Tuesday, October 26, 2021

अध्याय – 10 जनपद राज्य और प्रथम मगधीय साम्राज्य

जनपद राज्यों का उदय

वैदिक आर्यों ने जन अर्थात् कबीलों की स्थापना की थी। जन का आकार बढ़ने एवं नगरीय जीवन का प्रादुर्भाव होने से, बड़े राज्यों अर्थात् जनपदों का उदय हुआ। धीरे-धीरे लोगों की निष्ठा जन अथवा अपने कबीले के प्रति नहीं रहकर उस जनपद के प्रति हो गई जिसमें वे बसे हुए थे। एक जनपद पर एक राजा का शासन होता था।

महाजनपद

छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व में जनपदों का आकार और बढ़ा तथा महाजनपदों की स्थापना हुई। अधिकतर महाजनपद विंध्य के उत्तर में स्थित थे और भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा से लेकर पूर्व में बिहार तक फैले हुए थे। इनमें मगध, कोसल, वत्स और अवन्ति काफी शक्तिशाली राज्य थे। सबसे पूर्व की ओर अंग जनपद था जो बाद में मगध में समाहित हो गया।

महात्मा बुद्ध के जीवन काल (563 ई.पू. से 483 ई.पू.) में भारत में 16 महाजनपद थे। इनके नाम इस प्रकार से हैं- (1) अंग, (2) मगध, (3) काशी, (4) कोसल, (5) वज्जि, (6) मल्ल, (7) चेदि, (8) वत्स, (9) कुरु, (10) पांचाल, (11) मत्स्य, (12) सूरसेन, (13) अश्मक, (14) अवन्ति, (15) गान्धार, (16) काम्बोज। महाजनपदों का थोड़ा-बहुत इतिहास पुराणों में यत्र-तत्र मिलता है किंतु वह श्ृंखलाबद्ध नहीं है। पुराणों में मिलने वाली बहुत सी सूचनाएं विरोधाभासी हैं। महाजनपदों के साथ-साथ अनेक छोटे-छोटे स्वतंत्र एवं अर्द्धस्वतंत्र राज्य एवं गणराज्य भी अस्तित्व में थे जिनमें परस्पर द्वेष होने के कारण प्रायः युद्ध हुआ करते थे। भारत में महाजनपद छठी शताब्दी ई.पू. से लेकर चौथी शताब्दी ई.पू. तक अपना अस्तित्व बनाये रहे।

(1) अंग: यह राज्य मगध के पश्चिम में था। मगध और अंग के बीच में चम्पा नदी बहती थी। अंग की राजधानी चम्पा भी चम्पा नदी के तट पर स्थित थी। बुद्ध कालीन छः बड़े नगरों में चम्पा की गणना की जाती थी। पहले राजगृह भी अंग राज्य का ही हिस्सा था किंतु बाद में अंग राज्य, मगध में मिल गया।

(2) मगध: मगध राज्य में आधुनिक पटना तथा गया जिले और शाहाबाद जिले के कुछ भाग सम्मिलित थे। यह अपने समय का सबसे प्रमुख राज्य था। बुद्ध से पूर्व, बृहद्रथ तथा जरासंध इस राज्य के प्रसिद्ध राजा हुए। प्रारंभ में मगध की राजधानी गिरिब्रज थी किंतु बाद में पाटलिपुत्र हो गई।

(3) काशी: वैशाली के पश्चिम में काशी जनपद था जिसकी राजधानी वाराणसी थी। राजघाट में की गई खुदाई से पता चलता है कि यह बस्ती 700 ई.पू. के आसपास बसनी आरम्भ हुई। ईसा पूर्व छठी सदी में इस नगरी को मिट्टी की दीवार से घेरा गया था। अनुमान होता है कि आरम्भ में काशी सबसे शक्तिशाली राज्य था परन्तु बाद में इसने कोसल की शक्ति के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।

