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जिन्ना का उन्माद

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जहाँ एक ओर गांधीजी की जिद थी कि वे मुसलमानों को भारत से अलग नहीं जाने देंगे, वहीं दूसरी ओर जिन्ना का उन्माद उसके सिर पर हावी था। वह हर कीमत में पाकिस्तान चाहता था। माउण्टबेटन की दृष्टि में जिन्ना उन्मादी था!

जहाँ भारत के मुसलमान भारत से अलग पाकिस्तान देश के निर्माण को जेहाद समझ रहे थे, वहीं दूसरी ओर जिन्ना का उन्माद इस्लाम के लिए नहीं था, गांधी, नेहरू और सरदार पटेल जैसे कांग्रेसी नेताओं को नीचा दिखाने के लिए था। वह स्वयं को धरती के नक्शे पर एक राष्ट के जनक के रूप में देखना चाहता था। जिन्ना के लिए जेहाद कोई मायने नहीं रखता था।

जहाँ गांधीजी, खान अब्दुल गफ्फार खान और मौलाना आजाद सहित बहुत से कांग्रेसी नेता अब भी यह समझ रहे थे कि किसी न किसी तरह से विभाजन टल जाएगा किंतु माउण्टबेटन जानते थे कि सच्चाई क्या है! माउण्टबेटन ने लिखा है-

‘देश का विभाजन करने पर जिन्ना इस कदर आमादा थे कि मेरे किसी शब्द ने उनके कानों में प्रवेश किया ही नहीं, हालांकि मैंने ऐसी हर चाल चली जो मैं चल सकता था, ऐसी हर अपील मैंने की जो मेरी कल्पना में आ सकती थी। पाकिस्तान को जन्म देने का सपना उन्हें घुन की तरह लग चुका था। कोई तर्क काम न आया।

……. दो कारणों से जिन्ना की ताकत बहुत बढ़ी-चढ़ी थी। उन्होंने स्वयं को मुस्लिम लीग का बादशाह बनाने में सफलता पा ली थी। लीग के अन्य सदस्य समझौते के लिए शायद तैयार हो भी जाते, लेकिन जब तक जिन्ना जिन्दा थे, उन सदस्यों की जुबान नहीं खुल सकती थी।’

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जिन्ना का उन्माद माउण्टबेटन से छिपा नहीं रह सका। बहस किए जाइए, किए जाइए, किए जाइए। जिन्ना कुछ सुनने वाला नहीं। जब सुनने वाला ही नहीं, फिर बहस के पीछे समय जाया करके, गृह-युद्ध के खतरे को और-और बढ़ाते जाने कोई अर्थ नहीं था। जिन्ना का उन्माद सरदार पटेल से अधिक और काई नहीं जानता था। पटेल ने पंजाब एवं बंगाल के विभाजन का एक प्रस्ताव पारित किया तथा कांग्रेसियों को समझाया कि चूंकि पाकिस्तान का निर्माण इस्लामिक एवं गैर-इस्लामिक जनसंख्या के आधार पर होना है इसलिए पंजाब एवं बंगाल के हिन्दुओं को भारत में रहने का अधिकार है, जिन्ना उन्हें पाकिस्तान में शामिल नहीं कर सकते इसलिए भारत विभाजन से पहले पंजाब एवं बंगाल का विभाजन किया जाए।

पटेल ने कांग्रेसियों को समझाया कि जिन्ना किसी भी हालत में ऐसे पाकिस्तान को स्वीकार नहीं करेगा जिसमें पूरा पंजाब एवं पूरा बंगाल नहीं हो, इस प्रकार भारत के विभाजन को टाला जा सकता है। पटेल की बात कांग्रेसियों को उचित लगी। कुछ लोगों का मानना था कि पटेल ने भारत के विभाजन को रोकने के लिए प्रांतीय विभाजन का प्रस्ताव तैयार किया था।

मोसले ने लिखा है-

‘अपने सभी साथियों की अपेक्षा पटेल ही ठीक-ठीक जानते थे कि वे क्या कह रहे हैं। कांग्रेस कार्यसमिति के समक्ष भारत विभाजन के प्रस्ताव को पटेल ने प्रस्तुत किया। इस प्रस्ताव में पंजाब को दो टुकड़ों में बांटने की सिफारिश थी। एक टुकड़ा हिन्दुओं का, दूसरा मुसलमानों का। सिक्खों को यह आजादी थी कि वे कहाँ रहेंगे इसका निर्णय वे स्वयं कर सकें।

निर्णय का संकेत स्पष्ट था। यदि कांग्रेस एक प्रदेश का बंटवारा मान सकती है तो देश के बंटवारे का कैसे विरोध कर सकती है! कांग्रेस के संगठनकर्त्ता और संचालक की हैसियत से वह महसूस करता था कि आजाद हिन्दुस्तान में विरोधी दल के रूप में मुस्लिम लीग का मतलब है मुसीबत, कांग्रेस की योजनाओं का अंत, कानूनों पर रोकथाम।

…… पटेल ने वर्किंग कमेटी के एक सदस्य को लिखा- ‘यदि लीग पाकिस्तान के लिए अड़ जाती है तो फिर उसका एकमात्र तरीका है बंगाल और पंजाब का बंटवारा।

…… मैं नहीं समझता कि ब्रिटिश सरकार इस बंटवारे के लिए सहमत हो जाएगी। आखिरकार शक्तिशाली दल के हाथों सरकार सौंप देने की अक्ल आएगी। और यदि नहीं आई तो भी कोई बात नहीं। केन्द्र की मजबूत सरकार होगी, पूर्वी बंगाल, पंजाब का कुछ हिस्सा, सिंध और बलूचिस्तान इस केन्द्र के अधीन स्वतंत्र होंगे। केन्द्र इतना शक्तिशाली होगा कि अंततः वह भी इसमें आ जाएंगे।’

नेहरू को यह योजना पसंद आई। वह इस बंटवारे के माध्यम से जिन्ना को संदेश देना चाहता था कि यदि वह बंटवारा मांगेगा तो उसका हश्र यह भी हो सकता है। जब मौलाना आजाद और गांधीजी दिल्ली से बाहर थे तब यह प्रस्ताव कांग्रेस वर्किंग कमेटी में पारित करा लिया गया।

पटेल भले ही कांग्रेसियों को यह समझा रहे थे कि वे पाकिस्तान की मांग को दबाने के लिए यह चाल चल रहे हैं किंतु वस्तुतः वे इस प्रस्ताव के माध्यम से अंत्यत चतुराई से भारत-विभाजन की ओर बढ़ रहे थे क्योंकि जब तक कांग्रेस पंजाब एवं बंगाल के विभाजन का निर्णय नहीं लेती है, तब तक भारत के विभाजन का निर्णय संभव ही नहीं था और पटेल ने गांधी तथा मौलाना आजाद की अनुपस्थिति में कांग्रेस से यह निर्णय करवा लिया।

पटेल के प्रयत्नों से जिन्ना का उन्माद अब ठोस सच्चाई में बदलने जा रहा था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पंजाब और बंगाल

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मुहम्मद अली जिन्ना भारत का विभाजन चाहता था न कि पंजाब और बंगाल का। पंजाब और बंगाल को वह समूचा ही हड़प जाना चाहता था। सरदार पटेल उसकी इस मंशा को किसी भी कीमत पर पूरी नहीं होने दे सकते थे!

