था, उसकी सहायता न करता, और उसे राजा स्वीकार नहीं करता।

पुराणों में कहा गया है कि शिशुनाग वंश के विनाश के आगे शूद्र राजा होंगे। इस आधार पर बहुत से इतिहासकार मौर्यों को शूद्र मान लेते हैं जबकि यह निष्कर्ष सही नहीं है क्योंकि मौर्यों के बाद शुंग वंश एवं कण्व वंश ने भी मगध पर शासन किया जो कि ब्राह्मण थे। सातवाहन वंश भी ब्राह्मण था। पुराणों का यह कथन कि शिशुनाग वंश के विनाश के आगे शूद्र राजा होंगे, वस्तुतः नंद वंश के लिये है न कि मौर्यों के लिये।

कतिपय विद्वानों के अनुसार ‘मौर्य’ शब्द संस्कृत भाषा के पुल्लिंग शब्द ‘मुर’ से बना है जो महर्षि पाणिनी के कथनानुसार एक गोत्र का नाम था। इसलिये इस व्याख्या के अनुसार वह लोग जो ‘मुर’ गोत्र के थे ‘मौर्य’ कहलाये।

बौद्ध तथा जैन ग्रन्थों के अनुसार ‘मौर्य’ शब्द प्राकृत भाषा के ‘मोरिय’ शब्द का संस्कृत रूपान्तर है। ‘मोरिय’ एक क्षत्रिय वर्ग का नाम था जो नेपाल की तराई में ‘पिप्पलिवन’ नामक राज्य में शासन करता था। चूंकि इस प्रदेश में मयूर अर्थात् मोर पक्षियों का बाहुल्य था, इसलिये वहाँ के निवासी तथा उसके वंशज ‘मौरिय’ अथवा ‘मौर्य’ कहलाये।

कतिपय बौद्ध ग्रन्थों से ज्ञात होता है कि चंद्रगुप्त मौर्य मयूर पालकों के एक मुखिया की कन्या का पुत्र था जो क्षत्रिय-वंश का था। सम्भवतः ये क्षत्रिय शत्रुओं द्वारा जन्मभूमि से भगा दिये गये थे और छिप कर मयूर पलकों के रूप में पाटलिपुत्र के निकट जीवन व्यतीत कर रहे थे। जब इस क्षत्रिय-वंश के एक व्यक्ति ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया तो अपने मयूर पालक पूर्वजों की स्मृति में अपने नाम के आगे मौर्य शब्द जोड़ दिया।

सांची के पूर्वी द्वारों पर जो चित्रकारी की गई है उस पर मोर पक्षी के चित्र बने हुए हैं। इससे मार्शल ने यह निष्कर्ष निकाला है कि सम्भवतः मोर पक्षी मौर्य-वंश का राज्य चिह्न था और इस राज्य चिह्न के कारण ही इस वंश का नाम मौर्य वंश पड़ा। चूंकि राज-वंशों के चिह्न प्रायः पशु-पक्षी हुआ करते थे इसलिये मार्शल का यह अनुमान निराधार नहीं कहा जा सकता।

उपर्युक्त विवरण से इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि मौर्य शूद्र तथा अकुलीन नहीं थे। आधुनिक इतिहासकार इसी सिद्धान्त को स्वीकार करते हैं कि चंद्रगुप्त मौर्य क्षत्रिय राजकुमार था और ‘मोरिय’ क्षत्रियों का वंशज होने के कारण जो सम्भवतः दुर्दिन आ जाने के कारण मयूर पालक बन गये थे, मौर्य कहलाया। जिस राज-वंश की उसने स्थापना की वह मौर्य-वंश कहलाया। जिस साम्राज्य का उसने निर्माण किया वह मौर्य साम्राज्य और जिस काल में उसने तथा उसके वंशजों ने शासन किया वह मौर्य-काल कहलाया।

भारत के इतिहास में मौर्य-काल का महत्त्व

भारत के इतिहास में मौर्य-काल का विशिष्ट स्थान है। वास्तव में मौर्य-साम्राज्य की स्थापना से भारतीय इतिहास में एक युग का अन्त और दूसरे युग का आरम्भ होता है। जिस युग का अन्त होता है उसे हम अनैतिहासिक युग और जिस नये युग का आरम्भ होता है उसे हम ऐतिहासिक युग कह सकते हैं।

स्मिथ ने इस युग की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘मौर्य राज-वंश का प्रादुर्भाव इतिहासकार के लिए अन्धकार से प्रकाश के मार्ग का निर्देशन करता है। तिथि-क्रम सहसा निश्चित, लगभग-लगभग सुनिश्चित हो जाता है, एक विशाल साम्राज्य का प्रादुर्भाव होता है जो भारत के विच्छिन्न असंख्य टुकड़ों को संयुक्त कर देता है; इस वंश के राजा, जिन्हें वास्तव में सम्राट कहा जा सकता है, महान् व्यक्तित्त्व के तथा लब्ध-प्रतिष्ठ व्यक्ति थे जिनके गुणों के दर्शन समय के कुहासे में मन्द रूप में किये जा सकते हैं।’

इस नये युग की प्रधान विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) शृंखलाबद्ध इतिहास का आरम्भ

मौर्य-काल के पहले का इतिहास प्रायः अन्धकारमय तथा विशृंखलित है अर्थात् इसका कोई क्रम नहीं है। इसके दो प्रधान कारण प्रतीत होते हैं। पहला तो यह कि घटनाओं की तिथियों का ठीक-ठीक निश्चय नहीं है और दूसरा यह कि इस काल के इतिहास को जानने के साधन बहुत कम हैं।

प्रधानतः धार्मिक ग्रन्थों की सहायता से ही इस काल के इतिहास का निर्माण किया गया है। मौर्य-काल के आरम्भ से हम अन्धकार से प्रकाश में आ जाते हैं और भारत का क्रम-बद्ध इतिहास आरम्भ हो जाता है। इसके दो प्रधान कारण हैं। पहला तो यह है कि मौर्य-काल की तिथियाँ निश्चित हैं और दूसरा यह कि मौर्य-काल के इतिहास को जानने के साधन बड़े ही ठोस तथा व्यापक हैं। इस काल का इतिहास जानने के लिए हमें धार्मिक ग्रन्थों के अतिरिक्त अन्य साधन भी अर्थात् ऐतिहासिक ग्रन्थ, विदेशी विवरण, अभिलेख आदि प्राप्त हो जाते हैं।

मौर्य-काल के पूर्व हमें कोई विशुद्ध ऐतिहासिक ग्रन्थ प्राप्त नहीं होता जिसके द्वारा प्राचीन भारत के क्रम-बद्ध, प्रामाणिक इतिहास का ज्ञान प्राप्त किया जाय परन्तु मौर्य-काल में और उसके बाद अनेक ऐसे ऐतिहासिक ग्रन्थ लिखे गये जिनके आधार पर भारत का क्रम-बद्ध प्रमाणित इतिहास तैयार किया जा सकता है।

इन ऐतिहासिक ग्रन्थों में सर्व-प्रथम स्थान कौटिल्य के ग्रन्थ ‘अर्थशास्त्र’ का है। कौटिल्य को चाणक्य तथा विष्णुगुप्त भी कहा गया है। यद्यपि कौटिल्य के इस ग्रन्थ का नाम ‘अर्थशास्त्र’ है परन्तु इसमें अर्थ अर्थात् धन-सम्बन्धी कोई बात नहीं लिखी गई है। वास्तव में यह एक विशुद्ध राजनीतिक ग्रन्थ है ओर इससे मौर्यकालीन इतिहास का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त होता है।

मौर्यकालीन इतिहास जानने का दूसरा साधन विशाखदत्त द्वारा रचित ‘मुद्राराक्षस’ नामक नाटक है। यह एक ऐतिहासिक नाटक है और मौर्य-काल के प्रारम्भिक इतिहास को जानने में सहायक है। पुराणों से भी, जो ऐतिहासिक ग्रन्थ माने जाते हैं, मौर्य-युग के इतिहास का बहुत कुछ-ज्ञान प्राप्त होता है। कालिदास के ऐतिहासिक नाटक, काश्मीरी लेखक कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ तथा महर्षि पतन्जलि के ‘महाभाष्य’ से भी मौर्यकालीन इतिहास पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।

विदेशी यात्रियों के विवरण भी मौर्यकालीन इतिहास जानने के प्रामाणिक तथा विश्वसनीय साधन हैं। विदेशी लेखकों ने जो कुछ लिखा है वह स्वतंत्र तथा निष्पक्ष भाव से लिखा है और उनमें से अधिकांश ऐसे थे जो स्वयं भारत आये थे। उन्होंने जो कुछ अपनी आँखों से देखा अथवा भारतीयों से सुना, वही लिखा।

विदेशी लेखकों में सबसे पहला स्थान मेगस्थनीज का है जो यूनानी सम्राट सैल्यूकस का राजदूत था और चन्द्रगुप्त मौर्य की राजधानी पाटलिपुत्र में कई वर्षों तक रहा। कालान्तर में चीन तथा तिब्बत आदि देशों के यात्री भी भारत आये और उन्होंने यहाँ के विषय में लिखा। चीनी यात्रियों में फाह्यान तथा ह्नेनसांग और तिब्बती लेखकों में तारानाथ प्रमुख हैं।

शिला अभिलेख भी मौर्य-कालीन इतिहास जानने के अत्यन्त विश्वसनीय तथा प्रामाणिक साधन हैं। सम्राट अशोक ने स्तम्भों, शिलाओं तथा गुफाओं की दीवारों पर अनेक लेख लिखवाये जो आज भी उसकी कीर्ति का गान कर रहे हैं।

बौद्ध तथा जैन-ग्रन्थ भी मौर्य-कालीन इतिहास जानने के प्रमुख साधन हैं। चन्द्रगुप्त मौर्य ने जैन-धर्म को और अशोक ने बौद्ध-धर्म को आश्रय प्रदान किया। इसलिये इन दोनों धर्मों के आचार्यों ने अपने ग्रन्थों में मौर्य-कालीन इतिहास पर प्रकाश डालकर उसके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की।

उपर्युक्त प्रचुर साधनों की सहायता से इतिहासकारों ने मौर्य काल का प्रामाणिक तथा विश्वासनीय इतिहास तैयार किया है। इस प्रकार ऐतिहासिक साधनों तथा इतिहास निर्माण की दृष्टि से मौर्य-काल का बहुत बड़ा महत्त्व है।

(2) साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का प्रारम्भ

मौर्य-काल का दूसरा महत्त्व यह है कि इस काल के प्रारम्भ से ही भारत में साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का प्रारम्भ होता है और यह प्रवृत्ति आगामी शताब्दियों में भी चलती है। भारतवर्ष के राजनीतिक इतिहास में यहीं से एक नये युग का आरम्भ होता है जिसे हम साम्राज्यवाद तथा राजनीतिक एकता का युग कह सकते हैं।

मौर्य-काल के पूर्व भारतवर्ष में राजनीतिक एकता का सर्वथा अभाव था और सम्पूर्ण देश छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था। यद्यपि साम्राज्यवाद तथा राजनीतिक एकता का स्वप्न देखना भारतीय राजाओं ने मौर्य-काल के पहले ही आरम्भ कर दिया था, परन्तु इस स्वप्न को सर्वप्रथम मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चन्द्रगुप्त ने ही चरितार्थ किया।

उसने पंजाब तथा सिन्ध क्षेत्र से विदेशी यूनानियों को और उत्तरी-भारत के अन्य छोटे-छोटे देशी राज्यों को समाप्त कर सम्पूर्ण उत्तरी-भारत को एक राजनीतिक सूत्र में बांधा। इस प्रकार प्रथम बार भारत में राजनीतिक एकता की स्थापना हुई। राजनीतिक एकता का यह आदर्श भारत के भावी महत्त्वाकांक्षी सम्राटों को सदैव प्रेरित करता रहा।

(3) प्रशासनिक एकरूपता का प्रादुर्भाव

राजनीतिक एकता तथा शासन की एकरूपता में अटूट सम्बन्ध है। राजनीतिक एकता प्रशासकीय एकता की जननी है। जब मौर्य-सम्राटों ने सम्पूर्ण उत्तरी-भारत में राजनीतिक एकता स्थापित कर दी तब इस विशाल भू-भाग में एक ही प्रकार के सुदृढ़़ तथा सुव्यवस्थित केन्द्रीय शासन की स्थापना हो गई। चंद्रगुप्त मौर्य ने जिस शासन-व्यवस्था का शिलान्यास किया वही भावी शासकों के लिए आदर्श व्यवस्था बन गई और उसी में न्यूनाधिक परिवर्तन करके आगामी शासकों ने शासन-व्यवस्था को चलाया। मौर्य-कालीन शासन व्यवस्था शान्ति बनाये रखने तथा सम्पन्नता प्रदान करने में इतनी सफल रही कि इसे हम शान्ति तथा सम्पन्नता का युग कह सकते हैं।

(4) सांस्कृतिक एकता की स्थापना

राजनीतिक एकता सांस्कृतिक एकता की भी जननी है। चन्द्रगुप्त मौर्य ने विदेशियों को अपने देश से निष्कासित कर एक विशुद्ध भारतीय संस्कृति के विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियॉं उत्पन्न कीं। उसने सम्पूर्ण उत्तरी-भारत में एकछत्र, सुदृढ़ तथा सुव्यवस्थित शासन स्थापित कर सांस्कृतिक विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया।

अशोक ने बौद्ध-धर्म को राज-धर्म बनाकर, उसके प्रचार की समुचित व्यवस्था की तथा सम्पूर्ण भारत में पत्थरों पर शिक्षाएं तथा उपदेश लिखवा कर सम्पूर्ण राज्य में एक ही प्रकार की संस्कृति के विकास का कार्य किया।

(5) विदेशों के साथ घनिष्ठ सम्बन्धों की स्थापना

अशोक ने जिस सभ्यता तथा संस्कृति का सृजन किया, उसे विदेशों में भी प्रचारित कराया। इस प्रकार अशोक विदेशों में भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति के प्रचार का अग्रदूत बन गया। इस सभ्यता तथा संस्कृति के प्रचार की बहुत बड़ी विशेषता यह थी कि यह कार्य प्रेम तथा सद्भावना से किया गया।

चंद्रगुप्त मौर्य

चंद्रगुप्त मौर्य के भारतीय राजनीति के मंच पर आने की ओर संकेत करते हुए डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी ने लिखा है- ‘सिकन्दर के चले जाने के उपरान्त भारत के राजनीतिक गगन-मण्डल में एक नया तारा निकला जिसने शीघ्र ही अपने परम प्रकाश से शेष समस्त को तिमिर-तिरोहित कर दिया।’

स्मिथ ने चंद्रगुप्त मौर्य के भारतीय राजनीति के मंच पर आने के महत्त्व की ओर संकेत करते हुए लिखा है- ‘वास्तव में चंद्रगुप्त मौर्य ही प्रथम ऐतिहासिक व्यक्ति है जिसे हम सचमुच भारत का सम्राट् कह सकते हैं। एक इतिहासकार के लिए मौर्य राज-वंश का प्रादुर्भाव, अन्धकार से प्रकाश के मार्ग की ओर निर्देशन करता है।’

जस्टिन ने भी इस ओर संकेत करते हुए लिखा है- ‘सिकन्दर की मृत्यु के उपरान्त, चन्द्रगुप्त भारत की स्वतन्त्रता का निर्माता था।’

चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म 345 ई.पू. में मोरिय वंश के क्षत्रिय कुल में हुआ था जो सूर्यवंशी शाक्यों की एक शाखा थी। यह वंश नेपाल की तराई में स्थित पिप्पलिवन के गणतांत्रिक प्रणाली वाले राज्य पर शासन करता था। चन्द्रगुप्त का पिता इन्ही मोरियों का प्रधान था। दुर्भाग्यवश एक शक्तिशाली राजा ने उसकी हत्या कर दी और उसके राज्य को छीन लिया।

चन्द्रगुप्त की माता उन दिनों गर्भवती थी। इस विपत्ति में वह अपने सम्बन्धियों के साथ पिप्पलिवन से निकल गई तथा पाटलिपुत्र में अज्ञात रूप से निवास करने लगी। आजीविका चलाने तथा अपने राजवंश को गुप्त रखने के लिए ये लोग मयूर पालन का कार्य करने लगे। इस प्रकार चन्द्रगुप्त का प्रारम्भिक जीवन मयूर-पालकों के मध्य व्यतीत हुआ।

जब चन्द्रगुप्त बड़ा हुआ तब उसने मगध के राजा के यहाँ नौकरी कर ली। इन दिनों मगध में नन्द-वंश शासन कर रहा था। चंद्रगुप्त उसकी सेना में भर्ती हो गया। चन्द्रगुप्त बड़ा ही योग्य तथा प्रतिभावान् युवक था। अपनी योग्यता के बल से वह मगध की सेना का सेनापति बन गया परन्तु कुछ कारणों से मगध का राजा उससे अप्रसन्न हो गया और उसे मृत्यु-दण्ड की आज्ञा दे दी। चन्द्रगुप्त अपने प्राणों की रक्षा करने के लिए मगध राज्य से बाहर चला गया। उसने नन्द वंश को नष्ट करने का संकल्प लिया।

चंद्रगुप्त तथा चाणक्य का योग

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यद्यपि चन्द्रगुप्त ने नन्द-वंश को उन्मूलित करने का संकल्प कर लिया था परन्तु अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसके पास साधन उपलब्ध नहीं थे। वह पंजाब की ओर चला गया और इधर-उधर भटकता हुआ तक्षशिला जा पहुंचा, जहाँ विष्णुगुप्त नामक ब्राह्मण से उसकी भेंट हो गयी। विष्णुगुप्त को चाणक्य भी कहते हैं क्योंकि उसके पितामह (बाबा) का नाम चणक था। उसे कौटिल्य भी कहते है क्योंकि उसके पिता का नाम कुटल था। चाणक्य विद्वान तथा राजनीति का प्रकाण्ड पण्डित था। वह भारत के पश्चिमोत्तर भाग की राजनीतिक दुर्बलता से परिचित था और उसे आंशका लगी रहती थी कि यह प्रदेश कभी भी विदेशी आक्रमणकारियों का शिकार हो सकता है। वह इस भू-भाग के छोटे-छोटे राज्यों को समाप्त कर यहाँ एक प्रबल केन्द्रीय शासन स्थापित करना चाहता था, जिससे विदेशी आक्रमणकारियों से देश की रक्षा हो सके। अपने इस उदेश्य की पूर्ति के लिए यह मगध-नरेश की सहायता प्राप्त करने के लिए पाटलिपुत्र गया परन्तु वह नन्द-राज द्वारा अपमानित किया गया। चाणक्य बड़ा ही क्रोधी तथा उग्र-प्रकृति का व्यक्ति था। उसने नन्द-वंश को नष्ट करने का संकल्प कर लिया। नन्द-वंश के विशाल साम्राज्य का उन्मूलन करने के साधन उसके पास भी नहीं थे। इसलिये वह इस साधन की खोज में संलग्न था। इसी समय चन्द्रगुप्त से उसकी भेंट हुई।

चाणक्य तथा चन्द्रगुप्त दोनों के उद्देश्य एक ही थे। वे दोनों व्यक्ति, नन्द-वंश का विनाश करना चाहते थे परन्तु दोनों ही के पास साधनों का अभाव था। संयोगवश इन दोनों ने एक-दूसरे की आवश्यकता की पूर्ति कर दी।

चाणक्य को एक वीर, साहसी तथा महत्त्वाकांक्षी नवयुवक की आवश्यकता थी जिसकी पूर्ति चन्द्रगुप्त ने की और चन्द्रगुप्त को एक विद्वान् एवं अनुभवी कूटनीतिज्ञ की सेवाओं की आवश्यकता थी। साथ ही उसे सेना एकत्रित करने के लिये विपुल मात्रा में धन की आवश्यकता थी। उसकी इन दोनों आवश्यकताओं की पूर्ति चाणक्य ने कर दी। फलतः इन दोनों में मैत्री तथा गठबन्धन हो गया।

अपने उद्देश्य की पूर्ति की तैयारी करने के लिए दोनों मित्र विन्ध्याचल के वनों की ओर चले गये। चाणक्य ने अपना सारा धन चन्द्रगुप्त को दे दिया। इस धन की सहायता से उसने भाड़े की एक सेना तैयार की और इस सेना की सहायता से मगध पर आक्रमण कर दिया परन्तु नन्दों की शक्तिशाली सेना ने उन्हें परास्त कर दिया और वे मगध से भाग खड़े हुए। 

अब इन दोनों मित्रों ने अपने प्राणों की रक्षा के लिए फिर पंजाब की ओर प्रस्थान किया। चाणक्य तथा चंद्रगुप्त ने अनुभव किया कि मगध राज्य के केन्द्र पर प्रहार कर उन्होंने बहुत बड़ी भूल की थी। वास्तव में उन्हें इस राज्य के एक किनारे पर स्थित सुदूरस्थ प्रदेश पर आक्रमण करना चाहिए था, जहाँ केन्द्रीय सरकार का प्रभाव कम और उसके विरुद्ध अंसतोष अधिक रहता है।

उस समय यूनानी आक्रमणकारी सिकन्दर पंजाब में ही था और वहाँ के छोटे-छोटे राज्यों को जीत रहा था। चन्द्रगुप्त ने नन्दों के विरुद्ध सिकन्दर की सहायता लेने का विचार किया। इसलिये वह सिकन्दर से मिला और कुछ दिनों तक उसके शिविर में रहा।

चन्द्रगुप्त के स्वतन्त्र विचारों के कारण सिकन्दर उससे अप्रसन्न हो गया और उसका वध करने की आज्ञा दी। चन्द्रगुप्त प्राण बचाकर भाग खड़ा हुआ। अब उसने मगध-राज्य के विनाश के साथ-साथ यूनानियों को भी भारत से मार भगाने का निश्चय कर लिया। वह चाणक्य की सहायता से अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए योजनाएँ बनाने लगा।

चन्द्रगुप्त की विजयें

(1) विजय अभियान का आरम्भ

इतिहासकारों में इस बात पर मतभेद है कि चंद्रगुप्त मौर्य ने पहले पंजाब-सिंध से यूनानियों का सफाया किया अथवा मगध राज्य पर आक्रमण करके नंद वंश की सत्ता को समाप्त किया। यूनानी, बौद्ध तथा जैन ग्रंथों से अनुमान होता है कि चंद्रगुप्त ने पहले पंजाब एवं सिंध क्षेत्र को यूनानियों से मुक्त करवाया।

महावंश टीका तथा जैन ग्रंथ परिशिष्टपर्वन् में एक कथा मिलती है जिसके अनुसार चाणक्य तथा चंद्रगुप्त मौर्य ने पहले मगध राज्य पर आक्रमण किया किंतु वहां से परास्त होकर भाग खड़े हुए। इसके बाद उन्होंने निर्णय लिया कि सीधे ही मगध की राजधानी पर आक्रमण करने के स्थान पर उन्हें मगध राज्य के एक किनारे से अपना विजय अभियान आरम्भ करना चाहिये।

(2) पंजाब और सिंध पर अधिकार

सिकन्दर के भारत से चले जाने के उपरान्त पश्चिमोत्तर क्षेत्रों में निवास करने वाले भारतीयों ने यूनानियों के विरुद्ध आन्दोलन आरम्भ कर दिया। चन्द्रगुप्त के लिए यह स्वर्ण अवसर था। उसने इस स्थिति का पूरा लाभ उठाने का निश्चय किया। महावंश टीका तथा जैन ग्रंथ परिशिष्टपर्वन् के अनुसार चाणक्य ने धातुशास्त्र के ज्ञान से धन निर्मित करके सैनिक भर्ती किये।

चंद्रगुप्त मौर्य ने इस सेना के बल पर, यूनानियों के विरुद्ध चल रहे आंदोलन का नेतृत्व ग्रहण किया। चंद्रगुप्त ने यूनानियों को पंजाब तथा सिंध क्षेत्र से भगाना आरम्भ किया। यूनानी क्षत्रप यूडेमान, यूनानी सैनिकों के साथ भारत छोड़कर भाग गया। जो यूनानी सैनिक भारत में रह गये, वे तलवार के घाट उतार दिये गये। इस प्रकार चन्द्रगुप्त ने सम्पूर्ण पंजाब तथा सिंध पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया।

जस्टिन ने लिखा है- ‘सिकंदर की मृत्यु के पश्चात् उसके गवर्नरों को मारकर भारत को विदेशियों की दासता से मुक्त करवाने का श्रेय चंद्रगुप्त को है।’

जस्टिन लिखता है- ‘सिकन्दर की मृत्यु के बाद भारत ने मानो अपने गले से दासता का जुआ उतार फेंका और उसके क्षत्रपों को मार डाला। इस मुक्ति का सृष्टा सैंड्रोकोटस था।’

डॉ. राधाकुमुद मुकर्जी के अनुसार जस्टिन का यह उद्धरण इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण अभिलेख है। इसमें निश्चित रूप से यह कहा गया है कि चंद्रगुप्त इस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का नायक था।

(3) मगध राज्य पर आक्रमण

पंजाब तथा सिंध पर अधिकार स्थापित कर लेने के उपरान्त चंद्रगुप्त मौर्य ने मगध-राज्य पर आक्रमण करने के लिए पूर्व की ओर प्रस्थान किया। वह अपनी विशाल सेना के साथ मगध-साम्राज्य की पश्चिमी सीमा पर टूट पड़ा। चन्द्रगुप्त की सेना को रोकने के मगध-नरेश के समस्त प्रयत्न निष्फल सिद्ध हुए।

चंद्रगुप्त मौर्य की सेना ने मगध-राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र के निकट पहुँचकर उसका घेरा डाल दिया। अन्त में नन्द-राज धनानन्द की पराजय हुई और वह अपने परिवार के साथ युद्ध में मारा गया। इस प्रकार 322 ई.पू. में चन्द्रगुप्त पाटलिपु़त्र के सिंहासन पर बैठा। चाणक्य ने उसका राज्याभिषेक किया।

वायुपुराण में कहा गया है कि ब्राह्मण कौटिल्य नवनंदों का नाश करेगा तथा कौटिल्य ही चंद्रगुप्त का राज्याभिषेक करेगा। वायुपुराण, कौटिलीय अर्थशास्त्र, महावंशटीका, मत्स्य पुराण एवं भागवत पुराण, नीति शास्त्र, कथासरित्सागर, वृहत्कथा मंजरी, मुद्राराक्षस आदि ग्रंथों में चंद्रगुप्त द्वारा नंदों के उन्मूलन एवं मगध की गद्दी पर चंद्रगुप्त के सिंहासनारोहण का उल्लेख किया गया है।

(4) पश्चिमी भारत पर विजय

उत्तर भारत पर प्रभुत्व स्थापित कर लेने के उपरान्त चंद्रगुप्त मौर्य तथा चाणक्य ने पश्चिमी भारत पर भी अपनी विजय-पताका फहराने का निश्चय किया। उन्होंने सर्वप्रथम सौराष्ट्र पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। उसके बाद लगभग 303 ई.पू. में उसने मालवा पर अधिकार स्थापित कर लिया और पुष्यगुप्त वैश्य को वहाँ का प्रबन्ध करने के लिए नियुक्त किया जिसने सुदर्शन झील का निर्माण करवाया। इस प्रकार काठियावाड़ तथा मालवा पर चन्द्रगुप्त का प्रभुत्व स्थापित हो गया।

(5) सैल्यूकस पर विजय

चंद्रगुप्त मौर्य का अन्तिम संघर्ष सिकन्दर के पूर्व सेनापति तथा बैक्ट्रिया के शासक सैल्यूकस निकेटार के साथ हुआ। सिकन्दर की मृत्यु के उपरान्त सैल्यूकस उसके साम्राज्य के पूर्वी भाग का अधिकारी बना था। उसने 305 ई.पू. में भारत पर आक्रमण कर दिया, चन्द्रगुप्त ने पश्चिमोत्तर प्रदेश की सुरक्षा की व्यवस्था पहले से ही कर ली थी।

चंद्रगुप्त मौर्य की सेना ने सिन्धु नदी के उस पार ही सैल्यूकस की सेना का सामना किया। युद्ध में सैल्यूकस की बुरी तरह पराजय हो गई और उसे विवश होकर चन्द्रगुप्त के साथ सन्धि करनी पड़ी। सैल्यूकस ने अपने चार प्रांत- आरकोशिया (कंधार), पैरोपैनिसडाई (काबुल), एरिया (हेरात) तथा गेड्रोशिया (बिलोचिस्तान) चन्द्रगुप्त को दे दिये।

सैल्यूकस ने अपनी पुत्री का विवाह चन्द्रगुप्त के साथ कर दिया। भविष्य पुराण में इस विवाह का उल्लेख मिलता है। इस संधि के बाद सैल्यूकस ने मेगस्थनीज नामक एक राजदूत भी चंद्रगुप्त मौर्य की राजधानी पाटलिपुत्र में रहने के लिये भेजा। चन्द्रगुप्त ने भी सैल्यूकस को 500 हाथी भेंट किये।

चंद्रगुप्त मौर्य और सैल्यूकस के संघर्ष के सम्बन्ध में डॉ. राज चौधरी ने अपनी पुस्तक ‘प्राचीन भारत का राजनीतिक इतिहास’ में लिखा है- ‘यह देखा जायेगा कि प्राचीन लेखकों से हमें सैल्यूकस और चन्द्रगुप्त के वास्तविक संघर्ष का विस्तृत उल्लेख नहीं मिलता है। वे केवल परिणामों को बतलाते हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि आक्रमणकारी अधिक आगे न बढ़ सका और उसने एक सन्धि कर ली जो वैवाहिक सम्बन्ध द्वारा सुदृढ़़ बना दी गई।

