मध्यकालीन हिन्दू त्यौहार और वर्तमान में मनाए जाने वाले हिन्दू त्यौहारों में विशेष अंतर नहीं है किंतु मध्यकालीन हिन्दू समाज में त्यौहारों की संख्या अधिक थी। आज का हिन्दू समाज बहुत से त्यौहारों को मनाना भूल चुका है।
मध्य-कालीन समाज में त्यौहार, उत्सव और मेले
हिन्दू और मुसलमान अलग-अलग त्यौहार मनाते थे। ये त्यौहार पूरे देश में एक समय पर मनाये जाते थे किन्तु इन्हें मनाने के ढंग में स्थानीय भिन्नताएं रहती थीं। दीपावली पर दीयों की सजावट, अतिशबाजी तथा सोने-चांदी और जवाहरात के प्रदर्शन होते थे।
अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ होली, दीपावली एवं राखी आदि कुछ हिन्दू त्यौहारों को मनाते थे किन्तु औरंगजेब ने अपने दरबार में कई हिन्दू तथा फारसी त्यौहारों का मनाया जाना बन्द कर दिया। हिन्दुओं के त्यौहार पूरे वर्ष में फैले हुए थे तथा लगभग प्रत्येक माह में आते थे, इन्हें विक्रम कलैण्डर की तिथियों के अनुसार मनाया जाता था।
मध्यकालीन हिन्दू त्यौहार
चैत्र माह के शुक्ल पक्ष से वर्ष का पहला महीना आरम्भ होता था। इसके शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा से नवमी तक चैत्रीय नवरात्रियों का आयोजन किया जाता था। चैत्र शुक्ला प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा, चैत्रीचन्द्र (चेटीचण्ड) मनाया जाता था। इस प्रकार चैत्र शुक्ला प्रतिपदा वर्ष में आने वाला प्रथम मध्यकालीन हिन्दू त्यौहार था। यह परम्परा आज तक चल रही है। माना जाता है कि आज के दिन ही ईश्वर ने सृष्टि की रचना की थी।
शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन दुर्गा अष्टमी तथा नवमी को भगवान राम का जन्मदिन अर्थात् रामनवमी का त्यौहार मनाया जाता था। चैत्र-पूर्णिमा को हनुमान जयंती अर्थात् हनुमानजी का जन्म दिवस मनाया जाता था।
ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को वट सावित्री का पर्व होता था जिसमें पत्नी अपने पति की दीर्घ आयु की कामना के साथ व्रत करती थी। वट सावित्री का पर्व प्रमुख मध्यकालीन हिन्दू त्यौहार था। इसका महाराष्ट्र में अधिक महत्व था। आषाढ़ माह की पूर्णिमा को गुरु-पूर्णिमा के रूप में मनाते थे। इस दिन भगवान वेदव्यास का जन्मदिन होता है। इस दिन लोग अपने गुरु की पूजा करके उन्हें दक्षिणा आदि देते थे।
To purchase this book please click on Image.
श्रावण माह की पूर्णिमा को रक्षा-बन्धन मनाया जाता था इस दिन बहिनें अपने भाइयों के घर जाकर उनकी कलाई पर राखी बांधती थीं और उनकी रक्षा की कामना करती थीं। भाद्रपद माह की अष्टमी को भगवान श्रीकृष्ण का जन्मदिन जन्माष्टमी मनाया जाता था। दिन में निराहार अथवा फलाहार के साथ उपवास करते थे एवं अर्द्ध-रात्रि के समय चंद्रमा को अर्घ्य देकर गुड़-धनिये का प्रसाद बांटते थे। भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी मनाते थे। आश्विन (कार्तिक) माह के शुक्ल पक्ष के पहले नौ दिन में शारदीय नवरात्रि का आयोजन किया जाता था। दसवें दिन दशहरा अर्थात् विजयादशमी का आयोजन होता था। इस दिन को भगवान राम द्वारा रावण के वध के दिवस के रूप में मनाया जाता था। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को धनतेरस, चतुर्दशी को रूप चौदस एवं अमावस्या को दीपावली मनाई जाती थी। इस दिन को भगवान राम के अयोध्या में लौटने का दिन माना जाता था और उनके स्वागत में प्रत्येक, गांव, नगर मौहल्ले, गलियों एवं घरों में दिए जलाए जाते थे। रात्रि में माँ लक्ष्मी की पूजा होती थी एवं कुछ लोग द्यूतक्रीड़ा करना अच्छा समझते थे। दीपावली के अगले दिन यम द्वितीया होती थी जिसे भाई दूज के रूप में मनाया जाता था। इस दिन भाई अपनी बहिन के घर जाकर उससे टीका करवाता था।
इसी दिन गोवर्द्धन का आयोजन किया जाता था। गोवर्द्धन पूजा में अकबर भी भाग लेता था। बहुत सी गायों को नहला-धुलाकर एवं आभूषणों से सजाकर बादशाह के सामने लाया जाता था। बादशाह उनकी पूजा करता था। जहाँगीर ने भी इस त्यौहार का उल्लेख किया है। कार्तिक मास की पूर्णिमा को भी दिए जलाए जाते थे। इस दिन त्रिपुरी पूर्णिमा का आयोजन किया जाता था।
माघ माह में जब सूर्य का मकर राशि में प्रवेश होता था तब पूरे देश में मकर संक्रान्ति मनाई जाती थी। इस दिन नदियों में स्नान करके निर्धनों एवं ब्राह्मणों को दान दिया जाता था एवं अपने से बड़ों को भेंट दी जाती थी। इस दिन तमिनाडु में पोंगल का आयोजन किया जाता था।
माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को वसन्त पंचमी के रूप में सरस्वतीजी का जन्म-दिवस मनाया जाता था। इस दिन पीले कपड़े पहनते थे एवं पीले व्यंजन बनाए जाते थे। माघ माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को महाशिवरात्रि का आयोजन होता था। इस दिन पूरे दिन एवं पूरी रात निराहार रहकर भगवान शिव की पूजा की जाती थी।
फाल्गुन माह वर्ष का अंतिम माह होता था। इसमें सबसे बड़ा त्यौहार होली मनाया जाता था। फाल्गुन माह की पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता था। इस दिन हिरणाकश्यप की बहिन होलिका का दहन किया जाता था तथा प्रहलाद की रक्षा की जाती थी। होली की अग्नि में नया धान सेककर खाया जाता था। अगले दिन रंग खेला जाता था जिसे धुलण्डी कहते थे।
इनके अतिरिक्त करवा चौथ, सकट चौथ, शीतला सप्तमी, बड़ अमावस, हरियाली अमावस आदि अनेक छोटे-छोटे त्यौहार मनाए जाते थे। प्रत्येक एकादशी को निराहार रहकर व्रत किया जाता था तथा अगले दिन प्रदोष का व्रत किया जाता था।
कुछ प्रांतों में कुछ विशिष्ट त्यौहार भी मनाए जाते थे। केरल में ओणम, ओडिसा में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा, विषु, बिहार में छठ पूजा, पंजाब में लोहड़ी एवं वैशाखी, बंगाल में काली पूजा इसी प्रकार के विशिष्ट त्यौहार थे।
हिन्दुओं के ये समस्त त्यौहार अत्यंत प्राचीन काल से मनाए जाते रहे थे एवं वर्तमान समय में भी ये त्यौहार सामाजिक जन-जीवन में विशिष्ट स्थान रखते हैं। वर्ष भर में आने वाले सूर्यग्रहण एवं चंद्रग्रहण भी दान-पुण्य एवं स्नान के कारण पर्व की तरह दिखाई देते थे। अबुल फजल ने राम-नवमी और कृष्ण-जन्माष्टमी का उल्लेख महत्त्वपूर्ण हिन्दू त्यौहारों के रूप में किया है।
मध्यकालीन भारत के मुस्लिम समाज में मुहर्रम, मीलाद उन-नबी, सबे-उल-फितर और ईद-उल-जुहा मुसलमानों के प्रमुख प्रमुख त्यौहार थे। मध्य-कालीन मुस्लिम समाज इन त्यौहारों को बड़ी श्रद्धा से मनाता था। मुहर्रम के पहले दस दिनों में शिया मुसलमान शोक मनाते थे।
शिया अनुश्रुतियों के अनुसार हज़रत अली और उनके दो पुत्र-हसन और इमाम हुसैन, दीन की खातिर शहीद हुए थे। उनकी शहादत की याद में शिया हर वर्ष मुहर्रम के महीने की दसवीं तारीख को ताजिये निकाल कर शोक मानते हैं। इस दिन शिया मुसलमान पुरुष अपने शरीर को यातनाएं देते थे और अपने सिर पर धूल डालते थे। वे शोक की काली पोशाक पहनते थे। इब्नबतूता के अनुसार लोग उस दिन गरीबों को आटा, चावल और मांस बांटा करते थे।
To purchase this book please click on Image.
मुगल बादशाह यद्यपि सुन्नी थे तथापि उन्होंने मुहर्रम मनाये जाने पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया था किन्तु औरंगजेब ने अपने राज्य में मुहर्रम का जुलूस निकालने की मनाही कर दी थी। फिर भी मुहर्रम का जमाव तथा ताजिये का जुलूस कभी बन्द नहीं हुआ। इस कारण मुहर्रम के दिन शिया और सुन्नियों में खूनी-संघर्ष हो जाते थे जिनमें कई लोग मारे जाते थे। हिजरी महीने ‘रबी-उल-अव्वल’ के बाहरवें दिन हजरत मुहम्मद के जन्मदिन को मीलाद उन-नबी के रूप में मनाया जाता था। यह मुसलमानों के प्रमुख त्यौहार की सूची में सबसे ऊपर था। इस दिन शाही-महल में सैयदों, विद्वानों और सन्तों की सभा होती थी और कुरान पढ़ी जाती थी। गुलाब-जल का छिड़काव करने के साथ गरीबों में मिठाई और हलुआ बांटा जाता था। शाहजहाँ इस अवसर पर एक बड़ी रकम खैरात के रूप में बांटता था। इसी दिन हजरत मुहम्मद का निधन भी हुआ था। हिजरी माह ‘शाबान’ के चौदहवें दिन ‘सबे-बरात’ मनाया जाता था। इस दिन पैगम्बर मुहम्मद स्वर्ग में दाखिल हुए थे। इसलिए मुसलमान उस दिन खुशियां मनाते थे। शाबान के तेरहवें दिन लोग अपने परिवार के मृतक व्यक्तियों के नाम पर दही और मिठाइयों की थालियां सजाकर उन पर ‘फातिहा’ पढ़ते थे। आपस में मिठाई और उपहार का आदान-प्रदान होता था।
इस पर्व की दूसरी विशेषता घरों तथा मस्जिदों में दीपक जलाना तथा आतिशबाजी का खेल था। फीरोज तुगलक इस पर्व पर तीन दिनों तक आतिशबाजी करता था। शाही परिवार के साथ ही दिल्ली की जनता भी रोशनी तथा सजावट देखने के लिए सड़कों पर निकलती थी। राजमहलों, सरकारी इमारतों, बाग-बगीचों तथा बावलियों पर रोशनी की जाती थी और बादशाह एवं अमीर लोग गरीबों में पैसे बांटते थे।
रमजान महीने में मुसलमान दिन में निराहार रहकर ‘रोजे’ रखते थे। रोजे मुसलमानों के प्रमुख त्यौहार थे। इस दौरान वे पानी की एक बूंद भी नहीं पीते थे। रमज़ान महीने का आखरी जुमा (शुक्रवार) जुमातुल विदा के रूप में मानाया जाता था। ईद-उल-फितर तथा ईद-उल-जुहा मुसलमानों के महत्त्वपूर्ण त्यौहार थे। ईद-उल-फितर रमजान के महीने के अंत में आता था। ईद की घोषणा तोप दाग कर तथा बिगुल बजाकर की जाती थी।
ईद के दिन तथा उसके अगले दिन मुसलमान अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों के गले लगकर उन्हें मुबारक देते थे। इस अवसर पर घरों में मिठाइयां बनाकर गरीबों में बांटी जाती थी एवं घर पर ईद की बधाई देने के लिए आने वालों को परोसी जाती थीं। अपने रिश्तेदारों एवं मित्रों के घर भी मिठाइयाँ भेजी जाती थीं। परिवार के बड़े सदस्य अपने से छोटों को ‘ईदी’ (कुछ रुपये एवं उपहार) दिया करते थे।
फिरोज तुगलक इस अवसर पर अपने दरबारियों, कर्मचारियों तथा गुलामों को कपड़े एवं मिठाई देता था। सुल्तन हाथी-घोड़ों के जुलूस के साथ मस्जिद में नमाज पढ़ने जाता था। सिकन्दर लोदी ने इस अवसर पर कुछ कैदियों को जेल से रिहा करने की प्रथा शुरू की थी। जहाँगीर और शाहजंहा ने ईद के दिन जरूरतमंदों और गरीबों में बांटने के लिए खैरात की बड़ी राशि निश्चित की थी। औरंगजेब भी इस पर्व को धूमधाम से मनाता था।
हिजरी कलैण्डर के शव्वाल मास की पह्ली तारीख को ईद उल-फ़ित्र मनाई जाती थी। हिजरी कलैण्डर के बारहवें महीने ‘जई-उल-हज्जा’ के दसवें दिन ईद-उल-अज़हा या बकरा ईद मनाई जाती थी। इसकी तैयारियां कई दिन पहले से होती थीं। बादशाह जुलूस एवं लाव-लश्कर के साथ ईदगाह जाकर ईद की नमाज पढ़ता था।
इसके बाद बादशाह की उपस्थिति में ऊँट की बलि दी जाती थी। तुर्की सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक और मुगल बादशाह जाहंगीर अपनी तलवार से बकरे की बलि किया करते थे। सम्पन्न लोग भी अपने घरों में बकरे या भेड़ की बलि देते थे। घरों में मिठाइयां, पूडियां आदि तैयार करते थे तथा अपने पूर्वजों के नाम का फातिहा पढ़ते थे।
समकालीन ग्रंथों से पता चलता है कि मध्य-कालीन मुस्लिम समाज में बड़ा-वफात’, आखिर-चहर और शंबा नामक पर्व भी प्रचलित थे। इन के अलावा योम अल जुमा अर्थात् प्रत्येक साधारण शुक्रवार भी ईद उल मोमिनीन अर्थात् इस्लाम के विश्वासियों का पर्व कह्लाता है। मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल में नौरोज, मीना बाजार और आबे-पशम भी मनाए जाने लगे थे।
अकबर के काल में नौरोज के अवसर पर किए जाने वाले आयोजन मुसलमानों के प्रमुख त्यौहार बन गए थे। ‘नौरोज’ फारसी वर्ष के पहले महीने ‘फरवारदीस’ के प्रथम दिवस को (20 या 21 मार्च) को मनाया जाता था। इस समारोह को मुख्यतः उच्च वर्गीय मुसलमान और अमीर मनाते थे। इसका समारोह उन्नीस दिनों तक चलता था। यही समय भारत में बंसत के जाने का और गर्मी के आने का होता था। इस पर्व की तैयारियां महीने पहले शुरू हो जाती थीं।
शाही राजधानी में बाजार, दीवान-ए-खास और दीवान-ए-आम जैसे स्थानों को किनखाब, मखमल, जरी के सुनहले कपड़ों से सजाया जाता था। मुख्य समारोह का आयोजन दीवान-ए-आम में होता था जहाँ बड़ी वैभवपूर्ण सजावट की जाती थी। अमीर लोग भी अपने महलों को सजाते थे। साधारण-जन अपने मकानों की सफाई करके बंदनवार आदि लटकाते थे।
बहुत से स्थानों पर नौरोज का मेला लगता था। इस त्यौहार पर जुआ खेलने पर से प्रतिबंध हट जाता था। सप्ताह में एक दिन समस्त प्रजा के लिए बादशाह का दरबार खोल दिया जाता था। मुगल बादशाहों ने ऐसे अवसर पर ‘निसार’ के नाम से नए सिक्के चलाने की प्रथा प्रारम्भ की जो उस अवसर पर गरीबों को बांटने तथा लोगों को नजराने के लिए काम आते थे। राज्याभिषेक के अवसर पर भी ऐसे सिक्के चलाये जाते थे।
इन उन्नीस दिनों में शराब भी खूब पी जाती थी और चारों ओर आनन्द एवं उत्साह रहता था। फारस के कई गायक, वादक और नर्तक बादशाह के दरबार में पहुँचते थे। बादशाह का चंदोबा बीच में लगाया जाता था जो हीरे-मोती और कीमती जवाहरात से सुसज्जित होता था। इसके चारों ओर अमीरों के चंदोबे होते थे। बादशाह तथा उसके अमीर एक दूसरे को मूल्यवान भेंट देते थे।
बादशाह का जन्मदिन भी बड़े उत्साह और आनन्द से मनाया जाता था। अकबर ने यह प्रथा प्रारम्भ की कि उसका जन्मदिन सूर्य-वर्ष और चन्द्र-वर्ष दोनों के अनुसार मनाया जाए। इस दिन नौरोज की तरह ही शाही महल और दरबार को सजाया जाता था। हाथी-घोड़ों को सजाकर बादशाह के समक्ष पेश किया जाता था। बादशाह अपने दरबारियों को साथ लेकर अपनी माता से आशीर्वाद लेने जाता था।
