Tuesday, June 25, 2024
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अध्याय – 20 – इस्लाम का जन्म एवं प्रसार (अ)

जब कयामत आएगी, चांद में रोशनी नहीं रहेगी, सूरज और चांद सटकर एक हो जाएंगे और मनुष्य यह नहीं समझ सकेगा कि वह किधर जाए और अल्लाह को छोड़़कर अन्यत्र उसकी कोई भी शरण नहीं होगी ……. । 

– कुरान में कयामत के वर्णन का अंश।

जिस समय भारत भूमि पर वैष्णव धर्म के भीतर विभिन्न दार्शनिक विचारों का विकास नवीन उत्कर्ष को प्राप्त कर रहा था, भारत भूमि से दूर अरब की भूमि पर एक नवीन वैचारिक आंदोलन जन्म ले रहा था जिसे इस्लाम के नाम से जाना जाता है। पश्चिम एशिया में स्थित अरब प्रायद्वीप को भूमध्यसागर, लालसागर, अरबसागर और फारस की खाड़ी तीन ओर से घेरे हुए है। कुछ तटवर्ती क्षेत्रों को छोड़़कर यह सम्पूर्ण प्रायद्वीप रेगिस्तान है।

इस्लाम का अर्थ

इस्लाम अरबी भाषा के ‘सलम’ शब्द से निकला है जिसका अर्थ होता है आज्ञा का पालन करना। ‘इस्लाम’ का अर्थ है ‘आज्ञा का पालन करने वाला।’ इस्लाम का वास्तविक अर्थ है ‘खुदा के हुक्म पर गर्दन रखने वाला।’ व्यापक अर्थ में इस्लाम एक धार्मिक मत का नाम है, जिसका उदय सातवीं शताब्दी में अरब में हुआ था। इस मत के मानने वाले ‘मुसलमान’ कहलाते हैं। मुसलमान शब्द ‘मुसल्लम-ईमान’ का बिगड़ा हुआ स्वरूप है।

‘मुसल्लम’ का अर्थ है ‘पूरा’ और ‘ईमान’ का अर्थ है ‘दीन या धर्म।’ इसलिए मुसलमान उन लोगों को कहते हैं जिनका दीन इस्लाम में पूरा विश्वास है। वे जो भी कार्य करते हैं, अल्लाह के नाम पर करते हैं और कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व कहते हैं- ‘परम करुणामय एवं दयालु अल्लाह के नाम (बिस्मिल्ला-हिर्रहमा-निर्रहीम) पर यह काम करता हूँ।’

अरब का प्राचीन धर्म

इस्लाम का उदय होने से पहले, अरब वालों के धार्मिक विचार प्राचीन काल के हिन्दुओं के समान थे। वे भी हिन्दुओं की भाँति मूर्ति-पूजक थे और उनका अनेक देवी-देवताओं में विश्वास था। जिस प्रकार हिन्दू लोग कुल-देवता, ग्राम-देवता आदि में विश्वास करते थे उसी प्रकार इन लोगों के भी प्रत्येक कबीले का एक देवता होता था, जो उनकी रक्षा करता था। अरब वालों में अन्धविश्वास भी कूट-कूट कर भरा था।

उनकी धारणा थी कि भूत-प्रेत वृक्षों तथा पत्थरों में निवास करते हैं और मनुष्य को विभिन्न प्रकार के कष्ट देने की शक्ति रखते हैं। मक्का में काबा नामक प्रसिद्ध स्थान है जहाँ किसी समय 360 मूर्तियों की पूजा होती थी। यहाँ अत्यंत प्राचीन काल से एक काला पत्थर मौजूद है। अरब वालों का विश्वास था कि इस पत्थर को ईश्वर ने आसमान से गिरा दिया था। इसलिए वे इसे बड़ा पवित्र मानते थे और इसके दर्शन तथा पूजन के लिए काबा जाया करते थे।

यह पत्थर आज भी इस्लाम के अनुयाइयों में आदर की दृष्टि से देखा जाता है। काबा की रक्षा का भार कुरेश नामक कबीले के ऊपर था, कुरेश कबीले में मुहम्मद नामक बालक का जन्म हुआ जिसने आगे चलकर अरब की प्राचीन धार्मिक व्यवस्था के विरुद्ध बहुत बड़ी क्रान्ति की और एक नए मत को जन्म दिया, जो इस्लाम के नाम से जाना गया। इस्लाम के उदय से पहले, अरब में विदेशी यहूदियों और इसाइयों की बस्तियां भी थीं। विभिन्न भाषाओं और धर्मों के लोग एक दूसरे के सम्पर्क में आते थे और उनके विश्वास एक दूसरे को प्रभावित करते थे।

हजरत मुहम्मद का परिचय

हजरत मुहम्मद का जन्म ई.570 में मक्का के एक साधारण परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम अब्दुल्ला तथा माता का नाम अमीना था। मुहम्मद के जन्म से पहले ही उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। जब वे छः साल के हुए तो उनकी माता की, तथा आठ साल के हुए तो उनके दादा की भी मृत्यु हो गई। वे भेड़ें चराने लगे इस कारण उनकी शिक्षा का समुचित प्रबंध नहीं हुआ।

