संत शिरोमणि सूरदास का जन्म सोलहवीं सदी में हुआ। वे वल्लभाचार्य के प्रमुख शिष्य थे तथा भक्ति आंदोलन के महान संत थे किंतु वे उपदेशक अथवा सुधारक नहीं थे।
सूरदास ने अपने गुरु वल्लभाचार्य के निर्देश पर भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन किया तथा भागवत् पुराण में वर्णित लीलाओं को आधार बनाते हुए कई हजार सरस पदों की रचना की। इन पदों में भगवान कृष्ण के यशोदा माता के आंगन में विहार करने से लेकर उनके दुष्ट-हंता स्वरूप का बहुत सुंदर एवं रसमय वर्णन किया गया।
“मैया मोरी, मैं नहीं माखन खायो” जैसे पदों में सूरदास ने भगवान कृष्ण के बालस्वरूप की लीलाओं को जन-सामान्य के समक्ष रखा।
“जटिल जटा कून मुख फूल, सिर मुकुट गिरधरि“जैसे पदों में सूरदासजी ने भगवान कृष्ण के सौंदर्य की वर्णन करने में अपनी विशिष्ट काव्य प्रतिभा का परिचय दिया।
सूरदास ने भ्रमर गीतों के माध्यम से निर्गुण भक्ति को नीरस एवं अनुपयोगी घोषित किया तथा न केवल सगुण भक्ति करने अपितु भक्त-वत्सल भगवान की रूप माधुरी का रसपान करने वाली भक्ति करने का मार्ग प्रशस्त किया। एक भ्रमर गीत में वे लिखते हैं-
अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी ।
पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी ।
ज्यौं जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न ताकौं लागी ।
प्रीति-नदी में पाउँ न बोर्यो, दृष्टि न रूप परागी ।
‘सूरदास’ अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी ।
संत सूरदास की रचनाएँ- सूरसागर, सूरसारावली एवं साहित्य लहरी में संकलित हैं। उनकी रचनाएं ब्रज भाषा में हैं। ब्रजभाषा में इतनी प्रौढ़ रचनाएं सूरदास के अतिरिक्त अन्य कोई कवि नहीं कर सका।
सूरदास की रचनाओं में भक्ति, वात्सल्य और शृंगार रसों की प्रधानता है। पुष्टि मार्ग में दीक्षित होने से सूरदास की भक्ति में दास्य भाव एवं सखा भाव को प्रमुखता दी गई है। उन्होंने सूरसागर का आरम्भ ‘चरण कमल बन्दौं हरि राई’ से किया है।
अब मैं नाच्यौ बहुत गोपाल! जैसे पदों को देश-व्यापी लोकप्रियता अर्जित हुई तथा जन-सामान्य को अनुभव हुआ कि भक्ति के बल पर भगवान को अपने आंगन में बुलाया जा सकता है। उन्हें संकट के समय पुकारा जा सकता है और अपने शत्रु से त्राण पाने में सहायता ली जा सकती है। परमात्मा की शक्ति से ऐसे नैकट्य भाव का अनुभव इससे पूर्व किसी अन्य सम्प्रदाय द्वारा नहीं कराया गया था।
भ्रमर गीतों के माध्यम से सूरदास ने भगवान कृष्ण एवं गोपियों के बीच ब्रह्म और जीव के बीच अनंत काल से चले आ रह सहज आकर्षण एवं अध्यात्मिक बंधन का निरूपण किया है तथा निर्गुण ब्रह्म के स्थान पर सगुण ब्रह्म की महत्ता का वर्णन किया है- निरगुन कौन देस को वासी!
मध्यकालीन भक्ति आंदोलन की बहुत सारी धाराओं में संत कबीर का नाम अत्यंत श्रद्धा से लिया जाता है। वे राम को निराकार ब्रह्म के रूप में देखते थे।
मध्यकालीन भक्ति आंदोलन की बहुत सारी धाराओं में संत कबीर का नाम अत्यंत श्रद्धा से लिया जाता है। वे राम को निराकार ब्रह्म के रूप में देखते थे। उनसे पहले विष्णु या उनके अवतारों की साकार रूप में ही भक्ति करने की परम्परा थी। राम को निराकार ब्रह्म के रूप में देखने वाले वे संभवतः प्रथम संत थे।
कबीर का जीवन
संत कबीर रामानंदाचार्य के बारह प्रमुख शिष्यों में से थे। संत कबीर का जन्म ई.1398 में काशी में एक विधवा ब्राह्मणी की कोख से हुआ। माता द्वारा लोकलाज के कारण त्याग दिये जाने से कबीर नीरू नामक मुसलमान जुलाहे के घर में पलकर बड़े हुए। संत कबीर की पत्नी का नाम लोई था। उससे उन्हें एक पुत्र कमाल और पुत्री कमाली हुई।
धर्म-सुधारक
कबीर ने विधिवत् शिक्षा प्राप्त नहीं की थी। बड़े होने पर वे रामानन्द के शिष्य बन गए। कबीर ने घर-गृहस्थी में रहते हुए भी मोक्ष का मार्ग सुझाया। उन्हें हिन्दू-मुस्लिम दोनों के धर्मग्रन्थों का ज्ञान था। कबीर अपने समय के बहुत बड़े धर्म-सुधारक थे। वे अद्वैतवादी थे तथा निर्गुण-निराकार ब्रह्म के उपासक थे। वे जाति-पाँति, छुआछूत, ऊँच-नीच आदि भेदभाव नहीं मानते थे।
बाह्याडम्बर का विरोध
वे मूर्ति-पूजा और बाह्याडम्बर के आलोचक थे। उनके शिष्यों में हिन्दू तथा मुसमलान दोनों ही बड़ी संख्या में थे। इसलिए उन्होंने हिन्दुओं तथा मुसलमानों दोनों को पाखण्ड तथा आडम्बर छोड़कर ईश्वर की सच्ची भक्ति करने का उपदेश दिया तथा उनकी बुराइयों की खुलकर आलोचना की-
जो तू तुरक-तुरकणी जाया, भीतर खतना क्यों न कराया!