हुमायूँ ने इस अवसर पर बादशाह को मूल्यवान धातुओं तथा उपयोगी वस्तुओं से तौलने की प्रथा आरम्भ की। अकबर यह रस्म वर्ष में दो बार- सूर्य वर्ष तथा चन्द्र वर्ष के अनुसार करता था। यह प्रथा जहाँगीर तक तथा कुछ परिवर्तनों के साथ शाहजहाँ के समय तक चलती रही किन्तु औरंगजेब ने वर्ष में एक बार तौले जाने की पुरानी पद्धति अपनाई तथा 51 वर्ष की उम्र में इस प्रथा को समाप्त कर दिया।
औरंगजेब ने यह प्रथा अपने पुत्रों के लिए बीमारी के उपरान्त स्वस्थ होने पर, इस शर्त पर कायम रखी कि इसमें प्राप्त धन और वस्तुएं गरीबों में बांट दी जाएं। तौलने की रस्म शहजादे के दो वर्ष के होने पर शुरू होती थी, जबकि उसे केवल एक वस्तु से तौला जाता था। फिर वस्तुओं की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ाई जाती थी, जो धीरे-धीरे सात-आठ तक पहुँच जाती थी किन्तु किसी भी स्थिति में यह बारह से अधिक नहीं होती थी।
ये वस्तुएं बाद में फकीरों तथा जरूरतमंद लोगों को बांट दी जाती थीं। इस समारोह के बाद बादशाह तख्त पर बैठकर लोगों से उपहार ग्रहण करता था। बादशाह इस अवसर पर कुछ लोगों के लिए मनसबदारी घोषित करता था तथा कुछ लोगों को महंगे उपहार तथा जागीरें देता था।
मीना बाजार की शुरूआत सर्वप्रथम हुमांयू ने की थी। अकबर इन दिनों को ‘खुशरोज’ कहता था। शाहजहाँ प्रत्येक समारोह के बाद इस प्रकार का बाजार लगवाया करता था, नौरोज के बाद इस बाजार का लगना अनिवार्य हो गया था। अकबर के समय इस बाजार की सबसे अधिक उन्नति हुई। पहले माह बाजार बादशाह के महल के अन्दर नावों पर लगाया जाता था किंतु बाद में हरम की बारादरी में लगने लगा।
इसमें अमीरों की स्त्रियां और पुत्रियां दुकानें लगाकर बैठती थीं। राजपूत स्त्रियां भी इसमें भाग लेती थीं। अधिकांश दुकानें बहुमूल्य कपड़ों और जेवरातों की होती थीं। बादशाह शहजादियों तथा हरम की बेगमों के साथ बाजार में आता था और दुकानों से दुगने-तिगुने दाम देकर सौदा खरीद लेता था। बादशाह जिस स्त्री से प्रसन्न हो जाता, उससे अधिक वस्तुएं खरीदकर आवश्यकता से अधिक धन प्रदान कर देता था।
शाहजहाँ ने मुमताज महल को पहली बार मीना बाजार में ही देखा और पसंद किया था। औरतों के इस बाजार के बाद मर्दों का बाजार लगता था, जहाँ संसार के कई देशों के व्यापारी सामान बेचने आते थे।
वर्षा के आरम्भ में मुगल दरबार में होली की तरह एक पर्व मनाया जाता था। जहाँगीर इस पर्व को ‘आब-ए-पशम’ कहता था किन्तु इतिहासकार लाहोरी ने ‘पडशनामा’ में इसे ‘ईद-ए-गुलाबी’ कहा है। इस अवसर पर शाहजादे, प्रमुख अमीर एवं दरबारी एक-दूसरे पर गुलाब-जल छिड़कते थे। बादशाह को भेंट तथा उपहार प्रदान किए जाते थे।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मध्ययुगीन भारतीय समाज में हिन्दू और मुसलमान अपने-अपने त्यौहार मनाते थे। मुस्लिम बादशाहों ने कुछ हिन्दू त्यौहारों को अपना लिया था तथा हिन्दू भी मुसलमानों के प्रमुख त्यौहार में भाग लेते थे।
भारतीय कला चाहे वह शिल्पकला हो, मूर्तिकला हो, चित्रकला हो, संगीत कला हो या फिर और किसी भी प्रकार की कला हो, वह अपने माधुर्य, लावण्य एवं कला के चरमोत्कर्ष के लिए जानी जाती है।
ई. बी. हावेल ने लिखा है- किसी भी राष्ट्रीय कला का वास्तविक मूल्यांकन करते समय हमें यह विचार नहीं करना चाहिए कि उस कला ने क्या उधार लिया है अपितु यह देखना चाहिए कि उसने क्या दिया है। इस प्रकाश में देखने पर भारतीय कला को यूरोप या एशिया में महान स्कूलों में भी महानतम स्थान पर रखना चाहिए।
आर्यों के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद (ई.पू.4000 से ई.पू.1000) में कला शब्द का प्रयोग हुआ है- ‘यथा कला, यथा शफ, मध, शृण स नियामति।’ भरतमुनि (ई.पू.400 से ई.100 के बीच किसी समय) ने अपने ग्रंथ नाट्यशास्त्र में भी कला शब्द का प्रयोग किया है- ‘न तज्जानं न तच्छिल्पं न वाधि न सा कला।’ अर्थात् ऐसा कोई ज्ञान नहीं, जिसमें कोई शिल्प नहीं, कोई विधा नहीं या जो कला न हो।
भरतमुनि द्वारा प्रयुक्त ‘कला’ का आशय ‘ललित कला’ से लगाया जाता है और ‘शिल्प’ का आशय सम्भवतः किसी उपयोगी कला से। सामान्यतः कला उन क्रियाओं को कहते हैं जिन्हें करने के लिए थोड़ी चतुराई अथवा कौशल की आवश्यकता होती है। भारतीय कला-चिंतन में मन की सात्विक प्रवृत्तियों को उजागर करने पर बल दिया गया है।
कला के उद्देश्य
‘कला’ सृजन के अनेक उद्देश्य होते हैं। कला में आत्म-चैतन्य की प्रधानता होती है। कला का विचार भौतिक स्वरूप में प्रकट होता है किन्तु उसका उद्देश्य वस्तु के भौतिक स्वरूप को दर्शाना मात्र नहीं होता अपितु उसके आन्तरिक लक्षणों को भी दर्शाना होता है जिसमें कलाकार के अन्तर्मन की प्रतिच्छाया देखी जा सकती है। ‘कला’ मनुष्य को स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाती है।
भारतीय कलाकारों का मुख्य उद्देश्य स्थूल में सूक्ष्म की चेतना को जागृत करना रहा है। कला-सृजन के द्वारा मन और आत्मा का सौन्दर्य से साक्षात्कार होता है तथा आत्मा को शांति का अनुभव होता है। कला के माध्यम से रूप और सौन्दर्य का सृजन होता है। कला ‘अव्यक्त’ को ‘व्यक्त’ और ‘अमूर्त’ को मूर्त रूप प्रदान करती है।
भारतीय दृष्टिकोण से कला ‘रसानुभूति’ के लिए किया गया ‘सृजन’ है। कला मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है। दार्शनिकों के अनुसार ‘कला ही जीवन है।’ वास्तव में कला जीवन जीने का ढंग है। कला के द्वारा मनुष्य जीवन को पूर्णता प्राप्त होती है। कला मनुष्य की चेतना को स्पर्श करती है।
कला की परिभाषाएँ
‘कला’ वह मानवीय क्रिया है, जिसमें मानव की प्रकृति, रूप और भाव सम्मिलित रहते हैं। पाश्चात्य चिंतन में ‘कला’ शब्द का प्रयोग शारीरिक या मानसिक कौशल के लिए होता है। कौशलविहीन या बेढंग से किये गये कार्यों को कला नहीं माना जाता। आधुनिक काल में ‘कला’ की अनेक परिभाषाएं दी गई हैं जिनमें से कुछ के अनुसार ‘कला’ मानवीय भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति है।
‘कला’ कल्याण की जननी है। कल्पना की सौन्दर्यात्मक अभिव्यक्ति का नाम ही ‘कला’ है। कल्पना की अभिव्यक्ति भिन्न-भिन्न प्रकार से एवम् भिन्न-भिन्न माध्यमों से हो सकती है। कला का उद्गम सौन्दर्य की प्रेरणा से हुआ है। अतः ललित का आकलन ही कला है। प्रत्येक प्रकार की कलात्मक प्रक्रिया का लक्ष्य सौन्दर्य की अभिव्यक्ति है।
महाकवि कालीदास (गुप्तकालीन) ने ‘रघुवंश’ में ‘ललिते कला विधौ’ का उल्लेख इसी प्रसंग में किया है। भगवतशरण उपाध्याय के अनुसार, ‘अभिराम अंकन चाहे वह वाग्विलास के क्षेत्र में हों, चाहे राग-रेखाओं में, चाहे वास्तु-शिल्प में, वह कला ही है।’ जयशंकर प्रसाद के अनुसार- ‘ईश्वर की कर्त्तव्य-शक्ति का मानव द्वारा शारीरिक तथा मानसिक कौशलपूर्ण निर्माण कला है।’
कला और विज्ञान में अंतर
कला और विज्ञान में बहुत अंतर है। विज्ञान में ज्ञान का प्राधान्य है, कला में कौशल और कल्पना का। विज्ञान में प्रामाणिकता का निर्णय सूंघकर, चखकर, देखकर, नापकर, तौलकर तथा प्रयोगशाला में परख कर किया जाता है जबकि कला को प्रामाणिकता की आवश्यकता नहीं होती, उसका निर्णय मनुष्य की रसानुभूति करती है। विज्ञान की कृति हर काल, देश एवं परिस्थिति में एक जैसा परिणाम एवं प्रभाव उत्पन्न करती है जबकि ‘कला’ की रसानुभूति देश, काल एवं पात्र के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
कला और प्रकृति में अंतर
‘कला’ का कार्य ‘प्रकृति’ के कार्य से भिन्न है। कला का अर्थ है- रचना करना अर्थात् उसमें कृत्रिमता है जबकि प्रकृति में कृत्रिमता नहीं होती। कला उस प्रत्येक कार्य में है जो मनुष्य करता है जबकि प्रकृति स्वतः-स्फूर्त रचना है। कला को प्रकृति से प्रेरणा प्राप्त होती है। कला को कौशल की आवश्यकता होती है जबकि प्रकृति को किसी कौशल की आवश्यकता नहीं होती। कला में कल्पना होती है जबकि प्रकृति कल्पना से भी विचित्र होती है।
कला के प्रकार
वात्स्यायन के ग्रंथ कामसूत्र, उशनस् के ग्रंथ शुक्रनीति, जैन ग्रंथ प्रबंधकोश, कलाविलास तथा ललितविस्तर आदि ग्रंथों में कला एवं उसके प्रकारों की चर्चा हुई है। अधिकतर ग्रंथों में कलाओं की संख्या 64 दी गई है। प्रबंधकोश आदि कुछ ग्रंथों में 72 कलाओं की सूची मिलती है। ललितविस्तर में 86 कलाओं के नाम गिनाये गये हैं।
प्रसिद्ध कश्मीरी पंडित क्षेमेंद्र ने अपने ग्रंथ कलाविलास में सर्वाधिक संख्या में कलाओं का वर्णन किया है। उसमें 64 जनोपयोगी, 32 धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष सम्बन्धी, 32 मात्सर्य-शील-प्रभावमान सम्बन्धी, 64 स्वच्छकारिता सम्बन्धी, 64 वेश्याओं सम्बन्धी, 10 भेषज सम्बन्धी, 16 कायस्थ सम्बन्धी कलाओं तथा 100 सार-कलाओं की चर्चा की गई है। सबसे अधिक प्रामाणिक सूची कामसूत्र की है।
कलाओं का वर्गीकरण
भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ में कलाओं का वर्गीकरण ‘गौण’ एवं ‘मुख्य’ कलाओं के रूप में किया गया है। यही कलाएं आगे चलकर ‘कारू’ और ‘चारू’ कलाएँ कहलाईं जिन्हें ‘आश्रित’ और ‘स्वतंत्र’ कलाएं भी कहा जा सकता है। विद्वानों ने काव्य, संगीत, चित्र-शिल्प, नृत्य-नाट्य और वास्तु आदि में तादात्म्य स्थापित करते हुए, इन्हें कला में सम्मिलित किया है।
ये सभी ललित कलाएँ स्वतंत्र रूप में पहचानी जाती हैं। आधुनिक काल में कला को मानविकी विषय के अन्तर्गत रखा जाता है जिसमें इतिहास, साहित्य, दर्शन और भाषा-विज्ञान आदि भी आते हैं। पाश्चात्य संस्कृति में कला के दो भेद किये गए हैं-
(1.) उपयोगी कलाएँ (Practice Arts) तथा
(2.) ललित कलाएँ (Fine Arts½)
परम्परागत रूप से लोकप्रिय कलाओं के मुख्य प्रकार इस प्रकार हैं-
(1.) स्थापत्य कला (Architecture),
(2.) मूर्त्तिकला (Sculpture),
(3.) चित्रकला (Painting),
(4.) संगीत (Music),
(5.) काव्य (Poetry),
(6.) नृत्य (Dance),
(7.) रंगमंच (Theater and Cinema)
आधुनिक काल में फोटोग्राफी, चलचित्रण, विज्ञापन और कॉमिक्स के साथ-साथ अन्य विषय भी कला के प्रकारों में जुड़ गये हैं। आधुनिक काल की कलाओं को निम्नलिखित प्रकार से श्रेणीकृत कर सकते हैं-
कुछ कलाओं में दृश्य और निष्पादन दोनों के तत्त्व मिश्रित होते हैं, जैसे फिल्म।
भारतीय कला के प्राचीनतम साक्ष्य
भारतीय कला के प्राचीनतम साक्ष्य सैन्धव सभ्यता (ई.पू.3500 से ई.पू.1500 के बीच) की खुदाई में उपलब्ध सामग्री से प्राप्त हुए हैं। सैंधव सभ्यता में नगर-निर्माण कला, भवन निर्माण कला, कूप निर्माण कला, मूर्तिकला, नृत्य कला, संगीत कला, धातुकला, वस्त्र निर्माण कला, मिट्टी के बर्तन निर्माण कला, मुद्रा निर्माण कला आदि विविध कलाओं के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
इस सभ्यता से मंदिर निर्माण कला के साक्ष्य प्राप्त नहीं हुए हैं। सैंधव सभ्यता के बाद विविध कलाओं के साक्ष्य मौर्य काल (ई.पू.322 से ई.पू.184) में मिलते हैं तथा इसके बाद भारतीय कलाओं के साक्ष्य निरंतर मिलते हैं।
ई. बी. हावेल ने भारतीय मूर्ति कलाकी प्रशंसा करते हुए लिखा है कि सर्वोत्तम भारतीय मूर्ति सर्वोत्तम यूनानी मूर्ति की अपेक्षा अनुभूति के गहनतर स्वर और उत्कृष्ट मनोभावों को स्पर्श करती है।
सिन्धु सभ्यता कालीनभारतीय मूर्ति कला
सैन्धव सभ्यता अथवा हड़प्पा सभ्यता के काल से ही आग में पकी हुई मिट्टी की मूर्तियाँ, चूड़ियाँ, बर्तन, खिलौने एवं मुहरें बड़ी संख्या में मिलने लगती हैं। पूजा में प्रयुक्त होने वाले लिंग, योनियाँ, बड़े कूबड़ एवं विशाल सींगों वाले बैलों के अंकन वाली मुहरें, योगी एवं योगिनी के अंकनों से युक्त मुहरें प्राप्त हुई हैं जिनसे उस काल के केशविन्यास, मुद्राएं, बाट, खिलौने, नृत्य, संगीत आदि विभिन्न कलाओं की जानकारी मिलती है।
ये मृण्मूर्तियाँ सैंधव संस्कृति को अन्य पूर्ववर्ती अथवा समकालीन सभ्यताओं से पूरी तरह अलग करती हैं। इन मूर्तियों से ज्ञात होता है कि सिंधु सभ्यता के निवासियों ने लेखन कला, मूर्तिकला, चित्रकला, नृत्यकला एवं संगीतकला आदि विविध कलाओं का विकास कर लिया था।
सिंधु सभ्यता की लिपि को अभी तक ठीक से नहीं पढ़ा जा सका है किंतु उस काल की मूर्तियों, मुद्राओं, लिंगों, योनियों, आभूषणों, बर्तनों एवं भवनावशेषों से उस काल की सभ्यता पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। इन मुद्राओं पर परमपुरुष, परमनारी एवं प्रजनन देवी की आकृतियां अंकित हैं। बहुत सी मूर्तियों के दोनों ओर दो प्याले अथवा दीपक प्रदर्शित हैं और इन मूर्तियों के अग्रभाग पर धूम्र के निशान भी मिले हैं।
मौर्य कालीन भारतीय मूर्ति कला
पाटलिपुत्र, मथुरा, विदिशा तथा अन्य कई क्षेत्रों से मौर्यकालीन पत्थर की मूर्तियाँ मिली हैं। इन पर मौर्य काल की विशिष्ट चमकदार पॉलिश मिलती है। इन मूर्तियों में यक्ष-यक्षिणियों की मूर्तियाँ सर्वाधिक सजीव एवं सुंदर हैं। इन्हें मौर्यकालीन लोककला का प्रतीक माना जाता है। इनमें सबसे प्रसिद्ध दीदारगंज (पटना) से प्राप्त चामरग्राहिणी यक्षी की मूर्ति है जो पौने सात फुट ऊँची है।
यक्षी का मुखमण्डल अत्यंत सुंदर है। अंग-प्रत्यंग में समुचित भराव कला की सूक्ष्म छटा है। मथुरा के परखम गांव से प्राप्त यक्ष-मूर्ति भी 8 फुट 8 इंच की है। इसके कटाव में सादगी है तथा अलंकरण कम है। बेसनगर की स्त्री मूर्ति भी इस काल की मूर्तियों में विशिष्ट स्थान रखती है। अशोक के स्तम्भ शीर्षों पर बनी हुई विभिन्न पशुओं की मूर्तियाँ उस काल की सर्वश्रेष्ठ मूर्तियाँ हैं।
