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पाइथोगोरियन ब्रदरहुड

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पाइथोगोरियन ब्रदरहुड- bharatkaitihas.com
पाइथोगोरियन ब्रदरहुड

इटली में पाइथोगोरियन ब्रदरहुड की स्थापना

ईसा के जन्म से लगभग साढ़े पांच सौ साल पहले इटली में पाइथोगोरियन ब्रदरहुड की स्थापना हुई। यह एक दार्शनिक संस्था थी जो यूरोप के लोगों में शाकाहार का प्रचार करती थी तथा लोगों को धर्म एवं दर्शन के सिद्धांतों की जानकारी देती थी। इस संस्था के अनुसार इस संसार की रचना गणित के निश्चित सिद्धांतों के आधार पर हुई है।

अहिंसक एवं शाकाहारी दार्शनिक-चिंतन का उदय

यूरोप में ग्रीस नामक एक पुराना देश है जिसे हम यूनान के नाम से भी जानते हैं। इसी ग्रीस में ईसा से लगभग 580 साल पहले पाइथोगोरस नामक एक दार्शनिक का जन्म हुआ जिसे आज का संसार गणितज्ञ के रूप में जानता है। पाइथोगोरस की मृत्यु ईसा से लगभग 500 साल पहले हुई। इस काल में चीन, भारत एवं ईरान में नवीन दार्शनिक विचारों का उदय हो रहा था।

यूनान में इस कार्य का अग्रदूत पाइथोगोरस था। भारतीय दार्शनिक भगवान बुद्ध एवं महावीर स्वामी, चीन के दार्शनिक महात्मा कन्फ्यूशियस और लाओत्से तथा ईरानी दार्शनिक जरथ्रुस्ट पाइथोगोरस के ही काल में हुए । यह नवीन विचारों के विस्फोट का युग था। लगभग पूरा संसार इन नवीन विचारों से प्रभावित हो रहा था।

यह एक आश्चर्य की बात थी कि ये सभी दार्शनिक एक ही समय में एक दूसरे से हजारों किलोमीटर दूर बैठकर जो विचार प्रतिपादित कर रहे थे, उनमें अद्भुत समानता थी। ये सभी दार्शनिक अहिंसा और शाकाहार पर विशेष जोर दे रहे थे। पाइथोगोरस भी नितांत शाकाहारी था और उसके शिष्य भी केवल शाकाहारी मनुष्य ही हो सकते थे।

पाइथोगोरस यूरोपीय इतिहास का प्रथम ऋषि है जिसके बारे में लिखित प्रमाण मिलते हैं। पाइथोगोरस ने पाईथोगोरियनवाद नामक वैचारिक आन्दोलन की स्थापना की जिसे उस काल का धार्मिक मत भी कहा जा सकता है। उसके जीवन काल में उसे रहस्यवादी दार्शनिक माना जाता था।

हीरोडोट्स ने उसे यूनानियों में सबसे अधिक सक्षम दार्शनिक कहा है। पाइथोगोरस का नाम उसे पाइथिआ और अपोलो नामक यूनानी देवताओं से जोड़ता है। एरिस्टिपस ने उसके नाम का अर्थ बताते हुए कहा है कि वह यूनानी देवता पाइथियन (पाइथ) से कम सच (एगोर) नहीं बोलता था।

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लम्ब्लिकास ने लिखा है कि पाइथिआ (यूनानी देवता) ने पाइथोगोरस की गर्भवती माँ ‘पायथायस’ के सम्बन्ध में भविष्यवाणी की थी कि वह एक बहुत ही सुन्दर एवं बुद्धिमान बच्चे को जन्म देगी जो मानव जाति के लिए कल्याणकारी सिद्ध होगा।

पाइथोगोरस को मुख्यतः ‘पाइथागोरस प्रमेय’ के लिए जाना जाता है, जिसका नामकरण उसके नाम पर किया गया है। पाइथोगोरस को ‘संख्या के जनक’ के रूप में भी जाना जाता है। छठी शताब्दी ईसा-पूर्व में धार्मिक शिक्षण और दर्शन में पाइथोगोरस का महत्त्वपूर्ण योगदान था। वह सुकरात-पूर्व युग का प्रमुख दार्शनिक है।

पाइथोगोरस और उसके शिष्य मानते थे कि- ‘इस संसार में सब-कुछ गणित से सम्बन्धित है और संख्याओं में ही अंतिम सत्य छिपा है। इस कारण गणित के माध्यम से हर चीज के बारे में भविष्यवाणी की जा सकती है तथा हर चीज को एक ताल-बद्ध प्रतिरूप या चक्र के रूप में मापा जा सकता है।’

यूनानी दार्शनिक चिंतक लम्ब्लिकास के अनुसार, पाइथोगोरस ने कहा कि- ‘संख्या ही विचारों और रूपों की शासक है और देवताओं और राक्षसों की कारण है।’ पाइथोगोरस यूरोप का प्रथम चिंतक था जो स्वयं को एक दार्शनिक या बुद्धि का प्रेमी कहता था। पाइथोगोरस के विचारों ने आगे चलकर ‘प्लेटो’ पर गहरा प्रभाव डाला।

दुर्भाग्य से, पाइथोगोरस के बारे में बहुत कम तथ्य ज्ञात हैं, क्योंकि उसके मूल लेखन में से बहुत कम अंश ही शेष बचा है। पाइथोगोरस के नाम से जो उपलब्धियां गिनाई जाती हैं, उनमें से बहुत सी उपलब्धियां वास्तव में उसके सहयोगियों और उत्तराधिकारियों की हैं।

पाईथोगोरस का जन्म ‘सामोस’ नामक नगर में हुआ, जो एशिया माइनर के किनारे पर, पूर्वी ईजियन में एक यूनानी द्वीप है। उसकी माँ पायथायस ‘सामोस’ की निवासी थी और पिता मनेसार्चस एक ‘फोनिसियन व्यापारी’ था। पाईथोगोरस ने युवावस्था में ही अपने जन्म स्थान ‘सामोस’ को छोड़ दिया और वह पोलिक्रेट्स की अत्याचारी सरकार से बच कर इटली के दक्षिण में स्थित ‘क्रोटोन’ (क्रोतों) नामक द्वीप पर चला गया।

वहाँ से कुछ दिन बाद वह ‘केलेब्रिया’ नामक द्वीप पर गया तथा कुछ समय बाद वह इटली चला आया। इटली में उसने एक गुप्त धार्मिक समाज की स्थापना की जो प्रारंभिक ‘ओर्फिक कल्ट’ से साम्य रखती थी और संभवतः उसी से प्रभावित भी थी।

लम्ब्लिकास के अनुसार ‘थेल्स’ पाइथोगोरस की क्षमताओं से बहुत अधिक प्रभावित था, उसने पाइथोगोरस को इजिप्ट में स्थित ‘मेम्फिस’ नामक नगर में जाकर वहाँ के पुजारियों के साथ रहकर अध्ययन करने की सलाह दी जो अपनी बुद्धि के लिए जाने जाते थे। पाईथोगोरस ने इजिप्ट में कुछ ज्यामितीय सिद्धांतों को सीखा जिनसे प्रेरित होकर उसने ‘पाइथोगोरस प्रमेय’ प्रतिपादित की।

पाइथोगोरस ने लोगों के सांस्कृतिक जीवन में सुधार लाने का प्रयास किया तथा उन्हें सदाचार का पालन करने के लिए प्रेरित किया। बहुत से लोग उसके अनुयाई बन गए जिन्हें पाइथोइगोरियन कहा जाता था। पाइथोगोरस ने अपने शिष्यों के लिए एक सांस्कृतिक केन्द्र अथवा आश्रम स्थापित किया जिसके नियम बहुत कठोर थे।

इस आश्रम में लड़के और लड़कियां समान रूप से पढ़ते थे। उनके शिष्य स्वयं को ‘मेथमेटकोई’ कहते थे। वे आश्रम में ही रहते थे, उनकी अपनी कोई निजी संपत्ति नहीं होती थी तथा उन्हें आश्रम की ओर से शाकाहारी भोजन दिया जाता था। ई.1714 में रिचर्ड ब्लेक्मोर ने ‘दी ले मोनेस्ट्री’ नामक पुस्तक लिखी जिसमें उसने पाइथोगोरियनों के धार्मिक विश्वासों के बारे में लिखा है। यह यूरोपीय इतिहास में अंकित संन्यासी जीवन का पहला उदाहरण था।

