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रामानन्दाचार्य

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रामानन्दाचार्य

रामानुजाचार्य की शिष्य परम्परा में 14वीं शताब्दी ईस्वी में रामानंद हुए जिन्हें रामानन्दाचार्य भी कहा जाता है। उन्हें वैष्णव परम्परा की धार्मिक क्रांति को दक्षिण से उत्तर भारत में ले आने का श्रेय प्राप्त है- ‘भक्ति द्राविड़ ऊपजी, लाए रामानन्द।’

कुछ विद्वानों के अनुसार रामानंद का जन्म ई.1299 में प्रयाग के एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ। उन्होंने बनारस में शिक्षा प्राप्त की तथा वहाँ स्वामी राघवानन्द से श्री सम्प्रदाय की दीक्षा ली।

रामानन्दाचार्य ने बैकुण्ठवासी विष्णु के स्थान पर मानव शरीरधारी और राक्षसों का संहार करने वाले भगवान् राम को अपना आराध्य बनाया। उस समय हिन्दू समाज को एक ऐसे धर्म की आवश्यकात थी जो वीरत्व, त्याग एवं बलिदान के लिए प्रेरित कर सके। यद्यपि विष्णु के अवतार के रूप में भगवान राम को पहले से ही प्रतिष्ठा प्राप्त थी परन्तु राम की भक्ति और उपासना का व्यापक प्रचार रामानन्द ने ही किया।

रामानन्दाचार्य ने ‘ब्रह्मसूत्र’ पर ‘आनन्द भाष्य’ लिखा जिसमें ब्रह्म के रूप में श्रीराम को प्रतिष्ठित किया। उन्होंने ईश्वर के सगुण और निर्गुण, दोनों रूपों का समर्थन किया। उनके द्वारा स्थापित सम्प्रदाय ‘रामावत सम्प्रदाय’ कहलाता है। रामानन्दी लोग राम तथा सीता की पूजा करते हैं।

रामानंद रामानुज के ‘विशिष्ठ दर्शन’ में आस्था रखते थे और उन्होंने रामानुज के विचारों का समस्त उत्तर भारत में प्रचार किया। रामानुज, निम्बार्क और मध्वाचार्य के उपदेशों की भाषा संस्कृत थी किंतु रामानंद ने अपने उपदेश हिन्दी में दिए।

रामानन्दाचार्य के विचार रामानुज के विचारों से भी अधिक क्रान्तिकारी थे। रामानुज चारों वर्णों और अनेक जातियों की एकता में विश्वास नहीं करते थे परन्तु रामानन्द जाति-प्रथा को नहीं मानते थे। रामानन्द ने जाति-पाँति और ऊँच-नीच का भेद नहीं माना और शूद्रों, मुसलमानों तथा स्त्रियों को भी अपना शिष्य बनाया। उनके पूर्व स्त्रियों को सार्वजनिक रूप से धार्मिक विचार-विमर्षों में भाग नहीं लेने दिया जाता था।

रामानन्द ने इस प्रतिबन्ध को नहीं माना। उनकी मान्यता थी कि राम के भक्त बिना भेदभाव के एक साथ खा-पी सकते हैं। भगवान के भक्तों के लिए वर्णाश्रम का बन्धन व्यर्थ है। परमेश्वर का एक ही गोत्र है और एक ही परिवार है। अतः समस्त विष्णु-भक्त भाई-भाई हैं और सबकी जाति एक है।

रामानंद के 12 शिष्यों में सभी जातियों के स्त्री-पुरुष सम्मिलित थे- अनन्तानन्द, सुखानन्द, योगानन्द, सुरसुरानन्द, गालवानन्द, नरहरि आनन्द, भावानन्द (सभी ब्राह्मण), कबीरदास (जुलाहा), पीपा (क्षत्रिय), रैदास (चमार), धन्ना (जाट) तथा सेन (नाई)। कुछ सूचियों में योगानंद तथा गालवानंद के स्थान पर पद्मावती तथा सुरसुरी नामक महिला शिष्याओं के नाम मिलते हैं।

कहा जाता है कि गंगा नामक एक वेश्या ने भी रामानन्दाचार्य से दीक्षा प्राप्त की। रामानंद के शिष्यों में से कुछ सगुणोपासक हुए तथा कुछ निर्गुणोपासक। ये सभी शिष्य मुस्लिम शासन काल में हिन्दू-धर्म को दृढ़ता देने वाले सिद्ध हुए। इनकी प्रेरणा से समाज के विभिन्न वर्गों एवं जातियों के करोड़ों लोग, अनेक विपत्तियां सहकर भी वैष्णव धर्म में बने रहे।

चूंकि रामानन्दाचार्य ने स्वर्ग में रहने वाले विष्णु के स्थान पर धरती पर विचरने वाले राम एवं सीता को अपना आराध्य बनाया, संस्कृत के स्थान पर हिन्दी को उपदेशों का माध्यम बनाया तथा ब्राह्मण की जगह हर जाति के व्यक्ति को अपना शिष्य बनाया इसलिए उन्हें अपने पूर्ववर्ती वैष्णव आचार्यों अर्थात् रामानुज, माधवाचार्य तथा निम्बार्क से अधिक सफलता मिली। इस सफलता के आधार पर कई बार यह भी कह दिया जाता है कि मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन का सूत्रपात रामानन्द ने किया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारत का मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन

भगवद्भक्ति की अवधारणा

भक्ति आन्दोलन का पुनरुद्धार एवं उसके कारण

मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदाय

भक्तिआन्दोलन की प्रमुख धाराएँ

भक्ति आन्दोलन का प्रभाव

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत

रामानुजाचार्य

माधवाचार्य

निम्बार्काचार्य

संत नामदेव

रामानंदाचार्य

वल्लभाचार्य

सूरदास

संत कबीर

भक्त रैदास

गुरु नानकदेव

मीरा बाई

तुलसीदास

संत तुकाराम

दादूदयाल

चैतन्य महाप्रभु

रामानन्दाचार्य पर अन्य लेख

वैष्णव संत रामानंद से पहले हिन्दू धर्म की स्थिति

रामानंद की समन्वयवादी परम्परा

रामानंद के शिष्य

वल्लभाचार्य

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वल्लभाचार्य

महाप्रभु वल्लभाचार्य का जन्म ई.1479 में दक्षिण भारत के एक तैलंग ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता एक उच्चकोटि के विद्वान् थे और उन्होंने बनारस को अपना कार्यक्षेत्र बना रखा था। 13 वर्ष की आयु में ही वल्लभाचार्य समस्त धर्मग्रन्थों में पारंगत हो गए। उनके विचारों पर विष्णु स्वामी के भक्ति-सिद्धान्तों का विशेष प्रभाव पड़ा। वल्लभाचार्य ने उनके विचारों को अधिक सुस्पष्ट करके उनका प्रचार किया। उन्हें अग्निदेव का अवतार माना जाता है।