पटना, अहिच्छत्र, मथुरा, कौशाम्बी आदि में मिले भग्नावशेषों से बड़ी संख्या में मौर्यकालीन मृण्मूर्तियाँ प्राप्त की गई हैं। ये कला की दृष्टि से सुंदर हैं तथा मौर्य काल के परिधान, वेशभूषा एवं आभूषणों की जानकारी देती हैं। बुलंदीबाग (पटना) से प्राप्त मौर्य कालीन नर्तकी की मृण्मूर्ति विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
भारतीय मूर्ति कला पर विदेशी प्रभाव
मौर्य साम्राज्य के बिखर जाने के बाद भारत में यूनानी, शक, कुषाण, हूण पह्लव एवं सीथियन आदि जातियाँ प्रवेश कर गईं। इन्होंने भारत के विभिन्न भागों में छोटे-छोटे राज्य स्थापित कर लिए थे। इस कारण भारतीय कला पर विदेशी कला, विशेषकर गान्धार-शैली का बहुत प्रभाव हो गया।
कनिष्क कालीन मूर्तिकला
रॉलिसन ने लिखा है- ‘भारतीय संस्कृति के इतिहास में कुषाण काल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण युग है।’ कनिष्क के काल में मूर्तिकला की खूब उन्नति हुई। मथुरा में इस काल की कई मूर्तियाँ मिली हैं। कनिष्क काल की मथुरा शैली की मूर्तियाँ सरलता से पहचानी जाती हैं क्योंकि इनके निर्माण में लाल पत्थर का प्रयोग हुआ है जो मथुरा के निकट ‘सीकरी’ से प्राप्त होता था।
मथुरा शैली की मूर्तियाँ आकार में विशालाकाय हैं। इन मूर्तियों पर मूंछें नहीं हैं। बालों और मूछों से रहित मूर्तियों के निर्माण की परम्परा विशुद्ध रूप से भारतीय है। मथुरा की कुषाणकालीन मूर्तियों के दाहिने कंधे पर वस्त्र नहीं रहता। दाहिना हाथ अभय की मुद्रा में उठा हुआ होता है। मथुरा शैली की कुषाण कालीन मूर्तियों में बुद्ध सिंहासन पर बैठे हुए दिखाये गये हैं।
कनिष्क काल में मूर्तिकला की गान्धार-शैली की भी बड़ी उन्नति हुई। कनिष्क तथा उसके उत्तराधिकारियों ने जो बौद्ध-मूर्तियाँ बनवाईं, उनमें से अधिकांश मूर्तियां, पाकिस्तान के गान्धार जिले में मिली हैं। इसी से इस कला का नाम गान्धार-कला रखा गया है। गान्धार-कला की बहुत सी प्रतिमाएँ मुद्राओं पर भी उत्कीर्ण मिलती हैं।
गान्धार-कला को इण्डो-हेलेनिक कला अथवा इण्डो-ग्रीक कला भी कहा जाता है, क्योंकि इस पर यूनानी कला की छाप है। बुद्ध की मूर्तियों में यवन देवताओं की आकृतियों का अनुसरण किया गया है। इस कला को ग्रीक बुद्धिष्ट शैली भी कहा जाता है। इस शैली की मूर्तियों में बुद्ध कमलासन मुद्रा में मिलते हैं किंतु मुखमण्डल और वस्त्रों से बुद्ध, यूनानी राजाओं की तरह लगते हैं। बुद्ध की ये मूर्तियाँ यूनानी-देवता अपोलो की मूर्तियों से काफी साम्य रखती हैं। इनमें बुद्ध को यूरोपियन वेश-भूषा तथा रत्नाभूषणों से युक्त दिखाया गया है।
गुप्तकालीन भारतीय मूर्ति कला
गुप्त-काल में शिल्प-कला की बड़ी उन्नति हुई। गुप्तकाल की मूर्तिकला शैली को कनिष्ककालीन मथुरा शैली का ही विकसित रूप माना जाता है। गुप्त कालीन शिल्प-कला के सम्बन्ध में डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी ने लिखा है- ‘गुप्त काल के शिल्पकारों की कृतियों की यह विशेषता है कि उनमें ओज, अंसयम का अभाव तथा शैली का सौष्ठव पाया जाता है।’
गुप्त काल की शिल्पकला तथा चित्रकला के सम्बन्ध में डॉ. नीलकान्त शास्त्री ने लिखा है- ‘शिल्प कला तथा चित्रकला के क्षेत्र में गुप्त कालीन कला भारतीय प्रतिभा में चूड़ान्त विकास की प्रतीक है और इसका प्रभाव सम्पूर्ण एशिया पर दीप्तिमान है।’
डॉ. रमेशचन्द्र मजूमदार ने गुप्त कालीन शिल्प की विशेषता पर प्रकाश डालते हुए लिखा है- ‘सामान्यतः उच्चकोटि का आदर्श और माधुर्य तथा सौन्दर्य की उच्चकोटि की विकसित भावना गुप्त काल की शिल्प कला की विशेषता है।’
अपने पूर्ववर्ती युगों की अपेक्षा गुप्त काल में मूर्ति-पूजा का प्रचलन बहुत बढ़ गया था। इसलिये इस काल में देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बड़ी संख्या में बनाई गईं। इस काल की मूर्तिकला की कई विशेषताएँ हैं-
(1.) इस काल की मूर्तियाँ बहुत सुन्दर हैं।
(2.) वे विदेशी प्रभाव से मुक्त हैं और विशुद्ध भारतीय हैं।
(3.) इनमें नैतिकता पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया है।
(4.) इस काल में नग्न मूर्तियों का निर्माण बन्द हो गया और उन्हें झीने वस्त्र पहनाए गए।
(5.) ये बड़ी ही सरल हैं। इन्हें अत्यधिक अलंकृत करने का प्रयत्न नहीं किया गया।
(6.) गुप्तकाल की स्त्री प्रतिमाएं अधिक मांसल हैं तथा उनमें स्थूल स्तनों का अंकन प्रमुखता से किया गया है।
इस काल की सारनाथ की बौद्ध प्रतिमा बड़ी सुन्दर तथा सजीव है। मथुरा से प्राप्त भगवान विष्णु की मूर्ति गुप्तकाल की कला का श्रेष्ठ उदाहरण है। गुप्तकाल में बनारस, पाटलिपुत्र एवं मथुरा मूर्तिकला के प्रसिद्ध केन्द्र थे।
हर्षकालीन मूर्ति कला
हर्ष के शासनकाल में प्रशासनिक कौशल के साथ-साथ कला और साहित्य की भी बड़ी उन्नति हुई। हर्ष स्वयं कला और साहित्य का अनुरागी था। इस काल में भारत में बड़ी संख्या में हिन्दू, बौद्ध तथा जैन धर्मों के मंदिर, चैत्य तथा संघाराम बने। मंदिरों के निर्माण के कारण मूर्तिकला का भी पर्याप्त विकास हुआ। बौद्धों ने बुद्ध की तथा हिन्दुओं ने शिव तथा विष्णु आदि देवताओं की सुंदर मूर्तियों का निर्माण किया। इस काल की मूर्तिकला में भारशिव शैली तथा मथुरा शैली का सम्मिलन हो गया तथा गोल मुख के स्थान पर लम्बे चेहरे बनाये जाने लगे। अजन्ता की गुफा संख्या 1 एवं 2 की मूर्तियाँ इसी काल की हैं।
सल्तनत कालीन मूर्ति कला
मुसलमानों के भारत आने से पहले भारत में मूर्तिकला अत्यन्त ही उन्नत अवस्था में थी किन्तु मुस्लिम आक्रान्ता मूर्तियों को तोड़ना इस्लाम धर्म की सेवा तथा धार्मिक कर्त्तव्य मानते थे। अतः उन्होंने भारतीय मूर्तिकला पर घातक प्रहार किया। मुहम्मद गौरी एवं कुतुबुद्दीन ऐबक के आक्रमण में दिल्ली, आगरा, अजमेर आदि में स्थित लगभग समस्त प्राचीन धार्मिक स्थलों की मूर्तियों को नष्ट कर दिया गया।
बहुत से मंदिरों ने अपने मंदिर के बाहर इस्लामिक चिह्न अंकित किये ताकि मुस्लिम आक्रांता उन्हें पूरी तरह नष्ट न कर सकें। फिर भी इन मंदिरों की मूर्तियों को पूर्णतः अथवा अंशतः विक्षत कर दिया गया। सल्तनत काल में मंदिर एवं मूर्तियों के निर्माण पर पूरी तरह रोक लगा दी गई इसलिये उत्तर भारत में मूर्तिकला का विकास ठप्प हो गया। दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य सहित उन अन्य राज्यों में मंदिरों एवं मूर्तियों का निर्माण होता रहा जहाँ हिन्दू शासक राज्य कर रहे थे।
मुगल कालीन मूर्तिकला
मुगलों के काल में भी भारत की मूर्तिकला का निरंतर ह्रास होता रहा। बाबर और हुमायॅूँ भी कट्टर मुसलमान शासक थे और मूर्ति बनाना पाप समझते थे। उन्होंने अनेक मंदिरों एवं उनकी मूर्तियों को ध्वस्त कर दिया। अकबर ने अपने उदार दृष्टिकोण के कारण मूर्तिकला को प्रोत्साहन दिया। जहाँगीर ने भी कुछ मूर्तियाँ बनवाईं किन्तु शाहजहाँ और औरंगजेब ने इसे कोई प्रोत्साहन नहीं दिया, जिससे मूर्तिकला पतनोन्मुख हो गई। औरंगजेब के शासन काल में मूर्तिकला को सर्वाधिक हानि हुई।
भारत के शैलचित्र कम से कम बीस हजार साल पुराने हैं। ये भारत के लगभग समस्त प्रांतों में स्थित पहाड़ियों की गुफाओं में मिलते है। भारत के शैलचित्र इस बात की गवाही देते हैं कि भारत की सभ्यता कितनी पुरानी है।
भारत के शैलचित्र के सबसे प्राचीन साक्ष्य आदिमकालीन गुफाओं से मिलते हैं। आदिम युगीन मानवों ने गुफाओं में गेरू, रामरज एवं खड़िया आदि से पशु, पक्षी, कीट-पतंग, छिपकली तथा मानव आकृतियों के साथ-साथ नृत्य, शिकार, कृषि, पशुपालन आदि दृश्यों का चित्रण किया है। ये भारत की चित्रकला के सबसे पुराने प्रमाण हैं।
ये चित्र भारत के विभिन्न प्रांतों में सैंकड़ों स्थानों पर मिले हैं। मध्यप्रदेश के विंध्याचल की पहाड़ियों में स्थित भीमबेटका शैलाश्रयों में एक प्यालेनुमा चित्र बना हुआ है जिसे एक लाख वर्ष पुराना माना जाता है। कुछ स्थानों पर पुरापाषाण काल, मध्यपाषाण काल एवं नवपाषाण काल के चित्र एक ही गुफा में साथ-साथ मिले हैं।
भारत के शैलचित्र
जम्मू-काश्मीर प्रान्त से प्राप्त शैलचित्र
श्रीनगर की मदानी मस्जिद में चट्टान के एक टुकड़े पर 5000 साल पुराने शैलचित्र मिले हैं जिनमें एक ओर तारे बने हुए हैं तथा दूसरे छोर पर ड्रैगन जैसा सिर है। इस स्थान का मूल भित्तिचित्र धुंधला पड़ चुका है किंतु उसकी एक प्रति कश्मीर विश्वविद्यालय में सहेजकर रखी गई है।
इस भित्तिचित्र में भारतीय खगोल की एक दुर्लभ घटना का चित्रांकन किया गया है तथा इसमें दो सूर्य एक साथ दिखाए गए हैं। इस भित्तिचित्र में दिखाई दे रहा दूसरा सूर्य वास्तव में एक सुपरनोवा है जो किसी पुराने तारे के टूटने से उत्पन्न हुई ऊर्जा होती है। भीषण विस्फोट के बाद यह कई दिनों तक चमकदार दिखाई देता है जो दूसरे सूर्य के समान लगता है। इस चित्र में तारों के साथ सूर्य दिखाने का आशय है कि यह सुपरनोवा तब भी चमक रहा था जब रात्रि में तारे चमक रहे थे।
उत्तर प्रदेश से प्राप्त शैलचित्र
To purchase this book please click on Image.
मिर्जापुर से 30 किलोमीटर दूर कैमूर की पहाड़ियों में सोन नदी की घाटी में एक सौ से अधिक चित्रित गुफाएं मिली हैं। एक पहाड़ी में पंखों से बनी पोषाक वाले मानव-चित्र मिले हैं जो खुरदरे पत्थर पर निर्मित हैं। मिर्जापुर क्षेत्र में विजयगढ़ के निकट घोड़मंगर में पूरक शैली में अंकित गैंडे के शिकार का चित्रांकन किया गया है। कोहवर, विजयगढ़, सौहरीरौप, सोरहोघाट, भल्डारिया, लिखुनियाँ, कंडाकोट, घोड़मंगर, खोडहवा आदि स्थानों से ई.पू.5000 के चित्र मिले हैं। मोहरापथरी, बागापथरी, सहवाइयापथरी, लकहटपथरी नामक पहाड़ियों में भी आदिमयुगीन शैलचित्र मौजूद हैं। सोरहोघाट क्षेत्र में साही के आखेट, हाथ के छापे, मानव आकृतियां एवं पशुचित्र मौजूद हैं। एक गुफा में गेरूए रंग से बना सूअर के आखेट का चित्र बहुत प्रसिद्ध है। इसमें सूअर का आधा खुला हुआ मुंह उसकी पीड़ा को व्यक्त करता है। लिखुनियां की पहाड़ियों में आदिमयुगीन नृत्य एवं वादन के सुंदर शैलचित्र बने हुए हैं। लम्बे भाले लिए हुए कुछ घुड़सवारों को एक हथिनी को पकड़ने का प्रयास करते हुए दर्शाया गया है। बांदा जिले के मानिकपुर में सरहाट, कर्परिया एवं करियाकुंड आदि स्थलों से मिले शैलचित्रों में तीन अश्वों का ओजपूर्ण अंकन किया गया है। एक सुसज्जित द्वार पर एक चोंचदार पुरुष बैठाया गया है जिससे अनुमान होता है कि यह कोई तंत्र-मंत्र शाला रही होगी।
करियाकुंड में बारहसिंगा का पीछा करते हुए धुनर्धरों को चित्रित किया गया है। मलवा में एक ऐसी गाड़ी चित्रित है जिसमें पहिए नहीं हैं। इसमें एक व्यक्ति बैठा हुआ है और उसके दोनों ओर दो अनुचर धनुष-बाण एवं दण्ड लिए खड़े हैं। एक अन्य चित्र में तीन दण्डधारी अश्वारोही अपने-अपने घोड़े की रास थामे हुए एक ही दिशा में पैदल चल रहे हैं। इससे अनुमान होता है कि यह शैलचित्र उस समय का है जब उत्तर-वैदिक आर्य मिर्जापुर की पहाड़ियों तक फैल गए थे तथा उनमें राजन्य व्यवस्था स्प्ष्ट हो गई थी और शक्तिशाली राजा अस्तित्व में आ चुके थे।
दक्षिण भारत से प्राप्त शैलचित्र
दक्षिण भारत के रायचूर, कुप्पगल्लू (बेलारी), वसनवगुडी (बैंगलोर), तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, छोटा नागपुर से प्रागैतिहासिक युग के शैल-चित्रों का पता चला है। कर्नाटक में रायचूर के निकट स्थित रामायण कालीन ऋष्यमूक पर्वत के निकट से प्राप्त चित्रों का समय ई.पू. 3000 माना जाता है। मद्रास के निकट पूर्व-प्रस्तर युग के कलापूर्ण शिलाखण्ड का पता लगा है।
महाराष्ट्र से प्राप्त शैलचित्र
महाराष्ट्र के नरसिंहगढ़ की गुफाओं के चित्रों में चितकबरे हरिणों की खालों को सूखता हुआ दिखाया गया है।
उड़ीसा से प्राप्त शैलचित्र
उड़ीसा से भी प्रागैतिहासिक युग के पाषाण चित्रों का पता चला है।
मध्यप्रदेश से प्राप्त शैलचित्र
मध्यप्रदेश के आदमगढ़, रायगढ़, चक्रधरपुर, होशंगाबाद, सिंघनपुर आदि स्थानों से बड़ी संख्या में चित्रित शैलाश्रय प्राप्त हुए हैं। चक्रधरपुर से प्राप्त गुफाचित्रों को ई.पू.3000 का माना जाता है। पंचमढ़ी के निकट 5 मील के घेरे में लगभग 50 गुफाओं में प्रागैतिहासिक शैल-चित्र मिले हैं। यहीं पर महादेव पर्वत के निकट इमली खोह में सांभर के आखेट का दृश्य, भाडादेव गुफा की छत पर शेर के आखेट का दृश्य और महादेव बाजार में विशालाकाय बकरी का चित्र प्राप्त हुआ है।
लश्करिया खोह, सोनभद्रा, जम्बूद्वीप, निम्बूभोज, बनिया बेरी, माड़ादेव, नाकिया और झलाई आदि स्थानों से भी शैल-चित्रों से युक्त शैलाश्रय प्राप्त हुए हैं। यहाँ से पशु तथा आखेट चित्रों के अतिरिक्त शस्त्र-युद्ध, नृत्य एवं वादन के चित्र मिले हैं, दैनिक जीवन के दृश्य भी अंकित हैं। यहाँ के शैलचित्रों को तीन श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है-
(1.) पहले स्तर में तख्तीनुमा एवं डमरूनुमा मानवाकृतियों को बनाया गया है जिनके शारीरिक गठन को लहरदार रेखाओं से दिखाया गया है। इनमें लाल (गेरू) एवं पीले रंग की बहुलता है।
(2.) दूसरे स्तर के चित्रों में आकृतियों का रूप-विन्यास बेडौल, ओजपूर्ण एवं असंतुलित है। इनमें केवल शिकारी का ही चित्रांकन किया गया है।
