Sunday, February 25, 2024
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कैबीनेट मिशन प्लान (संयुक्त भारत योजना)

16 मई 1946 को कैबीनेट मिशन ने अपनी योजना प्रकाशित की। इसे ‘कैबीनेट मिशन प्लान’ तथा ‘संयुक्त भारत योजना’ भी कहते हैं। इसके द्वारा भविष्य में बनने वाले भारत संघ के लिए संघीय संविधान का निर्माण किया जाना प्रस्तावित किया गया जिसके तहत भावी भारत संघ की व्यवस्था की जानी थी। प्रस्तावित संघ में सरकार के तीनों अंग- विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका रखे जाने थे।

संघ में ब्रिटिश-भारत के 11 प्रांत और समस्त 565 देशी रियासतें शामिल होनी थीं। केन्द्रीय सरकार का अधिकार क्षेत्र रक्षा, वैदेशिक मामले और संचार तक सीमित होना था। शेष सभी विषय और अधिकार रियासतों के पास रहने थे। विधान निर्मात्री परिषद में रियासतों के प्रतिनिधियों की संख्या 93 से अधिक नहीं होनी थी जो बातचीत के द्वारा तय की जानी थी। साम्प्रदायिक प्रश्न उस सम्प्रदाय के सदस्यों द्वारा ही निर्धारित किया जाना था। शेष विषयों पर राज्यों का अधिकार होना था।

कैबीनेट मिशन प्लान में ब्रिटिश-प्रांतों को ‘ए’, ‘बी’ और ‘सी’ समूहों अथवा श्रेणियों में बांटने का प्रस्ताव था। पहले अर्थात् ‘ए’ समूह में हिन्दू बहुसंख्यक प्रांत- मद्रास, बम्बई, मध्य-प्रांत व बरार, संयुक्त प्रांत, एवं बिहार थे। दूसरे अर्थात् ‘बी’ समूह में पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत थे जहाँ मुसलमानों का बहुमत था। तीसरे अर्थात् ‘सी’ समूह में बंगाल और असम थे जहाँ मुसलमानों का हल्का बहुमत था।

ये तीनों ही संविभाग अपने समूह के लिए संविधान बनाने के अधिकारी थे। यह प्रावधान भी किया गया था कि ये प्रांत आपस में मिलकर गुट बना सकेंगे। इस योजना के तहत की गई व्यवस्था की प्रत्येक 10 वर्षों के बाद समीक्षा करने का प्रावधान किया गया। राज्यों के सम्बन्ध में कैबीनेट मिशन ने कहा कि ब्रिटिश-भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही, ब्रिटिश ताज और देशी राज्यों के विद्यमान सम्बन्ध समाप्त हो जाएंगे।

ब्रिटिश सरकार न तो अपने हाथ में सर्वोच्च सत्ता रखेगी न ही उसे नई सरकार को हस्तांतरित करेगी। राज्यों को उनके अधिकार वापिस कर दिए जाएंगे। अतः देशी राज्यों को चाहिए कि वे अपने भविष्य की स्थिति उत्तराधिकारी भारतीय सरकार से बातचीत करके व्यवस्थित करें। अर्थात् रजवाड़े अपनी शर्तों पर भारतीय संघ में शामिल हो सकते थे या भारत से बाहर रह सकते थे। कैबीनेट मिशन का विचार था कि यदि ‘एक-सत्तात्मक-भारत’ बना तो रजवाड़े शक्तिशाली तीसरी शक्ति बन जाएंगे।

17 मई 1946 को नवाब भोपाल ने लॉर्ड वैवेल को एक पत्र लिखकर कैबीनेट मिशन से आश्वासान मांगा कि सांप्रदायिकता के प्रश्न पर राज्य अपनी शर्तों पर एक अथवा एक से अधिक समूह बना सकेंगे। राज्यों को यह अधिकार होगा कि वे प्रत्येक 10 वर्ष के अंतराल पर संघीय संविधान के पुनरीक्षण के लिए कह सकें।

संविधान सभा को यह अधिकार नहीं होना चाहिए कि वह राज्यों में सरकार के प्रकार अथवा शासक वंश के सम्बन्ध में किसी तरह का विचार-विमर्श करे या उसके ऊपर अपनी कोई अभिशंसा दे। संविधान सभा में राज्यों के सम्बन्ध में लिया गया निर्णय या अभिशंसा को लागू करने से पूर्व सम्बन्धित राज्यों द्वारा उसकी अभिपुष्टि की जानी आवश्यक होगी।

दुःखों से मुक्ति का बीज

इस प्रकार कैबीनेट मिशन ने स्पष्ट कर दिया कि स्वतंत्र भारत के केवल दो टुकड़े नहीं होंगे अपितु समूह ए, बी एवं सी के रूप में तीन टुकड़े तथा चौथा टुकड़ा देशी-राज्यों का भी होगा जो कि एक अथवा उससे अधिक यहाँ तक कि पांच सौ पैंसठ तक हो सकता था। भारतीय नेताओं के अनुसार कैबीनेट मिशन द्वारा घोषित प्रांतों के समूहीकरण की योजना भारतीय संघ की एकता एवं अखंडता के लिए अत्यधिक घातक और खतरनाक प्रमाणित हो सकती थी।

इस घोषणा ने देशी शासकों को भविष्य में बनने वाली अंतरिम सरकार के साथ समानता का दर्जा दे दिया था। कांग्रेस इस स्थिति से अप्रसन्न थी तथा पहले ही कह चुकी थी कि कैबीनेट मिशन योजना ने केंद्र को केवल रक्षा, विदेश एवं संचार के अधिकारों से युक्त एक कमजोर केंद्र की प्रस्तावना की है। देश को ए, बी एवं सी समूहों में बांटकर, मुस्लिम लीग द्वारा निर्धारित की गई सीमाओं वाले पाकिस्तान की अवधारणा को पुष्ट किया गया है।

कांग्रेस का मानना था कि प्रांतों के समूहीकरण में प्रांतों को छूट रहेगी कि वे अपने लिए उपयुक्त समूह का चुनाव करें अथवा समूह से बाहर रह सकें जबकि मुस्लिम लीग का मानना था कि प्रांतों को उनके लिए निर्धारित समूह में शामिल होना आवश्यक होगा।

कैबीनेट योजना के प्रस्तावों पर गांधीजी का कहना था कि- ‘दुःख-दर्द से भरे इस देश को अभाव और दुःख से मुक्त करने का यह बीज है। वर्तमान परिस्थिति में इससे अच्छा वे कुछ नहीं कर सकते थे।’

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