जो तू बामन-बमनी जाया, आन बाट व्है क्यों नहीं आया।
कबीर ने कुसंग, झूठ एवं कपट का विरोध किया। उनके अनुसार जिस प्रकार लोहा पानी में डूब जाता है उसी प्रकार कुसंग के कारण मनुष्य भी भवसागर में डूब जाएगा। कबीर का मानना था कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु ‘काम’ है और ‘स्त्री’ काम को बढ़ाती है। इसलिए उन्होंने स्त्री को ‘कामणि काली नागणी’ अर्थात् जादू करने वाली काली सर्पिणी कहा।
नारी की झाईं परत अंधा होता भुजंग।
कबिरा तिन की कौन गति से नित नारी के संग।।
कबीर ने हिन्दू और मुस्लिम दोनों के अर्थहीन आडम्बरों और रस्मों का खण्डन किया। वे हिन्दुओं के छाप-तिलक एवं मूर्ति-पूजा के विरोधी थे तथा उन्होंने मुसलमानों की नमाज, रमजान के उपवास, मकबरों और कब्रों की पूजा आदि की भी आलोचना की उन्होंने मुसलमानों से कहा कि यदि तुम्हारे हृदय में भक्ति-भावना का उदय नहीं होता तो हजयात्रा से कोई लाभ नहीं है। कबीर ने एकेश्वरवाद एवं प्रेममयी भक्ति पर जोर दिया।
कबीर की वाणी
कबीर की वाणी का संग्रह ‘बीजक’ नाम से प्रसिद्ध है। बीजक के तीन भाग है- ]
(1.) रमैनी,
(2.) सबद, और
(3.) साखी।
कबीर की भाषा
संत कबीर की भाषा सधुक्कड़ी अथवा खिचड़ी कहलाती है जिसमें खड़ी बोली, अवधी, ब्रज, पंजाबी, राजस्थानी, इत्यादि अनेक भाषाओं का मिश्रण है। उनकी भाषा साहित्यिक न होने पर भी प्रभावशाली है।
ईश् भक्ति को प्रमुखता
यद्यपि कबीर को ज्ञानाश्रयी संत माना जाता है किंतु वे ईश्वर के प्रेम में समर्पित भक्त थे। ईश्वर के प्रति उनका प्रेम किसी प्रेमाश्रयी संत से कम नहीं था। एक दोहे में उन्होंने लिखा है-
कोई ध्यावे निराकार को, काई ध्यावे आकारा।
वह तो इन छोड़न तै न्यारा, जाने जानन हारा।
कबीर के लिए जीवन में सबसे महत्वपूर्ण बात केवल भक्ति थी। एक स्थान पर उन्होंने लिखा है-
साखत बामन मत मिलो, वैष्णो मिले चाण्डाल।
अंक माल दै भेंटिए, मानो मिले गोपाल।।
ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण
कबीरदासजी की भक्ति में ईश्वर को ज्ञान से नहीं अपितु भक्ति से पाने की ललक है। एक दोहे में उन्होंने लिखा है-
कबीर कूता राम का, मुतिया मेरा नाउं |
गले राम की जेवड़ी, जित खैंचे तित जाउं ||
मांसाहार का विरोध
संत कबीर मांसाहार के बड़े विरोधी थी। एक स्थान पर उन्होंने लिखा है-
बकरी पाती खात है, तिनकी काढी खाल।
जे नर बकरी खात हैं, तिनका कौन हवाल।।
कबीर का निर्गुण ब्रह्म
कबीर की भक्ति निर्गुण ब्रह्म अर्थात् बिना रूप और गुण वाले ईश्वर के प्रति थी। कबीर का राम दशरथ-पुत्र राम न होकर अजन्मा, सर्वव्यापी एवं घट-घट वासी राम था। उनका राम समस्त गुणों से परे था। वे कहते हैं-उनका मानना था कि ब्रह्म न तो मंदिर में हैं, न मस्जिद में, अपितु सर्वत्र व्याप्त है-
मस्जिद अंदर मुल्ला पुकारे, काशी अंदर ब्राह्मण
दोनों जगह मेरा साईं, मोहिं कहाँ ढूंढो रे बंदे।
ब्रह्म को निराकार और निर्द्वंद्व बताते हुए कबीर ने लिखा है-
सार सबद सुगम, सहज समाना
ऊंचा कहे न काहू, मंदा कहे न काहू।
ई.1518 में कबीर का निधन हुआ। इस प्रकार उनकी आयु 120 वर्ष मानी जाती है। समाज की निम्न समझी जाने वाली जातियों पर कबीर के उपदेशों का बड़ा प्रभाव पड़ा। उनके अनुयाई कबीर-पंथी कहलाए। आगे चलकर उनके शिष्यों ने उन्हें भगवान का अवतार मान लिया।
भक्त रैदास का जन्म काशी के एक चमार परिवार में हुआ। वे रामानन्द के बारह प्रमुख शिष्यों में से थे। वे विवाहित थे तथा जूते बनाकर अपनी जीविका चलाते थे।
भक्त रैदास तीर्थयात्रा, जाति-भेद, उपवास आदि के विरोधी थे। हिन्दू तथा मुसलमानों में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं मानते थे। वे निर्गुण भक्ति में विश्वास रखते थे। रैदास की रचनाओं में ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना स्पष्ट झलकती है।
वैष्णव संतों द्वारा ग्रहण किया जाने वाला श्री हरि चरणों का अनन्य आश्रय ही भक्त रैदास की साधना का प्राण है। उनके प्रभाव के कारण निम्न जातियों के लोगों में भगवद्-भक्ति में आस्था उत्पन्न हुई। रैदास के शिष्यों ने रैदासी सम्प्रदाय प्रारम्भ किया। लोक मान्यता है कि मीरा बाई उन्हें अपना गुरु मानती थी।
भक्त रैदास की भक्ति भावना व्यापक और गहरी है जो उनके पदों, भजनों और साहित्य से प्रकट होती है। रैदास की भक्ति भावना ईश्वर के प्रति प्रेम, सेवा, समर्पण और ईश्वर में अटूट विश्वास से ओतप्रोत है। उनके लिखे भजन जनसामान्य में अत्यंत लोकप्रिय हैं।
भक्त रैदास की भक्ति भावना का मूल तत्व ईश्वर-प्रेम है। अर्थात् वे वैष्णव संतों की प्रेमाश्रयी धारा के कवि हैं। उनकी भक्ति भावना पर समाधि और अद्वैत की मिली-जुली छाया है। उन्होंने सम्पूर्णता की अनुभूति को ध्यान में रखा और एकाग्रता और समाधि की अवस्था में जीवन को आनंदित किया। भक्त रैदास की भक्ति भावना में द्वैत और अद्वैत का सम्मिश्रण है जिसमें ईश्वर दीपक के समान है तो भक्त बाती के समान है। अर्थात् जिस प्रकार बाती दीपक के बिना अपूर्ण है, उसी प्रकार भक्त अपने अराध्य के बिना अपूर्ण है।
पंजाब के सन्तों में गुरु नानकदेव का नाम अग्रणी है। उनका जन्म ई.1469 में लाहैर से 50 किलोमीटर दूर तलवण्डी गांव के खत्री परिवार में हुआ। उनके पिता कालू ग्राम के पटवारी थे। नानक विवाहित थे तथा उनके दो पुत्र भी हुए किंतु बाद में साधु-संतों की संगत में रहने लगे। वे निर्गुण-निराकार ईश्वर की पूजा करते थे।
गुरु नानकदेव एकेश्वरवादी थे और ऊँच-नीच, हिन्दू-मुस्लिम तथा जाति-पाँति के भेद को नहीं मानते थे। वे मूर्ति-पूजा तथा तीर्थ-यात्रा के भी घोर विरोधी थे। सिक्ख धर्म के अनुसार मनुष्य को सरल तथा त्यागमय जीवन व्यतीत करना चाहिए। नानक का कहना था कि संसार में रहकर तथा सुन्दर गृहस्थ का जीवन व्यतीत करके भी मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता है। नानक पर सूफी मत का अधिक प्रभाव था तथा वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के पक्षधर थे और उनके झगड़ों को बेइमानों का काम बताते थे-
बन्दे इक्क खुदाय के, हिन्दू मुसलमान।
दावा राम रसूल का, लड़दे बेईमान।।
