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फ्लोरेंस में तीसरा दिन – 24 मई 2019 (10)

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फ्लोरेंस में तीसरा दिन

आज फ्लोरेंस शहर देखने का कार्यक्रम बनाया था जिसे स्थानीय भाषा में फिरेंजे कहते हैं। किसी भी शहर के भीतरी भाग को देखना हो तो सबसे बढ़िया माध्यम पैदल चलना ही हो सकता है।

आंख खुली तो देखा पाँच बज रहे हैं। यह कमाल ही था कि शरीर की जैविक घड़ी में भी अब भारत के पाँच बजे की बजाय इटली के पाँच बजे का अलार्म स्थिर हो गया था। हमें आज इटली में आठवां दिन था। उठते ही सैलफोन चार्जिंग पर लगाया तथा उसमें कैद तस्वीरों एवं वीडियो को गूगल पर ट्रांसफर किया।

ये दोनों कार्य भी यात्रा के दौरान अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। इस कार्य में एक भी दिन की चूक की तो भारी गड़बड़ हो सकती है। इस बार मैं लैपटॉप साथ नहीं लाया था, इसलिए फोटो और वीडियो प्रतिदिन गूगल पर ट्रांसफर करने पड़ रहे हैं। इसके बाद डायरी लिखने बैठ गया और सात बजे तक लिखता रहा।

घर से निकलते-निकलते 10.30 बज गए। आज फ्लोरेंस शहर देखने का कार्यक्रम बनाया था जिसे स्थानीय भाषा में फिरेंजे कहते हैं। किसी भी शहर के भीतरी भाग को देखना हो तो सबसे बढ़िया माध्यम पैदल चलना ही हो सकता है।

हमने पिताजी को घर पर छोड़ा और हम ट्राम से फ्लोरेंस रेल्वे स्टेशन पहुँचे। यहांँ से हमने पैदल यात्रा आरम्भ की। स्टेशन से थोड़ी दूरी पर एक चौक है जहाँ एक पुराना किंतु विशाल प्रेयर हाउस है। यहीं से घने बाजार का सिलसिला आरम्भ होता है। पर्यटकों के लिए प्रार्थना घर में प्रवेश करना प्रतिबंधित है, इस आशय की सूचना पढ़कर हम बाजार की तरफ मुड़ गए।

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यहाँ कुछ चित्रकार सड़क के किनारे मेज-कुर्सी लगाकर चित्र बना रहे थे। ये चित्र इतने सुंदर, मनोहारी और संतुलित थे कि कम्प्यूटर के लिए भी बनाने कठिन हैं। सदियों पहले फ्लोरेंस शहर ने इन्हीं चित्रों और मूर्तियों के निर्माण से इटली की जड़ता को समाप्त करके नवयुग का अवतरण किया था। वह युग भी कभी का बीत गया किंतु चित्र और मूर्तियां बनाने की परम्परा शहर ने आज भी जीवित रख रखी है। इस चौक के मध्य भाग में फ्लोरेंस के किसी दार्शनिक या चित्रकार की बड़ी प्रतिमा लगी हुई है। थोड़ा आगे चलने पर लैदर से बने सामान के क्योस्क लगे हुए थे। ये क्योस्क लकड़ी के अस्थाई ढांचों से बने हैं तथा दोनों ओर से सड़क के इतने बीच में आ गए हैं कि यात्रियों के लिए चलना भी कठिन हो जाता है। यहाँ चमड़े की कमर-पेटियां और लेडीज पर्स अधिक बिक रहे थे। भारतीय रुपए के हिसाब से यहाँ की प्रत्येक चीज बहुत महंगी थी। इन्हीं गलियों में चलते हुए हम एक विशाल चौक पर पहुँचे। इस चौक में इतनी अधिक भीड़ थी कि देखने वाले को लगता है मानो पूरी दुनिया ही सिमट कर इस स्थान पर आ गई हो! यहाँ ई.1408 में निर्मित एक बैपिस्ट्री है। सफेद और हरे रंग के इटैलियन पत्थरों से निर्मित यह बैपिस्ट्री अत्यंत कलात्मक है।

इसके आसपास भी अन्य कई विशाल भवन हैं। एक भवन तो ऊँची मीनार की तरह आकाश में जा घुसा प्रतीत होता है। कुछ पर्यटक क्रेन में बने प्लेटफॉर्म पर खड़े होकर इस सैंकड़ों फुट ऊंची मीनार के ऊपर तक जा रहे थे और वहाँ से नीचे की दुनिया देख रहे थे। हर ओर भीड़ ही भीड़। पर्यटकों के रेले के रेले समुद्री लहरों की तरह आ रहे थे और रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। इनमें से एक भवन में म्यूजियम भी बना हुआ था जिसमें प्रवेश करने के लिए लोग घण्टों से तिहरी कतारों में लगे हुए थे।

 इस भवन के बाहर एक सूचना पट्ट लगा है जिसके अनुसार इस बैपिस्ट्री के उत्तरी द्वार का जीर्णोद्धार करने के लिए दुनिया भर के सेठों ने धन दिया था। उनमें भारतीय उद्योगपति एवं स्वतंत्रता सेनानी जमना लाल बजाज का नाम सबसे ऊपर है।

चौक पर विक्टोरिया जैसी शैली में बनी घोड़ा-बग्घियां चल रही थीं जिन पर दुनिया भर से आए पर्यटक पूरे चौक एवं आसपास की गलियों का चक्कर लगा रहे थे। भारत में इन्हें टमटम कहा जाता है। संभवतः इस गाड़ी पर लगी घण्टियों की आवाज के कारण! इस चौक में एक लम्बी कतार में बहुत से चित्रकार बैठकर चित्र बना रहे थे। बहुत से पर्यटक इन चित्रकारों से बात करने का प्रयास करते हैं। इन चित्रकारों में 14-15 साल की किशोरियों से लेकर 80-85 साल के वृद्ध चित्रकार शामिल हैं। सचमुच फ्लारेंस चित्रकारों का नगर है।

यू हैव टेकन माई ग्लासेज

हम इन दृश्यों को देखते हुए उस चौक पर घूम ही रहे थे कि अचानक एक विदेशी युवती ने विजय की आंखों पर से चश्मा उतार लिया। शक्ल-सूरत से वह कोई चीनी लड़की दिखाई दे रही थी। उस युवती ने बहुत गुस्से में अंग्रेजी भाषा में विजय को डांटा- ‘हाऊ डेयर यू टू टेक माई ग्लासेज!

इस अप्रत्याशित छीन-झपट से विजय हक्का-बक्का रह गया और यह समझने का प्रयास करने लगा कि यह अनाजन स्त्री ऐसा क्यों कर रही है? इससे पहले कि विजय कुछ जवाब दे पाता, उस लड़की का साथी दौड़ता हुआ आया और उसने युवती को अपने हाथ में रखा एक चश्मा दिखाते हुए (संभवतः चीनी भाषा में) कुछ कहा। उस लड़की ने तुरन्त चश्मा विजय को लौटा दिया और माफी मांगती हुई बोली- ‘आई एम सॉरी, आई थौट यू हैव टेकन माई ग्लासेज।’ विजय अब भी कुछ नहीं बोल पाया, केवल मुस्कुरा दिया।

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान हम विजय के पास ही खड़े हुए थे किंतु हम सभी का ध्यान चौक में चल रही विभिन्न गतिविधियों की तरफ होने से हम इस घटना को देख ही नहीं पाए। जब वह युवती जाने लगी तब विजय ने हमें पूरा घटनाक्रम बताया।

दैत्याकार मूर्तियां

यहाँ से हम कुछ गलियां पार करके लगभग 650 मीटर दूर स्थित एक अन्य चौक में पहुँचे। गूगल मैप हमारा पथ-प्रदर्शन करता रहा। इन गलियों से गुजरते हुए हमें बड़े-बड़े दरवाजों वाले भवनों के सामने से गुजरना होता था। हमें यह देखकर आश्चर्य होता था कि हर घर का दरवाजा पूरी तरह बंद था।

इसलिए उनके भीतर एक दृष्टि फैंकना भी संभव नहीं था। इस चौक के बीचों-बीच एक बड़ा सा फव्वारा है जिसके चारों ओर बहुत सारी मनुष्याकार से भी बड़े आकार की मूर्तियां लगी हुई हैं। ज्यादातर मूर्तियां सफेद संगमरमर की हैं और लगभग सभी मूर्तियां बिना वस्त्रों के हैं। फव्वारे की बाहरी रिंग पर बनी हुई कुछ दैत्याकार मूर्तियां कांसे की हैं जो पानी बहते रहने के कारण गहरी हरी हो गई हैं।

पियाजा डेला सिगनोरिया

वस्तुतः इस समय हम जिस चौक में पहुँच गए थे, उसका नाम पियाजा डेला सिगनोरिया अर्थात् सिगनोरिया चौक है। इस चौक में विश्व-प्रसिद्ध ‘फोंटाना डेल नेट्टूनो’ अर्थात् ‘नेपच्यून देवता का फव्वारा’ स्थित है। यह फव्वारा प्राचीन रोमन देवता नेपच्यून को समर्पित है जिसे भारत में वरुण देव कहा जाता है।

वेदों में वरुण को असुर माना गया है जो बाद में देवताओं से मित्रता हो जाने के कारण देवता बन गया था। इटली में भी नेपच्यून की जो प्राचीन प्रतिमाएं मिलती हैं, उनकी आकृति देवताओं की तरह सौम्य न होकर दैत्यों की तरह क्रूर दिखाई देती हैं। प्राचीन यूनानी धर्म में नेपच्यून को शुद्ध जल एवं समुद्रों का देवता माना जाता था।

यह यूनानी देवता पोजीडोन का सहयोगी देवता है तथा इसे जूपीटर (बृहस्पति) एवं प्लूटो (यम) का भाई माना जाता है। प्राचीन रोमन-वासी नेपच्यून को लैटिन भाषा में नेप्ट्यूनस कहते थे तथा जल एवं झरनों के देवता के रूप में उनकी पूजा करते थे। नेपच्यून स्वर्ग, धरती तथा पाताल लोक का देवता था।

इसे घोड़ों के देवता के रूप में भी स्वीकार किया गया। नेपच्यून देवता की पत्नी का नाम सेलेसिया था। प्राचीन यूनानी धर्म में ओसेनस को भी समुद्र और नदियों का देवता माना जाता था। रोम वासियों ने भी इस यूनानी देवता को उसी रूप में स्वीकार किया। इटली की राजधानी रोम तथा अन्य नगरों में नेपच्यून तथा ओसेनस दोनों देवताओं के नाम वाले झरने एवं फव्वारे मिलते हैं जिनमें नेपच्यूटन अथवा ओसेनस देवताओं के साथ-साथ अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी लगी हुई हैं।

प्राचीन यूनानी एवं प्राचीन रोमन देवी-देवताओं की अधिकांश प्रतिमाएं निर्वस्त्र हैं। कुछ मूर्तियों की कमर अथवा वक्ष पर एक कपड़ा उत्कीर्ण किया जाता है। यही कारण है कि इटली की राजधानी रोम एवं अन्य नगरों में चौराहों, मुख्य गलियों एवं झरनों तथा फव्वारों आदि पर संगमरमर एवं कांसे की विशाल निर्वस्त्र प्रतिमाएं दिखाई देती हैं।

यूनानी एवं रोमन देवी-देवता वस्तुतः भारतीय वैदिक देवी-देवताओं के ही बदले हुए नाम हैं। वेदों में नेपच्यून को वरुण, जूपीटर को बृहस्पति तथा प्लूटो को यम कहा गया है जबकि ओसेनस ऋग्वेद में वर्णित वृत्र का बदला हुआ रूप है। वेदों में वृत्र को असुर माना गया है जिसने समुद्रों के जल को बांध लिया था और इन्द्र ने वृत्र का वध करके समुद्रों के जल को मुक्त करवाया। रोम का मुख्य फव्वारा ओसेनस अर्थात् वृत्र को एवं फ्लोरेंस का मुख्य फव्वारा नेपच्यून अर्थात् वरुण देवता को समर्पित है।

फ्लोरंस में नेपच्यून फाउंटेन के नाम से कई फव्वारे हैं जिनमें से पियाजा डेला सिगनोरिया अर्थात् सिगनोरिया चौक पर स्थित नेपच्यून फाउंटेन प्रमुख है। यह फव्वारा पलाज्जो वेचियो के सामने बना हुआ है। इस फव्वारे की मूर्तियों के निर्माण में संगमरमर तथा कांसे का प्रयोग हुआ है।

यह फव्वारा मूलतः ई.1565 में बना था। इसका डिजाइन बेक्कियो बैण्डिनेली नामक शिल्पकार ने तैयार किया था। इस फव्वारे की मूर्तियां बर्टोलोमियो नामक मूर्तिकार ने बनाई थीं। कांसे से निर्मित समुद्री-घोड़ों का निर्माण जियोवानी डा बोलोग्ना ने किया था। ई.1559 में फ्लोरेंस नगर में पेयजल की आपूर्ति के लिए एक नवीन नहर का निर्माण किया गया।

तब फ्लोरेंस के शासक कोसीमो प्रथम मेडिसी ने इस फव्वारे को डिजाइन करने के लिए एक प्रतियोगिता का आयोजन किया। उस समय रोम साम्राज्य का विस्तार लगभग सम्पूर्ण भू-मध्य सागरीय क्षेत्र पर था।

इसलिए उस काल में रोम एवं फ्लोरेंस में बने अधिकांश फव्वारों में समुद्रों के देवता नेपच्यून एवं उससे सम्बद्ध देवी-देवताओं की प्रतिमाएं लगती थीं। जो रोमन साम्राज्य के भूमध्यसागर पर अधिकार होने का प्रतीक थीं। नेपच्यून को सामान्यतः रथ पर आरूढ़ दिखाया जाता था जिसे काल्पनिक समुद्री घोड़ों द्वारा खींचा जाता था।

फ्लोरेंस में हुई प्रतियोगिता में बेक्कियो बैण्डिनेली का डिजाइन चुना गया किंतु काम पूरा होने से पहले ही उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद शिल्पकार अम्मान्नाटी को काम पूरा करने के लिए नियुक्त किया गया। इस फव्वारे में लगे नेपट्यून देवता का चेहरा, फ्लोरेंस के ग्राण्ड ड्यूक कोसीमो के चेहरे की अनुकृति है।

यह प्रतिमा लगभग 13 फुट ऊंची है। इसे अपून मार्बल से बनाया गया है। यह मार्बल मकराना के मार्बल से भी अधिक सफेद है। यह फव्वारा ई.1565 में बनकर तैयार हुआ ताकि फ्लोरेंस के तत्कालीन शासक फ्रैंसिस्को डे मेडिसी प्रथम तथा ऑस्ट्रिया की राजकुमारी ग्राण्ड ड्यूश जोहान्ना के विवाह को यादगार बनाया जा सके। फ्लोरेंसवासियों को यह फव्वारा  पसंद नहीं आया और उन्होंने फव्वारे में लगी नेपट्यून की मूर्ति को ‘विशाल सफेद दैत्य’ कहकर नकार दिया।

 नेपच्यून की प्रतिमा के चारों ओर कांसे की देव-प्रतिमाएं लगाई गई हैं जिन्हें उनके गहरे हरे रंग के कारण सहज ही पहचाना जा सकता है। फव्वारे के निकट अन्य देवी-देवताओं के साथ-साथ नेप्ट्यून की पत्नी देवी सैयला तथा चैरीब्डिस की प्रतिमाएं बनाई गई हैं। ये सभी प्रतिमाएं निर्वस्त्र हैं क्योंकि प्राचीन यूनानी एवं रोमन देवता इसी प्रकार बिना कपड़ों के ही बनाए जाते थे।

फव्वारे के चारों ओर लगी तथा उसके निकट चौक में यत्र-तत्र बनी हुई संगमरमर एवं कांसे की प्रतिमाओं के निर्माण में लगभग 10 साल लगे। फव्वारे के चारों ओर अष्टकोणीय कुण्ड बनाया गया है। उसके ठीक मध्य में नेप्ट्यून का प्लेटफॉर्म खड़ा किया गया है। इस चौक में खड़ी समस्त प्रतिमाएं ई.1574 तक बनकर तैयार हुईं। ई.1800 में उन प्रतिमाओं की अनुकृतियां तैयार करवाई गईं तथा मूल प्रतिमाओं को राष्ट्रीय संग्रहालय में भेज दिया गया।

विगत चार सौ सालों में इस फव्वारे को अनेक प्रकार के नुक्सान सहन करने पड़े। कुछ समय बाद फव्वारा उजड़ गया तथा इसका कुण्ड धोबियों द्वारा कपड़े धोने के काम में लिया जाने लगा। 25 जनवरी 1580 को इस फव्वारे में वाण्डाल आक्रांताओं द्वारा तोड़-फोड़ की गई।

इस फव्वारे में एक ‘सैटिर’ की प्रतिमा लगी हुई थी जिसे ई.1830 के कार्निवल के दौरान किसी ने चुरा लिया। जंगल के देवता को ‘सैटिर’ कहते हैं। यूनान में इसका अंकन एक ऐसे मनुष्य की तरह किया जाता था जिसके कान तथा पूंछ घोड़े की तरह हों। रोमन सैटिर में इसका अंकन ऐसे मनुष्य की तरह किया जाता था जिसके कान, पूंछ, पैर तथा सींग बकरी के जैसे होते थे। कुछ देशों में इस देवता का अंकन पंख वाले मनुष्य के रूप में किया जाता था।

ई.1848 में इस फव्वारे पर बमों से हमला किया गया। सरकार द्वारा इसे बनाया जाता था तथा उपद्रवी तत्वों द्वारा इसे तोड़ दिया जाता था। इसका मुख्य कारण यह प्रतीत होता है कि इस काल में ईसाई संघ के कुछ पदाधिकारी नहीं चाहते थे कि प्राचीन रोमन धर्म के देवी-देवताओं की प्रतिमाएं लोगों को दिखाई दें तथा उनमें अपने पुराने धर्म के प्रति आस्था का उदय हो।

फिर भी सरकार समय-समय पर फ्लोरेंस शहर की पहचान के रूप में इस फव्वारे का जीर्णोद्धार करवाती रही। 4 अगस्त 2005 की रात्रि में कुछ गुण्डों ने फव्वारे पर हमला किया। तीन लोग नेप्ट्यून देवता की प्रतिमा पर चढ़ गए और उन्होंने प्रतिमा का हाथ एवं त्रिशूल तोड़ दिया। वर्ष 2007 में इस प्रतिमा की मरम्मत की गई। वर्ष 2007 में एक बार पुनः चार लड़कों ने इस फव्वारे को नुक्सान पहुँचाया।

इटली में लगभग एक दर्जन नेप्ट्यून (नेप्चयून) फाउण्टेन हैं। फ्लोरेंस शहर के बोबोली गार्डन्स में पलाजो पित्ती के पीछे भी एक नेप्ट्यून फाउण्टेन है। इस फव्वारे की प्रतिमाएं भी बोलोग्ना ने बनाई थीं। इस फव्वारे को देखने के लिए संसार भर से आए पर्यटकों की इतनी भीड़ रहती है कि इसका चित्र उतारना भी आसान नहीं है।

उन्हीं दिनों जियोवान्नी एंजिलो मोण्टोर्सोली ने इटली के सिसली राज्य में स्थित मेसीना शहर में ऐसा ही फव्वारा बनाया। ई.1878 में रोम में भी नेप्ट्यून फाउण्टेन बनाया गया जिसमें नेप्ट्यून को एक ऑक्टोपस से लड़ते हुए दिखाया गया है।

चौक के बीचों-बीच एक विशाल और ऊंचे घोड़े पर किसी घुड़सवार योद्धा की प्रतिमा है। यह कांसे की विशाल प्रतिमा है तथा गहरे हरे रंग की दिखाई देती है। मेरे अनुमान से यह प्रतिमा इस फव्वारे को बनवाने वाले राजा फ्रैंसिस्को डे मेडिसी (प्रथम) की है तथा यह भी फव्वारे के साथ ई.1565 में बनकर तैयार हुई थी। इस प्रतिमा में बने घोड़े तथा राजा की आकृति का शिल्प और धातु ठीक वैसे ही हैं जैसे फव्वारे में लगी कांस्य-निर्मित देव-मूर्तियों के हैं।

लघु शंका

फव्वारे को देखकर हम चले ही थे कि मुझे लघुशंका से निवृत्त होने की इच्छा होने लगी। हम लगभग पूरा शहर घूम आए थे किंतु किसी भी स्थान पर हमें टॉयलेट की सुविधा दिखाई नहीं दी थी। क्या यहाँ के लोगों को पेशाब नहीं लगता!

मैंने विजय से प्रश्न किया तो वह समझ गया कि मेरी समस्या क्या है! उसने भानु से कहा कि वह सामने वाली शॉप पर काम कर रही लड़की से टॉयलेट के बारे में पूछे। भानु ने उस लड़की से बात की। हमारे सौभाग्य से वह अंग्रेजी जानती थी। उसने भानु को बताया कि यहाँ कोई पब्लिक टॉयलेट नहीं होता। आप किसी रेस्टोरेंट में जाइए, वहाँ से कुछ खरीदिए या खाइए, वहाँ आपको टॉयलेट की फैसिलिटी मिल जाएगी।

भानु द्वारा लाई गई यह सूचना किसी बड़े ताले को खोलने के लिए चाबी से कम नहीं थी। मैंने तुरंत ही एक रेस्टोरेंट वाले से टॉयलेट के लिए रिक्वेस्ट की क्योंकि यहाँ के रेस्टोरेंटों में हम कुछ खरीदने की तो सोच ही नहीं सकते थे। मांस-मछली और अण्डों की तरफ देखते ही हमें मतली आती थी।

रेस्टोरेंट का मालिक कुछ मजाकिया किस्म का आदमी था। उसे रोज मेरे जैसे पर्यटकों से पाला पड़ता होगा। इसलिए उसने हंसकर कहा- फिफ्टीन यूरो!’ उसकी बात सुकनकर मेरा मुंह उतर गया। यह तो बहुत बड़ी राशि थी। भारत के हिसाब से 1200 रुपए। फिर भी मैंने किसी तरह हिम्मत बटोर कर उससे कहा- ‘दिस इज वैरी हाई!’