वल्लभाचार्य ने सनातन धर्म के समक्ष ‘शुद्धाद्वैत’ सिद्धांत की संकल्पना प्रस्तुत की तथा पुष्टि सम्प्रदाय की स्थापना की। उन्होंने अणुभाष्य, सिद्धान्त रहस्य और भागवत टीका सुबोधिनी आदि अनेक ग्रंथों की रचना करके अपने मत के समर्थन में दार्शनिक भावभूमि तैयार की तथा ब्रह्मसूत्र, श्रीमद्भागवत् और श्रीमद्भगवद्गीता को पुष्टि मार्ग का प्रमुख साहित्य घोषित किया।

वल्लभाचार्य की मान्यता थी कि सृष्टि में तीन तत्व विद्यमान हैं- ब्रह्म, जगत् एवं जीव। आत्मा और जड़-जगत् ब्रह्म के ही स्वरूप हैं। ब्रह्म बिना किसी वस्तु अथवा शक्ति की सहायता से विश्व का निर्माण करता है, वह सगुण और सच्चिदानन्द है किंतु हमारी अविद्या के कारण वह हमें जगत् से अलग जान पड़ता है। इस अविद्या से मुक्ति पाने का मार्ग भक्ति है।

वल्लभाचार्य ने शंकराचार्य के मायावाद का विरोध करके यह सिद्ध किया कि जीव उतना ही सत्य है जितना कि ब्रह्म। फिर भी, वह ब्रह्म का अंश और सेवक ही है। उन्होंने कहा कि जीव भगवान् की भक्ति के बिना शान्ति नहीं पा सकता। भगवान का अनुग्रह होने पर जीव का पोषण होता है। व

ल्लभाचार्य के अनुसार ब्रह्म के तीन स्वरूप हैं- आधिदैविक, आध्यात्मिक एवं अंतर्यामी। अनंत दिव्य गुणों से युक्त पुरुषोत्तम श्री कृष्ण ही परमब्रह्म हैं। उनका मधुर रूप एवं लीलाएं, जीव में आनंद का आविर्भाव करने वाला अक्षय स्रोत है। सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म का विलास है तथा सम्पूर्ण जगत लीला के निमित्त ब्रह्म की आत्मकृति है। उन्होंने प्रेम-लक्षणा-भक्ति पर विशेष बल दिया और वात्सल्य-रस से ओत-प्रोत भक्ति की शिक्षा दी।

वल्लभाचार्य का भगवत्-कृपा में अटूट विश्वास था। उनके अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण ही परब्रह्म हैं। उनकी सेवा एवं भक्ति ही जीव का परम कर्त्तव्य है। मनुष्य संसारिक मोह और ममता का त्याग करके एवं श्रीकृष्ण के चरणों में सर्वस्व समर्पण करके भक्ति के द्वारा ही उनका अनुग्रह प्राप्त कर सकता है।

उन्होंने भारत में कृष्ण-भक्ति का व्यापक प्रचार किया तथा भगवान श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं को भक्ति का आधार बनाया ताकि जन साधारण, बाल-लीलाओं के गुणगान में रस का अनुभव कर सके और बालक के रूप में विहार करने वाले सहज-सरल ईश्वर के साथ अधिक तादात्म्य स्थापित कर सके। वल्लभाचार्य का लक्ष्य मुक्ति नहीं है। वह तो अपने आराध्य देव श्रीकृष्ण के निकट पहुँचकर सदैव के लिए उनकी सेवा में रत रहना चाहते हैं।

वल्लभाचार्य के जीवन का अधिकांश समय ब्रज में व्यतीत हुआ। उन्होंने मथुरा के निकट गोवर्द्धन पर्वत से भगवान श्रीकष्ण का विग्रह प्राप्त कर उसकी स्थापना की। भगवान के इस प्राकट्य को उस काल की विलक्षण घटना माना गया तथा देश भर से विष्णु-भक्त, भगवान के इस विग्रह के दर्शनों के लिए गोवर्द्धन पर्वत पहुँचने लगे।

वल्लभाचार्य की प्रेरणा से देश भर में श्रीमद्भागवत् का पारायण होने लगा। वल्लभाचार्य के सैंकड़ों शिष्य थे जिनमें सूरदास भी सम्मिलित थे। वल्लभाचार्य के शिष्य पूरे देश में फैल गए और उन्होंने भजन-कीर्तन एवं अपनी रचनाओं के माध्यम से देश भर में कृष्ण-भक्ति का प्रचार किया। यद्यपि वल्लभाचार्य ने संसार के भोग-विलास  त्याग कर विरक्ति के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करने का उपदेश दिया था परन्तु उनके अनुयायी इसका अनुसरण नहीं कर सके। ई.1531 में महाप्रभु वल्लभाचार्य का निधन हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारत का मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन

भगवद्भक्ति की अवधारणा

भक्ति आन्दोलन का पुनरुद्धार एवं उसके कारण

मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदाय

भक्तिआन्दोलन की प्रमुख धाराएँ

भक्ति आन्दोलन का प्रभाव

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत

रामानुजाचार्य

माधवाचार्य

निम्बार्काचार्य

संत नामदेव

रामानंदाचार्य

वल्लभाचार्य

चैतन्य महाप्रभु

सूरदास

संत कबीर

भक्त रैदास

गुरु नानकदेव

मीरा बाई

तुलसीदास

संत तुकाराम

दादूदयाल

चैतन्य महाप्रभु

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चैतन्य महाप्रभु महाप्रभु वल्लभाचार्य के समकालीन थे। चैतन्य का जन्म ई.1486 में कलकत्ता से 75 मील उत्तर में स्थित नवद्वीप अथवा नादिया ग्राम में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उस समय मुसलमानों के आतंक से भयभीत वैष्णव-भक्त बंगाल से भागकर नवद्वीप में शरण ले रहे थे। इस कारण नवद्वीप में वैष्णव-भक्ति की धारा अबाध गति से बह रही थी।

चैतन्य ने संस्कृत, व्याकरण और काव्य का अध्ययन करने के बाद भागवत पुराण तथा अन पुराणों का अध्ययन किया। उनके बड़े बड़े भाई विष्णुरूप ने बहुत कम आयु में ही सन्यास ले लिया था, इसलिए उनकी माता ने बाल्यकाल में ही चैतन्य का विवाह कर दिया। जब चैतन्य 11 वर्ष के हुए तो उनके पिता का देहान्त हो गया। पिता के पिण्डदान और श्राद्ध के लिए ई.1505 में चैतन्य को गया जाना पड़ा।

