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कुरूप तुर्की गुलाम भारत का भविष्य बन गया (42)

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कुरूप तुर्की गुलाम भारत का भविष्य बन गया

मुहम्मद गौरी की हत्या हो जाने के बार कुरूप तुर्की गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली का स्वामी बन गया। अब वही भारत का भाग्य-विधाता था और अब वही भारत के लोगों का भविष्य तय करने वाला था।

ई.1206 में मुहम्मद गौरी की हत्या हो गई। मुहम्मद गौरी निःसंतान था, इसलिए उसके गुलामों एवं उसके रक्त सम्बन्धियों में उसके साम्राज्य पर अधिकार करने को लेकर झगड़ा हुआ। अंत में उसके गुलाम ताजुद्दीन यल्दूज ने गजनी पर तथा दिल्ली के गवर्नर कुतुबुद्दीन ऐबक ने भारतीय क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया जो कि मुहम्मद गौरी का जेरखरीद कुरूप तुर्की गुलाम था।

इस प्रकार दिल्ली में पहली बार मुस्लिम सत्ता की स्थापना हुई। उसके दिल्ली का सुल्तान बनने के समय भारत में दिल्ली, अजमेर तथा लाहौर प्रमुख राजनीतिक केन्द्र थे। ये तीनों ही मुहम्मद गौरी और उसके गवर्नरों के अधीन जा चुके थे। इनके साथ ही हांसी, सिरसा, समाना, कोहराम, कन्नौज, बनारस तक के क्षेत्र भी नई सल्तनत के अधीन थे।

नई सल्तनत द्वारा देश में इस्लामी राज्य स्थापित हो जाने की घोषणा के साथ ही उत्तर भारत के सैंकड़ों मन्दिर एवम् पाठशालाएं ध्वस्त करके अग्नि को समर्पित कर दी गईं। हजारों-लाखों हिन्दू मौत के घाट उतार दिए गए तथा हजारों हिन्दू स्त्रियों का सतीत्व भंग किया गया।

हिन्दू राजाओं का मनोबल टूट गया तथा जैन एवं बौद्ध साधु उत्तरी भारत छोड़कर नेपाल तथा तिब्बत आदि देशों को भाग गए। देश की अपार सम्पत्ति म्लेच्छों के हाथ लगी। उन्होंने पूरे उत्तर भारत में भय और आतंक का वातावरण बना दिया जिससे भारतीय जन-जीवन में हाहाकार मच गया।

कुतुबुद्दीन ऐबक ने ई.1206 से लेकर 1210 में अपनी मृत्यु होने तक दिल्ली पर स्वतंत्र शासक के रूप में शासन किया। उसने भारत में ‘तुर्की सल्तनत’ की स्थापना की किंतु उसे ‘दिल्ली सल्तनत’ के नाम से जाना गया। चूंकि कुतुबुद्दीन ऐबक मुहम्मद गौरी का जेरखरीद गुलाम था इसलिए उसने दिल्ली में जिस राजवंश की स्थापना की उसे भारत के इतिहास में ‘गुलाम-वंश’ कहते हैं। इस वंश के समस्त शासक अपने जीवन के प्रारम्भिक काल में या तो गुलाम रह चुके थे या फिर वे किसी गुलाम की संतान थे।

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इस वंश का पहला शासक कुतुबुद्दीन ऐबक, मुहम्मद गौरी का गुलाम था। इस वंश का दूसरा शासक इल्तुतमिश, कुतुबुद्दीन ऐबक का गुलाम था। इस वंश का तीसरा प्रभावशाली शासक बलबन, इल्तुतमिश का गुलाम था। अतः यह वंश, गुलाम वंश कहलाता है। गुलाम वंश के समस्त शासक तुर्क थे।

कुछ इतिहासकार गुलाम वंश नामकरण उचित नहीं मानते। उनके अनुसार कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली में ‘कुतुबी’, इल्तुतमिश ने ‘शम्मी’ तथा बलबन ने ‘बलबनी’ राजवंश की स्थापना की। इस प्रकार इस समय में दिल्ली में एक वंश ने नहीं, अपितु तीन वंशों ने शासन किया। इन इतिहासकारों के अनुसार इस काल को ‘दिल्ली सल्तनत’ का काल कहना चाहिये।

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इस प्रकार कुतुबुद्दीन ऐबक भारत में तुर्की सल्तनत का संस्थापक, दिल्ली सल्तनत का संस्थापक, गुलाम वंश का संस्थापक तथा कुतुबी वंश का संस्थापक था। वह दिल्ली का पहला मुसलमान सुल्तान था। उसका जन्म तुर्किस्तान के कुलीन तुर्क परिवार में हुआ था किंतु वह बचपन में अपने परिवार से बिछुड़ गया तथा गुलाम के रूप में बाजार में बेच दिया गया। वह कुरूप किंतु प्रतिभावान बालक था। एक व्यापारी उसे दास के रूप में बेचने के लिए तुर्किस्तान से गजनी ले आया। सबसे पहले अब्दुल अजीज कूकी नामक एक काजी ने कुतुबुद्दीन को खरीदा। उस समय कुतुबुद्दीन बालक ही था। इसलिए उसने काजी के बच्चों के साथ घुड़सवारी सीखी तथा थोड़ी-बहुत शिक्षा प्राप्त की। गजनी के काजी ने कुतुबुद्दीन को कुछ समय बाद फिर से बाजार में बेच दिया। इस प्रकार कुतुबुद्दीन कई बार बिका। एक बार उसे मुहम्मद गौरी के सामने लाया गया। मुहम्मद गौरी ने कुतुबुद्दीन की कुरूपता पर विचार न करके उसे खरीद लिया। कुतुबुद्दीन ने अपने गुणों से मुहम्मद गौरी को मुग्ध कर लिया और उसका अत्यन्त प्रिय तथा विश्वासपात्र गुलाम बन गया। वह अपनी योग्यता के बल पर धीरे-धीरे एक पद से दूसरे पद पर पहुँचता गया और ‘अमीर आखूर’ अर्थात् घुड़साल रक्षक के पद पर पहुँच गया।

कुछ समय बाद कुतुबुद्दीन ऐबक मुहम्मद गौरी का इतना प्रिय बन गया कि गौरी ने उसे ‘ऐबक’ अर्थात् ‘चन्द्रमुखी’ के नाम से पुकारना आरम्भ किया। जब मुहम्मद गौरी ने भारत पर आक्रमण करना आरम्भ किया तब ऐबक भी उसके साथ भारत आया और अपने सैनिक-गुणों का परिचय दिया। मुहम्मद गौरी को अपनी भारतीय विजयों में ऐबक से बड़ा सहयोग मिला। तराइन के दूसरे युद्ध में कुतुबुद्दीन ऐबक मुहम्मद गौरी के साथ मौजूद था। कन्नौज के राजा जयचंद के विरुद्ध किए गए सैनिक अभियान में तो कुतुबुद्दीन ऐबक को मुस्लिम सेना के हरावल में रखा गया था। 

ई.1194 में जब मुहम्मद गौरी कन्नौज विजय के उपरान्त गजनी लौटा, तब उसने भारत के विजित भागों का प्रबन्ध कुतुबुद्दीन ऐबक के हाथों में दे दिया। इस प्रकार ऐबक मुहम्मद गौरी के भारतीय राज्य का वाइसराय बन गया। कुतुबुद्दीन ऐबक ने मुहम्मद गौरी के विजय अभियान को जारी रखा। ई.1195 में उसने कोयल को जीता जिसे अब अलीगढ़ कहा जाता है। इसके बाद उसने अन्हिलवाड़ा को नष्ट किया। जिस अन्हिलवाड़ा को मुहम्मद गौरी नहीं जीत पाया था, उसी अन्हिलवाड़ा को जलाकर राख करने का काम कुतुबुद्दीन ऐबक ने किया।

ई.1196 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने मेड़ राजपूतों को परास्त किया जो चौहानों की सहायता कर रहे थे। ई.1197 में उसने बदायूँ, चन्दावर और कन्नौज पर पुनः अधिकार किया। ये क्षेत्र संभवतः फिर से हिन्दुओं द्वारा छीन लिए गए थे।

ई.1202 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने चंदेलों को परास्त करके बुंदेलखण्ड का क्षेत्र अपने साम्राज्य में मिला लिया। इस प्रकार गौरी की मृत्यु से पूर्व ऐबक ने लगभग सम्पूर्ण उत्तरी भारत पर अधिकार कर लिया। इस विशाल मुस्लिम साम्राज्य को परास्त करके पुनः दिल्ली तथा उत्तर भारत के राज्यों पर अधिकार करना हिन्दू राजकुलों के वश की बात नहीं रही।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कुतुबुद्दीन ऐबक ने यल्दूज की बेटी से ब्याह कर लिया (43)

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कुतुबुद्दीन ऐबक - www.bharatkaitihas.com
कुतुबुद्दीन ऐबक ने यल्दूज की बेटी से ब्याह कर लिया

मुहम्मद गौरी की मृत्यु के समय उसका गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली का गवर्नर था। वह एक तुर्की गुलाम था जिसे तुर्किस्तान से लेकर अफगानिस्तान में कई बार बेचा गया था किंतु उसने अपनी योग्यता एवं सुल्तान की कृपा के बल पर अमीर तथा दिल्ली का गवर्नर होने का गौरव प्राप्त किया था।

मुहम्मद गौरी के कोई पुत्र नहीं था इसलिए उसके अमीरों में सल्तनत पर अधिकार करने की होड़ आरम्भ हो गई। ताजुद्दीन यल्दूज नामक एक अमीर ने गजनी पर अधिकार कर लिया। पाठकों को स्मरण होगा कि मुहम्मद गौरी ने अपने बड़े भाई मरहूम गयासुद्दीन गौरी के पुत्र महमूद को फीरोजकोह नामक क्षेत्र का गवर्नर बनाया था जो कि अफगानिस्तान में ही स्थित था। महमूद का पूरा नाम महमूद बिन गियासुद्दीन बताया जाता है।

जब मुहम्मद गौरी मर गया और ताजुद्दीन यल्दूज ने गजनी पर अधिकार कर लिया तो फीरोजकोह के गवर्नर महमूद बिन गियासुद्दीन ने गजनी पर आक्रमण करके स्वयं को गजनी का सुल्तान घोषित कर दिया क्योंकि सल्तनत का वास्तविक अधिकारी गियासुद्दीन ही था न कि ताजुद्दीन याल्दुज।

मुहम्मद गौरी की मृत्यु के समय कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली में था। जब मुहम्मद गौरी की मृत्यु का समाचार लाहौर पहुँचा तो लाहौर के नागरिकों ने कुतुबुद्दीन ऐबक को लाहौर का शासन अपने हाथों में लेने का निमंत्रण भिजवाया। यह निमंत्रण पाकर कुतुबुद्दीन तुरन्त दिल्ली से लाहौर के लिए चल पड़ा और वहाँ पहुँच कर उसने लाहौर का शासन अपने हाथ में ले लिया।

