Home Blog Page 56

संत कुम्भनदास और अकबर (156)

0
संत कुम्भनदास - www.bharatkaitihas.com
संत कुम्भनदास और अकबर

संत कुम्भनदास और अकबर समकालीन थे। अकबर चाहता था कि संत कुंभनदास फतहपुर सीकरी आकर रहें तथा अकबर के नवरत्न बन जाएं किंतु कुंभनदास को  राजसी वैभव की कोई लालसा नहीं थी। उन्होंने अकबर से कहलवाया कि जिस अकबर का मुंह देखकर दुःख उत्पन्न होता है उसे फतहपुर सीकरी आकर सलाम क्यों करूं?

बीरबल आदि हिन्दू दरबारियों, हिन्दू धर्मोपदेशकों, संतों एवं योगियों के प्रभाव से अकबर ने दिन में चार बार सूर्य की पूजा करनी आरम्भ कर दी तथा जोगियों की तरह लम्बी आयु पाने के लिए मांस खाना छोड़ दिया! अकबर को यह बात अनुभव हो गई थी कि जोगियों की तरह वैष्णव संत भी दिव्य शक्तियों वाले होते हैं। इसलिए अकबर ने अपने समय के विख्यात वैष्णव संतों को अपने दरबार में बुलाने के प्रयास प्रारम्भ किए। अकबर ने अपने अधिकारियों को आदेश दिया कि वे संत कुंभनदास को दरबार में लेकर आएं।

संत कुम्भनदास का जन्म मथुरा क्षेत्र में स्थित गोवर्धन के निकट जमुनावतो गांव में पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी के अंतिम वर्षों में हुआ था। वे गोरवा क्षत्रिय थे। उनके पिता एक साधारण किसान थे। कुम्भनदास बड़े होकर अपने पिता के साथ खेती करने लगे। वृंदावन क्षेत्र के पारसोली गांव में इस परिवार के पास एक छोटा सा खेत था। इस कारण यह परिवार अत्यंत निर्धन अवस्था में जीवन यापन करता था। कुंभनदास के परिवार में पत्नी, सात पुत्र, सात पुत्र-वधुएँ और एक विधवा भतीजी रहती थी।

जब कुम्भनदास पच्चीस वर्ष के हुए तो उन्होंने खेती-बाड़ी से मोह छोड़ दिया और वैष्णव संत महाप्रभु वल्लभाचार्य से दीक्षा लेकर उनके शिष्य बन गए। इस कारण खेती-बाड़ी का काम परिवार के अन्य सदस्यों पर चला गया। संत वल्लभाचार्य ने कुम्भनदास को गोवर्द्धन पर्वत पर प्रकट हुई भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा की सेवा में रख दिया। इस प्रकार कुंभनदास वृंदावन आ गए तथा अत्यंत विपन्न अवस्था में दिन बिताते हुए भजन करने लगे। वैष्णव संतों में यह मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण स्वयं बाल रूप में आकर संत कुंभनदास के साथ खेला करते थे।

श्रीनाथजी के मन्दिर में कुम्भनदास नित्य नये पद गाकर सुनाने लगे। पुष्टि सम्प्रदाय में सम्मिलित होने पर उन्हें कीर्तन की सेवा दी गयी। कुम्भनदास भगवत्कृपा को ही सर्वाेपरि मानते थे, बड़े-से-बड़े घरेलू संकट में भी वे अपने आस्था-पथ से कभी विचलित नहीं हुए। श्रीनाथजी के श्ृंगार सम्बन्धी पदों की रचना में उनकी विशेष रुचि थी। एक बार वल्लभाचार्यजी ने उनके युगल-लीला सम्बन्धी पदों से प्रसन्न होकर कहा था कि तुम्हें तो निकुंज-लीला के रस की अनुभूति हो गयी। संत कुम्भनदास महाप्रभु वल्लभाचार्य की कृपा से गद्गद होकर बोले, मुझे तो इसी रस की नितान्त आवश्यकता है।

महाप्रभु वल्लभाचार्य के गौलोक धाम गमन के बाद संत कुम्भनदास वल्लभाचार्य के पुत्र गोसाईं विट्ठलनाथ के संरक्षण में रहकर भगवान श्री पुरुषोत्तम का लीला-गान करने लगे। विट्ठलनाथ महाराज की उन पर बड़ी कृपा थी। वे उनके निर्लोभी जीवन की बड़ी सराहना किया करते थे। ई.1545 में गोसाईं विट्ठलनाथ ने अपने पिता के चार शिष्यों एवं अपने चार शिष्यों पर छाप अंकित की जिन्हें अष्टछाप संत कहा गया। कुंभनदास भी उनमें से एक थे।

बड़े-बड़े राजे-महाराजे एवं सेठ साहूकार संत कुम्भनदास के दर्शन करने में स्वयं को सौभाग्यशाली मानते थे। वृन्दावन के बड़े-बड़े रसिक और सन्त-महात्मा उनके सत्संग की उत्कृष्ट इच्छा किया करते थे। कुंभनदास ने भगवद्भक्ति का यश सदा अक्षुण्ण रखा, आर्थिक संकट और दीनता से उसे कभी कलंकित नहीं होने दिया।

एक बार विट्ठलनाथजी उन्हें अपनी द्वारका यात्रा में साथ ले जाना चाहते थे, उनका विचार था कि वैष्णवों की भेंट से उनकी आर्थिक स्थिति सुधर जायगी। कुम्भनदास श्रीनाथजी का वियोग एक पल के लिये भी नहीं सह सकते थे परंतु उन्होंने गोसाईंजी की आज्ञा का विरोध नहीं किया। वे गोसाईंजी के साथ अप्सरा कुण्ड तक ही गये थे कि श्रीनाथजी के सौंदर्य स्मरण से उनके अंग-अंग सिहर उठे, भगवान की मधुर-मधुर मन्द मुस्कान की ज्योत्स्ना विरह-अन्धकार में थिरक उठी, माधुर्यसम्राट नन्दनन्दन की विरह वेदना से उनका हृदय घायल हो चला। उन्होंने श्रीनाथजी के वियोग में एक पद गाया-

केते दिन जु गए बिनु देखैं।

तरुन किसोर रसिक नँदनंदन, कछुक उठति मुख रेखैं।।

वह सोभा, वह कांति बदन की, कोटिक चंद बिसेखैं।

वह चितवन, वह हास मनोहर, वह नटवर बपु भेखैं।।

स्याम सुँदर सँग मिलि खेलन की आवति हिये अपेखैं।

‘कुंभनदास’ लाल गिरिधर बिनु जीवन जनम अलेखैं।।

विट्ठलनाथजी के हृदय पर कुंभनदासजी द्वारा गाए गए इस विरह-गीत का बड़ा प्रभाव पड़ा। उन्होंने कुम्भनदास को वृंदावन लौट जाने की आज्ञा दे दी। वे नहीं चाहते थे कुम्भनदास पल भर के लिये भी श्रीनाथजी से अलग रहें। श्रीनाथजी के दर्शन करके कुम्भनदास स्वस्थ हुए।

कहा जाता है कि जब अकबर ने कुंभनदासजी के इस पद को सुना तो उसने कुम्भनदासजी को अपने दरबार में बुलाया। कुम्भनदासजी ने सीकरी जाने से मना कर दिया किंतु जब अकबर के अधिकारियों ने बारम्बार आग्रह किया तो वे पैदल ही वृंदावन से सीकरी के लिए रवाना हो गये।

जब कुंभनदास अकबर के दरबार में पहुंचे तो उन्हें अकबर का वैभव बड़ा फीका लगा। कुम्भनदास की पगड़ी फटी हुई थी तथा उनकी टांगों पर लिपटी हुई धोती मैली थी। वे आत्मग्लानि में डूबे हुए थे और विचार कर रहे थे कि किस पाप के फलस्वरूप उन्हें इनके सामने उपस्थित होना पड़ा!

अकबर ने कुंभनदास की बड़ी आवभगत की परंतु श्रीनाथजी से विलग होकर कुम्भनदास को अकबर का दरबार साक्षात नर्क के समान प्रतीत हो रहा था। अकबर ने कुंभनदास से आग्रह किया कि वे वही पद अपने मुख से सुनाएं जो उन्होंने श्रीविट्ठलनाथजी के समक्ष गाया था। कहते हैं कि कुंभनदास ने जब अकबर के समक्ष गायन किया तो उनके मुख से यह पद निकला-

भगत को कहा सीकरी सों काम।

आवत जात पन्हैयां टूटीं, बिसरि गयो हरिनाम।।

जाको मुख देखैं दुख लागै, ताको करनो पर्यो प्रनाम।

‘कुंभनदास’ लाल गिरिधर बिनु और सबै बेकाम।।

कुंभनदास के शब्द सुनकर अकबर समझ गया कि कुंभनदास कहना चाहते हैं कि अकबर का मुख देखकर दुःख उत्पन्न होता है, मैं फतहपुर सीकरी आकर उसे सलाम क्यों करूं? इस पर अकबर ने उन्हें फिर से वृंदावन जाने की आज्ञा दे दी। कुछ ग्रंथों के अनुसार अकबर के बुलाने पर कुंभनदास सीकरी गए ही नहीं, अपितु यह पद लिखकर अकबर को भिजवा दिया।

Teesra-Mughal-Jalaluddin-Muhammad-Akbar
To Purchase This Book Please Click On Image

मान्यता है कि ई.1563 में कुंअर मानसिंह ब्रज आया। उसने वृन्दावन भूमि के दर्शन करने के बाद गोवर्धन पर्वत की यात्रा की तथा श्रीनाथजी के दर्शन किये। जिस समय मानसिंह श्रीनाथजी के मंदिर में पहुंचा, उस समय कुंभनदास मृदंग और वीणा के साथ कीर्तन कर रहे थे। कुंअर मानसिंह कुंभनदास के निवास पर मिलने उनके गांव जमुनावतो भी गया। जब मानसिंह ने कुम्भनदास की दीन-हीन दशा को देखा तो वह चकित रह गया। जब मानसिंह उनकी कुटिया में पहुंचा तो कुम्भनदास धरती पर बैठकर भगवान के रूप-चिन्तन में ध्यानस्थ थे। मानसिंह भी वहीं बैठ गया। जब कुंभनदास की आंख खुली तो उन्होंने अपनी विधवा भतीजी से कहा कि अतिथि को आसन दो और मुझे तिलक लगाने के लिए दर्पण दो।

भतीजी ने कहा कि आसन और दर्पण तो पड़िया खा-पी गई। अर्थात् घास के बने हुए आसन तथा कुण्डी में भरे हुए पानी रूपी दर्पण को भैंस की बछिया खा-पी गयी। महाराजा मानसिंह को संत कुंभनदास की निर्धनता का पता लग गया। उसने संत को सोने का दर्पण देना चाहा किंतु कुंभनदास ने उसे अस्वीकार कर दिया। मानसिंह ने उन्हें मोहरों की थैली देनी चाही किंतु कुंभनदास ने वह भी स्वीकार नहीं की। मानसिंह ने जमनुवतो गांव कुम्भनदास के नाम करना चाहा, पर उन्होंने कहा कि मेरा काम तो करील और बेर के वृक्षों से ही चल जाता है। मैं इन सब चीजों को लेकर क्या करूंगा?