नानक ने अपने हिन्दू शिष्यों से कहा कि- ‘मैंने चारों वेद पढ़े, अड़सठ तीर्थों पर स्नान किया, वनों और जंगलों में निवास किया और सातों ऊपरी एवं निचली दुनियाओं का ध्यान किया और इस नतीजे पर पहुँचा कि मनुष्य चार कर्मों द्वारा मुक्ति प्राप्त कर सकता है- भगवान से भय, उचित कर्म, ईश्वर तथा उसकी दया में विश्वास और एक गुरु में विश्वास जो उचित मार्गदर्शन कर सके।’
नानक ने अपने मुसलमान शिष्यों से कहा- ‘दया को अपनी मस्जिद मानो, भलाई एवं निष्कपटता को नमाज की दरी मानो, जो कुछ भी उचित एवं न्याय-संगत है, वही तुम्हारी कुरान है। नम्रता को अपनी सुन्नत मानो, शिष्टाचार को रोजा मानो। इससे तुम मुसलमान बन जाओगे।’
उन्होंने पाँचों नमाजों की व्याख्या करते हुए कहा- ‘पहली नमाज सच्चाई, दूसरी इन्साफ, तीसरी दया, चौथी नेक-नियति और पाँचवीं नमाज अल्लाह की बंदगी है।’
नानक ने विभिन्न स्थानों का भ्रमण करके अपनी शिक्षाओं का प्रसार किया। नानक के शिष्यों ने सिक्ख धर्म की स्थापना की। वे सिक्ख धर्म के पहले गुरु माने जाते हैं। उनकी शिक्षाएँ आदि ग्रन्थ में पाई जाती हैं जो आगे चलकर गुरु ग्रंथ साहब कहलाया।
मध्य-कालीन भक्तों में मीरा बाई का नाम अग्रणी है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने मीरा का जन्म वि.सं. 1573 (ई.1516) में माना है जबकि गौरीशंकर हीराचंद ओझा, हरविलास शारदा तथा गोपीनाथ शर्मा आदि इतिहासकारों ने मीरा बाई का जन्म वि.सं. 1555 (ई.1498) में माना है। मीरा मेड़ता के राठौड़ शासक राव दूदा के पुत्र रतनसिंह की पुत्री थी।
जब मीरा बाई दो साल की थीं, उनकी माता का निधन हो गया। मीरा का विवाह मेवाड़ के महाराणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज से हुआ। विवाह के सात वर्ष बाद ही भोजराज एक युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। कुछ दिन बाद मीरा के श्वसुर महाराणा सांगा और पिता रतनसिंह भी खानवा के युद्ध में मृत्यु को प्राप्त हुए। कुछ समय बाद जोधपुर के राजा मालदेव ने मीरां के चाचा वीरमदेव से उनका मेड़ता राज्य छीन लिया।
बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति की थीं और श्रीकृष्ण को अपना पति मानती थीं। अब वह सांसारिक सुखों से विरक्त होकर साधु-संतों के साथ भगवान का भजन करने लगीं। महाराणा सांगा के बाद उनके पुत्र रतनसिंह और विक्रमादित्य क्रमशः मेवाड़ के महाराणा हुए किंतु उन दोनों को मीरा का साधुओं के साथ भजन गाना एवं नृत्य करना अच्छा नहीं लगा।
उन्होंने मीरा को रोकने का प्रयास किया किंतु मीरा चितौड़ छोड़़कर वृन्दावन चली गई। वहाँ से कुछ दिन वह द्वारिका चली गई और वहीं उसका शरीर पूरा हुआ।
मीराबाई ने चित्तौड़ के राजसी वैभव त्यागकर वैराग्य धारण किया तथा चमार जाति में जन्मे संत रैदास को अपना गुरु बनाया। वे जाति-पांति तथा ऊँच नीच में विश्वास नहीं करती थीं। उन्होंने ईश्वर के सगुण-साकार स्वरूप की भक्ति की। वे उच्चकोटि की कवयित्री थीं।
जन-साधारण में उनके भजन आज भी बड़े प्रेम एवं चाव से गाए जाते हैं। मीराबाई से प्रेरणा पाकर देश की करोड़ों नारियों ने श्रीकृष्ण भक्ति का मार्ग अपनाया जिससे हिन्दू परिवारों का वातावरण श्रीकृष्ण मय हो गया। राजपूताने के अनेक राजाओं ने भी श्रीकृष्ण भक्ति एवं ब्रज भाषा की कविता का प्रचार किया।
मीरा बाई की आध्यात्मिक यात्रा के तीन सोपान हैं। पहले सोपान में मीरा कृष्ण के लिए लालायित हैं और अत्यंत व्यग्र होकर गाती हैं- ‘मैं विरहणी बैठी जागूँ, जग सोवे री आली।’ कृष्ण-विरह सी पीड़ित होकर वे गाती हैं- ‘दरस बिन दूखण लागे नैण।’ कृष्ण भक्ति के दूसरे सोपान में मीरा श्रीकृष्ण को प्राप्त कर लेती हैं और वह कहती हैं- ‘पायोजी मैंने राम रतन धन पायो।’
भक्ति के तीसरे और अन्तिम सोपान में मीरा बाई को आत्मबोध हो जाता है और वे परमात्मा से एकाकार हो जाती हैं। यही सायुज्य भक्ति का चरम बिंदु है। इस सोपान में पहुँचकर मीरा कहती हैं- ‘म्हारे तो गिरधर गोपाल दूजो न कोई।’
मीरा के काव्य में सांसारिक बन्धनों को त्यागकर ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव मिलता है। मीरा कृष्ण को ही परमात्मा और अविनाशी मानती थी। उनकी भक्ति आडम्बर रहित है। मीरा किसी सम्प्रदाय विशेष से बँधी हुई नहीं थीं और उनके मन्दिर के द्वार सबके लिए खुले हुए थे। मीरा ने बहुत से पदों की रचना की जो फुटकर रूप में प्राप्त होते हैं। महादेवी वर्मा के अनुसार मीरा के पद विश्व के भक्ति साहित्य के अनमोल रत्न हैं। मीरा ने ‘राग गोविन्द’ नामक ग्रन्थ भी लिखा था किंतु यह ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता है।
रामानंद की शिष्य मण्डली के प्रमुख सदस्य नरहरि आनंद के शिष्य तुलसीदास, अकबर के समकालीन संत हुए। उनका जन्म ई.1532 के लगभग हुआ। उन्होंने रामचरित मानस, गीतावली, कवितावली, विनय पत्रिका, एवं हनुमान बाहुक आदि ग्रंथों की रचना की।
उन्होंने भारत की जनता को धनुर्धारी दशरथ-नदंन श्रीराम की भक्ति करने की प्रेरणा दी जो धरती, ब्राह्मण, गाय तथा देवताओं की रक्षा के लिए मनुष्य का शरीर धारण करते हैं- ‘गो द्विज धेनु देव हितकारी, कृपासिंधु मानुष तनुधारी।’ तथा जो जनता को सुखी करने वाले, वैदिक धर्म की रक्षा करने वाले एवं दुष्टों का विनाश करने वाले हैं- ‘जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता।’
तुलसी ने जनसामान्य को भगवान में विश्वास रखने की प्रेरणा देते हुए कहा- हे परमात्मा, आप ही मेरे स्वामी, गुरु, पिता और माता हैं, आपके चरण-कमलों को छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ- ‘मोरे तुम प्रभु गुर पितु माता, जाऊँ कहाँ तजि पद जल जाता।’
तुलसीदास ने जनसामान्य को सद्ग्रंथों का पठन करने का आह्वान किया तथा विभिन्न गुरुओं द्वारा फैलाए जाने वाले पंथों और मार्गों को निंदनीय बताया ताकि हिन्दू-धर्म को एकता के सूत्र में पिरोए रखा जा सके तथा धर्म-भीरु प्रजा को दुष्ट व्यक्तियों द्वारा धर्म के नाम पर उत्पन्न की जा रही भूल-भुलैयाओं में भटकने से रोका जा सके।