उसने 24 जून 1206 को लाहौर में ही अपना राज्यारोहण समारोह आयोजित करवाया। उस समय मुहम्मद गौरी की मृत्यु को केवल तीन माह ही हुए थे। तख्त पर बैठने के बाद भी ऐबक ने स्वयं को अमीर, मलिक, सिपहसलार ही कहलवाना जारी रखा तथा सुल्तान की उपाधि का प्रयोग नहीं किया।

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पूरे दो साल तक कुतुबुद्दीन ऐबक बिना सुल्तान बने ही सल्तनत चलाता रहा। उसने न तो अपने नाम की मुद्रायें चलवाईं और न अपने नाम से खुतबा ही पढ़वाया। संभवतः वह गजनी के सुल्तान महमूद बिन गियासुद्दीन से वैमनस्य उत्पन्न किये बिना, भारत में एक स्वतन्त्र तुर्की शासन की स्थापना करना चाहता था।

ई.1208 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपने एक दूत के माध्यम से एक प्रस्ताव सुल्तान महमूद बिन गियासुद्दीन के पास भेजा कि यदि सुल्तान, कुतुबुद्दीन ऐबक को भारत का स्वतन्त्र सुल्तान बना दे तो कुतुबुद्दीन ऐबक ख्वारिज्म के शाह के विरुद्ध गियासुद्दीन महमूद की सहायता करेगा। उस समय ख्वारिज्म का शाह गजनी के लिए बहुत बड़ी मुसीबत बना हुआ था। उसने मुहम्मद गौरी के अंतिम दिनों में ही मुहम्मद गौरी से मध्यएशिया का बहुत बड़ा भूभाग छीन लिया था और अब वह गजनी के राज्य का समाप्त करने पर उतारू था।

गजनी के सुल्तान गियासुद्दीन महमूद ने कुतुबुद्दीन ऐबक का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। ई.1208 में गियासुद्दीन ने कुतुबुद्दीन ऐबक को राजछत्र, ध्वजा, सिंहासन तथा दुंदुभि आदि राज्यसूचक वस्तुएँ भेजीं तथा उसे सुल्तान की उपाधि से विभूषित किया। इस प्रकार कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली का स्वतन्त्र शासक बन गया।


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गजनी के नए सुल्तान महमूद बिन गियासुद्दीन में इतनी योग्यता नहीं थी कि वह मुहम्मद गौरी द्वारा स्थापित विशाल सल्तनत पर शासन कर सके। इसलिए कुछ ही समय बाद सल्तनत के तीन अमीरों द्वारा सल्तनत के विभिन्न भागों पर अधिकार करने की चेष्टाएं आरम्भ हो गईं। ताजुद्दीन यल्दूज ने महमूद बिन गियासुद्दीन को गजनी से हटा दिया तथा पुनः गजनी का सुल्तान बन गया। कुतुबुद्दीन ऐबक पहले ही भारत का स्वतंत्र सुल्तान बन चुका था। मुहम्मद गौरी के समय से ही कुबाचा नामक एक अमीर मुल्तान तथा सिंध क्षेत्र का गवर्नर था। उसने भी स्वयं को गजनी से स्वतंत्र कर लिया। ताजुद्दीन यल्दूज ने ई.1208 में गजनी में एक बड़ी सेना तैयार की और कुबाचा को परास्त करके मुल्तान पर अधिकार कर लिया। इस पर कुबाचा ने कुतुबुद्दीन ऐबक को सहायता के लिए बुलवाया। ऐबक ने एक विशाल सेना लेकर मुल्तान पर आक्रमण किया तथा यल्दूज की सेना को मुल्तान से मार भगाया। इस अवसर पर कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपनी एक पुत्री का विवाह कुबाचा से कर दिया तथा कुबाचा ने जीवन भर कुतुबुद्दीन के प्रति निष्ठा रखने का वचन दिया। मुल्तान विजय के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने आगे बढ़कर गजनी पर भी आक्रमण किया। यल्दूज गजनी छोड़कर भाग गया और गजनी पर कुतुबुद्दीन का अधिकार हो गया।

गजनी के इतिहासकारों के अनुसार ऐबक अपनी विजय से मदांध होकर शराब पीने में व्यस्त हो गया। उसकी सेना ने गजनी के लोगों के साथ बड़ा दुर्व्यवहार किया। इससे तंग आकर गजनी के अमीरों ने यल्दूज को फिर से गजनी में आने के लिए आमन्त्रित किया।

ऐसा प्रतीत होता है कि गजनी के इतिहासकारों ने जानबूझ कर कुतुबुद्दीन पर झूठे आक्षेप लगाए हैं कि वह शराब पीने में व्यस्त हो गया तथा उसकी सेना ने जनता पर अत्याचार किए। कुतुबुद्दीन लम्बे समय से सुल्तान के पद पर कार्य कर रहा था और उसे सुल्तान के द्वारा किए जाने वाले आचरण की जानकारी थी।

वस्तुतः कुतुबुद्दीन ऐबक ई.1192 से दिल्ली का शासक था तथा उसे दिल्ली पर शासन करते हुए 16 साल हो गए थे। इस कारण गजनी वालों के लिए कुतुबुद्दीन ऐबक अब दिल्ली का सुल्तान था। गजनी के लोग यह सहन नहीं कर सकते थे कि दिल्ली का सुल्तान गजनी पर शासन करे और गजनी उसके साम्राज्य का एक प्रान्त बन कर रहे। यह गजनी तथा उसके निवासियों, दोनों के लिये अपमानजनक बात थी।

इसलिए जब गजनी के लोगों ने यल्दूज को फिर से गजनी पर अधिकार करने के लिए आमंत्रित किया तो यल्दूज ने गजनी को अफगानियों के स्वाभिमान का प्रश्न बना दिया। इस कारण गजनी के हजारों युवक यल्दूज की तरफ से लड़ने के लिए आ गए। उनकी सहायता से यल्दूज ने फिर से गजनी पर अधिकार कर लिया।

कुतुबुद्दीन ऐबक को यल्दूज से संधि करनी पड़ी। ऐबक ने यल्दूज को वचन दिया कि अब वह गजनी के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। इस संधि को मजबूत बनाने के लिए कुतुबुद्दीन ऐबक ने यल्दूज की बेटी से ब्याह कर लिया।

इस प्रकार कुतुबुद्दीन ने कुबाचा और यल्दूज दोनों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर लिए तथा भविष्य में होने वाले संघर्षों को टाल दिया ताकि वह शांति पूर्वक दिल्ली पर शासन कर सके। कुतुबुद्दीन के भाग्य से ख्वारिज्म के शाह ने गौर प्रदेश पर अधिकार कर लिया जिससे गजनी सल्तनत की नींव हिल गई तथा ई.1215 के आते-आते गजनी सल्तनत पूरी तरह समाप्त हो गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत का राजमुकुट युद्ध के मैदानों में मिला था कुतुबुद्दीन ऐबक को (44)

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भारत का राजमुकुट - www.bharatkaitihas.com
भारत का राजमुकुट युद्ध के मैदानों में मिला था कुतुबुद्दीन ऐबक को

गजनी के एक कुरूप गुलाम के सिर पर भारत का राजमुकुट सज गया किंतु उसे भारत का राजमुकुट किसी की कृपा से प्राप्त नहीं हुआ था। उसने यह मुकुट युद्ध के मैदानों में तलवार के जोर पर हासिल किया था।

कुतुबुद्दीन ऐबक ने गजनी के सुल्तान यल्दूज तथा मुल्तान के सुल्तान कुबाचा से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करके अपने राज्य की पश्चिमी सीमाओं को सुरक्षित बना लिया था। अब वह बड़ी शान से राजमुकुट धारण करके दिल्ली में बैठा। उसने एक ऐसी सल्तनत की नींव डाली थी जो अगले सवा तीन सौ साल तक अस्तित्व में रहने वाली थी।

कुतुबुद्दीन ऐबक के इतिहास में आगे बढ़ने से पहले हम युद्ध और विजयों के सम्बन्ध में कही जाने वाली एक लैटिन कहावत की चर्चा करेंगे। ईसा के जन्म से 47 साल पहले रोमन योद्धा जूलियस सीजर ने अपने लिए कहा था- ‘मैं आया, मैंने देखा और मैंने जीत लिया।’

इसी प्रकार अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी के फ्रांसीसी योद्धा नेपोलियन बोनापार्ट ने अपने बारे में कहा था- ‘फ्रांस का राजमुकुट मैंने युद्ध के मैदानों में पड़ा हुआ देखा, मैंने उसे अपनी तलवार से उठा लिया!’

भारत में तुर्की इतिहास के संदर्भ में इनमें से पहली कहावत मुहम्मद गौरी पर लागू होती है- ‘वह आया, उसने देखा और जीत लिया।’ जबकि दूसरी कहावत कुतुबुद्दीन ऐबक पर लागू होती है- ‘भारत का राजमुकुट उसे युद्ध के मैदानों में गिरा हुआ मिला।’

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ऐबक किसी सुल्तान का बेटा नहीं था, अपितु मध्यएशिया के बाजारों में पशुओं की तरह बिका हुआ एक निरीह गुलाम था। यदि बारहवीं सदी के गला-काट बेरहम युग में एक तुच्छ गुलाम दिल्ली का सुल्तान बना था तो उसके पीछे केवल उसका भाग्य ही काम नहीं कर रहा था। उसका उद्यम, परिश्रम, संघर्ष और उसके द्वारा चलाई गई तलवारें भी उसे सुल्तान के तख्त तक लेकर आए थे।

मुहम्मद गौरी ने भले ही उत्तरी भारत के बहुत बड़े हिस्से को अपनी तलवार की धार पर जीत लिया था किंतु इस विशाल भू-भाग पर अधिकार बनाए रखना, उसे जीतने की अपेक्षा कहीं अधिक दुष्कर था। इसके लिए कुतुबुद्दीन ऐबक को बहुत परिश्रम करना था। उसे मृत्यु-पर्यंत तलवार को कसकर पकड़े रखना ही था। वह स्वयं भी इस बात को समझता था कि जिस भी क्षण उसके हाथ से तलवार छूटेगी, उसी क्षण यह सल्तनत मुट्ठी में पकड़ी हुई रेत की तरह फिसल जाएगी। भारत में उसके शत्रुओं की कमी नहीं थी।

खलीक अहमद निजामी ने लिखा है- ‘यदि भारतीय जनता ने भारत में तुर्की शासन की स्थापना का प्रतिरोध किया होता तो गौरवंशी, भारतीय क्षेत्र में एक इंच भी भूमि नहीं जीत सकते थे।’

खलीक अहमद का यह कहना गलत है कि भारतीय जनता ने तुर्की शासन का विरोध नहीं किया था। वास्तविकता यह है कि पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के बाद भी भारतीय प्रतिरोध समाप्त नहीं हुआ था। भारत के प्रमुख हिन्दू राजा उसी दिन से अपनी खोई हुई स्वतन्त्रता को पुनः प्राप्त करने के लिए प्रयास करने लगे थे जिस दिन से पृथ्वीराज चौहान ने तराइन का मैदान हारा था।

