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कामरान का पश्चाताप देखकर बुग्गा फाड़कर रोने लगा हुमायूँ! (82)

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कामरान का पश्चाताप

बाबर ने हुमायूँ को अपना उत्तराधिकारी बनाया था किंतु हुमायूँ के तीनों सौतेले भाइयों ने हुमायूँ से बगावत करके जीवन भर उससे युद्ध किया। इस कारण हुमायूँ के दुश्मनों ने हुमायूँ की सल्तनत नष्ट कर दी। इस पर भी हुमायूँ अपने सौतेले भाइयों से इतना प्रेम करता था कि कामरान का पश्चाताप देखकर हुमायूँ को बड़ा दुख हुआ और वह भरे दरबार में बुग्गा फाड़कर रोने लगा!

टालिकान के दुर्ग से निकलने के बाद कामरान बहुत धीमी गति से आगे बढ़ा। उसे अपने पिता का राज्य छोड़कर जाने की कोई जल्दी नहीं थी। बादामदरा नामक स्थान पर पहुंचकर कामरान ने मक्का जाने का निश्चय त्याग दिया तथा बापूस को बादशाह हुमायूँ के पास भेजकर कहलवाया कि मैंने बादशाह के प्रति बहुत अपराध किए हैं। इसलिए मैं मक्का जाने की बजाय बादशाह की सेवा में रहकर पश्चाताप करना चाहता हूँ।

संभवतः हुमायूँ भी यही चाहता था, इसलिए उसने कामरान का पश्चाताप देखकर यह प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया तथा उसे अपने दरबार में उपस्थित होने की अनुमति दे दी। जब मिर्जा कामरान बादशाह हुमायूँ के समक्ष उपस्थित हुआ तो हुमायूँ ने इस प्रसन्नता में मिर्जा अस्करी की बेड़ियां भी खुलवा दीं।

हुमायूँ ने कामरान के स्वागत में एक बड़े दरबार का आयोजन किया तथा अपने अमीरों को कामरान के स्वागत के लिए उसके सामने भेजा। निश्चत समय पर कामरान ने दरबार में आकर गलीचे का चुम्बन किया तथा धरती पर दण्डवत् गिरकर बादशाह से अपने अपराधों की क्षमा मांगी। कामरान का पश्चाताप देखकर हुमायूँ ने कहा कि बहुत उपचार हो चुका। आओ अब भाइयों की तरह बगलगीर हो जाओ।

हुमायूँ ने मिर्जा कामरान को धरती से उठाकर उसे सीने से लगाया। इस भावुक क्षण में हुमायूँ का गला भर आया और वह अचानक ही बुग्गा फाड़कर रोने लगा। यह एक आश्चर्य की ही बात थी कि हुमायूँ के भाइयों ने जीवन भर हुमायूँ के साथ विश्वासघात किया था और अनेक बार हुमायूँ की पीठ में छुरी भौंकी थी किंतु हुमायूँ अपने भाइयों से एक-तरफा प्रेम करता रहा। वह अपने पिता की इस सीख को कभी नहीं भूला कि उसके भाई चाहे उसके प्रति कितना ही अपराध क्यों न करें, वह अपने भाइयों को क्षमा करे और उन पर कृपा करता रहे।

हुमायूँ अपने भाइयों के प्रेम में इतना अंधा था कि वह समझ ही नहीं सका कि यह कामरान का पश्चाताप नहीं है, उसका एक और छल है। इस पश्चाताप के दिखावे की आड़ में वह हुमायूँ और अधिक गहरे दुख देने वाला था!

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आज भी हुमायूँ उसी भावना से भरा हुआ था। बादशाह को बच्चों की तरह रोते देखकर बहुत से दरबारी भी रोने लगे। इनमें से बहुतों ने कभी न कभी अपने बादशाह से गद्दारी की थी किंतु उन्हें भी बादशाह ने उसी तरह क्षमा कर दिया था, जिस तरह वह अपने भाइयों को क्षमा करता रहता था। बादशाह से गले मिलने के बाद मिर्जा कामरान बादशाह के दायीं ओर बैठाया गया। इस पर बादशाह ने कहा कि वह और निकट खिसककर बैठे। मिर्जा सुलेमान सदैव हुमायूँ के बाईं ओर बैठता था। आज हुमायूँ ने उसे भी अपने दायीं ओर बैठाया। जब सभी दरबारी यथा-स्थान बैठ गए तब बड़ा भारी उत्सव मनाया गया। सभी को फल, मेवा एवं शाही व्यंजन परोसे गए। यह सभा देर शाम तक चलती रही। हुमायूँ ने कामरान का डेरा अपने डेरे के पास ही लगवाया था किंतु कामरान ने इच्छा प्रकट की कि वह आज की रात मिर्जा अस्करी के डेरे में बिताना चाहता है। बादशाह ने कामरान को मिर्जा अस्करी के डेरे पर जाने की अनुमति दे दी। अगले दिन बादशाह अपने समस्त भाइयों, मिर्जाओं, बेगों एवं अमीरों के साथ बंदगशा चश्मे पर पहुंचा।

किसी समय बाबर ने भी यहाँ मुकाम किया था और एक शिलालेख लगवाया था। तैमूर लंग के समय में इस पूरे क्षेत्र में हिन्दू प्रजा निवास किया करती थी किंतु तैमूर की सातवीं पीढ़ी अर्थात् हुमायूँ के समय तक इस क्षेत्र के समस्त हिंदू नष्ट हो चुके थे और पूरी तरह मुस्लिम प्रजा का निवास हो चुका था।

जिस स्थान पर कभी बाबर ने दरबार किया था, हुमायूँ ने भी उसी स्थान पर एक दरबार का आयोजन करके अपने राज्य को एक बार फिर से अपने भाइयों में बांट दिया। हुमायूँ ने इस स्थान पर इस आशय का एक शिलालेख भी लगवाया। कहा नहीं जा सकता कि इस स्थान पर बाबर एवं हुमायूँ द्वारा लगवाए गए शिलालेख अब कहाँ हैं!

मिर्जा कामरान को कोलाब का प्रदेश फिर से जागीर में दिया गया। मिर्जा सुलेमान को जफर का दुर्ग एवं जागीर दिए गए। उसके पुत्र मिर्जा इब्राहीम को टालिकान की जागीर एवं दुर्ग दिया गया। मिर्जा हिंदाल को कुंदूज, घूरी, कहमर्द, बलकन, इश्कमिश और नारी के दुर्ग एवं जागीरें दिए गए।

हुमायूँ ने मिर्जा कामरान को अपनी जागीर पर जाने के आदेश दिए तथा मिर्जा अस्करी को उसके साथ जाने की अनुमति दी। चाकर खाँ नामक एक अमीर कामरान का वकीले मुतलक अर्थात् प्रधानमंत्री हुआ करता था। हुमायूँ ने चाकर खाँ को भी कामरान के साथ जाने की अनुमति दे दी। इसी प्रकार करातीगीन नामक एक अमीर मिर्जा अस्करी का प्रमुख मंत्री हुआ करता था। करातीगीन को मिर्जा अस्करी के साथ जाने की अनुमति दी गई। शेर अली को मिर्जा हिंदाल के साथ भेजा गया।

इस दरबार के अंत में हुमायूँ ने प्रत्येक शहजादे को निशान और नक्कारा प्रदान किया। निशान का आशय झण्डे से और नक्कारे का आशय नगाड़े से है। अंत में बादशाह ने शर्बत पिया तथा अपने भाइयों को भी शर्बत पिलाकर विदा किया। मिर्जा कामरान, सुलेमान एवं हिंदाल को तमनतोग प्रदान किया गया।

तमनतोग याक की पूंछ से बनता था। यह शाही प्रभुत्व का प्रतीक चिह्न था तथा मुगल सल्तनत में सर्वोच्च पद का द्योतक था। उस काल में यह चिह्न बादशाह ही धारण किया करता था और शहजादों एवं मिर्जाओं को यह चिह्न धारण करने की अनुमति नहीं होती थी किंतु अपने भाइयों को संतुष्ट करने के लिए हुमायूँ ने उस प्राचीन परम्परा को तोड़ दिया ताकि हुमायूँ के प्रत्येक भाई को लगे कि वह स्वयं ही बादशाह है। 

इस आयोजन के बाद हुमायूँ काबुल के लिए चल दिया तथा उसके भाई भी अपनी-अपनी जागीरों में चले गए। इस यात्रा में हुमायूँ बड़ा प्रसन्न था। उसे लगता था कि उसके तथा उसके भाइयों के बीच का झगड़ा सदा के लिए समाप्त हो गया है।

मार्ग में हुमायूँ परियान के किले में ठहरा। तैमूर लंग के समय में यहाँ कतूर नामक स्थान हुआ करता था जिस पर हिंदुओं का शासन था। उस काल में इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में हिन्दू प्रजा निवास करती थी। तैमूर लंग ने यहाँ के समस्त हिंदुओं को मारकर परियान का किला बनवाया था।

हुमायूँ ने इस दुर्ग का नाम बदलकर इस्लामाबाद रख दिया तथा बेग मीराक को इस दुर्ग का किलेदार नियुक्त करके इस दुर्ग की मरम्मत करवाने के आदेश दिए। इसके बाद हुमायूँ काबुल के लिए रवाना हो गया।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हुमायूँ की कृपा और भाइयों की दुष्टता (83)

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हुमायूँ की कृपा - www.bharatkaitihas.com
हुमायूँ की कृपा और भाइयों की दुष्टता

हुमायूँ के विरुद्ध बारबार बगावत करने पर भी हुमायूँ अपने भाइयों से प्रेम ही करता रहा। हुमायूँ की कृपा देखकर उसके सौतेले भाइयों की दुष्टता छोड़ देनी चाहिए थी किंतु हुमायूँ के भाइयों ने अपना स्वभाव नहीं बदला, उन्होंने प्रेम की भाषा नहीं समझी और पूर्ववत् दुष्टता का दामन पकड़े रहे।

हुमायूँ ने अपने गद्दार भाइयों कामरान तथा अस्करी के अपराधों को भुलाकर उन्हें फिर से गले लगा लिया तथा अपने भाइयों में अपनी सल्तनत का फिर से बंटवारा कर दिया। इसके बाद हुमायूँ पारियान दुर्ग होता हुआ काबुल लौट आया। हुमायूँ को लगा कि अब सब-कुछ पहले जैसा हो जाएगा किंतु हुमायूँ की कृपा से भी उसके दुष्ट भाइयों का दिल नहीं पसीजा।

एक दिन एक उज्बेग शहजादा अब्बास सुल्तान, हुमायूँ से मिलने काबुल आया। हुमायूँ ने उसका स्वागत किया तथा अपनी छोटी बहिन गुलचेहर बेगम का उससे विवाह कर दिया। उन्हीं दिनों काश्मीर के शासक मिर्जा हैदर ने अपना एक दूत हुमायूँ के पास भेजकर उसे काश्मीर आने के लिए आमंत्रित किया।

हुमायूँ के सौभाग्य से उन्हीं दिनों ईरान से भी शाह का एक दूत आकर हुमायूँ से मिला। हुमायूँ ने उसके हाथों ईरान के शाह के लिए बहुत से उपहार भिजवाए। हुमायूँ ने अनुभव किया कि उसके जीवन का बुरा समय बीत गया है और अच्छे दिन लौट आए हैं। फरवरी 1549 के आरम्भ में हुमायूँ ने बल्ख पर अभियान करने का निश्चय किया ताकि कुछ साल पहले असफल रहे अभियान को अब पूर्ण किया जा सके।

हुमायूँ ने एक बार फिर से अपने सौतेले एवं चचेरे भाइयों को बल्ख आने के लिए लिखा और स्वयं भी एक सेना लेकर बल्ख के लिए रवाना हो गया। सबसे पहले मिर्जा सुलेमान का पुत्र मिर्जा इब्राहीम अपनी सेना लेकर हुमायूँ की सेना से आ मिला। हुमायूँ काबुल से चलकर ईस्तालिफ, पंजसीर, अन्दाब और नारी होता हुआ नीलबर नामक स्थान पर पहुंचा। मिर्जा हिन्दाल तथा मिर्जा सुलेमान भी नीलबर में हुमायूँ से आ मिले।