तुलसी ने पाखण्डी गुरुओं को चेतावनी देते हुए कहा- ‘हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुर घोर नरक महुँ परई।’ अर्थात् जो गुरु, शिष्य के शोक को नहीं हरता अपितु उसका धन हड़पता है, वह घनघोर नर्क में पड़ता है। उन्होंने राजाओं को भी अपनी अच्छी प्रजा अर्थात् सज्जनों के पालन का निर्देशन करते हुए कहा- ‘जासु राज प्रिय प्रजा दुःखारी, सो नृपु अवसि नरक अधिकारी।’
उन्होंने ‘कोउ नृप होहु हमें का हानि’ की मानसिकता को दास-दासियों की मानसिकता बताया। तुलसी की रामचरित मानस घर-घर पहुँच गई। करोड़ों लोगों को इसकी चौपाइयां कण्ठस्थ हो गईं तथा घर-घर पाठ होने लगे। रामचरित मानस के श्रीराम पर विश्वास हो जाने से सैंकड़ों वर्षों से दबे-कुचले कोटि-कोटि जनसमुदाय के मन में नवीन साहस का संचार हुआ। लोग ईश्वरीय सत्ता में विश्वास रखनकर अपने धर्म पर अडिग बने रहे।
तुलसीदास द्वारा विभिन्न सम्प्रदायों में समन्वय के प्रयास
दिल्ली सल्तनत (13वीं-16वीं शताब्दी ईस्वी) एवं मुगलों के शासन काल (16वीं-18वीं शताब्दी ईस्वी) में हिन्दू-धर्म के शैव, शाक्त एवं वैष्णव सम्प्रदायों के बीच कटुता का वातावरण था। यहाँ तक कि सगुणोपासकों एवं निर्गुणोपासकों के बीच भी कटुता व्याप्त थी। सभी सम्प्रदायों के मतावलम्बी अपने-अपने मत को श्रेष्ठ बताकर दूसरे के मत को बिल्कुल ही नकारते थे।
गोस्वामी तुलसीदास ने राम चरित मानस के माध्यम से इस कटुता को समाप्त करने का सफल प्रयास किया। इस ग्रंथ में तुलसी ने शैवों के आराध्य देव शिव तथा विष्णु के अवतार राम को एक दूसरे का स्वामी, सखा और सेवक घोषित किया।
राम भक्त तुलसी ने ‘सेवक स्वामि सखा सिय-पिय के, हित निरुपधि सब बिधि तुलसी के’ कहकर शंकर की स्तुति की। इतना ही नहीं तुलसी ने अपने स्वामी राम के मुख से- ‘औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउं कर जोरि, संकर भजन बिना नर भगति न पावई मोर’ कहलवाकर राम-भक्तों को शिव की पूजा करने का मार्ग दिखाया एवं राम-पत्नी सीता के मुख से शिव-पत्नी गौरी की स्तुति करवाकर शाक्तों एवं वैष्णवों को निकट लाने में सफलता प्राप्त की- ‘जय जय गिरिबर राज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी।’
तुलसी ने ‘सगुनहि अगुनहि नहीं कछु भेदा, गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा’ कहकर सगुणोपासकों एवं निर्गुणोपासकों के बीच की खाई को पाटने का प्रयास किया। तुलसी ने भक्तिमार्गियों एवं ज्ञानमार्गियों के बीच की दूरी समाप्त करते हुए कहा- ‘भगतहि ज्ञानही नहीं कछु भेदा, उभय हरहिं भव संभव खेदा।’
तुलसीदास ब्राह्मणों की श्रेष्ठता में विश्वास रखते थे किंतु उनके राम जन-जन के राम थे जिन्होंने शबर जाति की स्त्री के घर बेर खाए, गृध्र जाति के जटायु का उद्धार किया, निषादराज को अपना मित्र बनाया तथा केवट एवं अहिल्या का उद्धार किया। तुलसी के राम ने ताड़का-वध, शूर्पनखा की नासिका कर्तन तथा सिंहका का वध करके यह स्पष्ट संदेश दिया कि स्त्री यदि अच्छे गुणों से युक्त हो तभी वह पूज्य है, दुष्ट स्त्री उसी प्रकार वध के योग्य है जिस प्रकार बुरा पुरुष।
तुलसी के प्रयासों को बाद में आने वाले अन्य संतों ने भी बल दिया जिसके परिणाम स्वरूप शैव, शाक्त एवं वैष्णव सम्प्रदायों तथा इन सम्प्रदायों के भीतर उपस्थित विभिन्न विचारधाराओं के अनुयाइयों के बीच की दूरियां कम हुई और हिन्दू-धर्म, विदेशी धरती से आने वाले धर्मों के समक्ष साहस पूर्वक खड़ा हो गया। ई.1623 (वि.सं.1680) में तुलसी का देहान्त हो गया।
संत तुकाराम का जन्म ई.1608 में महाराष्ट्र के देहू गांव में हुआ। वे अपने समय के महान् संत और कवि थे तथा तत्कालीन भारत में चले रहे भक्ति आंदोलन के प्रमुख स्तंभ थे। उन्हें ‘तुकोबा’ भी कहा जाता है। उनके जन्म आदि के विषय में विद्वानों में मतभेद हैं। तुकाराम को चैतन्य नामक साधु ने ‘राम कृष्ण हरि’ मंत्र का स्वप्न में उपदेश दिया। संत तुकाराम ने 17 वर्ष तक जन-साधारण को उपदेश दिए।
अपने जीवन के उत्तरार्ध में उनके द्वारा गाए गए तथा उनके शिष्यों द्वारा लिपिबद्ध किए गए लगभग 4000 ‘अभंग’ आज भी उपलब्ध हैं। तुकाराम ने अपनी साधक अवस्था में संत ज्ञानेश्वर और नामदेव के ग्रंथों का गहराई से अध्ययन किया। इन तीनों संत कवियों के साहित्य में एक ही आध्यात्म सूत्र पिरोया हुआ है। स्वभाव से स्पष्टवादी होने के कारण इनकी वाणी में कठोरता दिखलाई पड़ती है, उसके पीछे उनका प्रमुख उद्देश्य समाज से दुष्टों का निर्दलन कर धर्म का संरक्षण करना था।
संत तुकाराम ने सदैव सत्य का ही अवलंबन किया और किसी की प्रसन्नता एवं अप्रसन्नता की ओर ध्यान न देते हुए धर्म-संरक्षण के साथ-साथ पाखंड-खंडन का कार्य किया। उन्होंने अनुभव-शून्य पोथी-पंडित, दुराचारी-धर्मगुरु इत्यादि समाज-कंटकों की अत्यंत तीव्र आलोचना की है। उनके उपदेशों का यही सार है कि संसार के क्षणिक सुख की अपेक्षा परमार्थ के शाश्वत सुख की प्राप्ति हेतु मानव का प्रयत्न होना चाहिए।
भारत के मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन के संतों में दादू दयाल का नाम आदर से लिया जाता है। दादू दयाल का जन्म ई.1544 में गुजरात के अहमदाबाद नगर में हुआ तथा उनका अधिकांश जीवन राजस्थान में व्यतीत हुआ।
संत कबीर एवं नानकदेव की भाँति दादू ने भी अन्धविश्वास, मूर्ति-पूजा, जाति-पाँति, तीर्थयात्रा, व्रत-उपवास आदि का विरोध किया और जनता को सीधा और सच्चा जीवन व्यतीत करने का उपदेश दिया।
दादू दयाल एक अच्छे कवि थे। उन्होंने भजनों के माध्यम से विभिन्न सम्प्रदायों के मध्य प्रेम एवं भाईचारे की भावना बढ़ाने पर जोर दिया। उनका पन्थ दादू-पन्थ के नाम से विख्यात हुआ। उनकी मृत्यु के बाद उनके शिष्यों- गरीबदास और माधोदास ने उनके उपदेशों को जनसाधारण में प्रचारित किया।
दादू दयाल हिंदी के भक्तिकाल में ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रमुख संत और कवि थे। उन्होंने दादूपंथ की स्थापना की जो कि निर्गुणवादी संप्रदाय है। दादू दयाल का नाम पहले बाहुबली था किंतु इनकी पत्नी का निधन हो जाने के बाद इन्होंने संन्यासी जीवन अपना लिया. पत्नी के निधन के बाद वे राजस्थान में जयपुर के निकट के आमेर में आकर रहे।