अत्यंत वृद्ध हो जाने पर भी कुम्भनदास नित्य जमुनावतो से गोवर्धन आया करते थे। एक दिन संकर्षण कुण्डी पर आन्योदर के निकट रुके। अष्टछाप के प्रसिद्ध कवि चतुर्भुजदासजी उनके साथ थे। कुंभनदास ने चतुर्भुजदास से कहा कि अब घर चलकर क्या करना है। कुछ समय बाद शरीर ही छूटने वाला है। जब गोसाईं विट्ठलनाथजी को यह बात ज्ञात हुई तो वे कुंभनदास के पास आए। कुछ ही देर में कुंभनदासजी के प्राण कंठ में आ गए। गोसाईं विट्ठलनाथजी ने कुंभनदास से पूछा कि इस समय मन किस लीला में लगा है? कुम्भनदासजी ने कहा- लाल तेरी चितवन चितहि चुरावै।

इसके अनन्तर कुम्भनदासजी ने युगल-स्वरूप की छवि के ध्यान में यह पद गाया-

रसिकनी रस में रहत गड़ी।

कनक बेलि बृषभानुनंदिनी स्याम तमाल चढ़ी।।

बिहरत श्रीगिरिधरन लाल सँग, कोने पाठ पढ़ी।

‘कुंभनदास’ प्रभु गोबरधनधर रति रस केलि बढ़ी।।

यह पद गाकर कुंभनदास ने नश्वर शरीर छोड़ दिया। कहा जाता है कि उस समय कुंभनदासजी की आयु 113 साल थी। कुम्भनदास के पदों की संख्या लगभग 500 है। कुम्भनदास के पदों का एक संग्रह कुम्भनदास शीर्षक से श्रीविद्या विभाग, कांकरोली द्वारा प्रकाशित हुआ है।

संत तुलसीदास और अकबर (157)

0
संत तुलसीदास और अकबर - www.bharatkaitihas.com
संत तुलसीदास और अकबर

संत तुलसीदास और अकबर समकालीन थे। तुलसीदास संत थे और अकबर बादशाह किंतु तुलसीदास की प्रसिद्धि अकबर से भी अधिक थी। अकबर चाहता था कि संत तुलसीदास और अकबर का साथ हो जाए किंतु तुलसी बाबा अकबर का मुंह देखने को भी तैयार नहीं थे।

अकबर ने वैष्णव संतों को अपने दरबार में बुलाने के अनेक प्रयास किए। उसने अवध क्षेत्र में निवास कर रहे विख्यात संत गोस्वामी तुलसीदासजी को अपने दरबार में बुलवाया। गोस्वामीजी ने अकबर के दरबार में जाने से मना कर दिया।

इस पर अकबर ने गोस्वामीजी को प्रस्ताव भिजवाया कि उन्हें अकबर के दरबार में मनसब प्रदान किया जाएगा। यह एक आकर्षक प्रस्ताव था जिसके लिए उस काल में भारत भर के वीर पुरुष, राजा-महाराजा एवं ज्ञानी पुरुष तरसते रहते थे किंतु गोस्वामीजी के लिए यह प्रस्ताव किसी सजा सुनाए जाने से कम नहीं था।

गोस्वामी तुलसीदासजी अप्रतिम विद्वान थे। उन्होंने रामचरित मानस, हनुमान बाहुक तथा विनय पत्रिका आदि लगभग 20 उत्कृष्ट ग्रंथों की रचना की थी। उन्होंने अपना पूरा जीवन निर्धन अवस्था में, एकाकी रहकर तथा भगवान श्रीराम के चरणों में समर्पित रहकर व्यतीत किया था। अपने जीवन का एक-एक क्षण ईशभक्ति में लगाने के लिए उन्होंने सदैव भिक्षा मांगकर उदरपूर्ति की थी और कभी धनार्जन नहीं किया।

उनके द्वारा लिखित प्रबंधकाव्य रामचरित मानस को अपार जनश्रद्धा प्राप्त हुई। इस ग्रंथ की चौपाइयां गांव-गांव गाई जाने लगीं। तत्कालीन संदर्भों के अनुसार काशी के कुछ पण्डित नहीं चाहते थे कि गोस्वामीजी द्वारा लिखित रामचरित मानस को लोक में ख्याति मिले। पण्डितों के इस दुराग्रह का मुख्य कारण यह था कि यह ग्रंथ संस्कृत में न होकर लोकभाषाओं अवधी एवं ब्रज में लिखा गया था जिसके कारण इस ग्रंथ को गांव-गांव में प्रचुर ख्याति मिल रही थी।

दुराग्रही पण्डितों ने गोस्वामीजी के इस ग्रंथ को नष्ट करने के लिए लठैत भिजवाए किंतु कहा जाता है कि भगवान श्रीराम एवं लक्ष्मणजी स्वयं धनुष-बाण लेकर इस ग्रंथ की रक्षा किया करते थे। स्वयं हनुमानजी गोस्वामीजी की कुटिया पर पहरा लगाने लगे। इस कारण दुराग्रही पण्डितों के लठैत इस ग्रंथ को नष्ट नहीं कर पाए। इस कारण गोस्वामीजी की ख्याति और अधिक बढ़ गई। यह ख्याति अकबर के दरबार तक जा पहुंची।

जब अकबर ने गोस्वामीजी को मनसब देने का प्रस्ताव भिजवाया तो गोस्वामीजी ने एक दोहा लिखकर अकबर को भिजवाया। यह दोहा इस प्रकार से था-

हम चाकर रघुबीर के पटौ लिखौ दरबार

तुलसी अब का होइंगे नर के मनसबदार।

अर्थात्- मैं तो भगवान श्रीराम का सेवक हूँ, मेरा पट्टा तो स्वयं प्रभु श्रीराम के दरबार से लिखा गया है। क्या अब मुझे मनुष्य का मनसबदार होना पड़ेगा! कहते हैं कि गोस्वामीजी के इस उत्तर से अकबर क्रोधित हो गया तथा उसने गोस्वामजी को पकड़कर जेल में बंद करवा दिया।

जब गोस्वामीजी जेल में बंद कर दिए गए तो बंदरों के एक विशाल झुण्ड ने अकबर के महल पर आक्रमण कर दिया। अकबर के महल में चारों तरफ बंदर ही बंदर दिखाई देने लगे। उन्होंने महल में रखी वस्तुएं उठाकर फैंक दी तथा अकबर के परिवार एवं सेवकों को डराने लगे।

अकबर के सैनिकों ने बंदरों को भगाने के बहुत प्रयास किए किंतु बंदरों का उत्पात जारी रहा। इस पर किसी ने अकबर को सुझाव दिया कि आपने गोस्वामी तुलसीदासजी को पकड़ लिया है, उनकी रक्षा स्वयं हनुमानजी करते हैं। इसलिए ये बंदर आपसे कुपित हो गए हैं। आप कोतवाल को आदेश दें कि वह गोस्वामीजी को मुक्त कर दे।

अकबर ने इस सुझाव को स्वीकार कर लिया तथा गोस्वामीजी को मुक्त करने के आदेश दिए। जब गोस्वामीजी मुक्त कर दिए गए तो बंदर शांत हो गए और वे अकबर का महल छोड़कर चले गए। अलग-अलग ग्रंथों में इस घटना का उल्लेख अलग-अलग तरह से मिलता है। कहा जाता है कि अकबर ने स्वयं गोस्वामीजी के समक्ष उपस्थित होकर उनसे क्षमा याचना की।

अकबर समझ गया कि संत तुलसीदास और अकबर कभी भी एक साथ नहीं बैठ सकते। अकबर अनाचारी म्लेच्छ शासक था और तुलसीदास भगवान राम के भक्त थे। इन दोनों का कोई मेल वैसे भी नहीं बैठता था।

अकबर ने वृंदावन के स्वामी हरिदासजी को भी अपने दरबार में आमंत्रित किया। वे अपने समय के प्रख्यात भक्त-कवि, शास्त्रीय संगीतकार तथा सखी संप्रदाय के प्रवर्तक थे। इस सम्प्रदाय के उपासक स्वयं को भगवान श्रीकृष्ण की सखि समझते हैं। स्वामी हरिदास को ललिता सखी का अवतार माना जाता था। वे उच्च कोटि के संगीतज्ञ थे।

Teesra Mughal Jalaluddin Muhammad Akbar - www.bharatkaitihas.com
To purchase this book please click on Image.

उन्होंने शास्त्रीय संगीत परम्परा में चतुष् ध्रुपदशैली की रचना की। ‘केलिमाल’ में स्वामी हरिदास के सौ से अधिक पद संग्रहित हैं। इनकी वाणी सरस और भावुक है। माना जाता है कि प्रसिद्ध गायक तानसेन इनके शिष्य थे। कुछ संदर्भों के अनुसार स्वामी हरिदास तानसेन के गुरु नहीं थे किंतु तानसेन उनका गुरुवत् सम्मान करते थे। जब अकबर ने संत हरिदास को अपने दरबार में बुलाया तो हरिदास ने भी अकबर के दरबार में जाने से मना कर दिया। इस पर अकबर उनके दर्शन करने स्वयं वृन्दावन गया। वह घण्टों तक हरिदास के चरणों में बैठकर उनका गायन सुनता रहा। यह प्रसिद्ध है कि अकबर साधु के वेश में तानसेन के साथ इनका गायन सुनने के लिए गया था। संत हरिदास केवल निर्धारित समय पर भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा के समक्ष गाया करते थे। इसलिए तानसेन ने एक युक्ति निकाली ताकि हरिदास अकबर के समक्ष गायन करें। तानसेन स्वामी हरिदास के सम्मुख बैठकर गाने लगे और उन्होंने जानबूझकर गायन में कुछ भूल कर दी। इस पर स्वामी हरिदास ने उसी पद को शुद्ध करके गाया। इस युक्ति से अकबर को स्वामी हरिदास का गायन सुनने का सौभाग्य प्राप्त हो गया। अकबर ने स्वामी हरिदास को बहुत सारी भेंट देनी चाही परंतु इन्होंने स्वीकार नहीं की।

लोकमान्यता है कि अकबर ने तानसेन के साथ वृंदावन की यात्रा की तथा मीरांबाई से उनके भजन सुने। मीरांबाई चित्तौड़ के महाराणा संग्रामसिंह (सांगा) के बड़े पुत्र कुंअर भोजराज की पत्नी थीं तथा अपने पति भोजराज की मृत्यु हो जाने के बाद चित्तौड़ के महल छोड़कर वृंदावन में निवास किया करती थीं।

मीरांबाई से अकबर की भेंट के सम्बन्ध में प्रचलित लोक मान्यता सही जान नहीं पड़ती। मीरांबाई का जन्म ई.1488 में तथा निधन ई.1547 में हुआ था। वे अकबर के दादा बाबर तथा पिता हुमायूँ की समकालीन थीं। जिस समय अकबर आगरा एवं दिल्ली का बादशाह हुआ, उस समय तक मीरांबाई इस संसार को त्यागकर जा चुकी थीं। अतः यह मान्यता सही नहीं है कि अकबर तानसेन के साथ वृंदावन गया और मीरांबाई के समक्ष उपस्थित हुआ। वस्तुतः अकबर और तानसेन ने वृंदावन जाकर स्वामी हरिदास से भेंट की थी और उनके गाए भजन सुने थे न कि मीरांबाई के।     

संत तुलसीदास पर अन्य लेख-

तुलसीदास

संत तुलसीदास और अकबर

गोस्वामी तुलसीदास का जीवनवृत्त

गोस्वामी तुलसीदास का काव्य तत्कालीन समय का इतिहास है!

