Tuesday, October 26, 2021

अध्याय – 12 चंद्रगुप्त मौर्य

(चंद्रगुप्त मौर्य की विजयें एवं प्रशासन के विशेष संदर्भ में)

मौर्य वंश

मौर्य साम्राज्य के संस्थापक सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य का प्रारम्भिक जीवन अन्धकार में है। यूनानी इतिहासकारों ने उसे भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा है। स्ट्रेबो, एरियन तथा जस्टिन ने उसे ‘सैण्ड्रोकोटस’ लिखा है जबकि एपिअन तथा प्लूटार्क ने उसे ‘ऐण्ड्रोकोटस’ लिखा है। फिलार्कस ने उसे ‘सैण्ड्रोकोप्टस’ कहा है। भारतीय ग्रंथ  उसे प्रायः चंद्रगुप्त मौर्य लिखते हैं। विशाखदत्त के नाटक ‘मुद्राराक्षस’ में उसे चन्दसिरि (चंद्रश्री), पि अदर्सन (प्रिय दर्शन) और वृषल (राजाओं में प्रधान) कहा गया है। कुछ विद्वानों के अनुसार उसके लिये ‘वृषल’ शब्द का प्रयोग उसकी सामजिक हेयता का द्योतक है।

कतिपय ब्राह्मण-ग्रन्थों के अनुसार ‘मौर्य’ शब्द व्यक्ति-वाचक संज्ञा ‘मुरा’ से बना है जो नन्द-राज की नाइन जाति की शूद्रा पत्नी थी। चूंकि मौर्य-साम्राज्य का संस्थापक चन्द्रगुप्त इसी मुरा के पेट से उत्पन्न हुआ था। इसलिये वह तथा उसके वंशज मौर्य कहलाये। इस व्याख्या के अनुसार ‘मौर्य’ शूद्र तथा निम्न कुल के ठहरते हैं परन्तु इस मत को स्वीकार करने में दो बहुत बड़ी कठिनाइयाँ है। पहली कठिनाई तो व्याकरण सम्बन्धी है। संस्कृत व्याकरण के नियमानुसार मुरा शब्द से, जो स्त्री-लिंग है, मौरेय शब्द बनेगा न कि मौर्य, अर्थात् मुरा की सन्तान मौरेय कहलायेगी, मौर्य नहीं। इसलिये मौर्यों को मुरा नामक शूद्र वंश का वंशज बताना, संस्कृत व्याकरण के नियम के विपरीत है।

मौर्यों को शूद्र-वंशीय स्वीकार करने में दूसरी कठिनाई यह है कि यदि मौर्य साम्राज्य का संस्थापक अर्थात् चन्द्रगुप्त शूद्र-वंश का होता तो कौटिल्य, जो एक ब्राह्मण था, उसकी सहायता न करता, और उसे राजा स्वीकार नहीं करता।

पुराणों में कहा गया है कि शिशुनाग वंश के विनाश के आगे शूद्र राजा होंगे। इस आधार पर बहुत से इतिहासकार मौर्यों को शूद्र मान लेते हैं जबकि यह निष्कर्ष सही नहीं है क्योंकि मौर्यों के बाद शुंग वंश एवं कण्व वंश ने भी मगध पर शासन किया जो कि ब्राह्मण थे। सातवाहन वंश भी ब्राह्मण था। पुराणों का यह कथन कि शिशुनाग वंश के विनाश के आगे शूद्र राजा होंगे, वस्तुतः नंद वंश के लिये है न कि मौर्यों के लिये।

कतिपय विद्वानों के अनुसार ‘मौर्य’ शब्द संस्कृत भाषा के पुल्लिंग शब्द ‘मुर’ से बना है जो महर्षि पाणिनी के कथनानुसार एक गोत्र का नाम था। इसलिये इस व्याख्या के अनुसार वह लोग जो ‘मुर’ गोत्र के थे ‘मौर्य’ कहलाये।

बौद्ध तथा जैन ग्रन्थों के अनुसार ‘मौर्य’ शब्द प्राकृत भाषा के ‘मोरिय’ शब्द का संस्कृत रूपान्तर है। ‘मोरिय’ एक क्षत्रिय वर्ग का नाम था जो नेपाल की तराई में ‘पिप्पलिवन’ नामक राज्य में शासन करता था। चूंकि इस प्रदेश में मयूर अर्थात् मोर पक्षियों का बाहुल्य था, इसलिये वहाँ के निवासी तथा उसके वंशज ‘मौरिय’ अथवा ‘मौर्य’ कहलाये।

कतिपय बौद्ध ग्रन्थों से ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य मयूर पालकों के एक मुखिया की कन्या का पुत्र था जो क्षत्रिय-वंश का था। सम्भवतः ये क्षत्रिय शत्रुओं द्वारा जन्मभूमि से भगा दिये गये थे और छिप कर मयूर पलकों के रूप में पाटलिपुत्र के निकट जीवन व्यतीत कर रहे थे। जब इस क्षत्रिय-वंश के एक व्यक्ति ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया तो अपने मयूर पालक पूर्वजों की स्मृति में अपने नाम के आगे मौर्य शब्द जोड़ दिया।

सांची के पूर्वी द्वारों पर जो चित्रकारी की गई है उस पर मोर पक्षी के चित्र बने हुए हैं। इससे मार्शल ने यह निष्कर्ष निकाला है कि सम्भवतः मोर पक्षी मौर्य-वंश का राज्य चिह्न था और इस राज्य चिह्न के कारण ही इस वंश का नाम मौर्य वंश पड़ा। चूंकि राज-वंशों के चिह्न प्रायः पशु-पक्षी हुआ करते थे इसलिये मार्शल का यह अनुमान निराधार नहीं कहा जा सकता।

उपर्युक्त विवरण से इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि मौर्य शूद्र तथा अकुलीन नहीं थे। आधुनिक इतिहासकार इसी सिद्धान्त को स्वीकार करते हैं कि चन्द्रगुप्त क्षत्रिय राजकुमार था और ‘मोरिय’ क्षत्रियों का वंशज होने के कारण जो सम्भवतः दुर्दिन आ जाने के कारण मयूर पालक बन गये थे, मौर्य कहलाया। जिस राज-वंश की उसने स्थापना की वह मौर्य-वंश कहलाया। जिस साम्राज्य का उसने निर्माण किया वह मौर्य साम्राज्य और जिस काल में उसने तथा उसके वंशजों ने शासन किया वह मौर्य-काल कहलाया।

भारत के इतिहास में मौर्य-काल का महत्त्व

भारत के इतिहास में मौर्य-काल का विशिष्ट स्थान है। वास्तव में मौर्य-साम्राज्य की स्थापना से भारतीय इतिहास में एक युग का अन्त और दूसरे युग का आरम्भ होता है। जिस युग का अन्त होता है उसे हम अनैतिहासिक युग और जिस नये युग का आरम्भ होता है उसे हम ऐतिहासिक युग कह सकते हैं। स्मिथ ने इस युग की पं्रशसा करते हुए लिखा है- ‘मौर्य राज-वंश का प्रादुर्भाव इतिहासकार के लिए अन्धकार से प्रकाश के मार्ग का निर्देशन करता है। तिथि-क्रम सहसा निश्चित, लगभग-लगभग सुनिश्चित हो जाता है, एक विशाल साम्राज्य का प्रादुर्भाव होता है जो भारत के विच्छिन्न असंख्य टुकड़ों को संयुक्त कर देता है; इस वंश के राजा, जिन्हें वास्तव में सम्राट कहा जा सकता है, महान् व्यक्तित्त्व के तथा लब्ध-प्रतिष्ठ व्यक्ति थे जिनके गुणों के दर्शन समय के कुहासे में मन्द रूप में किये जा सकते हैं।’ इस नये युग की प्रधान विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) श्ृंखलाबद्ध इतिहास का आरम्भ: मौर्य-काल के पहले का इतिहास प्रायः अन्धकारमय तथा विश्ृंखलित है अर्थात् इसका कोई क्रम नहीं है। इसके दो प्रधान कारण प्रतीत होते हैं। पहला तो यह कि घटनाओं की तिथियों का ठीक-ठीक निश्चय नहीं है और दूसरा यह कि इस काल के इतिहास को जानने के साधन बहुत कम हैं। प्रधानतः धार्मिक ग्रन्थों की सहायता से ही इस काल के इतिहास का निर्माण किया गया है। मौर्य-काल के आरम्भ से हम अन्धकार से प्रकाश में आ जाते हैं और भारत का क्रम-बद्ध इतिहास आरम्भ हो जाता है। इसके दो प्रधान कारण हैं। पहला तो यह है कि मौर्य-काल की तिथियाँ निश्चित हैं और दूसरा यह कि मौर्य-काल के इतिहास को जानने के साधन बड़े ही ठोस तथा व्यापक हैं। इस काल का इतिहास जानने के लिए हमें धार्मिक ग्रन्थों के अतिरिक्त अन्य साधन भी अर्थात् ऐतिहासिक ग्रन्थ, विदेशी विवरण, अभिलेख आदि प्राप्त हो जाते हैं।