इनकी भेंट फतेहपुर सीकरी में अकबर से हुई उसके बाद ये सांभर के निकट नरैना नामक गाँव में रहने लगे। नरैना में ही ई.1603 में दादू दयाल का निधन हुआ। उस स्थान को अब श्री दादू पालकांजी भैराणाधाम कहा जाता है।
इनके गुरु का नाम बुड्डन बाबा था। ज्ञानाश्रयी संत एवं कवि होने के कारण इन्हें राजस्थान का कबीर भी कहा जाता है। दादूदयाल के 52 मुख्य शिष्य थे जिनमें लालदास, गरीबदास, सुंदरदास, रज्जब और बखना मुख्य थे।
दादू दयाल हिंदी, गुजराती एवं डिंगल आदि भाषाओं के ज्ञाता थे। उन्होंने शबद और साकी लिखीं। इनकी रचनाएं प्रेमभाव से पूर्ण हैं। इन्होंने हिन्दुओं से जाति-पांति तोड़ने का आग्रह किया एवं हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए भी आवाज उठाई।
दादूपंथी साधु विवाह नहीं करते और बच्चों को गोद लेकर अपना पंथ चलाते हैं। दादू पंथ के सत्संग को अलख दरीबा कहा जाता है। दादू पंथ की प्रमुख पीठ राजस्थान के नरैना में भैराणाधाम में स्थित है। यहाँ प्रतिवर्ष फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को मेला लगता है।
दसवीं शताब्दी ईस्वी के अंत में आए मुस्लिम लेखक अलबिरूनी ने मध्यकालीन हिन्दू रीति-रिवाज पर टिप्पणी करते हुए लिखा है- हिन्दू अलग-अलग बैठकर भोजन खाते हैं और उनके भोजन का स्थान गोबर से लिपा चौका होता है। वे उच्छिष्ट का उपयोग नहीं करते हैं और जिन बर्तनों में खाते हैं, यदि वे मिट्टी के होते हैं तो भोजन खाकर बर्तन फैंक देते हैं।
मध्यकालीन हिन्दू रीति-रिवाज प्राचीन काल में विसित हुई सामाजिक संस्थाओं का ही विकसित रूप था। इस काल के जन-जीवन में जाति, कुटुम्ब, विवाह, सोलह संस्कार, दान-पुण्य, हरि-कीर्तन, तीर्थ सेवन आदि परम्पराओं का महत्त्वपूर्ण स्थान था किन्तु इस काल में भारतीय समाज हिन्दू और मुसलमान के रूप में पूरी तरह दो हिस्सों में विभक्त था।
दोनों के सामाजिक नियमों तथा व्यवहार में बहुत अन्तर था। मुसलमानों में बराबरी और भाईचारे का सिद्धान्त था जबकि हिन्दुओं में जाति-प्रथा और छुआछूत के कारण समाज के भीतर भारी विषमता थी। हिन्दुओं एवं मुसलमानों में विवाह से लेकर उत्तराधिकार के नियमों, मृतकों के संस्कार, वेशभूषा, भोजन और स्वागत के ढंग पूरी तरह अलग-अलग थे। दोनों के तीज-त्यौहार एवं पर्व भी अलग-अलग थे।
हिन्दुओं एवं मुसलमानों दोनों में विवाह का निर्णय यद्यपि पारिवारिक होता था किंतु मुसलमानों में उसका आधार जातीय न होकर सामाजिक हैसियत होता था जबकि हिन्दुओं में विवाह का आधार जाति एवं सामाजिक हैसियत दोनों होता था। हिन्दुओं में सहभोज केवल अपनी जाति के लोगों के बीच होता था जबकि मुसलमानों में सहभोज का कोई आधार नहीं था।
हिन्दुओं में विधवा-विवाह अब भी अच्छा नहीं माना जाता था तथा विधवा-विवाह न के बराबर होते थे किंतु मुसलमानों में विधवा-विवाह पर कोई प्रतिबंध नहीं था। हिन्दुओं में विवाह के बाद विच्छेद का कोई तरीका नहीं था किंतु मुसलमानों में पुरुषों द्वारा बड़ी आसानी से तलाक दिया जा सकता था। हिन्दू एक विवाह करते थे किंतु मुसलमान चार विवाह तक कर सकते थे। शहजादे एवं बादशाह कितने भी विवाह कर सकते थे। हिन्दुओं एवं मुसलमानों की संगीत कला, नृत्यकला, चित्रकला एवं स्थापत्यकला में भी भारी अंतर था।
सामाजिक रीति-रिवाजों एवं सांस्कृतिक परम्पराओं के अंतर को लेकर हिन्दू और मुसलमान एक-दूसरे को हीन समझते थे और एक-दूसरे से घृणा करते थे। सम्पूर्ण मध्य-काल में यह समस्या बनी रही कि अपने-अपने सुदृढ़ आधारों वाली इन दो सामाजिक एवं सांस्कृतिक व्यवस्थाओं में सामंजस्य कैसे विकसित हो! सम्पूर्ण दिल्ली सल्तनत काल में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच की खाई गहरी तथा चौड़ी होती चली गई।
मध्य-कालीन सन्तों ने हिन्दुओं एवं मुसलमानों की बुराइयों को लेकर उनकी आलोचना की तथा लड़ने की बजाए प्रेम की साधना करने का मार्ग सुझाया। मुगल काल में अकबर ने भी हिन्दू और मुसलमानों के धर्म एवं संस्कृति में निकटता लाने के प्रयास किए। कला और साहित्य के क्षेत्र में भी हिन्दू और मुस्लिम कला-परम्पराओं के समन्वय के प्रयास हुए किंतु इन दो संस्कृतियों में इतने अधिक अंतर थे कि इन्हें निकट लाना संभव नहीं हो सका।
हिन्दुओं के संस्कारों में तिलक लगाना, जनेऊ धारण करना, मूर्ति-पूजा, गौ-पूजा, विष्णु-पूजा, गंगा-स्नान, रामायण एवं गीता का पाठ आदि इतने गहरे पैठ चुके थे कि वे इन बातों को छोड़ नहीं सकते थे जबकि मुसलमानों ने गौ-मांस खाना, हिन्दुओं को बलपूर्वमक मुसलमान बनाना, मंदिरों को तोड़ना आदि बातें इतनी मजबूती से पकड़ रखी थीं कि वे इन्हें छोड़कर हिन्दुओं को गले लगाने को तैयार नहीं थे।
मध्यकालीन हिन्दू रीति-रिवाज
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मध्यकालीन हिन्दू रीति-रिवाज के अनुसार हिन्दू-धर्म में सोलह संस्कारों में से केवल जातकर्म, नामकरण, चूड़ाकरण, उपनयन और विवाह संस्कार आदि पांच-छः संस्कार ही प्रचलन में रह गए थे। अबुल फजल ने लिखा है कि जातकर्म संस्कार में बच्चे का जन्म होने पर घी और शहद मिलाकर सोने के छल्ले से शिशु के मुँह में डाला जाता था। बंगाल में महिलाएँ नवजात शिशु की दीर्घायु की कामना करती हुई उस पर हरी घास तथा चावल न्यौछावर करती थीं। तुलसीदास और सूरदास ने अपनी रचनाओं में शिशु जन्म के बाद होने वाले ‘नंदी मुख श्राद्ध’ का उल्लेख किया गया है। इस अवसर पर ब्राह्मणों को स्वर्ण, गाय, कपड़े, भोजन आदि पदार्थ दान स्वरूप दिए जाते थे। परिवार में होने वाले मांगलिक कार्यों एवं त्यौहारों पर घर के दरवाजों पर आम या अशोक के पत्तों की बंदनवार बनाकर लटकाई जाती थे। शिशु जन्म के बाद जन्मकुंडली बनाकर उसके भविष्य के बारे में घोषणा की जाती थी। शिशु-जन्म के चालीस दिन बाद नामकरण संस्कार होता था। बंगाल में दूध, दही और हल्दी मिलाकर शिशु के ललाट पर तिलक लगया जाता था। बच्चे की रुचि जानने के लिए बच्चे के सामने धान, भात, मिट्टी, सोना, चाँदी आदि कई वस्तुएँ रख दी जाती थीं और यह देखा जाता था कि वह किसे हाथ लगाता है!