(4) कोसल: कोसल जनपद के अंतर्गत पूर्वी उत्तर प्रदेश का समावेश होता था। इसकी राजधानी श्रावस्ती थी। इसे उत्तर-प्रदेश के गोंडा और बहराइच जिलों की सीमा पर स्थित सहेठ-महेठ स्थान के रूप में पहचाना गया है। खुदाई से जानकारी मिली है कि ईसा पूर्व छठी सदी में यहाँ कोई बड़ी बस्ती नहीं थी। कोसल में एक महत्त्वपूर्ण नगरी अयोध्या भी थी, जिसका सम्बन्ध रामकथा से जोड़ा जाता है किंतु इस स्थान पर अब तक हुए उत्खनन में, ईसा पूर्व छठी सदी की किसी भी बस्ती का पता नहीं चलता है। कोसल में शाक्यों का कपिलवस्तु गणराज्य भी सम्मिलित था। यहीं बुद्ध पैदा हुए थे। राजधानी कपिलवस्तु की खोज, बस्ती जिले के पिपरहवां स्थान पर हुई है। उनकी दूसरी राजधानी पिपरहवा से 15 किलोमीटर दूर नेपाल में लुम्बिनी स्थान पर थी।

(5) वज्जि संघ: गंगा के उत्तर में तिरहुत संभाग में वज्जियों का राज्य था। वह आठ जनों का संघ था। इनमें लिच्छवि सर्वाधिक शक्तिशाली थे। इनकी राजधानी वैशाली थी। वैशाली को आधुनिक वैशाली जिले के बसाढ़ गांव के रूप में पहचाना जाता है। पुराण, वैशाली को अधिक प्राचीन नगरी घोषित करते हैं परन्तु पुरातात्त्विक साक्ष्यों के अनुसार बसाढ़ की स्थापना ईसा पूर्व छठी शताब्दी के पहले नहीं हुई थी।

(6) मल्ल: कोसल के पड़ोस में मल्लों का गणराज्य था, इसकी सीमा वज्जी राज्य की उत्तरी सीमा से जुड़ी हुई थी। मल्लों की एक राजधानी कुसीनारा में थी जहाँ बुद्ध का निधन हुआ था। कुसीनारा की पहचान देवरिया जिले के कसियां स्थान से की गई है। मल्लों की दूसरी राजधानी पावा में थी।

(7) चेदि: आधुनिक बुंदेलखण्ड तथा उसका सीमपवर्ती प्रदेश इसके अंतर्गत था। इसकी राजधानी शक्तिमती थी। जातकों में वर्णित सोत्थवती यही नगरी थी। चेदि राज्य का महाभारत में भी उल्लेख है। शिशुपाल यहीं का राजा था जिसका भगवान श्रीकृष्ण ने शिरोच्छेदन किया था।

(8) वत्स: पश्चिम की ओर, यमुना के तट पर, वत्स जनपद था जिसकी राजधानी कौशाम्बी थी। वत्स लोग वही कुरुजन थे जो हस्तिनापुर छोड़कर प्रयाग के समीप कोशाम्बी में आकर बसे थे। कौशाम्बी को इसलिए पसंद किया गया क्योंकि यह स्थल गंगा-यमुना के संगम के निकट था। उत्खननों से ज्ञात हुआ है कि ईसा पूर्व छठी सदी में राजधानी कौशाम्बी की मजबूत किलेबन्दी की गई थी।

(9) कुरु: वर्तमान दिल्ली तथा मेरठ के समीपवर्ती प्रदेश कुरुराज्य के अंतर्गत थे। इसकी राजधानी इन्द्रप्रस्थ थी। महमूतसोम जातक के अनुसार इस राज्य में तीन सौ संघ थे। पाली ग्रंथों के अनुसार यहाँ के शासक युधिष्ठिता गोत्र के थे। हस्तिनीपुर नामक एक अन्य प्रमुख नगर भी इसी राज्य में था। संभवतः महाभारत कालीन हस्तिनापुर ही अब हस्तिनीपुर कहलाने लगा था। जैनों के उत्तराध्ययन सूत्र में इक्ष्वाकु नामक राजा का नाम मिलता है जो कुरु प्रदेश का राजा था। इस राज्य में पहले राजतंत्रात्मक शासन था किंतु बाद में यहां गणतंत्र की स्थापना हो गई।