मौर्य-काल के पूर्व हमें कोई विशुद्ध ऐतिहासिक ग्रन्थ प्राप्त नहीं होता जिसके द्वारा प्राचीन भारत के क्रम-बद्ध, प्रामाणिक इतिहास का ज्ञान प्राप्त किया जाय परन्तु मौर्य-काल में और उसके बाद अनेक ऐसे ऐतिहासिक ग्रन्थ लिखे गये जिनके आधार पर भारत का क्रम-बद्ध प्रमाणित इतिहास तैयार किया जा सकता है। इन ऐतिहासिक ग्रन्थों में सर्व-प्रथम स्थान कौटिल्य के ग्रन्थ ‘अर्थशास्त्र’ का है। कौटिल्य को चाणक्य तथा विष्णुगुप्त भी कहा गया है। यद्यपि कौटिल्य के इस ग्रन्थ का नाम ‘अर्थशास्त्र’ है परन्तु इसमें अर्थ अर्थात् धन-सम्बन्धी कोई बात नहीं लिखी गई है। वास्तव में यह एक विशुद्ध राजनीतिक ग्रन्थ है ओर इससे मौर्यकालीन इतिहास का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त होता है। मौर्यकालीन इतिहास जानने का दूसरा साधन विशाखदत्त द्वारा रचित ‘मुद्राराक्षस’ नामक नाटक है। यह एक ऐतिहासिक नाटक है और मौर्य-काल के प्रारम्भिक इतिहास को जानने में सहायक है। पुराणों से भी, जो ऐतिहासिक ग्रन्थ माने जाते हैं, मौर्य-युग के इतिहास का बहुत कुछ-ज्ञान प्राप्त होता है। कालिदास के ऐतिहासिक नाटक, काश्मीरी लेखक कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ तथा महर्षि पतन्जलि के ‘महाभाष्य’ से भी मौर्यकालीन इतिहास पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।

विदेशी यात्रियों के विवरण भी मौर्यकालीन इतिहास जानने के प्रामाणिक तथा विश्वसनीय साधन हैं। विदेशी लेखकों ने जो कुछ लिखा है वह स्वतंत्र तथा निष्पक्ष भाव से लिखा है और उनमें से अधिकांश ऐसे थे जो स्वयं भारत आये थे। उन्होंने जो कुछ अपनी आँखों से देखा अथवा भारतीयों से सुना, वही लिखा। विदेशी लेखकों में सबसे पहला स्थान मेगस्थनीज का है जो यूनानी सम्राट सैल्यूकस का राजदूत था और चन्द्रगुप्त मौर्य की राजधानी पाटलिपुत्र में कई वर्षों तक रहा। कालान्तर में चीन तथा तिब्बत आदि देशों के यात्री भी भारत आये और उन्होंने यहाँ के विषय में लिखा। चीनी यात्रियों में फाह्यान तथा ह्नेनसांग और तिब्बती लेखकों में तारानाथ प्रमुख हैं।

शिला अभिलेख भी मौर्य-कालीन इतिहास जानने के अत्यन्त विश्वसनीय तथा प्रामाणिक साधन हैं। सम्राट अशोक ने स्तम्भों, शिलाओं तथा गुफाओं की दीवारों पर अनेक लेख लिखवाये जो आज भी उसकी कीर्ति का गान कर रहे हैं।

बौद्ध तथा जैन-ग्रन्थ भी मौर्य-कालीन इतिहास जानने के प्रमुख साधन हैं। चन्द्रगुप्त मौर्य ने जैन-धर्म को और अशोक ने बौद्ध-धर्म को आश्रय प्रदान किया। इसलिये इन दोनों धर्मों के आचार्यों ने अपने ग्रन्थों में मौर्य-कालीन इतिहास पर प्रकाश डालकर उसके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की।

उपर्युक्त प्रचुर साधनों की सहायता से इतिहासकारों ने मौर्य काल का प्रामाणिक तथा विश्वासनीय इतिहास तैयार किया है। इस प्रकार ऐतिहासिक साधनों तथा इतिहास निर्माण की दृष्टि से मौर्य-काल का बहुत बड़ा महत्त्व है।

(2) साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का प्रारम्भ: मौर्य-काल का दूसरा महत्त्व यह है कि इस काल के प्रारम्भ से ही भारत में साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का प्रारम्भ होता है और यह प्रवृत्ति आगामी शताब्दियों में भी चलती है। भारतवर्ष के राजनीतिक इतिहास में यहीं से एक नये युग का आरम्भ होता है जिसे हम साम्राज्यवाद तथा राजनीतिक एकता का युग कह सकते हैं। मौर्य-काल के पूर्व भारतवर्ष में राजनीतिक एकता का सर्वथा अभाव था और सम्पूर्ण देश छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था। यद्यपि साम्राज्यवाद तथा राजनीतिक एकता का स्वप्न देखना भारतीय राजाओं ने मौर्य-काल के पहले ही आरम्भ कर दिया था, परन्तु इस स्वप्न को सर्वप्रथम मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चन्द्रगुप्त ने ही चरितार्थ किया। उसने पंजाब तथा सिन्ध क्षेत्र से विदेशी यूनानियों को और उत्तरी-भारत के अन्य छोटे-छोटे देशी राज्यों को समाप्त कर सम्पूर्ण उत्तरी-भारत को एक राजनीतिक सूत्र में बांधा। इस प्रकार प्रथम बार भारत में राजनीतिक एकता की स्थापना हुई। राजनीतिक एकता का यह आदर्श भारत के भावी महत्त्वाकांक्षी सम्राटों को सदैव प्रेरित करता रहा।

(3) प्रशासनिक एकरूपता का प्रादुर्भाव: राजनीतिक एकता तथा शासन की एकरूपता में अटूट सम्बन्ध है। राजनीतिक एकता प्रशासकीय एकता की जननी है। जब मौर्य-सम्राटों ने सम्पूर्ण उत्तरी-भारत में राजनीतिक एकता स्थापित कर दी तब इस विशाल भू-भाग में एक ही प्रकार के सुदृढ़़ तथा सुव्यवस्थित केन्द्रीय शासन की स्थापना हो गई। चन्द्रगुप्त-मौर्य ने जिस शासन-व्यवस्था का शिलान्यास किया वही भावी शासकों के लिए आदर्श व्यवस्था बन गई और उसी में न्यूनाधिक परिवर्तन करके आगामी शासकों ने शासन-व्यवस्था को चलाया। मौर्य-कालीन शासन व्यवस्था शान्ति बनाये रखने तथा सम्पन्नता प्रदान करने में इतनी सफल रही कि इसे हम शान्ति तथा सम्पन्नता का युग कह सकते हैं।

(4) सांस्कृतिक एकता की स्थापना: राजनीतिक एकता सांस्कृतिक एकता की भी जननी है। चन्द्रगुप्त मौर्य ने विदेशियों को अपने देश से निष्कासित कर एक विशुद्ध भारतीय संस्कृति के विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियॉं उत्पन्न कीं। उसने सम्पूर्ण उत्तरी-भारत में एकछत्र, सुदृढ़़ तथा सुव्यवस्थित शासन स्थापित कर सांस्कृतिक विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया। अशोक ने बौद्ध-धर्म को राज-धर्म बनाकर, उसके प्रचार की समुचित व्यवस्था की तथा सम्पूर्ण भारत में पत्थरों पर शिक्षाएं तथा उपदेश लिखवा कर सम्पूर्ण राज्य में एक ही प्रकार की संस्कृति के विकास का कार्य किया।

(5) विदेशों के साथ घनिष्ठ सम्बन्धों की स्थापना: अशोक ने जिस सभ्यता तथा संस्कृति का सृजन किया, उसे विदेशों में भी प्रचारित कराया। इस प्रकार अशोक विदेशों में भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति के प्रचार का अग्रदूत बन गया। इस सभ्यता तथा संस्कृति के प्रचार की बहुत बड़ी विशेषता यह थी कि यह कार्य प्रेम तथा सद्भावना से किया गया।

चन्द्रगुप्त मौर्य

चन्द्रगुप्त मौर्य के भारतीय राजनीति के मंच पर आने की ओर संकेत करते हुए डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी ने लिखा है- ‘सिकन्दर के चले जाने के उपरान्त भारत के राजनीतिक गगन-मण्डल में एक नया तारा निकला जिसने शीघ्र ही अपने परम प्रकाश से शेष समस्त को तिमिर-तिरोहित कर दिया।’ स्मिथ ने चन्द्रगुप्त मौर्य के भारतीय राजनीति के मंच पर आने के महत्त्व की ओर संकेत करते हुए लिखा है- ‘वास्तव में चन्द्रगुप्त मौर्य ही प्रथम ऐतिहासिक व्यक्ति है जिसे हम सचमुच भारत का सम्राट् कह सकते हैं। एक इतिहासकार के लिए मौर्य राज-वंश का प्रादुर्भाव, अन्धकार से प्रकाश के मार्ग की ओर निर्देशन करता है।’ जस्टिन ने भी इस ओर संकेत करते हुए लिखा है- ‘सिकन्दर की मृत्यु के उपरान्त, चन्द्रगुप्त भारत की स्वतन्त्रता का निर्माता था।’

चन्द्रगुप्त मौर्य का जन्म 345 ई.पू. में मोरिय वंश के क्षत्रिय कुल में हुआ था जो सूर्यवंशी शाक्यों की एक शाखा थी। यह वंश नेपाल की तराई में स्थित पिप्पलिवन के गणतांत्रिक प्रणाली वाले राज्य पर शासन करता था। चन्द्रगुप्त का पिता इन्ही मोरियों का प्रधान था। दुर्भाग्यवश एक शक्तिशाली राजा ने उसकी हत्या कर दी और उसके राज्य को छीन लिया। चन्द्रगुप्त की माता उन दिनों गर्भवती थी। इस विपत्ति में वह अपने सम्बन्धियों के साथ पिप्पलिवन से निकल गई तथा पाटलिपुत्र में अज्ञात रूप से निवास करने लगी। आजीविका चलाने तथा अपने राजवंश को गुप्त रखने के लिए ये लोग मयूर पालन का कार्य करने लगे। इस प्रकार चन्द्रगुप्त का प्रारम्भिक जीवन मयूर-पालकों के मध्य व्यतीत हुआ।

जब चन्द्रगुप्त बड़ा हुआ तब उसने मगध के राजा के यहाँ नौकरी कर ली। इन दिनों मगध में नन्द-वंश शासन कर रहा था। चंद्रगुप्त उसकी सेना में भर्ती हो गया। चन्द्रगुप्त बड़ा ही योग्य तथा प्रतिभावान् युवक था। अपनी योग्यता के बल से वह मगध की सेना का सेनापति बन गया परन्तु कुछ कारणों से मगध का राजा उससे अप्रसन्न हो गया और उसे मृत्यु-दण्ड की आज्ञा दे दी। चन्द्रगुप्त अपने प्राणों की रक्षा करने के लिए मगध राज्य से बाहर चला गया। उसने नन्द वंश को नष्ट करने का संकल्प लिया।