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मिर्जा कामरान तथा मिर्जा अस्करी पहले की तरह इस बार भी नहीं पहुंचे। हुमायूँ को विश्वास था कि इस बार वे दोनों अवश्य आएंगे। जब हुमायूँ बकलान के निकट पहुंचा तो उसने अपनी सेना ऐबक नामक कस्बे पर आक्रमण करने भेजी। यह कस्बा बल्ख पर अधिकार जमाए बैठे उज्बेगों के अधीन था। हुमायूँ की सेना ने तीन दिन तक ऐबक दुर्ग की घेराबंदी करके उसे अपने अधिकार में ले लिया। यहाँ से हुमायूँ ट्रांसऑक्सियाना विजय के लिए जाना चाहता था किंतु वह कामरान की प्रतीक्षा में ऐबक में ही ठहरा रहा। हुमायूँ का यह निर्णय हुमायूँ के लिए एक बार फिर से भारी पड़ गया। तब तक बल्ख के उज्बेगों ने दूर-दूर के उज्बेग राज्यों से उज्बेगों की सेनाएं बुला लीं और वे हुमायूँ की सेना पर टूट पड़े। स्वयं हुमायूँ को भी इस युद्ध में तलवार चलानी पड़ी और बड़ी कठिनाई से उज्बेगों को खदेड़ा जा सका। हुमायूँ चाहता था कि उज्बेगों का पीछा करके उन्हें नष्ट किया जाए किंतु हुमायूँ के कुछ अमीर तुरंत काबुल लौट जाना चाहते थे। उन्हें कामरान का भय सता रहा था। इसलिए उन्होंने हुमायूँ की सेना में यह अफवाह फैला दी कि कामरान काबुल के लिए रवाना हो गया है।

हुमायूँ के कुछ अमीर इस अफवाह पर विश्वास करके अपनी सेनाएं लेकर एक बार फिर से हुमायूँ को छोड़कर काबुल की तरफ भाग गए। वे बादशाह की बजाय अपने परिवारों को बचाना अधिक श्रेयस्कर समझते थे।

हुमायूँ के सामने अब तक यह अच्छी तरह स्पष्ट हो गया था कि जब तक हुमायूँ अपनी सेना के मन से कामरान का भय समाप्त नहीं करता, तब तक हुमायूँ को किसी भी अभियान में सफलता नहीं मिल सकती। कामरान पर हुमायूँ की कृपा का कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला है।

इसलिए हुमायूँ एक बार फिर बल्ख अभियान को अधूरा छोड़कर काबुल की तरफ लौट पड़ा। जब उज्बेगों को ज्ञात हुआ कि हुमायूँ काबुल लौट रहा है, तो उज्बेगों की सैनिक टोलियों ने हुमायूँ पर पीछे से आक्रमण करना आरम्भ कर दिया।

जब हुमायूँ अपने सैनिकों के साथ एक जंगल से होकर निकल रहा था, तब उज्बेग बिल्कुल निकट आ गए और हुमायूँ के दस्ते पर तीर बरसाने लगे। एक तीर हुमायूँ के घोड़े को आकर लगा और घोड़ा धरती पर गिर कर मर गया। हुमायूँ की सेना हुमायूँ को जंगल में ही छोड़कर भाग गई। ऐसा वह पहले भी कर चुकी थी।

हुमायूँ के अंगरक्षकों ने बड़ी कठिनाई से उसे अपने घेरे में लिया। हैदर मुहम्मद अख्ता नामक एक अमीर ने बादशाह को अपना घोड़ा दिया जिस पर बैठकर हुमायूँ उज्बेगों की पकड़ से दूर हो गया। अबुल फजल ने लिखा है कि हुमायूँ ने अपने कुछ सैनिक काबुल की तरफ दौड़ाए ताकि वे अकबर के पास पहुंचकर सैनिक सहायता ला सकें।

उज्बेग अब भी हुमायूँ के पीछे लगे हुए थे। हुमायूँ चहार चश्मा घाटी, घूरबंद, सियारान तथा कराबाग होता हुआ मामूरा नामक स्थान पर पहुंचा। यहीं पर अकबर अपनी सेना लेकर आ पहुंचा। इस समय अकबर की आयु 6-7 साल की थी। इसलिए अबुल फजल की यह बात सही प्रतीत नहीं होती कि अकबर सेना लेकर आया। 6-7 साल का बालक इस लायक नहीं होता कि किसी सेना का नेतृत्व कर सके।

अकबर द्वारा लाई गई सेना के साथ हुमायूँ काबुल पहुंचा। इस प्रकार एक बार फिर से मिर्जा कामरान तथा मिर्जा अस्करी द्वारा साथ नहीं दिए जाने के कारण हुमायूँ का अभियान बुरी तरह से विफल हो गया।

काबुल पहुंचकर हुमायूँ ने अपने अमीरों एवं वजीरों के पदों में बड़े बदलाव किए। वह अपने अमीरों की कायरता से परेशान था जो किसी भी तरह विश्वसनीय नहीं थे। इसलिए हुमायूँ ने पुराने वजीर को हटाकर अफजल खाँ को वजीर नियुक्त किया तथा ख्वाजा मुहम्मद बेग को अपना दीवान बनाया। संभवतः इन लोगों ने मुसीबत के क्षणों में हुमायूँ का साथ नहीं छोड़ा था।

अब हुमायूँ ने मिर्जा कामरान और मिर्जा अस्करी की सुधि ली जो वायदा करके भी हुमायूँ की सेवा में नहीं पहुंचे थे। मिर्जा कामरान ने इस बार भी पुराना वाला रवैया अपनाया था। उसने हुमायूँ की कृपा पर विचार करके, हुमायूँ की सेवा में उपस्थित होने की बजाय मिर्जा सुलेमान से अपना पुराना वैर चुकता करने के लिए टालिकान पहुंचने का निर्णय लिया। कामरान ने अपनी राजधानी कुलाब को मिर्जा अस्करी के संरक्षण में छोड़ा और स्वयं सेना लेकर टालिकान के लिए रवाना हो गया।

इस समय मिर्जा सुलेमान टालिकान में नहीं होकर बल्ख की सीमा पर हुमायूँ के साथ था। जब सुलेमान को ज्ञात हुआ कि कामरान टालिकान पर चढ़कर आया है तो सुलेमान ने हुमायूँ से अनुमति लेकर अपने पुत्र मिर्जा इब्राहीम को टालिकान के लिए रवाना किया। जब हुमायूँ उज्बेगों से परास्त होकर काबुल चला गया तो मिर्जा सुलेमान और मिर्जा इब्राहीम टालिकान जाने की बजाय बदख्शां की घाटी में चले गए ताकि मिर्जा कामरान से बचा जा सके।

हुमायूँ की पराजय और सुलेमान के पलायन के बाद मिर्जा कामरान ने कुंदूज पर शासन कर रहे अपने सौतेले भाई मिर्जा हिंदाल को संदेश भिजवाया कि वह हुमायूँ का साथ छोड़कर कामरान की तरफ हो जाए। मिर्जा हिंदाल एक बार हुमायूँ को छोड़ने की गलती कर चुका था और अब वह इस गलती को दोहराना नहीं चाहता था। इसलिए मिर्जा हिंदाल ने मिर्जा कामरान का प्रस्ताव ठुकरा दिया।

इस पर कामरान ने कुंदूज को घेर लिया। कामरान ने उज्बेगों को भी अपनी सहायता के लिए बुलवा लिया। मिर्जा हिंदाल कामरान तथा उज्बेगों की सम्मिलित सेनाओं का सामना नहीं कर सकता था। इसलिए उसने एक चाल चली। यह एक ऐसी शातिर चाल थी जो दुनिया के हर कोने में चली जाती थी और हर बार अपने उद्देश्य में सफल रहती थी।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हुमायूँ की हत्या का षड़यंत्र रचा अमीरों ने (84)

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हुमायूँ की हत्या का षड़यंत्र रचा अमीरों ने

मिर्जा कामरान तथा मिर्जा अस्करी के पक्ष के अमीर हुमायूँ को प्रत्यक्ष युद्ध में नहीं जीत सकते थे। इसलिए कामरान तथा अस्करी ने फिर से षड़यंत्र रचना आरम्भ कर दिया। कामरान के पक्ष के मुगल अमीरों ने हुमायूँ को युद्धक्षेत्र में ही निबटाने के लिए हुमायूँ की हत्या का षड़यंत्र रचा।

 जब हुमायूँ बल्ख में उज्बेगों से परास्त होकर काबुल भाग गया और मिर्जा सुलेमान तथा मिर्जा इब्राहीम टालिकान छोड़कर बदख्शां की घाटी में भाग गए तो मिर्जा कामरान ने मिर्जा हिंदाल को पत्र लिखकर अपनी तरफ मिलाना चाहा किंतु हिंदाल ने बादशाह हुमायूँ का साथ छोड़ना और कामरान का साथ करना स्वीकार नहीं किया। इस पर कामरान ने कुंदूज को घेर लिया तथा उज्बेगों को भी अपनी सहायता के लिए बुला लिया।

मिर्जा हिंदाल इन दोनों सेनाओं का सामना नहीं कर सकता था। इसलिए उसने कामरान तथा उज्बेगों में फूट डालने के लिए एक गहरी साजिश रची। मिर्जा हिंदाल ने कामरान की तरफ से स्वयं को एक पत्र लिखा जिसमें कहा गया था कि मैंने पहले से तय योजना के अनुसार उज्बेगों को कुंदूज बुला लिया है। आज की रात मेरी सेना ने उज्बेगों पर हमला करने की तैयारी कर ली है। अतः तुम भी आज रात उज्बेगों पर आक्रमण करना। उम्मीद है कि हम जल्दी ही बादशाह को उज्बेगों के विनाश की खबर सुनाएंगे।

हिंदाल ने यह पत्र उज्बेगों के शिविर के बाहर डलवा दिया। जब यह पत्र उज्बेगों के सेनापति के हाथ लगा तो उज्बेग कुंदूज से घेरा उठाकर भाग गए और कामरान अपनी सेना के साथ अकेला रह गया। उसी समय कामरान को समाचार मिला कि उसके वजीर चाकर बेग ने कामरान की राजधानी कुलाब को घेर लिया है तथा मिर्जा अस्करी भयभीत होकर दुर्ग के भीतर छिपा हुआ है। यह समाचार पाकर कामरान भी कुंदूज का घेरा उठाकर कुलाब के लिए रवाना हो गया।

उधर जब मिर्जा सुलेमान को ज्ञात हुआ कि मिर्जा कामरान के वजीर चाकर बेग ने कामरान की राजधानी को घेर लिया है तो सुलेमान जफर दुर्ग पर चढ़ बैठा जिसे किलान्जफर कहते थे और जो कुछ समय पहले ही कामरान ने सुलेमान से छीना था। कामरान ने एक सेना किलान्जफर के लिए रवाना की तथा स्वयं कुलाब के लिए रवाना हुआ।

कामरान ने चाकर बेग की सेना को मार भगाया तथा कुलाब का दुर्ग फिर से अपने अधिकार में ले लिया। इसके बाद मिर्जा कामरान मिर्जा अस्करी को अपने साथ लेकर किलान्जफर के लिए रवाना हुआ ताकि मिर्जा सुलेमान का दमन किया जा सके।

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जब उज्बेगों को ज्ञात हुआ कि मिर्जा कामरान बहुत थोड़ी सी सेना के साथ किलान्जफर जा रहा है तो मार्ग में रुस्ताक नामक स्थान पर उज्बेगों ने कामरान तथा अस्करी को घेर लिया। कामरान तथा अस्करी भागकर कर टालिकान के दुर्ग में चले गए। उधर जब मिर्जा सुलेमान और मिर्जा हिंदाल ने देखा कि मिर्जा कामरान की हालत पतली है तो उन दोनों ने मिलकर मिर्जा कामरान तथा मिर्जा अस्करी पर हमला बोल दिया। कामरान तथा अस्करी भागकर बदख्शां चले गए। जब हिंदाल तथा सुलेमान ने कामरान तथा अस्करी को वहाँ भी नहीं छोड़ा तो कामरान तथा अस्करी भागकर खोस्त चले गए। जब मिर्जा हिंदाल तथा मिर्जा सुलेमान खोस्त की तरफ बढ़ने लगे तो मिर्जा कामरान तथा मिर्जा अस्करी ने हजारा भाग जाने का कार्यक्रम बनाया जो हिंदुकुश पर्वत की तलहटी में हिंदुस्तान की तरफ था। उन दोनों ने हजारा जाने से पहले एक बार फिर से हुमायूँ की भावुकता का लाभ उठाने की योजना बनाई जिसे अन्य मुगल शहजादे एवं अमीर हुमायूँ की बेवकूफी कहते थे।

मिर्जा कामरान तथा मिर्जा अस्करी ने हुमायूँ को पत्र लिखकर उससे क्षमा याचना की तथा उसके दरबार में उपस्थित होने की अनुमति मांगी। इन दोनों भाइयों को विश्वास था कि हुमायूँ न केवल एक बार फिर मिर्जा कामरान तथा मिर्जा अस्करी को माफ कर देगा अपितु उनके खोए हुए राज्य भी लौटा देगा। उनकी आशा के अनुरूप हुमायूँ ने ऐसा ही किया।

इस पर मिर्जा कामरान तथा मिर्जा अस्करी ने हजारा जाने की बजाय काबुल की तरफ बढ़ना आरम्भ किया। इस बीच बादशाह के वजीर, दीवान एवं अन्य अमीरों ने बादशाह से कहा कि सरलता की भी एक सीमा होनी चाहिए। बादशाह के लिए उचित यह है कि वह मिर्जा कामरान तथा मिर्जा अस्करी को बंदी बना ले!