(6) दक्षिणापथ पर विजय

चंद्रगुप्त मौर्य ने सुदूर दक्षिण को छोड़कर दक्षिणापथ के अधिकांश भाग को जीतकर उसे मौर्य साम्राज्य का अंग बना लिया था। इतिहासकारों की धारणा है कि चन्द्रगुप्त का साम्राज्य सम्भवतः मैसूर की सीमा तक फैला हुआ था। कुछ इतिहासकार कृष्णा नदी को उसके राज्य की अंतिम सीमा मानते हैं। जैन संदर्भों के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य का राज्य दक्षिण में श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) तक विस्तृत रहा होगा।

(7) लगभग सम्पूर्ण भारत पर आधिपत्य

अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य पश्चिम में हिन्दूकुश पर्वत से लेकर पूर्व में बंगाल तक और उत्तर में हिमालय पर्वत से लेकर दक्षिण में कृष्णा नदी तक फैल गया। काश्मीर तथा नेपाल भी उसके साम्राज्य में सम्मिलित थे। केवल कलिंग तथा दक्षिण भारत का कुछ भाग उसके साम्राज्य के भीतर नहीं थे।

जस्टिन के अनुसार समस्त भारत चंद्रगुप्त के अधिकार में था। मुद्राराक्षस में आये एक श्लोक के अनुसार चंद्रगुप्त का साम्राज्य चतुःसमुद्रपर्यंत था। महावंश टीका में चंद्रगुप्त को सकल जम्बूद्वीप का स्वामी कहा गया है। प्लूटार्क के अनुसार ऐंड्रोकोटस ने छः लाख सैनिकों की सेना लेकर सारे भारत को रौंद डाला और उस पर अपना अधिकार कर लिया।

मुद्राराक्षस के अनुसार हिमालय से लेकर दक्षिणी समुद्र तक के राजा भयभीत और नतशीश होकर चंद्रगुप्त के चरणों में झुक जाया करते थे और चारों समुद्रों के पार से आये राजागण चंद्रगुप्त मौर्य की आज्ञा को अपने सिरों पर माला की तरह धारण करते थे। इस प्रकार चन्द्रगुप्त ने अपने बाहु-बल तथा अपने मन्त्री चाणक्य के बुद्धि-बल से भारत की राजनीतिक एकता सम्पन्न की।

चंद्रगुप्त मौर्य का शासन-प्रबन्ध

चंद्रगुप्त मौर्य न केवल एक महान् विजेता वरन् एक कुशल शासक भी था। उसने जिस शासन-व्यवस्था का निर्माण किया वह इतनी उत्तम सिद्ध हुई कि भावी शासकों के लिए आदर्श बन गई। वह शासन-व्यवस्था थोड़े बहुत परिवर्तनों के साथ निरन्तर चलती रही। चन्द्रगुप्त का शासन तीन भागों में विभक्त था- (अ) केन्द्रीय शासन, (ब) प्रान्तीय शासन तथा (स) स्थानीय शासन ।

(अ) केन्द्रीय शासन

केन्द्रीय शासन साम्राज्य की राजधानी से संचालित होता था। इसका संचालन सम्राट, उसके परामर्शदाताओं और मन्त्रियों द्वारा होता था। सम्राट तथा उसके मन्त्रियों के अधीन कर-संग्राहक, गुप्तचर-विभाग, सेना, न्यायालय आदि काम करते थे।

(1) सम्राट

केन्द्रीय शासन का प्रधान स्वयं सम्राट होता था। उसकी आज्ञाओं तथा आदेशों के अनुसार सम्पूर्ण देश का शासन चलता था। सम्राट स्वयं नियमों का निर्माण करता था तथा नियमों का पालन करवाने की व्यवस्था करता था। सम्राट नियमों का उल्लंघन करने वालों को दंड भी देता था। इस प्रकार सम्राट स्वयं व्यवस्थापिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका का प्रधान था। वही सम्पूर्ण देश के शासन का केन्द्र-बिन्दु था।

स्मिथ ने लिखा है- ‘ चंद्रगुप्त मौर्य के शासन से सम्बन्धित विदित तथ्य इस बात को सिद्ध कर देते हैं कि वह कठोर एवं निरंकुश शासक था।’

सम्राट न केवल् प्रशासकीय विभाग का सर्वेसर्वा था वरन् वह सैनिक-विभाग का भी प्रधान था और वह स्वयं सेना के संगठन की व्यवस्था करता था। युद्ध के समय वह स्वयं सेनापति के कार्यों को करता था।

स्पष्ट है कि राज्य की सारी शक्ति सम्राट के हाथ में थी और उसी की इच्छानुसार सम्पूर्ण राज्य का शासन संचालित होता था। इसलिये यदि यह कहें कि चन्द्रगुप्त का शासन एकतंत्रीय, स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश था तो कुछ अनुचित न होगा परन्तु स्वेच्छाचारी शासन का यह तात्पर्य नहीं है कि सम्राट मनमाने ढंग से शासन करता था और लोकमत की चिन्ता नहीं करता था।

स्वेच्छाचारी शासन का तात्पर्य  केवल इतना है कि सिद्धांततः राजा की शक्ति तथा उसके अधिकारों पर किसी भी प्रकार का नियंत्रण नहीं था परन्तु क्रियात्मक रूप में उसे परम्परागत नियमों, अपने परामर्शदाताओं के परामर्शों तथा नैतिक नियमों का सम्मान करना पड़ता था। कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र‘ से ज्ञात होता है कि सम्राट् अपनी प्रजा का ऋणी समझा जाता था।

वह अच्छा शासन करके ही इस ऋण से मुक्त हो सकता था। इसलिये स्वेच्छाचारी होते हुए भी प्रजा के हित में शासन करना राजा का परम धर्म था। अपनी प्रजा का अधिक से अधिक कल्याण करने के लिए और अपने शासन को सुचारू रीति से संचालित करने के लिए सम्राट् मन्त्रियों तथा अन्य पदाधिकारियों की नियुक्ति करता था।

(2) मन्त्रि-परिषद

सम्राट् को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्यों में परामर्श तथा सहायता देने के लिए एक मन्त्रि-परिषद की व्यवस्था की गई थी। चन्द्रगुप्त के प्रधान परामर्शदाता कौटिल्य का विश्वास था कि शासन की गाड़ी एक पहिए से नहीं चल सकती। सम्राट् उसका एक पहिया है, इसलिये उसके दूसरे पहिये अर्थात् मन्त्रिपरिषद् का होना अनिवार्य है, तभी शासन सुचारू रीति से संचालित होगा और प्रजा का अधिक से अधिक कल्याण हो सकेगा।

मन्त्रि-परिषद् के सदस्यों को सम्राट स्वयं नियुक्त करता था। समस्त मंत्री वेतनभोगी होते थे। केवल वही लोग इस पद पर नियुक्त किये जाते थे जो बुद्धिमान, निर्लोभी तथा सच्चरित्र हों। मन्त्रि-परिषद अपना निर्णय बहुमत से देती थी परन्तु सम्राट अपनी परिषद् के निर्णय को मानने के लिए बाध्य नहीं था। मन्त्रि-परिषद् राज्य के केवल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विषयों में परामर्श देने के लिए बुलाई जाती थी। राज्य के दैनिक कार्योंं से उसका कोई सम्बन्ध नहीं था।

(3) मन्त्रिन्

दैनिक शासन को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए सम्राट् को परामर्श देने और उसकी सहायता करने के लिए एक दूसरी सभा होती थी जिसके सदस्य मन्त्रिन् कहलाते थे। मन्त्रिन् का पद मन्त्रि-परिषद के सदस्यों से अधिक ऊँचा तथा महत्त्वपूर्ण होता था।

मंत्रिन् की नियुक्ति भी सम्राट् स्वयं करता था और इस पद पर केवल ऐसे ही लोग नियुक्त किये जाते थे जिनके किसी भी प्रकार के प्रलोभन में पड़ने की सम्भावना नहीं होती थी और जिनकी पहले से ही परीक्षा की जा चुकी होती थी। कौटिल्य ने इनकी संख्या तीन-चार बताई है। ये मन्त्रिन् देश-रक्षा, विदेशी विषयों, आकस्मिक आपत्तियों के लिए व्यवस्था करने, शासन को सुचारू रीति से संचालित करने आदि विषयों में सम्राट को परामर्श देते थे। सम्राट मन्त्रिन् के परामर्श को मानने के लिए बाध्य नहीं था।

(4) विभागीय व्यवस्था

मन्त्रि-परिषद तथा मन्त्रिन्, सम्राट को केवल परामर्श देते थे, वे दैनिक शासन को संचालित नहीं करते थे। राज्य के दैनिक शासन को सुचारू रीति से सम्पादित करने के लिए चन्द्रगुप्त ने विभागीय व्यवस्था का निर्माण किया था। इस व्यवस्था में सम्पूर्ण शासन का कार्य विभिन्न विभागों में विभक्त कर दिया गया था।

प्रत्येक विभाग को शासन के एक-दो विषय सौंपे गये थे। प्रत्येक विभाग का एक अध्यक्ष होता था जो ‘अमात्य’ कहलाता था। चन्द्रगुप्त के शासन-काल में इस प्रकार के कुल अठारह विभाग थे। इसलिये उसने अठारह अमात्यों को नियुक्त कर रखा था। इन अमात्यों के अधीन अनेक पदाधिकारी तथा कर्मचारी होते थे जो दैनिक शासन को सुचारू रीति से संचालित करते थे।

अमात्यों तथा उनके नीचे काम करने वाले समस्त कर्मचारियों की नियुक्ति सम्राट् स्वयं करता था और वे सम्राट के प्रति उत्तरदायी होते थे। जिस विभागीय व्यवस्था का सूत्रपात चन्द्रगुप्त मौर्य ने आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व किया था उसका अनुकरण आज सारे संसार में हो रहा है।

(5) पुलिस व्यवस्था

चन्द्रगुप्त तथा उसके प्रधानमन्त्री चाणक्य ने साम्राज्य में आन्तरिक शान्ति तथा सुव्यवस्था बनाये रखने के लिये एक अत्यन्त सुसंगठित तथा सुव्यवस्थित पुलिस विभाग का प्रबन्ध किया। पुलिस के सिपाही ‘रक्षिन्’ कहलाते थे। समाज की सुरक्षा का भार उन्हीं के ऊपर रहता था।

(6) गुप्तचर व्यवस्था

गुप्तचर उस व्यक्ति को कहते हैं जो गुप्त रूप से विचरण करके सब बातों का पता लगाये। चन्द्रगुप्त तथा चाणक्य ने गुप्तचरों की उपयोगिता का अनुभव करके सुदृढ़़ गुप्तचर विभाग का गठन किया। गुप्तचर-विभाग दो भागों में विभक्त था। एक को ‘संस्थान’ करते थे और दूसरे को ‘संचारण’।

संस्थान गुप्तचर एक स्थान पर रहकर अपनी गतिविधियों का संचालन करते थे जबकि संचारण गुप्तचर भ्रमण करके सूचनाएं एकत्रित करते थे। इस प्रकार स्थानीय बातों की सूचना प्राप्त करने के लिए संस्थान विभाग का और दूरस्थ सूचनाओं का पता लगाने के लिए संचारण विभाग का गठन किया गया था।

चंद्रगुप्त मौर्य के गुप्तचर विभाग में स्त्रियाँ भी काम करती थीं। किस समय में और किस स्थान पर कौनसी बात हो रही है इसकी सूचना सम्राट को गुप्तचरों से प्राप्त हो जाती थी। अपने राज्य के बड़े-बड़े कर्मचारियों के कार्यों की सूचना भी उसे गुप्तचरों से मिल जाती थी। इस प्रकार षड्यन्त्रों तथा कुचक्रों का पता लगाने में सम्राट को कोई कठिनाई नहीं होती थी।

(7) न्यायिक व्यवस्था

चंद्रगुप्त मौर्य ने एक निष्पक्ष, न्याय-प्रिय तथा विवेकशील न्याय व्यवस्था की आवश्यकता का अनुभव किया और अपने विद्वान, अनुभवी तथा नीति-निपुण प्रधान मन्त्री चाणक्य की सहायता से एक ऐसी न्याय-व्यवस्था का निर्माण किया जिसका अनुसरण आज भी सभ्य संसार द्वारा किया जा रहा है।

चन्द्रगुप्त द्वारा स्थापित न्याय-व्यवस्था में सम्राट स्वयं सबसे बड़ा न्यायाधीश था। राजा के नीचे अन्य न्यायाधीश थे। नगरों तथा जनपदों के लिए अलग-अलग न्यायाधीश थे। नगरों के न्यायाधीश ‘व्यवहारिक महामात्य’ और जनपदों के न्यायधीश ‘राजुक’ कहलाते थे। जो न्यायाधीश चार गाँवों के लिए होते थे वे संग्रहण’, जो चार सौ गाँव के लिए होते थे वे ‘द्रोणमुख’ और जो आठ सौ गाँवों के लिए होते थे वे ‘स्थानीय’ कहलाते थे।

न्यायाधीशों को ‘धर्मस्थ’ कहते थे। प्रत्येक न्यायालय में तीन धर्मस्थ तथा तीन अमात्य, न्यायाधीशों का आसन ग्रहण करते थे। न्यायलय दो भागों में विभक्त थे जो न्यायालय धन सम्बन्धी झगड़ों का निर्णय करते थे वे ‘धर्मस्थीय’ कहलाते थे और जो न्यायालय मार-पीट के मुकदमों का निर्णय करते थे वे ‘कंटक शोधन’ कहलाते थे।

छोटी अदालतों के निर्णय की अपीलें बड़ी अदालतों में होती थीं और सम्राट का निर्णय अंतिम माना जाता था। चन्द्रगुप्त के शासनकाल में दंड-विधान बड़ा कठोर था। जुर्माने के साथ-साथ अंग-भंग तथा मृत्युदंड भी दिया जाता था। कठोर दण्ड विधान का परिणाम यह हुआ कि अपराधों में कमी हो गई और लोग प्रायः अपने घरों में ताला लगाये बिना ही बाहर चले जाते थे। राजा की वर्षगांठ, राज्याभिषेक, राजकुमार के जन्म तथा नये प्रदेशों पर विजय प्राप्ति आदि अवसरों पर बंदियों को मुक्त करने की भी व्यवस्था थी।

(8) लोक-मंगलकारी कार्य

चंद्रगुप्त मौर्य के प्रधानमंत्री कौटिल्य के विचार में राजा अपनी प्रजा का ऋणी होता था। लोक-मंगलकारी कार्य करके ही वह प्रजा के ऋण से मुक्त हो पाता था। फलतः उसने अनेक लोक-मंगलकारी कार्य किये। उसने यातायात के साधनों की समुचित व्यवस्था की तथा सड़कों का निर्माण कर बड़े-बड़े नगरों को एक दूसरे से मिला दिया।

इन सड़कों के किनारे उसने छायादार वृक्ष लगवाये और कुएँ तथा धर्मशालाएँ बनवाईं। नदियों को पार करने के लिए उसने पुल बनवाये। चन्द्रगुप्त ने कृषि-क्षेत्रों की सिंचाई के लिए सुन्दर व्यवस्था की। राज्य की ओर से बहुत से तालाब तथा कुएँ खुदवाये गये। उसके पुष्यगुप्त नामक प्रान्तीय शासक ने सौराष्ट्र में सिंचाई के लिए सुदर्शन नामक विशाल झील का निर्माण करवाया।

चंद्रगुप्त मौर्य ने अनेक ‘भैषज्य-गृह’ अर्थात् औषधालय खुलवाये और उनमें औषधि तथा योग्य वैद्यों की नियुक्ति की। नगरों की स्वच्छता तथा भोजन-सामग्री की शुद्धता के लिए उसने निरीक्षक रखे। शासन की ओर से प्रजा की शिक्षा के लिये समुचित व्यवस्था की गई। शिक्षण कार्य प्रधानमन्त्री अथवा पुरोहित की अध्यक्षता में होता था।

शिक्षालयों को राज्य की ओर से सहायता दी जाती थी। इन सब लोक हितकारी कार्यों के अतिरिक्त दीन-दुखियों, असहायों तथा अकाल-पीड़ितों की सहायता की भी समुचित व्यवस्था की गई। इन सब कार्यों का परिणाम यह हुआ कि उसके काल में जनता सुखी तथा सम्पन्न हो गई।

(9) सैन्य व्यवस्था

चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने साम्राज्य की बाह्य शत्रुओं से सुरक्षा करने तथा राज्य विस्तार करने के लिए एक विशाल सेना का गठन किया। चन्द्रगुप्त महत्त्वकांक्षी सम्राट था। वह सम्पूर्ण भारत को अपने अधीन करना चाहता  था। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसे विशाल, सुसज्जित तथा सुशिक्षित सेना की आवश्यकता थी। इसलिये उसने चतुरंगिणी अर्थात् हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल सेनाओं का गठन किया और उनके प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था की।

सम्राट स्वयं सेना का प्रधान सेनापति होता था और युद्ध के समय रण-स्थल में उपस्थित रहकर सेना का संचालन करता था। चन्द्रगुप्त ने जल सेना का भी संगठन किया। सम्पूर्ण सेना के प्रबन्धन के लिए 30 सदस्यों की एक समिति होती थी। सेना का प्रबन्ध छः विभागों में विभक्त था और प्रत्येक विभाग का प्रबंध पांच सदस्यों के हाथों में रहता था। प्रत्येक विभाग का एक अध्यक्ष होता था।

पहला विभाग जल सेना का प्रबन्ध करता था। दूसरा विभाग सेना के लिये हर प्रकार की सामग्री तथा रसद जुटाने का प्रबन्ध करता था। तीसरा विभाग पैदल सेना का, चौथा विभाग अश्वारोही सेना का, पाँचवां विभाग हस्ति सेना का और छठा विभाग रथ सेना का प्रबन्ध करता था। सेना के साथ एक चिकित्सा विभाग भी होता था जो घायल तथा रुग्ण सैनिकों की चिकित्सा करता था।

चंद्रगुप्त मौर्य की सेना स्थायी थी, उसे राज्य की ओर से वेतन तथा अस्त्र-शस्त्र मिलता था। अस्त्र-शस्त्र बनाने के लिए राजकीय कार्यालय भी थे।

स्मिथ ने चंद्रगुप्त मौर्य के सैनिक संगठन की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘चन्द्रगुप्त मौर्य ने एक विशाल एवं स्थायी सेना की व्यवस्था की जिसे सीधे राजकोष से वेतन दिया जाता था और जो अकबर की सेना से भी अधिक सुयोग्य थी।’

(10) आय-व्यय का साधन

चंद्रगुप्त मौर्य के शासन में राज्य की आय का प्रधान साधन भूमि-कर था। राज्य द्वारा किसानों से उपज का चौथा भाग कर के रूप में लिया जाता था। कभी-कभी केवल आठवां भाग लिया जाता था। सम्राट को किसानों से पशु भी भेंट के रूप में मिलते थे। नगरों में विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के विक्रय-मूल्य का दसवां भाग राज्य को कर के रूप में मिलता था।

शास्ति अथवा जुर्माने से भी राज्य को कुछ धन मिल जाता था। आय का बहुत बड़ा भाग सेना तथा शासन पर व्यय होता था। शिल्पकारों, विद्वानों, दार्शनिकों, अनाथों, वृद्धों, रोगियों, अपाहिजों तथा विपत्तिग्रस्त लोगों को भी राज्य से सहायता मिलती थी। अकाल पीड़ितों की भी सहायता की जाती थी। सिंचाई, नगर की किलेबन्दी, भवन निर्माण तथा विभिन्न प्रकार के लोक मंगलकारी कार्यों पर बहुत सा धन व्यय होता था। 

(ब) प्रान्तीय शासन

चन्द्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य अत्यंत विशाल था। उस युग में जब यातायात के साधनों का अभाव था तब एक केन्द्र से सम्पूर्ण राज्य का संचालन सम्भव नहीं था। इसलिये चंद्रगुप्त ने साम्राज्य को कई प्रान्तों में विभक्त कर दिया और प्रत्येक प्रांत के शासन के लिए एक प्रांतपति नियुक्त कर दिया।

प्रांतपतियों की नियुक्ति सम्राट स्वयं करता था। प्रांतपति अपने समस्त कार्यों के लिए सीधे सम्राट् के प्रति उत्तरदायी होते थे। इस पद पर सम्राट् ऐसे ही लोगों को नियुक्त करता था जिनमें उसका पूर्ण विश्वास रहता था। जो प्रान्त अत्यंत महत्त्व के थे उन पर या तो सम्राट स्वयं नियन्त्रण रखता था या राजकुल के राजकुमारों को नियुक्त करता था।

यह शासक ‘कुमार-महामात्य’ कहलाते थे। अन्य प्रांतों के महामात्य ‘राष्ट्रीय’ कहलाते थे। प्रान्त में शांति रखना और वहाँ के शासन को सुचारू रीति से चलाना प्रांतपति का प्रधान कार्य था। युद्ध के समय सम्राट को सैनिक सहायता पहुंचाना भी उसका प्रमुख कर्त्तव्य होता था।

सम्राट् प्रान्तपतियों पर कड़ा नियंत्रण रखता था और गुप्तचरों के माध्यम से उनकी गतिविधियों की सूचना प्राप्त करता था। स्मिथ ने लिखा है- ‘केन्द्रीय मौर्य सरकार का नियन्त्रण सुदूरस्थ प्रान्तों तथा अधीनस्थ पदाधिकारियों पर अकबर द्वारा प्रयुक्त नियन्त्रण से भी अधिक कठोर प्रतीत होता है।’

(स) स्थानीय शासन

स्थानीय शासन का तात्पर्य गाँवों तथा नगरों के शासन से है। चंद्रगुप्त मौर्य ने इस बात का अनुभव किया कि यदि गाँवों तथा नगरों का शासन स्थानीय अर्थात् वहीं के लोगों को सौंप दिया जाय तो अति उत्तम होगा। इसलिये उसने गाँवों तथा नगरों की संस्थाओं का संगठन कर उन्हें पर्याप्त स्वतंत्रता दे रखी थी। इस प्रकार आधुनिक ग्राम-पंचायतों तथा नगरपालिकाओं का बीजारोपण चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन-काल में हो चुका था।

(द) गाँव का शासन

गाँव शासन की सबसे छोटी इकाई होता था। गाँव के प्रबन्ध के लिए एक ‘ग्रामिक’ होता था। वह राजकीय कर्मचारी नहीं होता था वरन् ग्रामवासियों द्वारा चुना जाता था और उनके प्रतिनिधि के रूप में अवैतनिक कार्य करता था। चूंकि ‘ग्रामिक’ वेतन नहीं लेता था इसलिये ऐसा लगता है कि गाँव का प्रतिष्ठित तथा सम्पन्न व्यक्ति इस पद के लिए चुन लिया जाता था।

‘ग्रामिक’ अपने समस्त कार्य, गाँव के अनुभवी वयोवृद्धों के परामर्श तथा सहायता से करता था। प्रत्येक गाँव में राजा का एक कर्मचारी भी होता था जो ‘ग्राम-भृतक’ अथवा ‘ग्राम-भोजक’ कहलाता था। ‘ग्रामिक’ के ऊपर ‘गोप’ होता था, जिसके अनुशासन में पाँच से दस गाँव होते थे। ‘गोप’ के ऊपर ‘स्थानिक’ होता था। उसके अनुशासन में आठ सौ गाँव होते थे ‘स्थानिक’ के ऊपर ‘समाहर्ता’ होता था जो सम्पूर्ण जनपद का प्रबन्ध करता था।

(य) नगर प्रबन्धन

चंद्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य में नगर प्रबन्धन के लिए आधुनिक नगरपालिकाओं जैसा संगठन विकसित किया गया था। यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने नगर प्रबन्धन का अत्यन्त विस्तृत विवरण दिया है। नगर का प्रधान ‘नगराध्यक्ष’ कहलाता था। कौटिल्य ने अपने ‘अर्थशात्र’ में उसे ‘पौर-व्यावहारिक’ नाम से पुकारा है जो राज्य का एक उच्च पदाधिकरी था।

वह आधुनिक काल के नगर प्रमुख की भांति होता था। मेगस्थनीज के अनुसार नगर के प्रबन्धन के लिए छः समितियाँ होती थीं। प्रत्येक समिति में पांच सदस्य होते थे। यह कहना उचित होगा कि आधुनिक नगरपालिकाओं का बीजारोपण चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन काल में हुआ था।

पहली समिति शिल्प-कला थी। यह समिति शिल्प तथा उद्योग-धन्धों का प्रबन्ध करती थी। कारीगरों की मजदूरी निश्चित करना, उनसे अच्छा काम लेना, उनकी रक्षा का प्रबन्ध करना, कच्चे माल का निरीक्षण करना आदि इस समिति के प्रधान कार्य थे। यदि कोई व्यक्ति कारीगरों का अंग-भंग कर देता था तो उसे प्राणदण्ड दिया जाता था।

दूसरी समिति विदेशियों की देखभाल करती थी। विदेशियों को हर प्रकार की सुविधा देना उसका प्रधान कार्य था। यह समिति विदेशियों के ठहरने तथा बीमार हो जाने पर उनकी चिकित्सा करवाने और मर जाने पर उनकी दाह-क्रिया करने का प्रबन्ध करती थी। मर जाने पर विदेशियों की सम्पत्ति उनके उत्तराधिकारियों को दी जाती थी।

तीसरी समिति जनसंख्या का हिसाब रखती थी। वह जनगणना करवाती थी और जन्म-मरण का हिसाब रखती थी। आजकल भी नगरपालिकाओं को यह कार्य करना पड़ता है। जनगणना कर लेने से करों को वसूलने में बड़ी सुविधा होती थी।

चौथी समिति वाणिज्य व्यवसाय का प्रबन्ध करती थी। नाप-तौल की देखभाल करना, ब्रिक्री की वस्तुओं का भाव निश्चित करना और बाटों की समुचित व्यवस्था करना इस समिति का प्रधान कार्य होता था। व्यापारियों को व्यापार करने के लिए राजकीय आज्ञा-पत्र लेना पड़ता था और उसके लिए कर देना पड़ता था। जो लोग एक से अधिक वस्तुओं का व्यापार करते थे उन्हें दो-गुना कर देना पड़ता था।

पांचवी समिति कारखानों में बनी हुई वस्तुओं की देखभाल करती थी। बेचने वाले नई तथा पुरानी वस्तुओं को मिला नहीं सकते थे। मिलावट करने वालों को कठोर दण्ड दिया जाता था।

छठी तथा अन्तिम समिति कर वसूल करने का काम करती थी। विक्रय की हुई वस्तुओं के मूल्य का दसवां भाग, कर के रूप में राज्य को मिलता था। यह कर अथवा चुंगी बड़ी कड़ाई के साथ वसूल की जाती थी। जो लोग कर देने में बेईमानी करते थे उन्हें दण्डित किया जाता था, यहाँ तक कि प्राण-दण्ड भी दिया जा सकता था।

उपर्युक्त विवरण से इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि चंद्रगुप्त मौर्य का शासन सुसंगठित तथा सुव्यवस्थित था। इस कारण उसका शासन आगामी मौर्य शासकों के लिए पथ-प्रदर्शक तथा उनके शासन की आधार-शिला बन गया।

मौर्य-शासन के सम्बन्ध में स्मिथ ने लिखा है- ‘मौर्य शासन बड़ा ही सुसंगठित तथा पूर्ण सुयोग्य एकतन्त्र था जिसमें अकबर से भी अधिक विस्तृत साम्राज्य पर नियन्त्रण रखने की क्षमता थी। बहुत सी बातों में इसने आधुनिक काल की संस्थाओं का पूर्वाभास दिया था।’

मेगस्थनीज का विवरण

सैल्यूकस ने मेगस्थनीज को अपना राजदूत बना कर चन्द्रगुप्त की राजधानी पाटलिपुत्र में रखा था। वह बहुत दिनों तक चन्द्रगुप्त के दरबार में रहा जिससे उसे मौर्य राज्यतंत्र तथा भारतीय समाज को अपनी आँखों से देखने का अवसर प्राप्त हुआ। उसने जो कुछ देखा और अन्य लोगों से सुना उसे ‘इण्डिका’ नामक पुस्तक में लिख दिया।

यद्यपि यह ग्रन्थ अब तक उपलब्ध नहीं हो सका है परन्तु इस ग्रंथ की बहुत सी बातों को अन्य यूनानी लेखकों ने अपने ग्रन्थों में लिखा है। इन सबका संग्रह कर लिया गया है जिसके अध्ययन से मेगस्थनीज के भारतीय विवरण का बोध हो जाता है। कुछ इतिहासकारों ने मेगस्थनीज को नितान्त झूठा तथा ढोंगी बताया है और उसके विवरण को बिल्कुल अविश्वसनीय बताया है।

अनुमान होता है कि जो कुछ उसने अपनी आँखों से देखा, उसमें सत्य का बहुत बड़ा अंश विद्यमान है परन्तु जो कुछ उसने दूसरों से सुनकर लिखा, वे असत्य से भरी हुई हैं। यूनानी होने के कारण वह भारतीय प्रथाओं को ठीक से समझ नहीं सका, इसलिये उनके विषय में उसने भ्रमपूर्ण बातें लिख दीं। कई स्थानों पर उसने भारतीय परम्पराओं को यूनानी परम्पराओं से मिला दिया है।

