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शरभंग ऋषि ने श्रीराम को समस्त योग, यज्ञ, तप एवं व्रत समर्पित कर दिए (31)

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शरभंग ऋषि - bharatkaitihas.com
शरभंग ऋषि ने श्रीराम को समस्त योग, यज्ञ, तप एवं व्रत समर्पित कर दिए

श्रीराम का लक्ष्य शरभंग ऋषि के आश्रम तक पहुंचने का था। इसलिए वे मुनियों से शरभंग ऋषि की कुटिया का मार्ग पूछने लगे। शीघ्र ही यह समाचार शरभंग ऋषि तक पहुंच गया कि श्रीराम, लक्ष्मण एवं सीताजी शरभंग ऋषि के आश्रम की ओर बढ़ रहे हैं।

महर्षि अत्रि एवं सती अनसूया से भेंट करने के पश्चात् ईक्ष्वाकु वंशी राजकुमार रामचंद्र ने दण्डकारण्य के गहन वन में प्रवेश किया। दण्डकारण्य का अद्भुत परिवेश किसी को भी चकित कर देने वाला था। इस वन में स्थान-स्थान पर मुनियों के आश्रम बने हुए थे जिनमें असंख्या मुनि सांसारिक बंधनों को त्यागकर तपस्या करते थे।

स्थान-स्थान पर यज्ञ कुण्ड बने हुए थे, ऋषियों के आश्रमों में उपनिषदों का आयोजन होता था। आश्रमों में बड़ी संख्या में गाएं पाली जाती थीं जिनके दूध एवं घी से न केवल ऋषि ही पुष्ट होते थे अपितु यज्ञ देव भी संतुष्ट रहते थे।

ऋषियों के आश्रमों के निकट अनेक वन्यपशु विचरण करते थे किंतु वे ऋषियों एवं आश्रम की गायों को किंचित् भी हानि नहीं पहुंचाते थे। दण्डकरारण्य का वातावरण इतना पवित्र था कि वहाँ नित्य की स्वर्ग के देवगण ऋषियों के दर्शनों के लिए आते थे तथा आश्रमों में होने वाले वेदपाठों के श्रवण का आनंद उठाते थे।

स्वर्ग की बहुत सी अप्सराएं स्वर्ग छोड़कर दण्डकारण्य में नृत्य करने आती थीं। नदियों एवं झरनों का पावन जल इस सम्पूर्ण धरती को दिव्य औषधियों एवं कंद-मूल तथा फल से लदे हुए वृक्षों से सम्पन्न रखता था।

आज जिस प्रदेश को हम छत्तीसगढ़ के रूप में जानते हैं, उसका बहुत सा प्रदेश इसी दण्डकारण्य में स्थित था। इस पुयण्भूमि में कई ऋषि और मुनि तो हजारों साल से तपस्या कर रहे थे। जब दण्डकारण्य के ऋषियों को ज्ञात हुआ कि श्रीराम ने दण्डकारण्य में प्रवेश किया है उनके आनंद का पार नहीं था। बहुत से ऋषियों को देवताओं ने बता रखा था कि एक दिन स्वयं श्री हरि विष्णु मानव देह धरकर आपके आश्रम में आपको दर्शन देने आएंगे।

इस कारण बहुत से ऋषि युगों से श्रीराम के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। एक दिन जब उन्हें ज्ञात हुआ कि श्रीराम ने अत्रि मुनि के आश्रम से प्रस्थान कर दिया है तो ऋषि-मुनि अपने आश्रमों को श्रीराम के स्वागत के लिए सजाने लगे। बहुत से ऋषियों ने दण्डकारण्या के पथों को बुहार कर अपने आश्रम को आने वाले मार्गों को सुगम कर दिया ताकि श्रीराम को उनके आश्रमों तक आने में कोई कष्ट न हो, कहीं वे मार्ग न पाकर उनका आश्रम छोड़कर आगे न बढ़ जाएं।

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श्रीराम ने जब मुनियों के समूहों को वेदपाठ करते हुए और सामगायन करते हुए सुना तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए। ऐसा सामगायन न तो देवलोक के गंधर्व कर सकते थे और न कश्यप के पुत्र तुम्बरू! ऋषियों की पावन भूमि देखकर इक्ष्वाकु राजकुमारों श्रीराम एवं श्रीलक्ष्मण ने अपने धनुषों की प्रत्यंचा खोल दी और तीर अपने तरकष में रख लिए। वे जिस ऋषि के आश्रम के द्वार पर जाकर खड़े हो जाते थे, उनका जीवन धन्य हो जाता था। प्रत्येक ऋषि श्रीराम से कुछ कहना चाहता था और प्रत्येक ऋषि श्रीराम से कुछ सुनना चाहता था। ऋषि-पत्नियों को ऐसा लगा मानो श्रीराम उनके अपने पुत्र हों।

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बहुत से ऋषियों ने श्रीराम से प्रार्थना की कि वे यहीं रुक जाएं, यहाँ सब प्रकार की सुख सुविधाएं हैं। बहुत से ऋषियों ने तो श्रीराम, लक्ष्मण एवं जानकी के लिए पर्णकुटियां भी बना रखी थीं किंतु श्रीराम ऋषियों का सान्निध्य प्राप्त करते हुए आगे बढ़ते रहे। श्रीराम का लक्ष्य शरभंग ऋषि के आश्रम तक पहुंचने का था। इसलिए वे मुनियों से शरभंग ऋषि की कुटिया का मार्ग पूछने लगे। शीघ्र ही यह समाचार शरभंग ऋषि तक पहुंच गया कि श्रीराम, लक्ष्मण एवं सीताजी शरभंग ऋषि के आश्रम की ओर बढ़ रहे हैं। जब यह समाचार ऋषि शरंभग के आश्रम में पहुंचा, तब देवराज इन्द्र शरभंग ऋषि के आश्रम में आए हुए थे, वे ऋषि को ब्रह्मलोक ले जाना चाहते थे किंतु जब शरभंग ने सुना कि श्रीराम आ रहे हैं तो उन्होंने देवराज इन्द्र से क्षमा मांग ली और ब्रह्मलोक जाने से मना कर दिया तथा अपने आश्रम में रहकर श्रीराम की प्रतीक्षा करने लगे। उन दिनों दण्डकराण्य में ऋषियों एवं मुनियों के आश्रम बने हुए थे तो वहीं, कुछ राक्षसों ने भी इस वन में आकर अपना निवास बना लिया था। वे अवसर प्राप्त होते ही इन मुनियों को मार कर खा जाते थे। शरभंग ऋषि के आश्रम की तरफ बढ़ते हुए श्रीराम को एक दिन विराध नामक राक्षस दिखाई दिया जो मनुष्यों को मारकर खा जाता था। श्रीराम ने उस नरभक्षी राक्षस का वध कर दिया।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार विराध श्रीराम एवं लक्ष्मण को मारकर सीताजी को भार्या बनाना चाहता था। इसलिए उसने अचानक आक्रमण करके सीताजी को उठा लिया और बोला- ‘मुनियों के वस्त्र पहनकर इस जंगल में सुंदर युवती के साथ घूमते हुए लज्जा नहीं आती! मैं तुम दोनों का वध करके इस स्त्री को अपनी भार्या बनाउंगा।’

विराध की बातें सुनकर सीताजी भयभीत हो गईं। सीताजी को भयभीत देखकर श्रीराम के अंग शोक से शिथिल हो गए और उन्होंने लक्ष्मण से कहा- ‘ऐसा लगता है कि माता कैकेई ने जिस इच्छा से हमें वन में भेजा है, आज उनकी वह इच्छा पूरी हो जाएगी।’

श्रीराम ने विराध से उसका परिचय पूछा। इस पर विराध ने कहा- ‘मुझे ब्रह्माजी से वरदान मिला हुआ है कि किसी शस्त्र से मेरा वध नहीं किया जा सकता। इसलिए तुम इस स्त्री को छोड़कर यहाँ से चले जाओ।’

जब श्रीराम एवं लक्ष्मण ने विराध पर शस्त्रों से प्रहार किया तो वे शस्त्र वरदान के प्रभाव से विराध के शरीर से निकलकर धरती पर गिरने लगे। विराध ने राम और लक्ष्मण को पकड़कर अपने कंधों पर उठा लिया तथा हिंसक पशुओं से भरे हुए भयानक वन में घुस गया।

इस पर सीताजी ने राक्षस से कहा- ‘तू इन दोनों भाइयों को छोड़ दे और मुझे पकड़कर ले चल।’

सीताजी को करुण विलाप करते हुए देखकर श्रीराम एवं लक्ष्मण ने शस्त्रों की बजाय द्वंद्वयुद्ध में राक्षस का संहार करने का निर्णय किया तथा उन्होंने राक्षस के कंधे पर बैठे-बैठे ही विराध की दोनों भुजाएं उखाड़ दीं। इससे राक्षस धरती पर गिर गया। श्रीराम एवं लक्ष्मण ने दुष्ट राक्षस को मुक्कों तथा लातों से पीटना आरम्भ किया तथा उसे उठाकर बार-बार धरती पर पटकने लगे। इस पर भी वह राक्षस नहीं मरा तो श्रीराम विराध की गर्दन पर पैर रखकर खड़े हो गए एवं लक्ष्मण ने एक खड्डा खोदा। दोनों राजकुमारों ने विराध को उसी खड्डे में गाढ़ दिया।

जब विराध मरने लगा तो उसने श्रीराम से कहा- ‘मैं तुम्बरू नामक गंधर्व हूँ, एक दिन मुझे कुबेर ने बुलाया किंतु मैं रम्भा पर आसक्त होने के कारण समय पर कुबेर के समक्ष उपस्थित नहीं हुआ। इस कारण कुबेर ने मुझे राक्षस होने का श्राप दिया था। आज आपके हाथों से मृत्यु पाकर मेरी मुक्ति हो गई।’

जहाँ वाल्मीकि रामायण में विराध के वध का वर्णन विस्तार से किया गया है, वहीं गोस्वामी तुलसीदासजी ने विराध के वध का उल्लेख अत्यंत संक्षेप में किया है। विराध को मारने के बाद श्रीराम, लक्ष्मण एवं सीताजी ने मुनि के आश्रम पहुंच कर उनके चरणों में प्रणाम किया।

मुनि शरभंग बोले- ‘हे राम! आपका स्वागत है, मर्हिष अत्री ने आपसे सत्य कहा था, मैं आपकी प्रतीक्षा कर रहा था।’

मुनि शरंभग ने अपने समस्त योग, यज्ञ, जप, तप तथा व्रत श्रीराम को समर्पित कर दिए तथा अपना शरीर योगानल से भस्म करके वैकुण्ठ को चले गए। मुनि शरभंग इंद्र के साथ ब्रह्मलोक नहीं गए क्योंकि इससे उनकी अभेद मुक्ति होती अर्थात् उनकी आत्मा पमरात्मा में विलीन हो जाती।

इसलिए मुनि शरभंग ने श्रीराम के आने की प्रतीक्षा की ताकि वे उनसे भेद भक्ति का वरदान ले सकें। इस प्रकार की मुक्ति में भक्त कभी भी परमात्मा में विलीन नहीं होता, अपितु सांसारिक बंधनों एवं मोह-माया से मुक्त होकर भक्त बना रहता है और परमात्मा के सान्निध्य का आनंद भोगता है।  

सुतीक्ष्ण ऋषि ने भगवान को देखकर आंखें बंद कर लीं (32)

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सुतीक्ष्ण ऋषि ने भगवान को देखकर आंखें बंद कर लीं

शरभंग ऋषि को विदा करके श्रीराम, लक्ष्मण एवं सीताजी ने वनवासी सन्यांसियों से सुतीक्ष्ण ऋषि के आश्रम का पता पूछा। इस अवसर पर उपस्थित सैंकड़ों मुनियों, तापसों एवं ऋषि-पुत्रों ने श्रीराम से कहा कि हम आपको सुतीक्ष्णजी के आश्रम तक पहुंचाएंगे। वे लोग चाहते थे कि अधिक से अधिक समय तक वे श्रीराम का सान्निध्य प्राप्त करें। इसलिए भगवान के मना करने पर भी वे लोग श्रीराम, लक्ष्मण एवं सीताजी के साथ हो लिए।

मार्ग में स्थान-स्थान पर हड्डियों के ढेर लगे हुए थे। इस पर श्रीराम ने पूछा कि पावन एवं पत्रित्र दण्डकारण्य में ये हड्डियां क्यों पड़ी हैं एवं ये किनकी हैं। इस पर वनवासी तापसों ने श्रीराम को बताया कि इस क्षेत्र में बहुत से राक्षस आ जाते हैं, वे ही ऋषियों एवं मुनियों को अकेला पाकर खा जाते हैं। ये हड्डियां उन्हीं ऋषियों एवं मुनियों की हैं।

यह सुनकर श्रीराम को बहुत दुख हुआ। गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा है कि श्रीराम की आंखों में करुणा का जल भर गया। उन्होंने दोनों भुजाएं उठाकर प्रण किया कि मैं इस धरती को राक्षसों से विहीन कर दूंगा। वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि जब वनवासी तापसों ने श्रीराम को दण्डकारण्य में राक्षसों द्वारा किए जा रहे अत्याचारों के बारे में बताया तो श्रीराम ने कहा कि मैं अपने पिता के वचनों का पालन करता हुआ देवताओं की प्रेरणा से ही यहाँ तक आ पहुंचा हूँ। अतः मैं मुनियों से शत्रुता रखने वाले राक्षसों का युद्ध में संहार करूंगा।  आप सब महर्षि भाई सहित मेरा पराक्रम देखें।