गोस्वामी तुलसीदास की दृष्टि में लौकिक दु:ख

तुलसीदासजी की लोकप्रियता से पीछे रह गया अकबर!

संत तुलसीदास का साहित्य         

कल्ला राठौड़ ने भरे दरबार में मूंछों पर ताव देकर अकबर को चुनौती दी (158)

0
कल्ला राठौड़
कल्ला राठौड़

राजस्थान के इतिहास में दो कल्ला राठौड़ हुए हैं, दोनों ही अकबर के समकालीन थे। एक मेड़ता का राजकुमार था और दूसरा सियाना का शासक। इस कड़ी में हम सियाना के जागीरदार की चर्चा कर रहे हैं।

यद्यपि अब तक राजपूताना के अधिकांश हिन्दू शासकों ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी तथापि उनमें से अधिकांश ने अपनी धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्वतंत्रता को अक्षुण्ण बनाए रखा था। सिवाना का शासक कल्याणसिंह रायमलोत भी उन्हीं में से एक था।

जिस समय अकबर ने मारवाड़ के स्वर्गीय राजा मालदेव के पुत्र मोटाराजा उदयसिंह को जोधपुर का राजा बनाया, उस समय कल्याणसिंह रायमलोत सिवाना का जागीरदार था। वह मारवाड़ नरेश मालदेव का पौत्र, राव रायमल का पुत्र तथा मोटाराजा उदयसिंह का सगा भतीजा था। कल्याणसिंह रायमलोत को मारवाड़ में कल्ला राठौड़ भी कहा जाता है। जब मारवाड़ के राठौड़ों ने अकबर की अधीनता स्वीकर कर ली तब कल्ला राठौड़ भी अकबर की सेवा में चला गया।

अकबर की सेवा में रहते हुए कल्ला राठौड़ बीकानेर के राजकुमार पृथ्वीराज राठौड़ के सम्पर्क में आया। पृथ्वीराज राठौड़ अपने समय में डिंगल भाषा का श्रेष्ठ कवि था। वह वीर-रस, भक्ति-रस एवं श्ृंगार-रस की कविताएं लिखा करता था। एक बार कल्ला राठौड़ ने कुंअर पृथ्वीराज राठौड़ से अनुरोध किया कि मैं धरती की रक्षा के लिये युद्ध करता हुआ वीरगति को प्राप्त करूंगा। इसलिये आप मेरी प्रशंसा में एक कवित्त बनाकर मुझे आज ही सुना दें।

इस पर पृथ्वीराज राठौड़ ने एक सुंदर कविता की रचना करके कल्ला राठौड़ का सुनाई जो आज भी डिंगल भाषा की अनूठी सम्पदा है।

एक बार अकबर ने बूंदी के हाड़ा शासक राव सुरजन से कहा कि हमारी इच्छा है कि आपकी पुत्री का विवाह शहजादे सलीम से हो। भरे दरबार में यह प्रस्ताव सुनकर हाड़ा हतप्रभ रह गया। उसने अकबर की अधीनता स्वीकर करते समय यह शर्त रखी थी कि बूंदी की राजकुमारियों का डोला कभी भी मुगल शहजादों के लिए नहीं जाएगा किंतु अब अकबर मक्कारी पर उतर आया था और उसे बूंदी की राजकुमारी का डोला चाहिए था।

इस समय तक बूंदी के हाड़ों की स्थिति यह नहीं रह गई थी कि वे अकबर जैसे शक्तिशाली बादशाह से सीधा लोहा ले सकें। अतः हाड़ा राजा स्वयं तो बादशाह के प्रस्ताव को अस्वीकार नहीं कर सका किंतु उसने सहायता की आशा से अकबर के दरबार में खड़े हिंदू राजाओं एवं राजकुमारों की तरफ दृष्टि दौड़ाई।

कहा जाता है कि समस्त हिन्दू राजाओं ने दृष्टि नीची कर ली किंतु सिवाना का कल्ला रायमलोत (कल्ला राठौड़) निर्भीकता से मूंछों पर ताव देते हुए हाड़ा की तरफ देखने लगा। कल्ला से दृष्टि मिलते ही हाड़ा को बचाव का रास्ता मिल गया। हाड़ा ने कहा, मेरी बेटी की सगाई हो चुकी है। अकबर ने पूछा किसके साथ?

Teesra-Mughal-Jalaluddin-Muhammad-Akbar
To Purchase This Book Please Click On Image

इस पर कल्ला राठौड़ ने अपनी मूंछों पर ताव देते हुए कहा, हुजूर मेरे साथ। अकबर समझ गया कि इस बात में सच्चाई नहीं है किंतु स्वाभिमान की चौखट पर खड़े हिंदू राजा की बात को अभिमानी बादशाह काट नहीं सका। कुछ दिनों बाद ही कल्ला राठौड़ ने हाड़ों की राजकुमारी से विवाह कर लिया। एक हिंदू नारी की अस्मिता की रक्षा के लिये अकबर के दरबार में दिखाए गए इस साहस का भुगतान कुछ दिन बाद कल्ला रायमलोत को अपने प्राणों से हाथ धोकर करना पड़ा।

जब अकबर को ज्ञात हुआ कि कल्ला राठौड़ ने बूंदी के हाड़ा राजकुमारी से विवाह कर लिया है तो अकबर बड़ा कुपित हुआ। उसने कल्ला को दण्ड स्वरूप लाहौर के मोर्चे पर तैनात कर दिया। लाहौर के मोर्चे पर एक दिन कल्ला राठौड़ तथा बादशाह के एक प्रिय मनसबदार के बीच कहा-सुनी हो गई। कल्ला ने उस मनसबदार को वहीं पर मार गिराया और लाहौर का मोर्चा छोड़कर सिवाना आ गया।

कविराज श्यामलदास ने अपने ग्रंथ वीर विनोद लिखा है कि जोधपुर नरेश मोटाराजा उदयसिंह ने अपनी पुत्री जगत गुसाइंन का विवाह शहजादे सलीम से कर दिया था। उदयसिंह का भतीजा कल्ला राठौड़ इस विवाह सम्बन्ध को अनुचित एवं अपमानजनक मानता था और उदयसिंह से झगड़ा करता था। उदयसिंह ने अकबर से अपने भतीजे की शिकायत की।

इस पर अकबर ने मोटाराजा उदयसिंह को आदेश दिया कि वह सिवाना पर हमला करके कल्ला राठौड़ को मार डाले। जोधपुर नरेश मोटाराजा उदयसिंह ने 2 जनवरी 1589 को सिवाना दुर्ग पर हमला किया। कल्ला राठौड़ युद्ध क्षेत्र में वीरगति को प्राप्त हुआ। कहा जाता है कि सिर कट जाने पर भी कल्ला राठौड़ का धड़ लड़ता रहा। इस घटना के सम्बन्ध में दुरसा आढ़ा ने लिखा है-

पाखती मीर उड़िया तरसि पारसी, घात चूको नहीं चूक रै घाई।

ऊजळी धार पडियार हूँ आछटी। रोसि त्रुटै कवटि हिंदवै राइ।

अर्थात्- आसपास के मुसलमान योद्धा भयभीत होकर भाग गए। स्वंय पर मृत्यु कारक गुप्त प्रहार होने पर भी वह वीर प्रहार करने में चूका नहीं। मस्तक टूट पड़ने पर भी उसने क्रोधपूर्वक म्यान से तीखी धार वाली कटार निकालकर चलाई।

जे किण ही साचवी तपणि सतवे-जुगनि,

पासि ढळियां कमळ पछै प्रतमाळ।

जुवैं माथै हुवै दुरति रांमोत जिमि,

किणिहि काढी नहीं, एणि कळिकाळ।

अर्थात्- सतयुग में भले ही किसी ने सिर कटकर पास में पड़ जाने के बाद तपबल से कटार संभाली हो, पर मस्तक के अलग हो जाने पर इस कलियुग में तो दुर्दम्य वीर, रायमल के पुत्र कल्ला की तरह किसी ने भी कटार नहीं निकाली।

जब कल्ला वीरगति को प्राप्त हुआ तो उसकी नई-नवेली हाड़ी रानी ने दुर्ग की ललनाओं के साथ जौहर का अनुष्ठान किया। राजस्थानी साहित्य में कल्ला रायमलोत की वीरता और पराक्रम से सम्बन्धित अनेक दोहे मिलते हैं-

किलो अणखलो यूं कहे, आव कल्ला राठौड़।

मो सिर उतरे मेहणो, तो सिर बांधै मौड़।।

 मारवाड़ में कल्ला रायमलोत को लोकदेवता के रूप में पूजा जाता है। सिवाना के दुर्ग में इनका थान बना हुआ है। अब यहाँ पर एक समारोह भी होता है। कल्ला रायमलोत का सिर कट जाने पर भी कल्ला का धड़ लड़ता रहा। इसलिये इन्हें लोकदेवता के समान पूजा जाता है।

सिवाना के दुर्ग में इनका थान बना हुआ है जहाँ प्रतिवर्ष एक समारोह होता है। चित्तौड़ दुर्ग में वीरगति प्राप्त करने वाले कल्ला राठौड़ का इतिहास हम पहले ही बता चुके हैं। बहुत से लोग इन दोनों कल्ला राठौड़ों को भ्रमवश एक ही समझ बैठते हैं।                                    

मुताह (159)

0
मुताह - www.bharatkaitihas.com
मुताह

मध्य एशियाई मंगोलों की संस्कृति में शरीर की भूख मिटाने के लिए किसी भी औरत से बनाए गए शारीरिक सम्बन्ध को मुताह कहते थे। अकबर ने नियम बनाया कि कितनी ही लौंडियों को मुताह करके बीवी बनाया जा सकता है!

 मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने लिखा है कि आजकल अकबर जिन प्रश्नों को पूछा करता था उनमें पहला यह था कि कितनी स्वतंत्र पैदा औरतों से एक आदमी निकाह कर सकता है? अकबर का दूसरा प्रश्न यह था कि क्या मुताह से की गई शादी वैध है? स्वतंत्र पैदा औरतों से अकबर का आशय ऐसी औरतों से था जो न तो स्वयं किसी की गुलाम थीं और न किसी गुलाम माता-पिता की संतान के रूप में उत्पन्न हुई थीं।

मध्यकाल में अरब के लोगों में गुलाम-दम्पत्तियों की पुत्रियों एवं गुलाम औरतों को पत्नी के रूप में भोगने का चलन था और उसे निकाह की सीमा से बाहर माना जाता था। कुछ लोग ऐसी औरतों से मुताह के माध्यम से शादी कर लेते थे और उन्हें अपनी पत्नी के रूप में भोगते थे। ‘मुताह’ मध्यएशियाई भाषाओं अर्थात् अरबी, फारसी एवं चगताई आदि किसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है- ‘आनंद’ अथवा ‘मज़ा’। अर्थात् अपनी पत्नी के अलावा किसी अन्य औरत के साथ शारीरिक सम्बन्धों का आनंद उठाने के लिए मुताह किया जाता था।

चूंकि इस्लाम में वेश्यावृत्ति हराम है, किसी औरत का जिस्म बेचने या खरीदने पर पाबंदी है तथा निकाह के अलावा किसी भी तरह के शारीरिक-सम्बन्ध को ‘गुनाह’ अथवा पाप माना जाता है। इसलिए अवैध शारीरिक सम्बन्धों को मुताह का आवरण दिया गया ताकि इसे वेश्यावृत्ति से अलग किया जा सके। मुताह को मिस्यार निकाह भी कहा जाता था।

मुताह एक तरह की कॉन्ट्रैक्ट मैरिज होती थी जिसमें एक निश्चित समय के लिए, मेहर की मोटी रकम तय करके निकाह होता था। इसमें मेहर का भुगतान शादी से पहले किया जाता था। मुताह की अवधि तीन दिन से लेकर कितने ही वक्फे हो सकती थी। एक बार मियाद तय होने के बाद वह बदली नहीं जा सकती थी। मुताह मौखिक एवं लिखित दोनों तरह से तय हो सकता था। यह परम्परा मुख्यतः शिया मुसलमानों में प्रचलित थी जबकि सुन्नी इसका विरोध करते थे।

मुताह के द्वारा जिस औरत से विवाह किया जाता था उसे पवित्र होना, मुस्लिम होना, अहले किताब होना तथा अविवाहित, विधवा अथवा तलाकशुदा होना आवश्यक था। शादीशुदा, व्यभिचार में लिप्त तथा नाबालिग औरतों से मुताह नहीं किया जा सकता था। मुताह करने वाला मर्द किसी भी उम्र का, पहले से शादी-शुदा एवं कुंआरा हो सकता था। मुताह की अवधि समाप्त होते ही वह औरत उस मर्द की बीवी के रूप में नहीं रह सकती थी। हालांकि मुताह की अवधि बीत जाने पर भी मर्द उन औरतों को भोगते रहते थे। मुताह के दौरान उत्पन्न हुए बच्चे नाजायज औलाद माने जाते थे। उन्हें अपने पिता की सम्पत्ति में से कुछ नहीं मिलता था।

ऐसा प्रतीत होता है कि मुताह की परम्परा यतीम एवं बेवा औरतों, गुलाम लौण्डियाओं एवं दूसरे देशों से लूटकर लाई गई औरतों को भोगने के लिए आरम्भ हुई थी। उस काल में मध्यएशियाई कबीलों के बीच हर समय युद्ध चला करते थे जिनमें बड़ी संख्या में लड़ाकों की मृत्यु होती थी। इस कारण कबीलों में बड़ी संख्या में पति-विहीन एवं यतीम औरतें रहती थीं। बहुत से लोग उनसे कुछ समय के लिए विवाह कर लेते थे ताकि उनकी सैक्स सम्बन्धी इच्छाओं को पूरा किया जा सके और उन्हें रोटी-पानी तथा आश्रय दिया जा सके।

जब अरब वालों ने मध्यएशियाई क्षेत्रों पर कब्जा किया तो मुताह की परम्परा अरब से मध्य एशिया में आ गई। जब मध्य एशियाई कबीले हिन्दूकुश पर्वत पार करके भारत में घुस आए तो मुताह की परम्परा उनके साथ भारत आ गई। बहुत से मुस्लिम अमीर एवं धनी लोग मनचाही संख्या में औरतों से मुताह करके उन्हें अपने हरम में रखते थे।

कानूनन स्वयं अकबर की भी चार बीवियां ही हो सकती थीं किंतु अकबर के हरम में पांच हजार औरतें थीं। अकबर ने उलेमाओं से पूछा कि मैंने अपनी जवानी के आरम्भ में जितनी चाही, उतनी शादियां कीं, स्वतंत्र पैदा या गुलाम, दोनों तरह की औरतों से। क्या मेरी इन शादियों को वैध घोषित किया जा सकता है?

अकबर के दरबारियों ने इस प्रश्न का उत्तर अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार दिया किंतु अकबर उनके उत्तरों से संतुष्ट नहीं हुआ। अकबर ने अपने दरबारियों से कहा कि अब्दुन्नबी ने एक बार कहा था कि एक मुज्तहिद अर्थात् इस्लामी कानून के व्याख्याकार ने नौ शादियों की अनुमति दी है।

मुल्ला बदायूंनी ने मुंतखब उत तवारीख में लिखा है कि जो लोग कुरान की उदारवादी व्याख्या करना चाहते थे, उन्होंने शहंशाह को बताया कि कोई भी व्यक्ति 18 शादियां कर सकता है। कुछ लोगों ने बादशाह को बताया कि कितनी ही औरतों से निकाह करो, दो और दो, तीन और तीन, चार और चार किंतु यह व्याख्या नकार दी गई।

कुछ लोगों का मानना था कि एक व्यक्ति को उतनी औरतों से शादी करनी चाहिए जितनी औरतों की औलादों का वह भरण-पोषण कर सके। इन लोगों के अनुसार एक आदमी को बीवियों की संख्या सीमित रखकर यतीम लड़कियों अथवा खरीदी हुई लड़कियों पर संतोष करना चाहिए। अर्थात् निकाह कम संख्या में और मुताह अधिक संख्या में करना चाहिए।

इस प्रकार अलग-अलग व्याख्याओं के चलते अकबर यह नहीं समझ पाया कि वह अपनी रियाया के लिए इस सम्बन्ध में क्या आदेश जारी करे! इसलिए अकबर ने अब्दुन्नबी के पास संदेश भिजवाया कि वह स्पष्ट करे कि वह शादी के मामले में कितनी औरतों की बात करता है?

Teesra-Mughal-Jalaluddin-Muhammad-Akbar
To Purchase This Book Please Click On Image

अब्दुन्नबी ने शहंशाह को जवाब भिजवाया कि मैं तो केवल इतना कहना चाहता था कि एक मुसलमान कितनी शादियां करे, इसके सम्बन्ध में वकीलों की राय अलग-अलग है। बादशाह चाहता था कि अब्दुन्नबी निश्चित संख्या बताए किंतु अब्दुन्नबी ने इस सम्बन्ध में कोई फतवा जारी नहीं किया जिससे बादशाह की शादियां वैध हो जाएं। अब्दुन्नबी के इस जवाब से अकबर बहुत नाराज हुआ।

मुल्ला बदायूंनी लिखता है कि बहुत विचार-विमर्श एवं इस विषय पर बहुत से पंथों के रिवाज देखकर उलेमाओं ने यह निर्णय पारित किया कि मुताह के माध्यम से एक व्यक्ति चाहे जितनी शादियां कर सकता है। उलेमाओं ने यह भी निर्णय दिया कि मुताह के माध्यम से की गई शादियों को इमाम मलिक द्वारा वैध घोषित किया गया है। एक दरबारी ने अकबर के सामने ‘मुवत्ता’ शीर्षक से लिखी गई एक पुस्तक प्रस्तुत की जिसमें इमाम ने मुताह से की गई शादी को अवैध घोषित किया था।

मुल्ला बदायूंनी ने लिखा है कि शिया लोग अपनी निकाह-शुदा बीवियों से उत्पन्न बच्चों की बजाय उन बच्चों से अधिक प्रेम करते हैं जो मुताह वाली बीवियों से पैदा हुए हैं। सुन्नियों में अथवा अहले-जमात में यह स्थिति उलटी है।

अकबर ने अबुल फजल के पिता शेख मुबारक को आदेश दिया कि वह विभिन्न पंथों, मजहबों एवं धर्मों में प्रचलित मान्यताओं एवं रीति-रिवाजों को एकत्रित करके उन्हें कागज पर लिखकर बादशाह के समक्ष प्रस्तुत करे।

जब शेख मुबारक ने यह कागज तैयार करके अकबर को दे दिया तो अकबर ने एक शाम को अबुल फजल, काजी याकूब, हाजी इब्राहीम तथा मुल्ला बदायूंनी सहित अनेक उलेमाओं को इबादतखाने में बुलाया और उनके समक्ष वह कागज रखा। बादशाह ने उन उलेमाओं से पूछा कि अब वे बताएं कि एक व्यक्ति को कितनी शादियां करनी चाहिए और मुताह से की गई शादी वैध है या अवैध?

सबने अपनी-अपनी राय व्यक्त की। मुल्ला बदायूंनी ने अकबर से कहा कि विभिन्न पंथों एवं मजहबों में इस विषय पर अलग-अलग राय व्यक्त की गई है किंतु इमाम मालिक तथा शिया मत इस बारे में एकमत हैं कि मुताह एक वैध विवाह है। जबकि इमाम शाफीई और बड़े इमाम हनीफाह इसे अवैध मानते हैं।

मुल्ला ने कहा कि मेरा मानना है कि अधिकांश लोगों में यह विश्वास है कि मुताह से की गई शादी वैध है। अतः इसे वैध मानना चाहिए, इमाम और उलेमा इस सम्बन्ध में क्या राय रखते हैं, इसे छोड़ देना चाहिए।

मुल्ला बदायूंनी ने लिखा है कि मेरे इस जवाब से अकबर बहुत प्रसन्न हुआ। काजी हुसैन ने भी इस मत को स्वीकार कर लिया तथा मुताह से की गई शादी को वैध घोषित किया। अकबर ने भी इसी मत को स्वीकार कर लिया। ऐसा करने से ही उसकी हजारों औरतें जो अकबर के हरम में रोटी-पानी और आश्रय पाती थीं और अकबर की सैक्स सम्बन्धी भूख मिटाती थीं, वैध कही जा सकती थीं।

बहुत से मुल्लाओं ने अकबर के इस आदेश का विरोध किया किंतु जिन मुल्लाओं, उलेमाओं एवं काजियों ने इस मत का विरोध किया, अकबर ने उन्हें या तो उनके पदों से हटा दिया या फिर उन्हें दिल्ली एवं आगरा जैसे शहरों से दूर स्थानांतरित कर दिया।

कोट पर जनेऊ डालकर घूमने वाले से डरते हैं लोग!