मुहम्मद अली जिन्ना को जिस पाकिस्तान की चाहत थी उसके अंतर्गत पांच नदियों से सिंचित विशाल पंजाब में लहलहाते गेहूं और गन्ने के खेत और गंगा तथा ब्रह्मपुत्र के जलों से सिंचित बंगाल में लहलहाते चावल, गन्ने और पटसन के खेत शामिल थे। उसमें पंजाब के लाहौर, अमृतसर, रावपिण्डी और कराची तथा बंगाल के कलकत्ता और ढाका जैसे विशाल व्यावसायिक एवं औद्योगिक नगर शामिल थे।

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जिन्ना पंजाब और बंगाल के बल पर खैबर-पख्तून, बलोचिस्तान तथा सिंध के निर्धन क्षेत्रों के लोगों का पेट भरना चाहता था। सरदार पटेल ने जिन्ना की इस कमजोरी को पकड़ लिया था और वे भारत का विभाजन रोकने के लिए इन दोनों प्रांतों का विभाजन करने की बात करने लगते थे। उनका तर्क था कि इन दोनों प्रांतों के साथ इन प्रांतों के हिन्दू पाकिस्तान को नहीं सौंपे जा सकते। जब माउण्टबेटन ने जिन्ना से भेंट की तो वायसराय ने उसे बताया कि वे भारत का विभाजन नहीं कर सकते। इस पर जिन्ना ने कहा कि विभाजन तो उन्हें करना ही होगा।

ई.1938-39 में उन लोगों ने (हिन्दुओं ने) हमारे साथ जो किया था, उसके कारण उन पर हमें भरोसा नहीं। आपके जाने के बाद हम कुछ चुने हुए हिन्दुओं के रहम पर रह जाएंगे। हमें दबाया जाएगा। हमारे साथ बहुत बुरा होगा। माउण्टबेटन ने जिन्ना को भरोसा दिलाना चाहा कि- ‘नेहरू और उनके साथियों का ऐसा करने का कोई इरादा नहीं है। फिर भी यदि आपको पाकिस्तान चाहिए तो मुझे पंजाब और बंगाल का विभाजन करना होगा। आप पंजाब और बंगाल के हिन्दुओं को पाकिस्तान नहीं ले जा सकते।’

 जिन्ना ने कहा- ‘आप यह नहीं समझते कि पंजाब एक राष्ट्र है, बंगाल एक राष्ट्र है। एक आदमी पंजाबी या बंगाली पहले है, बाद में हिन्दू या मुसलमान। अगर आप ये सूबे हमें देंगे तो किसी भी हालत में उनका बंटवारा नहीं करेंगे। इससे खून खराबा होगा।’

माउण्टबेटन ने कहा- ‘हिन्दू-मुसलमान, पंजाबी-बंगाली से पहले वह भारतीय है। इसलिए आप भारत के एक बने रहने के पक्ष में दलील दे रहे हैं। ….. यदि आप कैबीनेट मिशन प्लान को मान लेते तो आपको बहुत अधिक स्वायत्त अधिकार मिल जाते। पंजाब और बंगाल अपना शासन स्वयं संभालते। संयुक्त राष्ट्र अमरीका से भी अधिक स्वायत्तता होगी। फिर आप अल्पसंख्यक जनता को मनचाहे ढंग से दबाने की खुशी भी हासिल कर सकेंगे क्योंकि आप केन्द्र को हस्तक्षेप करने से टोक सकेंगे। क्या यह बात आपको अनुकूल लगती है?’

जिन्ना ने कहा- ‘नहीं! मैं भारत का एक हिस्सा नहीं बनना चाहता। हिन्दू राज्य के अधीन होने से तो मैं सब-कुछ खो देना ज्यादा पसंद करूंगा।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत विभाजन केवल पागलपन

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जिस समय लॉर्ड माउण्टबेटन भारत का विभाजन करने एवं उसे आजादी देने के उद्देश्य से भारत पहुंचे तो भारत के नेता और जनता दो धड़ों में बंट गए। एक धड़ा भारत विभाजन के लिए पागल हुआ पड़ा था और दूसरा धड़ा भारत विभाजन को ही पागलपन समझता था।

कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग के नेताओं से हुए विचार-विमर्श से भारत के नए वायसराय लॉर्ड माउण्टबेटन तुरंत समझ गए कि भारत का बंटवारा अनिवार्य है। मुसलमानों को पाकिस्तान देना ही होगा। अन्यथा कांग्रेस और मुस्लिम लीग अनन्त काल तक एक दूसरे से लड़ते ही रहेंगे। इसलिए उन्होंने भारत विभाजन की एक योजना तैयार की तथा इंग्लैण्ड की एटली सरकार को भेज दी।

इस योजना के साथ माउण्टबेटन ने एक पत्र भी लिखा- ‘विभाजन केवल पागलपन है। अगर इन अविश्वसनीय कौमी दंगों ने एक-एक व्यक्ति को वहशी न बना दिया होता, अगर विभाजन का एक भी विकल्प ढूंढ सकने की स्थिति होती तो दुनिया का कोई व्यक्ति मुझे इस पागलपन को स्वीकार करने के लिये बहका नहीं सकता। विश्व के सामने स्पष्ट रहना चाहिये कि ऐसे दीवानगी भरे फैसले की पूरी जिम्मेदारी भारतीय कंधों पर है, क्योंकि एक दिन ऐसा जरूर आयेगा जब स्वयं भारतीय अपने इस फैसले पर बुरी तरह पछतायेंगे।’

यह एक बड़ी विचित्र बात थी कि जिन भारतीय नेताओं को माउंटबेटन ने भारत विभाजन के लिये बड़ी मुश्किल से तैयार किया था, उन्हीं भारतीय नेताओं पर माउंटबेटन ने भारत विभाजन का आरोप रख दिया। माउंटबेटन को अपने प्रतिवेदन में ‘भारतीयों’ शब्द का प्रयोग न करके ‘लीगी नेताओं’ शब्द प्रयुक्त करने चाहिये थे।

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31 मार्च 1947 को गांधीजी ने माउण्टबेटन से भेंट की और गांधीजी को यह जानकर दुःख हुआ कि पटेल और नेहरू भी विभाजन के समर्थक हो गए हैं। गांधीजी की वायसराय से हुई भेंट के बाद मौलाना अबुल कलाम आजाद गांधीजी से मिलने पहुंचे। मौलाना अबुल कलाम आजाद ने इस भेंट के संस्मरण अपनी पुस्तक इण्डिया विन्स फ्रीडम में लिखे हैं- ‘मैं फौरन उनसे मिलने गया । गांधीजी का पहला कटाक्ष था- बंटवारा अब खतरा बन गया है। लगता है कि वल्लभभाई और यहाँ तक कि जवाहरलाल ने भी घुटने टेक दिए हैं। अब आप क्या कीजिएगा? क्या आप मेरा साथ देंगे या आप भी बदल गए हैं?’

मौलाना ने जवाब दिया- ‘मैं बंटवारे के खिलाफ रहा हूँ और अब भी हूँ। बंटवारे के खिलाफ जितना मैं आज हूँ उतना पहले कभी न था लेकिन मुझे यह देखकर अफसोस है कि जवाहरलाल और सरदार पटेल ने भी हार मंजूर कर ली है और आपके शब्दों में हथियार डाल दिए हैं। मेरी आशा अब एकमात्र आप पर टिकी है। अगर आप बंटवारे के खिलाफ खड़े हों तो हम अब भी उसे रोक सकते हैं। अगर आप भी मंजूर कर लेते हैं तो मुझे यह डर है कि हिंदुस्तान का सर्वनाश हो जाएगा।’

गांधीजी ने कहा- ‘आप भी कैसा सवाल पूछते हैं? अगर कांग्रेस बंटवारा मंजूर करेगी तो उसे मेरी लाश के ऊपर करना पड़ेगा। जब तक मैं जिंदा हूं मैं भारत के बंटवारे के लिए कभी राजी न हूंगा। और अगर मेरा वश चला तो कांग्रेस को भी इसे मंजूर करने की इजाजत नहीं दूंगा।

…….. बाद में उसी दिन गांधीजी लॉर्ड माउंटबेटन से मिले। वे दूसरे दिन भी उनसे मिले और फिर दो अप्रैल को भी मिले। ज्यों ही वे लॉर्ड माउंटबेटन से पहली बार मिलकर वापस आए त्यों ही सरदार पटेल उनके पास पहुंचे और दो घण्टे तक गुप्त वार्ता करते रहे। इस मुलाकात में क्या हुआ, मैं नहीं जानता। लेकिन जब मैं फिर गांधीजी से मिला तो मुझे इतना बड़ा आघात लगा जितना जिंदगी में कभी भी नहीं लगा था, क्योंकि मैंने देखा कि वह भी बदल गए हैं।’