श्रीराम ने उस क्षेत्र में रहने वाले मुनियों के आश्रमों में जाकर उन्हें अभय दिया तथा अपने प्रण के बारे में बताया। बाल्यकाल में ताड़का का वध करने एवं दण्डकारण्य में घुसकर विराध नामक राक्षस को मार डालने के कारण श्रीराम का यश चारों ओर फैल गया था। इसलिए जब मुनियों ने देखा कि स्वयं श्रीराम उनकी झौंपड़ियों में आकर उन्हें अभय दे रहे हैं तो उन्होंने अत्यंत सुख का अनुभव किया।

बहुत से ऋषियों, मुनियों एवं तापसों से भेंट करते हुए श्रीराम, लक्ष्मण एवं सीताजी सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में पहुंचे। सुतीक्ष्ण ऋषि, अगस्त्य मुनि के शिष्य थे तथा भगवान के अत्यंत भक्त थे। उन्होंने भी सुना था कि श्रीराम, लक्ष्मण एवं सीता इस गहन वन में मुनियों एवं तापसों से मिलते हुए घूम रहे हैं। इसलिए सुतीक्ष्ण ऋषि मन ही मन आशा कर रहे थे कि एक दिन प्रभु कृपा करके उनके आश्रम में भी आएंगे।

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राम चरित मानस में गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा है कि जब वनवासी तापसों ने सुतीक्ष्ण ऋषि की कुटिया में जाकर उन्हें सूचना दी कि श्रीराम आ रहे हैं तो सुतीक्ष्ण ऋषि अत्यंत व्याकुल हो गए। वे अपनी कुटिया से निकलकर मार्ग पर भागे ताकि श्रीराम की अगवानी कर सकें किंतु उन्हें मार्ग का ध्यान ही नहीं रहा इसलिए वे जहाँ-तहाँ भागने लगे। वनवासी तापसों ने सुतीक्ष्ण ऋषि को पकड़कर स्थिर किया किंतु सुतीक्ष्ण ऋषि इतने व्यग्र थे कि उन्हें न तो कुछ सुनाई दे रहा था और न दिखाई दे रहा था।

सुतीक्ष्ण ऋषि कहने लगे- ‘मैंने न तो सत्संग किया है, न योग, जप, तप किए हैं, न यज्ञ किए हैं, क्या फिर भी श्रीराम मुझसे मिलने आएंगे? वे कहाँ हैं, वे किस ओर से आ रहे हैं?’

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जब सुतीक्ष्ण ऋषि अत्यंत व्यग्र हो गए तो वे श्री हरि विष्णु का ध्यान लगाकर बैठ गए। उन्होंने ध्यानावस्था में ही भगवान के दर्शन किए। इसी समय श्रीराम ने सुतीक्ष्ण ऋषि की कुटिया में प्रवेश करके मुनि से कहा- ‘हे धर्मज्ञ महर्षि! मैं राम हूँ और आपके दर्शनों के लिए यहाँ आया हूँ, आप कृपा करके मुझसे बात कीजिए।’ भगवान की बात सुनकर सुतीक्ष्णजी ने आंखें खोल दीं। सुतीक्ष्णजी को बहुत आश्चर्य हुआ कि अभी आंखें बंद करके वे जिन श्री हरि विष्णु के दर्शन कर रहे थे, वही श्री हरि विष्णु उनके सामने साक्षत् खड़े थे। इस पर सुतीक्ष्ण मुनि ने नेत्र पुनः बंद कर लिए। नेत्र बंद करने के उपरांत भी मुनि को श्री हरि दिखाई दिए। इसलिए सुतीक्ष्ण मुनि समझ नहीं पाए कि उन्हें नेत्र बंद करने या हैं, या खोलने हैं! मुनि सुतीक्ष्ण की ऐसी अवस्था देखकर भगवान भी भाव-विभोर हो गए और उन्होंने मुनि को अपने हृदय से लगा लिया। इस पर मुनि को समझ में आ गया कि भगवान स्वयं चलकर उनकी कुटिया में आ गए हैं, इसलिए नेत्र बंद करने की आवश्यता नहीं है। मुनि सुतीक्ष्ण ने अत्यंत भाव-विभोर होकर भगवान की स्तुति की। श्रीराम ने कहा- ‘हे मुनि! आप मुझे अत्यंत प्रसन्न जानिए एवं मुझसे कोई वरदान मांगिए।’ मुनि ने कहा- ‘भगवन्! मैंने तो कभी कुछ मांगा ही नहीं! मुझे समझ ही नहीं पड़ता कि क्या झूठ है और क्या सत्य है! इसलिए मैं आपसे क्या मांगूं, और क्या नहीं! आपको जो अच्छा लगे मुझे वही वरदान दीजिए!

इस पर श्रीराम ने कहा- ‘हे मुनि! आप प्रगाढ़ भक्ति, वैराग्य, ज्ञान, विज्ञान और समस्त गुणों के निधान हो जाएं!’

सुतीक्ष्ण ऋषि ने कहा- ‘आपने जो कुछ दिया, मैंने स्वीकार कर लिया, अब आप कृपा करके अपने भाई लक्ष्मण तथा सीताजी सहित मेरे हृदय रूपी आकाश में चंद्रमा की भांति निवास करें।’

वाल्मीकि रामायण के सुतीक्ष्ण रामचरित मानस के सुतीक्ष्ण ऋषि से थोड़े अलग हैं। वाल्मीकि रामायण के सुतीक्ष्ण श्रीराम से कहते हैं- ‘हे वीर! मैंने सुना था कि आप राज्य से भ्रष्ट होकर चित्रकूट पर्वत पर रहते हैं। एक बार देवराज इन्द्र यहाँ सौ यज्ञों का अनुष्ठान करने के लिए आए थे। उन्होंने मुझे बताया था कि मैंने अपने तप से समस्त शुभ्र लोकों पर विजय प्राप्त कर ली है किंतु मैंने उन शुभ्र लोकों में जाने का विचार नहीं किया तथा आपकी प्रतीक्षा करता रहा। आज आप आ गए हैं, इसलिए मैं वे समस्त शुभ्र लोक आपको समर्पित करता हूँ, ताकि आप सीताजी एवं लक्ष्मण सहित उन लोकों में निवास करें जिन लोकों की सेवा स्वयं देवर्षि किया करते हैं।’

इस पर श्रीराम ने सुतीक्ष्ण ऋषि से कहा- ‘हे मुनि! उन शुभ्र लोकों की प्राप्ति तो मैं स्वयं आपको करवाउंगा। आप तो मुझे यह बताएं कि आज रात मैं इस वन में कहाँ निवास कर सकता हूँ।’

मुनि सतीक्ष्ण ने कहा- ‘हे राम! यह सम्पूर्ण वन ही तपोवन है, आप यहीं मेरी कुटिया में निवास कीजिए।’

इस पर श्रीराम, लक्ष्मणजी एवं सीताजी सुतीक्ष्ण ऋषि के आश्रम में ही रुक गए तथा अगली प्रातः मुनि से आज्ञा लेकर अगस्त्य ऋषि के आश्रम के लिए प्रस्थान कर गए।

रामचरित मानस में लिखा है कि श्रीराम ने सुतीक्ष्ण मुनि से पूछा कि अगस्त्य ऋषि के दर्शन कहाँ होंगे तो मुनि ने कहा- ‘मैं भी वहीं अपने गुरु अगस्त्य के आश्रम जा रहा हूँ। अतः मैं ही आपको पथ दिखा दूंगा।’

श्रीराम सुतीक्ष्ण ऋषि की चतुराई ताड़ गए कि अधिक से अधिक समय हमारा सान्निध्य प्राप्त करने के लिए इन्होंने यह बहाना बनाया है।

इस प्रकार तुलसी के सुतीक्ष्ण ऋषि भगवान के भक्त अधिक हैं जबकि वाल्मीकि रामायण के सुतीक्ष्ण ज्ञानी अधिक हैं।

महर्षि अगस्त्य से भेंट की श्रीराम ने (33)

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महर्षि अगस्त्य से भेंट की श्रीराम ने

भगवान श्रीराम ने अपने वनवास के समय महर्षि अगस्त्य से भेंट करके उनसे दिव्य आयुध एवं अस्त्र-शस्त्र प्राप्त किए। महर्षि अगस्त्य से भेंट के पीछे श्रीराम का मंतव्य केवल इतना ही नहीं था। इस भेंट के पीछे बड़े गहरे प्रयोजन छिपे थे।

श्रीराम, लक्ष्मण तथा जनकनंदिनी सीताजी महर्षि अगस्त्य से भेंट करने के लिए सुतीक्ष्ण ऋषि के साथ दण्डकारण्य से अगस्त्य के आश्रम के लिए रवाना हो गए। श्रीराम एवं महर्षि अगस्त्य से भेंट का श्रीराम कथा में अत्यंत महत्व है, यदि श्रीराम को मानव माना जाए तो भी और श्री हरि विष्णु का अवतार माना जाए तो भी! इस भेंट के महत्व की चर्चा करने से पहले हम अगस्त्य ऋषि की पृष्ठभूमि की चर्चा करते हैं।

महर्षि अगस्त्य एक ऋग्वैदिक ऋषि थे। उन्हें सप्तर्षियों में से एक माना जाता है। ऋग्वेद में उनका नाम कई बार आया है। महर्षि अगस्त्य ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 165वें सूक्त से लेकर 191वें तक के सूक्तों के दृष्टा थे। अगस्त्य के पुत्र दृढ़च्युत तथा दृढ़च्युत के पुत्र इध्मवाह भी नवम मंडल के 25वें तथा 26वें सूक्तों के द्रष्टा थे।

अगस्त्य ऋषि महर्षि पुलस्त्य के पुत्र तथा विश्रवा के भाई थे। इनका जन्म काशी में हुआ था। वर्तमान में वह स्थान अगस्त्य कुंड के नाम से प्रसिद्ध है।

देवताओं के अनुरोध पर महर्षि अगस्त्य काशी से दक्षिणापथ की ओर गए। कुछ पुराणों में यह प्रसंग आया है कि उन दिनों विंध्याचल पर्वत बड़ी तेजी से बढ़ रहा था। इसलिए देवताओं ने महर्षि अगस्त्य से अनुरोध किया कि वे विंध्याचल पर्वत को आदेश दें कि वह बढ़ना बंद कर दे। इस पर अगस्त्य ऋषि काशी से दक्षिणापथ की ओर गए तथा मार्ग में जब उन्होंने विंध्याचल पर्वत को पार किया तो विंध्याचल से कहा कि जब तक मैं लौट कर न आऊं, तुम इसी प्रकार स्थिर रहना, अपना आकार मत बढ़ाना।

विंध्याचल पर्वत महर्षि अगस्त्य की महिमा के बारे में जानता था। उसे ज्ञात था कि ये वही महर्षि अगस्त्य हैं जिन्होंने एक बार समुद्र का पानी पीकर उदरस्थ कर लिया था ताकि देवगण समुद्र में छिपे हुए राक्षसों को देख सकें और उनका संहार कर सकें। इसलिए विंध्याचल ने महर्षि का आदेश स्वीकार कर लिया।

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विंध्याचल ने बढ़ना बंद कर दिया और महर्षि अगस्त्य फिर कभी दक्षिणापथ से उत्तरापथ की ओर आए ही नहीं। वे दक्षिण भारत में इतने दीर्घकाल तक निवास करते रहे कि अधिकतर भारतीय अगस्त्य को तमिल देश का निवासी ही मानते हैं। तमिल भाषा में अगस्त्य को ‘अगतियार’ कहा जाता है।

महर्षि अगस्त्य ने विदर्भ-नरेश की पुत्री लोपामुद्रा से विवाह किया, जो विद्वान और वेदज्ञ थीं। दक्षिण भारत में इसे मलयध्वज नाम के पांड्य राजा की पुत्री बताया जाता है। वहाँ इसका नाम कृष्णेक्षणा है। इनके पुत्र का नाम इध्मवाहन था। महर्षि अगस्त्य ने मणिमती नगरी के दैत्यराज इल्वल तथा वातापी नामक दुष्ट दैत्य को नष्ट किया। भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में उनके विशिष्ट योगदान के लिए जावा, सुमात्रा, बाली आदि द्वीपों में भी उनकी पूजा की जाती है।

