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सूफियों के प्रेम तराने भी पाकिस्तान की जड़ों को पनपने से नहीं रोक सके

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भारत की धरती पर विगत लगभग एक हजार साल से सूफियों के प्रेम तराने गूंज रहे हैं। सूफी फकीरों एवं दरवेशों ने भारतीय वेदान्त के प्रेमतत्व को अपने गीतों में ढालकर भारत की धरती को प्रेम और भक्ति की दीवानगी से भर दिया। सूफी-मत का आदि स्रोत शामी जातियों की आदिम प्रवृत्तियों में मिलता है जो सीरिया के आसपास शाम नामक देश में रहते थे।

सूफी मत की आधारशिला रति-भाव था जिसका पहले-पहल शामी जातियों ने विरोध किया। मूसा और हजरत मुहम्मद ने संयत भोग का विधान किया। मूसा ने प्रवृत्ति मार्ग पर जोर देकर लौकिक प्रेम का समर्थन किया। सूफी ‘इश्क मजाजी’ को ‘इश्क हकीकी’ की पहली सीढ़ी मानते हैं। सूफी मत पर इस्लाम की गुह्य विद्या, आर्यों के अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, नव-अफलातूनी मत एवं विचार स्वातंत्र्य की छाप स्पष्ट दिखाई देती है तथा सूफी-मत को ‘जीवन का क्रियात्मक धर्म’ कहा जाता है।

भारत में इस्लाम के साथ-साथ सूफी-मत का भी प्रवेश हुआ। सूफी मत, अपने वर्तमान स्वरूप में इस्लाम का एक वर्ग अथवा समुदाय है और उतना ही प्राचीन है जितना कि इस्लाम। सूफी प्रचारक कई वर्गों तथा संघों में विभक्त थे। अरब से लेकर मध्य एशिया में उनके अलग-अलग केन्द्र थे, जहाँ से चलकर वे भारत पहुंचे थे। इस्लाम की ही तरह सूफी मत का भी भारत में तीव्र गति से प्रचार हुआ। हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ही सूफी सन्तों की ओर आकृष्ट हुए और उनकी शिक्षाओं से प्रभावित हुए।

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अजमेर में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती, दिल्ली में निजामुद्दीन औलिया, नागौर में हमीदुद्दीन नागौरी जैसे सैंकड़ों सूफियों ने इस्लाम को हिन्दुओं के निकट लाने का काम किया। भारत विभाजन के समय जिन पंजाब और सिंध को सर्वाधिक खून के आंसू बहाने पड़े, उन पंजाब और सिंध की धरती सैंकड़ों सालों से सूफियों के प्रेम-तरानों से गुंजारित थी। 12वीं सदी के सूफी बाबा फरीद, सत्रहवीं सदी के सूफी कवि बाबा अब्दुल रहमान, डेरा गाजी खान के साखी सरवर, चमकानी के फंडू बाबा, सूफी दरवेश अब्दुल्लाह शाह गाजी, बुल्लेशाह, वारिसशाह आदि सूफी संत पंजाब की धरती को अपने प्रेम-तरानों एवं विरह गीतों से सिंचित करते रहे।

पंजाबी कवि बुल्लेशाह

सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी में जब औरंगजेब भारत का सम्पूर्ण इस्लामीकरण करने के नाम पर भारत के चप्पे-चप्पे को रक्त से भिगो रहा था, उस समय ई.1680 में पंजाब के बहावलपुर राज्य के ‘गिलानियाँ’ अथवा मुल्तान क्षेत्र के कसूर नामक शहर में बुल्लेशाह नामक एक सूफी दरवेश पैदा हुआ। आज यह क्षेत्र पाकिस्तान में है। बुल्लेशाह की मृत्यु ई.1757 के आसपास हुई। उसकी कविताओं को काफ़ियाँ कहा जाता है। बुल्लेशाह पैगम्बर मुहम्मद की पुत्री फ़ातिमा के वंशजों में से थे। बुल्लेशाह जब बड़े हुए तो शाह इनायत के चेले बन गए। बुल्लेशाह का परिवार पैग़म्बर मुहम्मद की बहिन का वंशज होने से ऊँची ‘सैय्यद’ जाति का था जबकि शाह इनायत ‘आराइन’ जाति से थे जिन्हें नीची जाति का माना जाता था लेकिन जाति-पांति के भेद-भाव से दूर बुल्लेशाह अपने गुरु शाह इनायत से जुड़े रहे और प्रेम-तराने गाते रहे। अपने एक गीत में उन्होंने कहा-

बुल्ले नूँ समझावन आँईयाँ भैनाँ ते भरजाईयाँ

मन्न लै बुल्लेया साड्डा कैहना, छड्ड दे पल्ला राईयाँ

आल नबी, औलाद अली, नूँ तू क्यूँ लीकाँ लाईयाँ?

जेहड़ा सानू सईय्यद सद्दे, दोज़ख़ मिले सज़ाईयाँ

जो कोई सानू राईं आखे, बहिश्तें पींगाँ पाईयाँ

राईं-साईं सभनीं थाईं रब दियाँ बे-परवाईयाँ

सोहनियाँ परे हटाईयाँ ते कूझियाँ ले गल्ल लाईयाँ

जे तू लोड़ें बाग़-बहाराँ चाकर हो जा राईयाँ

बुल्ले शाह दी ज़ात की पुछनी? शुकर हो रज़ाईयाँ!

अर्थात्- बुल्ले को समझाने के लिए बहनें और भाभियाँ आईं और उन्होंने कहा हमारा कहना मान बुल्ले, आराइनों का साथ छोड़ दे। तू नबी के परिवार और अली के वंशजों में से है। बुल्ले ने जवाब दिया- जो मुझे सैय्यद बुलाएगा उसे दोज़ख़ (नरक) में सज़ा मिलेगी। जो मुझे आराइन कहेगा उसे बहिश्त (स्वर्ग) के सुहावने झूले मिलेंगे। आराइन और सैय्यद इधर-उधर पैदा होते रहते हैं, परमात्मा को ज़ात की परवाह नहीं। वह ख़ूबसूरतों को परे धकेलता है और बदसूरतों को गले लगता है। अगर तू बाग़-बहार (स्वर्ग) चाहता है तो आराइनों का नौकर बन जा। बुल्ले की ज़ात क्या पूछता है? ऊपर वाले की बनाई दुनिया के लिए शुक्र मना।

सिन्धी संत झूलेलाल तथा शाहबाज़ क़लन्दर

पंजाबी मिश्रित सिन्धी भाषा में लिखा गया ‘दमादम मस्त क़लन्दर’ नामक गीत भारतीय उपमहाद्वीप का अत्यंत लोकप्रिय एवं बहुत लम्बा सूफ़िआना गीत है जो सिन्ध प्रांत के महान संत झूले लाल क़लन्दर को सम्बोधित करके उनके सामने एक माँ की फ़रियाद रखता है। झूले लाल के साथ-साथ इसमें सूफ़ी संत शाहबाज़ क़लन्दर का भी उल्लेख है। झूले लाल साईं हमेशा लाल चोगा पहनते थे, इसलिए उन्हें ‘लाल’ या ‘लालन’ नाम से पुकारा जाता है। गाने का हर छंद ‘दमादम मस्त क़लन्दर, अली दम-दम दे अन्दर’ पर पूरा होता है जिसका अर्थ है- ‘दम-दम में मस्ती रखने वाला क़लन्दर (फ़क़ीर), जो हर सांस में रब (अली) को रखता है।’ इस गीत के कुछ अंश इस प्रकार हैं-

ओ लाल, मेरी पत्त रखियो बला झूले लालण,

सिन्धड़ि दा, सेवन दा, सख़ी शाहबाज़ क़लन्दर!

दमादम मस्त क़लन्दर, अली दम-दम दे अन्दर!

चार चिराग़ तेरे बरन हमेशा,

पंजवां बारन आईआं बला झूले लालण,

सिन्धड़ि दा, सेवन दा, सख़ी शाहबाज़ क़लन्दर!

दमादम मस्त क़लन्दर, अली दम-दम दे अन्दर!

हिंद-सिंद पीरा तेरी नौबत वाजे,

नाल वजे घड़ेयाल बला झूले लालण,

सिन्धड़ि दा, सेवन दा, सख़ी शाहबाज़ क़लन्दर!

दमादम मस्त क़लन्दर, अली दम-दम दे अन्दर!

मावाँ नूं पीरा बच्चड़े देना ई,

पैणा नूं देना तूं वीर मिला झूले लालण,

सिन्धड़ि दा, सेवन दा, सख़ी शाहबाज़ क़लन्दर!

दमादम मस्त क़लन्दर, अली दम-दम दे अन्दर!

उच्चा रोज़ा पीरा तेरा,

हेठ वग्गे दरिया बला झूले लालण,

सिन्धड़ि दा, सेवन दा, सख़ी शाहबाज़ क़लन्दर!

दमादम मस्त क़लन्दर, अली दम-दम दे अन्दर!

हर दम पीरा तेरी ख़ैर होवे,

नाम-ए-अली बेड़ा पार लगा झूले लालण,

सिन्धड़ि दा, सेवन दा, सख़ी शाहबाज़ क़लन्दर!

दमादम मस्त क़लन्दर, अली दम-दम दे अन्दर!

अर्थात्- हे लाल, मेरी रक्षा कीजिये, ऊंचे झूले लाल, सिन्ध का और सेरवन का संत शाहबाज़ क़लन्दर! दम-दम में मस्त फ़क़ीर, हर सांस में रब! तेरी मज़ार पर चार चिराग़ हमेशा जलते रहते हैं, तेरे आदर में पांचवां दिया जलाने के लिए मैं आई हूँ। …… हे पीर, पूरे हिंदुस्तान और सिन्ध में तेरी महानता गूंजती है, और तेरी मज़ार के बड़े घंटे की आवाज़ फैलती है। …… हे पीर, झोली फैलाने वाली माओं को तू बच्चे देता है, मांगने वाली बहनों को तू भाई देता है। …… ओ पीर, तेरा डेरा पहाड़ की ऊंचाई पर है, नीचे दरिया बहता है …… हे पीर, हर जगह तेरी जीत हो, अली के नाम पर भवसागर में मेरा बेड़ा पार लगा दे। …… सिन्ध का और सेरवन का संत शाहबाज़ क़लन्दर! हे हर सांस में मस्त फ़क़ीर!

भगवान झूलेलाल के संदेश

सिंध की भूमि पर भगवान झूले लाल को लेकर लिखे गए सूफियों के प्रेम तराने अलग ही मिठास रखते हैं। सिन्धी समाज में मान्यता है कि चेटीचण्ड के दिन वरुण देव ने अवतार लिया तथा प्रजा को मिरखशाह नामक दुष्ट शासक के अत्याचारों से मुक्ति दिलवाई। उनके बचपन का नाम उडेरोलाल था किंतु बाद में उन्हें झूलेलाल तथा लालसांई के नाम से जाना गया। सिंध क्षेत्र के मुसलमान उन्हें ख्वाजा खिज्र जिन्दह पीर के नाम से पूजते हैं। उनके प्रमुख संदेश इस प्रकार थे-

– ‘ईश्वर अल्लाह हिक आहे।’ अर्थात् ईश्वर अल्लाह एक हैं।

– ‘कट्टरता छदे, नफरत, ऊंच-नीच एं छुआछूत जी दीवार तोड़े करे पहिंजे हिरदे में मेल-मिलाप, एकता, सहनशीलता एं भाईचारे जी जोत जगायो।’ अर्थात् विकृत धर्मांधता, घृणा, ऊंच-नीच और छुआछूत की दीवारें तोड़ो और अपने हृदय में मेल-मिलाप, एकता, सहिष्णुता और भाईचारे के दीप जलाओ।

– ‘सभनि हद खुशहाली हुजे।’ अर्थात्- सब जगह खुशहाली हो।

– ‘सजी सृष्टि हिक आहे एं असां सभ हिक परिवार आहियू।’ अर्थात् समस्त सृष्टि एक है, हम सब एक परिवार हैं।

वारिसशाह की हीर-राँझा

सूफियों के प्रेम तराने वारिस शाह के गीतों में भी अपने पूरे ठाठ के साथ मुखरित हुए हैं। सूफी संत प्रेम में ईश्वर को और ईश्वर में प्रेम को देखते थे। उन्होंने बहुत से विख्यात प्रेमाख्यानों की रचना की। हीर-राँझा जैसे प्रेमाख्यान पर वे भला कैसे नहीं झूम जाते! इस प्रेमाख्यान को सैंकड़ों, कवियों, लेखकों एवं साहित्यकारों ने अपनी-अपनी तरह से लिखा किंतु हीर की पीर को ओर राँझा के प्रेम को पंजाबी सूफी कवि वारिसशाह ही सर्वाधिक मार्मिक शब्द दे सका। वारिसशाह ने अपनी कविता हीर-राँझा में चिनाब नदी के किनारे स्थित तख्त हजारा गांव तथा उसके लड़कों का वर्णन इस रसमय ढंग से किया-

केही तख़त हज़ारे दी सिफ़त कीजे, जित्थे रांझ्यां रंग मचायआ ए ।

छैल गभ्भरू, मसत अलबेलड़े नी, सुन्दर हिक्क थीं हिक्क सवायआ ए ।

वाले कोकले, मुन्दरे, मझ लुंङी, नवां ठाठ ते ठाठ चड़्हायआ ए ।

केही सिफ़त हज़ारे दी आख सकां, गोया बहशत ज़मीन ते आया ए ।

अर्थात्- चेनाब नदी के किनारे की सुन्दर बस्ती तख्त हजारा की क्या प्रशंसा करें जहाँ रांझों ने रौनक कर रखी है। यहाँ के मस्त, अलबेले सुंदर नौजवान देखते ही बनते हैं। दरिया की लहरों और बगीचों की सुगंधित हवाओं के कारण ऐसा लगता है मानो स्वर्ग ही धरती पर आ गया है। यही रांझाओं की धरती है जो मस्ती से यहाँ रहते हैं। इस बस्ती के नौजवान खूबसूरत और बेपरवाह किस्म के हैं। वे कानों में बालियाँ पहनते और कंधांे पर नए शॉल रखते हैं। उन्हें अपनी खूबसूरती पर गर्व है और वे सब इस मामले में एक-दूसरे को मात देते हुए प्रतीत होते हैं।