गांधीजी भी क्यों बदल गए और बंटवारे के पक्ष में हो गए, इसके ऊपर प्रकाश डालते हुए आजाद ने बताया कि देश की एकता बचाए रखने के लिए गांधीजी ने लॉर्ड माउंटबेटन को सुझाव दिया था कि जिन्ना को सरकार बनाने दी जाए और उन्हें अपने मंत्रिमण्डल के सदस्यों का चुनाव करने दिया जाए। माउंटबेटन को यह बात कुछ जंच गई थी किंतु इस सुझाव का जबर्दस्त विरोध नेहरू और पटेल दोनों ने किया और इसे वापस लेने के लिए गांधीजी को बाध्य किया।

आजाद ने लिखा- ‘गांधीजी ने मुझे यह बात याद दिलाई और कहा कि परिस्थितियां अब ऐसी हैं कि बंटवारा अवश्यंभावी लगता है।’ मौलाना अबुल कलाम आजाद का विचार था कि गांधीजी, सरदार पटेल के प्रभाव के कारण बंटवारे का विरोध नहीं कर सके और उसके समर्थक बन गए।

भारत स्वतंत्रता के द्वार पर खड़ा था और उसके नेता अभी भी घनघोर असमंजस में थे। उस काल के कुछ मुस्लिम नेता भारत विभाजन के माध्यम से मुसलमानों का भला करना चाहते थे तो कुछ नेता मुसलमानों को भारत में रखकर ही उनका भला करना चाहते थे। मौलान आजाद भी उन मुस्लिम नेताओं में से थे जो इस बात को समझते थे कि यदि मुसलमना भारत में रहेंगे तो उन्हें अधिक संसाधन एवं अवसर उपलब्ध होंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

माउण्टबेटन प्लान

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माउण्टबेटन प्लान

ब्रिटिश सरकार ने लॉर्ड माण्टबेटन को स्पष्ट आदेशों के साथ भारत भेजा था। उन्हें तीन लक्ष्य दिए गए थे- भारत का विभाजन करना, भारत को स्वतंत्र करना तथा भारत से अंग्रेजों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करना। इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए लॉर्ड माउण्टबेटन ने एक योजना बनवाकर इंग्लैण्ड भिजवाई। इसे माउण्टबेटन प्लान कहा जाता है।

बेईमान रैफरी

यद्यपि कुछ अंग्रेज इतिहासकारों ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग की लड़ाई में अंग्रेजों को रैफरी की भूमिका से युक्त बताया है। अब तक अंग्रेज-शक्ति मुस्लिम लीग का ही अधिक साथ देती आयी थी। वह उस बेईमान रैफरी की तरह थी जो मौका पाते ही चुपके से दो मुक्के उस प्रतिद्वंद्वी में जमा देती थी जो उसे पसंद नहीं था। अक्सर ये मुक्के कांग्रेस को पड़ते थे क्योंकि कांग्रेस हर हालत में भारत की आजादी चाहती थी जबकि मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग के माध्यम से भारत की आजादी का रास्ता अवरुद्ध कर रखा था।

नेहरू ने बचाया देश को

भारतीय नेताओं से विचार-विमर्श के बाद माउण्टबेटन ने भारत विभाजन की एक योजना तैयार की जिसे माउंटबेटन प्लान कहा जाता है। वायसराय ने मई 1947 के आरम्भ में इस योजना को ब्रिटिश सरकार की स्वीकृति के लिए लॉर्ड इस्मे के साथ लंदन भिजवा दिया। भारत की आजादी की योजना में लॉर्ड माउण्टबेटन ने प्रस्तावित किया कि भारत को दो स्वतंत्र देशों के रूप में आजादी दी जायेगी जिसमें से एक टुकड़ा पाकिस्तान होगा और दूसरा भारत। पाकिस्तानी क्षेत्रों का निर्धारण अंग्रेजों द्वारा नहीं किया जाएगा अपितु इसका निर्णय भारतीय स्वयं करेंगे।

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अंग्रेजों के अधीन 11 ब्रिटिश प्रांतों में से प्रत्येक प्रांत को पाकिस्तान या भारत में मिलने का निर्णय लेने का स्वतंत्र अधिकार होगा। यदि किसी ब्रिटिश प्रांत की जनता चाहे तो वह प्रांत भारत और पाकिस्तान दोनों में से किसी के भी साथ मिलने से इन्कार करके अपने प्रदेश को स्वतंत्र देश बना सकेगी। ऐसा करने के पीछे माउंटबेटन का तर्क यह था कि प्रजा पर न तो भारत थोपा जाये और न ही पाकिस्तान। प्रजा अपना निर्णय स्वयं करने के लिये पूर्ण स्वतंत्र रहे। जो प्रजा पाकिस्तान में मिलना चाहे, वह पाकिस्तान में मिले। जिसे भारत के साथ मिलना हो, वह भारत का अंग बने। जिसे दोनों से अलग रहना हो, वह सहर्ष अलग रहे। इसके निर्णय की प्रक्रिया ब्रिटिश प्रांतों में लम्बे समय से चल रही लेजिस्लेटिव एसम्बलियों के माध्यम से होनी थी। माउण्टबेटन द्वारा भारत में स्थित लगभग 565 देशी रियासतों के लिए भी यही प्रक्रिया प्रस्तावित की गई थी जिसके अनुसार प्रत्येक देशी रियासत को अधिकार होगा कि वह चाहे तो भारत में मिले, चाहे पाकिस्तान में मिले, चाहे स्वतंत्र रहे अथवा कुछ रियासतें मिलकर अपने लिए अलग-अलग देश बना लें। इस प्रकार माउंटबेटन ने कैबीनेट मिशन योजना की अनदेखी करके पाकिस्तान निर्माण के लिए क्रिप्स मिशन वाला खतरनाक रास्ता अपनाया।

यह अत्यंत खरतनाक योजना थी जिससे देश के टुकड़े-टुकड़े हो जाते और भारत बाल्कन द्वीपों की तरह बिखर जाता। भारत देश का कोई अस्तित्व ही नहीं होता। भारत में से निकलकर ब्रिटिश-प्रांत एवं देशी-रियासातें अलग-अलग देशों का ऐसा गुच्छा बन जातीं जो एक-दूसरे के रक्त की प्यासी होतीं। न तो कांग्रेसी नेताओं ने और न मुस्लिम लीग के नेताओं ने ऐसे स्वतंत्र भारत की कल्पना कभी की थी।

इस स्वतंत्रता से तो देश अंग्रेजों के अधीन रहकर तब तक स्वतंत्रता की प्रतीक्षा कर सकता था जब तक कि भारत स्वयं को एक रूप में, एक साथ और एक आत्मा के साथ स्वतंत्र होने योग्य बना ले। जब माउण्टबेटन ने भारत-पाकिस्तान के विभाजन की योजना इंग्लैण्ड भेज दी तब एक दिन उन्होंने इस योजना का प्रारूप जवाहरलाल नेहरू को दिखाया। जवाहरलाल नेहरू उस समय तक माउण्टबेटन की पत्नी एडविना के गहरे मित्र बन चुके थे।

दोनों ही मिलकर सिगरेट पीते थे, साथ-साथ यात्राएं करते थे तथा चाय की चुस्कियों एवं डिनर के छुरी-कांटों के साथ भारत की राजनीति पर घण्टों बात करते थे। माउण्टबेटन को विश्वास था कि आजाद-खयालों एवं व्यक्तिगत आजादी के पक्षधर अंग्रेजी पढ़े-लिखे नेहरू ईमानदारी से बनाई गई इस योजना को देखते ही सहमत हो जाएंगे किंतु हुआ बिल्कुल ठीक उलटा। जवाहरलाल नेहरू इस योजना को देखते ही आग बबूला हो गये।

वे अखण्ड भारत के अंतरिम प्रधानमंत्री थे तथा उनकी आंखों में अब भी अखण्ड एवं स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी तैर रही थी, जो उन्हें कभी नहीं मिलने वाली थी। यदि वे माउण्टबेटन प्लान को स्वीकार कर लेते तो वे संभवतः एक ऐसे देश के प्रधानमंत्री रह जाते जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं होना था। इस योजना के आधार पर बनने वाले लगभग छः सौ देशों में से शायद ही कोई उन्हें प्रधानमंत्री बनाने को तैयार होता।

