Friday, March 1, 2024
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गोस्वामी तुलसीदास का काव्य तत्कालीन समय का इतिहास है!

गोस्वामी तुलसीदास का काव्य सामाजिक चेतना के जिन स्वरों को पाठकों के समक्ष रखता है, वे स्वर वेदों से आने वाली स्तुतियों, उपनिषदों से आने वाले दर्शनों एवं पुराणों से आने वाली भक्तिकथाओं से तो प्रेरित हैं ही, उनमें तत्कालीन समय की झलक भी पर्याप्त मात्रा में देखने को मिलती है। तुलसी अपने समय को पहचानते हैं तथा उसे भविष्य के भारत से अलग करते हैं।

निःसंदेह गोस्वामी तुलसीदास का काव्य युगांतरकारी है। राष्ट्रीय पीड़ा को स्वर देने में इतना सक्षम और सशक्त साहित्य और कोई कवि आज तक नहीं रच सका। काव्य-पण्डितों की दृष्टि में तुलसीदास भक्तकवि थे, वे दास्यभाव के भक्त थे, वे समाज को भक्ति के माध्यम से मुक्ति का मार्ग दिखाने वाले युग-पुरुष थे परंतु यदि इतिहास की दृष्टि से देखें तो गोस्वामी तुलसीदास भक्तकवि होने के साथ-साथ और भी बहुत कुछ थे।

यदि यह कहा जाए कि तुलसीदास हिन्दू धर्म के पुनरुद्धारक थे, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। यदि यह कहा जाए कि तुलसीदास अपने समय के निर्माता थे तो इसमें भी कोई अतिश्योक्ति नहीं थी। यदि यह कहा जाए कि तुलसीदास भविष्य के भारत के निर्माता थे, तो उसमें भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

यह बहुत ही दुःख की बात है कि कम्युनिस्टों से प्रभावित भारतीय इतिहासकार सोलहवीं सदी को मुगल बादशाह अकबर की सदी मानते हैं। यही कारण है कि मैंने कई अवसरों पर इस बात को स्पष्ट किया है कि सोलहवीं सदी गोस्वामी तुलसीदास की थी न कि अकबर की!

अब तक उपलब्ध ऐतिहासिक एवं साहित्यिक स्रोतों के आधार पर यह मान्यता स्थापित की गई है कि रामचरित मानस के प्रणेता गोस्वामी तुलसीदास का जन्म विक्रम संवत् 1554 (ई.1497) में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को हुआ तथा उनका निधन संवत 1680 (ई.1623) में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को हुआ। अर्थात् उनकी जन्मतिथि एवं पुण्यतिथि एक ही थी। इन तिथियों से तुलसीदासजी की आयु 126 वर्ष बैठती है। संभव है कि उन्हें इतना लम्बा जीवन न मिला हो किंतु उन्होंने लम्बी आयु पाई, इसमें कोई संदेह नहीं है।

तुलसीदासजी के जन्म के समय तक ईरान एवं अफगानिस्तान से आए तुर्क मुसलमानों को हिन्दुकुश पर्वत से लेकर बंगाल की खाड़ी के बीच में स्थित उत्तर भारत के मैदानों पर शासन करते हुए तीन सौ साल का समय बीत चुका था। विदेशी भूमियों से आए मुसलमान आक्रांता भारत के नर-नारियों को मुसलमान बनाने के लिए उस काल में तरह-तरह के अत्याचार करते थे।

जो हिन्दू भयभीत होकर मुसलमान बन जाते, वे तो अपने परिवार को सुरक्षित बचा लेते थे जबकि अपनी टेक पर दृढ़ रहने वाले हिन्दुओं को उस काल में अनेक कष्टों का सामना करना पड़ता था। उनके दुःखों का पार न था। आक्रांता सैनिक हिन्दुओं की स्त्रियों को बलपूर्वक छीन लेते, उनके घरों को जला देते, बच्चों को जीवित ही आग में फैंक देते। उनकी झौंपड़ियों मेें रखे अनाज, कपड़ों एवं बरतनों को लूट लेते। खेतों में खड़ी फसलों को आग के हवाले कर देते।