चंद्रगुप्त तथा चाणक्य का योग

यद्यपि चन्द्रगुप्त ने नन्द-वंश को उन्मूलित करने का संकल्प कर लिया था परन्तु अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसके पास साधन उपलब्ध नहीं थे। वह पंजाब की ओर चला गया और इधर-उधर भटकता हुआ तक्षशिला जा पहुंचा, जहाँ विष्णुगुप्त नामक ब्राह्मण से उसकी भेंट हो गयी। विष्णुगुप्त को चाणक्य भी कहते हैं क्योंकि उसके पितामह (बाबा) का नाम चणक था। उसे कौटिल्य भी कहते है क्योंकि उसके पिता का नाम कुटल था। चाणक्य विद्वान तथा राजनीति का प्रकाण्ड पण्डित था। वह भारत के पश्चिमोत्तर भाग की राजनीतिक दुर्बलता से परिचित था और उसे आंशका लगी रहती थी कि यह प्रदेश कभी भी विदेशी आक्रमणकारियों का शिकार हो सकता है। वह इस भू-भाग के छोटे-छोटे राज्यों को समाप्त कर यहाँ एक प्रबल केन्द्रीय शासन स्थापित करना चाहता था, जिससे विदेशी आक्रमणकारियों से देश की रक्षा हो सके। अपने इस उदेश्य की पूर्ति के लिए यह मगध-नरेश की सहायता प्राप्त करने के लिए पाटलिपुत्र गया परन्तु वह नन्द-राज द्वारा अपमानित किया गया। चाणक्य बड़ा ही क्रोधी तथा उग्र-प्रकृति का व्यक्ति था। उसने नन्द-वंश को नष्ट करने का संकल्प कर लिया। नन्द-वंश के विशाल साम्राज्य का उन्मूलन करने के साधन उसके पास भी नहीं थे। इसलिये वह इस साधन की खोज में संलग्न था। इसी समय चन्द्रगुप्त से उसकी भेंट हुई।

चाणक्य तथा चन्द्रगुप्त दोनों के उद्देश्य एक ही थे। वे दोनों व्यक्ति, नन्द-वंश का विनाश करना चाहते थे परन्तु दोनों ही के पास साधनों का अभाव था। संयोगवश इन दोनों ने एक-दूसरे की आवश्यकता की पूर्ति कर दी। चाणक्य को एक वीर, साहसी तथा महत्त्वाकांक्षी नवयुवक की आवश्यकता थी जिसकी पूर्ति चन्द्रगुप्त ने की और चन्द्रगुप्त को एक विद्वान् एवं अनुभवी कूटनीतिज्ञ की सेवाओं की आवश्यकता थी। साथ ही उसे सेना एकत्रित करने के लिये विपुल मात्रा में धन की आवश्यकता थी। उसकी इन दोनों आवश्यकताओं की पूर्ति चाणक्य ने कर दी। फलतः इन दोनों में मैत्री तथा गठबन्धन हो गया।

अपने उद्देश्य की पूर्ति की तैयारी करने के लिए दोनों मित्र विन्ध्याचल के वनों की ओर चले गये। चाणक्य ने अपना सारा धन चन्द्रगुप्त को दे दिया। इस धन की सहायता से उसने भाड़े की एक सेना तैयार की और इस सेना की सहायता से मगध पर आक्रमण कर दिया परन्तु नन्दों की शक्तिशाली सेना ने उन्हें परास्त कर दिया और वे मगध से भाग खड़े हुए। 

अब इन दोनों मित्रों ने अपने प्राणों की रक्षा के लिए फिर पंजाब की ओर प्रस्थान किया। चाणक्य तथा चंद्रगुप्त ने अनुभव किया कि मगध राज्य के केन्द्र पर प्रहार कर उन्होंने बहुत बड़ी भूल की थी। वास्तव में उन्हें इस राज्य के एक किनारे पर स्थित सुदूरस्थ प्रदेश पर आक्रमण करना चाहिए था, जहाँ केन्द्रीय सरकार का प्रभाव कम और उसके विरुद्ध अंसतोष अधिक रहता है। उस समय यूनानी आक्रमणकारी सिकन्दर पंजाब में ही था और वहाँ के छोटे-छोटे राज्यों को जीत रहा था। चन्द्रगुप्त ने नन्दों के विरुद्ध सिकन्दर की सहायता लेने का विचार किया। इसलिये वह सिकन्दर से मिला और कुछ दिनों तक उसके शिविर में रहा। चन्द्रगुप्त के स्वतन्त्र विचारों के कारण सिकन्दर उससे अप्रसन्न हो गया और उसका वध करने की आज्ञा दी। चन्द्रगुप्त प्राण बचाकर भाग खड़ा हुआ। अब उसने मगध-राज्य के विनाश के साथ-साथ यूनानियों को भी भारत से मार भगाने का निश्चय कर लिया। वह चाणक्य की सहायता से अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए योजनाएँ बनाने लगा।

चन्द्रगुप्त की विजयें

(1) विजय अभियान का आरम्भ: इतिहासकारों में इस बात पर मतभेद है कि चंद्रगुप्त मौर्य ने पहले पंजाब-सिंध से यूनानियों का सफाया किया अथवा मगध राज्य पर आक्रमण करके नंद वंश की सत्ता को समाप्त किया। यूनानी, बौद्ध तथा जैन ग्रंथों से अनुमान होता है कि चंद्रगुप्त ने पहले पंजाब एवं सिंध क्षेत्र को यूनानियों से मुक्त करवाया। महावंश टीका तथा जैन ग्रंथ परिशिष्टपर्वन् में एक कथा मिलती है जिसके अनुसार चाणक्य तथा चंद्रगुप्त मौर्य ने पहले मगध राज्य पर आक्रमण किया किंतु वहां से परास्त होकर भाग खड़े हुए। इसके बाद उन्होंने निर्णय लिया कि सीधे ही मगध की राजधानी पर आक्रमण करने के स्थान पर उन्हें मगध राज्य के एक किनारे से अपना विजय अभियान आरम्भ करना चाहिये।

(2) पंजाब और सिंध पर अधिकार: सिकन्दर के भारत से चले जाने के उपरान्त पश्चिमोत्तर क्षेत्रों में निवास करने वाले भारतीयों ने यूनानियों के विरुद्ध आन्दोलन आरम्भ कर दिया। चन्द्रगुप्त के लिए यह स्वर्ण अवसर था। उसने इस स्थिति का पूरा लाभ उठाने का निश्चय किया। महावंश टीका तथा जैन ग्रंथ परिशिष्टपर्वन् के अनुसार चाणक्य ने धातुशास्त्र के ज्ञान से धन निर्मित करके सैनिक भर्ती किये। चंद्रगुप्त ने इस सेना के बल पर, यूनानियों के विरुद्ध चल रहे आंदोलन का नेतृत्व ग्रहण किया। चंद्रगुप्त ने यूनानियों को पंजाब तथा सिंध क्षेत्र से भगाना आरम्भ किया। यूनानी क्षत्रप यूडेमान, यूनानी सैनिकों के साथ भारत छोड़कर भाग गया। जो यूनानी सैनिक भारत में रह गये, वे तलवार के घाट उतार दिये गये। इस प्रकार चन्द्रगुप्त ने सम्पूर्ण पंजाब तथा सिंध पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया।

जस्टिन ने लिखा है- ‘सिकंदर की मृत्यु के पश्चात् उसके गवर्नरों को मारकर भारत को विदेशियों की दासता से मुक्त करवाने का श्रेय चंद्रगुप्त को है।’ जस्टिन लिखता है- ‘सिकन्दर की मृत्यु के बाद भारत ने मानो अपने गले से दासता का जुआ उतार फेंका और उसके क्षत्रपों को मार डाला। इस मुक्ति का सृष्टा सैंड्रोकोटस था।’ डॉ. राधाकुमुद मुकर्जी के अनुसार जस्टिन का यह उद्धरण इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण अभिलेख है। इसमें निश्चित रूप से यह कहा गया है कि चंद्रगुप्त इस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का नायक था।

(3) मगध राज्य पर आक्रमण: पंजाब तथा सिंध पर अधिकार स्थापित कर लेने के उपरान्त चन्द्रगुप्त ने मगध-राज्य पर आक्रमण करने के लिए पूर्व की ओर प्रस्थान किया। वह अपनी विशाल सेना के साथ मगध-साम्राज्य की पश्चिमी सीमा पर टूट पड़ा। चन्द्रगुप्त की सेना को रोकने के मगध-नरेश के समस्त प्रयत्न निष्फल सिद्ध हुए। चन्द्रगुप्त की सेना ने मगध-राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र के निकट पहुँचकर उसका घेरा डाल दिया। अन्त में नन्द-राज धनानन्द की पराजय हुई और वह अपने परिवार के साथ युद्ध में मारा गया। इस प्रकार 322 ई.पू. में चन्द्रगुप्त पाटलिपु़त्र के सिंहासन पर बैठा। चाणक्य ने उसका राज्याभिषेक किया।

वायुपुराण में कहा गया है कि ब्राह्मण कौटिल्य नवनंदों का नाश करेगा तथा कौटिल्य ही चंद्रगुप्त का राज्याभिषेक करेगा। वायुपुराण, कौटिलीय अर्थशास्त्र, महावंशटीका, मत्स्य पुराण एवं भागवत पुराण, नीति शास्त्र, कथासरित्सागर, वृहत्कथा मंजरी, मुद्राराक्षस आदि ग्रंथों में चंद्रगुप्त द्वारा नंदों के उन्मूलन एवं मगध की गद्दी पर चंद्रगुप्त के सिंहासनारोहण का उल्लेख किया गया है।