इस बार हुमायूँ ने अपने अमीरों की सलाह मान ली तथा जून 1550 में एक सेना के साथ मिर्जा कामरान तथा मिर्जा अस्करी की तरफ बढ़ना आरम्भ किया। हुमायूँ ने अकबर को काबुल में ही छोड़ दिया। जब मिर्जा कामरान तथा मिर्जा अस्करी ने सुना कि बादशाह एक सेना लेकर उनकी ही तरफ बढ़ रहा है तो उन दोनों के होश उड़ गए।

उन्होंने काबुल की तरफ बढ़ने की बजाय वहीं से हजारा भाग जाने की योजना बनाई किंतु उसी समय कराचः खां, मुसाहिब बेग तथा कुछ अन्य अमीरों ने मिर्जा कामरान को पत्र लिखकर सूचित किया कि वह बादशाह को चकमा देकर किसी तरह काबुल आ जाए, हम काबुल पर कामरान का अधिकार करवा देंगे।

यह पत्र पाकर कामरान तथा अस्करी की बांछें खिल गईं। वे बादशाह को चकमा देकर खिसक लिए। इधर जब बादशाह हुमायूँ किबचाक पहुंचा तो गद्दार कराचः खाँ के पक्ष के अमीरों ने बादशाह हुमायूँ को मिर्जा कामरान तथा मिर्जा अस्करी के बारे में गलत सूचनाएं देनी आरम्भ कीं। उन्होंने युद्धक्षेत्र में ही हुमायूँ की हत्या का षड़यंत्र रचा!

उन्होंने बादशाह को बताया कि मिर्जा कामरान तथा मिर्जा अस्करी भाग गए हैं। किसी ने कहा कि वे लोग जुहाक की तरफ गए हैं, तो किसी ने बताया कि वे लोग बामियान की तरफ गए हैं। इस प्रकार बादशाह को अलग-अलग स्थान बताए गए। बादशाह ने उन सभी स्थानों के लिए थोड़े-थोड़े सैनिक भिजवा दिए ताकि मिर्जा कामरान तथा मिर्जा अस्करी को ढूंढा जा सके।

हुमायूँ के गद्दार अमीर यही चाहते थे कि हुमायूँ की सेना तितर-बितर हो जाए और वे हुमायूँ को जीवित ही पकड़कर कामरान के हवाले कर दें किंतु एक किसान ने हुमायूँ को बता दिया कि मिर्जा कामरान तथा मिर्जा अस्करी अपनी सेना लेकर किबचाक की ओर आ रहे हैं। इस पर हुमायूँ के कान खड़े हुए।

हुमायूँ को स्पष्ट दिखने लगने लगा कि भाइयों ने अमीरों के साथ मिलकर हुमायूँ की हत्या का षड़यंत्र रचा है किंतु तब तक देर हो चुकी थी। उसकी बहुत सी सेना विभिन्न दिशाओं में जा चुकी थी। फिर भी हुमायूँ ने बचे-खुचे सैनिकों को साथ लेकर मिर्जा कामरान तथा मिर्जा अस्करी का सामना करने की तैयारी की।

हुमायूँ ने एक ऊंचे स्थान पर खड़े होकर अपने तथा कामरान के पक्ष के सैनिकों की संख्या का अनुमान किया। हुमायूँ ने देखा कि उसके अमीर, शत्रु से लड़ने के लिए तत्परता दिखाने की बजाय धीमी गति से तैयार हो रहे हैं। यह देखकर हुमायूँ को अनुमान हो गया कि वह चारों ओर गद्दारों से घिरा हुआ है। फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी तथा स्वयं हाथ में तलवार लेकर कामरान की सेना पर टूट पड़ा।

हुमायूँ के विश्वसनीय सैनिकों ने भी हुमायूँ का अनुकरण किया किंतु बहुत से गद्दार अमीर युद्ध के मैदान में ही हुमायूँ को पकड़ने अथवा मारने का प्रयास करने लगे ताकि कामरान से ईनाम पाया जा सके। इस कारण हुमायूँ के प्राण संकट में पड़ गए। हुमायूँ को दुश्मनों की आवश्यकता नहीं थी, उसके अपने भाई, अमीर (मंत्री) और बेग (सेनापति) मिलकर हुमायूँ की हत्या का षड़यंत्र रच बैठे थे।

वह युग ऐसा ही था। उस युग में गद्दारों की संख्या ईमानदारों की संख्या की अपेक्षा बहुत अधिक थी। बादशाह हुमायूँ अपने सभी सैनिकों, अमीरों, वजीरों, भाइयों पर कृपा दिखाता था किंतु फिर भी गद्दार लोगों की फितरत ऐसी ही हुआ करती है कि वे मौका मिलते ही अपने दयालु एवं स्नेही आश्रयदाता से भी घात करने से नहीं चूकते हैं। वास्तविकता तो यह है कि उस युग को दोष देना व्यर्थ है, हर युग का इतिहास कृतघ्नों की कृतघ्नताओं से भरा पड़ा है। आज भी वह सिलसिला जारी है।  

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हुमायूँ की मृत्यु की अफवाह फैला दी कामरान ने (85)

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हुमायूँ की मृत्यु की अफवाह फैला दी कामरान ने

हुमायूँ जीवन भर अपने सौतेले भाई मिर्जा कामरान से प्रेम करता रहा और उसके षड़यंत्रों को क्षमा करके उसके प्रति उदार व्यवहार करता रहा किंतु बादशाहत के लालच में अंधा कामरान हुमायूँ के विरुद्ध षड़यंत्र रचता रहा। उसने युद्धक्षेत्र में हुमायूँ की मृत्यु की अफवाह फैला दी।

यद्यपि इतिहासकारों ने हुमायूँ पर आलसी, अदूरदर्शी तथा विलासी होने के आरोप बार-बार लगाए हैं तथापि इतिहास इस बात का साक्षी है कि हुमायूँ की असफलताओं का कारण उसके ये दुर्गुण नहीं थे अपितु उसमें अन्य मुगल शहजादों की अपेक्षा दयाभाव अधिक था, इसलिए वह अपने ही लोगों से धोखा खाता था और पराजय का मुख देखता था।

हुमायूँ युद्ध के मैदान में स्वयं तलवार लेकर लड़ने में कभी भी पीछे नहीं रहता था। किबचाक में भी हुमायूँ ने अपने गद्दार अमीरों की गद्दारी पर ध्यान न देकर अपनी तलवार पर अधिक भरोसा किया और कामरान के सैनिकों पर काल बनकर टूट पड़ा। उसके स्वामिभक्त अमीरों और सैनिकों ने भी अपने रहमदिल बादशाह के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने का निश्चय किया।

जब हुमायूँ कामरान के एक अमीर पर तलवार से वार कर रहा था तब पीछे से बाबाई कुलानी बेग ने अचानक ही हुमायूँ के ऊपर वार किया। बाबाई कुलानी बेग हुमायूँ के पक्ष का था किंतु वह भी गद्दारी करके कामरान की तरफ हो गया था। हुमायूँ को इस बात का पता नहीं था। जब हुमायूँ ने पीछे मुड़कर वार करने वाले को देखा तो हुमायूँ बाबाई कुलानी की गद्दारी को देखकर हैरान रह गया।

घायल हुमायूँ इस स्थिति में नहीं था कि वह बाबाई कुलानी पर उलट कर वार कर सके किंतु हुमायूँ ने क्रोध से जलती हुई दृष्टि से उस गद्दार को देखा। इस दृष्टि को देखकर बाबाई कुलानी सहम गया और उसकी हिम्मत नहीं हुई कि वह हुमायूँ पर दूसरा वार कर सके। इसी बीच हुमायूँ के अंगरक्षकों ने हुमायूँ को अपनी सुरक्षा में ले लिया।

अब्दुल बाहाब नामक एक यसावल ने बादशाह के घोड़े की लगाम पकड़ ली और उसे लेकर जुहाक की तरफ भाग गए जहाँ हुमायूँ की सेनाओं को कामरान की तलाश में भेजा गया था। हुमायूँ के शरीर में गहरा घाव लगा था जिससे काफी रक्त बह गया था किंतु हुमायूँ के पास घोड़े की पीठ पर बैठकर दौड़ते रहने के अतिरिक्त कोई अन्य उपाय नहीं था। इस समय बादशाह हुमायूँ के सच्चे सहायक मिर्जा हिंदाल, मिर्जा सुलेमान तथा मिर्जा इब्राहीम हुमायूँ के पास नहीं थे।

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जब हुमायूँ काबुल से किबचाक के लिए रवाना हुआ था, तब वह दो ऊंटों पर लोहे के दो बक्से लदवाकर लाया था जिनमें हुमायूँ की प्रिय पुस्तकें भरी हुई थीं। युद्ध की रेलमपेल में वे ऊंट भी हुमायूँ के आदमियों के हाथों से छूट गए तथा पहाड़ों में भाग गए। बाद में ये ऊंट कामरान के सैनिकों द्वारा पकड़कर कामरान को प्रस्तुत किये गए। ये पुस्तकें कामरान के किसी भी काम की नहीं थीं किंतु कामरान ने उन्हें शाही निशानी समझकर अपने पास रख लिया। दूसरे दिन बादशाह के स्वामिभक्त अमीर बादशाह को ढूंढते हुए आ पहुंचे। गद्दार अमीर किबचाक में ही कामरान के पास रह गए। अब दूध का दूध और पानी का पानी होने का समय आ गया था। बादशाह बड़ी आसानी से अपने गद्दार और वफादार अमीरों को पहचान सकता था। हुमायूँ ने अपने 10 वफादार अमीरों को तत्काल काबुल के लिए रवाना किया ताकि शत्रु को काबुल में घुसने से रोका जा सके। हुमायूँ ने अपने कुछ अमीर गजनी के लिए रवाना किए ताकि गजनी पर अधिकार बनाए रखा जा सके।

हुमायूँ का मन अपने ही अमीरों से आशंकित था। हुमायूँ को लगता था कि यदि इस समय वह काबुल गया तो उसके गद्दार अमीर उसके साथ छल करके उसे कामरान के हाथों सौंप देंगे। इसलिए हुमायूँ काबुल नहीं जाकर बदख्शाँ की ओर चल दिया।

उधर कामरान ने स्थान-स्थान पर अपने संदेशवाहक भेजकर हुमायूँ की मृत्यु की अफवाह फैला दी कि मिर्जा हुमायूँ किबचाक की लड़ाई में मारा गया है। अबुल फजल ने इस सम्बन्ध में एक रोचक घटना का उल्लेख किया है। वह लिखता है कि एक दिन जब हुमायूँ बंगी नदी के किनारे पहुंचा तो वहाँ उसे एक आदमी मिला। उसने दूर से ही चिल्लाकर हुमायूँ से पूछा कि क्या तुझे बादशाह के बारे में कुछ पता है? हुमायूँ ने उससे पूछा कि तू कौन है?