आक्रांता सैनिक यहीं नहीं रुकते थे। वे हिन्दुओं के तीर्थों को गाय के मांस एवं रक्त से दूषित कर देते, मंदिरों में मांस फैंक देते, मंदिरों को तोड़कर उन पर मस्जिद बना देते तथा ऐसा हर कार्य करते थे जिससे हिन्दू जाति निराश होकर मुसलमान बन जाए। बहुत से दुष्ट-हृदय आक्रांता तो हिंदुओं के मुंह में पान की पीक थूकते तथा उनके मुंह में पेशाब करते थे।

जिस समय गोस्वामी तुलसीदास लगभग 30 साल के हुए, उस समय भारत में युगांतकारी सत्ता परिवर्तन हुआ तथा ईरानी एवं अफगानी मुसलमानों की जगह समरकंद से आए मंगोलों ने भारत पर अधिकार कर लिया जो भारत में आकर मुगल कहलाने लगे। ये मूलतः चीनी थे तथा इनमें भी तुर्कों का रक्तमिश्रण हुआ था फिर भी ‘मुगल’ अपने पूर्ववर्ती ‘तुर्क मुसलमानों’ की अपेक्षा कुछ उदार थे।

इसका कारण संभवतः यह था कि जब मंगोल मुसलमान नहीं बने थे, तब उन्होंने अरब से आने वाले तुर्क मुसलमानों से भारी लोहा लिया था। तुर्कों एवं मंगोलों ने एक दूसरे पर भारी अत्याचार किए थे। यहाँ तक कि मंगोलों ने तुर्क मुसलमानों के खलीफा को दरी में लपेट कर लातों से मारते हुए उसके प्राण लिए थे।

सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में मुगलों ने भारत पर अधिकार तो कर लिया किंतु उनके हाथों परास्त हुए अफगानी एवं ईरानी मुसलमानों की सेनाओं के लाखों सैनिक मुगलों एवं मुगल अमीरों की सेनाओं में भरती हो गए। इसका परिणाम यह हुआ कि हिन्दू प्रजा पर विगत तीन शताब्दियों से चला आ रहा अत्याचार इस काल में भी पूर्ववत् जारी रहा। 

हिन्दू देवालयों एवं पवित्र स्थानों को ध्वस्त किये जाने का क्रम, गोस्वामी तुलसीदास के जीवनकाल में भी अनवरत चल रहा था। तुलसीदासजी ने ये दृश्य अपनी आंखों से देखे थे। यही कारण है कि गोस्वामी तुलसीदास का काव्य अपने समय का आंखों देखा इतिहास बताता है। अपने काव्यग्रंथ कवितावली में गोस्वामीजी ने अपने काल के मुस्लिम शासकों के बारे में लिखा है कि इस कठिन समय में शासक बड़े दयाहीन हैं, राजवर्ग बड़ा ही धोखेबाज है-

कालु कराल, नृपाल कृपाल न, राज समाज बड़ो ही छली है।

तत्कालीन समाज का चित्रण करते हुये, गोस्वामीजी ने लिखा है- किसान के पास खेत नहीं है, भिखारी को भीख नहीं मिल रही है, व्यापारियों के पास व्यापार नहीं है। जीविका नहीं मिलने के कारण लोग दुःखी हो रहे हैं-

खेती न किसान को, भिखारी को न भीख बलि

बनिक  को  न  बनिज  न चाकर को चाकरी

जीविका  विहीन  लो  सीद्यमान   सोच  बस

कहै  एक एकन सौं,  कहाँ  जाय  का  करी।

गोस्वामी तुलसीदास का काव्य हमें बताता है कि तुलसी अपने समय की राजसत्ता के हिन्दू-विरोधी तथा दमनकारी रूप से बहुत व्यथित थे। उन्होंने अनुभव किया कि पूरा हिन्दू समाज ही नैराश्य के सागर में गोते लगा रहा है और हर प्रकार से कुण्ठित एवं पददलित है। तुलसीदासजी ने भारतीय समाज को निराशा और कुंठा से मुक्त करने के उद्देश्य से त्रेतायुग में हुए विष्णुअवतार श्रीराम के उदात्त चरित्र को नए सिरे से हिन्दू समाज के समक्ष रखा।