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महर्षि अगस्त्य अपने समय के बहुत बड़े वैज्ञानिक थे। उन्होंने बहुत से दिव्य शस्त्रों की रचना की थी। महर्षि अगस्त्य के ग्रंथ ‘अगस्त्य संहिता’ में विद्युत उत्पादन से सम्बन्धित सूत्र मिलते हैं। इस ग्रंथ में आए एक श्लोेक में कहा गया है कि एक मिट्टी के पात्र में ताम्रपट्टिका तथा शिखिग्रीवा डालें, फिर बीच में गीली काष्ट पांसु लगाएं। उसके ऊपर पारा लगाएं, ऊपर पारा तथा दस्तलोष्ट डालें, फिर तारों को मिलाएंगे तो उससे मित्रावरुणशक्ति का उदय होगा। अर्थात्- मिट्टी के बर्तन में एक कॉपर प्लेट लगाएं तथा उसमें शिखिग्रीवा अर्थात् कॉपर सल्फेट डालें। उनके बीच में लकड़ी का गीला बुरादा डाले और ऊपर दस्त लोष्ट अर्थात् जस्ते का लेप करें। इन्हें धातु के तारों से जोड़ने पर मित्रावरुणशक्ति अर्थात् बिजली बनेगी। अगस्त्य संहिता में विद्युत का उपयोग इलेक्ट्रोप्लेटिंग करने की विधि का भी विवरण दिया गया है। उन्होंने बैटरी द्वारा तांबे पर सोने एवं चांदी की पॉलिश चढ़ाने की विधि निकाली। संभवतः इसी कारण अगस्त्य को कुंभोद्भव अर्थात् ‘बैटरी बॉर्न’ कहा गया। महर्षि अगस्त्य कहते हैं- ‘सौ कुंभों अर्थात् उपरोक्त विधि से बने तथा शृंखला में जोड़े गए सौ सेलों की शक्ति का  पानी  पर प्रयोग करेंगे, तो  पानी अपने रूप को बदलकर प्राणवायु अर्थात् ऑक्सीजन एवं उदान वायु अर्थात् हाइड्रोजन में परिवर्तित हो जाएगा।

कृत्रिम स्वर्ण अथवा रजत के लेप को सत्कृति कहा जाता है। लोहे के पात्र में सुशक्त जल अर्थात् तेजाब के घोल का सान्निध्य पाते ही यवक्षार अर्थात् सोने या चांदी का नाइट्रेट, ताम्र को स्वर्ण या रजत से ढंक लेता है। स्वर्ण से लिप्त उस ताम्र को शातकुंभ अथवा स्वर्ण कहा जाता है।

पश्चिमी जगत के जिस वैज्ञानिक फैराडे ने विद्युत के बल्ब की खोज की थी, उसने अपनी जीवनी में लिखा है कि उसने विद्युत बल्ब बनाने के लिए इसी ग्रंथ के अंग्रेजी अनुवाद को आधार बनाया था। आधुनिक नौकाचलन और विद्युत वहन, संदेशवहन आदि के लिए जो अनेक बारीक तारों की मोटी केबल बनती है, उसका उल्लेख भी इस ग्रंथ में हुआ है तथा केबल को रज्जु कहा गया है।

महर्षि अगस्त्य ने अपने ग्रंथ में आकाश में उड़ने वाले गर्म गुब्बारे एवं विमान को संचालित करने की तकनीक का भी उल्लेख किया है। महर्षि अगस्त्य के अनुसार उदानवायु अर्थात् हाईड्रोजन को वायु प्रतिबंधक वस्त्र अर्थात् गुब्बारे में रोककर विमान बनाया जाता है। एक श्लोक में कहा गया है कि विमान वायु पर उसी तरह चलता है, जैसे जल में नाव चलती है।

इस ग्रंथ में गुब्बारों और आकाशछत्र को रेशमी वस्त्र सुयोग्य कहा गया है क्योंकि वह बड़ा लचीला होता है। वायु पुराण में आए एक उल्लेख के अनुसार प्राचीनकाल में ऐसा वस्त्र बनता था जिसमें वायु भरी जा सकती थी। उस वस्त्र को बनाने की विधि अगस्त्य संहिता में दी गई है।

रेशमी वस्त्र पर अंजीर, कटहल, आंब, अक्ष, कदम्ब, मीराबोलेन वृक्ष के तीन प्रकार ओर दालें इनके रस या सत्व के लेप किए जाते हैं। तत्पश्चात सागर तट पर मिलने वाले शंख आदि और शर्करा का घोल यानी द्रव सीरा बनाकर वस्त्र को भिगोया जाता है, फिर उसे सुखाया जाता है। फिर इसमें उदानवायु भरकर इसे उड़ाया जा सकता है।

महर्षि अगस्त्य के बाद वैशेषिक दर्शन में भी ऊर्जा के स्रोत, उत्पत्ति और उपयोग के सम्बन्ध में बताया गया है। इक्ष्वाकु राजकुमार श्रीराम भी महर्षि अगस्त्य की महिमा के बारे में जानते थे। इसलिए जब उन्होंने दण्डकारण्य में राक्षसों के संहार का प्रण लिया तो उन्हें अगस्त्य ऋषि के सहयोग की आवश्यकता अनुभव हुई।

श्रीराम को अच्छी तरह ज्ञात था कि उन्हें महर्षि अगस्त्य से निश्चय ही ऐसी युद्ध विद्याएं एवं दिव्य शस्त्र प्राप्त हो जाएंगे जिनका उपयोग करके वे राक्षसों का संहार कर सकेंगे। इसीलिए श्रीराम महर्षि अगस्त्य के प्रिय शिष्य सुतीक्ष्ण को अपने साथ लेकर महर्षि अगस्त्य के आश्रम में पहुंचे।

दिव्य आयुध श्रीराम को समर्पित कर दिए अगस्त्य ऋषि ने (34)

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दिव्य आयुध श्रीराम को समर्पित कर दिए अगस्त्य ऋषि ने

जब भगवान श्रीराम महर्षि अगस्त्य के आश्रम में उपस्थित हुए, तब गूढ़ संवादों के माध्यम से दोनों ने एक-दूसरे को बता दिया कि उनके उद्देश्य एक समान हैं। अगस्त्य ऋषि ने दिव्य आयुध श्रीराम को समर्पित कर दिए!

मुनि सुतीक्ष्ण श्रीराम, लक्ष्मण एवं जानकी को अपने साथ लेकर महर्षि अगस्त्य के आश्रम पहुंचे। यह आश्रम कहाँ रहा होगा, इस पर विचार किया जाना चाहिए!

भारतवर्ष में महर्षि अगस्त्य के अनेक आश्रम हैं। इनमें से कुछ मुख्य आश्रम उत्तराखण्ड, महाराष्ट्र तथा तमिलनाडु में हैं। उत्तर भारत के उत्तराखण्ड प्रांत के रुद्रप्रयाग नामक जिले में अगस्त्य मुनि नामक नगर है।

यहाँ महर्षि अगस्त्य ने तप किया था तथा आतापी-वातापी नामक दो असुरों का वध किया था। इस आश्रम के स्थान पर वर्तमान में एक मन्दिर बना हुआ है। आसपास के अनेक गाँवों में मुनि अगस्त्य को इष्टदेव के रूप में पूजा जाता है। माना जाता है कि महर्षि अगस्त्य दक्षिणापथ जाने से पहले इस आश्रम में रहते थे। यह रामायण काल से पहले की बात है।

महर्षि अगस्त का एक मुख्य आश्रम महाराष्ट्र के नागपुर जिले में है। यहाँ महर्षि ने रामायण काल में निवास किया था। श्रीराम के गुरु महर्षि वशिष्ठ का एक आश्रम अगस्त्य के इसी आश्रम के निकट था। महर्षि अगस्त्य ने श्रीराम को इस कार्य हेतु कभी समाप्त न होने वाले तीरों वाला तरकश प्रदान किया था।

महर्षि अगस्त का एक मुख्य आश्रम महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के अकोला के निकट प्रवरा नदी के किनारे स्थित है। यहाँ भी महर्षि ने रामायण काल में निवास किया था।

श्रीराम के वनवास गमन के पथ के अनुसार यह अनुमान लगाया जाना सहज है कि मुनि सुतीक्ष्ण श्रीराम, लक्ष्मण एवं जानकी को अपने साथ लेकर महाराष्ट्र के नागपुर जिले में स्थित आश्रम पहुंचे होंगे।

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महर्षि अगस्त्य को भी श्रीराम के आगमन की सूचना थी। चूंकि महर्षि वसिष्ठ इक्ष्वाकुओं के कुलगुरु थे तथा वसिष्ठ एवं अगस्त्य के आश्रम निकट थे, इसलिए अगस्त्य को इक्ष्वाकुओं की श्रेष्ठ परम्पराओं एवं श्रीराम के व्यक्तित्व एवं उनके जीवन के लक्ष्य की पूरी जानकारी रही होगी। इसलिए अन्य ऋषियों की तरह अगस्त्य भी श्रीराम के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे।

जहाँ दूसरे ऋषियों को श्रीराम के रूप में अपने इष्टदेव के दर्शनों की अभिलाषा थी, वहीं अगस्त्य के लक्ष्य भिन्न थे। वे श्रीराम के हाथों राक्षसों का संहार करवाना चाहते थे और वे अपने दिव्य आयुध श्रीराम को सौंपना चाहते थे।

इस प्रकार इस काल में महर्षि अगस्त्य और श्रीराम के जीवन-लक्ष्य एक जैसे थे। वे दोनों ही राक्षसों का संहार करके आर्य-संस्कृति की रक्षा करना चाहते थे। विगत हजारों साल से राक्षस देव-संस्कृति एवं आर्य-संस्कृति को नष्ट करने में लगे हुए थे। इसलिए वे लंका, जावा, सुमात्रा एवं बाली आदि द्वीपों से भारत की मुख्य भूमि पर प्रवेश करते थे एवं दक्षिणापथ से जनस्थान होते हुए दण्डकारण्य, आर्यावर्त तथा ब्रह्मर्षि देश तक धावे मारते थे।

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राक्षसों के राजा रावण ने अयोध्या राज्य में प्रवेश करके श्रीराम के पूर्वपुरुष राजा अनरयण्य का वध किया था। इसलिए श्रीराम चाहते थे कि इन राक्षसों की शक्ति को नष्ट किया जाए। यही कारण था कि कुलगुरु महर्षि वसिष्ठ, अनुज भरत, समस्त अयोध्यावासियों एवं माताओं के बार-बार आदेश एवं अनुरोध के उपरांत भी श्रीराम चित्रकूट से अयोध्या नहीं लौटे थे अपितु गहन दण्डकारण्य में प्रवेश करके विंध्याचल पार करते हुए महर्षि अगस्त्य के आश्रम में आ पहुंचे थे। श्रीराम के इस निर्णय में महर्षि विश्वामित्र के उस शिक्षण का भी बड़ा प्रभाव रहा जो विश्वामित्र ने उन्हें किशोरावस्था में अपने आश्रम पर आक्रमण करने वाले राक्षसों के संहार के निमित्त दिया था। इस प्रकार ऋषियों की रक्षा और राक्षसों का संहार श्रीराम के जीवन के दो मुख्य उद्देश्य बन गए थे। श्रीराम के इस क्षेत्र में पहुंचने से पहले केवल महर्षि अगस्त्य ही एकमात्र ऐसी शक्ति थे जो जनस्थान की ओर से आने वाले राक्षसों से निरंतर युद्ध कर रहे थे। महर्षि ने इन राक्षसों से युद्ध करने के लिए अनेक दिव्य आयुध बनाए थे। महर्षि ने विशिष्ट प्रकार की युद्ध विद्याएं भी विकसित की थीं।

जिस प्रकार श्रीराम चाहते थे कि उन्हें महर्षि से दिव्य शस्त्र एवं युद्ध-कौशल प्राप्त हो जाए, उसी प्रकार महर्षि अगस्त्य भी चाहते थे कि कोई क्षत्रिय राजकुमार इस कार्य का बीड़ा उठाए जो राक्षसों के विरुद्ध बड़ा युद्ध आहूत करे और उस युद्ध में दुष्ट राक्षसों की आहुति दे।

युद्ध विद्याओं पर महर्षि अगस्त्य का कितना गहरा प्रभाव था, इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि महर्षि अगस्त्य को आज भी केरल के मार्शल आर्ट कलरीपायट्टु की दक्षिणी शैली वर्मक्कलै का आदि गुरु माना जाता है। वर्मक्कलै निःशस्त्र युद्धकला शैली है।

मान्यता है कि भगवान शिव ने अपने पुत्र मुरुगन स्वामी अर्थात् कार्तिकेय को यह युद्धकला सिखायी थी तथा मुरुगन स्वामी ने यह कला महर्षि अगस्त्य को सिखायी थी। महर्षि अगस्त्य ने यह कला अन्य सिद्धों को सिखायी तथा इस कला पर तमिल भाषा में पुस्तकें भी लिखीं।

महर्षि अगस्त्य को दक्षिणी चिकित्सा पद्धति अर्थात् ‘सिद्ध वैद्यक’ का भी जनक माना जाता है। किसी भी बड़े युद्ध में चिकित्सा शास्त्र का ज्ञान होना परम आवश्य है ताकि घायल योद्धाओं का उपचार करके उनके प्राण बचाए जा सकें।

जब श्रीराम और रावण का युद्ध हुआ तो उसमें कम से कम दो बार अनुभवी एवं सिद्ध चिकित्सकों की आवश्यकता पड़ी। एक बार वैद्य सुषेण से श्रीलक्ष्मण का उपचार करवाया गया एवं दूसरी बार गरुड़जी से राम एवं लक्ष्मण का नागपाश कटवाया गया।

जब सुतीक्ष्णजी श्रीराम, लक्ष्मण एवं सीताजी को लेकर महर्षि अगस्त्य के आश्रम में पहुंचे तो श्रीराम ने निःसंकोच होकर कहा-

तुम जानहु जेहि कारन आयउँ, तेहि ताते तात न कहि समझायउँ।

अब सो मंत्र देहु प्रभु मोही, जेहि प्रकार मारौं मुनिद्रोही।

मुनि मुसुकाने सुनि प्रभु बानी, पूछेहु नाथ मोहि का जानी।

अर्थात्- जब श्रीराम ने महर्षि अगस्त्य से कहा कि आप जानते हैं कि मैं यहाँ क्यों आया हूँ। इसलिए अधिक विस्तार से नहीं कहना चाहता हूँ। आप कृपा करके मुझे ऐसा मंत्र दीजिए ताकि मैं मुनियों के द्रोहियों को अर्थात् राक्षसों को मार सकूं।