हीर के रूप-लावण्य की प्रशंसा करते हुए कवि कहता है-

केही हीर दी करे तारीफ शायर, मत्थे चमकदा हुसन महताब दा जी ।

ख़ूनी चूंडियां रात ज्यु चन्न गिरदे, सुरख रंग ज्युं रंग शहाब दा जी ।

नैन नरगसी मिरग ममोलड़े दे, गल्ल्हां टहकियां फुल्ल गुलाब दा जी ।

भवां वांङ कमान लाहौर दे सन, कोई हुसन ना अंत हिसाब दा जी ।

सुरमा नैणां दी धार विच्च फब रहआ, चंगा हिन्द ते कटक पंजाब दा जी।

अर्थात्- कवि, ‘हीर’ की भला क्या प्रशंसा करे! उसका माथा ऐसे चमक रहा है जैसे चंद्रमा का सौन्दर्य हो। उसकी लाल चूड़ियां इतनी सुर्ख हैं जैसे आग की लपटें हों। उसके नरगिसी आंखें मृगशावक की आंखों जैसी हैं तथा गाल गुलाब के फूलों जैसे लगते हैं। उसकी भौंहें लाहौरी तलवार की तरह खिंची हुई हैं। उसकी आंखों में सुरमा ऐसे सुशोभित हो रहा है जैसे हिन्दुस्तान और पंजाब की कोई भली सी सेना हो। उसके यौवन का कोई पार नहीं है।

यह ताकत सूफियों के प्रेम तराने की ही हो सकती थी।

इस प्रकार सूफियों द्वारा की गई प्रेम और रस की सृष्टि ने सैंकड़ों साल तक पंजाब वासियों के हृदयों में जिस आनंद की वर्षा की वह अन्य क्षेत्र के मानवों के लिए दुर्लभ है किंतु बुल्लेशाह, लालशाह, झूलेलाल तथा वारिस शाह जैसे सूफी फकीरों, चांद बीबी जैसे शासकों, गुरु नानक जैसे सिक्ख गुरुओं, रहीम एवं रसखान जैसे मुस्लिम कवियों और कबीरदास एवं रविदास जैसे हिन्दू संतों के ये प्रेम-प्रयास उस समय व्यर्थ प्रतीत होने लगे जब दोनों संस्कृतियों ने एक-दूसरे से अपनी दूरी यथावत् बनाए रखी।

हिन्दू और मुसलमान दोनों ही, अपने-अपने कारणों से एक-दूसरे के निकट आने के लिए कभी तैयार नहीं हुए। भारत की भूमि में भावी पाकिस्तान की जड़ें घृणा और वैमनस्य की खाद-पानी पाकर अनवरत विस्तार पाती रहीं। एक न एक दिन उन्हें धरती से बाहर निकलकर भारत का विभाजन करना ही था …… पाकिस्तान बनना ही था। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि सूफियों के प्रेम तराने भी पाकिस्तान की जड़ों को पनपने से नहीं रोक सके!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक राजनीति

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ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक राजनीति ब्रिटिश भारत में साम्प्रदायिक राजनीति की शुरुआत ईस्ट इण्डिया कम्पनी के समय से ही हो गई थी। जैसे-जैसे गोरों का शासन आगे बढ़ता गया, वैसे-वैसे भारत में साम्प्रदायिक राजनीति भी गाढ़ी होती चली गई। यहाँ तक कि यह न केवल देश के विभाजन का अपितु हिन्दू संस्कृतिं के विनाश का मुख्य कारण बन गई।

ब्रिटिश-भारत और रियासती-भारत

ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक राजनीति का इतिहास जानने से पहले हमें यूरोपीय जातियों के भारत में आगमन का इतिहास जानना होगा। ई.1498 में पहली बार पुर्तगाली व्यापारी वास्कोडिगामा के नेतृत्व में भारत आए। इन व्यापारियों ने भारत से इतना धन कमाया कि यूरोप के अन्य देश भी भारत आने के लिए लालायित हो उठे।

पुर्तगालियों के बाद हॉलैण्ड (नीदरलैण्ड) से डच, इंग्लैण्ड से अंग्रेज और फ्रांस से फ्रांसीसी व्यापारी भारत आए। डचों की गतिविधियां व्यापार करने तथा व्यापार के लिए कुछ भू-भागों पर अधिकार करने तक सीमित रहीं।

जब इंग्लैण्ड की ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने ई.1608 में भारत में प्रवेश किया तब इंग्लैण्ड पर महारानी एलिजाबेथ (प्रथम) का तथा भारत पर मुगल बादशाह जहाँगीर का शासन था। ई.1615 में अंग्रेजों का दूत सर टामस रो जहाँगीर के दरबार में उपस्थित हुआ तथा उसने कम्पनी के लिए कुछ व्यापारिक सुविधाएं प्राप्त कीं। ई.1644 में फ्रांसीसी व्यापारी भारत आए। इससे अंग्रेजों एवं फ्रांसीसियों के बीच भारत में व्यापारिक एवं राजनीतिक प्रतिद्वन्द्विता आरम्भ हो गयी किंतु ई.1760 में वैण्डीवाश के युद्ध के बाद भारत में फ्रैंच शक्ति परास्त हो गई।

ब्रिटिश-भारत का निर्माण

ई.1765 में बक्सर के मैदान में अंग्रेजों एवं मुगल बादशाह के बीच एक युद्ध लड़ा गया जिसमें मुगल बादशाह शाहआलम हार गया। इसके बाद मुगल बादशाह एवं अंग्रेजों के बीच एक संधि हुई जिसे इलाहाबाद की संधि कहा जाता है। इस संधि के बाद मुगल बादशाह को पेंशन देकर शासन के काम से अलग कर दिया गया तथा उसके क्षेत्रों पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी को दीवानी एवं फौजदारी अधिकार प्राप्त हो गए। अर्थात् अंग्रेज उत्तर-भारत के हरे-भरे मैदानों के प्रत्यक्ष स्वामी बन गए।

कम्पनी द्वारा समय-समय पर जीते गए पूर्वी भारत का असम एवं बंगाल, दक्षिण भारत का मद्रास, पश्चिमी भारत का बम्बई तथा उत्तर-पश्चिम के बिलोचिस्तान एवं सिंध आदि क्षेत्र भी अंग्रेजों के प्रत्यक्ष नियंत्रण में थे जिन्हें मुगलों से लिए गए क्षेत्रों के साथ मिलाकर ब्रिटिश-भारत का निर्माण किया गया।

अंग्रेजों ने ब्रिटिश-भारत को 11 प्रांतों में बांटा जिनमें अलग-अलग गवर्नरों की नियुक्ति की गई- (1) बंगाल, (2) पंजाब, (3) सिंध, (4) उड़ीसा, (5) असम, (6) मद्रास, (7) बम्बई, (8) यूनाइटेड प्रोविंस, (9) बिहार, (10) सेण्ट्रल प्रोविन्स, (11) नॉर्थ-वेस्ट फ्रण्टीयर प्रोविन्स। इन ग्यारह प्रांतों के अतिरिक्त अंग्रेजों ने भारत में छः चीफ-कमिश्नरेट भी स्थापित कीं जिनके नाम इस प्रकार थे- (1) अजमेर-मेरवाड़ा, (2) अण्डमान एण्ड निकोबार आइलैण्ड्स, (3) बिलोचिस्तान, (4) कुर्ग, (5) दिल्ली, (6) पांठ-पीपलोदा।

ई.1769 में कम्पनी ने ब्रिटिश-प्रांतों में जिलों का गठन करके कलक्टरों की नियुक्ति की तथा जनता को बंदूक से चलने वाले कठोर शासन में जकड़ लिया। ई.1773 में रेग्यूलेटिंग एक्ट के माध्यम से भारत में गवर्नर जनरल की नियुक्ति की गई तथा कम्पनी को ब्रिटिश सम्राट के अधीन कर दिया गया। भारत के गवर्नर जनरल पर नियत्रंण रखने के लिए चार सदस्यों की एक एक्जीक्यूटिव काउंसिल गठित की गई।

इस प्रकार भारत में एक ऐसी संस्था की स्थापना की गई जो शीघ्र ही न केवल भारत सरकार कहलाने वाली थी अपितु बिलोचिस्तान से लेकर असम तथा काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के क्षेत्र में रहने वाले करोड़ों भारतीयों के जीवन पर शिकंजा जकड़ने में सक्षम सिद्ध होने वाली थी।

इलाहाबाद की संधि के बाद मुगल-शासित उत्तर भारत में तो ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सत्ता स्थापित हो गई किंतु मध्य भारत, राजपूताना, मराठवाड़ा, कर्नाटक, हैदराबाद आदि क्षेत्र असंरक्षित रह गए। इसे रियासती भारत कहा जाता था। रियासती-भारत में लगभग 550-600 देशी रियासतें थीं जिनकी संख्या घटती-बढ़ती रहती थी। भारत की आजादी के समय देश में 118 सैल्यूट स्टेट्स एवं 448 नॉन सैल्यूट स्टेट्स थीं।

जब अंग्रेजों ने मुगलों को सत्ता से बाहर कर दिया तब उनके सैनिक बेरोजगार होकर डकैत बन गए जिन्हें भारतीय इतिहास में पिण्डारी कहा गया। इसी प्रकार दक्षिण भारत में मराठों ने अपनी शक्ति का प्रसार कर लिया तथा वे नर्मदा नदी को पार करके राजपूताना, दिल्ली एवं पंजाब तक धाड़े मारते थे। कुछ समय बाद मराठों एवं पिण्डारियों में गठजोड़ हो गया तथा उनकी संयुक्त सेनाओं ने सम्पूर्ण 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध एवं उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में उत्तर भारत के देशी राज्यों एवं अंग्रेजी क्षेत्रों में हाहाकार मचा दिया।

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इस पर ई.1817-1818 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारतीय राज्यों से सहायता की अधीनस्थ संधियां करके उन्हें संरक्षण प्रदान किया जिसके कारण देशी राज्यों के रक्षा एवं वैदेशिक मामलों का दायित्व ईस्ट-इण्डिया कम्पनी के पास चला गया और देशी राजा अपने राज्यों का आंतरिक प्रशासन करने तक सीमित हो गए।

ई.1857 में जब ब्रिटिश-भारत एवं राजपूताना रियासतों में सशस्त्र सैनिक क्रांति हुई तो ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने इस क्रांति को बलपूर्वक कुचल दिया किंतु ब्रिटेन के लोगों ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के विरुद्ध आवाजें उठानी शुरू कीं जिससे प्रेरित होकर ई.1858 में ग्रेट-ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया की सरकार ने ‘ब्रिटिश-भारत’ का शासन अपने हाथों में ले लिया। इसके साथ ही, ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने राजपूताना की रियासतों सहित देश की 40 प्रमुख रियासतों से जो ‘सहायता की अधीनस्थ संधियां’ कर रखी थीं वे भी ज्यों की त्यों ब्रिटिश क्राउन को स्थानांतरित हो गईं।

इस प्रकार ब्रिटिश-क्राउन के अधीन भारत के दो टुकड़े थे। पहला टुकड़ा प्रत्यक्ष-ब्रिटिश-शासित-क्षेत्र था जिसे ‘ब्रिटिश-इण्डिया’ अथवा ‘आंग्ल-भारत’ कहा जाता था। दूसरा टुकड़ा ‘देशी-राजाओं द्वारा शासित क्षेत्र’ था जिसे ‘इण्डियन-इण्डिया’ अथवा ‘रियासती-भारत’ कहा जाता था।

ब्रिटिश-क्राउन भारत के पहले टुकड़े पर गवर्नर जनरल के माध्यम से शासन करता था तो दूसरे टुकड़े पर वायसराय के माध्यम से शासन किया जाता था। व्यावहारिक रूप में इन दोनों पदों को एक ही व्यक्ति संभालता था। वायसराय के नीचे एक काउंसिल गठित की गई जिसके सदस्य वायसराय द्वारा मनोनीत किए जाते थे। ईस्वी 1858 के आगे भी यही व्यवस्था चलती रही। ब्रिटिश संसद ने इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं किया।

अंग्रेजों का भारतीयों के प्रति दृष्टिकोण

ब्रिटिश जाति स्वयं को उच्च एवं भारतीयों को नीच जाति के रूप में देखती थी। लैरी कांलिन्स एवं दॉमिनिक लैपियर ने लिखा है-

‘अंग्रेजों के मन में यह विश्वास जमता गया कि गोरी अंग्रेज जाति श्रेष्ठ और ऊंची है। काले भारतीय नीच और मूर्ख हैं। उन पर शासन करने की जिम्मेदारी ईश्वर नामक रहस्यमय शक्ति ने अंग्रेजों के ही कंधों पर रखी है। अंग्रेज वह जाति है जो केवल जीतने एवं शासन करने के लिए पैदा होती है।

….. भारतीयों पर शासन चलाने के लिए अंग्रेजों ने इण्डियन सिविल सर्विस की स्थापना की जिसमें 2000 अंग्रेज अधिकारी नियुक्त हुए। 10,000 अंग्रेज अधिकारियों को भारतीय सेना सौंप दी गई। तीस करोड़ की जनसंख्या को अनुशासन में रखने के लिए साठ हजार अंग्रेज सिपाही आ धमके। उनके अतिरिक्त दो लाख भारतीय सिपाही भारतीय सेना में थे ही।’

ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक राजनीति का आधार

हिन्दू एवं मुसलमान पिछले लगभग सात सौ सालों से पूरे देश में फैले हुए थे तथा इनके बीच हर जगह लगभग एक जैसी साम्प्रदायिक समस्या थी। ई.1858 से पहले तक अंग्रेज भारतीय मुसलमानों एवं हिन्दुओं के झगड़ों को बलपूर्वक दबाते थे किंतु जैसे ही भारत की आजादी की लड़ाई आरम्भ हुई वैसे ही अंग्रेजों ने भारत की साम्प्रदायिक समस्या को अपनी ढाल के रूप में प्रयुक्त करना आरम्भ कर दिया। उन्होंने हिन्दुओं एवं मुसलमानों को राजनीतिक स्तर पर उकसाना प्रारम्भ किया। अंग्रेज चाहते थे कि ये दोनों जातियां परस्पर झगड़ती रहें तथा अपने लिए आजादी की मांग नहीं करें।