इस कारण मेरठ, बरन (अब बुलंदशहर), कोयल (अब अलीगढ़), चंदावर, बयाना, ग्वालियर, गुजरात, कालिंजर तथा बदायूं आदि अनेक क्षेत्रों में कुतुबुद्दीन ऐबक को हिन्दू राजाओं एवं हिन्दू सरदारों का सशस्त्र प्रतिरोध झेलना पड़ा। हांसी (अब हिसार जिले में), दिल्ली तथा अजमेर में उसे राजपूतों के भयानक विद्रोहों का सामना करना पड़ा।

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ई.1208 में जिस समय कुतुबुद्दीन ऐबक मुल्तान तथा गजनी के अभियान में व्यस्त था, उस समय अवसर देखकर चंदेल राजपूतों ने अपनी राजधानी कालिंजर पर फिर से अधिकार स्थापित कर लिया था। चंदेलों ने न केवल कालिंजर पर अपितु अजयगढ़, झांसी, सौगोर, बिजवार, पन्ना और छत्तरपुर आदि अपने सभी पुराने क्षेत्र मुसलमानों से मुक्त करवा लिए। गहड़वाल राजपूतों ने हरिश्चन्द्र के नेतृत्व में फर्रूखाबाद तथा बदायूँ में फिर से धाक जमा ली थी। ग्वालियर फिर से प्रतिहार राजपूतों के हाथों में चला गया था। अन्तर्वेद (गंगा-यमुना के बीच के प्रदेश) में भी कई छोटे-छोटे राज्यों ने दिल्ली सल्तनत को कर देना बन्द कर दिया था और तुर्कों को इस क्षेत्र से बाहर निकाल दिया था। हांसी में जटवन नामक एक हिन्दू सरदार ने तुर्की सेना को घेर लिया। ऐबक को दिल्ली से एक बड़ी सेना लेकर हांसी पहुंचना पड़ा और इस विद्रोह को दबाना पड़ा। जटवन बागड़ के पास हुए युद्ध में काम आया। बरन नामक स्थान पर चंद्रसेन के नेतृत्व में डोर राजपूतों ने विद्रोह का झण्डा बुलंद कर दिया। कुतुबुद्दीन ऐबक वहाँ भी सेना लेकर पहुंचा और उसने डोर राजपूतों के नेता चंद्रसेन का दमन किया। कहते हैं कि चंद्रसेन का एक सम्बन्धी अजयपाल चंद्रसेन को धोखा देकर कुतुबुद्दीन ऐबक से मिल गया, इस कारण डोर राजपूत हार गए।

मेरठ में भी हिन्दुओं ने विद्रोह किया किंतु कुतुबुद्दीन ऐबक ने मेरठ का विद्रोह भी सफलतापूर्वक दबा दिया तथा वहाँ तुर्की सैनिकों की एक टुकड़ी तैनात कर दी।

ई.1193 में दिल्ली के तोमरों ने कुतुबुद्दीन ऐबक के विरुद्ध फिर से हथियार उठा लिए। इस पर ऐबक ने तोमरों को बुरी तरह परास्त किया। इसी बीच अजमेर में चौहान राजपूतों ने भयानक विद्रोह किया। इस विद्रोह की हम आगे चलकर विस्तार से चर्चा करेंगे।

इस प्रकार निश्चय पूर्वक कहा जा सकता है कि कुतुबुद्दीन ऐबक को मुहम्मद गौरी ने दिल्ली का गवर्नर भले ही बना दिया हो किंतु गवर्नर से सुल्तान बनने तथा भारत का राजमुकुट सुल्तान के सिर पर सजे रहने के लिए कुतुबुद्दीन को जीवन भर तलवार चलानी पड़ी थी। वह चारों ओर शत्रुओं से घिरा हुआ था। हर समय मौत का खतरा उसके सिर पर मण्डराता रहता था। हिन्दू राजा एवं सरदार जो कि इस देश के वास्तविक स्वामी थे तथा जिन्हें कुतुबुद्दीन ऐबक और उसके सेनापति विद्रोही कहते थे, प्राण-प्रण से अपनी भूमि फिर से प्राप्त करने के लिए जूझ रहे थे।

कुतुबुद्दीन ऐबक को जितना भय इन विद्रोही हिन्दू राजाओं से था, उससे कहीं अधिक भय मध्य-एशिया की तरफ से होने वाले आक्रमण का था क्योंकि ख्वारिज्म के शाह की दृष्टि गजनी तथा दिल्ली पर लगी हुई थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सैयद हुसैन खनगसवार मीरन को राजपूतों ने मार डाला (45)

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सैयद हुसैन खनगसवार मीरन को राजपूतों ने मार डाला

कुतुबद्दीन ऐबक ने सैयद हुसैन खनगसवार मीरन साहिब को अजमेर का दरोगा नियुक्त किया। इस प्रकार बारहवीं शताब्दी के अंत में अजमेर के चौहान नेपथ्य में चले गये तथा शाकंभरी राज्य पूरी तरह लुप्त हो गया।

दिल्ली सल्तनत का सुल्तान बनने के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक को रावी से लेकर ब्रह्मपुत्र की घाटी तक हिन्दू राजाओं एवं सरदारों द्वारा स्वतंत्र होने के लिए किए गए सशस्त्र प्रयासों का सामना करना पड़ा था। हम अपनी पूर्व में चर्चा कर चुके हैं कि ई.1192 में शहाबुद्दीन गौरी, स्वर्गीय राजा पृथ्वीराज चौहान के पुत्र गोविंदराज को अजमेर की गद्दी पर बैठाकर पुनः दिल्ली लौट गया।

जब वह दिल्ली से गजनी जा रहा था, तब एक चौहान सरदार ने हांसी के निकट मुहम्मद गौरी का मार्ग रोका। ताजुल मासिर के लेखक हसन निजामी ने इस चौहान मुखिया का नाम नहीं लिखा है। हसन निजामी के अनुसार कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा इस चौहान मुखिया का वध किया गया। कुछ भाट-ग्रंथों में इस चौहान मुखिया को पृथ्वीराज का बड़ा पुत्र रेणसी बताया गया है जो इस युद्ध में काम आया।

वस्तुतः पृथ्वीराज के किसी भी पुत्र का नाम रेणसी नहीं था। अतः हांसी के निकट मुहम्मद गौरी का मार्ग रोकने वाला चौहान योद्धा पृथ्वीराज का पुत्र न होकर कोई और रेणसी रहा होगा।

हसन निजामी ने लिखा है कि जब शहाबुद्दीन गौरी कुतबुद्दीन ऐबक को भारत में विजित क्षेत्रों का गवर्नर नियुक्त करके गजनी चला गया तब पृथ्वीराज चौहान के छोटे भाई हरिराज ने पृथ्वीराज के पुत्र गोविन्दराज को अजमेर से मार भगाया तथा स्वयं अजमेर का राजा बन गया क्योंकि गोविंदराज ने मुसलमानों की अधीनता स्वीकार कर ली थी।

इस समय कुतुबद्दीन ऐबक, बनारस, कन्नौज तथा कोयल (अलीगढ़) में हिन्दू विरोध से निबटने में व्यस्त था। इस कारण कुतुबुद्दीन ऐबक गोविंदराज को कोई सहायता उपलब्ध नहीं करा सका। इसलिए गोविंदराज अजमेर का दुर्ग खाली करके रणथंभौर चला गया।

हरिराज ने अजमेर पर अधिकार करके रणथंभौर को घेर लिया। गोविंदराज ने पुनः कुतुबुद्दीन ऐबक से सहायता मांगी। जब कुतुबुद्दीन ऐबक की सेना गोविंदराज की सहायता के लिये आई तो हरिराज रणथम्भौर का घेरा उठाकर अजमेर चला आया।

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ई.1194 में हरिराज ने अपने सेनापति चतरराज को दिल्ली पर आक्रमण करने के लिये भेजा। कुतुबुद्दीन ऐबक ने चतरराज को परास्त कर दिया। चतरराज फिर से अजमेर लौट आया। कुतुबुद्दीन ऐबक ने चतरराज का पीछा किया तथा वह भी सेना लेकर अजमेर आ गया और उसने तारागढ़ घेर लिया। हरिराज ने आगे बढ़कर कुतुबुद्दीन पर आक्रमण किया किंतु थोड़े से संघर्ष के बाद हरिराज परास्त हो गया।

हम्मीर महाकाव्य के अनुसार अपनी पराजय निश्चित जानकर हरिराज और उसका सेनापति जैत्रसिंह, अपने स्त्री समूह सहित, जीवित ही अग्नि में प्रवेश कर गये। इस प्रकार ई.1195 में अजमेर पर फिर से मुसलमानों का अधिकार हो गया। कुतुबद्दीन ऐबक ने सैयद हुसैन खनगसवार मीरन साहिब को अजमेर का दरोगा नियुक्त किया। इस प्रकार बारहवीं शताब्दी के अंत में अजमेर के चौहान नेपथ्य में चले गये तथा शाकंभरी राज्य पूरी तरह लुप्त हो गया।

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सम्राट पृथ्वीराज चौहान को वीरगति प्राप्त हुए 10 साल बीत गए थे किंतु अजमेर के चौहान अब भी अजमेर को स्वतंत्र कराने का स्वप्न देखते रहे। 12 अप्रेल 1202 की रात में, तारागढ़ के आसपास रहने वाले राठौड़ों एवं चौहानों के एक समूह ने अजमेर दुर्ग पर आक्रमण किया। राजपूत सैनिक किसी तरह बीठली दुर्ग में घुसने में सफल हो गए। रात के अंधेरे में दोनों पक्षों के बीच भयानक युद्ध हुआ जिसमें दुर्ग के भीतर स्थित समस्त मुस्लिम सैनिकों को मार डाला गया। राजपूतों ने दरोगा सैयद हुसैन खनगसवार मीरन को भी मार डाला। इस प्रकार अजमेर दुर्ग एक बार फिर से हिन्दुओं के अधिकार में आ गया। दुर्ग से भागे हुए मुस्लिम सिपाही जब यह समाचार लेकर दिल्ली पहुँचे तो कुतबुद्दीन ऐबक के होश उड़ गये। इस समय उसकी सेनाएं चारों दिशाओं में फैली हुई थीं तथा हिन्दू राजाओं एवं सरदारों से उलझी हुई थीं। इसलिए कुतुबुद्दीन ऐबक ने गजनी से सेना मंगवाई। गजनी से आई विशाल सेना ने राजपूतों से बीठली का दुर्ग फिर से छीन लिया तथा अजमेर में कत्लेआम किया। गजनी की सेना का यह प्रतिशोध बहुत भयानक था। गजनी से आई सेना ने तारागढ़ में स्थित राजपूत सैनिकों को मारने के बाद दुर्ग के बाहर रहने वाले राजपूत परिवारों को पकड़कर उनकी सुन्नत की और उन्हें मुसलमान बनाया।