लम्ब्लिकास के अनुसार पाइथोगोरस ने धार्मिक शिक्षण, सामान्य भोजन, व्यायाम, पठन और दार्शनिक अध्ययन से युक्त जीवन का अनुसरण किया। संगीत इस जीवन का एक आवश्यक अंग था। पाइथोगोरस के शिष्य ‘अपोलो’ देवता को प्रसन्न करने के लिए नियमित रूप से सामूहिक भजन गाते थे। वे आत्मा तथा शरीर की बीमारियों का उपचार करने के लिए वीणा का उपयोग करते थे। स्मरण-शक्ति को बढ़ाने के लिए सोने से पहले, आश्रम में कविता-पाठ किया जाता था।

लेवियस जोजेफस ने लिखा है कि समयरना के हर्मिपस के अनुसार पाइथोगोरस यहूदी विश्वासों से परिचित था तथा उसने उनमें से कुछ को अपने दर्शन में शामिल किया था। पाइथोगोरस के जीवन के अंतिम चरण में क्रोटोन (क्रोतों) के एक कुलीन सैलों (सामन्त) द्वारा पाइथोगोरस और उसके अनुयायियों के विरुद्ध एक षड़यंत्र रचा गया जिसके कारण पाइथोगोरस इटली के मेटापोंटम नामक स्थान पर चला गया। माना जाता है कि वहीं पर 90 वर्ष की आयु में पाइथोगोरस की मृत्यु हुई। बर्टेंड रसेल ने पश्चिमी दर्शन के इतिहास में लिखा है- ‘पाइथोगोरस का प्लेटो और अन्य दार्शनिकों पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा।’

पाइथोगोरस के अनुयायी पाइथोगोरियन कहलाते थे तथा उन्हें  ‘दार्शनिक-गणितज्ञ’ माना जाता था। इन्हीं अनुयाइयों ने अक्षीय ज्यामिति की शुरुआत की जिसके बारे में दो शताब्दी बाद ‘यूक्लिड’ ने अपनी पुस्तक ‘दी एलिमेंट्स’ में लिखा। पाइथोगोरस ने शांति के एक नियम का प्रतिपादन किया जो एकेमाइथिया कहलाता था। इस नियम को तोड़ने पर मृत्युदण्ड दिया जाता था।

पाइथोगोरस का मानना था कि एक व्यक्ति के शब्द सामान्यतः लापरवाही से युक्त होते हैं, जिससे उसकी गलत अभिव्यक्ति होती है। यदि किसी व्यक्ति को किसी बात पर संदेह हो तो उसे चुप रहना चाहिए। उसका एक और नियम था कि संकट में पड़े हुए किसी भी व्यक्ति की सहायता करनी चाहिए, उसे नीचे नहीं गिरने देना चाहिए, क्योंकि निष्क्रियता को प्रोत्साहित करना एक बहुत बड़ा पाप है। उसका कहना था कि किसी उद्देश्य या संकल्प की पूर्ति के लिए घर से निकल जाने के बाद वापिस मत जाओ, क्योंकि फुरीस (यूनानी देवता) आपके साथ होंगे। पाईथोगोरस का कहना था कि मनुष्य को सृष्टि, ईश्वर एवं गणित के सम्बन्ध में, सच्चाई को सीखना चाहिए।

पाइथोगोरस की मृत्यु के लगभग 700 साल बाद लिखी गयी पाइथोगोरस की जीवनी ‘पोरफायरी’ में कहा गया है कि पाइथोगोरस के उपदेशों से मानव को शांति मिली। यह शांति कोई साधारण किस्म की नहीं थी, बल्कि अद्भुत थी। पाइथोगोरियन्स अर्थात् ‘पाइथोगोरस के शिष्य’ दो प्रकार के थे।

शिष्यों के आंतरिक समूह को मेथमेटीकोई (गणितज्ञ) और बाहरी समूह को अकउसमेटीकोई कहा जाता था। पोरफायरी में लिखा है कि मेथमेटीकोई ज्ञान को अधिक विस्तार पूर्वक सीखते थे और अकउसमेटीकोई पाइथोगोरस की लेखनी के केवल सारांश एवं शीर्षकों को सुनते थे। लम्ब्लिकास के अनुसार अकउसमेटीकोई साधारण शिष्य थे जो पाइथोगोरस के व्याख्यानों को एक पर्दे के बाहर से सुनते थे।

अकउसमेटीकोईयों को अपने गुरु पाइथोगोरस को देखने की अनुमति नहीं थी और उन्हें पाइथोगोरस मत के भीतरी रहस्य नहीं सिखाये जाते थे। इसके बजाय उन्हें गुप्त तरीके से व्यवहार और नैतिकता सिखाई जाती थी एवं गुप्त अर्थों से युक्त संक्षिप्त बातें बताई जाती थी। अकउसमेटीकोई ने मेथमेटीकोई को असली पाइथोगोरियन्स माना। कुछ समय बाद इन दोनों प्रकार के शिष्यों में विवाद उत्पन्न हो गया।

साइक्लोन के ‘कोहोर्ट’ नामक एक क्रोधी अकउसमेटीकोई शिष्य ने कुछ मेथमेटीकोई शिष्यों की हत्या कर दी। इसके बाद, दोनों समूह एक दूसरे से पूरी तरह से अलग हो गए, पाइथोगोरस की पत्नी थेनो और उनकी दो बेटियों ने मेथमेटीकोई का नेतृत्व किया। थेनो एक ओर्फिक अनुयायी की बेटी थी और स्वयं भी गणितज्ञ थी।

उसने भी गणित, भौतिक विज्ञान, चिकित्सा और बाल मनोविज्ञान पर कई पुस्तकें लिखीं, उनमें से अब कुछ भी शेष नहीं बचा है। उसका सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है ‘गोल्डन मीन’ के दार्शनिक सिद्धांत पर एक पुस्तक का लेखन। उस काल में स्त्री को उसके पति की संपत्ति माना जाता था और उसे केवल अपने पति का घर संभालना होता था, पाइथोगोरस ने महिलाओं को काम करने के लिए बराबर का स्तर स्वीकृत किया।

पाइथोगोरस कालीन यूरोपीय समाज में कई प्रकार के अंधविश्वास एवं वर्जनाएं थीं। किसी व्यक्ति के लिए एक क्रॉस-बार पर पैर रखना तथा फलियाँ खाना वर्जित था। किसी सीढ़ी के नीचे से होकर निकलना दुर्भाग्य-पूर्ण माना जाता था। पाइथोगोरस ने इन बातों का विरोध किया। इसलिए पाइथोगोरस को बदनाम करने के लिए लोगों ने उन्हें ‘मिस्टिकोस लोगोस’ (रहस्यमय व्यक्ति) नामक अपमानजनक उपाधि दी।

ऐसे लोगों के उपहास से बचने के लिए पाइथोगोरस के शिष्यों ने पाइथोगोरस की शिक्षाओं को रहस्यमय शब्दावली में ढाल दिया। बाद में यूनानी दार्शनिक अरस्तू (ई.पू.384-ई.पू.322) ने उस शब्दावली की व्याख्या की। उदाहरण के लिए पाइथोगोरस की शिक्षा- ‘संतुलन पर कदम मत रखो’ का अर्थ किया गया- लालची मत बनो। ‘आग पर तलवार से प्रहार मत करो’ का अर्थ था- एक क्रोधित व्यक्ति से तीखे शब्दों में बात मत करो। ‘दिल को मत खाओ’ का अर्थ था- स्वयं को दुःख में मत जकड़ लो।

पाइथोगोरियन को ‘आत्माओं के स्थानांतर गमन’ के सिद्धांत के लिए भी जाना जाता है। उसने यह सिद्धांत भी प्रतिपादित किया कि ‘संख्या में चीजों की वास्तविक प्रकृति निवास करती है।’

पाईथोगोरस ने ‘शुद्धिकरण संस्कारों’ को अपनाया और जीवन जीने के भिन्न नियमों को विकसित किया। उसका मानना था कि ये नियम मनुष्य को देवताओं के बीच उच्च पद प्राप्त करने में सक्षम बनायेंगे। पाइथोगोरस के अधिकतर रहस्यवादी सिद्धांत ‘ओर्फिक परम्परा’ से लिए गए हैं।

आत्मा के सम्बन्ध में पाइथोगोरस के विचार सिरोस के ‘फेरेसीडस’ के विचारों से साम्य रखते हैं। फेरेसीडस को आत्माओं के स्थानांतर-गमन की शिक्षा देने वाला सबसे पहला यूनानी माना जाता है। वह पाइथोगोरस का शिक्षक था। फेरेसीडस ने ‘पेंटा मईकोस’ (पाँच गुप्त गुहाएं) के शब्दों में आत्मा के बारे में शिक्षा दी। उसके द्वारा पेंटाग्राम के पाइथोगोरियन उपयोग की सबसे संभावित उत्पत्ति, आंतरिक स्वास्थ्य के एक प्रतीक के रूप में प्रयुक्त की जाती थी।