उस आदमी ने जवाब दिया कि मुझे साल औरंग के नजरी ने बादशाह की खबर लाने के लिए भेजा है। हम लोगों में यह खबर है कि बादशाह किबचाक की लड़ाई में आहत हो गया था, उसके बाद उसे किसी ने नहीं देखा। मिर्जा कामरान के लोगों को उसका जिब्बा मिला है जो उसने युद्ध के समय में पहन रखा था। उस जिब्बे के मिलने पर कामरान ने बड़ी-बड़ी दावतें दी हैं।

उस आदमी की बात सुनकर हुमायूँ समझ गया कि कामरान ने हुमायूँ की मृत्यु की अफवाह फैला दी है ताकि युद्धक्षेत्र में तितर-बितर हुए हुमायूँ के पक्ष के सैनिक एवं अमीर हुमायूँ को ढूंढने की बजाय कामरान से आकर मिल जाएं! हुमायूँ ने उसे अपने पास बुलाकर उसे अपना परिचय दिया तथा उससे कहा कि तुम अपने लोगों के पास जाकर उन्हें हमारे बारे में अच्छी खबर सुनाओ।

उधर मिर्जा हिंदाल, मिर्जा सुलेमान तथा मिर्जा इब्राहीम हुमायूँ को ढूंढ रहे थे। अन्ततः उन्हें हुमायूँ के बारे में समाचार मिल गए। वे समझ गए कि हुमायूँ युद्ध में घायल होकर मरा नहीं है। कामरान ने हुमायूँ की मृत्यु की अफवाह फैला दी है।

जब हुमायूँ खंजान नामक गांव में ठहरा हुआ था, तब मिर्जा हिंदाल हुमायूँ को ढूंढता हुआ वहीं आ गया। कुछ दिनों बाद जब हुमायूँ का डेरा अंदराब में लगा हुआ था, तब मिर्जा सुलेमान और उसका पुत्र मिर्जा इब्राहीम भी आ पहुंचे। इनके आ जाने से हुमायूँ में आशा का नवीन संचार हुआ।

उधर कामरान को युद्ध-क्षेत्र से हुमायूँ के गायब हो जाने पर बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने अपने आदमियों को हुमायूँ की खोज में भिजवाया किंतु वे हुमायूँ को नहीं ढूंढ सके किंतु उन्होंने हुमायूँ का जिब्बा कामरान के सामने प्रस्तुत किया जो उन्हें जंगल में पड़ा हुआ मिला था। इस जिब्बे को देखकर कामरान को विश्वास हो गया कि हुमायूँ मर गया है।

इसलिए उसने युद्ध-क्षेत्र में पकड़े गए हुमायूँ के पक्ष के कुछ अमीरों को रस्सियों में बांधकर अपने सामने बुलाया। कामरान हुमायूँ से इतनी घृणा करता था कि उसने हुमायूँ के वफादार अमीर हुसैन कुली तथा ताखजी बेग सहित कई अमीरों के टुकड़े-टुकड़े स्वयं अपनी तलवार से किए।

ये वे अमीर थे जिनके कंधों पर मुगलिया सल्तनत टिकी हुई थी किंतु घमण्डी एवं दुष्ट-हृदय कामरान उन अमीरों को अपने हाथों से मार रहा था। कामरान ने युद्ध-क्षेत्र में हुमायूँ पर छल से वार करने वाले अमीर बाबाई कुलावी का बड़ा सम्मान किया तथा उसे हुमायूँ को ढूंढने का काम सौंपा।

इसके बाद कामरान ने काबुल की तरफ प्रस्थान किया तथा काबुल को घेर लिया। इस समय हुमायूँ का अल्पवयस्क पुत्र अकबर काबुल की रक्षा कर रहा था और कासिम खाँ बरलास अकबर की सेवा में था। कामरान ने कासिम खाँ बरलास को अपनी तरफ मिलाने का प्रयास किया किंतु कासिम खाँ बरलास नहीं माना।

इस पर कामरान ने हुमायूँ का जिब्बा कासिम खाँ बरलास के पास भिजवाया तथा उससे कहा कि हुमायूँ तो मर गया है, अब तू किसके लिए काबुल की रक्षा कर रहा है? इस जिब्बे को देखकर बरलास को कामरान की बात का विश्वास हो गया और उसने काबुल का दुर्ग कामरान को सौंप दिया। कामरान ने दुर्ग में घुसकर हुमायूँ के पूरे परिवार को बंदी बना लिया जिनमें सात साल का अकबर भी था।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कामरान दरवेश बन गया (86)

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कामरान दरवेश बन गया

जब कामरान ने किचबाक के युद्ध में हुमायूँ की मृत्यु की अफवाह फैला दी तो बहुत से लोगों को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ। कुछ ही दिनों में लोगों को पता चल गया कि हुमायूँ जीवित है तथा मिर्जा हिंदाल एवं मिर्जा सुलेमान ने उसे ढूंढ लिया है। जब यह बात कामरान को ज्ञात हुई तो वह हुमायूँ के भय से बाल मुण्डवाकर दरवेश बन गया। कामरान को मालूम था कि हुमायूँ किसी भी दरवेश के प्राण नहीं लेगा।

जब हुमायूँ किबचाक के युद्ध में कामरान को चकमा देकर जीवित ही निकल गया तब कामरान ने हुमायूँ के पक्ष के अमीरों को मारकर काबुल के लिए प्रस्थान किया तथा यह अफवाह फैला दी कि हुमायूँ मर गया है। जो लोग हुमायूँ की मृत्यु हो जाने की बात पर विश्वास नहीं करते थे, उन्हें हुमायूँ का जिब्बा दिखाया जाता था।

लोगों को हुमायूँ की मृत्यु का विश्वास हो जाए, इसके लिए कामरान ने अपने अमीरों तथा जनता के प्रभावशाली लोगों को दावतें खिलाईं। कामरान ने काबुल के रक्षक कासिम खाँ बरलास को भी हुमायूँ का जिब्बा दिखाकर काबुल दुर्ग तथा नगर पर अधिकार कर लिया और हुमायूँ के पूरे परिवार को बंदी बना लिया। हुमायूँ के अल्पवय पुत्र अकबर को भी बंदीगृह में डाल दिया गया।

यह सारा खेल दुष्ट कराचः खाँ द्वारा रचा गया था जो कभी हुमायूँ का विश्वसनीय था और गद्दारी करके कामरान की तरफ भाग गया था। पाठकों को स्मरण होगा कि हुमायूँ द्वारा टालिकान विजय किए जाने के बाद कराचः खाँ को गले में तलवार लटकाकर हुमायूँ के समक्ष प्रस्तुत किया गया था किंतु हुमायूँ ने उसे क्षमा करके पुनः अपनी सेवा में रख लिया था। इस पर भी कराचः खाँ के हृदय से दुष्टता समाप्त नहीं हुई थी और उसने एक बार फिर से गद्दारी करके हुमायूँ को नष्ट करने का गहरा षड़यंत्र रचा और काबुल पर कामरान का अधिकार करवा दिया।

अब जबकि कामरान काबुल का शासक था और हुमायूँ जंगलों में गायब था, कराचः खाँ ही काबुल का सारा प्रबंध देखने लगा। कासिम खाँ बरलास को उसका सहायक नियुक्त किया गया। हुमायूँ के दीवान ख्वाजा अली को भी बंदी बना लिया गया। काबुल नगर में जिस किसी ने हुमायूँ के पक्ष में आवाज उठाई, उसे रस्सियों से जकड़कर जेल में ठूंस दिया गया। हुमायूँ के पक्ष के अमीरों के परिवारों पर एक बार फिर से पहले की ही तरह जुल्म किए गए।

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जब कामरान को काबुल पर अधिकार किए हुए तीन महीने बीत गए, तब कामरान को हुमायूँ के जीवित होने का समाचार मिला। इस समाचार को सुनकर कामरान कांप उठा। कुछ दिनों बाद उसे समाचार मिले कि मिर्जा हुमायूं, मिर्जा हिंदाल, मिर्जा सुलेमान तथा मिर्जा इब्राहीम एक सेना के साथ काबुल की तरफ बढ़ रहे हैं। मिर्जा कामरान भी सतर्क होकर बैठ गया। उधर हुमायूँ ने अंदराब में रुककर अपनी सेना को व्यवस्थित किया तथा हिन्दूकोह नामक पहाड़ियों के रास्ते काबुल की तरफ बढ़ने लगा। एक दिन हुमायूँ ने अपने अमीरों और सेनापतियों को एकत्रित करके उनसे कहा कि वे सब शपथ लेकर कहें कि वे युद्ध के समय मुझे धोखा नहीं देंगे तथा शरीर में प्राण रहने तक युद्ध-क्षेत्र नहीं छोड़ेंगे। इस पर हाजी मुहम्मद खान कोकी नामक एक अमीर ने बादशाह से कहा कि हम तो यह शपथ ले लेंगे किंतु इस बार आपको भी एक शपथ लेनी होगी। कोकी की यह बात सुनकर बादशाह चौंक गया। बादशाह ने पूछा कि मुझे कौनसी शपथ लेनी है?

इस पर कोकी ने कहा कि आपको यह शपथ लेनी होगी कि आपके स्वामिभक्त अमीर आपको जो सलाह दें, आप उस पर अमल करेंगे। हुमायूँ यह शपथ लेने को तैयार हो गया किंतु मिर्जा हिंदाल ने इस शपथ का विरोध किया और कहा कि यह बादशाह की मर्जी पर है कि वह अपने अमीरों की किस सलाह पर अमल करे और किस पर नहीं।

मिर्जा हिंदाल की आपत्ति सुनने के बाद हुमायूँ ने कहा कि हम हाजी मुहम्मद कोकी की सलाह के अनुसार काम करेंगे। वे जो भी सलाह देना चाहें, स्वतंत्र हैं। जब हुमायूँ की सेना काबुल से थोड़ी ही दूरी पर रह गई तो हुमायूँ ने कामरान को संदेश भिजवाया कि इस प्रकार बार-बार मेरा विरोध करना और शांति तथा एकता का मार्ग छोड़़ना अच्छी बात नहीं है। तुम्हें चाहिए कि तुम हिन्दुस्तान पर विजय प्राप्त करने में हमारा साथ दो।

कामरान ने बादशाह के प्रस्ताव के उत्तर में कहलवाया कि यदि बादशाह कांधार जाकर रहे तथा काबुल मेरे अधिकार में रहने दे तो मैं बादशाह का सहयोग करने के लिए तैयार हूँ। हुमायूँ ने कामरान के इस प्रस्ताव के जवाब में एक नया प्रस्ताव भिजवाया कि यदि कामरान अपनी पुत्री का विवाह मेरे पुत्र अकबर के साथ कर दे तो काबुल नवदम्पत्ति को दे दिया जाएगा तथा मैं और कामरान अफगानिस्तान छोड़कर भारत विजय के लिए प्रस्थान करेंगे।

कामरान इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए तैयार हो गया किंतु कराचः खाँ को लगा कि यदि कामरान तथा हुमायूँ के बीच समझौता हो गया तो हुमायूँ कराचः खाँ का सिर काटे बिना नहीं रहेगा। इसलिए कराचः खाँ ने हुमायूँ के इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए कामरान से कहा कि हम किसी भी कीमत पर काबुल नहीं छोड़ सकते क्योंकि काबुल के लिए हमारे सिर दांव पर लगे हुए हैं। इसलिए कामरान ने हुमायूँ के प्रस्ताव का जवाब नहीं भिजवाया।

इस पर हुमायूँ की सेना ने काबुल दुर्ग पर हमला कर दिया। कुछ दिनों की लड़ाई के बाद कामरान की सेना को काबुल दुर्ग के दरवाजे खोलकर लड़ने के लिए आना पड़ा। दुर्ग के दरवाजे खुलते ही कामरान के पक्ष के बहुत से लोग कामरान का पक्ष छोड़कर बादशाह की तरफ भाग आए। वस्तुतः ये वे लोग थे जो परिस्थिति-वश कामरान की तरफ रह गए थे।

