Sunday, July 14, 2024
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43. कुतुबुद्दीन ऐबक ने यल्दूज की बेटी से ब्याह कर लिया!

मुहम्मद गौरी की मृत्यु के समय उसका गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली का गवर्नर था। वह एक तुर्की गुलाम था जिसे तुर्किस्तान से लेकर अफगानिस्तान में कई बार बेचा गया था किंतु उसने अपनी योग्यता एवं सुल्तान की कृपा के बल पर अमीर तथा दिल्ली का गवर्नर होने का गौरव प्राप्त किया था।

मुहम्मद गौरी के कोई पुत्र नहीं था इसलिए उसके अमीरों में सल्तनत पर अधिकार करने की होड़ आरम्भ हो गई। ताजुद्दीन यल्दूज नामक एक अमीर ने गजनी पर अधिकार कर लिया। पाठकों को स्मरण होगा कि मुहम्मद गौरी ने अपने बड़े भाई मरहूम गयासुद्दीन गौरी के पुत्र महमूद को फीरोजकोह नामक क्षेत्र का गवर्नर बनाया था जो कि अफगानिस्तान में ही स्थित था। महमूद का पूरा नाम महमूद बिन गियासुद्दीन बताया जाता है।

जब मुहम्मद गौरी मर गया और ताजुद्दीन यल्दूज ने गजनी पर अधिकार कर लिया तो फीरोजकोह के गवर्नर महमूद बिन गियासुद्दीन ने गजनी पर आक्रमण करके स्वयं को गजनी का सुल्तान घोषित कर दिया क्योंकि सल्तनत का वास्तविक अधिकारी गियासुद्दीन ही था न कि ताजुद्दीन याल्दुज।

मुहम्मद गौरी की मृत्यु के समय कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली में था। जब मुहम्मद गौरी की मृत्यु का समाचार लाहौर पहुँचा तो लाहौर के नागरिकों ने कुतुबुद्दीन ऐबक को लाहौर का शासन अपने हाथों में लेने का निमंत्रण भिजवाया। यह निमंत्रण पाकर कुतुबुद्दीन तुरन्त दिल्ली से लाहौर के लिए चल पड़ा और वहाँ पहुँच कर उसने लाहौर का शासन अपने हाथ में ले लिया। उसने 24 जून 1206 को लाहौर में ही अपना राज्यारोहण समारोह आयोजित करवाया। उस समय मुहम्मद गौरी की मृत्यु को केवल तीन माह ही हुए थे। तख्त पर बैठने के बाद भी ऐबक ने स्वयं को अमीर, मलिक, सिपहसलार ही कहलवाना जारी रखा तथा सुल्तान की उपाधि का प्रयोग नहीं किया।

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पूरे दो साल तक कुतुबुद्दीन ऐबक बिना सुल्तान बने ही सल्तनत चलाता रहा। उसने न तो अपने नाम की मुद्रायें चलवाईं और न अपने नाम से खुतबा ही पढ़वाया। संभवतः वह गजनी के सुल्तान महमूद बिन गियासुद्दीन से वैमनस्य उत्पन्न किये बिना, भारत में एक स्वतन्त्र तुर्की शासन की स्थापना करना चाहता था।

ई.1208 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपने एक दूत के माध्यम से एक प्रस्ताव सुल्तान महमूद बिन गियासुद्दीन के पास भेजा कि यदि सुल्तान, कुतुबुद्दीन ऐबक को भारत का स्वतन्त्र सुल्तान बना दे तो कुतुबुद्दीन ऐबक ख्वारिज्म के शाह के विरुद्ध गियासुद्दीन महमूद की सहायता करेगा। उस समय ख्वारिज्म का शाह गजनी के लिए बहुत बड़ी मुसीबत बना हुआ था। उसने मुहम्मद गौरी के अंतिम दिनों में ही मुहम्मद गौरी से मध्यएशिया का बहुत बड़ा भूभाग छीन लिया था और अब वह गजनी के राज्य का समाप्त करने पर उतारू था।

गजनी के सुल्तान गियासुद्दीन महमूद ने कुतुबुद्दीन ऐबक का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। ई.1208 में गियासुद्दीन ने कुतुबुद्दीन ऐबक को राजछत्र, ध्वजा, सिंहासन तथा दुंदुभि आदि राज्यसूचक वस्तुएँ भेजीं तथा उसे सुल्तान की उपाधि से विभूषित किया। इस प्रकार कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली का स्वतन्त्र शासक बन गया।