(3.) तीसरे स्तर में आकृतियां कुछ स्वाभाविक हैं। इनमें घरेलू जन-जीवन के चित्र हैं। आखेट के लिए प्रस्थान करते हुए, शहद एकत्रित करते हुए, घुड़सवार योद्धा, वाद्ययंत्रों को बजाते हुए वादक, शस्त्रधारी सैनिक आदि का अंकन किया गया है। इन चित्रों में आकृतियों को लाल रेखाओं से बनाकर उनमें काले एवं सफेद रंगों को भरा गया है।
सरगुजा रियासत के जोगीमारा से लाल-पीले रंगों से बने रेंगते हुए कीड़े, पशु-पक्षी, मनुष्य तथा असुर आकृतियों के चित्रण मिले हैं। ग्वालियर से 150 किलोमीटर दूर मुरैना जिले में पहाड़गढ़ के निकट असान नदी के तट पर एक घाटी में लगभग ई.पू.10,000 से लेकर ई.पू.100 तक के शैलचित्र मिले हैं। इनमें मनुष्यों, घोड़ों, हाथी पर सवार योद्धाओं, भालों, धनुषों एवं तीरों के चित्र मिले हैं।
मध्यप्रदेश के रायगढ़ के निकट बौतालदा की गुफाओं के शैलचित्रों में हिरण, छिपकली, जंगली भैंसों आदि का अंकन है। एक दृश्य में मानवों का एक समूह भैंसे का शिकार करने के लिए उसे घेर कर खड़ा है। कुछ चित्र पालतू पशुओं, युद्धरत मनुष्यों एवं नृत्यरत मनुष्यों के हैं। ये चित्र गेरू तथा रामरज जैसे भूरे रंगों से बने हैं।
विंध्याचल की पहाड़ियों में भीमबेटका नामक स्थान पर 200 से अधिक गुफाओं में पूर्व-पाषाण कालीन मानव द्वारा बनाए गए के शैल-चित्र प्राप्त हुए हैं। इन चित्रों की संख्या कई हजार है। इनका काल एक लाख वर्ष पूर्व तक माना जाता है। भीमबेटका की गुफाओं में हिरण, बारहसिंगा, सूअर, रीछ जंगली भैंसे, हाथी, घोड़े एवं अश्वारोहियों का अंकन किया गया है।
एक चित्र में मनुष्य जंगली भैंसे को घेरकर नृत्य करते दिखाए गए हैं जिसे ‘शिकार-नृत्य’ की संज्ञा दी गई है। कुछ गुफाओं में उस काल के चित्र भी मिले हैं जब मानव ने खेती करना सीख लिया था। इनमें आखेटक, कृषक एवं ग्वाले चित्रित किए गए हैं।
मंदसौर जिले में मोरी नामक स्थान पर मिली 30 गुफाओं से मिले चित्रों में सूर्य, चक्र, स्वास्तिक, सर्बतोभद्र, अष्टदल-कमल एवं पीपल की पत्तियों का अंकन मिला है जिनसे स्पष्ट है कि इन गुफाओं में धार्मिक अनुष्ठान किए गए होंगे तथा ये चित्र उस समय के हैं जब सभ्यता ने पर्याप्त विकास कर लिया था तथा उत्तर-वैदिक आर्यों की बस्तियां यहाँ तक पहुँच गई थीं। कुछ चित्र बांस से बनाई गई गाड़ियों, नृत्यरत मानवों एवं चरवाहों के हैं।
होशंगाबाद जिले में नर्मदा नदी से ढाई किलोमीटर दूर आदमगढ़ पहाड़ी पर एक दर्जन से अधिक शैलाश्रयों में जंगली भैंसे, घोड़े, शस्त्रधारी अश्वारोही, हाथी सवार मनुष्य, आदि का अंकन हुआ है। जिराफ का एक समूह एवं चार धनुर्धारी दिखाए गए हैं जिनका अंकन क्षेपन विधि से किया गया है। अर्थात् किसी लकड़ी की तख्ती पर आकृतियां काट कर उन्हें गुफा की दीवार से सटा कर ऊपर से रंग लगाया गया है जिससे दीवार पर वे आकृतियां अंकित हो गई हैं।
आदमगढ़ की एक गुफा में एक हाथी पर चढ़े हुए मनुष्यों को जंगली भैंसे का शिकार करते हुए दिखाया गया है। एक अन्य चित्र में गहरी पीली रखाओं से एक बारहसिंगे को छलांग लगाते हुए बनाया गया है। मध्यप्रदेश के रायसेन, रीवा, पन्ना, छतरपुर, कटनी, सागर, नरसिंहपुर, बस्तर, ग्वालियर एवं चम्बल घाटी में कई स्थानों से शैलचित्र मिले हैं। भोपाल क्षेत्र में धरमपुरी गुहा मंदिर, शिमलारिल, बरखेड़ा सांची, उदयगिरि आदि में भी आदिम चित्रकला प्राप्त हुई है। शिवपुरी के पास भी शैलचित्र मिले हैं।
मांठ नदी के किनारे सिंघनपुर नामक गांव से पचास चित्रित गुफाएं मिली हैं। एक गुफा के द्वार पर कंगारू जैसे किसी पशु का अंकन किया गया है। यहाँ से अश्व, हिरण, बारहसिंगा, जंगली भैंसा, सांड, सूंड उठाये हुए हाथी, खरगोश आदि के चित्र भी मिले हैं। एक गुफा की दीवार पर जंगली सांड को पकड़ने का दृश्य अंकित है। कुछ पशु हवा में उछाले गए हैं तो कुछ धरती पर गिरे पड़े हैं। इसी दीवार पर एक अन्य चित्र में घायल भैंसा बहुत सारे तीरों से बिंधा हुआ दिखाया गया है। उसके चारों ओर भाले लिए हुए शिकारियों का दल खड़ा है।
राजस्थान के शैलाश्रयों से प्राप्त चित्र
राजस्थान में शेखवाटी क्षेत्र के अजीतगढ़, डोकन, सोहनपुरा, गुढागौड़जी आदि स्थानों से शैलचित्र प्राप्त हुए हैं। रावतभाटा से 33 कलिोमीटर दूर दरा अभ्यारण्य में तिपटिया नामक स्थान पर प्रागैतिहासिक काल के शैल-चित्र मिले हैं। धरती से लगभग 500 फुट ऊँचा तीन मंजिल वाला शैलाश्रय है जिसकी दूसरी एवं तीसरी मंजिलें चित्रित हैं। उत्तरपाषाण कालीन मानवों द्वारा चित्रित इन शैल-चित्रों में बैल, गाय, हिरण, सूअर एवं काल्पनिक पशुओं के चित्रों का अंकन किया गया है।
इन चित्रों का रंग गहरा कत्थई तथा लाल है और ये रेखाओं के माध्यम से बनाए गए हैं। प्रागैतिहासिक काल के अनेक चित्रों के ऊपर ही ऐतिहासिक काल के चित्र भी बना दिए गए हैं। इस काल के चित्रों में देवी-देवता, योद्धा, घुड़सवार एवं ऊँट सवार प्रमुख हैं। ये पीले रंग तथा गेरू से बने हैं। इस काल के चित्रों में गौपालक द्वारा गायों को चराने, कहारों द्वारा वधू की डोली ले जाने एवं एक नृत्यांगना द्वारा नृत्य करने के दृश्य भी अंकित हैं जिनसे स्पष्ट है कि इस काल में मानव सभ्यता काफी आगे बढ़ चुकी थी।
आहू नदी के तट पर झालावाड़ जिले में आमझीरी नाला के निकट कई शैलाश्रय खोजे गए हैं जिनमें प्रस्तर युगीन मानवों द्वारा बनाई गई चित्रशाला देखी जा सकती है। इन चित्रों में बैल, हिरण, बकरी, बारहसिंघा, नीलगाय, चीता, मानव आकृतियां, धनुष-बाण, पशु-शिकार के दृश्य आदि अंकित हैं।
इस प्रकार हम देख सकते हैं कि भारत के शैलचित्र आदिम युग से लेकर ईसा पूर्व की कुछ शताब्दियों पूर्व तक के काल में बनाए गए। भारत के शैलचित्र पूरे भारत में छितराए हुए हैं जो आरम्भिक मानवों की गतिविधियों के प्रमाण हैं।
भारत की चित्रकला अत्यंत प्राचीन है। भारत के धर्मशास्त्रों तक में चित्रकला का उल्लेख मिलता है। इन उल्लेखों से मानव समाज पर चित्रकला के प्रभाव की जानकारी मिलती है।
कलाओं में चित्रकला सबसे ऊँची है जिसमें धर्म, अर्थ, काम एवम् मोक्ष की प्राप्ति होती है। अतः जिस घर में चित्रों की प्रतिष्ठा अधिक रहती है, वहाँ सदा मंगल की उपस्थिति मानी गई है। – विष्णुधर्मोत्तर पुराण।
सिन्धु सभ्यता की चित्रकला
सभ्य मानव द्वारा की गई भारत की चित्रकला के सर्वप्रथम साक्ष्य सैन्धव सभ्यता से प्राप्त हुए हैं। सिंधु स्थलों की खुदाई में प्राप्त अनेक मुद्राओं, बर्तनों एवं अन्य सामग्री पर सुंदर चित्र मिलते हैं। कुछ मुहरों पर पशु-पक्षी, वृक्ष, मानव, देवी-देवता आदि के चित्र मिले हैं। एक मुद्रा पर दो पशुओं के शीश पर पीपल की नौ पत्तियाँ अंकित हैं। एक अन्य मुद्रा पर एक नग्न स्त्री का चित्र है जिसके दोनों ओर एक-एक टहनी बनी है। उसके सामने पत्तियों का मुकुट पहने एक अन्य आकृति का चित्र है।
ये चित्र वनस्पतियों की देवी के प्रतीत होते हैं। उनकी बहुत सी मुद्राओं पर पीपल के विविध अंकन मिलते हैं। कहीं उसे वेदिका से उगता हुआ दिखाया गया है तो कहीं इसके भीतर देवता को अंकित किया गया है। अलग-अलग चित्रों में पीपल की टहनियों पर पत्तों की संख्या अलग-अलग रखी गई है। एक जगह इसकी पांच टहनियों पर सात पत्ते उपर की ओर, दो नीचे की ओर और एक बराबर में दिखाया गया है। कपड़ों और बर्तनों पर भी पीपल की टहनी और पत्तों के अनेक डिजाइन मिले हैं।
कुछ मुद्राओं पर बैल के चित्र मिले हैं। मोहेनजोदड़ो के एक ताम्रपत्र पर कूबड़दार बैल अंकित किया गया है। बैल की भांति भैंस और भैंसा के चित्र भी अनेक मुद्राओं पर मिले हैं। एक मुद्रा पर गाय की पूजा करते हुए एक मनुष्य का चित्र अंकित है। एक चबूतरे पर लेटे हुए नाग को दिखाया गया है। सिंधु सभ्यता से प्राप्त विभिन्न मुद्राओं पर हाथी, बाघ, भेड़, बकरी, गैंडा, हिरण, ऊँट, घड़ियाल, गिलहरी, तोता, मुर्गा, मोर आदि पक्षियों के चित्र भी मिले हैं। सम्भव है कि ये पशु-पक्षी विभिन्न देवी-देवताओं के वाहन रहे हों।
कुछ मुद्राओं पर मनुष्य को चीते से लड़ते हुए दिखाया गया है। इस चित्र में वृक्ष पर चढ़ा हुआ आदमी चीते को भगा रहा है तथा भागता हुआ चीता पीछे की ओर मुँह करके देख रहा है। इन मुद्राओं से अनुमान होता है कि उस काल में चीते बड़ी संख्या में पाए जाते थे और मानवों का उनसे निरंतर संघर्ष चल रहा था। सैन्धववासी, पशुओं की आकृति विचित्र ढंग से बनाते थे। कुछ पशु आधे मनुष्य और आधे पशु हैं।
आधा भेड़, आधा बकरा, आधा हाथी और आधा बैल या इसी प्रकार के अन्य मिश्रण से पशुओं की आकृति बनाते थे। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वे इनमें दैवीय अंश मानकर इनकी पूजा करते थे।
आर्य बस्तियों के प्राचीन चित्र
आर्य सभ्यता की वैदिक बस्तियों से मिले बर्तनों पर सफेद, काली एवं लाल रेखाओं के माध्यम से चित्रकारी की गई है। सभ्यता के विकास के साथ चित्रकला का भी विकास होता चला गया।
मौर्यकालीन चित्रकला
मौर्य काल में भारत की चित्रकला में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई। बौद्ध शैली के चित्रों की रचना इस काल में प्रारम्भ हो गई थी। उस काल की चित्रकला के पर्याप्त नमूने उपलब्ध नहीं हो सके हैं। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के मौर्यकालीन बौद्ध ग्रंथ विनय पिटक में राजप्रासादों में अंकित चित्रकला का उल्लेख हुआ है। ईसा पूर्व पहली शताब्दी के लगभग चित्रकला षडांग (चित्रकला के छः अंग) का विकास हुआ।
प्राचीन ग्रंथों में चित्रकला का उल्लेख
प्राचीन हिन्दू और बौद्ध साहित्य में कला के विभिन्न रूपों का उल्लेख हुआ है, यथा- लेप्यचित्र, आलेख्यचित्र और धूलिचित्र। पहली प्रकार की कला का सम्बन्ध भित्तिचित्रों से है। दूसरी प्रागैतिहासिक वस्त्रों पर बने रेखाचित्र और चित्रकला से सम्बद्ध है और तीसरे प्रकार की कला आंगन में बनाई जाती है।
पांचवी शताब्दी ईस्वी के मुद्राराक्षस नामक नाटक में चित्रों एवं चित्रपटों का उल्लेख है। छठी शताब्दी इस्वी के वात्स्यायन के ग्रंथ कामसूत्र में 64 कलाओं के अंतर्गत भारत की चित्रकला का भी उल्लेख हुआ है और कहा गया है कि यह कला वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित है। वात्स्यायन ने चित्रकला के छः अंगों का उल्लेख किया है। कामसूत्र के प्रथम अधिकरण के तीसरे अध्याय की टीका करते हुए यशोधर पंडित ने चित्रकला के छः अंग इस प्रकार बताये हैं-
रूपभेदाः प्रमाणनि भावलावण्ययोजनम्।
सादृश्यं वर्णिकाभंग इति चित्र षंड्गकम्।।
अर्थात्- (1.) रूपभेद, (2.) प्रमाण- सही नाप और संरचना आदि, (3.) भाव, (4.) लावण्य योजना, (5.) दृश्य विधान, (6.) वर्णिकाभंग।
सातवीं शताब्दी ईस्वी में मार्कण्डेय मुनि रचित विष्णुधर्मोत्तर पुराण के ‘चित्रसूत्र’ अध्याय में कला की विवेचना की गई है। इसमें चित्रकला को उच्च बताते हुए उसे धर्म, काम, अर्थ और मोक्ष देने वाली कला माना गया है। जहाँ इसकी प्रतिष्ठा की जाती है, वहाँ मंगल होता है-
कलानां प्रवरं चित्र, धर्म कामार्थ मोक्षदम्।
मांगल्यं प्रथमं चैतद्, गृहे यत्र प्रतिष्ठितम्।।
मार्कण्डेय मुनि द्वारा चित्रकला के छः अंग बताए गए हैं- (1.) आकृति की विभिन्नता, (2.) अनुपात, (3.) भाव, (4.) चमक, (5.) दृश्य विधान, (6.) रंगों का प्रभाव आदि।
भारत की चित्रकला की विभिन्न शैलियाँ
भारत में चित्रकला का प्रचलन देश के विभिन्न हिस्सों एवं इतिहास के समस्त कालखण्डों में विद्यमान रहा जिसके कारण अनेक शैलियाँ विकसित हो गईं। इनमें छः शैलियां मुख्य हैं- (1.) अजन्ता शैली, (2.) गुजरात शैली, (3.) मुगल शैली, (4.) राजपूत शैली, (5.) दकन शैली (6.) वर्तमान शैली।
अजन्ता चित्रकला शैली
अजन्ता की विश्व-विख्यात गुफाएं महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में सह्याद्रि पर्वतमाला में स्थित हैं। इन गुफाओं की संख्या 20 है। इनमें से गुफा संख्या 9, 10, 19 और 26 चैत्य हैं, शेष गुफाएं बौद्ध-भिक्षुओं के रहने के विहार हैं। गुफा संख्या 8, 12 और 13 प्राचीनतम हैं। 13वीं गुफा की दीवारों पर पॉलिश है और वह ई.पू. 200 के लगभग (मौर्यकाल) की हो सकती है। इन तीनों गुफाओं में चित्र नहीं हैं। 8वीं और 13वीं गुफाएं हीनयान सम्प्रदाय की हैं और ये सम्भवतः ई.पू.200 से ई.पू.150 के मध्य (शुंगकाल में) खोदी गई थीं।
छठी और सातवीं गुफाएं सम्भवतः ई.450-550 के बीच (गुप्तकाल में) खोदी गई थीं। कुछ गुफाएं इससे भी बाद की हैं। सबसे पहली गुफा सम्भवतः सबसे अन्त में खुदी। इन गुफाओं के चित्र भिन्न-भिन्न काल के हैं। इन गुफाओं के चित्र ईसा से प्रायः सौ वर्ष पहले से लेकर ईसा बाद सातवीं सदी इस्वी तक के है।
नवीं-दसवीं गुफाओं में दो काल के चित्र है, इनमें प्राचीनतम चित्र पहली ई.पू. पहली शती के हैं जबकि बाद के चित्र गुप्तकाल (ई.320-495), वाकाटक (ई.250-500) और चालुक्य काल (ई.550-642) के हैं। इनमें से अधिकांश चित्र अब मिट गए हैं या धूमिल पड़ गए हैं। समस्त विश्व में इन भित्तिचित्रों की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की गई है।
अजन्ता की गुफाओं में विकसित हुई चित्रशैली को अजन्ता शैली कहते हैं। ये चित्र किसी एक काल की नहीं है किंतु इस शैली की सर्वप्रमुख विशेषता यह है कि यह चित्रशैली केवल कन्दराओं की भित्तियों पर ही चित्रित मिलती है। इन्हें भित्ति-चित्र कहते हैं। दीवार पर चूना आदि का लेप लगाकर उन पर चित्र बनाए जाते हैं। इन्हें ‘फ्रेस्को-चित्रण’ भी कहते हैं।