(4) पश्चिमी भारत पर विजय: उत्तर भारत पर प्रभुत्व स्थापित कर लेने के उपरान्त चन्द्रगुप्त तथा चाणक्य ने पश्चिमी भारत पर भी अपनी विजय-पताका फहराने का निश्चय किया। उन्होंने सर्वप्रथम सौराष्ट्र पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। उसके बाद लगभग 303 ई.पू. में उसने मालवा पर अधिकार स्थापित कर लिया और पुष्यगुप्त वैश्य को वहाँ का प्रबन्ध करने के लिए नियुक्त किया जिसने सुदर्शन झील का निर्माण करवाया। इस प्रकार काठियावाड़ तथा मालवा पर चन्द्रगुप्त का प्रभुत्व स्थापित हो गया।

(5) सैल्यूकस पर विजय: चन्द्रगुप्त का अन्तिम संघर्ष सिकन्दर के पूर्व सेनापति तथा बैक्ट्रिया के शासक सैल्यूकस निकेटार के साथ हुआ। सिकन्दर की मृत्यु के उपरान्त सैल्यूकस उसके साम्राज्य के पूर्वी भाग का अधिकारी बना था। उसने 305 ई.पू. में भारत पर आक्रमण कर दिया, चन्द्रगुप्त ने पश्चिमोत्तर प्रदेश की सुरक्षा की व्यवस्था पहले से ही कर ली थी। उसकी सेना ने सिन्धु नदी के उस पार ही सैल्यूकस की सेना का सामना किया। युद्ध में सैल्यूकस की बुरी तरह पराजय हो गई और उसे विवश होकर चन्द्रगुप्त के साथ सन्धि करनी पड़ी। सैल्यूकस ने अपने चार प्रांत- आरकोशिया (कंधार), पैरोपैनिसडाई (काबुल), एरिया (हेरात) तथा गेड्रोशिया (बिलोचिस्तान) चन्द्रगुप्त को दे दिये।

सैल्यूकस ने अपनी पुत्री का विवाह चन्द्रगुप्त के साथ कर दिया। भविष्य पुराण में इस विवाह का उल्लेख मिलता है। इस संधि के बाद सैल्यूकस ने मेगस्थनीज नामक एक राजदूत भी चन्द्रगुप्त की राजधानी पाटलिपुत्र में रहने के लिये भेजा। चन्द्रगुप्त ने भी सैल्यूकस को 500 हाथी भेंट किये।

चन्द्रगुप्त मौर्य और सैल्यूकस के संघर्ष के सम्बन्ध में डॉ. राज चौधरी ने अपनी पुस्तक ‘प्राचीन भारत का राजनीतिक इतिहास’ में लिखा है- ‘यह देखा जायेगा कि प्राचीन लेखकों से हमें सैल्यूकस और चन्द्रगुप्त के वास्तविक संघर्ष का विस्तृत उल्लेख नहीं मिलता है। वे केवल परिणामों को बतलाते हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि आक्रमणकारी अधिक आगे न बढ़ सका और उसने एक सन्धि कर ली जो वैवाहिक सम्बन्ध द्वारा सुदृढ़़ बना दी गई।

(6) दक्षिणापथ पर विजय: चंद्रगुप्त मौर्य ने सुदूर दक्षिण को छोड़कर दक्षिणापथ के अधिकांश भाग को जीतकर उसे मौर्य साम्राज्य का अंग बना लिया था। इतिहासकारों की धारणा है कि चन्द्रगुप्त का साम्राज्य सम्भवतः मैसूर की सीमा तक फैला हुआ था। कुछ इतिहासकार कृष्णा नदी को उसके राज्य की अंतिम सीमा मानते हैं। जैन संदर्भों के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य का राज्य दक्षिण में श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) तक विस्तृत रहा होगा।

(7) लगभग सम्पूर्ण भारत पर आधिपत्य: अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार चन्द्रगुप्त का साम्राज्य पश्चिम में हिन्दूकुश पर्वत से लेकर पूर्व में बंगाल तक और उत्तर में हिमालय पर्वत से लेकर दक्षिण में कृष्णा नदी तक फैल गया। काश्मीर तथा नेपाल भी उसके साम्राज्य में सम्मिलित थे। केवल कलिंग तथा दक्षिण भारत का कुछ भाग उसके साम्राज्य के भीतर नहीं थे। जस्टिन के अनुसार समस्त भारत चंद्रगुप्त के अधिकार में था। मुद्राराक्षस में आये एक श्लोक के अनुसार चंद्रगुप्त का साम्राज्य चतुःसमुद्रपर्यंत था। महावंश टीका में चंद्रगुप्त को सकल जम्बूद्वीप का स्वामी कहा गया है। प्लूटार्क के अनुसार ऐंड्रोकोटस ने छः लाख सैनिकों की सेना लेकर सारे भारत को रौंद डाला और उस पर अपना अधिकार कर लिया। मुद्राराक्षस के अनुसार हिमालय से लेकर दक्षिणी समुद्र तक के राजा भयभीत और नतशीश होकर चंद्रगुप्त के चरणों में झुक जाया करते थे और चारों समुद्रों के पार से आये राजागण चंद्रगुप्त की आज्ञा को अपने सिरों पर माला की तरह धारण करते थे। इस प्रकार चन्द्रगुप्त ने अपने बाहु-बल तथा अपने मन्त्री चाणक्य के बुद्धि-बल से भारत की राजनीतिक एकता सम्पन्न की।

चन्द्रगुप्त का शासन-प्रबन्ध

चन्द्रगुप्त न केवल एक महान् विजेता वरन् एक कुशल शासक भी था। उसने जिस शासन-व्यवस्था का निर्माण किया वह इतनी उत्तम सिद्ध हुई कि भावी शासकों के लिए आदर्श बन गई। वह शासन-व्यवस्था थोड़े बहुत परिवर्तनों के साथ निरन्तर चलती रही। चन्द्रगुप्त का शासन तीन भागों में विभक्त था- (अ) केन्द्रीय शासन, (ब) प्रान्तीय शासन तथा (स) स्थानीय शासन ।

(अ) केन्द्रीय शासन: केन्द्रीय शासन साम्राज्य की राजधानी से संचालित होता था। इसका संचालन सम्राट, उसके परामर्शदाताओं और मन्त्रियों द्वारा होता था। सम्राट तथा उसके मन्त्रियों के अधीन कर-संग्राहक, गुप्तचर-विभाग, सेना, न्यायालय आदि काम करते थे।

(1) सम्राट: केन्द्रीय शासन का प्रधान स्वयं सम्राट होता था। उसकी आज्ञाओं तथा आदेशों के अनुसार सम्पूर्ण देश का शासन चलता था। सम्राट स्वयं नियमों का निर्माण करता था तथा नियमों का पालन करवाने की व्यवस्था करता था। सम्राट नियमों का उल्लंघन करने वालों को दंड भी देता था। इस प्रकार सम्राट स्वयं व्यवस्थापिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका का प्रधान था। वही सम्पूर्ण देश के शासन का केन्द्र-बिन्दु था। स्मिथ ने लिखा है- ‘चन्द्रगुप्त के शासन से सम्बन्धित विदित तथ्य इस बात को सिद्ध कर देते हैं कि वह कठोर एवं निरंकुश शासक था।’ सम्राट न केवल् प्रशासकीय विभाग का सर्वेसर्वा था वरन् वह सैनिक-विभाग का भी प्रधान था और वह स्वयं सेना के संगठन की व्यवस्था करता था। युद्ध के समय वह स्वयं सेनापति के कार्यों को करता था।

स्पष्ट है कि राज्य की सारी शक्ति सम्राट के हाथ में थी और उसी की इच्छानुसार सम्पूर्ण राज्य का शासन संचालित होता था। इसलिये यदि यह कहंे कि चन्द्रगुप्त का शासन एकतंत्रीय, स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश था तो कुछ अनुचित न होगा परन्तु स्वेच्छाचारी शासन का यह तात्पर्य नहीं है कि सम्राट मनमाने ढंग से शासन करता था और लोकमत की चिन्ता नहीं करता था। स्वेच्छाचारी शासन का तात्पर्य  केवल इतना है कि सिद्धांततः राजा की शक्ति तथा उसके अधिकारों पर किसी भी प्रकार का नियंत्रण नहीं था परन्तु क्रियात्मक रूप में उसे परम्परागत नियमों, अपने परामर्शदाताओं के परामर्शों तथा नैतिक नियमों का सम्मान करना पड़ता था। कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र‘ से ज्ञात होता है कि सम्राट् अपनी प्रजा का ऋणी समझा जाता था। वह अच्छा शासन करके ही इस ऋण से मुक्त हो सकता था। इसलिये स्वेच्छाचारी होते हुए भी प्रजा के हित में शासन करना राजा का परम धर्म था। अपनी प्रजा का अधिक से अधिक कल्याण करने के लिए और अपने शासन को सुचारू रीति से संचालित करने के लिए सम्राट् मन्त्रियों तथा अन्य पदाधिकारियों की नियुक्ति करता था।

(2) मन्त्रि-परिषद: सम्राट् को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्यों में परामर्श तथा सहायता देने के लिए एक मन्त्रि-परिषद की व्यवस्था की गई थी। चन्द्रगुप्त के प्रधान परामर्शदाता कौटिल्य का विश्वास था कि शासन की गाड़ी एक पहिए से नहीं चल सकती। सम्राट् उसका एक पहिया है, इसलिये उसके दूसरे पहिये अर्थात् मन्त्रिपरिषद् का होना अनिवार्य है, तभी शासन सुचारू रीति से संचालित होगा और प्रजा का अधिक से अधिक कल्याण हो सकेगा। मन्त्रि-परिषद् के सदस्यों को सम्राट स्वयं नियुक्त करता था। समस्त मंत्री वेतनभोगी होते थे। केवल वही लोग इस पद पर नियुक्त किये जाते थे जो बुद्धिमान, निर्लोभी तथा सच्चरित्र हों। मन्त्रि-परिषद अपना निर्णय बहुमत से देती थी परन्तु सम्राट अपनी परिषद् के निर्णय को मानने के लिए बाध्य नहीं था। मन्त्रि-परिषद् राज्य के केवल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विषयों में परामर्श देने के लिए बुलाई जाती थी। राज्य के दैनिक कार्योंं से उसका कोई सम्बन्ध नहीं था।