इस पर महर्षि अगस्त्य ने मुस्कुराकर कहा कि हे प्रभु! आप मुझसे ऐसा क्यों कह रहे हैं, मैं तो आपके समक्ष कुछ भी नहीं हूँ। मैं तो आपका भजन करके इस जन्म से मुक्त होना चाहता हूँ। मुझे आपकी बहुत बड़ी महिमा में से थोड़ी सी महिमा का ज्ञान है।

यह प्रसंग इस बात की ओर संकेत करता है कि वीर पुरुष कभी घमण्डी नहीं होते, श्रीराम और अगस्त्य दोनों ही महावीर थे और दोनों ही घमण्ड से नितांत दूर थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सीताजी की चिंता (35)

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सीताजी की चिंता

वाल्मीकि रामायण में सीताजी की चिंता का वर्णन हुआ है। जब वनवास काल में सीताजी भगवान श्रीराम को अपने कंधों पर हर समय धनुष धारण किए हुए देखती हैं तथा जंगलों में पशुओं का शिकार करते हुए देखती हैं तो सीताजी कहती हैं कि मैं आपकी यह प्रवृत्ति देखकर चिंतित हूँ।

महर्षि अगस्त्य से भेंट के साथ ही श्रीराम की युद्ध तैयारियां पूरी हो जाती हैं। जब सीताजी श्रीराम को राक्षसों से युद्ध करने के लिए उतावला देखती हैं तो वे बड़ी चिंतित होती हैं तथा अपनी चिंता श्रीराम से कहती हैं। सीताजी की चिंता के सम्बन्ध में वाल्मीकि रामायण में एक बड़ा विचित्र प्रसंग आया है। सीताजी कहती हैं कि मनुष्य में मिथ्या भाषण, परस्त्रीगमन तथा बिना कारण ही दूसरों के प्रति शत्रुता का भाव पालने की प्रवृत्ति होती है।

मैं जानती हूँ कि आपने जीवन में कभी मिथ्या भाषण नहीं किया और मुझे विश्वास है कि आगे भी नहीं करेंगे। इसी प्रकार मैं यह भी जानती हूँ कि आपने अपनी इंद्रियों को जीत रखा है, आप एक स्त्री व्रती हैं तथा मैं निश्चय पूर्वक कह सकती हूँ कि आप जीवन में कभी किसी स्त्री की ओर दृष्टि उठाकर नहीं देख सकते।

किंतु मैं देख रही हूँ कि जब से आपने दण्डकारण्य में प्रवेश किया है, तब से आपमें राक्षसों के संहार के लिए विशेष उत्साह ने प्रवेश किया है। आपने धनुष-बाण धारण कर रखे हैं, इसलिए मुझे भय है कि आप कहीं राक्षसों को देखते ही बिना किसी कारण के उन पर आक्रमण न कर दें। यदि आपके मन में राक्षसों के प्रति ऐसे विचार हैं तो कृपया उन्हें त्याग दें। बिना अपराध के ही किसी को मारना अच्छी बात नहीं है। आप अपने शस्त्रों का उपयोग केवल संकट में पड़े हुए प्राणियों के वध के लिए करें।

केवल शस्त्र का सेवन करने से मनुष्य की बुद्धि कलुषित हो जाती है। हम लोग इस समय वन में आए हुए हैं, इसलिए हमें तापस का जीवन व्यतीत करना चाहिए। एक तापस को शस्त्रों की क्या आवश्यकता है! आप अपने शस्त्र अयोध्या लौटकर धारण कर लेना क्योंकि वहां आप राजा होंगे और राजा को शस्त्रों की आवश्यकता होती है।

सीताजी कहती हैं- धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात् प्रभवते सुखम् धर्मेण लभते सर्वे धर्मसारमिदं जगत्।।

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अर्थात्- धर्म से अर्थ प्राप्त होता है, धर्म से सुख का उदय होता है और धर्म से ही मनुष्य सब कुछ पा लेता है। इस संसार में धर्म ही सार है।

सीताजी कहती हैं- ‘नारी बुद्धि की चपलता के कारण मैंने आपको धर्म का उपदेश दिया है किंतु आप धर्म के सम्पूर्ण स्वरूप को जानने वाले हैं, अतः आप जिसे धर्म समझते हों, वही करें!’

सीताजी की चिंता सुनकर श्रीराम कहते हैं- ‘हे देवि आपने सत्य ही कहा है। धनुष किसी प्राणी को दुःख पहुंचाने के लिए धारण नहीं किया जाता, यह तो संकटग्रस्त प्राणी के प्राणों की रक्षा के लिए धारण किया जाता है। तुम देख चुकी हो कि दण्डकारण्य में रहने वाले तापस एवं मुनि जन कितने दुःखी हैं। वे सब मेरी शरण में आए हैं। कंद-मूल खाकर जीवित रहने वाले इन निरीह तापसों को खाने वाले क्रूरकर्मा राक्षस किसी भी तरह दया के पात्र नहीं हैं। मैं संकटग्रस्त इन तापसों और मुनियों की प्राणरक्षा के लिए राक्षसों का संहार अवश्य करूंगा। मैं अपना प्रण छोड़ सकता हूँ, मैं तुम्हें और लक्ष्मण को भी छोड़ सकता हूँ किंतु मैं अपनी शरण में आए हुए ब्राह्मणों की रक्षा का संकल्प कभी नहीं छोड़ सकता हूँ। अतः तुम निश्चिंत रहो, मैं केवल आततायी राक्षसों का संहार करूंगा।’

रामचरित मानस में सीताजी की चिंता का उल्लेख नहीं है। रामचरित मानस के अनुसार श्रीराम महर्षि अगस्त्य से पूछते हैं- ‘अब मुझे वनवास की शेष अवधि में कहाँ निवास करना चाहिए!’

इस पर महर्षि अगस्त्य ने कहा- ‘हे राम! आप दण्डकवन में स्थित पंचवटी नामक स्थान पर जाकर निवास करें ताकि दण्डकवन को गौतम मुनि के श्राप से मुक्त किया जा सके।’ अगस्त्य मुनि के इस कथन से अनुमान होता है कि उस काल में दण्डकारण्य एवं दण्डक वन अलग-अलग स्थान थे।

वाल्मीकि रामायण में आए एक प्रसंग के अनुसार श्रीराम, लक्ष्मण एवं जानकी पंचासर नामक सरोवर के पास पहुंचे जहाँ हर समय मधुर संगीत सुनाई देता था। श्रीराम ने अपने साथ चल रहे धर्मभृत् नामक मुनि से पूछा- ‘यह संगीत क्यों सुनाई दे रहा है।’

मुनि धर्मभृत् ने कहा- ‘इस स्थान पर माण्डकर्णि नामक महाममुनि दस हजार वर्ष से तपस्या कर रहे हैं। देवताओं ने उनकी तपस्या भंग करने के लिए पांच अप्सराएं नियुक्त की हैं। माण्डकर्णि मुनि उन अप्सराओं को अपनी पत्नी बनाकर इस सरोवर के निकट बने आश्रम में निवास करते हैं। यह संगीत वे अप्सराएं ही बजा रही हैं।’

यह सुनकर श्रीराम ने कहा- ‘बड़ी विचित्र बात है!’

इसके बाद श्रीराम ने गोदावरी के निकट पंचवटी नामक स्थान पर पर्णकुटी बनाई। इस स्थान पर पहुंचने के बाद श्रीराम राक्षसों के बिल्कुल निकट पहुंच गए। यहीं पर उन्हें राक्षसराज रावण की बहिन शूर्पनखा ने तंग करना आरंभ किया। उसके चरित्र का वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा है-

सूपनखा रावण कै बहिनी, दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी।

अर्थात्- रावण की बहिन शूर्पनखा अत्यंत दुष्ट-हृदय सर्पणी की भांति भयंकर थी।

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राम चरित मानस में आए प्रसंग के अनुसार एक दिन शूर्पनखा की दृष्टि वन में निवास कर रहे रघुवंशी राजकुमारों श्रीराम एवं लक्ष्मण पर पड़ी। वह सुंदर रूप बनाकर श्रीराम के पास गई। वह चाहती थी कि श्रीराम उससे विवाह कर लें किंतु श्रीराम एवं लक्ष्मण दोनों ने उससे विवाह करने से मना कर दिया। शूर्पनखा आर्यों की इस पावन संस्कृति से परिचित नहीं थी जिसमें पराई स्त्री की ओर आंख उठाकर देखना भी पाप समझा जाता था। इसलिए वह राम-लक्ष्मण से विवाह करने का बार-बार अनुरोध करने लगी। जब श्रीराम ने किसी भी तरह श्ूार्पनखा का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया तो शूर्पनखा अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गई तथा उसने सीताजी को मारने का निश्चय किया ताकि उसके बाद श्रीराम शूर्पनखा से विवाह कर लें। इस पर श्रीराम ने अनुज लक्ष्मण को आदेश दिया कि वे इस असुर-नारी की नासिका भंग करके उसे शिक्षा दें। लक्ष्मण ने शूर्पनखा की नाक काट दी। इससे कुपित होकर शूर्पनखा के भाइयों खर एवं दूषण ने अपनी सेना लेकर श्रीराम एवं लक्ष्मण पर आक्रमण किया। जब श्रीराम ने उनका भी वध कर दिया तो शूर्पनखा रोती हुई रावण के दरबार में गई तथा उनसे कहा कि तेरे राज्य में दो आर्य-राजकुमार घुस आए हैं और उन्होंने तेरे जीवित रहते हुए ही, मेरा यह हाल किया है।

शूर्पनखा की यह दशा देखकर रावण ने शूर्पनखा के अपमान का बदला लेने के लिए सीताजी का हरण कर लिया।

इस पर श्रीराम ने पंचवटी से आगे दक्षिण दिशा में बढ़कर सीताजी को ढंूढना आरम्भ किया। इसी उपक्रम में श्रीराम का परिचय किष्किंधा के निर्वासित राजा सुग्रीव और उनके मंत्रियों हनुमान एवं जाम्बवान से हुआ। श्रीराम ने किष्किंधा के अन्यायी शासक बाली का वध करके सुग्रीव को राज्य दिलवाया।

सुग्रीव के मंत्रियों ने समुद्र के बीच बने हुए द्वीपों में सीताजी को ढूंढ निकाला तथा सुग्रीव की वानर सेना को साथ लेकर त्रिलोक-विजयी रावण की लंका पर आक्रमण कर दिया। इस कार्य में रावण द्वारा लंका से निष्कासित रावण के भाई विभीषण ने श्रीराम की सहायता की। श्रीराम ने रावण और उसके पुत्रों, मंत्रियों, सेनापतियों एवं सम्पूर्ण सेना को नष्ट करके सीताजी को पुनः प्राप्त कर लिया। सम्पूर्ण रामकथा बहुत दिव्य है। इसके बहुत से रूप हैं। अलग-अलग लेखकों ने अपनी रुचि के अनुसार इसे कहा है।

गोस्वामीजी ने लिखा है- ‘नाना भांति राम अवतारा, रामायन सत कोटि अपारा।’

हम इस कथा के केवल तीन बिंदुओं पर चर्चा करना चाहते हैं। ये तीनों ही पक्ष आर्य संस्कृति का उस काल की अन्य संस्कृतियों से अंतर स्पष्ट करते हैं। पहला बिंदु है भाइयों के बीच झगड़े का।

आर्य संस्कृति के इक्ष्वाकु राजकुमार राज्य के लोभी नहीं हैं, वे इस पर बड़े भाई का नैसर्गिक अधिकार मानते हैं जबकि बड़ा भाई भी पिता के वचनों के पालन के लिए राज्य त्यागकर जंगलों आता है और आर्य-संस्कृति के पोषक मुनियों की रक्षा के लिए राक्षसों का संहार करता है। आर्य संस्कृति के समानांतर चल रही वानर संस्कृति के दो भाई बाली एवं सुग्रीव और राक्षस संस्कृति के दो भाई रावण एवं विभीषण एक-दूसरे के प्राण लेने को आतुर हैं।

यहाँ यह स्पष्ट करना उचित होगा कि बाली एवं सुग्रीव में से बाली अधर्म के रास्ते पर है  और सुग्रीव उसके अधर्म से बचने का प्रयास कर रहे हैं। जबकि रावण और विभीषण में से रावण अधर्म के मार्ग पर है और विभीषण अपने भाई को अधर्म के मार्ग पर चलने से रोकने का प्रयास कर रहे हैं।

हमारी चर्चा का दूसरा बिंदु है विजित राज्य पर अधिकार! श्रीराम ने बाली और रावण दोनों राजाओं का वध किया। इस कारण किष्किंधा एवं लंका के राज्यों पर श्रीराम का अधिकार था किंतु उन्होंने ये राज्य स्वयं अपने अधिकार में न लेकर उन्हीं राज्यों के राजकुमारों को सौंप दिए। यह आर्य संस्कृति की एक और बड़ी विशेषता थी जो बाद में सैंकड़ों साल तक आर्य-राजाओं में देखी गई।