अजन्ता की गुफाओं में की गई चित्रकारी कई शताब्दियों में तैयार हुई थी, इसकी सबसे प्राचीन चित्रकारी ई.पू. प्रथम शताब्दी की है। इन चित्रों मे भगवान बुद्ध को विभिन्न रूपों में दर्शाया गया है। अजन्ता की चित्रकला के विषय में श्रीमती ग्राबोस्का ने लिखा है- ‘अजन्ता की कला भारत की प्राचीन कला है। चित्रकारियों का सौन्दर्य आश्चर्यजनक है और वह भारतीय चित्रकारी की चरमोन्नति का प्रतीक है।’
गुप्तकालीन अजन्ता चित्रकला
गुप्तकाल में चित्रकला की बड़ी उन्नति हुई। अजन्ता तथा एलोरा की गुफाओं की दीवारों में इस काल की चित्रकला के सुन्दर उदाहरण विद्यमान हैं। इन चित्रों को वज्रलेप से बनाया गया है। इस काल में प्रकृति चित्रण के साथ-साथ मनुष्याकृतियां भी बड़ी संख्या में बनीं।
हर्ष कालीन अजन्ता चित्रकला
अजन्ता की गुफा संख्या 1 और 2 में हर्ष कालीन चित्र देखने को मिलते हैं। ये चित्र दो प्रकार के हैं- (1.) प्रथम प्रकार के चित्रों में गति और जीवन का अभाव है जबकि (2.) द्वितीय प्रकार के चित्रों में संयोजन की समानता का अभाव है। एक चित्र में पुलकेशिन (द्वितीय) को फारस के सम्राट खुसरो परवेज का स्वागत करते हुए दिखाया गया है। इन गुफाओं में भगवान बुद्ध तथा पशु-पक्षियों के चित्र बहुतायत से बने हैं।
हर्ष काल के बाद की अजन्ता चित्रकला
हर्ष के बाद 7वीं-8वीं शताब्दी के लगभग अजन्ता चित्रकला अपने चरम पर पहुँच गई। इस काल में अजन्ता शैली का प्रभाव सम्पूर्ण देश पर किसी न किसी रूप में दिखाई देता है। कालीदास, भारवि, माघ, भवभूति आदि लेखकों ने अपने ग्रंथों में इन चित्रों की ओर संकेत किया है।
अजन्ता गुफाओं के चित्रों के विषय
अजन्ता के चित्रों का मुख्य विषय बौद्ध धर्म है। अजन्ता की गुफाओं में महात्मा बुद्ध के जीवन और जातक कथाओं की घटनाएं चित्रित की गई हैं। इन चित्रों को चार भागों में रखा जा सकता है-
(4.) रिक्त स्थान भरने के लिए अप्सराओं, गन्धर्वों तथा यक्षों का चित्रण।
बिम्बों की कल्पना, रंगों की योजना, रेखाओें के लालित्य और अभिव्यक्ति की सम्पन्नता के कारण अजन्ता के भित्ति चित्र अद्भुत दिखाई पड़ते हैं। ‘अजन्ता की कला इतनी पूर्ण, परम्परा में इतनी निर्दोष, अभिप्राय में इतनी सजीव तथा विषय-वैविध्य, आकृति तथा वर्ण के सौन्दर्य में इतनी समृद्ध है कि उसे विश्व की सर्वश्रेष्ठ कलाकृतियों में सम्मिलित किया जाता है।
यद्यपि ये चित्र मानव जीवन की विभिन्न भावनाओं से ओत-प्रोत हैं तथापि उनमें एक ऐसी आध्यात्मिक विशिष्टता है जिनके कारण उनमें किंचित् भी अश्लीलता नहीं है। गुफा संख्या 1 का चित्रण अत्यंत विशिष्ट है। गुफा संख्या 2 की छत में भी इसी प्रकार के आकर्षक अलंकरण हैं। पहली गुफा की छत में चित्रित सांडों की लड़ाई में पशुओं की गति को बहुत सुंदर ढंग से अभिव्यक्त किया गया है।
गुफा संख्या नौ एवं दस के चित्र इस्वी-पूर्व पहली सदी के हैं। नौवीं गुफा की दीवार पर प्रणाम मुद्रा में बैठे एक योगी का चित्र है। दसवीं गुफा के चित्र भी बड़े सजीव हैं। दाहिनी दीवार पर हाथी का एक रेखाचित्र बना हुआ है। इस गुफा के अधिकतर चित्र मिट गए हैं। सोलहवीं गुफा के चित्र भी अब कम ही बचे हैं। ई.1874 में जब ग्रिफिथ ने इन चित्रों की प्रतिलिपियां तैयार की थीं, तब काफी चित्र अस्तित्व में थे।
ग्रिफिथ ने अजन्ता कला की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। वर्गेस ने 17वीं गुफा के चित्रों को सबसे सुन्दर बताया था। राजकुमार विजय का सिंहल भूमि पर अवतरण अपनी असाधारण गति और सौन्दर्य के लिए अप्रतिम माना जाता है। गुफा संख्या 1 में बोधिसत्व पद्मपाणि अविलोकितेश्वर का चित्र भारतीय चित्रण कला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।
इस चित्र के मुख पर करुण भावों का उन्मेष है। इसी गुफा में फारस के निवासियों के वेश में कुछ व्यक्तियों का आगमन चित्रित है। इसमें प्रस्तुत फारसी वातावरण, अजन्ता के अन्य चित्रों से सर्वथा भिन्न है। ये चित्र उन फारसी दूतों के हैं जिन्हें फारस के शाह खुसरो परवेज ने चालुक्यराज पुलकेशिन (द्वितीय) के पास भेजा था।
गुफा संख्या 2 में स्तम्भ से लगी खड़ी एक नायिका का चित्र है जो अपने बाएं पैर को मोड़कर स्तम्भ से टिकाए हुए है। उसने बाएं आथ के अंगूठे और अनामिका को मिला रखा है। गुफा संख्या 10 में रानियों से घिरा हुआ राजा चित्रित है। यह चित्र काफी प्राचीन है किंतु आकृतियों की अभिव्यक्ति बड़ी प्रबल है तथा मुख मण्डल पर अभूतपूर्व ताजगी विराजमान है। 17वीं गुफा में बने एक चित्र में एक माता और एक पुत्र बुद्ध को भिक्षा दे रहे हैं। उनके अंग-अंग से दैन्य भाव प्रकट हो रहा है, उनकी पलकें बिखरी हुई हैं, नेत्र अधखुले हैं। 17वीं गुफा में बने एक चित्र में एक स्त्री अपने शिशु को लिए हुए है।
अजन्ता के चित्रों में सौन्दर्य की साधना की गई है। इन चित्रों में कलाकारों ने मानव जीवन का कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं छोड़ा है। अजन्ता के चित्रों में मैत्री, करुणा, पे्रम, क्रोध, लज्जा, हर्ष, उत्साह, घृणा आदि विभिन्न प्रकार के भाव, पद्ममणि बोधिसत्व, अवलोकितेश्वर, प्रशान्त तपस्वी और देवोपम राजपरिवार से लेकर क्रूर व्याध, निर्दय वधिक, साधु वेशधारी धूर्त, वार-वनिता, समाधिमग्न बुद्ध, प्रणयरत दम्पति और शृंगाररत नायिकाएँ अंकित हैं।
इन चित्रों में विविध प्रकार के अंग-विन्यास, मुख-मुद्राएँ, भाव-भंगिमाएँ, वेश-भूषाएँ, अंलकार, केश विन्यास, रूप-रंग आदि चित्रित हैं। अजन्ता के चित्रों में राहुल और उसकी माता, छदन्त जातक, क्रूर ब्राह्मण की कथा, शिवि जातक, गजराज की जल क्रीड़ा, कवियों का उल्लास, नन्द का पलायन आदि अनेक सुंदर चित्र बने हैं।
अजन्ता शैली में अंगुलियां कमल की पंखड़ियों जैसी चित्रित की गई हैं तथा नेत्र आधे बंद हैं। दोनों नेत्र छंद युक्त प्रतीत होते है। चित्रों के विषयों की विविधता, जीवन से उनकी अविच्छिन्नता और उनके सहज स्वाभाविक अंकन ने कला का एक अद्भुत संसार रच दिया है। नगरों, राजमहलों, साधारण आवासों, वन-प्रान्तरों आदि के दृश्य मानो चित्रों में सुरक्षित होकर रह गए हैं।
भारत की मुस्लिम चित्रकला को दो भागों में बांटा जा सकता है- दिल्ली सल्तनत कालीन मुस्लिम चित्रकला तथा मुगल सल्तनत कालीन मुस्लिम चित्रकला। निश्चित रूप से भारत की मुस्लिम चित्रकला पर हिन्दू शैलियों का भी प्रभाव है।
दिल्ली-सल्तनत कालीन मुस्लिम चित्रकला
मूर्ति-पूजा करना और मनुष्यों के चित्र एवं मूर्तियाँ बनाना इस्लाम में वर्जित है। क्योंकि ऐसा करते समय मूर्तिकार कल्पना करने लगता है कि वह अपनी चित्रित वस्तुओं को जीवन प्रदान कर रहा है। इस प्रकार वह अल्लाह से समता करने लगता है। जबकि जीवन प्रदान करने वाला एकमात्र अल्लाह है। इस कारण मध्य-कालीन मुसलमान जीव-जन्तुओं को चित्रित करना पाप समझते थे।
इसलिए दिल्ली के सुल्तान, मुसलमान अमीर और जनसाधारण चित्रकला से दूर रहते थे और मूर्तिकारों एवं चित्रकारों को संरक्षण नहीं देते थे। फिर भी सल्तनतकाल में अपवाद स्वरूप कुछ चित्र बने जिन पर ईरानी प्रभाव है।
सिकन्दर लोदी ने अपने काल के किसी दक्ष चित्रकार से वल्लभाचार्यजी का चित्र अपने सामने बैठकर बनवाया। यह चित्र सिकन्दर लोदी के महल में हर समय लगा रहता था। बाद में जब मुगलों ने आगरा पर अधिकार किया तब यह चित्र मुगल बादशाहों के पास आ गया। मुगल बादशाह हुमायूँ ने इस चित्र की रक्षा की तथा इसे अपने महल में लगा लिया।
जब शेरशाह सूरी ने हूमायूँ को भारत से भगा दिया तब भी वल्लभाचार्यजी का यह चित्र सुल्तान के महलों में सुरक्षित रहा। जब हुमायूँ लौटकर आया तब भी यह चित्र सुरक्षित था। अकबर, जहाँगीर तथा शाहजहां ने भी इस चित्र को संभाल कर रखा। शाहजहाँ के काल में जब किशनगढ़ का राजा रूपसिंह बलख और काबुल विजय के बाद आगरा आया तब उसने यह चित्र अपनी विजय के पुरस्कार के रूप में शाहजहाँ से मांग लिया।
इस प्रकार यह चित्र आज भी किशनगढ़ में सुरक्षित है। इस घटना से यह कहा जा सकता है कि दिल्ली सल्तनत में सिकंदर लोदी के काल से ही चित्रकला को पुनः प्रतिष्ठा मिलने लगी थी जो मुगलों के समय भी तब तक जारी रही जब तक कि औरंगजेब मुगलों के तख्त पर नहीं बैठ गया।
मुगल कालीन मुस्लिम चित्रकला
मुगल साम्राज्य की स्थापना के साथ ही मुस्लिम चित्रकला में नवजीवन आ गया। मुगल बादशाह चित्रकला के महान् प्रेमी थे। हेरात में बहजाद नामक चित्रकार ने चित्रकला की एक नई शैली आरम्भ की जो चीनी कला का प्रान्तीय रूप था और इस पर भारतीय, बौद्ध, ईरानी, बैक्ट्रियाई और मंगोलियन तत्त्वों का प्रभाव था। इसे बहजाद कला कहा जाता था। फारस के तैमूरवंशी राजाओं ने इसे राजकीय सहायता दी।
बाबर के काल में मुस्लिम चित्रकला
बाबर जब हेरात में आया, तब उसका बहजाद की मुस्लिम चित्रकला से परिचय हुआ। बाबर ने इस चित्रशैली में अनेक हस्तलिखित ग्रन्थों की प्रतिलिपियाँ चित्रित करवाईं तथा इस कला को अपने साथ भारत ले आया।
हुमायूँ के काल में मुस्लिम चित्रकला
हुमायूँ भी चित्रकला प्रेमी था। उसका फारस के उच्चकोटि के चित्रकारों से अच्छा परिचय था। इनमें से एक हेरात का प्रसिद्ध चित्रकार बहजाद का शिष्य मीर सैय्यद अली था और दूसरा ख्वाजा अब्दुस समद था। हुमायूँ इन दोनों को अपने साथ भारत ले आया। अब्दुस्समद द्वारा तैयार किए जाने वाले चित्रों में कुछ चित्र जहाँगीर द्वारा संकलित ‘गुलशन चित्रावली’ में संकलित हैं। ‘हम्जनामा’, जिसे ‘दास्ताने अमीर हम्जा’ भी कहते हैं, मुगल चित्रकला शैली में चित्रित सबसे महत्वपूर्ण चित्र संग्रह है।
‘हम्जनामा’ मीर सैय्यद अली एवं अब्दुस्समद के नेतृत्व में देश के विभिन्न भागों से बुलाए गए लगभग 100 चित्रकारों के समूह द्वारा तैयार किया गया जिसे पूरा करने में लगभग पन्द्रह वर्ष लगे। हम्जनामा में लगभग 1400 पृष्ठों को चित्रित किया गया। हुमायूँ तथा अकबर ने ईरानी कलाकारों से चित्रकला का कुछ ज्ञान प्राप्त किया। इस काल में अधिकांश चित्र सूती-वस्त्रों पर बनाए जाते थे।
इन चित्रों में ईरानी, भारतीय तथा यूरोपीयन शैलियों का सम्मिश्रण है किन्तु ईरानी शैली की प्रधानता होने के कारण इसे ईरानी कलम कहा गया। इस शैली को मुगल काल की प्रारम्भिक चित्रकला शैली कहा जा सकता है।
अकबर के काल में मुस्लिम चित्रकला
अकबर के उदारवादी दृष्टिकोण के कारण अकबर के शासनकाल में मुस्लिम चित्रकला की नई शैली विकसित हुई जो ईरानी और भारतीय शैली के सर्वोत्तम तत्त्वों का सम्मिश्रण थी। इस नवीन शैली में विदेशी तत्त्व भारतीय शैली में इस तरह घुल-मिल गये कि दोनों के पृथक् अस्तित्त्व का पत लगा पाना असम्भव हो गया और वह बिल्कुल भारतीय हो गई। अकबर ने चित्रकारी हेतु एक अलग विभाग स्थापित किया।
अबुल फजल ने आइने अकबरी में पन्द्रह प्रसिद्ध चित्रकारों का उल्लेख किया है जिनमें तेरह हिन्दू थे। दसवन्त, बसावन महेश, लाल मुकुन्द, सावलदास, अब्दुस्समद, सैय्यद अली आदि अकबर के दरबारी चित्रकार थे। रज्मनामा में दसवन्त के बनाए चित्र हैं।
मुगल चित्रकला के इतिहास में रज्मनामा को मील का पत्थर माना जाता है। दसवन्त के द्वारा बनाई गई अन्य कलाकृतियों में खानदाने-तैमूरिया और तूतीनामा शामिल हैं। बसावन अकबर के दरबार के मुख्य चित्रकारों में से एक था। बसावन को चित्रकला के सभी पक्षों में सिद्धहस्तता प्राप्त थी। एक कृशकाय घोड़े के साथ निर्जन क्षेत्र में भटकता हुआ मजनूं का चित्र बसावन की उत्कृष्ट कृति है।
जहाँगीर के काल में चित्रकला
जहाँगीर का शासनकाल मुस्लिम चित्रकला का स्वर्ण-काल था। जहाँगीर स्वयं अच्छा चित्रकार था। इस काल की चित्रकला में कई प्रयोग हुए। जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा तुजुके जहाँगीरी में लिखा है कि कोई भी चित्र चाहे वह किसी जीवित चित्रकार द्वारा बनाया गया हो अथवा मृतक चित्रकार द्वारा, मैं चित्र को देखते ही बता सकता हूँ कि यह किसकी कृति है। यदि कोई चित्र विभिन्न चित्रकारों द्वारा बनाया गया है तो भी मैं उनके चेहरे अलग-अलग करके बता सकता हूँ कि कौन से अंग किस चित्रकार ने बनाएं हैं।
जहाँगीर ने हेरात के प्रसिद्ध चित्रकार आकारिजा के नेतृत्व में आगरा में एक चित्रशाला की स्थापना की। जहाँगीर के शासनकाल में शिकार, युद्ध और दरबारी दृश्यों, आकृति-चित्रण, पशुओं व फूलों आदि के चित्रांकन में विशेष उन्नति हुई। उस्ताद मंसूर और अबुल हसन इस काल के दो बड़े नाम थे. मंसूर पक्षी-विशेषज्ञ चित्रकार था जबकि अबुल हसन व्यक्ति-चित्र बनाने में निपुण था।
जहाँगीर ने मंसूर को नादिर-उल्-सर तथा हसन को नादिर-उल-जमा की उपाधि दी। मंसूर की उत्कृष्ट कृतियों में साइबेरियाई सारस तथा बंगाल का अनोखा पुष्प सम्मिलित हैं। फारूखबेग, बिसनदास, दौलत एवं मनोहर भी जहाँगीर कालीन प्रमुख चित्रकार थे। जहाँगीर की मृत्यु के साथ ही मुगल चित्रकला का विकास रुक गया।
शाहजहाँ के काल में चित्रकला
शाहजहाँ को चित्रकला में विशेष रुचि नहीं थी तो भी उसने चित्रकला को संरक्षण प्रदान किया। फकीर उल्ला, मीर हाशिम, अनूप, चित्रा, मुहम्मद नादिर, हुनर एवं मुरार आदि शाहजहांकालीन प्रमुख चित्रकार थे।
औरंगजेब के काल में चित्रकला
औरंगजेब ने मुगल दरबार से चित्रकारों, संगीतज्ञों, कला-मर्मज्ञों आदि को निकाल दिया। इन कलाकारों ने राजस्थान और पंजाब के राजाओं के यहाँ आश्रय प्राप्त किया जिससे वहाँ नवीन चित्रकला शैलियों का विकास संभव हो सका।