जवाहरलाल ने अत्यंत रूखे शब्दों में माउण्टबेटन प्लान को मानने से अस्वीकार कर दिया। जवाहरलाल का जवाब सुनकर माउण्टबेटन को निराशा हुई किंतु उन्होंने जवाहरलाल से ही कहा कि ठीक है वे लंदन भेजी जा चुकी योजना को रद्द कर देंगे और शीघ्र ही एक नई योजना तैयार करवाकर जवाहरलाल को दिखाएंगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

वी. पी. मेनन द्वारा भारत विभाजन योजना में संशोधन

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जवाहरलाल नेहरू ने माउण्टबेटन प्लान को यह कहकर नकार दिया कि ब्रिटिश प्रांतों को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता के वे स्वयं इस बात का निर्णय लें कि भारत में रहें या पाकिस्तान में, अपितु हिन्दू बहुल प्रांतों को अनिवार्यतः भारत में ही रखा जाएगा तथा केवल मुस्लिम बहुल प्रांतों को ही पाकिस्तान में जाने का अधिकार होगा तो माउण्टबेटन ने वी. पी. मेनन से माउण्टबेटन प्लान में कुछ संशोधन करने को कहा।

जवाहरलाल नेहरू के नाराज हो जाने पर माउण्टबेटन की दृष्टि सरदार पटेल पर गई किंतु अब तक माउण्टबेटन समझ चुके थे कि इस योजना के मामले में पटेल तो नेहरू से भी अधिक कठोर सिद्ध होंगे। अतः माउण्टबेटन ने भारत सरकार में दोहरी भूमिका निभा रहे अपने राजनीतिक सलाहकार एवं सरदार पटेल के रियासती विभाग के सचिव वी. पी. मेनन से दूसरी योजना तैयार करने को कहा।

जहाँ लॉर्ड माउण्टबेटन के स्टाफ में इण्डियन सिविल सर्विस के बड़े-बड़े दिग्गज अधिकरी मौजूद थे और जिनकी छातियां ऑक्सफोर्ड एवं कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटियों की बड़ी-बड़ी डिग्रियों से जगमगाती थीं और जिनकी बुद्धिमानी के डंके पूरे इंग्लैण्ड में बजते थे और जिन्होंने भारत में अपनी जिंदगी के बहुत बड़े हिस्से गुजार दिये थे, उन सभी को नकार कर माउण्टबेटन ने एक ऐसे आदमी को भारत विभाजन की संशोधितत योजना बनाने के लिए बुलाया जो बहुत साधारण भारतीय परिवार के बारह सदस्यों में से एक था ।

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वह केवल 13 वर्ष की आयु में अपना स्कूल, घर और गांव छोड़कर बरसों तक दिल्ली की सड़कों पर हमाली और मजदूरी करता रहा था और रेलवे के इंजनों में कोयला झौंककर पेट पालता रहा था और जो केवल दो अंगुलियों से अंग्रेजी का टाइपराइटर चलाता था। इसका नाम वी. पी. मेनन था। उन दिनों पटेल और मेनन के दिमागों का गठजोड़ बहुत खतरनाक माना जाता था।

माउण्टबेटन को अनुमान भी नहीं था कि शतरंज की जिस चौसर पर माउण्टबेटन और जवाहरलाल नेहरू अपने-अपने मोहरे आगे बढ़ा रहे थे उस चौसर पर माउण्टबेटन और जहवाहरलाल तो स्वयं ही प्यादों से अधिक हैसियत नहीं रखते थे। असली खेल तो वी. पी. मेनन और सरदार पटेल खेलने वाले थे। चौसर भी मेनन और पटेल की थी और प्यादे भी। पटेल और मेनन ने बहुत पहले ही एक योजना अपने दिमाग में बना रखी थी। अब समय आ गया था जब मेनन उसे कागजों पर उतार दें। जहवारलाल नेहरू से बात करने के बाद माउण्टबेटन ने वी. पी. मेनन को बुलवाया तथा उन्हें उसी समय एक योजना बनाकर देने को कहा।

माउण्टबेटन ने इस बात का ध्यान रखा कि मेनन को पटेल से नहीं मिलने दिया जाए क्योंकि योजना बनाने से पहले यदि मेनन पटेल से मिले तो जहवारलाल को संदेह होगा कि विभाजन की नई योजना पटेल ने तैयार की है।

जवाहरलाल कतई नहीं चाहते थे कि इस योजना को बनाने का श्रेय सरदार पटेल को मिले। वी. पी. मेनन उसी समय वायसरॉय निवास पर टाइपराइटर लेकर बैठ गए और उन्होंने चार घण्टों में टाइपराइटर की मदद से एक योजना कागजों पर उतार दी। ऐसा लगता था कि यह मेनन ने तैयार की है किंतु वास्तव में इस योजना का खाका सरदार पटेल द्वारा पहले ही वी. पी. मेनन को बता दिया गया था।

ऑफिस के पोर्च में बैठकर हिमालय के विहंगम दृश्य का आनंद लेते हुए, लंच से डिनर के बीच फैले समय में अर्थात् कठिनाई से छः घण्टे तक काम करके एक ऐसे व्यक्ति ने भारतीय आजादी को नए सांचे में ढालने का गौरव प्राप्त किया, जिसने अपनी सरकारी नौकरी दो अंगुलियों से टाइपिंग करते हुए शुरू की थी। उसने जो मसौदा दुबारा लिखकर तैयार किया, उस आधार पर भारतीय उपमहाद्वीप को नए सिरे से व्यवस्थित किया जाना था और दुनिया का नक्शा भी बदल जाने वाला था।

इस योजना में प्रस्तावित किया गया कि हिन्दू-बहुल आबादी भारत में रहेगी। मुस्लिम-बहुल आबादी वाले क्षेत्र पाकिस्तान में जायेंगे। प्रत्येक ब्रिटिश प्रांत को अनिवार्यतः भारत या पाकिस्तान में मिलना होगा। पंजाब और बंगाल का आबादी के आधार पर बंटवारा होगा। देशी रजवाड़े अपनी मर्जी से हिन्दुस्तान या पाकिस्तान में मिल सकेंगे या फिर अलग देश के रूप में स्वतंत्र रह सकेंगे। नेहरू ने इस योजना को देखते ही स्वीकार कर लिया।

वी. पी. मेनन ने माउण्टबेटन प्लान में जो बड़ा बदलाव किया था, वह था पंजाब और बंगाल का मजहब के आधार पर बंटवारा। सरदार पटेल आरम्भ से ही पूरे पंजाब और पूरे बंगाल को पाकिस्तान में शामिल किए जाने के विरोधी थे।

माउण्टबेटन जानते थे कि जिन्ना आसानी से इस योजना को स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि उसकी मांग पूरे पंजाब और पूरे बंगाल की थी। इसके साथ-साथ ब्लूचिस्तान, सिंध और खैबर-पख्तून तो धर्म के आधार पर जिन्ना के थे ही। फिर भी माउण्टबेटन ने पंजाब और बंगाल के विभाजन वाली यह योजना स्वीकृति के लिए अपने सहायक लॉर्ड इस्मे के साथ लंदन भेज दी।

जिन्ना से भय

लियोनार्ड मोसले ने लिखा है-

‘योजना को स्वीकृति के लिये लंदन भेज दिये जाने के बाद माउंटबेटन जिन्ना की तरफ से आशंकित हो गया। उसे लगा कि जिन्ना छंटे हुए पाकिस्तान का विरोध करेगा। इसलिये उसने जिन्ना से बात की और उससे आश्वस्त होकर इस्मे को लंदन में तार भेजा कि मुझे पूरा विश्वास है कि जिन्ना इसे मान लेगा। हालांकि मैं जानता हूँ कि जिन्ना बहुत ही चालाक और सौदेबाज है, वह मुझे बहका भी सकता है।