(3) मन्त्रिन्: दैनिक शासन को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए सम्राट् को परामर्श देने और उसकी सहायता करने के लिए एक दूसरी सभा होती थी जिसके सदस्य मन्त्रिन् कहलाते थे। मन्त्रिन् का पद मन्त्रि-परिषद के सदस्यों से अधिक ऊँचा तथा महत्त्वपूर्ण होता था। मंत्रिन् की नियुक्ति भी सम्राट् स्वयं करता था और इस पद पर केवल ऐसे ही लोग नियुक्त किये जाते थे जिनके किसी भी प्रकार के प्रलोभन में पड़ने की सम्भावना नहीं होती थी और जिनकी पहले से ही परीक्षा की जा चुकी होती थी। कौटिल्य ने इनकी संख्या तीन-चार बताई है। ये मन्त्रिन् देश-रक्षा, विदेशी विषयों, आकस्मिक आपत्तियों के लिए व्यवस्था करने, शासन को सुचारू रीति से संचालित करने आदि विषयों में सम्राट को परामर्श देते थे। सम्राट मन्त्रिन् के परामर्श को मानने के लिए बाध्य नहीं था।

(4) विभागीय व्यवस्था: मन्त्रि-परिषद तथा मन्त्रिन्, सम्राट को केवल परामर्श देते थे, वे दैनिक शासन को संचालित नहीं करते थे। राज्य के दैनिक शासन को सुचारू रीति से सम्पादित करने के लिए चन्द्रगुप्त ने विभागीय व्यवस्था का निर्माण किया था। इस व्यवस्था में सम्पूर्ण शासन का कार्य विभिन्न विभागों में विभक्त कर दिया गया था। प्रत्येक विभाग को शासन के एक-दो विषय सौंपे गये थे। प्रत्येक विभाग का एक अध्यक्ष होता था जो ‘अमात्य’ कहलाता था। चन्द्रगुप्त के शासन-काल में इस प्रकार के कुल अठारह विभाग थे। इसलिये उसने अठारह अमात्यों को नियुक्त कर रखा था। इन अमात्यों के अधीन अनेक पदाधिकारी तथा कर्मचारी होते थे जो दैनिक शासन को सुचारू रीति से संचालित करते थे। अमात्यों तथा उनके नीचे काम करने वाले समस्त कर्मचारियों की नियुक्ति सम्राट् स्वयं करता था और वे सम्राट के प्रति उत्तरदायी होते थे। जिस विभागीय व्यवस्था का सूत्रपात चन्द्रगुप्त मौर्य ने आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व किया था उसका अनुकरण आज सारे संसार में हो रहा है।

(5) पुलिस व्यवस्था: चन्द्रगुप्त तथा उसके प्रधानमन्त्री चाणक्य ने साम्राज्य में आन्तरिक शान्ति तथा सुव्यवस्था बनाये रखने के लिये एक अत्यन्त सुसंगठित तथा सुव्यवस्थित पुलिस विभाग का प्रबन्ध किया। पुलिस के सिपाही ‘रक्षिन्’ कहलाते थे। समाज की सुरक्षा का भार उन्हीं के ऊपर रहता था।

(6) गुप्तचर व्यवस्था: गुप्तचर उस व्यक्ति को कहते हैं जो गुप्त रूप से विचरण करके सब बातों का पता लगाये। चन्द्रगुप्त तथा चाणक्य ने गुप्तचरों की उपयोगिता का अनुभव करके सुदृढ़़ गुप्तचर विभाग का गठन किया। गुप्तचर-विभाग दो भागों में विभक्त था। एक को ‘संस्थान’ करते थे और दूसरे को ‘संचारण’। संस्थान गुप्तचर एक स्थान पर रहकर अपनी गतिविधियों का संचालन करते थे जबकि संचारण गुप्तचर भ्रमण करके सूचनाएं एकत्रित करते थे। इस प्रकार स्थानीय बातों की सूचना प्राप्त करने के लिए संस्थान विभाग का और दूरस्थ सूचनाओं का पता लगाने के लिए संचारण विभाग का गठन किया गया था। चन्द्रगुप्त मौर्य के गुप्तचर विभाग में स्त्रियाँ भी काम करती थीं। किस समय में और किस स्थान पर कौनसी बात हो रही है इसकी सूचना सम्राट को गुप्तचरों से प्राप्त हो जाती थी। अपने राज्य के बड़े-बड़े कर्मचारियों के कार्यों की सूचना भी उसे गुप्तचरों से मिल जाती थी। इस प्रकार षड्यन्त्रों तथा कुचक्रों का पता लगाने में सम्राट को कोई कठिनाई नहीं होती थी।

(7) न्यायिक व्यवस्था: चन्द्रगुप्त ने एक निष्पक्ष, न्याय-प्रिय तथा विवेकशील न्याय व्यवस्था की आवश्यकता का अनुभव किया और अपने विद्वान, अनुभवी तथा नीति-निपुण प्रधान मन्त्री चाणक्य की सहायता से एक ऐसी न्याय-व्यवस्था का निर्माण किया जिसका अनुसरण आज भी सभ्य संसार द्वारा किया जा रहा है। चन्द्रगुप्त द्वारा स्थापित न्याय-व्यवस्था में सम्राट स्वयं सबसे बड़ा न्यायाधीश था। राजा के नीचे अन्य न्यायाधीश थे। नगरों तथा जनपदों के लिए अलग-अलग न्यायाधीश थे। नगरों के न्यायाधीश ‘व्यवहारिक महामात्य’ और जनपदों के न्यायधीश ‘राजुक’ कहलाते थे। जो न्यायाधीश चार गाँवों के लिए होते थे वे संग्रहण’, जो चार सौ गाँव के लिए होते थे वे ‘द्रोणमुख’ और जो आठ सौ गाँवों के लिए होते थे वे ‘स्थानीय’ कहलाते थे। न्यायाधीशों को ‘धर्मस्थ’ कहते थे। प्रत्येक न्यायालय में तीन धर्मस्थ तथा तीन अमात्य, न्यायाधीशों का आसन ग्रहण करते थे। न्यायलय दो भागों में विभक्त थे जो न्यायालय धन सम्बन्धी झगड़ों का निर्णय करते थे वे ‘धर्मस्थीय’ कहलाते थे और जो न्यायालय मार-पीट के मुकदमों का निर्णय करते थे वे ‘कंटक शोधन’ कहलाते थे। छोटी अदालतों के निर्णय की अपीलें बड़ी अदालतों में होती थीं और सम्राट का निर्णय अंतिम माना जाता था। चन्द्रगुप्त के शासनकाल में दंड-विधान बड़ा कठोर था। जुर्माने के साथ-साथ अंग-भंग तथा मृत्युदंड भी दिया जाता था। कठोर दण्ड विधान का परिणाम यह हुआ कि अपराधों में कमी हो गई और लोग प्रायः अपने घरों में ताला लगाये बिना ही बाहर चले जाते थे। राजा की वर्षगांठ, राज्याभिषेक, राजकुमार के जन्म तथा नये प्रदेशों पर विजय प्राप्ति आदि अवसरों पर बंदियों को मुक्त करने की भी व्यवस्था थी।

(8) लोक-मंगलकारी कार्य: चन्द्रगुप्त के प्रधानमंत्री कौटिल्य के विचार में राजा अपनी प्रजा का ऋणी होता था। लोक-मंगलकारी कार्य करके ही वह प्रजा के ऋण से मुक्त हो पाता था। फलतः उसने अनेक लोक-मंगलकारी कार्य किये। उसने यातायात के साधनों की समुचित व्यवस्था की तथा सड़कों का निर्माण कर बड़े-बड़े नगरों को एक दूसरे से मिला दिया। इन सड़कों के किनारे उसने छायादार वृक्ष लगवाये और कुएँ तथा धर्मशालाएँ बनवाईं। नदियों को पार करने के लिए उसने पुल बनवाये। चन्द्रगुप्त ने कृषि-क्षेत्रों की सिंचाई के लिए सुन्दर व्यवस्था की। राज्य की ओर से बहुत से तालाब तथा कुएँ खुदवाये गये। उसके पुष्यगुप्त नामक प्रान्तीय शासक ने सौराष्ट्र में सिंचाई के लिए सुदर्शन नामक विशाल झील का निर्माण करवाया। चंद्रगुप्त ने अनेक ‘भैषज्य-गृह’ अर्थात् औषधालय खुलवाये और उनमें औषधि तथा योग्य वैद्यों की नियुक्ति की। नगरों की स्वच्छता तथा भोजन-सामग्री की शुद्धता के लिए उसने निरीक्षक रखे। शासन की ओर से प्रजा की शिक्षा के लिये समुचित व्यवस्था की गई। शिक्षण कार्य प्रधानमन्त्री अथवा पुरोहित की अध्यक्षता में होता था। शिक्षालयों को राज्य की ओर से सहायता दी जाती थी। इन सब लोक हितकारी कार्यों के अतिरिक्त दीन-दुखियों, असहायों तथा अकाल-पीड़ितों की सहायता की भी समुचित व्यवस्था की गई। इन सब कार्यों का परिणाम यह हुआ कि उसके काल में जनता सुखी तथा सम्पन्न हो गई।