वहाँ उनकी भेंट ईश्वरपुरी नामक सन्यासी से हुई। चैतन्य उनके शिष्य हो गए। इसके बाद चैतन्य गृहस्थ जीवन से विरक्त होकर कृष्ण-भक्ति में लीन रहने लगे। चैतन्य ने वेदों और उपनिषदों का गहन अध्ययन किया किंतु उनसे चैतन्य की जिज्ञासा शान्त हुई तो उन्होंने भक्ति तथा प्रेम के माध्यम से ईश्वर को प्राप्त करने का मार्ग अपनाया। 24 वर्ष की आयु में वे केश्व भारती से दीक्षा लेकर सन्यासी हो गए। सन्यास लेने के बाद आठ वर्ष तक चैतन्य ने देश का भ्रमण किया।

वे सर्वप्रथम नीलांचल गए और इसके बाद दक्षिण भारत के श्रीरंग क्षेत्र एवं सेतुबंध आदि स्थानों पर रहे। उन्होंने देश के कोने-कोने में जाकर हरिनाम की महत्ता का प्रचार किया। ई.1515 में विजयादशमी के दिन चैतन्य ने अपनी विशाल शिष्य मण्डली के साथ वृंदावन के लिए प्रस्थान किया। ये वन के रास्ते ही वृंदावन को चले।

कहा जाता है कि चैतन्य के हरिनाम उच्चारण से वशीभूत होकर वन्यपशु भी नाचने लगते थे। शेर, बाघ और हाथी आदि भी इनके आगे प्रेमभाव से नृत्य करते चलते थे। कार्तिक पूर्णिमा को चैतन्य अपने शिष्यों सहित वृंदावन पहुँचे। वृंदावन में आज भी कार्तिक पूर्णिमा के दिन गौरांग-आगमनोत्सव मनाया जाता है।

वृंदावन में महाप्रभु ने इमली-तला और अक्रूर-घाट पर निवास किया तथा जन साधारण के समक्ष प्राचीन श्रीधाम वृंदावन की महत्ता प्रतिपादित कर लोगों की सुप्त भक्ति-भावनाओं को जागृत किया। वृंदावन से महाप्रभु प्रयाग गए। वहाँ कुछ काल तक निवास करने के पश्चात् महाप्रभु ने काशी, हरिद्वार, शृंगेरी (कर्नाटक), कामकोटि पीठ (तमिलनाडु), द्वारिका, मथुरा आदि तीर्थों में भगवद्नाम संकीर्तन किया। 

उनका मानना था कि ईश्वर कई रूप धारण करता है परन्तु उनमें सबसे मोहक और आकर्षक रूप श्रीकृष्ण का है। वे कृष्ण को ईश्वर का अवतार न मान कर ईश्वर मानते थे। उनके विचार से सबसे ऊँची भक्ति और प्रेम का घनिष्ठ स्वरूप पति-पत्नी के सम्बन्ध में होता है जिसमें किसी प्रकार का व्यापार नहीं होता और न उस प्रेम की कोई सीमा नहीं होती। इसलिए राधा और कृष्ण की कल्पना की गई है।

कृष्ण परम-ब्रह्म हैं और उनके भक्त राधा स्वरूप हैं। इसलिए भक्त का कृष्ण के प्रेम में विह्वल होना स्वाभाविक है। चैतन्य आत्मविभोर होकर अपना अस्तित्त्व भूल जाते थे और कृष्ण में लीन हो जाते थे।

चैतन्य ने भगवान की भक्ति के लिए संगीत और नृत्य का सहारा लिया जो संकीर्तन कहलाता था। उन्होंने अपने शिष्यों के साथ ढोलक, मृदंग, झाँझ, मंजीरे आदि वाद्य बजाकर, नृत्य करते हुए उच्च स्वर में हरि नाम संकीर्तन करना प्रारंभ किया- ‘हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे-हरे। हरे-राम, हरे-राम, राम-राम, हरे-हरे।’

उनकी संकीर्तन पद्धति मथुरा-वृन्दावन से लेकर पूर्वी-बंगाल तक व्यापक रूप से लोकप्रिय हो गई। इसमें भक्तजन समूह में संकीर्तन करते थे। चैतन्य और उनके अनुयाई सार्वजनिक मार्गों पर भजन-कीर्तन करते हुए नाचते-गाते थे और अर्द्ध-मूर्च्छित स्थिति में पहुँच जाते थे। स्वयं चैतन्य भी भक्ति के आवेश में मूर्च्छित और समाधिस्थ हो जाते थे।

चैतन्य ने लोगों को कृष्ण-भक्ति का मन्त्र दिया। कृष्ण-भक्ति एवं कीर्तन का प्रचार उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य था। उनके निर्मल चरित्र एवं प्रेमपूर्ण व्यवहार से असंख्य लोग उनके अनुयाई बन गए।

चैतन्य का धर्म रस्मों और आडम्बरों से मुक्त था। उन्होंने परमात्मा में पूर्ण आस्था रखने का उपदेश दिया। उनकी उपासना का स्वरूप प्रेम, भक्ति, कीर्तन और नृत्य था। प्रेमावेश में ही भक्त परमात्मा से साक्षात्कार का अनुभव करता है। चैतन्य का कहना था कि यदि कोई जीव कृष्ण पर श्रद्धा रखता है, अपने गुरु की सेवा करता है तो वह मायाजाल से मुक्त होकर कृष्ण के चरणों को प्राप्त करता है। चैतन्य ने ज्ञान के स्थान पर प्रेम और भक्ति को प्रधानता दी।

उन्होंने स्त्रियों को पुरुषों से पृथक् रहने का उपदेश दिया। वे मूर्ति-पूजा और धर्मग्रन्थों के विरोधी नहीं थे परन्तु उन्हें कर्मकाण्ड तथा आडम्बरों से घृणा थी। चैतन्य के अनुसार समस्त लोग समान रूप से ईश्वर की भक्ति कर सकते हैं। भक्ति मार्ग में ऊँच-नीच का भेदभाव नहीं होता, समस्त भक्त भगवान श्रीकृष्ण के चरणाश्रित होने के अधिकारी हैं।

चैतन्य और उनके अनुयाइयों ने मुसलमानों एवं निम्न जातियों के लोगों को भी कृष्ण-भक्ति का उपदेश दिया। चैतन्य के प्रभाव से शूद्रों को भी भक्ति का अधिकार मिल गया। चैतन्य ने अपने ‘शिक्षाष्टक’ में कृष्ण-भक्ति के विषय में अपने विचार व्यक्त किए हैं। उनके अनुसार भक्ति का प्रथम और प्रमुख साधन ‘हरिनाम संकीर्तन’ है।