पाइथोगोरस अपने समय का बहुत बड़ा संगीतज्ञ भी था। वह उस काल में प्रचलित संगीत में सुधार लाना चाहता था। उसका मानना था कि इस संगीत में पर्याप्त सामंजस्य नहीं है तथा यह बहुत ही व्यस्त रखने वाला है। एक प्राचीन कथा के अनुसार एक दिन पाइथोगोरस एक लोहार के पास से होकर निकला।

उसने लोहार की निहाइयों में से आ रही सुंदर और सामंजस्य-पूर्ण आवाज को सुनकर अनुभव किया कि संगीत के नोट को गणितीय समीकरणों में अनुवाद किया जा सकता है। क्योंकि आवाज से उत्पन्न होने वाली लय का जो भी वैज्ञानिक नियम अथवा कारण है वह अवश्य ही गणितीय है और इसे संगीत पर लागू किया जा सकता है।

वह लोहार के पास गया और उसके औजारों को देख कर पता लगाने की प्रयास किया कि यह कैसे हुआ! उसने पाया कि निहाईयां एक दूसरे के साधारण अनुपात में थीं। एक पहली के आधे आकार की थी, दूसरी दो-तिहाई आकार की थी और सारा क्रम इसी प्रकार से था।

पाइथोगोरस ने संख्या के सिद्धांत को विस्तार-पूर्वक स्पष्ट किया, जिसका सही अर्थ आज भी विद्वानों के बीच बहस का विषय बना हुआ है। पाइथोगोरस का नक्षत्रीय पिण्डों की ‘सततता’ (Regularity) पर विश्वास था। उसका मानना था कि ग्रह और तारे गणितीय समीकरणों के अनुसार गति करते हैं, इसी प्रकार की कुछ समानता संगीत के स्वरों में पाई जाती है और इससे एक मधुर संगीत उत्पन्न होता है।

पाइथोगोरस का एक विश्वास यह था कि जीवन का सार संख्या है। इस प्रकार से, सभी चीजों की स्थिरता ब्रह्माण्ड को बनाती है। स्वास्थ्य जैसी चीजें तत्वों के एक स्थिर अनुपात पर निर्भर करती हैं। किसी भी चीज का बहुत कम या बहुत ज्यादा होना असंतुलन का कारण होता है जो किसी भी जीव को रोगी बना सकता है। वह विचारों की तुलना संख्या की गणनाओं से करता था।

पाइथोगोरस की प्रमेय उस काल की एक चमत्कारिक गणितीय उपलब्धि मानी जाती है। इस प्रमेय के अनुसार समकोण त्रिभुज की दो भुजाओं के वर्ग का योग विकर्ण के वर्ग के बराबर होता है। मान्यता है कि इस प्रमेय को पाइथोगोरस से पहले भी बेबिलोनियाई लोगों और उनसे भी पहले भारतीयों के द्वारा काम में लिया जाता था। पाइथोगोरस ने इस प्रमेय को मिस्रवासियों से सीखा था।

पाइथोगोरस का दृष्टिकोण धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों था। उसके अनुसार विज्ञान एवं धर्म परस्पर सम्बद्ध हैं। धार्मिक रूप से पाइथोगोरस  मेटेम्पसाइकोसिस का अनुयायी था। वह आत्मा के स्थानांतर-आगमन अर्थात् पुनर्जन्म में विश्वास करता था। उसका मानना था कि आत्मा जब तक सदाचारी नहीं हो जाती तब तक वह मानव, पशु, या सब्जियों में बार-बार अवतार लेती रहती है।

पुनर्जन्म के सम्बन्ध में पाइथोगोरस का यह विचार प्राचीन यूनानी धर्म से प्रभावित था। वह पहला दार्शनिक था जिसने यह प्रस्तावित किया कि विचार-प्रक्रिया आत्मा एवं मस्तिष्क में स्थित है न कि हृदय में। पाईथोगोरस का कहना था कि उसे अपने पिछले चार जीवन विस्तार से याद हैं। उसे अपने एक मृत मित्र के रोने की आवाज एक कुत्ते के भौंकने में सुनाई देती थी।

अरस्तू ने पाइथोगोरस को एक अलौकिक व्यक्ति के रूप में वर्णित किया है जो आश्चर्यजनक कार्य करता था। पाइथोगोरस की एक जांघ सोने की थी जिससे वह स्वयं को अपोलो का पुत्र कहता था। उसने इस जांघ का प्रदर्शन एक बार ओलम्पिक खेलों के दौरान किया था। उसके पास सूर्यदेव का दिया हुआ ऐसा तीर था जिसकी सहायता से वह उड़कर दूरस्थ स्थानों पर भी पहुँच जाता था।

एक बार उसे क्रोतों तथा मेटापोंटम नामक दो अलग-अलग स्थानों पर एक ही समय में देखा गया था। अरस्तू ने पाइथोगोरस को गोल्डन थाई के साथ ऐसे स्वरूप में वर्णित किया जो देवत्व की पहचान है। अरस्तू और अन्य लोगों के अनुसार, कुछ प्राचीन लोग मानते थे कि पाईथोगोरस में न केवल अन्तरिक्ष और समय से होकर यात्रा करने की क्षमता है अपितु जानवरों और पौधों के साथ बात करने की भी क्षमता है।

र्ब्युअर्स डिक्शनरी ऑफ फ्रेस एंड फेबल के अनुसार पाइथोगोरस के पास एक गोल्डन थाई था जिसे उसने उत्तर देश के पुजारी एबेरिस को दिखाया था और उसका प्रदर्शन ओलिंपिक खेलों में भी किया था। र्ब्युअर के शब्दकोश में पाइथोगोरस द्वारा चन्द्रमा के सम्बन्ध में किए गए वर्णन का उल्लेख है। पाइथोगोरस का दावा था कि वह चन्द्रमा पर लिख सकता है। उसके अनुसार एक दर्पण पर रक्त से लिखा जाये और उसे चाँद के सामने रख दिया जाये तो चाँद की डिस्क पर लेख प्रतिबिंबित होगा।

पाईथोगोरस यह सोचने वाले पहले व्यक्तियों में से था कि पृथ्वी गोल है और समस्त ग्रहों का एक अक्ष है। समस्त ग्रह एक केन्द्रीय बिंदु के चारों और घूमते हैं। उसने कहा कि यह केन्द्रीय बिंदु पृथ्वी है, किन्तु बाद में कहा कि यह केन्द्रीय बिंदु ‘अग्नि’ है जिसे उसने कभी भी सूर्य के रूप में नहीं पहचाना। चाँद एक अन्य ग्रह है जिसे उसने ‘काउंटर अर्थ’ कहा, बाद में उसने सीमित-असीमित में विश्वास जताया।

प्राचीन रोम और नूमा पोम्पिलिअस की किवदंतियों के अनुसार रोम का दूसरा राजा, पाइथोगोरस के अधीन अध्ययन करता था। पाइथोगोरस ने एक गुप्त समाज की स्थापना की जो ‘पाइथोगोरियन ब्रदरहुड’ कहलाती थी, यह गणित के अध्ययन को समर्पित थी।  इसका भावी ज्ञान की गुप्त परम्पराओं पर गहरा प्रभाव पड़ा, जैसे रोसीक्रुसीएनिज्म और फ्रीमेसनरी। ये दोनों समूह गणित के अध्ययन को समर्पित थे।

दोनों का दावा था कि वे पाइथोगोरियन ब्रदरहुड से विकसित हुए हैं। पाइथोगोरस के गणित के रहस्यमयी और गुप्त गुणों की चर्चा पी हाल के अध्याय ‘दी सेक्रेट टीचिंग्स ऑफ ऑल एजेज’ में की गयी है जिसका शीर्षक है- ‘पाइथोगोरियन मेथमेटिक्स।’

पाइथोगोरस के सिद्धांत ने आने वाले समय में संख्या विज्ञान पर गहरा प्रभाव डाला तथा उसका संख्या सिद्धांत प्राचीन काल में पूरे मध्य-पूर्व में लोकप्रिय हुआ। 8वीं सदी के मुस्लिम कीमियागर जाबिर इब्न हयान ने व्यापक संख्या विज्ञान पर काम किया, वह पाइथोगोरस के सिद्धांत से बहुत अधिक प्रभावित था। समय के साथ लोगों ने पाइथोगोरियन ब्रदरहुड को भुला दिया किंतु इसके कुछ गुप्त संगठन यूरोप के कुछ देशों में काम करते रहे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महान् रोमन गणराज्य