हुमायूँ के सैनिकों ने कराचः खाँ का सिर काट डाला और उसे हुमायूँ के सम्मुख प्रस्तुत किया। हुमायूँ ने आदेश दिया कि कराचः खाँ के सिर को काबुल के लौहद्वार पर टांग दिया जाए। कराचः खाँ के मर जाने से हुमायूँ के जीवन का एक बड़ा कांटा हमेशा के लिए निकल गया। कामरान भी युद्ध में नहीं टिक सका और वह युद्ध के मैदान से भाग निकला।

कामरान बादयाज की घाटी से होता हुआ काबुल से दूर चला गया। कामरान दरवेश बन गया, उसने अपने बाल मुण्डवा लिए तथा अफगान कबीलों की शरण में चल गया। उस समय कामरान के पास केवल आठ विश्वस्त सेवक थे। एक मुगल शहजादे का अफगानों की शरण में जाना मुगलों के लिए बहुत ही लज्जाजनक बात थी किंतु कामरान के पास अपनी जान बचाने का केवल यही एक उपाय बचा था।

मिर्जा कामरान काबुल से बाहर निकलते समय मिर्जा हुमायूँ के पुत्र अकबर को अपने साथ ले गया किंतु अकबर मार्ग में ही छूट गया तथा हुमायूँ की सेना द्वारा प्राप्त कर लिया गया। जब अकबर को हुमायूँ के समक्ष प्रस्तुत किया गया तो हुमायूँ को बड़ी प्रसन्नता हुई। हुमायूँ की सेना ने कामरान के पक्ष के अमीरों और बेगों का पीछा किया तथा उन्हें पकड़कर मारना आरम्भ किया। मिर्जा अस्करी पहाड़ों में छिपकर भागता हुआ पकड़ा गया।

हुमायूँ के सैनिकों ने युद्ध-क्षेत्र के निकट से दो ऊंटों को पकड़ा जिन पर लोहे के बड़े बक्से लदे हुए थे। ये ऊंट हुमायूँ के समक्ष प्रस्तुत किए गए। जब इन ऊंटों पर लदे हुए बक्सों को खोला गया तब उनमें से वही पुस्तकें निकलीं जिन्हें हुमायूँ के आदमियों ने किबचाक के युद्ध में खो दिया था। इन पुस्तकों के मिलने से हुमायूँ को जितनी प्रसन्नता हुई, उतनी तो उसे काबुल फिर से मिल जाने पर भी नहीं हुई थी।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मिर्जा हिंदाल का तरकस देखकर कामरान ने अपनी पगड़ी धरती पर फैंक दी (87)

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मिर्जा हिंदाल का तरकस देखकर कामरान ने अपनी पगड़ी धरती पर फैंक दी

उधर ख्वाजा इब्राहीम ने मिर्जा हिंदाल के शव को पहचान लिया तथा उसे उठाकर मिर्जा हिंदाल के डेरे पर ले गया। उसने हुमायूँ के समक्ष मिर्जा हिंदाल की मृत्यु का समाचार प्रकट नहीं किया, अपितु कहा कि इस विजय पर मिर्जा हिंदाल ने आपको बधाई भिजवाई है।

जब कामरान काबुल छोड़कर भाग गया ओर हुमायूँ की सेना ने अकबर को बरामद कर लिया तो हुमायूँ ने काबुल दुर्ग में प्रवेश करके अपने परिवार की महिलाओं से भेंट की तथा उन्हें सांत्वना प्रदान की। परिवार में सबको सकुशल देखकर हुमायूँ ने निर्धनों एवं दरवेशों में धन बंटवाया। उसने अपने विश्वस्त सेवकों को पुरस्कृत किया तथा दुष्ट मनुष्यों को सजा दी।

दीनदार बेग, हैदर दोस्त, मुगल कानजी और मस्तअली कुरची को प्राणदण्ड दिया गया। बादशाह ने अपनी पुत्री बख्शी बानू का विवाह मिर्जा सुलेमान के पुत्र मिर्जा इब्राहीम के साथ कर दिया तथा सुलेमान और इब्राहीम को पुरस्कृत करके बदख्शां भेज दिया।

हुमायूँ ने बंदी बनाकर रखे गए मिर्जा अस्करी को सुलेमान के साथ भेज दिया ताकि अस्करी को कड़े पहरे में रखा जा सके। जब हुमायूँ को ज्ञात हुआ कि कामरान दरवेश बन गया है तो हुमायूँ को बड़ा दुःख हुआ किंतु कुछ दिनों में उसके चित्त में शांति हो गई। उसने मिर्जा सुलेमान को आदेश भिजवाया कि वह मिर्जा अस्करी को बल्ख के रास्ते हज्जा भेज दे।

इस समय मिर्जा सुलेमान की एक पुत्री अविवाहित थी। हुमायूँ उससे विवाह करना चाहता था। अबुल फजल ने लिखा है कि बादशाह हुमायूँ सुलेमान की प्रतिष्ठा बढ़ाना चाहता था इसलिए हुमायूँ ने मिर्जा सुलेमान के पास प्रस्ताव भिजवाया कि वह अपनी पुत्री का विवाह बादशाह के साथ कर दे।

इस प्रस्ताव को पाकर मिर्जा सुलेमान चिंतित हो गया। इस समय तक हुमायूँ 42 वर्ष का प्रौढ़ हो चुका था जबकि मिर्जा सुलेमान की पुत्री अभी छोटी बालिका ही थी। यह एक अजीब सी बात थाी क्योंकि कुछ ही दिनों पहले हुमायूं ने अपनी पुत्री का विवाह मिर्जा सुलेमान के पुत्र से किया था और अब हुमायूं मिर्जा सुलेमान की पुत्री से विवाह करना चाहता था।

मिर्जा सुलेमान बादशाह हुमायूँ के इस प्रस्ताव को अस्वीकार करके बादशाह से अपने सम्बन्ध नहीं बिगाड़ना चाहता था इसलिए उसने बादशाह से कहलवाया कि मैं बादशाह से अपनी पुत्री का विवाह करने के लिए तैयार हूँ किंतु अभी वह छोटी है, अतः उसके बड़े होने पर ही बादशाह से उसका विवाह करना उचित रहेगा। हुमायूँ ने मिर्जा सुलेमान की बात मान ली।

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उधर कामरान कुछ दिनों तक शांत रहने के बाद फिर से सक्रिय हो गया। उसने खलील और महमंद कबीलों के अफगानों को तथा कुछ बदमाश किस्म के भगोड़े सैनिकों को अपने साथ मिलाकर एक सेना खड़ी कर ली। गजनी के गवर्नर हाजी मुहम्मद खाँ पर हुमायूँ को बड़ा भरोसा था, वह भी कामरान के साथ मिलकर बादशाह हुमायूँ के विरुद्ध षड़यंत्र करने लगा। हुमायूँ ने कांधार के गवर्नर बैराम खाँ को निर्देश दिए कि वह हाजी मुहम्मद खाँ को समझा-बुझा कर बादशाह की सेवा में ले आए। जब हाजी मुहम्मद खाँ को बैराम खाँ के आने की जानकारी हुई तो उसने बैराम खाँ को काराबाग दुर्ग में छल से बंदी बनाने का षड़यंत्र रचा किंतु बैराम खाँ को समय रहते इस षड़यंत्र का पता लग गया और वह काराबाग दुर्ग में प्रवेश करने की बजाय दुर्ग के बाहर ही खेमा लगाकर बैठ गया। अंत में हाजी मुहम्मद तथा उसके भाई शाह मुहम्मद ने बैराम खाँ के साथ बादशाह की सेवा में चलना स्वीकार कर लिया। काबुल में बादशाह के सामने इन दोनों भाइयों का व्यवहार अत्यंत आपत्तिजनक था।

इस पर हुमायूँ ने बैराम खाँ को आदेश दिया कि इन दोनों भाइयों को गिरफ्तार कर लिया जाए। बादशाह ने उन दोनों भाइयों के अपराधों और उनके द्वारा बादशाह के प्रति की गई सेवाओं की सूची बनवाई। जांच अधिकारी ने बादशाह को उन 102 अपराधों की सूची दी जो इन दोनों भाइयों द्वारा किए गए थे। जबकि इन भाइयों ने बादशाह के प्रति अब तक एक भी सेवा का कार्य नहीं किया था। इस पर बादशाह ने इन दोनों भाइयों को मरवा दिया तथा बहादुर खाँ नामक एक अमीर को गजनी का शासक बना दिया।

एक बार कामरान सेना लेकर काबुल से केवल एक पड़ाव की दूरी तक आ पहुंचा। इस पर बादशाह हुमायूँ मिर्जा कामरान से लड़ने के लिए सेना लेकर गया। थोड़ी देर की लड़ाई के बाद कामरान पराजित होकर भाग गया। इस घटना के बाद मिर्जा कामरान ने सीधे काबुल पर आक्रमण करने की बजाय हुमायूँ की सल्तनत में स्थित अनेक स्थानों पर हमले किए तथा शाही खजाने को लूट कर भागता रहा।

कुछ समय बाद जब कामरान का जोर काफी बढ़ गया तो नवम्बर 1551 में बादशाह हुमायूँ ने मिर्जा हिंदाल तथा अकबर को अपने साथ लेकर कामरान के विरुद्ध अभियान किया। जब तूमान क्षेत्र के जपरियार गांव में शाही शिविर लगा हुआ था तब एक रात कामरान ने अफगानों की एक बड़ी सेना के साथ शाही शिविर पर हमला बोल दिया।

अंधेरे के कारण शत्रु और मित्र की पहचान करना संभव नहीं था। इसलिए हुमायूँ और अकबर अपने डेरे के पीछे एक ऊँचे स्थान पर खड़े हो गए। थोड़ी ही देर में चंद्रमा का उजाला हो गया और शत्रु की पहचान आसान हो गई। इस युद्ध में मिर्जा कामरान तो हारकर भाग गया किंतु मिर्जा हिंदाल मारा गया।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि जब कामरान तथा हुमायूँ की सेनाओं के बीच युद्ध समाप्त हो गया और मिर्जा हिंदाल अपने डेरे को लौट रहा था तब हिंदाल को एक खाई से एक आदमी के चिल्लाने की आवाज सुनाई दी। कोई व्यक्ति सहायता के लिए पुकार लगाते हुए कह रहा था कि ये लोग मुझे तलवार से मार रहे हैं, कोई मुझे बचाओ।

हिंदाल ने इस आवाज को पहचान लिया। यह आवाज हिंदाल के तबकची की थी। हिंदाल अपने तबकची के प्राण बचाने के लिए उसी समय उस खाई में कूद पड़ा। उसी दौरान मिर्जा हिंदाल वीरगति को प्राप्त हुआ।

अबुल फजल ने लिखा है कि जिस अफगान सैनिक ने मिर्जा हिंदाल को जहर-बुझा भाला मारा था, वह हिंदाल के शरीर से उसका तरकस उतार कर ले गया तथा उस तरकस को मिर्जा कामरान के समक्ष प्रस्तुत किया। मिर्जा कामरान ने उस तरकस को देखते ही पहचान लिया और वह समझ गया कि यह मिर्जा हिंदाल का तरकस है। भाई के मरने का समाचार सुनते ही कामरान ने अपनी पगड़ी उतारकर धरती पर फैंक दी।

उधर ख्वाजा इब्राहीम ने मिर्जा हिंदाल के शव को पहचान लिया तथा उसे उठाकर मिर्जा हिंदाल के डेरे पर ले गया। उसने हुमायूँ के समक्ष मिर्जा हिंदाल की मृत्यु का समाचार प्रकट नहीं किया, अपितु कहा कि इस विजय पर मिर्जा हिंदाल ने आपको बधाई भिजवाई है।

हुमायूँ इस वाक्य में छिपे हुए मर्मान्तक संदेश को समझ गया। उसने गुलबदन के पति ख्वाजा खिज्र खाँ से कहा कि वह मिर्जा हिंदाल का शव लेकर काबुल जाए। जब ख्वाजा खिज्र खाँ रोने लगा तो हुमायूँ ने कहा कि अभी शत्रु पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ है इसलिए कमजोरी दिखाना उचित नहीं है।

हुमायूँ के आदेश से मिर्जा हिंदाल का शव काबुल ले जाया गया तथा बाकर के पैरों की तरफ दफना दिया गया। इस पर बाबर के एक और बेटे की इस असार संसार से विदाई हो गई। पाठकों को स्मरण होगा कि बाबर के बहुत से पुत्र बाबर के जीवन काल में ही मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे। बाबर की मृत्यु के 21 साल बाद बाबर का यह पहला पुत्र था जो मृत्यु को प्राप्त हुआ।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हुमायूँ को चकमा देकर कामरान अफगानिस्तान से भारत भाग गया (88)

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हुमायूँ को चकमा देकर कामरान अफगानिस्तान से भारत भाग गया

अब हुमायूँ कामरान से सदैव के लिए छुटकारा पाने का निश्चय कर चुका था। इसलिए वह सेना लेकर कामरान को ढूंढने लगा। कामरान भी समझ गया कि अंब हमायूँ के हाथों में पड़कर बचना कठिन है। इसलिए वह हुमायूँ को चकमा देकर अफगानिस्तान से भारत भाग जाने की जुगत भिड़ाने लगा!