अंग्रेजों की शह पाकर कुछ मुसलमान नेताओं ने साम्प्रदायिकता को ही अपनी राजनीति का आधार बना लिया। उनके विरोध में हिन्दू-प्रतिरोध ने भी सिर उठाया और देखते ही देखते ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिकता ही राजनीति का एकमात्र आधार हो गई।

अंग्रेजों ने देश में साम्प्रदायिकता की आग तो लगा दी किंतु उन्हें मालूम नहीं था कि इस आग की लपटें इतनी ऊँची उठेंगी कि मुसलमान अपने लिए एक अलग राष्ट्र की मांग करने लगेंगे तथा अंग्रेजों के लिए इस देश पर शासन करना असम्भव हो जाएगा। आगे चलकर ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक राजनीति ही अंग्रेजों के सर्वनाश का कारण बनी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक समस्या के मुख्य कारण (1)

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ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक समस्या का मुख्य कारण भारत का मध्यकालीन इतिहास था जब मुसलमानों ने सत्ता, तलवार और लालच के बल पर लाखों हिन्दुओं को मुसलमान बनाया। इस्लामी आक्रांताओं का यह कार्य हिन्दुओं के लिए अत्यंत अपमानजनक था तथा उनके गौरव को पददलित करने वाला था। इस कारण भारतवासी कभी नहीं भूल पाये कि उनकी पहचान हिन्दू धर्म से है।

(1) इस्लाम का भारत की भूमि में बाहर से आना

‘हिन्दू-संस्कृति’ भारत भूमि पर जन्मी थी। इसी को रूढ़ अर्थ में ‘हिन्दू-धर्म’ तथा ‘हिन्दू-जाति’ कहा गया। यह भारत-भूमि पर आकार लेने वाला प्रथम धर्म है। इसलिए इसे ‘सनातन-धर्म’ भी कहते हैं। बाद में बौद्ध, जैन, सिक्ख आदि कई पंथ इसी धर्म से निकले जिन्हें स्वीकार करने में हिन्दुओं को संकोच नहीं हुआ किंतु इस्लाम, विजेता के रूप में बाहर से भारत में आया इसलिए भारतवासियों के लिए इस्लाम को अंगीकार करना सहज रूप से स्वीकार्य नहीं हुआ।

(2) हिन्दू धर्म एवं इस्लाम में मौलिक भिन्नताएँ

जिस समय इस्लाम ने भारत में प्रवेश किया, उस समय तक लगभग समस्त हिन्दू जाति देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तथा उनके लिए मंदिर बनाकर उनकी पूजा करती थी किंतु इस्लाम में मूर्ति-पूजा को अधर्म समझा जाता था। इसलिए इस्लामी आक्रांताओं ने हिन्दू-देवालयों एवं देव-विग्रहों को तोड़ने के प्रति विशेष आग्रह प्रदर्शित किया तथा इस दुराग्रह को उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। इसी प्रकार हिन्दू-जाति गाय को देवी-देवताओं के समान पूज्य मानती आई है किंतु मुसलमान गायों को काटकर उनका मांस खाते थे। इस कारण हिन्दू कभी भी इस्लाम के प्रति मुलायम दृष्टिकोण नहीं अपना सके।

हिन्दू अनेक देवी-देवताओं में विश्वास करते थे किंतु मुसलमान एक अल्लाह में विश्वास करते हैं। हिन्दू गंगा नहाते हैं एवं चार धामों की यात्रा करते हैं जबकि मुसलमान हज करने मक्का जाते हैं। हिन्दू तिलक, चोटी एवं जनेऊ को अपनी पहचान मानते हैं जबकि मुसलमान सुन्नत, बुर्का एवं तीन तलाक को मुसलमानियत की पहचान समझते हैं। ऐसी स्थिति में ये दोनों संस्कृतियां एक दूसरे को कैसे सहन कर सकती थीं! हिन्दुओं और मुसलमानों ने अपनी-अपनी दाढ़ी-मूंछों, भाषा, खानपान एवं पहनावे में भी यत्न-पूर्वक अंतर बनाए रखा। मुसलमान अपनी पहचान कुरान से तथा हिन्दू अपनी पहचान वेद, रामायण एवं गीता से करते रहे।

(3) हिन्दुओं द्वारा स्वयं को रूढ़ियों की कारा में बंद कर लेना

हिन्दुओं ने अपने अस्तित्व को बचाने के लिए स्वयं को जातियों, संस्कारों, धार्मिक परम्पराओं एवं रूढ़ियों की ऐसी मजबूत कारा में बंद कर लिया जिसमें मुस्लिम जीवन शैली की स्वीकार्यता के लिए किंचित भी अवकाश नहीं था। वे मुसलमानों के हाथ का छुआ अन्न-जल भी ग्रहण नहीं करते थे। शुद्धता एवं पवित्रता के प्रति हिन्दुओं के इस आग्रह को मुसलमान उनका घमण्ड समझते थे। ऐसी परिस्थितियों में भारत में हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता की आग सदैव प्रज्जवलित रही।

(4) मुसलमानों का राजनीतिक एवं आर्थिक क्षेत्र में पिछड़ जाना

ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक समस्या का एक बड़ा कारण मुसलमानों का राजनीतिक एवं आर्थिक क्षेत्र में पिछड़ जाना था। भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना के पूर्व, मुस्लिम समाज दो वर्गों में विभाजित था- प्रथम वर्ग में वे लोग थे जो विदेशों से आये आक्रांताओं, व्यापारियों तथा धर्म प्रचारकों के वंशज थे।

दूसरे वर्ग में वे भारतीय थे जो भय अथवा लालच से ग्रस्त होकर, परिस्थिति वश, बल-पूर्वक अथवा स्वेच्छा से धर्म-परिवर्तन करके मुसलमान बन गये थे अथवा ऐसे लोगों की सन्तान थे। प्रथम वर्ग के लोग शासन संभालते थे तथा उनका शासन एवं शासकीय नौकरियों पर एकाधिकार था। यह ‘मुस्लिम अभिजात्य वर्ग’ था।

दूसरे वर्ग के लोग खेती-बाड़ी या अन्य छोटे-मोटे काम करते थे। धर्म-परिवर्तन के बाद भी दूसरे वर्ग के आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षणिक स्तर में कोई उल्लेखीय परिवर्तन नहीं हुआ था। प्रथम वर्ग अर्थात् मुस्लिम अभिजात्य वर्ग का राजनीतिक प्रभुत्व 18वीं और 19वीं शताब्दी में बंगाल, अवध तथा दिल्ली द्वारा अँग्रेजों के समक्ष घुटने टेक देने के साथ समाप्त हो चुका था किंतु मुस्लिम अभिजात्य वर्ग, राजनीतिक प्रभुत्व का इतना अधिक अभ्यस्त था कि इसने कभी व्यापार अथवा किसी अन्य कार्य की ओर ध्यान नहीं दिया।

सरलता से धन प्राप्त होते रहने से इस वर्ग में अकर्मण्यता व्याप्त थी। प्रतिष्ठा बनाये रखने के दिखावे ने इस वर्ग को भीतर और बाहर दोनों तरफ से खोखला कर दिया। अंग्रेजों द्वारा किए गए भूमि के स्थायी बन्दोबस्त के कारण अभिजात्य वर्ग के मुसलमानों की आर्थिक स्थिति और भी दयनीय हो गई।

(5) अंग्रेजी शिक्षा-पद्धति से दूर रहना

ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक समस्या का एक बड़ा कारण मुसलमानों का अपने अतीत में डूबे हुए रहकर मदरसों में तालीमी शिक्षा प्राप्त करना और अंग्रेजी शिक्षा-पद्धति से दूर रहना था।

मुसलमानों ने केवल कुरान और हदीस की शिक्षा को ही वास्तविक शिक्षा समझा तथा अँग्रेजी शिक्षा-पद्धति को नहीं अपनाया। इस प्रवृत्ति ने मुसलमानों की सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रगति को अवरुद्ध कर दिया। अंग्रेजी शिक्षा से वंचित मुसलमानों को सरकारी नौकरियां नहीं मिल सकीं क्योंकि अँग्रेजी राज में सरकारी नौकरियों के लिए अँग्रेजी शिक्षा की डिग्रियां आवश्यक थीं। इस क्षेत्र में हिन्दू उनसे आगे निकल गये।

मुसलमानों की स्थिति के सम्बन्ध में विलियम हण्टर ने लिखा है- ‘एक अमीर, गौरव-पूर्ण तथा वीर जाति को निर्धन तथा निरक्षर जन-समूह में बदल दिया गया और उसके उत्साह तथा गर्व को मिट्टी में मिला दिया गया।’ अँग्रेजों के शासन में मुसलमानों के राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक जीवन में आई गिरावट के कारण मुसलमान स्वयं को उपेक्षित अनुभव करने लगे और उनमें असन्तोष तथा विद्रोह की भावना पनप गई।

(6) अँग्रेजों का हिंदुओं पर विश्वास एवं मुसलमानों पर अविश्वास

ई.1857 के प्रथम स्वातन्त्र्य संग्राम के बारे में सर जेम्स आउट्रम का मत था- ‘यह विद्रोह मुसलमानों के षड़यंत्र का परिणाम था जो हिन्दुओं की शक्ति के बल पर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते थे।’ वी. ए. स्मिथ ने लिखा है- ‘यह हिन्दू शिकायतों की आड़ में मुस्लिम षड़यंत्र था जो पुनः मुगल बादशाह के नेतृत्व में मुस्लिम सत्ता स्थापित करना चाहते थे।’

विद्रोह के काफी समय बाद बेगम जीनत महल ने देशी शासकों को पत्र लिखे, जिनमें उसने मुगल बादशाह की अधीनता में, अँग्रेजों को देश से बाहर निकालने की बात लिखी। अतः जेम्स आउट्रम एवं स्मिथ के कथनों में कुछ सच्चाई प्रतीत होती है।

बहादुरशाह के मुकदमे के जज एडवोकेट जनरल मेजर हैरियट ने मुकदमे में पेश हुए समस्त दस्तावेजों का अच्छी तरह से अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला- ‘आरम्भ से ही षड्यंत्र सिपाहियों तक सीमित नहीं था और न उनसे वह शुरू ही हुआ था, अपितु इसकी शाखाएं राजमहल (लालकिला) और शहर (दिल्ली) में फैली हुई थीं।’

(7) ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक समस्या के मुख्य कारण 1857 की क्रांति

यह सच है कि ई.1857 की क्रांति में हिन्दुओं की अपेक्षा मुसलमानों ने अधिक बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था किंतु इस सच्चाई से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि इस क्रांति में देश के केवल 1/3 मुसलमानों ने भाग लिया था। बड़ी मुस्लिम शक्तियों में केवल अवध की बेगम जीनत महल तथा लाल किले का बादशाह बहादुरशाह ही इस क्रांति में सम्मिलित हुए थे। जबकि व्यापक फलक पर नाना साहब, झांसी की रानी, तात्या टोपे, कुंवरसिंह और अवध के हिन्दू ताल्लुकेदारों ने क्रांति का वास्तविक संचालन किया था।

लॉर्ड केनिंग आरम्भ में इसे मुसलमानों द्वारा किया गया षड्यन्त्र मानते थे किंतु बाद में उन्होंने अपनी धारणा बदल ली। उन्होंने भारत सचिव को लिखे एक पत्र में स्वीकार किया- ‘मुझे कोई संदेह नहीं है कि यह विद्रोह ब्राह्मणों और दूसरे लोगों के द्वारा धार्मिक बहानों पर राजनीतिक उद्देश्यों के लिये भड़काया गया था।’

उपरोक्त तथ्यों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि जहाँ हिन्दू सेनानायक, विदेशी शासन से मुक्ति के लिये लड़े, वहीं मुसलमानों के एक बड़े वर्ग ने बहादुरशाह के नेतृत्व में मुगल शासन की पुनर्स्थापना के लिये संघर्ष किया। लॉर्ड केनिंग द्वारा प्रस्तुत इस निष्कर्ष के उपरांत भी भारत में नियुक्त अंग्रेज पूरी तरह हिन्दुओं अथवा पूरी तरह मुसलमानों को इस क्रांति के लिए जिम्मेदार नहीं ठहरा सके किंतु उनमें यह सामान्य धारणा बन गई थी कि ई.1857 की क्रांति में हिन्दुओं की अपेक्षा मुसलमानों ने अधिक उत्साह दिखाया था।

बहुत से अंग्रेज मानते थे कि ई.1857 का विद्रोह मुसलमानों द्वारा, अपने खोये हुए शासन की पुनर्प्राप्ति का प्रयास था। अतः इस क्रांति के दमन के बाद अँग्रेजों ने मुसलमानों पर विश्वास करना बंद करके हिन्दुओं का पक्ष लेना आरम्भ कर दिया। शासन के इस असमान व्यवहार के कारण हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच दूरियां और बढ़ीं। इस नीति से अंग्रेज हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सैंकड़ों सालों से चली आ रही खाई को और चौड़ी करके उसका लाभ अपने पक्ष में लेना चाहते थे।

………… लगातार (2)

सैयदअहमद का अलीगढ़ आन्दोलन

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सैयदअहमद का अलीगढ़ आन्दोलन ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक समस्या के मुख्य कारणों में से था किंतु दुर्भाग्यवश भारत की आजादी से पहले और आजादी प्राप्त करने के बाद कम्युनिस्ट लेखकों ने सर सैयद को देश के बहुत बड़े समाज-सुधारक के रूप में प्रस्तुत किया।

ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक समस्या के मुख्य कारण – 2

पिछले आलेख में हमने ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक समस्या के मुख्य कारणों की चर्चा की थी। सर सैयदअहमद का अलीगढ़ आन्दोलन भी इस समस्या का मुख्य कारण सिद्ध हुआ।

1857 की क्रांति के असफल रहने के बाद अँग्रेजों के साथ सामंजस्य के प्रश्न पर मुस्लिम समाज में दो वर्ग उभर कर सामने आये। एक वर्ग तो वह था जो किसी भी कीमत पर ब्रिटिश सत्ता से समझौता अथवा सहयोग करने के विरुद्ध था तथा हिंसात्मक साधनों से ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकना चाहता था।