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6. महान् रोमन गणराज्य

रोम की स्थापना के लगभग बाद पाँच सौ सालों तक रोम में राजा का राज्य चलता रहा किंतु ई.पू. 509 में रोमन गणराज्य की स्थापना हुई। यह एक विचित्र प्रकार का गणराज्य था जिस पर जमींदार वर्ग के कुछ धनी कुटुम्बों का वर्चस्व था। उन्हें सम्मिलित रूप से ‘सीनेट’ कहते थे। इस सीनेट को रोम-वासियों द्वारा चुने हुए रोमन-पदाधिकारी नामांकित करते थे जिन्हें ‘कौन्सिल’ कहा जाता था।

सीनेट ‘गणराज्य पद्धति’ पर रोम का शासन चलाती थी। रोमन गणराज्य में दो प्रकार के लोग रहते थे। पहला वर्ग जमींदारों का था और दूसरा वर्ग जन-साधारण का था। उच्च वर्ग को ‘पैट्रिशियन’ और साधारण जनता के वर्ग को ‘प्लेबियन’ कहा जाता था। सभी लोग सीनेट का आदर करते थे किंतु केवल धनी एवं प्रभुत्व सम्पन्न व्यक्ति अर्थात् ‘पैट्रिशियन’ ही सीनेटर हो सकते थे।

इस कारण रोमन गणराज्य के आरम्भिक कई सौ वर्षों तक धनी जमींदार वर्ग एवं जन-साधारण वर्ग में प्रभुत्व को लेकर रक्त-रंजित संघर्ष होते रहे। जमींदार वर्ग के प्रभावशाली लोग भी सीनेट में स्थान पाने के लिए एक-दूसरे के विरुद्ध षड़यंत्र रचा करते थे तथा एक-दूसरे की हत्या तक कर देते थे। इसका मुख्य कारण यह था कि रोमन गणराज्य का प्रमुख सामान्यतः सीनेट का ही कोई सदस्य होता था।

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उस काल के रोम में जमींदार वर्ग एवं जन-साधारण वर्ग के अतिरिक्त एक वर्ग गुलामों का भी था जिन्हें अफ्रीका के उत्तरी तटों से पकड़कर लाया जाता था। इनकी जिंदगी पशुओं के समान थी तथा इन्हें रोम का नागरिक नहीं माना जाता था। वृद्ध-गुलाम अपने स्वामियों द्वारा मुक्त कर दिए जाते थे। वे भी बड़ी संख्या में रोम में रहते थे।

गुलामों एवं स्वतंत्र गुलामों को कौंसिल के सदस्यों को चुनने का अधिकार नहीं होता था। यह एक आश्चर्य की ही बात थी कि कौंसिल के सदस्यों का चुनाव जमींदार वर्ग एवं जन साधारण वर्ग के सम्मिलित वोटों से होता था किंतु कौंसिल के सदस्यों द्वारा सीनेट के लिए केवल जमींदार वर्ग के व्यक्ति ही नामित किए जा सकते थे तथा गण-प्रमुख का चुनाव सीनेट के सदस्यों में से ही होता था।

इस प्रकार गण-प्रमुख के निर्वाचन में जन-सामान्य की भूमिका नगण्य एवं निष्प्रभावी बन कर रह जाती थी। रोम के धनी वर्ग अर्थात् ‘पैट्रिशियन’ के हाथों में रोम की लगभग सारी सम्पत्ति केन्द्रित थी। जन-साधारण वर्ग अर्थात् ‘प्लेबियन’ दिन-रात परिश्रम करके भी कठिनाई से पेट भर पाता था। जन-साधारण ने कई बार इन धनी लोगों के विरुद्ध आवाज उठाई किंतु हर बार जमींदारों द्वारा उन्हें बुरी तरह से कुचला गया। अंत में जन-साधारण ने रोम छोड़ने का निर्णय लिया।

वे बहुत बड़ी संख्या में रोम छोड़कर चले गए और उन्होंने एक अलग नगर बसा लिया। इससे रोम के धनी लोगों को बड़ी कठिनाई हो गई और उनके दैनिक कामकाज ठप्प हो गए। अंत में रोम के जमींदार वर्ग ने जन-साधारण से समझौता कर लिया और उन्हें नागरिक जीवन में कुछ अधिकार दे दिए। इन अधिकारों में समय के साथ वृद्धि होने लगी और इस वर्ग के कुछ लोग सीनेट के सदस्य भी बनने में सफल होने लगे।

रोम के आंतरिक राजनीतिक एवं नागरिक तनाव तथा संघर्ष के बीच भी इस काल में रोम न केवल इटालवी प्रायःद्वीप अपितु भूमध्य सागरीय क्षेत्र के विशाल क्षेत्र पर राज्य करता था। स्पेन, उत्तरी अफ्रीका, औबेरियन प्रायद्वीप, दक्षिणी फ्रांस, यमन और पूर्वी भूमध्य सागर के अधिकतम भाग पर रोम की सेनाओं का डंका बजता था तथा वहाँ रोमन गवर्नर नियुक्त थे। दुनिया उसे महान् रोमन गणराज्य के नाम से जानती थी। रोमन समाज को उस समय सबसे आधुनिक समाज माना जाता था।

रोमन गणराज्य के नेताओं ने शांति और युद्ध के समय मजबूत परम्पराओं का निर्माण किया और समय-समय पर उच्च नैतिकता का प्रदर्शन किया। रोमन सीनेटरों ने कई कानूनी और विधायी संरचनाओं का निर्माण किया जिनकी व्याख्या ‘नेपोलियन संहिता’ और ‘जस्टीनियन संहिता’ में देखने को मिलती है। रोमन गणराज्य में स्थापित हुई कई परम्पराओं को आज भी यूरोप तथा विश्व के कई आधुनिक राष्ट्रों एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में देखा जा सकता है।

रोमन अपमान का खूनी बदला

जिस समय रोम की नींव पड़ी, उन्हीं दिनों अफ्रीका के उत्तरी समुद्र-तट पर फीनिश लोगों ने ‘कार्थेज’ नामक नगर की स्थापना की। बाद में रोम तथा कार्थेज उन्नति करते हुए शक्तिशाली हो गए तथा इन दोनों शहरों में व्यापारिक वर्चस्व को लेकर लम्बे समय तक युद्ध हुए। उन दिनों रोम तथा कार्थेज के बीच दक्षिणी इटली, सिसली और मेसीना में छोटे-छोटे यूनानी-उपनिवेश स्थित थे।

रोम तथा कार्थेज दोनों ही इन उपनिवेशों को समाप्त करके उन पर अपना अधिकार जमाना चाहते थे। अंत में यूनानियों को इन उपनिवेशों से बाहर निकालने के लिए रोम एवं कार्थेज आपस में मिल गए। जब यूनानियों को इटली एवं सिसली से बाहर निकाल दिया गया तब रोमन सेनाओं ने सिसली पर कब्जा कर लिया और रोम ‘बूट की शक्ल’ (जूते की आकृति) वाले इटली की दक्षिणी नोक तक पहुँच गया।

रोम और कार्थेज की दोस्ती स्वार्थ-प्रेरित थी अतः अधिक दिनों तक बनी नहीं रह सकी। भूमध्य सागर के दोनों किनारों पर दोनों शक्तियां अपनी-अपनी सेनाओं का डेरा डालकर बैठ गईं। उन दिनों कार्थेज की शक्ति बहुत बढ़ी हुई थी और वह रोम को अधिक महत्त्व नहीं देता था। रोम भी जोश में था। इस कारण दोनों देशों की सेनाएं लगभग 100 साल तक एक-दूसरे से लड़ती रहीं।

बीच-बीच में कुछ समय के लिए शांति होती थी किंतु कुछ समय बाद दोनों देशों की सेनाएं एक दूसरे पर भूखे-भेड़ियों की तरह टूट पड़तीं जिनमें हजारों सैनिक मारे जाते अथवा अंग-भंग होकर हमेशा के लिए अपंग हो जाते। इन दोनों शक्तियों के बीच तीन बड़े युद्ध हुए जिन्हें ‘प्यूनिक युद्ध’ कहते हैं।