राजस्थान में मुगल शासकों के काल में विकसित हुई चित्रकला शैलियों को राजपूत चित्रकला के अंतर्गत रखा जाता है। राजपूत चित्रकला पर मुगल एवं ईरानी शैलियों का प्रभाव है।
राजस्थान में अत्यंत प्राचीन काल से अब तक विकसित हुई चित्रकला की समृद्ध धारा के प्रवाह को देखा जा सकता है। कोटा जिले के आलणियां, दरा, बैराठ, झालावाड़ जिले के आमझीरी नाला तथा भरतपुर जिले के दर नामक स्थानों के शैलाश्रयों में आदिम मानव द्वारा उकेरे गये रेखांकन तथा मृद्भाण्डों पर उकेरी गयी कलात्मक रेखायें प्रदेश की अत्यंत प्राचीन चित्रण परंपरा की कहानी कहती हैं।
राजस्थान से प्राप्त विक्रम संवत के पूर्व के सिक्कों पर अंकित मानव, पशु-पक्षी, सूर्य, चंद्र, धनुष, बाण, स्तूप, स्वास्तिक, वज्र, पर्वत, नदी आदि धार्मिक चिह्न प्राप्त होते हैं। बैराठ, रंगमहल तथा आहाड़ से प्राप्त सामग्री पर वृक्षावली तथा ज्यामितीय अंकन देखने को मिलते हैं।
सातवीं एवं आठवीं शताब्दी के लगभग राजपूताना में अजन्ता चित्रकला की समृद्ध परम्परा विद्यमान थी किन्तु अरबों के आक्रमण के कारण पश्चिमी क्षेत्र के कलाकार गुजरात से राजपूताना की ओर आ गये जिन्होंने स्थानीय शैली को आत्मसात करके एक नई शैली को जन्म दिया और अजन्ता शैली का प्रभाव नेपथ्य में चला गया।
इस नई शैली की चित्रकला से जैन ग्रंथों को बड़ी संख्या में चित्रित किया गया इसलिए इसे जैन शैली कहा गया। इस शैली का विकास गुजरात से आये कलाकारों ने किया था, इसलिये इसे गुजरात शैली भी कहा गया। धीरे-धीरे गुजरात और राजपूताना शैली में कोई भेद नहीं रहा। पन्द्रहवीं शताब्दी में इस पर मुगल शैली का प्रभाव दिखाई देने लगा।
ज्यों-ज्यों राजपूत शासकों ने मुगल बादशाह अकबर से राजनैतिक एवं वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये और उनका मुगल दरबार में आना-जाना होने लगा, त्यों-त्यों राजपूत चित्रकला पर मुगल प्रभाव बढ़ता गया, जिससे राजपूत शैली की पूर्व प्रधानता समाप्त हो गई।
राजस्थान में चित्रकला की अनेक शैलियां विकसित हुईं जिनमें मेवाड़ शैली, मारवाड़ शैली, बूंदी शैली, किशनगढ़ शैली, जयपुर शैली, बीकानेरी शैली, अलवर शैली, कोटा शैली, नाथद्वारा शैली, उणियारा शैली, अजमेर शैली, डूंगरपुर शैली, देवगढ़ शैली आदि प्रमुख हैं। इन सब शैलियों को राजपूत चित्रकला के अंतर्गत रखा जा सकता है। राजपूत चित्रकला पर मुगल एवं ईरानी शैलियों का प्रभाव है।
राजस्थानी चित्रकला का वैज्ञानिक वर्गीकरण सर्वप्रथम डॉ. आनंद कुमार स्वामी ने ई.1916 में अपनी पुस्तक ‘राजपूत पेंटिंग’ में किया था। आनंद कुमार स्वामी, ओ. सी. गांगुली, हैवेल आदि विद्वानों ने इसे राजपूत चित्रकला कहा जबकि रामकृष्ण दास ने इसे राजस्थानी कला कहा।
मुस्लिम प्रभाव से इस शैली में विभिन्न रियासतों में अलग-अलग चित्र शैलियों का विकास हुआ। इन शैलियों को पृष्ठ भूमि, बॉर्डर, पशु पक्षियों का अंकन, पोशाकों का अंकन, आंखों की बनावट, चित्रों की विषय वस्तु, चेहरे की दाढ़ी-मूंछें, चिबुक, होंठ आदि की बनावट से अलग-अलग किया जाता है।
रंगों के आधार पर भी इनमें वर्गीकरण हो सकता है। जयपुर एवं अलवर शैलियों के चित्रों में हरे रंग का अधिक प्रयोग होता है। जोधपुर एवं बीकानेर शैलियों में पीले रंग का अधिक प्रयोग होता है। कोटा शैली में नीले रंग का अधिक प्रयोग होता है। बूंदी शैली में सुनहरी रंग का अधिक प्रयोग होता है।
किशनगढ़ शैली में सफेद एवं गुलाबी रंग का अधिक प्रयोग होता है। बॉर्डर की पट्टी के रंगों से भी इन्हें अलग किया जा सकता है। उदाहरण के लिये उदयपुर में पीला, किशनगढ़ में गुलाबी एवं हरा, बूंदी में लाल एवं सुनहरी तथा जयपुर में चंदेरी एवं लाल रंग के बॉर्डर अधिक संख्या में बनाये गये हैं।
राजपूत चित्रकलाकी विभिन्न शैलियाँ
राजस्थानी चित्रकला को अध्ययन की दृष्टि से निम्नलिखित शैलियों एवं उप-शैलियों में रखा जा सकता है-
मेवाड़ स्कूल
नाथद्वारा शैली, देवगढ़ उपशैली, शाहपुरा उपशैली, उदयपुर शैली, सावर उपशैली, बागौर ठिकाणे की उपशैली, बेगूं ठिकाणे की उपशैली, केलवा ठिकाणे की उपशैली।
आम्बेर शैली, शेखावाटी शैली, उणियारा ठिकाणे की उपशैली, ईसरदा ठिकाणे की उपशैली, शाहपुरा शैली, जयपुर शैली, अलवर शैली।
मेवाड़ प्रदेश की राजपूत चित्रकला
मेवाड़ प्रदेश की चित्रकला के अंतर्गत उदयपुर शैली, नाथद्वारा शैली, देवगढ़ उपशैली, शाहपुरा उपशैली, चावंड, बनेड़ा, बागौर, सावर, बेगूं तथा केलवा ठिकाणों की चित्रकला आती है।
मेवाड़ शैली
इसे उदयपुर शैली भी कहते हैं। ई.1260 का श्रावक प्रतिक्रमण चूर्णि नामक चित्रित ग्रंथ मेवाड़ शैली का प्रथम उदाहरण है। यह ग्रंथ ताड़पत्रों से बनाया गया है। इसके चित्र नागदा के सास-बहू मंदिर तथा चित्तौड़ के मोकल मंदिर की तक्षण कला जैसे हैं।
गरुड़, नासिका, परवल की खड़ी फांक जैसे नेत्र, घुमावदार एवं लम्बी अंगुलियां, लाल-पीले रंग की प्रचुरता, छोटी ठोड़ी, अलंकारों की प्रधानता आदि इस शैली की विशेषतायें हैं। उदयपुर शैली में कदम्ब के वृक्ष एवं हाथियों का प्रमुखता से अंकन किया गया है। मेवाड़ में राणा कुंभा, राणा सांगा, मीरांबाई, राणा प्रताप, उदयसिंह, जगतसिंह, राजसिंह, जयसिंह, अमरसिंह आदि के काल में चित्रकला का अच्छा विकास हुआ। महाराणा अमरसिंह प्रथम के काल में यह अपने चरम पर पहुँची।
इसे मेवाड़ की चित्रकला का स्वर्ण युग भी कहा जाता है। चावण्ड में ई.1605 में चित्रित भेंट, रसिक प्रिया, उदयपुर में ई.1648 में चित्रित रामायण तथा आर्ष रामायण, ई.1741 में चित्रित गीत गोविंद तथा ई.1719 में चित्रित बिहारी सतसई उदयपुर शैली के प्रमुख चित्र हैं। मेवाड़ शैली में चित्रित रागमाला, बारहमासा, पंचतंत्र तथा रसमंजरी भी उल्लेखनीय हैं।
नाथद्वारा शैली की राजपूत चित्रकला
ई.1670 में श्रीनाथजी के विग्रह के साथ ब्रज की चित्रण परंपरा मेवाड़ में आयी तथा उदयपुर शैली व ब्रज शैली के मिश्रण से नाथद्वारा शैली का विकास हुआ। इस शैली में आंखें हिरण के समान बनाई जाती हैं। गायों का अंकन अधिक किया जाता है। यमुना के तट, अन्नकूट, जन्माष्टमी उत्सव आदि का अंकन भी इस चित्र शैली की प्रमुख विशेषता है। इस शैली के चित्रों में हरे एवं पीले रंग का अधिक प्रयोग किया जाता है।
मेवाड़ की लघु चित्र शैली
महाराणा जगतसिंह प्रथम (ई.1628 से 1652) के काल में चित्रकला का खूब विकास हुआ। मेवाड़ के राणा शैव मत के उपासक थे किंतु इस काल में वल्लभ संप्रदाय के प्रसार के कारण श्री कृष्ण के जीवन से संबंधित चित्रों का निर्माण अधिक हुआ। इस काल में रागमाला (ई.1628), रसिकप्रिया (ई.1628-30), गीतगोविंद (ई.1629), भगवद् पुराण (ई.1648) एवं रामायण (ई.1649) आदि विषयों पर लघु चित्रों का निर्माण हुआ। इनमें से अधिकतर चित्र देश-विदेश के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं।
देवगढ़ उपशैली
इस शैली का विकास देवगढ़ के रावत द्वारकादास चूण्डावत द्वारा हुआ। यह मेवाड़ शैली की उपशैली है। मोटी एवं सधी हुई रेखाएं, पीले रंगों का बाहुल्य, मारवाड़ के अनुकूल स्त्री पुरुषों की आकृतियां, शिकार, गोठ, आदि से सम्बन्धित चित्र इसकी विशेषता है।
मरुप्रदेश की राजपूत चित्रकला
तिब्बती इतिहासकार तारानाथ (16वीं शताब्दी) ने मरूप्रदेश में 7वीं शताब्दी के श्रीरंगधर नामक एक चित्रकार का उल्लेख किया है। ई.1422-23 में लिखित सुपाश्र्वनाथ चरितम् के चित्रों में जैन एवं गुजराती शैली का प्रभाव दृष्टिगत होता है। ई.1450 के लगभग गीत-गोविंद तथा बालगोपाल-स्तुति की एक-एक प्रति प्राप्त हुई है जिनमें राजस्थान के प्रारंभिक चित्रण को देखा जा सकता है।
जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़, जैसलमेर, नागौर, घाणेराव तथा अजमेर शैलियों को मारवाड़ चित्रकला तथा मरुप्रदेश की चित्रकला भी कहते हैं। राजा मालदेव के समय (ई. 1532 से 1568) का जोधपुर शैली का उत्तराध्ययन सूत्र बड़े महत्व का है। अब यह चित्र बड़ौदा संग्रहालय में रखा है।
मारवाड़ शैलीकी राजपूत चित्रकला
ई.1623 की पाली रागमाला चित्रावली, 17वीं शताब्दी की ही जोधपुर शैली की सूरसागर पदों पर आधारित चित्रावली तथा रसिकप्रिया में रंगों की चटकता और वस्त्राभूषण आदि का चित्रांकन महत्त्वपूर्ण है। जोधपुर दुर्ग में चैखेलाव महल के भित्ति चित्र, राजा मालदेव के समय में बने थे। ये मार्शल टाइप के हैं।
राजा सूरसिंह के समय के अनेक लघुचित्र, ढोला मारू तथा भागवत आदि के चित्र भी उल्लेखनीय हैं। उन्नीसवीं सदी में मारवाड़ नाथ संप्रदाय से विशेष रूप से प्रभावित रहा। अतः राजा मानसिंह के समय के नाथ संप्रदाय के मठों के चित्र भी विशिष्ट बन पड़े हैं। इस शैली के पुरुष लम्बे-चैड़े, गठीले बदल के तथा गलमुच्छों, ऊंची पगड़ी एवं राजसी वैभव वाले वस्त्राभूषणों से युक्त हैं।
स्त्रियों की वेशभूषा में ठेठ राजस्थानी लहंगा, ओढ़नी, लाल फूंदने आदि का प्रयोग प्रमुख रूप से हुआ है। जोधपुर शैली में भी पीले रंग का अधिक प्रयोग हुआ है। इस शैली के चित्रों में आम के पेड़, कौवा एवं घोड़ा अधिक देखने को मिलते हैं। राम-रावण युद्ध, कौंधती बिजली, मरुस्थल के दृश्य, लोक देवताओं के चित्र, दुर्गा सप्तशती का चित्रण भी इस शैली की विशेषतायें हैं।
बीकानेर शैलीकी राजपूत चित्रकला
बीकानेर शैली में मुगल शैली के प्रभाव के कारण नारी अंकन में तन्वंगी देह चित्रित की गयी है। इस चित्रांकन में हरे, लाल, बैंगनी, जामुनी तथा सलैटी रंगों का प्रयोग किया गया है। पीले रंग को भी प्रमुखता दी गई है। शाहजहाँ और औरंगजेब शैली की पगड़ियों के साथ ऊंची मारवाड़ी पगड़ियां, ऊंट, हिरण आदि पशुओं और कौवा तथा चील आदि पक्षियों के साथ राजपूती जीवन शैली की छाप दिखायी देती है।
ऊँट की खाल पर चित्रों का अंकन इस शैली की विशेषता है। बीकानेर के मंदिरों में मथेरण, उस्ता एवं चूनगर जाति के चित्रकारों ने विशाल संख्या में भित्ति चित्रों का निर्माण किया। भाण्डा शाह के जैन मंदिर के रंगमंडप का शिखर तथा इसकी कलात्मक चित्रकारी अत्यंत आकर्षक है।
नागौर उपशैली
नागौर उपशैली में पारदर्शी वेशभूषा एवं बुझे हुए रंगों का प्रयोग अधिक किया गया है। नागौर दुर्ग में काष्ठ के दरवाजों एवं किले के भित्तिचित्र तथा घाणेराव के ठिकाने में बने हुए अनेक लघुचित्र देखने योग्य हैं।
जैसलमेर शैली
इस शैली में दाढ़ी मूंछों की मुखाकृति प्रमुखता से बनाई जाती है। चेहरे पर ओज एवं वीरत्व की प्रधानता होती है। मूमल इस शैली का प्रमुख चित्र है।
किशनगढ़ शैली की चित्रकला
किशनगढ़ शैली में राधा कृष्ण की लीलायें, बणी-ठणी, रंग-बिरंगे उपवन आदि की बहुलता है। तारों एवं चंद्रमा से युक्त रातों का अंकन खूबसूरती से किया गया है। इस शैली के चित्रों में पुरुष लम्बे, इकहरे, नील छवि वाले, समुन्नत ललाट, कर्णांत तक खिंचे अरुणाभ नयन, मोती जड़ित श्वेत या मूंगिया पगड़ी वाले चित्रित किये गये हैं।
जबकि नारियां तन्वंगी, लम्बी, गौरवर्णा, नुकीली चिबुक, सुराहीदार गर्दन, क्षीणकटि, लम्बी कमल पांखुरी सी आँखों वाली चित्रित की गयी हैं। दूर-दूर तक फैली झीलों में जल क्रीड़ा करते हंस, बत्तख, सारस, नौकायें, केले के गाछ तथा रंग-बिरंगे उपवन किशनगढ़ शैली को दूसरी शैलियों से अलग करते हैं।
किशनगढ़ की चित्रकला को चरम पर पहुँचाने का श्रेय राजा सावंतसिंह (ई.1699-1764) को है जो नागरीदास के नाम से प्रसिद्ध हुए। वे राजा राजसिंह के पुत्र थे। उनकी पे्रयसी का नाम बणी ठणी था। वह विदुषी, परम सुंदरी, संगीत में दक्ष तथा कवियत्री थी।
उसके प्रति राजा नागरीदास का आत्मनिवेदन काव्यधारा के रूप में प्रस्फुट हुआ। जिसने चित्रकारों को विषय वस्तु, कल्पना तथा सौंदर्य का विशाल आकाश प्रदान किया। भारत सरकार ने 5 मई 1973 को बणी-ठणी पर एक डाक टिकट भी जारी किया। इस चित्र को ई.1778 में किशनगढ़ के चित्रकार निहालचंद ने बनाया था।
हाड़ौती की राजपूत चित्रकला
चैहान वंशी हाड़ाओं का शासन बूंदी, कोटा तथा झालावाड़ आदि क्षेत्रों पर रहा। इस कारण इन क्षेत्रों से प्राप्त चित्र हाड़ौती शैली के अंतर्गत आते हैं।
बूंदी शैली
इस शैली में पशु-पक्षियों का सर्वाधिक अंकन किया गया है। वर्षा में नाचते हुए मोर, वृक्षों पर कूदते बंदर और जंगल में विचरण करते हुए सिंह सर्वाधिक इसी शैली के चित्रों में अंकित किये गये हैं। बूंदी शैली की आकृतियां लम्बी, शरीर पतले, स्त्रियों के अधर अरुण, मुख गोल, चिबुक पीछे की ओर झुकी तथा छोटी होती है। प्रकृति तथा स्थापत्य के चित्रांकन में श्वेत, गुलाबी, लाल, हरे रंगों का प्रयोग किया गया है।
राग-रागिनी, नायिका भेद, ऋतु वर्णन, बारहमासा, कृष्णलीला, दरबार, हस्तियुद्ध, उत्सव आदि का अंकन इस शैली में प्रमुख स्थान रखता है। इस शैली में सुनहरी रंग का प्रयोग अधिक हुआ है। साथ ही खजूर के पेड़, बत्तख एवं हिरण का बहुतायत से अंकन किया गया है। महाराव उम्मेदसिंह के शासन काल में निर्मित चित्रशाला (रंगीन चित्र) बूंदी चित्र शैली का श्रेष्ठ उदाहरण है।
कोटा शैली
कोटा शैली बूंदी शैली से आई है। कोटा शैली में शिकार का बहुरंगी तथा वैविध्यपूर्ण चित्रण देखा जा सकता है। इस शैली में नीला रंग, खजूर के वृक्ष, बत्तख एवं शेर आदि का प्रमुखता से अंकन किया गया है। झालावाड़ के राजमहलों में श्रीनाथजी, राधा-कृष्ण लीला, रामलीला तथा राजसी वैभव के चित्र दर्शनीय हैं। झालावाड़ के राजकीय संग्रहालय में कुछ तांत्रिक देव-चित्र प्रदर्शित हैं जो पशु-पक्षी के रूप में अंकित किए गए हैं।
