Tuesday, June 18, 2024
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33. श्रीराम ने दिव्य शस्त्रों की प्राप्ति के लिए महर्षि अगस्त्य से भेंट की!

श्रीराम, लक्ष्मण तथा जनकनंदिनी सीताजी सुतीक्ष्ण ऋषि के साथ दण्डकारण्य से अगस्त्य ऋषि के आश्रम के लिए रवाना हो गए। श्रीराम एवं अगस्त्य की भेंट का श्रीराम कथा में अत्यंत महत्व है, यदि श्रीराम को मानव माना जाए तो भी और श्री हरि विष्णु का अवतार माना जाए तो भी! इस भेंट के महत्व की चर्चा करने से पहले हम अगस्त्य ऋषि की पृष्ठभूमि की चर्चा करते हैं।

महर्षि अगस्त्य एक ऋग्वैदिक ऋषि थे। उन्हें सप्तर्षियों में से एक माना जाता है। ऋग्वेद में उनका नाम कई बार आया है। महर्षि अगस्त्य ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 165वें सूक्त से लेकर 191वें तक के सूक्तों के दृष्टा थे। अगस्त्य के पुत्र दृढ़च्युत तथा दृढ़च्युत के पुत्र इध्मवाह भी नवम मंडल के 25वें तथा 26वें सूक्तों के द्रष्टा थे।

अगस्त्य ऋषि महर्षि पुलस्त्य के पुत्र तथा विश्रवा के भाई थे। इनका जन्म काशी में हुआ था। वर्तमान में वह स्थान अगस्त्य कुंड के नाम से प्रसिद्ध है।

देवताओं के अनुरोध पर महर्षि अगस्त्य काशी से दक्षिणापथ की ओर गए। कुछ पुराणों में यह प्रसंग आया है कि उन दिनों विंध्याचल पर्वत बड़ी तेजी से बढ़ रहा था। इसलिए देवताओं ने महर्षि अगस्त्य से अनुरोध किया कि वे विंध्याचल पर्वत को आदेश दें कि वह बढ़ना बंद कर दे। इस पर अगस्त्य ऋषि काशी से दक्षिणापथ की ओर गए तथा मार्ग में जब उन्होंने विंध्याचल पर्वत को पार किया तो विंध्याचल से कहा कि जब तक मैं लौट कर न आऊं, तुम इसी प्रकार स्थिर रहना, अपना आकार मत बढ़ाना।

विंध्याचल पर्वत महर्षि अगस्त्य की महिमा के बारे में जानता था। उसे ज्ञात था कि ये वही महर्षि अगस्त्य हैं जिन्होंने एक बार समुद्र का पानी पीकर उदरस्थ कर लिया था ताकि देवगण समुद्र में छिपे हुए राक्षसों को देख सकें और उनका संहार कर सकें। इसलिए विंध्याचल ने महर्षि का आदेश स्वीकार कर लिया।

पूरे आलेख के लिए देखिए यह वी-ब्लॉग-

विंध्याचल ने बढ़ना बंद कर दिया और महर्षि अगस्त्य फिर कभी दक्षिणापथ से उत्तरापथ की ओर आए ही नहीं। वे दक्षिण भारत में इतने दीर्घकाल तक निवास करते रहे कि अधिकतर भारतीय अगस्त्य को तमिल देश का निवासी ही मानते हैं। तमिल भाषा में अगस्त्य को ‘अगतियार’ कहा जाता है।

महर्षि अगस्त्य ने विदर्भ-नरेश की पुत्री लोपामुद्रा से विवाह किया, जो विद्वान और वेदज्ञ थीं। दक्षिण भारत में इसे मलयध्वज नाम के पांड्य राजा की पुत्री बताया जाता है। वहाँ इसका नाम कृष्णेक्षणा है। इनके पुत्र का नाम इध्मवाहन था। महर्षि अगस्त्य ने मणिमती नगरी के दैत्यराज इल्वल तथा वातापी नामक दुष्ट दैत्य को नष्ट किया। भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में उनके विशिष्ट योगदान के लिए जावा, सुमात्रा, बाली आदि द्वीपों में भी उनकी पूजा की जाती है।

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महर्षि अगस्त्य अपने समय के बहुत बड़े वैज्ञानिक थे। उन्होंने बहुत से दिव्य शस्त्रों की रचना की थी। महर्षि अगस्त्य के ग्रंथ ‘अगस्त्य संहिता’ में विद्युत उत्पादन से सम्बन्धित सूत्र मिलते हैं। इस ग्रंथ में आए एक श्लोेक में कहा गया है कि एक मिट्टी के पात्र में ताम्रपट्टिका तथा शिखिग्रीवा डालें, फिर बीच में गीली काष्ट पांसु लगाएं। उसके ऊपर पारा लगाएं, ऊपर पारा तथा दस्तलोष्ट डालें, फिर तारों को मिलाएंगे तो उससे मित्रावरुणशक्ति का उदय होगा।