(9) सैन्य व्यवस्था: चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने साम्राज्य की बाह्य शत्रुओं से सुरक्षा करने तथा राज्य विस्तार करने के लिए एक विशाल सेना का गठन किया। चन्द्रगुप्त महत्त्वकांक्षी सम्राट था। वह सम्पूर्ण भारत को अपने अधीन करना चाहता  था। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसे विशाल, सुसज्जित तथा सुशिक्षित सेना की आवश्यकता थी। इसलिये उसने चतुरंगिणी अर्थात् हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल सेनाओं का गठन किया और उनके प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था की। सम्राट स्वयं सेना का प्रधान सेनापति होता था और युद्ध के समय रण-स्थल में उपस्थित रहकर सेना का संचालन करता था। चन्द्रगुप्त ने जल सेना का भी संगठन किया। सम्पूर्ण सेना के प्रबन्धन के लिए 30 सदस्यों की एक समिति होती थी। सेना का प्रबन्ध छः विभागों में विभक्त था और प्रत्येक विभाग का प्रबंध पांच सदस्यों के हाथों में रहता था। प्रत्येक विभाग का एक अध्यक्ष होता था। पहला विभाग जल सेना का प्रबन्ध करता था। दूसरा विभाग सेना के लिये हर प्रकार की सामग्री तथा रसद जुटाने का प्रबन्ध करता था। तीसरा विभाग पैदल सेना का, चौथा विभाग अश्वारोही सेना का, पाँचवां विभाग हस्ति सेना का और छठा विभाग रथ सेना का प्रबन्ध करता था। सेना के साथ एक चिकित्सा विभाग भी होता था जो घायल तथा रुग्ण सैनिकों की चिकित्सा करता था। चन्द्रगुप्त की सेना स्थायी थी, उसे राज्य की ओर से वेतन तथा अस्त्र-शस्त्र मिलता था। अस्त्र-शस्त्र बनाने के लिए राजकीय कार्यालय भी थे। स्मिथ ने चन्द्रगुुप्त मौर्य के सैनिक संगठन की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘चन्द्रगुप्त मौर्य ने एक विशाल एवं स्थायी सेना की व्यवस्था की जिसे सीधे राजकोष से वेतन दिया जाता था और जो अकबर की सेना से भी अधिक सुयोग्य थी।’

(10) आय-व्यय का साधन: चंद्रगुप्त मौर्य के शासन में राज्य की आय का प्रधान साधन भूमि-कर था। राज्य द्वारा किसानों से उपज का चौथा भाग कर के रूप में लिया जाता था। कभी-कभी केवल आठवां भाग लिया जाता था। सम्राट को किसानों से पशु भी भेंट के रूप में मिलते थे। नगरों में विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के विक्रय-मूल्य का दसवां भाग राज्य को कर के रूप में मिलता था। शास्ति अथवा जुर्माने से भी राज्य को कुछ धन मिल जाता था। आय का बहुत बड़ा भाग सेना तथा शासन पर व्यय होता था। शिल्पकारों, विद्वानों, दार्शनिकों, अनाथों, वृद्धों, रोगियों, अपाहिजों तथा विपत्तिग्रस्त लोगों को भी राज्य से सहायता मिलती थी। अकाल पीड़ितों की भी सहायता की जाती थी। सिंचाई, नगर की किलेबन्दी, भवन निर्माण तथा विभिन्न प्रकार के लोक मंगलकारी कार्यों पर बहुत सा धन व्यय होता था। 

(ब) प्रान्तीय शासन: चन्द्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य अत्यंत विशाल था। उस युग में जब यातायात के साधनों का अभाव था तब एक केन्द्र से सम्पूर्ण राज्य का संचालन सम्भव नहीं था। इसलिये चंद्रगुप्त ने साम्राज्य को कई प्रान्तों में विभक्त कर दिया और प्रत्येक प्रांत के शासन के लिए एक प्रांतपति नियुक्त कर दिया। प्रांतपतियों की नियुक्ति सम्राट स्वयं करता था। प्रांतपति अपने समस्त कार्यों के लिए सीधे सम्राट् के प्रति उत्तरदायी होते थे। इस पद पर सम्राट् ऐसे ही लोगों को नियुक्त करता था जिनमें उसका पूर्ण विश्वास रहता था। जो प्रान्त अत्यंत महत्त्व के थे उन पर या तो सम्राट स्वयं नियन्त्रण रखता था या राजकुल के राजकुमारों को नियुक्त करता था। यह शासक ‘कुमार-महामात्य’ कहलाते थे। अन्य प्रांतों के महामात्य ‘राष्ट्रीय’ कहलाते थे। प्रान्त में शांति रखना और वहाँ के शासन को सुचारू रीति से चलाना प्रांतपति का प्रधान कार्य था। युद्ध के समय सम्राट को सैनिक सहायता पहुंचाना भी उसका प्रमुख कर्त्तव्य होता था। सम्राट् प्रान्तपतियों पर कड़ा नियंत्रण रखता था और गुप्तचरों के माध्यम से उनकी गतिविधियों की सूचना प्राप्त करता था। स्मिथ ने लिखा है- ‘केन्द्रीय मौर्य सरकार का नियन्त्रण सुदूरस्थ प्रान्तों तथा अधीनस्थ पदाधिकारियों पर अकबर द्वारा प्रयुक्त नियन्त्रण से भी अधिक कठोर प्रतीत होता है।’

(स) स्थानीय शासन: स्थानीय शासन का तात्पर्य गाँवों तथा नगरों के शासन से है। चन्द्रगुप्त ने इस बात का अनुभव किया कि यदि गाँवों तथा नगरों का शासन स्थानीय अर्थात् वहीं के लोगों को सौंप दिया जाय तो अति उत्तम होगा। इसलिये उसने गाँवों तथा नगरों की संस्थाओं का संगठन कर उन्हें पर्याप्त स्वतंत्रता दे रखी थी। इस प्रकार आधुनिक ग्राम-पंचायतों तथा नगरपालिकाओं का बीजारोपण चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन-काल में हो चुका था।

(द) गाँव का शासन: गाँव शासन की सबसे छोटी इकाई होता था। गाँव के प्रबन्ध के लिए एक ‘ग्रामिक’ होता था। वह राजकीय कर्मचारी नहीं होता था वरन् ग्रामवासियों द्वारा चुना जाता था और उनके प्रतिनिधि के रूप में अवैतनिक कार्य करता था। चूंकि ‘ग्रामिक’ वेतन नहीं लेता था इसलिये ऐसा लगता है कि गाँव का प्रतिष्ठित तथा सम्पन्न व्यक्ति इस पद के लिए चुन लिया जाता था। ‘ग्रामिक’ अपने समस्त कार्य, गाँव के अनुभवी वयोवृद्धों के परामर्श तथा सहायता से करता था। प्रत्येक गाँव में राजा का एक कर्मचारी भी होता था जो ‘ग्राम-भृतक’ अथवा ‘ग्राम-भोजक’ कहलाता था। ‘ग्रामिक’ के ऊपर ‘गोप’ होता था, जिसके अनुशासन में पाँच से दस गाँव होते थे। ‘गोप’ के ऊपर ‘स्थानिक’ होता था। उसके अनुशासन में आठ सौ गाँव होते थे ‘स्थानिक’ के ऊपर ‘समाहर्ता’ होता था जो सम्पूर्ण जनपद का प्रबन्ध करता था।

(य) नगर प्रबन्धन: चंद्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य में नगर प्रबन्धन के लिए आधुनिक नगरपालिकाओं जैसा संगठन विकसित किया गया था। यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने नगर प्रबन्धन का अत्यन्त विस्तृत विवरण दिया है। नगर का प्रधान ‘नगराध्यक्ष’ कहलाता था। कौटिल्य ने अपने ‘अर्थशात्र’ में उसे ‘पौर-व्यावहारिक’ नाम से पुकारा है जो राज्य का एक उच्च पदाधिकरी था। वह आधुनिक काल के नगर प्रमुख की भांति होता था। मेगस्थनीज के अनुसार नगर के प्रबन्धन के लिए छः समितियाँ होती थीं। प्रत्येक समिति में पांच सदस्य होते थे। यह कहना उचित होगा कि आधुनिक नगरपालिकाओं का बीजारोपण चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन काल में हुआ था।

पहली समिति शिल्प-कला थी। यह समिति शिल्प तथा उद्योग-धन्धों का प्रबन्ध करती थी। कारीगरों की मजदूरी निश्चित करना, उनसे अच्छा काम लेना, उनकी रक्षा का प्रबन्ध करना, कच्चे माल का निरीक्षण करना आदि इस समिति के प्रधान कार्य थे। यदि कोई व्यक्ति कारीगरों का अंग-भंग कर देता था तो उसे प्राणदण्ड दिया जाता था।

दूसरी समिति विदेशियों की देखभाल करती थी। विदेशियों को हर प्रकार की सुविधा देना उसका प्रधान कार्य था। यह समिति विदेशियों के ठहरने तथा बीमार हो जाने पर उनकी चिकित्सा करवाने और मर जाने पर उनकी दाह-क्रिया करने का प्रबन्ध करती थी। मर जाने पर विदेशियों की सम्पत्ति उनके उत्तराधिकारियों को दी जाती थी।

तीसरी समिति जनसंख्या का हिसाब रखती थी। वह जनगणना करवाती थी और जन्म-मरण का हिसाब रखती थी। आजकल भी नगरपालिकाओं को यह कार्य करना पड़ता है। जनगणना कर लेने से करों को वसूलने में बड़ी सुविधा होती थी।

चौथी समिति वाणिज्य व्यवसाय का प्रबन्ध करती थी। नाप-तौल की देखभाल करना, ब्रिक्री की वस्तुओं का भाव निश्चित करना और बाटों की समुचित व्यवस्था करना इस समिति का प्रधान कार्य होता था। व्यापारियों को व्यापार करने के लिए राजकीय आज्ञा-पत्र लेना पड़ता था और उसके लिए कर देना पड़ता था। जो लोग एक से अधिक वस्तुओं का व्यापार करते थे उन्हें दो-गुना कर देना पड़ता था।

पांचवी समिति कारखानों में बनी हुई वस्तुओं की देखभाल करती थी। बेचने वाले नई तथा पुरानी वस्तुओं को मिला नहीं सकते थे। मिलावट करने वालों को कठोर दण्ड दिया जाता था।

छठी तथा अन्तिम समिति कर वसूल करने का काम करती थी। विक्रय की हुई वस्तुओं के मूल्य का दसवां भाग, कर के रूप में राज्य को मिलता था। यह कर अथवा चुंगी बड़ी कड़ाई के साथ वसूल की जाती थी। जो लोग कर देने में बेईमानी करते थे उन्हें दण्डित किया जाता था, यहाँ तक कि प्राण-दण्ड भी दिया जा सकता था।