दक्षिण भारत को उसने देखा ही नहीं था और उसके विषय में दूसरों से सुनकर लिखा है। इसलिये उसमें असत्य की मात्रा अधिक है। जो कुछ उसने भारतीय जनश्रुतियों के आधार पर लिखा, वह भी विश्वसनीय नहीं है। इतनी बातों के होते हुए भी भारतीय इतिहास के निर्माण में मेगस्थनीज के विवरण से बड़ी सहायता मिलती है। उसने भाारत की भौगोलिक, सामाजिक तथा राजनीतिक दशा पर पर्याप्त प्रकाश डालने का प्रयत्न किया है।

(1) भौगोलिक दशा

भारत की सीमा का वर्णन करते हुए मेगस्थनीज ने लिखा है कि इसके उत्तर में हिमालय पर्वत, दक्षिण तथा पूर्व में समुद्र और पश्चिम में सिन्धु, गंगा, सोन आदि नदियाँ विद्यमान हैं। दक्षिण भारत की नदियों का उल्लेख उसने बिल्कुल नहीं किया। चूंकि अफगानिस्तान, चन्द्रगुप्त के साम्राज्य का अंग था इसलिये उसने अफगानिस्तान की काबुल, स्वात, गोमल आदि नदियों का उल्लेख किया है। उसने भारत की जलवायु के विषय में लिखा है कि गर्मी की ऋतु में बड़ी गर्मी पड़ती है। वर्षा, गर्मी तथा जाड़ा दोनों ही ऋतुओं में होती है, परन्तु गर्मी के दिनों में अधिक वर्षा होती है।

(2) सामाजिक दशा

मेगस्थनीज ने मौर्य कालीन सामाज का वर्णन करते हुए सात वर्गों अथवा जातियों का उल्लेख किया है। पहले वर्ग में उसने ब्राह्मणांे तथा दार्शनिकों को रखा है। यद्यपि इनकी संख्या कम थी परन्तु समाज में ये लोग बड़े आदर की दृष्टि से देखे जाते थे। ये लोग राजा तथा प्रजा के लिए यज्ञ करते थे। इस सेवा के कारण ये लोग राज्य-करों से मुक्त रहते थे।

दूसरा वर्ग कृषकों का था। समाज में इनकी संख्या सर्वाधिक थी। ये लोग खेती करते थे। अपने खेतों की उपज का चौथाई भाग राज्य को कर के रूप में देते थे। लड़ाई के समय में भी इनकी खेती को कोई हानि नहीं पहुंचती थी। तीसरा वर्ग ग्वालों तथा शिकारियों का था। ग्वालों का मुख्य व्यवसाय पशु-पालन तथा दूध बेचना और शिकारियों का जंगली पशुओं का शिकार करना था। ग्वाले पशुओं को बेचते और किराये पर भी देते थे।

शिकारी लोग जंगली पशुओं का शिकार करके खेतों की रक्षा करते थे। इस सेवा के बदले में शिकारियों को राज्य की ओर से धन मिलता था। शिकारी किसी एक स्थान पर नहीं रहते थे वरन् एक स्थान से दूसरे स्थान को घूमा करते थे। चौथे वर्ग में व्यापारी तथा श्रमजीवी आते थे। व्यापारी विभिन्न प्रकार के व्यवसाय तथा उद्योग-धन्धों में लगे रहते थे।

उन्हें अपनी आय का कुछ भाग राज्य को कर के रूप में देना पड़ता था। विदेशों से व्यापार करने के लिये व्यापारियों को राज्य की ओर से धन उधार मिलता था। श्रमजीवी लोग अन्य वर्गों की सेवा का कार्य करते थे। पाँचवां वर्ग योद्धाओं का था। इस वर्ग का सारा खर्च राजा स्वयं चलाता था।

योद्धा सदैव युद्ध करने के लिये उद्यत रहते थे और शान्ति के समय में आनन्द का जीवन व्यतीत करते थे। छठा वर्ग निरीक्षकों का था। इस वर्ग का कर्त्तव्य राजा के कार्यों का निरीक्षण करना और उसकी सूचना सम्राट को देना होता था। इन निरीक्षकों में से जो सर्वाधिक योग्य तथा विश्वसनीय होते थे, वे राजधानी तथा राज-शिविर के निरीक्षण के लिए रखे जाते थे।

निरीक्षक गुप्तचरों का भी काम करते थे। सातवां वर्ग मन्त्रियों तथा परामर्शदाताओं का था। इस वर्ग की संख्या सबसे कम थी परन्तु यह वर्ग समाज में सर्वाधिक शिक्षित तथा बुद्धिमान होता था। राज्य के उच्च पद इन्हीं को दिये जाते थे।

मेगस्थनीज का कहना है कि यह सातों जातियाँ अपने निश्चित कार्य को ही कर सकती थीं। इन्हें अन्य कार्यों को करने की आज्ञा नहीं थी। इनमें अन्तर्जातीय विवाह भी नहीं हो सकता था। मेगस्थनीज लिखता है कि भारतवासियों को अच्छे-अच्छे कपड़े पहनने का बड़ा शौक था। इनके वस्त्र बहुमूल्य होते थे और उन पर सोने का काम किया जाता था। विवाह का उद्देश्य भोग करना, जीवनसंगी बनाना और पुत्र उत्पन्न करना था।

इस काल में बहु-विवाह की भी प्रथा भी थी परन्तु यह सम्भवतः राजवंशों तक सीमित थी। एक विवाह-प्रथा में वर का पिता एक जोड़ी बैल, कन्या के पिता को देता था। मेगस्थनीज ने लिखा है कि भारतवासी लेखन-कला नहीं जानते थे। यह बिल्कुल असत्य प्रतीत होता है।

मेगस्थनीज ने ब्राह्मणों, संन्यासियों तथा श्रमणों का भी उल्लेख किया है। ये लोग अत्यन्त सरल जीवन व्यतीत करते थे और सांसारिक जीवन त्याग कर बस्ती से दूर निवास करते थे। ये लोग शाकाहारी होते थे और कुशासन अथवा मृगचर्म पर सोते थे। ये लोग प्रायः घूम कर जनता को उपदेश दिया करते थे। 

(3) राजनीतिक दशा

मेगस्थनीज ने लिखा है कि राजा दिन भर अपनी राजसभा में रहता था और न्याय करता था। उसे अपनी जान का सदैव भय लगा रहता था। इसलिये वह एक कमरे में दो रात से अधिक नहीं रहता था। जब कभी सम्राट शिकार के लिए जाता था तो उसका मार्ग रस्सियों से अलग कर दिया जाता था और यदि कोई इन रस्सियों को लांघने का प्रयत्न करता था तो उसे प्राण-दण्ड दिया जाता था।

मेगस्थनीज ने सम्राट के राज-भवन का बड़ा सुन्दर वर्णन किया है। वह लिखता है कि सम्राट के भवन पाटलिपुत्र में बने थे। इनके चारों और सुन्दर उद्यान तथा सरोवर थे। राजभवन के आंगन में पालतू मोर रखे जाते थे। उद्यानों में सुन्दर तोते बहुत बड़ी संख्या में पाये जाते थे जो राज-भवन के ऊपर मंडराया करते थे। सरोवरों में सुन्दर मछलियाँ रहती थी। मछलियों को पकड़ने की किसी को आज्ञा नहीं थी परन्तु राजकुमार लोग आमोद-प्रमोद के लिए उन्हें पकड़ सकते थे। सम्राट् प्रायः राज-प्रासाद के भीतर ही रहता था। उसकी रक्षा के लिए नारी संरक्षिकाएँ होती थीं।

केवल चार अवसरों पर सम्राट् अपने राज-भवन के बाहर निकलता था- (1) युद्ध के समय, (2) न्यायाधीश का पद ग्रहण करने के लिए, (3) बलि देने के लिए तथा (4) आखेट के लिए। मेगस्थनीज ने राज-दरबार का भी बड़ा सुन्दर वर्णन किया है। उसके कथनानुसार चन्द्रगुप्त का दरबार बड़े ठाट-बाट का था।

सोने-चांदी के सुन्दर बर्तन, जड़ाऊ मेज तथा कुर्सियाँ और कीमखाब के बारीक वस्त्र, देखने वालों की आँख को चकाचौंध कर देते थे। सम्राट मोती की मालाओं से अलंकृत पालकी और सुनहले फूलों से विभूषित हाथी पर बैठ कर राज-भवन के बाहर जाता था। सम्राट को शिकार करने का बड़ा शौक था। उसके आखेट के लिए बड़े-बड़े वन सुरक्षित रखे जाते थे। राजा को पहलवानों के दंगल, घुड़दौड़, पशुओं के युद्ध आदि देखने का बड़ा शौक था।

मेगस्थनीज ने चन्द्रगुप्त की राजधानी पाटलिपुत्र का भी बड़ा विस्तृत वर्णन किया है। वह लिखता है कि पाटलिपुत्र भारत का सबसे बड़ा नगर है। वह सोन तथा गंगा नदियों के संगम पर स्थित है। यह नगर साढ़े नौ मील लम्बा और पौने दो मील चौड़ा है।

नगर के चारों ओर एक खाई है जिसकी चौड़ाई 606 फुट और गहराई 45 फुट है। उसके चारों ओर एक दीवार है जिसमें 64 द्वार और 570 बुर्ज बने हैं। पाटलिपुत्र के प्रबन्ध के विषय में मेगस्थनीज ने लिखा है कि नगर का प्रबन्ध छः समितियों द्वारा होता था जिनमें से प्रत्येक में पाँच-पाँच सदस्य होते थे।

मोरलैंड ने मेगस्थनीज द्वारा वर्णित शासन की ओर संकेत करते हुए लिखा है- ‘जहाँ तक शासन का सम्बन्ध है, मेगस्थनीज के वर्णनांशों से हमें यह पता लग जाता है कि यह सुव्यस्थित तथा पूर्णतया सुंसगठित था।’

चन्द्रगुप्त के अन्तिम दिवस

जैन अनुश्रुतियों के अनुसार चन्द्रगुप्त ने महावीर स्वामी की शिष्यता ग्रहण कर ली थी। चन्द्रगुप्त ने 24 वर्षों तक शासन करने के उपरान्त राज-वैभव को त्यागकर 298 ई. पू. में संन्यास ग्रहण कर लिया। उसके शासन-काल के अंतिम भाग में उसके राज्य में बड़ा दुर्भिक्ष पड़ा। इसलिये जैन-भिक्षुकों के एक बहुत बड़े दल ने आचार्य भद्रबाहु के नेतृत्व में कर्नाटक के लिए प्रस्थान किया। चन्द्रगुप्त को भी वैराग्य उत्पन्न हो गया और वह अपना राज्य अपने पुत्र बिन्दुसार को सौंप कर स्वयं कर्नाटक के पर्वतों की ओर चला गया। वहीं पर एक जैन साधु की भांति उपवास करके उसने प्राण त्यागे।

चन्द्रगुप्त के कार्यों का मूल्याकंन

चन्द्र्रगुप्त मौर्य ऐतिहासिक काल का, भारत का प्रथम सम्राट था। उसे भारत में विशाल साम्राज्य की स्थापना करने का श्रेय प्राप्त है। जिन परिस्थितियों में उसने इस साम्राज्य की स्थापना की वे उसके गौरव को अधिक बढ़ा देती हैं। जिस समय उसने साम्राज्य स्थापित करने की कल्पना की उस समय वह साधनहीन था।

न उसके पास सेना थी और न सेना को संगठित करने के लिए धन था। वह अपने प्राणों की रक्षा के लिए इधर-उधर भटक रहा था। अपनी प्रतिभा के बल से उसने सेना और धन दोनों प्राप्त कर लिये। सौभाग्य से उसे चाणक्य जैसे अद्वितीय प्रतिभा वाले ब्राह्मण का धन तथा बुद्धि प्राप्त हो गई।

अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने दोनों का सदुपयोग किया। नन्दों के विशाल तथा शक्तिशाली साम्राज्य पर विजय प्राप्त करना खेल नहीं था। उसने न केवल एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की वरन् यूनानियों को भी अपने देश से मार भगाया और देश को विदेशी शासन से मुक्त करने का यश प्राप्त किया।

चंद्रगुप्त मौर्य प्रथम तथा अन्तिम भारतीय शासक था जिसने अफगानिस्तान तथा बिलोचिस्तान पर भी शासन किया। भारत की प्राकृतिक सीमाओं के बाहर शासन करने का यश उसी को प्राप्त है। उसने भारत के छोटे-छोटे राज्यों को समाप्त कर देश को राजनीतिक एकता प्रदान की और भारत के भावी महत्त्वाकांक्षी सम्राटों के लिए आदर्श उपस्थित किया।

उसने न केवल सम्पूर्ण उत्तरी भारत पर एकछत्र साम्राज्य स्थापित किया वरन् दक्षिण भारत के भी बड़े भाग पर शासन किया। उन दिनों, जब यातायात के साधनों का अभाव था, उसने एक असम्भव कार्य को सम्भव कर दिखाया। चन्द्रगुप्त ने न केवल एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की वरन् उसे सुरक्षित तथा स्थायी बनाने की भी व्यवस्था की।

उसने एक ऐसी सुसंगठित तथा सुसज्जित सेना का संगठन किया जिससे उसका साम्राज्य न केवल उसके अपने जीवन-काल में वरन् उसके उत्तराधिकारियों के काल में भी बाह्य आक्रमणों से सुरक्षित रहा।

चंद्रगुप्त मौर्य की कीर्ति न केवल सामारिक दृष्टिकोण से अमर है वरन् उसका प्रशासकीय दृष्टिकोण से भी भारतीय इतिहास में उच्च स्थान है। वह प्रजा को शान्ति, सुख तथा सम्पन्नता प्रदान करने में सफल रहा। उसका शासन लोककल्याणकारी राज्य की स्थापना का आदर्श रूप था।

उसने सत्ता का अत्यधिक विकेन्द्रीकरण करके प्रांतीय तथा स्थानीय शासन को अनेक अधिकार प्रदान किये। उसके शासन का आधार विकसित अधिकारी तंत्र था। उसके राज्य में उचित एवं कठोर न्याय व्यवस्था स्थापित की गई। उसके शासन में कृषि, शिल्प, उद्योग, संचार, वाणिज्य एवं व्यापार की वृद्धि के लिये राज्य की ओर से कई उपाय किये गये।

चंद्रगुप्त मौर्य ने जिस शासन व्यवस्था को प्रारम्भ किया वह भावी शासकों के लिए आदर्श तथा अनुकरणीय बन गई। उसने जिस मन्त्रिपरिषद् तथा विभागीय व्यवस्था का प्रारम्भ किया वह थोड़े-बहुत परिवर्तन के साथ आज भी विश्व के समस्त प्रजातान्त्रिक राज्यों में प्रचलित है। उसके द्वारा स्थापित स्थानीय शासन आज भी ग्राम-पंचायतों, नगर पालिकाओं तथा महापालिकाओं के रूप में कार्य कर रहा है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि सैनिक तथा प्रशासकीय दोनों ही दृष्टिकोण से चन्द्रगुप्त मौर्य एक आदर्श तथा अनुकरणीय सम्राट था। भारत के बहुत कम शासकों को इस बात का श्रेय है कि उन्होंने अपने इतने छोटे से शासन काल (24 वर्ष) में इतनी अधिक सफलताएं अर्जित की हों।

बिन्दुसार (268 ई.पू.-273 ई. पू.)

चंद्रगुप्त मौर्य के पश्चात् उसका पुत्र बिन्दुसार मगध के सिंहासन पर बैठा। उसने ‘अमित्रघात’ की उपाधि धारण की जिसका अर्थ होता है अमित्रों अर्थात् शत्रुओं का घात अर्थात् विनाश करने वाला। यद्यपि वह अपने पिता से प्राप्त साम्राज्य की सीमा में वृद्धि नहीं कर सका परन्तु वह आन्तरिक विद्रोहों को शान्त कर साम्राज्य को संगठित रखने में पूर्णरूप से समर्थ रहा।

उसके शासन-काल में पहला विद्रोह तक्षशिला में हुआ। उस समय बिन्दुसार का ज्येष्ठ पुत्र सुसीम वहाँ शासन कर रहा था। बिन्दुसार ने विद्रोह की सूचना पाते ही अपने दूसरे पुत्र अशोक को विप्लव शान्त करने के लिए तक्षशिला भेजा। वहाँ पहुंचने पर ज्ञात हुआ कि प्रजा ने राजा अथवा राजकुमार के विरुद्ध विद्रोह नहीं किया है वरन् यह विद्रोह अमात्यों के विरुद्ध था जो प्रजा पर अत्याचार करते थे।

अशोक ने अमात्यों का दमन करके तक्षशिला में शान्ति स्थापित की। विदेशी राज्यों के साथ बिन्दुसार ने अपने पिता की भाँति मैत्री-पूर्ण सम्बन्ध रखा। मिस्र तथा सीरिया के शासकों ने अपने राजदूत पाटलिपुत्र भेजे जहाँ उनका बड़ा आदर-सत्कार हुआ। भारत के बाहर परिचमोत्तर प्रदेश में उसने यूनानियों के साथ मैत्री का व्यवहार किया तथा उनके साथ व्यापारिक एवं सांस्कृतिक सम्बन्ध रखा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – मौर्य साम्राज्य

12. चंद्रगुप्त मौर्य  

13. अशोक महान् 

14. मौर्य-कालीन भारत 

अशोक महान् (अध्याय 13)

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अशोक महान्

अशोक महान् मौर्य राजवंश का तीसरा राजा था। वह चंद्रगुप्त मौर्य का पौत्र तथा बिन्दुसार का पुत्र था। उसका वास्तविक नाम अशोक था किंतु जवाहरलाल नेहरू ने अशोक को अशोक महान् तथा अकबर को अकबर महान् लिखा है, इस कारण इतिहास में उसे अशोक महान् के नाम से जाना जाता है।

मौर्य सम्राट बिन्दुसार के कई पुत्र तथा कन्याएँ थीं। अशोक उसका ज्येष्ठ पुत्र था जो बड़ा ही वीर तथा साहसी था। बौद्ध ग्रन्थ ‘दिव्यावदान’ में अशोक के दो भाइयों सुसीम तथा विगतशोक का उल्लेख मिलता है। सुसीम अशोक का सौतेला और विगतशोक उसका सगा भाई था। 273 ई.पू. में बिन्दुसार का निधन हो गया और उसका ज्येष्ठ पुत्र अशोक मगध के सिंहासन पर बैठा।

अशोक महान् का प्रारम्भिक जीवन

अशोक बिन्दुसार का पुत्र और चन्द्रगुप्त का पौत्र था। उसकी माता चम्पा-निवासी एक ब्राह्मण की कन्या थी। वह ब्राह्मण बिन्दुसार को अपनी रूपवती, दर्शनीय कन्या उपहार (भेंट) के रूप में दे गया था। अन्तःपुर की अन्य रानियाँ उसके असीम सौन्दर्य से आतंकित हो उठीं और उन्होंने उसे नाइन (नौकरानी) के रूप में रनिवास में रखा।

कालान्तर में सम्राट को इस रहस्य का पता लग गया और उसने उसे अपनी पटरानी बना लिया। ब्राह्मण-कन्या से बिन्दुसार के दो पुत्र उत्पन्न हुए। इनमें से एक का नाम अशोक और दूसरे का विगतशोक रखा गया। अशोक की माँ का नाम कई ग्रन्थों में ‘धम्मा’ मिलता है परन्तु कुछ ग्रन्थों में उसे ‘सुभद्रांगी’ अर्थात् ‘अच्छे अंगों वाली’ कहा गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि उसका बचपन का नाम ‘धम्मा’ था। अत्यन्त रूपवती होने के कारण उसका नाम ‘सुभद्रांगी’ पड़ गया।

कुछ विद्वानों के विचार में अशोक सैल्यूकस की पुत्री का पुत्र था जिसका विवाह उसने चन्द्रगुप्त से परास्त होने के बाद बिन्दुसार के साथ कर दिया था, परन्तु इस बात का कोई विश्वस्त प्रमाण नहीं है। अशोक के कई पत्नियाँ थी जिनमें से ‘देवी’ सर्वाधिक प्रसिद्ध है। वह विदिशा के एक श्रेष्ठी (व्यवसायी) की कन्या थी जिसका नाम देवी था। महेन्द्र तथा संघमित्रा इसी देवी की सन्तान थे जिन्होंने बौद्ध धर्म के प्रचार में बड़ा योगदान दिया।

अशोक की दूसरी पत्नी का नाम पद्मावती था जिससे कुणाल नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था। अशोक ने अपने पिता के जीवन काल में ही शासन का काफी अनुभव प्राप्त कर लिया था। वह अवन्ति (उज्जयिनी) तथा तक्षशिला का प्रान्तपति रह चुका था। इससे स्पष्ट है कि बिन्दुसार को अशोक की कार्य-कुशलता, विवेकशीलता तथा वीरता में पूरा विश्वास हो गया था अन्यथा वह सुदूरस्थ प्रान्तों में इतने महत्त्वपूर्ण पद पर उसे नियुक्त नहीं करता। 

अशोक महान् का सिंहासनारोहण

महावंश टीका में लिखा है कि बिन्दुसार के एक सौ पुत्र थे जिनमें विगतशोक ही अशोक का सगा भाई था। शेष समस्त भाई उसके सगे भाई न थे। इनमें सुमन अथवा सुसीम सबसे बड़ा था। अशोक सुमन से छोटा और शेष भाइयों से बड़ा था। वह अपने समस्त भाइयों से अधिक तेजस्वी था।

कहा जाता है कि अशोक ने अपने 99 सौतेले भाइयों की हत्या कर समस्त जम्बूद्वीप अर्थात् भारतवर्ष पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। यद्यपि भाइयों की हत्या की कथा कपोल-कल्पित और बौद्ध आचार्यों की मन-गढ़न्त प्रतीत होती है परन्तु इसमें सन्देह नहीं कि अशोक को अपने बड़े सौतेले भाई सुसीम के साथ संघर्ष करना पड़ा था।

विभिन्न सूत्रों से ज्ञात होता है कि बिन्दुसार सुसीम को अधिक प्यार करता था और उसे अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहता था। ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण नैतिक दृष्टि से भी उसी को सिंहासन मिलना चाहिए था परन्तु अशोक अपने भाइयों में सर्वाधिक योग्य था और अवन्ति तथा तक्षशिला में सफलता पूर्वक शासन करके और तक्षशिला के विद्रोह को शान्त करके अपनी वीरता तथा शासन क्षमता का परिचय दे चुका था।

इसलिये प्रधानमन्त्री खल्वाटक तथा अन्य अमात्य उसी को राजा बनाना चाहते थे। फलतः जब बिन्दुसार की मृत्यु हो गई तब अशोक तथा सुसीम में संघर्ष हुआ। इस संघर्ष का एक बहुत बड़ा प्रमाण यह है कि अशोक का राज्याभिषेक उसके सिंहासनारोहण के चार वर्ष बाद हुआ था। सम्भवतः भाइयों के पारस्परिक संघर्ष के कारण ही यह विलम्ब हुआ।

अधिंकाश विद्वानों की धारणा है कि संभवतः इस युद्ध में सुसीम तथा उसके कुछ अन्य भाइयों की हत्या हुई। अशोक के अभिलेखों से ज्ञात होता है कि उसके राज्याभिषेक के बाद भी उसके कई भाई जीवित थे। प्रतीत होता है कि बौद्ध आचार्यों ने इस बात को दिखाने के लिए कि बौद्ध-धर्म को स्वीकार कर लेने पर एक क्रूर तथा हत्यारा व्यक्ति भी उदार तथा दयावान् बन सकता है, अशोक द्वारा अपने 99 भाइयों की हत्या की कथा का आविष्कार किया गया।

अशोक महान् की विजयें

सिंहासनारोहण के उपरान्त अशोक ने अपने पिता बिन्दुसार तथा अपने पितामह चन्द्रगुप्त की साम्राज्य विस्तार नीति को जारी रखा। सैल्यूकस पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त चन्द्रगुप्त ने विदेशियों के साथ मैत्री रखने तथा सम्पूर्ण भारत पर एकछत्र साम्राज्य स्थापित करने का निश्चय किया था।

अशोक ने भी इसी नीति को अपनाया। उसने यूनानियों के साथ मैत्री भाव रखा और उनके साथ राजदूतों का आदान-प्रदान किया। उसने यूनानियों को राजकीय पदों पर भी नियुक्त किया। सम्पूर्ण भारत पर एकछत्र साम्राज्य स्थापित करने के लिए उसने दिग्विजय की नीति का अनुसरण किया। उसने उन पड़ोसी राज्यों पर, जो साम्राज्य के बाहर थे, आक्रमण करना आरम्भ कर दिया।

काश्मीर विजय

राजतरंगिणी के अनुसार अशोक काश्मीर का प्रथम मौर्य  सम्राट था। उसने कश्मीर घाटी में श्रीनगर की स्थापना की थी। इससे कुछ विद्वानों ने यह निष्कर्ष निकाल लिया कि अशोक ने ही काश्मीर को जीतकर मगध साम्राजय में मिलाया था परंतु अशोक के बारे में विख्यात है कि उसने कलिंग के अतिरिक्त और कोई विजय नहीं की थी।

बिंदुसार ने भी साम्राज्य का विस्तार नहीं किया था। अतः काश्मीर विजय का श्रेय चंद्रगुप्त मौर्य को ही मिलना चाहिये। राजतरंगिणी के अतिरिक्त और किसी स्रोत से अशोक द्वारा काश्मीर जीतने की पुष्टि नहीं होती।

कंलिग विजय

कंलिग का राज्य अशोक के साम्राज्य के दक्षिण-पूर्व में जहाँ आधुनिक उड़ीसा का राज्य है, स्थित था। अशोक के सिंहासनारोहण के समय वह पूर्ण रूप से स्वतन्त्र था और उसकी गणना शक्तिशाली राज्यों में होती थी। कंलिग के राजा ने एक विशाल सेना का संगठन कर लिया था और अपने राज्य को सुदृढ़ बनाने में संलग्न था। ऐसे प्रबल राज्य का मगध-राज्य की सीमा पर रहना मौर्य साम्राज्य के लिये हितकर नहीं था।

इसलिये अपने सिंहासनारोहण के तेरहवें वर्ष और अपने राज्याभिषेक के नवें वर्ष में अशोक ने कलिंग पर एक विशाल सेना के साथ आक्रमण कर दिया। यद्यपि कंलिग की सेना बड़ी वीरता तथा साहस के साथ लड़ी परन्तु वह अशोक की विशाल सेना के सामने ठहर न सकी और अन्त में परास्त होकर भाग खड़ी हुई। कलिंग पर अशोक का अधिकार स्थापित हो गया। उसने अपने एक प्रतिनिधि को वहाँ का शासक नियुक्त कर दिया। इस प्रकार कंलिग मगध साम्राज्य का अंग बन गया।

कंलिग युद्ध के परिणाम

कंलिगयुद्ध का पहला परिणाम यह हुआ कि मगध साम्राज्य की सीमा में वृद्धि हो गई और अशोक की साम्राज्यवादी नीति पूर्ण रूप से सफल सिद्ध हुई। अब उसका राज्य पश्चिम में हिन्दूकुश पर्वत से लेकर पूर्व में बंगाल तक और उत्तर में हिमालय पर्वत से लेकर दक्षिण में मैसूर तक फैल गया।

कंलिग विजय का दूसरा परिणाम यह हुआ कि इसमें भीषण हत्याकांड हुआ। कहा जाता है कि इस युद्ध में हताहतों की संख्या दो लाख पचास हजार से अधिक थी जिनमें सैनिकों के साथ-साथ साधारण जनता भी सम्मिलित थी। इस भीषण रक्तपात के पश्चात् कंलिग में भयानक महामारी फैली जिसने असंख्य प्राणियों के प्राण ले लिये।

अशोक के हृदय पर कंलिग-युद्ध के भीषण नर-संहार का गहरा प्रभाव पड़ा। उसने सकंल्प किया कि भविष्य में वह युद्ध नहीं करेगाा और युद्ध के स्थान पर धर्म-यात्राएँ करेगाा। अब युद्ध-घोष के स्थान पर धर्म-घोष हुआ करेगा और सबसे मैत्री तथा सद्भावना रखी जायेगी। यदि कोई क्षति भी पहुँचायेगाा तो सम्राट् उसे यथा सम्भव सहन करेगा। अशोक ने न केवल स्वयं युद्ध न करने का निश्चय किया वरन् अपने पुत्र तथा पौत्र को भी युद्ध न करने का आदेश दिया।

कुछ इतिहासकारों के विचार में अशोक की युद्ध न करने की नीति का बुरा राजनीतिक प्रभाव पड़ा। जिससे भारत की सैनिक शक्ति उत्तरोत्तर निर्बल होती गई, विदेशियों को भारत पर आक्रमण करने का दुःसाहस हुआ और उन्होंने विभिन्न भागों पर अधिकार स्थापित कर लिया। भारत पर इस युद्ध का गहरा धार्मिक तथा सांस्कृतिक प्रभाव पड़ा।

अशोक ने इस युद्ध के उपरान्त बौद्ध-धर्म को स्वीकार कर लिया और उसके प्रचार का प्रयास किया, जिसके फलस्वरूप बौद्ध धर्म का न केवल सम्पूर्ण भारत में वरन् विदेशों में भी प्रचार हो गया। अशोक ने जिन देशों में बौद्ध-धर्म का प्रचार करवाया उनके साथ उसने मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किये। इससे उन देशों के साथ भारत का व्यापारिक तथा सांस्कृतिक सम्बन्ध भी स्थापित हो गया और उन देशों में भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति का प्रचार हो गया।