माउंटबेटन को इतने पर भी संतोष नहीं हुआ। उसने जिन्ना से निबटने के लिये एक आपात योजना भी तैयार की कि यदि जिन्ना एन वक्त पर मुकर गया तो उस समय क्या किया जायेगा। इस आपात् योजना में मुख्यतः यह प्रावधान किया गया था कि चूंकि जिन्ना ने योजना को अस्वीकार कर दिया है इसलिये सत्ता वर्तमान सरकार को ही सौंपी जा रही है।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गांधीजी का असमंजस और भारत को बीच में से चीरने की योजना

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ईस्वी 1909 में अखण्ड भारत में मुस्लिम जनसंख्या

जब माउण्टबेटन प्लान अर्थात् भारत के विभाजन की योजना लंदन से स्वीकार होकर आ गई तब कांग्रेसी नेता, मुस्लिमलीगी नेता और भारत की जनता इस बात को समझ गए कि अब भारत विभाजन को कोई नहीं रोक सकता किंतु गांधीजी का असमंजस अब भी बना रहा। इसी दौरान जिन्ना ने भारत को बीच में से चीरने की खतरनाक योजना बनाई।

मौलाना अबुल कलाम द्वारा विभाजन का विरोध

जब मौलाना अबुल कलाम आजाद को ज्ञात हुआ कि माउंटबेटन ब्रिटिश मंत्रिमण्डल से मिलने लंदन जा रहे हैं तो मौलाना ने शिमला जाकर माउंटबेटन से भेंट की और प्रस्ताव रखा कि कैबीनेट मिशन प्लान पर दृढ़ रहें ताकि देश का विभाजन टाला जा सके। इस पर लॉर्ड माउंटबेटन ने कहा कि यदि सत्ता हस्तांतरण में देरी की गयी तो लोग ब्रिटिश सरकार की नीयत पर शक करेंगे और सरकार की बदनामी होगी।

भारत विभाजन को लेकर केवल मौलाना के मन में ही असमंजस नहीं था, गांधीजी का असमंजस भी बरकरार था। इन दानों वृद्ध नेताओं को अब भी लगता था कि भारत का विभाजन रोका जा सकता है और अविभाजित भारत में मुसलमान अधिक शांति एवं समृद्धि के साथ रह सकेंगे। हिन्दुओं का क्या होगा, संभवतः इस सम्बन्ध में मौलाना और गांधीजी दोनों ही नहीं सोचते थे!

गांधीजी का असमंजस

वायसराय एवं गवर्नर जनरल माउण्टबेटन के प्रयासों से 6 मई 1947 को गांधीजी ने नई दिल्ली में मुहम्मद अली जिन्ना के निवास पर भेंट की। उन दोनों के बीच भारत का वह नक्शा रखा गया जिसमें पाकिस्तान हरे रंग से दिखाया गया था। गांधीजी ने जिन्ना से बहुत अनुनय-विनय की कि वह पाकिस्तान को लेने की जिद्द छोड़ दे।

गांधीजी ने जिन्ना से यहाँ तक कहा कि- ‘यदि वह पाकिस्तान की मांग छोड़ देता है तो उसे आजाद भारत का प्रधानमंत्री बना दिया जाएगा’ किंतु जिन्ना टस से मस नहीं हुआ। इस भेंट के बाद जिन्ना ने एक परिपत्र जारी किया जिसमें कहा गया कि मिस्टर गांधी बंटवारे के सिद्धांत को नहीं मानते हैं। उनके लिये बंटवारा अनिवार्य नहीं है। जबकि मेरी दृष्टि में न सिर्फ बंटवारा अनिवार्य है अपितु हिन्दुस्तान की राजनीतिक समस्या का एकमात्र व्यावहारिक हल भी है।

7 मई 1947 की प्रार्थना सभा में गांधीजी ने अपना निर्णय जनता के समक्ष रखा-

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‘कल में जिन्ना साहब के पास गया था। हमारे बीच राजनीतिक विरोध बहुत ज्यादा है। वे पाकिस्तान मांगते हैं, मैं उसका विरोधी हूँ परन्तु कांग्रेस वालों ने लगभग निर्णय कर लिया है कि पाकिस्तान की मांग पूरी कर दी जाए। हाँ पंजाब और बंगाल के जिन इलाकों में हिन्दुओं का बहुमत है, वे पाकिस्तान को न मिलें। केवल वे ही प्रदेश पाकिस्तान में जाएंगे जहाँ मुसलमानों का बहुमत है। मैं तो इसके भी विरुद्ध हूँ। देश के टुकड़े करने की बात से मैं कांप उठता हूँ। परन्तु यह विचार रखने वाला इस समय मैं अकेला हूँ। मैं किसी भी पक्ष का समर्थन नहीं करता। जिन्ना साहब को मैंने साफ कह दिया है कि मैं तो हिन्दू, मुसलमान, पारसी सिक्ख, जैन, ईसाई आदि सभी जातियों का सेवक हूँ, ट्रस्टी हूँ। इसलिए पाकिस्तान के निर्माण में मैं दिलचस्पी नहीं लूंगा। और उसकी स्वीकृति पर मैं हस्ताक्षर नहीं करूंगा। मैंने जिन्ना साहब को यह भी नम्रतापूर्वक बताया कि आप हिंसा के जोर से या ऐसे नामर्दी भरे रवैये से पाकिस्तान नहीं ले सकते। समझाकर शांति से सारा देश भले ही आपको सौंप दिया जाए, उससे मैं खुश हो जाउंगा। ऐसा होगा तो मैं सबसे पहली बधाई दूंगा।’

गांधीजी द्वारा पाकिस्तान निर्माण का पुनः विरोध

18 मई 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन भारत-विभाजन की योजना लेकर दिल्ली से लंदन गए। पूरा देश जानता था कि लॉर्ड माउंटबेटन भारत-विभाजन की अनुमति लेने के लिए लंदन गए हैं किंतु 30 मई 1947 को जिस दिन भारत-विभाजन योजना पर एटली और चर्चिल का अनुमोदन लेकर वायसराय लंदन से भारत लौटे, उसी शाम को प्रार्थना सभा में गांधीजी ने विभाजन का कठोर शब्दों में विरोध करते हुए कहा- ‘देश अगर धू-धू करके जलने लगता है, तो भी….. पाकिस्तान के नाम पर हम एक इंच भूमि नहीं देंगे।

गांधीजी भले ही पाकिस्तान न बनने देने की गंभीर घोषणाएं कर रहे थे किंतु भीतर ही भीतर हताश थे और वे अच्छी तरह समझ चुके थे कि इस विषय पर अब कांग्रेस में उनके विचारों का समर्थन करने वालों की संख्या घट गई है। यहाँ तक कि उनके पुराने साथी नेहरू और पटेल भी पाकिस्तान निर्माण के समर्थक हो गए हैं।

इससे दुःखी होकर एक दिन उन्होंने प्रार्थना सभा में सबके सामने कहा- ‘आज मैं स्वयं को अकेला पाता हूँ। सरदार पटेल और जवाहरलाल भी सोचते हैं कि मेरा स्थिति का आकलन गलत है तथा विभाजन पर सहमति से शांति अवश्य वापस होगी….।’

भारत को बीच में से चीरने की योजना

जब माउंटबेटन नयी योजना की स्वीकृति लेकर भारत आ गये तो अचानक जिन्ना ने मांग की कि उसे पूर्वी-पाकिस्तान और पश्चिमी-पाकिस्तान को मिलाने के लिये हिंदुस्तान से होकर एक हजार मील का रास्ता चाहिये। इस पर कांग्रेस फिर बिफर पड़ी किंतु माउण्टबेटन ने किसी तरह दोनों पक्षों में बीच-बचाव किया।

गुरुदत्त ने लिखा है- ‘जिन्ना उत्तरी और पश्चिमी-पाकिस्तान को मिलाने के लिए हिमालय के नीचे-नीचे एक सौ मील चौड़ी पट्टी चाहता था।’

दिल्ली में सीधी कार्यवाही दिवस का खतरा मई 1947 के दूसरे सप्ताह में कलकत्ता डेली में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई जिसमें एक संवाददाता द्वारा लिखा गया कि- ‘ परिस्थिति का मेरा अध्ययन इस प्रकार है……. दिल्ली में वैसा ही डायरेक्ट एक्शन शीघ्र होने वाला है। जैसा अभी-अभी पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत में किया गया है। ……..

