Tuesday, May 24, 2022

185 गोस्वामी तुलसीदासजी से पीछे रह गया अकबर!

आज अकबर की मृत्यु हुए 417 वर्ष बीत चुके हैं। भारत में शायद ही कोई ऐसा शिक्षित व्यक्ति हो जिसने अकबर का नाम न सुन रखा हो! अकबर के सम्बन्ध में भारत के लोगों में अलग-अलग राय है। कुछ लोग अकबर को महान् मानते हैं तो कुछ लोग उसे क्रूर एवं अत्चारी मानते हैं। कुछ लोग उसे इस्लाम का प्रचार करने वाला मानते हैं तो कुछ लोग उसे इस्लाम को क्षति पहुंचाने वाला मानते हैं। कुछ लोग अकबर को हिन्दुओं का मित्र मानते हैं तो कुछ लोग उसे हिन्दू धर्म को को नष्ट करने का षड़यंत्र रचने वाला मानते हैं। अकबर के समर्थकों का मत है कि अकबर हिन्दू धर्म और इस्लाम दोनों से ऊपर उठकर एक मानव धर्म की रचना करना चाहता था, वह सभी धर्मों एवं मजहबों के प्रति उदार था किंतु वह लोगों की मजहबी कट्टरता के खिलाफ था।

हिन्दू इतिहासकारों की अकबर के विरुद्ध सबसे बड़ी शिकायत यह है कि उसने हिन्दू राजाओं को अपने अधीन करके तथा हिन्दू राजकुमारियों से विवाह करके हिंदुओं के गौरव पर चोट की तथा हिंदू धर्म एवं हिन्दू अस्मिता को नुक्सान पहुंचाया। भारत में अक्सर लोग यह कहते हुए मिल जाते हैं कि यदि अकबर जैसे दो-चार शासक और हो गये होते तो हिन्दू धर्म बड़ी कठिनाई में पड़ जाता। इसके विपरीत, मुस्लिम इतिहासकार मानते हैं कि अकबर ने इस्लाम के सिद्धांतों को छोड़कर तथा दीने-इलाही चलाकर भारत में इस्लाम का बहुत नुक्सान किया। अकबर के समकालीन मुल्ला-मौलवी तो अकबर को इस्लाम का शत्रु ही मानते थे।

इतिहास की बहुत सारी पुस्तकों में अकबर की गणना भारत के महान् शासकों में की जाती है। उसके व्यक्तित्व के सम्बन्ध में विद्वानों ने इतना अधिक लिख दिया है कि वास्तविकता का पता लगाना कठिन हो गया है। अबुल फजल जैसे प्रशंसकों ने उसके व्यक्तित्व को अत्यन्त अतिरंजित करके उसे एक आदर्श शासक बताया है परन्तु बदायूंनी ने उसे इस्लाम का शत्रु घोषित करके उसके व्यक्तित्व को हेय सिद्ध करने का प्रयास किया है। उपलब्ध साक्ष्यों का अध्ययन करने पर अनुमान होता है कि अकबर का व्यक्तित्व अपने युग के मुस्लिम बादशाहों से कहीं अधिक श्रेष्ठ था। उसमें ऐसे अनेक गुणों का समावेश था जिनके बल पर वह अपने राज्य का अभूतपूर्व विस्तार कर सका, उसे स्थायित्व दे पाया तथा अपने वंशजों के लिये मार्गदर्शक सिद्धांतों का निर्माण करने में सफल रहा किंतु उसकी सफलताओं एवं उपलब्धियों के समस्त परिणाम केवल उसके राज्य-विस्तार पर आकर केन्द्रित हो जाते हैं।

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अकबर के समकालीन एक जेजुइट पादरी ने अकबर के बारे में लिखा है- ‘वह हर समय व्यस्त रहता था। अभी वह राजकीय मामलों में मशगूल है या अपनी प्रजा के लोगों को मुजरे दे रहा है तो दूसरे ही क्षण वह ऊँटों के बाल कतरता हुआ या पत्थर फोड़ता हुआ या लकड़ी काटता हुआ या लोहा कूटता हुआ नजर आता है। इन सब कामों को वह इतनी होशियारी से करता है मानो खुद अपने ही खास पेशे को कर रहा हो।’