दुकानदार फिर हंसकर बोला- ‘आ’म जोकिंग, प्लीज गो इनसाइड।’ उसने एक कौने में बने टॉयलेट की तरफ संकेत कर दिया। मेरी जान में जान आई। यहाँ से हम अपने घर की तरफ चल दिए। यह रास्ता ठीक उसी नदी की तरफ होकर जाता था जिसके किनारे-किनारे हम पहले दिन एक घण्टा टहले थे।

सोना सस्ता और टमाटर महंगा!

मार्ग में एक ज्यूलरी मार्केट था। इस बाजार को देखकर आंखें चौंधिया जाती हैं। सोने-चांदी, प्लेटिनम, हीरे, जवाहरात एवं सेमी-प्रीशियस स्टोन से बनी ज्यूलरी की इतनी सारी दुकानें एक साथ देखकर हैरानी हुई। दुकानों के शोकेस आभूषणों से ठसाठस भरे हुए हैं और गलियां दुनिया भर से आए पर्यटकों से भरी हैं।

इतनी सारी दुकानें, इतनी सारी ज्यूलरी और इतने सारे पर्यटकों की उपस्थिति देखकर ही अनुमान लगाया जा सकता है कि यहाँ प्रतिदिन कई सौ करोड़ रुपयों के आभूषणों की बिक्री होती होगी। यहाँ सोने का भाव 350 यूरो अर्थात् 28 हजार भारतीय रुपए रुपए प्रति 10 ग्राम है। जबकि इन दिनों भारत में सोने का भाव 32000 रुपए प्रति 10 ग्राम है।

दूसरी ओर यदि इटली में भारतीय मुद्रा में 32 हजार रुपए का टमाटर खरीदा जाए तो केवल 100 किलो टमाटर आएंगे किंतु भारत में इतने ही रुपए में 1,000 किलो टमाटर खरीदे जा सकते हैं। यह मेरी समझ से बाहर की बात थी कि यदि इटली में टमाटर का भाव भारत की तुलना में 10 गुना महंगा है तो सोना भारत से भी सस्ता क्यों है? हम भारत में सस्ता टमाटर खा रहे हैं या इटली के लोग सस्ता सोना खरीद रहे हैं?

मैं और विजय इन ज्यूलरी शॉप को देखते हुए आगे बढ़ गए। आगे वही नदी थी जिसके किनारे हम पहले ही दिन एक घण्टे तक घूमते रहे थे। नदी के किनारे पहुँचकर हमने देखा कि मधु, भानु और दीपा हमारे साथ नहीं हैं। हम दोनों वापस बाजर की तरफ लौटे। वे तीनों ठीक उसी स्थान पर खड़ी हुई थीं

जहाँ से बाजार समाप्त होता था और नदी का तट आरम्भ होता था। नदी के किनारे आधे घण्टे चलने के बाद हम अपने सर्विस अपार्टमेंट पहुँचे। अब तक दोपहर के डेढ़ बज गए थे। हम पूरे तीन घण्टे तक या तो चलते रहे थे या खड़े रहे थे। शहर में बैठने की बेंच इक्का-दुक्का स्थानों पर थीं और उन पर पर्यटक पहले से ही जमे हुए थे।

इस कारण हमें बैठने का अवसर कहीं नहीं मिला था। सायं सवा पाँच बजे मैं और विजय पिताजी के साथ घूमने निकले। हमने ट्राम के टिकट खरीदे। इन्हीं टिकटों से किसी भी सिटी बस में भी यात्रा की जा सकती थी। हमारा विचार पूरे डेढ़ घण्टे में ट्राम या बस में बैठे रहकर शहर घूमने का था ताकि पिताजी को पैदल नहीं चलना पड़े।

हम ट्राम से शहर के अंतिम छोर तक गए। इस स्थान पर हमें पहली बार इटली की मिट्टी और घास दिखाई दी। हम दूसरी ट्राम पकड़ कर वापस लौटे और इस बार शहर के दूसरे छोर पर उतरे।

रोमांचक अनुभव रोम और फ्लोरेंस की मैट्रो रेल यात्रा

इटली के नगरों में ट्राम सेवा को चलते हुए देखना और उसमें यात्रा करना एक आनंद दायक अनुभव है। रोम संसार के प्राचीन नगरों में से एक है किंतु जिस तरह से उसका आधुनिकीकरण हुआ है, उसे देखकर लगता है कि रोम हाल ही में कुछ वर्षों में बनकर तैयार हुआ है। ट्राम सेवा उसकी सुंदरता में चार-चांद लगा देती है।

इसके लिए न तो ऊंचे प्लेट फार्म बनाने पड़ते हैं और न पटरियों के किनारे गिट्टी बिछानी पड़ती है। इसलिए बच्चे, बूढ़े, स्त्रियां सभी इसकी सवारी पसंद करते हैं। यह नगर के आवागमन को तो सुगम बनाती ही है, साथ ही सिटी बस की सेवा से भी अधिक सुगम है। यह बहुत कम समय में शहर के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में पहुँचा देती है।

बसों, कारों तथा अन्य साधनों की अपेक्षा यह अधिक सुरक्षित एवं आराम देह सेवा है। फ्लोरेंस संसार के सबसे सुंदर शहरों में से एक है। इस नगर की ट्राम सेवा दर्शकों को लुभाती है। फ्लोरेंस आने वाले पर्यटक ट्राम का आनंद उठाना कभी नहीं भूलते।

जिस स्थान पर हम ट्राम से उतरे, वहाँ से वह चौक निकट ही था जहाँ आज प्रातः हमने विशाल बैपिस्ट्री देखी थी। हमें एक मिनी बस दिखाई दी। हम उसी बस से बैपिस्ट्री तक पहुँचे। इस समय भी यहाँ सुबह जैसी ही भीड़ थी। लोग विक्टोरिया गाड़ियों का आनंद ले रहे थे। इस चौक को देखने के बाद हम बस में बैठकर सर्विस अपार्टमेंट लौट आए।

दिन अब भी काफी बाकी था। इसलिए इस बार पिताजी घर पर रहे और बाकी के सदस्य दूध, फल और तरकारी खरीदने के लिए निकल गए। इन्हें आंख मींचकर खरीदना पड़ा था। भारत में दूध और सब्जियां 60 रुपए किलो तथा फल 100-125 रुपए किलो मिल जाते हैं किंतु यहाँ दूध से लेकर आलू-प्याज, टमाटर, सेब, केला, और आड़ू 300-350 रुपए किलो मिलते हैं।

रात को नौ बजे जब हम सर्विस अपार्टमेंट पर लौटे, तब भी दिन का पर्याप्त उजाला मौजूद था। आज दिन भर हमें बहुत पैदल चलना पड़ा था इस कारण बुरी तरह थक गए। खाना खाकर लेटते ही नींद आ गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

वेनेजिया में पहला दिन – 25 मई 2019 (11)

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वेनेजिया में पहला दिन

वेनेजिया में पहला दिन हमें अब तक विदेश यात्राओं में हुए अनुभवों से पूरी तरह अलग अनुभव देने वाला रहा। समझ में नहीं आता कि यह कैसा शहर है। शहरों में से नदी या नहरें गुजरती हुई तो हमने देखी थीं किंतु यह शहर समुद्री नदियों एवं नहरों के बीच से होकर गुजरता हुआ प्रतीत होता है।

सुबह 5.27 पर आंख खुली। शौचादि से निवृत्त होकर कल की यात्रा का विवरण लिखने बैठ गया। आज हमें प्रातः 11 बजे वेनिस के लिए निकलना है। दोपहर 12 बजे की ट्रेन है। वेनिस में जो सर्विस अपार्टमेंट विजय ने बुक करवाया था, उसके मालिक को विजय ने यहीं से मैसेज कर दिया कि हम दोपहर 2.30 बजे वेनिस पहुँचेंगे।

उसका जवाब आया कि नहीं आप 2.30 बजे नहीं आ सकते, आपका समय दोपहर बाद तीन बजे से है। विजय ने वापस लिखा कि हमारी ट्रेन 2.35 पर वेनिस पहुँचेगी। हम उसके बाद ही सर्विस अपार्टमेंट पहुँचेंगे। तब तक तीन बज ही जाएंगे!

अब तक हम इटली के तीन नगर देख चुके हैं। हमारी योजना में सम्मिलित चौथा और अंतिम नगर वेनिस है जो विश्व भर में श्रेष्ठ वाइन बनाने के लिए जाना जाता है। हम ठीक 11 बजे सर्विस अपार्टमेंट से बाहर आ गए।

यहाँ से 100 मीटर चलकर ट्राम का स्टेशन था तथा 750 मीटर चलकर शॉर्टकट से हम सीधे मुख्य रेल्वे स्टेशन पहुँच सकते थे। हमने 750 मीटर वाला रास्ता लिया ताकि 7.5 यूरो अर्थात् 600 भारतीय रुपए बचाए जा सकें। जब हम संकरी गलियों से होते हुए रेल्वे स्टेशन जा रहे थे तो हमने देखा कि ये गलियां भी इतनी साफ सुथरी थीं जिनकी भारत में कल्पना भी नहीं की जा सकती।

आई डोण्ट केयर

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हमारे जैसे बहुत से पर्यटक अपना सामान खींचते हुए वेनेजिया रेल्वे स्टेशन की तरफ जा रहे थे। इसका अर्थ यह था कि केवल हम ही यूरो नहीं बचा रहे थे अपितु दुनिया भर से आए लोगों में से बहुत से हमारे जैसे ही थे। हम 11.20 पर रेल्वे स्टेशन पहुँचे जबकि हमारी गाड़ी 12.30 पर थी। यहाँ भी रोम रेल्वे स्टेशन की तरह बैठने की कोई सुविधा नहीं थी अतः हम लगभग सवा घण्टे तक खड़े ही रहे। 12.20 पर इलैक्ट्रोनिक पैनल पर गाड़ी का प्लेटफॉर्म नम्बर डिस्प्ले हुआ, 12.25 पर गाड़ी आई और जैसे ही हम गाड़ी में बैठे, ठीक 12.30 पर चल पड़ी। यह भी एक बुलेट ट्रेन थी तथा पूरे रास्ते में 250-300 किलोमीटर प्रति घण्टे की गति से चलती रही। मार्ग में 2-3 स्टॉप ही थे किंतु वेनेसिया इटली के लगभग धुर उत्तरी क्षेत्र में एण्ड्रिाटिक समुद्र के तट पर स्थित है। इसलिए इस यात्रा में 2 घण्टे लग गए। ट्रेन ठीक 2.35 पर पहुँच गई। रेलवे स्टेशन पर उतरकर  विजय ने वेनेसिया के सर्विस अपार्टमेंट के मालिक को व्हाट्सैप पर सूचित किया कि हमारी ट्रेन पहुँच गई है। हम लगभग आधे घण्टे में सर्विस अपार्टमेंट पहुँच जाएंगे। इस पर सर्विस अपार्टमेंट के मालिक का जवाब आया कि आई डोण्ट केयर, व्हेदर योअर ट्रेन ऑर यू रीचेज एट 2.35, योअर टाइम स्टार्ट्स एट थ्री!

हमें उसका संदेश पढ़कर कुछ चिंता हुई। यह झगड़ालू किस्म का आदमी लग रहा था। कहीं वह हमें अपना अपार्टमेंट देने से ही मना न कर दे। हमने उसे 55 हजार रुपए केवल तीन रात्रियों के लिए दिए थे। रेलवे स्टेशन से सर्विस अपार्टमेंट लगभग 400 मीटर था तथा यहाँ से केवल पैदल ही जाया जा सकता था। गूगल की सहायता से हम लगभग 10-12 मिनट में सर्विस अपार्टमेंट वाली गली में पहंच गए।

 यहाँ विजय के फोन पर मकान मालिक का फोन आया- ‘आयम वेटिंग फॉर यू गाइज फॉर ए लोंग टाइम! व्हेयर आर यू!’

विजय ने कहा- ‘वी हैव एण्टर्ड द स्ट्रीट एण्ड सर्चिंग योअर हाउस।’

इतना सुनते ही एक मकान के सैकण्ड फ्लोर की खिड़की से किसी की आवाज आई- ‘हे! लुक हीयर।’

हमने उस ओर देखा तो पाया कि कोई हमें अपनी ओर बुला रहा था। हम समझ गए कि यही मकान मालिक है। मैंने उसे हाथ हिलाते हुए देखकर राहत की सांस ली तथा सोचा कि अब यह हमें सर्विस अपार्टमेंट देने से मना नहीं करेगा।

इतना बुरा भी नहीं!

हम मकान का बाहरी दरवाजा खोलकर और दो मंजिल सीढ़ियां चढ़कर जब सर्विस अपार्टमेंट में पहुँचे तो वह सीढ़ियों पर ही खड़ा था। उसने हंसकर हमें वेलकम कहा और अपना नाम लॉरेंजो बताया। उसने हमारे हाथों से सामान ले लिया। हमने उससे मना किया किंतु वह नहीं माना। उसका यह एटीट्यूट देखकर मुझे और अधिक तसल्ली हो गई। पता नहीं उसे क्या कन्फ्यूजन हुआ था, आदमी तो बुरा नहीं था! या तो उसे विजय के द्वारा लिखी जा रही अंग्रेजी समझ में नहीं आ रही थी, या फिर वह हमारे पाँच-दस मिनट पहले पहुँचने की बात से परेशान था!

हे गाइज! यू डोण्ट टच!

उसने विजय, मधु और भानु को सर्विस अपार्टमेंट की सारी व्यवस्थाएं समझाई। पासपोर्ट स्कैन किए। सिटी टैक्स लिया और चाबियों के दो सैट दिए। इस दौरान मैं और पिताजी एक सोफे पर बैठे रहे। अंत में अपनी बात समाप्त करके जाते समय उसने विजय को डूज एण्ड डोण्ट्स की भी हिदायत दी। उसने विजय से हाथ मिलाया और फिर अपना हाथ मधु की तरफ बढ़ा दिया। मधु ने हंसकर दोनों हाथ जोड़ दिए। इस पर वह जोर से हंसा और बोला- ‘हे गाइज यू डोण्ट टच!’ और फिर मुझसे तथा पिताजी से हाथ मिलाकर चला गया।

भारत के नक्शे में नहीं है काश्मीर!

यह एक मध्ययुगीन वेनेजियन शैली का आलीशान बहुमंजिला घर है। हमारा फ्लैट दूसरी मंजिल पर है। फ्लैट काफी बड़ा है और इसमें दो कमरे, एक बड़ा हॉल, एक बहुत बड़ी किचन, दो लैट-बाथ, एक लॉबी है। फ्लैट में बढ़िया किस्म की सागवान के ऊँचे दरवाजे और खिड़कियां हैं जिन पर महंगे पर्दे पड़े हैं। हर कमरा महंगे फर्नीचर और इलैक्ट्रोनिक सामान से भरा हुआ है। हॉल के एक कोने में एक बड़ा सा पियानो भी रखा है।

पूरे मकान में इटैलियन मार्बल का फर्श है जिसकी पॉलिश इतनी चमकदार है कि शीशे को भी मात दे। घर के प्रत्येक कमरे में लकड़ी के लम्बे-लम्बे रैक लगे हुए हैं जिनमें जियोग्राफी की मोटी-मोटी किताबें और एटलस भरे पड़े हैं। कुछ फिक्शन भी है जो इटैलियन, स्पेनिश अंग्रेजी आदि भाषाओं में है। हमने अनुमान लगाया कि यह किसी भूगोल के प्रोफेसर का मकान है। संभवतः लॉरेंजो का पिता स्थानीय यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर होगा या रहा होगा क्योंकि लॉरेंज के व्यवहार से लगता नहीं कि वह अधिक पढ़ा-लिखा है।

मैंने एक एटलस खोल कर देखा, पहला पन्ना ही भारत का पॉलिटिकल मैप निकला। इसमें काश्मीर को चीन एवं पाकिस्तान में दिखा रखा था। यह देखकर मेरे मन में खिन्नता हुई। क्यों दुनिया भारत को समझ ही नहीं पाती! आखिर हमारी गलती क्या है! क्यों दुनिया भर के एटलसों में काश्मीर को पाकिस्तान में दिखाया जाता है?

संकरी गलियों का शहर

हम खाना खाकर सो गए। आज भी भानु और मधु फ्लारेंस से दोपहर का भोजन बनाकर लाईं थी। शाम 6.00 बजे हम चाय पीकर पैदल ही घूमने निकले। हमने जीवन में इतनी संकरी गलियों का शहर पहली बार देखा था। कुछ गलियां तो केवल तीन फुट चौड़ी हैं। कुछ गलियों के ऊपर मुश्किल से साढ़े-पाँच छः फुट की ऊंचाई पर छतें बनी हुई हैं।

थोड़ी-थोड़ी दूरी पर नहरें बनी हुई हैं जिसके पार जाने के लिए छोटी-छोटी पुलियाएं हैं। इटली के उत्तरी भाग में एण्ड्रियाटिक समुद्र के तट पर बसा हुआ वेनिस शहर संसार के अत्यंत पुराने शहरों में से एक है। इसकी कहानी आज से डेढ़ हजार साल पहले आरम्भ होती है।

पाँचवी शताब्दी ईस्वी में जब अतिला नामक हूण आक्रांता, इटली में मारकाट मचाता हुआ घूम रहा था तो उसके भय से हजारों लोग इटली के दक्षिणी भागों को छोड़कर उत्तर की तरफ भाग आए ताकि वे एल्प्स पर्वत के जंगलों में छिप सकें। मार्ग में उन्होंने बहुत से टापुओं को देखा जो एण्ड्रिायिटक समुद्र में दलदल के सूख जाने से उभर आए थे। बहुत से लोग इन्हीं टापुओं पर जाकर छिप गए। अतिला तो समय के साथ मारा गया किंतु बहुत से लोग यहीं बस गए। उन्होंने इन्हीं टापुओं पर अपने घर बना लिए।

कालांतर में ये टापू नहरों के माध्यम से जुड़कर कर एक बड़े शहर में बदल गए। आगे चलकर वेनिस एक बड़े बंदरगाह के रूप में विकसित हो गया तथा इस शहर के बड़े-बड़े मालवाहक जहाज, इटली के दक्षिण में स्थित राज्यों से लेकर उत्तरी अफ्रीकी तटों पर स्थित मिस्र आदि देशों तथा भारत जैसे दूरस्थ देशों से भी व्यापार करने लगे।

व्यापारिक जहाजों एवं शहर की रक्षा केे लिए वेनेशिया वासियों ने अपनी एक नौ-सेना भी खड़ी कर ली। यहाँ तक कि उन्होंने अपना एक गणराज्य स्थापित कर लिया। जब शहर में धन की आवक होने से विशाल भवनों का निर्माण होने लगा तो इसकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक पहुँचने लगी। वेनिसया के व्यापारी अपनी धन-सम्पदा के लिए पूरे यूरोप में प्रसिद्ध हो गए।

यहाँ तक कि धन के प्रति अपने लालच के लिए भी। सोलहवीं शताब्दी ईस्वी के अंग्रेज नाटककार शेक्सपीयर ने वेनिस के व्यापारियों को लेकर एक नाटक लिखा था- ‘मर्चेण्ट ऑफ दी वेनिस।’ यह नाटक संसार भर के देशों में खेला एवं पढ़ा जाता है। इसमें इटली के एक लालची व्यापारी के माध्यम से वेनेसिया वासियों की उन दिनों की प्रवृत्ति का बहुत बारीक चित्रण किया गया है।

उत्तरी इटली में स्थित वेनिस अथवा वेनेजिया शहर सातवीं-आठवीं शताब्दियों में उत्तरी यूरोप के बर्बर कबीलों के आक्रमणों से त्रस्त था। वे इस शहर के धनी व्यापारियों को लूटने के लिए शहर पर भयानक आक्रमण करते थे। इन बर्बर सैनिकों के हमलों से नगर-वासियों की सुरक्षा करने के लिए इस शहर में पतली गलियां बनाने की परम्परा आरम्भ हुई।

 मध्य काल में इस शहर पर ऑस्ट्रिया, फ्रांस, इटली तथा जर्मनी की सेनाओं के हमले होते रहते थे। इन हमलावरों से बचने में इन पतली गलियों ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई। ये पतली गलियां निश्चित रूप से किसी दूसरी-तीसरी गलियों में खुलती हुई अंत में किसी बड़े चौक में खुलती हैं जहाँ बड़ी संख्या में वेनेसिया के सैनिक मौजूद रहते थे।

यदि कोई शत्रु सैनिक किसी गली में घुसकर उसके पार निकले की कोशिश करता तो गली के दूसरे मुंह पर खड़े वेनेसिया के सिपाही उसकी गर्दन उड़ा देते थे।

इस कारण शत्रु सेना इन गलियों में घुसने का साहस ही नहीं कर पाती थी। इस प्रकार युद्ध-काल में पूरा शहर एक खुले दुर्ग में बदल जाता था। घुड़सवार योद्धा के लिए इस शहर में दो कदम भी चल पाना संभव नहीं था। कुछ गलियां तो इतनी नीची और इतनी संकरी हैं कि अकेला सिपाही अपने हथियार लेकर भी उसमें से नहीं गुजर सकता था। आज भी ये गलियां ज्यों की त्यों हैं।

गलियों में बनी हुई सड़कों पर कोलतार नहीं बिछा हुआ है अपितु पत्थरों के टुकड़े समतल करके बिछाए गए हैं। शहर की गलियों के मिलन बिंदुओं पर बनने वाले सैंकड़ों चौक में प्रायः रेस्टोरेंट एवं बाजार चलते हैं। खुले आकाश के नीचे 8-10 कुर्सियों से लेकर 100-150 कुर्सियों तक वाले ओपन एयर रेस्टोरेंट इस शहर को अलग ही स्वरूप प्रदान करते हैं।

इन कुसियों पर बैठकर, देश-विदेश से आए स्त्री-पुरुषों की की भीड़ दिन-रात सिगरेट एवं शराब पीती रहती है। पूरे शहर में ये दृश्य हर गली, हर नुक्कड़ एवं हर चौक में दिखाई देते हैं। वैसे यह पिज्जा और पास्ता का देश है किंतु ओपन एयर रेस्टोरेंट इसे वाइन और सिगरेट का शहर होने की घोषणा करते हुए दिखाई देते हैं।

पूरे देश में जगह-जगह पिज्जेरियो खुले हुए हैं जिनमें रखी हुई शीशे की अलमारियों से बकरों, भेड़ों एवं सूअरों के कटे हुए सिर झांकते रहते हैं। किसी कटे हुए सिर की आंखों में देखने का साहस कर सकें तो आप उन आंखों में उस दर्द की फोटो देख सकते हैं जिसकी अनुभूति इस सिर को अपने धड़ से अलग होते हुए हुई थी।

यह शहर 100 से अधिक टापुओं से बना है जिनके बीच में समुद्र का जल भरा हुआ है। समुद्री जल का प्रवाह नियंत्रित करके उसे सैंकड़ों नहरों में बदल दिया गया है। ये नहरें कहीं पर विशाल नदी के समान चौड़ी हैं तो कहीं पर पतले से नाले के समान संकरी। इन नहरों की चौड़ाई के अनुसार इनमें जहाज, फैरी, स्टीमर, बोट, शिकारे आदि चलते हैं जिनके माध्यम से शहर की यात्री-परिवहन एवं माल-ढुलाई सम्बन्धी आवश्यकताएं पूरी होती हैं।

एक टापू पर स्थित बाजार एवं मोहल्ले आदि तक जाने के लिए पतली गलियों का प्रयोग करना होता है तथा विभिन्न टापुओं को जोड़ने के लिए नहरों के ऊपर पुलियाएं बनी हुई हैं। इस शहर में सड़कें लगभग नहीं के बराबर हैं और जो भी हैं उनमें पैदल चलकर किसी नाव या फैरी तक पहुँचना होता है।

यात्री-परिवहन एवं माल ढुलाई की दृष्टि से यह शहर संसार भर में अनूठा है और अपनी तरह का अकेला देश है। शहर के जल-मल निकासी के लिए भी कुछ पतली नहरें बनाई गई हैं जो सीवर के पानी को दूर समुद्र में ले जाकर छोड़ती हैं।

खारेपन और झगड़ालूपन का शहर

विदेशों से आने वाले पर्यटकों के लिए शहर में कुली सेवा उपलब्ध है। ये कुली बहुत ही छोटे-छोटे हथ-ठेलों पर सामान लादकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाते हैं। बसावट की विचित्रता के कारण आज वेनेजिया अथवा वेनिस संसार के सुंदरतम शहरों में से एक माना जाता है किंतु मुझे यह शहर बसावट के हिसाब से अलग लगते हुए भी सुंदर तो कतई नहीं लगा!