इसके विपरीत दूसरा वर्ग ब्रिटिश सत्ता की स्थिरता चाहता था तथा मुस्लिम समुदाय के विकास के लिए पश्चिमी शिक्षा को महत्त्वपूर्ण मानता था। पहले वर्ग का प्रतिनिधित्व सैयद अहमद बरेलवी ने किया, जबकि दूसरे वर्ग की विचारधारा ने अलीगढ़ आन्दोलन को जन्म दिया, जिसका नेतृत्व सर सैयद अहमद खाँ ने किया। सैयद अहमद का जन्म 17 अप्रैल 1817 को दिल्ली में हुआ।

ई.1846 से 1854 तक वे ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधीन दिल्ली के सदर अमीन रहे। ई.1855 में उनका बिजनौर स्थानान्तरण हो गया। ई.1857 की क्रांति के समय वह बिजनौर में थे। उन्होंने क्रांति के समय बहुत से अँग्रेजों के प्राण बचाये। इससे उन्हें अँग्रेजों की सद्भावना प्राप्त हो गई। इस सद्भावना का उपयोग उन्होंने भारतीय मुसलमानों के हितों के लिये किया।

उस समय भारतीय मुसलमान अपने अतीत की यादों में खोये हुए थे और अँग्रेजों के साथ उनके सम्बन्ध अच्छे नहीं थे। मुसलमानों में अँग्रेजी शिक्षा के प्रति धार्मिक और सांस्कृतिक उदासीनता थी। सैयद अहमद खाँ ने अपने जीवन के प्रमुख दो उद्देश्य बनाये- पहला, अंग्रेजों एवं मुसलमानों के सम्बन्ध मधुर बनाना और दूसरा, मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा का प्रसार करना। उन्होंने मुसलमानों को समझाया कि ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादार रहने से ही उनके हितों की पूर्ति हो सकती है तथा अँग्रेज अधिकारियों को समझाया कि मुसलमान हृदय से अँग्रेजी शासन के विरुद्ध नहीं हैं। अँग्रेजों की थोड़ी सी सहानुभूति से वे सरकार के प्रति वफादार हो जायेंगे।

अँग्रेजों ने भी मुसलमानों के प्रति उदारता का रुख अपनाना उचित समझा, क्योंकि हिन्दुओं में बढ़ती हुई राष्ट्रीयता के विरुद्ध वे मुस्लिम साम्प्रदायिकता का उपयोग कर सकते थे। अतः सर सैयद अहमदखाँ को अपने प्रथम उद्देश्य में शीघ्र ही सफलता मिल गई। वास्तविकता यह थी कि सर सैयद अहमद ने स्वयं को मुस्लिम कुलीन वर्ग के हित-चिंतन तक ही सीमित रखा था।

जब उन्होंने मुसलमानों को हिन्दुओं से पृथक करने तथा उनमें हिन्दुओं के प्रति घृणा फैलाने का कार्य आरम्भ किया, तब अँग्रेजों ने सर सैयद का ऐसा प्रचार किया जैसे वे समस्त मुस्लिम-सम्प्रदाय के एक-मात्र उन्नायक हों। भारत के अनपढ़ एवं संकीर्णतावादी मुसलमानों ने सर सैयद अहमदखाँ का साथ दिया परन्तु जागृत एवं प्रगतिशील मुसलमानों ने ई.1885 में स्थापित कांग्रेस को अपना समर्थन दिया तथा सर सैयद की राष्ट्र-विरोधी एवं भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन को शिथिल करने की नीति का समर्थन नहीं किया।

सैयद अहमद खाँ ने अपने दूसरे उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपने विचारों और कार्यक्रमों का केन्द्र अलीगढ़ को बनाया। अलीगढ़ से किये गये समस्त प्रयासों को समग्र रूप से अलीगढ़ आन्दोलन कहा जाता है। अलीगढ़ आन्दोलन ने मुसलमानों की शिक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किया। ई.1875 में सर सैयद अहमदखाँ ने अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कॉलेज की स्थापना की।

उत्तर प्रदेश के गवर्नर म्यूर ने इस कॉलेज को भूमि प्रदान की। जनवरी 1877 में लॉर्ड लिटन ने इस कॉलेज का उद्घाटन किया। इस प्रकार, आरम्भ से ही इस संस्था पर अंग्रेजों की विशेष कृपा-दृष्टि रही। लॉर्ड लिटन को दिये गये स्मृति-पत्र के अनुसार इस कॉलेज ने ब्रिटिश ताज के प्रति नवचेतना लाने और मुसलमानों को संगठित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अलीगढ़ आन्दोलन के विचारों को प्रचारित करने के लिए सर सैयद ने ई. 1886 में ऑल इंडिया मुहम्मडन एजुकेशनल कांग्रेस की स्थापना की।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अन्तर स्पष्ट करने के लिए ई.1890 में इसका नाम बदलकर ऑल इंडिया मुहम्मडन एजुकेशन कांफ्रेंस किया गया। अलीगढ़ कॉलेज का मुख्य उद्देश्य मुस्लिम युवाओं में पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार करना था किन्तु शीघ्र ही वहाँ का मुख्य काम राष्ट्रविरोधी और साम्प्रदायिक वातावरण तैयार करना हो गया। वहाँ से प्रकाशित अलीगढ़ इन्स्टीट्यूट गजट शैक्षणिक विषयों पर ध्यान केन्द्रित न करके राजनीतिक क्रिया-कलापों की खिल्ली उड़ाने और गाली-गलौच करने लगा।

यद्यपि कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश अधिकारियों के प्रोत्साहन एवं सहयोग से हुई थी तथापि जब कांग्रेस उनके द्वारा निर्देशित मार्ग पर न जाकर, ब्रिटिश शासन की आलोचना का मंच बन गई तो ब्रिटिश नौकरशाही का रुख कांग्रेस-विरोधी हो गया। सैयद अहमद खाँ ने कांग्रेस का विरोध आरम्भ से ही किया था। जब ब्रिटिश शासकों का रुख कांग्रेस के विरुद्ध होने लगा तो सैयद अहमद ने कांग्रेस पर हमला और भी तेज कर दिया। उन्होंने मुसलमानों को कांग्रेस से दूर रखने का प्रयास किया।

ई.1887 में सर सैयद ने कहा- ‘कांग्रेस में हिन्दू, बंगालियों के साथ मिलकर अपनी शक्ति बढ़ाना चाहते थे जिससे वे मुसलमानों के धर्म-विरोधी कार्यों को दबा सकें।’ सर सैयद अहमद मुसलमानों के ऐतिहासिक महत्त्व का बखान करके हिन्दुओं तथा मुसलमानों में गहरी खाई उत्पन्न करना चाहते थे ताकि मुसलमानों को पृथकतावादी राजनीति के लिये तैयार किया जा सके।

उन्होंने इस बात का प्रचार करना आरम्भ किया कि यदि प्रतिनिधि मूलक जनतांत्रिक सरकार बन गई और ब्रिटिश शासन का अन्त हो गया और सत्ता भारतीयों को हस्तांतरित कर दी गई तो हिन्दू, मुसलमानों पर शासन करेंगे। उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं के समकालिक करने की कांग्रेस की मांग को मुसलमानों के हितों के विरुद्ध बताया, क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र में मुस्लिम समुदाय काफी पिछड़ा हुआ था।

ई.1887 में उन्होंने मुसलमानों के पिछड़ेपन को लेकर लिखा- ‘जितना अनुभव और जितना विचार किया जाता है, सबका निर्णय यह निकलता है कि अब भारत के मुसलमानों को भारत की अन्य कौमों से समानता कर पाना असम्भव सा लगता है। बंगाली तो अब इतना आगे बढ़ गये कि यदि बंगाल, हिन्दुस्तान और पंजाब के मुसलमान पंख लगाकर भी उड़ें तो उनको पकड़ नहीं सकते। भारत की हिन्दू कौमों ने भी उन्नति करके मैदान में मुसलमानों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। यदि मुसलमान दौड़कर भी चलें तो भी उनको पकड़ नहीं सकते।’

इस प्रकार सैयदअहमद का अलीगढ़ आन्दोलन भारत की राजनीति में साम्प्रदायिक रंग घोल घोलने वाला मुख्य कारक था। दिया। उन्होंने मुसलमानों के हितों की राजनीति करने के नाम पर जिन उपायों एवं वक्तव्यों का सहारा लिया, वे राष्ट्रीय जीवन के मार्ग को अवरुद्ध करने वाले सिद्ध हुए। उनकी साम्प्रदायिक राजनीति के दो हथियार थे-

(1) ब्रिटिश राज्य के प्रति अटूट स्वामि-भक्ति और

(2) मुसलमानों की पृथक् राजनीति।

अलीगढ़ आन्दोलन ने जिस मुस्लिम बौद्धिक जागरूकता का विकास किया उससे भारतीय मुसलमानों को अपनी अलग पहचान स्थापित करने में सहायता मिली। इसी कारण आगे चलकर उन्हें राजनैतिक रूप से संगठित होने का अवसर मिला।

………… लगातार (3)

फूट डालो राज करो

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फूट डालो राज करो – ब्रिटिश-भारत में साम्प्रदायिक समस्या के मुख्य कारण (3)

बहुत से लोग अंग्रेजों पर आरोप लगाते हैं कि उन्होंने भारत पर शासन करने के लिए हिन्दुओं एवं अंग्रेजों में फूट डालो राज करो की नीति का अनुसरण किया। ऐतिहासिक सच्चाई यह है कि हिन्दुओं एवं मुसलमानों में फूट पहले से ही विद्यमान थी, अंग्रेजों ने तो उसे बढ़ावा देकर अपना स्वार्थ सिद्ध करने का प्रयास किया।

भारत में साम्प्रदायिक समस्या के बहुत से तत्व भारत में ही मौजूद थे जिनका अंग्रेजों ने भरपूर लाभ उठाया तथा भारत के राष्ट्रीय जीवन में कदम कदम पर फूट डालो राज करो की नीति का अनुसरण किया।

(8) थियोडर बेक का कांग्रेस विरोधी अभियान

अलीगढ़ कॉलेज के प्रिंसीपल थियोडर बेक ने कांग्रेस-विरोधी अभियान में सर सैयद को महत्त्वपूर्ण सहयोग दिया। बेक ने अलीगढ़ के छात्रों को कांग्रेस से दूर रखने के लिए छात्रावासों में जाकर तथा छात्रों को अपने घर बुलाकर उनके मस्तिष्क में कांग्रेस-विरोधी जहर भरा। कांग्रेस-विरोधी राजनीतिक विचारों को इंग्लैण्ड में प्रचारित करने के लिए बेक की सहायता से अगस्त 1888 में यूनाइटेड इण्डियन पेट्रियाटिक एसोसिएशन की स्थापना की गई।

बेक द्वारा कांग्रेस की नीतियों के विरोध में की जा रही कार्यवाहियों का एक मात्र लक्ष्य यह था कि ब्रिटिश सरकार कांग्रेस की मांगों को स्वीकार न करे। फिर भी ई.1892 में भारतीय परिषद् अधिनियम पारित हो गया। अतः पुनः मुस्लिम हितों की रक्षा के लिए बेक ने सर सैयद के सहयोग से दिसम्बर 1893 में मुहम्मडन एंगलो-ओरियंटल डिफेन्स एसोसिएशन की स्थापना की। वे इस संस्था के माध्यम से भारतीय मुसलमानों को एक राजनीतिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत कर अँग्रेजी राज्य से उनके लिए अधिक से अधिक लाभ उठाने का प्रयास कर रहे थे।

एसोसिएशन द्वारा मुसलमानों को बिना किसी प्रवेश-परीक्षा के तकनीकी शिक्षा संस्थानों में प्रवेश, व्यवस्थापिका सभा तथा अन्य स्थानीय स्वशासी निकायों में मुसलमानों के समुचित प्रतिनिधित्व तथा साम्प्रदायिक प्रणाली के आधार पर पृथक् निर्वाचन-पद्धति की स्थापना की मांग की गई। इन मांगों के लिए प्रस्तुत आधारभूत सिद्धान्त इस प्रकार थे-

(क) जिन नगरों में मुस्लिम जनसंख्या 15 प्रतिशत थी, वहाँ की नगर पालिका में कम-से-कम एक मुस्लिम सदस्य अवश्य होना चाहिए।

(ख) जिन नगरों में मुस्लिम जनसंख्या 15 प्रतिशत से 25 प्रतिशत तक थी, वहाँ की नगर पालिका में मुसलमान सदस्यों की संख्या लगभग आधी होनी चाहिए।

(ग) जिन नगरों में मुस्लिम जनसंख्या 25 प्रतिशत से अधिक हो, वहाँ आधे सदस्य अवश्य मुसलमान होने चाहिए।

एसोसिएशन के उद्घाटन भाषण में बेक ने कहा- ‘इस समय देश में दो आन्दोलन चल रहे हैं- पहला, राष्ट्रीय कांग्रेस का और दूसरा गो-हत्या विरोधी। पहला आन्दोलन ब्रिटिश-विरोधी है और दूसरा मुस्लिम-विरोधी।’ बेक ने अपने एक लेख में गृह-सरकार की इस बात के लिए निन्दा की कि वह देशद्रोही आन्दोलनकारियों के दबाव में आकर उनकी मांगें स्वीकार करती जा रही है। ई.1898 में सर सैयद अहमद खाँ का और अगले वर्ष बेक का देहान्त हो गया। उनके देहान्त के बाद उनकी कांग्रेस विरोधी राजनीति को थियोडर मॉरिसन ने आगे बढ़ाया। उसने घोषणा की कि- ‘यदि भारत में प्रजातन्त्र की स्थापना होती है तो यहाँ अल्पसंख्यकों की स्थिति लकड़हारों एवं भिश्तियों जैसी हो जायेगी।’

(9) हिन्दुओं द्वारा अपने सांस्कृतिक उत्थान के प्रयास

ब्रिटिश काल में हिन्दू समाज में नई चेतना उत्पन्न हुई। मुसलमानों के शासन काल में हिन्दू अपने समस्त राजनीतिक अधिकार खो चुके थे तथा उनमें शासन का विरोध करने का साहस नहीं बचा था किंतु अँग्रेजों के शासन-काल में पाश्चात्य शिक्षा के कारण हिन्दू-युवाओं में शासन के विरुद्ध संघर्ष करने का नवीन साहस उत्पन्न हुआ तथा हिन्दू समाज में राष्ट्रीयता की भावना का पुनः उदय हुआ। यही कारण है कि राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व प्रायः हिन्दू नेताओं के हाथों में रहा। इस दौरान हिन्दुओं ने अपने सांस्कृतिक उत्थान के लिए कई आंदोलन चलाए-