पं. जवाहर लाल नेहरू ने इंदिरा प्रियदर्शिनी को लिखे पत्रों में लिखा है- ‘वह जमाना यूरोप में नीदरलैण्ड के विद्रोह का और इंग्लैण्ड में शेक्सपीयर का था। अकबर का नाम भारत के इतिहास में जगमगा रहा है और कभी-कभी कुछ बातों में वह हमें अशोक की याद दिलाता है। यह एक अजीब बात है कि ईसा से तीन सौ साल पहले का एक बौद्ध सम्राट और ईसा के बाद सोलहवीं सदी का एक मुसलमान बादशाह, दोनों एक ही ढंग से और करीब-करीब एक ही आवाज में बोल रहे हैं। ताज्जुब नहीं कि यह खुद भारत की ही आवाज हो जो उसके दो महान् पुत्रों के जरिये बोल रही हो। अशोक के बारे में हम केवल उतना ही जानते हैं जितना उसने खुद पत्थरों पर तराशा हुआ छोड़ा है किंतु अकबर के बारे में हम बहुत-कुछ जानते हैं। उसके दरबार के दो समकालीन इतिहासकारों के लम्बे विवरण मिलते हैं। जो विदेशी उससे मिलने आए थे- खासकर जेजुुइट लोग, जिन्होंने उसे ईसाई बनाने की जोरदार कोशिश की थी, उन्होंने भी लम्बे-चौड़े बयान लिखे हैं।’

जवाहरलाल नेहरू ने अकबर के व्यक्तित्व का विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए लिखा है- ‘संयोग से अकबर एक बुद्धिमान स्वेच्छाचारी था और वह भारत के लोगों की भलाई के लिए जी-तोड़ कोशिश करता रहता था। एक तरह से वह भारतीय राष्ट्रीयता का जन्मदाता माना जा सकता है। हालांकि वह एक शक्तिशाली और निरंकुश शासक था किंतु वह हाथ से काम करने को अपनी शान के खिलाफ नहीं समझता था जैसा कि आजकल के कुछ लोग खयाल करते हैं।’

अकबर के समकालीन पादरी मनसर्रट ने लिखा है- ‘अकबर बहुत कृपण था और धन को बचाए रखने वाला था।’

अकबर के दरबार में उपस्थित ईसाई पादरी जेवियर ने लिखा है- ‘अकबर अपने चरणों की धोवन जन-सामान्य को पीने के लिए देता था। जेवियर के हवाले से स्मिथ ने लिखा है कि अकबर अपने आप को पैगम्बर की तरह घोषित करता था। जनता को मानना होता था कि अकबर के पैरों की धोवन पीने से जनता के रोग ठीक हो जाते हैं।’

बदायूंनी लिखता है- ‘इस तरह का अपमानजनक व्यवहार केवल हिंदुओं के लिए ही सुरक्षित था। यदि हिंदुओं के अतिरिक्त कोई अन्य व्यक्ति अकबर के प्रति इस तरह की भक्ति प्रदर्शित करने की इच्छा प्रकट करता तो अकबर उसे झिड़क देता था।’

पुरुषोत्तम नागेश ओक ने लिखा है- ‘औरतें यातनाग्रस्त होकर अंतिम उपाय के रूप में अपने बच्चों को अकबर के चरणों में लेटा देती थीं और दया की भीख मांगती थीं। अकबर के दरबारी, ईसाई पादरियों को समझाया करते थे कि ये औरतें अकबर को पहुंचा हुआ फकीर मानती हैं, वे अपने बच्चों को आशीर्वाद दिलाने के लिए उन्हें बादशाह के चरणों में डालती हैं।’

विन्सेट स्मिथ ने अकबर की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘वह मनुष्य का जन्मजात शासक था और इतिहास में परिज्ञात सर्वशक्तिशाली शासकों में स्थान पाने का वस्तुतः अधिकारी है। यह अधिकार निःसंदेह उसके अलौकिक एवं प्राकृतिक गुणों, उसके मौलिक विचारों तथा उसकी शानदार सफलताओं पर आधारित है।’ के. टी. शाह ने अकबर के बारे में लिखा है- ‘मुगलों में अकबर सबसे महान् था और यदि मौर्यों के काल से नहीं तो कम से कम एक सहò वर्षों में वह सबसे बड़ा भारतीय शासक था।’