इस्लाम में परिवर्तित होने के बाद ये राजपूत परिवार तारागढ़ के निकट ही रहने लगे। बाद में इन्हें देशवाली मुसलमान कहा जाने लगा। गजनी एवं गौर से आए मुसलमानों द्वारा इन्हें बहुत नीची दृष्टि से देखा जाता था। गजनी के मुसलमानों द्वारा देशवाली मुसलमानों को बराबर का स्तर नहीं दिया गया। उन्हें सेना में भी भर्ती नहीं किया जाता था। इसलिये देशवाली मुसलमान उपेक्षित जीवन जीने लगे और उनकी आर्थिक दशा दिन पर दिन गिरने लगी। 

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बख्तियार खिलजी ने नालंदा एवं विक्रमशिला के बौद्ध भिक्षुओं को क्रूरता से मारा (46)

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बख्तियार खिलजी ने नालंदा एवं विक्रमशिला के बौद्ध भिक्षुओं को क्रूरता से मारा

इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने नालंदा एवं विक्रमशिला में निहत्थे आचार्यों, बटुकों, बौद्ध भिक्षुओं तथा स्नातकों के साथ उसी निर्दयता, नृशंसता एवं क्रूरता का प्रदर्शन किया जो मुहम्मद गौरी ने अजमेर में चौहानों के साथ एवं कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली में तोमरों के साथ किया था।

ई.1206 में कुतुबुद्दीन ऐबक मुल्तान एवं गजनी के अभियान पर गया तो भारत के अन्य भू-भागों की तरह बंगाल से भी उसे बड़ी चुनौती मिली। इस चुनौती का इतिहास जानने से पहले हमें एक बार ई.1193 में लौटना होगा जब कुतुबुद्दीन ऐबक ने इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी नामक एक सेनापति को बिहार की तरफ अभियान करने के लिए भेजा था।

बख्तियार खिलजी बड़ी तेजी से बिहार की ओर बढ़ा। उसने मार्ग में पड़ने वाले नगरों, गांवों और कस्बों को उजाड़कर वीरान बना दिया। देखते ही देखते उसने बिहार पर भी अधिकार कर लिया। उन दिनों बिहार में नालंदा एवं विक्रमशिला के विश्वविद्यालय अपने चरम पर थे। ये दोनों विश्वविद्यालय भारत की पश्चिमी सीमा पर स्थित तक्षशिला विश्वविद्यालय तथा गुजरात के वलभी विश्वविद्यालय की तरह विश्व-विख्यात थे तथा सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में भारतीय ज्ञान के प्रकाश-स्तंभ की तरह कार्य करते थे।

बख्तियार खिलजी जानता था कि उसकी सेना द्वारा किए गए युद्ध-अभियान तब तक अधूरे हैं जब तक कि भारतीय संस्कृति की जड़ों पर चोट नहीं की जाए। वह यह भी जानता था कि उत्तरी भारत में स्थित हिन्दुओं एवं बौद्धों के मंदिर, मठ, उपाश्रय तो भारतीय संस्कृति को सुशोभित करने वाले पुष्प मात्र हैं। इनके टूटने से भारतीय संस्कृति की चमक-दमक भले ही कुछ कम हो जाए किंतु इससे संस्कृति की जड़ों को कुछ नहीं होगा।

बख्तियार खिलजी अच्छी तरह जानता था कि भारतीय संस्कृति की जड़ें भारत भर में फैले गुरुकुलों, विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों से निकलती हैं। अतः बख्तियार खिलजी ने अपने मार्ग में पड़ने वाले शिक्षा के समस्त केन्द्रों को प्रमुख रूप से निशाने पर लिया। उसने नालंदा एवं विक्रमशिला के विश्वविद्यालयों को जलाकर राख कर दिया। इन विश्वविद्यालयों में चीन, तिब्बत तथा लंका आदि देशों के हजारों विद्यार्थी एवं शिक्षक पढ़ने-पढ़ाने के लिए आया करते थे।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

ये दोनों विश्वविद्यालय पहले वैदिक शिक्षा के केन्द्र हुआ करते थे किंतु बाद में इनमें बौद्ध शिक्षा का बोलबाला हो जाने से इन दोनों विश्वविद्यालयों में बौद्ध भिक्षुओं की प्रमुखता हो गई थी। चूंकि पिछले कई सौ सालों से भारतीय राजाओं में बौद्धधर्म को राजधर्म बनाने का प्रचलन समाप्त हो गया था इसलिए दोनों ही विश्वविद्यालयों में बौद्धधर्म के साथ-साथ वैदिक धर्म के आचार्य एवं स्नातक भी पठन-पाठन करते थे।

बख्तियार खिलजी की क्रूर सेनाएं इन विश्वविद्यालयों में घुस गईं तथा शिक्षकों, स्नातकों, बटुकों एवं बौद्ध भिक्षुओं को बड़ी निर्ममता से मारने लगीं। विश्वविद्यालयों में स्थित आचार्यों एवं विद्यार्थियों के आवास, विहार, पुस्तकालय, यज्ञशालाएं एवं भोजनशालाएं नष्ट कर दिए गए।

बख्तियार खिलजी ने नालंदा एवं विक्रमशिला में निहत्थे आचार्यों, बटुकों, बौद्ध भिक्षुओं तथा स्नातकों के साथ उसी निर्दयता, नृशंसता एवं क्रूरता का प्रदर्शन किया जो मुहम्मद गौरी ने अजमेर में चौहानों के साथ एवं कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली में तोमरों के साथ किया था। कई हजार आचार्यों, बटुकों, बौद्ध भिक्षुओं तथा स्नातकों के सिर धड़ से काटकर धरती पर फैंक दिए गए। महीनों तक उनके शव सड़ते रहे।

इनमें से हजारों विद्यार्थी चीन, तिब्बत, लंका, बर्मा, स्याम, जावा, सुमात्रा, बाली आदि सैंकड़ों देशों एवं द्वीपों से आए हुए थे जो भारत की संस्कृति को सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में प्रसारित करने का काम करते थे। विश्वविद्यालयों की जिन वाटिकाओं एवं कक्षों से वेदमंत्र एवं बौद्ध-सूत्र गूंजा करते थे, वहाँ अब चील, कौए, गिद्ध, सियार एवं श्वान चीखा करते थे।

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विश्वविद्यालयों में स्थित संसार के दुर्लभ ग्रंथों के पुस्तकालय आग के हवाले कर दिए गए जिसके कारण मीलों दूर तक धुआं फैल गया। विश्वविद्यालयों के जिन परिसरों में स्थित यज्ञकुण्डों से हवन के सुवासित वलय उठा करते थे, अब वहाँ से मौत का काला धुआं उठ रहा था। ये दोनों विश्वविद्यालय फिर कभी अस्तित्व में नहीं आ सके। ई.1203 में ऐबक के आदेश पर बख्तियार खिलजी ने बंगाल के शासक लक्ष्मण सेन पर आक्रमण किया। इस युद्ध में लक्ष्मण सेन परास्त हो गया तथा बंगाल का काफी बड़ा हिस्सा बख्तियार खिलजी के अधीन हो गया। उन दिनों बंगाल में देवकोट नामक अत्यंत प्राचीन नगर हुआ करता था। इसे कोटिवर्ष भी कहते थे। यह स्थान इतना पुराना था कि इसका नाम वायु पुराण आदि ग्रंथों में भी मिलता है। इख्तियारुद्दीन ने इसी देवकोट को अपनी राजधानी बनाया। अब यह नगर अस्तित्व में नहीं है किंतु इस नगर के ध्वंसावशेष बंगाल के दिनाजपुर जिले में मिले हैं। बख्तियार खिलजी से परास्त होने के बाद बंगाल के सेन-वंशी शासक पश्चिमी बंगाल के हिस्सों को खाली करके बंगाल के पूर्वी भाग में चले गये परन्तु वे अपने राज्य के खोए हुए हिस्सों को प्राप्त करने के लिए निरंतर सचेष्ट बने रहे।

ई.1206 में इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के उपरान्त बंगाल तथा बिहार के मुस्लिम सेनापतियों ने दिल्ली से अपने सम्बन्ध-विच्छेद करने के प्रयत्न किए। अलीमर्दा खाँ नामक एक अफगान सरदार ने लखनौती को अपनी राजधानी बनाकर स्वतंत्रता पूर्वक शासन करना आरम्भ कर दिया। कुछ समय बाद खिलजी अमीरों ने उसे कैद कर लिया और उसके स्थान पर मुहम्मद शेख को बंगाल और बिहार का शासक बना दिया। अलीमर्दा खाँ कारगार से निकल भागा। उसने दिल्ली पहुँच कर कुतुबुद्दीन ऐबक से, बंगाल में हस्तक्षेप करने के लिए कहा।

कुतुबुद्दीन ऐबक ने अलीमर्दा खाँ के पुराने अपराध माफ करके उसे बिहार एवं बंगाल का गवर्नर बना दिया। इस प्रकार बिहार एवं बंगाल फिर से दिल्ली सल्तनत के अधीन हो गए और रावी के तट से लेकर ब्रह्मपुत्र की घाटी तक कुतुबुद्दीन ऐबक की तलवार की धाक जम गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु (47)

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कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु

ई.1210 में जब कुतुबुद्दीन ऐबक लाहौर में चौगान खेल रहा था तब वह अचानक घोड़े से गिर पड़ा। घोड़े की काठी का उभरा हुआ भाग ऐबक के पेट में घुस गया और इस चोट से कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु हो गई। उसे लाहौर में ही दफना दिया गया।

कुतुबुद्दीन ऐबक के सेनापति इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने नालंदा एवं विक्रमशिला के विश्विविद्यालयों को जलाकर राख कर दिया तथा बंगाल के सेन शासकों को पूर्व की ओर खिसक जाने पर विवश कर दिया। इस प्रकार कुतुबुद्दीन ऐबक ने रावी नदी से लेकर ब्रह्मपुत्र की घाटी तक हो रहे विद्रोहों का दमन कर लिया तथा भारत के बड़े हिस्से पर ऐबक की पकड़ मजबूत हो गई किंतु कुतुबुद्दीन ऐबक जब तक दिल्ली के तख्त पर बैठा रहा, उसे भारतीय हिन्दू नरेशों एवं सामंतों से युद्ध करते रहना पड़ा। इन युद्धों में कई बार कुतुबुद्दीन ऐबक के प्राणों पर बन आई किंतु वह हर बार बच गया।