चैतन्य महाप्रभु बंगाल के सबसे बड़े धर्म-सुधारक थे। उनके विचार में केवल कर्म से कुछ नहीं होता। मोक्ष प्राप्ति के लिए हरि-भक्ति तथा उनका गुण-गान करना आवश्यक है। प्रेम तथा लीला इस सम्प्रदाय की विशेषताएँ हैं। चैतन्य सम्प्रदाय, निम्बार्काचार्य की भांति भेदाभेद के सिद्धान्त को मानते थे अर्थात् जीवात्मा एक दूसरे से भिन्न तथा अभिन्न दोनों है। केवल भक्ति के बल से ही मानव की आत्मा श्रीकृष्ण तक पहुँच सकती है। मनुष्य की आत्मा ही राधा है। उसे श्रीकृष्ण के प्रेम में लीन रहना चाहिए। दास, मित्र, पत्नी तथा पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण से प्रेम करना मानव जीवन का प्रधान लक्ष्य है।

चैतन्य महाप्रभु ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष जगन्नाथ पुरी में व्यतीत किए। वे जीवन के अन्तिम बारह वर्ष में कृष्ण-विरह में व्याकुल रहा करते थे और हर समय उनके नेत्रों से आँसू बहा करते थे। उनके भक्त उन्हें कृष्ण की प्रेम-लीलाएँ सुना-सुना कर सान्त्वना दिया करते थे। ई.1533 में 47 वर्ष की अल्पायु में रथयात्रा के दिन चैतन्य भक्ति के उन्माद में समुद्र में घुस गए तथा उनका शरीर पूरा हो गया।

बंगाल, बिहार, उड़ीसा एवं उत्तर प्रदेश की प्रजा पर चैतन्य महाप्रभु की संकीर्तन भक्ति का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। उनकी मृत्यु के पश्चात् वृन्दावन के गोस्वामियों ने चैतन्य के सिद्धान्तों और संकीर्तन-पद्धति को व्यवस्थित रूप प्रदान किया तथा चैतन्य-सम्पद्राय की स्थापना की। इस सम्प्रदाय को गौड़ीय सम्प्रदाय भी कहा जाता है। वृन्दावन के गोस्वामी, चैतन्य को अपना प्रभु मानते थे परन्तु नादिया ग्राम के अनुयाई उन्हें कृष्ण का अवतार मानने लगे और गौरांग महाप्रभु के रूप में स्वयं चैतन्य की पूजा होने लगी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत

रामानुजाचार्य

माधवाचार्य

निम्बार्काचार्य

संत नामदेव

रामानंदाचार्य

वल्लभाचार्य

चैतन्य महाप्रभु

सूरदास

संत कबीर

भक्त रैदास

गुरु नानकदेव

मीरा बाई

तुलसीदास

संत तुकाराम

दादूदयाल

सूरदास

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सूरदास

संत शिरोमणि सूरदास का जन्म सोलहवीं सदी में हुआ। वे वल्लभाचार्य के प्रमुख शिष्य थे तथा भक्ति आंदोलन के महान संत थे किंतु वे उपदेशक अथवा सुधारक नहीं थे।

सूरदास ने अपने गुरु वल्लभाचार्य के निर्देश पर भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन किया तथा भागवत् पुराण में वर्णित लीलाओं को आधार बनाते हुए कई हजार सरस पदों की रचना की। इन पदों में भगवान कृष्ण के यशोदा माता के आंगन में विहार करने से लेकर उनके दुष्ट-हंता स्वरूप का बहुत सुंदर एवं रसमय वर्णन किया गया।

मैया मोरी, मैं नहीं माखन खायो” जैसे पदों में सूरदास ने भगवान कृष्ण के बालस्वरूप की लीलाओं को जन-सामान्य के समक्ष रखा।

जटिल जटा कून मुख फूल, सिर मुकुट गिरधरि जैसे पदों में सूरदासजी ने भगवान कृष्ण के सौंदर्य की वर्णन करने में अपनी विशिष्ट काव्य प्रतिभा का परिचय दिया।

सूरदास ने भ्रमर गीतों के माध्यम से निर्गुण भक्ति को नीरस एवं अनुपयोगी घोषित किया तथा न केवल सगुण भक्ति करने अपितु भक्त-वत्सल भगवान की रूप माधुरी का रसपान करने वाली भक्ति करने का मार्ग प्रशस्त किया। एक भ्रमर गीत में वे लिखते हैं-

अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी ।

पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी ।

ज्यौं जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न ताकौं लागी ।

प्रीति-नदी में पाउँ न बोर्यो, दृष्टि न रूप परागी ।

‘सूरदास’ अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी ।

संत सूरदास की रचनाएँ- सूरसागर, सूरसारावली एवं साहित्य लहरी में संकलित हैं। उनकी रचनाएं ब्रज भाषा में हैं। ब्रजभाषा में इतनी प्रौढ़ रचनाएं सूरदास के अतिरिक्त अन्य कोई कवि नहीं कर सका।

सूरदास की रचनाओं में भक्ति, वात्सल्य और शृंगार रसों की प्रधानता है। पुष्टि मार्ग में दीक्षित होने से सूरदास की भक्ति में दास्य भाव एवं सखा भाव को प्रमुखता दी गई है। उन्होंने सूरसागर का आरम्भ ‘चरण कमल बन्दौं हरि राई’ से किया है।

अब मैं नाच्यौ बहुत गोपाल! जैसे पदों को देश-व्यापी लोकप्रियता अर्जित हुई तथा जन-सामान्य को अनुभव हुआ कि भक्ति के बल पर भगवान को अपने आंगन में बुलाया जा सकता है। उन्हें संकट के समय पुकारा जा सकता है और अपने शत्रु से त्राण पाने में सहायता ली जा सकती है। परमात्मा की शक्ति से ऐसे नैकट्य भाव का अनुभव इससे पूर्व किसी अन्य सम्प्रदाय द्वारा नहीं कराया गया था।

भ्रमर गीतों के माध्यम से सूरदास ने भगवान कृष्ण एवं गोपियों के बीच ब्रह्म और जीव के बीच अनंत काल से चले आ रह सहज आकर्षण एवं अध्यात्मिक बंधन का निरूपण किया है तथा निर्गुण ब्रह्म के स्थान पर सगुण ब्रह्म की महत्ता का वर्णन किया है- निरगुन कौन देस को वासी!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारत का मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन

भगवद्भक्ति की अवधारणा

भक्ति आन्दोलन का पुनरुद्धार एवं उसके कारण

मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदाय

भक्तिआन्दोलन की प्रमुख धाराएँ

भक्ति आन्दोलन का प्रभाव

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत

रामानुजाचार्य

माधवाचार्य

निम्बार्काचार्य

संत नामदेव

रामानंदाचार्य

वल्लभाचार्य

चैतन्य महाप्रभु

सूरदास

संत कबीर

भक्त रैदास

गुरु नानकदेव

मीरा बाई

तुलसीदास

संत तुकाराम

दादूदयाल

संत कबीर

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संत कबीर

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन की बहुत सारी धाराओं में संत कबीर का नाम अत्यंत श्रद्धा से लिया जाता है। वे राम को निराकार ब्रह्म के रूप में देखते थे।