0
कोट पर जनेऊ
कोट पर जनेऊ

भारत में कानून के दायरे में रहकर जिंदगी जीने वाला कोई भी व्यक्ति किसी से नहीं डरता किंतु कोट पर जनेऊ डालकर घूमने वाले से हर कोई डरता है! यह अनोखा क्रांतिकारी अमरीकियों से हमारी जाने क्या शिकायत कर आए, यह सोचकर हर कोई भयभीत रहता है।

राहुल गांधी ने अमरीका वालों से जाकर शिकायत की है कि भारत में सिक्ख पगड़ी नहीं पहन पा रहे हैं, कड़ा नहीं पहन पा रहे हैं, गुरुद्वारों में नहीं जा पा रहे हैं। अब पता नहीं अमरीका वाले भारत वालों को इस बात के लिए कितना डांटेंगे, फटकारेंगे, कितनी लानत-मलानत करेंगे और वित्तीय प्रतिबंध लगाएंगे! भारत के लोगों को डरना चाहिए, सचमुच!

समझ में नहीं आता कि जब इस देश में राहुल गांधी कोट पर जनेऊ ओढ़कर शिवमंदिरों में घुसे, तब भी उन्हें किसी ने नहीं रोका तो भला सिक्खों को उनके अपने देश भारत में पगड़ी बांधकर गुरुद्वारों में जाने से कौन रोक सकता है!

राहुल गांधी को शायद पता नहीं है कि प्रच्छन्न रूप से जिस हिन्दू जाति पर वे सिक्खों को पगड़ी नहीं पहनने देने का अरोप लगा रहे हैं, वस्तुतः वह हिन्दू जाति ही पगड़ी पहनकर सिक्ख बनी है। यह बात 325 साल से अधिक पुरानी नहीं है जब गुरु गोविंद सिंह ने पांच हिन्दुओं के सिरों पर पगड़ी बांधते हुए कहा था-

सकल जगत में खालसा पंथ गाजे। जगे धर्म हिन्दू तुरक धुंध भाजे।।

राहुल गांधी ने अमरीका वालों से जाकर यह भी कहा है कि अब भारत में लोग नरेन्द्र मोदी से नहीं डरते। जैसे ही 2024 के लोकसभा चुनावों के नतीजे आए, विदिन मिनिट्स लोगों का डर दूर हो गया। इसका श्रेय मुझे अर्थात् राहुल गांधी को नहीं जाता, इसका श्रेय कांग्रेस को और समस्त विपक्षी दलों को जाता है।

अरे भई एक ओर तो आप यह कह रहे हैं कि भारत में सिक्ख इतने डरे हुए हैं कि पगड़ी पहनकर गुरुद्वारों में नहीं जा पा रहे और दूसरी ही सांस में कह रहे हैं कि लोग अब नरेन्द्र मोदी से नहीं डर रहे!

पहले यह तो तय कर लीजिए कि लोग डर रहे हैं कि नहीं डर रहे! या केवल सिक्ख डर रहे हैं और बाकी लोगों का डर लोकसभा चुनावों के बाद दूर हो गया है क्योंकि कांग्रेस को 99 या 98 सीटें मिल गईं!

एक बात और समझ में नहीं आई कि लोग नरेन्द्र मोदी से क्यों डरेंगे? क्या कोई कानूनी दायरे में रहकर जीने वाला नागरिक अपने ही देश के प्रधानमंत्री से डरता है? प्रधानमंत्री तो देश के लोगों द्वारा ही चुना गया होता है। देश का प्रधानमंत्री तो देश के लोगों का संरक्षक होता है, हितैषी होता है और विश्वसनीय मित्र होता है। ऐसे व्यक्ति से लोग क्यों डरेंगे?

क्या भारत के लोग नरेन्द्र मोदी के पहले के किसी भी प्रधानमंत्री से डरते थे? जिस समय देश अंग्रेजों के अधीन था, उस समय भी भारत के लोग इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री रैम्से मैकडोनल्ड, चैम्बरलेन, विंस्टन चर्चिल और क्लेमेंट एटली आदि से नहीं डरते थे, तो भारत के लोग आजादी के 75 साल बाद नरेन्द्र मोदी से क्यों डरेंगे?

एक बार को यदि यह मान भी लिया जाए कि भारत के लोग अपने ही प्रधानमंत्री से डरे तो इसके केवल दो ही उदाहरण हैं, यदि सिक्ख डरे तो राजीव गांधी के शासन काल में और हिन्दू डरे तो केवल इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपात् काल में।

अब नरेन्द्र मोदी के शासन काल में कौन डर रहा है भाई! मुसलमान तो खुद कहते हैं कि हम किसी से नहीं डरते। यह तो केवल राहुल गांधी ही हैं जो कुछ दिन पहले तक यह कहते फिरते थे कि देश का मुसलमान डरा हुआ है। अगली ही सांस में यह भी कहते थे कि मैं नरेन्द्र मोदी से नहीं डरता।

समझ में नहीं आता कि वह कौनसा डर है जिसकी बात हर समय राहुल गांधी किसी न किसी बहाने से किया करते हैं! यह डर काले साये की भांति राहुल गांधी के अवचेतन पर नहीं तो कम से कम जिह्वा पर अवश्य आकर बैठ गया है। कहीं यह सत्ता से वंचित रह जाने का भय तो नहीं है?

संभवतः राहुल गांधी को भय है कि प्रधानमंत्री की जिस कुर्सी पर उनके पिता, दादी और दादी के पिता बरसों-बरस बैठे रहे, उस कुर्सी तक वे कभी नहीं पहुंच पाएंगे। कांग्रेस बुद्धिजीवियों की पार्टी है, क्या कोई राहुल गांधी को समझाएगा कि प्रधानमंत्री बनने के लिए क्या करना पड़ता है!

यदि आज तक राहुल गांधी प्रधानमंत्री की कुर्सी के कुछ नजदीक तक भी नहीं पहुंच पाए तो इसमें कोई क्या कर सकता है। वे बातें ही ऐसी अटपटी, और बचकानी करते हैं और विदेश में जाकर कहते हैं कि भारत में चुनाव निष्पक्ष नहीं होते। जब चुनाव निष्पक्ष होते ही नहीं है तो फिर राहुल अपने लिए कौनसा सुनहरा भविष्य देख रहे हैं?

एक बात और यदि इस देश का आदमी किसी से डरा हुआ है तो केवल उस आदमी से डरा हुआ है जो कोट पर जनेऊ डालकर अपने आप को दत्तात्रेय गोत्र का ब्राह्मण बताता है और मुसलमानों एवं दलितों का स्वघोषित नेता बनता है। यदि किसी का दिल दलितों के लिए वाकई धड़कता है है तो वह स्वयं को दत्तात्रेय ब्राह्मण घोषित क्यों करता है?

जब अपनी जाति अपनी मर्जी से ही घोषित करनी है तो स्वयं को दलित घोषित क्यों नहीं करते? क्या इसमें वे अपना अपमान समझते हैं? जब भारत में कोई व्यक्ति कोट पर जनेऊ डालकर स्वयं को ब्राह्मण बता सकता है तो स्वयं को दलित क्यों नहीं बता सकता!

आजकल तो वैसे भी हिन्दू तीर्थों पर बड़ी संख्या में रोहिंग्या मुसलमान गले में जनेऊ डालकर बैठ गए हैं, वे शायद कोट पर जनेऊ डालकर नहीं बैठ सकते! यदि भारत के लोग वाकई में किसी से डरे हुए हैं तो हिन्दू तीर्थों में बैठे इन जनेऊ धारी रोहिंग्याओं से डरे हुए हैं। कोट पर जनेऊ पहनने वालों से तो एक-दो चुनावों के बाद पीछा छूट जाएगा किंतु इन जनेऊ धारी रोहिंग्याओं से पीछा जाने कैसे और कब छूटेगा!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मोहन भागवत आखिर चाहते क्या हैं?

0
मोहन भागवत - www.bharatkaitihas.com
मोहन भागवत एवं नरेन्द्र मोदी

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत की बात करने से पहले एक छोटी सी कहानी।

तीर्थयात्रा पर जा रहे एक वृद्ध दम्पत्ति भोजन करने के लिए एक ढाबे में आए। उन्होंने एक थाली भोजन मंगवाया। पहले पति ने भोजन किया और उनकी वृद्धा पत्नी पंखा झलती रहीं। जब पति भोजन कर चुके तो पत्नी ने भोजन आरम्भ किया तथा वृद्ध पति पंखा झलने लगे। ढाबे का स्वामी वृद्ध-दम्पत्ति के इस प्रेम भाव को देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ और बोला- महाशय आप लोगों का जीवन धन्य है, इस आयु में भी आपके जीवन में इतना प्रेम है! पति ने मुस्कुराते हुए कहा कि प्रेम-व्रेम तो जो है सो है, किंतु कुछ मजबूरी भी है। हमारे पास दांतों का सैट एक ही है।

इस छोटी सी कहानी के बाद मैं आरएसएस और बीजेपी पर आता हूँ और उसके बाद मोहन भागवत पर आऊंगा। आरएसएस और बीजेपी का सम्बन्ध पति-पत्नी वाला नहीं है अपितु माँ-बेटे जैसा है। संघ के हृदय से बीजेपी प्रकट हुई है। इन दोनों के पास भी दांतों का एक ही सैट है। दांतों के इस सैट का नाम है- हिन्दुत्व। 

आएसएस ने बीजेपी को जन्म ही नहीं दिया अपितु पाल-पोस कर इतना बड़ा भी किया कि बीजेपी अटल बिहारी वाजपेयी के समय में आठ साल तक देश पर शासन कर चुकी है तथा नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश पर विगत साढ़े दस साल से शासन कर रही है।

अटल बिहारी वाजपेयी तो पूरे आठ साल गठनबंधन की सरकार होने का हवाला देकर देश में एक भी ऐसा काम नहीं कर सके जिसके कारण इतिहास उन्हें याद रख सके किंतु उस सरकार की इतनी उपलब्धि अवश्य थी कि उसने पूरे आठ साल तक ताकतवर राजनीतिक जोंकों को देश का रक्त नहीं चूसने दिया।

अपने अब तक के कार्यकाल में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार ने बहुत से ऐसे काम किए हैं जिनके लिये उसे इतिहास में याद किया जाएगा। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाई। लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग किया। राममंदिर का भव्य निर्माण करवाया। कोरोना के संकट से सबसे पहले उबरने वाला देश भारत ही था जिसके कारण करोड़ों लोगों का जीवन बचा।

नरेन्द्र मोदी सरकार ने वैश्विक स्तर पर भारत की छवि शक्तिशाली देश के रूप में स्थापित की। देश की अर्थव्यवस्था को संसार भर की आर्थिक शक्तियों की पंक्ति में लाकर खड़ा किया। रूस-यूक्रेन युद्ध में स्वयं को पूरी तरह अंतर्राष्ट्रीय दबावों से मुक्त रखा।

नरेन्द्र मोदी सरकार ने अमरीका के लाख विरोधी प्रयासों के बावजूद रूस से सस्ता तेल खरीद कर भारत के अरबों रुपए बचाए। जो बाइडेन ने क्वार्ड की आड़ में लाख प्रयास किया कि भारत चीन से भिड़ जाए किंतु नरेन्द्र मोदी सरकार ने चीन को बिना युद्ध किए ही अपनी सीमाओं पर नियंत्रित किया तथा भारत-पाकिस्तान के बीच चलने वाली रेल एवं बस सेवाओं तथा व्यापार को बंद करके, शत्रुवत् व्यवहार कर रहे पाकिस्तान के हाथ में भीख का कटोरा थमा दिया।