कुतुबुद्दीन ऐबक के सौभाग्य से इस काल में गजनी ख्वारिज्म के शाह के आक्रमणों से त्रस्त था और भारतीय राजा अपना-अपना राज्य प्राप्त करने के लिए अलग-अलग प्रयास कर रहे थे। उनका कोई संघ तैयार नहीं हो सका जो एक साथ कुतुबुद्दीन की शक्ति को चूर-चूर करके उसे धूल में मिला सकता। गजनी की खराब परिस्थिति के कारण कुतुबुद्दीन स्वयं को भारत पर केन्द्रित कर पा रहा था और भारतीय राजाओं का संघ नहीं बनने के कारण कुतुबुद्दीन उनके विद्रोहों को दबा पा रहा था।

इस काल में भारतीय भले ही संगठित नहीं थे किंतु हिन्दू प्रतिरोध का एक दूसरा पक्ष भी था जो बहुत उजला था। उस काल के भारत में तुर्की सत्ता का विरोध करने वालों में केवल राजा एवं स्थानीय शासक ही नहीं थे, जन सामान्य भी तुर्कों का विरोध करता था जिनमें जाटों, गुर्जरों एवं मेरों की भूमिका उल्लेखनीय थी। इसलिए कुतुबुद्दीन ऐबक ने ऐसे विद्रोहों को दबाने के लिए स्थानीय हिन्दू सैनिकों को अपनी सेना में भरती करना प्रारम्भ किया तथा स्थानीय छोटे सामंतों को नौकरी पर रख लिया जिन्हें रावत, राणा एवं ठाकुर कहते थे। ई.1208 में जब कुतुबुद्दीन ऐबक गजनी के अभियान पर तो उसकी सेना में कई हिन्दू राणा और ठाकुर भी थे।

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विद्रोहों एवं विरोधों के इस काल में बदायूं के राठौड़ों ने स्वयं को दिल्ली की सत्ता से मुक्त करवा लिया किंतु कुतुबुद्दीन ऐबक ने एक सेना भेजकर बदायूं पर फिर से अधिकार कर लिया तथा अपने गुलाम इल्तुतमिश को बदायूं का गवर्नर बना दिया। कालिंजर तथा ग्वालियर पर भी राजपूतों ने फिर से अधिकार कर लिया था किंतु कुतुबुद्दीन ऐबक अपने जीवन काल में इन दोनों स्थानों पर फिर से अधिकार नहीं कर सका।

ई.1210 में जब कुतुबुद्दीन ऐबक लाहौर में चौगान खेल रहा था तब वह अचानक घोड़े से गिर पड़ा। घोड़े की काठी का उभरा हुआ भाग ऐबक के पेट में घुस गया और इस चोट से कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु हो गई। उसे लाहौर में ही दफना दिया गया। उसके लिए एक साधारण सी कब्र बनाई गई तथा उस पर अत्यन्त साधारण स्मारक खड़ा किया गया।

मुहम्मद गौरी के शव की ही भांति कुतुबुद्दीन ऐबक का शव भी न तो शाही परिवार के किसी सदस्य के लिए और न उसके किसी गुलाम के लिए आदरणीय था। कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु से दुनिया में किसी को कोई दुःख नहीं हुआ।

कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के समय तक दिल्ली पर ऐबक का शासन 12 साल तक मुहम्मद गौरी के गवर्नर के रूप में तथा 4 साल तक स्वतंत्र शासक के रूप में रहा। मुहम्मद गौरी के जीवित रहते, ऐबक उत्तर भारत को विजित करने में लगा रहा। स्वतंत्र शासक के रूप में उसका काल अत्यन्त संक्षिप्त था। इस कारण शासक के रूप में उसकी उपलब्धियाँ विशेष नहीं थीं फिर भी अपने चार वर्ष के कार्यकाल में उसने भारत में दिल्ली सल्तनत की जड़ें मजबूत कर दीं।

कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु से भले ही उस काल में दुनिया में किसी को कोई दुःख नहीं हुआ किंतु बाद के इतिहासकारों के लिए कुतुबुद्दीन बहुत महत्वपूर्ण हो गया। भारत के मुस्लिम इतिहासकारों एवं कम्युनिस्ट लेखकों ने कुतुबुद्दीन ऐबक का इतिहास अत्यंत गौरवशाली बना दिया।

मुस्लिम इतिहासकारों ने ऐबक के शासन की प्रशंसा में बड़ी स्तुतियां गाई हैं। उसे उदार, साहसी एवं न्यायप्रिय शासक बताया है। मिनहाज उस् सिराज ने लिखा है- ‘ऐबक ने लोगों को इनाम में एक लाख जीतल देकर लाख-बख्श की ख्याति प्राप्त की।’

फख्र ए तुदब्बिर ने लिखा है- ‘ऐबक ने अपनी सेना में तुर्क, गौरी, खुरासानी, खलजी और हिन्दुस्तानी सैनिक भरती किए। उसने किसानों से बलपूर्वक घास की एक पत्ती तक नहीं ली।’

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16वीं सदी के मुगल दरबारी अबुल फजल ने लिखा है- ‘मुहम्मद गौरी ने भारत में खून की नदियां बहाईं किंतु ऐबक ने लोगों की भलाई के लिए अच्छे और महान काम किए।’ फरिश्ता ने भी ऐबक के शासन की बहुत प्रंशसा की है। यदि हम उस काल के मुस्लिम इतिहासकारों की पुस्तकों को ध्यान से देखें तो स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि ये प्रशंसाएं नितांत झूठी हैं। वास्तविकता तो यह थी कि उसने भारत से हजारों निर्दोष लोगों को पकड़कर गुलाम बनाया और मध्यएशिया के देशों में बिकने के लिए भेज दिया। ऐबक के समकालीन लेखक हसन निजामी ने लिखा है कि अकेले गुजरात अभियान में ही ऐबक ने बीस हजार लोगों को पकड़ कर गुलाम बनाया। इरफान हबीब ने इन आंकड़ों को गलत एवं ज्यादा बताया है। जबकि वास्तविकता यह थी कि वास्तविक आंकड़े लाखों में रहे होंगे क्योंकि 20 हजार गुलामों का आंकड़ा तो केवल गुजरात अभियान का है। मुस्लिम इतिहासकारों ने ऐबक के न्याय तथा उदारता की मुक्त-कण्ठ से प्रशंसा की है और लिखा है कि उसके शासन में भेड़ तथा भेड़िया एक ही घाट पर पानी पीते थे। उसने अपनी प्रजा को शांति प्रदान की जिसकी उन दिनों बड़ी आवश्यकता थी। सड़कों पर डाकुओं का भय नहीं रहता था और शाँति तथा सुव्यवस्था स्थापित थी

भारत के मुस्लिम इतिहासकारों का यह वर्णन गजनी के मुस्लिम इतिहासकारों के वर्णन से मेल नहीं खाता। गजनी के इतिहासकारों के अनुसार ई.1208 में जब ऐबक ने गजनी पर अधिकार किया तब वह मद्यपान में व्यस्त हो गया तथा उसकी सेना ने गजनी-वासियों के साथ बड़ा दुर्व्यवहार किया जिससे दुःखी होकर गजनी की जनता ने पुराने शासक यल्दूज को गजनी पर पुनः आक्रमण करने के लिये आमंत्रित किया। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब ऐबक ने अपनी मातृभूमि गजनी में इतना भयानक रक्तपात किया तब वह भारत में आदर्श शासन कैसे स्थापित कर सकता था?

वास्तविकता यह थी कि युद्ध के समय ऐबक ने सहस्रों हिन्दुओं की हत्या करवाई और सहस्रों हिन्दुओं को गुलाम बनाया। इस पर भी भारत के मुस्लिम इतिहासकारों ने उसकी यह कहकर प्रशंसा की है कि शांतिकाल में उसने हिन्दुओं के साथ उदारता का व्यवहार किया। जबकि वास्तविकता यह है कि उसने हिन्दुओं की धार्मिक स्वतंत्रता छीन ली। उसने हिन्दुओं के मन्दिरों को तुड़वाकर उनके स्थान पर मस्जिदों का निर्माण करवाया। उसके शासन में हिन्दू दूसरे दर्जे के नागरिक थे। उन्हें शासन में उच्च पद नहीं दिये गये।

यदि फिर भी मुस्लिम लेखक यह लिखते हैं कि उसके शासन में भेड़ और भेड़िए एक ही घाट पर पानी पीते थे तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि भेड़ कौन थे और भेड़िए कौन थे? उस काल में भेड़ियों को क्या पड़ी थी जो वे भेड़ों को अपने घाट पर पानी पीने देते? जो भेड़ें भेड़ियों के घाट पर पानी पी रही थीं तो उन्हें इस पानी की क्या कीमत चुकानी पड़ रही थी?

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

विध्वंसक कुतुबुद्दीन ऐबक को महान् निर्माता कहा गया (48)

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विध्वंसक कुतुबुद्दीन ऐबक को महान् निर्माता कहा गया

मुस्लिम इतिहासकारों एवं कम्युनिस्ट लेखकों ने विध्वंसक कुतुबुद्दीन ऐबक को इतिहास की पुस्तकों में महान् निर्माता कहा है जिसके राज्य में भेड़ और भेड़िए एक ही घाट पर पानी पीते थे। भारत में आजादी के बाद की पीढ़ी ने यही इतिहास पढ़कर बड़ी-बड़ी परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं और बड़े-बड़े पद प्राप्त किए।

कुतुबुद्दीन ऐबक ने हजारों भारतीय नागरिकों का कत्ले आम किया तथा हजारों भारतीयों को गुलाम बनाकर मध्य-एशिया के बाजारों में बिकने के लिए भेजा फिर भी भारत के मुस्लिम इतिहासकारों ने उसकी वीरता, उदारता एवं न्यायप्रियता का गुणगान करते हुए उसे महान् निर्माता के रूप में चित्रित किया है। डॉ. हबीबुल्ला ने ऐबक के कार्यों का मूल्यांकन करते हुए लिखा है- ‘वह महान् शक्ति तथा महान् योग्यता का सैनिक नेता था। उसमें एक तुर्क की वीरता के साथ-साथ पारसीक की सुरुचि तथा उदारता विद्यमान् थी।’

वास्तविकता यह है कि विध्वंसक कुतुबुद्दीन ऐबक को अपने संक्षिप्त शासन काल में भवन बनवाने का समय ही नहीं मिला। उसने दिल्ली तथा अजमेर के प्रसिद्ध हिन्दू भवनों को तोड़कर उनमें मस्जिदें बनवाईं।

विध्वंसक कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली के निकट महरौली गांव में मंदिरों को तोड़कर कुव्वत-उल-इस्लाम नामक मस्जिद का निर्माण करवाया जिसका अर्थ होता है- ‘इस्लाम की शक्ति।’ इस मस्जिद को इस्लाम द्वारा दिल्ली पर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में बनवाया गया। इसके निर्माण के लिए सामग्री प्राप्त करने हेतु इस क्षेत्र में स्थित 27 हिन्दू मंदिरों का विध्वंस किया गया। इस मस्जिद की बाहरी शैली हिन्दू स्थापत्य की है। मस्जिद के इबादतखाने में बड़ी सुन्दर खुदाइयाँ मौजूद हैं जो प्राचीन हिन्दू मंदिरों की याद दिलाती हैं।

