Home Blog Page 98

मुहम्मद गौरी के आक्रमण के समय बिखरा हुआ था भारत (32)

0
मुहम्मद गौरी के आक्रमण - www.bharatkaitihas.com
मुहम्मद गौरी के आक्रमण के समय बिखरा हुआ था भारत

जिस काल में मुहम्मद गौरी के आक्रमण आरम्भ हुए, उस काल में भारत का राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बिखरा हुआ था। सिंधु नदी से लेकर पंजाब की अंतिम नदी तक के क्षेत्र में मुसलमानों के छोटे-छोटे राज्य स्थापित हो चुके थे। शेष भारत में हिन्दू राजाओं के राज्य थे जो हर समय आपस में लड़कर अपने-अपने राज्य का विस्तार करते रहते थे और पड़ौसी राज्य को मिटाते रहते थे।

ई.1173 में शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी अफगानिस्तान में स्थित गजनी का नया शासक बना। गजनी का नया राजवंश अधिक शक्ति-सम्पन्न था, इसलिए उसने भारत में तुर्की साम्राज्य के विस्तार के लिए नए रास्ते खोल दिए। महमूद गजनवी की तरह मुहम्मद गौरी के भी भारत पर आक्रमण करने के पीछे कई उद्देश्य थे। उसका सबसे पहला उद्देश्य पंजाब में गजनवी वंश के शासक खुसरवशाह को तथा उसके राज्य को समूल नष्ट करना था ताकि भविष्य में मुहम्मद गौरी के साम्राज्य को कोई खतरा नहीं हो।

मुहम्मद गौरी के आक्रमण एक साथ बहुत सारे उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आरम्भ हुए थे। मुहम्मद गौरी भारत में एक नए मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना करके इतिहास में अपना नाम अमर करना चाहता था तथा अरब के खलीफाओं से अपने लिए प्रशंसा प्राप्त करना चाहता था। महमूद गौरी भी महमूद गजनवी की तरह भारत से विपुल धन-दौलत एवं गुलामों को प्राप्त करना चाहता था।

मुहम्मद गौरी अपने युग के अन्य मध्यएशियाई मुस्लिम शासकों की तरह कट्टर सुन्नी मुसलमान था, इसलिए वह भारत से बुत-परस्ती अर्थात् मूर्ति-पूजा को समाप्त करना अपना परम कर्त्तव्य समझता था। इस प्रकार मुहम्मद गौरी द्वारा भारत पर आक्रमण करने के राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक कारण थे। अपने जीवन के अंतिम 20 वर्षों में वह इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति में लगा रहा। ईस्वी 1173 से ईस्वी 1193 तक भारत पर मुहम्मद गौरी के आक्रमण होते रहे।

मुहम्मद गौरी के आक्रमण के समय भारत वर्ष कहने को ही एक राष्ट्र था किंतु राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक दृष्टि से बुरी तरह से बिखरा हुआ था। केवल प्राकृतिक सीमाएं ही भारत के एक राष्ट्र होने का आभास करवाती थीं। उत्तर में हिमालय तथा उत्तर-पश्चिम में हिन्दूकुश पर्वत, पूर्व में बंगाल की खाड़ी, दक्षिण में हिन्दू महासागर एवं पश्चिम में अरब की खाड़ी इस देश को एक प्राकृतिक राष्ट्र का स्वरूप प्रदान करते थे।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

वह समय बीत चुका था जब वेद, उपनिषद्, पुराण, रामायण, महाभारत एवं गीता आदि महान् ग्रंथ इस देश को एक सांस्कृतिक राष्ट्र बनाते थे। इस समय के भारत में हिन्दू धर्म की शैव, शाक्त तथा वैष्णव शाखाएं विभिन्न उपशाखाओं में विभक्त हो रही थीं तथा उनका बिखराव अपने चरम पर था। बौद्धधर्म का भारत में नाश हो चुका था किंतु शैवों और बौद्धों के मिश्रण से नाथ सम्प्रदाय से लेकर विभिन्न तांत्रिक मत, कापालिक एवं अघोर सम्प्रदाय आदि जन्म ले चुके थे। जैन धर्म दक्षिण भारत तथा पश्चिम के मरुस्थल में जीवित था तथा दूसरे धर्मों एवं सम्प्रदायों से असम्पृक्त रहकर अपने अलग स्वरूप में फल-फूल रहा था। यद्यपि दक्षिण भारत के आलवार, शंकराचार्य एवं रामानुजाचार्य जैसे गुरुओं ने भारत की सांस्कृतिक आत्मा के पुनर्जागरण के राष्ट्रव्यापी अभियान चलाए थे तथापि भारत के सहज विश्वासी और सरल लोग पाखण्डियों के चक्करों में फंस चुके थे और प्रजा को इस भंवर से निकालने के लिए वैष्णव संतों और भक्त कवियों के धरती पर आने में अभी कुछ समय शेष था। मुहम्मद गौरी के आक्रमणों के समय सिंध, मुल्तान और पंजाब के अधिकांश क्षेत्र गजनी के मुसलमानों के अधिकार में थे तथा वहाँ अलग-अलग मुस्लिम शासक शासन कर रहे थे।

रावी नदी के पूर्व में भी बहुत से दुर्ग गजनी के मुसलमानों के अधीन हो गए थे जिनमें हांसी से लेकर लाहौर तथा कांगड़ा तक के दुर्ग सम्मिलित थे। जिस समय मुहम्मद गौरी गजनी का शासक हुआ, उस समय उत्तर भारत में चार प्रमुख हिन्दू राजा शासन कर रहे थे-

(1.) दिल्ली तथा अजमेर में चौहान वंश का राजा पृथ्वीराज तृतीय (ई.1179-92),

(2.) कन्नौज में गहड़वाल वंश का राजा जयचंद (ई.1170-94),

(3.) बिहार में पाल वंश का राजा पालपाल (ई.1165-1200)

(4.) बंगाल में सेन वंश का राजा लक्ष्मण सेन (ई.1178-1206)

इनके साथ ही मध्य चेदि में कलचुरि वंश, मालवा में परमार वंश, गुजरात में चौलुक्य वंश, बदायूं में राष्ट्रकूट वंश सहित अनेक राजपूत वंश छोटे-छोटे राज्यों के स्वामी थे। इन राज्यों में परस्पर फूट थी तथा वे परस्पर संघर्षों में व्यस्त थे। पृथ्वीराज तथा जयचंद में वैमनस्य था। दक्षिण भारत भी बुरी तरह बिखरा हुआ था। देवगिरि में यादव, वारांगल में काकतीय, द्वारसमुद्र में होयसल तथा मदुरा में पाण्ड्य वंश का शासन था। ये राज्य भी परस्पर युद्ध करके एक दूसरे को नष्ट करके अपनी आनुवांशिक परम्परा निभा रहे थे।

सिंध, मुलतान तथा पंजाब में मुस्लिम शासित क्षेत्रों में इस्लाम का प्रसार हो गया था। वहाँ हिन्दुओं को बल-पूर्वक इस्लाम स्वीकार करवाया जा रहा था। जो लोग मुसलमान नहीं बनना चाहते थे, उन्हें या तो उस क्षेत्र से पलायन करना पड़ रहा था अथवा वे भारी भू-राजस्व एवं जजिया आदि कर देकर निर्धनता को प्राप्त कर रहे थे।

सामाजिक दृष्टि से भी इस काल में भारत की दशा बहुत शोचनीय थी। समाज का प्रायः नैतिक पतन हो चुका था। शत्रु से देश की रक्षा और युद्ध का समस्त भार अब भी राजपूत जाति पर था, शेष प्रजा इससे उदासीन थी। हिन्दू शासकों को द्वेष, अहंकार तथा विलास-प्रियता के घुन खाए जा रहे थे। राष्ट्रीय उत्साह पहले की ही भांति विलुप्त था। कुछ शासकों में देश तथा धर्म के लिए मर मिटने का उत्साह था किंतु वे परस्पर फूट का शिकार थे। स्त्रियों की सामाजिक दशा, उत्तर वैदिक काल की अपेक्षा काफी गिर चुकी थी।

इस प्रकार मुहम्मद गौरी के आक्रमण के समय भारत की जैसी स्थिति थी उसे देखते हुए भारत को गुलाम बना लेना, उसकी संस्कृति को उखाड़ फैंकना, उसकी प्रजा को सदा के लिए विपन्न बना देना मुहम्मद गौरी जैसे प्रबल विदेशी आक्रांता के लिए बहुत आसान नहीं था तो बहुत कठिन भी नहीं था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुहम्मद गौरी ने भारत के समस्त मुस्लिम अमीरों के राज्य छीन लिए (33)

0
मुहम्मद गौरी - www.bharatkaitihas.com
मुहम्मद गौरी ने भारत के समस्त मुस्लिम अमीरों के राज्य छीन लिए

जिस समय मुहम्मद गौरी ने भारत की ओर रुख किया, भारत राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से बिखरा हुआ था। यद्यपि महमूद गजनवी भारत की आर्थिक सम्पदा को बड़े स्तर पर लूटने में सफल रहा था तथापि उसने जो कुछ भी लूटा था, वह भारत की समृद्धि का शतांश भी नहीं था, सहस्रांश भी नहीं था।

सिंधु और सरस्वती से लेकर रावी, व्यास, चिनाब, झेलम, गंगा, यमुना, गोमती, नर्मदा, कृष्णा और कावेरी जैसी सैंकड़ों नदियां युगों-युगों से भारत भूमि को सम्पन्न बना रही थीं। अकेले महमूद के वश की बात नहीं थी कि वह भारत की उस अपार सम्पदा को लूट ले।

यदि रावी से हिन्दूकुश पर्वत तक का वह क्षेत्र जो गजनी के मुसलमानों के अधीन चला गया था, उसे छोड़ दें तो शेष भारत में कृषि, शिल्प, उद्योग एवं व्यापार पहले की ही तरह उन्नत अवस्था में थे। जन-साधारण सुखी था और राजवंश धनी थे। मुहम्मद गौरी की दृष्टि इन हिन्दू राज्यों एवं हिन्दू प्रजा पर गढ़ी हुई थी किंतु भारत के हिन्दुओं पर हाथ डालने से पहले उसने मुल्तान तथा सिंध क्षेत्र के मुस्लिम अमीरों के राज्य छीनने का निश्चय किया।

मुहम्मद गौरी का भारत पर पहला आक्रमण ई.1175 में मुल्तान पर हुआ। मुल्तान पर उस समय शिया मुसलमान करमाथियों का शासन था। गौरी ने करमाथियों को परास्त करके मुल्तान पर अधिकार कर लिया। उसी वर्ष गौरी ने ऊपरी सिंध के कच्छ क्षेत्र पर आक्रमण किया तथा उसे अपने अधिकार में ले लिया।

कुछ मुस्लिम ग्रंथों में लिखा है कि उस काल में सिंध क्षेत्र में स्थित ‘उच’ में एक भाटी राजा राज्य करता था। मुहम्मद शिहाबुद्दीन गौरी ने उसकी रानी को प्रलोभन देकर अपनी तरफ मिला लिया। उस रानी ने अपने पति को विष देकर मार डाला तथा किले पर मुहम्मद शिहाबुद्दीन गौरी का अधिकार करवा दिया। आधुनिक शोधों से यह सिद्ध हो चुका है कि बारहवीं शताब्दी ईस्वी में सिंध के रेगिस्तान में स्थित ‘उच’ नामक स्थान पर किसी भी भाटी शासक का शासन नहीं था। उस समय यह किला एक करमाथी मुसलमान के अधीन था। अतः यह पूरी घटना ही मनगढ़ंत है।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

सिंध पर आक्रमण के बाद पूरे 7 साल तक मुहम्मद भारत से दूर रहा। संभवतः इस अवधि में वह ख्वाज्मि के बादशाह से लड़ने में व्यस्त रहा। उससे निबटने के बाद ई.1182 में मुहम्मद ने एक बार फिर से भारत की ओर रुख किया तथा निचले सिंध क्षेत्र पर आक्रमण किया। उन दिनों निचले सिंध में देवल का राज्य स्थित था जिस पर शिया सम्प्रदाय के ‘सुम्र’ मुसलमान शासन करते थे। इन्हीं सुम्र मुसलमानों को ढोला-मारू की कथा में ‘सुमरा’ कहा गया है। मुहम्मद गौरी ने सुमरा मुसलमानों को अपनी अधीनता स्वीकार करने पर विवश किया।

मुहम्मद गौरी का अगला आक्रमण ई.1178 में गुजरात के चौलुक्य राज्य पर हुआ जो उस समय एक धनी राज्य था। गुजरात पर इस समय मूलराज (द्वितीय) शासन कर रहा था। उसकी राजधानी अन्हिलवाड़ा थी। चौलुक्यों ने कुछ ही साल पहले मालवा के परमारों एवं चित्तौड़ के गुहिलों से उनके राज्य के अधिकांश भाग छीनकर अपनी शक्ति बहुत बढ़ा ली थी।

To purchase this book, please click on photo.