रामकथा के जिस तीसरे बिंदु की चर्चा हम करना चाहते हैं, वह है स्त्री-लोलुपता एवं स्त्री से विवाह सम्बन्धी मान्यताएं। किष्किंधा का राजा बाली अपने छोटे भाई सुग्रीव को राज्य से निकालकर उसकी पत्नी को अपने पास रख लेता है और जब सुग्रीव किष्किंधा के राजा बनते हैं तो वे मृत-भाई की पत्नी तारा से विवाह कर लेते हैं।

यह उस काल के वनवासी वानर समुदाय की संस्कृति है। इसी प्रकार जब विभीषण लंका के राजा बनते हैं तो वे भी रावण की पटरानी मंदोदरी से विवाह कर लेते हैं। यह उस काल के राक्षस समुदाय की संस्कृति है। जबकि उस काल की आर्य संस्कृति न तो छोटे भाई की पत्नी से विवाह करने की अनुमति देती है और न बड़े भाई की पत्नी से।

रावण सीताजी को बहुत से प्रलोभन एवं भय दिखाकर उनसे विवाह करना चाहता है किंतु सीताजी को न तो अपने प्राणों की परवाह है और न राज्य के सुखों की। उन्हें अपने वनवासी राम को छोड़कर अन्य कोई भी पुरुष पति रूप में स्वीकार नहीं है। यह उस काल के आर्यों की संस्कृति है।

शम्बूक वध का सच (36)

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शम्बूक वध का सच

शम्बूक वध का सच भारतीय पौराणिक इतिहास की ऐसी जटिल पहेली बन गया है जिसे आज के राजनेता अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए काम में ले रहे हैं। उन्हें शम्बूक वध का सच नहीं जानना है, इस मिथक को अपने पक्ष में भुनाना है।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार जब श्रीराम अयोध्या के राजा बन गए तब एक दिन वे अपने राज्य के विभिन्न भागों में यह देखने के लिए गए कि उनके राज्य में कहीं अधर्म तो नहीं हो रहा है! जब राज्य के विभिन्न क्षेत्रों का भ्रमण करते हुए श्रीराम अपने राज्य के दक्षिणी भाग में पहुंचते तो वहां उन्होंने शैवल पर्वत के उत्तरी भाग में एक विशाल सरोवर दिखाई दिया। इस सरोवर के तट पर एक तपस्वी बड़ी भारी तपस्या कर रहा था।

वह नीचे को मुख किए हुए लटका हुआ था। रघुकुल नंदन श्रीराम ने उस तपस्वी से कहा कि उत्तम तप का पालन करने वाले तापस तुम धन्य हो! मैं दशरथकुमार राम तुम्हारा परिचय जानने के कौतूहल से ये बातें पूछ रहा हूँ। तुम्हें किस वस्तु को पाने की इच्छा है? तपस्या द्वारा संतुष्ट हुए इष्ट देवता से वर के रूप में तुम क्या पाना चाहते हो? स्वर्ग या दूसरी कोई वस्तु अथवा कौनसा पदार्थ है, जिसके लिए तुम ऐसी कठोर तपस्या कर रहे हो, जो दूसरों के लिए दुष्कर है?

तुम यह भी बताओ कि तुम ब्राह्मण हो या दुर्जय क्षत्रिय? तीसरे वर्ण के वैश्य हो अथवा शूद्र? तुम्हारा भला हो, ठीक-ठीक बताना। महाराज श्रीराम के इस प्रकार पूछने पर नीचे सिर किए लटके हुए उस तपस्वी ने कहा- महायशस्वी राम! मैं शूद्रयोनि में उत्पन्न हुआ हूँ और सदेह स्वर्गलोक में जाकर देवत्व प्राप्त करना चाहता हूँ। इसीलिए ऐसा उग्र तप कर रहा हूँ। हे राम मैं झूठ नहीं बोलता, मैं देवलोक पर विजय प्राप्त करने की इच्छा से ही यह तपस्या में लगा हूँ। आप मुझे शूद्र समझिए, मेरा नाम शम्बूक है।

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शम्बूक इस प्रकार कह ही रहा था कि श्रीरामचंद्र ने म्यान में से चमचमाती हुई तलवार खींच ली और उसी से उसका सिर काट लिया। शम्बूक वध होते ही इन्द्र और अग्नि सहित सम्पूर्ण देवता ‘बहुत ठीक, बहुत ठीक’ कहकर भगवान श्रीराम की बारम्बार प्रशंसा करने लगे। उसी समय उनके ऊपर सब ओर से वायुदेव द्वारा बिखेरे गए दिव्य एवं परम सुगन्धित पुष्पों की वर्षा होने लगी।

शम्बूक वध हुआ देखकर देवताओं ने कहा- ‘हे देव आपने यह देवताओं का ही कार्य सम्पन्न किया है। शत्रुओं का दमन करने वाले रघुकुल नंदन सौम्य श्रीराम! आपके इस सत्कर्म से यह शूद्र सशरीर स्वर्गलोक में नहीं जा सका है।’

हिन्दू जनमानस का एक बहुत बड़ा वर्ग शम्बूक वध के प्रसंग पर उद्वेलित रहता है। बहुत से लोग श्रीराम पर आक्षेप लगाते हैं कि उन्होंने शंबूक का वध इसलिए किया कि वह शूद्र था किंतु जब हम वैदिक, उत्तर वैदिक एवं पौराणिक काल के सम्पूर्ण वांगमय को देखते हैं तो हमें कुछ अलग तरह की बातें दृष्टिगोचर होती हैं। हम उनमें से कुछ बातों की चर्चा करना चाहेंगे।

सबसे पहले हमें वाल्मीकि रामायण के रचना काल पर विचार करना चाहिए जिसके सम्बन्ध में विद्वानों में बड़ा मतभेद है। हिन्दू धर्म में यह धारणा प्रचलित है कि रामायण की रचना वेदों के बाद हुई थी, क्योंकि आर्यों को लिपि का ज्ञान भी वैदिक काल के बीत जाने पर हुआ था।

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श्रीराम का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद के दशम् मण्डल में हुआ है। ऋग्वेद की रचना का काल आज से लगभग 6000 वर्ष पहले से लेकर आज से लगभग 4000 साल पहले तक का माना जाता है जबकि ऋग्वेद के दशम् मण्डल की रचना का काल ई.पू.1500 माना जाता है। अतः माना जा सकता है कि रामायण का रचना-काल ई.पू.1500 के बाद रहा होगा। रामायण की भाषा वैदिक भाषा से भिन्न है तथा भाषा की दृष्टि से वाल्मीकि रामायण उत्तर वैदिक-काल की रचना प्रतीत होती है। उत्तर-वैदिक काल में आर्य समुदाय में जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था का उदय नहीं हुआ था। लोग अपनी रुचि के अनुसार अपना कर्म चुनते थे और वही उसका वर्ण होता था। इस काल में केवल तीन ही वर्ण थे। शूद्र वर्ण का उदय तो उत्तर-वैदिक काल के सैंकड़ों साल बाद हुआ। अतः श्रीराम के काल में शंबूक के शूद्र होने तथा शूद्र होने के कारण उसका वध किए जाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। एक आख्यान के अनुसार जिस प्रकार वाल्मीकि के पूर्व रामकथा मौखिक रूप से विद्यमान थी, उसी प्रकार दीर्घकाल तक ‘वाल्मीकि-रामायण’ भी मौखिक रूप में ही जीवित रही। इस महाकाव्य की रचना के पश्चात् लव-कुश ने उसे कंठस्थ किया और वर्षों तक उसे गाते रहे किन्तु अन्त में इस काव्य को लिपिबद्ध करने का कार्य भी स्वयं वाल्मीकि ने ही किया।

भाषा की दृष्टि से रामायण की संस्कृत न केवल उत्तर-वैदिक-काल के बाद की है अपितु सातवीं शताब्दी ईस्वी पूर्व में हुए प्रसिद्ध संस्कृत-विद्वान् पाणिनि के भी बाद की है। पाणिनि के ‘अष्टाध्यायी’ में वाल्मीकि अथवा वाल्मीकि-रामायण का उल्लेख नहीं है किन्तु उसमें कैकयी, कौशल्या, शूर्पणखा आदि का उल्लेख हुआ है।

इससे प्रतीत होता है कि पाणिनि के काल में यद्यपि रामकथा प्रचलित थी, फिर भी वाल्मीकि रामायण की रचना उस समय तक नहीं हुई थी। इससे विद्वानों ने निष्कर्ष निकाला है कि वाल्मीकि-रामायण की रचना ई.पू. 600-500 के काल में हुई होगी।

वर्तमान समय में हमें जो वाल्मिीकि-रामायण मिलती है, पाठ की दृष्टि से उस वाल्मीकि-रामायण के चार प्रामाणिक संस्करण उलपब्ध हैं- उदिच्य पाठ, दक्षिणात्य पाठ, गौड़ीय पाठ और पश्चिमोत्तरीय पाठ।

सारांश रूप में हम यह कहना चाहते हैं कि वाल्मीकि-रामायण के नाम से जो पुस्तक वर्तमान समय में हमारे हाथों में है, उसकी रचना ऋग्वैदिक काल में मौखिक रूप से हुई थी और जब लिपि का आविष्कार हुआ तब इसे लिखित रूप प्राप्त हुआ। इस बीच इसके मूल स्वरूप में कितने ही परिवर्तन आए होंगे, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

उत्तर वैदिक काल के बाद आरम्भ हुए पौराणिक काल में जो शूद्र-वर्ण था, उसमें केवल शिल्प-कर्म करने वाले लोग थे, वे अस्पर्श्य नहीं थे, इसलिए वे तपस्या करने पर वध योग्य नहीं माने जा सकते थे।

श्रीराम कथा में श्रीराम के उज्जवल चरित्र के विभिन्न तत्वों के आधार पर कहा जा सकता है कि शम्बूक वध एक क्षेपक है जो बहुत बाद के काल में प्रचलित मान्यताओं के प्रभाव से किसी अनाम व्यक्ति ने जोड़ दिया है। जो राम शबरी के झूठे बेर खाते हैं, जो राम केवट से गंगापार उतार देने का सविनय अनुरोध करते हैं, जो राम निषाद राज को गले लगाते हैं, जो राम वनवासी वानरों को अपने भाई लक्ष्मण से भी बढ़कर बताते हैं, वे श्रीराम शम्बूक वध केवल इसलिए नहीं कर सकते कि वह शूद्र होकर तपस्या कर रहा है।

यदि शम्बूक वध की कथा को सत्य मान लिया जाए तो भी उसका वध किए जाने का कारण यह माना जाना चाहिए कि वह सदेह स्वर्ग जाना चाहता था और देवलोक पर विजय प्राप्त करना चाहता था। पुराणों में राजा मान्धाता की कथा मिलती है जिसके अनुसार उसने स्वर्ग पर विजय प्राप्त करने के लिए तपस्या की थी और इन्द्र ने उसे लवणासुर के हाथों मरवाया था।

विभिन्न पुराणों सहित वाल्मीकि रामायण में श्रीराम के पूर्वज राजा सत्यव्रत की कथा मिलती है, जिसमें बताया गया है कि राजा सत्यव्रत ने सदेह स्वर्ग जाने का प्रयास किया तो देवताओं ने उसे स्वर्ग से धकेल कर आकाश में उल्टा लटका दिया जिसे हम त्रिशंकु के नाम से जानते हैं।

पौराणिक काल का जितना भी हिन्दू धार्मिक साहित्य उपलब्ध है, उसमें सदेह स्वर्ग जाने की कामना को बहुत बड़ा अपराध माना गया है। शंबूक यही अपराध करने जा रहा था, अतः यदि शंबूक-वध की कथा सत्य है तो शम्बूक वध का कारण उसका सदेह स्वर्ग जाने तथा देवलोक पर विजय प्राप्त करने का प्रयास करना है, न कि उसका शूद्र होकर तपस्या करना। यदि शंबूक के स्थान पर कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य भी यही प्रयास करता तो उसका यही अंत होना था।

एक बात और भी है जो शंबूक-वध के प्रसंग को संदेहास्पद बनाती है। पौराणिक काल के पश्चात् भारत में चार्वाकों की एक दीर्घ परम्परा विकसित हुई। उन्होंने हिन्दू धर्मग्रंथों में बहुत सी अशोभनीय बातें जोड़ दीं ताकि हिन्दू समाज अपनी वैदिक एवं पौराणिक परम्पराओं से दूर हो जाए तथा सनातन धर्म से उसका विश्वास हट जाए।

अतः यदि यह कहा जाए कि शम्बूक वध का प्रसंग कालांतर में चार्वाकों द्वारा जोड़ दिया गया होगा तो इसमें कोई अतिश्योत्ति नहीं होगी। वाल्मीकि रामायण में भगवान बुद्ध को चोर एवं दण्डनीय बताया गया है। हमने पहले भी कहा है कि भगवान बुद्ध के जीवन काल से बहुत पहले ही रामायण की रचना हो चुकी थी, अतः उसमें बुद्ध का उल्लेख होना ही नहीं चाहिए। अतः इस कथन को बाद में जोड़ा गया है।

जातक कथाओं में रामायण के पात्रों का उल्लेख है जो कि बुद्ध के जीवन काल के कुछ पश्चात् ही रचे गए थे। इन कथाओं में राम को बहुत आदर से स्मरण किया गया है, यदि उस काल की रामायण में बुद्ध को चोर बताया गया होता तो जातक कथाओं में राम का स्मरण आदर से नहीं किया गया होता!