हिन्दुस्तान की केन्द्रीय सरकार के संचार विभाग को अविलम्ब मुसलमानी बना दिया गया है। दिल्ली टेलिफोन विभाग के समस्त आवश्यक स्थानों पर यूरोपियन, हिन्दू और सिक्ख अधिकारियों को निकालकर मुसलमान नियुक्त कर दिए गए हैं। जिससे वैसा ही समय पड़ने पर जैसा पंजाब और पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत में अभी-अभी पड़ा था, समस्त संचार साधन दिल्ली के भीतर और दिल्ली के हिन्दुस्तान के अन्य भागों के साथ काट लिए जाएं अथवा नियंत्रण में कर लिए जाएं।’

सरकार द्वारा समय पर किए गए प्रबंध से यह आशंका निर्मूल सिद्ध हुई, दिल्ली में डायरेक्ट एक्शन नहीं हो सका।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

स्वतंत्र बंगाल की मांग – सुहरावर्दी द्वारा अलग बंगाल बनाने की योजना

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सुहरावर्दी गांधी और मुजीबुर्रहमान

लॉर्ड माउंटबेटन योजना को बदलने के लिए एक और चाल चली गई। बंगाल का मुख्यमंत्री सुहरावर्दी जो बंगाल में सीधी कार्यवाही का खलनायक था, गांधीजी के पास एक प्रस्ताव लेकर आया। उसकी योजना यह थी कि कांग्रेस मान जाए कि पूर्ण बंगाल को एक स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया जाए।

अर्थात् स्वतंत्र भारत की तरह न केवल स्वतंत्र पाकिस्तान की स्थापना की जाए अपितु स्वतंत्र बंगाल की भी स्थापना की जाए। गांधीजी इसके लिए तैयार हो गए।

इस दौर की राजनीति में गांधीजी न केवल कांग्रेस के सर्वमान्य नेता थे अपितु सम्पूर्ण हिन्दू समाज के भी नेता थे किंतु वे अपने मुस्लिम प्रेम के कारण जिस प्रकार के ऊट पंटाग निर्णय ले रहे थे, उन्हें देखकर हैरानी होती है। संभवतः गांधीजी को लग रहा था कि जैसे ही स्वतंत्र बंगाल की मांग सामने आएगी, भारत से पाकिस्तान के अलग होने की संभावना पर विराम लग जाएगा किंतु राजनीति को किंचिंत् भी समझने वाला नौसीखिया भी बता सकता है कि गांधीजी द्वारा स्वतंत्र बंगाल की मांग को समर्थन दिया जाना किसी भी तरह व्यावहारिक नहीं था।

यदि स्वतंत्र बंगाल की स्थापना हो जाती तो स्वतंत्र पंजाब की मांग को भी नैतिक समर्थन प्राप्त हो जाता। ऐसी स्थिति में देशी राज्यों के राजा भी अपने-अपने राज्यों को स्वतंत्र देश घोषित कर देते। इस प्रकार भारत खण्ड-खण्ड होकर बिखर जाता।

ऐसा नहीं था कि केवल गांधीजी जी सुहरावर्दी की चाल में फंसे, बाबू शरत्चन्द्र बोस और दूसरे बंगाली कांग्रेसी भी इस चाल में फंस गए और स्वतंत्र बंगाल की योजना बनने लगी किंतु हिन्दू महासभा के नेता श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने इस योजना के पीछे काम कर रहे षड़यंत्र का रहस्योद्घाटन कर दिया। डॉ. मुखर्जी का कहना था कि यह स्वतंत्र बंगाल की योजना पूरे बंगाल को पाकिस्तान में सम्मिलित करने का षड़्यंत्र है।

उन्होंने बताया कि- ‘पहले बंगाल को एक स्वतंत्र देश बनाया जाएगा और जब यह स्वतंत्र देश अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करने में असफल होगा तो वहाँ के बहुसंख्यक मुसलमान इसे पूरा का पूरा पाकिस्तान के हाथों में दे देंगे।’

डॉ. मुखर्जी द्वारा मुस्लिम लीग के षड़यंत्र का रहस्योद्घाटन कर दिए जाने के बाद गांधीजी ने सुहरावर्दी के समक्ष शर्त रखी कि गांधीजी इस योजना को तभी आशीर्वाद देना स्वीकार करेंगे जब बंगाल विधान सभा के तीन चौथाई सदस्य बहुमत से इस योजना को पारित कर देंगे। इसके साथ ही गांधीजी यह शर्त भी लगाना चाहते थे कि भविष्य में कभी भी कोई भी निश्चय तब तक मान्य नहीं होगा, जब तक स्वतंत्र बंगाल की विधान सभा के तीन चौथाई हिन्दू सदस्य उस निर्णय के पक्ष में नहीं होंगे।

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मुस्लिम लीग ने कहा कि स्वतंत्र बंगाल की विधान सभा के निर्णय तीन चौथाई मत से स्वीकार हुआ करेंगे किंतु गांधीजी की मांग का आशय यह नहीं था, वे तो हिन्दुओं के तीन-चौथाई बहुमत की बात कर रहे थे। कांग्रेसी नेताओं को मुस्लिम लीग के इस षड़यंत्र का भी पता चल गया कि बंगाल की मुस्लिम लीग सुहरावर्दी की सहायता से बंगाल विधान सभा के अछूत जाति के सदस्यों को मुस्लिम लीग की योजना के पक्ष में करने में लगी है। इस प्रकार मुस्लिम लीग की यह चाल भी असफल हुई।

सुहरावर्दी की इस योजना के पीछे एक खतरनाक मनोविज्ञान काम कर रहा था। वास्तव में पाकिस्तान का असम्भव-सपना सम्भव बनाने में सुहरावर्दी का सबसे अधिक योगदान था। उसने ही बंगाल में ‘लड़ कर लेंगे पाकिस्तान’ का आह्वान किया था। उसने ही कलकत्ता में सीधी कार्यवाही दिवस की योजना बनाई थी और अत्यंत क्रूरता-पूर्वक कार्यान्वित की थी। जिन्ना तो केवल जुबानी-नेतागिरी कर रहा था, धरती पर उसका कार्यान्वयन तो सुहरावर्दी और उसके जैसे लोग कर रहे थे किंतु अब जब पाकिस्तान बनने का समय आ गया तो सुहरावर्दी को अपने पैरों के तले धरती खिसकती हुई अनुभव हुई थी।

मुहम्मद अली जिन्ना, लियाकत अली, चौधरी मुहम्मद अली तथा अब्दुल रब निश्तर जैसे नेता जो अब तक दिल्ली में राजनीति करते रहे थे, वे पाकिस्तान बनने के बाद पश्चिमी-पाकिस्तान के कराची अथवा किसी अन्य नगर में बैठकर राजनीति करने वाले थे ।

पूर्वी बंगाल और उसके नेताओं की स्थिति द्वितीय श्रेणी के नेताओं जैसी होने जा रही थी। इसलिए उसने गांधीजी को दी गई योजना के माध्यम से भावी पूर्वी-पाकिस्तान की, भावी पश्चिमी-पाकिस्तान से मुक्ति का मार्ग ढूंढने का प्रयास किया था।

मोसले ने इस ओर संकेत करते हुए लिखा है- ‘सुहरावर्दी ने स्वतंत्र बंगाल की मांग कबूल करवाने की आखिरी कोशिश की क्योंकि उसे पता था कि पाकिस्तान में उसे वह जगह नहीं मिलने वाली थी, जो वह चाहता था। जिन्ना ने पूर्वी बंगाल के लिए नाजीमुद्दीन को चुन लिया था। सुहरावर्दी भारत में ही रहने की सोच रहा था।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गांधीजी के खिलाफ

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सब भीतर ही भीतर गांधीजी के खिलाफ थे