उपर्युक्त विवरण से इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि चंद्रगुप्त मौर्य का शासन सुसंगठित तथा सुव्यवस्थित था। इस कारण उसका शासन आगामी मौर्य शासकों के लिए पथ-प्रदर्शक तथा उनके शासन की आधार-शिला बन गया।

मौर्य-शासन के सम्बन्ध में स्मिथ ने लिखा है- ‘मौर्य शासन बड़ा ही सुसंगठित तथा पूर्ण सुयोग्य एकतन्त्र था जिसमें अकबर से भी अधिक विस्तृत साम्राज्य पर नियन्त्रण रखने की क्षमता थी। बहुत सी बातों में इसने आधुनिक काल की संस्थाओं का पूर्वाभास दिया था।’

मेगस्थनीज का विवरण

सैल्यूकस ने मेगस्थनीज को अपना राजदूत बना कर चन्द्रगुप्त की राजधानी पाटलिपुत्र में रखा था। वह बहुत दिनों तक चन्द्रगुप्त के दरबार में रहा जिससे उसे मौर्य राज्यतंत्र तथा भारतीय समाज को अपनी आँखों से देखने का अवसर प्राप्त हुआ। उसने जो कुछ देखा और अन्य लोगों से सुना उसे ‘इण्डिका’ नामक पुस्तक में लिख दिया। यद्यपि यह ग्रन्थ अब तक उपलब्ध नहीं हो सका है परन्तु इस ग्रंथ की बहुत सी बातों को अन्य यूनानी लेखकों ने अपने ग्रन्थों में लिखा है। इन सबका संग्रह कर लिया गया है जिसके अध्ययन से मेगस्थनीज के भारतीय विवरण का बोध हो जाता है। कुछ इतिहासकारों ने मेगस्थनीज को नितान्त झूठा तथा ढोंगी बताया है और उसके विवरण को बिल्कुल अविश्वसनीय बताया है। अनुमान होता है कि जो कुछ उसने अपनी आँखों से देखा, उसमें सत्य का बहुत बड़ा अंश विद्यमान है परन्तु जो कुछ उसने दूसरों से सुनकर लिखा, वे असत्य से भरी हुई हैं। यूनानी होने के कारण वह भारतीय प्रथाओं को ठीक से समझ नहीं सका, इसलिये उनके विषय में उसने भ्रमपूर्ण बातें लिख दीं। कई स्थानों पर उसने भारतीय परम्पराओं को यूनानी परम्पराओं से मिला दिया है। दक्षिण भारत को उसने देखा ही नहीं था और उसके विषय में दूसरों से सुनकर लिखा है। इसलिये उसमें असत्य की मात्रा अधिक है। जो कुछ उसने भारतीय जनश्रुतियों के आधार पर लिखा, वह भी विश्वसनीय नहीं है। इतनी बातों के होते हुए भी भारतीय इतिहास के निर्माण में मेगस्थनीज के विवरण से बड़ी सहायता मिलती है। उसने भाारत की भौगोलिक, सामाजिक तथा राजनीतिक दशा पर पर्याप्त प्रकाश डालने का प्रयत्न किया है।

(1) भौगोलिक दशा: भारत की सीमा का वर्णन करते हुए मेगस्थनीज ने लिखा है कि इसके उत्तर में हिमालय पर्वत, दक्षिण तथा पूर्व में समुद्र और पश्चिम में सिन्धु, गंगा, सोन आदि नदियाँ विद्यमान हैं। दक्षिण भारत की नदियों का उल्लेख उसने बिल्कुल नहीं किया। चूंकि अफगानिस्तान, चन्द्रगुप्त के साम्राज्य का अंग था इसलिये उसने अफगानिस्तान की काबुल, स्वात, गोमल आदि नदियों का उल्लेख किया है। उसने भारत की जलवायु के विषय में लिखा है कि गर्मी की ऋतु में बड़ी गर्मी पड़ती है। वर्षा, गर्मी तथा जाड़ा दोनों ही ऋतुओं में होती है, परन्तु गर्मी के दिनों में अधिक वर्षा होती है।

(2) सामाजिक दशा: मेगस्थनीज ने मौर्य कालीन सामाज का वर्णन करते हुए सात वर्गों अथवा जातियों का उल्लेख किया है। पहले वर्ग में उसने ब्राह्मणांे तथा दार्शनिकों को रखा है। यद्यपि इनकी संख्या कम थी परन्तु समाज में ये लोग बड़े आदर की दृष्टि से देखे जाते थे। ये लोग राजा तथा प्रजा के लिए यज्ञ करते थे। इस सेवा के कारण ये लोग राज्य-करों से मुक्त रहते थे। दूसरा वर्ग कृषकों का था। समाज में इनकी संख्या सर्वाधिक थी। ये लोग खेती करते थे। अपने खेतों की उपज का चौथाई भाग राज्य को कर के रूप में देते थे। लड़ाई के समय में भी इनकी खेती को कोई हानि नहीं पहुंचती थी। तीसरा वर्ग ग्वालों तथा शिकारियों का था। ग्वालों का मुख्य व्यवसाय पशु-पालन तथा दूध बेचना और शिकारियों का जंगली पशुओं का शिकार करना था। ग्वाले पशुओं को बेचते और किराये पर भी देते थे। शिकारी लोग जंगली पशुओं का शिकार करके खेतों की रक्षा करते थे। इस सेवा के बदले में शिकारियों को राज्य की ओर से धन मिलता था। शिकारी किसी एक स्थान पर नहीं रहते थे वरन् एक स्थान से दूसरे स्थान को घूमा करते थे। चौथे वर्ग में व्यापारी तथा श्रमजीवी आते थे। व्यापारी विभिन्न प्रकार के व्यवसाय तथा उद्योग-धन्धों में लगे रहते थे। उन्हें अपनी आय का कुछ भाग राज्य को कर के रूप में देना पड़ता था। विदेशों से व्यापार करने के लिये व्यापारियों को राज्य की ओर से धन उधार मिलता था। श्रमजीवी लोग अन्य वर्गों की सेवा का कार्य करते थे। पाँचवां वर्ग योद्धाओं का था। इस वर्ग का सारा खर्च राजा स्वयं चलाता था। योद्धा सदैव युद्ध करने के लिये उद्यत रहते थे और शान्ति के समय में आनन्द का जीवन व्यतीत करते थे। छठा वर्ग निरीक्षकों का था। इस वर्ग का कर्त्तव्य राजा के कार्यों का निरीक्षण करना और उसकी सूचना सम्राट को देना होता था। इन निरीक्षकों में से जो सर्वाधिक योग्य तथा विश्वसनीय होते थे, वे राजधानी तथा राज-शिविर के निरीक्षण के लिए रखे जाते थे। निरीक्षक गुप्तचरों का भी काम करते थे। सातवां वर्ग मन्त्रियों तथा परामर्शदाताओं का था। इस वर्ग की संख्या सबसे कम थी परन्तु यह वर्ग समाज में सर्वाधिक शिक्षित तथा बुद्धिमान होता था। राज्य के उच्च पद इन्हीं को दिये जाते थे। मेगस्थनीज का कहना है कि यह सातों जातियाँ अपने निश्चित कार्य को ही कर सकती थीं। इन्हें अन्य कार्यों को करने की आज्ञा नहीं थी। इनमें अन्तर्जातीय विवाह भी नहीं हो सकता था। मेगस्थनीज लिखता है कि भारतवासियों को अच्छे-अच्छे कपड़े पहनने का बड़ा शौक था। इनके वस्त्र बहुमूल्य होते थे और उन पर सोने का काम किया जाता था। विवाह का उद्देश्य भोग करना, जीवनसंगी बनाना और पुत्र उत्पन्न करना था। इस काल में बहु-विवाह की भी प्रथा भी थी परन्तु यह सम्भवतः राजवंशों तक सीमित थी। एक विवाह-प्रथा में वर का पिता एक जोड़ी बैल, कन्या के पिता को देता था। मेगस्थनीज ने लिखा है कि भारतवासी लेखन-कला नहीं जानते थे। यह बिल्कुल असत्य प्रतीत होता है। मेगस्थनीज ने ब्राह्मणों, संन्यासियों तथा श्रमणों का भी उल्लेख किया है। ये लोग अत्यन्त सरल जीवन व्यतीत करते थे और सांसारिक जीवन त्याग कर बस्ती से दूर निवास करते थे। ये लोग शाकाहारी होते थे और कुशासन अथवा मृगचर्म पर सोते थे। ये लोग प्रायः घूम कर जनता को उपदेश दिया करते थे। 