शिशु के छः माह का हो जाने पर अन्न-प्राशन्न संस्कार किया जाता था। सूरदास के पदों में आए प्रसंग के अनुसार बालक को खीर, मधु और घी चखाया जाता था जिसे उसका पिता धार्मिक अनुष्ठान के उपरान्त खिलाता था। शिशु के तीन वर्ष का होने पर मुंडन संस्कार (चूड़ाकर्म) किया जाता था तथा सिर पर एक चोटी छोड़़कर शेष बाल काट दिए जाते थे।
तभी बच्चे का कर्णच्छेदन संस्कार भी किया जाता था अर्थात् उसके दोनों कान छेदे जाते थे। आठ वर्ष की आयु में बच्चे का जनेऊ संस्कार किया जाता था जिसे उपनयन संस्कार भी कहते थे। जनेऊ में तीन सूत होते थे जिसमें प्रत्येक सूत तीन धागों को बुनकर बनाया जाता था। जनेऊ बालक के बाएं कन्धे पर लटकाया जाता था तथा जिसके छोर दाएं हाथ में लपेट दिए जाते थे।
जनेऊ के तीन सूत- ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं तथा उसका सफेद रंग पवित्रता का सूचक है। जनेऊ धारण करने के बाद बालक अपना अध्ययन प्रारम्भ करता था। विद्याध्ययन आरम्भ करने से पहले बालक को गुरु द्वारा गायत्री मंत्र सुनाया जाता था। इस अवसर पर ब्राह्मणों को दक्षिणा एवं निर्धनों को दान दिया जाता था। बालक के विद्याध्ययन की समाप्ति पर समावर्तन संस्कार किया जाता था।
हिन्दुओं में विवाह की पम्पराएं एवं नियम
मध्यकालीन हिन्दू रीति-रिवाज के अनुसार हिन्दुओं में विवाह समारोह आज की ही तरह बड़ी धूम-धाम से होते थे। हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों में बाल-विवाह की प्रथा प्रचलित थी। असम में केवल ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों में बाल-विवाह का प्रचलन था। शेष जातियों में वयस्क होने पर ही विवाह होते थे। असम के अतिरिक्त शेष भारत में हिन्दुओं में बेटी का विवाह छः से आठ वर्ष की आयु तक कर दिया जाता था।
मध्यकालीन हिन्दू रीति-रिवाज के अनुसार अधिक उम्र की लड़कियों का पिता के घर में रहना वर्जित माना जाता था। बाल-विवाह की स्थिति में सहवास युवा होने पर ही होता था। अकबर ने विवाह की न्यूनतम आयु लड़कों के लिए 16 वर्ष तथा लड़कियों के लिए 14 वर्ष निर्धारित की। विवाह के लिए दुल्हा और दुल्हन के साथ-साथ माता-पिता की सहमति भी अनिवार्य थी। अकबर के पश्चात् किसी बादशाह ने इस आदेश का समुचित पालन नहीं करवाया।
हिन्दुओं में रक्त सम्बन्धियों एवं सगोत्रियों के साथ और अन्तर्जातीय विवाहों का निषेध था। अकबर निकट रिश्तेदारों में विवाह का समर्थक नहीं था। उसने किसी नवयुवक द्वारा धन के लोभ में अधेड़ आयु की महिला से विवाह करने की प्रथा को भी गलत माना। अकबर ने आदेश दिया कि यदि स्त्री अपने पति से 12 वर्ष से अधिक बड़ी है तो ऐसा विवाह गैर-कानूनी और रद्द माना जाएगा।
मध्यकालीन हिन्दू रीति-रिवाज के अनुसार समाज में दहेज प्रथा प्रचलित थी। अमीर लोग अपनी पुत्री के विवाह में बहुत सा धन दहेज के रूप में दिया करते थे। निर्धन लोग भी इस प्रथा से बचे हुए नहीं थे। महाराष्ट्र के महान् सन्त तुकाराम को भी अपनी बेटी के विवाह के लिए गाँव के लोगों से धन मांगना पड़ा था। अकबर दहेज प्रथा का विरोधी था किन्तु उसने इस बुराई को समाप्त करने का कोई प्रयत्न नहीं किया।
पिता द्वारा पुत्री को दहेज दिए जाने के साथ-साथ, मामा द्वारा भांजी के विवाह में मायरा (भात) भरने की प्रथा प्रचलित थी। नरसी मेहता को अपनी दोहिती के विवाह में मायरा भरने के लिए ईश्वर से करुण पुकार लगानी पड़ी थी।
मध्य-काल में प्रारम्भ में कुछ निम्न जातियों को छोड़कर शेष हिन्दू समाज में विधवा-विवाह पर प्रतिबंध था। किसी भी मध्य-कालीन शासक ने इसे पुनः प्रचलित करने का प्रयास नहीं किया। फलस्वरूप मध्य-काल में बाल-विधवाओं की समस्या विकट थी, जिन्हें घर की चार-दीवारी में रहते हुए नारकीय जीवन व्यतीत करना पड़ता था। अकबर ने विधवा-विवाह को कानूनी घोषित किया। उसका मानना था कि जो नवयुवती अपने पति के साथ सुखभोग नहीं कर सकी है, उसे सती नहीं किया जाना चाहिए, उसका विवाह किसी विधुर से कर दिया जाना चाहिए।
हिन्दुओं में विवाह समरोह
मध्यकालीन हिन्दू रीति-रिवाज के अनुसार हिन्दुओं में वर-वधू का चुनाव माता-पिता या घर के बड़े सदस्यों द्वारा किया जाता था। विवाह सम्बन्ध के मामले में लड़के की बात सुनी जाती थी किन्तु लड़कियों को अपने विवाह के बारे में कुछ भी बोलने का अधिकार नहीं था। धनी घरों की लड़कियां इसका अपवाद थीं। कुछ पुरोहित या पुरोहितिनियां या चतुर महिलाएं विवाह-योग्य लड़के-लड़कियों की जानकारी रखती थीं तथा विवाह के लिए परामर्श और सहयोग करती थीं।
जब दोनों पक्ष विवाह सम्बन्ध के लिए सहमत हो जाते थे तब ज्योतिषियों द्वारा बताए गए शुभ-मुहूर्त के दिन सगाई का दस्तूर किया जाता था। इसमें वर के माथे पर तिलक लगाकर कुछ भेंट दी जाती थीं। यद्यपि हिन्दुओं में विवाह के धार्मिक कृत्य में जाति और प्रान्त के अनुसार काफी अन्तर था तथापि धार्मिक संस्कार एक जैसे थे। समकालीन साहित्यिक ग्रन्थों में इन विवाहों के धार्मिक कृत्यों का विवरण मिलता है।
दूल्हा सुन्दर वस्त्र धारण करके अश्व पर सवार होता था, जिसके पीछे उसकी सहायता के लिए एक वयस्क पुरुष बैठता था। दूल्हे के साथ सजी हुई बारात दुल्हन के घर जाती थी। बारात के आगे रंग-बिरंगे कपड़ों में सजे बाजे वाले चलते थे, जिनके हाथों में अस्त्र-शस्त्र भी होते थे। बारात में मित्र और सम्बन्धी सम्मिलित होते थे। बारात के वधू-पक्ष के घर पहुँचने पर स्वागत किया जाता था और व्यंजन परोसे जाते थे जिसे ज्यौनार कहा जाता था।