पहला प्यूनिक युद्ध ई.पू.264 से ई.पू.241 तक अर्थात् 23 साल तक चला। इस युद्ध में रोम की जीत हुई। 22 वर्ष बाद दूसरा प्यूनिक युद्ध आरम्भ हुआ। कार्थेज की ओर से इस युद्ध का नेतृत्व उस काल के प्रसिद्ध योद्धा ‘हैनिवाल’ ने किया। उसने 15 वर्ष तक रोम के लोगों को सताया। अंत में ई.पू.216 में कैनी की लड़ाई में हैनिवाल ने रोम को हरा दिया किंतु रोम के लोगों ने हिम्मत नहीं हारी।

उन्होंने रोम और कार्थेज के बीच के समुद्री मार्ग पर अधिकार कर लिया ताकि हैनिवाल बचकर कार्थेज न जा सके तथा कार्थेज से नई सेना आकर हैनिवाल तक नहीं पहुँच सके। इसके बाद रोम-वासियों ने छापामार युद्ध आरम्भ किया। वे जान गए थे कि सम्मुख लड़ाई में हैनिवाल को हरा पाना अत्यंत कठिन है।

 रोम का सेनापति ‘फैबियस’ अपनी पराजय के बावजूद हैनिवाल से लड़ाई जारी रखने का साहस रखता था। हैनिवाल ने इटली के बहुत बड़े हिस्से को वीरान कर दिया किन्तु वह रोम को अपने अधिकार में नहीं ले सका।

अंत में ई.पू.202 में ‘जामा की लड़ाई’ में हैनिवाल को परास्त कर दिया गया। इसके बाद हैनिवाल प्राण बचाने के लिए भागता रहा किंतु वह जहाँ भी गया रोम की न बुझने वाली नफरत उसका पीछा करती रही और अंत में वह विषपान करके मर गया। इसके बाद रोम ने कार्थेज को बहुत नीचा दिखाया किंतु रोम के मन में सुलग रही बदले की आग बुझी नहीं!

पराजित कार्थेज पचास साल तक रोम द्वारा किए जा रहे अपमान को सहता रहा। अंत में रोम ने कार्थेज को इतना परेशान किया कि कार्थेज तीसरे प्यूनिक युद्ध के लिए विवश हो गया। इस लड़ाई में भी भारी मारकाट हुई और कार्थेज पूरी तरह नष्ट हो गया। जिस कार्थेज को ‘भूमध्य सागर की रानी’ कहा जाता था, उस कार्थेज की भूमि पर रोम ने हल चलवा दिए।

कार्थेज से लिए गए बदले से, पूरे यूरोप और भूमध्य सागरीय क्षेत्र में रोमन सेनाओं का आतंक स्थापित हो गया। इन क्षेत्रों के शासक रोम के नाम से भय खाने लगे। अब यूरोप में रोम का कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं रहा। रोम ने भू-मध्य सागर में स्थित समस्त यूनानी उपनिवेशों पर पहले ही अधिकार कर लिया था।

अब कार्थेज भी रोम के अधिकार में आ गया। इसके बाद रोम ने कार्थेज के प्रभाव वाले समस्त उपनिवेशों पर भी अधिकार कर लिया। यहाँ तक कि स्पेन भी रोम के नियंत्रण में आ गया। इतना होने पर भी उत्तरी और मध्य यूरोप अब भी रोमन गणराज्य के अधिकार क्षेत्र से बाहर था। महान् रोमन गणराज्य जितनी जल्दी हो सके, उसे निगल जाना चाहता था।

रोमनगणराज्य का नैतिक पतन (7)

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रोमनगणराज्य का पतन होने से पहले रोमनगणराज्य का नैतिक पतन हुआ। इस कारण रोम की जनता रोमनगणराज्य से घृणा करने लगी। यह कैसा गणराज्य था जिसमें न तो गण की सुरक्षा थी और न राज की।

रोमवासियों का गणराज्य से मोहभंग

कार्थेज के पतन के बाद पराजित देशों से गुलाम पकड़ने का काम तेज हो गया। गुलामों के विशाल झुण्ड पानी के जहाजों में भर-भर कर रोम पहुँचाए जाने लगे। इन्हें रोम के धनी जमींदार खरीदकर अपने खेतों में काम पर लगा देते थे।

इस प्रकार रोम के धनी और भी धनी हो गए जबकि रोम का जन-साधारण अब भी वहीं खड़ा था। उसकी जेबें खाली थीं, मन उदास थे और मस्तिष्क में रोमन गणराज्य के प्रति विरक्ति तथा घृणा का भाव था। सीनेट उसे तनिक भी नहीं सुहाती थी और कौंसिल से उसका विश्वास उठ गया था। सीनेट के चुनावों में होने वाली रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार भी अब जन-सामान्य की आंखों से छिपे नहीं रहे थे।

ग्लेडियेटरों से कमाई

रोम की सेनाएं अफ्रीकी तटों से हब्शियों को पकड़कर लाती थीं जिन्हें गुलामों के रूप में बेच कर रोम गणराज्य को भारी कमाई होती थी। इन्हें खेतों में काम करने से लेकर बड़े-बड़े भवनों के लिए पत्थर ढोने, सड़कों पर गिट्टी कूटने, जंगलों से लकड़ी काटकर लाने, पशु चराने तथा जंगली जानवरों का शिकार करने जैसे भारी-भारी काम सौंपे जाते थे।

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कार्थेज के पतन के बाद रोम में गुलामों की इतनी बड़ी संख्या में आवक होने लगी कि उन सभी को काम पर नहीं लगाया जा सकता था। इसलिए उन्हें मनोरंजन करने के काम पर लगा दिया गया। अमीर लोग अपने-अपने गुलामों को हथियार देकर एक दूसरे के सामने खड़ा कर देते और उनके बीच तलवार-बाजी करवाते। इन नकली लड़ाइयों में गुलामों को असली चोट लगती, असली खून बहता और यहाँ तक कि वे असली मृत्यु को प्राप्त कर जाते थे। इन गुलाम योद्धाओं को ग्लेडियेटर कहा जाता था। अपने प्राण बचाने के लिए प्रत्येक योद्धा अंतिम सांस तक लड़ता था। इस कारण ये मुकाबले अत्यंत वीभत्स एवं भयानक होते थे। इन प्रतिस्पर्द्धाओं को देखने के लिए सैंकड़ों रोमनवासियों की भीड़ जुटती थी। यह भीड़ इन मुकाबलों को देखने के लिए ग्लेडियेटरों के स्वामियों को धन चुकाती थी। धीरे-धीरे रोम में इस खेल को इतनी प्रसिद्धि मिल गई कि यह रोम का प्रमुख खेल बन गया। हाथों में तलवार, भाले एवं गंडासे लिए हुए दोनों ओर के गुलाम, शतरंज के खेल में मरने वाले पैदलों की तरह एक दूसरे के हाथों बेरहमी से मार दिए जाते थे और रोमनवासी उनके चीत्कारों को सुनकर आनंदित होते।

अपनी जान बचाने और प्रतिद्वन्द्वी की जान लेने के लिए ग्लेडियटरों द्वारा की जाने वाली पैंतरे-बाजियां दर्शकों के रोमांच को चरम पर पहुँचा देती थीं। इस प्रकार अब ग्लेडियेटरों की लड़ाई खेल और रोमांच न रहकर व्यवसाय बन गई। बहुत से लोग इस खेल में अपने-अपने ग्लेडियेटरों को उतार कर मालामाल होने लगे। एक तरह से यह मुर्गे और बकरे लड़ाकर कमाई करने जैसा खेल हो गया जिसमें पशु-पक्षियों की जगह इंसान लड़ते थे।

पहले जब गुलामों को पकड़कर रोम लाया जाता था तो वे पेटभर खाना, आश्रय और कपड़े पाकर संतुष्ट हो जाते थे तथा कठोर परिश्रम करने के बावजूद भागने का प्रयास नहीं करते थे किंतु जब उन्हें ग्लेडियेटर बनाया जाने लगा तो वे प्रायः अवसर पाकर जंगलों में भाग जाते। उनमें से बहुत कम को ही वापस पकड़ कर लाना संभव हो पाता था।

इसलिए ग्लेडियेटरों को मजबूत कोठरियों में बंद करके रखा जाने लगा। उन्हें कोठरियों में अच्छा भोजन दिया जाता था ताकि वे हष्ट-पुष्ट रहें तथा खेल के मैदान में जीत प्राप्त करके अपने मालिक की तिजोरी धन से भर सकें। दूसरी ओर जंगलों में भाग जाने वाले ग्लेडियेटर प्रायः जंगली जानवरों का आहार बन जाते।