इससे अधिक सुंदर तो रोम और फ्लोरेंस हैं। जाने क्यों मुझे यह अनुभव होता रहा था कि रोम की हवाओं में उदासी भरी हुई है और फ्लोरेंस की हवाओं में जिंदगी की खुशियां भरी हुई हैं जबकि वेनिस की हवाओं में समुद्र के खारेपन के साथ-साथ शहरवासियों का झगड़ालूपन भी मौजूद है। शहरवासियों के झगड़ालूपन का अनुभव हमें अगले तीन दिनों तक लगातार हुआ।

गनेश रेस्टोरेंट

अभी हम एक नहर को पार करके थोड़ा आगे बढ़े ही थे कि हमें एक पुराना सा ढाबा दिखाई दिया जिस पर ‘गनेश रेस्टोरेंट’ लिखा हुआ था। अवश्य ही कोई भारतीय यहाँ आकर बस गया था।

दीपा की ड्राइंग

एक चौक में तीन-चार साल के छोटे-छोटे बच्चे चॉकस्टिक से फर्श पर आड़ी-तिरछी रेखाएं खींचकर ड्रॉइंग बना रहे थे तथा रोमन एल्फाबैट्स लिख रहे थे। इनके साथ इनके माता-पिता भी थे जो उनकी सुरक्षा का ध्यान रख रहे थे। एकाध जगह 3-4 बच्चे गेंद खेलते हुए भी दिखाई दिए। ये भी बहुत छोटे बच्चे थे और उनके माता-पिता उनके लिए बार-बार गेंद उठाकर ला रहे थे।

उन बच्चों को देखकर दीपा भी उनके साथ खेलने की जिद करने लगी। मैंने मना किया किंतु मधु ने वहाँ खेल रहे बच्चों को इस बात के लिए सहमत कर लिया कि वे दीपा को भी अपने साथ बॉल खेलने देंगे और अपनी चॉक से ड्राइंग करने देंगे। मधु में संसार के किसी भी प्राणी से संवाद स्थापित कर लेने की अद्भुत क्षमता है।

वह गली के कुत्ते-बिल्लियों और गायों से लेकर संसार के किसी भी मनुष्य से बिना किसी संकोच के संवाद कर लेती है, फिर ये तो इटली के छोटे-छोटे बच्चे ही थे। न वे मधु की भाषा जानते थे और न मधु उन बच्चों की भाषा जानती थी किंतु वे कुछ क्षणों में मधु की हर बात मानने को तैयार थे।

संभवतः उन बच्चों के माता-पिता को भी यह देखकर अच्छा लग रहा था कि इण्डियन साड़ी पहने हुए कोई औरत उनके बच्चों को खिला रही थी और ड्राइंग बनाना सिखा रही थी। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस पूरे उपक्रम में दीपा की तो लॉटरी लग गई थी। थोड़ी ही देर में वहाँ मौजूद सारी गेंदें और सारे चॉकस्टिक दीपा के लिए उपलब्ध थे!

चीनी दम्पत्ति के चिंतातुर चेहरे!

थोड़ी देर में हम एक बहुत चौड़ी नहर के किनारे पहुँचे। यह शायद शहर की मुख्य नहरों में से एक थी। इसे पार करने के लिए यहाँ कोई पुलिया नहीं थी। केवल मोटर बोट चल रही थीं। हम एक मोटरबोट स्टैण्ड पर खड़े होकर टिकट आदि खरीदने की व्यवस्था समझने का प्रयास कर ही रहे थे कि एक चीनी युवक हमारे पास आकर हमसे पूछने लगा कि मोटरबोट का टिकट कहाँ से मिलेगा?

उसके साथ एक चीनी युवती भी थी। दोनों के चेहरे घबराए हुए से लग रहे थे। मैंने एक साइन बोर्ड की तरफ संकेत करते हुए कहा कि देखिए यहाँ कुछ निर्देश लिखे हुए हैं। मेरे द्वारा उस साइन बोर्ड की तरफ 7-8 बार संकेत करने और अपनी बात बार-बार दोहराने के बाद भी वह चीनी युवक समझ नहीं पाया कि मैं क्या कह रहा हूँ!

चीनी युवती इस दौरान बिल्कुल चुप खड़ी रही। इस पर मैंने विजय से कहा कि वह उन्हें समझाए। विजय ने उसके हाथ से सैलफोन लेकर उसे गूगल के माध्यम से समझाने का प्रयास किया किंतु वह विजय को अपना सैलफोन देने को तैयार नहीं हुआ। युवक और युवती बुरी तरह घबराए हुए थे। हमें उनकी बातों से लगा कि वे अपने साथियों से बिछड़ गए हैं और गूगल के अनुसार उनके साथी नहर के दूसरी तरफ कहीं पर हैं और यह चीनी दम्पत्ति उन तक न तो पैदल पहुँच पा रहा है और न मोटरबोट का टिकट खरीद पा रहा है।

 मोटर बोट के स्टैण्ड तक जाने के लिए जो गेट था, उस पर इलैक्ट्रोनिक लॉक लगा था और वह बिना टिकट लिए खोला नहीं जा सकता था। वह चीनी दम्पत्ति हमारी बातों से निराश होकर वहाँ से चला गया। हम वहीं खड़े रहकर उनकी हालत पर तरस खाते रहे। लगभग 5-7 मिनट बाद वह चीनी दम्पत्ति फिर से लौट आया और मुझसे पूछने लगा कि इस नहर को पार करने का क्या तरीका है?

मैंने दुबारा मोर्चा संभाला और उसे बताया कि यहाँ दो तरह के रेट लिखे हुए हैं, डेढ़ यूरो और साढ़े सात यूरो। यह संभव है कि यहाँ के स्थानीय नागरिकों के लिए डेढ़ यूरो टिकट लगता हो और विदेशी पर्यटकों से सात यूरो लिए जाते हों। इसलिए वह चाहे तो दो यूरो का सिक्का इस बोर्ड के पास लगी मशीन में डालकर देख ले! यदि दो यूरो में टिकट नहीं निकले तो पाँच यूरो और डाल दे।

 एक टिकट खरीदने के बाद दूसरे टिकट के लिए भी यही प्रक्रिया करे। बड़ी मुश्किल से मैं उसे यह बात समझाने में सफल हुआ। इस बार उन्होंने हमारी बात ज्यादा ध्यान से सुनी क्योंकि वे भी समझ गए थे कि हम भले ही स्थानीय नहीं हों किंतु केवल हम ही वहाँ थे जिन्हें अंग्रेजी बोलनी आती थी और वे केवल हमारी बात ही समझ सकते थे।

नो क्रिकेट!

हमें नहीं मालूम कि बाद में क्या हुआ क्योंकि हम उसके बाद वहाँ से वापस अपने सर्विस अपार्टमेंट को लौट लिए। हमें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि पूरे शहर में एक भी जगह लड़कों का झुण्ड क्रिकेट नहीं खेल रहा था। दो-चार स्थानों पर हमने लड़कों को वॉलीबॉल, फुटबॉल और बैडमिण्टन खेलते हुए देखा। संभवतः इटली के लोग स्वयं को अंग्रेजों से अधिक श्रेष्ठ समझते थे इसलिए वे अंग्रेजों का खेल खेलना भी अपनी तौहीन समझते थे।

यहाँ आकर ही यह बात समझ में आती है कि क्रिकेट वास्तव में अंग्रेजों तथा उनके गुलाम रहे देशों का खेल है। हालांकि इटली भी सैंकड़ों साल तक फ्रांस, विएना, ग्रीस तथा ऑस्ट्रिया देशों के राजाओं के झण्डों के नीचे रहा था किंतु वह गुलामों जैसी स्थिति नहीं थी अपितु उन्होंने अपनी स्वेच्छा से उन देशों के राजाओं को इटली का सम्राट मान लिया था क्योंकि उस काल में पूरा यूरोप एक देश की ही तरह व्यवहार करता था!

यूँ तो रोम ने सैंकड़ों साल तक यूरोप के कई देशों पर शासन किया था किंतु वेनेजिया पर नहीं। यह कभी गणराज्य तो कभी राज्य रहा और कुछ समय के लिए ऑस्ट्रिया के अधीन भी रहा किंतु रोम से काफी दूर ही रहा। यही कारण था कि वेनेजिया की संस्कृति और रोम की संस्कृति में काफी अंतर देखने को मिलता है। इन शहरों में रहने वाले लोगों के स्वभाव भी अलग हैं, बहुत अलग!

नो हाफ पैण्ट!

मार्ग में हमें एक चर्च दिखाई दिया। इसका भवन बता रहा था कि यह गोथिक शैली का एक मध्यकालीन चर्च है। हम लोग उत्सुकतावश चर्च में घुस गए। चर्च के प्रवेश द्वार पर विजिटर्स के लिए एक नोटिस लगा हुआ था जिसमें चित्रों के माध्यम से समझाया गया था कि इस चर्च में कोई भी व्यक्ति घुटनों से ऊपर के कपड़े पहनकर प्रवेश नहीं कर सकता। अकेला पुरुष एढ़ी तक लम्बी पैण्ट पहनकर ही आ सकता है।

विजिटर्स को चर्च के एक हिस्से तक ही प्रवेश करने की अनुमति थी। उसके आगे का क्षेत्र प्रार्थना करने वालों के लिए सुरक्षित था। चर्च के आखिरी छोर पर एक मंच बना हुआ था जिस पर माता मरियम की गोद में शिशु ईसा की प्रतिमा बनी है।

मूर्ति के नीचे खड़े पादरी भी विजिटर्स को साफ दिखाई देते हैं। इस चर्च के भीतर बहुत पुराने फ्रैस्को बने हुए हैं। समुद्र के किनारे स्थित होने के उपरांत भी फ्रैस्को बहुत अच्छी स्थिति में हैं। यह चर्च बाहर से जितना विशाल दिखाई देता है, भीतर से उतना ही भव्य है।

हम कुछ देर तक एक चौक पर पड़ी बैंचों पर बैठे रहे। ये बेंचें एक पेड़ के नीचे रखी थीं। यहाँ से थोड़ी दूर खड़ा कोई व्यक्ति वायलिन बजा रहा था और पूरे परिवेश में अद्भुत शांति व्याप्त थी। इतनी शांति भरी जगहें भारत में तो ढूंढने से भी नहीं मिलती। ऐसा लगता है जैसे भारत का चप्पा-चप्पा आदमियों से भर गया है और सारा परिवेश मनुष्यों की चीख-चिल्लाहटों से भर गया है। जबकि रोम, फ्लोरेंस और वेनेजिया में शांति का साम्राज्य पसरा पड़ा है।

नाचती हुई लड़कियों का शहर

इस शहर के किसी भी चौक में युवतियों का कोई समूह नृत्य करता हुआ दिखाई दे जाता है। ये लड़कियां समाज के विभिन्न वर्गों से आती हैं तथा सार्वजनिक रूप से नृत्य करके पर्यटकों से रुपए मांगती हैं और थोड़ी ही देर में किसी पतली गली में गायब हो जाती हैं।

इसी प्रकार यहाँ के चौराहों, पुलियाओं एवं चौक आदि में कुछ लोग म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट बजाकर पैसे मांगते हुए दिख जाते हैं। इसी प्रकार चित्रकार भी चित्र बनाने के लिए गलियों में बैठे रहते हैं। ये लोग भिखारी नहीं हैं, आर्टिस्ट हैं। वे मानव समाज के समक्ष अपनी कला का सार्वजनिक प्रदर्शन करते हैं तथा समाज से उसके बदले में प्रतिदान चाहते हैं।

भारत में ऐसे कलाकारों के गांव के गांव हैं तथा सैंकड़ों जातियां हैं। भारत के ये कलाकार भी भिखारी नहीं हैं, वे भी घर, गली, गांव या मौहल्ले में अपनी कलाओं का प्रदर्शन करके समाज से प्रतिदान मांगते हैं।

हम गलती से उन्हें भिखारी समझ लेते हैं लेकिन भोपे, लंगा, मांगणियार, ढाढ़ी, राणीमंगा जैसी सैंकड़ों कलाकार जातियां इसी तरह कला का प्रदर्शन करके अपना गुजर बसर करती हैं। इटली में यह परम्परा अधिक मुखर और अधिक स्पष्ट दिखाई देती है।

कला की प्रशंसा

एक गली में हमने कुछ चित्रकारों को मेज-कुर्सी लगाकर चित्र बनाते हुए देखा। हम लोग एक चित्रकार के पास रुक गए। वह चित्र बनाने में व्यस्त था फिर भी उसने अपने हाथ का ब्रुश रोककर हमसे हलो कहा। ऐसा लगता था जैसे वह हमें देखकर खुश है। मैंने एक चित्र का मूल्य पूछा।

यह चित्र ए-4 साइज के किसी कैनवास पर बना हुआ था तथा उसमें वाटरकलर का प्रयोग किया गया था। उसने कहा- फिफ्टी यूरो बिकॉज आई यूज वाटर कलर्स ओन्ली।’ सुनने में चार हजार रुपए भले ही अधिक लगते हैं किंतु वास्तविकता यह है कि उस चित्र को बनाने में 50 यूरो से कहीं अधिक की मेहनत और समय लगा होगा। इस चित्र को बनाने में व्यय हुई मानव प्रतिभा का मूल्य तो आंका ही नहीं जा सकता।

मैंने अंग्रेजी भाषा में उसके चित्रों की तारीफ की तो वह गदगद हो गया। उसकी आंखों से कृतज्ञता टपकती हुई साफ अनुभव की जा सकती थी। मुझे लगा कि वह अपनी कला की प्रशंसा सुनकर  इतना अधिक खुश था जितना कि चित्र खरीदने पर भी नहीं होता। जो कलाकार हैं, केवल वही इस बात को समझ सकते हैं कि कोई कलाकार अपनी कला की प्रशंसा सुनकर कितना खुश होता है।

यह ठीक वैसा ही अनुभव है जैसा कि यदि आप किसी के द्वारा बनाए गए पकौड़ों की तारीफ कर दें तो वह चाहता है कि अपने बनाए हुए सारे पकौड़े आपको खिला दे। जैसे उसका अपना पेट तो केवल तारीफ से भर जाता है!

गूगल बाबा!

एक जमाना था जब गांव में सबसे बूढ़े आदमी को सबसे अधिक ज्ञानी माना जाता था। हर बात उससे पूछी जाती थी और उम्मीद की जाती थी कि चूंकि इसने जीवन में बहुत अनुभव एकत्रित कर लिया है तो इसके पास सारे सवालों का जवाब है। आज उसे बूढ़े बाबा का स्थान गूगल ने ले लिया है। गूगल बाबा की कृपा से हम उन्हीं चौकों, गलियों, नहरों एवं पुलियाओं को पार करते हुए अपने सर्विस अपार्टमेंट में आ गए।

आज की दुनिया में गूगल पर लोगों की जासूसी करने का आरोप लगता है और कहा जाता है कि जितना आप स्वयं अपने बारे में नहीं जानते, उतना आपकी पत्नी आपके बारे में जानती है किंतु जितना आपकी पत्नी आपको जानती है उससे कहीं अधिक आपके बारे में गूगल जानता है। यहाँ तक कि गूगल तो आपकी पत्नी के बारे में भी जानता है, जो कि आप बिल्कुल भी नहीं जानते।

जासूसी के इस आरोप के बावजूद इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि आज गूगल मानव की सबसे अधिक सेवा कर रहा है, सचमुच बड़ी सेवा। यहाँ तक कि बहुत से लोगों की जान भी इसी गूगल के माध्यम से बच रही है, दुर्घटनाएं भी टल रही हैं और समय भी बच रहा है। यह अलग बात है कि कुछ तलाक भी इसी गूगल ने करवाए हैं। घर लौट कर हमने खाना खाया। मोबाइल फोन ही पर ही भारतीय टीवी चैनल देखे और दस बजते-बजते सो गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

वेनेजिया में दूसरा दिन – 26 मई 2019 (12)

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वेनेजिया में दूसरा दिन - bharatkaitihas.com
वेनेजिया में दूसरा दिन

वेनेजिया में दूसरा दिन लगभग 90 साल की एक वृद्ध इटैलियन महिला से दीपा की हैलो के साथ आरम्भ हुआ जो एक विशाल बहुमंजिला भवन के किसी फ्लोर पर अकेली रहती थी।

हैलो दीपा!

सुबह पाँच बजे आंख खुल गई। मधु ने चाय बनाई। इस चाय के कारण ऐसा लगता ही नहीं है कि हम अपने घर से हजारों किलोमीटर दूर हैं। दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर डायरी लिखने बैठ गया। आठ बजे तक लिखता रहा। जैसे ही मैंने लिखने का काम पूरा किया, दीपा मेरी मेज के पास आकर कहने लगी- ‘मुझे गोद में उठाकर उस खिड़की में दिखाओ!’

मैंने उसे गोद में उठा कर खिड़की तक उठा लिया। वह बाहर झांकने लगी तो पास वाले मकान की खिड़की से एक कमजोर और कांपती हुई आवाज आई- ‘हैलो डॉल!’

मैंने देखा कि पास वाले मकान की खिड़की से एक अत्यंत वृद्ध महिला झांक रही हैं, संभवतः 90 वर्ष के आसपास की आयु रही होगी उनकी।

मैंने दीपा से कहा- ‘गुड मॉर्निंग बोलो दादीजी को।’

जब दीपा ने गुड मॉर्निंग कहा तो वृद्ध महिला बहुत खुश हुईं। उन्होंने पूछा- ‘व्हाट इज योअर नेम?’

जब दीपा ने अपना नाम बताया तो वह समझ नहीं पाईं। शायद कुछ ऊँचा भी सुनती थीं। दीपा तो मेरी गोदी से उतर कर भाग गई। वृद्धा उस कुर्सी पर वहीं बैठी रहीं।

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हम इस बिल्डिंग की दूसरी मंजिल पर थे। इटली के वृद्ध लोगों में कितना अकेलापन है, यह हमने रोम में अनुभव कर लिया था किंतु यहाँ वेनेजिया में भी परिस्थितियाँ कोई ज्यादा अलग नहीं थीं। यहाँ भी लोग बच्चों की बजाय मशीनों पर अधिक निर्भर हैं। यह वृद्धा तो संभवतः कई-कई दिन तक किसी आदमी की शक्ल तक नहीं देख पाती होंगी! उनके लिए आज का दिन बहुत महत्त्वपूर्ण हो गया होगा क्योंकि उन्होंने आज के दिन की शुरुआत एक छोटी बच्ची से हैलो और गुडमॉर्निंग के साथ की। सुबह का नाश्ता करके और दोपहर का भोजन साथ में लेकर हम लोग पौने ग्यारह बजे सर्विस अपार्टमेंट से निकल पाए। आज हम जिन गलियों से निकले, वे तो कल वाली गलियों से भी अधिक पतली थीं। आज हमारा कार्यक्रम मोटर बोट से पोण्टे दी रियाल्टो ब्रिज तक जाने का था जो हमारे घर से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर था। वहाँ से हमें लगभग 1 किलोमीटर दूर बेसिलिका दी सान मार्को होते हुए सान माकर्’स स्क्वैयर तक जाना था। इसलिए हम पोण्टे दी रियाल्टा ब्रिज तक मोटर बोट से जाकर शेष मार्ग पैदल तय करना चाहते थे ताकि बोटिंग भी हो जाए और हमें पैदल भी नहीं जाना पड़े। घर से निकलते ही विजय ने गूगल सर्च पर बोट पकड़ने के लिए टिकट खिड़की तक जाने का ऑप्शन डाला किंतु गूगल इस ऑप्शन को नहीं समझ पाया।

हम अंदाज से ग्राण्ड नहर के किनारे तक पहुँचे और वहाँ खड़े इटैलियन नागरिकों से टिकट खिड़की के बारे में पूछताछ की। एक इटैलियन स्त्री ने बताया कि टिकट खिड़की यहाँ से बहुत दूर है (फार अवे!) इस पॉइंट से केवल पासधारी यात्री चढ़ सकते हैं। यदि आप बॉक्स से टिकट खरीदते हैं तो डेढ़ यूरो लगेगा और यदि किसी अन्य टिकट खिड़की से खरीदते हैं तो साढ़े सात यूरो प्रति टिकट लगेगा।

अब हमारी समझ में आया कि गूगल टिकट खिड़की क्यों नहीं ढूंढ पा रहा था। उसे यहाँ बॉक्स कहते हैं तथा वह इस नहर के दूसरी तरफ था। अब यह भी समझ आया कि कल चीनी दम्पत्ति घबराया हुआ क्यों था, उसे टिकट खिड़की मिल नहीं रही होगी और वहाँ लगी वैण्डिंग मशीन से 7.5 यूरो में टिकट निकल रहा होगा जो कि हमारी ही तरह चीनी लोगों को भी बहुत महंगा लग रहा होगा। पिताजी ने उस स्त्री से पूछा कि डेढ़ यूरो वाला टिकट कौन लोग खरीद सकते हैं तो वह स्त्री पिताजी की बात समझ ही नहीं पाई।

हम वहीं एक चर्च की सीढ़ियों पर बैठ गए। वहाँ बहुत से कबूतर धरती पर ही चक्कर लगाते हुए घूम रहे थे। दीपा ने उन्हें बिस्किट और चावल के अरवे (भुने हुए चावल) खिलाकर उनसे दोस्ती कर ली। हम आगे की रणनीति पर विचार करने लगे। पिताजी इतनी दूर पैदल नहीं चल सकते थे तथा उस स्थान तक जाने का और कोई साधन नहीं था। अतः हमने पिताजी को सर्विस अपार्टमेंट छोड़ने का निर्णय लिया।

ये शहर दिन भर दारू पीता है!