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन की बहुत सारी धाराओं में संत कबीर का नाम अत्यंत श्रद्धा से लिया जाता है। वे राम को निराकार ब्रह्म के रूप में देखते थे। उनसे पहले विष्णु या उनके अवतारों की साकार रूप में ही भक्ति करने की परम्परा थी। राम को निराकार ब्रह्म के रूप में देखने वाले वे संभवतः प्रथम संत थे।

कबीर का जीवन

संत कबीर रामानंदाचार्य के बारह प्रमुख शिष्यों में से थे। संत कबीर का जन्म ई.1398 में काशी में एक विधवा ब्राह्मणी की कोख से हुआ। माता द्वारा लोकलाज के कारण त्याग दिये जाने से कबीर नीरू नामक मुसलमान जुलाहे के घर में पलकर बड़े हुए। संत कबीर की पत्नी का नाम लोई था। उससे उन्हें एक पुत्र कमाल और पुत्री कमाली हुई।

धर्म-सुधारक

कबीर ने विधिवत् शिक्षा प्राप्त नहीं की थी। बड़े होने पर वे रामानन्द के शिष्य बन गए। कबीर ने घर-गृहस्थी में रहते हुए भी मोक्ष का मार्ग सुझाया। उन्हें हिन्दू-मुस्लिम दोनों के धर्मग्रन्थों का ज्ञान था। कबीर अपने समय के बहुत बड़े धर्म-सुधारक थे। वे अद्वैतवादी थे तथा निर्गुण-निराकार ब्रह्म के उपासक थे। वे जाति-पाँति, छुआछूत, ऊँच-नीच आदि भेदभाव नहीं मानते थे।

बाह्याडम्बर का विरोध

वे मूर्ति-पूजा और बाह्याडम्बर के आलोचक थे। उनके शिष्यों में हिन्दू तथा मुसमलान दोनों ही बड़ी संख्या में थे। इसलिए उन्होंने हिन्दुओं तथा मुसलमानों दोनों को पाखण्ड तथा आडम्बर छोड़कर ईश्वर की सच्ची भक्ति करने का उपदेश दिया तथा उनकी बुराइयों की खुलकर आलोचना की-

जो तू तुरक-तुरकणी जाया, भीतर खतना क्यों न कराया!

जो तू बामन-बमनी जाया, आन बाट व्है क्यों नहीं आया।

कबीर ने कुसंग, झूठ एवं कपट का विरोध किया। उनके अनुसार जिस प्रकार लोहा पानी में डूब जाता है उसी प्रकार कुसंग के कारण मनुष्य भी भवसागर में डूब जाएगा। कबीर का मानना था कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु ‘काम’ है और ‘स्त्री’ काम को बढ़ाती है। इसलिए उन्होंने स्त्री को ‘कामणि काली नागणी’ अर्थात् जादू करने वाली काली सर्पिणी कहा।

नारी की झाईं परत अंधा होता भुजंग।

कबिरा तिन की कौन गति से नित नारी के संग।।

कबीर ने हिन्दू और मुस्लिम दोनों के अर्थहीन आडम्बरों और रस्मों का खण्डन किया। वे हिन्दुओं के छाप-तिलक एवं मूर्ति-पूजा के विरोधी थे तथा उन्होंने मुसलमानों की नमाज, रमजान के उपवास, मकबरों और कब्रों की पूजा आदि की भी आलोचना की उन्होंने मुसलमानों से कहा कि यदि तुम्हारे हृदय में भक्ति-भावना का उदय नहीं होता तो हजयात्रा से कोई लाभ नहीं है। कबीर ने एकेश्वरवाद एवं प्रेममयी भक्ति पर जोर दिया।

कबीर की वाणी

कबीर की वाणी का संग्रह ‘बीजक’ नाम से प्रसिद्ध है। बीजक के तीन भाग है- ]

(1.) रमैनी,

(2.) सबद, और

(3.) साखी।

कबीर की भाषा

संत कबीर की भाषा सधुक्कड़ी अथवा खिचड़ी कहलाती है जिसमें खड़ी बोली, अवधी, ब्रज, पंजाबी, राजस्थानी, इत्यादि अनेक भाषाओं का मिश्रण है। उनकी भाषा साहित्यिक न होने पर भी प्रभावशाली है।

ईश् भक्ति को प्रमुखता

यद्यपि कबीर को ज्ञानाश्रयी संत माना जाता है किंतु वे ईश्वर के प्रेम में समर्पित भक्त थे। ईश्वर के प्रति उनका प्रेम किसी प्रेमाश्रयी संत से कम नहीं था। एक दोहे में उन्होंने लिखा है-

कोई ध्यावे निराकार को, काई ध्यावे आकारा।

वह तो इन छोड़न तै न्यारा, जाने जानन हारा।

कबीर के लिए जीवन में सबसे महत्वपूर्ण बात केवल भक्ति थी। एक स्थान पर उन्होंने लिखा है-

साखत बामन मत मिलो, वैष्णो मिले चाण्डाल।

अंक माल दै भेंटिए, मानो मिले गोपाल।।

ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण

कबीरदासजी की भक्ति में ईश्वर को ज्ञान से नहीं अपितु भक्ति से पाने की ललक है। एक दोहे में उन्होंने लिखा है-

कबीर कूता राम का, मुतिया मेरा नाउं |

गले राम की जेवड़ी, जित खैंचे तित जाउं ||

मांसाहार का विरोध

संत कबीर मांसाहार के बड़े विरोधी थी। एक स्थान पर उन्होंने लिखा है-

बकरी पाती खात है, तिनकी काढी खाल।

जे नर बकरी खात हैं, तिनका कौन हवाल।।

कबीर का निर्गुण ब्रह्म

कबीर की भक्ति निर्गुण ब्रह्म अर्थात् बिना रूप और गुण वाले ईश्वर के प्रति थी। कबीर का राम दशरथ-पुत्र राम न होकर अजन्मा, सर्वव्यापी एवं घट-घट वासी राम था। उनका राम समस्त गुणों से परे था। वे कहते हैं-उनका मानना था कि ब्रह्म न तो मंदिर में हैं, न मस्जिद में, अपितु सर्वत्र व्याप्त है-