(3) राजनीतिक दशा: मेगस्थनीज ने लिखा है कि राजा दिन भर अपनी राजसभा में रहता था और न्याय करता था। उसे अपनी जान का सदैव भय लगा रहता था। इसलिये वह एक कमरे में दो रात से अधिक नहीं रहता था। जब कभी सम्राट शिकार के लिए जाता था तो उसका मार्ग रस्सियों से अलग कर दिया जाता था और यदि कोई इन रस्सियों को लांघने का प्रयत्न करता था तो उसे प्राण-दण्ड दिया जाता था। मेगस्थनीज ने सम्राट के राज-भवन का बड़ा सुन्दर वर्णन किया है। वह लिखता है कि सम्राट के भवन पाटलिपुत्र में बने थे। इनके चारों और सुन्दर उद्यान तथा सरोवर थे। राजभवन के आंगन में पालतू मोर रखे जाते थे। उद्यानों में सुन्दर तोते बहुत बड़ी संख्या में पाये जाते थे जो राज-भवन के ऊपर मंडराया करते थे। सरोवरों में सुन्दर मछलियाँ रहती थी। मछलियों को पकड़ने की किसी को आज्ञा नहीं थी परन्तु राजकुमार लोग आमोद-प्रमोद के लिए उन्हें पकड़ सकते थे। सम्राट् प्रायः राज-प्रासाद के भीतर ही रहता था। उसकी रक्षा के लिए नारी संरक्षिकाएँ होती थीं। केवल चार अवसरों पर सम्राट् अपने राज-भवन के बाहर निकलता था- (1) युद्ध के समय, (2) न्यायाधीश का पद ग्रहण करने के लिए, (3) बलि देने के लिए तथा (4) आखेट के लिए। मेगस्थनीज ने राज-दरबार का भी बड़ा सुन्दर वर्णन किया है। उसके कथनानुसार चन्द्रगुप्त का दरबार बड़े ठाट-बाट का था। सोने-चांदी के सुन्दर बर्तन, जड़ाऊ मेज तथा कुर्सियाँ और कीमखाब के बारीक वस्त्र, देखने वालों की आँख को चकाचौंध कर देते थे। सम्राट मोती की मालाओं से अलंकृत पालकी और सुनहले फूलों से विभूषित हाथी पर बैठ कर राज-भवन के बाहर जाता था। सम्राट को शिकार करने का बड़ा शौक था। उसके आखेट के लिए बड़े-बड़े वन सुरक्षित रखे जाते थे। राजा को पहलवानों के दंगल, घुड़दौड़, पशुओं के युद्ध आदि देखने का बड़ा शौक था।

मेगस्थनीज ने चन्द्रगुप्त की राजधानी पाटलिपुत्र का भी बड़ा विस्तृत वर्णन किया है। वह लिखता है कि पाटलिपुत्र भारत का सबसे बड़ा नगर है। वह सोन तथा गंगा नदियों के संगम पर स्थित है। यह नगर साढ़े नौ मील लम्बा और पौने दो मील चौड़ा है। नगर के चारों ओर एक खाई है जिसकी चौड़ाई 606 फुट और गहराई 45 फुट है। उसके चारों ओर एक दीवार है जिसमें 64 द्वार और 570 बुर्ज बने हैं। पाटलिपुत्र के प्रबन्ध के विषय में मेगस्थनीज ने लिखा है कि नगर का प्रबन्ध छः समितियों द्वारा होता था जिनमें से प्रत्येक में पाँच-पाँच सदस्य होते थे। मोरलैंड ने मेगस्थनीज द्वारा वर्णित शासन की ओर संकेत करते हुए लिखा है- ‘जहाँ तक शासन का सम्बन्ध है, मेगस्थनीज के वर्णनांशों से हमें यह पता लग जाता है कि यह सुव्यस्थित तथा पूर्णतया सुंसगठित था।’

चन्द्रगुप्त के अन्तिम दिवस

जैन अनुश्रुतियों के अनुसार चन्द्रगुप्त ने महावीर स्वामी की शिष्यता ग्रहण कर ली थी। चन्द्रगुप्त ने 24 वर्षों तक शासन करने के उपरान्त राज-वैभव को त्यागकर 298 ई. पू. में संन्यास ग्रहण कर लिया। उसके शासन-काल के अंतिम भाग में उसके राज्य में बड़ा दुर्भिक्ष पड़ा। इसलिये जैन-भिक्षुकों के एक बहुत बड़े दल ने आचार्य भद्रबाहु के नेतृत्व में कर्नाटक के लिए प्रस्थान किया। चन्द्रगुप्त को भी वैराग्य उत्पन्न हो गया और वह अपना राज्य अपने पुत्र बिन्दुसार को सौंप कर स्वयं कर्नाटक के पर्वतों की ओर चला गया। वहीं पर एक जैन साधु की भांति उपवास करके उसने प्राण त्यागे।

चन्द्रगुप्त के कार्यों का मूल्याकंन

चन्द्र्रगुप्त मौर्य ऐतिहासिक काल का, भारत का प्रथम सम्राट था। उसे भारत में विशाल साम्राज्य की स्थापना करने का श्रेय प्राप्त है। जिन परिस्थितियों में उसने इस साम्राज्य की स्थापना की वे उसके गौरव को अधिक बढ़ा देती हैं। जिस समय उसने साम्राज्य स्थापित करने की कल्पना की उस समय वह साधनहीन था। न उसके पास सेना थी और न सेना को संगठित करने के लिए धन था। वह अपने प्राणों की रक्षा के लिए इधर-उधर भटक रहा था। अपनी प्रतिभा के बल से उसने सेना और धन दोनों प्राप्त कर लिये। सौभाग्य से उसे चाणक्य जैसे अद्वितीय प्रतिभा वाले ब्राह्मण का धन तथा बुद्धि प्राप्त हो गई। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने दोनों का सदुपयोग किया। नन्दों के विशाल तथा शक्तिशाली साम्राज्य पर विजय प्राप्त करना खेल नहीं था। उसने न केवल एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की वरन् यूनानियों को भी अपने देश से मार भगाया और देश को विदेशी शासन से मुक्त करने का यश प्राप्त किया। वह प्रथम तथा अन्तिम भारतीय शासक था जिसने अफगानिस्तान तथा बिलोचिस्तान पर भी शासन किया। भारत की प्राकृतिक सीमाओं के बाहर शासन करने का यश उसी को प्राप्त है। उसने भारत के छोटे-छोटे राज्यों को समाप्त कर देश को राजनीतिक एकता प्रदान की और भारत के भावी महत्त्वाकांक्षी सम्राटों के लिए आदर्श उपस्थित किया। उसने न केवल सम्पूर्ण उत्तरी भारत पर एकछत्र साम्राज्य स्थापित किया वरन् दक्षिण भारत के भी बड़े भाग पर शासन किया। उन दिनों, जब यातायात के साधनों का अभाव था, उसने एक असम्भव कार्य को सम्भव कर दिखाया। चन्द्रगुप्त ने न केवल एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की वरन् उसे सुरक्षित तथा स्थायी बनाने की भी व्यवस्था की। उसने एक ऐसी सुसंगठित तथा सुसज्जित सेना का संगठन किया जिससे उसका साम्राज्य न केवल उसके अपने जीवन-काल में वरन् उसके उत्तराधिकारियों के काल में भी बाह्य आक्रमणों से सुरक्षित रहा।

चन्द्रगुप्त मौर्य की कीर्ति न केवल सामारिक दृष्टिकोण से अमर है वरन् उसका प्रशासकीय दृष्टिकोण से भी भारतीय इतिहास में उच्च स्थान है। वह प्रजा को शान्ति, सुख तथा सम्पन्नता प्रदान करने में सफल रहा। उसका शासन लोककल्याणकारी राज्य की स्थापना का आदर्श रूप था। उसने सत्ता का अत्यधिक विकेन्द्रीकरण करके प्रांतीय तथा स्थानीय शासन को अनेक अधिकार प्रदान किये। उसके शासन का आधार विकसित अधिकारी तंत्र था। उसके राज्य में उचित एवं कठोर न्याय व्यवस्था स्थापित की गई। उसके शासन में कृषि, शिल्प, उद्योग, संचार, वाणिज्य एवं व्यापार की वृद्धि के लिये राज्य की ओर से कई उपाय किये गये।

चन्द्रगुप्त मौर्य ने जिस शासन व्यवस्था को प्रारम्भ किया वह भावी शासकों के लिए आदर्श तथा अनुकरणीय बन गई। उसने जिस मन्त्रिपरिषद् तथा विभागीय व्यवस्था का प्रारम्भ किया वह थोड़े-बहुत परिवर्तन के साथ आज भी विश्व के समस्त प्रजातान्त्रिक राज्यों में प्रचलित है। उसके द्वारा स्थापित स्थानीय शासन आज भी ग्राम-पंचायतों, नगर पालिकाओं तथा महापालिकाओं के रूप में कार्य कर रहा है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि सैनिक तथा प्रशासकीय दोनों ही दृष्टिकोण से चन्द्रगुप्त मौर्य एक आदर्श तथा अनुकरणीय सम्राट था। भारत के बहुत कम शासकों को इस बात का श्रेय है कि उन्होंने अपने इतने छोटे से शासन काल (24 वर्ष) में इतनी अधिक सफलताएं अर्जित की हों।

बिन्दुसार (268 ई.पू.-273 ई. पू.)

चन्द्रगुप्त के पश्चात् उसका पुत्र बिन्दुसार मगध के सिंहासन पर बैठा। उसने ‘अमित्रघात’ की उपाधि धारण की जिसका अर्थ होता है अमित्रों अर्थात् शत्रुओं का घात अर्थात् विनाश करने वाला। यद्यपि वह अपने पिता से प्राप्त साम्राज्य की सीमा में वृद्धि नहीं कर सका परन्तु वह आन्तरिक विद्रोहों को शान्त कर साम्राज्य को संगठित रखने में पूर्णरूप से समर्थ रहा। उसके शासन-काल में पहला विद्रोह तक्षशिला में हुआ। उस समय बिन्दुसार का ज्येष्ठ पुत्र सुसीम वहाँ शासन कर रहा था। बिन्दुसार ने विद्रोह की सूचना पाते ही अपने दूसरे पुत्र अशोक को विप्लव शान्त करने के लिए तक्षशिला भेजा। वहाँ पहुंचने पर ज्ञात हुआ कि प्रजा ने राजा अथवा राजकुमार के विरुद्ध विद्रोह नहीं किया है वरन् यह विद्रोह अमात्यों के विरुद्ध था जो प्रजा पर अत्याचार करते थे। अशोक ने अमात्यों का दमन करके तक्षशिला में शान्ति स्थापित की। विदेशी राज्यों के साथ बिन्दुसार ने अपने पिता की भाँति मैत्री-पूर्ण सम्बन्ध रखा। मिस्र तथा सीरिया के शासकों ने अपने राजदूत पाटलिपुत्र भेजे जहाँ उनका बड़ा आदर-सत्कार हुआ। भारत के बाहर परिचमोत्तर प्रदेश में उसने यूनानियों के साथ मैत्री का व्यवहार किया तथा उनके साथ व्यापारिक एवं सांस्कृतिक सम्बन्ध रखा।

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