सर्विस अपार्टमेंट से पोण्टे दी रियाल्टो पहुचंने में हमें एक घण्टा लग गया। यहाँ एक चौड़ी सी नहर थी जिस पर एक प्राचीन काल का पक्का पुल बना हुआ था।  वेनेजिया के इस क्षेत्र में पर्यटकों की भीड़ अधिक है। जिस बाजार के बीच से होकर हम यहाँ तक आए थे वह एक मध्यम चौड़ाई की अर्थात् लगभग 20 फुट चौड़ी सड़क है जिसके दोनों तरफ दुकानें और रेस्टोरेंट बने हुए हैं। बीच-बीच में चौक भी आते हैं जहाँ देश-विदेश से आए स्त्री-पुरुष बैठे हुए वाइन और सिगरेट पीते रहते हैं और अपने सामने रखी हुई प्लेटों में से मांस के टुकड़े उठाकर खाते रहते हैं। विजय ने एक स्थान पर टिप्पणी की- ‘बड़ा अजीब शहर है, दिन भर दारू पीता है!’

नृत्यरत रूपसियां

हमने वेनेजिया के एक छोटे से चौक पर कुछ युवतियों के एक समूह को सफेद, महंगे और अलंकृत परिधानों में नृत्य करते हुए देखा। इन लड़कियों ने अपने चेहरे सावधानी पूर्वक लीप-पोत रखे थे तथा अपने सिर पर ऐसे हैट लगा रखे थे जिनसे उनके चेहरे का लगभग एक तिहाई भाग छिपा हुआ था। संभवतः यह सब उपक्रम इसलिए किया गया था ताकि उन्हें कोई पहचाने नहीं! नृत्य स्थल पर एक टोपी रखी हुई थी जिसमें कोई-कोई पर्यटक यूरो डाल रहे थे। हम लोगों ने कुछ देर रुककर उनका नृत्य देखा और यह सोचकर आश्चर्य किया कि इटली में युवाओं का इस तरह पैसा कमाना बुरा नहीं माना जाता, अपितु कला माना जाता है!

माई स्कर्ट इज लाउडर दैन योअर वॉइस!

दुनिया का शायद ही कोई देश ऐसा होगा जहाँ के पर्यटक यहाँ वेनेजिया में मौजूद नहीं हों। इन पर्यटकों में पुरुषों की बजाय लड़कियों की संख्या अधिक है। लड़कियों के छोटे-बड़े ऐसे समूह भी दिखाई दे जाते हैं जिनके साथ पुरुष सदस्य नहीं हैं। अलग-अलग देशों से आई इन लड़कियों के चेहरे-मोहरे, रूप-रंग, चाल-ढाल तथा आदतें बिल्कुल अलग-अलग हैं किंतु एक बात में इन युवतियों में जबर्दस्त समानता है। ज्यादातर लड़कियों की स्कर्ट घुटनों से बहुत ऊपर है।

इन्हें देखकर मुझे कुछ साल पहले निर्भया काण्ड के बाद दिल्ली में एक नारी सशक्तीकरण संस्था द्वारा निकाले गए एक विरोध-जुलूस का स्मरण हो आया जिसमें कुछ तख्तियों पर लिखा हुआ था- ‘माई स्कर्ट इज लाउडर दैन योअर वॉइस!’ बहुत सी लड़कियों ने इस प्रकार की स्कर्ट्स पहनी हुई हैं जिनमें यत्नपूर्वक अधोवस्त्र प्रदर्शन का प्रबंध किया गया था। शायद यही कारण रहा हो या कोई और, मैं निश्चय पूर्वक नहीं कह सकता कि  क्यों उस चर्च में घुटनों से ऊपर के स्कर्ट और पैण्ट पहनकर प्रवेश निषिद्ध किया गया है!

ओ अलबेली बीच बजरिया ना कर ऐसी बतियां!

यहाँ किसी भी गली में, किसी भी चौक में, किसी भी बाजार में तथा किसी भी पर्यटन स्थल पर युवा-जोड़े एक दूसरे का आलिंगन और स्नेह प्रदर्शन करते हुए दिखाई दे जाते हैं। शायद मेरी ही दृष्टि विकृत है जो मुझे यह सब दिखाई देता है किंतु इन्हें देखकर मुझे ‘मदर इण्डिया’ चलचित्र का वह गीत बार-बार याद आता है- ‘ओ अलबेली बीच बजरिया ना कर ऐसी बतियां, सुने सब लोगवा कटे नाक रे।’

जाने क्यों वह दुनिया ऐसी थी जिसमें उस फिल्म की नायिका की बातें सुनकर नायक की नाक कटने लगती थी। हो सकता है कि मैं गलत होऊं किंतु मुझे तो कम से कम यही लगता है कि वह पुरानी दुनिया ही अच्छी थी जिसमें बीच बाजार में बात करते हुए भी नाक कटती थी। उस दुनिया में तो बीच बाजार में ‘स्नेह-प्रदर्शन’ करने वाले कुत्ते-बिल्ली भी बुरे लगते थे। इटली की सड़कों पर कुत्ते-बिल्ली नहीं हैं किंतु उनकी कमी विदेशों से आए आलिंगनबद्ध पर्यटक कर देते हैं।

शरीर की दुःश्चिंताएं

अब तक डेढ़ बच चुका था और मेरे रक्त में शर्करा का स्तर कम होने लगा था। वैसे भी हम पौने ग्यारह बजे से लगातार चल ही रहे थे। हमने पोण्टे दी रियाल्टो ब्रिज पर बैठकर लड्डू और मठरी खाए जिन्हें मधु जोधपुर से बनाकर अपने साथ लाई थी। हिन्दुस्तानी आदमी कहीं भी चला जाए, लड्डू-मठरी के बिना उसका काम नहीं चलता। ये पिज्जा, पास्ता और बर्गर घर के बने इन लड्डू-मठरियों के सामने कुछ भी नहीं। लघुशंका की इच्छा भी होने लगी थी किंतु यह भारत नहीं था जहाँ सरकार और समाज, नगर निगम और सेठ आम व्यक्ति के लिए प्याऊ, पेशाबघर, शौचालय, सराय, टिन शेड आदि बनवाते हैं। यहाँ तो मनुष्य का जीवन ‘पैसा फैंको पेशाब करो!’ वाली उक्ति पर टिका हुआ है।

तुम हमारा समुद्र देखो!

लगभग सवा दो बजे हम सैन मार्क्’स स्क्वैयर पर पहुँचे। यहाँ हजारों आदमियों की भीड़ पहले से ही डटी हुई थी। इस चौक पर चारों ओर विशाल भवन बने हुए हैं। गगनचुम्बी सैन मार्को चर्च इनमें सबसे बहुत अनूठा, बहुत अलग और बहुत भव्य है। यह एक विशाल भवन है जिसके मुख्य द्वार के दोनों तरफ पर्यटकों की लम्बी-लम्बी कतारें लगी हुई थीं।

ये वे लोग थे जो टिकट लेकर घण्टों तक किसी भवन के बाहर प्रतीक्षा करने की हिम्मत और इच्छा रखते थे। पता नहीं क्यों ये लोग यह नहीं समझ पाते थे कि एक-दो चर्च भीतर से देख लिए तो काफी हैं! बाकी के चर्च उससे आखिर कितने अलग होंगे!

हमने बेसिलिका में भीतर नहीं जाने और बाहर के दृश्यों में ही समय व्यतीत करने का निर्णय लिया। यह समुद्र के किनारे पर बना हुआ एक विशाल चौक है। समुद्र में सैंकड़ों नावें और मोटरबोटें खड़ी थीं। चौक में सफेद रंग के सैंकड़ों समुद्री पक्षी उड़ान भर रहे थे। ऐसा लगता था मानो वे इंसान से कह रहे हों कि तुम हमारा समुद्र देखो और हम तुम्हारी धरती देखते हैं।

हाँ पेट भर गया!

कुछ देर बाद हमने बेसिलिका के बाईं ओर बने एक बरामदे में बैठकर दोपहर का खाना खाया। उसी समय एक भारतीय युवती हमारी बैंच पर आकर बैठ गई।

मैंने उससे पूछा- ‘कहाँ से आई हैं आप?’

लड़की ने जवाब दिया- ‘मध्य प्रदेश से।’

-‘आप भी खाना खाईए!’

 उसकी आंखों से साफ लगता था कि इटली में कुछ भारतीयों को रोटी-सब्जी खाते देखकर उसे आश्चर्य हो रहा था किंतु उसने केवल इतना ही कहा- ‘नहीं आप लोग खाइए। मैंने खाना खा लिया है।’

मैंने पूछा- ‘क्या खाया?’

लड़की ने हंसकर किंतु थोड़े से संकोच के साथ कहा- ‘पिज्जा!’

-‘क्या पिज्जा से पेट भर गया?’

मेरे इस प्रश्न पर उसने पहले से भी ज्यादा जोर से हंसकर कहा- ‘हाँ पेट भर गया!’

एक यूरो दे दीजिए!

लगभग तीन बजे हम वहाँ से लौट पड़े। रास्ते में हमने एक दुकान से केले खरीदे। दुकानदार भारत, बांगलादेश या पाकिस्तान का रहने वाला होगा। इसलिए हिन्दी जानता था। उसने छः केलों के लिए 2 यूरो मांगे। मैंने उससे केलों का वजन करने को कहा तो उसने कहा- ‘एक यूरो दे दीजिए।’

 आगे एक जनरल स्टोर से हमने दूध और सब्जियां खरीदीं। 650 ग्राम टमाटर, 900 मिलीलीटर दूध तथा 1500 ग्राम आलू के लिए हमें 5.75 यूरो अर्थात् 460 रुपए चुकाने पड़े। संभवतः यह वेनेजिया की सबसे सस्ती दुकान थी!

वेनेजिया में भी चलती है ट्राम!

सायं 6 बजे मैं, विजय एवं पिताजी रेल्वे स्टेशन की तरफ वाली नहर पर घूमने गए। इस समय यहाँ पर्यटकों की बहुत भीड़ थी। नहर के किनारे-किनारे बने प्लेटफॉर्म पर रखी कुर्सियों पर बैठकर लोग सिगरेट, शराब और मांस अर्थात् पदार्थ की तीनों अवस्थाओं गैस, द्रव और ठोस का सेवन कर रहे थे। हमें 28 मई को वापस भारत के लिए लौटना है।

एयरपोर्ट यहाँ से लगभग 13 किलोमीटर दूर है। इसलिए मैंने और विजय ने विचार किया कि हम यहाँ से एयरपोर्ट जाने का साधन पता कर लेते हैं। पिताजी वहीं नहर के किनारे बने पुराने चर्च की सीढ़ियों बैठ गए और हम गूगल की सहायता से टैक्सी स्टैण्ड की ओर बढ़े। लगभग आधा किलोमीटर चलने के बाद हम एक चौक में पहुँचे।

इस चौक से एक चौड़ी नहर तो 90 डिग्री पर मुड़ जाती है तथा यहीं पर एक और बहुत चौड़ी नहर आकर मिलती है। यहाँ बने एक पुलिया पर खड़े होकर तीनों तरफ की नहरों को देखा जा सकता है। चौड़ी नहर इतनी चौड़ी है कि वह समुद्र के मुहाने पर पहुँच जाने का अहसास करवाती है।

इसी चौक से बस सेवा, टैक्सी सेवा, मोटरबोट सेवा और ट्राम सेवा चलती हैं। इन चारों साधनों को एक साथ देखकर हम आश्चर्य चकित रह गए। हम तो सोच भी नहीं सकते थे कि वेनेजिया में ट्राम सेवा भी उपलब्ध है!

वेनिस शहर 100 से अधिक समुद्री टापुओं से मिलकर बना है जिनके बीच नहरों, पुलियाओं एवं नावों एवं स्टीमरों के माध्यम से आवागमन किया जाता है किंतु वेनिस शहर के कुछ टापू इतने बड़े हैं कि उनमें ट्राम सेवा आसानी से चलती है। हम शायद किसी बड़े टापू पर पहुँच गए।

यहाँ आकर हम रोम अथवा फ्लोरेंस में होने जैसा अनुभव कर रहे थे। यहाँ शहर खुली हवा में सांस ले रहा था। वेनेजिया की यह ट्राम सेवा केवल इसी द्वीप पर चलती है जो द्वीप के एक छोर से दूसरी छोर पर जाती है।

एयरपोर्ट  के लिए केवल बस सेवा और टैक्सी सेवा उपलब्ध है। वेनेजिया की नगरपालिका ने सभी साधनों के भाड़े की दरें निश्चित कर रखी हैं। हमें यदि बस से जाना है तो प्रति व्यक्ति 8 यूरो देने होंगे और यदि टैक्सी से जाना है तो प्रति टैक्सी 40 यूरो देने होंगे।

 हम यदि यहाँ से बस पकड़ते तो भी हमें 5 सदस्यों के लिए 40 यूरो ही देने होते। बस में यात्रा करने पर केवल 13 किलोमीटर के लिए प्रति व्यक्ति 640 रुपए का भाड़ा बहुत अधिक है। हम चाहे जिस भी साधन से जाएं हमें भारतीय मुद्रा में 3200 रुपए व्यय करने होंगे। जबकि दिल्ली में हमें पाँच व्यक्तियों की टैक्सी के लिए लगभग 350 रुपए और बस के लिए लगभग 75 रुपए चुकाने पड़ते।

 इस चौक से टैक्सी सेवा 24 घण्टे मिलती है जबकि बस, बोट और ट्राम रात में बंद रहती हैं। यहाँ से पूछताछ करके हम पुनः उसी पुलिया से होते हुए स्टेशन के सामने लौट आए जहाँ चर्च की सीढ़ियों पर पिताजी बैठे थे। थोड़ी देर वहीं नहर के किनारे बैठकर हम लोग फिर से अपने सर्विस अपार्टमेंट लौट लिए। इसी के साथ वेनेजिया में हमारा दूसरा दिन पूरा हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

वेनेजिया में तीसरा दिन – 27 मई 2019 (13)

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वेनेजिया में तीसरा दिन

वेनेजिया में तीसरा दिन बरसात की भेंट चढ़ गया। दिन निकलने के साथ ही बरसात आरम्भ हो गई थी, इसलिए कहीं दूर आना-जान संभव नहीं था। इसलिए हमने शहर में ही एक छोटा सा चक्कर लगाने का निश्चय किया।

प्रातः 4 बजे आंख खुल गई। लगभग पूरी रात बरसात होती रही इसलिए सुबह तक ठण्ड काफी बढ़ गई थी। विजय की आंख भी मेरे साथ ही खुल गई थी। उसने चाय बनाई और मैं कल की यात्रा का विवरण लिखने बैठ गया। 8 बजे तक लिखता रहा। इस बीच दो कप चाय और पी ली। आज हमारा केवल एक ही जगह जाने का कार्यक्रम था।

विजय ने नेट पर पढ़ा था कि सोमवार को प्रातः 11 बजे एक नहर में नावों पर सब्जी मार्केट लगता है। यह विदेशी पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केन्द्र होता है। आज हमने वहीं जाने का निर्णय लिया। यह स्थान हमारे अपार्टमेंट से केवल 1 किलोमीटर दूर था। हम प्रातः 11.00 बजे सर्विस अपार्टमेंट से निकले। धीमी बूंदा-बादी अब भी हो रही थी। इसलिए पिताजी घर में ही रहे।

 हम लोग छतरियां और बरसातियां लेकर चले। अब तक हमें याद हो चला था कि यहाँ घर से बाहर निकलने से पहले छतरी या बरसाती लेनी चाहिए।

नावों का विशेष साप्ताहिक सब्जी-बाजार

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संकरी गलियों, पतली नहरों एवं उन पर बनी छोटी पुलियाओं से होते हुए हम लगभग 20 मिनट में उस स्थान पर पहुँच गए जहाँ नावों में विशेष साप्ताहिक बाजार लगता है। हमें यह बाजार देखकर बहुत निराशा हुई। वहाँ केवल दो नावें थीं जिन पर दो-दो युवतियां सब्जी बेच रही थीं। उन पर सब्जियां बहुत कम थीं ज्यादातर तो फल एवं फूल थे। खरीददार भी एकाध ही मौजूद था। विदेशी खरीददार तो हम अकेले ही थे। सब्जी और फल ताजी तो थे किंतु उनके भाव वेजेनिया की अन्य नियमित दुकानों जैसे ही बहुत ऊँचे थे। फिर भी हमने कुछ सब्जियां और फल खरीदें ताकि वे कल रास्ते में काम आ सकें। जब मैंने कुछ फल छांटे तो नाव की मालकिन ने आकर मुझे टोका- ‘नो सैल्फ सर्विस। लीव इट।’ मैंने छांटे हुए फलों को फिर से टोकरी में रख दिया। उसने स्वयं फल और सब्जियां छांटकर हमें दीं। ऐसा लगता था जैसे वह इस बात को पसंद नहीं करती थी कि कोई हिन्दुस्तानी व्यक्ति उसकी सब्जियों को छुए! उसकी आंखों में गर्व के भाव को मैं स्पष्ट पढ़ सकता था।

महंगा म्यूजियम!

पास में ही एक चौक पर लियोनार्डो दा विंची के नाम से एक म्यूजियम है जिसमें लियोनार्डो द्वारा बनाए गए चित्रों में प्रदर्शित मशीनों के मॉडल बनाकर रखे गए हैं। एक टिकट 8 यूरो का है। इस छोटे से म्यूजियम के लिए यह टिकट बहुत महंगा है।

व्यापारियों की कुटिल वृत्ति

शेक्सपीयर के नाटक ‘ए मर्चेण्ट ऑफ वेनिस’ में वेनिस के व्यापारी की जो कुटिल वृत्ति दिखाई गई है, वह इटली के व्यापारियों में साफ दिखाई देती है। एयर पोर्ट पर …. रुपए का यूरो और बाहर बाजार में …. रुपए का यूरो! एयरपोर्ट पर पानी की बोतल 200 रुपए की, यह क्या है! 13 किलोमीटर की बस यात्रा के लिए 640 भारतीय रुपए, यह क्या है! पेशाब करने के लिए 160 रुपए, यह क्या है! हमारे चार दिन के अनुभव के आधार पर हम कह सकते हैं कि वेनिस के लोग अधिक कंजरवेटिव, घमण्डी और पैसे के भूखे लगते हैं।

अश्वेत भिखारी की गिड़गिड़ाहट

एक पुलिया पर अफ्रीकी या अमरीकी अश्वेत युवक भीख मांग रहा था। इसके जींस और टी-शर्ट भी ठीक दिख रहे थे और इसके पास रखा एयर बैग भी अच्छी किस्म का था। सिर पर टोपी से लेकर पैरों में जूते तक सभी कुछ तो ठीक लग रहा था!