मस्जिद अंदर मुल्ला पुकारे, काशी अंदर ब्राह्मण

दोनों जगह मेरा साईं, मोहिं कहाँ ढूंढो रे बंदे।

ब्रह्म को निराकार और निर्द्वंद्व बताते हुए कबीर ने लिखा है-

सार सबद सुगम, सहज समाना

ऊंचा कहे न काहू, मंदा कहे न काहू।

ई.1518 में कबीर का निधन हुआ। इस प्रकार उनकी आयु 120 वर्ष मानी जाती है। समाज की निम्न समझी जाने वाली जातियों पर कबीर के उपदेशों का बड़ा प्रभाव पड़ा। उनके अनुयाई कबीर-पंथी कहलाए। आगे चलकर उनके शिष्यों ने उन्हें भगवान का अवतार मान लिया। 

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुख्य अध्याय – भारत का मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन

भगवद्भक्ति की अवधारणा

भक्ति आन्दोलन का पुनरुद्धार एवं उसके कारण

मध्य-युगीन भक्ति सम्प्रदाय

भक्तिआन्दोलन की प्रमुख धाराएँ

भक्ति आन्दोलन का प्रभाव

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मीरा बाई

तुलसीदास

संत तुकाराम

दादूदयाल

भक्त रैदास

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भक्त रैदास

भक्त रैदास का जन्म काशी के एक चमार परिवार में हुआ। वे रामानन्द के बारह प्रमुख शिष्यों में से थे। वे विवाहित थे तथा जूते बनाकर अपनी जीविका चलाते थे।

भक्त रैदास तीर्थयात्रा, जाति-भेद, उपवास आदि के विरोधी थे। हिन्दू तथा मुसलमानों में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं मानते थे। वे निर्गुण भक्ति में विश्वास रखते थे। रैदास की रचनाओं में ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना स्पष्ट झलकती है।

वैष्णव संतों द्वारा ग्रहण किया जाने वाला श्री हरि चरणों का अनन्य आश्रय ही भक्त रैदास की साधना का प्राण है। उनके प्रभाव के कारण निम्न जातियों के लोगों में भगवद्-भक्ति में आस्था उत्पन्न हुई। रैदास के शिष्यों ने रैदासी सम्प्रदाय प्रारम्भ किया। लोक मान्यता है कि मीरा बाई उन्हें अपना गुरु मानती थी।

भक्त रैदास की भक्ति भावना व्यापक और गहरी है जो उनके पदों, भजनों और साहित्य से प्रकट होती है। रैदास की भक्ति भावना ईश्वर के प्रति प्रेम, सेवा, समर्पण और ईश्वर में अटूट विश्वास से ओतप्रोत है। उनके लिखे भजन जनसामान्य में अत्यंत लोकप्रिय हैं।

भक्त रैदास की भक्ति भावना का मूल तत्व ईश्वर-प्रेम है। अर्थात् वे वैष्णव संतों की प्रेमाश्रयी धारा के कवि हैं।  उनकी भक्ति भावना पर समाधि और अद्वैत की मिली-जुली छाया है। उन्होंने सम्पूर्णता की अनुभूति को ध्यान में रखा और एकाग्रता और समाधि की अवस्था में जीवन को आनंदित किया। भक्त रैदास की भक्ति भावना में द्वैत और अद्वैत का सम्मिश्रण है जिसमें ईश्वर दीपक के समान है तो भक्त बाती के समान है। अर्थात् जिस प्रकार बाती दीपक के बिना अपूर्ण है, उसी प्रकार भक्त अपने अराध्य के बिना अपूर्ण है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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गुरु नानकदेव

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गुरु नानकदेव

पंजाब के सन्तों में गुरु नानकदेव का नाम अग्रणी है। उनका जन्म ई.1469 में लाहैर से 50 किलोमीटर दूर तलवण्डी गांव के खत्री परिवार में हुआ। उनके पिता कालू ग्राम के पटवारी थे। नानक विवाहित थे तथा उनके दो पुत्र भी हुए किंतु बाद में साधु-संतों की संगत में रहने लगे। वे निर्गुण-निराकार ईश्वर की पूजा करते थे।

गुरु नानकदेव एकेश्वरवादी थे और ऊँच-नीच, हिन्दू-मुस्लिम तथा जाति-पाँति के भेद को नहीं मानते थे। वे मूर्ति-पूजा तथा तीर्थ-यात्रा के भी घोर विरोधी थे। सिक्ख धर्म के अनुसार मनुष्य को सरल तथा त्यागमय जीवन व्यतीत करना चाहिए। नानक का कहना था कि संसार में रहकर तथा सुन्दर गृहस्थ का जीवन व्यतीत करके भी मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता है। नानक पर सूफी मत का अधिक प्रभाव था तथा वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के पक्षधर थे और उनके झगड़ों को बेइमानों का काम बताते थे-

बन्दे इक्क खुदाय के, हिन्दू मुसलमान।

दावा राम रसूल का,  लड़दे बेईमान।।

नानक ने अपने हिन्दू शिष्यों से कहा कि- ‘मैंने चारों वेद पढ़े, अड़सठ तीर्थों पर स्नान किया, वनों और जंगलों में निवास किया और सातों ऊपरी एवं निचली दुनियाओं का ध्यान किया और इस नतीजे पर पहुँचा कि मनुष्य चार कर्मों द्वारा मुक्ति प्राप्त कर सकता है- भगवान से भय, उचित कर्म, ईश्वर तथा उसकी दया में विश्वास और एक गुरु में विश्वास जो उचित मार्गदर्शन कर सके।’

नानक ने अपने मुसलमान शिष्यों से कहा- ‘दया को अपनी मस्जिद मानो, भलाई एवं निष्कपटता को नमाज की दरी मानो, जो कुछ भी उचित एवं न्याय-संगत है, वही तुम्हारी कुरान है। नम्रता को अपनी सुन्नत मानो, शिष्टाचार को रोजा मानो। इससे तुम मुसलमान बन जाओगे।’

उन्होंने पाँचों नमाजों की व्याख्या करते हुए कहा- ‘पहली नमाज सच्चाई, दूसरी इन्साफ, तीसरी दया, चौथी नेक-नियति और पाँचवीं नमाज अल्लाह की बंदगी है।’

नानक ने विभिन्न स्थानों का भ्रमण करके अपनी शिक्षाओं का प्रसार किया। नानक के शिष्यों ने सिक्ख धर्म की स्थापना की। वे सिक्ख धर्म के पहले गुरु माने जाते हैं। उनकी शिक्षाएँ आदि ग्रन्थ में पाई जाती हैं जो आगे चलकर गुरु ग्रंथ साहब कहलाया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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गुरु नानकदेव