(क) गौ-रक्षा आंदोलन: ई.1882 में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने गौ रक्षिणी सभा की स्थापना की तथा आर्य समाज ने देश भर में गौ-हत्या के विरुद्ध आन्दोलन छेड़ा। मुसलमानों ने इस आंदोलन का विरोध किया जिसके फलस्वरूप देश के बहुत बड़े हिस्से में साम्प्रदायिक दंगे हुए। इन दंगों में बहुत से मन्दिर, मस्जिद और दुकानें नष्ट कर दी गईं। दोनों सम्प्रदायों के सैंकड़ों लोग घायल हुए।

(ख) बाल गंगाधर तिलक के आंदोलन: महाराष्ट्र में बाल गंगाधर तिलक ने विदेशी सत्ता के विरुद्ध जनमत तैयार करने के लिए छत्रपति शिवाजी एवं भगवान गणेश के नाम पर उत्सव आरम्भ किये। इस कारण मुस्लिम समुदाय, हिन्दुओं के विरुद्ध भड़क गया।

(ग) उर्दू विरोधी आंदोलन: उत्तर-पश्चिमी प्रान्त के न्यायालयों एवं शासन के निम्न स्तरों पर उर्दू भाषा का प्रयोग लम्बे समय से किया जा रहा था किन्तु 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में उर्दू के स्थान पर, हिन्दी को शासन की भाषा के रूप में प्रयोग करने की मांग की जाने लगी। ई.1900 में प्रान्त के लेफ्टिनेन्ट गवर्नर एन्थोनी मेक्डोनेल ने हिन्दी को न्यायालयों की वैकल्पिक भाषा के रूप में स्वीकार कर लिया। उसके इस कदम से मुसलमान, हिन्दुओं के विरुद्ध लामबन्द हो गये।

(घ) शुद्धि आंदोलन: स्वामी दयानन्द सरस्वती ने धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को पुनः हिंदू धर्म मे प्रवेश करने की प्रेरणा देकर शुद्धि आंदोलन चलाया था। इस आंदोलन के तहत लाखों मुसलमानों तथा ईसाइयों की शुद्धि कराकर सत्य सनातन वैदिक धर्म में वापसी कराई गई। 11 फरवरी 1923 को स्वामी श्रद्धानन्द द्वारा भारतीय शुद्धि सभा की स्थापना की गई।

पं. मदनमोहन मालवीय, डॉ. शिवराम मुंजे, भाई परमानंद एवं लाला लाजपतराय, स्वामीजी के इस कार्य के प्रमुख सहयोगी थे। मुसलमानों ने इस आंदोलन का विरोध किया। उन्हीं दिनों आर्य समाज के शुद्धि आंदोलन के विरोध में एक गीत लिखा गया- ‘मेरे मौला बुला ले मदीना मुझे।’ इस गीत की अंतिम पंक्ति थी- ‘यहाँ न जीने देंगे आर्य मुझे।’

(10) कांग्रेस की स्थापना के बाद अंग्रेजों द्वारा मुसलमानों को समर्थन

साम्प्रदायिकता की समस्या को उलझाने में ब्रिटिश नौकरशाहों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अपने शासन के प्रारम्भ में वे मुसलमानों को उच्च पदों पर नियुक्त नहीं करते थे तथा अँग्रेजी शिक्षा प्राप्त हिन्दुओं को प्राथमिकता देते थे। इस कारण ब्रिटिश राज में मुसलमानों की आर्थिक दशा, हिन्दुओं की अपेक्षा अधिक तेजी से खराब हुई। ज्यों-ज्यों राष्ट्रीय आन्दोलन में उग्रता आने लगी, त्यों-त्यों अँग्रेज यह अनुभव करने लगे कि अपनी सत्ता की सुरक्षा के लिए उन्हें मुसलमानों को अपने पक्ष में लेना चाहिये तथा मुसलमानों को हिन्दुओं से दूर किया जाना चाहिये। ई.1905 का बंगाल-विभाजन हिन्दुओं और मुसलमानों को एक-दूसरे से दूर करने के लिए ही किया गया था।

लॉर्ड कर्जन ने पूर्वी-बंगाल के मुसलमानों को भरोसा दिया कि नये सूबे में उनकी वही प्रधानता स्थापित होगी जो कभी मुस्लिम सूबेदारों के युग में होती थी। ई.1911 में बंगाल विभाजन को निरस्त करने से मुस्लिम साम्प्रदायिकता में अत्यधिक वृद्धि हुई क्योंकि अँग्रेज, मुसलमानों को यह समझाने में सफल रहे कि हिन्दुओं के आंदोलन के कारण ही मुसलमान अपना मुस्लिम-बहुल प्रांत खो बैठे।

इस प्रकार जब-जब हिन्दुओं और मुसलमानों ने मिलकर देश की आजादी का बिगुल बजाया, तब-तब अँग्रेजों ने भारत के राष्ट्रीय जीवन में फूट डालो राज करो की नीति का अनुसरण किया। अँग्रेजों ने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति पर चलते हुए मुसमलानों की साम्प्रदायिक भावना को खूब भड़काया।

(11) सरकारी नौकरियों में मुसलमानों का कम प्रतिनिधित्व

ब्रिटिश-भारत में मुसलमानों की जनसंख्या लगभग 23 प्रतिशत थी किंतु ई.1893 से ई.1907 के मध्य विभिन्न विधान सभाओं में मुसलमानों को केवल 12 प्रतिशत स्थान प्राप्त हुए। ई.1904 में किये गये एक सरकारी सर्वेक्षण के अनुसार देश में 75 रुपये या इससे अधिक वेतन पर काम करने वाले हिन्दुओं की संख्या 1,427 थी जबकि ऐसे मुसलमानों की संख्या केवल 213 थी।

जब भारत सचिव लॉर्ड मार्ले ने संवैधानिक सुधारों की घोषणा करके भारत में प्रतिनिधि-शासन-प्रणाली के विस्तार का समर्थन किया तो मुसलमानों में चिन्ता व्याप्त हो गई। उनमें हिन्दुओं के प्रति ईर्ष्या का भाव उत्पन्न हुआ जो अँग्रेजी पढ़-लिखकर अधिक संख्या में नौकरियाँ पा गये थे।

(अध्याय पूर्ण)

गॉड सेव द क्वीन

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गॉड सेव द क्वीन बनाम वन्दे मातरम्

अंग्रेजों ने भारतीयों के मन-मस्तिष्क एवं जीवन के प्रत्येक अंग पर शिकंजा कसने के लिए कई तरह के उपकरण तैयार किए जिनमें ‘ गॉड सेव द क्वीन / किंग ‘ गीत भी सम्मिलित था। ई.1870 के दशक में इस गीत को समस्त सरकारी समारोहों में गाना अनिवार्य कर दिया गया। इस गीत के भाव इस प्रकार थे-

भगवान हमारी दयालु रानी को बचाओ!

लंबे समय तक हमारी महान रानी रहे!

ईश्वर ने रानी को बचाया!

उसे विजय भेजें, खुश और गौरवशाली,

हमारे ऊपर लंबा शासन करने के लिए

ईश्वर ने रानी को बचाया!

हे भगवान हमारे भगवान उठो,

उसके दुश्मनों को बिखराओ,

और उन्हें गिराओ, उनकी राजनीति को समझो,

अपनी कपटपूर्ण चाल एवं हमारी निराशा को

हम अपनी आशा से ठीक करते हैं

भगवान हम सबको बचाओ!

दुकान में आपके सबसे अच्छे उपहार,

उसे डालने से प्रसन्नता हो;

वह लंबे समय तक शासन कर सकती है

वह हमारे कानूनों की रक्षा कर सकती है,

और भी हमें कारण दें,

दिल और आवाज के साथ गाते हैं

ईश्वर ने रानी को बचाया!

गॉड सेव द क्वीन गीत को प्रत्येक सरकारी आयोजन में गाए जाने के आदेश से, बंगाल में नियुक्त डिप्टी कलक्टर बंकिमचन्द्र चटर्जी को बहुत ठेस पहुंची। उन दिनों अंग्रेजों की नीतियों के कारण सम्पूर्ण बंगाल अकाल, भूख एवं महामारी से त्रस्त था जिसके विरोध में बंगाल में सन्यासी विद्रोह अपने चरम पर था। बंकिम चंद्र चटर्जी ने देश की परिस्थितियों को लेकर ई.1876 में ‘आनंदमठ’ नामक उपन्यास की रचना की तथा उसमें एक गीत ‘वन्दे मातरम्’ शीर्षक से लिखा। यह गॉड सेव द क्वीन के प्रतिकार के रूप में लिखा गया था। शीघ्र ही यह देशभक्तों का प्रमुख गीत बन गया-

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वन्दे मातरम्।

सुजलां सुफलाम्/ मलयजशीतलाम्/ शस्यश्यामलाम्/ मातरम्।

शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीम्/ फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीम्

सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्/ सुखदां वरदां मातरम्।

कोटि कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले/

कोटि-कोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले/ अबला केन मा एत बले।

बहुबलधारिणीं/ नमामि तारिणीं/ रिपुदलवारिणीं/ मातरम्

तुमि विद्या, तुमि धर्म/ तुमि हृदि, तुमि मर्म

त्वम् हि प्राणारू शरीरे/ बाहुते तुमि मा शक्ति,

हृदये तुमि मा भक्ति/ तोमारई प्रतिमा गडी मन्दिरे-मन्दिरे

त्वम् हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी/ कमला कमलदलविहारिणी

वाणी विद्यादायिनी /नमामि त्वाम्/ नमामि कमलाम्

अमलां अतुलाम्/ सुजलां सुफलाम्/ मातरम्।

वन्दे मातरम्/ श्यामलाम् सरलाम्/ सुस्मिताम् भूषिताम्

धरणीं भरणीं/ मातरम्।

यह गीत हिन्दुओं के साथ-साथ मुसलमानों ने भी उत्साह के साथ अपनाया किंतु शीघ्र ही कुछ साम्प्रदायिक-विचारों वाले मुसलमानों ने इस गीत को इस्लाम के विरुद्ध घोषित कर दिया। उनके अनुसार मुसलमान अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य के समक्ष सजदा नहीं कर सकते थे तथा इस गीत में भारत माता की वंदना की गई थी जो न केवल मूर्तिपूजा को स्वीकार करने जैसा था अपितु अल्लाह के अलावा भी किसी अन्य के समक्ष सिर झुकाने जैसा था।

इस प्रकार ब्रिटिश काल में भारतीय समाज तीन भागों में बंट गया। अंग्रेजों को नारे एवं गीत के रूप में गॉड सेव द क्वीन चाहिए था, हिन्दुओं को वन्दे मातरम् चाहिए था और मुसलमानों के लिए अल्लाह हो अकबर ही एकमात्र अभीष्ट था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कांग्रेस का जन्म

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ब्रिटिश नौकरशाही के गर्भ से कांग्रेस का जन्म

कांग्रेस का जन्म भारतीय जनमानस के चिंतन का परिणाम नहीं था। कांग्रेस का जन्म ब्रिटिश नौकरशाही के गर्भ से हुआ था। इसलिए यह संस्थान अपने जन्म से लेकर आज तक भारतीय संस्कृति को नहीं समझ सकी।

ए. ओ. ह्यूम और कांग्रेस की स्थापना

भारत का शासन वायसराय की काउंसिल द्वारा लगभग पूर्णतः निरंकुश रूप से चलाया जाता था। ई.1858 में ब्रिटिश क्राउन द्वारा भारत की सत्ता ग्रहण करने के बाद ब्रिटिश सांसदों द्वारा भारत में संवैधानिक व्यवस्था लागू करने की मांग होने लगी। इसलिए ई.1861 में ब्रिटिश संसद ने इल्बर्ट बिल के माध्यम से भारत में अनेक विधिक सुधार किए।

इसके बाद पूरे भारत में एक ऐसी संस्था की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी जो देश की समस्याओं को एक साझा मंच दे सके और ब्रिटिश शासन इस संस्था से बात करके इन समस्याओं का समाधान कर सके ताकि जनता में बढ़ते हुए असंतोष को रोका जा सके।

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उन्हीं दिनों भारत में नियुक्त अंग्रेज अधिकारी सर एलन ओक्टावियन ह्यूम ने कुछ गुप्त सरकारी रिपोर्टें देखीं जिनसे उसे आभास हुआ कि भारतवासियों का बढ़ता हुआ असन्तोष किसी भी समय राष्ट्रीय विद्रोह का रूप धारण कर सकता है जिसका स्वरूप 1857 के विद्रोह से भी अधिक भयानक हो सकता है। अतः ए. ओ. ह्यूम ने सरकार के सहयोग से एक ऐसी राजनीतिक संस्था स्थापित करने की योजना बनाई जो सरकार के समक्ष भारत की राजनीतिक समस्याओं को प्रस्तुत कर सके तथा सरकार उससे विचार विमर्श करके जनता की समस्याओं को सुलझा सके। इस प्रकार जनता में पनप रहे असंतोष को ठण्डा किया जा सके।

ए. ओ. ह्यूम का जन्म 6 जून 1829 को इंग्लैण्ड में हुआ था। उसका पिता ब्रिटिश सांसद था। ह्यूम ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हेलबरी कॉलेज में प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की थी तथा यूनिवर्सिटी कॉलेज हॉस्पीटल से चिकित्सा विज्ञान की उपाधि प्राप्त करने के बाद ई.1849 से वह भारत में काम कर रहा था।

ई.1857 की क्रांति के समय वह इटावा का कलक्टर था किंतु कलक्टर होते हुए भी उसे इटावा से भागकर 6 माह के लिये आगरा के किले में शरण लेनी पड़ी थी। उसके बाद वह विभिन्न पदों पर काम करता हुआ ई.1870 में भारत सरकार में सचिव बन गया तथा ई.1879 में सेवानिवृत्त होकर जनसेवा में जुट गया। ई.1885 में ह्यूम और उसके मित्रों ने तत्कालीन वायसराय लॉर्ड डफरिन को एक राजनीतिक संस्था गठिन करने के विषय में सुझाव दिया।

लॉर्ड डफरिन ने इस सुझाव पर सहमति जताते हुए कहा- ‘भारत में ऐसी कोई संस्था नहीं है जो इंग्लैण्ड के विरोधी दल की भाँति यहाँ भी कार्य कर सके और सरकार को यह बता सके कि शासन में क्या त्रुटियाँ हैं और उन्हें कैसे दूर किया जा सकता है!’