मुझे उसका गिड़गिड़ाना बहुत ही कृत्रिम जान पड़ा। वह संभवतः इटेलियन भाषा में कुछ शब्द उच्चारित कर रहा था। इतना हट्टा-कट्टा नौजवान भीख मांगता हुआ इस शहर के वैभव से मैच नहीं करता है। वहाँ से गुजर रही इटैलियन महिलाओं ने उस युवक से इटैलियन भाषा में कुछ नाराजगी भरे शब्द भी कहे। उनकी नाराजगी उनकी मुखमुद्रा से व्यक्त हो रही थी! बूंदा-बांदी अब भी हो रही थी।

इसलिए पर्यटक अपने निवास स्थानों में ही दुबके पड़े थे। सारा शहर निर्जन सा दिखाई पड़ रहा था। गलियां सुनसान थीं और चौक में पड़ी कुर्सियों पर बैठकर वाइन, पिज्जा और सिगरेट का आनंद लेने वाले लोग गायब थे। हम भी अपने सर्विस अपार्टमेंट के लिए लौट लिए। वेनेजिया में तीसरा दिन लगभग इतना ही रहा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इटली में अंतिम दिन – 28 मई 2019 (14)

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इटली में अंतिम दिन

आज हमारा इटली में अंतिम दिन था। इस दिन की शुरुआत रास्ते के लिए खाना बनाने से आरम्भ हुई। इस दिन का दूसरा बड़ा काम कचरा फैंकने के लिए स्थान ढूंढना रहा।

कचरा फैंकने की मशक्कत

सुबह 4.30 बजे उठकर निकलने की तैयारियां कीं। मधु एवं भानु ने रात में ही पूड़ियां बना ली थीं। सब्जियां सुबह उठकर तैयार कीं। सारी तैयारियां हो जाने के बाद सुबह 6.47 बजे मैं और विजय कचरा फैंकने गए। रोम, फ्लोरेंस तथा वेनेजिया में तीनों ही सर्विस अपार्टमेंट्स के मालिकों ने हमें यह सख्त हिदायत दी थी कि अपार्टमेंट छोड़ने से पहले हम कचरा अवश्य ही बाहर फैंक दें।

हम जान गए थे कि यहाँ भारत की तरह नहीं है कि जहाँ चाहो कचरा फैंक दो। कचरे को कचरे के नियत स्थान पर ही फैंकना होता है। वेनेजिया में प्रातः 6.30 बजे एक सफाई कर्मचारी अपनी ट्रॉलियां लेकर आता है जो प्रातः 7.30 बजे तक उपलब्ध रहता है। हमने नहर के किनारे उसे कर्मचारी को ढूंढ लिया।

जब हमने उससे गारबेज-कंटेनर के बारे में पूछा तो उसने एक कौने में खड़ी ट्रॉली की ओर संकेत किया। उस कर्मचारी के कपड़े भारत के कलक्टरों से भी अच्छे लग रहे थे और उसकी आंखों में लगभग वैसा ही भाव था जैसा कल नाव में सब्जी बेचने वाली औरत की आंखों में देखने को मिला था! पता नहीं उसकी आंखों के अजीब से भाव को देखकर मुझे कुछ कठिनाई सी हो रही थी!

जब कचरा फैंककर लौटे तो सर्विस अपार्टमेंट का रास्ता भूल गए किंतु अधिक नहीं ढूंढना पड़ा। 7 बजकर 03 मिनट तक हम वापस अपार्टमेंट में लौट आए और 7 बजकर 06 मिनट पर हमने अपार्टमेंट छोड़ दिया।

13 किलोमीटर के 3200 रुपए

इस समय बरसात बंद थी। गूगल सर्च की सहायता से हम 7.23 पर टैक्सी स्टैण्ड पहुँच गए। यहाँ बहुत सी टैक्सियां खड़ी थीं। एक टैक्सी ने हमें 7.46 पर एयरपोर्ट के बाहर उतार दिया। केवल 13 किलोमीटर के लिए 3200 रुपए का भुगतान करते हुए हमें अच्छा नहीं लग रहा था किंतु और कोई उपाय भी तो नहीं था!

पीने का पानी नहीं!

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विजय ने भारत में ही फ्लाइट के जो टिकट बुक करवाए थे उनका बारकोड स्कैन करके एक वेंडिंग मशीन से हमें बोर्डिंग पास मिल गए। हमें भय था कि एयरपोर्ट पर बहुत भीड़ होगी किंतु यहाँ भीड़ नहीं के बराबर थी। इसका कारण संभवतः यह था कि यह एक स्थानीय एयरपोर्ट है जहाँ से केवल इटली के विभिन्न शहरों के लिए फ्लाइट्स मिलती है। हम यहाँ से रोम पहुँचकर ही दिल्ली के लिए इण्टरनेशनल फ्लाइट पकड़ सकते थे। हमने बोर्डिंग-पास प्रिण्ट करके नाश्ता किया, इतने में ही चैक-इन काउण्टर खुल गया। हमने अपना सामान इस काउंटर पर जमा करवाया। काउंटर पर बैठी महिला कर्मचारी ने हमें हिदायत दी कि हम किसी भी तरह का लिक्विड अपने हैण्डबैग में नहीं ले जाएं। इसलिए हमने पानी की सारी बोतलें चैक-इन से पहले खाली कर दीं। हमारा प्लेन 11.20 पर था। जब तक हम हैंगर के पास वाले दरवाजे के पास पहुँचे तब तक 9.30 ही बजे थे। कुछ देर बाद जब प्यास लगी तो हमने इधर-उधर पानी की तलाश की किंतु एयरपोर्ट के भीतर पीने का पानी उपलब्ध नहीं था। भारत के पालम इण्टरनेशनल एयरपोर्ट, मलेशिया के कुआलालम्पुर एयरपोर्ट और जकार्ता एयरपोर्ट के भीतर हम पीने का पानी अपनी बोतलों में भर चुके थे किंतु यहाँ यह सुविधा उपलब्ध नहीं थी।

अंत में इटली में अंतिम दिन हमें 2.5 यूरो अर्थात् भारतीय मुद्रा में 200 रुपए की पानी की एक लीटर की बोतल खरीदनी पड़ी। रोम जाने वाला प्लेन 25 मिनट लेट हो गया। इसलिए 10 बजे की बजाय 12.25 पर रोम पहुँचा। हमारी अगली फ्लाइट 2.10 पर थी। यहाँ भी भीड़ बहुत कम थी। दिल्ली एयरपोर्ट जैसा बुरा हाल नहीं था।

संभवतः यहाँ से बहुत से पर्यटक सड़क मार्ग से यूरोप के दूसरे देशों को निकल जाते होंगे। हमें यहाँ सामान चैक-इन नहीं कराना था इसलिए हम समय पर ही प्लेन तक पहुँच गए। प्लेन में शाम 4 बजे (इटैलियन समय) हमें लंच मिला। इसमें पास्ता और बॉइल्ड राइस शािमल थे। पास्ता में से बदबू आ रही थी और राइस कच्चे थे। हममें से किसी से यह खाना नहीं खाया गया। इस खराब भोजन के लिए हमसे प्लेन के टिकट के साथ जाने कितना अधिक भुगतान लिया गया था!

हमने शाम आठ बजे (इटेलियन टाइम) घर से लाई गईं कल रात की पूड़ियां खाईं जो प्लेन के पास्ता और राइस से बहुत ज्यादा अच्छी थीं। 24 घण्टे पहले बनी पूड़ियां और 15 घण्टे पहले बनी सब्जियां अब तक खाने के योग्य थीं किंतु विमान में दिया गया गर्म खाना बदबू दे रहा था!

इटैलियन समय के अनुसार रात 11 बजे विमान दिल्ली एयरपोर्ट पर पहुँच गया। इस समय भारत की घड़ियों में रात्रि के ढाई बजे थे। भारत से रोम 5 हजार 950 किलोमीटर दूर है किंतु कुछ ही दिन पूर्व भारत पर पाकिस्तान की ओर से हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों के विरुद्ध एयर-ऑपरेशन किया था जिसके कारण पाकिस्तान ने भारत की ओर से आने वाली सभी फ्लाइट्स पर रोक लगा दी थी। इस कारण हमारा विमान अंकारा होते हुए हिन्द महासागर, अरब सागर, अहमदाबाद, उदयपुर और जयपुर के ऊपर उड़ते हुए 7 हजार 400 किलोमीटर की दूरी पार करके दिल्ली पहुँचा था।

इस कारण साढ़े सात घण्टे की बजाय 9 घण्टे का समय लगा था। इमीग्रेशन पर चैक-आउट करने तथा लगेज-बेल्ट से अपना सामान प्राप्त करने में लगभग एक घण्टा लग गया। प्रातः 3.30 बजे हम एयरपोर्ट से बाहर आए। आजकल दिल्ली एयरपोर्ट पर टैक्सी पकड़ने के लिए लगभग आधा-पौन किलोमीटर चलना पड़ता है। यदि आप विमान से लेकर टैक्सी तक की बात करें तो यह सफर लगभग डेढ़-पौने दो किलोमीटर का हो जाता है।

अब भारतीय सिम ने काम करना आरम्भ कर दिया था। इसलिए विजय ने सैलफोन पर ऊबर की टैक्सी बुक की। हमें टैक्सी पकड़ने के लिए काफी दूर तक चलना पड़ा। टैक्सी का ड्राइवर एक हरियाणवी जवान था। उसने कोई प्रयास नहीं किया कि वह हमें देखे, उसे ढूंढने की सारी जिम्मेदारी हम पर ही थी। अंततः ड्राइवर हमें मिला, उसने हमें विलम्ब के लिए उलाहना दिया तथा टैक्सी का पिछला दरवाजा खोलकर खड़ा हो गया।

मैंने उससे कहा- ‘सामान टैक्सी के भीतर जमाओ।’

ड्राइवर ने बहुत तेज आवाज में जवाब दिया- ‘ये मेरा काम नहीं है। अपने आप रखो सामान।’

मैंने कहा- ‘सामान तो टैक्सी ड्राइवर ही जमाता है, हम तो तुम्हें उठाकर दे सकते हैं।’

वह बोला- ‘मैं तेरा नौकर नहीं हूँ। गाड़ी का मालिक हूँ मैं!’

अजीब बदतमीज आदमी था। उसने तो बदतमीजी के मामले में रोम वाला टैक्सी ड्राइवर भी पीछे छोड़ दिया था। विजय ने नाराज होकर कहा- ‘हमें तेरी टैक्सी में नहीं जाना है, मैं बुकिंग कैंसिल कर रहा हूँ।’

वह बोला- ‘इसी में तुम सबकी भलाई है।’ वह जोर से दरवाजा बंद करके अपनी टैक्सी लेकर चला गया। आसपास खड़े ड्राइवर चुपचाप तमाशा देखते रहे। भारत में आते ही कितने कड़वे शब्दों से स्वागत हुआ था! विजय ने टैक्सी की बुकिंग कैंसिल करके ऊबर के एप पर ड्राइवर की शिकायत लॉज की तथा तत्काल दूसरी टैक्सी बुक की।

हमने दूसरी टैक्सी वाले को रास्ते में बताया कि किस प्रकार पहली टैक्सी वाले ने हमसे बदतमीजी की तो वह बोला- ‘अजी ये रोज का काम हो लिया। कोई मेव भाई होगा। उनकी बड़ी कम्पलेन आ रही है। आपसे तो कड़वा ही बोला है, ये तो मारपीट भी कर लें तो कोई बड़ी बात थोड़े ही है।’

हमने इस बदतमीजी का कारण पूछा तो वह बोला- ‘ये कोई ड्राइवर थोड़े ना हैं। इन्हें तो ये गाड़ी शाद्दी में मिली है, दहेज में। इब कोई रोजगार तो है ना। लड़की इसलिए मिल गई कि इनके बाप-दादों की ज्जमीनों के भाव हो गए करोड़ों में। लड़की के बाप ने दहेज में ये गाड्डी दे दी। इब के करेगा! टैक्सी में ई तो लगायगा!’

तो यह थी मेरे भारत महान् की महान् नंगी सच्चाई! अजीब सी बेरोजगारी है यहाँ, लोगों की जेबों में पैसा तो है किंतु बेरोजगारी और बदतमीजी भी प्रचुर मात्रा में है! लोग काम ढूंढते हैं किंतु काम के लिए आवश्यक कौशल प्राप्त नहीं करते! यहाँ तक कि ग्राहक से व्यवहार करने का सामान्य तरीका भी नहीं सीखते। जब टैक्सी घर के सामने जाकर रुकी तब तक पौ फटने में कुछ ही देर रह गई थी।

इस समय सवा चार बज रहे थे। घर पहुँचते ही सब सो गए। सुबह आंख खुली तो भारत की घड़ियों में सुबह के पौने सात बज रहे थे। इटली में तो इस समय रात के सवा तीन ही बज रहे होंगे किंतु शरीर की घड़ी संभवतः अपने देश की घड़ियों को पहचान गई थी।

सारा श्रेय मधु एवं भानु को!

यह विदेश यात्रा इसलिए संभव हो सकी थी क्योंकि हमें यात्रा के दौरान भोजन सम्बन्धी कोई कष्ट नहीं हुआ था। इस सफलता का सारा श्रेय मधु और भानु को जाता है। यदि हम पिज्जा और पास्ता के भरोसे इटली गए होते तो हमें यह यात्रा बीच में ही छोड़कर आनी पड़ती। हम पिज्जा और पास्ता तो खा सकते थे किंतु जिन दुकानों में भेड़, बकरी और सूअर के मांस पकते और बिकते थे, वहाँ से कुछ भी लेकर हम कैसे खा सकते थे! भोजन स्वयं बनाने के कारण हम यात्रा के व्यय को भी नियंत्रण में रख सके थे। 

हस्ती मिट रही है हमारी!

कुछ धूर्त किस्म के लोग शब्दों का आडम्बर खड़ा करके ऐसी मिथ्या और सारहीन बातें तैयार करते हैं जिनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता किंतु वे बातें उस देश के चालाक राजनीतिज्ञों द्वारा जनता में पवित्र मंत्रों की तरह फैलाई जाती हैं तथा कुछ ही दिनों में वे गलत बातें राष्ट्रीय अस्मिता और जातीय अभिमान की प्रतीक बनकर दैवीय उपलब्धि बन जाती हैं और देश की जनता आज्ञाकारिणी भेड़ों की तरह उन पवित्र मंत्रों को प्रतिदिन दोहराती है। ऐसा ही एक मंत्र है- ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा!’

भारत की आजादी से पहले डॉ. इकबाल ने लिखा था- ‘यूनान मिस्र रोम सब मिट गए जहाँ से, है बाकी अब तक नामओ निशाँ हमारा! कुछ बात है की हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौर ए जहाँ हमारा!’

कितनी झूठी और मक्कारी भरी बात है यह! भारत की जनता इस गीत को गाते समय गर्व से अपना सीना फुला लेती है, हैरत होती है ऐसे लोगों को देखकर!

हम अपनी आंखों से देख आए हैं कि यूनान, रोम और मिस्र आज भी वहीं खड़े हैं, जहाँ वे थे। यदि संसार में सबसे ज्यादा कोई देश मिटा है तो वह भारत है जिसके 18 टुकड़े हो गए- 1. ईरान, 2. अफगानिस्तान, 3. पाकिस्तान, 4. भारत, 5. नेपाल, 6. भूटान, 7. तिब्बत, 8. बांगलादेश, 9. बर्मा, 10. थाइलैण्ड, 11. श्रीलंका, 12. इण्डोनेशिया, 13. मलेशिया, 14. ब्रुनेई, 15. मेडागास्कर, 16. वियतनाम, 17. कम्बोडिया और 18. मालदीव।

कुछ इतिहासकार तो इनकी संख्या 24 बताते हैं। इनमें से 7 टुकड़े तो अंग्रेजों ने ही भारत से तोड़कर अलग किए। ये देश भारत से टूट-टूट कर अलग हुए, कभी राजनीतिक कारणों से, कभी भौगोलिक कारणों से तो कभी सांस्कृतिक कारणों से।

ये देश भारत के हिस्से उस काल में थे जब पूरी दुनिया पाँच बड़ी सभ्यताओं में विभक्त थी- 1. रोमन साम्राज्य, 2. मिस्र साम्राज्य, 3. भारतीय उपमहाद्वीप के हिन्दू राज्य, 4. चीन का हान साम्राज्य, 5. शेष दुनिया।

ऊँट भले ही सुईं की नोक में प्रवेश कर जाए!

इटली के शहरों में पर्यटकों की भारी भीड़ लगी रहने के कारण यहाँ के नागरिकों के जीवन में स्थाई व्यवधान उत्पन्न हो गया है। प्रत्येक वस्तु महंगी हो गई है। भीड़ के कारण नागरिकों का अपने घरों एवं गलियों से बाहर निकलना कठिन हो गया है। इसलिए बहुत से नागरिक अपने पुराने घरों को छोड़कर बाहरी कॉलोनियों में शिफ्ट हो गए हैं तथा कुछ नागरिक उन शहरों में चले गए हैं जहाँ पर्यटकों की आवाजाही नहीं होती।

 इटलीवासियों के देखकर समझ में आता है कि पर्यटन एवं पूंजीवाद एक सीमा तक ही किसी देश के लिए अनुकूल हो सकते हैं। बीमा पर जोर देना, अत्यधिक पर्यटन को बढ़ावा देना, करों में वृद्धि करना, सरकारी सेवाओं के शुल्क बढ़ाना, नागरिकों के जीवन में कानूनों तथा सरकारी नियमों का हस्तक्षेप बढ़ाना पूंजीवादी व्यवस्था के ‘साइड इफैक्ट्स’ हैं।

भारत इस समय इसी दिशा में बढ़ रहा है। गरीबी में जीना मानवता के प्रति अपराध है किंतु गरीब के लिए जिंदगी जीने के अवसर कम करना प्रकृति और ईश्वर दोनों के प्रति अपराध है। देश की अर्थव्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें न तो किसी को गरीबी में जीना पड़े और न किसी गरीब को अपने जीवन से निराश होना पड़े।

मानव जीवन को सुख, आनंद, उमंग और उत्साह से भरने के लिए पैसा ही एकमात्र आवश्यकता नहीं है। सांस्कृतिक उदारता भी बहुत कम धन में, राष्ट्र के लोगों के जीवन को सुखी बना सकती है। महंगी शराब, महंगे पिज्जा और तरह-तरह के मांस एवं अण्डों के भोजन गरीबों को जीवन जीने की सुविधाओं से दूर करते हैं।

जबकि शुद्ध शाकाहारी सात्विक भोजन, सादा कपड़े, कम धन में भी जीवन को सुखी बना सकते हैं। सामुदायिक सेवाओं में वृद्धि करने से आम आदमी कम धन में जीवन व्यतीत करने में सफल हो सकते हैं। एक बार टॉयलेट जाने के लिए 80 से 160 रुपए वसूलने वाले देश में कोई भी गरीब आदमी जीवित कैसे रह सकता है!

कम धन अर्जित करने के लिए झूठ, चोरी, मक्कारी, फरेब का सहारा नहीं लेना पड़ता और यह सब किए बिना अधिक धन कैसे अर्जित किया जा सकता है! एकाकी परिवारों को अपनी दैनंदिनी पर अधिक धन व्यय करना पड़ता है जबकि संयुक्त परिवार कम पैसों में जीवन जीने की सुविधा देते हैं। ईसा मसीह ने शायद यही सब बातें सोचकर कहा होगा कि ऊँट भले ही सुईं की नोक में प्रवेश कर जाए किंतु कोई अमीर व्यक्ति स्वर्ग में प्रवेश नहीं कर सकता!

अंत में फ्लोरेंस के एक चर्च के पैनल में बने दृश्य का स्मरण करना चाहूंगा जिसमें एक धनी-सामंत का पुत्र ईसाई संत होकर भिक्षु का जीवन जीने की इच्छा व्यक्त करता है। वह भिखारी बन जाता है और जब उसकी मृत्यु होती है तो स्वर्ग से देवदूत उसे लेने के लिए आते हैं। इस संत को रोम के कैथोलिक समाज में ईसा मसीह जैसा ही आदर दिया जाता है।

भारत में भी महात्मा बुद्ध और महावीर स्वामी के आदर्श हमारे सामने हैं जहाँ ये राजकुमार भिक्षुओं का जीवन जिए और समाज को आडम्बर-रहित, विलासिता-रहित जीवन जीने के उपदेश देते रहे। भारतीय संस्कृति के महानायक राम और कृष्ण इसलिए कालजयी बन पाए क्योंकि एक ने 14 वर्ष तक वनों में निवास करके वनवासियों के लिए संघर्ष किया और दूसरे ने अपने जीवन का प्रारम्भिक हिस्सा गायों की सेवा करने के लिए ग्वाले के रूप में बिताया। सोने के पालनों में पलने वाले लोग किसी भी देश में, किसी भी संस्कृति में नायक नहीं बन सके!

ईसाई धर्म का मूल भी सादगी एवं आडम्बर रहित जीवन जीने में है किंतु इटली सहित यूरोप के कुछ देशों ने पूंजीवाद का विस्तार किया और साम्राज्यवाद को पूंजीवाद के औजार के रूप में प्रयुक्त किया। इस कारण सदियों से आधी दुनिया शोषण, अत्याचार और निर्धनता की शिकार रही है।

यदि यूरोपीय देश भारत से धन छीनकर नहीं ले गए होते तथा सादगी से रहे होते तो आज भारत में गरीबी नहीं होती और यूरोप-वासियों को अपने बेटे-पोतों से अलग-थलग एकाकी जीवन नहीं जीना पड़ता। भारत में अहिंसा, शाकाहार, सादगी, उच्च विचार, स्वदेशी आदि पर जोर दिए जाने का अर्थ पूंजीवाद से दूर जाना है, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

सादगी और सरलता पर खड़ी है भारतीय संस्कृति!

भारतीय जीवन में सादगी कितनी गहराई से प्रतिष्ठित है, इसके ढेरों उदाहरण भारत के बड़े नेताओं के आचरण में देखी जा सकती है। मदन मोहन मालवीय, लाल बहादुर शास्त्री, गुलजारी लाल नंदा, जॉर्ज फर्नाण्डीस आदि के जीवन भारतीय सादगी के महानतम् उदाहरण हैं।

मदनमोहन मालीवय कपड़े धोने से लेकर भोजन बनाने तक, अपना सारा काम स्वयं करते थे। लाल बहादुर शास्त्री, नेहरू का दिया हुआ पुराना कोट पहन कर ताशकंद गए थे जिसका कॉलर फटा हुआ था। जॉर्ज फर्नाण्डीस अपने कपड़े स्वयं धोते थे और उन पर कभी इस्तरी नहीं करते थे। एक बार दिल्ली के एक बहुमंजिला इमारत में बम विस्फोट हुआ। उस फ्लैट में भारत के पूर्व-प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा रहते थे। उस समय अपराह्न के तीन बजे थे। 82 वर्ष के नंदा इसलिए जीवित बच गए क्योंकि वे स्नानघर में बैठे हुए कपड़े धो रहे थे!

आप चाय वापस ले जाइए!

पुराने नेताओं की सादगी आज भी हमारे सार्वजनिक जीवन से नष्ट नहीं हुई है। इसका उदाहरण अरुण जेटली के जीवन में हुई एक घटना में देखा जा सकता है। जब वे भारत के वित्तमंत्री थे, तब उन्होंने किसी एयरपोर्ट पर चाय मंगवाई, जब उन्होंने उस चाय का दाम पूछा तो अरुण जेटली को उसके इतने अधिक दाम सुनकर आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा कि-‘नहीं मैं इतनी महंगी चाय नहीं पी सकता, आप वापस ले जाइए!’