कंलिग युद्ध का महत्त्व

कंलिग युद्ध का भारत के इतिहास में बहुत बड़ा महत्त्व है। इसका न केवल राजनीतिक वरन् सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी बहुत बड़ा महत्त्व है। वास्तव में यहीं से भारत के इतिहास में एक नये युग का आरम्भ होता है।

यह युग है शान्ति तथा सदभावना का, सामाजिक सुधार का, नैतिक उन्नति का, धार्मिक प्रचार का, आर्थिक समृद्धि का, साम्राज्य-विस्तार के विराम का, सैनिक हा्रस का तथा बृहत्तर भारत के प्रसार का। यहीं से उस साम्राज्यवादी नीति का अन्त हो जाता है जिसका प्रारम्भ चन्द्रगुप्त मौर्य ने किया था।

राजनीति में अहिंसा की नीति के अनुसारण से भारत का सैनिक बल समाप्त हो गया और वह पतनोन्मुख हो गया परन्तु अशोक ने अपनी सारी शक्ति प्रजा की आर्थिक तथा आध्यात्मिक उन्नति में लगा दी। भारतीय इतिहास में अन्तर्राष्ट्रीयता का युग यहीं से आरम्भ होता है और भारत की कूप-मण्डूकता समाप्त होती है।

प्रायः युद्ध में विजय प्राप्त करने से विजय-कामना प्रबल हो जाती है परन्तु कंलिग-युद्ध, प्रथम उदाहरण है जब इसके विजेता ने सैनिक सन्यास ले लिया और भविष्य में युुद्ध न करने का निश्चय किया। यहीं से अशेक की महानता का बीजारोपण हुआ और यह भारतीय नरेशों का शिरोमणि बन गया।

डॉ. हेमचन्द्र राय चौधरी ने कंलिग युद्ध का महत्त्व बताते हुए लिखा है- ‘कंलिग युद्ध ने अशोक के जीवन को एक नया मोड़ दिया और भारत तथा सम्पूर्ण विश्व के इतिहास पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डाला।’

डॉ. एन. एन. घोष ने लिखा है- ‘अशोक ने अपनी तलवार को म्यान में रख लिया और धर्म-चक्र को ग्रहण कर लिया।’

डॉ. हेमचन्द्र राय चौधरी ने लिखा है- ‘अब भेरि-घोष के स्थान को धर्म-घोष ग्रहण करेगा।’

अशोक महान् का शासन

अशोक की ‘युद्ध-विराम-नीति’ का बड़ा परिणाम यह हुआ कि सारी शक्ति प्रशासकीय विभागों में नियोजित हो गई। अशोक सिंहासन पर बैठने के पूर्व ही, अवन्ति तथा तक्षशिला के प्रान्तपति के रूप में पर्याप्त प्रशासकीय अनुभव प्राप्त कर चुका था। इसलिये उसे अपने पूर्वजों के शासन को संभालने में कोई कठिनाई नहीं हुई।

अपने शासन के प्रारम्भिक काल में उसने अपने पूर्वजों की साम्राज्यवादी नीति का अनुसरण किया और उनके द्वारा स्थापित शासन-व्यवस्था के अनुसार शासन चलाता रहा। शासन का स्वरूप स्वेच्छाचारी, निरंकुश राजतन्त्र था और केन्द्रीय, प्रान्तीय तथा स्थानीय शासन पूर्ववत् चलता रहा।

पुरानी मन्त्रि-परिषद तथा विभागीय अध्यक्ष अन्य कर्मचारियों की सहायता से शासन को चलाते रहे परन्तु कलिंग-युद्ध के उपरान्त अशोक ने अपने शासन में नये सिद्धान्तों तथा आदर्शों का समावेश किया। ये आदर्श तथा सिद्धान्त निम्नांकित थे-

अशोक ने अपने शासन का आधार प्रजा-पालन तथा उसके हित-चिन्तन को बनाया। उसने अपनी प्रजा को संतान मानकर उसके अनुकूल आचरण करना आरम्भ किया।

अपने द्वितीय कंलिग शिलालेख में अशोक कहता है- ‘समस्त मनुष्य मेरी सन्तान हैं। जिस प्रकार मैं चाहता हूँ कि मेरी सन्तान इस लोक तथा परलोक में सब प्रकार की समृद्धि तथा सुख भोगे, ठीक उसी प्रकार मैं अपनी प्रजा के सुख तथा उसकी समृद्धि की कामना करता हूँ।’

अपने चौथे स्तम्भ-लेख में अशोक ने पितृत्व की भावना को इस प्रकार व्यक्त किया है- ‘जिस प्रकार मनुष्य अपनी संतान को अपनी चतुर धाय के हाथ में सौप कर निश्चिन्त हो जाता है और सोचता है कि वह उस बालक को यथा-शक्ति सुख देने की चेष्टा करेगी, उसी प्रकार अपनी प्रजा के सुख तथा हित-चिन्तन के लिए मैने ‘राजुक’ नामक कर्मचारी नियुक्त किये हैं।’

अशोक अपने सातवें शिलालेख में कहता है- ‘मैंने यह प्रबन्ध किया है कि सब समय में, चाहे मैं भोजन करता रहूँ, चाहे अन्तःपुर में रहूँ, चाहे शयनागार में, चाहे उद्यान में, सर्वत्र मेरे ‘प्रतिवेदक’ (संवाददाता) प्रजा के कार्य की सूचना मुझे दें। मैं प्रजा का कार्य सर्वत्र करूंगा। मैं समस्त कार्य इस दृष्टि से करता हूँ कि प्राणियों के प्रति मेरा जो ऋण है उससे मैं उऋण हो जाऊँ और न केवल इस लोक में लोगों को सुखी करूँ वरन् परलोक में उन्हें स्वर्ग-लोक का अधिकरी बनाऊँ।’

इस प्रकार अशोक ने शासन में नैतिक तथा लोक-मंगलकारी सिद्धान्तों तथा आदर्शों का सूत्रपात किया।

अशोक को अपने आदर्शों को व्यवहार में लाने के लिये अपने पूर्वजों की शासन व्यवस्था में थोड़ा बहुत परिवर्तन भी करना पड़ा। चूँकि प्रजा की नैतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति करना अशोक के शासन का परम आदर्श था, इसलिये उसने नये पदाधिकारियों की नियुक्ति की जो ‘धर्म-महामात्र’ कहलाये।

इनका प्रधान कार्य अकारण दण्डित व्यक्तियों को दण्ड से मुक्त करवाना, ऐसे दण्डित व्यक्तियों के दण्ड को कम करवाना जो वृद्ध हों अथवा जिनके आश्रित बहुत से बाल-बच्चे हों; और विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों के हित की चिन्ता करना था। उसने कुछ पुराने पदाधिकारियों के कार्यों में भी वृद्धि कर दी।

अपने तीसरे शिलालेख में अशोक करता है- ‘राज्य के युक्त, राजुक तथा प्रादेशिक नामक पदाधिकारी भविष्य में अपने नियत कार्यों के अतिरिक्त प्रति पांचवें वर्ष दौरा करके धर्म का प्रचार करें।’

उदार तथा लोक-मंगलकारी नीति के कारण अशोक को न्याय व्यवस्था में भी कई परिवर्तन करने पड़े। उसके पूर्वजों के काल का दण्ड विधान बड़ा कठोर था। अशोक ने उसमें उदारता का संचार कर दिया।

उसके चौथे शिलालेख से ज्ञात होता है कि उसने यह आज्ञा दे रखी थी कि यदि किसी व्यक्ति को मृत्युदण्ड मिलता हो तो उसे मृत्युदंड देने के पहले तीन दिन का अवकाश देना चाहिये, जिससे वह अवकाश के समय में अपने पापों का प्रायश्चित कर सके, अपने विचारों को सुधार सके तथा कुछ धार्मिक कृत्य कर सके जिससे उसका परलोक सुधर सके। उसके पांचवें शिलालेख से ज्ञात होता है कि वह प्रति वर्ष अपने राज्याभिषेक दिवस पर बंदियों को मुक्त करता था।

न्याय व्यवस्था में अशोक ने एक और प्रशंसनीय सुधार किया। उसने ‘राजुकों’ (न्यायाधीशों) को पुरस्कार तथा दण्ड देने की पूरी स्वतन्त्रता दे दी जिससे वे आत्म-विश्वास तथा निर्भीकता के साथ अपने कर्त्तव्य का पालन कर सकें और जनता की अधिक से अधिक सेवा कर सकें। 

अशोक ने अपनी प्रजा के जीवन तथा सम्पति की रक्षा की समुचित व्यवस्था करने के साथ-साथ उसके नैतिक तथा आध्यात्मिक विकास के लिए समुचित वातावरण तैयार करवाया। उसने राज्य के कर्मचारियों को आदेश दिया कि वे प्रजा की नैतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति का सदैव ध्यान रखें।

अशोक ने उन समारोहों, उत्सवों तथा अनुष्ठानों को बन्द करवा दिया जिनमें मांस, मदिरा तथा नाच गाने का प्रयोग होता था। इनके स्थान पर उसने धर्म समाजों की स्थापना करवाई जिससे प्रजा में धार्मिक भावना तथा नैतिक बल उत्पन्न हो। विहार (आनन्द) यात्राओं के स्थान पर अब उसने धर्म-यात्राओं को प्रोत्साहन दिया और स्वयं धर्म-यात्राएँ करने लगा। अशोक ने स्वयं अपनी प्रजा के समक्ष अपने उच्च एवं पवित्र नैतिक आचरण का आदर्श रखा, जिसका उसकी प्रजा पर गहरा प्रभाव पड़ा।

अशोक ने अनेक लोक-मंगलकारी कार्य करवाये। उसने सड़कें बनवाईं, उनके किनारे छायादार वृक्ष लगवाये और कुएँ तथा बावलियाँ खुदवाईं। पानी में उतरने के लिए उसने सीढ़ियाँ बनवाईं। राज्य की ओर से आम तथा बरगद के पेड़ लगवाये जाते थे जिससे उनकी सघन छाया में मनुष्य तथा पशु दोनों ही विश्राम कर सकें। सम्राट्, रानी तथा राजकुमारों की अपनी अलग-अलग दानशालाएँ होती थीं जिनमें दीन दुखियों को निःशुल्क भोजन तथा वस्त्र मिलता था।

अशोक की उदारता तथा दया केवल मनुष्यों तक ही सीमित न रही वरन् वह पशु-पक्षियों तक पहुँच गई थी। उसने न केवल मनुष्यों वरन् पशु-पक्षियों के लिए भी औषधालय बनवाये। औषधि की सुविधा के लिए जड़ी-बूटियों के पौधे भी लगवाने का प्रबन्ध किया। उसके प्रथम शिलालेख से ज्ञात होता है कि उसने आदेश दे रखा था कि उसकी राजधानी में किसी पशु की हत्या न की जाय। यह आदेश उसके अंहिसात्मक बौद्ध-धर्म को स्वीकार करने का फल था।

उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि अशोक का शासन बड़ा उदार तथा लोक-मंगलकारी था। उसने अपनी प्रजा को न केवल भौतिक सुख प्रदान किया वरन् उनकी नैतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति का भी यथाशक्ति प्रयत्न किया। स्मिथ ने अशोक को बड़ा ही सफल शासक बताया है।

स्मिथ लिखता है- ‘यदि अशोक योग्य न होता तो अपने विशाल साम्राज्य पर चालीस वर्ष तक सफलतापूर्वक शासन न किये होता और ऐसा नाम न छोड़ गया होता जो दो हजार वर्षों के व्यतीत हो जाने के उपरान्त भी लोगों की स्मृति में अब भी ताजा बना हुआ है।’

अशोक महान् का धम्म

अशोक के शिलालेखों में धम्म शब्द का बार-बार प्रयोग हुआ है। इस धम्म का वास्तविक अर्थ क्या है तथा वह किस धर्म का अनुयायी था, इस विषय पर विद्वानों में बड़ा मतभेद है। भिन्न-भिन्न इतिहासकारों ने अशोक के धम्म के बारे में भिन्न-भिन्न मत व्यक्त किये हैं। हेरास के विचार में अशोक ब्राह्मण-धर्म का अनुयायी था।

डॉ. एफ. डब्लू. टामस के मतानुसार वह जैन धर्म का अनुगमन करता था। डॉ. फ्लीट ने उसके धम्म को राज-धर्म बताया है तथा भण्डारकर ने उसके धम्म को उपासक बौद्ध-धर्म बताया है जिसे महात्मा बुद्ध ने गृहस्थों के लिए प्रतिपादित किया था और जिसमें केवल व्यावहारिक सिद्धान्तों को ग्रहण किया गया था।

विन्सेंट स्मिथ तथा डॉ. राधाकुमुद मुकर्जी ने अशोक के धम्म को सार्वभौम धर्म माना है जिसमें समस्त धर्मों के अच्छे गुण सन्निहित हैं और जो किसी भी एक धर्म की सीमा में नहीं समा सकता। इन समस्त मतों में सत्य का थोड़ा-बहुत अंश विद्यमान है परंतु वास्तविकता यह है कि अशोक के धार्मिक विचारों में समय-सम पर क्रमिक विकास होता चला गया।

(1) ब्राह्मण धर्म

अपने जीवन के प्रारंभिक-काल में अशोक ब्राह्मण धर्म का अनुयायी था। काश्मीरी लेखक कल्हण के मतानुसार वह शिव का उपासक था और पशु तथा मनुष्य की हत्या का विरोधी नहीं था। सम्राट के भेजनालय में शोरबा बनाने के लिए प्रतिदिन सहस्रों पशुओं की हत्या की जाती थी।

अपने पूर्वजों की भांति उसकी भी युद्ध में रुचि थी और उसे मनुष्यों का हत्याकांड कराने में संकोच नहीं होता था। अशोक का इस प्रकार का आचरण केवल कलिंग युद्ध तक ही रहा। इसलिये यह कहा जा सकता है कि अपने प्रारंम्भिक जीवन से कलिंग के युद्ध तक अशोक ब्राह्मण-धर्म का अनुयायी था तथा उस युग में प्रचलित मान्यताओं के अनुसार क्षात्र-धर्म का पालन करता था।

(2) बौद्ध धर्म

कलिंग युद्ध में हुए भीषण हत्याकांड के पश्चात् अशोक ने भविष्य में युद्ध न करने तथा प्राणी मात्र पर दया करने का निश्चय किया। अपने इस निश्चय के फलस्वरूप उसे ब्राह्मण धर्म को, जो शत्रुसंहारक अवधारणा पर आधारित था, त्याग देना पड़ा। उसे ऐसे धर्म में दीक्षित होने की आवश्यकता पड़ी, जो अहिंसक-धर्म हो और प्राणी मात्र पर दया करना सिखलाये।

भारतवर्ष में उस समय दो ऐसे धर्म थे, जो अहिंसा के पोषक थे और सत्कर्म तथा सदाचार पर बल देते थे। ये थे- जैन तथा बौद्ध धर्म। अशोक इन्हीं दोनों में से एक का अनुयायी बन सकता था। जैन-धर्म के कठोर नियमों तथा कठिन तपस्या के कारण अशोक ने इस बात का अनुभव किया कि उसकी प्रजा इसका अनुसरण न कर सकेगी।

इसलिये उसने अत्यंत सरल तथा व्यावहारिक बौद्ध धर्म को स्वीकार करने का निश्चय कर लिया। अपने राज्याभिषेक के नवें वर्ष में वह बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गया। ‘दीपवंश’ तथा ‘महावंश’ के अनुसार न्यग्रोध नामक व्यक्ति ने अशोक को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी थी। ‘दिव्यावदान’ के अनुसार बालपण्डित अथवा समुद्र ने उसे बौद्ध बनाया था।

विभिन्न साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि प्रारम्भ में अशोक एक उपासक के रूप में बौद्ध धर्म में दीक्षित हुआ था परन्तु कलिंग युद्ध के एक वर्ष उपरान्त अर्थात् अपने राज्याभिषेक के दसवें वर्ष में वह बौद्ध-संघ में सम्मिलत हो गया और उसके नियमों का पालन करने लगा।

बौद्ध-धर्म में दीक्षित होने के उपरान्त अशोक ने पहला काम यह किया कि उसने बुद्ध के जीवन से सम्बन्ध रखने वाले तीर्थ स्थानों की यात्रा की। सर्वप्रथम वह स्थविर उपगुप्त के साथ लुम्बिनी गया, जहाँ बुद्ध का जन्म हुआ था। उसने लुम्बनी में लगने वाले धार्मिक कर को बंद कर दिया और अन्य करों को भी 1/2 से घटा कर 1/8 कर दिया।

इस प्रकार अशोक महान् ने उपास्य-देव की जन्म भूमि में अपनी दया तथा उदारता का परिचय दिया। लुम्बिनी से अशोक कपिलवस्तु गया, जहाँ बुद्ध का शैशवकाल व्यतीत हुआ था। यहाँ से वह उपगुप्त के साथ बुद्धगया पहुंचा जहाँ उसने बोधि वृक्ष के दर्शन किये जिसके नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था।

यहाँ से अशोक महान् काशी के निकट सारनाथ गया, जहाँ बुद्ध ने अपने पांच शिष्यों को अपना प्रथम उपदेश दिया था। अन्त में वह कुशीनगर गया, जहाँ बुद्ध को निर्वाण प्राप्त हुआ था। वह बौद्ध धर्म से सम्बन्धित अन्य स्थानों पर भी गया। अशोक ने बुद्ध के अवशेषों को एकत्र किया और उन्हें फिर से वितरित कर उन पर स्मारक बनवाये।

अशोक महान् ने बौद्ध-संघ में उत्पन्न फूट को दूर करने का प्रयत्न किया। उसने संघ में फूट पैदा करने वाले भिक्षुओं को संघ से निष्कासित करने की व्यवस्था की। उसने राजधानी पाटलिपुत्र में तीसरी बौद्ध-संगीति बुलवाई और बौद्ध-धर्म के अनुयायियों में जो मतभेद उत्पन्न हो गया था उसको दूर करने का प्रयत्न किया।

अशोक महान् ने बौद्ध-धर्म के प्रचार का भी तन-मन-धन से प्रयत्न किया। ये सब बातें तथा उसके हिंसा-निषेधक कार्य सिद्ध करते हैं कि अशोक बौद्धधर्म का अनुयायी था। चीनी यात्रियों ने भी उसे बौद्ध धर्म का अनुयायी स्वीकार किया है।

अशोक को बौद्ध-धर्म का अनुयायी स्वीकार कने में केवल यही कठिनाई हो सकती है कि उसने बौद्ध-धर्म के चार आर्य-सत्यों अर्थात् दुःख, दुःख समुदय, दुःख निरोध तथा दुःख निरोध मार्ग का कहीं उल्लेख नहीं किया है। इस आपत्ति को यह कहकर दूर किया जा सकता है कि अशोक बौद्ध-धर्म के केवल उन नियमों का पालन कराना चाहता था, जो गृहस्थों के लिये थे, उनका नहीं जो भिक्षुओं के लिए थे।

(3) जैन धर्म

डॉ. एफ. डब्लू. टामस के मतानुसार अशोक जैन धर्म का अनुगमन करता था। इस मत के पक्ष में कहने के लिये अधिक बातें नहीं हैं। यह मत केवल इस अनुमान पर आधारित है कि अशोक का धम्म पूर्ण अहिंसा के सिद्धांत पर खड़ा था जो कि जैन धर्म के अहिंसा के विचार से मेल खाती हैं।

साथ ही इस मत के समर्थन में यह भी कहा जाता है कि चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने अंतिम समय में जैन धर्म स्वीकार कर लिया था। इसलिये अशोक ने अपने पिता द्वारा अपनाये गये धर्म का ही पालन किया किंतु अशोक जैन धर्म का अनुयायी था, इस बात के साक्ष्य नहीं मिलते हैं। अतः इस मत को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

(4) अशोक का धम्म

अशोक ने अपने ‘धम्म’ की व्याख्या अपने अभिलेखों में की है जिनका अध्ययन करने से उसके ‘धम्म’ के सार का पता लगता है। अपने दूसरे स्तम्भ लेख में अशोक स्वयं पूछता है कि धम्म क्या है ? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए वह स्वयं कहता है कि धम्म पापहीनता है, बहुकल्याण है, दया है, दान है, सत्य है, शुद्धि है।

अपने धम्म के अन्यान्य आचार तत्वों का उल्लेख करते हुए अशोक अपने द्वितीय लघु शिलालेख में कहता है कि माता-पिता की उचित सेवा, सर्व प्राणियों के प्रति आदर-भाव तथा सत्यता गुरुतर सिद्धांत हैं। इन धर्म-गुणों की वृद्धि होनी चाहिये। इसी भांति शिष्यों को गुरुओं का उचित आदर करना चाहिये तथा सम्बन्धियों से उचित व्यवहार उत्तम है।

ग्यारहवें शिलालेख में अशोक अपने धम्म के अन्यान्य तत्वों का उल्लेख करते हुए कहता है- ‘दासों, भृत्यों तथा वेतन भोगी सेवकों के साथ उचित व्यवहार, माता-पिता की सेवा, मित्रों, परिचितों, सम्बन्धियों ब्राह्मणों, श्रमणों और साधुओं के प्रति उदारता, प्राणियों में संयम तथा पशु बलि से विरतता ही धम्म है।’

अशोक के ‘धम्म’ का स्वरूप दो प्रकार का है, एक आदेशात्मक और दूसरा निषेधात्मक। माता पिता की सेवा करना, गुरुजनों का आदर करना; मित्रों, परिजनों, सम्बन्धियों, दासों, भृत्यों तथा वेतन-भोगी सेवकों के साथ उचित व्यवहार करना, ब्राह्मणों, श्रमण तथा साधुओं के प्रति उदारता दिखलाना और प्राणी-मात्र पर दया करना, अशोक के ‘धम्म’ का अभिलेखीय सार तथा उसका आदेशात्मक स्वरूप है।

अशोक ने कुछ दुर्गुणों तथा कुप्रवृत्तियों का भी निषेध किया है जो धर्म में बाधक सिद्ध होती हैं। ये कुप्रवृत्तियां उग्रता, निष्ठुरता, क्रोध, अभिमान, ईर्ष्या आदि हैं। इनको अशोक ने पाप कहा है। इन सब कुप्रभावों को मन में नहीं आने देना चाहिए। यही अशोक के ‘धम्म’ का निषेधात्मक स्वरूप है।

प्रत्येक धर्म के दो स्वरूप होते हैं। एक कर्मकांड मूलक और दूसरा आचार मूलक। कर्मकांड में विभिन्न प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान तथा समारोह किये जाते हैं तथा आचार मूलक में अच्छे आचार पर बल दिया जाता है। अशोक ने अपने ‘धम्म’ में कर्मकांडमूलक रूप को हतोत्साहित और आचार मूलक रूप को प्रोत्साहित किया है।

लोग अनेक प्रकार के मंगल-कार्य करते हैं परन्तु अशोक ने इन्हें निस्सार बताया है। वह इनके स्थान पर धर्म-मंगल करने पर बल देता है जो निश्चित रूप से फलदायक होता है। दासों और वेतन भोगी सेवकों से उचित व्यवहार करना, गुरुजनों का आदर करना, प्रणियों के प्रति अहिंसात्मक व्यवहार करना, ब्राह्मण और श्रमणों को दान देना तथा अन्य ऐसे कार्य धर्म-मंगल कहलाते हैं।

इसी प्रकार अशोक ने धर्म-दान को साधारण दान से अधिक उत्तम बताया है। दासों और सेवकों के प्रति उचित व्यवहार करना, माता-पिता की सेवा करना, मित्रों, परिचितों, संबंधियों, असहायों, ब्राह्मणों और श्रमणों के प्रति उदारता दिखलाना और अहिंसा करना ही धर्म-दान हैं। अपने तेरहवें शिला-लेख में अशोक ने धर्म विजय को साधारण विजय से अधिक कल्याणकारी बताया है।

(i) व्यवहारिक धर्म

अशोक महान् ने अपनी प्रजा से जिन आदेशों का अनुसरण करने के लिए कहा, उन उपदेशों को उसने स्वयं अपने जीवन व्यवहार में लाकर चरितार्थ किया। उसने हिंसात्मक परम्पराओं को बन्द करवाया। अशोक ने उन विहार-यात्राओं को त्याग दिया जिनमें आखेट द्वारा मनोरंजन किया जाता था।

अशोक महान् ने विहार यात्राओं के स्थान पर धर्म-यात्राएं आरम्भ की, जिनमें दर्शन, दान तथा उपदेशों का आयोजन रहता था। अशोक के बौद्ध धर्म में दीक्षित होने के पूर्व उसकी पाकशाला में सहस्रों पशुओं तथा पक्षियों की हत्या होती थी।

उसके प्रथम शिलालेख से ज्ञात होता है कि अशोक महान् ने यह आज्ञा दे दी थी कि उसकी पाकशाला में केवल तीन पशुओं अर्थात् दो मोर तथा एक मृग का वध हो। वह भी सदैव नहीं। भविष्य में यह भी बन्द कर दिया जाय। इस प्रकार अपने भोजनागार में भी उसने हिंसा को बन्द करवा दिया। सत्य बात तो यह है कि उसका धर्म उसके शासन तथा जीवन का एक अविच्छिन्न अंग बन गया था।

(ii) राज-धर्म

फ्लीट के अनुसार अशोक ने अपने अभिलेखों में जिस धर्म का प्रतिपादन किया है, वह वस्तुतः राज-धर्म है। भारतीय व्यवस्थाकारों ने राजा के लिये कतिपय कर्तव्याकर्तव्यों अथवा विधि निषेधों का उल्लेख किया है। इनके आधार पर ही राजा को अपना शासन संचालित करना चाहिये। महाभारत में इस राज-धर्म का सविस्तार वर्णन है। अशोक के अभिलेखों में वर्णित धम्म भी महाभारत के उस राजधर्म से मेल खाता है। अतः फ्लीट के अनुसार अशोक के धम्म को भी राज-धर्म ही समझना चाहिये।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार अशोक के अभिलेखों में वर्णित धम्म को राजधर्म मानने में कठिनाई यह है कि राजधर्म राजा के लिये होता है, प्रजा के लिये नहीं, जबकि अशोक के शिलालेखों में जिन बातों का उल्लेख किया गया है, उनमें राजा ने स्वयं द्वारा किये जा रहे धम्म के पालन के साथ-साथ उन बातों पर भी जोर दिया है जिन बातों का पालन वह प्रजा से करवाना चाहता था।

वास्तव में देखा जाये तो महाभारत में वर्णित राजधर्म के अनुसार राजा को प्रजा की भौतिक उन्नति के साथ उसकी नैतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति का भी प्रयास करना चाहिये। अशोक के स्तम्भ लेखों में वर्णित वे बातें जो प्रजा के पालन के लिये लिखी गई हैं, राजधर्म का ही हिस्सा हैं। अतः निष्कर्ष रूप में अशोक के धम्म को यदि राज-धर्म स्वीकार कर लिया जाये, तो इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है।

(iii) सार्वभौम-धर्म

अशोक का धार्मिक विचार तब उच्चता की पराकाष्ठा को पहुंच जाता है और उसका धर्म सार्वभौम धर्म बन जाता है, जब वह विभिन्न धर्मों की बाह्य विभिन्नता की उपेक्षा करके उनके आन्तरिक तत्त्वों पर बल देता है। अब अशोक का धार्मिक दृष्टिकोण इतना व्यापक हो जाता है कि वह किसी धर्म-विशेष का अनुयायी नही रह जाता वरन् वह एक नये धर्म का संस्थापक बन जाता है जो अशोक के ‘धम्म’ के नाम से विख्यात हुआ।

अशोक महान् का वह ‘धम्म’ सर्व-मंगलकारी है और उसका उद्देश्य प्राणी-मात्र का उद्धार करना है। यह धर्म अत्यंत सरल, व्यावहारिक, सर्वग्राह्य तथा सर्वमान्य है। दान देना, सब पर दया करना, सत्य बोलना, सबके कल्याण की चिन्ता करना, अपनी आत्मा तथा विचारों को शुद्ध रखना और किसी प्रकार के पापकर्म न करना, यही अशोक के ‘धम्म’ के प्रधान लक्षण थे।

अपने बारहवें शिलालेख में अशोक महान् ने सब धर्मों के सार की वृद्धि की कामना की है। यह सब सर्व धर्म सार समन्वित उसका अपना ‘धम्म’ था। सब धर्मों के सार की वृद्धि तभी हो सकती है जब मनुष्य दूसरे धर्मों के प्रति सहिष्णु हो। इसी ध्येय से अशोक ने अपने बारहवें शिलालेख में यह परामर्श दिया है कि मनुष्य को दूसरे के भी धर्म को सुनना चाहिए।

अशोक का कहना है कि जो मनुष्य अपने धर्म को पूजता है और अन्य धर्मों की निन्दा करता है वह अपने धर्म को बड़ी क्षति पहुंचाता है। इसलिये लोगों में वाक्-संयम होना चाहिए अर्थात् संभल कर बोलना चाहिए। यह अशोक की धार्मिक सहिष्णुता का अभिलेखीय प्रमाण है जो आज भी हमारा पथ प्रदर्शन कर सकता है।

अशोक के इन आदेशों तथा कामनाओं से स्पष्ट हो जाता है कि वह समस्त धर्मों के मध्य बड़ा है और किसी से अपने को संलग्न न करते हुए उनमें मेल तथा सद्भावना उत्पन्न करने का प्रयत्न कर रहा है। वह अपने सातवें शिलालेख में कहता है- ‘सर्वत्र समस्त धर्म वाले एक साथ निवास करें।’