ह्यूम की इच्छा थी कि बम्बई के गवर्नर को इसका अध्यक्ष बनाया जाये परन्तु लॉर्ड डफरिन ने कहा- ‘गवर्नर को ऐसी संस्थाओं की अध्यक्षता नहीं करनी चाहिए। क्योंकि उसकी उपस्थिति में लोग अपने विचार स्वतन्त्रता पूर्वक प्रकट नहीं कर सकेंगे।’ इसके बाद ह्यूम इंग्लैण्ड गया और वहाँ उसने लॉर्ड रिपन, लॉर्ड डलहौजी तथा लॉर्ड ब्राइस आदि प्रख्यात ब्रिटिश राजनीतिज्ञों से इस संस्था के गठन के सम्बन्ध में विचार-विमर्श किया।

इंग्लैण्ड से भारत लौटकर ह्यूम ने भारत में पहले से ही चल रही एक संस्था नेशनल यूनियन का नाम बदल कर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस रखा तथा मई 1885 में भारतीय नेताओं के नाम एक परिपत्र जारी किया जिसके माध्यम से उसने दिसम्बर के अन्तिम सप्ताह में देश के समस्त भागों के प्रतिनिधियों की एक सभा पूना में बुलाई। उसने इस सभा के दो उद्देश्य बताये-

(1) राष्ट्र की प्रगति के कार्य में लगे लोगों का एक-दूसरे से परिचय।

(2) इस वर्ष में किये जाने वाले कार्यों की चर्चा और निर्णय।

पूना में प्लेग फैल जाने का कारण कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन पूना की बजाय बम्बई में किया गया। 28 दिसम्बर 1885 को बम्बई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज भवन में हुए इस अधिवेशन की अध्यक्षता उमेशचन्द्र बनर्जी ने की। इसमें देश के विभिन्न भागों से आये 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

इन प्रतिनिधियों में बैरिस्टर, सॉलिसिटर, वकील, व्यापारी, जमींदार, साहूकार, डॉक्टर, समाचार पत्रों के सम्पादक और मालिक, निजी कॉलेजों के प्रिंसिपल और प्रोफेसर, स्कूलों के प्रधानाध्यापक, धार्मिक गुरु और सुधारक आदि विभिन्न प्रकार के लोग थे। इनमें दादाभाई नौरोजी, फीरोजशाह मेहता, वी. राघवचार्य, एस. सुब्रह्मण्यम्, दिनेश वाचा, काशीनाथ तेलंग आदि नेता एवं सामाजिक कार्यकर्ता प्रमुख थे।

यह सम्मेलन सफल रहा और राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक संस्था भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जन्म हुआ। अधिवेशन की समाप्ति पर ह्यूम के आग्रह पर महारानी विक्टोरिया की जय के नारे लगाये गये।

ह्यूम ने सदस्यों का आह्वान इन शब्दों में किया- ‘हम सभी तीन बार ही नहीं, तीन का तीन गुना और यदि हो सके तो नौ गुना अर्थात् 27 बार उस महान विभूति की जय बोलें जिसके जूतों के फीते खोलने योग्य भी मैं नहीं हूँ, जिसके लिये आप सब प्रिय हैं और जो आप सबको अपने बच्चों के समान समझती हैं। सब मिलकर बोलिए महामहिम महारानी विक्टोरिया की जय……..।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कांग्रेस स्थापना के उद्देश्य एवं कारण

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अंग्रेजों द्वारा कांग्रेस की स्थापना की गई थी। इसलिए सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि कांग्रेस स्थापना के उद्देश्य एवं कारण अंग्रेजी राज्य के विस्तार एवं सुदृढ़ीकरण हेतु थे न कि भारतीयों का उद्धार करने के लिए।

इसलिए कांग्रेस स्थापना के उद्देश्य एवं कारण दो भागों में रख सकते हैं। कांग्रेस की स्थापना के घोषित उद्देश्य अलग थे और वास्तविक उद्देश्य अलग। कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन के अध्यक्षीय भाषण में उमेशचन्द्र बनर्जी ने कांग्रेस स्थापना के उद्देश्य एवं कारण निम्नलिखित बताए-

(1) सारे भारतवर्ष में देशहित में काम करने वाले लोगों का आपस में सम्पर्क बढ़ाना और उनमें मित्रता की भावना उत्पन्न करना।

(2) व्यक्तिगत मित्रता और मेल-जोल से देशप्रेमियों में जाति-पाँति के भेदभाव, वंश, धर्म और प्रान्तीयता की संकीर्ण भावनाओं का नाश करके राष्ट्रीय एकता की जनभावनाओं का विकास करना जिनकी उत्पत्ति लॉर्ड रिपन के काल में हुई थी।

(3) पूरे वाद-विवाद के बाद भारत में शिक्षित लोगों की सामाजिक समस्याओं के बारे में सम्मतियाँ प्राप्त कर उनका प्रामाणिक संग्रह तैयार करना।

(4) उन तरीकों पर विचार कर निर्णय करना जिनके अनुसार आने वाले बारह महीनों में राजनीतिज्ञ देशहित के लिये कार्य करेंगे।

प्रथम अधिवेशन में नौ प्रस्ताव पारित हुए जिनमें विभिन्न विषयों पर सुधारों की मांग की गई। इन प्रस्तावों से भी कांग्रेस के उद्देश्यों की जानकारी मिलती है। प्रथम प्रस्ताव में भारतीय प्रशासन की जांच के लिए एक रॉयल कमीशन नियुक्त करने तथा द्वितीय प्रस्ताव में केन्द्रीय एवं प्रान्तीय व्यवस्थापिका सभाओं में नामित सदस्यों के स्थान पर निर्वाचित भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाने की मांग की गई।

अन्य प्रस्तावों में सैनिक खर्च में कमी, भारत और इंग्लैण्ड में सिविल सर्विस प्रतियोगिता परीक्षाओं को साथ-साथ कराने और आयात करों में वृद्धि करने आदि मांगें की गईं। इन समस्त प्रस्तावों पर भारत में पहले से ही विभिन्न मंचों पर चर्चा चल रही थी।

कांग्रेस की स्थापना के वास्तविक कारण

सेवानिवृत्त वरिष्ठ अँग्रेज नौकरशाह द्वारा कांग्रेस की स्थापना में अत्यधिक रुचि लेने की बात ने आरम्भ से ही कांग्रेस की स्थापना के वास्तविक कारणों को विवादास्पद बना दिया। नन्दलाल चटर्जी ने लिखा है- ‘कांग्रेस रूसी भय की सन्तान थी।’

एन्ड्रूज और मुखर्जी ने अपनी पुस्तक राइज एण्ड ग्रोथ ऑफ द कांग्रेस इन इण्डिया में लिखा है- ‘कांग्रेस की स्थापना के ठीक पहले जैसी स्थिति थी, वैसी 1857 के बाद इससे पहले कभी नहीं हुई थी।’

बहुत से इतिहासकारों का मानना है कि कांग्रेस स्थापना के उद्देश्य एवं कारण ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा में निहित थे। इन इतिहासकारों के अनुसार कांग्रेस का जन्म इसलिए हुआ क्योंकि ब्रिटिश शासक इसकी आवश्यकता समझते थे।

यह राष्ट्रीय आन्दोलन के स्वाभाविक विकास का नहीं, राष्ट्रीय आन्दोलन में साम्राज्यवादी हस्तक्षेप का परिणाम था। इस मत के विपरीत कुछ इतिहासकारों का मानना है कि कांग्रेस की स्थापना केवल ब्रिटिश साम्राज्य के हितों की रक्षा के उद्देश्य से नहीं की गई थी, उसके और भी कारण थे। इन कारणों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है-

(अ) कांग्रेस की स्थापना साम्राज्य की रक्षा के लिए हुई

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(1) ह्यूम उच्च सरकारी अधिकारी रह चुका था। उसे भारत में बढ़ते हुए खतरनाक असन्तोष की जानकारी थी। गवर्नर जनरल लॉर्ड लिटन (ई.1876-80) के समय ह्यूम ने एक रिपोर्ट भारत सरकार को भेजी थी जिसमें लिखा था-

‘मुझे निम्नलिखित साक्ष्यों ने आश्वस्त कर दिया है कि हम एक भीषण विस्फोट के कगार पर हैं। मुझे 7 बड़े-बड़े पोथे दिखाये गये जिनमें देशी भाषा में लिखे विविध रपटों और परचों के अँग्रेजी में सारांश तथा अनुवाद थे। ये सब रपटें जिला, तहसील, परगना, शहर, कस्बा तथा गांवों के क्रम से संकलित थीं। ये रपटें तीस हजार से अधिक सूत्रों से प्राप्त की गई थीं। इनसे प्रकट होता था कि गरीब तबके के लोगों में गहरी निराशा छाई हुई थी। उनके मन में यह विश्वास जम गया था कि वे भूखे रहकर मर जायेंगे…… वे कुछ करना चाहते थे। कुछ हिंसात्मक कार्य……।’

इसीलिए उसने ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा के उद्देश्य से कांग्रेस की स्थापना में इतनी अधिक रुचि ली। ह्यूम ने सर आकले कारविन को एक पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि कांग्रेस की स्थापना का उद्देश्य, अँग्रेजी शासकों के कार्यों के फलस्वरूप उत्पन्न एक प्रबल और उमड़ती हुई शक्ति के निष्कासन के लिए रक्षा-नली (सेफ्टी फनल) का निर्माण करना था।

(2) बढ़ते हुए भारतीय असन्तोष से ब्रिटिश साम्राज्य को बचाने का एकमात्र रास्ता इस आन्दोलन को वैधानिक मार्ग पर लाना था, ह्यूम इसी निष्कर्ष पर पहुँचे थे। लाला लाजपतराय ने लिखा है– ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य अँग्रेजी साम्राज्य को खतरे से बचाना था। भारत की राजनैतिक स्वतन्त्रता के लिए प्रयास करना नहीं, अँग्रेजी साम्राज्य के हितों की पुष्टि करना था।’

सर विलियम वेडरबर्न का मत है- ‘भारत में असन्तोष की बढ़ती हुई शक्तियों से बचने के लिए एक सेफ्टी-वाल्व (रक्षा-अवरोधक) की आवश्यकता है और कांग्रेस से बढ़कर अन्य कोई सेफ्टी-वाल्व नहीं हो सकता।’

(3) सरकार के व्यवहार से भी तथ्य की पुष्टि होती है कि कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा के लिए की गई थी। प्रारम्भिक अधिवेशनों में कांग्रेस प्रतिनिधियों को गवर्नरों द्वारा गार्डन पार्टियाँ दी गईं और अधिवेशन की व्यवस्था में भी पूरा सहयोग दिया गया परन्तु जब ऐसे लोग जिन्हें ब्रिटिश शासक नहीं चाहते थे, कांग्रेस में घुस आए और कांग्रेस ने ब्रिटिश शासकों की इच्छा के विरुद्ध मार्ग पकड़ लिया तब लॉर्ड डफरिन और ब्रिटिश शासक, कांग्रेस के विरुद्ध हो गये और उसको समाप्त करने का प्रयास करने लगे। क्योंकि कांग्रेस, ब्रिटिश सरकार की तीव्र आलोचना करने लगी थी। सरकार के इस आचरण से स्पष्ट है कि अँग्रेज, कांग्रेस की स्थापना अँग्रेजी साम्राज्य के सुरक्षा कवच के रूप में करना चाहते थे।

(4) डा. नन्दलाल चटर्जी का मानना है कि कांग्रेस की स्थापना के समय भारत पर रूसी आक्रमण का भय था। अतः अँग्रेज भारत की राजनीतिक स्थिति सुधारने के लिए प्रयत्नशील थे ताकि युद्ध की स्थिति में भारतीयों का सहयोग लिया जा सके। रूसी आक्रमण का भय समाप्त होते ही सरकार ने कांग्रेस के प्रति अपने रुख में परिवर्तन कर लिया।

(5) रजनी पाम दत्त ने लिखा है- ‘कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश सरकार की पूर्व-निश्चित गुप्त योजना का अंग थी।’

(ब.) कांग्रेस की स्थापना केवल साम्राज्य की रक्षा के लिए नहीं हुई

कुछ विद्वानों का मत है कि कांग्रेस स्थापना के उद्देश्य एवं कारण केवल ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा में निहित नहीं थे, अपितु अत्यंत व्यापक थे। कांग्रेस के जन्मदाता इसे केवल सरकार समर्थित संस्था बनाना नहीं चाहते थे। इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जाते हैं-

(1) यह सही है कि कांग्रेस के संस्थापकों में से कुछ का उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा करना था परन्तु उनका उद्देश्य राष्ट्रीय चेतना को दबाना नहीं था। वे सरकार विरोधी असन्तोष को हिंसक रास्ते पर जाने से रोक कर वैधानिक मार्ग की ओर मोड़ना चाहते थे। स्वयं वेडरबर्न ने कहा था कि कांग्रेस की भूमिका इंग्लैण्ड के विरोधी दल के समान होनी चाहिए। वायसराय डफरिन भी ऐसा ही चाहते थे।

(2) सामान्यतः यह कहा जाता है कि ह्यूम एक भूतपूर्व अँग्रेज अधिकारी थे और वे ऐसी किसी संस्था की स्थापना क्यों करते जो ब्रिटिश साम्राज्य विरोधी हो? इसके उत्तर में कहा जाता हे कि ह्यूम व्यक्तिगत रूप से उदारवादी विचारधारा से प्रभावित थे और वे चाहते थे कि भारत में ब्रिटिश शासन प्रजातांत्रिक रूप से काम करे। इसके अलावा, कांग्रेस का प्रारम्भिक रुख भी अँग्रेजों का विरोधी नहीं था।