(10) पांचाल: वर्तमान रुहेलखण्ड तथा उसके समीप के जिले पांचाल प्रदेश में आते थे। यह दो भागों में विभक्त था। इनमें से उत्तर-पांचाल की राजधानी अहिच्छत्र थी तथा दक्षिण-पांचाल की राजधानी काम्पिल्य थी।

(11) मत्स्य: इसकी राजधानी विराट नगर थी। यह यमुना के पश्चिम में तथा कुरु देश के दक्षिण में स्थित था। पहले तो चेदि राज्य ने मत्स्य राज्य पर अपना अधिकार जमाया, उसके बाद मगध ने मत्स्य राज्य को अपने अधीन कर लिया।

(12) सूरसेन: सूरसेन राज्य यमुना के किनारे था। मथुरा इसकी राजधानी थी। बुद्ध के समय अवन्तिपुत्र मथुरा का राजा था। यहां पहले गणतंत्र राज्य था किंतु बाद में इसमें राजतंत्र की स्थापना हुई। मेगस्थनीज के समय तक सूरसेन वंश के राजा शांति से शासन करते थे।

(13) अश्मक: दक्षिण भारत की प्रमुख नदी गोदावरी के तट पर अश्मक राज्य स्थित था। यह भारत का प्रमुख राज्य था तथा पोतन इसकी राजधानी थी। पुराणों के अनुसार इस राज्य के राजा इक्ष्वाकु वंश के थे। एक जातक के अनुसार किसी समय यह राज्य काशी के निकट था।

(14) अवन्ति: मध्य मालवा और मध्य प्रदेश के सीमावर्ती नगरों में अवन्ति राज्य स्थित था। इस राज्य के दो भाग थे, उत्तरी भाग की राजधानी उज्जैन में थी और दक्षिण भाग की महिष्मती में। उत्खननों से जानकारी मिली है कि ईसा पूर्व छठी सदी से ये दोनों नगर महत्त्व प्राप्त करते गए। अंततोगत्वा उज्जैन ने महिष्मती को पछाड़ दिया। उज्जैन में बड़े पैमाने पर लौहकर्म का विकास हुआ और इसकी मजबूत किलेबन्दी की गई।

(15) गांधार: गांधार राज्य में तक्षशिला, काश्मीर तथा पश्चिमोत्तर प्रदेश सम्मिलित थे। कुंभकार जातक के अनुसार तक्षशिला इसकी राजधानी थी। बुद्ध के समय पुमकुसाती गांधार का राजा था।

(16) काम्बोज: यह गांधार के पड़ौस में स्थित था। हाटक इसकी राजधानी थी। कुछ समय पश्चात् यहां भी गणतंत्र की स्थापना हुई।

ब्राह्मण धर्म के प्रति क्षत्रियों का विद्रोह

महाजनपद काल में क्षत्रियों का ब्राह्मण धर्म के प्रति विद्रोह हुआ। इस विद्रोह के चलते बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म का प्रादुर्भाव हुआ। इन धर्मों की स्थापना करने वाले क्षत्रिय राजकुमार थे। इन धर्मों की स्थापना के फलस्वरूप भारत में वैदिक चिंतन से अलग, नये रूपों में धार्मिक चिंतन की परम्पराएं आरम्भ हुईं। बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म के उत्थान का इतिहास अन्य पुस्तक में यथा-स्थान लिखा गया है।

मगध साम्राज्य की स्थापना और विस्तार

ईसा पूर्व छठी सदी के आगे का भारत का राजनीतिक इतिहास जनपद राज्यों में प्रभुता के लिए हुए संघर्ष का इतिहास है। मगध राज्य ने इस संघर्ष में प्रमुख भूमिका निभाई। अंततः मगध राज्य ने कई जनपदों को परास्त कर अपने भीतर मिला लिया तथा वह भारत का सबसे शक्तिशाली राज्य बन गया। इस प्रकार मगध साम्राज्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हो गया।