मिर्जा हिंदाल की मृत्यु पर मुगलों के खेमे में भयानक शोक छा गया। बाबर के बेटों की आपसी लड़ाई का ऐसा भयावह परिणाम निकलेगा, इसकी कल्पना तक किसी ने नहीं की थी। जिस सल्तनत को बनाने के लिए बाबर ने अपना पूरा जीवन खपा दिया था, बाबर के बेटे न तो उस सल्तनत को आगे बढ़ा पा रहे थे और न उसे सुरक्षित रख पा रहे थे। हुमायूँ के लाख प्रयास करने पर भी कामरान मुगलों की आपसी कलह को समाप्त नहीं होने दे रहा था।

अब तक तो हुमायूँ ने मिर्जा कामरान और मिर्जा अस्करी के विरुद्ध कोई सख्त कदम नहीं उठाया था तथा हर बार उनके अपराधों को भुलाकर उन्हें गले लगाया था किंतु अब कामरान ने इसकी संभावनाएं समाप्त कर दी थीं। मिर्जा हिंदाल की हत्या एक ऐसा अपराध था, जिसे किसी भी कीमत पर क्षमा नहीं किया जा सकता था।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि मिर्जा हिंदाल की हत्या के बाद मिर्जा कामरान के जीवन में दुर्भाग्य का अंधेरा छा गया, उसे फिर किसी भी युद्ध में सफलता नहीं मिली। हुमायूँ ने कुछ समय पहले ही हिंदाल को गजनी की जागीर दी थी। हुमायूँ ने अब अपने पुत्र अकबर को गजनी का शासक बनाया तथा हिंदाल के समस्त सेवक भी अकबर को सौंप दिए। इस समय अकबर 10 वर्ष का हो चुका था।

हिंदाल की जागीर तथा सेवक अकबर को सौंपे जाने के पीछे अबुल फजल ने एक अजीब सा तर्क दिया है। वह लिखता है कि जब हिंदाल जीवित था, तब एक बार अकबर की पगड़ी उसके सिर से नीचे गिर गई। इस पर हिंदाल ने अकबर की पगड़ी उठाकर उसके सिर पर वापस रखी। इसलिए मिर्जा हिंदाल को अकबर के लिए शुभ माना गया।

मिर्जा हिंदाल के पास 14 स्वामिभक्त सेवक थे जो हिंदाल के प्रति अनन्य निष्ठा रखते थे, ये समस्त सेवक अब अकबर के लिए निष्ठा रखने लगे। हिंदाल के सेवकों में बाबा दोस्त नामक एक अमीर भी था किंतु उसकी संगति और चरित्र अच्छा नहीं था, इसलिए हुमायूँ ने अकबर को बुरी संगति से बचाने के लिए बाबा दोस्त को अकबर की सेवा में नियुक्त नहीं किया।

हिंदाल की सेवा में मुहम्मद ताहिर खाँ नामक एक वृद्ध अमीर भी रहता था। वह बहुत अनुभवी एवं वीर माना जाता था। उसने भी इच्छा प्रकट की कि वह शहजादे अकबर की सेवा करना चाहता है किंतु हुमायूँ ने ताहिर खाँ को इसलिए अकबर की सेवा में नियुक्त करने से मना कर दिया क्योंकि ताहिर खाँ कामरान के हाथों से कुंदूज की रक्षा नहीं कर सका था।

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जपरियार गांव में मिर्जा हिंदाल को मारने के बाद मिर्जा कामरान की सेना जपरियार से बीहसूद भाग गई। हुमायूँ ने अकबर को तो उसके सेवकों के साथ काबुल भेज दिया तथा स्वयं कामरान का पीछा करते हुए बीहसूद पहुंच गया। हुमायूँ ने बीहसूद में एक मजबूत किला बनाने के आदेश दिए ताकि इस क्षेत्र के अफगान जागीरदारों की गतिविधियों पर नियंत्रण करने के लिए इस क्षेत्र में एक स्थाई सेना रखी जा सके। हुमायूँ ने अपने गुप्तचरों की टोलियां चारों तरफ भिजवाईं ताकि कामरान की स्थिति का पता लगाया जा सके किंतु कामरान लगातार अपना ठिकाना बदलता रहा। अफगान कबीलों के सरदारों ने कामरान को न केवल अपने यहाँ शरण दी अपितु उसे हर संभव सहायता भी उपलब्ध करवाई। कुछ अमीरों ने हुमायूँ को सलाह दी कि अब कामरान में बादशाह का विरोध करने की शक्ति शेष नहीं बची है, इसलिए बादशाह को काबुल लौट चलना चाहिए। इतने लम्बे समय तक राजधानी से दूर रहना ठीक नहीं है। जबकि कुछ अमीरों की सलाह थी कि बादशाह को यहीं पर रुककर उन अफगान कबीलों को दण्ड देना चाहिए जिन्होंने कामरान को शरण दे रखी है।

इस बार हुमायूँ कामरान के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही करना चाहता था। संभवतः मिर्जा हिंदाल की मृत्यु से हुमायूँ किसी कठोर निश्चय पर पहुंच गया था। इसलिए उसने अफगान कबीलों पर कार्यवाही करने का निर्णय लिया ताकि कामरान को ढूंढा जा सके। अफगान कबीले दूर-दूर तक फैले हुए थे तथा अब तक यह ज्ञात नहीं हो सका था कि कामरान किस कबीले में छिपा हुआ है।

हुमायूँ ने अपनी सेनाओं को आदेश दिया कि आगे बढ़ा जाए तथा जो भी कबीला विरोध करे उसे दण्ड दिया जाए। जब हुमायूँ ने यह अभियान आरम्भ किया तो एक दिन माहम अली कुली खाँ तथा बाबा खिजरी नामक दो अमीर हुमायूँ की सेना द्वारा पकड़े गए। ये दोनों अमीर कामरान के विश्वस्त थे तथा मलिक मुहम्मद मंदरोरी से सहायता प्राप्त करने के लिए जा रहे थे। इन दोनों को हुमायूँ के समक्ष प्रस्तुत किया गया।

हुमायूँ ने उनसे पूछा कि इस समय कामरान किस कबीले में है? माहम अली कुली खाँ ने बादशाह को गुमराह करने के उद्देश्य से एक दूरस्थ कबीले का नाम बताया किंतु बाबा खिजरी ने कहा कि मुझे ज्ञात है कि कामरान कहाँ है, इस समय वह बहुत घबराया हुआ है। यदि आप कुछ सैनिक मेरे साथ भेज दें तो मैं उन्हें कामरान के पास ले जा सकता हूँ।

बादशाह ने बाबा खिजरी की बात पर विश्वास करके अपने कुछ अमीरों को बाबा खिजरी के साथ जाने के आदेश दिए। ये लोग उसी रात कामरान को पकड़ने के लिए रवाना हो गए। पौ फटते ही हुमायूँ की सेना ने वह गांव घेर लिया तथा उस कबीले के अधिकांश स्त्री-पुरुष एवं बच्चों को मार दिया। उन्होंने बहुत से लोगों को बंदी बना लिया। अंत में ये लोग एक मकान में पहुंचे। उस समय कामरान मुँह ढंक कर सोया हुआ था। उसकी सेवा में केवल दो आदमी थे।

हुमायूँ के अमीरों ने उन दो आदमियों में से एक को पकड़ लिया तथा दूसरा भाग गया। पकड़े गए आदमी का नाम शाहकुली नारंजी था। इसके बाद खाट पर सोए हुए कामरान को उठाया गया। जब वह उठा तो हुमायूँ के अमीर यह देखकर चौंक गए कि वह कामरान नहीं है, वह तो कामरान होने का नाटक कर रहा था।

वास्तव में जो दूसरा आदमी भाग गया था, वही मिर्जा कामरान था जो हुमायूँ को चकमा देकर भाग जाने में सफल रहा था। इसके बाद मिर्जा कामरान की बहुत तलाश की गई किंतु वह हाथ नहीं आया। बहुत दिनों बाद हुमायूँ को अपने विश्वस्त आदमियों से सूचना मिली कि कामरान भारत चला गया है। अबुल फजल तथा गुलबदन बेगम दोनों ने लिखा है कि कामरान भारत के शासक सलीमशाह की सेवा में चला गया।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अकबर के शौक देखकर हुमायूँ चिंतित हो गया (89)

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अकबर के शौक - www.bharatkaitihas.com
अकबर के शौक देखकर हुमायूँ चिंतित हो गया

किशोरावस्था की दहलीज पर पैर रख चुका अकबर पहाड़ी ऊंटों एवं अरबी घोड़ों की पीठ पर बैठकर उन्हें तेज गति से दौड़ाने में अपना दिन व्यतीत करता था। मुल्लाजाद असामुद्दीन अकबर को पढ़ाई लिखाई की ओर नहीं खींच सका तो वह भी कबूतर उड़ाने के अपने पुराने शौक में व्यस्त हो गया। धीरे-धीरे अकबर को भी कबूतर उड़ाने की लत लग गई। अकबर के शौक देखकर हुमायूँ चिंतित हो गया।

जब हुमायूँ को कामरान के भारत भाग जाने की सूचना मिली तो हुमायूँ बड़ा प्रसन्न हुआ। वह अपने हाथ भाई के रक्त से नहीं रंगना चाहता था। कामरान के चले जाने के बाद इस रक्तपात की आवश्यकता ही नहीं रह गई थी। अतः हुमायूँ ने बाग-ए-सफा नामक स्थान पर एक बड़े उत्सव का आयोजन करने का निश्चय किया।

हुमायूँ ने अपने संदेशवाहक काबुल भेजकर अकबर को तथा हरम की समस्त बेगमों को वहीं पर बुला लिया। अपने परिवार के आने पर इस विशाल उत्सव का आयोजन किया गया। इस उत्सव में हुमायूँ के सभी अमीरों एवं गणमान्य लोगों ने भाग लिया।

इस उत्सव के समापन के बाद हुमायूँ ने अपने परिवार एवं अमीरों सहित काबुल के लिए प्रस्थान किया। इस समय तक हुमायूँ को काबुल छोड़े हुए छः माह से भी अधिक समय हो चुका था। जब भी हुमायूँ किसी सैनिक अभियान पर काबुल से बाहर जाता था, कामरान काबुल पर अधिकार कर लेता था किंतु इस बार कामरान काबुल पर अधिकार नहीं कर सका। यह हुमायूँ की बड़ी सफलता थी और इससे भी बड़ी सफलता यह थी कि अब कामरान पूरी तरह शक्तिहीन होकर अफगानिस्तान से चला गया था। अब हुमायूँ अपने परिवार एवं राज्य पर अधिक ध्यान दे सकता था।