सम्पूर्ण हिन्दू वांगमय में कोई ऐसी अन्य कथा नहंी मिलती जिसमें किसी शूद्र वर्ण के व्यक्ति को तपस्वी बनने से रोका गया हो अथवा उसे तपस्वी बनने पर मार डाला गया हो! वाल्मीकि रामायण में शंबूक-वध का उल्लेख आया है जबकि गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित रामचरित मानस में यह प्रसंग नहीं है।

महाभारत कालीन ऋषि रोमहर्षिण तथा उनके पुत्र सूतजी भी सूतकर्म करने वाले थे किंतु उन्होंने व्यास गद्दी पर बैठकर ऋषियों एवं राजाओं को पुराण सुनाए थे। उन्हें तो किसी ने नहीं मारा!

अतः हम सार रूप में यही कहना चाहेंगे कि इक्ष्वाकु वंशी राम जिनका सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद के दसवें मण्डल में हुआ है, जन-जन के राम हैं, उनके लिए किसी व्यक्ति के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र होने का कोई अर्थ नहीं हैं।

ये उन्हीं श्री हरि विष्णु के मानव अवतार हैं जिन्होंने श्रीकृष्ण अवतार में दासी पुत्र विदुरजी के घर भोजन किया, न कि हस्तिनापुर के राजा दुर्योधन के यहाँ! वैदिक काल में वर्ण का निर्धारण कर्म से होता था तथा महाभारत काल में वर्ण का निर्धारण उस घर से होता था, जिसमें रहकर बालक पलता था। जाति प्रथा तो भारतीय समाज में बहुत बाद में आई है। अतः शंबूक-वध की कथा नितांत कल्पना है तथा हिन्दू समाज की समरसता को भंग करने के उद्देश्य से गढ़ी गई है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजा शिबि

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राजा शिबि

राजा शिबि ने अपने शरीर का मांस काटकर बाज को दे दिया!

पिछली एक कथा में हमने चर्चा की थी कि इन्द्र के कुपित हो जाने के कारण राजा ययाति स्वर्ग से नीचे गिरने लगा। उस स्थान पर अष्टक, प्रतर्दन, वसुमान् और शिबि नामक राजर्षि बैठे हुए तपस्या कर रहे थे। इस कथा में हम राजा शिबि की कथा की चर्चा करेंगे जिनका उल्लेख अनेक पुराणों, महाभारत तथा जातक कथाओं में मिलता है। तेरहवीं सदी के जैन कवि बालचंद्र सूरि ने ‘करुणावज्रायुध’ में राजा शिबि की कहानी राजा वज्रायुध के नाम से कही है। इस कथा का प्रारूप जातक कथा के बोधिसत्व के समान है।

राजा शिबि कुरुवंशी राजा उशीनर के पुत्र थे। इस कारण राजा ययाति अवश्य ही राजा उशीनर तथा राजा शिबि के पूर्वज रहे होंगे। राजा उशीनर के वंशज आगे चलकर उशीनर कहलाए। कौषीतकि उपनिषद् में उशीनर की गणना मत्स्यों, कुरुओं तथा पांचालों आदि के साथ राजवंशों के रूप में की गई है।

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अनेक पुराणों के अनुसार उशीनरों का प्रदेश मध्यदेश था। महाभारत के अनुसार उशीनरों की राजधानी भोज नगर थी तथा उशीनरों ने यमुना की पार्श्ववर्ती नदियों के किनारे यज्ञ किया था। पाणिनि ने अपने ग्रंथ अष्टाध्यायी में अपने कई सूत्रों में उशीनर देश का उल्लेख किया है जिसके अनुसार ‘पुरूवंशी नरेश शिबि’ उशीनर देश के राजा थे। राजा शिबि बड़े परोपकारी एवं धर्मात्मा थे। उनके यहाँ से कोई याचक खाली हाथ नहीं लौटता था। उनकी सम्पत्ति परोपकार के लिए थी और शक्ति आर्त की रक्षा के लिए। वे अजातशत्रु थे। उनकी प्रजा सुखी एवं संतुष्ट थी। राजा शिबि सदैव ही भगवद्-आराधन में लीन रहते थे। महाभारत के वनपर्व में इन्द्र और अग्नि द्वारा राजा शिबि की परीक्षा लिए जाने की कथा मिलती है। शिबि की त्याग-भावना उनके स्वभाव का स्थायी गुण है अथवा अस्थायी, इस बात की परीक्षा करने के लिए देवराज इंद्र और अग्निदेव ने एक योजना बनायी। एक दिन अग्निदेव कबूतर का रूप धारण करके फड़फड़ाते हुए राजा शिबि की गोद में जाकर गिरे। उस सयम राजा शिबि अपने दिव्य सिंहासन पर बैठे हुए थे। उसी समय देवराज इन्द्र बाज पक्षी का रूप धारण करके उस कबूतर का पीछा करते हुए दरबार में आए।

जब भयभीत कबूतर राजा शिबि की गोद में आकर गिरा तो पुरोहित ने राजा से कहा- ‘महाराज। यह कबूतर बाज के डर से अपने प्राणों की रक्षा के लिए आपकी शरण में आया है। किसी तरह प्राण बच जाएं, यही इस कबूतर का प्रयोजन है परन्तु विद्वान पुरुष कहते हैं कि इस तरह कबूतर का आकर गिरना भयंकर अनिष्ट का सूचक है। आपकी मृत्यु निकट जान पड़ती है, अतः आपको इस उत्पात की शान्ति के लिए धन दान करना चाहिए।’

उसी समय बाज से भयभीत कबूतर ने राजा से कहा- ‘महाराज। मैं बाज के डर से प्राण बचाने के लिए प्राणार्थी होकर आपकी शरण में आया हूँ। मैं वास्तव में कबूतर नहीं, ऋषि हूँ। मैंने स्वेच्छा से अपना शरीर  बदल लिया है। प्रजापालक एवं प्राणरक्षक होने के कारण आप ही मेरे स्वामी हैं। मैं आपकी शरण में हूँ, मुझे बचाइये। मुझे ब्रह्मचारी समझिये। मैंने वेदों का स्वाध्याय करते हुए अपने शरीर को दुर्बल किया है। मैं तपस्वी और जितेन्द्रिय हूँ। आचार्य के प्रतिकूल कभी कोई बात नहीं करता। मुझे योगयुक्त और निष्पाप जानिये। मैं वेदों का प्रवचन और छन्दों का संग्रह करता हूँ। मैंने सम्पूर्ण वेदों के एक-एक अक्षर का अध्ययन किया है। मैं श्रोत्रिय विद्वान हूँ। मुझ जैसे व्यक्ति को किसी भूखे प्राणी की भूख बुझाने के लिए उसके हवाले कर देना उत्तम दान नहीं है। अतः मुझे बाज को मत सौंपिये। मैं कबूतर नहीं हूँ’।

कबूतर के चुप हो जाने पर बाज ने राजा से कहा- ‘महाराज! समस्त जीवों को बारी-बारी से विभिन्न योनियों में जन्म लेकर रहना पड़ता है। मालूम होता है, आप इस सृष्टि परम्परा में पहले कभी इस कबूतर से जन्म ग्रहण कर चुके हैं, तभी तो इसे अपने आश्रय में ले रहे हैं। राजन् मैं आग्रह-पूर्वक कहता हूँ, आप इस कबूतर को शरण देकर मेरे भोजन में विघ्न न डालें।’

राजा बोले- ‘अहो! आज से पहले किसी ने कभी भी किसी पक्षी के मुख से ऐसी उत्तम संस्कृत नहीं सुनी होगी जैसी ये कबूतर और बाज बोल रहे हैं। किस प्रकार इन दोनों का वास्तविक स्वरूप जानकर इनके प्रति न्यायोचित बर्ताव किया जा सकता है! जो राजा अपनी शरण में आए हुए भयभीत प्राणी को उसके शत्रु के हाथ में दे देता है, उसके देश में समय पर वर्षा नहीं होती। उसके बोए हुए बीज भी समय पर नहीं उगते हैं।

जब वह संकट के समय अपनी रक्षा चाहता है, तब उसे कोई रक्षक नहीं मिलता है। जो राजा अपनी शरण में आए हुए भयभीत प्राणी को उसके शत्रु के हाथ में सौंप देता है, उसकी संतानें छोटी अवस्था में ही मर जाती हैं। उसके पितरों को कभी पितृलोक में रहने के लिए स्थान नहीं मिलता और देवता उसका दिया हुआ हविष्य ग्रहण नहीं करते हैं, उसका भोजन निष्फल है।

वह अनुदार ह्दय का मनुष्य शीघ्र ही स्वर्गलोक से भ्रष्ट हो जाता है और इन्द्र आदि देवता उसके ऊपर वज्र का प्रहार करते हैं। अतः हे बाज! इस कबूतर के बदले मेरे सेवक तुम्हारी पुष्टि के लिए भात के साथ ऋषभकन्द पका कर देंगे। तुम जिस स्थान पर प्रसन्नता-पूर्वक रह सको, वहीं चलकर रहो। मेरे सेवक तुम्हारे लिए वहीं पर भात और ऋषभकन्द का गूदा पहुँचा देंगे।’

बाज बोला- ‘राजन! मैं आपसे ऋषभकन्द नहीं मांगता और न मुझे इस कबूतर से अधिक कोई दूसरा मांस ही चाहिए। आज दूसरे पक्षियों के अभाव में यह कबूतर ही मेरे लिए देवताओं का दिया हुआ भोजन है। अतः यही मेरा आहार होगा। इसे ही मुझे दे दीजिये।’

राजा ने कहा- ‘हे बाज! उक्षा अर्थात् ऋषभकन्द अथवा वेहत नामक औषधियाँ बड़ी पुष्टिकारक होती हैं। मेरे सेवक वन में जाकर उनकी खोज करेंगे और पर्याप्त मात्रा में भात के साथ पकाकर तुम्हारे पास पहुँचा देंगे। भयभीत कपोत के बदले में यह मूल्य उचित होगा। इस मूल्य को ले लो तथा इस कबूतर को न मारो।

मैं अपने प्राण दे दूंगा किंतु यह कबूतर तुम्हें नहीं दूंगा। क्या तुम नहीं जानते कि यह कबूतर कितना सुन्दर, कैसा भोला और सौम्य है! अब तुम यहाँ व्यर्थ कष्ट न उठाओ। मैं इस कबूतर को किसी भी प्रकार से तुम्हारे हाथ में नहीं दूंगा। बाज! जिस कर्म से शिबि देश के लोग प्रसन्न होकर मुझे साधुवाद देते हुए मेरी भूरि-भूरि प्रशंसा करें और जिससे मेरे द्वारा तुम्हारा भी प्रिय कार्य बन सके, वह बताओ। उसी के लिए मुझे आज्ञा दो। मैं वही करूंगा।’

बाज बोला- ‘राजन्! अपनी दायीं जांघ से इस कबूतर के बराबर मांस काटकर दे दो। ऐसा करने से कबूतर की भली-भाँति रक्षा हो सकती है। इसी से शिबि देश की प्रजा आपकी भूरि-भूरि प्रशंसा करेगी और मेरा भी प्रिय कार्य सम्पन्न हो जायेगा।’

बाज के ऐसा कहने पर राजा ने अपनी दायीं जांघ से मांस काटकर तराजू के एक पलड़े पर रखा तथा दूसरे पलड़े में कबूतर को रख दिया। कबूतर का भार अधिक था। इसलिए राजा ने और मांस काटकर तराजू में चढ़ा दिया। फिर भी कबूतर वाला पलड़ा भारी रहा। इस प्रकार राजा शिबि ने क्रमशः अपने सभी अगों का मांस काट-काटकर तराजू पर चढ़ाया तो भी कबूतर ही भारी रहा। तब राजा स्वयं ही तराजू पर चढ़ गए। ऐसा करते समय उनके मन मे क्लेश नहीं हुआ।

राजा को ऐसा करते हुए देखकर बाज बोला- ‘हो गयी कबूतर की प्राण रक्षा। ‘ऐसा कहकर वह वहीं अन्तर्धान हो गया।

राजा शिबि कबूतर से बोले- ‘हे कपोत। हम तो तुम्हें कबूतर ही समझते थे। हे पक्षी-प्रवर! मैं आपसे पूछता हूँ, बताओ, यह बाज कौन था? ईश्वर के अतिरिक्त और कोई भी ऐसा चमत्कारपूर्ण कार्य नहीं कर सकता। भगवन! मेरे इस प्रश्न का यथावत उत्तर दें।’

कबूतर बोला- ‘राजन्! मैं धूममयी ध्वजा से विभूषित वैश्वानर अग्नि हूँ और उस बाज के रूप में साक्षात वज्रधारी शचीपति इन्द्र थे। सुरथा नन्दन! तुम एक श्रेष्ठ पुरुष हो। हम दोनों तुम्हारी श्रेष्ठता की परीक्षा करने के लिए यहाँ आए थे। राजन्! तुमने मेरी रक्षा करने के लिए तलवार से काटकर अपना यह मांस दिया है, इसके घाव को मैं अभी अच्छा कर देता हूँ।

यहाँ की चमड़ी का रंग सुन्दर और सुनहला हो जायगा तथा इससे बड़ी पवित्र सुगन्ध फैलती रहेगी, यह तुम्हारा राज चिह्न होगा। तुम्हारे इस दक्षिण पार्श्व से एक पुत्र उत्पन्न होगा, जो इन प्रजाओं का पालक और यशस्वी होने के साथ ही देवर्षियों के अत्यन्त आदर का पात्र होगा। उसका नाम होगा- कपोतरोमा।

राजन्। तुम्हारे द्वारा उत्पन्न किया हुआ वह पुत्र, जिसे तुम भविष्य में प्राप्त करोगे, तुम्हारी जांघ का भेदन करके प्रकट होगा, इसीलिए औभ्दिद कहलाएगा। उसके शरीर के रोएं कबूतर के समान होंगे। उसका शरीर बैल के समान ह्ष्ट-पुष्ट होगा। तुम देखोगे कि वह सुयश से प्रकाशित हो रहा है। सुरथा के वंशजों में वह सर्वश्रेष्ठ शूरवीर होगा।’ ऐसा कहकर अग्निदेव चले गए।

राजा शिबि से कोई कुछ भी मांगता, वे दिए बिना नहीं रहते थे। एक बार मंत्रियों ने पूछा- ‘महाराज! आप किस इच्छा से ऐसा साहस करते हैं, अदेय वस्तु का दान करने को भी तैयार हो जाते हैं। क्या आप यश चाहते हैं?’