हर्यक वंश

इतिहासकारों के अनुसार हर्यक वंश के राजा बिम्बिसार ने मगध साम्राज्य की स्थापना की। इस वंश के तीन प्रमुख राजाओं- बिम्बिसार, अजातशत्रु तथा उदायिन् के पश्चात् कुछ निर्बल शासकों ने भी मगध पर शासन किया।

बिम्बिसार: बिम्बिसार के शासनकाल में मगध ने पर्याप्त उन्नति की। वह महात्मा बुद्ध का समकालीन था। उसके द्वारा विजय और विस्तार की नीति आरम्भ की गई। बिम्बिसार ने अंग देश पर अधिकार कर लिया और अंग देश का शासन अपने पुत्र अजातशत्रु को सौंप दिया। बिम्बिसार ने वैवाहिक सम्बन्धों से भी अपनी स्थिति को मजबूत बनाया। उसने तीन विवाह किए। उसकी प्रथम पत्नी कोसल के राजा की पुत्री और प्रसेनजित की बहन थी। कोसलदेवी के साथ दहेज के रूप में प्राप्त काशी ग्राम से उसे एक लाख रुपये की आय होती थी। इससे पता चलता है कि उस काल में राजस्व, मुद्राओं में वसूल किया जाता था। इस विवाह से कोसल के साथ उसकी शत्रुता समाप्त हो गई और दूसरे राज्यों से निबटने के लिए उसे छुट्टी मिल गई। उसकी दूसरी पत्नी वैशाली की लिच्छवि राजकुमारी चल्हना थी और तीसरी रानी पंजाब के मद्रकुल के मुखिया की पुत्री थी। विभिन्न राजकुलांे से वैवाहिक सम्बन्धों के कारण बिम्बिसार को अत्यधिक राजनीतिक प्रतिष्ठा मिली। इससे मगध राज्य के पश्चिम और उत्तर की ओर विस्तार का मार्ग प्रशस्त हुआ।

मगध की असली शत्रुता अवन्ति से थी। उस समय चण्डप्रद्योत महासेन अवन्ति का राजा था। मगध के राजा बिम्बिसार ने उस पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध का संभवतः कोई परिणाम नहीं निकला इस पर दोनों राजाओं ने मित्र बन जाना ही उपयुक्त समझा। बाद में चण्डप्रद्योत जब पीलिया से पीड़ित हुआ तो बिम्बिसार ने अपने राजवैद्य जीवक को उज्जैन भेजा। चण्डप्रद्योत को गांधार के राजा के साथ हुए युद्ध में भी विजय नहीं मिली किन्तु गांधारराज ने बिम्बिसार के पास एक पत्र और दूत-मंडली भेजकर उससे मित्रता कर ली। इस प्रकार विजय और कूटनीति से बिम्बिसार ने मगध को ईसा पूर्व छठी सदी में सर्वशक्तिमान राज्य बना दिया। उसके राज्य में 80,000 गांव थे।

मगध की आरंभिक राजधानी राजगीर में थी, उस समय इसे गिरिव्रज कहते थे। यह स्थल पांच पहाड़ियों से घिरा हुआ था और इनके खुले भागों को पत्थरों की दीवारों से चारों ओर से घेर दिया गया था। इन पहाड़ियों ने राजगीर को अजेय बना दिया। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार बिम्बिसार ने 544 ई.पू. से 492 ई.पू. तक (लगभग बावन साल) शासन किया।