तुलसी के राम अपने पूर्ववर्ती समस्त रामकथाओं के राम से पूरी तरह अलग हैं। तुलसी के राम भक्तवत्सल हैं, अंतर्यामी हैं, मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। इन सब गुणों से ऊपर, तुलसी के राम संकल्पबद्ध दुष्टहंता हैं। वे भुजा उठाकर दुष्टों के विनाश का प्रण करते हैं-

निशिचरहीन करहुं मही भुज उठाइ प्रन कीन्ह।

तुलसी बाबा ने हिन्दू प्रजा में मुस्लिम आक्रांताओं के विरुद्ध उठ खड़े होने योग्य साहस जुटाने का मंत्र फूंकने के लिए पतित-पावनी रामकथा का आश्रय लिया।

जब ई.1556 में 14 साल का अकबर भारत में मुगलों का तीसरा बादशाह हुआ, तब तुलसीदासजी की आयु 59 वर्ष रही होगी। गोस्वामीजी ने अपनी आयु का अंतिम भाग अकबर के शासनकाल में बिताया। इस बात के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं कि अकबर ने गोस्वामीजी को अपने दरबार में आने का निमंत्रण भिजवाया था। इस तथ्य से यह स्पष्ट हो जाता है कि अपने जीवनकाल में ही तुलसीदास कितनी लोकप्रियता प्राप्त कर चुके थे।

चूंकि तुलसी बाबा ने अपने जीवन का उत्तरार्द्ध अकबर के शासनकाल में बिताया था, इसलिए स्वाभाविक ही है कि गोस्वामी तुलसीदास का काव्य विशेषकर रामचरित मानस एवं कवितावली में आया सामाजिक दुर्दशा का वर्णन अकबर एवं उसके शासनकाल से सम्बद्ध रहा होगा। हमें उन भारतीय इतिहासकारों की बुरी नीयत को समझना चाहिए जो अकबर को महान बताते हैं। ऐसे इतिहासकारों में समस्त कम्युनिस्ट इतिहासकार एवं भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी शामिल हैं।

गुसाईं तुलसीदास ने तत्कालीन आक्रांता सैनिकों द्वारा हिन्दुओं पर किए जा रहे भीषण अत्याचारों का आरोपण रामचरित मानस में राक्षसों के कुकर्मों के रूप में किया। जब तुलसी बाबा निशाचरों, को परिभाषित करते हैं तब तो स्पष्ट लगता है मानो वे तत्कालीन शासकों एवं उनके सैनिकों की ही चर्चा कर रहे हैं। गोस्वामी तुलसीदास का काव्य इन्हीं वर्णनों से भरा पड़ा है।

तुलसीदासजी ने अपने समय के राजसमाज, को ‘बड़ो ही छली’ कहा है। विनयपत्रिका में भी तुलसीदास यही भाव दोहराते हैं- राज समाज अनेक कुचालों से भर गया है। वे नित नई कुचालें चल रहे हैं। स्पष्ट है कि तुलसीदासजी देख पा रहे थे कि अकबर किस प्रकार सुलहकुल, दीनेइलाही एवं मीना बाजार जैसी नीतियाँ अपना कर हिन्दू समाज को छल रहा था।

इस काल में अकबर तथा उसके शहजादे हिन्दू नारियों से विवाह कर रहे थे और हिन्दुओं को उच्च वेतन वाली नौकरियों पर रखकर उन्हें प्रलोभित कर रहे थे। ये सब बातें अकबर की ‘मधुमिश्रित कूटनीति’ अर्थात् ‘शुगरकोटेड डिप्लोमैसी’ के अतिरिक्त और कुछ नहीं था। वह येन-केन प्रकरेण हिन्दुओं को मुसलमान बनाना चाहता था।

बालकाण्ड में वर्णित रावण का चरित्र अकबर के चरित्र का ही निरूपण है। रावण के कुकर्मों तथा अकबर की नीतियों में अद्भुत समानता नजर आती है। रामचरित मानस में गोस्वामीजी ने लिखा है-

किन्नर सिद्ध मनुज सुर नागा। हठ सबही के पंथहिं लागा।।

ब्रह्मसृष्टि जहँ लगि तनुधारी। दसमुख बसबर्ती नर नारी।।

अर्थात्- रावण हठपूर्वक किन्नर, सिद्ध, मनुज, देव, नाग आदि के पीछे लग गया जिसके कारण ब्रह्माजी की सृष्टि के समस्त शरीरधारी नर-नारी रावण के अधीन हो गए।