ग्लेडियेटरों का विद्रोह

एक दिन रोम गणराज्य में उपद्रव आरम्भ हो गए। ये उपद्रव अफ्रीकी तटों से पकड़कर लाए गए गुलामों और ग्लेडियेटरों ने किए थे। सैंकड़ों ग्लेडियेटरों ने ‘स्पार्तक’ नामक एक ग्लेडियेटर के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया। ये लोग बंद कोठरियों के दरवाजों को तोड़कर रोम की सड़कों पर आ गए और रोम के ‘पैट्रिशियन’ अर्थात् धनी-मानी लोगों को मारने लगे।

रोमन सेनाओं ने ग्लेडियेटरों के इस विद्रोह को बड़ी बेरहमी से कुचला। उन्हें ढूंढ-ढूंढकर मारा गया। रोम नगर में ‘एपियन’ नामक सड़क पर छः हजार गुलामों को एक साथ सूली पर चढ़ाया गया जिनमें से अधिकांश ग्लेडियेटर थे।

रोम में गृहयुद्ध

ग्लेडियेटरों के दमन के उपरांत भी रोम में शांति नहीं हुई। राजधानी की सड़कों पर हिंसा और उपद्रव पहले की भांति जारी रहे किंतु इस बार उनकी कमान सीनेट में नामांकन को लेकर लड़ रहे शक्तिशाली धनी जमींदारों के हाथों में थी। रोम का जन-साधारण अब भी शासन के प्रति मन में उदासी और मस्तिष्क में घृणा का भाव लिए अपने घरों में चुपचाप बैठा था।

उसमें सम्भवतः क्रांति करने की क्षमता ही नहीं बची थी। सीनेट में प्रवेश पाने के इच्छुक प्रतिद्वन्द्वियों की सेनाओं के बीच सड़कों पर खूनी संग्राम होने लगे। रोम की शक्ति, शत्रुओं का दमन करने में व्यय न होकर एक दूसरे को मारने में खर्च होने लगी। इस कारण रोमन सेनाओं में बिखराव दिखाई देने लगा और शीघ्र ही उन्हें देश से बाहर के मोर्चों पर पराजय का स्वाद चखना पड़ा जो कि रोमन योद्धाओं के लिए बिल्कुल नई बात थी।

पार्थव में रोमनगणराज्य की भारी पराजय

रोम-वासियों की धारणा थी कि शासन-तंत्र चलाने के लिए उन्होंने अपने राज्य में जिस गणराज्य-व्यवस्था की स्थापना की है, वह संसार की समस्त व्यवस्थाओं में सर्वश्रेष्ठ है। इसे कभी कोई पराजित नहीं कर सकता किंतु जिस समय सीनेट में नामांकन को लेकर रोम का धनी-जमींदार वर्ग सड़कों पर एक दूसरे का खून बहा रहा था, रोम की सेनाएं पार्थव नामक देश में बड़ा युद्ध लड़ रही थीं।

ई.पू.53 में पार्थव देश के भीतर हुई ‘कैरे की लड़ाई’ में रोम की सेनाएं बुरी तरह परास्त हो गईं। पार्थव में स्थित रोमन सेना को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया तथा उसके डेरे लूट लिए गए। यह शर्मनाक पराजय रोम जैसे शक्तिशाली गणराज्य के लिए बहुत बड़ा झटका था। इस पराजय के कारण, रोमन वासियों के अजेय होने का भ्रम टूट गया। यह सीनेट के शासन काल की बड़ी घटनाओं में से एक थी तथा इसे गणराज्य की बहुत बड़ी विफलता माना गया। 

मिस्र के शासक का रोम पर अधिकार

 ईसा के जन्म से लगभग 325 साल पहले मेसीडोनिया के यूनानी सेनापति टॉलेमी सोटेर (प्रथम) ने मिस्र में टॉलेमी राजवंश की स्थापना की। वह मेसीडोनिया के राजा सिकन्दर का सहायक था तथा सिकंदर की मृत्यु के बाद उसने मिस्र में स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया था। तब से उसका वंश मिस्र पर शासन करता रहा था।

रोम की पार्थव पराजय के बाद मिस्र के शासक टॉलेमी (बारहवें) ने रोम पर अधिकार कर लिया। यह पराजय रोमन गणराज्य के लिए बहुत घातक सिद्ध हुई। जिस रोम ने केवल दूसरे देशों पर विजय और शासन करना ही जाना था, अब वही रोम मिस्र द्वारा पददलित होकर उसका उपनिवेश बन गया। रोमन गणपतियों के ऊपर मिस्री गवर्नर आकर बैठ गए।

अतः रोमन गणराज्य में यह धारणा बनने लगी कि गणराज्य व्यवस्था में परस्पर प्रतिस्पर्द्धा कर रहे धनी-जमींदार रोम की रक्षा नहीं कर सकते। बहुत से रोमन यह अनुभव करने लगे थे कि गणराज्य की तुलना में राजतंत्रीय शासन कहीं अधिक अच्छा है जो देश के शत्रुओं के विरुद्ध पूरी शक्ति के साथ लड़ सकता है।

रोमनगणराज्य का नैतिक पतन होने के बाद उसका राजनीतिक पतन होना अवश्यम्भावी था। उसे कोई बचा नहीं सकता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जूलियस सीजर एवं क्लियोपैट्रा (8)

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जूलियस सीजर एवं क्लियोपैट्रा

संसार के इतिहास में जूलियस सीजर एवं क्लियोपैट्रा की गणना महान् प्रेमियों में होती है। इनकी तुलना यूरोप में रोमियो जूलियट से, मध्य एशिया में लैला मजनूं से और दक्षिण एशिया में हीर रांझा से की जाती है।

जूलियस सीजर का उत्थान

रोम के धनी-जमींदारों की भीड़ में उन दिनों दो योद्धाओं के नाम प्रमुखता से उभरकर सामने आए। पहला था पॉम्पी और दूसरा था जूलियस सीजर। सीजर ने गॉल (फ्रांस) को जीतकर ख्याति अर्जित की। कुछ समय बाद सीजर ने ब्रिटेन को जीतकर संसार को एक बार फिर से रोम का लोहा मानने के लिए विवश कर दिया। जब सीजर फ्रांस और इंग्लैण्ड में व्यस्त था तब पॉम्पी पूर्व की ओर गया और वहाँ उसने रोम के लिए कुछ क्षेत्र जीते। दोनों सेनापतियों में पुरानी प्रतिद्वंद्विता थी जो उन दिनों प्रायः प्रत्येक रोमन सेनापति के बीच पाई जाती थी।

ये दोनों धनी-जमींदार युवक अत्यंत महत्त्वाकांक्षी थे तथा एक दूसरे को नीचा दिखाने का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देते थे। इस शत्रुता के चलते वे सीनेट के आदेशों की भी अवहेलना करने लगे। अंत में इन दोनों प्रतिद्वंद्वियों में खुला युद्ध हुआ। दोनों सेनापतियों की सेनाओं के बीच यूनान के ‘फारसैल’ नामक स्थान पर भयानक लड़ाई हुई जिसमें पॉम्पी पराजित हो गया और मिस्र की तरफ भाग गया। जूलियस सीजर भी पॉम्पी का पीछा करता हुआ मिस्र पहुँच गया।

मिस्र में उन दिनों टॉलेमी (बारहवें) का पुत्र ‘टॉलेमी (तेरहवां)’ एवं टॉलेमी (बारहवें) की पुत्री ‘क्लियोपैट्रा (सप्तम्)’ मिस्र पर संयुक्त रूप से शासन कर रहे थे। जब तक जूलियस सीजर मिस्र पहुँचकर पॉम्पी को घेर पाता, मिस्र के राजा टॉलेमी (तेरहवें) ने पॉम्पी को पकड़कर उसकी हत्या कर दी। इससे पहले कि जूलियस सीजर मिस्र से वापस रोम लौटता, रानी क्लियोपैट्रा ने सीजर से गुप्त-स्थान पर भेंट करने की प्रार्थना भिजवाई। जूलियस सीजर को महारानी क्लियोपैट्रा का संदेश पाकर हैरानी हुई।

शत्रुओं की भूमि पर शत्रुओं की महारानी से गुप्त रूप से मिलना किसी षड़यंत्र का हिस्सा भी हो सकता था किंतु सीजर ने महारानी से मिलने का निर्णय किया और पूरी तैयारी के साथ क्लियोपैट्रा से मिलने पहुँच गया।