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गजनी के नए सुल्तान महमूद बिन गियासुद्दीन में इतनी योग्यता नहीं थी कि वह मुहम्मद गौरी द्वारा स्थापित विशाल सल्तनत पर शासन कर सके। इसलिए कुछ ही समय बाद सल्तनत के तीन अमीरों द्वारा सल्तनत के विभिन्न भागों पर अधिकार करने की चेष्टाएं आरम्भ हो गईं।

ताजुद्दीन यल्दूज ने महमूद बिन गियासुद्दीन को गजनी से हटा दिया तथा पुनः गजनी का सुल्तान बन गया। कुतुबुद्दीन ऐबक पहले ही भारत का स्वतंत्र सुल्तान बन चुका था। मुहम्मद गौरी के समय से ही कुबाचा नामक एक अमीर मुल्तान तथा सिंध क्षेत्र का गवर्नर था। उसने भी स्वयं को गजनी से स्वतंत्र कर लिया।

ताजुद्दीन यल्दूज ने ई.1208 में गजनी में एक बड़ी सेना तैयार की और कुबाचा को परास्त करके मुल्तान पर अधिकार कर लिया। इस पर कुबाचा ने कुतुबुद्दीन ऐबक को सहायता के लिए बुलवाया। ऐबक ने एक विशाल सेना लेकर मुल्तान पर आक्रमण किया तथा यल्दूज की सेना को मुल्तान से मार भगाया। इस अवसर पर कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपनी एक पुत्री का विवाह कुबाचा से कर दिया तथा कुबाचा ने जीवन भर कुतुबुद्दीन के प्रति निष्ठा रखने का वचन दिया।

मुल्तान विजय के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने आगे बढ़कर गजनी पर भी आक्रमण किया। यल्दूज गजनी छोड़कर भाग गया और गजनी पर कुतुबुद्दीन का अधिकार हो गया। गजनी के इतिहासकारों के अनुसार ऐबक अपनी विजय से मदांध होकर शराब पीने में व्यस्त हो गया। उसकी सेना ने गजनी के लोगों के साथ बड़ा दुर्व्यवहार किया। इससे तंग आकर गजनी के अमीरों ने यल्दूज को फिर से गजनी में आने के लिए आमन्त्रित किया।

ऐसा प्रतीत होता है कि गजनी के इतिहासकारों ने जानबूझ कर कुतुबुद्दीन पर झूठे आक्षेप लगाए हैं कि वह शराब पीने में व्यस्त हो गया तथा उसकी सेना ने जनता पर अत्याचार किए। कुतुबुद्दीन लम्बे समय से सुल्तान के पद पर कार्य कर रहा था और उसे सुल्तान के द्वारा किए जाने वाले आचरण की जानकारी थी। वस्तुतः कुतुबुद्दीन ऐबक ई.1192 से दिल्ली का शासक था तथा उसे दिल्ली पर शासन करते हुए 16 साल हो गए थे। इस कारण गजनी वालों के लिए कुतुबुद्दीन ऐबक अब दिल्ली का सुल्तान था। गजनी के लोग यह सहन नहीं कर सकते थे कि दिल्ली का सुल्तान गजनी पर शासन करे और गजनी उसके साम्राज्य का एक प्रान्त बन कर रहे। यह गजनी तथा उसके निवासियों, दोनों के लिये अपमानजनक बात थी।

इसलिए जब गजनी के लोगों ने यल्दूज को फिर से गजनी पर अधिकार करने के लिए आमंत्रित किया तो यल्दूज ने गजनी को अफगानियों के स्वाभिमान का प्रश्न बना दिया। इस कारण गजनी के हजारों युवक यल्दूज की तरफ से लड़ने के लिए आ गए। उनकी सहायता से यल्दूज ने फिर से गजनी पर अधिकार कर लिया।

कुतुबुद्दीन ऐबक को यल्दूज से संधि करनी पड़ी। ऐबक ने यल्दूज को वचन दिया कि अब वह गजनी के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। इस संधि को मजबूत बनाने के लिए कुतुबुद्दीन ऐबक ने यल्दूज की बेटी से ब्याह कर लिया।

इस प्रकार कुतुबुद्दीन ने कुबाचा और यल्दूज दोनों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर लिए तथा भविष्य में होने वाले संघर्षों को टाल दिया ताकि वह शांति पूर्वक दिल्ली पर शासन कर सके। कुतुबुद्दीन के भाग्य से ख्वारिज्म के शाह ने गौर प्रदेश पर अधिकार कर लिया जिससे गजनी सल्तनत की नींव हिल गई तथा ई.1215 के आते-आते गजनी सल्तनत पूरी तरह समाप्त हो गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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