राक्षसों के आचरण के कारण धरती के मानवों की बड़ी दुर्दशा हुई-

जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा।

आपुनु उठि धावइ रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा।।

अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहि काना।

तेहि बहुबिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना।।

बरनि न जाइ अनीति घोर निसाचर जो करहिं।

हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापहि कवनि मिति।।

गोस्वामी तुलसीदास के समय में मुगल सैनिक इन्हीं राक्षसों की तरह आचरण कर रहे थे। इन अत्याचारों से उत्पन्न कुंठा एवं निराशा से बाहर निकलने के लिए गुसाईं बाबा ने हिन्दुओं को भगवान विष्णु के राम अवतार की कथा सुनाई। ऐसे राम जिन्होंने धरती पर अवतार लेकर राक्षसों का संहार किया तथा समाज को उनके संत्रास से मुक्ति दिलवाई।

तुलसी बाबा की रामचरित मानस को पढ़कर समाज में उत्साह का नए सिरे से संचार हुआ। रामचरित मानस के अंत में तुलसीदासजी ने हिन्दू समाज को रामराज्य का मार्ग दिखाया। उत्तरकाण्ड में तुलसीदासजी ने रामराज्य का विशद वर्णन किया है। उन्होंने मानव समाज के समक्ष रामराज्य की ऐसी अभिनव अवधारणा प्रस्तुत की जिसमें कोई भी व्यक्ति किसी से शत्रुता का भाव नहीं रखे, सब लोग प्रेमपूर्वक रहें तथा अपने-अपने धर्म का पालन करें-

बयरु न कर काहू सन कोई, राम प्रताप बिषमता खोई।

सब नर करहिं परस्पर प्रीती, चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।

रामराज्य की संकल्पना के माध्यम से गोस्वामीजी भारत की प्रजा को यह संदेश देने में सफल हुए कि यदि प्रजा रामजी के आदर्शों पर चले तो सम्पूर्ण धरती को सुखी बनाया जा सकता है। ऐसी धरती जिसमें न भय होगा न शोक और न रोग-

राम राज बैठे त्रैलोका, हर्षित भए गए सब सोका।

तुलसी बाबा ने विष्णु के अवतार श्रीराम का ऐसा लोकनायक स्वरूप चित्रित किया, जिस पर प्रजा विश्वास कर सके। प्रजा को अपना नायक, जननायक अथवा महानायक ढूंढने के लिए किसी राजा की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता न हो वह स्वयं अपने भीतर ही राम को पा सके। तुलसीदास के राम जन-जन के मन में लोकनायक बनकर युगों-युगों के लिए स्थापित हो गए। ऐसे महानायक को पूजने वाली प्रजा को अधिक समय तक गुलाम बनाकर नहीं रखा जा सकता था।

तुलसी के राम इतने विलक्षण हैं कि वे एक ही समय में शस्त्र, शास्त्र, धर्म एवं नीति के पथ पर चलते हुए, अपने कर्म और आचरण के माध्यम से अपने पक्ष में लोकमत तैयार करते हैं। अपने लिए कुछ नहीं रखते, प्रजा के लिए ही सबकुछ अर्पित करते हैं।

गुसाईं तुलसीदास ने अपने जीवन काल में ही रामकथा को गांव-गांव तक पहुंचाने का प्रयास किया। उन्होंने सैंकड़ों गांवों में रामलीलाओं का मंचन करवाया। उनके प्रयासों से हिन्दू समाज का खोया हुआ आत्मबल और विश्वास लौट आया। हिन्दुओं ने अब बड़ी दृढ़ता से मुसलमान हो जाने से मना करना आरम्भ कर दिया। जब मुगल शासकों को प्रजा का सहयोग मिलना बंद हो गया और प्रजा के मन से शासकों का भय जाता रहा तो मुगल सत्ता ही मिट्टी की भीत की तरह भरभराने लगी।