अबुल फजल ने लिखा है कि हुमायूँ का पुत्र जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर दस साल का हो चुका था किंतु अब तक उसकी विधिवत् शिक्षा आरम्भ नहीं हुई थी। विगत दस वर्षों में हुमायूँ लगातार भागता रहा था, इसलिए उसे अकबर को अपने साथ रखने का अवसर बहुत कम ही मिला था। इस भागमभाग और राजधानी की छीना-झपटी के कारण अकबर की शिक्षा का प्रबंध नहीं हो सका था।

अब जबकि कामरान अफगानिस्तान की धरती से दूर जा चुका था, हुमायूँ को अकबर की शिक्षा पर ध्यान देने का समय मिला। उसने मुल्लाजाद असामुद्दीन को अकबर का शिक्षक नियुक्त किया। मुल्लाजाद एक योग्य शिक्षक था और अकबर को पढ़ाने का पूरा प्रयास करता था किंतु अकबर ने शिक्षा प्राप्त करने में कोई रुचि नहीं दिखाई।

किशोरावस्था की दहलीज पर पैर रख चुका अकबर पहाड़ी ऊंटों एवं अरबी घोड़ों की पीठ पर बैठकर उन्हें तेज गति से दौड़ाने में अपना दिन व्यतीत करता था। उसके चाटुकार सेवक उसकी तारीफ करते न थकते थे। जब मुल्लाजाद असामुद्दीन अकबर को पढ़ाई लिखाई की ओर नहीं खींच सका तो वह भी कबूतर उड़ाने के अपने पुराने शौक में व्यस्त हो गया। धीरे-धीरे अकबर को भी कबूतर उड़ाने की लत लग गई।

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एक दिन किसी ने हुमायूँ को बता दिया कि गुरु-चेला सारे दिन कबूतर उड़ाने में व्यस्त रहते हैं। इस पर हुमायूँ ने मुल्लाजाद असामुद्दीन को हटा दिया तथा मौलाना बायाजीन को अकबर का शिक्षक नियुक्त किया। मौलाना ने भी बहुत प्रयास किया कि अकबर थोड़ा पढ़-लिख ले किंतु अकबर को अपने शौक पूरे करने में ही आनंद आता था। अब अकबर ने कुत्तों द्वारा हिरणों का शिकार करने का नया शौक पाल लिया। मौलाना बायाजीन ने हार-थक कर हाथ खड़े कर दिए और हुमायूँ से कहा कि शहजादे को पढ़ाना संभव नहीं है। इस पर हुमायूँ ने काबुल के अच्छे आलिमों, मुल्लाओं, मौलवियों एवं मौलानाओं को बुलाकर उनसे पूछा कि आपमें से कौनसा आलिम ऐसा है जो शहजादे को पढ़ा सके! सभी मुल्ला-मौलवी एवं मौलाना चाहते थे कि वे अकबर को पढ़ाएं इसलिए उन्होंने अपनी योग्यता के बारे में बढ़-चढ़कर दावे किए। इस पर हुमायूँ ने कागज की पर्चियों पर उनके नाम लिखवाए। जब उन पर्चियों में से पहली पर्ची खोली गई तो उसमें मौलाना अब्दुल कादिर का नाम आया। उसी को अकबर का शिक्षक नियुक्त किया गया। एक दिन बादशाह ने शाहम खाँ जलाईर नामक एक अमीर को यह देखने के लिए भेजा कि अकबर क्या करता है?

उस युग में जिस प्रकार गद्दारों की कमी नहीं थी, उसी प्रकार चाटुकारों की भी कमी नहीं थी। उसने जाकर देखा कि अकबर के रंग-ढंग अच्छे नहीं हैं किंतु वह अपने मुँह से यह बात हुमायूँ से नहीं कहना चाहता था। सच बोलने की बजाय वह कोई ऐसी बात बादशाह से कहना चाहता था जिससे वह बादशाह से बड़ा ईनाम पा सके।

अबुल फजल ने अकबरनामा में लिखा है कि शाहम खाँ ने बादशाह को बताया कि जब वह शहजादे अकबर के कक्ष में पहुंचा तो उस समय शहजादा पलंग पर लेटा हुआ था। उसके चेहरे पर दिव्य प्रकाश था और ऐसा जान पड़ता था जैसे वह सोया हुआ है परंतु वास्तव में वह फरिश्तों से बात कर रहा था। इस बातचीत में अकबर फरिश्तों से कह रहा था कि यदि अल्लाह ने चाहा तो मैं संसार के उत्तम भाग को जीत लूंगा और दुःखी लोगों की अभिलाषाएं पूरी कर दूंगा।

यह तो नहीं कहा जा सकता कि शाहम खाँ की बात का हुमायूँ पर क्या प्रभाव पड़ा क्योंकि इसके सम्बन्ध में कहीं पर कोई उल्लेख नहीं मिलता है किंतु यह तय है कि शाहम खाँ जलाईर जीवन भर इस बात को दोहराता रहा। अबुल फजल ने लिखा है कि जब अकबर बादशाह बना तब भी शाहम खाँ इस बात को कहता था किंतु अकबर को चाटुकारिता पसंद नहीं थी।

हुमायूँ समझ गया कि शिक्षा प्राप्त करना अकबर के वश की बात नहीं है, इसलिए उसने अकबर को आदेश दिया कि वह गजनी जाकर अपनी जागीर संभाले। अकबर के विश्वसनीय अतगा खाँ को अकबर के साथ भेजा गया। उसके साथ ही अकबर के समस्त सेवक तथा मरहूम मिर्जा हिंदाल के समस्त सेवक भी गजनी भेजे गए। हुमायूँ ने छः महीने तक अकबर को गजनी में रखा तथा उसके आचरण के समाचार लेता रहा।

अकबर के भाग्य से उन दिनों गजनी में बाबा विलास नामक एक दरवेश रहा करता था। अकबर उसके सम्पर्क में आया तथा उससे इतना अधिक प्रभावित हुआ कि अकबर प्रतिदिन उस दरवेश से मिलने के लिए जाने लगा। जब हुमायूँ को यह समाचार मिला तो हुमायूँ बहुत संतुष्ट हुआ।

गजनी में रहने वाले चाटुकार लोग नित्य ही अकबर की कुशाग्र बुद्धि एवं न्यायप्रियता के समाचार हुमायूँ को भिजवाने लगे। उन्हें सुनकर हुमायूँ को लगने लगा कि बाबर के बेटों ने जो कुछ भी भूमि खोई है, उस समस्त भूमि को बाबर का यह वंशज अवश्य ही फिर से प्राप्त कर लेगा। छः माह की अवधि बीत जाने पर हुमायूँ ने अकबर को आदेश भिजवाए कि वह काबुल आकर बादशाह की सेवा में उपस्थित हो। हुमायूँ का आदेश मिलते ही अकबर काबुल के लिए रवाना हो गया।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाबर का बेटा औरतों के कपड़े पहनकर भाग निकला (90)

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बाबर का बेटा औरतों के कपड़े पहनकर भाग निकला

हुमायूँ के भय से बाबर का बेटा मिर्जा कामरान बीहसूद से निकल कर हिन्दूकुश पर्वत को पार करके भारत चला आया। इस समय कामरान के पास केवल 12 अनुचर थे जिनमें अमीर तथा सेवक दोनों ही शामिल थे।

भारत आकर मिर्जा कामरान को ज्ञात हुआ कि इस समय दिल्ली का शासक इस्लामशाह सूरी पंजाब के बान नामक गांव में ठहरा हुआ है। पाठकों को स्मरण होगा कि ईस्वी 1540 में शेर खाँ सूरी ने हुमायूँ से भारत का राज्य छीना था तथा शेरशाह सूरी के नाम से भारत का सुल्तान बन गया था किंतु इसके बाद शेरशाह सूरी केवल पांच साल ही जीवित रहा और एक दिन कालिंजर दुर्ग पर अभियान के समय अपनी ही तोप के फट जाने से मृत्यु को प्राप्त हुआ था।

शेरशाह के बाद उसका पुत्र जलाल खाँ इस्लामशाह सूरी के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठा। गुलबदन बेगम तथा अबुल फजल दोनों ने इस्लामशाह को सलीमशाह कहकर सम्बोधित किया है। इससे प्रतीत होता है कि जलाल खाँ को सुल्तान बनने के बाद इन दोनों नामों से जाना जाता था।

शाह बुदाग नामक एक अमीर ने मिर्जा कामरान को सलाह दी कि हमें इस्लामशाह सूरी से सम्पर्क करना चाहिए। कामरान को यह सलाह अच्छी लगी और उसने शाह बुदाग को अपना दूत बनाकर इस्लामशाह के पास भेजा। अबुल फजल ने लिखा है कि सलीम खाँ को बाबर के बेटे पर दया आ गई तथा उसने शाह बुदाग के हाथों कुछ रुपया कामरान के लिए भिजवाया। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि सलीमशाह ने कामरान के लिए एक हजार रुपए भिजवाए।

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कामरान एक उतावला व्यक्ति था। इसलिए इससे पहले कि शाह बुदाग लौट कर आता, मिर्जा कामरान स्वयं ही इस्लामशाह से मिलने चल पड़ा। जब मिर्जा कामरान के आदमियों ने सुल्तान इस्लामशाह को सूचना दी कि मिर्जा कामरान सुल्तान से मिलने के लिए आ रहा है तो इस्लामशाह ने अपने तीन अमीरों को कामरान का स्वागत करने के लिए भेजा। उन अमीरों ने चार कोस आगे जाकर कामरान का स्वागत किया तथा बड़े आदर के साथ कामरान को इस्लामशाह के पास ले आए। सुल्तान इस्लामशाह ने कामरान पर दया करके उसे रुपए भिजवाए थे तथा शाही तौर-तरीकों की पालना करते हुए अपने अमीरों को कामरान का स्वागत करने भेजा था किंतु इस्लामशाह यह नहीं भूला था कि यह शत्रु का पुत्र है। इसलिए इस्लामशाह ने कामरान के साथ वैसा व्यवहार नहीं किया जैसा कि किसी महत्वपूर्ण शहजादे के साथ उन दिनों किया जाता था। इस्लामशाह के इस रूखे व्यवहार से कामरान को बहुत धक्का लगा किंतु इस समय वह हुमायूँ का भगोड़ा और इस्लामशाह का शरणागत था। इसलिए कामरान इस अपमान को सह गया। इस्लामशाह ने कामरान से कहा कि वह शाही लश्कर के साथ हमारा मेहमान बनकर रहे तथा हमारे साथ दिल्ली चले।

इस्लामशाह की योजना थी कि वह कामरान को दिल्ली ले जाकर किसी दुर्ग में बंद कर दे। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि सलीमशाह ने प्रकट रूप से तो कामरान से कुछ नहीं कहा किंतु जब कामरान कक्ष से बाहर जा रहा था, तब सलीमशाह ने कहा कि जिस इंसान ने अपने भाई मिर्जा हिंदाल को मारा है, मैं उसकी सहायता किस प्रकार कर सकता हूँ? ऐसे मनुष्य को तो नष्ट करना उचित है।

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि जब कामरान ने सुना कि सलीमशाह कामरान के बारे में बुरे विचार रखता है तो वह किसी से कुछ कहे-सुने बिना ही वहाँ से भाग गया। जब सलीमशाह को पता लगा तो उसने कामरान के साथियों को पकड़कर बंदी बना लिया। बाबर का बेटा मिर्जा कामरान भीरा और खुशआब होते हुए गक्खरों की तरफ गया। अभी वह गक्खरों की सीमा पर ही था कि गक्खरों ने उसे पकड़ लिया तथा बादशाह हुमायूँ के पास भेज दिया।

हालांकि गुलबदन बेगम तथा अबुल फजल दोनों ही अकबर के समकालीन थे तथापि उन दोनों द्वारा लिखे गए विवरणों में पर्याप्त अंतर है। अबुल फजल ने लिखा है कि कामरान ने अपने अमीर जोगी खाँ को माचीवाड़ा के निकटवर्ती क्षेत्र के राजा बक्कू से सहायता मांगने के लिए भेजा। राजा बक्कू ने कामरान की सहायता करने का वचन दिया।