अजातशत्रु: बिम्बिसार के बाद उसका पुत्र अजातशत्रु (492 ई.पू. से 460 ई.पू.) मगध के सिंहासन पर बैठा। उसने अपने पिता बिम्बिसार की हत्या करके सिंहासन पर अधिकार किया। उसके शासनकाल में मगध के राजकुल का वैभव अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच गया। उसने दो लड़ाइयाँ लड़ीं और तीसरी के लिए तैयारियां कीं। उसने विस्तार की आक्रामक नीति से काम लिया। उसकी इस नीति का काशी और कोसल ने मिलकर प्रतिरोध किया। मगध ओर कोसल के बीच लंबे समय तक संघर्ष जारी रहा। अंत में अजातशत्रु की विजय हुई। कोसल नरेश को अजातशत्रु के साथ अपनी पुत्री का विवाह करने और अपने जामाता को काशी सौंपकर समझौता करने के लिए विवश होना पड़ा।

अजातशत्रु ने वैवाहिक सम्बन्धों का कोई लिहाज नहीं रखा। यद्यपि उसकी माँ लिच्छवि राजकुमारी थी तथापि उसने वैशाली पर आक्रमण किया। बहाना यह ढूंढा गया कि लिच्छवि कोसल के मित्र हैं। उसने लिच्छवियों में फूट डालने के लिए षड्यंत्र रचा, और अंत में उन पर आक्रमण करके उनके स्वातंत्र्य को नष्ट कर दिया। वैशाली को नष्ट करने में उसे सोलह साल का लंबा समय लगा। अंत में उसे इसलिए सफलता मिली क्योंकि उसने पत्थरों को फेंक सकने वाले प्रस्तर-प्रक्षेपक जैसे एक युद्ध-यंत्र का उपयोग किया। उसके पास एक ऐसा रथ था, जिसमें गदा जैसा हथियार जुड़ा हुआ था। इससे युद्ध में लोगों को बड़ी संख्या में मारा जा सकता था। काशी और वैशाली को मिला लेने के बाद मगध साम्राज्य का और अधिक विस्तार हुआ। अजातशत्रु की तुलना में अवन्ति का शासक अधिक शक्तिशाली था। अवन्तों ने कौशाम्बी के वत्सों को हराया था और अब वे मगध पर आक्रमण करने की धमकी दे रहे थे। इस खतरे का सामना करने के लिए अजातशत्रु ने राजगीर की किलेबन्दी की, इन दीवारों के अवशेष आज भी देखने को मिलते हैं परन्तु अजातशत्रु के जीवनकाल में अवन्ति को मगध पर आक्रमण करने का अवसर नहीं मिला।

उदायिन्: अजातशत्रु के बाद उदायिन् (460-444 ई.पू.) मगध की गद्दी पर बैठा। उसने पटना में गंगा और सोन के संगम पर एक दुर्ग बनवाया। पटना, मगध साम्राज्य के केन्द्र में स्थित था। मगध का साम्राज्य अब उत्तर हिमालय से लेकर दक्षिण में छोटा नागपुर की पहाड़ियों तक फैला हुआ था। पटना की स्थिति, सामरिक दृष्टि से बड़े महत्त्व की थी।

शिशुनाग वंश

मगध के राज्याधिकारियों द्वारा हर्यक वंश के अंतिम शासक नागदासक को सिंहासन से उतार कर बनारस के प्रांतपति शिशुनाग को मगध का शासक बनाया गया। उसने 18 वर्ष तक मगध पर शासन किया। उसका वंश शिशुनाग के नाम से प्रसिद्ध हुआ। अवन्ति की शक्ति को तोड़ देना शिशुनाग की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। इसके बाद से अवन्ति राज्य, मगध साम्राज्य का भाग बन गया और मौर्य साम्राज्य के अंत समय तक बना रहा। शिशुनाग के बाद कालाशोक अथवा काकवर्ण मगध का राजा हुआ। उसने 28 वर्ष शासन किया। कालाशोक के शासन के 10वें वर्ष में दूसरी बौद्ध संगीति हुई। कालाशोक की हत्या गले में छुरा मारकर की गई। उसके बाद उसके 10 पुत्रों ने एक-एक करके कुल 22 वर्ष तक मगध पर शासन किया। शिशुनाग राजा अपनी राजधानी को कुछ समय के लिए वैशाली ले गए।