अशोक महान् के अनेक अभिलेखों में ब्राह्मणों तथा श्रमणों को समान रूप से सम्मानित किया गया है। उसके आठवें शिलालेख से ज्ञात होता है कि अपनी धर्म यात्राओं में वह ब्राह्मणों तथा श्रमणों दोनों के ही दर्शन करता था और उन्हें दान देता था। उसके बारहवें अभिलेख में कहा गया है कि देवताओं का प्रिय ‘प्रियदर्शी’ राजा सब धर्मों तथा सम्प्रदायों, साधुओं और गृहस्थों को दान तथा अन्य प्रकार की पूजा से सम्मानित करता है।

अशोक महान् के धम्म की उपर्युक्तु विवेचना से इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि अशोक कलिंग युद्ध के पूर्व ब्राह्मण धर्म का अनुयायी था। कलिंग युद्ध के उपरान्त वह बौद्ध धर्म का अनुयायी हो गया और अन्त में उसने अपने नये धर्म की स्थापना की जिसे सार्वभौम धर्म कहने में संकोच नहीं होना चाहिए।

वह धर्म अत्यंत सरल, व्यावहारिक तथा आचार-मूलक था, जिसका अनुगमन उसकी प्रजा आसानी से कर सकती थी। उसमें उच्च कोटि की धार्मिक सहिष्णुता थी। अशोक के धर्म को राज धर्म नहीं कहा जा सकता क्योंकि उसमें न केवल राजा का वरन् प्रजा का हित भी निहित था।

(iv) प्राणी-मात्र का धर्म

अशोक का ‘धम्म’ मानव-जाति के लिए ही नहीं वरन् समस्त प्राणी-मात्र के लिये था। सब प्राणियों के प्रति अहिंसा उसके ‘धम्म’ का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धन्त था। वह अपने सातवें शिलालेख में कहता है- ‘मार्गों में मैंने वट-वृक्ष लगवाये जिससे वे पशुओं तथा मनुष्यों को छाया दें। मनुष्यों तथा पशुओं को सुख देने के लिए मैने अनेक आम्र-कुंज लगवाये।’

अपने दूसरे स्तम्भ लेख में अशोक कहता है, ‘मैंने मनुष्यों और पशु-पक्षियों तथा जानवारों के प्रति यथेष्ट तथा अनेक प्रकार से उदारता तथा अनुग्रह किये हैं।’

इस प्रकार अशोक ने प्राणी-मात्र पर दया करके अपने ‘धम्म’ की सर्वव्यापकता का परिचय दिया।

अशोक महान् द्वारा धर्म प्रचार

अशोक ने अपनी प्रजा के कल्याण के लिये न केवल धार्मिक उपदेश प्रस्तुत किये अपितु धर्म के प्रचार के लिये भी विशेष प्रयास किये। उसका उद्देश्य था कि उसका धर्म न केवल सम्पूर्ण भारत में वरन् सम्पूर्ण विश्व में प्रचारित हो जाये। अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने निम्नलिखित कार्य किये-

(1) सम्राट द्वारा धर्म का पालन

अशोक ने जिस धर्म का प्रतिपादन तथा प्रचार किया उसका स्वयं अपने जीवन में पालन भी किया। कलिंग-युद्ध के उपरान्त उसने अहिंसा-धर्म को स्वीकार कर लिया और जीवन-पर्यन्त अहिंसा-धर्म का पालन किया। उपदेशक के रूप में वह बौद्ध-धर्म में प्रविष्ट हुआ। उसने जीवन भर सक्रिय रूप से संघ की सेवा की और एक भिक्षु की भांति त्यागमय जीवन व्यतीत किया। अशोक के त्यागमय जीवन, धर्म-परायणता तथा निष्ठा का उसकी प्रजा पर गहरा प्रभाव पड़ा और प्रजा ने सम्राट् के आदर्शों का अनुगमन करना आरम्भ कर दिया।

(2) धम्म को राज-धर्म बनाना

अशोक ने अपने धर्म को राज-धर्म बना दिया। उसने न केवल अपने व्यक्तिगत जीवन को धर्ममय बनाया वरन् सम्पूर्ण शासन को धर्ममय बना दिया। राज्य उसके लिए साध्य न था वरन् धार्मिक आदर्शों को व्यवहार में लाने के लिए साधन बन गया। उसने अपने राज्य की सम्पूर्ण शक्ति तथा साधनों को धर्म प्रचार में लगा दिया। राज-धर्म बन जाने से अशोक के उत्तराधिकारियों ने भी इसको अपनाया तथा आश्रय दिया जिससे अशोक की मृत्यु के उपरान्त भी यह जीता-जागता रहा।

(3) धर्म-विभाग की स्थापना

अपने धर्म के प्रचार के लिए अशोक ने एक अलग धर्म-विभाग की स्थापना की। इस विभाग के प्रधान पदाधिकारी ‘धर्म-महामात्र’ कहलाते थे। इन धर्म-महामात्रों को यह आदेश दिया गया कि वे प्रजा की नैतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति का अधिक से अधिक प्रयत्न करें। धर्म-महामात्र घूम-घूम कर अशोक के धर्म का प्रचार करते थे।

(4) धर्म यात्राएँ

अशोक महान् ने मनोरंजन के लिए की जाने वाली विहार-यात्राओं को बन्द करवा दिया और उनके स्थान पर धर्म-यात्राएं करने लगा। इन धर्म-यात्राओं में ब्राह्मणों तथा श्रमणों का दर्शन किया जाता था और उन्हें दान दिया जाता था। स्थविरों का दर्शन करके उन्हें स्वर्ण-दान दिया जाता था। इन यात्राओं में लोगों से धर्म की चर्चा की जाती थी और उनके प्रश्नों का उत्तर दिया जाता था।

(5) धर्म-श्रावण

अपने धर्म के प्रचार के लिए अशोक ने धर्म-श्रावण की व्यवस्था की। उसके सातवें स्तंभ लेख से प्रकट होता है कि अशोक समय-समय पर अपनी प्रजा को धर्म का सन्देश देता था। यही सन्देश धर्म-श्रावण कहलाते थे। ऐसे अवसरों पर धर्म के सम्बन्ध में भाषण आदि दिये जाते थे। राजुक, प्रादेशिक, युक्त आदि राज्य कर्मचारी भी इस कार्य में सहायता देते थे।

(6) धार्मिक प्रदर्शन

प्रजा के हृदय में स्वर्ग प्राप्ति की कामना बढ़े और वे धर्म-निष्ठ होकर सदाचार करें, इस उद्देश्य से अशोक ने प्रजा को दिव्य रूपों का दर्शन कराना आरम्भ किया। उसने स्वर्ग में जाते हुए विमानों आदि का प्रदर्शन कराया और उन्हें स्वर्ग-प्राप्ति का के लिये प्रेरित करने का प्रयास दिया।

(7) धर्म-मंगल

अशोक ने सधारण मंगल को, जिसके अनुसार विभिन्न प्रकार के धार्मिक कृत्य तथा अनुष्ठान किये जाते थे, अनुचित तथा निष्फल बताकर धर्म-मंगल करने का उपदेश दिया। धर्म-मंगल को अशोक ने सार्थक तथा लाभदायक बतलाया। धर्म-मंगल सदाचार द्वारा किये जा सकते थे। इसलिये सम्राट ने आचरण की सभ्यता पर सर्वाधिक जोर दिया। बौद्ध-धर्म में आचरण की सभ्यता को प्रधानता दी गई है।

(8) दान-व्यवस्था

अशोक द्वारा धर्म-प्रचार के लिये आरम्भ की गई दान व्यवस्था का प्रजा पर गहरा प्रभाव पड़ा। राजधानी तथा अन्य स्थानों पर रोगियों, भूखों तथा दुःखी मनुष्यों को राज्य की ओर से दान देने की व्यवस्था की गई। यह दान व्यक्तियों तक ही सीमित न था, वरन् संस्थाओं को भी दिया जाता था। इन संस्थाओं में धार्मिक संस्थाओं का प्रमुख स्थान था। इस राजकीय सहायता से धर्मिक संस्थाओं को धर्म के प्रचार में बड़ा प्रोत्साहन मिला।

(9) लोक-हित के कार्य

अशोक ने लोक-हित के अनेक कार्यों को करके अहिंसा-धर्म को अत्यंत प्रिय बना दिया। उसने मुनष्य तथा पशुओं की चिकित्सा के लिए देश तथा विदेशों में भी औषधालय बनवाये और औषधियों के उद्यान लगवाये। इसी प्रकार के अन्य लोक-मंगलकारी कार्यों को करके अशोक ने प्राणी-मात्र पर दया दिखाने का उपदेश दिया।

(10) पशु-वध-निषेध

अशोक ने पशुओं के वध का निषेध करके तथा प्राणी मात्र पर दया दिखलाने का उपदेश देकर अहिंसा-धर्म के प्रचार में बड़ा योग दिया। अन्य प्रकार से भी पशु-पक्षियों की जो हिंसा होती थी उसे अशोक ने बन्द करवा दिया। वास्तव में अहिंसा तथा प्राणीमात्र पर दया करना उसके शासन का मूल मन्त्र बन गया था।

(11) निज्झाति अथवा आत्म-चिन्तन

अशोक का विश्वास था कि मनुष्य सदैव अपने सत्कार्मों को देखता है, अपने कुकर्मों पर उसकी दृष्टि नहीं जाती। इसका परिणाम यह होता है कि उसके पाप कर्म बढ़ते जाते हैं और वह धर्म पर नहीं चल पाता। इसलिये अशोक ने आत्म-परीक्षण, आत्म निरीक्षण तथा आत्म-चिंतन की व्यवस्था की, जिससे मुनष्य अपने पापों को देख सके और अपना सुधार कर सके। इसी को निज्झाति कहा गया है।

(12) धर्म अनुशासन

अशोक ने ‘धम्म’ के अनुशासन सम्बन्धी कुछ नियम बनाये और उन्हें प्रकाशित करवाया। इन नियमों के प्रचार तथा उसका पालन करवाने के लिए उसके पदाधिकारी भी नियुक्त किये जो राज्य में दौरा किया करते थे और देखते थे कि लोग धर्म के अनुशासन का पालन कर रहे हैं अथवा नहीं।

(13) बौद्ध-संगीति

अशोक ने अपने शासन-काल में अपनी राजधानी पाटलिपुत्र में तीसरी बौद्ध-संगीति बुलवाई। इस संगीति में बौद्ध-धर्म ग्रन्थों का संशोधन किया गया। बौद्ध-संघ में जो दोष आ गये थे उनको दूर करने का प्रयत्न किया गया। इन संशोधनों तथा सुधारों से बौद्ध-धर्म में जो शिथिलता आ रही थी वह दूर हो गई। अशोक के इस कार्य के सम्बन्ध में हण्टर ने लिखा है- ‘इस संगीति के माध्यम से लगभग आधी मानव जाति के लिए साहित्य और धर्म का सृजन किया गया और शेष आधी मानव-जाति के विश्वासों को प्रभावित किया गया।’

(14) मठों का निर्माण तथा उनकी सहायता

अशोक ने देश के विभिन्न भागों में अनेक मठों का निर्माण करवाया और उनकी सहायता की। इन मठों में बहुत बड़ी संख्या में भिक्षु-भिक्षुणी तथा धर्मोपदेशक निवास करते थे जो सदैव धर्म के चिन्तन तथा प्रचार में संलग्न रहा करते थे। ऐसी सुव्यवस्था में धर्म के प्रचार का क्रम तेजी से चलता रहा।

(15) धर्म-लिपि की व्यवस्था

अशोक ने धम्म के प्रचार के लिए धम्म के सिद्धान्तों तथा आदर्शों को पर्वतों की चट्टानों, पत्थरों के स्तम्भों तथा पर्वतों की गुफाओं में लिखवाकर उन्हें सबके लिए तथा सदैव के लिए सुलभ बना दिया। ये अभिलेख जन-साधारण की भाषा में लिखवाये गये थे जिससे समस्त प्रजा उन्हें समझ सके और उनका पालन कर सके। इस प्रकार के अभिलेखों से धम्म के प्रचार में बड़ी सहायता मिली।

(16) पाली भाषा में ग्रंथ रचना

अशोक के आदेश से बौद्ध-ग्रन्थों की रचना पाली भाषा में की गई जो जन-साधारण की तथा अत्यंत लोकप्रिय भाषा थी। चूंकि इस भाषा को साधारण लोग भी सरलता से समझ लेते थे इसलिये इससे बौद्ध-धर्म के प्रचार में बड़ा योग मिला।

(17) धर्म-विजय का आयोजन

अशोक ने धम्म का दूर-दूर तक प्रचार करने के लिए धर्म विजय का आयोजन किया। उसने भारत के भिन्न-भिन्न भागों तथा विदेशों में अपने धर्म के प्रचार का प्रयत्न किया। उसने दूरस्थ विदेशी राज्यों के साथ मैत्री की और वहाँ पर मनुष्यों तथा पशुओं की चिकित्सा का प्रबंध किया। उसने इन देशों में बौद्ध धर्म का प्रचार करने तथा हिंसा को रोकने के लिये उपदेशक भेजे।

अशोक महान् ने अपने पुत्र महेन्द्र तथा पुत्री संघमित्रा को धर्म का प्रचार करने के लिए सिंहलद्वीप अर्थात् श्रीलंका भेजा। अशोक के धर्म प्रचारक बड़े ही उत्साही तथा निर्भीक थे। उन्होंने मार्ग की कठिनाईयों की चिन्ता न कर श्रीलंका, बर्मा, तिब्बत, जापान, कोरिया तथा पूर्वी द्वीप-समूहों में धर्म का प्रचार किया। अशोक द्वारा किये गये प्रयत्नों के फलस्वरूप उसके शासनकाल में बौद्ध-धर्म को सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त हो गया।

भण्डारकर ने इस तथ्य की ओर संकेत करते हुए लिखा है- ‘इस काल में बौद्ध-धर्म को इतना महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त हो गया कि अन्य समस्त धर्म पृष्ठभूमि में चले गए… परन्तु इसका सर्वाधिक श्रेय तीसरी शताब्दी ई.पू. के बौद्ध सम्राट, चक्रवर्ती धर्मराज को मिलना चाहिए।’

वर्तमान में यद्यपि बौद्ध-धर्म अपनी जन्मभूमि में उन्मूलित सा हो गया है परन्तु उन देशों में वह अब भी अपना अस्तित्त्व बनाये हुए है।

अशोक महान् के अभिलेख

अशोक ने अपने जीवन-काल में अनेक शिलालेख तथा स्तम्भलेख लिखवाए जिनका बड़ा ऐतिहासिक महत्त्व है। इन स्तम्भलेखों से अशोक के साम्राज्य की सीमा निश्चित करने में बड़ी सहायता मिलती है। इनसे यह भी पता लग जाता है कि किन विदेशी राज्यों के साथ अशोक ने अपना मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किया था। ये अभिलेख अशोक महान् के धर्म, उसके चरित्र तथा शासन पर भी बहुत बड़ा प्रकाश डालते हैं।

डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी ने अशोक के अभिलेखों के महत्त्व को बताते हुए लिखा है- ‘अशोक के अभिलेख लेख-संग्रह अनूठे हैं। उनसे उसकी आन्तरिक भावनाओं और आदर्शों का पता लगता है। वे उस महान् सम्राट के शब्दों को ही शताब्दियों से वहन करते आये हैं।’

अशोक के अभिलेखों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है- (1) शिलालेख तथा (2) स्तम्भलेख।

शिलालेख स्तम्भ लेख से अधिक प्राचीन हैं। शिलालेख सीमान्त प्रदेश में पाये जाते हैं जबकि स्तम्भ लेख आन्तरिक प्रान्तों में पाये जाते हैं। विन्सेन्ट स्मिथ ने अशोक के अभिलेखों को तिथि क्रमानुसार आठ भागों में विभक्त किया है-

(1) लघु शिलालेख

इसके अन्तर्गत नं. 1 तथा नं. 2 के शिलालेख आते हैं। ये मैसूर तथा अन्य राज्यों में भी पाये जाते हैं। इनसे सम्राट् के व्यक्तिगत जीवन तथा धर्म के लक्षणों का पता चलता है।

(2) भब्रू शिलालेख

यह शिलालेख जयपुर राज्य में मिला था। इसमें बौद्ध-धर्म ग्रन्थों से लिये गए सात ऐसे उद्धरण हैं जिन्हें अशोक चाहता था कि उसकी प्रजा पढ़े और उसके अनुसार आचरण करे।

(3) चतुर्दश शिलालेख

ये संख्या में चौदह हैं। इन शिलालेखों में अशोक के नैतिक तथा राजनैतिक विचार अंकित किये गए हैं। इनमें तेरहवां शिलालेख अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। कलिंग-युद्ध के उपरान्त अशोक के मन में जो दुःख उत्पन्न हुआ वह इसी अभिलेख में अंकित है।

(4) दो कलिंग शिलालेख

इन शिलालेखों में उन सिद्धन्तों का उल्लेख मिलता है जिनके अनुसार कलिंग के विभिन्न प्रान्तों तथा सीमान्त-प्रदेश के अविजित लोगों के साथ व्यवहार किया जाना चाहिए था।

(5) तीन गुहा लेख

ये गया के निकट की बराबर नामक पहाड़ी में मिले हैं। इन शिलालेखों में सम्राट अशोक द्वारा दिये गये दानों का उल्लेख है जो उसने आजीवकों को दिये थे। इनसे अशोक की धार्मिक सहिष्णुता का पता चलता है।

(6) दो तराई स्तम्भ लेख

ये स्तम्भ लेख नेपाल की तराई में विद्यमान हैं। इन स्तम्भ लेखों में सम्राट अशोक की उन तीर्थ-यात्राओं का वर्णन है जो उसने बौद्ध धर्म के तीर्थ स्थानों के दर्शन के लिए की थी।

(7) सप्त स्तम्भ लेख

ये संख्या में सात हैं और छः स्थानों में पाये गये हैं। इनमें से दो दिल्ली में हैं। इन स्तम्भ लेखों में सम्राट के उन उपायों का उल्लेख है जो उसने धर्म-प्रचार के लिए किये थे।

(8) चार गौरा-स्तम्भ

इनमें से दो लेख सांची तथा सारनाथ की लाटों पर खुदे हुए हैं और दो प्रयाग में हैं। इन स्तम्भ लेखों को सम्भवतः बौद्ध-धर्म में उत्पन्न मतभेदों को दूर करने के लिये उत्कीर्ण कराया गया था।

क्या अशोक महान् सम्राट था ?

अशोक की गणना न केवल भारत के वरन् विश्व के महान सम्राटों में की जाती है। अशोक के सम्पूर्ण जीवन का अध्ययन कर लेने के उपरान्त उसकी महानता के कारणों का पता लगाना कठिन नहीं रह जाता।

उसकी महानता उसके साम्राज्य की विशालता, उसकी सेना की अजेयता, उसके शासन की सुदृढ़़ता अथवा उसके राज-वैभव में नहीं पायी जाती वरन् उसकी महानता उसके अलौकिक व्यक्तित्त्व, उसकी अगाध धर्मपरायणता, उसके धार्मिक विचारों की उदारता, उसके सिद्धान्तों तथा आदर्शों की उच्चता, राष्ट्र-निर्माण की योजनाओं, साहित्य तथा कला की अपूर्व सेवाओं तथा उसकी धर्म विजय में पाई जाती हैं।

समस्त मानव-समाज तथा समस्त प्राणियों के कल्याण की विराट चेष्टा उसे न केवल भारत वरन् सम्पूर्ण विश्व के महान सम्राटों में सर्वोत्कृष्ट स्थान प्रदान करती है। अशोक की महानता को सिद्ध करने के लिए निम्नलिखित तथ्य उपस्थित किये जा सकते हैं-

(1) महान् व्यक्तित्त्व

अशोक की महानता का सबसे प्रथम प्रमाण उसका महान् व्यक्तित्त्व है। कलिंग युद्ध के उपरान्त वह समस्त राजसी सुखों तथा विलासों को त्याग कर सन्त जैसा सरल तथा त्यागमय जीवन व्यतीत करने लगा। उसका जीवन शुद्ध, पवित्र तथा दयामय बन गया। आत्म-संयम तथा आत्म-नियंत्रण में वह पूर्णरूप से सफल रहा और आत्म-त्याग उसके जीवन का मूलमंत्र बन गया।

वह अहिंसा का पुजारी बन गया। उसने मांस-भक्षण बंद कर दिया। वह सत्यनिष्ठ, दयालु, सहिष्णु तथा शांतिमय बन गया। उसमें उच्च कोटि की कर्त्तव्य परायणता आ गई। वह अपनी प्रजा के हित-चिंतन में संलग्न रहता था और उसकी नैतिक, आध्यात्मिक, बौद्धिक तथा भौतिक उन्नति का अथक प्रयास करता था। शिलाओं तथा स्तम्भों पर अंकित अशोक के उपदेशों से ज्ञात होता है कि वह अपने युग का भद्रतम तथा श्रेष्ठतम व्यक्ति था।

(2) महान् धर्मतत्त्ववेत्ता

अशोक ने धर्म के वास्तविक तत्त्व को समझा था। उसकी महानता का सबसे बड़ा कारण उसकी धर्म-निष्ठा तथा धर्म-परायणता है। उसकी धार्मिक धारणा संकीर्ण न थी। वह कट्टरपंथी अथवा धर्मान्ध नहीं था। उसका धार्मिक दृष्टिकोण उदार तथा व्यापक था। उसकी धार्मिक धारणा का मूलाधार ईश्वर का पितृत्व तथा मानव का भ्रातृत्व था।

वह ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सिद्धान्त का अनन्य अनुयायी था। उसमें उच्च कोटि की धार्मिक सहिष्णुता थी। यद्यपि बौद्ध धर्म अशोक का व्यक्तिगत धर्म था और इसके प्रचार के लिए उसने तन-मन-धन से प्रयत्न किया परन्तु अन्य धर्म वालों के साथ उसने किसी भी प्रकार का अत्याचार नहीं किया।

समस्त धर्म तथा सम्प्रदाय अशोक की सहानुभूति तथा सहायता के पात्र थे। समस्त धर्मों के उत्तम तत्त्वों के संग्रह से उसका धम्म, सार्वभौम धर्म बन गया था जिसका लक्ष्य लोक-कल्याण तथा प्राणी मात्र का उद्धार करना था। अशोक की अगाध धर्म-निष्ठा तथा धर्म-तत्त्व-ज्ञान उसे महान् धर्माचार्यों में स्थान प्रदान करते हैं।

(3) महान् धर्म-प्रचारक

अशोक न केवल एक महान् धर्मोपदेशक था। वरन् वह एक महान् धर्म-प्रचारक भी था। अशोक ने धर्म का प्रचार न केवल भारत के कोने-कोने में किया वरन् उसके धर्म का आलोक विदेशों में भी पहुंचा जहाँ वह अब भी जीवित है और असंख्य व्यक्तियों की आत्मा को शांति दे रहा है। एक स्थानीय धर्म को अशोक ने अन्तर्राष्ट्रीय धर्म बना दिया।

इसी से डॉ. भण्डारकर ने लिखा है- ‘अशोक के आदर्श बड़े ऊँचे थे। उसने अपनी बुद्धिमत्ता तथा कलन-शक्ति को, संकीर्ण प्रांतीय बौद्ध सम्प्रदाय को, विश्वव्यापी धर्म बना देने में लगा दिया।’

धर्म-प्रचार का यह कार्य बाहुबल से नहीं वरन् आत्मबल से शान्तिपूर्वक, प्रेम तथा सद्भावना के साथ किया गया। यही बात अशोक के धर्म प्रचार की विशेषता थी जो उसे धर्म प्रचारकों में सर्वोच्च स्थान प्रदान करती है।

अशोक ने धर्मप्रचारकों की सहायता से धर्मप्रचार का जो श्लाघनीय कार्य किया उसकी प्रशंसा करते हुए के. जे.सौन्डर्स ने लिखा है- ‘विश्व इतिहास में सम्राट अशोक के धर्म प्रचारकों द्वारा सभ्यता के प्रचार का महत्त्वपूर्ण कार्य किया गया क्योंकि इन लोगों ने ऐसे देशों में प्रवेश किया जो अधिकांशतः बर्बर तथा अन्धविश्वासपूर्ण थे।’

(4) महान् धर्म-विजेता

अशोक एक महान् धर्म-विजेता था। कलिंग युद्ध के उपरान्त उसने भेरिघोष को सदैव के लिए शान्त करके धर्म-घोष करने का संकल्प लिया। उसने रणक्षेत्र में विजय प्राप्त करने के स्थान पर धर्मक्षेत्र में विजय पताका फहराने का निश्चय किया। यह विजय सरल नहीं थी, क्योंकि यह विजय शरीर पर नहीं, वरन् आत्मा पर प्राप्त करनी थी।

यह विजय बाहुबल अथवा सैन्यबल की विजय नहीं थी, वरन् आत्मबल तथा तथा प्रेमबल की विजय थी। यह विजय थोड़े से व्यक्तियों पर नहीं, वरन् प्रणिमात्र पर प्राप्त करनी थी। वह शांति विजय थी, अशांति की नहीं थी। अशोक ने धर्माचार्यों तथा धर्म-प्रचारकों की एक विशाल सेना संगठित की और उन्हें प्रेमायुध से सुसज्जित किया।

सत्य, सत्कर्म, सद्भावना, तथा सद्व्यवहार की यह चतुरंगिणी सेना धर्म-विजय के लिए निकल पड़ी। इस सेना के प्रेमायुद्ध के सामने न केवल सम्पूर्ण भारत नत-मस्तक हो गया वरन् उसकी विजय पताका विदेशों में भी फहराने लगी। यह विजय आध्यात्मिक तथा सांस्कृतिक विजय थी जो स्थायी सिद्ध हुई।

अशोक ने जिन देशों पर धर्म-विजय प्राप्त की उन्हें भारत के साथ प्रेम के ऐसे प्रबल बन्धन में बांध दिया कि अब तक वह अविच्छिन रूप से चलता आ रहा है। यह अशोक की अद्वितीय विजय थी जिसकी समता संसार का अन्य कोई विजयी सम्राट नहीं कर सकता।

(5) महान् शासक

अशोक की गणना विश्व के महान् शासकों में होती है। कलिंग युद्ध के उपरान्त अशोक के राजनीतिक आदर्श अत्यंत ऊँचे हो गये। प्रजा-पालन तथा उसके हित चिन्तन को अशोक ने अपने जीवन का महान् लक्ष्य बना लिया। वह अपनी प्रजा को सन्तानवत् समझने लगा और उसी के कल्याण की चिन्ता में दिन रात संलग्न रहने लगा।

डॉ. हेमचन्द्र राज चौधरी ने लिखा है- ‘वह अपने उत्साह में सुदृढ़़ और प्रयासों में अथक था। उसने अपनी सारी शक्ति अपनी प्रजा की आध्यात्मिक तथा भौतिक उन्नति में लगा दी जिसे वह अपनी सन्तान-सदृश समझता था।’

उसने विहार-यात्राएं बन्द करवा दीं जो आमोद-प्रमोद तथा मनोरंजन का साधन थीं और उनके स्थान पर धर्म-यात्राएं आरम्भ कीं जिनमें धर्मिक उपदेश दिये जाते थे। तीर्थ स्थानों के दर्शन किये जाते थे और ब्राह्मणों, श्रमणों तथा दीन-दुःखियों को दान दिये जाते थे।

उसका शासन इतना सुसंगठित, सुव्यवस्थित एवं लोक-मंगलकारी था कि उसके शासनकाल में कोई आन्तरिक उपद्रव नहीं हुआ और प्रजा ने अधिक सुख तथा शान्ति का उपभोग किया। अशोक ने अपनी प्रजा की न केवल भौतिक अभिवृद्धि का भगीरथ प्रयास किया वरन् उसकी नैतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति का भी यथा शक्ति प्रयास किया।

अशोक ने प्रजा के नैतिक तथा आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाने के लिए धर्म-महामात्रों को नियुक्त किया और राजकीय कर्मचारियों को आदेश दिया कि वे घूम-घूमकर प्रजा के आचरण का निरीक्षण करें और उसे सदाचारी तथा धर्म-परायण बनाने का प्रयत्न करें। शासक के रूप में अशोक की महानता इस बात में पायी जाती है कि देश के राजनीतिक जीवन में उसने आदर्श, पवित्रता तथा कर्त्तव्य-परायणता का समावेश किया।

अशोक ने एक भिक्षु जैसा सादा जीवन व्यतीत कर और राज-सुलभ समस्त सुखों का त्याग कर प्रजा के इहलौकिक तथा पारलौकिक हित-चिन्तन में संलग्न रहकर विश्व के सम्राटों के समक्ष ऐसा आदर्श प्रस्तुत किया जो सर्वथा अनुकरणीय है। एच. जी. वेल्स ने लिखा है- ‘प्रत्येक युग और प्रत्येक राष्ट्र इस प्रकार के सम्राट को उत्पन्न नहीं कर सकता है। अशोक अब भी विश्व के इतिहास में अद्वितीय है।’

(6) महान् राष्ट्र निर्माता

अशोक महान् राष्ट्र-निर्माता था। उसने राष्ट्र की एकता तथा संगठन के लिए सम्पूर्ण राज्य में एक राष्ट्र-भाषा का प्रयोग किया। इस तथ्य की पुष्टि उसके अभिलेखों में प्रयुक्त पाली भाषा से होती है। अशोक महान् ने अपने साम्राज्य के अधिकांश भाग में ब्राह्मी लिपि का प्रयोग कराया था। केवल पश्चिमोत्तर प्रदेश में खरोष्ठी लिपि का प्रयोग किया जाता था।