वर और वधू एक-दूसरे को माला पहनाते थे। पुरोहितों द्वारा वैदिक मन्त्र उच्चारित किए जाते थे और अग्निकुण्ड में आहुतियां देकर देवताओं का आह्वान किया जाता था। वर-वधू उस अग्निकुण्ड के चारों ओर सात फेरे लेते थे। वधू के पिता द्वारा कन्यादान किया जाता था। वधू को लाल चूड़ियां पहनाई जाती थीं और उसकी मांग में सिंदूर भरा जाता था। वधू का पिता वर तथा उसके सम्बन्धियों को नकद, स्वर्ण तथा वस्त्र के रूप में उपहार देता था।
इसके बाद वर अपनी वधू को लेकर अपने पिता के घर आता था। अकबर ने आदेश जारी किए कि अमीर-उमराव शादी में मुबारकबाद के रूप में केवल दो नारियल भेंट करें। एक तो उस अधिकारी की ओर से तथा दूसरा बादशाह सलामत की ओर से माना जाएगा।
हिन्दुओं में विवाह विच्छेद
मध्यकालीन हिन्दू रीति-रिवाज के अनुसार हिन्दू किसी भी परिस्थिति में अपनी पत्नी को तलाक नहीं दे सकता था कई बार विभिन्न कारणों से पति-पत्नी अलग रहते थे किंतु उनमें विवाह विच्छेद की कोई कानूनी, सामाजिक या धार्मिक रीति नहीं थी।
हिन्दुओं के मृतक संस्कार
मध्यकालीन हिन्दू रीति-रिवाज के अनुसार हिन्दुओं में अंतिम संस्कार का बड़ा महत्त्व था, क्योंकि वे इहलोक से परलोक को अधिक मान्यता देते थे। इनके मुख्य अनुष्ठान दाह-संस्कार, उदकर्म, असौच, अस्थि-संचयन, शान्ति-कर्म और सपिंडी कर्म थे। अबुल फजल ने कुछ ऐसे वर्गों का उल्लेख किया है जिनके लिए दाह-संस्कार वर्जित था। धर्मशास्त्र के अनुसार छोटे बच्चों और तपस्वियों के लिए भू-समाधि एवं जल-समाधि का प्रावधान था।
जब व्यक्ति मरणासन्न हो जाता था तब उसे चारपाई से उठाकर जमीन पर लिटा देते थे। उसका सिर उत्तर की तरफ रहता था तथा उस पर हरी दूब बिखेर कर गाय का गोबर लगाते थे। उसके मस्तक पर पवित्र गंगाजल डालकर मुँह में तथा वक्षस्थल पर तुलसीदल रखते थे। मरणासन्न व्यक्ति को भवसागर पार कराने के उद्देश्य से गोदान किया जाता था।
अन्न, वस्त्र एवं, भोजन एवं सिक्के दान किए जाते थे। अबुल फजल ने बंगाल की एक प्रथा का उल्लेख किया है, इसमें मृत्युशैय्या पर पड़े व्यक्ति को उठाकर निकट की नदी में ले जाया जाता था और मृत्यु के समय उसके शरीर को कमर तक जलधार में डुबाये रखते थे। सिक्ख-पंथ के संस्थापक गुरुनानक ने उल्लेख किया है कि किसी सम्बन्धी की मृत्यु की सूचना देने वाले पत्र के ऊपरी कौने को फाड़ दिया जाता था।
यह प्रथा आज भी प्रचलित है। मृत्यु के पश्चात् तीन दिन तक परिवार के सदस्य भूमि पर सोते थे, दिन में मांगकर या खरीद कर लाए गए भोजन ग्रहण करते थे। घर में भोजन नहीं बनाया जाता था। मृतक के परिवार वाले दस दिन से लेकर एक माह का शोक रखते थे। इस दौरान वे हजामत बनाने, वेद-पाठ करने, देव-प्रतिमाओं की पूजा करने आदि का निषेध रखते थे। गहरे रंग के कपड़े नहीं पहने जाते थे।
मध्यकालीन हिन्दू रीति-रिवाज के अनुसार औरतें सिर पर सफेद दुपट्टा रखती थीं। चार से दस दिन में ‘अस्थि-संचयन’ किया जाता था जिसमें चिता से राख एवं अस्थियों को एकत्रित करके दूध तथा गंगाजल से धोया जाता था और पवित्र नदियों में विसर्जित कर दिया जाता था। मृत्यु के तेरहवें दिन रिश्तेदारों द्वारा मृतक के उत्तराधिकारी को पगड़ी बांधते थे। अबुल फजल के अनुसार मृत्यु के एक साल बाद मृतक का श्राद्ध किया जाता था जिसमें ब्राह्मणों को दान दिया जाता था।
भारत में मध्यकालीन मुस्लिम रीति-रिवाज विदेशी आक्रांताओं के साथ आए थे। जिन हिन्दुओं को बलपूर्वक या लालच से या स्वेच्छा से मुसलमान बना लिया गया वे भी मध्यकालीन मुस्लिम रीति-रिवाज मानने लगे।
मध्यकालीन मुस्लिम रीति-रिवाज
मुस्लिम परिवार में पुत्र का जन्म
हालांकि मध्यकालीन मुस्लिम रीति-रिवाज हिन्दुओं से अलग थे किंतु मुसलमानों में भी हिन्दुओं की तरह पुत्र के पैदा होने को अच्छा समझा जाता था। इस अवसर पर घर में जलसा किया जाता था। सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी में इटली से भारत आए मानसी ने अमीर मुस्लिम परिवार में पुत्र जन्म पर मनाये जाने वाले समारोह का वर्णन किया है।
मध्यकालीन मुस्लिम रीति-रिवाज के अनुसार पुत्र-जन्म होने पर शिशु के मुँह में शहद टपकाया जाता था और माँ का स्तन दबाकर उसमें से दूध की बूँद शिशु के मुख में डाली जाती थी। शिशु को अजान सुनाई जाती थी। अकबर ने शहजादों के जन्म पर हिन्दुओं की तरह जन्मकुडली भी बनवाई थी। जन्म के दिन ही शिशु का नाम रखा जाता था। यह कार्य प्रायः दादा के द्वारा किया जाता था।
शिशु जन्म के छठे दिन छठी का समारोह मनाया जाता था। बालक के स्नान के बाद उसे किसी फकीर के द्वारा पहने गए पुराने कपड़े की कमीज पहनाई जाती थी। अकबर का पहला कपड़ा सूफी सन्त सैयद अली शिराजी की पोशक से तैयार किया गया था। शिशु जन्म के सातवें दिन अकिकाह किया जाता था। इस अवसर पर लड़के के लिए दो तथा लड़की के लिए एक बकरा काटा जाता था।
उसी दिन लड़के की पहली हजामत होती थी। अबुल फजल ने मुगलों द्वारा अपनाये गए तुर्की रिवाजों का उल्लेख किया है। जब बच्चा चलने लगता था तो शिशु का दादा शिशु को अपनी पगड़ी से धक्का देता था जिससे वह गिर जाए।
मध्यकालीन मुस्लिम रीति-रिवाज – सुन्नत
बालक के चार वर्ष चार महीने तथा चार दिन का होने पर बिस्मिल्लाह या मकतब किया जाता था। खतना या सुन्नत का आयोजन भी बहुत धूमधाम से किया जाता था। अकबर ने 12 वर्ष से पहले खतना करने की मनाही कर दी थी, इसके बाद भी यह काम उस बालक की इच्छा पर छोड़ दिया जाता था कि वह अपनी सुन्नत कब करवाए।