तंजौर शैली
भित्ति चित्रों की दृष्टि से कोटा सबसे सम्पन्न है। दक्षिण भारत के चित्रकारों ने भी कोटा में भित्ति चित्र बनाये। तंजौर शैली के अनेक चित्र कोटा के भवनों में चित्रित हैं।
ढूंढाड़ की राजपूत चित्रकला
आमेर, जयपुर, अलवर, शेखावाटी, उणियारा, करौली आदि शैलियां ढूंढाड़ चित्रकला में आती हैं। झिलाय ठिकाणा भी ढूंढाड़ी चित्रकला के अंतर्गत आता है।
जयपुर शैलीकी राजपूत चित्रकला
जयपुर शैली में हरे रंग के प्रयोग, पीपल एवं वट के वृक्ष मोर एवं अश्व का अधिक चित्रांकन किया गया है। मुगलों एवं ब्रज क्षेत्र की संस्कृति का प्रभाव भी इस चित्रकला शैली पर देखा जा सकता है। आमेर की छतरियों, बैराठ के मुगल गार्डन, मौजमाबाद के निजी चित्रों में मुगल प्रभाव हावी है। राजा जयसिंह के समय के चित्रों में रीतिकालीन प्रभाव स्पष्ट दिखायी देता है।
इस काल में आदमकद चित्रों की भी परम्परा पड़ी। माधोसिंह (प्रथम) के काल में गलता के मंदिरों, शीशोदिया रानी के महल, चंद्रमहल तथा पुण्डरीक की हवेली में कलात्मक भित्ति-चित्रण हुआ। सवाई प्रतापसिंह के काल में राधाकृष्ण की लीलाएं, नायिका भेद, राग-रागिनी, बारहमासा आदि का चित्रण हुआ।
अलवर शैली
इस शैली में भी जयपुर शैली की सारी विशेषतायें मिलती हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि जयपुर शैली और दिल्ली शैली के मिश्रण से अलवर शैली बनी। हरे रंग के प्रयोग, पीपल एवं वट के वृक्ष, मोर एवं अश्व का अधिक चित्रांकन किया गया है।
इस शैली में वेश्याओं के जीवन का खूबसूरती से अंकन किया गया है। जमनादास, छोटेलाल, बक्साराम एवं नन्दलाल अलवर शैली के प्रसिद्ध चित्रकार थे। अलवर के राजकीय संग्रहालय में अलवर नरेशों द्वारा खरीदे गए बहुमूल्य चित्र संगृहीत हैं।
मौर्य कालीन स्थापत्य कला में स्तूपों का स्थान भी महत्वपूर्ण है। स्तूप ईंटों तथा पत्थरों के ऊँचे टीले तथा गुम्बदाकार स्मारक हैं। कुछ स्तूपों के चारों ओर पत्थर, ईंटें अथवा ईंटों की जालीदार बाड़ लगाई गई है।
‘वास्तु’ शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत भाषा की ‘वस्’ धातु से हुई है जिसका अर्थ ‘बसना’ होता है। बसने के लिये भवन की आवश्यकता होती है अतः ‘वास्तु’ का अर्थ ‘रहने हेतु भवन’ है। ‘वस्’ धातु से ही वास, आवास, निवास, बसति, बस्ती आदि शब्द बने हैं। नगर-निर्माण योजना एवं भवन निर्माण योजना बनाने वाले मुख्य व्यक्ति को ‘स्थपति’ कहते थे। ‘स्थपति से ही ‘स्थापत्य’ शब्द बना है जिसका अर्थ नगर एवं भवन निर्माण कला है।
स्थापत्य कला को कलाओं की रानी कहा जाता है। भारत में स्थापत्य कला का सर्वप्रथम विकास सिंधु घाटी सभ्यता में देखने को मिलता है। यह नगरीय सभ्यता थी जिसमें पक्के घरों का निर्माण किया गया था। वैदिक एवं उत्तरवैदिक-काल की सभ्यता मुख्यतः ग्रामीण थी तथा इस काल के आर्य कच्ची झौंपड़ियों में रहना अधिक पसंद करते थे।
यद्यपि वेदों में पुरों का उल्लेख हुआ है तथापि उस काल के पुरों के कोई अवशेष उपलब्ध नहीं हो पाए हैं। ये संभवतः प्राकार से घिरे हुए लघु ग्राम ही थे। महाभारत कालीन सभ्यता के अवशेष कुरुक्षेत्र एवं मेरठ के पास की खुदाइयों में मिले हैं। इस काल तक सभ्यता काफी विकसित हो चुकी थी तथा मनुष्य ताम्र-सभ्यता की अवस्था में पहुँच गया था।
मौर्यकालीन सभ्यता से लेकर गुप्तकालीन, हर्षकालीन, राजपूत कालीन, दिल्ली सल्तनत कालीन, मुगल कालीन एवं ब्रिटिश कालीन स्थापत्य कला के साक्ष्य प्रचुरता से प्राप्त होते हैं। इस कला के इतिहास एवं विभिन्न तत्त्वों के बारे में अलग अध्याय में विस्तार से चर्चा की गई है।
प्राचीन नगर निर्माण कला
प्राचीन आर्यों के नगरों के नाम महावन, तोरण एवं गोपुर आदि मिलते हैं जिनसे अनुमान होता है कि ये बसावटें जंगलों एवं गौचरों आदि में विकसित हुई होंगी तथा इनके आवास कच्चे अर्थात् घास-फूस एवं मिट्टी से बनते होंगे। इस कारण उस काल के स्थापत्य के अवशेष नहीं मिलते हैं। जब पक्के भवनों का निर्माण होने लगा तो नगरों की स्थापना निश्चित नगर-योजना के आधार पर होने लगी।
ई.पू. 8वीं शती में मगध की राजधानी राजगृह उन्नति के शिखर पर थी। यद्यपि उस काल के पक्के भवन भी आदिकालीन झोपड़ियों के नक्शे के आधार पर गोलाकार ही बनते थे तथापि उनकी दीवारों में चौकोर दरवाजे एवं खिड़कियाँ लगते थे।
बौद्ध लेखक धम्मपाल के अनुसार, ईसा पूर्व पाँचवीं शती में महागोविन्द नामक स्थपति ने उत्तर भारत की अनेक राजधानियों के विन्यास (नक्शे अथवा नगर योजना) तैयार किए थे। चौकोर नगरियों के मध्य-भाग में एक दूसरे को समकोण पर काटने वाली दो-दो मुख्य सड़कें बनाई गई थीं जो सम्पूर्ण नगरी को चार भागों में बाँट देती थीं।
एक भाग में राजमहल होते थे जिनके विस्तृत वर्णन मिलते हैं। सड़कों के चारों छोरों पर नगरद्वार होते थे। मौर्यकाल (ई.पू. चौथी शती) के अनेक नगर यथा कपिलवस्तु, कुशीनगर, उरुबिल्व आदि एक ही नक्शे अथवा नगर-योजना के अनुसार बने थे। इनके नगरद्वार भी एक जैसे थे। इन नगरों से मिले भवनों के अवशेषों में बाहर निकले हुए छज्जों, अलंकृत गवाक्षों एवं स्तंभों से बौद्धकालीन नगरियों की भावुकता का आभास होता है।
अशोक की भाँति कनिष्क भी बहुत बड़ा निर्माता था। उसने दो नगरों का निर्माण करवाया। उसने एक नगर तक्षशिला के समीप बनवाया जिसके खंडहर आज भी विद्यमान हैं। यह नगर ‘सिरपक’ नामक स्थान पर बसाया गया था। कनिष्क ने दूसरा नगर काश्मीर में बसाया था जिसका नाम कनिष्कपुर था।
मौर्य कालीन स्थापत्य कला
मगध के मौर्य शासकों के काल में जिस स्थापत्य कला का विकास हुआ, उसे मौर्य कालीन स्थापत्य कहते हैं। मौर्य कालीन स्थापत्य कला के स्मारक पाँच स्वरूपों में प्राप्त होते हैं- (1.) आवासीय भवन (2.) राजप्रासाद (3.) गुहा-गृह (4.) स्तम्भ तथा (5.) स्तूप।
(1.) आवासीय भवनों का निर्माण
अशोक के पूर्व जो आवासीय भवन बने थे, वे ईटों तथा लकड़ी से निर्मित हुए। अशोक के शासन-काल में भवन निर्माण में लकड़ी तथा ईटों के स्थान पर पाषाण का प्रयोग आरम्भ हो गया। जो काम लकड़ी तथा ईटों पर किया जाता था, इस काल में वह पत्थर पर किया जाने लगा। काश्मीर में श्रीनगर तथा नेपाल में ललितपाटन नामक नगरों की स्थापना उसी के शासन-काल में हुई थी।
(2.) राजप्रासाद का निर्माण
मेगस्थिनीज ने पाटलिपुत्र में बने सुंदर राजप्रासाद का वर्णन किया है। यह राजप्रासाद इतना सुन्दर था कि इसके निर्माण के सात सौ वर्ष बाद जब फाह्यान ने इसे देखा तो वह आश्चर्य चकित रह गया। उसने लिखा है कि अशोक के महल एवं भवनों को देखकर लगता है कि इस लोक के मनुष्य इन्हें नहीं बना सकते। ये तो देवताओं द्वारा बनवाये गये होंगे।
पटना से इस मौर्यकालीन विशाल राजप्रासाद के अवशेष प्राप्त हुए हैं। एरियन के अनुसार यह राजप्रासाद कारीगरी का एक आश्चर्यजनक नमूना है। राज-प्रासाद के अवशेषों में चंद्रगुप्त मौर्य की राजसभा भी मिली है। पतंजलि ने इस राजसभा का वर्णन किया है। यह सभा एक बहुत ही विशाल मण्डप के रूप में है। मण्डप के मुख्य भाग में, पूर्व से पश्चिम की ओर 10-10 स्तम्भों की 8 पंक्तियां हैं।
डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार यह ऐतिहासिक युग का प्रथम विशाल अवशेष है जिसके दिव्य स्वरूप को देखकर दर्शक मंत्रमुग्ध रह जाता है। उसके विभ्राट स्वरूप की स्थायी छाप मन पर पड़े बिना नहीं रह सकती।
(3.) गुहा स्थापत्य
बिहार में गया के पास बराबर एवं नागार्जुनी की पहाड़ियों में मौर्यकालीन सात गुहा-गृह प्राप्त हुए हैं। बराबर पर्वत समूह से चार गुफाएं मिली हैं- कर्ण चोपड़ गुफा, सुदामा गुफा, लोमस ऋषि गुफा तथा विश्व झौंपड़ी गुफा। नागार्जुनी पहाड़ियों से तीन गुफाएं मिली हैं- गोपी गुफा, वहियका गुफा तथा वडथिका गुफा।
इन गुहा-गृहों का निर्माण मौर्य-सम्राट अशोक तथा दशरथ के शासन काल में किया गया था। ये गुहा-गृह शासकों की ओर से आजीवकों को दान में दिये गये थे। इन गुहा-गृहों की दीवारें आज भी शीशे की भाँति चमकती हैं।
(4.) स्तम्भ
सांची तथा सारनाथ में अशोक के काल में बने तीस से चालीस स्तम्भ आज भी विद्यमान हैं। इनका निर्माण चुनार के बलुआ पत्थरों से किया गया है। इन स्तम्भों पर की गई पॉलिश शीशे की तरह चमकती है। ये स्तम्भ चालीस से पचास फुट लम्बे हैं तथा एक ही पत्थर से निर्मित हैं। इनका निर्माण शुण्डाकार में किया गया है। ये स्तम्भ नीचे से मोटे तथा ऊपर से पतले हैं।
इन स्तम्भों के शीर्ष पर अंकित पशुओं की आकृतियाँ सुंदर एवं सजीव हैं। शीर्ष भाग की पशु आकृतियों के नीचे महात्मा बुद्ध के धर्म-चक्र प्रवर्तन का आकृति चिह्न उत्कीर्ण है। इन स्तम्भों के शीर्ष पर अत्यंत सुंदर, चिकनी एवं चमकदार पॉलिश की गई है जो मौर्य काल की विशिष्ट उपलब्धि है। लौरिया नंदन स्तम्भ के शीर्ष पर एक सिंह खड़ा है। संकिसा स्तम्भ के शीर्ष पर एक विशाल हाथी है तथा रामपुरवा के स्तम्भ शीर्ष पर एक वृषभ है।
अशोक के स्तम्भों में सबसे सुंदर एवं सर्वोत्कृष्ट सारनाथ के स्तम्भ का शीर्षक है। सारनाथ स्तम्भ के शीर्ष पर चार सिंह एक दूसरे की ओर पीठ किये बैठे हैं। मार्शल के अनुसार ईस्वी शती पूर्व के संसार में इसके जैसी श्रेष्ठ कलाकृति कहीं नहीं मिलती। ऊपर की ओर बने सिंहों में जैसी शक्ति का प्रदर्शन है, उनकी फूली हुई नसों में जैसी प्राकृतिकता है, और उनकी मांसपेशियों में जो तनाव है और उनके नीचे उकेरी गई आकृतियों में जो प्राणवंत वास्तविकता है, उसमें कहीं भी आरम्भिक कला की छाया नहीं है।
(5.) स्तूप
मौर्य कालीन स्थापत्य कला में स्तूपों का स्थान भी महत्वपूर्ण है। स्तूप निर्माण की परम्परा लौह कालीन तथा महापाषाणकालीन बस्तियों के समय से आरंभ हो चुकी थी किंतु अशोक के काल में इस परम्परा को विशेष प्रोत्साहन मिला। स्तूप ईंटों तथा पत्थरों के ऊँचे टीले तथा गुम्बदाकार स्मारक हैं। कुछ स्तूपों के चारों ओर पत्थर, ईंटें अथवा ईंटों की जालीदार बाड़ लगाई गई है।
इन स्तूपों का निर्माण बुद्ध अथवा बोधिसत्व (सत्य-ज्ञान प्राप्त बौद्ध मतावलम्बी) के अवशेष रखने के लिये किया जाता था। बौद्ध साहित्य के अनुसार अशोक ने लगभग चौरासी हजार स्तूपों का निर्माण करवाया था। इनमें से कुछ स्तूपों की ऊँचाई 300 फुट तक थी। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भारत तथा अफगानिस्तान के विभिन्न भागों में इन स्तूपों को खड़े देखा था।
वर्तमान में कुछ स्तूप ही देखने को मिलते हैं। इनमें मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के निकट स्थित सांची का स्तूप प्रसिद्ध है। इसकी ऊँचाई 77.5 फुट, व्यास 121.5 फुट तथा इसके चारों ओर लगी बाड़ की ऊँचाई 11 फुट है। इस स्तूप का निर्माण अशोक के काल में हुआ तथा इसका विस्तार अशोक के बाद के कालों में भी करवाया गया। इस स्तूप की बाड़ और तोरणद्वार कला की दृष्टि से आकर्षक एवं सजीव हैं।
साँची, भरहुत, कुशीनगर, बेसनगर (विदिशा), तिगावाँ (जबलपुर), उदयगिरि, प्रयाग, कार्ली (मुम्बई), अजन्ता, एलोरा, विदिशा, अमरावती, नासिक, जुनार (पूना), कन्हेरी, भुज, कोंडेन, गांधार (वर्तमान कंधार-अफगानिस्तान), तक्षशिला पश्चिमोत्तर सीमान्त में ईस्वी पूर्व चौथी शती से चौथी शती ईस्वी तक की वास्तुकृतियाँ कला की दृष्टि से अनूठी हैं।
सर जॉन मार्शल ने ‘भारत का पुरातत्व सर्वेक्षण 1912-13’ में लिखा है कि- ‘वे भवन तत्कलीन वास्तुकला की अद्वितीय सूक्ष्मता और पूर्णता का दिग्दर्शन कराते हैं। उनके कारीगर आज भी यदि संसार में आ सकते, तो अपनी कला के क्षेत्र में कुछ विशेष सीखने योग्य शायद न पाते।’
दक्षिण भारत में गुंतूपल्ले (कृष्ण जिला) और शंकरन् पहाड़ी (विजगापट्टम् जिला) में शैलकृत्त वास्तु के दर्शन होते हैं। साँची, नालन्दा और सारनाथ में अपेक्षाकृत बाद की वास्तुकृतियाँ हैं।
मौर्य कालीन स्थापत्य कला पर विदेशी प्रभाव
स्पूनर, मार्शल तथा निहार रंजन रे आदि अनेक विद्वानों ने मौर्यकाल की कला को भारतीय नहीं माना है। इन विद्वानों ने मौर्य काल की कला पर ईरानी कला का प्रभाव माना है। स्पूनर ने लिखा है कि पाटलिपुत्र का राजभवन फारस के राजमहल का प्रतिरूप था। स्मिथ ने लिखा है कि मौर्यों की कला ईरान तथा यवनों से प्रभावित हुई है। सिकंदर के आक्रमण के समय विदेशी सैनिक तथा शिल्पी भारत में बस गये थे, उन्हीं के द्वारा अशोक ने स्तम्भों का निर्माण करवाया।
स्मिथ की मान्यता है कि अशोक से पहले, भारत में भवन निर्माण में पत्थरों का प्रयोग नहीं किया जाता था। विदेशी कलाकारों द्वारा इसे संभव किया गया। इन विद्वानों की धारणा को नकारते हुए अरुण सेन ने लिखा है कि मौर्य कला तथा फारसी कला में पर्याप्त अंतर है। फारसी स्तम्भों में नीचे की ओर आधार बनाया जाता था जबकि अशोक के स्तम्भों में कोई आधार नहीं बनाया गया है।
मौर्य स्तम्भ का लम्बा भाग गोलाकार है एवं चमकदार पॉलिश से युक्त है जबकि फरसी स्तम्भों में चमकदार पॉलिश का अभाव है। अतः मौर्य कला पर फारसी प्रभाव होने की बात को स्वीकार नहीं किया जा सकता। मौर्य कला अपने आप में पूर्णतः भारत में विकसित होने वाली कला है।
कनिष्क कालीन स्थापत्य
दूसरी शताब्दी ईस्वी के विदेशी शासक कनिष्क ने अपनी राजधानी पुष्पपुर में 400 फुट ऊँचा लकड़ी का स्तम्भ तथा बौद्ध-विहार बनवाया। यहीं पर उसने एक पीतल की मंजूषा में बुद्ध के अवशेष रखवाकर एक स्तूप बनवाया। इस स्तूप का निर्माण कनिष्क ने एक यूनानी शिल्पकार से करवाया। अपने साम्राज्य के अन्य भागों में भी कनिष्क ने बहुत से विहार तथा स्तूप बनवाये। चीनी यात्री फाह्यान ने गान्धार में कनिष्क द्वारा बनवाये गये विहारों तथा स्तूपों को देखा था। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 170 विहारों तथा स्तूपों का वर्णन किया है।