मीरा बाई

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संत तुकाराम

दादूदयाल

गुरु नानकदेव पर यह भी देखें-

सिक्ख गुरु एवं उनका इतिहास

गुरु नानक एवं उनका धर्म

सिक्ख धर्म के ग्रंथ एवं मंदिर

बंदा बैरागी और सिक्ख धर्म

हिन्दू धर्म और सिक्ख पंथ

सिक्खों का नरसंहार

सिक्खिस्तान

मीरा बाई

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मीरा बाई

मध्य-कालीन भक्तों में मीरा बाई का नाम अग्रणी है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने मीरा का जन्म वि.सं. 1573 (ई.1516) में माना है जबकि गौरीशंकर हीराचंद ओझा, हरविलास शारदा तथा गोपीनाथ शर्मा आदि इतिहासकारों ने मीरा बाई का जन्म वि.सं. 1555 (ई.1498) में माना है। मीरा मेड़ता के राठौड़ शासक राव दूदा के पुत्र रतनसिंह की पुत्री थी।

जब मीरा बाई दो साल की थीं, उनकी माता का निधन हो गया। मीरा का विवाह मेवाड़ के महाराणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज से हुआ। विवाह के सात वर्ष बाद ही भोजराज एक युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। कुछ दिन बाद मीरा के श्वसुर महाराणा सांगा और पिता रतनसिंह भी खानवा के युद्ध में मृत्यु को प्राप्त हुए। कुछ समय बाद जोधपुर के राजा मालदेव ने मीरां के चाचा वीरमदेव से उनका मेड़ता राज्य छीन लिया।

बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति की थीं और श्रीकृष्ण को अपना पति मानती थीं। अब वह सांसारिक सुखों से विरक्त होकर साधु-संतों के साथ भगवान का भजन करने लगीं। महाराणा सांगा के बाद उनके पुत्र रतनसिंह और विक्रमादित्य क्रमशः मेवाड़ के महाराणा हुए किंतु उन दोनों को मीरा का साधुओं के साथ भजन गाना एवं नृत्य करना अच्छा नहीं लगा।

उन्होंने मीरा को रोकने का प्रयास किया किंतु मीरा चितौड़ छोड़़कर वृन्दावन चली गई। वहाँ से कुछ दिन वह द्वारिका चली गई और वहीं उसका शरीर पूरा हुआ।

मीराबाई ने चित्तौड़ के राजसी वैभव त्यागकर वैराग्य धारण किया तथा चमार जाति में जन्मे संत रैदास को अपना गुरु बनाया। वे जाति-पांति तथा ऊँच नीच में विश्वास नहीं करती थीं। उन्होंने ईश्वर के सगुण-साकार स्वरूप की भक्ति की। वे उच्चकोटि की कवयित्री थीं।

जन-साधारण में उनके भजन आज भी बड़े प्रेम एवं चाव से गाए जाते हैं। मीराबाई से प्रेरणा पाकर देश की करोड़ों नारियों ने श्रीकृष्ण भक्ति का मार्ग अपनाया जिससे हिन्दू परिवारों का वातावरण श्रीकृष्ण मय हो गया। राजपूताने के अनेक राजाओं ने भी श्रीकृष्ण भक्ति एवं ब्रज भाषा की कविता का प्रचार किया।

मीरा बाई की आध्यात्मिक यात्रा के तीन सोपान हैं। पहले सोपान में मीरा कृष्ण के लिए लालायित हैं और अत्यंत व्यग्र होकर गाती हैं- ‘मैं विरहणी बैठी जागूँ, जग सोवे री आली।’ कृष्ण-विरह सी पीड़ित होकर वे गाती हैं- ‘दरस बिन दूखण लागे नैण।’ कृष्ण भक्ति के दूसरे सोपान में मीरा श्रीकृष्ण को प्राप्त कर लेती हैं और वह कहती हैं- ‘पायोजी मैंने राम रतन धन पायो।’

भक्ति के तीसरे और अन्तिम सोपान में मीरा बाई को आत्मबोध हो जाता है और वे परमात्मा से एकाकार हो जाती हैं। यही सायुज्य भक्ति का चरम बिंदु है। इस सोपान में पहुँचकर मीरा कहती हैं- ‘म्हारे तो गिरधर गोपाल दूजो न कोई।’

मीरा के काव्य में सांसारिक बन्धनों को त्यागकर ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव मिलता है। मीरा कृष्ण को ही परमात्मा और अविनाशी मानती थी। उनकी भक्ति आडम्बर रहित है। मीरा किसी सम्प्रदाय विशेष से बँधी हुई नहीं थीं और उनके मन्दिर के द्वार सबके लिए खुले हुए थे। मीरा ने बहुत से पदों की रचना की जो फुटकर रूप में प्राप्त होते हैं। महादेवी वर्मा के अनुसार मीरा के पद विश्व के भक्ति साहित्य के अनमोल रत्न हैं। मीरा ने ‘राग गोविन्द’ नामक ग्रन्थ भी लिखा था किंतु यह ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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तुलसीदास

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तुलसीदास

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संत तुलसीदास

रामानंद की शिष्य मण्डली के प्रमुख सदस्य नरहरि आनंद के शिष्य तुलसीदास, अकबर के समकालीन संत हुए। उनका जन्म ई.1532 के लगभग हुआ। उन्होंने रामचरित मानस, गीतावली, कवितावली, विनय पत्रिका, एवं हनुमान बाहुक आदि ग्रंथों की रचना की।

उन्होंने भारत की जनता को धनुर्धारी दशरथ-नदंन श्रीराम की भक्ति करने की प्रेरणा दी जो धरती, ब्राह्मण, गाय तथा देवताओं की रक्षा के लिए मनुष्य का शरीर धारण करते हैं- ‘गो द्विज धेनु देव हितकारी, कृपासिंधु मानुष तनुधारी।’ तथा जो जनता को सुखी करने वाले, वैदिक धर्म की रक्षा करने वाले एवं दुष्टों का विनाश करने वाले हैं- ‘जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता।’

तुलसी ने जनसामान्य को भगवान में विश्वास रखने की प्रेरणा देते हुए कहा- हे परमात्मा, आप ही मेरे स्वामी, गुरु, पिता और माता हैं, आपके चरण-कमलों को छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ- ‘मोरे तुम प्रभु गुर पितु माता, जाऊँ कहाँ तजि पद जल जाता।’

तुलसीदास ने जनसामान्य को सद्ग्रंथों का पठन करने का आह्वान किया तथा विभिन्न गुरुओं द्वारा फैलाए जाने वाले पंथों और मार्गों को निंदनीय बताया ताकि हिन्दू-धर्म को एकता के सूत्र में पिरोए रखा जा सके तथा धर्म-भीरु प्रजा को दुष्ट व्यक्तियों द्वारा धर्म के नाम पर उत्पन्न की जा रही भूल-भुलैयाओं में भटकने से रोका जा सके।