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ऐबक की बनवाई हुई दूसरी प्रसिद्ध इमारत कुतुबमीनार है। वैसे तो यह एक विजय स्तम्भ है किंतु कुतुबुद्दीन ऐबक ने इस मीनार को ख्वाजा मुईनद्दीन चिश्ती के शिष्य ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की स्मृति में ई.1199 में बनवाना आरम्भ किया किंतु यह ई1221 में बनकर पूरी हुई, उस समय दिल्ली पर कुतुबुद्दीन के गुलाम इल्तुतमिश का शासन था।

ई.1200 में विध्वंसक कुतुबुद्दीन ऐबक ने अजमेर की चौहान कालीन संस्कृत पाठशाला को तोड़कर उसके परिसर में एक मस्जिद बनवाई। बाद में इस परिसर में पंजाबशाह की स्मृति में अढ़ाई दिन का उर्स भरने लगा। तब से इसे अढ़ाई दिन का झौंपड़ा कहने लगे। बहुत से लोग समझते हैं कि इसका निर्माण ढाई दिन में किया गया था। इस मस्जिद के भीतर खड़े स्तम्भों एवं गुम्बदों की कलात्मक खुदाई इसके हिन्दू भवन होने की घोषणा करती है।

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ऐबक का शासन सैनिक बल पर अवलम्बित था। उसके साथ सदैव एक प्रबल सेना रहती थी। इसके साथ ही, सल्तनत के अन्य भागों में भी महत्त्वपूर्ण स्थानों में सेना रखी जाती थी। राजधानी दिल्ली तथा प्रान्तीय नगरों का शासन मुसलमान अधिकारियों के हाथों में था। इन अधिकारियों की इच्छा ही कानून थी। ग्रामीण क्षेत्रों में कर-वसूली का काम अब भी हिन्दू कर्मचारियों के हाथों में था और लगान-सम्बन्धी पुराने नियम ही चालू रखे गये थे। ऐबक द्वारा कोई व्यवस्थित न्याय विधान स्थापित नहीं किया गया। इस कारण न्याय की व्यवस्था असन्तोषजनक थी। काजियों की मर्जी ही सबसे बड़ा कानून थी। सल्तनतकालीन इतिहासकार कुतुबुद्दीन ऐबक की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं क्योंकि उसने भारत में मुस्लिम शासन की नींव रखी। हमें भी ऐबक के चरित्र तथा कार्यों का मूल्यांकन करने के लिये उन्हीं के विवरण पर निर्भर रहना पड़ता है। सल्तनत कालीन इतिहासकार ऐबक की कितनी ही प्रशंसा क्यों न करें, वास्तविकता यह थी कि एक आक्रांता के रूप में उसकी समस्त अच्छाइयाँ मुस्लिम प्रजा के लिये थीं जो कि उस समय मुट्ठी भर थी और जिसकी खुशहाली पर ऐबक के शासन की मजबूती निर्भर करती थी। शासन की दृष्टि में हिन्दू प्रजा काफिर थी जिसे मुस्लिम प्रजा के बराबर अधिकार प्राप्त नहीं थे।

विध्वंसक कुतुबुद्दीन ऐबक युद्ध में तलवार चलाना तो जानता था किंतु उसमें रचनात्मक प्रतिभा नहीं थी। उसने भारत में हिन्दू शासन को तो नष्ट किया किंतु अपनी ओर से कोई सुदृढ़़, संगठित एवं व्यवस्थित शासन व्यवस्था स्थापित नहीं कर सका। न ही उसने कोई शासन सम्बन्धी सुधार किये। उसने हिन्दू प्रजा पर उन काजियों को थोप दिया जो इस्लाम के अनुसार काफिर प्रजा का न्याय करते थे।

ऐबक की उदारता तथा दानशीलता मुसलमानों तक ही सीमित थी। हिन्दुओं के साथ वह सहिष्णुता की नीति का अनुसरण नहीं कर सका। उसने हजारों हिन्दुओं की हत्या करवाई, हजारों हिन्दुओं को गुलाम बनाकर मध्यएशिया के बाजारों में बिकने के लिए भेजा, सैंकड़ों मन्दिरों का विध्वंस करके काफिर हिन्दुओं को दण्डित किया तथा मुस्लिम इतिहासकारों से प्रशंसा प्राप्त की।

मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार कुतुबुद्दीन ऐबक को साहित्य तथा कला से भी प्रेम था। हसन निजामी तथा फखरे मुदीर आदि विद्वानों को उसका आश्रय प्राप्त था जबकि वास्तविकता यह है कि उसके काल में संगीत कला, चित्र कला, नृत्य कला, स्थापत्य कला, शिल्प कला, मूर्ति कला आदि कलाओं का कोई विकास नहीं हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बुखारा का गुलाम इल्तुतमिश दिल्ली का सुल्तान बन गया (49)

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बुखारा का गुलाम इल्तुतमिश दिल्ली का सुल्तान बन गया

कुतुबुद्दीन ऐबक के बाद आरामशाह नामक लड़का दिल्ली का सुल्तान हुआ किंतु कुछ ही दिनों में अमीरों के निमंत्रण पर बुखारा का गुलाम इल्तुतमिश दिल्ली सल्तनत के तख्त पर बैठ गया।

जिस विध्वंसक कुतुबुद्दीन ऐबक ने उत्तरी भारत में हिंसा, विध्वंस एवं विनाश का ताण्डव किया, उसे निजामी एवं हबीबुल्ला जैसे मुस्लिम इतिहासकारों ने महान् सुल्तान बताकर उसका गुणगान किया। अल्लाउद्दीन नामक एक लेखक ने अपनी पुस्तक ‘तारीख-ए-जहान गुशा’ में लिखा है कि कुतुबुद्दीन ऐबक के कोई पुत्र नहीं था। मिनहाज उस् सिराज ने लिखा है कि कुतुबुद्दीन ऐबक के तीन पुत्रियां थीं। इनमें से बड़ी पुत्री का विवाह मुल्तान के शासक कुबाचा के साथ हुआ था।

जब इस बड़ी पुत्री की मृत्यु हो गई तो कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपनी दूसरी पुत्री का विवाह भी कुबाचा से कर दिया। कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपनी तीसरी पुत्री का विवाह इल्तुतमिश नामक एक गुलाम के साथ किया जो ऐबक की सेना में उच्च पद पा गया था।

कुछ लेखकों के अनुसार कुतुबुद्दीन के एक पुत्र था जिसका नाम आरामशाह था। वह लाहौर का सूबेदार था। ई.1210 में कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के बाद, लाहौर के तुर्क सरदारों ने कुतुबुद्दीन ऐबक के पुत्र आरामशाह को भारत का सुल्तान घोषित कर दिया किंतु दिल्ली के अमीर नहीं चाहते थे कि लाहौर के अमीरों की पसंद का व्यक्ति दिल्ली का सुल्तान बने क्योंकि इससे साम्राज्य में अधिकांश उच्च पद तथा सम्मानित स्थान लाहौर के अमीरों को ही प्राप्त हो जाते तथा दिल्ली के अमीर उपेक्षित हो जाते।

अतः दिल्ली के अमीरों ने आरामशाह को गद्दी से हटाने के प्रयत्न आरम्भ किए। उन्होंने ऐबक के दामाद और बदायूं के गवर्नर इल्तुतमिश को दिल्ली के तख्त पर बैठने के लिए आमन्त्रित किया। आरामशाह को हटाकर इल्तुतमिश को सुल्तान बनाने के लिए आमंत्रित करने से ऐसा लगता है कि आरामशाह कुतुबुद्दीन ऐबक का पुत्र नहीं था।

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दिल्ली के अमीरों का निमंत्रण पाकर बुखारा का गुलाम इल्तुतमिश अपनी सेना के साथ बदायूँ से दिल्ली की ओर चल दिया। आरामशाह भी लाहौर से दिल्ली की ओर चला परन्तु दिल्ली के अमीरों ने आरामशाह का स्वागत नहीं किया। इस पर दिल्ली नगर के बाहर आरामशाह तथा इल्तुतमिश की सेनाओं में मुठभेड़ हुई। इस मुठभेड़ में आरामशाह पराजित हुआ और बंदी बना लिया गया।

दिल्ली के अमीरों ने इल्तुतमिश को दिल्ली का नया सुल्तान घोषित कर दिया। इस प्रकार ई.1211 में बुखारा का गुलाम इल्तुतमिश दिल्ली का सुल्तान बन गया। ऐबक वंश का अन्त हो गया और उसके स्थान पर इल्बरी तुर्कों के शम्सी वंश का राज्य स्थापित हो गया।

इल्तुतमिश का पिता आलम खाँ तुर्कों के इल्बरी कबीले का प्रधान व्यक्ति था। इल्तुतमिश बाल्यकाल से प्रतिभाशाली तथा रूपवान था। इस कारण उसे अपने पिता की विशेष कृपा तथा वात्सल्य प्राप्त था। इससे अन्य भाइयों तथा सम्बन्धियों को इल्तुतमिश से बड़ी ईर्ष्या होती थी।

वे लोग बालक इल्तुतमिश को घर से बहकाकर ले गये और बुखारा जाने वाले घोड़ों के एक सौदागर के हाथों बेच दिया। घोड़ों के सौदागर ने बालक इल्तुतमिश को बुखारा के मुख्य काजी के एक सम्बन्धी को बेच दिया। इस प्रकार वह बुखारा का गुलाम इल्तुतमिश के रूप में जाना गया।

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इसके बाद इल्तुतमिश दो बार और बेचा गया। अन्त में जमालुद्दीन नामक एक सौदागर इल्तुतमिश को गजनी ले गया। गजनी के सुल्तान मुहम्मद गौरी के एक अनुचर की दृष्टि इल्तुतमिश पर पड़ी। उसने सुल्तान से इल्तुतमिश की प्रशंसा की परन्तु मूल्य का निर्णय न होने से उस समय इल्तुतमिश खरीदा नहीं जा सका। इस पर इल्तुतमिश को बेचने के लिए भारत लाया गया। कुछ दिनों के उपरान्त कुतुबुद्दीन ऐबक ने इल्तुतमिश को दिल्ली में खरीद लिया। इस प्रकार इल्तुतमिश मुहम्मद गौरी के गुलाम का गुलाम था। ई.1205 में जब मुहम्मद गौरी ने पंजाब में खोखरों के विरुद्ध अभियान किया तो उसमें इल्तुतमिश ने असाधारण पराक्रम का परिचय दिया। इससे प्रसन्न होकर मुहम्मद गौरी ने कुतुबुद्दीन को आदेश दिया कि वह इल्तुतमिश को गुलामी से मुक्त कर दे तथा उसके साथ अच्छा व्यवहार करे। इसके बाद ऐबक इल्तुतमिश के साथ सौम्य व्यवहार करने लगा तथा उसे सदैव अपने साथ रखने लगा। कुतुबुद्दीन ऐबक ने इल्तुतमिश को ‘सर जानदार’ के पद पर नियुक्त किया और बाद में ‘अमीरे शिकार’ बना दिया। जब ग्वालियर पर कुतुबुद्दीन का अधिकार स्थापित हो गया तब इल्तुतमिश को वहाँ का अमीर नियुक्त किया गया। कुतुबुद्दीन ने अपनी एक पुत्री कुतुब बेगम का विवाह इल्तुतमिश के साथ कर दिया तथा जब कुतुबुद्दीन सुल्तान बना तो उसने इल्तुतमिश को बदायूँ का गवर्नर नियुक्त कर दिया।

कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के समय इल्तुतमिश बदायूं का गवर्नर था। जिस समय लाहौर के अमीरों ने आरामशाह को ऐबक का उत्तराधिकारी घोषित किया, उस समय दिल्ली का सेनापति अली इस्माइल, दिल्ली के मुख्य काजी के पद पर भी कार्य कर रहा था। उसने कुछ अमीरों को अपने साथ मिलाकर, इल्तुतमिश को सुल्तान बनने के लिये दिल्ली आमंत्रित किया।

इससे इल्तुतमिश को दिल्ली की सेना एवं अमीरों का विश्वास प्राप्त हो गया। इल्तुतमिश ने पहले भी कई अवसरों पर अपने रण-कौशल का परिचय दिया था इसलिये सेना तथा अमीर उसकी नेतृत्व-प्रतिभा से परिचित थे।

आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि जब उच के शासक नासिरुद्दीन कुबाचा को आरामशाह तथा इल्तुतमिश के संघर्ष की जानकारी मिली तो उसने स्वयं को उच तथा मुल्तान का स्वतंत्र सुल्तान घोषित कर दिया। अवसर देखकर बंगाल के शासक अलीमर्दान ने भी स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया।

इस प्रकार कुछ समय के लिए दिल्ली सल्तनत चार स्वतंत्र राज्यों में विभक्त हो गई। इनमें से पहला राज्य उच तथा मुल्तान था जिसका सुल्तान कुबाचा था। दूसरा राज्य लाहौर तथा दिल्ली था जिसका सुल्तान आरामशाह था, तीसरा राज्य बदायूं था जिसका सुल्तान इल्तुतमिश था और चौथा राज्य बिहार एवं बंगाल था जिसका सुल्तान अलीमर्दान था। यह स्थिति लगभग आठ माह तक रही।

दिल्ली की सेना का प्रिय तथा विश्वासपात्र बन जाने से इल्तुतमिश की स्थिति सुदृढ़़ हो गई। इल्तुतमिश ने दिल्ली के बाहर ही आरामशाह का मुकाबला किया तथा उसे परास्त करके दिल्ली के तख्त पर बैठ गया। इस प्रकार अपनी योग्यता एवं भाग्य के बल पर इल्तुतमिश गुलाम से सुल्तान बन गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कुबाचा यल्दूज और अलीमर्दान इल्तुतमिश की जान के दुश्मन बन गए (50)

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कुबाचा यल्दूज और अलीमर्दान - www.bharatkaitihas.com
कुबाचा यल्दूज और अलीमर्दान इल्तुतमिश की जान के दुश्मन बन गए

जब इल्तुतमिश आरामशाह को बंदी बनाकर स्वयं सुल्तान बन गया तो कुबाचा यल्दूज और अलीमर्दान इल्तुतमिश की जान के दुश्मन बन गए। कुबाचा यल्दूज और अलीमर्दान इल्तुतमिश को बुखारा के बाजार में कई बार बिके हुए एक गुलाम से अधिक कुछ नहीं मानते थे।

कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के बाद दिल्ली सल्तनत चार भागों में बंट गई। मुल्तान तथा उच (सिंध) पर कुबाचा ने, लाहौर एवं दिल्ली पर आरामशाह ने, बदायूं पर इल्तुतमिश ने एवं बिहार तथा बंगाल पर अलीमर्दान ने अधिकार कर लिया किंतु लगभग आठ माह की इस अराजकता के बाद इल्तुतमिश ने दिल्ली के निकट आरामशाह को परास्त कर दिया तथा स्वयं दिल्ली का सुल्तान बन गया।

सुल्तान बनते ही इल्तुतमिश को अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ा। उसके समक्ष अनेक चुनौतियाँ मुंह बाए खड़ी थीं। इनमें से पहली चुनौती आरामशाह की थी जिसे इल्तुतमिश ने बंदी बना लिया था। इसके बाद आरामशाह का कुछ पता नहीं चला। सम्भवतः उसे मार डाला गया।

यद्यपि दिल्ली के काजी अली इस्माइल की सहायता से इल्तुतमिश दिल्ली के तख्त पर बैठ गया था तथापि उसने इस पद को उत्तराधिकार के नियम से प्र्राप्त नहीं किया था। यह पद उसने कुछ अमीरों के सहयोग से प्राप्त किया था। चूूँकि इल्तुतमिश एक गुलाम का गुलाम था, इसलिए बहुत से कुतुबी तथा मुइज्जी अमीरों ने इल्तुतमिश को सुल्तान स्वीकार नहीं किया। स्वतन्त्र तुर्क सरदार गुलाम के गुलाम को अपना स्वामी स्वीकार करने में अपना अपमान समझते थे। वे उसे राज्य का अपहर्त्ता मानते थे। इल्तुतमिश ने धैर्य के साथ इन विरोधियों का दमन किया।

सुल्तान बनने के पूर्व इल्तुतमिश एक छोटे से प्रान्त का गवर्नर था। अधिकांश तुर्क-सरदार उसके समकक्ष थे। तुर्क-सरदार कुबाचा तथा अलीमर्दान तो कुतुबुद्दीन ऐबक के काल में पद तथा प्रतिष्ठा में इल्तुतमिश से कहीं अधिक ऊँचे थे। उन्हें इल्तुतमिश का उत्कर्ष सहन नहीं था। उन्हें अपने वश में करने के लिए साहस, बुद्धि तथा धैर्य की आवश्यकता थी। इल्तुतमिश में ये समस्त गुण विद्यमान थे, अतः वह सफलतापूर्वक अपने समकक्ष विरोधियों का सामना कर सका।

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तुर्कों में यह परम्परा थी कि कोई वंश-विशेष सदैव के लिए राज्य का अधिकारी नहीं होता था। नया सुल्तान, तुर्क अमीरों के निर्वाचन द्वारा नियुक्त किया जा सकता था। फलतः पुराने सुल्तान का निधन होने पर समस्त योग्य तथा महत्त्वाकांक्षी सेनापति राजपद प्राप्त करने की चेष्टा करते थे। ऐसी स्थिति में राज्य में सैनिक विद्रोह होने की सम्भावना सदैव बनी रहती थी।

बंगाल में अलीमर्दान खाँ बड़ी निर्दयता तथा निरंकुशता से शासन कर रहा था और अल्लाउद्दीन का विरुद धारण करके स्वयं को स्वतन्त्र शासक घोषित कर चुका था। कुबाचा भी ऐबक की तरह मुहम्मद गौरी का गुलाम था। उसने भी मुहम्मद गौरी तथा कुतुबुद्दीन ऐबक की वैसी ही सेवा की थी जैसी ऐबक ने की थी। कुबाचा भी इल्तुतमिश की तरह कुतुबुद्दीन ऐबक का दामाद था। इसलिए उसने इल्तुतमिश को अपना स्वामी स्वीकार करने से मना कर दिया तथा स्वयं को मुल्तान तथा सिन्ध का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया। उसने पंजाब का बहुत सा भाग दबा लिया और लाहौर, भटिन्डा, सरसुती, कुहराम आदि दुर्गों पर अपनी चौकियाँ स्थापित कर दीं। अब उसकी दृष्टि दिल्ली पर लगी हुई थी।

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गजनी का शासक ताजुद्दीन यल्दूज, कुतुबुद्दीन ऐबक का श्वसुर था। उसने गजनी पर अधिकार स्थापित कर लिया था इसलिये वह स्वयं को मुहम्मद गौरी का उत्तराधिकारी समझता था और उस सम्पूर्ण भारतीय भू-भाग को अपने साम्राज्य के अंतर्गत मानता था जो मुहम्मद गौरी ने जीता था। इस नाते यल्दूज दिल्ली के नए सुल्तान इल्तुतमिश को अपना प्रान्तपति समझता था। इसलिये यल्दूज ने इल्तुतमिश के पास राजकीय चिह्न भेजकर अपनी प्रभुता का प्रदर्शन किया। संकटपूर्ण परिस्थितियों में इल्तुतमिश ने उन वस्तुओं को स्वीकार कर लिया परन्तु इल्तुतमिश ने इस अपमान को स्मरण रखा तथा समय आने पर भरपूर बदला लिया। इस प्रकार कुबाचा, यल्दूज एवं अलीमर्दान इल्तुतमिश की जान के दुश्मन बन गए। वे तीनों ही अलग-अलग कारणों से स्वयं को दिल्ली का स्वामी समझते थे और दिल्ली पर अधिकार करना चाहते थे। इन दिनों दिल्ली की राजनीति में भारतीय मुसलमानों का भी एक प्रबल दल खड़ा हो गया था। उनमें तथा विदेशी मुसलमानों में बड़ा वैमनस्य था। इस कारण राज्य में आंतरिक संघर्ष की सम्भावना सदैव बनी रहती थी। ये लोग विद्रोह करने तथा अपना प्राबल्य स्थापित करने के लिए सचेष्ट रहते थे। इन विद्रोही-दलों पर नियन्त्रण रखना नितान्त आवश्यक था।

मुहम्मद गौरी तथा कुतुबुद्दीन ऐबक ने जिन राजपूत वंशों से उनके राज्य छीन लिये थे, वे ऐबक के मरते ही अपने खोये हुए राज्य प्राप्त करने का प्रयत्न करने लगे। जालौर तथा रणथम्भौर के शासक फिर से स्वतन्त्र हो गये। अजमेर, ग्वालियर तथा दो-आब में भी तुर्की सत्ता समाप्त हो गई। इल्तुतमिश के बदायूँ छोड़ते ही गाहड़वालों की प्रतिक्रिया भी आरम्भ हो गई और उनके आक्रमणों का वेग बढ़ गया। कालिंजर तथा ग्वालियर तो ऐबक के शासन काल में ही स्वतन्त्र हो चुके थे।

इस काल में भारत की पश्चिमोत्तर सीमा की रक्षा की समुचित व्यवस्था करना नितान्त आवश्यक था क्योंकि मध्य-एशिया में स्थित तुर्क तथा मंगोल राज्यों में इस समय बड़ी खलबली मची हुई थी। अनेक मंगोल सरदारों को अपना देश छोड़कर पलायन करना पड़ रहा था। मंगोल सरदार, नये राज्य स्थापित करने की कामना से प्रेरित होकर अन्य देशों पर आक्रमण कर रहे थे। भारत उनके लिए आसान शिकारगाह बन सकता था।