मुहम्मद गौरी मुल्तान, कच्छ और पश्चिमी राजपूताना में होकर आबू के निकट पहुंचा। वहाँ कयाद्रा गांव के निकट मूलराज (द्वितीय) की सेना से उसका युद्ध हुआ। इस युद्ध में गौरी बुरी तरह परास्त होकर अपनी जान बचाकर भाग गया। यह भारत में उसकी पहली पराजय थी। गुजरात में मिली पराजय से मुहम्मद गौरी इतना आतंकित हो गया कि अगले बीस साल तक उसने गुजरात पर आक्रमण करने की हिम्मत नहीं की। गुजरात में पराजय का स्वाद चखने के बाद गौरी ने स्वयं को पंजाब पर केन्द्रित करने का निश्चय किया तथा ई.1179 में पेशावर पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया। उसके दो साल बाद ई.1181 में गौरी ने लाहौर पर आक्रमण किया। उन दिनों गजनी का पूर्व शासक खुसरव शाह लाहौर में निवास करता था। खुसरव शाह ने मुहम्मद गौरी को विपुल धन देकर उससे संधि कर ली तथा अपना पुत्र जमानत के तौर पर शिहाबुद्दीन गौरी की सेवा में भेज दिया। ई.1185 में गौरी ने पंजाब पर तीसरा आक्रमण किया तथा सियालकोट तक का प्रदेश जीत लिया। उसने सियालकोट दुर्ग पर अधिकार करके उसकी मरम्मत करवाई तथा आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों को लूटकर अपनी शक्ति का परिचय दिया।

इस पर लाहौर के शासक खुसरव शाह ने नमक की पहाड़ियों के निकट रहने वाली खोखर जाति से मित्रता कर ली। खोखर उन दिनों हिन्दू हुआ करते थे। वे बड़े वीर एवं युद्धप्रिय लोग थे। वर्तमान समय में उत्तरी भारत में खोखर जाट एवं खोखर राजपूत पाए जाते हैं। हरियाणा की तरफ के खोखर जाट हैं जबकि राजस्थान की तरफ के खोखर राजपूत हैं। राजस्थान में हजारों खोखर मुसलमान भी निवास करते हैं।

जिस समय गौरी ने सियालकोट पर आक्रमण किया, उस समय खोखरों तथा जम्मू के राजा चक्रदेव के बीच शत्रुता चल रही थी। अतः खोखरों ने खुसरव शाह से दोस्ती का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

खुसरव शाह तथा खोखरों की सम्मिलित सेना ने सियालकोट को घेर लिया किंतु मुहम्मद गौरी की सेना ने खुसरव शाह तथा खोखरों की सेना को मार भगाया। इस पर ई.1186 में मुहम्मद गौरी ने पुनः लाहौर पर आक्रमण किया। मुहम्मद गौरी ने जम्मू के राजा चक्रदेव के पास मित्रता का प्रस्ताव भेजा। चूंकि जम्मू घाटी में रहने वाले खोखर जो कि चक्रदेव के शत्रु थे, खुसरव शाह से मिल गए, इसलिए चक्रदेव ने मुहम्मद गौरी से मित्रता करने में भलाई समझी तथा उसने अपनी एक सेना मुहम्मद गौरी की सहायता के लिए भेज दी।

जब मुहम्मद गौरी लाहौर के निकट पहुंचा तो उसने लाहौर के शासक खुसरव शाह को संधि करने के बहाने अपने शिविर में आमंत्रित किया। जब खुसरव शाह मुहम्मद गौरी के शिविर में गया तो मुहम्मद गौरी ने छल से उसे बंदी बना लिया तथा ‘गरजिस्तान’ नामक स्थान पर एक दुर्ग में बंद कर दिया। ‘गरजिस्तान’ को आजकल ‘गिलगिस्तान’ कहते हैं। पूरे छः साल तक खुसरव शाह को इस दुर्ग में बंदी रखा गया। ई.1192 में मुहम्मद गौरी की आज्ञा से उसकी हत्या कर दी गई।

इस प्रकार भारत के समस्त मुस्लिम अमीरों के राज्य मुहम्मद शिहाबुद्दीन गौरी के अधीन आ गए। मुहम्मद ने उनके स्थान पर अपने गुलामों को वहाँ का शासक नियुक्त किया। ये मुस्लिम राज्य मुहम्मद के लिए भारत में आधार शिविर का कार्य करने लगे जहाँ से वह अपने आगे के अभियान चला सकता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पराजय की पीड़ा छिपाने का प्रयास किया भारतीयों ने (34)

0
पराजय की पीड़ा - www.bharatkaitihas.com
पराजय की पीड़ा छिपाने का प्रयास किया भारतीयों ने

पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी के बीच 21 लड़ाइयां हुईं जिनमें चौहान विजयी रहे। स्पष्ट है कि भारतीयों ने झूठ बोलकर पराजय की पीड़ा छिपाने का प्रयास किया!

मुहम्मद गौरी ने भारत में अपना रास्ता साफ करने के लिए हिन्दू राजाओं पर हाथ डालने से पहले भारत में स्थित मुस्लिम अमीरों के राज्य छीन लिए। करमाथी मुसलमानों, सुमरा मुसलमानों तथा लाहौर के गजनवियों का सफाया करने के बाद मुहम्मद गौरी मुल्तान, सिंध तथा पंजाब क्षेत्र का स्वामी बन गया।

पंजाब पर अधिकार कर लेने से मुहम्मद गौरी के क्षेत्र की सीमा दिल्ली एवं अजमेर के चौहान साम्राज्य से जा लगी। इस समय सोमेश्वर का पुत्र पृथ्वीराज (तृतीय) चौहानों का राजा था। भारत के इतिहास में उसे पृथ्वीराज चौहान तथा रायपिथौरा कहा जाता है। वह ई.1179 में केवल 11 वर्ष की आयु में सम्राट बना था।

ई.1175 से मुहम्मद गौरी भारत पर निरंतर आक्रमण कर रहा था किंतु पृथ्वीराज चौहान ने उसकी ओर ध्यान न देकर, अपने साम्राज्य की सीमाओं पर स्थित हिन्दू राजाओं का दमन करके अपने राज्य का विस्तार करने में लगा रहा। पृथ्वीराज ने नागों, भण्डानकों तथा चंदेलों का दमन किया। पृथ्वीराज ने गहड़वालों की राजकुमारी संयोगिता का अपहरण करके उन्हें अपना शत्रु बना लिया तथा गुजरात के चौलुक्यों से अपने वंशानुगत झगड़े को चरम पर पहुंचा दिया।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

उस काल में अजमेर के चौहानों की ही तरह अन्हिलवाड़ा के चौलुक्य भी परमारों तथा गुहिलों के राज्यों को क्षति पहुंचाकर अपना क्षेत्र बढ़ाने में लगे हुए थे। इन समस्त युद्धों के परिणाम स्वरूप चौहानों तथा चौलुक्यों के राज्य तो दूर-दूर तक फैल गए किंतु हिन्दू वीरों की भयानक क्षति होने से राष्ट्र दुर्बल हो गया। सम्राट पृथ्वीराज चौहान यद्यपि वीर, शक्तिशाली एवं युद्ध-प्रिय राजा था तथापि वह इस बात को समझने में विफल रहा कि मुहम्मद गौरी के रूप में कितनी भयानक विपत्ति देश एवं धर्म के समक्ष मुँह बाए खड़ी है।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

राजा पृथ्वीराज चौहान ने हिन्दू राजाओं का संगठन खड़ा करने की बजाय उनसे शत्रुता बढ़ाने का अदूरदर्शी कार्य किया। यह अदूरदर्शिता हजारों साल से भारत वर्ष के राजाओं में चली आ रही थी। वे रक्त-रंजित युद्धों के माध्यम से अपने-अपने राज्य का प्रसार करते थे किंतु इस प्रयास में अपनी सेना, हिन्दू धर्म एवं भारत राष्ट्र की अजेय शक्ति का क्षय करते थे। जब पृथ्वीराज चौहान का राज्य अजमेर से बढ़कर दिल्ली होता हुआ पंजाब के भटिण्डा, सरहिंद तथा उसके आगे के क्षेत्रों में भी फैल गया तो मुहम्मद गौरी की सीमाएं उसके राज्य तक आ पहुँचीं। पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी के बीच 21 लड़ाइयां हुईं जिनमें चौहान विजयी रहे। हम्मीर महाकाव्य ने पृथ्वीराज द्वारा 7 बार गौरी को परास्त किया जाना लिखा है। पृथ्वीराज प्रबन्ध 8 बार हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष का उल्लेख करता है। प्रबन्ध कोष का लेखक 20 बार गौरी को पृथ्वीराज द्वारा कैद करके मुक्त करना बताता है। सुर्जन चरित्र में 21 बार और प्रबन्ध चिन्तामणि में 23 बार गौरी का हारना अंकित है। इस प्रकार भारतीय लेखक झूठ पर झूठ बोलते रहे और पराजय की पीड़ा छिपाने के लिए मुहम्मद गौरी की काल्पनिक पराजयों को अपनी पुस्तकों में अंकित करते रहे।

पराजय की पीड़ा छिपाने का यह प्रयास ठीक वैसा ही था जिस प्रकार कबूतर बिल्ली पर अपनी विजयों के दावे करता रहे और बिल्ली आकर कबूतर को दबोच ले! झूठ बोलकर न पराजय छिपाई जा सकती है और न पराजय की पीड़ा!