इस प्रकार भाषा तथा लिपि की एकता ने राजनीतिक एकता को सजीव बना दिया। देश के कोने-कोने में धर्म का प्रचार कर उसने सांस्कृतिक एकता की चेतना को जागृत किया। सम्पूर्ण राज्य के लिए एक जैसी न्याय व्यवस्था लागू करके उसने समानता के सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया था। अशोक ने शिल्प तथा स्थापत्य कला के विकास में भी बड़ा योग दिया। उसके काल के बने स्तंभ आज भी भारतीय कला का मस्तक ऊँचा किये हुए है।

(7) महान् आदर्शवादी

अशोक की महानता उसके उच्चादर्शों तथा महान् सिद्धान्तों में पाई जाती है। अशोक महान् ने राजनैतिक, सामाजिक तथा धार्मिक जीवन में ऐसे नवीन आदर्शों की स्थापना की जिनकी कल्पना उस काल का अन्य कोई महान् सम्राट नहीं कर सका।

राजनीतिक क्षेत्र में उसके आदर्श थे- युद्धविराम, शान्ति तथा सद्भावना की स्थापना, पड़ौसियों के साथ मैत्री तथा सहयोग स्थापित करना, विदेशों में युद्ध संदेश के स्थान पर शान्ति तथा सद्भावना के संदेश भेजना, प्रजा के हित-चिन्तन में दिन-रात संलग्न रहना और अपने सम्पूर्ण आमोद-प्रमोद तथा सुखों को प्रजा के हित के लिए त्याग देना, अपनी प्रजा का सच्चा सेवक बनना।

सामाजिक क्षेत्र में अशोक महान् लोकतंत्रवादी था और ‘वसुधैव कुटुम्कम’ अर्थात् सम्पूर्ण पृथ्वी ही परिवार है, सिद्धान्त का अनुयायी था। समानता, स्वतंत्रता तथा विश्व बंधुत्व उसके सामाजिक जीवन की आधार-शिलाएं थीं।

धार्मिक जीवन में अशोक महान् का आदर्श सहिष्णुता तथा समन्वयन था। तत्कालीन प्रचलित धर्मों के उत्तम तथ्यों के संग्रह से उसने एक ऐसे धर्म की स्थापना की जो सर्वमान्य हो। इस धर्म में न कोई दुरूह दर्शन था और न कोई आडम्बर। यह बड़ा ही सरल तथा व्यावहारिक धर्म था जिसमें आचरण की शुद्धता तथा कर्त्तव्य-पालन पर बल दिया जाता था।

सारांश रूप में कहा जा सकता है कि लोक-कल्याण, भौतिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति ही अशोक के जीवन के प्रधान लक्ष्य थे। एच.जी वेल्स ने अशोक की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘सहस्र सम्राटों के नामों के मध्य, जो इतिहास के पन्नों को भरे हुए हैं अशोक का नाम एक सितारे की भांति प्रकाशमान है।’

डॉ. हेमचन्द्र राय चौधरी ने भी इतिहास में अशोक महान् का स्थान निर्धारित करते हुए लिखा है कि भारत के इतिहास में अशोक दिलचस्प व्यक्ति था। उसमें चन्द्रगुप्त जैसी शक्ति, समुद्रगुप्त जैसी विलक्षण प्रतिभा और अकबर जैसी व्यापक उदारता थी।

अशोक महान् के उत्तराधिकारी

लगभग चालीस वर्ष तक सफलतापूर्वक शासन करने के उपरान्त 232 ई.पू. में अशोक महान् की मृत्यु हो गई। उसके बाद उसका पुत्र कुणाल सिंहासन पर बैठा। सिंहासन पर बैठने से पहले वह गान्धार का शासक रह चुका था। कुणाल के शासनकाल में मगध साम्राज्य का पश्चिमोत्तर भाग स्वतन्त्र हो गया और अशोक के दूसरे पुत्र जालौक ने काश्मीर में अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया।

कुणाल के बाद अशोक का पोता दशरथ मगध के सिंहासन पर बैठा। वह बड़ी ही धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति था। उसने नागार्जुनी की पहाड़ि़यों में आजीवकों के लिए गुहामन्दिर बनवाए। उसके शासनकाल में कलिंग ने मगध साम्राज्य से अपना सम्बन्ध विच्छेद कर लिया।

दशरथ के बाद सम्प्रति मगध के सिंहासन पर बैठा। वह एक योग्य तथा शक्तिशाली शासक था। वह जैन-धर्म का अनुयायी तथा आश्रयदाता था। सम्प्रति के बाद कई अयोग्य एवं शक्तिहीन राजा मगध के सिंहासन पर बैठे जिनके शासन-काल में साम्राज्य छिन्न-भिन्न होने लगा। वृहद्रथ अन्तिम मौर्य सम्राट था जिसकी हत्या उसके ही सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने की और स्वयं मगध का शासक बन गया। इस प्रकार चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा संस्थापित साम्राज्य का सदा के लिये अन्त हो गया।

मौर्य-साम्राज्य के पतन के कारण

अशोक महान् की मृत्यु के साथ ही मौर्य साम्राज्य के अंत का प्रारंभ हो गया। इसके लिये स्वयं अशोक से लेकर उसके उत्तराधिकारी भी जिम्मेदार थे। मौर्य-साम्राज्य के पतन के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-

(1) अशोक की अहिंसा की नीति

अशोक ने अहिंसा की नीति को शासन का आधार बनाया। इस नीति पर चलकर वह अपने जीवनकाल में साम्राज्य को सुसंगठित तथा सुव्यवस्थित रख सका परन्तु अहिंसा की नीति के अन्तिम परिणाम अच्छे न हुए। उसने जिस आध्यात्मिकता का वायुमंडल उत्पन्न किया, वह सैनिक दृष्टिकोण से साम्राज्य के लिए बड़ा घातक सिद्ध हुआ। अशोक के शासनकाल में ही सैनिक-शक्ति व्यर्थ समझी जाने लगी। इससे वह निश्चय ही क्षीण हो गयी होगी। उसके उत्तराधिकारी भी सैनिक शक्ति को बढ़ा नहीं सके होंगे।

(2) ब्राह्मणों की प्रतिक्रिया

मौर्य साम्राज्य के समस्त सम्राट प्रायः जैन अथवा बौद्ध धर्म के अनुयायी हुए और इन्हीं दो धर्मों को प्रश्रय तथा प्रोत्साहन देते रहे। इससे ब्राह्मणों में मौर्यों के विरुद्ध प्रतिक्रिया हुई और वे मौर्य-साम्राज्य के शत्रु हो गये। इससे राज्य की शक्ति निरंतर क्षीण होती चली गई।

(3) अशोक महान् के अयोग्य उत्तराधिकारी

अशोक के उत्तराधिकारियों में एक भी इतना योग्य न था जो उसके विशाल केन्द्रीभूत शासन को संभाल सकता। केन्द्रीय शक्ति के निर्बल होते ही राज्य के सुदूर भागों के प्रान्तपतियों ने विद्रोह का झंडा खड़ा कर दिया और स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया। अशोक के उत्तराधिकारियों में कुछ बड़े ही अत्याचारी हुए। अतः प्रजा की भी मौर्य शासकों के प्रति कोई सहानुभूति न रही। अशोक के कई पुत्र थे जिनमें परस्पर संघर्ष चला करता था। यह सब मौर्य-साम्राज्य के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ।

(4) अन्तःपुर तथा दरबार के षड्यन्त्र

अशोक के अनेक पुत्र तथा रानियां थीं, जो प्रायः एक दूसरे के विरुद्ध षड्यंत्र रचा करती थीं। इसका भी साम्राज्य पर अच्छा प्रभाव न पड़ा। वृहदृथ के शासन-काल में राज दरबार में दो दल हो गए थे। एक दल सेनापति का था और दूसरा प्रधानमन्त्री का। यह दल-बन्दी साम्राज्य के लिए घातक सिद्ध हुई। अन्त में सेनापति पुष्यमित्र शुंग, मौर्य-सम्राट वृहद्रथ की हत्या करके स्वयं मगध के सिंहासन पर बैठ गया। इस प्रकार मौर्य-साम्राज्य का दीपक सदैव के लिए बुझ गया।

(5) यवनों के आक्रमण

मौर्य-साम्राज्य की शक्ति को क्षीण होते देख बैक्ट्रिया के यवनों ने भी मगध राज्य के पश्चिमोत्तर प्रदेश पर आक्रमण करना आरम्भ किया और उसको छिन्न-भिन्न करने में बड़ा योग दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – मौर्य साम्राज्य

12. चंद्रगुप्त मौर्य  

13. अशोक महान् 

14. मौर्य-कालीन भारत 

मौर्य कालीन भारत

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मौर्य कालीन भारत

मौर्य कालीन भारत का इतिहास भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की अनूठी विरासत को समेटे हुए है। मौर्य कालीन समाज आज के भारतीय समाज से पूर्णतः भिन्न था। मौर्य कालीन भारत को जानने के तीन प्रमुख साधन हैं- (1) मेगस्थनीज का भारतीय विवरण, (2) कौटिल्य का अर्थशास्त्र तथा (3) अशोक के अभिलेख।

मौर्य कालीन समाज

वर्ण-व्यवस्था

मौर्य-कालीन समाज में वर्ण-व्यवस्था तथा वर्णाश्रम-धर्म दोनों ही सुदृढ़़ रूप से स्थापित थे। कौटिल्य के अर्थशास्त्र से हमें चार जातियों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र का पता लगता है। ब्राह्मण सर्वाधिक आदरणीय थे। अशोक के अभिलेखों से ज्ञात होता है कि वह ब्राह्मणों तथा श्रमणों को दान देता था और उनका बड़ा सम्मान करता था।

भारतीय वर्ण व्यवस्था की समझ न होने से मेगस्थनीज ने सात जातियों- दार्शनिक, किसान, ग्वाले, कारीगर, सैनिक, निरीक्षक तथा अमात्य का वर्णन किया है। मेगस्थनीज के विवरण से ज्ञात होता है कि अन्तर्जातीय विवाह तथा खान-पान का निषेध था, परन्तु अर्थशास्त्र से ज्ञात होता है कि मौर्य कालीन समाज में ये दोनों ही प्रथाएं प्रचलित थीं। मौर्य-काल में शूद्रों की दशा अच्छी नहीं थी, वे नीची दृष्टि से देखे जाते थे।

वैवाहिक परम्पराएँ

विवाह के समय कन्या की न्यूनतम आयु बारह वर्ष और वर की सोलह वर्ष होनी आवश्यक थी। कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख किया है- ब्राह्म, शौल्क, प्रजापत्य, दैव, गान्धर्व, आसुर, राक्षस तथा पैशाच।

मेगस्थनीज ने भारतीयों के लिये विवाह के तीन लक्ष्य बताये हैं- जीवन-संगिनी प्राप्त करना, भोग करना तथा कई सन्तानें प्राप्त करना। इस युग में बहु-विवाह की प्रथा प्रचलित थी। अशोक की कई रानियां थीं। स्त्रियों को भी, पति के मर जाने अथवा घर छोड़कर चले जाने और बहुत दिनों तक वापस नहीं आने पर पुनर्विवाह की आज्ञा थी।

पति के दुराचारी, हत्यारा, नपुंसक आदि होने पर विवाह-विच्छेद की भी आज्ञा थी। कौटिल्य ने नियोग की भी आज्ञा दी है अर्थात् संतानहीन स्त्री किसी अन्य व्यक्ति के साथ संसर्ग कर संतान उत्पन्न कर सकती थी।

स्त्रियों की दशा

मौर्यकाल में स्त्रियों की दशा बहुत संतोषजनक नहीं थी। वे संतान उत्पन्न करने का साधन-मात्र समझी जाती थीं। स्त्रियों का कार्यक्षेत्र चूल्हा-चक्की समझा जाता था। वे प्रायः घर के भीतर ही रहती थीं। डॉ. भण्डारकर के विचार में इस युग में पर्दे की प्रथा थी। कौटिल्य के मतानुसार स्त्रियों को उच्च-शिक्षा देना उचित ही है।

मेगस्थनीज के कथनानुसार स्त्रियों को दार्शनिक ज्ञान देना इस युग में उचित नहीं समझा जाता था। स्त्रियों में अन्धविश्वास व्याप्त था और वे विभिन्न प्रकार के मंगल-अनुष्ठान किया करती थीं। स्त्रियों को सम्पत्ति सम्बन्धी कुछ अधिकार प्राप्त थे। स्त्री अपने पति के अत्याचारों के विरुद्ध न्यायालय में जा सकती थी।

स्त्री-हत्या महापाप समझा जाता था। कुछ ऐसे प्रमाण भी मिलते हैं जिनसे ज्ञात होता है कि स्त्रियों का एक ऐसा भी वर्ग था जो अच्छी दशा में था। राज-महिलाएं दान दिया करतीं थीं। स्त्रियां सैनिक तथा गुप्तचर का कार्य करती थीं। चन्द्रगुप्त मौर्य की संरक्षिकाएं स्त्रियां होती थीं। वे धर्मप्रचार का कार्य भी करती थीं। अशोक ने अपनी पुत्री संघमित्रा को धर्मप्रचार के लिए श्रीलंका भेजा था। अनेक स्त्रियां नृत्य, संगीत तथा ललित कलाओं में निष्णात होती थीं। इस काल में वेश्यावृत्ति का भी प्रचलन था।

दास प्रथा

मौर्य-काल में दास प्रथा का भी प्रचलन था। दास अपने स्वामी की विभिन्न प्रकार से सेवा करते थे। दास प्रायः अनार्य हुआ करते थे जिनका पशुओं की भांति क्रय-विक्रय होता था। आर्थिक संकट के कारण कभी-कभी आर्य लोग भी दास बन जाते थे। दासों के साथ अच्छा व्यवहार होता था। उन्हें गाली देना अथवा मारना-पीटना उचित नहीं समझा जाता था। दासों को अपनी माता की सम्पत्ति में पूरा अधिकार रहता था। स्वामी को मूल्य चुका देने पर दासों की दासता समाप्त भी हो जाती थी और वे फिर पूर्ण रूप से स्वतंत्र हो जाते थे।

मांस भक्षण

मौर्य-काल में मांस भक्षण का प्रचलन था। सम्राट अशोक के भोजनालय में अनेक प्रकार के पशु-पक्षियों का मांस बनता था। बाजार में कच्चा तथा पकाया हुआ दोनों प्रकार का मांस बिकता था। अशोक के बौद्ध धर्म ग्रहण कर लेने के उपरान्त मांस-भक्षण बहुत कम हो गया था।

मदिरापान

इस काल में मदिरापान का भी प्रचलन था। अर्थशास्त्र में अनेक प्रकार की मदिराओं का वर्णन है। मदिरापान केवल मदिरालय में ही होता था। बाहर केवल वही लोग मदिरा ले जा सकते थे जो बड़े ही विश्वसनीय तथा चरित्रवान होते थे। मदिरापान समाज में बुरा समझा जाता था इसलिये इसका प्रयोग सीमित था। मदिरापान प्रायः अनुष्ठानों के अवसर पर होता था।

आमोद-प्रमोद

अशोक के अभिलेखों से पता लगता है कि मौर्य कालीन समाज में ‘विहार-यात्राएं’ आमोद-प्रमोद की प्रधान साधन थीं। इन यात्राओं में पशु-पक्षियों का शिकार किया जाता था। ‘समाज’ भी आमोद-प्रमोद के प्रधान साधन थे। इन समाजों में मनुष्य तथा पशुओं के द्वन्द्व युद्ध होते थे। अशोक ने अहिंसा-धर्म स्वीकार करने के उपरान्त विहार-यात्राओं तथा समाज के आयोजन बन्द करवा दिये थे। रथ-दौड़, खेल-कूद तथा नाच गाने, आमोद-प्रमोद के अन्य साधन थे।

नैतिक आचरण

मेगस्थनीज के अनुसार मौर्य-काल में भारतीयों का नैतिक स्तर बड़ा ऊँचा था। लोगों का जीवन सरल था और उनमें फिजूल-खर्ची नहीं थी। इससे उनका जीवन सुखी था। चोरी का नामोनिशान नहीं था। लोग प्रायः अपने घरों को अरक्षित छोड़कर चले जाते थे।

लोग सामाजिक नियमों का पालन करते थे जिससे न्यायालय की शरण में जाने की बहुत कम आवश्यकता पड़ती थी। समाज में योग्यता का बड़ा आदर होता था। वृद्ध तभी आदरणीय समझे जाते थे जब उनमें ज्ञान तथा योग्यता होती थी। सत्य तथा गुण का बड़ा आदर होता था। अतिथि-सत्कार पर बल दिया जाता था।

अशोक के शासन-काल में समाज का नैतिक स्तर बहुत ऊँचा उठ गया था क्योंकि अशोक ने गुरुजनों का आदर करना, माता-पिता की सेवा करना, मित्रों, परिचितों तथा सम्बन्धियों के साथ उदारता बरतना तथा ब्राह्मणों एवं श्रमणों के दर्शन करना तथा दान देना आदि उपदेशों पर बल दिया था।

मौर्य कालीन धार्मिक दशा

धर्म के प्रति शासकों का दृष्टिकोण: मौर्य-कालीन शासकों का धार्मिक दृष्टिकोण बड़ा ही उदार तथा व्यापक था। यद्यपि उनमें से कुछ ने जैन-धर्म तथा कुछ शासकों ने बौद्ध-धर्म को अपनाया तथा राजकीय आश्रय प्रदान किया परन्तु अन्य धर्मों के साथ उन्होंने किसी प्रकार का अत्याचार नहीं किया। समस्त धर्म उनकी सहानुभूति एवं सम्मान के पात्र बने रहे, उनसे सहायता पाते रहे और अपनी उन्नति में लगे रहे।

ब्राह्मण-धर्म: कौटिल्य तथा मेगस्थनीज दोनों के विवरणों से ज्ञात होता है कि उस काल में नये-नये धर्मों का प्रचार हो जाने पर भी ब्राह्मण-धर्म सर्वाधिक प्रबल था। वैदिक कर्मकाण्डों अर्थात् यज्ञ तथा बलि का बड़ा जोर था। यज्ञ के अवसर पर मद्यपान किया जाता था। स्त्रियाँ अनेक प्रकार के मंगल कार्य करती थीं।

ब्राह्मणों का बड़ा आदर सत्कार होता था। मेगस्थनीज के विवरण से ज्ञात होता है कि ब्राह्मण, आत्मा तथा परमात्मा के चिन्तन में संलग्न रहते थे। ब्राह्मण-धर्म में अनेक देवी-देवताओं की पूजा होती थी। कौटिल्य ने वर्णाश्रम-धर्म के पालन पर जोर दिया है। स्वर्ग की प्राप्ति अब भी जीवन का अन्तिम लक्ष्य समझा जाता था।

भागवत धर्म

मौर्य कालीन समाज में, ब्राह्मण-धर्म से निःसृत शैव सम्प्रदाय तथा भागवत धर्म भी प्रचलन में थे। मेगस्थनीज ने शिव तथा कृष्ण की पूजा का उल्लेख किया है। वासुदेव की पूजा का उल्लेख अनेक स्थलों पर मिलता है। स्पष्ट है कि उस काल में भक्ति-प्रधान भागवत-धर्म का प्रचलन था।

आजीवक धर्म

अशोक के शिलालेखों में आजीवकों का उल्लेख मिलता है। जैन-ग्रन्थों से ज्ञात होता है कि आजीवक-सम्प्रदाय ब्राह्मण सम्प्रदाय से भिन्न था किंतु डॉ. भण्डारकर के विचार में आजीवक सम्प्रदाय ब्राह्मणों से भिन्न कोई अन्य संप्रदाय नहीं था। आजीवक लोग नंगे संन्यासियों की भाँति जीवन व्यतीत करते थे।

उनका विश्वास था कि समस्त बातें तथा घटनाएँ एक नियति अर्थात् नियम के अनुसार घटती हैं और मनुष्य उनमें कोई परिवर्तन नही कर सकता। अनुश्रुतियों से ज्ञात होता है कि बिन्दुसार ने आजीवकों को अपना संरक्षण प्रदान किया था। अशोक ने भी आजीवक संन्यासियों को बरार की गुफाएं दान में दी थीं। मौर्य सम्राट दशरथ भी आजीवकों का आश्रयदाता था।

जैन धर्म

मौर्य-काल में जैन धर्म भी उन्नत दशा में था। जैन-ग्रन्थों से ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य जैन-धर्म का अनुयायी तथा आश्रयदाता था। अशोक के पौत्र सम्प्रति ने भी जैन-धर्म को संरक्षण प्रदान किया और स्वयं उसका अनुयायी बन गया। अशोक के अभिलेखों में जैनियों को निर्ग्रन्थ कहा गया है।

बौद्ध धर्म

बौद्ध धर्म की इस काल में समस्त धर्मों से अधिक उन्नति हुई। चूंकि अशोक इस धर्म का अनुयायी हो गया था और उसने बौद्ध धर्म को राजधर्म बनाकर उसका तन, मन, धन से प्रचार किया इसलिये न केवल सम्पूर्ण भारत में वरन् विदेशों में भी इसका प्रचार हो गया। अशोक का धार्मिक दृष्टिकोण उदार तथा व्यापक था।

वह कट्टरपन्थी बिल्कुल नहीं था। बौद्ध-धर्म के अतिरिक्त अन्य धर्म-वालों को भी वह दान देता था और उन्हें आदर की दृष्टि से देखता था। वह ब्राह्मणों तथा श्रमणों के दर्शन करता था और उन्हें दान देता था। वास्तव में अशोक का धर्म एक सार्वभौम धर्म था जिसमें समस्त धर्मों की अच्छी बातें विद्यमान थी।

मूर्ति पूजा

कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में मूर्तियों तथा मन्दिरों का उल्लेख किया है जिससे ज्ञात होता है कि इस काल में मूर्ति-पूजा का प्रचलन था। मूर्ति बनाने वाले लोग ‘देवता कारू’ कहलाते थे। महर्षि पंतजलि ने भी शिव, विशाख आदि की मूर्तियों का उल्लेख किया है। बौद्ध लोग बुद्ध तथा बोधिसत्वों की मूर्तियों की पूजा करते थे।

नदियों की पूजा

मौर्यकालीन समाज में नदियों को पवित्र माना जाता था। मेगस्थनीज ने गंगा को अत्यन्त पवित्र नदी बताया है। इस काल में तीर्थ-यात्रा का भी प्रचलन था। लोग पवित्र पर्वों के अवसरों पर तीर्थ-स्थानों में दर्शन तथा स्नान के लिए जाते थे। अशोक के समय से राज्य ने तीर्थों से तीर्थ कर लेना बन्द कर दिया था।

मौर्य कालीन आर्थिक दशा

कृषि

मौर्य-कालीन समाज में कृषि प्रधान व्यवसाय था। मेस्थनीज ने लिखा है कि दूसरी जाति कृषकों की है जो संख्या में सबसे अधिक है। किसानों को समाज के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण समझा जाता था और उनकी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाता था। युद्ध के समय भी कृषि को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचाई जाती थी।

मेस्थनीज के अनुसार भूमि उर्वर थी तथा सिंचाई की व्यवस्था उत्तम थी। खेती परम्परागत विधि से की जाती थी। कृषक लोहे के उपकरण काम में लेते थे। वे विभिन्न प्रकार की मिट्टियों की प्रकृति तथा गुणों से परिचित थे।

प्रमुख फसलें

मेस्थनीज के अनुसार भारत में एक साल में दो बार वर्षा होती है- एक बार जाड़े में जबकि गेहूँ, बोया जाता है और दूसरी बार गर्मी में जबकि तिल, ज्वार आदि बोया जाता है। इसके साथ-साथ फल एवं मूल भी उत्पन्न होते हैं जो मनुष्यों को प्रचुर खाद्य सामग्री प्रदान करते हैं।

मगध के कई क्षेत्रों में धान, गेहूँ तथा जौ की खेती होती थी। बौद्ध ग्रं्रथों में धान की भरपूर फसलों के कई उल्लेख मिलते हैं। पतंजलि ने भी धान का उल्लेख मगध में उगायी जाने वाली प्रमुख फसल के रूप में किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में गेहूँ, जौ, चना, चावल, सहजन, तरबूज, खरबूज, आम, जामुन, अनार, अंगूर, फालसा, नींबू आदि फसलों एवं फलों का उल्लेख किया गया है। पुरातात्विक खुदाइयों में भी मौर्य काल में गेहूं तथा जौ की बड़े स्तर पर खेती होने के प्रमाण मिले हैं।

सिंचाई

मौर्य काल में राज्य की ओर से सिंचाई का प्रबन्ध किया जाता था और कुएं, तालाब, झील आदि खुदवाये जाते थे। इस सुविधा के बदले में राज्य किसानों से सिंचाई-कर लेता था। सौराष्ट्र से प्राप्त दूसरी शतब्दी ई.पू. के जूनागढ़ अभिलेख से प्रकट होता है कि चंद्रगुप्त मौर्य के प्रांतपति पुष्यगुप्त ने सुदर्शन झील का निर्माण करवाया तथा उससे सिंचाई के लिये नहरें निकालीं।

मेगस्थनीज ने भी मौर्य साम्राज्य में प्रयुक्त सिंचाई पद्धतियों का उल्लेख किया है। उसने नहरों एवं खेतों को पानी के संभरण का निरीक्षण करने के लिये नियुक्त अधिकारियों का भी उल्लेख किया है।

कौटिल्य ने सिंचाई के कई साधनों का उल्लेख किया है- 1. नदी, सर, तड़ाग् और कूप द्वारा सिंचाई, 2. ढोल या चरस द्वारा कुएँ से पानी निकालकर सिंचाई, 3. बैलों द्वारा खींचे जानेे वाले रहट या चरस द्वारा कुएँ से सिंचाई, 4. बांध बनाकर नहरों द्वारा सिंचाई, 5. वायु द्वारा संचालित चक्की द्वारा सिंचाई।

खाद

मौर्य काल में भूमि की उर्वरता को बनाये रखने के लिए खादों का प्रयोग किया जाता था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में विभिन्न प्रकार की खादों का वर्णन मिलता है। अर्थशास्त्र में घी, शहद, चर्बी, मछलियों का चूर्ण, गोबर, राख, आदि का खाद के रूप में उपयोग होने का उल्लेख है। किसान विभिन्न प्रकार के अन्न, फल तथा तरकारियों की कृषि करते थे।

पशुपालन

भारत में पशुपालन का कार्य, मानव के आदिम अवस्था से बाहर निकलते ही आरंभ हो गया थ। मौर्य कालीन समाज में भी व्यापक स्तर पर पशुपालन होता था। मेगस्थनीज ने ग्वालों की जाति का उल्लेख किया है जिससे स्पष्ट है कि दूध के लिए पशुपालन किया जाता था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र से ज्ञात होता है कि मौर्य शासन में अलग से पशु विभाग की व्यवस्था की गई थी।

इस विभाग का कार्य बंजर भूमि में चारागाहों का विकास करना, रोगी पशुओं की चिकित्सा की व्यवस्था करना, पशुओं के साथ अमानुषिक व्यवहार रोकना, उनका पंजीयन करना होता था। अर्थशास्त्र में गोअध्यक्ष तथा अश्वाध्यक्ष के उल्लेख मिलते हैं।

चूंकि कृषि तथा सिंचाई काफी उन्नत दशा में पहुंच चुकी थी इसलिये अनुमान लगाया जा सकता है कि कृषि के लिये खेत जोतने, भार ढोने एवं कुओं से सिंचाई का पानी निकालने के काम में पशुओं की सहायता ली जाती थी। उस काल में खेतों में विभिन्न प्रकार की खादों का उपयोग हो रहा था इसलिये पशुओं के गोबर एवं मींगनी भी काम में ली जाती रही होगी। मांसाहारी लोग बकरी तथा मुर्गा पालते थे। ऊन एवं मांस के लिये भेड़पालन होता था।

उद्योग-धन्धे

मौर्य-काल में विभिन्न प्रकार के उद्योग-धन्धे प्रचलन में थे। इनमें सूती एवं ऊनी वस्त्र निर्माण, धातु निर्माण तथा धातुओं से कृषि उपकरण, बरतन तथा हथियारों का निर्माण, मिट्टी के बर्तनों एवं मूर्तियों का निर्माण, कीमती धातुओं, लकड़ी का काम, चंदन की लकड़ी एवं हाथी दांत के आभूषणों का निर्माण आदि प्रमुख उद्योग धंधे थे। कुछ लोग मदिरा बनाने एवं बेचने का काम करते थे।

वस्त्र निर्माण

कपास की अच्छी खेती होती थी। इसलिये सूती वस्त्र का व्यवसाय बड़ी उन्नत दशा में था। सूती कपड़े के लिये काशी, वत्स, अपरान्त, बंग और मदुरा विशेष रूप से विख्यात थे। सूत कातने के लिये चरखों तथा कपड़ा बुनने के लिये करघों का उपयोग किया जाता था।

मेगस्थनीज तथा कौटिल्य दोनों के द्वारा दिये गये विवरण के अनुसार देश में कपास की खेती प्रचुरता में होती थी इसलिये तंतुवाह (जुलाहे) काफी व्यस्त रहते थे। वस्त्र बनाने के लिए सन का भी प्रयोग किया जाता था। मगध तथा काशी सन के वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध थे। वृक्षों के पत्तों तथा उनकी छाल के रेशों से भी वस्त्र बनाये जाते थे।