(3) ई.1888 में ह्यूम ने कांग्रेस के मंच से जो भाषण दिया उससे भी पता चलता है कि ह्यूम का उद्देश्य केवल ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा करना नहीं था। उन्होंने अपने भाषण में जहाँ एक तरफ ब्रिटिश सरकार की निरंकुशता की आलोचना की, वहीं दूसरी तरफ देश में राजनीतिक जागरण की बात भी कही ताकि सरकार पर दबाव डाला जा सके। अपने भाषण में ह्यूम ने कहा था-

‘हमारे शिक्षित भारतीयों ने अलग-अलग रूप में, हमारे अखबारों ने व्यापक रूप में तथा हमारी राष्ट्रीय महासभा के समस्त प्रतिनिधियों ने एक स्वर से सरकार को समझाने की चेष्टा की है किन्तु सरकार ने जैसा कि प्रत्येक स्वेच्छाचारी सरकार का रवैया होता है, समझने से इन्कार कर दिया है। अब हमारा कार्य यह है कि देश में अलख जगाएँ, ताकि हर भारतीय जिसने भारत माता का दूध पिया है, हमारा साथी, सहयोगी तथा सहायक बन जाये और यदि आवश्यकता पड़े तो……..स्वतन्त्रता, न्याय तथा अधिकारों के लिये जो महासंग्राम हम छेड़ने जा रहे हैं, उसका सैनिक बन जाये।’

(4) कांग्र्रेस की स्थापना केवल ह्यूम ने नहीं की थी। दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, उमेश चन्द्र बनर्जी, फीरोजशाह मेहता, जस्टिस रानाडे आदि भारतीय नेताओं ने भी सक्रिय सहयोग दिया था। यह सम्भव नहीं है कि इन भारतीय नेताओं ने ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा के उद्देश्य से कांग्रेस की स्थापना में सहयोग दिया। उनका उद्देश्य भारतीयों के लिए शासन में कुछ सुधारों की मांग करना था।

(5) डॉ. ईश्वरी प्रसाद का मानना है कि कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा के उद्देश्य से नहीं अपितु भारतीयों के हित की दृष्टि से की गई।

(6) कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष उमेशचन्द्र बनर्जी ने कांग्रेस की स्थापना के सम्बन्ध में लिखा है- ‘ह्यूम का विचार था कि भारत के प्रमुख व्यक्ति वर्ष में एक बार एकत्र होकर सामाजिक विषयों पर चर्चा करें। वे नहीं चाहते थे कि उनकी चर्चा का विषय राजनीति रहे क्योंकि मद्रास, कलकत्ता और बम्बई में पहले से ही राजनैतिक संस्थाएँ थीं।’ अर्थात् राष्ट्रीय कांग्रेस एक सामाजिक संस्था के रूप में कार्य करने वाली संस्था के रूप में उद्भूत हुई।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि केवल और केवल अंग्रेजी साम्राज्य की सुरक्षा में ही कांग्रेस स्थापना के उद्देश्य एवं कारण छिपे हुए थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कांग्रेस का प्रारम्भिक स्वरूप एवं प्रभाव

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अंग्रेजों द्वारा स्थापित कांग्रेस का प्रारम्भिक स्वरूप एवं प्रभाव

अंग्रेजों द्वारा स्थापित कांग्रेस का प्रारम्भिक स्वरूप प्रार्थना पत्रों, अनुनयों एवं विनयों के माध्यम से भारत के लोगों के लिए अंग्रेज अधिकारियों से कुछ सुविधाओं की याचना करने वाला था।

कांग्रेस का प्रारम्भिक स्वरूप

कांग्रेस के स्वरूप के सम्बन्ध में विद्वानों में जबर्दस्त मतभेद रहा। यद्यपि इसके निर्माण एवं विकास में मद्रासी, मराठी और पारसियों का उतना ही हाथ था जितना बंगालियों का किंतु कुछ लोग इसे बंगाली कांग्रेस कहते थे। कुछ लोग इसे हिन्दू कांग्रेस कहते थे।

कुछ लोग इसे केवल पढ़े-लिखे भारतीयों की संस्था कहते थे और इसके राष्ट्रीय स्वरूप को नकारते थे। जबकि कुछ विद्वानों के अनुसार कांग्रेस के संगठन और उद्देश्यों पर दृष्टि डालने से सिद्ध हो जाता है कि कांग्रेस का जन्म राष्ट्रीय संस्था के रूप में हुआ। कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में सम्मिलित होने वाले प्रतिनिधि विभिन्न धर्मों, वर्गों, सम्प्रदायों एवं प्रांतों से थे।

कांग्रेस का विभिन्न क्षेत्रों पर प्रभाव

विशिष्ट बुद्धिजीवी वर्ग पर प्रभाव: कांग्रेस की स्थापना भले ही ए. ओ. ह्यूम के नेतृत्व में साम्राज्यवादी शक्तियों ने की थी किंतु भारत का बुद्धिजीवी वर्ग इसे सम्भालने के लिये आगे आया। दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, उमेश चन्द्र बनर्जी, फीरोजशाह मेहता, जस्टिस महादेव गोविंद रानाडे, पण्डित मदन मोहन मालवीय आदि बुद्धिजीवी भारतीय नेताओं ने कांग्रेस को खड़ा करने में सक्रिय सहयोग दिया।

भारत में रहने वाले अँग्रेजों पर प्रभाव: ई.1907 तक अनेक प्रतिष्ठित अंग्रेज किसी न किसी रूप में कांग्रेस से जुड़ गये थे। ए. ओ. ह्यूम, विलियम वेडरबर्न, सर हेनरी कॉटन, एण्ड्रिल यूल और नार्टन जैसे उदारवादी आंग्ल-भारतीय भी कांग्रेस में सम्मिलित हो गये थे।

जनसामान्य पर प्रभाव: कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशनों में ब्रिटिश-भारत में रहने वाले विभिन्न धार्मिक समुदायों एवं जातियों के शिक्षित प्रतिनिधि भाग लेते थे। ये लोग परस्पर स्नेह और विश्वास की भावना प्रकट करते थे। यही कारण था कि कांग्रेस की स्थापना के बाद देश में राष्ट्रीय चेतना, राष्ट्रीय एकता तथा जनसेवा के उच्चादर्शों का तेजी से विकास हुआ।

कांग्रेस के उस काल के उच्चादर्श उसके राष्ट्रीय स्वरूप को प्रकट करते हैं। प्रारम्भ में कांग्रेस की लोकप्रियता शिक्षित वर्ग तक सीमित रही किंतु बाद में इसके द्वारा राजनीतिक अधिकारों की मांग किये जाने के कारण सामान्य लोगों का ध्यान भी इसकी तरफ आकर्षित होने लगा।

विभिन्न धर्मों पर प्रभाव: कांग्रेस के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता उमेशचंद्र बनर्जी ने की जो हिन्दू थे। दूसरे अधिवेशन की अध्यक्षता दादाभाई नौरोजी ने की जो पारसी थे और तीसरे अधिवेशन की अध्यक्षता बदरुद्दीन तैयबजी ने की जो मुसलमान थे। कांग्रेस के चौथे अधिवेशन की अध्यक्षता प्रसिद्ध अँग्रेज व्यवसायी जार्ज यूल ने की जो ईसाई थे।

आगे भी यह क्रम जारी रहा। इस प्रकार विभिन्न धर्मों के नेताओं को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाये जाने से यह संस्था किसी एक धर्म के प्रभाव वाली संस्था न बनकर राष्ट्रीय व्यापकता वाली संस्था के रूप में विकसित हुई।

मुसलमानों पर प्रभाव: आरम्भ में कांग्रेस में मुस्लिम प्रतिनिधियों की संख्या कम थी किन्तु धीरे-धीरे उनकी संख्या बढ़ती गई। सर सैय्यद अहमद ने मुसलमानों को कांग्रेस से दूर रखने का भरसक प्रयास किया। उन्होंने ब्रिटिश राजभक्तों की एक संस्था यूनाइटेड पौट्रियाटिक एसोसिएशन और मुसलमानों के लिए मोहम्मडन एजूकेशन कांग्रेस बनाई। इन मुट्ठी भर लोगों को छोड़कर कांग्रेस पूर्णतः लोक प्रतिनिधि संस्था थी और इसके प्रतिनिधि राष्ट्रीय विचारों का प्रतिनिधत्व करते थे। कांग्रेस के चौथे सम्मेलन में 1248 प्रतिनिधि सम्मिलित हुए थे जिनमें से 221 मुसलमान तथा 220 ईसाई थे।

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रियासती जनता पर प्रभाव: कांग्रेस ने ब्रिटिश-भारत में राष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण कर लिया था फिर भी ई.1938 के हरिपुरा अधिवेशन से पहले तक कांग्रेस ने देशी रियासतों को अपने कार्यक्षेत्र से पूरी तरह अलग रखा। इस कारण रियासती-भारत की जनता पर ई.1885 से 1938 तक की अवधि में कोई विशेष प्रभाव नहीं था।

साम्राज्यवादियों पर प्रभाव: कांग्रेस की स्थापना साम्राज्यवादियों के प्रयासों से हुई थी। फिर भी अनेक साम्राज्यवादी अँग्रेज आरम्भ से ही कांग्रेस को घृणा की दृष्टि से देखते थे।

मई 1886 में सर हेनरी मेन ने डफरिन को एक पत्र लिखकर ह्यूम के विरुद्ध गंभीर टिप्पणी की- ‘ह्यूम नामक एक दुष्ट व्यक्ति है जिसे लॉर्ड रिपन ने बहुत सिर चढ़ाया था और जिसके सम्बन्ध में ज्ञात होता है कि वह भारतीय होमरूल आंदोलन के मुख्य भड़काने वालों में है। यह बहुत ही चालाक, पर कुछ सिरफिरा, अहंकारी और नैतिकताहीन व्यक्ति है…. जिसे सत्य की कोई परवाह नहीं है।

दिसम्बर 1886 में लॉर्ड डफरिन ने कांग्रेस के प्रतिनिधियों के लिये कलकत्ता में एक स्वागत समारोह आयोजित किया किंतु जब कांग्रेस की मांगें सामने आईं तो वे कांग्रेस के सचिव ए. ओ. ह्यूम से बुरी तरह नाराज हो गये। डफरिन ने ह्यूम के विरुद्ध अत्यंत उग्र शब्दों में नाराजगी व्यक्त की।

इंग्लैण्ड वासियों पर प्रभाव: ई.1890 में कांग्रेस ने एक प्रतिनिधि मण्डल इंग्लैण्ड भेजा, जिसने इंग्लैण्ड, वेल्स और स्कॉटलैंण्ड के निवासियों में कांग्रेस का प्रचार किया। इस प्रतिनिधि मण्डल की यात्रा के बाद ब्रिटिश संसद के सदस्यों की एक समिति बनाई गई जिसका उद्देश्य भारतीय समस्याओं पर विचार करना था।

ब्रिटिश जनमत को आकर्षित करने के लिए लंदन में इण्डिया नामक समाचार पत्र प्रकाशित किया जाने लगा। इन प्रचार कार्यों के कारण इंग्लैण्ड के लोग भी कांग्रेस के कार्यों में रुचि लेने लगे। ई.1890 में स्वयं लॉर्ड लैंन्सडाउन ने स्वीकार किया कि कांग्रेस देश की एक शक्तिशाली उत्तरदायी राजनैतिक संस्था है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि निश्चित रूप से कांग्रेस अपनी स्थापना के समय से ही राष्ट्रीय संस्था थी। इसमें समाज के हर वर्ग, धर्म, जाति का व्यक्ति सदस्य हो सकता था। इसका प्रभाव भी भारत के किसी एक कोने तक सीमित न होकर राष्ट्रव्यापी था।

आरम्भ में इसे जनसामान्य का समर्थन कम मिला किंतु समय के साथ कांग्रेस का राष्ट्रीय स्वरूप विस्तृत होता चला गया तथा इसकी लोकप्रियता में वृद्धि होने लगी। कांग्रेस ने सम्पूर्ण देश की राजनैतिक, आर्थिक एवं सामाजिक उन्नति के लिए संवैधानिक उपायों से प्रयास करना आरम्भ किया।

कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में पं. मदनमोहन मालवीय ने कहा- ‘इस महान संस्था के द्वारा भारतीय जनता को एक जीभ मिल गई है जिसके द्वारा हम इंग्लैण्ड से कहते हैं कि वह हमारे राजनैतिक अधिकारों को स्वीकार करे।’ कांग्रेस के प्रारम्भिक कार्यों का ही परिणाम था कि देश में प्रबल जनमत का विकास हुआ।

सर हेनरी कॉटन ने लिखा है- ‘कांग्रेस के सदस्य किसी भी स्थिति में सरकारी नीति में परिवर्तन लाने में सफल नहीं हुए किन्तु अपने देश के इतिहास के विकास में तथा देश वासियों के चरित्र निर्माण में निश्चित रूप से उन्होंने सफलता प्राप्त की।’

यह कहना अतिश्योक्ति-पूर्ण नहीं होगा कि कांग्रेस का प्रारम्भिक स्वरूप भले ही अंग्रेजों की कृपा प्राप्त करने वाला रहा हो किंतु कांग्रेस का जन्म भारत के राजनैतिक इतिहास की अभूतपूर्व घटना थी। इसका जन्म ऐसे समय में हुआ, जब ब्रिटिश साम्राज्य अपनी सफलता के सर्वोच्च शिखर पर था। उसकी शक्ति को चुनौती देना सरल नहीं था।

इसलिए कांग्रेस का प्रारम्भिक स्वरूप भले ही कुछ भी क्यों न रहा हो, फिर भी कांग्रेस ने कुछ ही वर्षों में व्यापक राष्ट्रीय स्वरूप प्राप्त कर लिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

नरमपंथी कांग्रेस

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भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में नरमपंथी कांग्रेस की भूमिका

कांग्रेस की स्थापना अंग्रेज अधिकारियों द्वारा ऐसे भारतीयों के साथ मिलकर की गई थी जो अंग्रेजों के मित्र हुआ करते थे और बड़ी ही विनम्र शब्दावली में अंग्रेजी शासन के समक्ष अपनी बात रखा करते थे। इसलिए इस काल की कांग्रेस को नरमपंथी कांग्रेस कहा जाता था और इसके नेताओं को उदारवादी कहा जाता था।