इस बात में कोई संदेह नहीं कि मुहम्मद गौरी तथा पृथ्वीराज चौहान की सेनाओं के बीच चौहान साम्राज्य की सीमाओं पर कई बार झड़पें हुई होंगी जिनमें मुहम्मद गौरी की सेनाएं हारी होंगी किंतु प्रबंध कोष द्वारा यह लिखना कि पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद गौरी को इक्कीस बार कैद करके मुक्त किया, अत्यंत ही संदेहास्पद जान पड़ता है।

अपने शत्रु को 20 बार कैद करके मुक्त किया जाना जाना सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक दोनों ही दृष्टि से गलत एवं हास्यास्पद प्रतीत होता है। अब तक प्राप्त विश्वसनीय उल्लेखों के अनुसार ई.1189 में मुहम्मद गौरी ने पहली बार पृथ्वीराज चौहान के राज्य में प्रवेश किया तथा भटिण्डा के दुर्ग पर अधिकार कर लिया।

भटिण्डा का दुर्ग पृथ्वीराज (द्वितीय) के समय से अजमेर राज्य के अधीन था किंतु पृथ्वीराज (तृतीय) ने दुर्ग के छिन जाने पर भी मुहम्मद गौरी के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की। संभवतः पृथ्वीराज चौहान उस समय किसी अन्य अभियान में व्यस्त था।

मुहम्मद गौरी ने भटिण्डा दुर्ग में जियाउद्दीन नामक एक काजी को दुर्गपति नियुक्त कर दिया। इस प्रकार चौहानों के विरुद्ध यह पहला हमला था जिसमें मुहम्मद गौरी ने विजय प्राप्त की थी। यह हमला धोखे से किया गया था तथा मुहम्मद गौरी इस विजय के उपरांत भी यह समझता था कि चौहानों की वास्तविक शक्ति इतनी अधिक है कि मुहम्मद गौरी के लिए यह संभव नहीं है कि वह भटिण्डा से आगे बढ़कर दिल्ली या अजमेर तक पहुंच सके। अतः वह वापस गजनी लौट गया।       

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजा धीर पुण्ढीर ने मुहम्मद गौरी को जीवित ही पकड़ लिया (35)

0
राजा धीर पुण्ढीर - www.bharatkaitihas.com
राजा धीर पुण्ढीर ने मुहम्मद गौरी को जीवित ही पकड़ लिया

कवि चंद बरदाई ने पृथ्वीराज रासो में लिखा है कि राजा धीर पुण्ढीर ने मुहम्मद गौरी को पकड़ लिया। कवि चंद बरदाई ने यह भी लिखा है कि पृथ्वीराज ने हाथी, घोड़े एवं स्वर्ण लेकर मुहम्मद गौरी को मुक्त कर दिया।

ई.1189 में मुहम्मद गौरी ने भटिण्डा दुर्ग पर आक्रमण करके उस पर छल-पूर्वक अधिकार कर लिया। यह दुर्ग पृथ्वीराज चौहान के अधीन था। पृथ्वीराज चौहान ने उस समय कोई कार्यवाही नहीं की।

वह संभवतः किसी अन्य अभियान में संलग्न था। ई.1191 में मुहम्मद गौरी ने भारत पर पुनः आक्रमण किया तथा पंजाब में स्थित सरहिंद के दुर्ग पर भी अधिकार कर लिया। इस पर पृथ्वीराज चौहान की सेनाओं ने करनाल जिले में स्थित तराइन के मैदान में मुहम्मद गौरी का रास्ता रोका।

यह लड़ाई भारत के इतिहास में ‘तराइन की पहली लड़ाई’ के नाम से प्रसिद्ध है। युद्ध के मैदान में गौरी का सामना दिल्ली के राजा गोविंदराय तोमर से हुआ जो पृथ्वीराज चौहान के अधीन सामंत था तथा पृथ्वीराज का निकट सम्बन्धी भी था।

इस युद्ध के सम्बन्ध में अलग-अलग और विरोधाभासी तथ्य मिलते हैं। हिन्दू ग्रंथों एवं मुस्लिम ग्रंथों के विवरणों में काफी अंतर है। कुछ मुस्लिम ग्रंथों के अनुसार जब युद्ध क्षेत्र में पृथ्वीराज चौहान की सेना भारी पड़ने लगी तो मुहम्मद गौरी की सेना युद्ध के मैदान से भाग छूटी।

सेना को भागते हुए देखकर मुहम्मद गौरी राजपूत सेना के हरावल को चीरता हुआ गोविंदराज तक जा पहुंचा तथा अपना घोड़ा उस पर कुदा कर भाले से वार कर दिया जिससे राजा गोविंदराज के दो दांत टूट गए। इस पर गोविंदराज ने सांग फैंकी जिससे गौरी की बांह में घाव हो गया। 

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

‘तबकात ए नासिरी’ में लिखा है कि राजा गोविंदराज के वार से मुहम्मद गौरी घायल होकर घोड़े से गिर गया और अत्यधिक रक्त बह जाने से बेसुध हो गया। तबकात ए नासिरी की अलग-अलग प्रतियों में मिले वर्णनों में भी अंतर है। इस ग्रंथ की एक प्रति में कहा गया है कि मुहम्मद को घायल हुआ देखकर एक खिलजी नवयुवक फुर्ती से मुहम्मद के घोड़े पर सवार होकर गौरी को युद्ध के मैदान से बाहर ले गया।

एक अन्य ग्रंथ में लिखा है कि खिलजी सैनिक सुल्तान को अपने घोड़े पर बैठाकर बाहर ले गया। एक अन्य ग्रंथ में लिखा है कि खिलजी सैनिक अपने सुल्तान को युद्ध के मैदान से घसीटते हुए बाहर खींच ले गया।

To purchase this book, please click on photo.

‘तबकात ए नासिरी’ की एक अन्य प्रति में लिखा है कि जब यवन सेना भागकर सुरक्षित स्थान पर पहुंची और उसने सुल्तान को अपने साथ नहीं पाया तो वह विलाप करने लगी। ‘जैन उल मासरी’ नामक ग्रंथ में लिखा है कि मुहम्मद गौरी को उसकी सेना ने गिरते हुए नहीं देखा इसलिए कोई भी गौरी की सहायता के लिए नहीं पहुंचा। रात भर गौरी युद्ध के मैदान में बेसुध पड़ा रहा। बाद में तुर्की गुलाम आए और उठाकर ले गए। इन समस्त वृत्तांतों पर यदि विचार किया जाए तो ऐसा लगता है कि मुहम्मद गौरी युद्ध में घायल हुआ था और उसकी सेना युद्ध के मैदान छोड़कर भाग गई थी। एक खिलजी सैनिक द्वारा मुहम्मद को पृथ्वीराज की सेना के बीच में से लेकर निकल भागने की संभवना बहुत ही क्षीण है। अवश्य ही मुहम्मद गौरी पकड़ा गया होगा, जैसा कि हिन्दू ग्रंथ लिखते हैं। कवि चंद बरदाई ने पृथ्वीराज रासो में लिखा है कि राजा धीर पुण्ढीर ने मुहम्मद गौरी को पकड़ लिया। कवि चंद बरदाई ने यह भी लिखा है कि पृथ्वीराज ने हाथी, घोड़े एवं स्वर्ण लेकर मुहम्मद गौरी को मुक्त कर दिया। प्रबंध कोष कहता है कि पृथ्वीराज ने गौरी को पकड़ कर छोड़ दिया। प्रबंध चिंतामणि भी इसकी पुष्टि करता है। हम्मीर महाकाव्य में लिखा है कि गौरी के क्षमा-याचना करने पर पृथ्वीराज ने दया करके उसे छोड़ दिया।

कुछ जैन ग्रंथों में लिखा है कि अपनी माता कर्पूरदेवी के कहने पर पृथ्वीराज ने मुहम्मद गौरी को मुक्त कर दिया। फरिश्ता ने लिखा है कि राजपूतों ने गौरी की भागती हुई सेना का चालीस मील तक पीछा किया। मुहम्मद गौरी बुरी तरह भयभीत हो गया फिर भी लाहौर तक पहुंच गया। लाहौर में उसने अपने घावों का उपचार करवाया। इसके पश्चात् वह गजनी लौट गया। मिनहाज उस् सिराज लिखता है कि विजय के बाद राजपूत सेना पृथ्वीराज के नेतृत्व में आगे बढ़ी और तबरहिंद अर्थात् सरहिंद के किले पर पुनः अधिकार कर लिया जिसे शहाबुद्दीन ने राजपूतों से छीना था।

तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकार जमीउल हिकायत और हसन निजामी तराइन के प्रथम युद्ध का उल्लेख नहीं करते हैं, इससे स्पष्ट होता है कि इस युद्ध में मुहम्मद गौरी को पराजय के साथ-साथ अत्यंत शर्मिंदगी भी उठानी पड़ी थी। जब सम्राट पृथ्वीराज की सेना ने आगे बढ़कर तबरहिंद का दुर्ग घेर लिया तो मुहम्मद गौरी के अमीर काजी जियाउद्दीन ने चौहन सेना का डटकर मुकाबला किया तथा 13 महीने तक हिन्दुओं को दुर्ग में नहीं घुसने दिया।

अंत में हिन्दुओं ने दुर्ग पर अधिकार कर लिया तथा काजी जियाउद्दीन को पकड़कर अजमेर लाया गया। काजी ने पृथ्वीराज के मंत्रियों के समक्ष प्रस्ताव रखा कि यदि उसे मुक्त करके गजनी जाने की अनुमति दी जाए तो वह सम्राट को विपुल धन प्रदान करेगा। काजी का यह अनुरोध स्वीकार कर लिया गया तथा उससे धन लेकर उसे गजनी जाने की अनुमति दे दी गई।

इसमें कोई संदेह प्रतीत नहीं होता कि तराइन की पहली लड़ाई में राजा धीर पुण्ढीर ने मुहम्मद गौरी को जीवित ही पकड़ लिया था किंतु मुहम्मद गौरी द्वारा क्षमा याचना किए जाने पर पृथ्वीराज चौहान ने उसे जीवित ही छोड़ दिया था। इसी प्रकार काजी जियाउद्दीन भी पकड़कर अजमेर लाया गया होगा और दण्डराशि लेकर जीवित ही छोड़ दिया गया होगा!

संभवतः इन्हीं दो घटनाओं को पृथ्वीराज रासो, हम्मीर महाकाव्य, पृथ्वीराज प्रबन्ध, सुर्जन चरित्र तथा प्रबन्ध चिन्तामणि आदि ग्रंथों में पृथ्वीराज चौहान द्वारा मुहम्मद गौरी को अनेक बार परास्त करके बंदी बनाए जाने एवं क्षमा करके मुक्त किए जाने जैसी बातें लिखी हैं। इनमें से पहले घटना तराइन के प्रथम युद्ध में मुहम्मद को बंदी बनाए जाने की है तथा दूसरी घटना सरहिंद के दुर्ग में काजी को बंदी बनाए जाने की है।

भारतीय इतिहासकारों ने पृथ्वीराज द्वारा मुहम्मद गौरी को 20-21 बार हराने और बंदी बनाकर छोड़ने जैसी बातें लिखकर इस पूरे प्रकरण को संदेहास्पद बना दिया। कोई युद्धनीति यह नहीं कहती कि शत्रु को तब तक बंदी बनाकर मुक्त करते रहो जब तक कि वह तुम्हें ही पकड़ कर नहीं मार डाले! न पृथ्वीराज ने ऐसा किया होगा!