फिर भी वे चिंतनशील बालक थे। इतिहासकार नैथेनियन प्लैट ने लिखा है- ‘अरब के तारों भरे आकाश के तले एक अनाथ गडरिया बालक अपना एकान्त समय ईश्वर के बारे में चिन्तन करता हुआ बिताया करता था।’

 वयस्क होने पर मुहम्मद अपने चाचा के साथ ऊँटों के काफिले लेकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने लगे। इन यात्राओं से उनको मक्का की भौगोलिक, राजनीतिक एवं सामाजिक स्थितियों का ज्ञान हो गया तथा साथ ही उन्हें व्यापार का भी व्यावहारिक ज्ञान हो गया।

यात्राओं और व्यापार के कारण मोहम्मद का सम्पर्क एक धनी विधवा ‘बीबी खदीजा’ से हुआ। बीबी खदीजा ने उनकी ईमानदारी एवं गुणों से प्रभावित होकर उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। उस समय मुहम्मद की आयु लगभग 25 वर्ष और बीबी खदीजा की आयु लगभग 40 वर्ष थी। हजरत मुहम्मद सरल जीवन व्यतीत करते थे। चालीस वर्ष की अवस्था तक उनके जीवन में कोई विशेष घटना नहीं घटी।

एक दिन उन्हें फरिश्ता जिबराइल के दर्शन हुए जो उनके पास अल्लाह का पैगाम अर्थात् संदेश लेकर आया। यह संदेश इस प्रकार से था- ‘अल्लाह का नाम लो, जिसने सब वस्तुओं की रचना की है।’ इसके बाद मुहम्मद को प्रत्यक्ष रूप में अल्लाह के दर्शन हुए और यह संदेश मिला- ‘अल्लाह के अतिरिक्त कोई दूसरा ईश्वर नहीं है और मुहम्मद उसका पैगम्बर है।’

अब मुहम्मद ने अपने मत का प्रचार करना आरम्भ किया। उन्होंने अपने ज्ञान का पहला उपदेश अपनी पत्नी खदीजा को दिया। उन्होंने मूर्ति-पूजा तथा बाह्याडम्बरों का विरोध किया। उनकी शिक्षा में यहूदी, ईसाई और हनीफी शिक्षाओं से भिन्न अथवा नया कुछ भी नहीं था किंतु हजरत मुहम्मद का कहना था कि केवल अल्लाह में आस्था रखो। उसकी इच्छा को चुपचाप शिरोधार्य कर लेना चाहिए।

कुरान की सूरत तीन में कहा गया है- ‘अल्लाह इस बात की गवाही देता है कि उस (एक अल्लाह) के सिवाय कोई भी पूज्य नहीं और फरिश्ते तथा इल्म वाले भी गवाही देते हैं कि वही इन्साफ के साथ सब कुछ सम्भालने वाला है। उसके सिवाय और कोई इलाह (पूज्य) नहीं, वह सर्वशक्तिमान और ज्ञानमय है। बेशक दीन तो अल्लाह के नजदीक यही इस्लाम (आत्म समर्पण) है।’

अरबवासियों ने मुहम्मद के विचारों का स्वागत नहीं किया। उनके अपने कुरैशी कबीले के लोगों ने हजरत मुहम्मद का जबर्दस्त विरोध किया। कुछ लोगों ने हजरत मोहम्मद की हत्या करने का षड्यन्त्र रचा जिससे विवश होकर 28 जून 622 को हजरत मुहम्मद को अपनी जन्मभूमि मक्का को छोड़ कर मदीना चले गए। यहीं से मुसलमानों का ‘हिजरी संवत्’ आरम्भ होता है। हिजरी अरबी के ‘हज्र’ शब्द से निकला है, जिसका अर्थ है- ‘जुदा या अलग हो जाना।’ चूंकि हजरत मुहम्मद मक्का से अलग होकर मदीना चले गए इसलिए इस घटना को ‘हिजरत’ कहते है।

मदीना (यस्रिब) के खेतिहर नखलिस्तान में हजरत मुहम्मद को अपने विचारों के प्रचार के लिए अनुकूल वातावरण मिला। मदीना वालों की, मक्का के अभिजात्य लोगों से शत्रुता थी, अतः उन्होंने हजरत मुहम्मद को सहर्ष समर्थन दिया और बहुत से लोग उनके अनुयाई बन गए जो ‘अन्सार’ कहलाए। मुहम्मद मदीना में नौ वर्ष तक रहे।

हजरत मुहम्मद ने अपने अनुयाइयों के साथ ई.630 में मक्का पर आक्रमण कर उसे जीत लिया। पराजित मक्कावासियों ने आत्समर्पण कर मुहम्मद के धार्मिक विश्वासों को स्वीकार कर लिया। इससे कुरैशी व्यापारियों तथा सरदारों को नुकसान नहीं हुआ अपितु फायदा हुआ। मक्का का एक जातीय व धार्मिक केन्द्र के रूप में महत्त्व पहले से भी अधिक बढ़ गया।