तुलसी ने पाखण्डी गुरुओं को चेतावनी देते हुए कहा- ‘हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुर घोर नरक महुँ परई।’ अर्थात् जो गुरु, शिष्य के शोक को नहीं हरता अपितु उसका धन हड़पता है, वह घनघोर नर्क में पड़ता है। उन्होंने राजाओं को भी अपनी अच्छी प्रजा अर्थात् सज्जनों के पालन का निर्देशन करते हुए कहा- ‘जासु राज प्रिय प्रजा दुःखारी, सो नृपु अवसि नरक अधिकारी।’

उन्होंने ‘कोउ नृप होहु हमें का हानि’ की मानसिकता को दास-दासियों की मानसिकता बताया। तुलसी की रामचरित मानस घर-घर पहुँच गई। करोड़ों लोगों को इसकी चौपाइयां कण्ठस्थ हो गईं तथा घर-घर पाठ होने लगे। रामचरित मानस के श्रीराम पर विश्वास हो जाने से सैंकड़ों वर्षों से दबे-कुचले कोटि-कोटि जनसमुदाय के मन में नवीन साहस का संचार हुआ। लोग ईश्वरीय सत्ता में विश्वास रखनकर अपने धर्म पर अडिग बने रहे।

तुलसीदास द्वारा विभिन्न सम्प्रदायों में समन्वय के प्रयास

दिल्ली सल्तनत (13वीं-16वीं शताब्दी ईस्वी) एवं मुगलों के शासन काल (16वीं-18वीं शताब्दी ईस्वी) में हिन्दू-धर्म के शैव, शाक्त एवं वैष्णव सम्प्रदायों के बीच कटुता का वातावरण था। यहाँ तक कि सगुणोपासकों एवं निर्गुणोपासकों के बीच भी कटुता व्याप्त थी। सभी सम्प्रदायों के मतावलम्बी अपने-अपने मत को श्रेष्ठ बताकर दूसरे के मत को बिल्कुल ही नकारते थे।

गोस्वामी तुलसीदास ने राम चरित मानस के माध्यम से इस कटुता को समाप्त करने का सफल प्रयास किया। इस ग्रंथ में तुलसी ने शैवों के आराध्य देव शिव तथा विष्णु के अवतार राम को एक दूसरे का स्वामी, सखा और सेवक घोषित किया।

राम भक्त तुलसी ने ‘सेवक स्वामि सखा सिय-पिय के, हित निरुपधि सब बिधि तुलसी के’ कहकर शंकर की स्तुति की। इतना ही नहीं तुलसी ने अपने स्वामी राम के मुख से- ‘औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउं कर जोरि, संकर भजन बिना नर भगति न पावई मोर’ कहलवाकर राम-भक्तों को शिव की पूजा करने का मार्ग दिखाया एवं राम-पत्नी सीता के मुख से शिव-पत्नी गौरी की स्तुति करवाकर शाक्तों एवं वैष्णवों को निकट लाने में सफलता प्राप्त की- ‘जय जय गिरिबर राज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी।’

तुलसी ने ‘सगुनहि अगुनहि नहीं कछु भेदा, गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा’ कहकर सगुणोपासकों एवं निर्गुणोपासकों के बीच की खाई को पाटने का प्रयास किया। तुलसी ने भक्तिमार्गियों एवं ज्ञानमार्गियों के बीच की दूरी समाप्त करते हुए कहा- ‘भगतहि ज्ञानही नहीं कछु भेदा, उभय हरहिं भव संभव खेदा।’

तुलसीदास ब्राह्मणों की श्रेष्ठता में विश्वास रखते थे किंतु उनके राम जन-जन के राम थे जिन्होंने शबर जाति की स्त्री के घर बेर खाए, गृध्र जाति के जटायु का उद्धार किया, निषादराज को अपना मित्र बनाया तथा केवट एवं अहिल्या का उद्धार किया। तुलसी के राम ने ताड़का-वध, शूर्पनखा की नासिका कर्तन तथा सिंहका का वध करके यह स्पष्ट संदेश दिया कि स्त्री यदि अच्छे गुणों से युक्त हो तभी वह पूज्य है, दुष्ट स्त्री उसी प्रकार वध के योग्य है जिस प्रकार बुरा पुरुष।

तुलसी के प्रयासों को बाद में आने वाले अन्य संतों ने भी बल दिया जिसके परिणाम स्वरूप शैव, शाक्त एवं वैष्णव सम्प्रदायों तथा इन सम्प्रदायों के भीतर उपस्थित विभिन्न विचारधाराओं के अनुयाइयों के बीच की दूरियां कम हुई और हिन्दू-धर्म, विदेशी धरती से आने वाले धर्मों के समक्ष साहस पूर्वक खड़ा हो गया। ई.1623 (वि.सं.1680) में तुलसी का देहान्त हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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संत तुकाराम

संत तुकाराम का जन्म ई.1608 में महाराष्ट्र के देहू गांव में हुआ। वे अपने समय के महान् संत और कवि थे तथा तत्कालीन भारत में चले रहे भक्ति आंदोलन के प्रमुख स्तंभ थे। उन्हें ‘तुकोबा’ भी कहा जाता है। उनके जन्म आदि के विषय में विद्वानों में मतभेद हैं। तुकाराम को चैतन्य नामक साधु ने ‘राम कृष्ण हरि’ मंत्र का स्वप्न में उपदेश दिया। संत तुकाराम ने 17 वर्ष तक जन-साधारण को उपदेश दिए।

अपने जीवन के उत्तरार्ध में उनके द्वारा गाए गए तथा उनके शिष्यों द्वारा लिपिबद्ध किए गए लगभग 4000 ‘अभंग’ आज भी उपलब्ध हैं। तुकाराम ने अपनी साधक अवस्था में संत ज्ञानेश्वर और नामदेव के ग्रंथों का गहराई से अध्ययन किया। इन तीनों संत कवियों के साहित्य में एक ही आध्यात्म सूत्र पिरोया हुआ है। स्वभाव से स्पष्टवादी होने के कारण इनकी वाणी में कठोरता दिखलाई पड़ती है, उसके पीछे उनका प्रमुख उद्देश्य समाज से दुष्टों का निर्दलन कर धर्म का संरक्षण करना था।

संत तुकाराम ने सदैव सत्य का ही अवलंबन किया और किसी की प्रसन्नता एवं अप्रसन्नता की ओर ध्यान न देते हुए धर्म-संरक्षण के साथ-साथ पाखंड-खंडन का कार्य किया। उन्होंने अनुभव-शून्य पोथी-पंडित, दुराचारी-धर्मगुरु इत्यादि समाज-कंटकों की अत्यंत तीव्र आलोचना की है। उनके उपदेशों का यही सार है कि संसार के क्षणिक सुख की अपेक्षा परमार्थ के शाश्वत सुख की प्राप्ति हेतु मानव का प्रयत्न होना चाहिए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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