मध्यकालीन मुसलमानों में सुन्नत की परम्परा वस्तुतः यहूदियों से आई थी। यहूदी लोग अपनी संतान की सुन्नत किया करते थे। ईसाइयों ने भी यहूदियों की इस परम्परा को अपनाया तथा ईसाइयों में भी सुन्नत होती थी। बाद में जब इस्लाम का उदय हुआ, तब मुसलमानों के लिए भी सुन्नत का प्रावधान किया गया। मध्यकालीन मुसलमान परिवारों में पुत्र तथा पुत्री दोनों की सुन्नत की जाती थी। बाद में स्त्रीसुन्नत की परम्परा अनिवार्य नही रही। मुसलमानों एवं यहूदियों में आज भी सुन्नत होती है जबकि ईसाई लोग इसे प्रायः छोड़ चुके हैं।
मुसलमानों में विवाह समारोह
मध्यकालीन मुस्लिम रीति-रिवाज के अनुसार माँ का दूध टालकर अर्थात् सगी बहिन को छोड़कर किसी भी स्त्री से विवाह किया जा सकता था और कोई भी व्यक्ति चार स्त्रियों तक से विवाह कर सकता था। बहुविवाह के कारण बहुत से परिवारों में कलह और अनैकतिकता आ जाती थी। अकबर से पूर्व किसी भी शासक ने बहुविवाह प्रथा पर अंकुश लगाने का प्रयास नहीं किया था।
यद्यपि अकबर के इबादतखाने के उलेमा ‘निकाह’ के द्वारा चार औरतों से तथा ‘मूता’ के अन्तर्गत कितनी भी औरतों से विवाह के समर्थक थे, किंतु अकबर ने आदेश दिया कि साधारण आय वाले व्यक्ति को केवल एक विवाह करना चाहिए, यदि पहली पत्नी निःसंतान हो तो दूसरे विवाह के बारे में सोचना चाहिए। अकबर का मानना था कि एक से अधिक पत्नी रखना व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए घातक है तथा इससे परिवार में व्यवस्था भी नहीं रहती।
मुसलमानों में वैवाहिक सम्बन्ध ‘कव्वाल’ निर्धारित करते थे। इस कार्य के लिए परिवार से 1 दाम से 10 मुहर तक शुल्क वसूल किया जाता था। उच्च राजकीय अधिकारियों एवं दरबारियों के लड़के-लड़कियों के विवाह से पहले शाही अनुमति ली जाती थी। मुगल बादशाहों ने अपनी लड़कियों की शादी नहीं करने का रिवाज बना रखा था किंतु औरंगजेब ने कुछ मुसलमान फकीरों के कहने पर अपनी दो पुत्रियों मेहरून्निसा और जुबेदामुन्निसा का विवाह किया था।
मुसलमानों में विवाह समारोह दुल्हन के घर से ‘सचाक’ (चार मूल्यवान उपहार) और मेहन्दी भेजने से आरम्भ होता था। सुन्दर तश्तरियों में फल, मिठाईयां और रुपए सजाकर भेजे जाते थे। परिवार की महिलाएं दूल्हे के हाथों पर मेहंदी लगाती थीं। विवाह के मजहबी काम काजी पूरे करता था। इसमें दुल्हन की औपचारिक स्वीकारोक्ति प्राप्त की जाती थी तथा दूल्हे के द्वारा इबादत तथा मेहर की घोषण से शादी की रस्म पूरी होती थी। शाही के अंत में कुरान पढ़ी जाती थी।
मध्यकालीन मुस्लिम रीति-रिवाज – तलाक
मध्यकालीन मुस्लिम रीति-रिवाज के अनुसार तलाक को अच्छा नहीं समझा जाता था फिर भी उनमें तीन तलाक की प्रथा प्रचलित थी जिसमें पति अपनी पत्नी से असंतुष्ट होने पर तीन बार- ‘तलाक’ शब्द का उच्चारण करके उसे छोड़ देता था। इस अवसर पर उसे अपनी छोड़ी गई पत्नी को मेहर की रकम चुकानी होती थी। यदि पति पुनः उसी स्त्री से विवाह करता चाहता था तो उस स्त्री को किसी दूसरे व्यक्ति से विवाह करके उसके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने के बाद दूसरे पति को तलाक देकर पुनः पहले पति से विवाह किया जा सकता था। इसे हलाला करना कहते थे।
मुसलमानों के मृतक संस्कार
मध्यकालीन मुस्लिम रीति-रिवाज के अनुसार मुसलमानों के मृत्यु संस्कार के नियम अलग थे। मरणासन्न व्यक्ति का मुख मक्का की तरफ फेर दिया जाता था और उसके निकट कुरान के यासीन अध्याय का पाठ किया जाता था। उसे मक्का के जमजम कुएं का पानी या शर्बत पिलाया जाता था, जिससे शरीर से प्राण निकलने में सुविधा हो। व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर मृत्यु की घोषणा की जाती थी।
शाही परिवार के किसी सदस्य या बादशाह के प्रिय व्यक्ति के मरने पर वकील अपनी बांह पर नीला रूमाल बांधकर बादशाह के सामने उपस्थित होता था। मृतक के सम्बन्धी अपने कपड़ों को फाड़ते और अपने सिर पर धूल डालते थे। मृतक के शव को फूल मालाओं तथा सुगन्धित द्रव्यों से सुसज्जित कर कब्रिस्तान ले जाया जाता था।
किसी शाही अधिकारी की मृत्यु होने पर उसके प्रतीक चिह्न, ध्वज तथा हाथी-घोड़े आदि भी शव-यात्रा में शामिल होते थे। कुछ मुसलमान भी अपने प्रियजन की मृत्यु पर सिर मुंडवा लेते थे। चालीस दिनों तक शोक रखा जाता था। शोक में स्वादिष्ट भोजन और सुन्दर पोशाक से परहेज रखा जाता था। शोक की समाप्ति चालीसवें दिन होती थी।
इस दिन मृतक के सम्बन्धी एवं मित्र, मृतक की कब्र पर जाते थे और मृतक के नाम पर गरीबों में खाना, कपड़ा और पैसे बांटते थे। मृत्यु की वार्षिकी भी इसी तरह मनाई जाती थी। जहाँगीर के अनुसार वार्षिकी मनाने का रिवाज मुसलमानों ने हिन्दुओं से ग्रहण किया था। फातिहा पढ़े जाने के बाद गरीबों में भोजन बांटा जाता था। इब्नबतूता ने उल्लेख किया है कि मृतक को उसके जीवन काल के समान ही आवश्यक वस्तुएं भेंट दी जाती थी।
मध्यकालीन मुस्लिम रीति-रिवाज के अनुसार अमीर लोग अपने पूर्वजों की कब्र पर रोशनी एवं सजावट करते थे और साधारण लोग मृतक की कब्र पर दीपक जलाते थे। अमीरों की कब्रों के प्रवेश द्वार पर हाथी-घोड़े बांधे जाते थे। कुरान पढ़ने के लिए खतमी (वाचक) नियुक्त किए जाते थे। सन्तों की कब्र पर अमीरों द्वारा दरगाह बनवाई जाती थी, जहाँ उसके अनुयाइयों की भीड़ लगती थी। फीरोज तुगलक की तरह औरंगजेब भी कब्रिस्तान में औरतों के प्रवेश का विरोधी था। वह कब्रों पर छत डालने तथा उसकी दीवारों पर सफेदी पोतने को भी पसन्द नहीं करता था।
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...