अर्थात्- मिट्टी के बर्तन में एक कॉपर प्लेट लगाएं तथा उसमें शिखिग्रीवा अर्थात् कॉपर सल्फेट डालें। उनके बीच में लकड़ी का गीला बुरादा डाले और ऊपर दस्त लोष्ट अर्थात् जस्ते का लेप करें। इन्हें धातु के तारों से जोड़ने पर मित्रावरुणशक्ति अर्थात् बिजली बनेगी।

अगस्त्य संहिता में विद्युत का उपयोग इलेक्ट्रोप्लेटिंग करने की विधि का भी विवरण दिया गया है। उन्होंने बैटरी द्वारा तांबे पर सोने एवं चांदी की पॉलिश चढ़ाने की विधि निकाली। संभवतः इसी कारण अगस्त्य को कुंभोद्भव अर्थात् ‘बैटरी बॉर्न’ कहा गया।

महर्षि अगस्त्य कहते हैं- ‘सौ कुंभों अर्थात् उपरोक्त विधि से बने तथा श्ृंखला में जोड़े गए सौ सेलों की शक्ति का  पानी  पर प्रयोग करेंगे, तो  पानी अपने रूप को बदलकर प्राणवायु अर्थात् ऑक्सीजन एवं उदान वायु अर्थात् हाइड्रोजन में परिवर्तित हो जाएगा।

कृत्रिम स्वर्ण अथवा रजत के लेप को सत्कृति कहा जाता है। लोहे के पात्र में सुशक्त जल अर्थात् तेजाब के घोल का सान्निध्य पाते ही यवक्षार अर्थात् सोने या चांदी का नाइट्रेट, ताम्र को स्वर्ण या रजत से ढंक लेता है। स्वर्ण से लिप्त उस ताम्र को शातकुंभ अथवा स्वर्ण कहा जाता है। पश्चिमी जगत के जिस वैज्ञानिक फैराडे ने विद्युत के बल्ब की खोज की थी, उसने अपनी जीवनी में लिखा है कि उसने विद्युत बल्ब बनाने के लिए इसी ग्रंथ के अंग्रेजी अनुवाद को आधार बनाया था। आधुनिक नौकाचलन और विद्युत वहन, संदेशवहन आदि के लिए जो अनेक बारीक तारों की मोटी केबल बनती है, उसका उल्लेख भी इस ग्रंथ में हुआ है तथा केबल को रज्जु कहा गया है।

महर्षि अगस्त्य ने अपने ग्रंथ में आकाश में उड़ने वाले गर्म गुब्बारे एवं विमान को संचालित करने की तकनीक का भी उल्लेख किया है। महर्षि अगस्त्य के अनुसार उदानवायु अर्थात् हाईड्रोजन को वायु प्रतिबंधक वस्त्र अर्थात् गुब्बारे में रोककर विमान बनाया जाता है। एक श्लोक में कहा गया है कि विमान वायु पर उसी तरह चलता है, जैसे जल में नाव चलती है। इस ग्रंथ में गुब्बारों और आकाशछत्र को रेशमी वस्त्र सुयोग्य कहा गया है क्योंकि वह बड़ा लचीला होता है। वायु पुराण में आए एक उल्लेख के अनुसार प्राचीनकाल में ऐसा वस्त्र बनता था जिसमें वायु भरी जा सकती थी। उस वस्त्र को बनाने की विधि अगस्त्य संहिता में दी गई है।

रेशमी वस्त्र पर अंजीर, कटहल, आंब, अक्ष, कदम्ब, मीराबोलेन वृक्ष के तीन प्रकार ओर दालें इनके रस या सत्व के लेप किए जाते हैं। तत्पश्चात सागर तट पर मिलने वाले शंख आदि और शर्करा का घोल यानी द्रव सीरा बनाकर वस्त्र को भिगोया जाता है, फिर उसे सुखाया जाता है। फिर इसमें उदानवायु भरकर इसे उड़ाया जा सकता है।

महर्षि अगस्त्य के बाद वैशेषिक दर्शन में भी ऊर्जा के स्रोत, उत्पत्ति और उपयोग के सम्बन्ध में बताया गया है। इक्ष्वाकु राजकुमार श्रीराम भी महर्षि अगस्त्य की महिमा के बारे में जानते थे। इसलिए जब उन्होंने दण्डकारण्य में राक्षसों के संहार का प्रण लिया तो उन्हें अगस्त्य ऋषि के सहयोग की आवश्यकता अनुभव हुई। श्रीराम को अच्छी तरह ज्ञात था कि उन्हें अगस्त्य ऋषि से निश्चय ही ऐसी युद्ध विद्याएं एवं दिव्य शस्त्र प्राप्त हो जाएंगे जिनका उपयोग करके वे राक्षसों का संहार कर सकेंगे। इसीलिए श्रीराम महर्षि अगस्त्य के प्रिय शिष्य सुतीक्ष्ण को अपने साथ लेकर महर्षि अगस्त्य के आश्रम में पहुंचे।

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