यह मिथक पृथ्वीराज रासो नामक ग्रंथ की उपज है जिसे बाद में अन्य हिन्दू लेखकों ने भी बढ़ा-चढ़ा कर लिख दिया क्योंकि पृथ्वीराज रासो पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी के बीच 21 लड़ाइयों का उल्लेख करता है जिनमें चौहान विजयी रहे किंतु वह पृथ्वीराज द्वारा मुहम्मद गौरी को केवल एक बार बंदी बनाए जाने का उल्लेख करता है। इस प्रकार के मिथ्या वर्णनों के कारण राजा धीर पुण्ढीर जैसे महान् वीरों की वीरता समाज के सामने नहीं आ पाती!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पृथ्वीराज चौहान के मंत्री और सेनापति मुहम्मद गौरी से मिल गए (36)

0
पृथ्वीराज चौहान के मंत्री - www.bharatkaitihas.com
पृथ्वीराज चौहान के मंत्री और सेनापति मुहम्मद गौरी से मिल गए

ऐतिहासिक तथ्य इस कड़वी सच्चाई की पुष्टि करते हैं कि पृथ्वीराज चौहान के मंत्री और सेनापति मुहम्मद गौरी से मिल गए जिनके कारण पृथ्वीराज चौहान तराइन की दूसरी लड़ाई हार गया।

मुहम्मद गौरी तराइन के युद्ध में घायल होकर राजा धीर पुण्ढीर के हाथों पकड़ लिया गया तथा सम्राट पृथ्वीराज चौहान को विपुल धन देकर बंदीगृह से छूट गया तथा फिर से गजनी चला गया। गजनी पहुँचने के बाद पूरे एक साल तक मुहम्मद गौरी अपनी सेना में वृद्धि करता रहा। जब उसकी सेना में 1,20,000 सैनिक जमा हो गए तो ई.1192 में वह पुनः सम्राट पृथ्वीराज चौहान से लड़ने के लिए भारत की ओर चल दिया।

‘तबकात ए नासिरी’ नामक ग्रंथ के अनुसार शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी को कन्नौज तथा जम्मू के राजाओं द्वारा सैन्य सहायता भी उपलब्ध करवाई गई किंतु किसी भी समकालीन इतिहास ग्रंथ में तराइन के द्वितीय युद्ध में राजा जयचन्द गाहड़वाल की किसी भी तरह की भूमिका के बारे में कोई उल्लेख नहीं है। यहाँ तक कि मुहम्मद गौरी के दरबारी लेखक हसन निजामी ने भी अपने ग्रंथों में इस बात का कोई उल्लेख नहीं किया है।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

बीसवीं शताब्दी ईस्वी में अजमेर का इतिहास लिखने वाले लेखक हर बिलास शारदा ने तबकात ए नासिरी नामक ग्रंथ के आधार पर लिखा है कि कन्नौज के राठौड़ों तथा गुजरात के सोलंकियों ने एक साथ षड़यंत्र करके पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिए शहाबुद्दीन को आमंत्रित किया। वस्तुतः हर बिलास शारदा ने यहाँ एक साथ कई गलतियां की हैं। कन्नौज के शासक राठौड़ नहीं थे, गाहड़वाल थे। दूसरी गलती यह कि कन्नौज की सेना इस युद्ध से पूरी तरह दूर रही। ऐसी स्थिति में मुहम्मद गौरी को पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण करने हेतु आमंत्रित करने वाली बात कैसे स्वीकार की जा सकती है!

तीसरी गलती यह है कि शारदा ने गुजरात के सोलंकियों को भी इस षड़यंत्र में शामिल कर लिया है। गुजरात के सोलंकी तो ई.1178 में ही मुहम्मद गौरी को पीटकर भगा चुके थे तथा उसके बाद से मुहम्मद ने गुजरात की बजाय पंजाब पर अपना ध्यान केन्द्रित कर लिया था। ऐसी स्थिति में गुजरात के चौलुक्यों को क्या आवश्यकता थी कि वे मुहम्मद के साथ षड़यंत्र में सम्मिलित होते!

चौथी गलती यह कि जब गुजरात के चौलुक्यों ने इस युद्ध में भाग ही नहीं लिया तो उनके द्वारा गौरी को आमंत्रित करने की बात कैसे स्वीकार की जा सकती है? पांचवी गलती यह कि जब मुहम्मद गौरी लगभग प्रतिवर्ष भारत पर आक्रमण कर रहा था, तब इस आक्रमण के लिए उसे कन्नौज द्वारा आमंत्रित किए जाने की क्या आवश्यकता आन पड़ी थी!

To purchase this book, please click on photo.

वस्तुतः तबकात ए नासिरी का लेखक मिनहाजुद्दीन सिराज, मुहम्मद गौरी की मृत्यु के बाद दिल्ली में स्थापित दिल्ली सल्तनत के अधीन दिल्ली का शहर-काजी था, उसने दिल्ली के सुल्तानों को खुश करने के लिए अपने ग्रंथ में यह मिथ्या बात लिखी। काजी मिनहाजुद्दीन सिराज की बात का विश्वास नहीं किया जा सकता क्योंकि इसकी पुष्टि किसी भी समकालीन स्रोत से नहीं होती है किंतु दुर्भाग्य से हर बिलास शारदा ने इसे अपने ग्रंथ में उद्धृत कर दिया और तभी से भारत में ये धारणाएं प्रचलित हो गईं कि कन्नौज का राजा राठौड़ था और उसने देश के साथ गद्दारी करके मुहम्मद गौरी को देश पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया था। वस्तुतः सम्राट उसे धोखा कन्नौज या गुजरात के शासकों ने नहीं दिया था, उसे धोखा पृथ्वीराज चौहान के मंत्री एवं सेनापतियों ने दिया था जो सम्राट पृथ्वीराज से नाराज थे। जब मुहम्मद गौरी लाहौर पहुँचा तो उसने किवाम उल मुल्क को अपने दूत के रूप में अजमेर भेजकर सम्राट पृथ्वीराज से कहलवाया कि वह इस्लाम स्वीकार कर ले और गौरी की अधीनता मान ले। पृथ्वीराज ने गौरी को प्रत्युत्तर भिजवाया कि वह गजनी लौट जाए अन्यथा युद्ध-क्षेत्र में भेंट करने के लिए तैयार रहे।

मुहम्मद गौरी, पृथ्वीराज को छल से जीतना चाहता था। इसलिए गौरी ने अपना दूत दुबारा अजमेर भेजकर कहलवाया कि मैं युद्ध की अपेक्षा सन्धि को अच्छा मानता हूँ, इसलिए मैंने एक दूत अपने भाई के पास गजनी भेजा है। ज्योंही गजनी से आदेश प्राप्त हो जाएंगे, मैं स्वदेश लौट जाऊंगा तथा पंजाब, मुल्तान एवं सरहिंद को लेकर संतुष्ट हो जाऊँगा।

इस संधि वार्त्ता ने पृथ्वीराज को भ्रम में डाल दिया। फिर भी पृथ्वीराज कोई संकट मोल नहीं लेना चाहता था इसलिए वह स्वयं सेना लेकर तराइन पहुंचा। सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी के लेखक फरिश्ता ने लिखा है कि राजा पृथ्वीराज अपने साथ पांच लाख घुड़सवार तथा तीन हजार हाथी लेकर युद्ध के मैदान में पहुंचा। यह संख्या बहुत अधिक है, इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

विभिन्न लेखकों के अनुसार उस समय सम्राट के पास बहुत कम सेना थी। अधिकतर सेना पृथ्वीराज चौहान के मंत्री स्कंद के साथ थी किंतु वह सम्राट के साथ युद्धक्षेत्र में नहीं जा सकी। इस पर राजा पृथ्वीराज अपने साथ उपलब्ध सेना को लेकर तराइन की ओर बढ़ा।

पृथ्वीराज का दूसरा सेनाध्यक्ष उदयराज भी समय पर अजमेर से रवाना नहीं हो सका। पृथ्वीराज चौहान के मंत्री सोमेश्वर ने इस युद्ध का विरोध किया था और कुछ समय पूर्व ही पृथ्वीराज द्वारा दण्डित किया गया था, वह अजमेर से रवाना होकर शत्रु से जा मिला।

जब राजा पृथ्वीराज की सेना तराइन के मैदान में पहुँची तो भी संधिवार्त्ता के भुलावे में पड़ी रही। उधर मुहम्मद गौरी ने अपनी सेना के पांच भाग किए। चार भागों को भारतीय सेना पर चारों ओर से आक्रमण करने का काम सौंपा गया तथा एक बड़ा हिस्सा आरक्षित रखा गया ताकि संकट के समय काम आ सके अथवा पृथ्वीराज की भागती हुई सेना की हत्या कर सके।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पृथ्वीराज चौहान का शिविर बूचड़खाने में बदल दिया मुहम्मद गौरी ने (37)

0
पृथ्वीराज चौहान का शिविर - www.bharatkaitihas.com
पृथ्वीराज चौहान का शिविर बूचड़खाने में बदल दिया मुहम्मद गौरी ने

तराइन की दूसरी लड़ाई में जिस समय हिन्दू सेना इस विश्वास के साथ अपने शिविर में रात्रि विश्राम कर रही थी कि संधि हो चुकी है और अब युद्ध नहीं होगा, उस समय मुहम्मद गौरी ने अचानक ही हमला करके हिन्दू सैनिकों को काट दिया और पृथ्वीराज चौहान का शिविर बूचड़खाने में बदल दिया।

मुहम्मद गौरी द्वारा संधिवार्त्ता का भुलावा देने पर भी पृथ्वीराज चौहान अपनी सेना लेकर तराइन के मैदान में आ गया। यद्यपि चौहान सम्राट के साथ बहुत कम सेना युद्धक्षेत्र में पहुंची थी तथापि मुहम्मद गौरी जानता था कि यदि सम्मुख युद्ध होता है तो यह हिन्दू सेना मुहम्मद गौरी की सेना पर भारी पड़ेगी। इसलिए मुहम्मद गौरी ने कई प्रकार के छल रचे तथा पृथ्वीराज के कुछ मंत्रियों एवं सेनापतियों को अपनी ओर मिला लिया जिनका विवरण हम पिछले आलेख में कर चुके हैं।

मुहम्मद गौरी के समकालीन लेखक हसन निजामी की पुस्तक ‘ताजुल मासिर’ को इस युद्ध का आँखों देखा हाल माना जा सकता है क्योंकि वह स्वयं मुहम्मद गौरी के साथ था किंतु आधुनिक शोधों से स्पष्ट हो चुका है कि हसन निजामी निष्पक्ष नहीं था। उसने तथ्यों एवं घटनाओं को बहुत तोड़-मरोड़कर एवं बढ़ा-चढ़ाकर लिखा है।

चंदबरदाई के ग्रंथ ‘पृथ्वीराज रासो’ को भी आँखों देखा हाल माना जा सकता है क्योंकि इसका लेखक युद्धक्षेत्र में पृथ्वीराज के साथ था किंतु इस पुस्तक में बाद में इतना अधिक लेखन जोड़ दिया गया कि पुस्तक का मूल स्वरूप लुप्त हो गया तथा अनेक भ्रामक बातें इतिहास बनकर खड़ी हो गईं।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

‘विविध तीर्थ कल्प’ आदि ग्रंथों में जैन लेखकों ने जो विवरण लिखे हैं वे भी इन्हीं दो पुस्तकों के आधार पर लिखे गए हैं क्योंकि उनमें से कोई भी समकालीन नहीं था। उदाहरण के लिए ‘विविध तीर्थ कल्प’ का लेखक जिनप्रभ सूरी चौदहवीं शताब्दी ईस्वी के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के समकालीन था।

सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध लेखक फरिश्ता ने लिखा है कि पृथ्वीराज की सेना सरस्वती नदी के एक ओर आकर बैठ गई। इसके बाद मुहम्मद अपनी छोटी सेना लेकर आया तथा नदी के दूसरी ओर खेमा गाढ़कर बैठ गया। उसकी मुख्य सेना पीछे थी जिसे पृथ्वीराज की सेना देख नहीं सकी और यह सोचकर आनंदित होती रही कि दुश्मन की सेना बहुत छोटी है।

फरिश्ता लिखता है कि जब दोनों सेनाएं कुछ दूरी पर आमने-सामने खेमाजन हुईं तब राजपूतों ने गौरी को धमकाते हुए कुछ दूत भेजे। उन दूतों ने गौरी को यह संदेश सुनाया कि यदि वह गजनी लौट जाता है तो वे लोग उसे बिना नुक्सान पहुंचाए लौट जाने देंगे और यदि वह युद्ध करना चाहता है तो उसे तथा उसकी सेना को समूल नष्ट कर दिया जाएगा।

फरिश्ता लिखता है कि गौरी ने जवाब दिया- ‘मैं अपनी मर्जी से नहीं आया हूँ, अपितु अपने सुल्तान भाई की आज्ञा से आया हूँ। मैं तो सिर्फ सेनापति हूँ, मालिक तो वही है। यद्यपि मैं बहुत कष्ट और परेशानी उठाकर गजनी से यहाँ पहुंचा हूँ फिर भी आप लोगों की नेक सलाह मानते हुए आप लोगों से कुछ वक्त मांगता हूँ। आप लोगों की तरह मैं खुद चाहता हूँ कि हमारे बीच सुलह-सफाई हो जाए। सरहिन्द और मुल्तान मेरा तथा बाकी हिस्सा आपका। मैं इसी काम की खातिर एक सफीर अपने भाई के पास फीरोजकोह भेज रहा हूँ। इसलिए जब तक वह सफीर फीरोजकोह से वापस यहाँ लौट कर न आ जाए, तब तक जंग-बंदी रहे।’

To purchase this book, please click on photo.

हिन्दू सेनापति मुहम्मद गौरी की कूटनीतिक भाषा को समझ नहीं सके और इसे इस्लामी सेना की दुर्बलता समझकर राग-रंग एवं नाच-गाने में डूब गए। मुहम्मद गौरी ने हिन्दू सैनिकों को भ्रम में डाले रखने के लिए अपने शिविर में रात भर आग जलाए रखी और अपने सैनिकों को शत्रुदल के चारों ओर घेरा डालने के लिए रवाना कर दिया। मिनहाज उस् सिराज ने लिखा है कि मुहम्मद ने अपनी मुख्य सेना को अपने पीछे रखा जिसके पास हाथी, झण्डे तथा शामियाने थे। जबकि दस-दस हजार घुड़सवारों के चार दल बनाकर काफिरों की सेना के चारों ओर अलग-अलग दिशाओं से भेज दिए। इन घुड़सवारों के पास हल्के हथियार थे।  ज्योंही प्रभात हुआ, तुर्कों ने अजमेर की सेना पर चारों ओर से आक्रमण कर दिया। हिन्दू सेना तो अभी नींद में ही थी तथा कुछ सैनिक शौचादि का उपक्रम कर रहे थे। उसी समय 40 हजार घुड़सवार चारों दिशाओं से हिन्दू शिविर पर टूट पड़े। बहुत से हिन्दू सैनिकों को तो हथियार उठाने तक का अवसर नहीं मिला। इस कारण कई हजार सैनिकों को उनके शिविरों में ही निहत्थे मार दिया गया।

डॉ. बिंध्यराज चौहान ने लिखा है- ‘नरायन का दूसरा संग्राम युद्ध नहीं था, एक भयंकर दुर्घटना थी जिसमें न रणगजों पर हौदे चढ़ाए जा सके, न अश्वों पर जीनें कसी जा सकीं। न तो कोई राजपूत स्नान-ध्यान करके माथे पर रोली का टीका लगा सका, न कुसुम्बे का प्याला पी सका, न घोड़े पर सवार हाते समय चारणों एवं भाटों द्वारा गढ़ी गई चमत्कारी वंशोत्पत्ति का बखान सुन सका और न ही तुरही, भेरी नगाड़े बजाए जा सके, क्योंकि तब तक चारों तरफ हड़बड़ाहट से मची भगदड़ के बीच तुर्कों ने पशुओं के साथ राजपूतों को काट-काट कर ढेर लगा दिए।’

इस अनपेक्षित, असमय एवं आकस्मिक आक्रमण से पृथ्वीराज की सेना में चारों ओर भगदड़ मच गई। पृथ्वीराज चौहान का शिविर बूचड़खाने में बदल गया प्रतीत होता था। सम्राट पृथ्वीराज चौहान उसी समय हाथी पर चढ़कर युद्ध के लिए तैयार हो गया।

डॉ. बिंध्यराज ने लिखा है- ‘आरम्भिक क्षति उठाने के बाद राजपूती सेना संगठित हुई जिसका प्रधान सेनापति दिल्ली का गोविंदराय तोमर था।’

फुतुहूस्सलातीन ने लिखा है- ‘भयंकर हाथियों की सेना लेकर गोविंदराय आगे बढ़ा। उस समय राय पिथौरा अपनी केन्द्रीय सेना के साथ युद्ध कर रहा था।’

गोविंदराय के दाहिने ओर की कमान पदमशा रावल संभाले था और बायां दस्ता भोला अर्थात् भुवनैकमल्ल के अधीन था। मुईजुद्दीन साम की सेना के केन्द्रीय भाग का नेतृत्व मुहम्मद स्वयं कर रहा था। उसके दाहिने ओर इलाह था तथा बाएं दस्ते का नेतृत्व मुकल्बा के अधीन था। कुतुबुद्दीन सचल-दस्ते की व्यवस्था देख रहा था और सदैव ‘मुइजुद्दीन साम’ अर्थात् मुहम्मद गौरी के निकट रहता था। उस समय मुईजुद्दीन की सेना में 1,30,000 अश्वारोही थे। प्रत्येक सैनिक जिरह बख्तर और हथियारों से सुसज्जित था।

गोविंदराय हाथियों की सेना के साथ आगे बढ़ा और खारबक के अग्रिम दल पर हमला बोल दिया। खारबक ने अपने मुंह पर ढाल लगाकर अपनी रक्षा की और अपने तीरंदाजों को आदेश दिया कि वे केवल हाथियों और महावतों पर हमला करें। खारबक का आदेश पाते ही तुर्कों ने हाथियों पर इतना जबर्दस्त हमला किया कि चौहान सेना के हाथियों की सेना अस्त-व्यस्त हो गई तथा हिन्दुओं की सेना पराजय की ओर उन्मुख हो गई।

इसे ‘तराइन का द्वितीय युद्ध’ कहते हैं। यह कोई युद्ध नहीं था, निर्दोष एवं निहत्थे हिन्दू सैनिकों का कत्ले आम था, धोखा था, षड़यंत्र था, छल था!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पृथ्वीराज चौहान जीवित पकड़ा गया (38)

0
पृथ्वीराज चौहान जीवित पकड़ा गया - www.bharatkaitihas.com
पृथ्वीराज चौहान जीवित पकड़ा गया

जब मुहम्मद गौरी रात के अंधेरे में छल से पृथ्वीराज चौहान के शिविर में घुसकर हिन्दू सैनिकों को काटने लगा तब पृथ्वीराज चौहान घोड़े पर सवार होकर अपने शिविर से निकला किंतु सिरसा के आसपास मुहम्मद गौरी के सैनिकों के हाथ लग गया । इस प्रकार पृथ्वीराज चौहान जीवित पकड़ा गया।

मुहम्मद गौरी ने तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को संधि का छलावा दिया तथा अपनी मुख्य सेना को पीछे की ओर छिपाकर तड़का होने से पहले ही पृथ्वीराज चौहान के शिविर पह हमला बोल दिया तथा बहुत से हिन्दू सैनिकों को काट डाला। बड़ी कठिनाई से पृथ्वीराज चौहान की सेना का कुछ हिस्सा युद्ध के लिए सन्नद्ध हो पाया जिसमें दिल्ली के तोमर शासक गोविंदराज की हाथी सेना तथा स्वयं सम्राट पृथ्वीराज चौहान के अधीन केन्द्रीय सेना प्रमुख थे।

हसन निजामी, इसामी तथा नयनचंद्र सूरी ने लिखा है कि गोविंदराय तोमर की हाथी सेना ने तुर्क सेना पर दबाव बढ़ा दिया तो मुहम्मद गौरी के सेनापति खरमेल ने हाथियों की सेना के पीेछे जोर-जोर से नगाड़े पिटवाए। इस कारण हाथी भ्रमित हो गए तथा इधर-उधर भागने लगे। सम्राट पृथ्वीराज चौहान का हाथी भी अनियंत्रित हो गया। इस कारण गौरी के सैनिकों ने पृथ्वीराज के हाथी को घेर लिया और उस पर ताबड़तोड़ वार करने लगे। जब पृथ्वीराज का हाथी घायल हो गया तब पृथ्वीराज हाथी से उतरकर घोड़े पर सवार हुआ।

मिनहाज उस् सिराज लिखता है कि काफिरों ने बड़ी बहादुरी से सुल्तान की सेना का सामना किया जो चारों ओर से आक्रमण कर रही थी। शाम होने तक युद्ध चलता रहा तथा शाम होते ही मुहम्मद ने अपनी आरक्षित सेना को थके हुए राजपूतों पर आक्रमण करने के आदेश दिए। इस अंतिम प्रहार को राजपूत योद्धा नहीं झेल सके।

पृथ्वीराज का सेनापति खाण्डेराव जिसने तराइन के प्रथम युद्ध में मुहम्मद गौरी की सेना को परास्त किया था, मारा गया और पृथ्वीराज का उत्साह भंग हो गया। यह खाण्डेराव दिल्ली का शासक गोविंदराज था जिसे मिनहाज उस् सिराज ने खाण्डेराव लिखा है।

मिनहाज उस् सिराज के अनुसार जब युद्ध काफिरों के हाथों से निकलता हुआ दिखाई दिया तो पृथ्वीराज अपने हाथी को छोड़कर घोड़े पर सवार हुआ और युद्धक्षेत्र से निकल गया किंतु सरस्वती के पास पकड़ा गया और मुहम्मद पूर्ण रूप से विजयी हुआ। पृथ्वीराज चौहान जीवित पकड़ा गया , इस सम्बन्ध में कई मत मिलते हैं।

इलियट तथा डाउसन ने प्राचीन ग्रंथों के आधार पर इस युद्ध का वर्णन करते हुए लिखा है कि जब सम्राट पृथ्वीराज अपने हाथी से उतरकर घोड़े पर सवार हुआ तो हिन्दुओं ने बाजे बजवाए जिन्हें सुनकर घोड़ा नाचने लगा। पृथ्वीराज को समझते हुए देर नहीं लगी कि क्या होने वाला है। वह घोड़े से उतरकर पैदल ही युद्ध करने लगा। इसी समय किसी तुर्क ने सम्राट के गले में एक सिंगनी डाल दी। इस प्रकार पृथ्वीराज पकड़ा गया।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

 मिनहाज उस् सिराज लिखता है कि इस युक्ति से अल्लाह ने मुहम्मद की सेना को विजयी बनाया तथा काफिरों की सेना भाग खड़ी हुई। पृथ्वीराज को तुरंत ही मार दिया गया। जबकि हसन निजामी लिखता है कि राजा पृथ्वीराज को पकड़कर अजमेर लाया गया।

कुछ लेखकों के अनुसार सम्राट पृथ्वीराज सिरसा के आसपास मुहम्मद गौरी के सैनिकों के हाथ लग गया और मारा गया। राजा गोविंदराय और अनेक सामंत, वीर योद्धाओं की भांति लड़ते हुए काम आए। किंतु बाद की घटनाएं इस बात की पुष्टि नहीं करतीं। अतः इस सम्बन्ध में यही मत स्थिर किया जा सकता है कि युद्धक्षेत्र में अथवा सिरसा के निकट पृथ्वीराज चौहान जीवित पकड़ा गया।

अधिकातर लेखकों के अनुसार तराइन की पहली लड़ाई का विजेता गोविन्दराज तोमर तथा चितौड़ का राजा समरसिंह भी तराइन की दूसरी लड़ाई में काम आए। तुर्कों ने भागती हुई हिन्दू सेना का पीछा किया तथा उन्हें बिखेर दिया।

To purchase this book, please click on photo.