जब भारत के विभाजन हेतु माउण्टबेटन योजना लंदन से स्वीकृत होकर आ गई तो कांग्रेस सहित भारत के विभिन्न पक्षों ने विभाजन की अनिवार्यता को अनुभव कर लिया किंतु गांधीजी अब भी इसके खिलाफ थे इस कारण कांग्रेस एवं अन्य दल गांधीजी के खिलाफ हो गए किंतु वे अपने भावों को सार्वजनिक रूप से व्यक्त नहीं कर पा रहे थे। माउण्टबेटन ने इस घटना को अपने संस्मरणों में लिखा है।

2 जून 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने कांग्रेस की ओर से नेहरू, सरदार पटेल तथा कांग्रेस अध्यक्ष आचार्य कृपलानी को, मुस्लिम लीग की ओर से जिन्ना, लियाकत अली तथा रबनिस्तर को एवं साठ लाख सिक्खों का प्रतिनिधित्व करने वाले सरदार बलदेवसिंह को अपने निवास पर आमंत्रित किया और उन्हें माउण्टबेटन योजना की प्रतिलिपियां सौंप दीं।

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इन नेताओं ने लॉर्ड माउंटबेटन से योजना की प्रतियां ले लीं किंतु वे गांधीजी के भावी कदम से आशंकित थे। इस बैठक में लॉर्ड माउंटबेटन के साथ लॉर्ड इस्मे तथा सर एरिक मेलविल भी सम्मिलित हुए। 2 जून 1947 को माउंटबेटन के निवास पर नेताओं के व्यवहार पर लॉर्ड माउंटबेटन ने टिप्पणी करते हुए लिखा है- ‘मैं एक अजीब बात अनुभव कर रहा था। वे सब अंदर ही अंदर चुपके-चुपके गांधी के खिलाफ थे। जल्द ही वे मेरे साथ आ गये। उन्होंने मुझे उकसाना आंरभ किया ……. कहना चाहिये कि एक तरह से वे गांधी को स्वयं चुनौती न देकर मेरे माध्यम से देना चाहते थे। ‘

कांग्रेस, मुस्लिम लीग तथा सिक्ख नेताओं के चले जाने के बाद लॉर्ड माउंटबेटन ने गांधीजी को बुलाया और उनसे इस योजना का विरोध न करने की अपील की। गांधीजी ने उस दिन मौनव्रत रख लिया, इसलिये उन्होंने एक कागज पर लिखकर वायसराय को सूचित किया कि मैं आज बोल नहीं सकता फिर कभी आपसे अवश्य चर्चा करना चाहूंगा। गांधीजी के इस रवैये से स्पष्ट है कि गांधीजी भारत विभाजन का ठीकरा अपने सिर पर फोड़े जाने से बचना चाहते थे।

जिन्ना की मक्कारी

2 जून 1947 को माउण्टबेटन ने अपने निवास पर पुनः जिन्ना से भेंट की तथा चाहा कि जिन्ना उन्हें लिखकर दे कि मुस्लिम लीग को विभाजन की योजना स्वीकार है। इस पर जिन्ना ने लिखकर देने से मना कर दिया तथा जवाब दिया कि- ‘इसका निर्णय मुस्लिम लीग की कार्यसमिति करेगी।’

स्टेनली वोलपर्ट ने इस वार्तालाप को इस प्रकार लिखा है-

माण्टबेटन ने जिन्ना से प्रश्न किया- ‘मुस्लिम लीग की कार्यसमिति इस योजना को स्वीकार करेगी या नहीं?’

जिन्ना ने जवाब दिया- ‘उम्मीद तो है।’

माउण्टबेटन ने पूछा- ‘क्या वह खुद इस योजना को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं?’

जिन्ना ने कहा- ‘वह निजी तौर पर माउण्टबेटन के साथ हैं और अपनी तरफ से पूरा प्रयास करेंगे कि अखिल भारतीय मुस्लिम लीग कौंसिल भी इसे स्वीकार कर ले।’

माउण्टबेटन ने जिन्ना को याद दिलाया- ‘आपके इस हथकण्डे से कांग्रेस पार्टी आपको हमेशा शक की निगाह से देखती रही है। आपका तरीका हमेशा यही रहा है कि आप पहले कांग्रेस द्वारा किसी भी योजना पर अंतिम निर्णय लिए जाने की प्रतीक्षा करते हैं, ताकि आपको मुस्लिम लीग के अनुकूल फैसला करने का अवसर मिल जाए। यदि आपका रवैया यही बना रहा तो सुबह की बैठक में कांग्रेस पार्टी के नेता और सिक्ख, योजना पर अपनी मुहर लगाने से इन्कार कर देंगे जिसका नतीजा अव्यवस्था में निकलेगा और आपके हाथ से आपका पाकिस्तान हमेशा के लिए निकल जाएगा।’

जिन्ना ने कहा- ‘जो होना है, वह तो होगा ही।’

माउण्टबेटन ने कहा- ‘मि. जिन्ना मैं आपको इस समझौते के लिए किए गए परिश्रम को व्यर्थ करने की अनुमति नहीं दे सकता। चूंकि आप मुस्लिम लीग की तरफ से स्वीकृति नहीं दे रहे हैं, इसलिए उसकी तरफ से मुझे स्वयं बोलना पड़ेगा। ….. मेरी केवल एक शर्त है कि सुबह की मीटिंग में जब मैं यह कहूं कि मि. जिन्ना ने मुझे यह आश्वासन दिया है, जिसे मैंने मान लिया है और जिससे मैं संतुष्ट हूँ तो आप किसी भी कीमत पर इसका खण्डन नहीं करेंगे और जब मैं आपकी तरफ देखूंगा तो आप सहमति में सिर हिलाएंगे……..।’  

वायसराय के इस प्रस्ताव का जवाब जिन्ना ने केवल सिर हिलाकर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भेड़ियों के सामने

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सीमांत गांधी अब्दुल गफ्फार खाँ पाकिस्तान के साथ नहीं जाना चाहते थे, उन्होंने पाकिस्तान के लिए संघर्ष कर रही मुस्लिम लीग के नेताओं की तुलना भेड़ियों से करते हुए कहा कि कांग्रेस हमें भेड़ियों के सामने फैंक देना चाहती है।

3 जून 1947 को कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक हुई जिसमें माउंटबेटन योजना स्वीकार कर ली गई। बैठक में इसे अस्थाई समाधान बताया गया तथा आशा व्यक्त की गई कि जब नफरत की आंधी थम जाएगी तो भारत की समस्याओं को सही दृष्टिकोण से देखा जाएगा और फिर द्विराष्ट्र का ये झूठा सिद्धांत हर किसी के द्वारा अस्वीकार कर दिया जाएगा।

आज जो भारत का स्वरूप है, इसे इस क्षेत्र के भूगोल यहाँ के पर्वतों और समुद्रों ने बनाया है ….. आर्थिक परिस्थितियों और अंतर्राष्ट्रीय मामलों के चलते भारत की एकता और जरूरी हो जाती है। भारत का जो स्वरूप हमेशा से हमारी आंखों में बसा हुआ है वह हमारे दिलो-दिमाग में बरकरार रहेगा।

भेड़ियों के सामने

कांग्रेस कार्यसमिति के इस निर्णय से पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश के खानबंधु और खुदाई खिदमतगार, जो बराबर कांग्रेस का साथ दे रहे थे, बड़ी मुसीबत में पड़ गए। जब वर्किंग कमेटी की बैठक में गांधीजी ने भी माउंटबेटन की योजना का अर्थात् देश के बंटवारे की योजना का समर्थन किया तो सीमांत गांधी अब्दुल गफ्फार खाँ अवाक रह गए।

अब्दुल गफ्फार को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि खाँ आश्चर्य हुआ कि बंटवारा स्वीकार करने के पहले पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश के नेताओं से पूछा भी नहीं गया। उन्होंने देश के बंटवारे का विरोध करते हुए कहा कि- ‘अगर कांग्रेस अब खुदाई खिदमतगारों को भेड़ियों के सामने फेंक देती है तो सीमांत प्रदेश इसे दगाबाजी का काम समझेगा।’