जब इस्लामशाह ने पंजाब से दिल्ली जाने के लिए माचीवाड़ा की नदी पार की तो कामरान ने युसूफ आफ ताबंची को अपने कपड़े पहनाकर अपने बिस्तर पर सुला दिया तथा बाबा सईद से कहा कि बैठे-बैठे कुछ गुनगुनाता रहे ताकि देखने वाले को लगे कि मिर्जा सो रहा है। इसके बाद बाबर का बेटा कामरान वेश बदल कर अपने डेरे से निकला तथा माचीवाड़ा के राजा बक्कू के पास चला गया।

कुछ दिन बाद जब इस्लामशाह की सेना कामरान को ढूंढती हुई माचीवाड़ा पहुंची तो माचीवाड़ा के राजा बक्कू ने कामरान को कहलूर के राजा के पास भेज दिया। कहलूर के राजा ने मिर्जा को जम्मू के राजा के पास भिजवा दिया। जम्मू के राजा ने कामरान को अपने राज्य में नहीं घुसने दिया। इस पर मिर्जा कामरान मानकोट चला गया। मानकोट व्यास नदी के तट पर स्थित एक पहाड़ी किला था और इसका पुराना नाम रामकोट था, वहाँ एक हिंदू राजा राज्य करता था।

मानकोट के राजा ने मिर्जा कामरान को पकड़कर इस्लामशाह को सौंपने की योजना बनाई। जब मानकोट के सैनिक कामरान के पास पहुंचकर उसके सेवकों से बात करने लगे तो कामरान को अनुमान हो गया कि मानकोट के राजा ने अपने आदमियों को किस उद्देश्य से भेजा है। इसलिए कामरान ने मानकोट के सैनिकों से बचने के लिए स्त्री का वेश बनाया तथा एक अफगान घुड़सौदागर के साथ गक्खर प्रदेश के लिए रवाना हो गया।

तत्कालीन ऐतिहासिक विवरणों के आधार पर यह अनुमान होता है कि अपने शत्रुओं से बचने के लिए कामरान प्रायः वेश बदलकर रहता था, कभी अपने सेवकों के वेश में तो कभी स्त्री के वेश में ताकि संकट-काल में तुरंत प्राण बचा कर भागा जा सके।

ई.1525 में बाबर इन्हीं गक्खरों को परास्त करके पंजाब होता हुआ दिल्ली, आगरा और चंदेरी तक पहुंचा था। आज उसी बाबर का बेटा गक्खरों का शरणार्थी था। इस प्रकार इतिहास की धारा एक बार फिर से घूमकर उसी बिंदु पर लौट आई थी!

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कामरान की हत्या करने को कहा मुल्लाओं ने (91)

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कामरान की हत्या करने को कहा मुल्लाओं ने!

हुमायूँ ने अपने दरबारियों की यह बात मानने से अस्वीकार कर दिया तथा उनसे कहा कि मरहूम बादशाह बाबर ने इस संसार को छोड़ते समय मुझे आदेश दिया था कि मैं अपने भाइयों को क्षमा करूं चाहे वे मेरे विरुद्ध कितना भी अपराध क्यों न करें। मैं कुछ भी कर सकता हूँ किंतु अपने मरहूम पिता के आदेशों की अवहेलना नहीं कर सकता। मैं कामरान की हत्या नहीं कर सकता!

सिंधु और झेलम नदी के बीच में बड़ी संख्या में गक्खर लोग रहा करते थे जो अत्यंत युद्धप्रिय थे। कुछ इतिहासकारों ने इन्हें खोखर कहा है। उन्हीं के नाम पर यह क्षेत्र गक्खड़ प्रदेश, घक्कर प्रदेश अथवा खोखर प्रदेश कहलाता था।

किसी समय ये लोग हिन्दू थे किंतु ई.712 से लेकर ई.1555 तक की दीर्घ अवधि में बेरहम समय के थपेड़े खाकर इनमें से बहुत से लोग इस्लाम स्वीकार करने का विवश हुए। इन्हें महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी तथा तैमूर लंग जैसे प्रबल आक्रांताओं से युद्ध करना पड़ा था। आज भी भारत में गक्खर एवं खोखर उपजातियां रहती हैं जो स्वयं को जाट बताती हैं। गक्खर एवं खोखर उपजाति के कुछ लोग स्वयं को राजपूत बताते हैं तो इन उपजातियों के लोग मुसलमान भी हैं।

काश्मीर के सुल्तान जैनुल ओबेदीन के समय गक्खर का यह विशाल प्रदेश काश्मीर राज्य के अधीन था किंतु जैनुल की मृत्यु के बाद गजनी के गवर्नर मलिक किद ने गक्खर के काफी बड़े हिस्से पर अधिकार कर लिया था। चूंकि उस समय गजनी काबुल के अधीन था इसलिए तब से गक्खर प्रदेश भी काबुल राज्य के अंतर्गत माना जाता था। मलिक किद ने अपने पुत्र पीर खाँ को गक्खर प्रदेश का शासक नियुक्त किया था। पीर खाँ के मरने पर पीर खाँ का पुत्र तातार खाँ गक्खर का शासक हुआ।

गजनी का गवर्नर मलिक किद बाबर के किसी पूर्वज का निकट सम्बन्धी था। इस नाते मलिक किद के वंशज बाबर तथा उसके पुत्रों के प्रति अत्यंत निष्ठा रखते थे। जब बाबर भारत पर आक्रमण करने आया तो गक्खर के शासक तातार खाँ ने पानीपत तथा खानवा के युद्धों में बाबर का साथ दिया था।

जब ई.1540 में मिर्जा हुमायूँ को आगरा एवं दिल्ली छोड़कर सिंध की तरफ भागना पड़ा था तब शेरशाह सूरी ने तातार खाँ के राज्य पर आक्रमण करके गक्खर प्रदेश को छीनने का प्रयास किया था किंतु वह तातार खाँ को परास्त नहीं कर सका था।

शेरशाह सूरी के बाद जब शेरशाह का पुत्र इस्लामशाह सूरी सुल्तान हुआ तब इस्लामशाह ने भी तातार खाँ पर आक्रमण किया किंतु इस्लामशाह को भी सफलता नहीं मिली थी।

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जब मिर्जा मिर्जा कामरान मानकोट से भागकर गक्खरों के प्रदेश में पहुंचा तो तातार खाँ का पुत्र सुल्तान आदम गक्खर प्रदेश का शासक था। वह भी हुमायूँ को अपना बादशाह मानता था। अतः सुल्तान आदम ने कामरान को पकड़कर हुमायूँ के सुपुर्द करने की योजना बनाई। जब कामरान ने सुल्तान आदम से सम्पर्क किया तो सुल्तान आदम ने उसकी बड़ी आवभगत की तथा उसे अपने पास रख लिया ताकि आसानी से हाथ आया हुआ कामरान इधर-उधर न भाग जाए। सुल्तान आदम ने अपने कुछ आदमियों को कामरान की सेवा में रख दिया। देखने में तो वे सेवक लगते थे किंतु वास्तव में वे सुल्तान आदम के सैनिक थे जो इस बात को सुनिश्चित करते थे कि कामरान यहाँ से भाग न जाए। सुल्तान आदम ने बादशाह हुमायूँ के पास प्रार्थना-पत्र भिजवाया कि मिर्जा कामरान हमारे पहरे में है, अतः आप यहाँ आकर कामरान का उपचार करें। जब कामरान को ज्ञात हुआ कि सुल्तान आदम ने कामरान के साथ छल किया है, तब कामरान ने भी एक योजना बनाई। उसने हुमायूँ के पास पत्र भेजकर निवेदन किया कि मैं बादशाह की सेवा में आ रहा था किंतु मुझे गक्खरों ने पकड़ लिया है। इसलिए आप यहाँ आकर मुझे इनकी कैद से मुक्त करवाएं।

कामरान को लगता था कि अपने भाई की पीड़ा के बारे में जानकर हुमायूँ अवश्य ही कामरान को गक्खरों से छुड़ाएगा तथा गक्खरों को दण्डित करेगा।

सुल्तान आदम का पत्र पाकर हुमायूँ ने गक्खर प्रदेश पर अभियान करने का निश्चय किया। ई.1541 में हुमायूँ भारत भूमि को छोड़कर अफगानिस्तान आया था। इस घटना को अब 12 साल का समय हो चुका था। तब से ही हुमायूँ की बड़ी इच्छा थी कि वह एक फिर से भारत पर अभियान करे। चूंकि गक्खरों का यह प्रदेश भारत की भूमि पर स्थित था इसलिए हुमायूँ ने स्वयं ही इस अभियान पर जाना निश्चित किया।

उसने काबुल का शासन ख्वाजा जलालुद्दीन महमूद नामक एक अमीर को सौंपा तथा स्वयं अकबर को अपने साथ लेकर सिंधु नदी की तरफ चला। सिंधु नदी पर पहुंचकर हुमायूँ ने गक्खर प्रदेश के शासक सुल्तान आदम को पत्र भिजवाया कि हम सिंधु नदी तक आ गए हैं, तुम तुरंत हमारी सेवा में आओ।

सुल्तान आदम बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ। हुमायूँ ने कामरान को भी वहीं बुलवा लिया। जब कामरान बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ तो हुमायूँ बड़ा प्रसन्न हुआ। पहले की ही तरह हुमायूँ ने अपने भाई को गले लगा लिया। कामरान से मिलने की प्रसन्नता में हुमायूँ के शिविर में रात भर जश्न मनाया गया।

हुमायूँ के दरबारियों ने हुमायूँ के ऐसे रंग-ढंग देखे तो उन्हें बड़ा क्षोभ हुआ। वे तो कामरान की हत्या करना चाहते थे किंतु हुमायूँ कामरान की आवभगत कर रहा था। जिस कामरान के कारण बादशाह तथा उसके अमीरों एवं उनके परिवार के लोगों के प्राण कई बार संकट में पड़ चुके थे, बादशाह उसके विरुद्ध कोई कार्यवाही करने को तैयार नहीं था। इस पर दरबारियों ने एकत्रित होकर बादशाह से निवेदन किया कि न्याय की दृष्टि से कामरान की हत्या कर देना ही उचित है। यह आपका भाई नहीं है, शत्रु है। आपके इस काम से अल्लाह को प्रसन्नता होगी।

हुमायूँ ने अपने दरबारियों की यह बात मानने से अस्वीकार कर दिया तथा उनसे कहा कि मरहूम बादशाह बाबर ने इस संसार को छोड़ते समय मुझे आदेश दिया था कि मैं अपने भाइयों को क्षमा करूं चाहे वे मेरे विरुद्ध कितना भी अपराध क्यों न करें। मैं कुछ भी कर सकता हूँ किंतु अपने मरहूम पिता के आदेशों की अवहेलना नहीं कर सकता। मैं कामरान की हत्या नहीं कर सकता!

इस पर समस्त दरबारियों ने एकराय होकर मुल्लाओं से सम्पर्क किया तथा उनसे एक कागज लिखवाया जिसमें कहा गया था कि इस्लाम के कानून के अनुसार कामरान की हत्या करना ही उचित है। इस कागज पर बहुत बड़ी संख्या में मुल्लाओं से हस्ताक्षर करवाए गए। जब यह कागज हुमायूँ के समक्ष प्रस्तुत किया गया तो हुमायूँ ने उन्हें बुलाकर उनसे विचार-विमर्श किया तथा मुल्लाओं को इस बात पर सहमत कर लिया कि कामरान की हत्या नहीं की जाए, कामरान की आंखें फोड़ कर उसके प्राण बख्श दिए जाएं।

जब कामरान को बादशाह के इस निर्णय की जानकारी मिली तो उसने बादशाह से कहलवाया कि जिन लोगों ने आपको यह सलाह दी है, उन्हीं लोगों ने मेरी यह हालत की है किंतु बादशाह ने कामरान को कोई जवाब नहीं दिया। मिर्जा कामरान जीवन भर हुमायूँ की पीठ में छुरी भौंकता आया था, किंतु अब वे दिन लद चुके थे।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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तिरुक्कुरल : विश्व साहित्य का गौरव

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तिरुक्कुरल (Thirukkural) केवल एक पुस्तक नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक संपूर्ण संहिता है। इसे 'तमिल वेद' और 'विश्व नीतिशास्त्र' के रूप...