समाज के विघटन का सबसे बड़ा कारण होता है वर्गभेद, जो जाति-पांति, छूत-अछूत तथा छोटे-बड़े के भाव में प्रकट होता है। तुलसीदासजी के समय में ये कुरीतियां अपने चरम पर पहुंच चुकी थीं। इसलिये उन्होंने वर्गभेद पर करारा प्रहार किया। तुलसी निश्चय ही वर्णाश्रम धर्म के समर्थक थे। लेकिन वे वर्णाश्रम व्यवस्था के तात्त्विक रूप के प्रतिपादक थे, विकृत रूप के नहीं। तुलसीदास वर्ण-आधारित भेदभाव के विरोधी थे।

उनका प्रयास शास्त्रीय मर्यादा तथा लोक व्यवहार में समन्वय स्थापित करने का था। जब राम वनगमन करते हैं तो वे निषादराज को अपना मित्र कहकर गले लगाते हैं। इसका प्रभाव सम्पूर्ण हिन्दू समाज पर पड़ता है। जब भरतजी अयोध्यावासियों को साथ लेकर चित्रकूट जाते हैं तो सामाजिक परम्परा के अनुसार निषादराज गुह महर्षि वसिष्ठ को दूर से ही दण्डप्रणाम करता है-

प्रेम पुलकि केवट कहि नामू, कीन्ह दूरि तें दण्ड प्रनामू।

ब्राह्मण, पुरोहित, ऋषि, राजगुरु आदि इतने सारे उच्च सामाजिक आयामों पर प्रतिष्ठित वसिष्ठ मुनि निषादराज गुह को अपने शरीर से लगा लेते है-

रामसखा ऋषि बरबस भेंटा। जनु महि लुठत सनेह समेटा।।

वस्तुतः सामाजिक जीवन में जब तक इस तरह का भाव उत्पन्न नहीं होगा, तब तक कोई भी राष्ट्र सुखपूर्वक मुस्कुरा नहीं सकता। इसलिए तुलसी बाबा ने अपना सम्पूर्ण साहित्य ऐसा ही समाज बनाने के लिए समर्पित कर दिया। कुछ क्षुद्र मानसिकता वाले राजनेता आजकल तुलसीदास को ब्राह्मणवादी और सामन्तवादी कहकर उनकी निंदा करते हैं किन्तु वास्तविकता यह है कि तुलसी के हृदय में दीन, दुखियों व दरिद्रों के प्रति जितनी वेदना थी, उतनी शायद ही कहीं अन्यत्र देखने को मिले-

जेहि दीन पियारे वेद पुकारे द्रवउ सो श्रीभगवाना।

X    X    X

 बन्दउ सीताराम पद जिनहिं परम प्रिय खिन्न।

तुलसी बाबा ने समाज की दरिद्रता को रावण कहा है-

दारिद दसानन दबाई दुनी, दीनबन्धु! दुरित दहन देखि तुलसी हाहाकरी।

तुलसीदास का यह हाहाकार वस्तुतः तुलसी के समय की ही अनुगूंज है। तुलसीदास अपने काल में हिन्दू धर्म में व्याप्त पाखण्डों से भी अत्यन्त व्यथित थे। वे देख रहे थे कि सर्वत्र असत्य और हिंसा का बोलबाला है। इसलिये तुलसी ने समाज के समक्ष एक बार पुनः उपनिषदों के इस मर्म को नई शब्दावली में प्रस्तुत किया-

परम धरम श्रुति विदित अहिंसा। परनिंदा सम अघ न गिरीसा।

X    X    X

धरम न दूसर सत्य समाना। आगम निगम पुरान बखाना।।

वे तुलसी बाबा ही थे जिन्होंने सोलहवीं सदी के कठिन समय में हिन्दू समाज को एक करने के लिए बहुत ही सरल शब्दावली में समाज को बताया कि दूसरों की भलाई करने से अधिक बड़ा कोई धर्म नहीं है। वे जानते थे कि यदि प्रजा परोपकार की भावना के सूत्र से एक-दूसरे से जुड़ी रहेगी तो समाज बड़ी आसानी से शासक वर्ग के अत्याचारों का सामना कर सकेगा-

परहित सरिस धरम नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।

इस प्रकार हम देखते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास का काव्य तत्कालीन समय की झलक ही नहीं देता, उसका आंखों देखा इतिहास भी बताता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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