विभिन्न लेखकों ने इस युद्ध की तिथि भी अलग-अलग लिखी है। पृथ्वीराज रासो ने विक्रम संवत् 1158 के श्रावण मास की अमावस्या को शनिवार के दिन यह युद्ध होना बताया है किंतु यह तिथि ऐतिहासिक कसौटी पर खरी नहीं उतरती। क्योंकि विक्रम संवत 1158 का अर्थ होता है ई.1101 जबकि यह युद्ध तो ई.1192 में हुआ था। हसन निजामी ने लिखा है कि यह लड़ाई हिजरी 588 के रमजान महीने के आरम्भ होने से पहले ही जीती जा चुकी थी। इस प्रकार निजामी कोई निश्चित तिथि नहीं बताता है। हिजरी 588 में रमजान का महीना 10 सितम्बर 1192 को आरम्भ हुआ था। अतः तराइन की दूसरी लड़ाई 10 सितम्बर 1192 से पहले किसी महीने में हुई थी। राजस्थान के अजमेर, नागौर गोठमांगलोद आदि स्थानों पर उन राजपूत वीरों के नामों के शिलालेख मिलते हैं जिनके इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त होने पर उनकी रानियां एवं ठकरानियां सती हुई थीं। ये शिलालेख अप्रेल एवं मई 1192 की तिथियों के हैं। इनसे सिद्ध होता है कि तराइन का दूसरा युद्ध अप्रेल 1192 से पहले ही हो चुका था। ‘दिल्ली के तोमर’ नामक ग्रंथ के लेखक हरिहर निवास द्विवेदी ने विभिन्न तथ्यों के आधार पर युद्ध की तिथि 1 मार्च 1192 मानी है, उस दिन रविवार था तथा होली का त्यौहार था। युद्ध के आरम्भ होने एवं समाप्त होने की यही तिथि सही जान पड़ती है।

17 मार्च 1192 को दिल्ली भी तुर्कों के अधिकार में चली गई। बारहवीं शताब्दी ईस्वी में उत्तर भारत के सर्वाधिक शक्तिशाली सम्राट पृथ्वीराज चौहान पर गजनी के छोटे से राज्य के शासक के छोटे भाई मुहम्मद गौरी की विजय के अनेक कारण बताए जाते हैं जिनमें से एक कारण गुप्तचर प्रबंधन को भी बताया जाता है।

मिनहाज उस् सिराज ने ‘तबकाते नासिरी’, अब्दुल फजल ने ‘अकबरनामा’ तथा मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने ‘मुंतखाब अत् तवारीख’ में लिखा है कि मुहम्मद गौरी ने जनता में पृथ्वीराज चौहान के विरुद्ध असंतोष उत्पन्न करने के लिए गौर के निकट चिश्त नामक स्थान पर रहने वाले मुईनुद्दीन संजरी को अजमेर भेज दिया था। वह तराइन की पहली लड़ाई के बाद अपने अनुयाइयों के साथ अजमेर आया था तथा अजमेर के राजमहल में सम्राट के विरुद्ध चल रहे असंतोष एवं षड़यंत्रों के समाचार मुहम्मद गौरी को भेजता रहता था। इसलिए बहुत से लोग मुईनुद्दीन संजरी को मुहम्मद गौरी का जासूस मानते हैं।

‘फुतुहूस्सलातीन’ के अंग्रेजी अनुवाद में भी अजमेर के राजमहल में घटित इन घटनाओं का उल्लेख किया गया है। रानी संयोगिता तथा रानी पद्मावती के बीच सौतिया डाह के कारण चलने वाले षड़यंत्र, पृथ्वीराज चौहान के मंत्री कैमास का एक दासी के साथ प्रेम प्रसंग एवं पृथ्वीराज के सेनापति प्रतापसिंह एवं प्रधानमंत्री कैमास के बीच के द्वेष के कारण कैमास के वध आदि बहुत सी बातें मुईनुद्दीन संजरी द्वारा ही गौरी को पहुंचाई गई थीं।

इसामी के अनुसार जिस समय पृथ्वीराज मुल्तान से तराइन के लिए रवाना हुआ, उस समय उसे ज्ञात हो चुका था कि कैमास की हत्या हो चुकी है तथा पृथ्वीराज के सेनापतियों एवं मंत्रियों में मन-मुटाव अपने चरम पर है। इसलिए गौरी ने अजमेर के कुछ सेनापतियों एवं मंत्रियों को अपनी ओर मिला लिया और पृथ्वीराज तराइन का दूसरा युद्ध हार गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पृथ्वीराज चौहान की हत्या के लिए मंत्री प्रतापसिंह जिम्मेदार था (39)

0
पृथ्वीराज चौहान की हत्या - www.bharatkaitihas.com
पृथ्वीराज चौहान की हत्या के लिए मंत्री प्रतापसिंह जिम्मेदार था

निःसंदेह पृथ्वीराज चौहान की हत्या स्वयं मुहम्मद गौरी ने की थी किंतु पृथ्वीराज चौहान की हत्या के लिए मंत्री प्रतापसिंह अधिक जिम्मेदार था जिसने अपने पुराने वैर को निकालने के लिए अपने ही राजा के साथ छल किया तथा अपना देश दुश्मनों के हाथों बेच दिया।

तराइन के दूसरे युद्ध में मुहम्मद गौरी ने छल-बल से पृथ्वीराज चौहान की सेना को मार दिया तथा सम्राट पृथ्वीराज चौहान को जीवित ही पकड़ लिया। पृथ्वीराज चौहान के अंत के सम्बन्ध में अलग-अलग विवरण मिलते हैं। ‘पृथ्वीराज रासो’ में पृथ्वीराज चौहान की हत्या गजनी में होनी दिखाई गई है। इस विवरण के अनुसार पृथ्वीराज को पकड़ कर गजनी ले जाया गया जहाँ उसकी आँखें फोड़ दी गईं। इस ग्रंथ का रचयिता चंद बरदाई सम्राट पृथ्वीराज का बाल-सखा था, वह भी सम्राट के साथ गजनी गया।

पृथ्वीराज रासो कहता है कि चंद बरदाई ने पृथ्वीराज की मृत्यु निश्चित जानकर शत्रु के विनाश का कार्यक्रम बनाया तथा मुहम्मद गौरी से आग्रह किया कि आँखें फूट जाने पर भी राजा पृथ्वीराज शब्दबेधी बाण मार सकता है। इस मनोरंजक दृश्य को देखने के लिए गौरी ने एक विशाल दरबार का आयोजन किया। उसने एक ऊँचे मंच पर बैठकर एक घण्टा बजाया तथा पृथ्वीराज को लक्ष्य वेधने का संकेत दिया। उसी समय कवि चन्द बरदाई ने यह दोहा पढ़ा-

           चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण। ता उपर सुल्तान है, मत चूके चौहान।।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

इससे सम्राट पृथ्वीराज को गौरी की स्थिति का अनुमान हो गया और सम्राट ने जो तीर छोड़ा वह मुहम्मद गौरी के कण्ठ में जाकर लगा तथा उसके प्राण पंखेरू उड़ गए। अपने राजा को शत्रु-सैनिकों के हाथों में पड़कर अपमानजनक मृत्यु से बचने के लिए कवि चन्द बरदाई ने राजा पृथ्वीराज के पेट में अपनी कटार भौंक दी और स्वयं भी उसके साथ मृत्यु को प्राप्त हुआ। उस समय पृथ्वीराज की आयु मात्र 26 वर्ष थी।

आधुनिक शोधों से स्पष्ट हो चुका है कि पृथ्वीराज रासो में इतना अधिक क्षेपक जोड़ दिया गया है कि इसके मूल तथ्य ही बदल गए हैं। ‘हम्मीर महाकाव्य’ नामक ग्रंथ में सम्राट पृथ्वीराज को कैद किए जाने और अंत में उसे मरवा दिए जाने का उल्लेख है। विरुद्धविधिविध्वंस नामक ग्रंथ में पृथ्वीराज का युद्ध-स्थल में काम आना लिखा है।

‘पृथ्वीराज प्रबन्ध’ के अनुसार विजयी शत्रु पृथ्वीराज को अजमेर ले आए और वहाँ उसे एक महल में बंदी के रूप में रखा गया। इसी महल के सामने मुहम्मद गौरी अपना दरबार लगाता था जिसे देखकर पृथ्वीराज को बड़ा दुःख होता था। एक दिन राजा पृथ्वीराज ने अपने मंत्री प्रतापसिंह से धनुष-बाण लाने को कहा ताकि वह मुहम्मद गौरी का अंत कर दे। प्रतापसिंह पृथ्वीराज चौहान का अत्यंत विश्वसनीय मंत्री था किंतु आरम्भ से लेकर अंत तक यही प्रतापसिंह पृथ्वीराज के सर्वनाश का प्रमुख कारण बना।

To purchase this book, please click on photo.