नरेन्द्र मोदी सरकार ने वंदे भारत जैसी शानदार ट्रेनें चलाईं। चौदह नए एम्स बनाए। घर-घर शौचालय बनवाए। साढ़े तीन करोड़ परिवारों को पक्के घर दिलवाए। देश के 140 करोड़ लोगों में से 80 करोड़ लोगों को निःशुल्क राशन उपलब्ध करवाया तथा एक करोड़ निर्धन परिवारों को निशुल्क गैस कनैक्शन दिए।

जन-धन योजना, किसानों को सब्सीडी, युवाओं को रोजगार आदि-आदि की बात करें तो बात लम्बी हो जाएगी किंतु इन शानदार उपलब्धियों के समक्ष, नरेन्द्र मोदी से पहले की सरकारें बहुत बौनी दिखाई देती हैं।

आज उत्तर प्रदेश में आदित्यनाथ योगी, असम में हेमंत बिस्वा, राजस्थान में भजनलाल शर्मा तथा मध्यप्रदेश में मोहन यादव की सरकारें अपराधियों के अवैध घरों पर बुलडोजर चला रही हैं, तो उनके पीछे भी नरेन्द्र मोदी सरकार का ही वरद हस्त है। अन्यथा बीजेपी शासित राज्यों में ऐसी कार्यवाहियां कदापि संभव नहीं थीं।

आदित्यनाथ योगी के शासन में उत्तर प्रदेश पुलिससाढ़े तेरह हजार से अधिक एनकाउंटर कर चुकी है। क्या केन्द्र सरकार के सहयोग एवं समर्थन के बिना कोई राज्य सरकार ऐसा साहसिक कार्य कर सकती थी!

उज्जैन मंदिर परिसर का विस्तार एवं सौंदर्यीकरण, वाराणसी मंदिर का उद्धार एवं विस्तार, केदारनाथ मंदिर का विकास आदि जैसे महत्वपूर्ण कार्य भी नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में उन प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों द्वारा किए गए।

गुजरात के काण्डला पोर्ट के आस-पास सैंकड़ों एकड़ जमीन पर किए गए कब्जे, भेंट द्वारिका में बनाई गई अवैध मजारें और मस्जिदें, उत्तराखण्ड में सरकारी भूमियों पर बनाई गई मजारें और मस्जिदें, द्वारिका में मुसलमान नाव चालकों द्वारा हिन्दू तीर्थयात्रियों पर की जा रही मनमानियों आदि को रोकने के काम बीजेपी की प्रदेश सरकारों द्वारा किए गए हैं।

इतनी सारी उपलब्धियों के बावजूद देश का एक बड़ा वर्ग नरेन्द्र मोदी से नाराज है। कोई जीएसटी को लेकर दुखी है, कोई रेल किराए में वृद्धजनों को मिलने वाली छूट के बंद होने से दुखी है, कोई बैंक खातों में ब्याज दरों के कम होने से दुखी है। कोई आयकर में छूट की वृद्धि से असंतुष्ट है। कुछ लोग टोल नाकों पर हो रही वसूली से नाराज हैं।

बहुत से लोग तो इसलिए दुखी हैं कि नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा चलाई गई व्यक्तिगत लाभ की योजनाओं का अधिकांश लाभ उन लोगों ने लूट लिया जो कभी भी बीजेपी को वोट नहीं देते। बहुत से लोग इसलिए दुखी हैं कि नरेन्द्र मोदी सरकार ने ममता बनर्जी की सरकार को बर्खास्त नहीं किया।

बहुत से लोग इसलिए भी नरेन्द्र मोदी से नाराज हैं कि राहुल गांधी, सोनिया गांधी एवं प्रियंका वाड्रा को नेशनल हेराल्ड आदि प्रकरणों में जेल में बंद नहीं किया गया। रॉबर्ट वाड्रा पर बॉर्डर पर भूमि खरीदने के मामले में भी कार्यवाही नहीं हुई।

कुछ बड़े मुद्दे भी हैं जिन पर नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा कार्यवाही किए जाने की अपेक्षा बीजेपी के प्रत्येक समर्थक को थी। वक्फ बोर्ड पर जो संशोधित कानून अब लाया गया है, वह पिछले दस सालों में क्यों नहीं आया? धर्मस्थलों के सम्बन्ध में नरसिम्हा राव सरकार द्वारा 1947 की स्थिति को बहाल रखने वाला कानून अब तक रद्द क्यों नहीं किया गया? संविधान से धर्मनिरपेक्ष एवं समाजवाद शब्द क्यों नहीं हटाए गए? आदि।

Hindutav - www.bharatkaitihas.com
To purchase the book please click on image.

आम जनता की नाराजगी की बातें समझ में आती हैं किंतु यह बात समझ में नहीं आती कि मोहन भागवत नरेन्द्र मोदी से क्यों नाराज हैं? क्यों वे बार-बार यह दोहराते हैं कि स्वयंसेवक को घमण्ड नहीं होना चाहिए। स्वयंसेवक को स्वयं को भगवान नहीं समझना चाहिए। स्वयंसेवक को जनता का सेवक होना चाहिए।

मोहन भागवत भले ही नाम न लें किंतु बीजेपी के समर्थकों एवं विरोधियों दोनों को समझ में आता है कि वह स्वयंसेवक कौन है जो मोहन भागवत की दृष्टि में घमण्डी हो गया है और स्वयं को भगवान समझने लगा है!

न तो नरेन्द्र मोदी ने कभी यह कहा कि मैं भगवान हूँ, न उन्होंने घमण्ड वाली ऐसी कोई बात कही, न उन्होंने कभी किसी सफलता का श्रेय स्वयं लिया। नरेन्द्र मोदी ने केवल इतना कहा कि भगवान की मुझ पर विशेष कृपा है और इस अच्छे कार्य के लिए भगवान ने मुझे चुना! मोदी और उनके समर्थक इतना अवश्य कहते हैं कि ये मोदी की गारण्टी है! मोदी है तो मुमकिन है! ये जुमले जनता का विश्वास जीतने के लिए गढ़े गये हैं न कि मोदी के घमण्ड का प्रदर्शन करने के लिए!

जनता इतना अवश्य समझती है कि एक ओर नरेन्द्र मोदी हैं जो संसद में खड़े होकर कहते हैं कि अब सनातन को भी (अपनी सुरक्षा के लिए) सोचना पड़ेगा और दूसरी ओर भागवत हैं जो कहते हैं कि सब अपने हैं और सब हिन्दू हैं। सबका डीएनए एक है और भारत में रहने वाले सब हिन्दू हैं। यदि मोहन भागवत की बात सही है तो फिर देश में आए दिन दंगे क्यों होते हैं?

समझ नहीं आता कि मोहन भागवत आखिर चाहते क्या हैं? वे साफ-साफ क्यों नहीं कह देते? ऐसा तो नहीं हो सकता कि मोहन भागवत यह न समझ सकें कि उनके मुख से निकले शब्दों से जनता में क्या संदेश जा रहा है! फिर वे इस ओर से सतर्क क्यों नहीं हैं?

आरएसएस के स्वयंसेवक जब भी मोहन भागवत का नाम लेते हैं तो उन्हें परम पूज्य कहते हैं। क्या यह अहंकार नहीं है, क्या संतों और महात्माओं के अतिरिक्त और कोई पूज्य अथवा परम पूज्य होता है? मोहन भागवत से तो किसी ने नहीं कहा कि आप स्वयं को परम पूज्य कहने वालों को ऐसा कहने से क्यों नहीं रोकते!

मोहन भागवत यह अवश्य ही समझते होंगे कि आज के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत से अधिक लोकप्रिय हैं। यदि उन्होंने मोदी की छवि को नुक्सान पहुंचाया तो उस नुक्सान का कुछ हिस्सा स्वयं मोहन भागवत के हिस्से में भी आएगा, क्योंकि आखिर दोनों के पास दांतों का तो एक ही सैट है- हिन्दुत्व।

मोहन भागवत और नरेन्द्र मोदी को दांतों के इस सैट की सुरक्षा मिलकर करनी चाहिए। दांतों का यह सैट केवल उन दोनों की ही सम्पत्ति नहीं है, भारत की धर्मप्राण हिन्दू जनता के पास भी दांतों का केवल यही एक सैट है। यदि आरएसएस एवं बीजेपी के मुखियाओं की लड़ाई से हिन्दुत्व के पुनः गौरव प्राप्त करने के अभियान को क्षति पहुंची तो किसी के पास कुछ नहीं बच पाएगा!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रेल कर्मचारी हैं कि अराजक तत्व!

0
रेल कर्मचारी - www.bharatkaitihas.com
वंदे भारत ट्रेन को हरी झण्डी दिखाते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

इन दिनों आगरा एवं गंगापुर सिटी मण्डलों के रेल कर्मचारी उदयपुर-आगरा कैंट वंदे भारत ट्रेन के संचालन को लेकर आपस में जो मारपीट कर रहे हैं, उसने संसार के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान भारतीय रेल की संस्कृति का सिर शर्म से झुका देने जैसा काम किया है। यह मारपीट कई दिनों से चल रही है।

रेल मण्डलों के कर्मचारियों के बीच ट्रेनों के संचालन को लेकर विवाद की घटनाएं पहले भी होती थीं किंतु इस बार कुछ रेल कर्मचारी अपने ही साथियों के साथ ऐसी मारपीट कर रहे हैं, जिसके वीडियो देखकर हैरानी होती है!

अराजकता पर उतरे रेल कर्मचारियों ने 7 सितम्बर को अपने साथी रेलवे गार्ड के कपड़े फाड़कर और स्टेशन पर घसीट कर पीटा। रेल कर्मचारियों ने गार्ड एवं चालक के केबिन के कांच के शीशे और ताले भी तोड़ दिए। ये उद्दण्ड रेल कर्मचारी समझ रहे होंगे कि ऐसा करके उन्होंने अपनी बहादुरी का परिचय दिया किंतु ऐसी मारपीट तो गुण्डे किया करते हैं!

दोनों मण्डलों के रेल कर्मचारी चाहते हैं कि इस रेल का संचालन उनके पास रहे। संभव है कि दोनों तरफ के कर्मचारियों के अपने-अपने कुछ मुद्दे हों किंतु उन्हें सुलझाने के लिए क्या मारपीट और तोड़फोड़ के ही तरीके बचे हैं! जब रेल के भीतर ही रेल कर्मचारी सुरक्षित नहीं रहेंगे तो कहाँ रहेंगे?

रेल-कर्मचारियों के लिए रेल उतनी ही आदरणीय है जितनी कि किसी व्यक्ति की माँ होती है। भारतीय रेल, कर्मचारी और उसके परिवार का पेट भरने वाली माँ नहीं तो और क्या है? क्या कोई अपनी माँ को क्षति पहुंचाता है? क्या कोई कर्मचारी किसी के कपड़े फाड़ता है? क्या सभ्य समझ में ऐसी हरकतें सहन की जा सकती हैं?