राजा बोले- ‘नहीं, मैं यश अथवा ऐश्वर्य की कामना से दान नहीं करता, भोगों की अभिलाषा से भी नहीं। धर्मात्मा-पुरुषों ने सदैव इस मार्ग का सेवन किया है, अतः मेरा भी यह कर्त्तव्य है, ऐसा समझ कर ही मैं यह सब कुछ करता हूँ। सत्पुरुष जिस मार्ग से चले हैं, वही उत्तम है, यही सोचकर मेरी बुद्धि उत्तम पथ का आश्रय लेती है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लवणासुर का वध कर दिया शत्रुघ्न ने

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लवणासुर का वध कर दिया शत्रुघ्न ने

इस धारवाहिक की 9वीं कड़ी में हमने वायुपुराण, विष्णु पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, भागवत पुराण, मत्स्य पुराण, वाल्मीकि रामायण तथा महाभारत आदि ग्रंथों में मिलने वाली राजा मांधाता की कथा की चर्चा की थी। राजा मांधाता त्रेता युग का पहला राजा था जो ईक्ष्वाकु कुल में उत्पन हुआ था। उसका वध लवणासुर नामक एक असुर ने भगवान शिव के दिव्य त्रिशूल की सहायता से छलपूर्वक किया था।

ईक्ष्वाकु वंशी राज कुमार श्रीराम ने राक्षसों के राजा रावण का वध करके अपने पूर्वज राजा अनरण्य की हत्या का बदला लिया था। जब राम लंका से पुनः अयोध्या लौट आए, तब राम के सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न ने लवणासुर का वध करके अपने पूर्वज मांधाता की हत्या का बदला लिया। वाल्मीकि रामायण सहित अनेक ग्रंथों में इस कथा का वर्णन किया गया है।

इस कथा के अनुसार एक बार शत्रुघ्न ने च्यवन ऋषि से पूछा कि लवणासुर में कितना बल है तथा उसने किन-किन योद्धाओं की हत्या की है। इस पर च्यवन ऋषि ने राजकुमार शत्रुघ्न को बताया कि तुम्हारे पूर्वज राजा मांधात ने प्रतिज्ञा की कि मैं इन्द्र का आधा सिंहासन और उसका आधा राज्य प्राप्त करूंगा।

जब राजा मांधाता ने देवलोक पर आक्रमण किया तो देवराज इंद्र ने उससे कहा कि अभी तो तुम पूरी धरती के भी राजा नहीं हुए हो, अभी तो मधुवन का राजा लवणासुर तुम्हारा आदेश नहीं मानता, पहले उस पर विजय प्राप्त करो तब स्वर्ग पर आक्रमण करना।

इन्द्र को यह पता था कि लवणासुर के पास भगवान शिव का दिया हुआ एक दिव्य त्रिशूल है जिसके कारण वह अजेय है किंतु राजा मांधाता उस त्रिशूल के बारे में नहीं जानता था। इसलिए जब राजा मांधाता ने अपनी सेना को साथ लेकर लवणासुर पर आक्रमण किया तो लवाणासुर ने उसी दिव्य त्रिशूल से राजा मांधाता एवं उसकी सेना का संहार कर दिया। इस प्रकार इंद्र ने चालाकी से काम लेकर राजा मांधाता को नष्ट करवा दिया।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

लवणासुर अत्यंत शक्तिशाली है एवं समस्त देवता उससे भयभीत रहते हैं। अतः यदि आप उसका वध कर दें तो यह देवताओं की बहुत बड़ी सहायता होगी। उसके वध से समस्त लोकों का कल्याण होगा। लवणासुर प्रतिदिन नींद से जागकर अपने भोजन हेतु मांस का संग्रह करने के लिए निकलता है। उस समय  दिव्य त्रिशूल उसके हाथ में नहीं होता। यदि आप उस समम लवणासुर पर आक्रमण करें तो आपको सफलता मिल सकती है किंतु जब वह त्रिशूल उठा लेता है तो फिर उसे कोई नहीं मार सकता।’

महर्षि च्यवन की बात सुनकर शत्रुहंता शत्रुघ्नजी ने लवणासुर का वध करने का निश्चय किया और वे यमुना नदी को पार करके मधुपुरी के द्वार पर जाकर खड़े हो गए। उस समय तक लवणासुर मांस-संग्रहण के लिए नगर से बाहर निकल कर जंगल में जा चुका था। अतः शत्रुघ्नजी वहीं खड़े रहकर उसके लौटने की प्रतीक्षा करने लगे।

मध्याह्नकाल में वह क्रूरकर्मा राक्षस हजारों प्राणियों का बोझा लिए हुए अपने नगर के द्वार पर आया। उसने इक्ष्वाकु राजकुमार शत्रुघ्नजी को अस्त्र-शस्त्र लिए हुए वहाँ खड़े देखा। उन्हें देखते ही वह राक्षस अत्यंत क्रोधित हुआ।

लवणासुर ने कहा- ‘हे नराधम! इन छोटे से हथियारों से तू मेरा क्या बिगाड़ लेगा! मैं तेरे जैसे हजारों अस्त्र-शस्त्र धारी मनुष्यों को रोष में भरकर खा चुका हूँ। जान पड़ता है कि काल तेरे सिर पर नाच रहा है। अच्छा हुआ कि तू इस समय मुझे मिल गया क्योंकि मेरा आज का आहार पूरा नहीं हुआ है। तू स्वयं ही मेरे मुंह में आ पड़ा!’

वाल्मीकि रामायण में लिखा है कि लवणासुर अपनी बात कहते हुए बार-बार हँस रहा था जबकि शत्रुघ्नजी को उसकी बातें सुनकर इतना क्रोध आ रहा था कि उनके नेत्रों से आंसू टपकने लगे।

रोष से कांपते हुए शत्रुघ्नजी ने लवणासुर से कहा- ‘दुष्ट दुर्बुद्धि मैं तेरे साथ द्वंद्वयुद्ध करना चाहता हूँ। मैं महाराज दशरथ का पुत्र और परम बुद्धिमान् राजा श्रीराम का अनुज हूँ। तू समस्त प्राणियों का शत्रु है, इसलिए मैं तेरा वध करने आया हूँ।’

इस पर लवणासुर ने कहा- ‘तेरे भाई राम ने जिस रावण की हत्या की है, वह मेरी मौसी शूर्पनखा का भाई था किंतु मैंने राम को छोड़ दिया क्योंकि वह मुझसे युद्ध करने के लिए नहीं आया था किंतु जो कोई भी मुझसे युद्ध करने के लिए आया है, या भविष्य में आएगा, उसे मैं अवश्य ही मार डालूंगा। तू दो घड़ी ठहर जा, मैं तुझे युद्ध का अवसर अवश्य दूंगा किंतु पहले मैं अपना अस्त्र तो ले आऊं!’

इस पर शत्रुघ्नजी ने कहा- ‘हे राक्षस अब तू मुझसे बच कर नहीं जा सकता! किसी भी बुद्धिमान व्यक्ति को अपने सामने आए हुए शत्रु को नहीं छोड़ना चाहिए! अतः अब तू इस जीव-जगत् को अच्छी तरह देख ले, मैं तुझे तीखे बाणों द्वारा अभी यमराज के घर भेज रहा हूँ क्योंकि तू तीनों लोकों का और श्रीरघुनाथजी का भी शत्रु है।’

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शत्रुघ्नजी के इतना कहते ही लवणासुर ‘खड़ा रह, खड़ा रह’ कहता हुआ हाथ पर हाथ रगड़ने लगा और दांत कटकटाने लगा। लवणासुर ने अपने हाथों में पकड़े हुए वन्यपशु धरती पर रख दिए तथा शत्रुघ्नजी पर प्रहार करने के लिए तैयार हो गया। शत्रुघ्नजी ने कहा- ‘जैसे देवताओं ने रावण को धराशायी हुए हुए देखा था, उसी तरह सभी विद्वान् ब्राह्मण और ऋषिगण आज मेरे द्वारा मारे जा रहे दुराचारी लवणासुर को भी देख लें।’ शस्त्रहीन लवणासुर वृक्षों को उखाड़कर शत्रुघ्नजी पर फैंकने लगा। शत्रुघ्नजी ने अपनी ओर आते हुए उन वृक्षों को टुकड़ों में काट दिया। शत्रुघ्नजी ने लवणासुर पर अपने बाणों की झड़ी लगा दी किंतु लवणासुर पर उनका कोई असर नहीं हुआ। इस पर लवणासुर ने एक विशाल वृक्ष उखाड़कर शत्रुघ्नजी के सिर पर दे मारा जिससे शत्रुघ्नजी मूर्च्छित हो गए। लवणासुर ने समझा कि शत्रुघ्नजी मर गए। इस पर वह धरती पर झुककर उन पशुओं को एकत्रित करने लगा जिन्हें वह जंगल से मारकर लाया था। दो घड़ी में ही शत्रुघ्नजी की चेतना पुनः लौट आई। उन्होंने भगवान विष्णु का तेजोमय सनातन बाण हाथ में लिया। श्री हरि विष्णु ने इस बाण का निर्माण मधु-कैटभ नामक राक्षसों का संहार करने के लिए किया था। बाण के तेज से सम्पूर्ण सृष्टि में खलबली मच गई।

देवताओं ने घबराकर ब्रह्माजी की शरण ली। उन्हें लगा कि इस बाण से सम्पूर्ण सृष्टि नष्ट होने वाली है।

ब्रह्माजी देवताओं से कहा- ‘निर्भय होकर लवणासुर और शत्रुघ्नजी का युद्ध देखो।’

जब शत्रुघ्नजी ने आकाश को देवताओं से भरे हुए देखा तो उन्होंने वह दिव्य बाण अपने धनुष पर चढ़ा लिया। लवणासुर ने शत्रुघ्नजी को पुनः युद्ध के लिए तत्पर देखा तो लवणासुर अपने हाथों में पकड़े हुए पशुओं को छोड़कर पुनः युद्ध करने के लिए आया।

शत्रुघ्नजी ने धनुष की प्रत्यंचा को कान तक खींचकर बाण छोड़ दिया। वह दिव्य बाण लवणासुर का वक्षस्थल भेदकर रसातल में चला गया और वहाँ से पुनः शत्रुघ्नजी के पास आ गया।

लवणासुर धरती पर गिर गया और भगवान शिव का दिव्य त्रिशूल भगवान शिव के पास लौट गया। देवताओं, अप्सराओं, गंधर्वों, ब्राह्मणों एवं ऋषियों ने इक्ष्वाकु राजकुमार शत्रुघ्नजी की प्रशंसा की। इस प्रकार राम ने महाराज अनरण्य के हत्यारे रावण को और शत्रुघ्नजी ने महाराज मांधाता के हत्यारे लवणासुर का संहार करके अपने पूर्वजों का ऋण चुकाया।

राजा दशरथ के पुत्रों की कथा के साथ ही इक्ष्वाकुवंशी राजाओं की श्रेष्ठ परम्परा अपने चरम पर पहुंच जाती है। राजा दशरथ के चारों पुत्रों के दो-दो पुत्र हुए जिनका उल्लेख पुराणों में मिलता है। उनकी कथाएं चमत्कारों एवं दिव्य शक्तियों से मुक्त हैं। फिर भी इस राजवंश के राजा अपने शील, शौर्य एवं सत्यनिष्ठा के लिए युगों तक जाने गए।

भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के समय तक भी भारत में कुछ राजवंश अपना सम्बन्ध रघुवंशी इक्ष्वाकुओं से बताते थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि उन राजवंशों में भी इक्ष्वाकुओं की उज्जवल परम्पराएं विद्यमान थीं तथा आज भी सम्पूर्ण हिन्दू जाति इक्ष्वाकुओं द्वारा स्थापित जीवन के उच्च मानदण्डों का अनुसरण करने का प्रयास करती है। भारत भूमि इक्ष्वाकुओं की चिरकाल तक ऋणी रहेगी।

लाल किले की दर्दभरी दास्तान

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लाल किले की दर्दभरी दास्तान

लाल किले की दर्दभरी दास्तान शीर्षक से लिखी गई इस पुस्तक को देश-विदेश में अभूतपूर्व प्रसिद्धि प्राप्त हुई है। लाखों लोगों ने इसे पसंद किया एवं सराहा है। शाहजहाँ से लेकर औरंगजेब तक के मुगलों का जैसा रोमांचक एवं वास्तविक इतिहास इस पुस्तक में लिखा गया है, वैसा इतिहास अन्य पुस्तकों में नहीं मिलता।