पृथ्वीराज की माता के शासन काल में कदम्बवास राज्य का प्रधानमंत्री था किंतु प्रतापसिंह ने षड़यंत्र रचकर कदम्बवास को सम्राट की दृष्टि से गिरा दिया तथा पृथ्वीराज ने कदम्बवास की हत्या करवा दी। तब से प्रतापसिंह ही राज्य का समस्त कार्य देखता था किंतु जब मुहम्मद गौरी तराइन के दूसरे युद्ध के लिए आया तो प्रतापसिंह सम्राट को धोखा देकर भीतर ही भीतर मुहम्मद गौरी से मिल गया। पृथ्वीराज प्रतापसिंह पर इतना अधिक विश्वास करता था कि वह अंत तक इस बात को नहीं जान सका। जब सम्राट ने प्रतापसिंह को धनुष-बाण लाने के लिए कहा तो प्रतापसिंह ने उसकी सूचना मुहम्मद गौरी को दे दी। मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज की परीक्षा लेने के लिए अपनी एक प्रतिमा बनवाकर एक स्थान पर रखवाई जिसे पृथ्वीराज ने अपने बाण से तोड़ दिया। यह देखकर मुहम्मद गौरी ने अंधे पृथ्वीराज को गड्ढे में फिंकवा दिया जहाँ पत्थरों की चोटों से उसका अंत कर दिया गया। दो समसामयिक लेखकों यूफी तथा हसन निजामी ने पृथ्वीराज को कैद किया जाना तो लिखा है किंतु निजामी यह भी लिखता है कि जब बंदी पृथ्वीराज जो इस्लाम का शत्रु था, सुल्तान के विरुद्ध षड़यंत्र करता हुआ पाया गया तो उसकी हत्या कर दी गई।

मिनहाज उस् सिराज पृथ्वीराज के भागने पर पकड़ा जाना और फिर मरवाया जाना लिखता है। फरिश्ता भी पृथ्वीराज चौहान की हत्या के सम्बन्ध में इसी कथन का अनुमोदन करता है। सोलहवीं शताब्दी का लेखक अबुलफजल लिखता है कि पृथ्वीराज को सुलतान गजनी ले गया जहाँ पृथ्वीराज की मृत्यु हो गई। पृथ्वीराज की मृत्यु के चार सौ साल बाद लिखी गई इस बात का अधिक महत्त्व नहीं है।

अजमेर से सम्राट पृथ्वीराज चौहान का एक सिक्का मिला है जिसके दूसरी तरफ मुहम्मद गौरी का नाम भी अंकित है। यह सिक्का इस बात का द्योतक है कि पृथ्वीराज को युद्ध के मैदान से जीवित ही पकड़कर अजमेर लाया गया तथा मुहम्मद गौरी ने उसके कुछ सिक्कों को जब्त करके उनके पीछे अपना नाम अंकित करवाया। इससे यह सिद्ध होता है कि पृथ्वीराज को युद्ध के मैदान में नहीं मारा गया था। न ही उसे गजनी ले जाया गया था। पृथ्वीराज को तराइन के मैदान से अजमेर लाया गया था और अजमेर में ही पृथ्वीराज चौहान की हत्या की गई थी।

बहुत से लोगों ने सम्राट पृथ्वीराज चौहान की हत्या के इतिहास को रहस्यमय एवं रोमांचक बनाने के लिए पृथ्वीराज के अंत के सम्बन्ध में कई तरह के किस्से गढ़ लिए हैं किंतु इतिहास की सच्चाइयां रहस्य रोमांच से अलग, बहुत भयानक एवं बदसूरत होती हैं, सम्राट पृथ्वीराज का अंत भी वैसा ही भयानक और बदसूरत था।

भारतीय राजा किसी दूसरे राजा को पकड़ लेने पर जिस गरिमा और उदारता का परिचय देते थे, मुहम्मद गौरी की तरफ से वैसा कुछ नहीं किया गया। उसने सम्राट पृथ्वीराज चौहान को क्रूर मौत के हवाले किया। मुहम्मद गौरी को यह भी स्मरण नहीं रहा कि इसी पृथ्वीराज ने मुहम्मद गौरी तथा काजी शिराज से केवल कर लेकर उन्हीं जीवित ही छोड़ दिया था।

ई.1192 में पृथ्वीराज चौहान की हत्या के बाद शहाबुद्दीन गौरी ने पृथ्वीराज चौहान के अवयस्क पुत्र गोविन्दराज से विपुल कर-राशि लेकर उसे अजमेर की गद्दी पर बैठाया। इसके बाद शहाबुद्दीन गौरी कुछ समय तक अजमेर में रहकर दिल्ली चला गया जो इस समय मुहम्मद गौरी के सेनापतियों के अधीन था। मुहम्मद गौरी ने अपने जेरखरीद गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को भारत में अपने द्वारा विजित क्षेत्रों का गवर्नर नियुक्त किया। कुछ दिन दिल्ली में निवास करने के बाद मुहम्मद गौरी फिर से गजनी चला गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजा जयचंद का हाथी (40)

0
राजा जयचंद का हाथी - www.bharatkaitihas.com
राजा जयचंद का हाथी

राजा जयचंद के पास एक सफेद रंग का हाथी था। उसे मुहम्मद गौरी की सेना ने पकड़ लिया। महावत के बार-बार प्रयास करने पर भी राजा जयचंद का हाथी मुहम्मद गौरी को प्रणाम करने के लिए तैयार नहीं हुआ। हाथी मनुष्यों से अधिक वफादार निकला।

सम्राट पृथ्वीराज चौहान के मंत्री प्रतापसिंह ने अपने राजा को धोखा देकर उसे मुहम्मद गौरी के हाथों मरवा दिया। भारत में अधिकांश लोग यह मानते हैं कि मुहम्मद गौरी की मृत्यु गजनी में सम्राट पृथ्वीराज चौहान के शब्दबेधी बाण से हुई थी किंतु ऐतिहासिक साक्ष्य इन तथ्यों की पुष्टि कर चुके हैं कि न तो सम्राट पृथ्वीराज चौहान कभी गजनी गया था और न मुहम्मद गौरी की मृत्यु गजनी में किसी शब्दबेधी बाण से हुई थी।

मुहम्मद गौरी सम्राट पृथ्वीराज चौहान की अजमेर में हत्या करने के बाद लगभग 14 साल तक जीवित रहा और भारत का रक्त पीता रहा। ई.1194 में मुहम्मद गौरी ने कन्नौज के गहड़वाल शासक जयचंद पर आक्रमण किया। चंदावर के मैदान में दोनों पक्षों में भयानक युद्ध हुआ। यह मैदान आगरा तथा इटावा के बीच यमुना के तट पर स्थित था। अब इस स्थान को फीरोजाबाद कहा जाता है।

ई.1349 में लिखित राजशेखर सूरि कृत ‘प्रबंधकोश’ में लिखा है कि सुहावादेवी नामक एक रूपवती एवं बुद्धिमती विधवा राजा जयचंद गाहड़वाल के प्रधानमंत्री पद्माकर द्वारा अन्हिलपुर पाटण अर्थात् गुजरात से लाकर राजा जयचंद को भेंट की गई। महाराज जयचंद ने उस स्त्री के रूप-लावण्य पर मोहित होकर उसे अपनी पासवान बना लिया। इस स्त्री के गर्भ से मेघचंद नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

जब मेघचंद युवा हुआ तो सुहावादेवी ने महाराज जयचंद से कहा कि वह मेघचंद को युवराज बनाए। महाराज जयचंद इस बात पर सहमत हो गया किंतु जयचंद के मंत्री विद्याधर ने इसे कुल-मर्यादा के विरुद्ध बताकर इस विचार का विरोध किया। इस कारण सुहावादेवी ने कन्नौज राज्य का विनाश करने का निश्चय किया। उसने अपना एक दूत तक्षशिला भेजा, जहाँ इन दिनों मुहम्मद गौरी निवास कर रहा था। सुहावादेवी ने मुहम्मद से कहलवाया कि वह जयचंद पर आक्रमण करे।

महाराज जयचंद के मंत्री विद्याधर को सुहावादेवी के इस षड़यंत्र की जानकारी हो गई तथा उसने महाराज को सुहावादेवी के द्वारा दूत भेजे जाने की सूचना दे दी। जयचंद अपनी पासवान पर विश्वास करता था इसलिए उसने मंत्री की बात पर विश्वास नहीं किया। विद्याधर को अपनी स्वामिभक्ति पर संदेह किए जाने से इतनी अधिक ग्लानि हुई कि उसने गंगाजी में डूबकर प्राण त्याग दिए।

कुछ काल के पश्चात् सुल्तान मुहम्मद गौरी ने कन्नौज राज्य पर आक्रण किया। ‘कन्नौज का इतिहास’ नामक ग्रंथ के लेखक आनंद स्वरूप मिश्र ने लिखा है कि गौरी ने यह आक्रमण किया अवश्य था किंतु सुहावा देवी के कहने पर नहीं किया था। जब राजा जयचंद को मुहम्मद के आने का पता चला तो वह भी एक सेना लेकर मुहम्मद की तरफ बढ़ा। यमुना नदी के तट पर चंदावर के मैदान में दोनों सेनाएं एक-दूसरे के सामने हो गईं तथा दोनों पक्षों में विकराल युद्ध हुआ।

राजशेखर सूरि का ग्रंथ ‘प्रबंधकोश’ इस बात की सूचना नहीं देता है कि इस युद्ध में महाराज जयचंद की मृत्यु कैसे हुई। ‘प्रबंधकोष’ की रचना ई.1349 में हुई थी जबकि यह युद्ध ई.1194 में हुआ था। अर्थात् यह ग्रंथ इस युद्ध के लगभग 155 वर्ष बाद लिखा गया। इस कारण इस ग्रंथ में जनश्रुति का भी कुछ अंश हो सकता है। ‘प्रबंधचिंतामणि’ से भी सुहावादेवी की घटना का समर्थन होता है। विद्यापति की ‘पुरुष परीक्षा’ में भी लिखा है कि राजा जयचंद को उसकी रानी शुभा देवी ने धोखा देकर उसे शहाबुद्दीन से मरवा दिया।

To purchase this book, please click on photo.

यहाँ हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि समस्त हिन्दू राजाओं का इतिहास इसी प्रकार विकृत किया गया है। जयचंद पर आरोप लगाया जाता है कि उसने मुहम्मद गौरी को सम्राट पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया। यही आरोप अन्हिलवाड़ा के चौलुक्यों पर लगाया जाता है।

जयचंद की पासवान सुहावा देवी पर आरोप लगाया जाता है कि उसने मुहम्मद गौरी को महाराज जयचंद पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया। महाराणा सांगा पर आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने समरकंद के शासक बाबर को आमंत्रित किया कि वह दिल्ली के इब्राहीम लोदी पर आक्रमण करे। पाठक के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कहीं यह हिन्दू राजाओं को बदनाम करने की सोची-समझी साजिश तो नहीं है!

यदि तत्कालीन मुस्लिम लेखकों के ग्रंथों को देखें तो हम पाएंगे कि किसी भी मुस्लिम लेखकर ने सुहावादेवी के प्रकरण का उल्लेख नहीं किया है जबकि तीन बड़े हिन्दू लेखक सुहावा देवी द्वारा किए गए षड़यंत्र का उल्लेख करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि हिन्दू लेखकों द्वारा अपने राजा को वीर दिखाने एवं उसे शत्रु द्वारा छल से मारे जाने की भावना के वशीभूत होकर ऐसी बातें लिखी गईं। जब एक लेखक ने किसी बात को लिख दिया तो दूसरे लेखकों ने उसका रूप बदल कर उसे अपने ग्रंथों में दोहरा दिया। इस कारण सम्राट पृथ्वीराज की तरह महाराज जयचंद का इतिहास भी झूठ के नीचे दब गया है।

ख्वाजा हसन निजामी ने ‘ताज-उल-मासिर’ में लिखा है कि दिल्ली पर अधिकार करने के दो साल बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने जयचंद पर चढ़ाई की। सुल्तान शहाबुद्दीन भी मार्ग में ऐबक से आ मिला। सेना में 50,000 घुड़सवार थे। कुतुबुद्दीन ऐबक को शाही सेना के हरावल में रखा गया। जयचंद ने इटावा के पास चंदावर में शाही सेना का सामना किया। राजा जयचंद ने हाथी पर बैठकर युद्ध किया। अंत में वह मारा गया। सुल्तान ने असनी के दुर्ग में रखा हुआ राजा जयचंद का खजाना लूट लिया। असनी का दुर्ग गंगा नदी के बाएं तट पर स्थित था। सुल्तान ने आगे बढ़कर बनारस की भी यही दशा की। इस लूट में 300 हाथी मिले जिनमें एक सफेद हाथी भी था।