अर्थशास्त्र से ज्ञात होता है कि मौर्य-काल में कई प्रकार के ऊनी वस्त्र बनते थे। मेगस्थनीज ने कई प्रकार के बहुमूल्य वस्त्रों का उल्लेख किया है। उसने मलमल के कामदार वस्त्रों की मुक्त-कंठ से प्रशंसा की है। उस काल में बंगाल उच्चकोटि के मलमल वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध था।

धातु उद्योग

मौर्यकाल में विभिन्न प्रकार की धातुओं के निर्माण एवं उन पर आधारित उद्योग उन्नत दशा में थे। सोना, चांदी, ताम्बा और लोहा प्रचुर मात्रा में निकाला एवं गलाया जाता था। जस्ता एवं कुछ अन्य धातुएं भी काम में ली जाती थीं। राज्य की खानों के कार्य का अध्यक्ष आकराध्यक्ष कहलाता था। \

आभूषण निर्माण

पुरुष तथा स्त्री दोनों ही आभूषण पहनते थे। इस काल में हाथी-दाँत के सुन्दर आभूषण बनते थे। मेगस्थनीज से पता लगता है कि समृद्ध लोग बहुमूल्य वस्त्र धारण करते थे। उनके वस्त्रों पर सोने का काम किया जाता था। एरियन का कथन है कि भारत में धनी लोग अपने कानों में हाथीदांत के उच्च कोटि के आभूषण पहनते थे। समुद्रों से मणि, मुक्ता, रत्न, सीप आदि निकालने का काम राजकीय अधिकारियों की देखरेख में होता था। इन सबका प्रयोग आभूषण निर्माण में होता था।

सुरा उद्योग: इस काल में सुरा का निर्माण एवं व्यापार बड़े स्तर पर होता था। अर्थशास्त्र में छः प्रकार की सुराओं- मेदक, प्रसन्न, आसव, अरिष्ट, मैरेय और मधु का उल्लेख है। सुरा के निर्माण एवं प्रयोग पर सुराध्यक्ष का नियंत्रण रहता था।

लकड़ी तथा चमड़े का काम: वनों एवं पशुओं की प्रचुर उपलब्धता के कारण मौर्य काल में इमारती लकड़ी, चंदन की लकड़ी, पशुओं से प्राप्त ऊन और चमड़े पर आधारित उद्योग एवं व्यवसाय भी उन्नत दशा में थे।

व्यापार

मौर्य काल में आन्तरिक तथा विदेशी व्यापार उन्नत दशा में था। व्यापारिक सुरक्षा की पूर्ण व्यवस्था थी। मेगस्थनीज के विवरण से ज्ञात होता है कि विदेशियों की सुरक्षा करने तथा उन्हें हर प्रकार की सुविधा देने के लिए पाटलिपुत्र में पाँच सदस्यों की एक समिति काम करती थी। विभिन्न प्रकार के उद्योग-धन्धे करने वालों को भी सुरक्षा दी जाती थी।

यदि कोई व्यक्ति श्रमिकों अथवा कारीगरों का अंग-भंग कर देता था तो उसे मृत्युदंड दिया जाता था। यदि कोई व्यापारी नाप-तौल में बेईमानी करता था अथवा मिलावट करता था तो उसे कठोर दंड दिया जाता था। नावों द्वारा नदियों के मार्ग से भी व्यापार होता था। देश के विभिन्न भाग विभिन्न प्रकार के व्यवसायों तथा व्यापार के लिए प्रसिद्ध थे।

विदेशी व्यापार, स्थल तथा सामुद्रिक मार्गों से होता था। चीन तथा मिस्र आदि देशों के साथ भारत का व्यापारिक सम्बन्ध था। अशोक ने जिन देशों में बौद्ध-धर्म का प्रचार किया उनके साथ भारत का व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित हो गया। विदेशों के साथ राजदूतों का आदान-प्रदान करके भी मौर्य सम्राटों ने व्यापार में बड़ी उन्नति की।

व्यापारिक मार्ग

मौर्य काल में देश में आन्तरिक व्यापार की सुविधा के लिए बड़े-बड़े राजमार्ग बनवाये गये थे। पाटलिपुत्र से पश्चिमोत्तर को जाने वाला मार्ग 1500 कोस लम्बा था। दूसरा महत्वपूर्ण मार्ग हैमवतपथ था जो हिमालय की ओर जाता था। दक्षिण भारत को भी अनेक मार्ग गये थे।

कौटिल्य के अनुसार दक्षिणापथ में भी वह मार्ग सबसे अधिक महत्वपूर्ण है जो खानों से होकर जाता है जिस पर गमनागमन बहुत होता है और जिस पर परिश्रम कम पड़ता है। विभिन्न नगरों तथा प्रमुख मार्गों को एक दूसरे से जोड़ने के लिए कई छोटे-छोटे मार्ग बनवाये गये थे। राज्य की ओर से इन मार्गों की सुरक्षा का प्रबन्ध किया जाता था।

मुद्रा

व्यापार के लिए विभिन्न प्रकार की मुद्राओं का प्रयोग होता था। अर्थशास्त्र में मौर्य काल में प्रचलित अनेक मुद्राओं के नाम दिये गये हैं- सुवर्ण (सोने का), कार्षापण या पण या धरण (चांदी का), माषक (ताम्बे का), काकणी (ताम्बे का)। कौटिल्य ने उस काल की समस्त मुद्राओं को दो भागों में बांटा है- प्रथम कोटि में ‘कीष प्रवेष्य’ मुद्राएं आती थीं।

ये लीगल टेण्डर के रूप में थीं। सम्पूर्ण राजकीय कार्य इन्हीं मुद्राओं में होता था। द्वितीय कोटि में व्यावहारिक मुद्राएं आती थीं। ये टोकन मनी के रूप में थीं। जनता का साधारण लेन-देन इन मुद्राओं में हो सकता था किंतु ये मुद्राएं राजकीय कोष में प्रवेश नहीं कर पाती थीं। मुद्र निर्माण राजकीय टकसालों में ही हो सकता था। परंतु यदि कोई व्यक्ति चाहे तो अपनी धातु ले जाकर राजकीय टकसाल से अपने लिये मुद्राएं बनवा सकता था। इस कार्य के लिये उसे एक निश्चित शुल्क देना पड़ता था।

मौर्य कालीन साहित्य तथा शिक्षा

भाषा: मौर्य-काल में दो प्रकार की भाषाओं का प्रचलन था। पहली भाषा संस्कृत थी तथा दूसरी पाली। संस्कृत विद्वानों की और पाली जन-साधारण की भाषा थी। संस्कृत साहित्यिक भाषा थी। इसमें ग्रन्थ लिखना गौरवपूर्ण समझा जाता था। बौद्ध-धर्म के प्रचार के साथ, पाली में भी ग्रन्थ रचना आरम्भ हो गयी। प्रारम्भिक बौद्ध-ग्रन्थ पाली भाषा में लिखे गये हैं। अशोक के अभिलेख पाली भाषा में खुदे हैं।

लिपि

मौर्य-काल में दो प्रकार की लिपियों का प्रयोग होता था- ब्राह्मी लिपि तथा खरोष्ठी लिपि। अशोक के अधिकांश अभिलेख ब्राह्मी लिपि में हैं। अशोक ने खरोष्ठी लिपि का प्रयोग पश्चिमोत्तर प्रदेशों के अभिलेखों में किया। सम्भवतः उस प्रदेश में इस लिपि का प्रयोग होता था। यह लिपि दाहिनी ओर से बाईं ओर को लिखी जाती थी। शेष भारत में ब्राह्मी लिपि का प्रयोग होता था। आज भी कुछ प्रान्तीय भाषाओं में ब्राह्मी लिपि का प्रयोग होता है।

साहित्य

मौर्य-काल में रचित संस्कृत का सबसे प्रसिद्ध एवं ऐतिहासिक ग्रन्थ कौटिल्य का ‘अर्थशास्त्र’ है। इसी काल में वात्सायन ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘कामसूत्र’ की रचना की। कुछ विद्वान कौटिल्य, वात्सायन, विष्णुगुप्त तथा चाणक्य एक ही व्यक्ति के चार नाम होना बताते हैं। इसी काल में कात्यायन ने पाणिनी की अष्टाध्यायी पर अपने वार्तिक लिखे।

इस काल में कुछ सूत्र ग्रन्थों तथा धर्म-शास्त्रों की भी रचना हुई। संभवतः रामायण तथा महाभारत का परिवर्द्धन भी इसी काल में हुआ। बौद्ध-धर्म के त्रिपिटक ग्रन्थों तथा अनेक जैन ग्रन्थों का संकलन इसी युग में हुआ था। अनेक ग्रंथों में सुबंधु नामक एक ब्राह्मण विद्वान का उल्लेख आता है जो बिंदुसार का मंत्री था।

उसने वासवदत्ता नाट्यधारा नामक नाटक की रचना की। संस्कृत का परम विद्वान वररुचि इसी काल में हुआ। बृहत्कथा कोष के अनुसार इस काल में कवि नामक एक अन्य विद्वान भी हुआ। जैन-धर्म का प्रसिद्ध आचार्य भद्रबाहु इसी काल की विभूति था। जैन धर्म के आचारांग सूत्र, भगवती सूत्र, समवायांग सूत्र आदि की रचना इसी काल में हुई।

शिक्षा

मौर्य-कालीन सम्राटों ने शिक्षा की बड़ी सुन्दर व्यवस्था की थी। स्मिथ के विचार में ब्रिटिश-काल में भी उतनी विस्तृत शिक्षा की योजना न थी जितनी मौर्य-काल में थी। तक्षशिला उच्च-शिक्षा का सबसे बड़ा केन्द्र था जहाँ धनी तथा निर्धन दोनों ही शिक्षा प्राप्त करते थे। धनी परिवारों के बच्चे शुल्क देकर दिन में अध्ययन करते थे। निर्धनों के बच्चे दिन में गुरु की सेवा करते थे तथा रात में अध्ययन करते थे। गुरुकुलों, मठों तथा विहारों में भी शिक्षा दी जाती थी। इन संस्थाओं को राज्य की ओर से सहायता दी जाती थी।

मौर्य कालीन कला

मौर्य काल की कला उच्चकोटि की थी। उस काल में कलात्मक अभिव्यक्ति के लिये काष्ठ, हाथीदांत, मिट्टी, कच्ची ईंटें तथा धातुएं काम में ली गई थीं। इस काल में शिल्पकला के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई। इस कारण मौर्य-काल पाषाण मूर्तियों एवं भवनों के लिये अधिक प्रसिद्ध है। इस काल की शिल्प कला को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है- (1) स्थापत्य कला तथा (2) मूर्ति कला।

स्थापत्य कला

मौर्य कालीन स्थापत्य कला के स्मारक चार स्वरूपों में प्राप्त होते हैं- (1) आवासीय भवन (2) राजप्रासाद (3) गुहा-गृह (4) स्तम्भ तथा (5) स्तूप।

(1) आवासीय भवनों का निर्माण

अशोक के पूर्व जो आवासीय भवन बने थे, वे ईटों तथा लकड़ी से निर्मित हुए। अशोक के शासन-काल में भवन निर्माण में लकड़ी तथा ईटों के स्थान पर पाषाण का प्रयोग आरम्भ हो गया। जो काम लकड़ी तथा ईटों पर किया जाता था, इस काल में वह पत्थर पर किया जाने लगा। अशोक बहुत बड़ा भवन निर्माता था। काश्मीर में श्रीनगर तथा नेपाल में ललितपाटन नामक नगरों की स्थापना उसी के शासन-काल में हुई थी।

 (2) राजप्रासाद का निर्माण

मेगस्थनीज ने पाटलिपुत्र में बने सुंदर राजप्रासाद का वर्णन किया है। यह राजप्रासाद इतना सुन्दर था कि इसके निर्माण के सात सौ वर्ष बाद जब फाह्यान ने इसे देखा तो वह आश्चर्य चकित रह गया। उसने लिखा है कि अशोक के महल एवं भवनों को देखकर लगता है कि इस लोक के मनुष्य इन्हें नहीं बना सकते।

ये तो देवताओं द्वारा बनवाये गये होंगे। पटना से इस मौर्यकालीन विशाल राजप्रासाद के अवशेष प्राप्त हुए हैं। एरियन के अनुसार यह राजप्रासाद कारीगरी का एक आश्चर्यजनक नमूना है। राजप्रसाद के अवशेषों में चंद्रगुप्त मौर्य की राजसभा भी मिली है। पतंजलि ने इस राजसभा का वर्णन किया है। यह सभा एक बहुत ही विशाल मण्डप के रूप में है।

मण्डप के मुख्य भाग में, पूर्व से पश्चिम की ओर 10-10 स्तम्भों की 8 पंक्तियां हैं। डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार यह ऐतिहासिक युग का प्रथम विशाल अवशेष है जिसके दिव्य स्वरूप को देखकर दर्शक मंत्रमुग्ध रह जाता है। उसके विभ्राट स्वरूप की स्थायी छाप मन पर पड़े बिना नहीं रह सकती।

(3) गुहा स्थापत्य

बिहार में गया के पास बराबर एवं नागार्जुनी की पहाड़ियों में मौर्यकालीन सात गुहा-गृह प्राप्त हुए हैं। बराबर पर्वत समूह से चार गुफाएं मिली हैं- कर्ण चोपड़ गुफा, सुदामा गुफा, लोमस ऋषि गुफा तथा विश्व झौंपड़ी गुफा। नागार्जुनी पहाड़ियों से तीन गुफाएं मिली हैं- गोपी गुफा, वहियका गुफा तथा वडथिका गुफा। इन गुहा-गृहों का निर्माण अशोक तथा दशरथ के शासन काल में किया गया था। ये गुहा-गृह शासकों की ओर से आजीवकों को दान में दिये गये थे। इन गुहा-गृहों की दीवारें आज भी शीशे की भाँति चमकती हैं।

(4) स्तम्भ

सांची तथा सारनाथ में अशोक के काल में बने तीस से चालीस स्तम्भ आज भी विद्यमान हैं। इनका निर्माण चुनार के बलुआ पत्थरों से किया गया है। इन स्तम्भों पर की गई पॉलिश शीशे की तरह चमकती है। ये स्तम्भ चालीस से पचास फीट लम्बे हैं तथा एक ही पत्थर से निर्मित हैं। इनका निर्माण शुण्डाकार में किया गया है। ये स्तम्भ नीचे से मोटे तथा ऊपर से पतले हैं।

इन स्तम्भों के शीर्ष पर अंकित पशुओं की आकृतियाँ सुंदर एवं सजीव हैं। शीर्ष भाग की पशु आकृतियों के नीचे महात्मा बुद्ध के धर्म-चक्र प्रवर्तन का आकृति चिह्न उत्कीर्ण है। इन स्तम्भों के शीर्ष पर अत्यंत सुंदर, चिकनी एवं चमकदार पॉलिश की गई है जो मौर्य काल की विशिष्ट उपलब्धि है। लौरिया नंदन स्तम्भ के शीर्ष पर एक सिंह खड़ा है।

संकिसा स्तम्भ के शीर्ष पर एक विशाल हाथी है तथा रामपुरवा के स्तम्भ शीर्ष पर एक वृषभ है। अशोक के स्तम्भों में सबसे सुंदर एवं सर्वोत्कृष्ट सारनाथ के स्तम्भ का शीर्षक है। सारनाथ स्तम्भ के शीर्ष पर चार सिंह एक दूसरे की ओर पीठ किये बैठे हैं। मार्शल के अनुसार ईस्वी शती पूर्व के संसार में इसके जैसी श्रेष्ठ कलाकृति कहीं नहीं मिलती।

ऊपर की ओर बने सिंहों में जैसी शक्ति का प्रदर्शन है, उनकी फूली हुई नसों में जैसी प्राकृतिकता है, और उनकी मांसपेशियों में जो तनाव है और उनके नीचे उकेरी गई आकृतियों में जो प्राणवंत वास्तविकता है, उसमें कहीं भी आरम्भिक कला की छाया नहीं है।

(5) स्तूप

मौर्य कालीन स्थापत्य कला में स्तूपों का स्थान भी महत्वपूर्ण है। स्तूप निर्माण की परम्परा लौह कालीन तथा महापाषाणकालीन बस्तियों के समय से आरंभ हो चुकी थी किंतु अशोक के काल में इस परम्परा को विशेष प्रोत्साहन मिला। स्तूप ईंटों तथा पत्थरों के ऊँचे टीले तथा गुम्बदाकार स्मारक हैं।

कुछ स्तूपों के चारों ओर पत्थर, ईंटें अथवा ईंटों की जालीदार बाड़ लगाई गई है। इन स्तूपों का निर्माण बुद्ध अथवा बोधिसत्व (सत्य-ज्ञान प्राप्त बौद्ध मतावलम्बी) के अवशेष रखने के लिये किया जाता था। बौद्ध साहित्य के अनुसार अशोक ने लगभग चौरासी हजार स्तूपों का निर्माण करवाया था। इनमें से कुछ स्तूपों की ऊँचाई 300 फुट तक थी।

चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भारत तथा अफगानिस्तान के विभिन्न भागों में इन स्तूपों को खड़े देखा था। वर्तमान में कुछ स्तूप ही देखने को मिलते हैं। इनमें मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के निकट स्थित सांची का स्तूप प्रसिद्ध है। इसकी ऊँचाई 77.5 फुट, व्यास 121.5 फुट तथा इसके चारों ओर लगी बाड़ की ऊँचाई 11 फुट है।

इस स्तूप का निर्माण अशोक के काल में हुआ तथा इसका विस्तार अशोक के बाद के कालों में भी करवाया गया। इस स्तूप की बाड़ और तोरणद्वार कला की दृष्टि से आकर्षक एवं सजीव हैं।

मूर्ति कला

प्रस्तर मूर्तियां: पाटलिपुत्र, मथुरा, विदिशा तथा अन्य कई क्षेत्रों से मौर्यकालीन पत्थर की मूर्तियां मिली हैं। इन पर मौर्य काल की विशिष्ट चमकदार पॉलिश मिलती है। इन मूर्तियों में यक्ष-यक्षिणियों की मूर्तियां सर्वाधिक सजीव एवं सुंदर हैं। इन्हें मौर्यकालीन लोक कला का प्रतीक माना जाता है।

इनमें सबसे प्रसिद्ध दीदारगंज, पटना से प्राप्त चामरग्राहिणी यक्षी की मूर्ति है जो 6 फुट 9 इंच ऊँची है। यक्षी का मुखमण्डल अत्यंत सुंदर है। अंग-प्रत्यंग में समुचित भराव रेखा और कला की सूक्ष्म छटा है। मथुरा के परखम गांव से प्राप्त यक्ष की मूर्ति भी 8 फुट 8 इंच की है। इसके कटाव में सादगी है तथा अलंकरण कम है।

बेसनगर की स्त्री मूर्ति भी इस काल की मूर्तियों में विशिष्ट स्थान रखती है। अशोक के स्तम्भ शीर्षों पर बनी हुई पशुओं की मूर्तियां उस युग के संसार में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती हैं।

मृण्मूर्तियाँ: पटना, अहच्छत्र, मथुरा, कौशाम्बी आदि में मिले भग्नावशेषों से बड़ी संख्या में मृण्मूर्तियां भी प्राप्त की गई हैं। ये कला की दृष्टि से सुंदर हैं तथा उस युग के परिधान, वेशभूषा तथा आभूषणों की जानकारी देती हैं। मौर्य काल की, बुलंदीबाग (पटना) से प्राप्त एक नर्तकी की मृण्मूर्ति विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

चित्रकला

मौर्य काल में चित्रकला के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई। बौद्ध शैली के चित्रों की रचना इस काल में प्रारम्भ हो गई थी। अभाग्यवश उस काल की चित्रकला के पर्याप्त नमूने उपलब्ध नहीं हो सके हैं।

मौर्यकाल की कला पर विदेशी प्रभाव

स्पूनर, मार्शल तथा निहार रंजन रे आदि अनेक विद्वानों ने मौर्यकाल की कला को भारतीय नहीं माना है। इन विद्वानों ने मौर्य काल की कला पर ईरानी कला का प्रभाव माना है। स्पूनर ने लिखा है कि पाटलिपुत्र का राजभवन फारस के राजमहल का प्रतिरूप था। स्मिथ ने लिखा है कि मौर्यों की कला ईरान तथा यवनों से प्रभावित हुई है।

सिकंदर के आक्रमण के समय विदेशी सैनिक तथा शिल्पी भारत में बस गये थे, उन्हीं के द्वारा अशोक ने स्तम्भों का निर्माण करवाया। स्मिथ की मान्यता है कि अशोक से पहले, भारत में भवन निर्माण में पत्थरों का प्रयोग नहीं किया जाता था। विदेशी कलाकारों द्वारा इसे संभव किया गया।

इन विद्वानों की धारणा को नकारते हुए अरुण सेन ने लिखा है कि मौर्य कला तथा फारसी कला में पर्याप्त अंतर है। फारसी स्तम्भों में नीचे की ओर आधार बनाया जाता था जबकि अशोक के स्तम्भों में कोई आधार नहीं बनाया गया है। मौर्य स्तम्भ का लम्बा भाग गोलाकार है एवं चमकदार पॉलिश से युक्त है जबकि फरसी स्तम्भों में चमकदार पॉलिश का अभाव है।

अतः मौर्य कला पर फारसी प्रभाव होने की बात को स्वीकार नहीं किया जा सकता। मौर्य कला अपने आप में पूर्णतः भारत में विकसित होने वाली कला है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – मौर्य साम्राज्य

12. चंद्रगुप्त मौर्य  

13. अशोक महान् 

14. मौर्य-कालीन भारत 

शुंग वंश एवं कण्व वंश

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शुंग वंश एवं कण्व वंश

मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत में एक के बाद एक तीन ब्राह्मण राज्य स्थापित हुए। इन राज्यों के संस्थापक शुंग वंश, कण्व वंश एवं सातवाहन वंश के थे। इस अध्याय में शुंग वंश एवं कण्व वंश का इतिहास दिया गया है।

मौर्य-साम्राज्य भारत का प्रथम विशाल साम्राज्य था। मौर्य काल में भारत को जो राजनीतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक एकता प्राप्त हुई वह इसके पूर्व कभी नहीं थी। अशोक के काल में यह एकता चरम पर पहुंच गई परन्तु अशोक की मृत्यु के पश्चात राष्ट्र में फिर से विच्छिन्नता आरम्भ हो गई।

लगभग पांच शताब्दियों तक यह स्थिति रही जिससे भारत न केवल राजनीतिक वरन् सामाजिक तथा सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी छिन्न-भिन्न हो गया। मौर्य साम्राज्य के नष्ट हो जाने पर भारत में अनेक छोटे-छोटे राज्य स्थापित हो गये। राजनीतिक विच्छिन्नता के परिणाम स्वरूप भारत पर पुनः विदेशी आक्रमण आरम्भ हो गये और भारत के विभिन्न भागों में विदेशियों के राज्य स्थापित हो गये।

राष्ट्र की राजनीतिक एकता के लिये बौद्ध धर्म और जैन धर्म के अहिंसात्मक सिद्धांतों के दुष्परिणाम सामने आ चुके थे। इस कारण मौर्योत्तर युग में वर्णाश्रम धर्म ने फिर से जोर पकड़ा और ब्राह्मण धर्म का महत्त्व पुनः बढ़ने लगा। संस्कृत भाषा का महत्त्व फिर से बढ़ा और उसी में साहित्य रचना होने लगी।

शुंग वंश और उसकी उपलब्धियाँ

शुंग वंश का प्रथम शासक पुष्यमित्र शुंग था। वह मौर्य वंश के अन्तिम शासक वृहद्रथ का सेनापति था। पुष्यमित्र शुंग ने 184 ई.पू. में एक सैनिक निरीक्षण के समय अपने स्वामी का वध कर दिया तथा स्वयं पाटलिपुत्र के सिंहासन पर बैठ गया।

पतंजलि के महाभाष्य, विभिन्न पुराण, कालिदास के मालविकाग्निमित्रम्, बाणभट्ट के हर्षचरित, जैन लेखक मेरुतुंग के थेरावली, बौद्ध ग्रंथ दिव्यावदान एवं तारानाथ लिखित बौद्ध धर्म का इतिहास आदि साहित्यिक स्रोतों से शुंग वंश की जानकारी मिलती है। खारवेल के हाथी गुम्फा अभिलेख, धनदेव के अयोध्या अभिलेख से इस जानकारी की पुष्टि होती है तथा भरहुत एवं सांची के स्तूपों से शुंग वंश की कलात्मक प्रगति का ज्ञान होता है।

पतंजलि के महाभाष्य, पाणिनी की अष्टाध्यायी, गार्गी संहिता, विभिन्न पुराण, बाणभट्ट का हर्षचरित आदि ग्रंथ निर्विवाद रूप से स्वीकार करते हैं कि शुंग ब्राह्मण थे। तिब्बती आचार्य तारानाथ भी उन्हें ब्राह्मण बताता है।

पुष्यमित्र शुंग

प्राचीन भारतीय शासकों में पुष्यमित्र शुंग महत्वपूर्ण स्थान रखता है। उसने उत्तरमौर्य कालीन शासकों के समय गिरती हुई राजसत्ता के गौरव को पुनः स्थापित किया। सैन्य शक्ति एवं बौद्धिक क्षमता के बल पर उसने भारत की राजनीतिक एकता को पुनः सृजित करने का प्रयास किया।

वह सेनापति से शासक बना था इसलिये उसने अंतिम समय तक अपनी सेना से सम्बन्ध बनाये रखा। उसने कभी भी सम्राट की उपाधि धारण नहीं की तथा स्वयं को सेनापति ही कहता रहा। तत्कालीन समस्त साक्ष्यों में उसे सेनानी ही कहा गया है जबकि उसके पुत्र और उत्तराधिकारी अग्निमित्र के लिये राजा शब्द का प्रयोग किया गया है।

उसके काल की तीन प्रमुख घटनाएँ है- (1) विदर्भ के राजा को युद्ध में परास्त करना (2) यूनानियों के आक्रमणों को रोकना और (3) अश्वमेध यज्ञ करना।

(1) विदर्भ विजय

जिस समय पुष्यमित्र मगध का राजा बना, उस समय विदर्भ पर यज्ञसेन का शासन था जो कि मौर्यों की राजसभा के एक मंत्री का सम्बन्धी था। मालविकाग्निमित्र नामक नाटक से पुष्यमित्र तथा यज्ञसेन के मध्य हुए संघर्ष की सूचना मिलती है। संभवतः यज्ञसेन ने अंतिम मौर्य सम्राट की हत्या से उत्पन्न हुई उथल-पुथल की स्थिति का लाभ उठाने की चेष्टा की तथा स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया। पुष्यमित्र के पुत्र अग्निमित्र ने यज्ञसेन को परास्त करके विदर्भ को पुनः शंुग साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया।

(2) यूनानियों की पराजय

पुष्यमित्र शुंग के समय में यवनों ने भारत की पश्चिमोत्तर सीमा पर आक्रमण किया। पतंजलि के महाभाष्य, मालविकाग्निमित्र तथा गार्गी संहिता के यज्ञ पुराण से इस आक्रमण की सूचना मिलती है कि यवन सेनाएं साकेत, पांचाल तथा मथुरा को रौंदते हुई पाटलिपुत्र तक पहुंच गईं। पुष्यमित्र ने इस युद्ध के बाद अश्वमेध यज्ञ किया। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि यवनों के साथ हुए युद्ध में पुष्यमित्र शुंग की विजय हुई। मालविकाग्निमित्र के अनुसार वसुमित्र ने यवनों को सिंधु नदी के तट पर पराजित किया था।

(3) अश्वमेध यज्ञ

वैदिक काल से ही आर्य राजा अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने और स्वयं को सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न राजा घोषित करने के लिये अश्वमेध यज्ञ करते थे। चूंकि पुष्यमित्र शुंग स्वयं ब्राह्मण था इसलिये उसने वैदिक परम्परा के अनुसार अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया ताकि उसके अधीनस्थ राजा उसे सार्वभौम चक्रवर्ती सम्राट स्वीकार कर लें।

पुष्यमित्र का साम्राज्य

विदर्भ विजय से मगध राज्य की खोई हुई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त हुई। यवनों को परास्त करके उसने अपने राज्य की पश्चिमी सीमा स्यालकोट तक बढ़ा ली। साकेत से यूनानियांे को भगा देने से मध्य प्रदेश में उसके राज्य को स्थायित्व मिल गया। विदर्भ विजय ने उसका राज्य दक्षिण में नर्मदा नदी तक विस्तृत कर दिया। इस प्रकार पुष्यमित्र का राज्य उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी तक तथा पूर्व में बंगाल की खाड़ी से लेकर पश्चिम में सिंधु नदी तक विस्तृत था।

पुष्यमित्र की उपलब्धियाँ

ब्राह्मण धर्म का पुनरुद्धार

चंद्रगुप्त मौर्य ने जैन धर्म को तथा अशोक ने बौद्ध धर्म को राज्याश्रय दिया। इस कारण ब्राह्मण धर्म का वेग मंद पड़ गया। पुष्यमित्र शुंग स्वयं ब्राह्मण था इसलिये उसने ब्राह्मण धर्म के पुनरुत्थान के लिये प्रयास किया। पुष्यमित्र के राजपुरोहित का यह कथन उल्लेखनीय है कि ब्राह्मणों एवं श्रमणों में शाश्वत विरोध है।

पतंजलि पुष्यमित्र के राजपुरोहित थे। इतिहासकारों का मानना है कि पतंजलि ने संस्कृत भाषा को बोधगम्य एवं सरल बनाने के लिये अष्टाध्यायी के महाभाष्य की रचना पुष्यमित्र के शासन काल में की। मनुस्मृति भी इसी काल में लिखी गई। इसमें भावी ब्राह्मण व्यवस्था की रूपरेखा थी।