रेल कर्मचारी भारत में सबसे अधिक अनुशासित कर्मचारियों में माने जाते हैं। ये लोग घड़ी देखकर जीवन जीने के अभ्यस्त होते हैं। उनके प्रत्येक कार्य में अनुशासन इस तरह घुल जाता है जिस तरह फूल में सुगंध। आगरा एवं गंगापुर सिटी के संचालन को लेकर मारपीट और तोड़-फोड़ कर रहे कर्मचारी फूल और सुगंध दोनों को कुचल रहे हैं।

भारतीय रेल एक अखिल भारतीय संस्थान है, इसमें क्षेत्रीयता, प्रादेशिकता, भाषा, जाति जैसी संकीर्णताएं नहीं हैं। इसी कारण भारतीय रेल ने पूरे संसार में अपनी अलग पहचान बनाई है। रेल कर्मचारियों ने तो अपने प्राणों की बाजी लगाकर भारतीय सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाया है तथा अपने देश की रक्षा की है। गडरा रोड का स्मारक ऐसी गौरवमयी घटनाओं के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

रेल को क्षतिग्रस्त करके इन रेलकर्मचारियों ने अपनी घिनौनी प्रवृत्ति का परिचय दिया है। रेल कर्मचारी, रेल का मालिक नहीं है, रेल का नौकर है। क्या नौकर अपने मालिक पर हाथ उठाता है? क्या ऐसा काम करने वाला रेल कर्मचारी अपने लिए किसी भी पक्ष की भी सहानुभूति की आशा कर सकता है?

अनुशासनहीन एवं अराजकता के स्तर तक उद्दण्ड हो चुके रेल कर्मचारियों को तुंरत सेवा से बर्खास्त किया जाना चाहिए तथा रेलवे स्टेशन पर उत्पात मचाने के अपराध में जेल भी भेजा जाना चाहिए।

भारतीय रेल के संवर्द्धन एवं संरक्षण में रेलवे बोर्ड की बड़ी भूमिका रही है। इसका गठन बहुत मजबूत विधायी शक्तियों के साथ हुआ है। इन्हीं शक्तियों के बल पर रेलवे बोर्ड संसार के सबसे बड़ी संख्या वाले कर्मचारी संस्थान का संचालन बिना किसी बाधा के करता है।

रेलवे बोर्ड की मजबूती का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि आजादी के बाद बहुत से राजनेताओं ने रेलवे बोर्ड को कमजोर करके इसमें राजनीति के छल-कपट घुसाने का प्रयास किया किंतु उनके सभी प्रयास असफल रहे। आशा की जानी चाहिए कि रेलवे बोर्ड कर्मचारियों की उद्दण्डता से सख्ती से निबटेगा ताकि रेलवे की संस्कृति की सर्वोच्चता बनी रहे।

रेलवे प्रबंधन के साथ-साथ रेलवे यूनियन्स को भी इस ओर ध्यान देना चाहिए कि कैसे रेल कर्मचारी अनुशासन में रहें, कैसे वे रेल की शान को संसार में सबसे ऊपर रखें, कैसे वे स्वयं गरिमामय जीवन जिएं तथा कैसे वे अपने जीवन को जनता की सेवा में समर्पित करके एक पुष्प की तरह महकें।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जातीय जगनणना में दूर खड़ी मुस्कुराएंगी सवर्ण जातियाँ !

0
जातीय जगनणना - bharatkaitihas.com
जातीय जगनणना - उल्टा पड़ेगा दांव!

जातीय जगनणना से पहले सवर्ण जातियों में जो बेचैनी दिखाई दे रही है, वह शीघ्र उन जातियों में स्थानांतरित हो जाएगी जो जातीय जगनणना के परिणाम स्वरूप किसी बड़े लाभ का गणित लगा रही हैं!

एक पुरानी कहावत है- भुस में आग लगाय, जमालो दूर खड़ी मुसकाय। जमालो तब तक ही मुस्कुरा सकती है जब तक वह दूसरों के भूसे में आग लगाती है। इस बार जमालो ने ओवर कॉन्फिडेंस में अपने ही भूसे में आग लगा ली है। अब जमालो नहीं मुस्कुराएगी, वह पछताएगी और पूरा गांव दूर खड़ा होकर जमालो का तमाशा देखेगा!

ऐसा ही कुछ हाल जातीय जगनणना वाले मामले में कांग्रेस का होने वाला है। कांग्रेस पिछले कुछ सालों से जातीय जनगणना के भूसे में आग लगाने का प्रयास कर रही है। अब ऐसा लग रहा है कि पूरा गांव भूसे में आग लगाने को तैयार है। पता नहीं क्यों कांग्रेस इस बात की अनदेखी कर रही है कि जिस भूसे में आग लगने वाली है, उससे कांग्रेस का ही सबसे अधिक नुक्सान होने वाला है!

लोकसभा चुनाव 2024 में दलित जातियां, पिछड़ी जातियां और मुसलमान वोटर जिस बड़ी संख्या में कांग्रेस के साथ जुड़ा, उससे कांग्रेस को लगता है कि जातीय जनगणना के मुद्दे को उछाल कर कांग्रेस 52 से 99 पर पहुंची है। संभवतः इसीलिए कांग्रेस ने जातीय जनगणना के मुद्दे को कस कर पकड़ लिया।

कांग्रेस को लगता था कि सरकार कभी भी जातीय जनगणना के लिए तैयार नहीं होगी और कांग्रेस इस मुद्दे को भुनाकर 99 से 272 पर पहुंच जाएगी किंतु दांव उलटा भी पड़ सकता है, ऐसा कांग्रेस ने क्यों नहीं सोचा?

भाजपा अब तक इस मुद्दे पर असमंजस में थी कि कहीं इससे समाज में जातीय वैमनस्य न फैल जाए किंतु अब लगता है कि भाजपा ने कांग्रेस के हाथ से यह मुद्दा छीनने के लिए जातीय जनगणना करवाने का मन बना लिया है।

जातीय जनगणना से सवर्ण जातियों को कुछ फर्क तो पड़ेगा किंतु अधिक फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि उन्हें पता है कि उनकी संख्या देश में एक तिहाई से अधिक नहीं है। वैसे भी अब पढ़ा-लिखा सवर्ण युवा सरकारी नौकरी में नहीं जाता, प्राइवेट सैक्टर के पैकेज के पीछे भागता है।

जातीय जनगणना से फर्क उन जातियों को पड़ेगा जो विगत कुछ दशकों से आरक्षण की मलाई खाती आ रही हैं। जातीय जनगणना के बाद इस मलाई पर वे जातियां हक जताएंगी जो आरक्षण में रहकर भी इसका कोई लाभ नहीं उठा सकी हैं। उन्हें आरक्षण के नाम पर बुरी तरह से ठगा गया है।

मनमोहनसिंह सरकार द्वारा करवाए गए आर्थिक सर्वेक्षण में 37 लाख से अधिक जातियों की सूची बनाई गई थी। यदि जातीय जनगणना के नाम पर फिर से वैसी ही एक नई सूची बनवाई जाए तो जातीय जनगणना का कोई अर्थ नहीं होगा।

अतः बहुत अधिक संभावना है कि जब किसी परिवार की जाति लिखी जाएगी तो अगले कॉलमों में यह भी लिखा जाए कि उस परिवार के पास भूमि कितनी है, भैंसें कितनी हैं, वाहन कितने हैं, ट्रैक्टर कितने हैं, मकान कितने हैं, सरकारी नौकरियों में सदस्य कितने हैं?

जैसे ही यह सूची तैयार होकर सामने आएगी, वैसे ही उन आरक्षित जातियों के भीतर बेचैनी उत्पन्न होगी जिनके पास कोई भूमि, भैंस, ट्रैक्टर वाहन, मकान और नौकरी आदि नहीं होंगे। वे अपने लिए कोटा के भीतर कोटा और क्रीमी लेयर जैसी मांगें करेंगे जिनके लिए सुप्रीम कोर्ट पहले से ही अपनी राय व्यक्त कर चुका है और कुछ निर्देश भी दे चुका है।

अब तक दलित वर्ग में आरक्षण का बड़ा हिस्सा खा रहीं यूपी की जाटव और बिहार की पासवान जैसी जातियां, जनजाति वर्ग में मीणा, ओबीसी वर्ग में कुर्मी और यादव जैसी जातियां, राजस्थान में जाट, माली और चारण जैसी जातियाँ संभवतः आरक्षण का वैसा लाभ न ले सकें जैसा वे अब तक लेती आई हैं।

वैसे भी अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल यादव, जाट, मीणा, माली चारण, आदि बहुत सी जातियाँ उच्च वर्ण जातियां हैं, सामाजिक एवं आर्थिक आधार पर वे ठीक वैसी ही है जैसी कायस्थ, राजपुरोहित, या अन्य पढ़ी-लिखी एवं सम्पन्न जातियां हैं। यादव, जाट, मीणा, माली, चारण में से एक भी जाति ऐसी नहीं है जिन्हें आजादी से पहले या बाद में, सवर्ण समाज अपने साथ बैठाकर भोजन नहीं करता था अथवा उनके घर भोजन करने नहीं जाता था।

दलित एवं ओबीसी वर्ग की जिन जातियों से लोग मुख्यंत्री, प्रधानमंत्री, राज्यपाल एवं राष्ट्रपति बनते हैं, वे पिछड़े हुए कैसे हो सकते हैं! क्योंकि इन पदों के लिए कोई आरक्षण नहीं है!

दूसरी ओर दलित वर्ग को ही लें, इनके भीतर की स्थिति ऐसी है कि यदि बिहार की पासवान जाति की तुलना मुसहरा जाति से की जाए तो पासवान की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति मुसहरे की तुलना में वैसी ही है जैसे अम्बानी और अडाणी के कारखानों के सामने पेड़ के नीचे बैठकर दांतुन बेचने वाला लड़का।

राजस्थान सरकार द्वारा वर्ष 2012 में पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व जांचने के लिये करवाए गए सर्वे के अनुसार राज्य में 23 पिछड़ी जातियों का एक भी सदस्य सरकारी नौकरी में नहीं था। इन जातियों के नाम इस प्रकार थे- गाड़िया लोहार, बागरिया, हेला मोगिया, न्यारिया, पटवा, सतिया-सिंधी, सिकलीगर, बंदूकसाज सिरकीवाल, तमोली, जागरी, लोढ़े-तंवर, खेरवा, कूंजड़ा, सपेरा, मदारी, बाजीगर, नट, खेलदार, चूनगर, राठ, मुल्तानी, मोची, कोतवाल तथा कोटवाल।

जातीय जगनणना के बाद ये जातियाँ सामने आएंगी और वे आरक्षित जातियों से अपने हिस्से का लाभ मांगेंगी। इस कारण आरिक्षत जातियों में बेचैनी उत्पन्न होगी। इस बेचैनी के जो भी परिणाम आगे निकलेंगे, उनके बारे में अभी से आकलन करना कठिन है किंतु इतना तय है कि कांग्रेस को इस जातीय जनगणना से कोई लाभ नहीं मिलेगा। अपितु यादव, कुर्मी, जाट, चारण, माली, जाटव, पासवान जैसी शक्तिशाली आरक्षित जातियां कांग्रेस का विरोध करेंगी।

यह भी संभव है कि ये शक्तिशाली आरक्षित जातियां जातीय जगनणना को रोकने का प्रयास करें अथवा उनके नतीजे सार्वजनिक न करने के लिए दबाव बनाएं। ठीक वैसे ही जैसे कांग्रेस ने कनार्टक में जो जातीय जनगणना करवाई उसके नतीजे आज तक सार्वजनिक नहीं किए गए।

बिहार में जो जातीय जगनणना हुई, उसका कोई लाभ किसी भी राजनीतिक दल को नहीं मिला। इस बार भी जातीय जगनाणना का लाभ किसी भी राजनीतिक दल को नहींं मिलेगा। यह ठीक वैसा ही होगा जैसे कि मण्डल आयोग की रिपोर्ट लागू करने का लाभ वी. वी. पी. सिंह और उनकी पार्टी को नहीं मिला! उनके साथ-साथ किसी और दल को भी नहीं मिला।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जातीय उन्माद के भंवर में फंस गई देश की कश्ती!