सौन्दर्य का महासागर महारानी क्लियोपैट्रा

जब जूलियस सीजर ने महारानी क्लियोपैट्रा को देखा तो अवाक् होकर देखता ही रह गया। उसे लगा कि सौन्दर्य और प्रकाश का कोई महापुंज ही नारी देह में सिमट कर आ खड़ा हुआ है। उस समय तक क्लियोपैट्रा को यौवन की चौखट पर पांव रखे हुए अधिक दिन नहीं हुए थे तथा वह दैहिक सौन्दर्य के चरम पर थी।

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जब उसने पहली ही भेंट में जूलियस सीजर को अपलक अपनी ओर देखते हुए पाया तो वह समझ गई कि उसने जिस उद्देश्य से सीजर को आमंत्रित किया है, उसे पूरा होने में अब कोई कठिनाई नहीं होगी। इस भेंट का मुख्य उद्देश्य यही था कि वह रोमन सेनापति को अपने दैहिक आकर्षण के पाश से बांध सके। ताकि सीजर क्लियोपैट्रा के उस राजनीतिक प्रस्ताव को स्वीकार कर ले जिससे रोम और मिस्र दोनों का इतिहास एवं भूगोल सदा के लिए बदल जाने वाला था। रानी क्लियोपैट्रा ने सीजर के समक्ष प्रस्ताव रखा कि वह मिस्र के राजा टॉलेमी (तेहरवें) के विरुद्ध रानी क्लियोपैट्रा को सैनिक सहायता प्रदान करे। यदि टॉलेमी मारा जाता है तो मिस्र पर रानी क्लियोपैट्रा का अधिकार होगा और रोम को मिस्र की अधीनता से मुक्त कर दिया जाएगा। सीजर जानता था कि यदि वह रोम को मिस्र के चंगुल से निकाल लेगा तो रोम के गणराज्य पर बिना किसी बाधा के नियंत्रण कर लेगा। इसलिए सीजर ने मिस्र की रानी का यह प्रस्ताव तुरंत स्वीकार कर लिया। क्लियोपैट्रा के सौन्दर्य की विश्व इतिहास में अत्यधिक चर्चा हुई है। उसके बारे में कहा जाता है कि उसके सौन्दर्य ने संसार का नक्शा और इतिहास दोनों बदल कर रख दिए।

विख्यात फ्रांसीसी लेखक पैस्कल ने लिखा है- ‘यदि क्लियोपैट्रा की नाक कुछ छोटी होती तो दुनिया की सूरत बिल्कुल बदल गई होती।’

मिस्र के टॉलेमी राजवंश में ‘क्लियोपेट्रा’ नाम की सात रानियां हुई हैं। क्लियोपैट्रा मूलतः सिल्युक वंश के राजा ‘अंतियोख महान’ की पुत्री एवं पाँचवे टॉलेमी की पत्नी का नाम था किंतु ‘क्लियोपेट्रा’ नाम की ख्याति बारहवें टॉलेमी की पुत्री ओलीतिज़ क्लियोपैट्रा के कारण हुई।

इस क्लियोपैट्रा का जन्म ई.पू.69 में हुआ था। उससे पूर्व इस वंश में इस नाम की छः रानियाँ हो चुकी थीं। जूलियस सीजर के समय में जो क्लियोपैट्रा मिस्र पर शासन कर रही थी, उसे मिस्र के इतिहास में क्लियोपैट्रा (सप्तम) कहते हैं तथा उसका नाम क्लियोपैट्रा फिलेपाटर था।

जिस समय मिस्र के राजा बारहवें टॉलेमी ने रोम पर आक्रमण किया था, तब राजकुमारी क्लियोपैट्रा केवल 10 साल की थी तथा वह अपने पिता के साथ सैनिक अभियान पर रोम गई थी। क्लियोपैट्रा की बड़ी बहन ‘बेरेनीस (चतुर्थ)’ ने अपने पिता की अनुपस्थिति का लाभ उठाते हुए राज्य पर अधिकार कर लिया और स्वयं मिस्र की रानी बन गई।

तीन साल बाद जब उसका पिता बारहवां टॉलेमी रोम पर विजय प्राप्त करके पुनः मिस्र लौटा तो उसने अपनी बड़ी पुत्री बेरेनीस (चतुर्थ) को पकड़कर मार डाला और स्वयं फिर से मिस्र का शासक हुआ। जब क्लियोपैट्रा 17 साल की हुई तो उसके पिता बारहवें टॉलेमी की मृत्यु हो गई। टॉलेमी वंश में यह परम्परा थी कि जब कोई राजा मर जाता था तो उसकी किसी पुत्री का विवाह राजा के बड़े पुत्र के साथ कर दिया जाता था तथा उन दोनों को संयुक्त रूप से अगला शासक बनाया जाता था।

पिता की वसीयत के अनुसार राजकुमारी क्लियोपैट्रा का विवाह क्लियोपैट्रा के छोटे भाई के साथ कर दिया गया और दोनों को संयुक्त रूप से मिस्र का राजा एवं रानी बनाया गया। मिस्र का यह नया राजा मिस्र के इतिहास में तेरहवें टॉलेमी के नाम से विख्यात हुआ।

सत्रह वर्ष की आयु राजनीति को समझने के लिए अधिक नहीं होती किंतु क्लियोपैट्रा ने अपने पिता के साथ युद्ध के मैदानों में रहकर राजनीति के पाठ पढ़े थे। उसने रोम जैसी महान् सभ्यता को मिस्र के अधीन होते हुए देखा था।

यहाँ तक कि क्लियोपैट्रा ने अपने पिता के हाथों अपनी विद्रोही पुत्री को मौत के घाट उतरते हुए भी देखा था और अब इतनी कम उम्र में उसने पिता का आश्रय खो दिया था। इसलिए वह अल्पायु में ही परिपक्व हो गई। उसे सेनाओं का संचालन करना और राजदूतों से व्यवहार करना आ गया था। उसकी व्यक्तिगत आकांक्षाएं भी विस्तार ले चुकी थीं और अब वह राजनीति के क्रूर गगन में लम्बी उड़ान भरने को तैयार थी।

विश्व इतिहास में क्लियोपैट्रा एक ऐसी सुन्दर, कामुक, मक्कार और प्रभावशाली रानी के रूप में याद की जाती है जिसके रहस्यों पर कई पर्दे पड़े हैं। उसने मिस्र के जनजीवन में कई प्रथाओं का प्रचलन किया। इस कारण उसकी तुलना मिस्र की देवी आइसिस तथा रोम की देवी वीनस से की जाती है। वैसे भी मिस्र में शासकों की मूर्तियाँ बनाकर उन्हें देवी-देवताओं की तरह पूजने की परम्परा थी।

यह परम्परा टॉलेमी वंश के साथ यूनान से आई थी। रानी क्लियोपैट्रा की अनेक मूर्तियां, पेंटिंग और सिक्के मिले हैं जिनमें वह देवी आइसिस तथा वीनस की तरह दर्शाई गई है। रानी क्लियोपैट्रा जितनी सुंदर और मोहक थी, उससे कहीं ज्यादा कामुक, चतुर, षड्यंत्रकारी और क्रूर थी।

इतना होने पर भी प्रेम, समर्पण और विश्वास की दुनिया में भी उसका नाम बहुत ऊपर है। यद्यपि क्लियोपैट्रा की मातृ भाषा ग्रीक थी तथापि वह मिस्र की पहली टॉलेमियन रानी थी जिसने मिस्री भाषा सीख कर मिस्र के लोगों को आदर प्रदान किया। वह अपने युग की महान् नौसैनक कमाण्डर, चिकित्सा-लेखक तथा राजनीतिज्ञ भी थी।

रानी क्लियोपैट्रा अपने छोटे भाई टॉलेमी (तेरहवें) की पत्नी बनकर उसके साथ संयुक्त शासक के रूप में राज्य भोगने लगी किंतु शीघ्र ही उन दोनों में झगड़ा हो गया। यह झगड़ा इतना बढ़ा कि देश की सेनाएं दो भागों में बंट र्गईं और मिस्र में गृह-युद्ध छिड़ गया।

आगे चलकर क्लियोपैट्रा ने राजनीति में सफल होने के लिए कई पुरुषों से विवाह किए एवं कई पुरुषों से शारीरिक सम्बन्ध बनाए। उसके बारे में कहा जाता था कि वह राजाओं और सैन्य अधिकारियों को अपनी सुंदरता के मोहपाश में बांधकर अपने बिस्तर तक खींच लाती थी और अपना काम निकल जाने पर उन्हें मौत के घाट उतार देती थी।