लेनपूल ने अकबर की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘वह भारत का भद्रतम शासक था…..वह साम्राज्य का सच्चा संस्थापक तथा संगठनकर्ता था…..वह मुगल साम्राज्य के स्वर्ण-युग का प्रतिनिधित्व करता है।’ एडवर्ड्स तथा गैरेट ने अकबर की प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘अकबर ने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी योग्यता को सिद्ध कर दिया है। वह एक निर्भीक सैनिक, एक महान् सेनानायक, एक बुद्धिमान प्रबन्धक, एक उदार शासक और चरित्र का सही मूल्यांकन करने वाला था। वह मनुष्यों का जन्मजात नेता था और इतिहास का सर्वशक्तिमान् शासक कहलाने का वास्तविक अधिकारी है।’

यूरोपीय इतिहासकार हेग ने लिखा है- ‘वास्तव में वह एक महान् शासक था क्योंकि वह जानता था कि अच्छा शासक वही है जिसका उसकी प्रजा आज्ञा-पालन के साथ-साथ आदर-सम्मान और प्यार करती हो न कि भयभीत रहती हो। वह ऐसा शहजादा था जिसे समस्त लोग प्यार करते थे, जो महान् व्यक्तियों के साथ दृढ़, निम्न-स्थिति के लोगों के प्रति उदार और जो छोटे-बड़े परिचित-अपरिचित समस्त लोगों के साथ न्याय करता था।’

पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने विश्व इतिहास की झलक में अकबर की प्रसिद्धि का विश्लेषण करते हुए लिखा है- ‘अकबर के शासनकाल में उत्तर भारत में और अधिकतर काशी में एक व्यक्ति हुआ जिसका नाम संयुक्त प्रांत अर्थात् आज के उत्तर प्रदेश में हरेक देहाती की जबान पर है। वहाँ वह इतना मशहूर है और इतना लोकप्रिय है, जितना अकबर या दूसरा कोई बादशाह नहीं हो सकता। नेहरू लिखते हैं कि मेरा मतलब तुलसीदास से है जिन्होंने हिन्दी में रामचरित मानस या रामायण लिखी।’

यदि हम नेहरू के इस कथन पर निष्पक्ष होकर विचार करें तो हम पाएंगे कि यद्यपि जवाहरलाल नेहरू द्वारा अकबर की प्रसिद्धि के सम्बन्ध में किया गया यह विलेषण अंतिम सत्य नहीं है तथापि यह कथन इस ओर मजबूत संकेत करता है कि अकबर अपने काल का एकमात्र प्रसिद्धतम व्यक्ति नहीं था, कुछ लोग थे जो अकबर से भी अधिक लोकप्रिय थे जिनमें गोस्वामी तुलसीदास और उस काल के अनेक वैष्णव संतों के नाम लिए जा सकते हैं। जैसे कि भगवान वल्लभाचार्य एवं अकबर का स्वयं का मुख्य सेनापति खानखाना अब्दुर्रहीम। सूरदास तथा मीरांबाई भी लोकप्रियता के मामले में अकबर से बहुत आगे बैठते हैं।

भारत की जनता तब भी संतों से ऊर्जा प्राप्त कर रही थी और आज भी उन संतों की वाणी भारतीय समाज को ऊर्जा एवं प्रेरणा दे रही है। भारतीयों के लिए कोई धनी व्यक्ति अथवा कोई राजा तब तक आदरणीय नहीं हुआ जब तक कि उसमें संतों की तरह निष्छलता और लोकोपकार की भावना के दर्शन न हुए हों! इस कसौटी पर अकबर का व्यक्तित्व बहुत छोटा सिद्ध होता है। वह औरतों और सल्तनत का लालची था न कि जनता का निश्छल सेवक या कि दिव्य गुणों से सम्पन्न अद्भुत संत!

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