नंद वंश

शिशुनागों के बाद नन्दों का शासन आरम्भ हुआ। इस वंश का संस्थापक महापद्म था जिसके बारे में इतिहासकारों की धारणा है कि वह शूद्र माता के गर्भ से उत्पन्न हुआ था। जैन ग्रंथ परिशिष्टपर्वन् के अनुसार वह नापित पिता तथा वेश्या माता के गर्भ से उत्पन्न हुआ था। माना जाता है कि उसने शिशुनागवंश के अंतिम राजा की धोखे से हत्या करके मगध के शासन पर अधिकार जमा लिया। कर्टिअस आदि इतिहासकारों के अनुसार महापद्म नंद ने कालाशोक की ही हत्या की थी तथा कालाशोक के दस पुत्रों ने महापद्म नंद के संरक्षण में 22 वर्ष तक शासन किया। बाद में महापद्मनंद ने मगध का शासन हथिया लिया। महाबोधि वंश में महापद्मनंद का नाम उग्रसेन भी मिलता है। महापद्मनंद ने 28 साल तक शासन किया। उसके बाद उसके 8 पुत्रों ने 12 वर्ष तक शासन किया।

नंद मगध के सबसे शक्तिशाली शासक सिद्ध हुए। इनका शासन इतना शक्तिशाली था कि सिकंदर ने, जो उस समय पंजाब पर आक्रमण कर चुका था, पूर्व की ओर आगे बढ़ने का साहस नहीं किया। नन्दों ने कलिंग को जीतकर मगध की शक्ति को बढ़ाया, विजय के स्मारक रूप में वे कलिंग से जिन की मूर्ति उठा लाए थे। ये समस्त घटनाएं महापड्ड नन्द के शासन काल में घटित हुईं। उसने अपने को एकराट् कहा है। अनुमान होता है कि उसने न केवल कलिंग पर अधिकार किया, अपितु उसके विरुद्ध विद्रोह करने वाले कोसल को भी हथिया लिया।

नन्द शासक अत्यंत धनी और बड़े शक्तिशाली थे। उनकी सेवा में 2,00,000 पदाति, 60,000 घुड़सवार और 6,000 हाथी थे। इतनी विशाल सेना का रख-रखाव एक अच्छी और प्रभावी कराधान प्रणाली से ही सम्भव है। परवर्ती नन्द शासक दुर्बल और अप्रिय सिद्ध हुए।

मगध की सफलता के कारण

मौर्यों के उत्थान के पहले की दो सदियों में मगध साम्राज्य के रूप में भारत में सबसे बड़े राज्य की स्थापना बिम्बिसार, अजातशत्रु और महापड्ड नन्द जैसे कई साहसी और महत्त्वाकांक्षी शासकों के प्रयासों से हुई। उन्होंने अपने राज्यों का निरंतर विस्तार किया और उसे सशक्त बनाया परन्तु मगध के विस्तार का यही एक कारण नहीं था। कुछ दूसरे महत्त्वपूर्ण कारण भी थे। लोहे के समृद्ध भण्डार मगध की आरंभिक राजधानी राजगीर के निकट स्थित थे। इस कारण मगध के शासक अपनी सेना के लिये लिए प्रभावी हथियार बनवा सके। उनके शत्रु सरलता से ऐसे हथियार प्राप्त नहीं कर सकते थे। लोहे की खानें पूर्वी मध्यप्रदेश में भी मिलती हैं, जो उज्जैन के अवन्ति राज्य से अधिक दूर नहीं थी। 500 ई.पू. के आसपास उज्जैन में निश्चय ही लोहे को गलाने और तपाकर ढालने का भी काम होता था। वहाँ के लौहार अच्छी किस्म के हथियार तैयार करते थे। यही कारण है कि उत्तर भारत की प्रभुता के लिए अवन्ति और मगध के बीच कड़ा संघर्ष हुआ। उज्जैन पर अधिकार करने में मगध को लगभग सौ साल का समय लगा।