हिन्दू स्थापत्य कला अत्यंत प्राचीन काल में विकसित हुई जिसमें देवालय, राजप्रासाद, दुर्ग, जलाशय, उद्यान आदि के भवन बनाए जाते थे।
मौर्य काल के बाद हिन्दू स्थापत्य कला का तेजी से विकास हुआ। हिन्दू स्थापत्य कला दो रूपों में मिलती है- (1.) निजी उपयोग के भवन, (2.) सार्वजनिक उपयोग के भवन।
निजी उपयोग के भवन प्रायः आवासीय थे। इनमें जन-साधारण के छोटे घरों से लेकर राजाओं के भव्य प्रासाद एवं सामंतों की हवेलियां तक सम्मिलित थे जबकि सार्वजनिक स्थापत्य कला में मंदिर, दुर्ग, उद्यान एवं जलाशय आदि आते थे। सार्वजनिक स्थापत्य के विकास में चार कारण प्रतीत होते हैं- (1.) धार्मिक प्रेरणा, (2.) सामरिक आवश्यकता, (3.) ऐश्वर्य, विलास एवं प्रतिष्ठा की आकांक्षा (4.) जनकल्याण की भावना।
भारत में सार्वजनिक स्थापत्य की परम्परा अत्यंत प्राचीन काल से चली आ रही है। प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में जलाशयों, मंदिरों एवं धार्मिक स्थलों का निर्माण पूर्त-धर्म माना जाता था। याज्ञवलक्य स्मृति की टीका मिताक्षरा में स्त्रियों एवं विधवाओं को भी पूर्त-धर्म हेतु धन व्यय करने की अनुमति दी गई है। प्राचीन काल में सार्वजनिक लाभ एवं उपयोग के लिए दातव्य कार्यों एवं वस्तुओं से सम्बन्धित नियम बने हुए थे।
स्मृतियों के अनुसार लोगों को कुएं, बांध जलयंत्र इत्यादि बनवाने चाहिए। कुछ ग्रंथकारों ने लिखा है कि यज्ञों से केवल स्वर्ग मिलता है परंतु मंदिरों एवं तालाबों के निर्माण से मुक्ति हो जाती है। स्मृति चंद्रिका, कात्यायन आदि ग्रंथों से ज्ञात होता है कि राजा लोग मंदिरों, तड़ागों, कूपों आदि सम्पत्तियों पर दृष्टि रखते थे और उन पर विपत्ति आने पर उनकी रक्षा करते थे।
मंदिर स्थापत्य कला
मंदिर मुख्यतः धार्मिक वास्तु है जिसमें भारतीय वास्तुकला का उत्कृष्ट विकास देखने को मिलता है। देवी-देवताओं के मूर्त रूपों की पूजा हेतु मूर्ति स्थापना के लिए जो सुंदर भवन निर्मित हुए, वही भवन मंदिर कहलाए। मंदिरों की कल्पना ईश्वर के आवास के रूप में की जाती है इसलिए ईश्वर के प्रिय स्थलों को प्रतीकात्मक रूप में मंदिर में उत्कीर्ण किया जाता है।
यही कारण है कि नदियां एवं उद्यान आदि के अंकन का मंदिर-वास्तुकला में प्रमुख स्थान है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर प्रतीकों का अंकन करके उपासकों एवं श्रद्धालुओं का मन एवं मस्तिष्क ईश्वर के ध्यान एवं दर्शन के लिए तैयार किया जाता है। भारतीय साहित्य में हिन्दू मंदिर की संकल्पना एक पर्वत के रूप में की गई है, जहाँ देवगण निवास एवं क्रीड़ा करते हैं।
इस संकल्पना का आधार विष्णुधर्मोत्तर पुराण है। बृहत्संहिता तथा भविष्य पुराण के अनुसार तीर्थों एवं धर्म-क्षेत्रों में देवताओं की उपस्थिति अनुभव की जा सकती है। बृहत्संहिता तथा मत्स्य पुराण में पर्वतों की सूची में उद्धृत प्रथम तीन पर्वतों- मरु, मन्दर तथा कैलाश का नाम मंदिरों के अन्तर्गत भी आता है। मंदिरों की कल्पना पर्वतों के रूप में न केवल स्थापत्य-ग्रंथों में मिलती है अपितु साहित्य तथा अभिलेखों में भी प्राप्त होती है।
गुप्तकालीन मंदिर स्थापत्य
गुप्तकाल (ई.320-495) से पहले की स्थापत्यकला मंथर गति से चलती है। गुप्तकाल से पहले के काल में मंदिरों का निर्माण प्रायः लकड़ी से होता था। इसलिए गुप्तकाल से पहले का मंदिर-स्थापत्य बहुत पहले ही नष्ट हो गया। तत्कालीन ग्रंथों से भी उन मंदिरों की जानकारी नहीं मिलती। पाँचवीं शताब्दी ईस्वी अर्थात् गुप्तकाल से भवन निर्माण में पक्की ईंटों का बहुतायत से प्रयोग होने लगा।
उस समय समाज में बौद्ध प्रभाव क्षीण होकर ब्राह्मण प्रभाव अपने चरम पर पहुँच गया था। इस काल में विष्णु, शिव, सूर्य, बुद्ध, बोधिसत्वों तथा तीर्थकरों की पूजा का महत्व बढ़ गया इस कारण उनकी पूजा के लिए बड़ी संख्या में मन्दिरों का निर्माण किया गया। इन मन्दिरों में पूजा-पाठ तथा देवताओं की उपासना की जाती थी।
गुप्तकाल में स्थापत्य के क्षेत्र में नवीन प्ररेणा, नवीन पद्धति और नवीन योजनाओं का विकास हुआ। इस कारण गुप्तकाल में मूर्ति-शिल्प एवं मंदिरों की स्थापत्य-कला ने भारतीय संस्कृति में अपना चिरस्थाई स्थान बना लिया। मान्यता है कि गुप्तकाल में ही सर्वप्रथम पाषाण मंदिरों का निर्माण हुआ।
गुप्तकाल के अनेक मंदिरों के अवशेष प्राप्त हुए हैं जिनसे उस काल के मंदिर-स्थापत्य की जानकारी मिलती है। गुप्तकाल में मंदिर निर्माण कला का विकास तीन चरणों में हुआ। सबसे प्रारम्भिक मंदिर एक कक्ष वाले होते थे और उस कक्ष में प्रतिमा प्रतिष्ठित रहती थी। दूसरे चरण में मंदिरों की छतों में पत्थरों के ऊर्ध्वरोही निर्माण हुए जो या तो सीधे अथवा वक्ररेखी भागों वाले पिरामिड जैसे दृष्टिगोचर होते थे। तीसरे चरण में गुप्तकालीन मंदिर शैली अपने चरम को प्राप्त कर गई।
गुप्तकालीन मंदिर शैली मुख्यतः उत्तर भारत में प्रचलित हुई, इस शैली को ‘नागर शैली’ कहा जाता है। नागर शैली के मंदिरों में गर्भगृह, शिखर, मण्डप, प्रदक्षिणा-पथ, जगती, आमलक, कीर्तिमुख जंघा, रथिकाएं, स्तम्भ, प्रवेश द्वार, चौखट एवं गवाक्षों का निर्माण अनिवार्य रूप से किया जाता है।
प्रतीक शास्त्रियों ने मंदिर के अंग-प्रत्यंग के निर्माण का उद्देश्य एवं विधान निश्चित किया है। मंदिर निर्माण की पृष्ठभूमि में दार्शनिक रहस्य निहित हैं। देव-मंदिर परम-पुरुष का प्रतीक है। आकार-प्रकार, स्वरूप, ऊँचाई, ध्वज, कलश, बाह्य अलंकरण, वेदी, प्राचीर, प्रदक्षिणा, आदि सभी का धर्मशास्त्रीय तथा आगमशास्त्रीय महत्व है। मंदिर की बनावट दो भागों में विभक्त होती है-
(1.) ऊर्ध्व छंद: नींव से लेकर शिखर की चोटी तक की ऊँचाई तथा
(2.) तल छंद: एक सिरे से दूसरे सिरे तक बने भवन की लम्बाई।
शिल्पियों ने देवालयों के विभिन्न भागों पर मूर्तियों के माध्यम से उत्कीर्ण पौराणिक वृत्तान्तों एवं कथानकों को प्रदर्शित करने के लिए निश्चित शिल्प-विधानों का पालन किया है। देवताओं तथा दिग्पालों के अंकन में उनके वाहन एवं आयुधों को एक निश्चित अनुपात में उत्कीर्ण किया गया है। मूर्तिकारों ने मूर्ति में निहित सौन्दर्य-मूल्यों को यथावत् बनाए रखा है।
मंदिरों का गर्भगृह छोटा तथा अन्धकारपूर्ण होता है। इसमें केवल प्रमुख देव स्थापित होता है तथा दीवारें एकदम सपाट होती हैं। गर्भगृह की बाह्य भित्ति अभिष्ठान, मंडोवर, प्रवेशद्वार तथा स्तम्भ मूर्तियों से भरे रहते हैं। गर्भगृह की बाह्यभित्ति पर अंकित देव, गन्धर्व, अप्सरा तथा गंधर्व आदि, मुख्य देव की प्रकृति के विभिन्न रूपों को प्रस्तुत करते हैं।
मंदिर की प्रत्येक प्रतिमा चाहे बाहर हो या भीतर, उनका एक निश्चित उद्देश्य होता है। देव-मूर्तियाँ मुख्य देव के विभिन्न स्वरूपों की मूर्त रूप हैं तथा उपासक के लिए भक्तिभाव का वातावरण उत्पन्न करती हैं एवं ईश्वर की उपस्थिति की अनुभूति करवाती हैं।
गुप्तकालीन ब्राह्मण मंदिरों में भीटागाँव (कानपुर जिला), बुधरामऊ (फतेहपुर जिला), सीरपुर और खरोद (रायपुर जिला) तथा तेर (शोलापुर के निकट) के मंदिरों की शृंखला उल्लेखनीय है। भीटागाँव का मंदिर, जो संभवतः अब तक प्राप्त सबसे प्राचीन मंदिर है, 36 वर्ग फुट के ऊँचे चबूतरे पर मीनार की भाँति 70 फुट ऊँचा बना हुआ है।
बुधरामऊ का मंदिर भी ऐसा ही है। अन्य हिंदू मंदिरों की भाँति इनमें मण्डप आदि नहीं है, केवल गर्भगृह हैं। भीतर की दीवारें यद्यपि सादी हैं तथापि उनमें पट्टे, किंगरियाँ, दिल्हे, आले आदि बनाएं गए हैं। इनके विभिन्न भागों का अनुपात सुंदर है और वास्तु प्रभाव कौशलपूर्ण है। आलों में बौद्धचैत्यों की डाटों का प्रभाव अवश्य पड़ा दिखाई पड़ता है। इनकी शैलियों का अनुकरण शताब्दियों बाद बनने वाले मंदिरों में भी हुआ है।
गुप्तोत्तर कालीन मंदिर स्थापत्य
गुप्तकाल के बाद की मंदिर स्थापत्य कला का वर्गीकरण दो तरह से किया जाता है- (1.) क्षेत्रीयता के आधार पर तथा (2.) सम्प्रदाय के आधार पर।
क्षेत्र के आधार पर मंदिर स्थापत्य शैलियां
क्षेत्र के आधार पर हुए वर्गीकरण में उत्तर भारत की आर्य मंदिर शैली एवं दक्षिण भारत की अनार्य अथवा द्रविड़ मंदिर शैली आती हैं। ग्वालियर के तेली का मंदिर (11वीं शती) और भुवनेश्वर के बैताल देवल मंदिर (9वीं शती) उत्तरी शैली का प्रतिनिधित्व करते हैं जबकि सोमंगलम् एवं मणिमंगलम् आदि के चोल मंदिर (11वीं शती) दक्षिणी शैली का प्रतिनिधित्व करते हैं।
मंदिरों की उत्तरी एवं दक्षिणी शैलियाँ पूरी तरह भौगोलिक सीमा में नहीं बँधतीं। चालुक्यों की राजधानी पट्टदकल के दस मंदिरों में से चार- (1.) पप्पानाथ मंदिर ई.680, (2.) जंबुलिंग मंदिर, (3.) करसिद्धेश्वर मंदिर तथा (4.) काशी विश्वनाथ उत्तरी शैली के हैं जबकि छः मंदिर- (1.) संगमेश्वर ई.750, (2.) विरूपाक्ष ई.740, (3.) मल्लिकार्जुन ई.740, (4.) गलगनाथ ई.740, (5.) सुनमेश्वर और (6.) जैन मंदिर, दक्षिणी शैली के हैं।
10वीं एवं 11वीं शती में पल्लवों, चोलों, पांड्यों, चालुक्यों और राष्ट्रकूटों ने दक्षिणी शैली को संरक्षण दिया। दोनों ही शैलियों पर बौद्ध वास्तु का प्रभाव है, विशेषकर शिखरों में।
सम्प्रदायों के आधार पर मंदिर स्थापत्य की शैलियां
सम्प्रदायों के आधार पर किए गए वर्गीकरण में मंदिरों को नागर, द्रविड़ और बेसर कहा जाता है। नागर शैली में विष्णु के पवित्र पर्वतों का और द्रविड़ शैली में शिव के पवित्र पर्वतों का रूपांकन किया गया है। नागर और द्रविड़ मंदिर-स्थापत्य में स्तम्भों, गर्भक्षेत्रों और शिखरों को अत्यंत कलात्मक बनाया जाता था जबकि बेसर शैली में नागर एवं द्रविड़ दोनों शैलियों का मिश्रण होता है।
बेसर शैली में छतों का आकार-प्रकार कई प्रकार की विशेषताएं लिए हुए होता था। मध्य भारत तथा कर्नाटक के मन्दिरों में प्रायः आर्य तथा द्रविड़ दोनों शैलियों का सम्मिलित स्वरूप मिलता है। चालुक्यों और होयसालों ने मिश्रित बेसर शैली को प्रोत्साहन दिया। विमान शिखर छोटा, फैले कलश, मूर्तियों का आधिक्य, अलंकरण परम्परा का बाहुल्य ही इनकी विशेषता है।
फर्ग्यूसन का मत है कि नागर शैली हिमालय से लेकर विंध्याचल तक फैली हुई थी और द्रविड़ शैली कृष्णा नदी से लेकर कन्याकुमारी तक विस्तृत थी। हैवेल ने इस मत से असहमति व्यक्त करते हए कहा है कि दोनों ही सम्प्रदायों का दोनों ही क्षेत्रों में एक साथ प्रचार हुआ। अनेक स्थानों पर विष्णु और शिव के देवालय साथ-साथ विद्यमान हैं।
बौद्ध स्थापत्य
बौद्ध धर्म के अनुयाई मंदिर न बनाकर स्तूपों, चैत्यगृहों एवं विहारों का निर्माण करते थे। पगोडा शैली स्तूपों का ही विकसित रूप है। स्तूप का शाब्दिक अर्थ होता है- ‘मिट्टी का टीला’। सांची, भरहुत तथा अमरावती भारत के सबसे पुराने स्तूपों मे से हैं। स्तूप भगवान बुद्ध का रूप होता है। अर्थात् स्तूप स्वयं अपने आप में बुद्ध की विशालाकाय प्रतिमा है जो ध्यान मुद्रा में व्याघ्रजीन (सिंहासन) पर मुकुट धारण करके विराजमान है। स्तूप का शिखर भगवान बुद्ध का सिर है, स्तूप का मध्यभाग भगवान बुद्ध का धड़ है, स्तूप की सीढ़ियाँ भगवान के पैर हैं तथा स्तूप का आधार भगवान बुद्ध का सिंहासन है।
हर्षकालीन मंदिर स्थापत्य
हर्ष के शासन काल में प्रशासनिक कौशल के साथ-साथ कला और साहित्य की भी उन्नति हुई। हर्ष स्वयं कला और साहित्य का अनुरागी था। इस काल में भारत में बड़ी संख्या में हिन्दू, बौद्ध तथा जैन धर्मों के मंदिर, चैत्य तथा संघाराम बने। एलोरा का मंदिर, एलिफैण्टा का गुहा मंदिर, कांची में मामल्लपुरम् का शैल मंदिर इसी काल में बने। इस काल में मूर्तियाँ भी बड़ी संख्या में बनीं।
वृहत्तर भारत की भारतीय वास्तुकला
वृहत्तर भारत में आज के अफगानिस्तान से लेकर पाकिस्तान, बांगलादेश, नेपाल, भूटान, बर्मा, लंका एवं इण्डोनेशिया आदि देश सम्मिलित थे। इन सभी देशों में भारतीय वास्तुकला से निर्मित भवन स्थित हैं। नेपाल, श्रीलंका, बर्मा, स्याम, जावा, सुमात्रा, बाली, हिंदचीन और कंबोडिया में भी भारतीय कला के उत्कृष्ट नमूने देखने को मिलते हैं।
नेपाल के भक्तपुर का पगोडा शैली का मण्डप-विहीन मन्दिर भारतीय वास्तुकला का ही प्रतिनिधित्व करता है। नेपाल के शंभुनाथ, बोधनाथ, मामनाथ मंदिर, लंका में अनुराधापुर का स्तूप और लंकातिलक मंदिर, बरमा के बौद्ध मठ और पगोडा, कंबोडिया में अंकोर के मंदिर, स्याम में बैंकाक के मंदिर, जावा में परमबनम का शिव मंदिर, कलासन मंदिर और बोरोबुदूर स्तूप आदि हिंदू और बौद्ध वास्तु के प्रमाण हैं।
जावा में भारतीय संस्कृति के प्रवेश के कुछ प्रमाण गुप्तकाल में 4थी शती ईस्वी में मिलते हैं। वहाँ के अनेक स्मारकों से पता लगता है कि मध्य जावा में ई.625 से ई.928 तक और पूर्वी जावा में ई.928 से ई.1478 तक वास्तुकला का स्वर्णकाल था।
हिन्दू सनातन धर्म परम्परा (Sanatan Dharma Tradition) में सगुण-निर्गुण अंतर्द्वन्द्व उपनिषदों के काल से ही दिखाई देने लगता है। कबीर की रामभक्ति भी इसी...
काशी (Kashi) को पुराणों] धर्मशास्त्रों, विविध हिन्दू ग्रंथों, इतिहास ग्रंथों तथा लोकपरंपरा में अनेक नामों से पुकारा जाता है। इसके प्रमुख नाम निम्नलिखित हैं—
काशी...