महर्षि पंतजलि के महाभाष्य से हमें ज्ञात होता है कि पुष्यमित्र वैष्णव धर्म का अनुयायी था। उसने ब्राह्मण-धर्म को संरक्षण प्रदान किया और उसे राज धर्म बना दिया। ब्राह्मण धर्म और व्यवस्था के पुनरुद्धार का यह कार्य कण्वों और सातवाहनों के समय में भी चलता रहा।

बौद्ध धर्म का दमन

बौद्ध-ग्रन्थ ‘दिव्यावदान’ के अनुसार पुष्यमित्र, बौद्धों का विरोधी था और उनके साथ अत्याचार करता था। पुष्यमित्र ने 84 हजार स्तूपों को नष्ट करके ख्याति प्राप्त करने का प्रयत्न किया तथा बहुत से स्तूपों को नष्ट कर दिया। उसने यह घोषणा करवाई कि जो कोई व्यक्ति उसे बौद्ध भिक्षु का सिर लाकर देगा, उसे 100 दीनार देगा।

तिब्बती लेखक तारानाथ लिखता है कि पुष्यमित्र ने मध्य प्रदेश से जालंधर तक बहुत से बौद्धों का वध किया और उनके स्तूपों तथा विहारों को भूमिसात किया। आर्य मंजूश्रीमूलकल्प में भी इसी प्रकार का वर्णन है। अधिकांश विद्वानों ने इन कथनों का विरोध करते हुए लिखा है कि चूंकि वह ब्राह्मण धर्म का अनुयायी था इसलिये बौद्धों ने उसके विरुद्ध इस तरह की अनर्गल बातें लिखीं।

भारतीय इतिहास में इस तरह की परम्परा कभी भी देखने को नहीं मिलती जब किसी भारतीय आर्य राजा ने दूसरे धर्मावलम्बियों की हत्या करवाई हो। पुष्यमित्र के समय भारतवासी दीनार शब्द से परिचित ही नहीं थे इसलिये दीनार देने की घोषणा करने वाली बात मिथ्या है तथा बाद के किसी काल में गढ़ी गई है।

सहिष्णु शासक

अधिकांश इतिहासकार पुष्यमित्र को सहिष्णु राजा स्वीकार करते हैं। पुष्यमित्र ने भरहुत, बोध गया तथा सांची के स्तूपों को नया रूप दिया और उनके आकार को बढ़ाया। भरहुत स्तूप के प्राचीर पर सुगनं रजे लिखा हुआ है जिसका अर्थ है कि स्तूप का यह भाग शुंग शासक के काल में निर्मित हुआ।

दिव्यावदान में उल्लेख है कि उसने कई बौद्धों को अपना मंत्री बनाया। मालविकाग्निमित्र से विदित होता है कि पुष्यमित्र के पुत्र अग्निमित्र की राजसभा में एक बौद्ध धर्मावलम्बी भगवती कौशिकी नामक महिला थी जिसे बहुत सम्मान दिया जाता था। अतः स्पष्ट है कि पुष्यमित्र शुंग ब्राह्मण धर्म का अनुयायी था तथा आर्य परम्पराओं के अनुसार उसने दूसरे धर्मों के लोगों के साथ सहिष्णुता का व्यवहार किया।

पुष्यमित्र का शासन काल

वायु पुराण तथा कतिपय अन्य पुराणों में पुष्यमित्र द्वारा 60 वर्ष तक शासन किया जाना बताया गया है जो कि सत्य प्रतीत नहीं होता। संभवतः इसमें वह अवधि भी जोड़ ली गई है जिस अवधि में उसने अवंति के गवर्नर के रूप में शासन किया। कुछ इतिहासकार पुष्यमित्र के शासन की अवधि 36 वर्ष तथा कुछ इतिहासकार 33 वर्ष मानते हैं। माना जाता है कि 148 ई. पू. में उसका निधन हुआ।

पुष्यमित्र के उत्तराधिकारी

शुंग-वंश में कुल दस शासक हुए, जिन्होंने लगभग 112 वर्ष तक शासन किया। इनके नाम इस प्रकार से हैं- (1) पुष्यमित्र, (2) अग्निमित्र, (3) वसुज्येष्ठ, (4) वसुमित्र, (5) आन्ध्रक, (6) पुलिन्डक, (7) घोष, (8) वज्रमित्र, (9) भाग और (10) देवभूति।

शुंगकालीन कला

शुंग-काल में यद्यपि मौर्यकालीन अनेक भवनों एवं स्तूपों के निर्माण को पूरा किया गया था किन्तु इस काल में ब्राह्मण-धर्म के प्रभाव से मन्दिरों एवं मूर्तियों का अधिक बाहुल्य दिखाई पड़ता है। हिन्दू देवी-देवताओं विष्णु, शिव, ब्रह्मा, बलराम, लक्ष्मी, वासुदेव आदि की मूर्तियों की बहुतायत है। बेसनगर में गरुड़ध्वज के साथ खड़ी विष्णु मूर्ति इसी काल में निर्मित हुई।

शुंग वंश का अंत

कहा जाता है कि शुंगवंश का अंतिम शासक देवभूति अत्यंत कामुक राजा था। 72 ई.पू. में देवभूति के मन्त्री वसुदेव कण्व ने देवभूति का वध करके नये राजवंश की स्थापना की।

कण्व-वंश

इस वंश का संस्थापक वसुदेव कण्व था। इतिहासकार अब तक इस वंश के समय की किसी उल्लेखनीय घटना अथवा विशेष उपलब्धि का पता नहीं लगा पाये हैं। इस वंश में कुल चार शासक- वसुदेव, भूमिमित्र, नारायण तथा सुशर्मा हुए जिन्होंने कुल 45 वर्षों तक शासन किया। इस वंश का अन्तिम शासक सुशर्मा था।

पुराणों में कहा गया है कि कण्व वंश के शासक धर्मानुकूल शासन करेंगे। इससे अनुमान होता है कि शुंगों के शासन काल में ब्राह्मण धर्म व्यवस्था चलती रही। इस वंश के शासन के बारे में इससे अधिक जानकारी नहीं मिलती।

पुराणों से ज्ञात होता है कि 28 ई.पू. अथवा 27 ई.पू. में आन्ध्र अथवा सातवाहन वंश के सिमुक ने सुशर्मा का वध करके कण्व वंश का अन्त कर दिया और स्वयं मगध का शासक बन गया। कण्व काल में संस्कृत के प्रसिद्ध कवि भास ने ‘प्रतिज्ञा यौगन्धरायण’ नाटक की रचना की।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल अध्याय – ब्राह्मण राज्य

शुंग वंश एवं कण्व वंश

आन्ध्र अथवा सातवाहन वंश

सातवाहन अथवा आन्ध्र वंश

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सातवाहन वंश अथवा शुंग वंश

सातवाहन राजाओं के नामों में गौतम और वसिष्ठ लगा हुआ है। ये ब्राह्मण गोत्र हैं। नासिक अभिलेख में गौतमीपुत्र शातकर्णि की माता गौतमी बलश्री को राजर्षिवधू कहा गया है।

आन्ध्र वंश अथवा सातवाहन

आन्ध्र एक जाति का नाम था जो गोदावरी तथा कृष्णा नदियों के मध्य-भाग में निवास करती थी। वायु पुराण के अनुसार आन्ध्र जाति में उत्पन्न सिन्धुक, कान्वायन सुशर्मा एवं शुंगों की अवशिष्ट शक्ति को नष्ट कर राज्य प्राप्त करेगा। इस कथन से अनुमान होता है कि सिमुक ने कण्व तथा शुंग दोनों वंशों की शक्ति को नष्ट किया। इससे यह भी अनुमान होता है कि कण्वों के समय में भी शुंग किसी न किसी भू-भाग पर किसी न किसी रूप में शासन कर रहे थे।

आर्य अथवा अनार्य ?

निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि आन्ध्र लोग आर्य थे अथवा अनार्य! कुछ विद्वानों के विचार से ये मूलतः अनार्य थे परन्तु आर्यों के घनिष्ठ सम्पर्क में आ जाने से इन्होंने आर्य-सभ्यता तथा संस्कृति को अपना लिया था। इससे यह बताना कठिन हो गया कि ये लोग आर्य थे अथवा अनार्य। आंयगर के अनुसार आन्ध्र लोग अनार्य प्रजाति के थे जो धीरे-धीरे आर्य बना लिये गये। वे दक्षिण भारत के उत्तरी-पूर्वी भाग में निवास करते थे और काफी शक्तिशाली थे।’

भारतीय पुराण इस राजवंश को आन्ध्रजातीय अथवा आन्ध्रभृत्य लिखते हैं किंतु इस वंश के लेखों में कहीं पर भी आन्ध्र नाम का प्रयोग नहीं हुआ है। इस वंश के राजा स्वयं को सातवाहन लिखते थे। लिखित साहित्य में इस वंश के लिये कहीं-कहीं शालिवाहन शब्द भी प्रयुक्त हुआ है।

प्राचीन ब्राह्मण ग्रंथ दक्षिणी भारत में गोदावरी तथा कृष्णा नदियों के बीच के प्रदेश को आन्ध्र जाति का निवास स्थान बताते हैं। ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार यह प्रदेश आर्य संस्कृति से बाहर था। पुराणों में आन्ध्रों की गणना पुण्ड्र, शबर और पुलिंद आदि अनार्यों के साथ हुई है। उपरोक्त तथ्यों के अनुसार यदि इस वंश को आन्ध्र वंश माना जाये तो यह राजवंश अनार्य सिद्ध होता है।

क्या सातवाहन ब्राह्मण थे ?

जहां पुराण एक ओर आंध्र वंश को अनार्य बताते हैं वहीं वे, सातवाहन राजाओं को ब्राह्मण बताते हैं जो मगध पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने से पहले दक्षिण भारत में निवास करते थे। कुछ सातवाहन राजाओं के नामों में गौतम और वसिष्ठ लगा हुआ है। ये ब्राह्मण गोत्र हैं। नासिक अभिलेख में गौतमीपुत्र शातकर्णि की माता गौतमी बलश्री को राजर्षिवधू कहा गया है।

इससे अनुमान होता है कि वह ब्राह्मण-कन्या नहीं थी यदि ब्राह्मण-कन्या होती तो उसे ब्रह्मर्षि कन्या लिखा जाता। नासिक अभिलेख में गौतमीपुत्र शातकर्णि को एकबम्हन कहा गया है। इससे अनुमान होता है कि वह एक ब्राह्मण था। सेनार, ब्यूलर आदि अधिकांश विद्वानों ने सातवाहनों को ब्राह्मण माना है।

डॉ. हेमचन्द्र राय चौधरी ने सातवाहनों को आन्ध्र का भृत्य बताते हुए लिखा है- ‘यह विश्वास करने योग्य बात है कि आन्ध्र-भृत्य अथवा सातवाहन राजा ब्राह्मण थे जिनमें कुछ नाग-रक्त का सम्मिश्रण था।’

यदि यह वंश, आर्य वंश था तथा ब्राह्मण जाति का था फिर भी ब्राह्मण ग्रंथों ने इसे अनार्य क्यों कहा ? इसका कारण यह था कि यह वंश पहले, महाराष्ट्र में राज्य करता था परंतु कालान्तर में शकों ने इस राजवंश को परास्त करके महाराष्ट्र से निकाल दिया। पराजित राजवंश महाराष्ट्र को छोड़कर गोदावरी एवं कृष्णा के बीच आन्ध्र प्रदेश में जाकर बस गया। आंध्र देश पर राज्य करने के कारण यह राजवंश आन्ध्र कहलाने लगा। अतः आन्ध्र नाम, प्रादेशिक संज्ञा है, जातीय संज्ञा नहीं है।

आंध्र अथवा सातवाहन ?

बृहद्देशी नामक ग्रंथ में आन्ध्री और सातवाहनी नामक दो पृथक-पृथक रागिनियों का उल्लेख है। इससे कुछ इतिहासकारों का अनुमान है कि आन्ध्र तथा सातवाहन दो पृथक जातियां थीं किंतु कतिपय विद्वानों के अनुसार आन्ध्र जाति में सातवाहन नामक राजकुमार हुआ, जिसके वंशज सातवाहन कहलाये। इस प्रकार आन्ध्र ‘जाति’ का और सातवाहन ‘कुल’ का नाम था।

सातवाहन शासक

सिमुक

सातवाहन-वंश का पहला राजा सिमुक था। उसे सिसुक सिंधुक, शिशुक तथा शिप्रक आदि नामों से भी पुकारा गया है। इसे भृत्य भी कहा गया है। अतः अनुमान होता है कि वह आरंभ में किसी राजा का सामन्त था। बाद में स्वतंत्र शासक बना। उसकी राजधानी प्रतिष्ठान अथवा पैठन थी जो गोदावरी नदी के तट पर स्थित थी। 28 ई.पू. में सिन्धुक ने कण्व-वंश के अन्तिम शासक देवभूति की हत्या करके मगध पर अधिकार कर लिया। डॉ. राय चौधरी ने इसे 60 ई.पू. से 37 ई.पू. के बीच के कालखण्ड का माना है।

कृष्ण

पुराणों के अनुसार सिमुक का भाई कृष्ण, सिमुक का उत्तराधिकारी था। कुछ इतिहासकार नासिक गुहा लेख में वर्णित कन्ह को इस कृष्ण से मिलाते हैं। उसके समय में एक श्रमण महामात्र ने नासिक में एक गुफा का निर्माण करवाया। इससे प्रकट होता है कि नासिक पर कृष्ण का शासन था।

शातकर्णि (प्रथम)

सातवाहन वंश का प्रथम शक्तिशाली राजा शातकर्णि था। इसके शासन के अनेक साक्ष्य मिलते हैं। पुराण इसे कृष्ण का पुत्र कहते हैं किंतु नानाघाट शिलालेख में उसे सिमुक सातवाहनस वंसवधनस (सिमुक सातवाहन के वंश को बढ़ाने वाला) कहा गया है। इससे अनुमान होता है कि वह सिमुक का पुत्र था।

शातकर्णि की रानी का नाम नागानिका था जो अंगीय वंश के राजा की पुत्री थी। शातकर्णि ने दो बार अश्वमेध यज्ञ किये। नानाघाट अभिलेख द्वितीय अश्वमेध यज्ञ का उल्लेख करता है। प्रथम अश्वमेध यज्ञ के उल्लेख वाला अभिलेख अब तक प्राप्त नहीं हो सका है। द्वितीय अश्वमेध यज्ञ में उसने बड़ी संख्या में गाय, घोड़े, हाथी, गांव, सुवर्ण आदि का दान किया।

सांची अभिलेख में भी राजा शातकर्णि का उल्लेख मिलता है। जिससे प्रकट होता है कि शातकर्णि का शासन मालवा पर भी था। यह प्रदेश स्वयं शातकर्णि ने जीता था। शातकर्णि ने मालवा शैली की गोल मुद्राएं चलाई थीं। शातकर्णि ने एक विशाल राज्य की स्थापना की जिसमें महाराष्ट्र का अधिकांश भाग, उत्तरी कोंकण और मालवा सम्मिलित थे। उसकी राजधानी प्रतिष्ठान थी। शातकर्णि ही प्रथम सातवाहन राजा था जिसने दक्षिण भारत में सातवाहनों की प्रभुसत्ता स्थापित की।

शातकर्णि के उत्तराधिकारी

शातकर्णि की मृत्यु के समय उसके दो पुत्र अल्पवयस्क अवस्था में थे इसलिये शातकर्णि की रानी नागानिका ने संरक्षिका के रूप में शासन भार संभाला। शातकर्णि के निर्बल उत्तराधिकारियों को शकों के आक्रमण का सामना करना पड़ा। यहीं से शक-सातवाहन संघर्ष आरम्भ हुआ जो दीर्घकाल तक चलता रहा।

शकों ने महाराष्ट्र, राजपूताना के कुछ भाग, अपरान्त, गुजरात, काठियावाड़ और मालवा पर अधिकार कर लिया। इनमें से कुछ प्रदेश पहले सातवाहनों के अधीन थे। शातकर्णि प्रथम तथा गौतमीपुत्र शातकर्णि के बीच का लगभग 100 वर्ष का इतिहास अंधकार मय है।

इस अवधि में सातवाहन राजाओं के बारे में विशेष जानकारी नहीं मिलती। इस अवधि में सातवाहनों का एकच्छत्र राज्य बिखर गया तथा उनकी कई शाखाएं विकसित हो गईं। पौराणिक विवरणों में शातकर्णि तथा गौतमीपुत्र शातकर्णि के बीच 10, 12, 13, 14 अथवा 19 राजाओं के नाम मिलते हैं।

गौतमी-पुत्र शातकर्णि

106 ई. के लगभग सातवाहन वंश में महापराक्रमी नरेश गौतमीपुत्र शातकर्णि का उदय हुआ जिसने सातवाहन वंश का पुनरुद्धार किया। पुराणों के अनुसार गौतमीपुत्र शातकर्णि, सातवाहन वंश का तेइसवाँ राजा था। वह सातवाहन वंश का सर्वाधिक प्रतापी तथा शक्तिशाली राजा था।

उसने साम्राज्यवादी नीति का अनुसरण किया और सम्पूर्ण दक्षिणापथ तथा मध्य भारत पर अधिकार कर लिया। एक विजेता के रूप में उसका सबसे अधिक प्रशंसनीय कार्य यह था कि उसने शकों को महाराष्ट्र से मार भगाया। गौतमी-पुत्र शातकर्णि महान् विजेता ही नहीं, वरन् कुशल शासक भी था। वह अपने राज्य में पूर्ण शान्ति तथा सुव्यवस्था बनाये रखने में सफल रहा। उसने 106 ई. से 130 ई. तक शासन किया।

गौतमीपुत्र शातकर्णि की उपलब्धियाँ

गौतमीपुत्र शातकर्णि की उपलब्धियां सम्पूर्ण सातवाहन वंश को गौरव प्रदान करती हैं। गौतमीपुत्र शातकर्णि की सफलताओं का विवरण गौतमीपुत्र शातकर्णि के पुत्र वसिष्ठीपुत्र पुलमावी के नासिक अभिलेख तथा गौतमी बलश्री के नासिक अभिलेख में मिलता है। उसकी उपलब्धियों का मूल्यांकन निम्नलिखित तथ्यों के आलोक में किया जा सकता है-

(1) सातवाहन वंश की पुनर्स्थापना

गौतमीपुत्र शातकर्णि ने विगत एक शताब्दी से भी अधिक समय से पतन की ओर जा रहे सातवाहन वंश का उद्धार करके इस वंश की पुनर्स्थापना की। गौतमी बलश्री के नासिक अभिलेख में उसे अपराजितविजय पताकः कभी परास्त न होने वाला कहा गया है।

(2) शक, यवन और पह्लवों पर विजय

वसिष्ठीपुत्र पुलमावी के नासिक अभिलेख में गौतमीपुत्र शातकर्णि को सातवाहन कुल के यश को फिर से स्थापित करने वाला बताया गया है। इस कार्य को पूर्ण करने के लिये उसे क्षत्रियों के दर्प और मान का मर्दन करना पड़ा। शक, यवन और पह्लवों का नाश करना पड़ा और क्षहरात वंश का निर्मूलन करना पड़ा।

(3) क्षत्रियों के दर्प का मर्दन

गौतमीबलश्री के नासिक अभिलेख में गौतमीपुत्र शातकर्णि को ‘खतिय-दप-मान-मदनस’ अर्थात क्षत्रियों के दर्प एवं मान का मर्दन करने वाला कहा गया है। इससे अनुमान होता है कि उसने बहुत से तत्कालीन क्षत्रिय राजाओं को परास्त करके अपने साम्राज्य का विस्तार किया।

(4) क्षहरात वंश पर विजय

नासिक के दो अभिलेखों से प्रकट होता है कि गौतमीपुत्र शातकर्णि ने क्षहरात वंश को पराजित करके अपने वंश का राज्य स्थापित कर लिया। जोगलथम्भी-मुद्रा-भाण्ड में ऐसी 9000 मुद्रायें मिली हैं जिन पर नहपान तथा गौतमीपुत्र दोनों के नाम अंकित हैं। इससे प्रकट होता है कि गौतमीपुत्र शातकर्णि ने नहपान को पराजित करने के पश्चात् उसकी मुद्राओं पर अपना नाम अंकित करने के पश्चात् उन्हें फिर से प्रसारित किया। कुछ विद्वान यह नहीं मानते कि नहपान तथा गौतमीपुत्र शातकर्णि समकालीन थे।

स्मिथ के अनुसार जोगलथम्भी-मुद्रा-भाण्ड में नहपान की जो 13 हजार मुद्राएं मिली हैं तथा जिनमें से 9000 मुद्राओं को गौतमीपुत्र शातकर्णि द्वारा फिर से चलाया गया था, वे बहुत पहले से चल रही थीं तथा गौतमीपुत्र शातकर्णि के समय में भी चल रही थीं। इन मुद्राओं से यह कदापि सिद्ध नहीं होता कि गौतमीपुत्र शातकर्णि ने नहपान को परास्त किया था। नहपान तो गौतमीपुत्र शातकर्णि से पहले ही मर चुका था।

(5) सम्पूर्ण दक्षिणापथ पर विजय

नासिक अभिलेख के अनुसार उसके साम्राज्य में गोदावरी और कृष्णा के मध्य का प्रदेश (असिक), गोदावरी का तटीय प्रदेश (अश्मक), पैठान के चतुर्दिक प्रदेश (मूलक), दक्षिणी काठियावाड़ (सुराष्ट्र), उत्तरी काठियावाड़ (कुकुर), बम्बई का उत्तरी प्रदेश (अपरांत), नर्मदा नदी पर महिष्मति प्रदेश (अनूप), बरार (विदर्भ), पूर्वी मालवा (आकर), पश्चिमी मालवा (अवन्ति) सम्मिलित थे।

(6) तीनों समुद्रों तक सीमा का विस्तार

गौतमी बलश्री के नासिक अभिलेख के अनुसार गौतमीपुत्र शातकर्णि का राज्य सम्पूर्ण दक्षिणापथ में विस्तृत था। इस अभिलेख में उसे कभी परास्त न होने वाला कहा गया है। इसी अभिलेख में उसे त्रिसमुद्र तोय-पीत-वाहनस्य कहा गया है। अर्थात् उसके वाहनों (हाथियों) ने तीनों समुद्रों (अरब सागर, बंगाल की खाड़ी तथा हिन्द महासागर) का जल पिया। यह हो सकता है कि यह केवल एक काव्यात्मक अतिरंजना हो किंतु निश्चय ही इतनी विजयों के बाद उसका प्रभाव सम्पूर्ण दक्षिण भारत ने स्वीकार कर लिया होगा।

(7) वर्णाश्रम धर्म की पुनर्स्थापना

गौतमी बलश्री के अभिलेख  के अनुसार गौतमीपुत्र शातकर्णि को राम, केशव, अर्जुन और भीम के सदृश पराक्रम वाला बताया गया है। वह विजयोन्मत्त नहीं था। उसका निर्भय हाथ अभयोदक देने में आर्द्र रहता था। शत्रुओं की प्राण हिंसा में उसकी रुचि नहीं थी। वह आगमों का ज्ञाता था, श्रेष्ठ पुरुषों का आश्रयदाता था और सदाचारी था। वह धर्मशास्त्र सम्मत कर ही लेता था। वह द्विज एवं द्विजेत्तर समस्त कुलों का पोषक था। उसने वर्ण संकरता को रोककर वर्णाश्रम व्यवस्था को स्थिरता प्रदान की।

(8) शकों से वैवाहिक सम्बन्ध

शकों की शक्ति को ध्यान में रखते हुए गौतमीपुत्र शातकर्णि ने उनसे वैवाहिक सम्बन्ध बनाये ताकि उसके वंशजों का भविष्य सुरक्षित हो सके और उसके साम्राज्य को स्थायित्व मिल सके। उसने अपने पुत्र वाशिष्ठिपुत्र पुलुमावि का विवाह शक क्षत्रप रुद्रदामन की पुत्री के साथ किया।

वाशिष्ठिपुत्र पुलुमावि

पौराणिक विवरणों के अनुसार गौतमीपुत्र के बाद वाशिष्ठिपुत्र पुलुमावि सातवाहन सम्राट बना। वह 130 ई. में सिंहासन पर बैठा। टॉलेमी ने अपनी पुस्तक ज्योग्राफी में प्रतिष्ठान का शासक सिरोपोलेमायु को बताया है। पुराणों में उसे पुलोमा कहा गया है। उसकी कुछ मुद्राओं पर उसका नाम वाशिष्ठीपुत्र पुलुमावि मिलता है।

150 ई. के रुद्रदामन अभिलेख में जूनागढ़, पूर्वी मालवा, महिष्मती का निकटवर्ती प्रदेश, कठियावाड़, पश्चिमी राजस्थान और उत्तरी कोंकण आदि क्षेत्र रुद्रदामन के राज्यक्षेत्र में बताये गये हैं। ये प्रदेश गौतमीपुत्र शातकर्णि के समय में सातवाहनों के अधिकार में थे।

अतः अनुमान होता है कि गौतमीपुत्र शातकर्णि की मृत्यु के बाद शकों ने फिर से सिर उठा लिया तथा सातवाहनों के कई प्रदेश छीन लिये। रुद्रदामन का अभिलेख कहता है कि रुद्रदामन ने शातकर्णि राजा को दो बार परास्त किया किंतु उससे वैवाहिक सम्बन्ध होने के कारण उसे नष्ट नहीं किया।

वाशिष्ठिपुत्र पुलुमावि ने अपने क्षेत्रों की भरपाई करने के लिये आंध्र, विदर्भ तथा कोरोमण्डल तट तक अपना राज्य विस्तृत किया। प्रतिष्ठान उसकी राजधानी बनी रही। नासिक भी उसके अधीन बना रहा। नासिक अभिलेख में उसे दक्षिणापथेश्वर कहा गया है। पुलुमावि ने 130 ई. से 154 ई. अथवा 159 ई. तक शासन किया। उसके उत्तराधिकारी निर्बल थे। उनमें से कइयों का तो अब विवरण भी नहीं मिलता।

यज्ञश्री शातकर्णी

इस वंश का अन्तिम उल्लेखनीय शासक यज्ञश्री शातकर्णी था। पुराणों के अनुसार वह, गौतमीपुत्र के 35 वर्ष बाद सिंहासन पर बैठा तथा उसने 29 वर्ष शासन किया। अनुमान होता है कि वह 165 ई. से 194 ई. तक शासन करता रहा। अपरांत की राजधानी सोपारा से उसके सिक्के मिले हैं जो रुद्रदामन के सिक्कों का प्रतिरूप मात्र हैं इससे अनुमान होता है कि उसने शकों से अपरान्त फिर से छीन लिया था।

यज्ञश्री शातकर्णि की मुद्रायें गुजरात, काठियावाड़, पूर्वी तथा पश्चिमी मालवा, मध्यप्रदेश और आन्ध्र प्रदेश में पाई गईं। वे शक मुद्राओं के प्रारूप पर बनी हैं इससे अनुमान होता है कि उसने शकों पर विजय प्राप्त की। उसके काल में सातवाहन राज्य अरबसागर तक विस्तृत था। उसके काल में व्यापारिक उन्नति हुई। उसकी कुछ मुद्राओं पर दो मस्तूल वाले जहाज, मछली एवं शंख आदि का अंकन मिलता है। सातवाहन शक संघर्ष का यह अंतिम चरण था। इसके बाद दोनों के संघर्ष के उल्लेख अप्राप्य हैं।

अंतिम शासक

यज्ञश्री शातकर्णी के बाद सातवाहन वंश का उत्तरोत्तर पतन ही होता गया। सातवाहन वंश का अंतिम शासक पुलुमावि चतुर्थ था। पुराणों के अनुसार उसने सात वर्ष शासन किया। उसका शासन काल सम्भवतः 220 ईस्वी से 227 ईस्वी तक था। कालान्तर में महाराष्ट्र पर आभीर-वंश ने और दक्षिणापथ पर इक्ष्वाकु तथा पल्लव-वंश ने अधिकार स्थापित कर लिये। इस प्रकार तीसरी शताब्दी तक सातवाहन वंश का अन्त हो गया।

सातवाहन कालीन साहित्य

अनेक सातवाहन राजा उच्च कोटि के विद्वान थे और विद्वानों के आश्रयदाता थे। हाल नामक सातवाहन राजा अपने समय में प्राकृत का विख्यात कवि था जिसने शृंगार-रस की ‘गाथा सप्तसती’ नामक ग्रन्थ की रचना की। हाल की राजसभा में गुणाढ्य नामक विद्वान् रहता था जिसने ‘वृहत्कथा’ नामक ग्रंथ की रचना की।

सातवाहनों के शासन काल में धर्म

सातवाहन-काल में भारत में बौद्ध तथा ब्राह्मण, दोनों ही धर्म उन्नत दशा में थे। शासक वर्ग में अश्वमेध तथा राजसूय यज्ञ करने तथा ब्राह्मणों को दक्षिणा देने का प्रचलन था। इस काल में दक्षिण भारत में शैव-धर्म का सर्वाधिक प्रचार हुआ। उत्तर भारत में शिव तथा कृष्ण की आराधना विशेष रूप से होती थी। इस काल में धार्मिक-सहिष्णुता उच्च कोटि की थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मूल अध्याय – ब्राह्मण राज्य

शुंग वंश एवं कण्व वंश

आन्ध्र अथवा सातवाहन वंश

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