मगध के लिए कुछ और भी अनुकूल परिस्थितियाँ थी। मगध की दोनों राजधानियाँ- पहली राजगीर और दूसरी पाटलिपुत्र, सामरिक दृष्टि से अत्यंत सुरक्षित स्थानों पर थीं। राजगीर पांच पहाड़ियों के एक समूह से घिरा होने के कारण दुर्भेद्य थी। तोपों का आविष्कार बहुत बाद में हुआ। उन दिनों राजगीर जैसे दुर्ग को तोड़ना सरल काम नहीं था। ईसा पूर्व पांचवीं सदी में मगध के शासक अपनी राजधानी पाटलिपुत्र ले गए। केन्द्र भाग में स्थित इस स्थल के साथ समस्त दिशाओं से संचार-सम्बन्ध स्थापित किए जा सकते थे। पाटलिपुत्र गंगा, गंडक और सोन नदियों के संगम पर स्थित था। पाटलिपुत्र से थोड़ी दूरी पर सरयू नदी भी गंगा से मिलती थी। पूर्व-औद्योगिक दिनों में, जब संचार में बड़ी कठिनाइयाँ थीं, नदी मार्गों का अनुसरण करते हुए सेना उत्तर, पश्चिम, दक्षिण, और पूर्व की ओर आगे बढ़ती थी। इसके अतिरिक्त लगभग चारों ओर से नदियों द्वारा घिरे होने के कारण पटना की स्थिति भी अभेड्ड बन गई थी। सोन और गंगा इसे उत्तर तथा पश्चिम की ओर से घेरे हुए थीं, तो पुनपुन इसे दक्षिण और पूर्व की ओर से घेरे हुए थी। इस प्रकार, पाटलिपुत्र सही अर्थों में एक जलदुर्ग था। उन दिनों इस नगर पर अधिकार करना सरल नहीं था।

मगध राज्य मध्य गंगा के मैदान में स्थित था। इस अत्यधिक उपजाऊ प्रदेश से जंगल साफ हो चुके थे। भारी वर्षा होती थी, इसलिए सिंचाई के बिना भी इलाके को उत्पादक बनाया जा सकता था। प्राचीन बौद्ध ग्रंथों के उल्लेखों के अनुसार इस प्रदेश में कई प्रकार के चावल पैदा होते थे। प्रयाग के पश्चिम की ओर के प्रदेश की अपेक्षा यह प्रदेश कहीं अधिक उपजाऊ था। परिणामतः यहाँ के किसान काफी अतिरिक्त अनाज पैदा करते थे जिसे शासक अपनी सेना के लिये एकत्रित कर लेते थे।

मगध के शासकों ने नगरों के उत्थान और मुद्राचलन से भी लाभ उठाया। उत्तर-पूर्वी भारत में व्यापार-वणिज्य की वृद्धि के कारण शासक पण्य-वस्तुओं पर मार्ग-कर लगा सकते थे और इस प्रकार अपनी सेना के खर्च के लिए धन एकत्र कर सकते थे। सैनिक संगठन के मामले में मगध को एक विशेष सुविधा प्राप्त थी। भारतीय राज्य घोड़े और रथ के उपयोग से भलीभांति परिचित थे किंतु मगध ही पहला राज्य था जिसने अपने पड़ोसियों के विरुद्ध हाथियों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया। देश के पूर्वी भाग से मगध के शासकों के पास हाथी पहुंचते थे। यूनानी स्रोतों से जानकारी मिलती है कि नन्दों की सेना में 6000 हाथी थे। दुर्र्गों को भेदने, सड़कों तथा यातायात की दूसरी सुविधाओं से रहित प्रदेशों और कच्छी क्षेत्रों में हाथियों का उपयोग किया जा सकता था। इन्हीं सब कारणों से मगध को दूसरे राज्यों को हराने और भारत में प्रथम साम्राज्य स्थापित करने में सफलता मिली।

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