यदि आज हुआ होता वह ईसाई संत!

भारतीय सादगी के ठीक उलट, इटली में दो सौ रुपए लीटर के भाव से पानी तो खरीद कर पीना ही पड़ता है, लघुशंका से निवृत्त होने के लिए भी एक बार में एक व्यक्ति को अस्सी से एक सौ साठ रुपए तक देने पड़ते हैं। यदि रोम का वह राजकुमार जो ईसाई संत होकर भिखारी का जीवन जीता था, आज रोम में पैदा हुआ होता तो उसे पानी पीने और लघुशंका जाने की सुविधा तक उपलब्ध नहीं होती! हमने कैसी दुनिया का निर्माण किया है!

वी कान्ट डू, एज द रोमन्स डू!

पूरी दुनिया में एक कहावत कही जाती है- ‘व्हैन इन रोम, डू एज द रोमन्स डू!’ यह कहावत रोमन सभ्यता की उच्चता और उनके दंभ को प्रदर्शित करती है। संभवतः इस कहावत का निर्माण उस समय हुआ होगा जब यूरोपवासियों ने प्राचीन भारत और उसके निवासियों को नहीं देखा होगा। रोमन लोगों के इतिहास, सभ्यता एवं संस्कृति में मुझे ऐसा कुछ नहीं लगा कि एक भारतीय, रोम में जाकर वैसा बर्ताव करे जैसा कि रोम के लोग करते हैं।

यह केवल दंभोक्ति प्रतीत होती है। रोम की बजाय भारतीयों के हृदय अधिक उदार हैं। रोम में बूढ़ी आबादी विशेषकर वृद्ध औरतें अधिक दिखाई देती हैं जो इस बात की गवाही देती हैं कि उन्हें गृहस्थी बसाने की अपेक्षा स्वेच्छाचारी और एकाकी जिंदगी अधिक पसंद है। ऐसा समाज संसार के लिए आदर्श कैसे हो सकता है जिसमें बच्चों की किलकारियों के लिए स्थान नहीं हो! यही कारण है कि आज इटली के मूल लोगों की जनसंख्या गिर रही है। वहाँ दूसरे देशों के लोग आकर बस रहे हैं।

हमारे अनुभव केवल हमारे हैं!

इस पुस्तक में लिखे गए अनुभव नितांत हमारे हैं। निश्चित रूप से अन्य पर्यटकों को हमसे बिल्कुल अलग अनुभव होते होंगे, अच्छे भी और बुरे भी! अतः यह तो नहीं कहा जा सकता कि पोप का देश बिल्कुल वैसा ही है, जैसा हमें दिखाई दिया किंतु जैसा हमें दिखाई दिया, वैसा पूरी ईमानदारी के साथ लिख दिया गया है, बिना किसी राग-द्वेष अथवा पूर्वाग्रह के!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

लेखकीय – रोमन साम्राज्य का इतिहास एवं इटली का एकीकरण

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लेखकीय - रोमन साम्राज्य

लेखकीय – रोमन साम्राज्य का इतिहास एवं इटली का एकीकरण पृष्ठ पर लेखकर डॉ. मोहनलाल गुप्ता की कलम से पुस्तक रोमन साम्राज्य का इतिहास एवं इटली का एकीकरण की प्रस्तावना लिखी गई है।

आदमी द्वारा किए गए आविष्कारों और खोजों की सूची आग और पहिए से आरम्भ होती है। इस सूची में घोड़े की पीठ का कहीं भी उल्लेख नहीं मिलता, जबकि घोड़े की पीठ ने दुनिया को बनाने में उतनी ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है जितनी कि आग और पहिया ने। रोमन साम्राज्य का निर्माण भी केवल आग और पहिए के बल पर नहीं, अपितु घोड़े की पीठ के बल पर भी हुआ था। घोड़ा आदमी का सहचर कब बना, कहा नहीं जा सकता किंतु घोड़े और आदमी के सहचरत्व ने पूरी दुनिया को बांधकर छोटे-बड़े साम्राज्यों में बदल दिया। रोम साम्राज्य भी उन्हीं में से एक था।

घोड़ा अनी पीठ पर तलवारें लेकर चलता था। पहिया उसके पीछे क्रीत दास की तरह दौड़ता था तथा तलवारें ढोने वाला घोड़ा जिस मानव बस्ती में पहुँचता था, वहाँ आग लग जाती थी। आदमी का लहू धरती पर बहता था तथा घोड़े पर बैठा हुआ आदमी अचानक सम्राट बन जाता था और दशों दिशाएं उसके जयघोष से गूंजने लगती थीं। ठीक यही वह क्षण होता था जब धर्म नामक संस्था प्रकट होकर सम्राट को देवत्व प्रदान करती थी। इस पुस्तक में रोम साम्राज्य की कुछ ऐसी ही कथा उभर कर आई है।

मनुष्य अपने अतीत के इतिहास को अपनी आंखों से देखना चाहता है इसलिए वह दुनिया का भ्रमण करता है। दुनिया के माध्यम से वह न केवल अपने इतिहास को अपितु दुनिया बनाने वाले को भी समझना चाहता है। यही कारण है कि विश्व भर में करोड़ों लोग प्रतिवर्ष किसी न किसी स्थान की यात्रा करते हैं।

वर्ष 2019 में ग्यारह दिन के इटली प्रवास के दौरान मुझे इटली की सड़कों पर घूमते हुए रोमन लोगों के चेहरे ही दिखाई नहीं दिए अपितु उन चेहरों में से झांकते हुए भारतीय पंजाबियों से लेकर मिस्र की महारानी क्लियोपैट्रा और मेसीडोनिया के राजा सिकंदर के चेहरे दिखाई दिए। शेक्सपीयर के नाटक ‘मर्चेण्ट ऑफ वेनिस’ के मर्चेण्ट का चेहरा भी मुझे बहुत से व्यापारियों में दिखाई दिया। इन्हीं चेहरों के पीछे रोम के उन सम्राटों एवं पोप के चेहरे भी झांकते हुए दिखाई दिए जिन्होंने संसार भर में शासन और धर्म के नए मानक स्थापित किए।

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रोम सदा से ही पोप का देश नहीं था। मूलतः यह यूरोपियन आदिवासियों का देश है जिन्हें भारत से आए संस्कृत-भाषी आर्यों ने सभ्यता और संस्कृति का पहला पाठ पढ़ाया। रोम की स्थापना ईसा के जन्म से लगभग 900 साल पहले हुई तथा पोप की स्थापना ईसा की मृत्यु के लगभग 100 साल बाद हुई। अर्थात् पोप नामक संस्था के अस्तित्व में आने से पहले एक हजार वर्ष की दीर्घ अवधि में रोम की धरती पर बहुत कुछ ऐसा घटित हो चुका था जो न केवल प्राचीन रोम की पहचान है अपितु पूरी दुनिया को आज भी आकर्षित करता है। फिर भी पिछले दो हजार सालों से रोम, पोप का ही देश बना हुआ है। यह पोप के लिए ही जाना जाता है। पोप ही इस देश की धड़कन है और पोप ही इस देश की वास्तविक पहचान है। हमारे परिवार के लिए किसी देश के भ्रमण पर जाना, आधुनिक पर्यटन की किसी भी क्रिया से मेल नहीं खाता है। हमारी इन यात्राओं में मौज-शौक के पीछे भागना, मनोरंजन के लिए पैसा फैंकना, खेल-तमाशे देखना, उस देश के खाने-पीने का आनंद उठाना जैसे तत्व बिल्कुल ही नहीं होते। हमारे लिए ये महंगी विदेश यात्राएं उस देश के इतिहास और संस्कृति को आत्मसात् करने और बाद में उसे ज्यों की त्यों पन्नों पर उतार देने की परिश्रम-युक्त प्रक्रिया का साधन हैं।

वर्ष 2019 की गर्मियों में हमरे परिवार द्वारा की गई रोम यात्रा ऐसी ही एक प्रक्रिया का अंग थी। 17 मई से 28 मई 2019 तक ग्यारह दिनों की इस यात्रा में, हम इटली और उसके नगरों की सभ्यता, संस्कृति एवं इतिहास को जितना देख, सुन और समझ पाए, वही इस पुस्तक के पन्नों में लिखा गया है किंतु इस तरह की यात्राओं में केवल उस देश में गुजारे गए दिन ही लेखन का हिस्सा नहीं होते, अपितु उस देश की यात्रा से पहले बहुत कुछ पढ़ना और समझना होता है। निश्चित रूप से इटली की यात्रा से पहले पढ़ा गया और समझा गया इतिहास एवं भूगोल भी इस पुस्तक के महत्त्वपूर्ण हिस्से हैं।

11 दिन के इटली प्रवास के दौरान हमने चार दिन रोम में, तीन दिन फ्लोरेंस में, एक दिन पीसा में और तीन दिन वेनिस में बिताए। इस दौरान अनेक रोचक एवं खट्टे-मीठे अनुभव भी हुए, उन्हें भी ज्यों का त्यों लिखने का प्रयास किया गया है।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इटली यूरोप का भारत (1)

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इटली यूरोप का भारत - bharatkaitihas.com
इटली यूरोप का भारत

कई मायनों में इटली यूरोप का भारत है। कई मायनों में इटली यूरोप का भारत है। इस बात को वहाँ जाकर ही समझा जा सकता है। इटली के लोगों की कद-काठी, बालों का रंग, चेहरा-मोहरा भारत के पंजाब प्रांत के लोगों से मिलता है न कि शेष यूरोपवासियों से।

इटली को ‘यूरोप का भारत’ कहा जाता है। ऐसा कहे जाने के पीछे कोई निश्चित कारण तो प्रतीत नहीं होता है फिर भी इस मान्यता के पीछे छिपे कुछ कारण दोनों देशों को देखने से स्वतः ही स्पष्ट होने लगते हैं।

भारत एवं इटली में समानता

इटली के लोगों का रंग भारत के उन गोरे लोगों जैसा है जो पंजाब, हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखण्ड आदि प्रदेशों में रहते हैं। इनकी कद-काठी भी पंजाबियों से मिलती जुलती है। इटली के लोग मंझोले कद तथा गठे हुए शरीर के होते हैं। इटली के लोगों के बाल भी भारतीयों के बालों की तरह काले हैं जबकि यूरोपियन लोगों के बाल प्रायः सुनहरी पीली आभा लिए हुए सफेद होते हैं।

इटली के लोगों की आंखों की चमक भी कभी-कभी इनके भारतीय होने का आभास देती है। वास्तव में इटली के लोगों का मूल उद्गम आज से हजारों साल पहले के भारतीय आर्यों में छिपा हुआ है। यही कारण है कि इटली की मूल भाषा ‘लैटिन’ भी ‘संस्कृत’ के शब्दों से भरी पड़ी है।

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जिस तरह भारत के लोग अब संस्कृत के स्थान पर संस्कृत से निकली हुई हिन्दी व्यवहार में लाते हैं, उसी प्रकार इटली के लोग लैटिन से बनी हुई ‘इटैलिया’ भाषा काम में लाते हैं। जिस तरह भारत एशिया के दक्षिणी भाग में स्थित है, उसी तरह इटली भी यूरोप के दक्षिणी भाग में स्थित है। जैसे भारत के उत्तर में हिमालय पर्वत शृंखला है, वैसे ही इटली के उत्तरी हिस्से में आल्प्स पर्वतमाला है। जैसे भारत को पूर्व, दक्षिण एवं पश्चिम में तीनों ओर से समुद्र घेरकर भारत को एक प्रायद्वीप बनाता है, वैसे ही इटली के भी पूर्व, दक्षिण एवं पश्चिम में तीन ओर समुद्र है और वह इटली को प्रायद्वीप बनाता है। इटली भी भारत की तरह कृषि-प्रधान देश है तथा यहाँ की जलवायु भी भारत के जलवायु की तरह विविधताएं लिए हुए है। जिस प्रकार भारत में खेत छोटे आकार के हैं तथा अधिकतर खेती मानव संसाधन एवं पशु-संसाधन के उपयोग से होती है, वही स्थिति इटली की भी है। इटली में भी भारत की तरह चावल तथा मक्का खूब पैदा होता है। जिस प्रकार भारत संसार का प्राचीनतम देश है, उसी प्रकार इटली भी यूरोप का प्राचीनतम देश है। जिस प्रकार भारत के लोग बहु-देव वादी एवं मूर्ति-पूजक धर्म में विश्वास करते हैं, उसी प्रकार इटली में भी ईसाई धर्म के उदय से पहले बहुदेव वादी एवं मूर्ति-पूजक धर्म प्रचलन में था।

जिस तरह भारत के लोग देवी-देवताओं के लिए पहाड़ों एवं मैदानों में मंदिर बनाते हैं, उसी प्रकार इटली के मूल धर्म को मानने वाले लोग भी देवी-देवताओं के लिए पहाड़ों एवं मैदानों में मंदिर बनाते थे। भारत की तरह इटली में भी गणतंत्र लागू होने से पहले छोटे-छोटे राज्य थे तथा दोनों ही देशों में राज्यों के एकीकरण के लिए जनता को अत्यधिक समय, श्रम एवं ऊर्जा व्यय करनी पड़ी एवं दीर्घकालीन आंदोलन चलाने पड़े।

जिस तरह भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा है तथा उसमें केसरिया, सफेद एवं हरे रंग की पट्टियां प्रयुक्त होती हैं, उसी प्रकार इटली का ध्वज भी तिरंगा हैं तथा उसमें हरे, सफेद एवं लाल रंगों की पट्टियां प्रयुक्त होती हैं किंतु भारत के तिरंगे में रंगीन पट्टियां आड़ी हैं जबकि इटली के ध्वज की रंगीन पट्टियां खड़ी हैं।

भारत के झण्डे का केसरिया रंग शौर्य का प्रतीक है तो इटली के झण्डे का लाल रंग गणतंत्र लिए हुए रक्त-रंजित संघर्ष का प्रतीक है। भारत के झण्डे में सफेद रंग शांति का प्रतीक है तथा इटली के झण्डे का सफेद रंग बर्फ से ढके हुए आल्प्स पर्वतों का प्रतीक है। भारत के झण्डे का हरा रंग हरियाली एवं समृद्धि का प्रतीक है तो इटली के झण्डे का हरा रंग हरियाली से ढकी पहाड़ियों का प्रतीक है।

भारत एवं इटली में अंतर

इतनी सारी समानताओं के होते हुए भी भारत एवं इटली में बहुत से अंतर भी हैं। क्षेत्रफल के मामले में भारत इटली से 11 गुना बड़ा तथा जनंसख्या के मामले में भारत इटली से 22 गुना बड़ा है। क्षेत्रफल तथा जनसंख्या दोनों में ही इटली भारत के कई प्रांतों से भी छोटा है। भारत एक धर्म-निरपेक्ष देश है जबकि इटली का राष्ट्रीय धर्म ‘ईसाई’ है।

भारत में लगभग 80 प्रतिशत लोग हिन्दू धर्म को मानते हैं जबकि इटली के 84 प्रतिशत लोग कैथोलिक ईसाई धर्म को मानते हैं। भारतीय संस्कृति में परोपकार को धन से ऊपर माना जाता है, जबकि इटली की संस्कृति में धन ही सर्वोपरि है। भारत में सार्वजनिक प्याऊ, सार्वजनिक पेशाबघर, सार्वजनिक शौचालय, धर्मशाला, विश्रामगृह, सदाव्रत, लागत मूल्य के भोजनालय आदि उपक्रम सरकार तथा जनता दोनों की तरफ से बनाए एवं चलाए जाते हैं जबकि इटली में इस तरह की निःशुल्क व्यवस्थाएं न तो सरकार की तरफ से की जाती हैं और न ही समाज की तरफ से।

इटली की विशेषताएं

भारत के मुकाबले बहुत छोटा देश होते हुए भी इटली का जनसंख्या घनत्व 201 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है जबकि भारत का जनसंख्या घनत्व 416 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। इस कारण इटली बहुत साफ-सुथरा, शांत एवं खाली-खाली सा लगता है जबकि भारत के शहर एवं गांव दोनों में ही गंदगी का साम्राज्य है।

भारत के बाजारों, गलियों एवं सड़कों पर भीड़-भाड़ एवं शोर-शराबा अपने चरम पर हैं। इटली के लोग वृद्धों एवं बच्चों के लिए मुस्करा कर मार्ग छोड़ते हैं तथा किसी अकेले जा रहे वृद्ध का हाथ पकड़कर उन्हें सड़क के दूसरी तरफ छोड़ देते हैं जबकि भारत में ज्यादातर लोग सड़क पर एक दूसरे को धकियाते हुए से चलते हैं।

इटली की सड़क पर चलने का पहला अधिकार पैदल यात्री का है जिसे देखकर चलती हुई कारें रुक जाती हैं जबकि भारत की सड़कों पर तेज गति के वाहनों को पहले निकलने का स्वयंसिद्ध अधिकार है। अन्यथा वे टक्कर मारने में जरा भी देर नहीं लगाते।

इटली का राष्ट्र के रूप में उदय

इटली, यूनान के बाद यूरोप की दूसरी प्राचीनतम सभ्यता है। रोम की सभ्यता तथा इतिहास इस देश के प्राचीन वैभव तथा विकास के प्रतीक हैं। आधुनिक इटली ई.1861 में एक देश के रूप में गठित हुआ। देश की धीमी प्रगति, शिथिल सामाजिक संगठन तथा राजनितिक उथल-पुथल इटली के 2,500 वर्ष के इतिहास का बड़ा हिस्सा हैं।

इटली के अधिकांश भू-भाग प्राचीन एवं मध्यकाल में अस्तित्व में आने वाले महान् रोमन साम्राज्य, प्राचीन रोमन साम्राज्य, पवित्र रोमन साम्राज्य एवं पूर्वी रोमन साम्राज्य के अंतर्गत रहे। कुछ छोटे-छोटे राज्य भी थे जिन पर जर्मन एवं फ्रैंच कबीलों के मुखियाओं का शासन रहा।

ई.1861 में लगभग सम्पूर्ण इटली एकीकृत होकर पीडमॉंट के राजा इमेनुएल के अधीन हो गया तथा ई.1946 में इटली से राजतंत्र की विदाई हो गई। इटली के एक छोटे से भू-भाग पर शासन करने वाला अंतिम राजवंश ‘सेवाय’ था।

ईसा के आसपास और उसके बाद एक के बाद एक करके अवतरित होने वाले रोमन साम्राज्यों ने भूमध्य सागर के क्षेत्र में अपनी प्रभुता स्थापित की जिसके कारण रोम ने भूमध्यसागरीय देशों एवं प्राचीन यूरोपीय देशों में सभ्यता-संस्कृति, शासन प्रणाली एवं विधिक प्रणालियों की आधारशिला रखी। इटली की संस्कृति पर प्राचीन यूनानी संस्कृति का बड़ा प्रभाव है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रिपब्बलिका इटेलियाना (2)

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रिपब्बलिका इटेलियाना - bharatkaitihas.com
रिपब्बलिका इटेलियाना

इटली की मूल भाषा लैटिन तथा वर्तमान राजभाषा ‘इटेलियन’ में इस देश का मूल नाम रिपब्बलिका इटेलियाना है। अंग्रेजी भाषा में इसे ‘इटली’ कहा जाता है। 35 से 47 डिग्री उत्तरी अक्षांशों एवं 6 से 19 डिग्री पूर्वी देशांतरों के बीच, यूरोप महाद्वीप के दक्षिणी भाग में स्थित इटालियन प्रायद्वीप, ई.1861 से एक देश के रूप में संगठित है। इटली के उत्तर में आल्प्स पर्वतमाला स्थित है जिसमें यूरोप के फ्रांस, स्विट्ज़रलैंड, ऑस्ट्रिया तथा स्लोवेनिया नामक देशों की सीमाएँ आकर लगती हैं।

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सिसली तथा सार्डीनिया, जो भूमध्य सागर के दो सबसे बड़े द्वीप हैं, इटली के ही भाग हैं। वेटिकन सिटी तथा सैन मरीनो इटली के अंतर्गत समाहित दो स्वतंत्र देश हैं। रोम इटली की राजधानी है। देश के अन्य प्रमुख नगरों में फ्लोरेंस, वेनिस, मीलान, पीसा, जिनोआ इत्यादि प्रमुख हैं। इटली की मुख्य भूमि, दक्षिण और सूर्य-पारगमन की दोनों दिशाओं अर्थात् पूर्व से दक्षिण होते हुए पश्चिम दिशा तक, भूमध्य सागर द्वारा जलावृत्त है। इस प्रायद्वीप को इटालियन प्रायद्वीप कहते हैं। इटली के समस्त द्वीपों को मिलाकर इटली की तटरेखा लगभग 7,600 किलोमीटर है। उत्तर में इसकी सीमा यूरोप के फ्रांस (488 कि.मी.), ऑस्ट्रिया (430 कि.मी.), स्लोवेनिया (232 कि.मी.) तथा स्विट्ज़रलैंड नामक देशों से लगती है। वेटिकन सिटी तथा सैन मरीनो नामक देश चारों तरफ़ से इटली से घिरे हुए हैं। इटली, यूरोप के दक्षिणवर्ती तीन बड़े प्रायद्वीपों में बीच का प्रायद्वीप है जो भूमध्यसागर के मध्य में स्थित है। प्रायद्वीप के पश्चिम, दक्षिण तथा पूर्व में क्रमशः तिरहेनियन, आयोनियन तथा ऐड्रियाटिक सागर हैं और उत्तर में आल्प्स पहाड़ की श्रेणियाँ फैली हुई हैं। सिसली (इटली के अधिकार में), सार्डीनिया (इटली के अधिकार में) तथा कॉर्सिका (फ्रांस के अधिकार में), ये तीन बड़े द्वीप तथा लिग्यूरियन सागर में स्थित अन्य टापुओं के समुदाय मूलतः इटली के हैं।

इटली प्रायद्वीप का आकार एक बड़े बूट (जूते) के समान है। उत्तर-पश्चिम से दक्षिण पूर्व तक चौड़ाई 80 से 150 मील तक है। सुदूर दक्षिण में चौड़ाई केवल 35 से 20 मील तक रह जाती है।