0
जातीय उन्माद - bharatkaitihas.com
जातीय उन्माद में फंसा भारत

क्या देश की कश्ती जातीय उन्माद के भंवर में फंस गई है! क्या जातीय जनगणना इस उन्माद का चरम है! या देश के समक्ष इससे भी बड़ा संकट मुंह बाए खड़ा है!

जिन दिनों देश को आजादी मिली थी, उन दिनों प्रदीप का गाया एक गीत बड़ा प्रसिद्ध हुआ था- हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चो संभाल के।

ऐसे संभाल कर रखा हमने आजादी की कश्ती को! आजादी मिले अभी सौ साल भी नहीं हुए हैं कि चारों ओर से जाति-जाति की पुकार सुनाई दे रही है। हर तरफ से आरक्षण का शोर है। हर तरफ बेरोजगारों की भीड़ खड़ी है और अपनी-अपनी जाति के नाम पर नौकरी मांग रही है।

राजनीतिक दलों ने कभी अजगर बनाकर, कभी एमवाई का नारा लगाकर तो कभी पीडीए बनाकर देश में जातिवाद का भयानक तूफान खड़ा कर दिया है।

मण्डल कमीशन लागू होने के बाद से देश की नैय्या दिन प्रति दिन जातियों के भंवर में गहरी धंसती जा रही है। बिहार, यूपी, हरियाणा, पंजाब एवं तमिलनाडू आदि विभिन्न प्रांतों में ताल ठोक रहे क्षेत्रीय दलों की तो उत्पत्ति ही जातीय वोटों के गणित पर हुई है।

लगभग समस्त क्षेत्रीय दलों को जीवन दान अर्थात् वोट और सत्ता जातीय उन्माद फैलाकर प्राप्त होते हैं किंतु अब तो देश पर दीर्घकाल तक शासन करने वाले कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल ने भी जातीय जनगणना के नाम पर जातीय उन्माद को बढ़ाना आरम्भ कर दिया है।

यह जातीय उन्माद हमें कहीं का नहीं छोड़ेगा। इस उन्माद के कारण हम एक दूसरे के दुश्मन जैसा व्यवहार करने लगे हैं। राजनीतिक दल एक दूसरे से लड़ें तो बात समझ में आती है कि इन्हें सत्ता छीननी है किंतु जातीय उन्माद में फंसकर जनता आपस में लड़-मर रही है। हम अपनी स्वाभाविक संस्कृति को भूलते जा रहे हैं।

आज देश में प्रत्येक जाति को आरक्षण चाहिए। ज्यादा से ज्यादा आरक्षण चाहिए। कोई दिमाग लगाने को तैयार नहीं है कि न केवल आरक्षण की अपितु सरकारी नौकरियों की भी एक सीमा है! इस समय जिन भी जातियों को कुल मिलाकर पचास प्रतिशत के आसपास आरक्षण मिला हुआ है, यदि केवल उन्हीं को सौ प्रतिशत आरक्षण दे दिया जाए तो क्या उन समुदायों के समस्त नौजवानों को नौकरियां मिल जाएंगी!

जाति आधारित आरक्षण का अर्थ है कि आरक्षित समुदाय के लोगों में उनकी जाति के कारण सामाजिक एवं आर्थिक समस्याएं उत्पन्न हुई हैं।

यदि जाति ही समस्या है तो देश में लाखों ब्राह्मण परिवार निर्धनता की रेखा से नीचे जीवन यापन क्यों कर रहे हैं? क्षत्रिय समुदाय के लाखों परिवार मजदूरी करके जीवन यापन क्यों कर रहे हैं? प्रतिवर्ष वैश्य जाति के लोग व्यापार में घाटा खाकर और कर्ज के जाल में फंसकर आत्महत्या क्यों कर रहे हैं?

प्राचीन हिन्दू समाज में जातियों का निर्माण व्यक्ति द्वारा किए जा रहे कार्य के आधार पर हुआ था। आजादी से पहले तक हम लोग अपनी जाति अथवा परिवार के द्वारा हजारों वर्षों से किए जा रहे कामों को करते आ रहे थे। उसी के आधार पर हम बढ़ई, सुनार, कुम्हार, मोची, तेली, नाई, दर्जी, महाजन, ब्राह्मण या राजपूत कहलाते थे।

आजादी के बाद इन सबका पैतृक व्यवसाय छुड़वाकर तथा जबर्दस्ती पढ़ा-पढ़ाकर नौकरियों की लाइनों में लगा दिया गया और जब अपेक्षित संख्या में नौकरियां नहीं मिलीं तो समाज में आरक्षण का भूत खड़ा किया गया।

अब तो आरएसएस ने भी जातीय जनगणना की आवश्यकता स्वीकार कर ली है। कुछ दिन पहले ही राहुल गांधी ने कहा था कि देश में जातीय जनगणना होगी, ऑर्डर आ गया है। राहुल गांधी कौनसे ऑर्डर की बात कर रहे थे!

कहा नहीं जा सकता कि जातीय जनगणना से कौनसी नई समस्याएं खड़ी होंगी क्योंकि हिन्दू समाज को जातियों के नाम पर लड़वाने का अधिकांश काम तो पहले ही पूरा हो चुका है। अब तो एस सी को एस सी से, एसटी को एस टी से और ओबीसी को ओबीसी से लड़वाना ही बाकी रहा है। संभवतः जातीय जनगणना से ऐसा ही कुछ भयानक परिणाम निकले!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चिराग पासवान खो चुके हैं अपनी विश्वसनीयता!

0
चिराग पासवान - bharatkaitihas.com
चिराग पासवान

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में चल रही एनडीए की तीसरी सरकार के तीन बड़े स्टेक होल्डरों में से तीसरे चिराग पासवान ने वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में अपनी विश्वसनीयता खो दी है!

पिछले दिनों उन्होंने जातीय जनगणना के मामले में राहुल गांधी के सुर में सुर मिलाया, वक्फ बोर्ड के प्रावधानों पर आपत्ति की तथा सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय का यह कहकर विरोध किया कि हम आरक्षण के कोटे के भीतर कोटे से सहमत नहीं हैं।

एनडीए सरकार पहले ही यह स्पष्ट कर चुकी थी कि सरकार सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए क्रीमी लेयर वाले सुझाव से सहमत नहीं है, फिर भी चिराग ने जिस तरह उछल-उछल कर एनडीए के प्रति अपना विरोध स्पष्ट किया, वह एनडीए के लिए सिरदर्दी पैदा करने वाला है।

एनडीए सरकार का हिस्सा बनने के लिए चिराग पासवान लोकसभा चुनावों से पहले और बाद में यह कहते रहे हैं कि वे नरेन्द्र मोदी के हनुमान हैं, समझ में नहीं आता कि चिराग पासवान किस तरह के हनुमान हैं! हनुमानजी तो लंका को फूंक कर आए थे जबकि चिराग तो एनडीए को ही चिन्गारी दिखाने का काम कर रहे हैं।

चिराग पासवान को एनडीए तीन में केबीनेट मंत्री का पद दिया गया है, जबकि इस पद के लिए न केवल एनडीए के अन्य स्टेक होल्डर दलों में अपितु स्वयं बीजेपी में भी वर्षों से मंजी हुई राजनीति कर रहे नेता दावेदार थे किंतु लगता है कि चिराग को घी हजम नहीं हुआ!

चिराग के पिता रामविलास पासवान ने भी हालांकि जीवन भर जातिवादी राजनीति की जिसे उन्होंने सिद्धांतवादी राजनीति कहकर अलग-अलग दलों की सरकारों में मंत्री पद भोगे किंतु उन्होंने अपनी विश्वसनीयता कभी नहीं खोई। जबकि चिराग पासवान जातिवादी राजनीति के नाम पर स्वयं अपनी ही विश्वसनीयता खो रहे हैं।

जब एनडीए तीन बनी थी, तब सबको लगा था कि नीतीश कुमार और चन्द्रबाबू नायडू एनडीए तीन पर दबाव की राजनीति करेंगे और चिराग के बारे में किसी को ऐसा अनुमान नहीं था कि वे पिद्दी न पिद्दी का शोरबा होते हुए भी सरकार पर इतना दबाव बनाने का प्रयास करेंगे।

चिराग की इन्हीं हरकतों के कारण बीजेपी चिराग के चाचा पशुपति पासवान के साथ नए सिरे से गठबंधन की तैयारियां कर रही हैं।

यह सही है कि लोकसभा चुनावों में चिराग के सहयोग के बिना न केवल एनडीए को अपितु स्वयं बीजेपी को भी बिहार में कुछ सीटें और कम मिलतीं किंतु यह भी उतना ही सही है कि बीजेपी के सहयोग के बिना चिराग को बिहार में एक भी सीट नहीं मिलती!

चिराग अपने इस कमजारे पक्ष को समझ नहीं पा रहे किंतु चाचा पशुपित पारस चिराग को यह बात एक बार फिर अच्छी तरह से समझा देंगे।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

- Advertisement -

Latest articles

डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

0
चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

0
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...
पुष्पक विमान - www.bharatkaitihas.com

पुष्पक विमान विभीषण को क्यों नहीं लौटाया था श्रीराम ने?

0
रावण का वध करने के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो उन्होंने पुष्पक विमान लंका के नए राजा विभीषण को क्यों नहीं लौटाया?...
एनीमल फार्म - www.bharatkaitihas.com

एनीमल फार्म और भारतीय राजनीति

0
क्या आपने उस किताब का नाम सुना है जिसने 1950 के दशक में पूरी दुनिया में आग लगा दी थी! क्या आपने एनीमल फार्म...
हरम बेगम का कपट जाल - www.bharatkaitihas.com

हरम बेगम का कपट जाल (69)

0
बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है...