उदारवादी नेतृत्व अथवा नरमपंथी कांग्रेस

भारत की आजादी के लिये संघर्ष अँग्रेजी राज्य की स्थापना के साथ ही आरम्भ हो गया था। 18वीं शती में प्रेस के उदय साथ ही भारतीयों को अपने अधिकारों की मांग करने के लिये मंच मिलना आरम्भ हो गया था। यही कारण है कि ई.1885 से ई.1947 तक कांग्रेस का इतिहास, भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन का ही इतिहास है। कांग्रेस के इतिहास को मुख्यतः दो चरणों में विभाजित किया जा सकता है-

(1) प्रथम चरण: स्थापना से लेकर रोलट एक्ट तक अर्थात् ई.1885 से 1919 तक। इस चरण में ई.1885 से 1905 तक नरमपंथी कांग्रेस का नेतृत्व उदारवादियों ने किया और ई.1905 से 1919 तक इसका नेतृत्व उग्रवादी विचारधारा के नेताओं के हाथों में रहा।

(2) द्वितीय चरण: असहयोग आंदोलन से लेकर भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति तक अर्थात् ई.1920 से 1947 तक। इस काल में कांग्रेस का नेतृत्व दक्षिणपंथी मोहनदास कर्मचंद गांधी और उनके समाजवादी-वामपंथी सहयोगी जवाहरलाल नेहरू आदि नेताओं के हाथों में रहा।

उदारवादी युग

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ई.1885 से 1905 तक नरमपंथी कांग्रेस की बागडोर पूरी तरह से उदारवादियों अथवा नरम राष्ट्रवादियों के हाथों में रही जो अँग्रेजों तथा अँग्रेजी शासन के प्रति नरम रवैया रखते थे और बहिष्कार तथा असहयोग जैसे क्रान्तिकारी विचारों के विरुद्ध थे। इनमें से अधिकांश नेताओं के हृदय में ब्रिटिश राज के प्रति कृतज्ञता के भाव थे। वे भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को वरदान समझते थे। उन्होंने अनेक सामाजिक संस्थाओं एवं रीति-रिवाजों में सामाजिक समानता तथा व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की स्थापना के लिए परिवर्तन का सुझाव दिया। वे भारत में प्रतिनिधिमूलक संस्थाओं की स्थापना और नागरिक स्वतन्त्रता की मांग प्रस्तुत करते थे।

राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए उदारवादियों ने संवैधानिक आन्दोलन का समर्थन किया। उनके द्वारा जो राजनीतिक आन्दोलन प्रारम्भ किया गया वह भारत की एकता, जातीय एवं साम्प्रदायिक समन्वय, आधुनिकीकरण, सामाजिक रूढ़ियों का विरोध एवं भेदभाव का निषेध, नवीन आर्थिक प्रगति तथा उद्योगीकरण का समर्थन करता था।

उदारवादियों ने सेवाओं के भारतीयकरण, पाश्चात्य शिक्षा के विस्तार, व्यवस्थापिका सभाओं के चुने हुए सदस्यों की संख्या में वृद्धि, विधि का शासन, स्वतन्त्रता के अधिकारों का व्यापक प्रयोग आदि विषयों पर ध्यान केन्द्रित किया।

दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, फीरोजशाह मेहता, लालमोहन घोष, रासबिहारी, गोपालकृष्ण गोखले, श्रीनिवास शास्त्री, महादेव गोविंद रानाडे आदि नेता उदारवादी युग के प्रमुख स्तम्भ थे। कुछ उदारवादी अँग्रेज यथा- ए. ओ. ह्यूम, विलियम वेडरबर्न, जार्ज यूल, मेक्विन, स्मिथ आदि भी नरमपंथी कांग्रेस के सदस्य थे।

इन उदारवादी नेताओं ने ई.1885 से 1905 तक कांग्रेस का नेतृत्व किया। उदारवादी नेताओं ने भारत के ब्रिटिश शासकों को प्रसन्न रखते हुए उनकी दयालुता एवं न्यायप्रियता की दुहाई देकर स्वशासन की ओर बढ़ने का प्रयत्न किया। जेल जाने का कष्ट उठाना इन नेताओं के वश की बात नहीं थी। वे अपनी सामजिक स्थिति, पद, व्यवसाय आदि को यथावत् बनाये रखते हुए भारत में स्वराज्य की स्थापना का स्वप्न देखते थे।

 उदारवादी नेताओं का मानना था कि ब्रिटिश शासन ने ही भारत को आधुनिक सभ्यता के मार्ग पर अग्रसर किया, स्वतन्त्रता की भावना उत्पन्न की, राष्ट्रीय चेतना को जन्म दिया और देश की जनता को एकसूत्र में बांधने का काम किया। जस्टिस रानाडे का मानना था कि भारत में अँग्रेजी शासन भारतीयों को नागरिक एवं सार्वजनिक गतिविधियों का राजनैतिक शिक्षण देने की दृष्टि से उपयोगी सिद्ध हुआ था।

उनका कहना था- ‘हिन्दुओं एवं मुसलमानों में वैज्ञानिक क्रियाकलाप, नवीन शिक्षण तथा व्यावसायिक दृष्टिकोण की कमी होने के कारण प्रगति शिथिल होती गयी। अँग्रेजों के आगमन ने यह स्थिति बदल दी। भारत को एक नवीन ज्योति दिखाई दी। आधुनिकीकरण का मार्ग प्रशस्त हुआ। अँग्रेजों के सम्पर्क में आने से हमें स्वतन्त्रता की महत्ता का आभास हुआ। सदियों की गुलामी एवं जड़ता को पाश्चात्य प्रभाव ने समाप्त कर दिया। भारतीय नवजागरण प्रारम्भ हुआ।’

दादाभाई नौरोजी की धारणा थी कि अँग्रेजों का शासन भारत के चहुँमुखी विकास के लिए दैविक वरदान का कार्य करेगा। उनका कहना था कि- ‘अँग्रेजों का उस समय तक भारत में बने रहना आवश्यक है जब तक कि भारतीयों को वे स्वावलम्बी बनाने सम्बन्धी अपना न्यासिता का उद्देश्य पूरा नहीं कर लेते।’

उदारवादियों ने भारतीयों की इंग्लैण्ड के प्रति वफादारी और उनकी देशभक्ति के बीच गहरा सम्बन्ध स्थापित करने में कभी असुविधा महसूस नहीं की।

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने कहा था- ‘ईश्वर भविष्य में हमारी वफादारी को और गहरा करे, हमारी देशभक्ति को और प्रोत्साहित करे और ब्रिटिश साम्राज्य के साथ हमारे सम्बन्धों को और अधिक दृढ़ करे।’

उदारवादी नेता देश की शासन व्यवस्था में क्रान्तिकारी परिवर्तनों के विरोधी थे। उनका मानना था कि भारत में सुधार कार्य एक साथ सम्भव नहीं है, इसलिए क्रमिक सुधार होने चाहिये। वे राजनीतिक एवं प्रशासकीय क्षेत्र में धीरे-धीरे सुधार लाना चाहते थे। वे सरकार में जनता की समुचित भागीदारी चाहते थे।

आर. जी. प्रधान ने लिखा है- ‘कांग्रेस के प्रारम्भिक दिनों के प्रस्तावों से पता चलता है कि उनकी मांगें अत्यन्त साधारण थीं। कांग्रेस के नेता आदर्शवादी नहीं थे। वे हवाई किला नहीं बनाते थे। वे व्यावहारिक सुधारक थे तथा आजादी, क्रमशः कदम-कदम करके हासिल करना चाहते थे।’

फीरोजशाह जैसे नरमपंथी कांग्रेस नेता, अँग्रेजों के संरक्षण में भारत के राजनीतिक शिक्षण का मार्ग ढूँढ रहे थे और उनका विश्वास था कि किसी दिन अँग्रेज स्वयं ही, भारत की राष्ट्रीय मांगों को स्वीकार कर लेंगे। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी भी ब्रिटेन के मार्गदर्शन में भारत की प्रगति का स्वप्न देखते थे। उनका उद्देश्य भारत में राजनीतिक सुधारों की मांग प्रस्तुत करना तथा अँग्रेजी शासन से प्रार्थना एवं याचिकाओं के माध्यम से नवीन सुधारों को लागू करवाना था। गोपालकृष्ण गोखले भारत के राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं पुनर्जीवन के लिए क्रमिक विकास का सहारा लेना चाहते थे।

उदारवादी नेता, पाश्चात्य सभ्यता एवं विचारों के पोषक थे। उनकी मान्यता थी कि भारतीयों के लिए, भारत का ब्रिटेन से सम्बन्ध होना एक वरदान है। ब्रिटेन से सम्बन्धों के कारण पाश्चात्य साहित्य, आधुनिक शिक्षा पद्धति, यातायात के साधन, न्याय प्रणाली, स्थानीय स्वशासन आदि व्यवस्थाएँ भारत के लिए अमूल्य वरदान सिद्ध हुई हैं। पाश्चात्य विचार एवं दर्शन, लोगों में स्वतन्त्रता और लोकतन्त्र के प्रति आदर उत्पन्न करता है। अतः भारत के हित में यही उचित होगा कि ब्रिटेन से उसका अटूट सम्बन्ध बना रहे।

श्रीमती एनीबीसेन्ट का माना था- ‘इस काल के नेता स्वयं को ब्रिटिश प्रजा मानने में गौरव का अनुभव करते थे।’

गोपालकृष्ण गोखले का कहना था- ‘हमारा भाग्य अँग्रेजों के साथ जुड़ा हुआ है। चाहे वह अच्छे के लिए हो अथवा बुरे के लिए।’

इसी प्रकार दादाभाई नौरोजी का कहना था- ‘कांग्रेस ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध विद्रोह करने वाली संस्था नहीं है, अपितु वह तो ब्रिटिश सरकार की नींव को दृढ़ करना चाहती है।’

उदारवादियों का विश्वास था कि अँग्रेज, संसार के सर्वाधिक ईमानदार, शक्ति सम्पन्न और प्रजातन्त्रवादी लोग हैं। वे भारत में भी प्रजातान्त्रिक संस्थाओं का विकास करेंगे। यदि ब्रिटिश संसद और जनता को भारतीय समस्याओं से अवगत कराया जाए तो वे निश्चित रूप से सुधार के कदम उठायेंगे।

सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का कहना था- ‘अँग्रेजों के न्याय, बुद्धि और दया भावना में हमारी दृढ़ आस्था है। संसार की इस महानतम प्रतिनिधि सभा, संसदों की जननी ब्रिटिश कॉमन सभा के प्रति हमारे हृदय में असीम श्रद्धा है; अँग्रेज स्वेच्छा से भारत से चले जायेंगे।’

कांग्रेस के उदारवादी नेता ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत स्वशासन चाहते थे। कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने कहा- ‘स्वशासन एक प्राकृतिक देन है, ईश्वरीय शक्ति की कामना है। प्रत्येक राष्ट्र को स्वयं अपने भाग्य का निर्णय करने का अधिकार होना चाहिए, यही प्रकृति का नियम है।’

ब्रिटिश साम्राज्य से सम्बन्ध विच्छेद की तो वे स्वप्न में भी कल्पना नहीं कर सकते थे। इसलिए पूर्ण स्वतन्त्रता की बात उनके मस्तिष्क में नहीं थी। वे तो ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत स्वशासन प्राप्त करना चाहते थे।

उदारवादी नेताओं को अँग्रेजों की न्यायप्रियता में अटूट विश्वास था। उन्होंने सरकार के साथ संघर्ष करने की बात कभी नहीं की। उनका पूर्ण विश्वास वैधानिक संघर्ष में था। वे अपने कार्यों से सरकार को असन्तुष्ट नहीं करना चाहते थे। उन्होंने प्रार्थनाओं, प्रार्थना-पत्रों, याचिकाओं, स्मरण-पत्रों और प्रतिनिधि-मण्डलों द्वारा सरकार से अपनी न्यायोचित मांगों को मानने का आग्रह किया।

अनेक विद्वानों का मानना है कि इस समय कांग्रेस की नीति प्रार्थना करने की थी, अपनी मांगों के लिए संघर्ष करने की नहीं। इस रीति-नीति को कुछ लोगों ने राजनीतिक भिक्षावृत्ति कहा।

उदारवादियों की मांगें

कांग्रेस ने अपनी स्थापना के प्रारम्भिक बीस वर्षों में वार्षिक अधिवेशनों में विभिन्न प्रस्ताव पारित करके ब्रिटिश सरकार का ध्यान भारतीय जनता की समस्याओं की ओर आकर्षित किया तथा नागरिक प्रशासन में विभिन्न प्रकार के सुधार करने की मांग की। उनकी विभिन्न मांगें इस प्रकार से थीं-

1. प्रशासन व्यवस्था में भारतीयों की अधिक से अधिक भागीदारी हो।

2. विधायी परिषदों में सुधार हो।

3. केन्द्रीय तथा प्रान्तीय कौंसिलों का विस्तार हो तथा उनमें सरकार द्वारा नामित सरकारी सदस्यों की संख्या में कमी करके निर्वाचित और गैर-सरकारी भारतीय सदस्यों की संख्या में वृद्धि की जाये।

4. कार्यपालिका और न्यायपालिका का पृथक्करण हो तथा मुकदमों की सुनवाई में जूरी प्रथा को मान्यता दी जाये।

5. वित्तीय व्यवस्था का पुनर्गठन करके करों का बोझ कम किया जाये।

6. अँग्रेजी साम्राज्य की सुरक्षा और विस्तार के व्यय में ब्रिटिश सरकार भी भागीदारी निभाये।

7. सरकार के सैनिक व्यय में कमी की जाये।

8. किसानों की स्थिति सुधारने के लिए भू-राजस्व की दर कम की जाये तथा यह 20 से 30 वर्षों के लिये स्थाई की जाये।

9. भारतीय जनता की दशा सुधारने के लिए उचित कदम उठाए जाएँ। प्राथमिक शिक्षा का विस्तार हो, औद्योगिक एवं तकनीकी शिक्षा की सुविधा दी जाये, सफाई में सुधार के लिए अधिक अनुदान दिया जाए इत्यादि।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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