रेडियो पर घोषणा

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3 जून 1947 को शाम सात बजे वायसराय तथा भारतीय नेताओं ने माउंटबेटन योजना को स्वीकार कर लिये जाने तथा अंग्रेजों द्वारा भारत को शीघ्र ही दो नये देशों के रूप में स्वतंत्रता दिये जाने की घोषणा की। वायसराय ने कहा कि कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के बीच ऐसी किसी योजना पर समझौता हो पाना संभव नहीं हुआ है जिससे कि देश एक रह सके। इसलिये आजादी के साथ ही जनसंख्या के आधार पर देश का विभाजन हिंदुस्तान व पाकिस्तान के रूप में किया जायेगा।

वायसराय की घोषणा में पाकिस्तान के प्रांतीय और जिलेवार हिस्सों को गिनाया गया। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि प्रांतीय और राष्ट्रीय स्तर पर विधान सभा के भीतर जनमत संग्रह ‘साधारण बहुमत’ से विभाजन के पक्ष और विपक्ष में किस प्रकार किया जाएगा। देर से बचने के लिए विभिन्न प्रांतों के हिस्सों को स्वतंत्र रूप से यह कार्य करना होगा। मौजूदा संविधान सभा और नई संविधान सभा, संविधान रचना का काम करेगी। ये संस्थाएं अपने नियम स्वयं बनाने के लिए स्वतंत्र होंगी।

वायसराय माउण्टबेटन के संदेश के बाद जवाहरलाल नेहरू, सरदार बलदेवसिंह और मुहम्मद अली जिन्ना के संदेश प्रसारित किए गए। नेहरू ने अपने वक्तव्य के अंत में सुभाष चंद्र बोस द्वारा दिया गया नारा उच्चारित किया- ‘जयहिन्द।’ जबकि जिन्ना ने अपना भाषण ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ कहकर समाप्त किया।

जवाहरलाल नेहरू ने वायसराय की घोषणा का स्वागत करते हुए देशवासियों से अपील की कि वे इस योजना को शांतिपूर्वक स्वीकार कर लें। नेहरू ने कहा- ‘हम भारत की स्वतंत्रता बल प्रयोग या दबाव से प्राप्त नहीं कर रहे हैं। यदि देश का विभाजन हो भी जाता है तो कुछ दिनों पश्चात् दोनों भाग पुनः एक हो जायेंगे और फिर अखण्ड भारत की नींव और मजबूत हो जायेगी।’

जिन्ना ने अपने भाषण में कहा- ‘यह हम लोगों के लिये सोचने की बात है कि जो योजना बर्तानिया सरकार सामने रख रही है, उसे हम लोग समझौता- आखिरी सौदे के रूप में स्वीकार कर लें।’

सिक्खों के नेता बलदेवसिंह ने कहा- ‘यह समझौता नहीं था, आखिरी सौदा था। इससे हर किसी को खुशी नहीं होती। सिक्खों को तो होती ही नहीं। फिर भी यह गुजारे लायक है हमें इसे मान लेना चाहिये।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

गांधीजी से भय

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जब माउण्टबेटन योजना लंदन से लेकर भारत में समस्त पक्षों द्वारा स्वीकार कर ली गई तब अचानक ही समस्त पक्षों में गांधीजी से भय व्याप्त हो गया क्योंकि गांधीजी ने अब तक एक बार भी भारत विभाजन को स्वीकार नहीं किया था।

गांधीजी के दो बड़े चेले नेहरू एवं पटेल गांधीजी से भय के कारण मन ही मन कांप रहे थे, वे दोनों ही गांधीजी को विभाजन के लिए तैयार नहीं कर पाए थे। नेहरू एवं पटेल ही नहीं, पूरी कांग्रेस गांधीजी से भय खा रही थी!

जिस वायसराय लॉर्ड माउण्टबेटन से हर कोई डरा हुआ था कि न जाने यह शक्तिशाली अंग्रेज भारत के भाग्य का क्या निर्णय करे, उस माउंटबेटन को भी गांधीजी से भय लग रहा था। 4 जून 1947 को माउंटबेटन को सूचना मिली कि आज शाम की प्रार्थना सभा में गांधीजी देशवासियों से अपील करेंगे कि वे विभाजन की योजना को अस्वीकार कर दें।

इस पर माउंटबेटन ने गांधीजी को वायराय भवन में बुलाया और उनसे कहा कि- ‘विभाजन की पूरी योजना आपके निर्देशानुसार बनायी गयी है। अतः आप इस योजना का विरोध न करें।’

गांधीजी ने वायसराय की किसी बात का जवाब नहीं दिया किंतु इस बार यह नहीं कहा कि उनका मौन व्रत है। गांधीजी ऐसा कह भी नहीं सकते थे क्योंकि उन्हें शाम को प्रार्थना सभा में अपने भक्तों को सम्बोधित करना था। गांधीजी राजनीति के चतुर खिलाड़ी थे, उन्होंने वायसराय की आंख में कुछ ऐसा पढ़ लिया था जो पहले कभी नहीं पढ़ा गया था। गांधीजी ने मन ही मन कुछ निर्णय लिया और वे वायसराय भवन से बाहर आ गए।

जब गांधीजी बिना कुछ कहे, बिना कोई प्रतिवाद किए, बिना कोई आश्वासन दिए वायसराय के पास से उठकर चले गए तो वायसराय को हैरानी हुई। उसे गांधीजी से भय अब भी लग रहा था किंतु जिस प्रकार गांधीजी ने कोई निर्णय ले लिया था, उसी प्रकार वायसराय ने भी गांधीजी के सम्बन्ध में कुछ निर्णय ले लिया था।

उस शाम गांधीजी ने प्रार्थना सभा में इतना ही कहा कि- ‘वायसराय को दोष देकर ही क्या हो जायेगा? जो हो रहा है और जो होने जा रहा है, उसका जवाब तो स्वयं हमारे दिलों में छिपा है। किसी को कुछ कहने से पहले क्यों न हम अपने दिलों में झांक कर देख लें?’

हंसराज रहबर ने गांधी के इस वक्तव्य पर टिप्पणी करते हुए लिखा है- ‘गांधी ने कहा था कि पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा और जब बन गया तो निर्णय सुनाने का यह धूर्तता भरा ढंग अपनाया।’

विभाजित भारत की विदेश नीति एक रहे

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5 जून 1947 को माउण्टबेटन ने पुनः विभिन्न दलों के नेताओं से भेंट करके विभाजन की योजना को कार्यान्वित करने पर विचार-विमर्श किया। इस बैठक में जिन्ना ने अपना मंतव्य स्पष्ट करते हुए कहा कि भविष्य में बनने वाले दोनों राज्यों को हर तरह से स्वाधीन और समान स्तर पर रहना चाहिए। नेहरू का कहना था कि इस मामले में हमें अलग दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। भारत का प्रशासन पहले की ही तरह चलाया जा रहा है। यदि कुछ असंतुष्ट प्रांतों को अलग होने की अनुमति दी जाती है तो उस स्थिति में भी भारत सरकार का काम या उसकी विदेश नीति का कार्यान्वयन बाधित नहीं होना चाहिए। इस बैठक में काफी तनाव था।

स्वतंत्रता की तिथि की घोषणा जब भारत के हिन्दुओं की पार्टी कांग्रेस, मुसलमानों की पार्टी मुस्लिम लीग और सिक्खों के नेता बलदेव सिंह ने भारत विभाजन की योजना स्वीकार कर ली तो माउण्टबेटन ने पत्रकार सम्मेलन का आयोजन किया। इस सम्मेलन में उन्होंने भारत को निकट भविष्य में दो उपनिवेशों के रूप में स्वतंत्र किए जाने की घोषणा की।

जब एक पत्रकार ने माउंटबेटन से स्वतंत्रता की तिथि के बारे में प्रश्न किया तो माउंटबेटन ने 15 अगस्त 1947 की तिथि घोषित कर दी। यह द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान के समर्पण की तिथि थी।

अब किसी को गांधीजी से भय नहीं था। यहाँ तक का सफलर बहुंत शांत ढंग से निबट गया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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