जो कुरैशी पहले हजरत मुहम्मद के इस्लाम के आन्दोलन को शत्रुतापूर्ण दृष्टि से देखते थे, वे ही अब इस आन्दोलन से जुड़ने लगे और अग्रणी भमिका भी निभाने लगे। फलस्वरूप, थोड़े ही समय में सम्पूर्ण अरब के लोग इस्लाम को मानने लगे। मक्का इस्लाम का तीर्थ स्थान एवं प्रमुख धार्मिक केन्द्र बन गया।  ई.632 में मुहम्मद का निधन हो गया। उनके उत्तराधिकारी खलीफा कहलाए।

हजरत मुहम्मद के उपदेश

हजरत मुहम्मद का एक अल्लाह में विश्वास था, जिसका न आदि है न अन्त, अर्थात् न वह जन्म लेता है और न मरता है। वह सर्वशक्तिमान्, सर्वदृष्टा तथा अत्यन्त दयावान है। मुहम्मद का कहना था कि चूंकि समस्त इंसानों को अल्लाह ने बनाया है इसलिए समस्त इंसान एक समान हैं। मुहम्मद ने अपने अनुयाइयों से कहा- ‘सच्चे धर्म का यह तात्पर्य है कि तुम अल्लाह, कयामत, फरिश्तों, कुरान तथा पैगम्बर में विश्वास करते रहो और अपनी सम्पत्ति को दीन-दुखियों को खैरात में देते रहो।’

हजरत मुहम्मद के सम्बन्ध में मुसलमानों की मान्यता

मुसलमानों में ‘ला इलाह इल्लिलाह मुहम्मदुर्रसूलिल्लाह’ के सिद्धांत में अटल विश्वास है अर्थात् ‘अल्लाह के सिवाय कोई पूजनीय नहीं है तथा मुहम्मद उसके रसूल हैं।’ अल्लाह में विश्वास रखने के साथ-साथ यह मानना भी जरूरी है कि मुहम्मद अल्लाह के नबी, रसूल और पैगम्बर हैं। पैगाम ले जाने वाले को ‘पैगम्बर’ कहते हैं।

हजरत मुहम्मद, अल्लाह का संदेश पृथ्वी पर लाए, इसलिए वे पैगम्बर कहलाए। ‘नबी’ कहते हैं किसी उपयोगी परम ज्ञान की घोषणा को। हजरत मुहम्मद ने चूँकि ऐसी घोषणा की, इसलिए वे नबी हुए। ‘रसूल’ का अर्थ दूत होता है। हजरत मुहम्मद रसूल हैं, क्योंकि उन्होंने अल्लाह और इंसान के बीच दूत का काम किया।

कुरान

पैगम्बर मुहम्मद को अल्लाह की ओर से बहुत से ‘इल्हाम’ (दिव्य ज्ञान) हुए थे। मुहम्मद ने जनसामान्य को इस ज्ञान का उपदेश दिया जो ‘कुरान’ में संकलित है। कुरान को ‘कलामे-पाक’ भी कहा जाता है। यह स्वयं ‘अल्लाह ताला’ का कलाम है। यह आसमान से हजरत मुहम्मद पर ‘नाजिल’ किया गया (उतारा गया) है। मान्यता है कि हजरत मुहम्मद द्वारा ‘इल्हाम’ के सम्बन्ध में कही गई बातों से उनके अनुयाई टीपें तैयार कर लेते थे।

हजरत मुहम्मद की मृत्यु के बाद इन टीपों को ई.650 में खलीफा उस्मान के काल में संकलित कर लिया गया और यह संकलन ही कुरान के नाम से जाना गया। इसे पैगम्बरों के पास ईश्वरीय आदेश पहुँचाने वाले फरिश्ते जिब्राइल द्वारा कुरान अरबी भाषा के ‘किरन’ शब्द से निकला है, जिसका अर्थ है- ‘निकट या समीप।’ इस प्रकार कुरान वह ग्रन्थ है, जो लोगों को अल्लाह के निकट ले जाता है।

सुन्ना

मुसलमानों के धार्मिक साहित्य का दूसरा भाग सुन्ना कहलाता है। उसमें हजरत मुहम्मद के जीवन, चमत्कारों और उपदेशों से सम्बन्धित हदीसें अर्थात् अनुश्रुतियां शामिल हैं। हदीसों का संकलन नौंवी शताब्दी में बुखारी, मुस्लिम इब्न अल इज्जाज आदि उलेमाओं ने किया था। कई उलेमाओं ने कुरान और हदीस के आधार पर हजरत मुहम्मद का जीवन चरित्र लिखा।

हजरत मुहम्मद के उपलब्ध जीवन चरित्रों में से सबसे प्राचीन मदीना के निवासी इब्न इसहाक द्वारा आठवीं शताब्दी ईस्वी में लिखा गया। शिया मतावलम्बी ‘सुन्ना’ को नहीं मानते जिसकी रचना पहले तीन खलीफाओं के शासनकाल में पैगम्बर विषयक अनुश्रुतियों से हुई थी।

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