जलवायु

रिपब्बलिका इटेलियाना अर्थात् इटली की जलवायु मुख्यतः भूमध्यसागरीय है परन्तु इसमें बहुत अधिक बदलाव पाया जाता है। ट्यूरिन तथा मीलान जैसे शहरों की जलवायु को महाद्वीपीय या आर्द्र महाद्वीपीय जलवायु की श्रेणी में रखा जा सकता है।

प्राकृतिक दशा

इटली मुख्यतः पर्वतीय देश है जिसके उत्तर में आल्प्स पहाड़ तथा मध्य में रीढ़ की भाँति अपेनाइन पर्वत की शृंखलाएँ फैली हुई हैं। अपेनाइन पहाड़ जेलोआ तथा नीस नगरों के मध्य से प्रारंभ होकर दक्षिण-पूर्व दिशा में एड्रियाटिक समुद्र तट तक चला गया है और मध्य तथा दक्षिणी इटली में रीढ़ की भाँति दक्षिण की तरफ फैला हुआ है। वनस्पति, जलवायु तथा प्राकृतिक दृष्टि से यह प्रायद्वीप तीन भागों में बाँटा जा सकता है- (1) उत्तरी इटली, (2) मध्य इटली तथा (3) दक्षिणी इटली।

उत्तरी इटली

यह इटली का सबसे घना बसा हुआ मैदानी भाग है जो मानव जाति के उद्भव से पहले के काल में समुद्र था तथा बाद के किसी काल में नदियों द्वारा आल्प्स पर्वत से लाई हुई मिट्टी से बना। यह मैदान देश की 17 प्रतिशत भूमि घेरे हुए है जिसमें चावल, शहतूत तथा पशुओं के लिए चारा पैदा होता है। इस मैदानी भाग के उत्तर में आल्प्स पहाड़ की ढाल तथा पहाड़ियाँ हैं जिन पर चरागाह, जंगल तथा सीढ़ीनुमा खेत हैं।

पर्वतीय भाग की प्राकृतिक शोभा कुछ झीलों तथा नदियों की उपस्थिति के कारण बहुत बढ़ गई है। उत्तरी इटली का भौगोलिक वर्णन ‘पो’ नामक नदी के माध्यम से ही किया जा सकता है। पो नदी एक पहाड़ी सोते के रूप में ‘माउंट वीज़ो पर्वत’ (ऊँचाई 6,000 फुट) से निकलकर 20 मील बहने के बाद ‘सैलुजा के मैदान’ में प्रवेश करती है।

 ‘सोसिया’ नदी के संगम से 337 मील तक इस नदी में नौ-परिवहन होता है। समुद्र में गिरने से पहले नदी दो शाखाओं (पो डोल मेस्ट्रा तथा पो डि गोरो) में विभक्त हो जाती है। पो के मुहाने पर 20 मील चौड़ा डेल्टा है। नदी की कुल लंबाई 420 मील है तथा यह 29,000 वर्ग मील भूमि के जल की निकासी करती है।

आल्प्स पहाड़ तथा अपेनाइंस से निकलने वाली ‘पो’ की मुख्य सहायक नदियाँ क्रमानुसार टिसिनो, अद्दा, ओगलियो और मिन्सिओ तथा टेनारो, टेविया, टारो, सेचिया और पनारो हैं। टाइबर (244 मील) तथा एड्रिज (220 मील) इटली की दूसरी तथा तीसरी सबसे बड़ी नदियाँ हैं। ये प्रारंभ में सँकरी तथा पहाड़ी हैं किंतु मैदानी भाग में इनका विस्तार बढ़ जाता है और बाढ़ आती है।

सभी नदियाँ सिंचाई तथा विद्युत उत्पादन की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी हैं, किंतु यातायात के लिए अनुपयुक्त हैं। आल्प्स, अपेनाइंस तथा एड्रियाटिक सागर के मध्य में स्थित एक सँकरा समुद्रतटीय मैदान है। उत्तरी भाग में पर्वतीय ढालों पर जैतून, अंगूर तथा नारंगी बहुतायत से पैदा होती है। उपजाऊ घाटी तथा मैदानों में घनी बस्ती है। इनमें अनेक गाँव तथा शहर बसे हुए हैं। अधिक ऊँचाइयों पर घने जंगल स्थित हैं।

मध्य इटली

मध्य इटली के बीच में अपनाइंस पहाड़ उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की दिशा में एड्रियाटिक समुद्र-तट के समानांतर फैला हुआ है। अपेनाइंस का सबसे ऊँचा भाग ‘ग्रैनसासोडी इटैलिया’ (9,560 फुट) इसी भाग में है। यहाँ पर्वत श्रेणियों का जाल बिछा हुआ है, जो नवंबर से मई तक बर्फ से ढकी रहती हैं। यहाँ पर कुछ विस्तृत, बहुत सुंदर तथा उपजाऊ घाटियाँ हैं जिनमें ‘एटरनो की घाटी’ (2,380 फुट) प्रमुख है।

मध्य इटली की प्राकृतिक रचना के कारण यहाँ एक ओर अधिक ठंडा, उच्च पर्वतीय भाग है तथा दूसरी ओर गर्म तथा शीतोष्ण जलवायु वाली ढाल एवं घाटियाँ हैं। पश्चिमी ढाल एक पहाड़ी ऊबड़-खाबड़ भाग है। दक्षिण में ‘टस्कनी’ तथा ‘टाइबर’ के बीच का भाग ज्वालामुखी पहाड़ों की देन है, अतः यहाँ शंक्वाकार पहाड़ियाँ तथा झीलें हैं। इस पर्वतीय भाग तथा समुद्र के बीच में काली मिट्टी वाला एक उपजाऊ मैदान है जिसे ‘कांपान्या’ कहते हैं।

मध्य इटली के पूर्वी तट की तरफ की पर्वत-श्रेणियाँ समुद्र के बहुत निकट तक फैली हुई हैं। अतः एड्रियाटिक सागर में गिरनेवाली नदियों का महत्त्व बहुत कम है। यह विषम-भाग फल-उद्यानों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ जैतून तथा अंगूर की खेती होती है एवं बड़े शहरों तथा बड़े गाँवों का अभाव है। अधिकांश लोग छोटे-छोटे कस्बों तथा गाँवों में रहते हैं। खनिज संपत्ति के अभाव में यह भाग औद्योगिक विकास की दृष्टि से पिछड़ा हुआ है। फुसिनस, ट्रेसिमेनो तथा चिडसी यहाँ की प्रसिद्ध झीलें हैं। पश्चिमी भाग की झीलें ज्वालामुखी पहाड़ों से निकलती हैं।

दक्षिणी इटली

यह संपूर्ण भाग पहाड़ी है जिसके बीच में अपेनाइंस रीढ़ की भाँति फैला हुआ है तथा दोनों ओर नीची पहाड़ियाँ हैं। इस भाग की औसत चौड़ाई 50 मील से लेकर 60 मील तक है। पश्चिमी तट पर ‘तेरा डी लेवोरो’ नामक संकरा तथा पूर्व में ‘आपूलिया’ नामक चौड़ा मैदान स्थित हैं। इन दो मैदानों के अतिरिक्त सारा भाग पहाड़ी है और अपेनाइंस की ऊँची-नीची शृंखलाओं से ढका हुआ है।

 ‘पोटेंजा की पहाड़ी’ दक्षिणी इटली की अंतिम सबसे ऊँची पहाड़ी ‘पोलिनो की पहाड़ी’ से मिलती है। सुदूर दक्षिण में ग्रेनाइट तथा चूने के पत्थर की, जंगलों से ढकी हुई पहाड़ियाँ तट तक चली गई हैं। एड्रियाटिक सागर में गिरनेवाली ‘लीरी’ तथा ‘गेटा’ आदि नदियाँ पश्चिमी ढाल पर बहनेवाली नदियों की तुलना में अधिक लंबी हैं। ‘ड्रिनगो’ से दक्षिण की ओर गिरने वाली विफरनो, फोरटोरे, सेरवारो, आंटो तथा ब्रैडानो नदियाँ मुख्य हैं।

दक्षिणी-इटली में पहाड़ों के बीच ‘लैगोडेल-मोटेसी’ नामक झील स्थित है। इटली के समीप सिसली, सार्डीनिया, कॉर्सिका, एल्वा, कैप्रिया, गारगोना, पायनोसा, मांटीक्रिस्टो, जिग्लिको आदि द्वीप स्थित हैं। इस्चिया, प्रोसिदा तथा पोंजा नामक द्वीप नेपल्स की खाड़ी के पास स्थित हैं, ज्वालामुखी-पहाड़ों से निकले लावा से बने हैं। एड्रियाटिक तट पर केवल ‘ड्रिमिटी द्वीप’ स्थित है।

जलवायु तथा वनस्पति

पूर्व से दक्षिण होते हुए पश्चिम तक अर्थात् तीन ओर से समुद्र से घिरा हुआ होने के कारण तथा उत्तर में आल्प्स पर्वत की ऊँची शृंखला से घिरा हुआ होने के कारण इटली की जलवायु यूरोपीय देशों के जलवायु से भिन्न है। उत्तरी इटली, मध्य इटली एवं दक्षिणी इटली में जलवायु का पर्याप्त अंतर है। यह यूरोप का सर्वाधिक गर्म देश है।

आल्प्स के कारण इटली में उत्तरी ठंडी हवाएं प्रवेश नहीं कर पाती हैं किंतु पूर्वी भाग में ठंडी तथा तेज ‘बोरा’ नामक हवाएँ चलती हैं। दक्षिण में अपेनाइंस पहाड़ के कारण अंध महासागर से आने वाली हवाओं का प्रभाव ‘तिरहीनियन’ समुद्र तट तक ही सीमित रहता है और ये हवाएं इटली में प्रवेश नहीं कर पातीं।

उत्तरी तथा दक्षिणी इटली के तापमान में पर्याप्त अंतर पाया जाता है। ताप का उतार-चढ़ाव 52 डिग्री फारेनहाइट से 66 डिग्री फारेनहाइट तक होता है। दिसंबर तथा जनवरी सबसे अधिक ठंडे तथा जुलाई और अगस्त सबसे अधिक गर्म महीने होते हैं। पो नदी के मैदान का औसत ताप 55 डिग्री फारेनहाइट तथा 500 मील दूर स्थित सिसली का औसत ताप 64 डिग्री फारेनहाइट है।

देश में वर्षा का वार्षिक औसत 899 मिमी है। उत्तर के आल्प्स के पहाड़ी क्षेत्र तथा अपेनाइंस के ऊँचे पश्चिमी भाग में सर्वाधिक वर्षा होती है। आल्प्स के मध्यवर्ती भाग में गर्मी में वर्षा होती है तथा जाड़े में बर्फ गिरती है। पो नदी की द्रोणी में गर्मी में अधिक वर्षा होती है। स्थानीय कारणों के अतिरिक्त इटली की जलवायु भूमध्यसागरीय है जहाँ जाड़े में वर्षा होती है तथा गर्मी शुष्क रहती है।

जलवायु की विषमता के कारण यहाँ विविध प्रकार की वनस्पतियाँ उगती हैं। आधुनिक किसानों ने पूरे इटली को फलों, तरकारियों तथा अन्य फसलों से भर दिया है, इसलिए केवल ऊँचे पहाड़ों पर ही जंगली पेड़ तथा झाड़ियाँ पाई जाती हैं। ऊँचाई पर नुकीली पत्ती वाले सदाबहार जंगल पाए जाते हैं। इनमें सरो, देवदार, चीड़ तथा फर के वृक्ष मुख्य हैं।

उत्तर के पर्वतीय ठंडे भागों में अधिक ठंड सहन करने वाले पेड़ पाए जाते हैं। तटीय तथा अन्य निचले मैदानों में जैतून, नारंगी, नीबू आदि फलों के उद्यान हैं। मध्य इटली में अपेनाइंस पर्वत की ऊँची श्रेणियों को छोड़कर प्राकृतिक वनस्पति अन्यत्र उपलब्ध नहीं होती। यहाँ जैतून तथा अंगूर की खेती होती है। दक्षिणी-इटली में तिरहीनियन तट पर जैतून, नारंगी, नीबू, शहतूत, अंजीर आदि फलों के उद्यान हैं। इस भाग में कंदों से उगाए जाने वाले फूल भी होते हैं।

कृषि

इटली-वासियों का सबसे बड़ा व्यवसाय खेती है। जलवायु तथा प्राकृतिक दशा की भिन्नता के कारण इस छोटे से देश में राई से लेकर चावल तक, सेब से लेकर नारंगी तक तथा अलसी से लेकर कपास तक विविध प्रकार की जिन्सें पर्याप्त मात्रा में पैदा होती हैं। इटली में लगभग 700 लाख एकड़ भूमि उपजाऊ है जिसमें से 183 लाख एकड़ में अन्न, 28 लाख एकड़ में दाल आदि फसलें, 8 लाख एकड़ में औद्योगिक फसलें, 15 लाख एकड़ में तरकारियाँ, 24 लाख एकड़ में अंगूर, 20 लाख एकड़ में जैतून, 2 लाख एकड़ में चरागाह और चारे की फसलें तथा 144 लाख एकड़ भूमि में जंगल पाए जाते हैं।

जनसंख्या

द्वितीय विश्व-युद्ध से पहले इटली में जनसंख्या वृद्धि की दर काफी ऊँची थी किंतु द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद इटली की जनसंख्या लगभग स्थिर हो गई।  ई.1931 में वार्षिक वृद्धि 0.87 प्रतिशत थी। इटली की जनसंख्या वर्ष 2008 में 5 करोड़ 90 लाख तथा वर्ष 2019 में 5 करोड़ 92 लाख थी।

इस प्रकार विगत ग्यारह वर्षों के औसत के अनुसार तो इटली की जनसंख्या स्थिर रही किंतु विगत कुछ सालों से इसकी जनसंख्या में 0.1 प्रतिशत की वार्षिक गिरावट दर्ज की जा रही है। पर्वतीय भूमि तथा सीमित औद्योगिक विकास के कारण जनसंख्या का घनत्व अन्य यूरोपीय देशों की अपेक्षा बहुत कम अर्थात् केवल 201 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। इटली में 30 प्रतिशत जनसंख्या गांवों में एवं सत्तर प्रतिशत जनसंख्या नगरों में निवास करती है तथा देश के 99 प्रतिशत लोग शिक्षित हैं।

खनिज सम्पदा

सिसली (काल्टानिसेटा), टस्कनी (अरेंजो, फ्लोरेंस तथा ग्रासेटो), सार्डीनिया (कैगलिआरी, ससारी तथा इंग्लेसियास) एवं पीडमांट क्षेत्रों में खनिज तथा औद्योगिक विकास हुआ है। इटली से कीमती रत्न एवं लोहा सहित विभिन्न प्रकार के खनिज दूसरे दशों को निर्यात किये जाते हैं जबकि अन्य बहुत से खनिज आयात भी किए जाते हैं।

उद्योग-धंधे

देश का प्रमुख उद्योग सूती तथा रेशम आधारित वस्त्र-उद्योग है। लोंबार्डी, पीडमांट तथा वेनेशिया मुख्य सिल्क उत्पादक क्षेत्र हैं। देश में रासायनिक वस्तुएं बनाने तथा चीनी बनाने के भी पर्याप्त कारखाने हैं। विभिन्न प्रकार की मशीनें, मोटर, मोटर साइकिल तथा साइकिल बनाने का उद्योग भी बहुत बड़ा है। देश की नदियों में जलविद्युत् पर्याप्त मात्रा में उत्पन्न की जाती है। अर्जेंटीना, संयुक्त राज्य अमरीका एवं कनाडा आदि देशों से इटली के व्यापारिक सम्बन्ध हैं।

आयात की जाने वाली वस्तुओं में कपास, ऊन, कोयला और रासायनिक पदार्थ हैं तथा निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में विभिन्न प्रकार की मशीनें, फल, सूत, कपड़े, मोटर, मोटरसाइकिल एवं कुछ विशिष्ट रासायनिक पदार्थ हैं। इटली का आयात, निर्यात से अधिक है।

नगर

संपूर्ण देश 19 क्षेत्रों तथा 92 प्रांतों में बँटा हुआ है। देश में एक लाख से अधिक जनसंख्या वाले केवल 26 नगर हैं। इनमें रोम, मीलान नेपल्स, तूरिन तथा जेनेवा प्रमुख हैं। अन्य नगरों में टोरीनो, बर्गमो, वेनिस, रवेन्ना, बारी, सियेना, फ्लोरेन्स, पीसा नापोलि, पाम्पे, सोरेन्टो, पलेर्मो, ट्रिएस्ट, वेरोना, जेनोआ तथा ब्रिंडिसि प्रमुख हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रोमन् सभ्यता की स्थापना एवं विस्तार (3)

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रोमन् सभ्यता की स्थापना एवं विस्तार

रोमन् सभ्यता की स्थापना का उद्भव तथा रोमन सभ्यता की स्थापना दो अलग-अलग विषय हैं। इस क्षेत्र में मानवों का अधिवास अत्यंत प्राचीन काल से था किंतु रोमन् सभ्यता की स्थापना उसके बहुत बाद में हुई तथा माना जाता है कि रोमन् सभ्यता की स्थापना भारत से गए आर्यों के किसी दल ने की जो संस्कृत बोलते थे तथा वैदिक देवी-देवताओं में विश्वास करते थे।

आठ से बारह फुट के कंकालों की कब्रें!

पश्चिमी इटली के सार्डीनिया प्रांत के उत्तरी भाग में अर्जाचेना नामक स्थान के पास कोड्डू विसियू नामक स्थल है जहाँ से ‘नूरागे-युग’ की लगभग 800 ‘दैत्याकार-कब्रें मिली हैं। इन्हें मेगालिथिक कब्रें कहा जाता है। स्थानीय लोग मानते हैं कि ये कब्रें ईसा से लगभग तीन हजार साल पहले इस क्षेत्र में रहने वाले विशाल दैत्यों की हैं। इन 800 कब्रों में से केवल 100 कब्रों में हड्डियाँ मिली हैं।

शेष कब्रों में या तो हड्डियाँ थी ही नहीं और यदि थीं तो उन्हें इटली की सरकार द्वारा हटा दिया गया है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि यहाँ के निवासी परग्रह से आए पुरुषों और धरती पर रहने वाली औरतों से उत्पन्न हुए थे। बाइबिल में ‘वाचसी’ नामक मनुष्यों का उल्लेख मिलता है। माना जाता है कि यहाँ के निवासी नेफेलिन तथा वाचसी नामक जातियों की हाइब्रिड संतानें हैं जो धरती पर तबाही लेकर आए थे।

स्थानीय लोगों की यह भी मान्यता है कि इटली के सादरा नामक शहर से एक चर्च के नीचे मिली कब्रों से 9 से 12 फुट के कुछ कंकाल मिले थे जिन्हें चर्च या सरकार द्वारा छिपा दिया गया है। ‘कोड्डू-विसियू’ की दैत्याकार संरचनाओं के नीचे परग्रही लोगों के अवशेष या हड्डियाँ मिल सकती हैं या परग्रहियों तथा मानवों की संकर नस्ल के लोगों की हड्डियाँ मिल सकती हैं।

इस सभ्यता के लोगों ने नक्षत्र सम्बन्धी खगोलीय घटनाओं के अध्ययन के लिए कुछ मेगालिथिक रचनाएं बनाई थी जिन्हें ‘नूरागे’ कहा जाता है। इस इलाके से कुछ पिरामिड और टॉवर भी मिले हैं। एन्शिएण्ट एलियनस पर खोज करने वाले कुछ अनुसंधानकर्त्ताओं का मानना है कि ये पिरामिड और टॉवर अंतरिक्ष से आए यानों के लिए प्लेटफॉर्म एवं संकेतकों की तरह प्रयुक्त हुए थे।

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इनकी संख्या 30 हजार के लगभग है। ऐसी रचनाएं पास के द्वीपों और ग्रीस में भी मिली हैं। कुछ नूरागे तारा-मण्डलों की आकृतियां पर बने हैं। रात के समय तारे आसमान में ऐसी आकृतियां बनाते हैं। एक प्रस्तर-स्तम्भ पर एक गोलाकार चित्र बना है जो किसी मनुष्य के धरती पर आने की घटना की ओर संकेत करता हुआ प्रतीत होता है। एक पत्थर पर किसी अंतरिक्ष यान का चित्र खोदा गया प्रतीत होता है। पुरातत्वविदों के अनुसार ये कब्रें कांस्य कालीन युग के मानवों की हैं। इस सभ्यता का प्रारम्भिक काल ई.पू.2800 था और इस सभ्यता के लोग ई.पू. 200 के आसपास समाप्त हुए। उन्होंने खगोल विज्ञान में चंद्रमा के उस चक्र को समझ लिया था जब चन्द्रमा आकाश में सबसे ऊँचाई पर होता है। इस स्थान से कुछ बर्तन, कटोरे तथा तश्तरियां मिली हैं जिन पर कंघे से पंक्तियां बनाई गई हैं। यहाँ से मिली सुराहियां मुड़ी हुई गर्दन वाली हैं। ये नूरागे युग के प्रारम्भिक काल की रचनाएँ हैं। इस सभ्यता को बोनानारो संस्कृति से सम्बन्धित माना जाता है। पुरातत्वविद् इस सभ्यता को ईसा से लगभग 1800 साल पहले की मानते हैं। इस स्थल से उठाई गई कुछ पुरातात्विक सामग्री इटली के विभिन्न संग्रहालयों में रखी गई है। इस प्रस्तर युगीन सभ्यता का रोमन सभ्यता से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है।

विश्व की महान् सभ्यताओं का सिलसिला

रोमन सभ्यता संसार की प्राचीन सभ्यताओं में से एक है किंतु रोम के बसने से भी कई हजार साल पहले से संसार में कई सभ्यताएं चल रही थीं। इन सभ्यताओं के अस्तित्व में आने का सिलसिला आज से लगभग 10 हजार साल पहले ‘होमो सेपियन सेपियन’ नामक मनुष्य प्रजाति के अस्तित्व में आने के बाद आरम्भ हुआ। संसार की प्राचीनतम सभ्यताओं में भारतीय आर्यों की ऋग्वैदिक सभ्यता सबसे महान् थी जिन्होंने ईसा से लगभग 6000 साल पहले पुरा-पाषाण बस्तियों के रूप में अपनी सभ्यता का विकास करना आरम्भ किया।

इन आर्यों ने न केवल परिवार एवं कुटुम्ब जैसी संस्थाओं को व्यवस्थित किया अपितु खेती और पशुपालन का सिलसिला भी आरम्भ किया। आवासीय भवन बनाने की शुरुआत उन्होंने ही की। इसी प्रकार मिट्टी के बर्तन एवं ईंटें बनाने तथा कपड़ा बुनने की कला का आविष्कार करते हुए वे ईसा से लगभग 4000 साल पहले ऋग्वेद जैसे उच्चतम दार्शनिक ग्रंथ की रचना तक पहुँच गए थे।

भारतीय आर्यों के समानांतर महान् सभ्यताओं में मिस्र की 5500 ई.पू. की नील सभ्यता, मेसोपोटामिया की 4500 ई.पू. की सुमेरियाई सभ्यता, भारत की 3500 ई.पू. की सिंधु सभ्यता, चीन की 2000 ई.पू. की यलो रीवर सभ्यता तथा मैक्सिको की 1500 ई.पू. की माया सभ्यता रोम की स्थापना से हजारों साल पहले अस्तित्व में आ चुकी थीं।

रोम की स्थापना एवं उसके संस्थापक

रोम नगर की नींव ईसा-पूर्व नौवीं सदी में पड़ी। इसके सम्बन्ध में कई अद्भुत एवं रोचक कहानियां प्रचलित हैं। रोमवासियों की प्राचीन काल से चली आ रही धारणा के अनुसार आर्यों के कुछ समूह रोम में आए तथा उन्होंने टाइबर नदी (टिब्रिस रीवर) के निकट स्थित सात पहाड़ियों पर छोटी-छोटी बस्तियां बसाईं।

ये बस्तियां ही सैंकड़ों साल की अवधि में फल-फूलकर पहले गांव, फिर कस्बा और बाद में शहर बन गईं। रोम के मुखिया ने अपने आस-पास के कबीलों को परास्त करके उन पर अधिकार करना आरम्भ किया। इस कारण यह शहर निरंतर बढ़ता हुआ सिसली के निकट मेसीना तक पहुँच गया। इस प्रकार रोम एक नगर न रहकर एक प्रदेश अथवा प्रांत बन गया।

रोम को बसाने वाले आर्य कौन थे! इस प्रश्न पर विचार किया जाना चाहिए। भारतीय प्राचीन संस्कृत साहित्य में रोम को ‘रोमक’ कहा गया है। इसका अर्थ है कि भारतीय आर्य अत्यंत प्राचीन काल से रोम के बारे में जानते हैं। इस सम्बन्ध में इस प्रश्न पर प्रमुखता से ध्यान दिया जाना चाहिए कि यूरोप के अन्य लोगों से बिल्कुल उलट, इटली-वासियों की त्वचा का रंग ठीक वैसा ही क्यों है जैसा गौर-वर्ण भारत-वासियों का?