पश्चिमोत्तर की समस्या के जटिल हो जाने का एक कारण यह भी था कि पंजाब में निवास करने वाले खोखर बड़े विद्रोही प्रवृत्ति के थे जो प्रायः लाहौर तथा दिल्ली के सुल्तानों की शान्ति भंग कर देते थे।

इल्तुतमिश ने विपत्तियों से घबराने के स्थान पर, निर्भीकता के साथ उनका सामना किया तथा एक-एक करके समस्त बाधाओं पर विजय प्राप्त करने में सफल रहा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इल्तुतमिश के शत्रु चुन-चुन कर मारे गए (51)

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इल्तुतमिश के शत्रु - www.bharatkaitihas.com
इल्तुतमिश के शत्रु चुन-चुन कर मारे गए

इल्तुतमिश अपने शत्रुओं को चुन-चुन कर मारता जा रहा था किंतु इल्तुतमिश के शत्रु कम होने का नाम नहीं लेते थे। फिर भी इल्तुतमिश ने धैर्य नहीं खोया। वह जीवन भर तलवार चलाता रहा था और अब भी उसे बस तलवार ही चलानी थी।

बदायूं का गवर्नर इल्तुतमिश जो किसी समय बुखारा के बाजार में गुलाम के रूप में बेचा गया था, जब भारत का सुल्तान बन गया तो मुल्तान का शासक कुबाचा, गजनी का शासक यल्दूज तथा बंगाल का शासक अलीमर्दान इल्तुतमिश के शत्रु हो गए। दिल्ली के कुछ विद्रोही सरदार इन शत्रुओं के साथ हो गए।

पिछले सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक के तुर्की अंग-रक्षकों का सरदार तथा कुछ कुतुबी एवं मुइज्जी सरदार नहीं चाहते थे कि इल्तुतमिश सुल्तान बने। इसलिए वे दिल्ली के आस-पास अपनी सेनाएँ एकत्रित करने लगे। इल्तुतमिश को उनकी विद्रोही गतिविधियों के बारे में समय रहते ही पता चल गया।

इसलिए इल्तुतमिश ने उन पर अचानक आक्रमण करके उन्हें बुरी तरह परास्त किया। उनमें से बहुतों को मौत के घाट उतार दिया तथा उनकी शक्ति को छिन्न-भिन्न कर दिया। इस प्रकार इल्तुतमिश ने राजधानी दिल्ली को आंतरिक रूप से सुरक्षित बना लिया।

इस पर भी इल्तुतमिश के शत्रु कम नहीं हुए। आरामशाह तथा इल्तुतमिश के संघर्ष का लाभ उठाकर दो-आब के कई हिन्दू शासक भी स्वतन्त्र हो गये।

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इल्तुतमिश ने राजधानी में अपनी स्थिति सुदृढ़़ करके दो-आब के विद्रोही हिन्दुओं की ओर ध्यान दिया। उसने बदायूँ, कन्नौज तथा बहराइच पर आक्रमण करके वहाँ के शासकों का दमन किया। कछार के प्रान्त पर भी उसने अपनी सत्ता स्थापित कर ली। इसके बाद उसने बहराइच को जीत कर वहाँ पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया।

इल्तुतमिश ने अवध पर भी आक्रमण किया तथा उसे अपनी सल्तनत में मिला लिया परन्तु सम्भवतः तिरहुत को अपने राज्य में नहीं मिला पाया। इल्तुतमिश ने बनारस तथा तराई क्षेत्र के तुर्क-सरदारों एवं हिन्दू-राजाओं को परास्त करके उन्हें अपना आधिपत्य स्वीकार करने के लिए बाध्य किया।

इल्तुतमिश के गद्दी पर बैठने के कुछ समय बाद ख्वारिज्म के शाह ने गजनी पर आक्रमण करके उस पर अपना अधिकार कर लिया। इस पर गजनी का सुल्तान यल्दूज गजनी से भागकर लाहौर आ गया। लाहौर से उसने दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। इल्तुतमिश पहले से ही इस विपत्ति का सामना करने के लिए तैयार था। उसने अपनी सुसज्जित सेना के साथ दिल्ली से प्रस्थान कर दिया और ई.1215 में तराइन के मैदान में यल्दूज को बुरी तरह परास्त किया। यल्दूज को बंदी बनाकर बदायूँ के दुर्ग में भेज दिया गया जहाँ कुछ समय बाद यल्दूज की हत्या कर दी गई। इस प्रकार एक बड़े इल्तुतमिश के शत्रु का नाश हो गया।

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इल्तुतमिश द्वारा यल्दूज को पराजित किए जाने के कुछ समय उपरान्त मुल्तान तथा उच के शासक कुबाचा ने लाहौर पर अधिकार कर लिया। इस पर इल्तुतमिश ने एक सेना लाहौर भेजी। इस सेना ने कुबाचा को परास्त कर दिया। कुबाचा ने इल्तुतमिश का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया। इसी समय ख्वारिज्म के शाह का पुत्र जलालुद्दीन मंगोलों के आक्रमण से त्रस्त होकर भारत आ गया तथा उसने उसने कुबाचा के राज्य को लूटकर उसे नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। इससे कुबाचा की शक्ति तथा प्रतिष्ठा को बड़ा धक्का लगा। थोड़े ही दिनों बाद, मंगोल सेना ने भी मुल्तान पर आक्रमण किया तथा कुबाचा को बड़ी क्षति पहुँचाई। ई.1221 में मंगोलों ने चंगेज खाँ के नेतृत्व में भारत पर आक्रमण किया। चंगेज खाँ तूफान की भाँति मध्यएशिया से चला था। जब उसने ख्वारिज्म पर आक्रमण किया, तब वहाँ के शाह का पुत्र जलालुद्दीन भारत भाग आया परन्तु मंगोल उसका पीछा करते हुए भारत तक आ पहुँचे। इस समय जलालुद्दीन ने सिन्धु नदी के तट पर अपना खेमा लगा रखा था। जलालुद्दीन ने इल्तुतमिश से शरण मांगी।  इल्तुतमिश जानता था कि दिल्ली में ख्वारिज्म के शहजादे जलालुद्दीन की उपस्थिति इल्तुतमिश के तुर्की अमीरों पर अच्छा प्रभाव नहीं डालेगी।

इसलिये उसने जलालुद्दीन के पास कहला भेजा कि दिल्ली की जलवायु उसके अनुकूल नहीं होगी और उसके दूत को मरवा दिया। निराश होकर जलालुद्दीन सिन्ध की ओर बढ़ा और कुबाचा के राज्य में लूटमार करता हुआ फारस की ओर चल दिया परन्तु मार्ग में ही उसकी हत्या कर दी गई। जलालुद्दीन का अंत हुआ देखकर मंगोल भी लौट गये। इस प्रकार इल्तुतमिश ने अपनी दूरदर्शिता से जलालुद्दीन तथा मंगोलों से भी अपने राज्य की रक्षा कर ली।

खिलजी तुर्क भी इन दिनों सीमान्त प्रदेशों में बड़ा उपद्रव मचा रहे थे। इस प्रकार कुबाचा की स्थिति बड़ी संकटापन्न हो गई। इस स्थिति से लाभ उठा कर ई.1227 में इल्तुतमिश ने मुल्तान पर आक्रमण कर दिया तथा मुल्तान पर अपना अधिकार जमा लिया।

ख्वारिज्म के शहजादे जलालुद्दीन तथा मंगोल सम्राट चंगेज खाँ के भारत से चले जाने के बाद इल्तुतमिश ने दिल्ली से उच के लिए प्रस्थान किया। वह कुबाचा को दण्डित करना चाहता था। इस पर कुबाचा ने अपनी सेना तथा कोष के साथ भक्कर के दुर्ग में शरण ली। तीन महीने के घेरे के बाद उच पर इल्तुतमिश का अधिकार हो गया।

कुबाचा इतना आंतकित हो गया कि उसने अपने प्राणों की रक्षा के लिए सिन्धु नदी के उस-पार भाग जाने का निश्चय किया। जब कुबाचा एक नाव में बैठ कर सिन्धु नदी पार कर रहा था तब नाव उलट गई और कुबाचा नदी में डूब कर मर गया। इस प्रकार इल्तुतमिश के दूसरे बड़े प्रतिद्वन्द्वी का भी नाश हो गया।

अब इल्तुतमिश को पंजाब में अपने दो शत्रुओं का दमन करना था। एक थे विद्रोही खोखर और दूसरा था खोखरों का मित्र सैफुद्दीन करलुग जो ख्वारिज्म के शाह की ओर से पश्चिमी पंजाब में नियुक्त था। इल्तुतमिश ने खोखरों पर आक्रमण करके उनकी शक्ति को छिन्न-भिन्न करना आरम्भ किया और उनके राज्य के कुछ भाग पर अधिकार जमा लिया।

लाहौर तो इल्तुतमिश के अधिकार में पहले से ही था। पंजाब के अन्य प्रमुख नगर- स्यालकोट, जालन्धर, नन्दना आदि भी इल्तुतमिश के अधिकार में आ गये। इल्तुतमिश ने खोखरों के गांव तुर्की अमीरों को जागीर में दे दिये। इससे इल्तुतमिश के राज्य की पश्चिमी सीमा सुरक्षित हो गई।

पश्चिम की ओर से निबट कर इल्तुतमिश ने अपने राज्य के पूर्व की ओर अर्थात् बंगाल की ओर रुख किया। इस समय तक अलीमर्दान मर चुका था और हिसामुद्दीन इवाज, सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी की उपाधि धारण करके बंगाल में शासन कर रहा था। ई.1225 में इल्तुतमिश ने बंगाल पर आक्रमण किया। गयासुद्दीन ने इल्तुतमिश की अधीनता स्वीकार कर ली और बिहार पर अपना अधिकार त्याग दिया। इल्तुतमिश संतुष्ट होकर लौट आया, परन्तु उसके दिल्ली पहुँचते ही गयासुद्दीन ने फिर से स्वयं को बंगाल का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और बिहार पर भी अधिकार कर लिया।

इस पर ई.1226 में इल्तुतमिश ने अपने पुत्र नासिरुद्दीन महमूद को बंगाल पर आक्रमण करने भेजा जो उन दिनों अवध का गवर्नर था। नासिरुद्दीन ने गयासुद्दीन खिलजी को मारकर लखनौती पर अधिकार कर लिया। इल्तुतमिश ने नासिरुद्दीन को बंगाल का गवर्नर बना दिया। ई.1229 में नासिरुद्दीन के हटते ही बंगाल में फिर से विद्रोह की चिन्गारी फूट पड़ी।

इस पर इल्तुतमिश ने ई.1230 में पुनः बंगाल पर अधिकार कर लिया और अल्लाउद्दीन जैनी को वहाँ का गवर्नर नियुक्त किया। उसने बंगाल के विद्रोहियों को चुन-चुन कर मौत के घाट उतारा। इस प्रकार इल्तुतमिश के शत्रु चुन-चुन कर मारे जाते रहे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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