भारत में दो लाल किले हैं। पहला लाल किला आगरा में है जिसका निर्माण मुसलमानों के भारत में आने से पहले तोमर राजपूतों ने लाल कोट के नाम से करवाया था। लोदी सुल्तानों- सिकंदर लोदी तथा इब्राहीम लोदी एवं मुगल बादशाहों- बाबर, हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ तथा औरंगज़ेब ने इस किले में थोड़े-बहुत समय के लिए निवास किया।

सिकंदर लोदी, अकबर एवं शाहजहाँ ने इस किले का जीर्णोद्धार करवाया। लोदियों एवं मुगलों के शासन काल में आगरा के लाल किले में शाही खजाना, बहुमूल्य रत्न, स्वर्ण एवं अन्य कीमती सम्पत्ति रहती थी। इस दुर्ग में मुगलों की टकसाल भी थी जिसमें सोने-चांदी के सिक्के ढाले जाते थे। इस किले में एक जेल भी थी जिसमें शाही परिवार के बंदियों को रखा जाता था।

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दूसरा लाल किला दिल्ली में है जिसे ई.1638 से 1648 की अवधि में शाहजहाँ ने बनवाया। बहुत से लोग मानते हैं कि दिल्ली के लाल किले का निर्माण भी तोमरों ने करवाया था किंतु यह सही नहीं है। राजा अनंगपाल अथवा उसके पूर्वजों ने दिल्ली में जिस लाल कोट नामक दुर्ग का निर्माण करवाया था, वह शाहजहाँ के लाल किले से 23 किलोमीटर दूर महरौली में स्थित था, जहाँ आज भी उसके खण्डहर बिखरे पड़े हैं। कुतुबमीनार का निर्माण उसी के ध्वंसावशेषों से करवाया गया।

शाहजहाँ के दुर्भाग्य से शाहजहाँ के पुत्र औरंगजेब ने शाहजहाँ को आगरा के लाल किले में बंदी बनाकर रखा और दिल्ली का लाल किला औरंगजेब की राजधानी बना।

लाल किले की दर्दभरी दास्तान पुस्तक का लेखन यूट्यूब चैनल ‘ग्लिम्प्स ऑफ इण्डियन हिस्ट्री बाई डॉ. मोहनलाल गुप्ता’ के लिए ‘लाल किले की दर्द भरी दास्तां’ नामक धारावाहिक के रूप में किया गया जिसमें शाहजहाँ द्वारा दिल्ली में लाल किला बनवाए जाने से लेकर भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति तक के इतिहास का वह भाग दिया गया है जो दिल्ली एवं आगरा के लाल किलों की छत्रछाया में घटित हुआ। इस काल में ये दोनों लाल किले भारत की सत्ता के प्रतीक बन गए थे।

लाल किले की दर्दभरी दास्तान धारवाहिक में प्रयुक्त ‘लाल किला’ किसी एक या दो भवनों का नाम नहीं है, अपितु मुगलिया सत्ता के अहंकार का प्रतीक है। मनुष्य को जब सत्ता मिलती है तब वह किस तरह मदमत्त होकर दूसरे मनुष्यों को कीट-पतंग समझने लगता है और जब मनुष्य से सत्ता विदा ले लेती है, तब मनुष्य किस तरह कातर, विनम्र और परमुखापेक्षी हो जाता है, लाल किले की दर्द भरी दास्तां से अधिक यह बात और कौन समझ सकता है!

इस धारावाहिक को अपार लोकप्रियता मिली। देश-विदेश में रहने वाले लाखों दर्शकों ने इस धारावाहिक की कड़ियों को देखा तथा सराहा। इस धारावाहिक की लोकप्रियता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता था कि इसका प्रसारण वर्ष 2019-20 में प्रतिदिन प्रातः आठ बजे किया जाता था किंतु देश-विदेश में रहने वाले हजारों दर्शक प्रातः आठ बजने से पहले ही यूट्यूब चलाकर बैठ जाते थे। बहुत से दर्शक अपने पूरे परिवार के साथ इस धारवाहिक को देखते थे और अपने बच्चों के साथ, इस धारावाहिक में आए ऐतिहासिक तथ्यों पर चर्चा किया करते थे।

इस धारावाहिक की कड़ियां आज भी यूट्यूब चैनल ‘ग्लिम्प्स ऑफ इण्डियन हिस्ट्री बाई डॉ. मोहनलाल गुप्ता’ पर उपलब्ध हैं।

भारत के इतिहास की वे छोटी-छोटी हजारों बातें जो आधुनिक भारत के कतिपय षड़यंत्रकारी इतिहासकारों द्वारा इतिहास की पुस्तकों का हिस्सा बनने से रोक दी गईं किंतु तत्कालीन दस्तावेजों, पुस्तकों, मुगल शहजादों एवं शहजादियों की डायरियों आदि में उपलब्ध हैं, इस धारवाहिक के माध्यम से लाखों दर्शकों तक पहुंचीं।

बहुत से दर्शकों की मांग थी कि इस धारवाहिक की कड़ियों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवाया जाए। उन दर्शकों की भावनाओं का सम्मान करते हुए, मैं इस धारावाहिक की कड़ियों को पुस्तक के रूप में आप सबके हाथों में सौंप रहा हूँ।

                                               – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पोप के देश में ग्यारह दिन

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पोप के देश में ग्यारह दिन

पोप के देश में ग्यारह दिन इस पुस्तक के दो भाग हैं, पहले भाग में इटली एवं रोम का राजनीतिक इतिहास एवं ईसाई धर्म का इतिहास लिखा गया है। दूसरे हिस्से भाग में इटली भ्रमण का विवरण लिखा गया है।

इटली को यूरोप का भारत कहा जाता है क्योंकि इटली का प्राचीनतम धर्म, भाषा एवं संस्कृति भारत से गए थे जबकि रोम को भारत में दुनिया की नाभि कहा जाता है क्योंकि रोम का धर्म, भाषा एवं संस्कृति समूचे यूरोप, अनेक एशियाई देशों, अमरीकी महाद्वीपों एवं ऑस्ट्रेलिया में समाए हुए हैं।

आज के रोम की पहचान पोप से है जो रोम के भीतर बसे वेटिकन सिटी नामक स्वतंत्र देश का स्वतंत्र शासक है। रोम सदा से ही पोप का देश नहीं था।

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पोप के अस्तित्व में आने से पहले रोम की धरती पर बहुत कुछ ऐसा घटित हो चुका था जो न केवल प्राचीन रोम की पहचान है अपितु पूरी दुनिया को आज भी आकर्षित करता है। फिर भी पोप ही इस देश की धड़कन है और पोप ही इस देश की वास्तविक पहचान है।

प्रस्तुत पुस्तक लेखक द्वारा अपने परिवार के साथ इटली की राजधानी रोम, इटली के सबसे सुंदर नगर फ्लोरेंस, गैलीलियो के नगर पीसा तथा संसार के सबसे अद्भुत नगर वेनेजिया आदि नगरों के प्रवास के दौरान हुए अनुभवों के आधार पर इटली केे इतिहास, संस्कृति एवं पर्यटन के विविध पक्षों को लेकर लिखी गई है।

रोम सदा से ही पोप का देश नहीं था। मूलतः यह यूरोपियन आदिवासियों का देश है जिन्हें भारत से आए संस्कृत-भाषी आर्यों ने सभ्यता और संस्कृति का पहला पाठ पढ़ाया। रोम की स्थापना ईसा के जन्म से लगभग 900 साल पहले हुई तथा पोप की स्थापना ईसा की मृत्यु के लगभग 100 साल बाद हुई।

अर्थात् पोप नामक संस्था के अस्तित्व में आने से पहले एक हजार वर्ष की दीर्घ अवधि में रोम की धरती पर बहुत कुछ ऐसा घटित हो चुका था जो न केवल प्राचीन रोम की पहचान है अपितु पूरी दुनिया को आज भी आकर्षित करता है। फिर भी पिछले दो हजार सालों से रोम, पोप का ही देश बना हुआ है। यह पोप के लिए ही जाना जाता है। पोप ही इस देश की धड़कन है और पोप ही इस देश की वास्तविक पहचान है।

हमारे परिवार के लिए किसी देश के भ्रमण पर जाना, आधुनिक पर्यटन की किसी भी क्रिया से मेल नहीं खाता है। हमारी इन यात्राओं में मौज-शौक के पीछे भागना, मनोरंजन के लिए पैसा फैंकना, खेल-तमाशे देखना, उस देश के खाने-पीने का आनंद उठाना जैसे तत्व बिल्कुल ही नहीं होते।

हमारे लिए ये महंगी विदेश यात्राएं उस देश के इतिहास और संस्कृति को आत्मसात् करने और बाद में उसे ज्यों की त्यों पन्नों पर उतार देने की परिश्रम-युक्त प्रक्रिया का साधन हैं। वर्ष 2019 की गर्मियों में हमरे परिवार द्वारा की गई रोम यात्रा ऐसी ही एक प्रक्रिया का अंग थी।

17 मई से 28 मई 2019 तक ग्यारह दिनों की इस यात्रा में, हम इटली और उसके नगरों की सभ्यता, संस्कृति एवं इतिहास को जितना देख, सुन और समझ पाए, वही इस पुस्तक के पन्नों में लिखा गया है किंतु इस तरह की यात्राओं में केवल उस देश में गुजारे गए दिन ही लेखन का हिस्सा नहीं होते, अपितु उस देश की यात्रा से पहले बहुत कुछ पढ़ना और समझना होता है। निश्चित रूप से इटली की यात्रा से पहले पढ़ा गया और समझा गया इतिहास एवं भूगोल भी पोप के देश में ग्यारह दिन के महत्त्वपूर्ण हिस्से हैं।

11 दिन के इटली प्रवास के दौरान हमने चार दिन रोम में, तीन दिन फ्लोरेंस में, एक दिन पीसा में और तीन दिन वेनिस में बिताए। इस दौरान अनेक रोचक एवं खट्टे-मीठे अनुभव भी हुए, उन्हें भी ज्यों का त्यों लिखने का प्रयास किया गया है।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अनुक्रमणिका

पोप का देश

1. यूरोप का भारत – इटली / 9

2. रिपब्बलिका इटेलियाना / 12

3. रोमन् सभ्यता की स्थापना एवं विस्तार / 18

4. रोम का प्राचीन धर्म 24

5. इटली में पाइथोगोरियन ब्रदरहुड की स्थापना / 27

6. महान् रोमन गणराज्य / 34

7. रोमन गणराज्य का नैतिक पतन / 37

8. जूलियस सीजर एवं क्लियोपैट्रा / 40

9. महान् रोमन साम्राज्य का उदय / 51

10. ईसा मसीह को सूली / 54

11. महान् रोमन साम्राज्य के शासक / 57

12. दो ऑगस्टस तथा दो सीजर / 64

13. रोमन साम्राज्य में ईसाइयों को प्राणदण्ड / 66

14. महान् रोमन साम्राज्य का विभाजन / 71

15. पश्चिमी रोमन साम्राज्य अर्थात् ‘रोम’ / 73

16. पूर्वी रोमन साम्राज्य अर्थात् ‘रूम’ / 80

17. ईसाई धर्म का अंतर्द्वन्द्व / 83

18. पोप का प्राकट्य एवं उसका शक्ति विस्तार / 86

19. महान् रोमन साम्राज्य का दुःखद अंत / 89

20. महान् रोमन साम्राज्य का द्वितीय संस्करण / 97

21. पवित्र रोमन साम्राज्य का प्रथम संस्करण / 100

22. पवित्र रोमन साम्राज्य का द्वितीय संस्करण / 104

23. गिरजाघरों की गॉथिक शैली का विकास / 108

24. वेनिस शहर की दुविधा / 110

25. हिलाल के खिलाफ क्रॉस का क्रूसेड / 112

26. पोप एवं पवित्र रोमन सम्राट में टकराव का चरम / 157

27. ईसाई संघ द्वारा इनक्विजिशन की स्थापना / 130

28. पोप की प्रतिष्ठा को धक्का / 136

29. पूर्वी रोमन साम्राज्य का अंत / 139

30. इटली में ‘रिनेंसाँ’ नामक युग का प्रारम्भ / 142

31. धर्म एवं विज्ञान के बीच संघर्ष / 150

32. कैथोलिक धर्म से अलग सम्प्रदायों का उदय / 157

33. यूरोपीय समाज में भेदभाव एवं शोषण / 160

34. यूरोप में लोकतांत्रिक विचारों का उदय / 164

35. यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय / 172

36. पवित्र रोमन साम्राज्य के द्वितीय संस्करण का अन्त / 175

37. इटली का एकीकरण / 181

38. फासिज्म का नायक बैनितो मुसोलिनी / 193

39. फासी-नाजी भाई-भाई / 201

40. इटली में आधुनिक गणराज्य की स्थापना / 210

पोप के देश में

1. दुनिया की नाभि की ओर / 214

2. रोम में पाँच दिन / 217

3. फ्लोरेंस में तीन दिन / 263

4. पीसा में एक दिन / 273

4. वेनेजिया में तीन दिन / 285

5. इटली की धरती पर अंतिम दिन / 304

परिशिष्ट

1. रोमन कैथोलिक चर्च / 311

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