इटली-वासियों की आँखें और बाल भी भारतीयों की ही तरह काले होते हैं। यहाँ तक कि इन दोनों समूहों की भाषा भी संस्कृत ही थी। तो क्या इटली और भारत के आर्य किसी एक ही प्राचीन आर्य जन-समूह से सम्बन्ध रखते हैं?

आर्यों के प्राचीन इतिहास के अनुसार ई.पू. 9वीं सदी में ‘एशिया कोचक (अब तुर्की)’ में स्थित ‘लीदिया’ के राजा अत्ती का बेटा तिरहेन लीदिया की आधी जनसंख्या के साथ जहाजों में बैठकर इटली के पश्चिमी किनारे पर उतरा। अपने मुखिया के नाम पर ये आगंतुक अपने को ‘तिरहेनी’ कहते थे। संभवतः एशिया कोचक के आर्य, भारतीय आर्यों से ही किसी काल में अलग होकर पश्चिम की ओर बढ़ने लगे होंगे।

इन लोगों ने इटली की धरती पर पहुँच कर समुद्र के किनारे अनेक बस्तियाँ बसाईं। तिरहेनियों की भाषा और ‘संस्कृत’ में काफी साम्य था। तिरहेनी धीरे-धीरे बढ़ते हुए ‘इटली’ के ‘लातियम’ प्रांत में समुद्र से 16-17 मील दूर, टाइबर नदी के किनारे तीन छोटी-छोटी पहाड़ियों पर बसे हुए एक छोटे से गाँव रोमा या रोम में पहुँचे। तिरहेनियों के अधीन धीरे-धीरे रोम इटली का एक बड़ा नगर बनने लगा। आगे चलकर इस शहर ने इतिहास में वह नाम पाया जो आज तक यूरोप के किसी अन्य देश को नहीं मिल सका। तिरहेनियों ने रोम में ‘जूपिटर’ (वैदिक शब्द- द्यौस्पितर) का विशाल मंदिर बनाया।

मादा भेड़िया का दूध पीकर बड़े हुए थे रोम के संस्थापक

रोम की स्थापना के सम्बन्ध में यह भी मान्यता है कि रेमस और रोमुलस नामक दो जुड़वा भाइयों को उनके नाना एम्यूनियस ने एक डोंगी में बिठाकर टाइबर नदी में बहा दिया। डोंगी एक दलदल में जाकर रुक गई, उसी स्थान पर बाद में रोम आबाद हुआ। एक मादा भेड़िया ने इन दोनों बच्चों को अपना दूध पिलाकर पाला। एक दिन ये बच्चे फोस्च्युलस नामक एक स्त्री को मिले जो किसी गड़रिये की स्त्री थी। उसने इन बच्चों का पालन-पोषण किया।

बड़े होकर ये बच्चे फिलीस्तीन के युद्ध-प्रिय गड़रियों के एक गिरोह के सरदार बन गए। कुछ समय बाद इन दोनों लड़कों की भेंट अपने बाबा से हुई जिसने इन्हें पहचान लिया। बाबा ने अन्यायी एम्यूलियस को मार डाला तथा इन लड़कों को अल्बस की राजगद्दी पर बिठाया।

बाद में इन लड़कों ने उसी स्थान पर एक नगर की नींव रखी जहाँ आकर उनकी डोंगी रुकी थी और जहाँ मादा भेड़िया ने उनका पालन-पोषण किया था। नगर की स्थापना से पहले दोनों भाइयों में इस बात को लेकर झगड़ा हुआ कि नगर की नींव कौन रखेगा। इस झगड़े में रेमस मारा गया और रोमुलस ने नगर की नींव रखी। वही रोम का पहला सम्राट भी बना। रोम के संस्थापकों को मादा भेड़िया ने पाला था, इस घटना की स्मृति में मादा भेड़िया प्राचीन रोम की प्रतीक मानी जाती थी।

भगवान राम के नाम पर हुआ रोम का नामकरण

संस्कृत भाषा के भारतीय विद्वान मानते हैं कि रोम नामक नगर की स्थापना भगवान ‘राम’ के नाम पर हुई थी। भगवान राम का समय ईसा से पाँच हजार साल पहले का है जबकि रोम की स्थापना ईसा से केवल 800-900 साल पहले हुई। अतः ‘रोम’ नामकरण की पृष्ठभूमि में ‘राम’ सम्बन्धी मान्यता में कोई अतिश्योक्ति या काल सम्बन्धी विसंगति दिखाई नहीं देती।

रोम नगर की स्थापना के काल में भारतीय आर्य ‘द्यौस’ तथा ‘द्यौस्पितर’ नामक देवताओं की पूजा करते थे। इनमें से ‘द्यौस’ यूनान में ‘ज्यू’ के नाम से तथा ‘द्यौस्पितर’ रोम में ‘ज्युपीटर’ के नाम से पूजा जाता था। अतः द्यौस एवं द्यौस्पितर की भांति ‘राम’ भी रोमन आर्यों द्वारा पूजे जाते रहे हों तो इसमें अतिश्याक्ति नहीं है!

यूनान से आए थे इटली के अधिकांश निवासी

आठवीं शताब्दी ईस्वी पूर्व में यूनान में मैग्ना ग्रेसिया नामक सभ्यता थी। माना जाता है कि उसी काल से यूनानी लोग इटली के दक्षिणी भागों में आकर बसने लगे थे।

तीन जनजातियों ने रोमन सभ्यता का निर्माण किया

इटली का इतिहास ईसा-पूर्व 9वीं शताब्दी से आरम्भ होता है। इस समय वर्तमान इटली के केन्द्रीय भाग में तीन इटालवी जनजातियों के अस्तित्व में होने के प्रमाण मिलते हैं। वे मुख्यतः तीन भाषाएँ बोलते थे- ओस्कान, अम्ब्रिआन तथा लैटिन। चौथी शताब्दी ईस्वी के मध्य में लैटिन भाषा अन्य भाषाओं पर हावी हो गई तथा पूरे इटली की भाषा बन गई।

जब लैटिन भाषा यूरोप के अन्य देशों में पहुँची तो इसने उन देशों की भाषाओं को जन्म दिया। आज भी इटली के लोगों को अपनी भाषा पर इतना अधिक गर्व है कि वे अंग्रेजी, फ्रैंच, जर्मन, रशियन जैसी भाषाओं को तुच्छ समझते हैं तथा ‘लैटिन’ से निकली हुई ‘इटालियन’ भाषा में ही लिखना-पढ़ना पसंद करते हैं। आम इटली-वासी अंग्रेजी भाषा का केवल वही शब्द समझ सकता है जो लैटिन भाषा से ज्यों का त्यों अंग्रेजी में लिया गया है।

जर्मन एवं फ्रैंच कबीलों का आगमन

ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियों में जर्मन एवं फ्रैंच कबीलों ने रोम में आकर निवास करना आरम्भ किया। बाद में ये इतने शक्तिशाली हो गए कि इन्होंने प्राचीन रोमन साम्राज्य को ध्वस्त करके एक नए रोमन साम्राज्य का निर्माण किया।

इटली देश का नामकरण

इटैलियन इतिहासकारों के अनुसार ई.पू. तीसरी सदी में पहली बार पूरे देश का नाम इटालिया पड़ा। इटालिया से ही इटली शब्द बना। यह नाम एक इटालियाई शब्द के यूनानी रूप ‘वाइटालिया’ से लिया गया है जिसका अर्थ है ‘चरागाह’। यूनानी लोग इटली को इटालियम अर्थात् ‘चरागाह’ कहते थे। भारतीय विद्वानों के अनुसार इटली शब्द का निर्माण संस्कृत के ‘स्थली’ शब्द से हुआ है। यह शब्द भी चारागाह की ओर संकेत करता हुआ प्रतीत होता है।

रोमन सभ्यता का यूरोप पर प्रभाव

रोमन सभ्यता का आशय रोम नगर के बसने एवं उसके शासकों द्वारा नगर का विस्तार करने मात्र से नहीं है। रोमन सभ्यता का वास्तविक और व्यापक अर्थ रोमन संस्कृति के विकसित होने तथा सम्पूर्ण यूरोप को प्रभावित करने की शक्ति में निहित है। भौगोलिक रूप से रोम यूरोप के भीतर स्थित है किंतु सांस्कृतिक रूप से रोम पूरे यूरोप पर छाया हुआ है। निःसंदेह इस कार्य में यूनान उसके साथ रहा है।

रोम और यूनान ने समूचे यूरोप की संस्कृति, भाव-भूमि एवं चिंतन-दर्शन का निर्माण किया है। प्राचीन काल की सदियों में रोम एवं ग्रीस (यूनान) के दार्शनिकों ने यूरोपीय देशों में निवास करने वाले मानव समाज के चिंतन को गढ़ा। यूरोप में यह कहावत है कि ‘आज के यूरोपीय देश यूनान और रोम के बच्चे हैं।’

समूचा यूरोप एक देश है

इसलिए इटली अथवा किसी भी यूरोपीय देश के धर्म, समाज एवं संस्कृति को समझने के लिए रोम एवं ग्रीस के दार्शनिक-चिंतन को समझना आवश्यक है। इन दोनों देशों का समूचे यूरोप पर इतना व्यापक प्रभाव है कि भौगोलिक रूप से यूरोप भले ही एक विशाल महाद्वीप दिखाई देता हो तथा विगत लगभग तीन हजार साल में यूरोप महाद्वीप में सैंकड़ों राज्य एवं देश बने-बिगड़े हों किंतु सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक दृष्टियों से समूचा यूरोप एक देश ही प्रतीत होता है। आज भी यूरोप के किसी एक भू-भाग में उत्पन्न विचारों एवं व्यवस्थाओं को यूरोप के अन्य देशों में बिना किसी कठिनाई के अपना लिया जाता है।

दुनिया की स्वामिनी रोम

प्राचीनकाल में रोम का प्रभाव यूरोपीय देशों पर इतना अधिक था कि यूरोप के देशों में सैंकड़ों साल तक रोम को दुनिया की स्वामिनी समझा जाता रहा। रोम की लैटिन भाषा ने यूरोप के विभिन्न देशों की भाषाओं को जन्म दिया, केवल अंग्रेजी इससे अलग एवं असम्बद्ध रहकर विकसित हुई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रोम का प्राचीन धर्म (4)

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रोम का प्राचीन धर्म

रोम का प्राचीन धर्म भारत के वैदिक धर्म पर ही आधारित है। इस कारण रोमन देवी-देवताओं के नाम वैदिक देवी-देवताओं से समानता रखते हैं।

भारोपीय (हिन्द-यूरोपीय) धर्म

भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में यूरोप की सभ्यता एवं संस्कृति हजारों साल बाद की है। भारत में ऋग्वेद की रचना का काल यद्यपि पश्चिमी इतिहासकारों ने विवादास्पद बना दिया है तथापि आधुनिक भारतीय विद्वानों द्वारा खोजे गए साक्ष्यों के आधार पर यह माना जाता है कि ऋग्वेद की रचना ईसा से लगभग 4000 से 3000 साल पहले हुई। जबकि यूरोप में धर्म एवं दर्शन की चिंतन परम्परा ईसा से लगभग छः शताब्दियों पहले या उससे कुछ पहले आरम्भ होने के संकेत मिलते हैं।

हालांकि प्राचीन यूनानी एवं रोमन धर्म उत्तर-वैदिक ऋषियों के काल में अस्तित्व में आने लगे थे। इस काल में रोम एवं यूनान सहित लगभग सम्पूर्ण यूरोप का धर्म भारोपीय (हिन्द-यूरोपीय) धर्म था। यह मूर्तिपूजक और बहुदेववादी धर्म था। भारतीयों के धर्म में ‘एक अदृश्य ईश्वर’ की अवधारणा आरम्भ से ही मौजूद थी किंतु यूनानी एवं रोमन भारोपीय धर्म में ‘एक अदृश्य ईश्वर’ की अवधारणा नहीं थी। वे विभिन्न देवी-देवताओं को ही प्रकृति की विभिन्न शक्तियों का स्वामी मानते थे।

यूनानी देवताओं का उद्भव

रोमवासी अत्यंत प्राचीन काल से बहुदेववादी थे। वे मुख्यतः यूनानी देवताओं की पूजा करते थे। यूनानी देवताओं में ‘ज्यूस’ सर्वप्रमुख था। वस्तुतः यह प्राचीन भारतीय आर्यों द्वारा पूजित एवं ऋग्वेद में वर्णित ‘द्यौस’ नामक देवता ही था जिसे सभी देवताओं का राजा माना जाता था। देवराज ज़्यूस की पत्नी हीरा थी। ‘ज्यूस’ बादल, कड़कती बिजली और वज्र के देवता थे। वे इन्द्र की तरह वज्र लिए रहते थे।

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उनके लिए प्राचीन यूनान (ग्रीस) में कई सुंदर मंदिर बनाए गए थे। प्राचीन रोमन धर्म में पहले ज्यूस को ही पूजा जाता था किंतु बाद में ज्यूस के स्थान पर जुपीटर को प्रमुख देवता माना गया। जुपीटर को भारतीय ग्रंथों में ‘द्यौस्पितर’ तथा ‘वृहस्पति’ कहा गया है तथा उन्हें देवताओं का गुरु माना गया है। इस प्रकार प्राचीन रोम वासियों का धर्म भारतीय आर्य-धर्म पर आधारित था। इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि रोम नगर की स्थापना, पूर्व दिशा से आए आर्यों के समूहों ने की थी। आरम्भ में रोम-वासियों में कुछ निश्चित देवी-देवताओं के प्रति आदर-भाव था। वे मुख्यतः यूनानी देवी-देवताओं की पूजा करते थे तथा उन्हें बलि भी देते थे किंतु जैसे-जैसे समय बदलता गया रोम-वासियों ने नए देवी-देवताओं को इस सूचि में जोड़ना आरम्भ कर दिया। उन्होंने युद्ध के देवता मार्स (मंगल) को भी देवताओं की सूचि में सम्मिलित कर लिया था जिसे वे रोम को बसाने वाले रेमस एवं रोमुलस का पिता मानते थे। वे जुपीटर (वृहस्पति) को सबसे बड़ा देवता मानते थे जो आकाश से रोम वासियों को देखता था और उनकी रक्षा करता था। रोम नगर में कैपिटोलाइन  नामक पहाड़ी पर उन्होंने जुपीटर का मंदिर बना रखा था। इस मंदिर में वे जुपीटर की पत्नी जूनो (जो कि जुपीटर की बहिन भी थी) और जुपीटर की पुत्री मिनर्वा की पूजा करते थे।

नेप्च्यून को वे समुद्र के देवता के रूप में तथा प्लूटो को पाताल लोक के देवता के रूप में पूजते थे। बैक्कस, अपोलो, मरकरी, प्लूटो, सैटर्न, वुल्कन, मिथ्रास भी रोमन देवताओं में सम्मिलित थे। इनमें से अपेालो (सूर्य), सैटर्न (शनि) एवं मिथ्रास (मित्रादि) देवताओं के रूप में प्राचीन भारतीय आर्यों द्वारा भी पूजे जाते थे। सिरीस, फ़्लोरा, फ़ोर्तूना, डायना एवं वीनस भी रोमन देवियों में सम्मिलित थीं।

ये देवियां यूनानी एवं जर्मन धर्म में भी पूजी जाती थीं। कुछ कम महत्त्वपूर्ण एवं छोटे देवता भी थे जिनमें निमेसिस को प्रतिकार के देवता के रूप में, क्यूपिड को प्रेम की देवी के रूप में, पैक्स को शांति के देवता के रूप में तथा फूरीज को प्रतिशोध की देवी के रूप में पूजा जाता था।

धीरे-धीरे उन्होंने यूनानी देवी-देवताओं तथा अन्य देशों के देवी-देवताओं की पूजा करना बंद कर दी और केवल रोमन देवी-देवताओं अर्थात् मार्स, जुपीटर, जूनो, मिनर्वा, क्यूपिड एवं फूरीज आदि की ही पूजा करने लगे। ईसा के जन्म से पहले वाली शताब्दी में जूलियस सीजर के काल में रोमवासियों ने रोमन-सम्राटों को भी रोमन देवताओं की सूचि में सम्मिलित कर लिया।

रोमन देवी-देवताओं की प्रतिमाएं तथा मंदिर बनाए जाते थे तथा उन्हें पालतू पशुओं की बलि दी जाती थी। इस धर्म के आध्यात्मिक पक्ष के बारे में अब कोई जानकारी नहीं मिलती है किंतु भारतीय एवं यूनानी लोगों की तरह वे भी व्रत एवं उपवास करते थे। वे देवी-देवताओं के चमत्कारों, उनकी कृपाओं एवं उनके द्वारा कुपित होकर दिए जाने वाले कष्टों में भी विश्वास करते थे तथा देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए नरबलि भी देते थे। रोमन सम्राट भी इसी धर्म का पालन करते थे।

यहूदी धर्म से दूरी

ईसा से लगभग 2000 साल पहले बेबीलोन में यहूदी धर्म प्रकट हुआ। बहुदेववादी यूनानी धर्म की मान्यताओं से ठीक उलट, यह एकेश्वरवादी धर्म था जिसमें अवतारों तथा देवी-देवताओं को कोई मान्यता नहीं थी किंतु वे ईश्वर द्वारा भेजे जाने वाले दूतों एवं फरिश्तों में विश्वास करते थे। रोम तथा यूनान ने स्वयं को यहूदी धर्म से पूरी तरह अलग रखा किंतु विशाल रोमन साम्राज्य में समय के साथ लाखों यहूदी दूर-दूर तक फैल गए थे।

उनका मुख्य केन्द्र ‘फिलीस्तीन’ था जिसकी प्रांतीय राजधानी ‘जेरूसलम’ थी। यहूदी धर्मग्रंथ ‘इब्रानी भाषा’ में लिखा गया ‘तनख़’ है, जो वास्तव में ईसाइयों की बाइबिल का पूर्वार्द्ध है। इसे ‘ओल्ड टेस्टामेण्ट’ भी कहते हैं। इसी टेस्टामेंट में लिखा है कि एक दिन धरती पर मसीहा आएगा और यहूदियों का उद्धार करेगा।

हालांकि विशाल रोमन साम्राज्य में लाखों यहूदी रहते थे और यहूदियों की मुख्य भूमि जेरूसलम एवं फिलीस्तीन भी रोमन साम्राज्य के अधीन थे तथापि रोम के लोगों ने यहूदी धर्म को कभी नहीं अपनाया और इस धर्म से अंत तक दूरी बनाए रखी। वे इस धर्म से घृणा करते थे तथा अवसर मिलने पर यहूदियों की हत्या करने से नहीं चूकते थे।

रोम के प्राचीन धर्म के प्रति असंतोष

जिस समय ईसा का जन्म भी नहीं हुआ था, रोम में प्राचीन धर्म के प्रति असंतोष के स्वर उठने लगे थे। इटली के प्रसिद्ध कवि लूक्रेती ने अपनी कविताओं में, मृत्यु के बाद के जीवन को धोखा बताया और धार्मिक रूढ़ियों का उपहास उड़ाया। लूक्रेती रोमन सम्राट ऑक्टेवियन के काल में हुआ था तथा वर्जिल, होरेस और ओविद नामक कवि उसके समकालीन थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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