इब्न अल असीर नामक एक समकालीन लेखक ने लिखा है कि पकड़े गए हाथी सुल्तान को सलाम करने के लिए लाए गए। फीलवानों के निर्देश पर सभी हाथियों ने सुल्तान का अभिवादन किया किंतु राजा जयचंद का हाथी महावत के बार-बार प्रयास करने पर भी मुहम्मद प्रणाम करने के लिए तैयार नहीं हुआ। अंग्रेज लेखक सर थॉमक होल्डिच ने भी इस घटना का वर्णन किया है।

‘तबकाते नासिरी’ में लिखा है कि हिजरी 590 अर्थात् ई.1194 में सुल्तान शहाबुद्दीन ने अपने दो सेनापतियों कुतुबुद्दीन तथा इजुद्दीन को जयचंद से लड़ने भेजा जिन्होंने चंद्रावर के पास जयचंद को हराया। महाराज जयचंद युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ किंतु उसका मृत शरीर मुहम्मद की सेना के हाथ नहीं लग सका। ‘कामिलुत्तवारीख’ में लिखा है कि हिजरी 590 में शहाबुद्दीन ने चंदावर में जयचंद को हराया और बनारस को लूट लिया। वह बनारस से मिला सामान 1400 ऊंटों पर लादकर गजनी ले गया। यह मुहम्मद गौरी का भारत पर अंतिम अभियान था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पांच सौ मन हीरों का मालिक अपनी बेटी के मकबरे में दफनाया गया (41)

0
मुहम्मद गौरी की हत्या - www.bharatkaitihas.com
मुहम्मद गौरी की हत्या

अंग्रेज लेखक स्मिथ ने लिखा है कि शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी की हत्या पंजाब के झेलम जिले में ढामियाक अथवा दामयेक नामक स्थान पर कट्टरपंथी मुसलमानों के एक समूह द्वारा की गई थी। कुछ लेखकों के अनुसार मुहम्मद गौरी का वध विद्रोही गक्खरों ने किया था। 

मुहम्मद गौरी ई.1194 में कन्नौज के शासक महाराज जयचंद को मार दिया। मुहम्मद गौरी ने इस अभियान में कन्नौज, काशी एवं बनारस में भी भारी विध्वंस किया। इन नगरों में स्थित मंदिरों, महलों एवं किलों से मिली सम्पत्ति को 1400 ऊँटों पर लादकर गजनी चला गया। सर थॉमस होल्डिच ने लिखा है कि लूट का माल 4 हजार ऊँटों पर लादकर ले जाया गया। यह भारत पर मुहम्मद का अंतिम अभियान था।

‘उत्तर प्रदेश में बौद्धधर्म का विकास’ नामक ग्रंथ के लेखक डॉ. नलिनाक्ष दत्त तथा डॉ. कृष्णदत्त बाजपेई ने लिखा है कि सारनाथ भी मुहम्मद गौरी के हाथों से नहीं बच सका। वहाँ के अनेक विशाल भवन नष्ट कर दिए गए। सारनाथ के बौद्ध भिक्षु या तो मारे गए या अन्यत्र चले गए।

धीरे-धीरे यह स्थान पूर्णतः निर्जन बन गया। मुगल काल में यहाँ के टीलों पर एक भवन बना जिसे चौखण्डी कहते हैं। कुछ लेखकों का मानना है कि सारनाथ का विध्वंस तो महमूद गजनवी के सेनापति नियाल्तगीन ने बनारस अभियान के समय ही कर दिया था। सारनाथ तभी से वीरान पड़ा था।

ई.1197 में मुहम्मद गौरी के बड़े भाई गयासुद्दीन की मृत्यु हो गई। उस समय गयासुद्दीन का एक नाबालिग पुत्र जीवित था जिसका नाम महमूद था। मुहम्मद गौरी ने महमूद को एक बड़े प्रांत का प्रांतपति बना दिया तथा स्वयं गजनी एवं गौर सहित सम्पूर्ण सल्तनत का स्वामी बन गया।

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा प्रकाशित ‘कन्नौज का इतिहास’ के लेखक आनन्द स्वरूप मिश्र ने लिखा है कि मुहम्मद गौरी की हत्या ई.1205-1206 में झेलम के समीप जंगली लोगों नेकी थी, जब वह रात को अपने खेमे में सो रहा था।

अंग्रेज लेखक स्मिथ ने लिखा है कि शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी की हत्या पंजाब के झेलम जिले में ढामियाक अथवा दामयेक नामक स्थान पर कट्टरपंथी मुसलमानों के एक समूह द्वारा की गई थी। कुछ लेखकों के अनुसार मुहम्मद गौरी का वध विद्रोही गक्खरों ने किया था।  भारत में कुछ लोग मानते हैं कि मुहम्मद गौरी की हत्या पंजाब में रहने वाले खोखर जाटों ने की थी। संभवतः खोखरों को ही मुस्लिम इतिहासकारों ने गक्खर लिखा है।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

आनन्द स्वरूप मिश्र ने लिखा है कि मुहम्मद गौरी ने भारत पर नौ बड़े आक्रमण किए थे जिनमें से सात आक्रमणों में उसे विपुल सम्पत्ति हाथ लगी थी। मुहम्मद गौरी की सम्पत्ति का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उसके पास 500 मन हीरे थे। यह विशाल सम्पत्ति मुहम्मद की रक्षा नहीं कर सकी। वह भी उन अभागे सुल्तानों एवं बादशाहों की तरह गुमनाम लोगों द्वारा निर्ममता से मौत के घाट उतार दिया गया जिन्हें अपनी शक्ति, साम्राज्य एवं सम्पत्ति का बड़ा घमण्ड था।

आज भले ही अफगानिस्तान, पाकिस्तान एवं भारत के करोड़ों लोग मुहम्मद गौरी के नाम की आहें भरते हैं, उसके नाम की मिसाइलें और स्मारक बनवाते हैं किंतु इतिहास की कड़वी सच्चाई यह है कि उस काल में किसी को मुहम्मद के प्रति कोई सहानुभूति नहीं थी।

मुहम्मद का मृत शरीर मुहम्मद गौरी के किसी भी सेनापति, किसी भी गुलाम और किसी भी शाही व्यक्ति के काम का नहीं था। इसलिए उसके मृत शरीर के लिए एक मकबरा तक बनवाने की आवश्यकता अनुभव नहीं की गई और उसका शव उस मकबरे में दफनाया गया जो मुहम्मद गौरी की पुत्री के लिए बनाया जा रहा था।

To purchase this book, please click on photo.

ई.1192 में चौहान पृथ्वीराज (तृतीय) की मृत्यु तथा ई.1194 में महाराज जयचंद की मृत्यु भारत के प्राचीन इतिहास के काल खण्ड की अंतिम बड़ी घटनाएं मानी जाती हैं। इसके बाद उत्तर भारत के मैदानों में हिन्दू राज्यों के स्थान पर तुर्क शासन की स्थापना हो गई और भारत का इतिहास मध्यकाल में प्रवेश कर गया। कुछ इतिहासकारों ने भारत के इतिहास के वर्गीकरण में हर्षवर्द्ध्रन की मृत्यु के बाद से लेकर सम्राट पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु तक के काल को ‘राजपूत काल’ कहा है। यह ई.648 से लेकर ई.1192 तक का काल है किंतु दिल्ली सल्तनत की स्थापना मुहम्मद गौरी की मृत्यु के बाद ई.1206 में हुई थी, इसलिए सामान्यतः ई.648 से लेकर ई.1206 तक की अवधि को भारत के इतिहास में राजपूत काल कहा जाता है। ई.1192 में दिल्ली पर मुहम्मद गौरी का अधिकार हो जाने से लेकर ई.1206 में मुहम्मद गौरी की मृत्यु होने तक दिल्ली पर मुहम्मद गौरी का हिन्दुस्तानी गवर्नर कुतुबुद्दीन ऐबक शासन करता रहा। उसके अधीन पंजाब के बहुत बड़े हिस्से से लेकर दिल्ली, अजमेर, कन्नौज, बनारस तथा बदायूं आदि के क्षेत्र थे। ये क्षेत्र सिंधु और सरस्वती से लेकर पंजाब की पांचों बड़ी नदियों- झेलम, चिनाव, रावी, सतलुज, व्यास से होते हुए गंगा एवं यमुना की अंतर्वेदी तक विस्तृत थे।

अंतर्वेदी को अब गंगा-यमुना का दो-आब कहा जाता है। सिंधु के तट से लेकर गंगा के मैदान तक विस्तृत यह क्षेत्र संसार के सर्वाधिक उपजाऊ क्षेत्रों में से एक था। धरती के इस भूखण्ड पर संसार की सर्वाधिक उन्नत एवं समृद्ध संस्कृति का प्रसार था। वेदों के मंत्र इसी क्षेत्र में प्रकट हुए थे।

पुराणों की गाथाएं इन्हीं क्षेत्रों में लिखी गई। श्री राम की अयोध्या, श्री कृष्ण की मथुरा, भगवान भोलेनाथ शिव की काशी इसी भूक्षेत्र में स्थित थी। भगवान वेदव्यास ने गीता का तथा महर्षि वाल्मीकि ने रामायण का प्रणयन इसी क्षेत्र में किया था। शकुंतला का पुत्र भरत इन्हीं मैदानों में खेला था। पाण्डवों ने इन्हीं मैदानों में अपनी दिग्विजय यात्रा की थी। चाणक्य और चंद्रगुप्त जैसे गुरु-शिष्य इसी भूखण्ड में प्रकट हुए थे। सम्राट समुद्रगुप्त ने इन्हीं मैदानों को जीतकर भारत राष्ट्र की कल्पना को साकार किया था।

दिल्ली सल्तनत की स्थापना के साथ ही भारत के इतिहास का वह स्वर्णकाल बीत चुका था जब थाणेश्वर का सम्राट हर्षवर्द्धन, मरुभूमि के गुर्जर प्रतिहार नरेश तथा सपादलक्ष के चौहान इन मैदानों के स्वामी हुआ करते थे। समय बदल चुका था, वेदों की ऋचाएं शांत हो चुकी थीं, स्वर्ग से आने वाली हवाएं रास्ता भूल चुकी थीं तथा नदी तटों से उठने वाले यज्ञकुण्डों के धूम्र-वलय काल के गाल में समा चुके थे।

अब इन मैदानों तथा उनमें बहने वाली नदियों का स्वामी मुहम्मद गौरी का जेर-खरीद गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक था और निर्दोष हिन्दुओं के रक्त से भीग-भीग कर धरती लाल हो चुकी थी।

जैसे ही ई.1206 में मुहम्मद गौरी की हत्या हुई, उसके गवर्नरों में सल्तनत पर अधिकार करने के लिए छीना-झपटी मच गई क्योंकि मुहम्मद गौरी के कोई पुत्र नहीं था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

- Advertisement -

Latest articles

डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

0
चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

0
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...
पुष्पक विमान - www.bharatkaitihas.com

पुष्पक विमान विभीषण को क्यों नहीं लौटाया था श्रीराम ने?

0
रावण का वध करने के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो उन्होंने पुष्पक विमान लंका के नए राजा विभीषण को क्यों नहीं लौटाया?...
एनीमल फार्म - www.bharatkaitihas.com

एनीमल फार्म और भारतीय राजनीति

0
क्या आपने उस किताब का नाम सुना है जिसने 1950 के दशक में पूरी दुनिया में आग लगा दी थी! क्या आपने एनीमल फार्म...
हरम बेगम का कपट जाल - www.bharatkaitihas.com

हरम बेगम का कपट जाल (69)

0
बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है...