जब क्लियोपैट्रा ने जूलियस सीजर की सेनाओं को मिस्र की धरती पर देखा तो उसने जूलियस सीजर से अपने पति और मिस्र के संयुक्त राजा के विरुद्ध सहयोग मांगा। रोम की स्वतंत्रता के विचार, स्वयं के उत्थान की संभावना एवं क्लियोपैट्रा के सौंदर्य के प्रभाव के कारण जूलियस सीजर क्लियोपैट्रा का सहयोग करने के लिए तैयार हो गया। क्लियोपैट्रा ने जूलियस को अपने महल में आमंत्रित किया और उसकी प्रेयसी बन गई।

इसके बाद टॉलेमी (तेरहवें) एवं उसकी रानी क्लियोपैट्रा (सप्तम्) में नए सिरे से युद्ध छिड़ गया। क्लियोपैट्रा की छोटी बहिन आरसीनोए (चतुर्थ) ने इस युद्ध में अपने बड़े भाई राजा टॉलेमी (तेरहवें) का पक्ष लिया। राजकुमारी आरसीनोए (चतुर्थ) मिस्र देश की प्रधान सेनापति भी थी। उसने अपनी सेनाओं को आदेश दिया कि वे क्लियोपैट्रा के महल को घेर लें।

जब मिस्र की सेना ने रानी क्लियोपैट्रा के महल के चारों ओर घेरा डाला तो न केवल रानी क्लियोपैट्रा अपितु रोमन सेनापति जूलियस सीजर भी रानी के महल में घिर गया। इससे पहले कि आरसीनोए की सेनाएं क्लियोपैट्रा के महल में घुस पातीं, रोम से जूलयिस सीजर की नई सेनाएं आ गईं और युद्ध का पासा पलट गया।

नील के मैदान में दोनों पक्षों में भयानक युद्ध हुआ जिसमें मिस्र का राजा तथा क्लियोपैट्रा का पति टॉलेमी (तेरहवां), मारा गया। राजकुमारी आरसीनोए को देश-निकाला देकर इफेसस भेज दिया गया। जूलियस सीजर ने क्लियोपैट्रा को उसके अन्य छोटे भाई के साथ मिस्र का संयुक्त राजा बना दिया और स्वयं रोम लौट गया। इस नए राजा को मिस्र के इतिहास में टॉलेमी (चौदहवां) कहा जाता है। अब क्लियोपैट्रा ने अपने इसी भाई से विवाह कर लिया। हालांकि जूलियस सीजर के साथ उसका प्रेम प्रसंग चलता रहा।

जूलियस सीजर को रोम के शासक की मान्यता

पॉम्पी के मार्ग से हट जाने तथा रोम की मिस्र से मुक्ति हो जाने के बाद अब जूलियस सीजर ही रोमन गणराज्य का सर्वमान्य नेता हो गया। हालांकि अब भी वह सीनेट को अपने से ऊपर मानने के लिए बाध्य था। सीनेट के कुछ सदस्यों ने प्रयास किया कि सीजर को ताज पहनाकर रोम का बादशाह घोषित कर दिया जाए किंतु सीजर रोम की सैंकड़ों वर्षों पुरानी परम्पराओं के कारण ताज पहनने एवं सम्राट बनने से हिचकिचाता रहा।

ई.पू.46 में क्लियोपैट्रा मिस्र से रोम आई तथा अपने पूर्व प्रेमी जूलियस सीजर के महल में ठहरी। इस समय तक जूलियस सीजर रोम का एकछत्र शासक बन चुका था। यद्यपि वह स्वयं को राजा नहीं कहता था, तथापि रोम का सर्वेसर्वा वही था। क्लियोपैट्रा लगभग तीन साल तक रोम में रही। जूलियस सीजर से क्लियोपैट्रा के एक पुत्र भी हुआ जिसे ‘कैसरियन’ तथा ‘टॉलेमी (पंद्रहवां)‘ भी कहा जाता है।

रानी क्लियोपैट्रा के और भी पुत्र हुए किंतु क्लियोपैट्रा ने अपने इसी पुत्र को मिस्र का अगला उत्तराधिकारी घोषित किया। जब रोम की सेना को लगा कि जूलियस सीजर का पुत्र होने के नाते मिस्र की रानी का पुत्र रोम का अगला शासक हो सकता है तो रोम की जनता ने जूलियस सीजर के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।

जूलियस सीजर की हत्या

जूलियस सीजर मिस्र की कुछ परम्पराओं से बहुत प्रभावित हुआ। मिस्र में गणतंत्र नहीं था, राजतंत्र था तथा राजा को देवता माना जाता था। मिस्र में इस समय टॉलमी वंश का शासन था जो मूलतः यूनान से मिस्र आए थे और राजा को देवता मानने की परम्परा भी वे यूनान से अपने साथ लाए थे।

क्लियोपैट्रा भी इसी वंश की राजकुमारी थी और अपने पिता की मृत्यु के बाद अपने भाइयों से बारी-बारी से विवाह करके वह मिस्र पर अपने पति के साथ संयुक्त शासक के रूप में शासन करती थी। वह भी मिस्र में देवी समझी जाती थी। जूलियस सीजर ने अपने विश्वस्त सहयोगियों एवं अनुचरों के माध्यम से प्रयास किया कि रोमवासी भी जूलियस सीजर को देवता समझें। इसके बाद रोम में सीजर की मूर्तियां बनने लगीं और उनकी पूजा भी होने लगी।

सीजर का ऐसा उत्थान रोम के दूसरे धनी-जमींदार युवक सहन नहीं कर सके। इसलिए रोम में उसके विरुद्ध षड़यंत्र रचे जाने लगे। अंत में ई.पू.44 में ब्रूटस और दूसरे लोगों ने सीजर को फोरम की सीढ़ियों पर ही छुरा भौंककर मार डाला। फोरम उस भवन का नाम था जिसमें सीनेट की बैठकें हुआ करती थीं।

इस काल में रोम का शासन इटली, स्पेन, इंग्लैण्ड, फ्रांस, यूनान, एशिया-कोचक, परगैमम, कार्थेज तथा भूमध्य सागर के कई तटीय देशों तक विस्तृत था तथा क्लियोपैट्रा एवं सीजर के सम्बन्धों के कारण अब मिस्र, रोम का संरक्षित राज्य माना जाता था। उत्तर में राइन नदी के सहारे-सहारे रोमन गणराज्य की सीमा थी।

यह सचमुच ही एक विशाल राज्य था। भारत के साथ उसके व्यापारिक सम्बन्ध थे। ऐसे राज्य का स्वामी होना किसी काल्पनिक देवत्व से कई गुना बढ़कर था किंतु जूलियस सीजर न तो काल्पनिक देवत्व प्राप्त कर सका और न इतने विशाल साम्राज्य को भोगने के लिए अधिक समय तक जीवित रह सका।

इससे अधिक आश्चर्य की बात इस संसार में और क्या होगी कि इतने विशाल राज्य का स्वामी जूलियस सीजर उसी सीनेट के भवन की सीढ़ियों पर सामान्य आदमी की तरह मार दिया गया जिस सीनेट के सदस्यों को वह अपनी अंगुली के संकेतों पर नचाता रहा था।

धरती के हर कोने में और हर युग में व्यक्तिगत शत्रुताओं, धार्मिक विद्वेषों, सम्पत्ति के झगड़ों और सामंती प्रतिद्वन्द्विताओं का अंत प्रायः इसी रक्त-रंजित विधि से हुआ करता है। विश्व के हर देश में तथा हर युग में पराई स्त्री के साथ विवाहेतर सम्बन्ध, मनुष्य के पतन का कारण बनते रहे हैं, जूलियस सीजर एवं रानी क्लियोपैट्रा के सम्बन्ध इसकी जीती-जागती मिसाल हैं। 

सीजर अपने समय का महान् योद्धा एवं सफल सेनापति ही नहीं था अपितु एक बड़ा लेखक भी था। उसने गॉल (फ्रांस) पर उसके द्वारा की गई चढ़ाई का बड़ा सुंदर वर्णन लिखा है जिसके लिए उसने लैटिन भाषा का प्रयोग किया। यह पुस्तक आज भी यूरोप के लगभग समस्त देशों के लाखों विद्यालयों में पढ़ाई जाती है। संसार की सैंकड़ों भाषाओं में इस पुस्तक के अनुवाद हुए हैं। यह इतिहास एवं साहित्य दोनों की दृष्टि से मूल्यवान पुस्तक है।

जूलियस सीज़र के समय के इटैलियाई गद्य लेखकों में ‘सिसरो’ का नाम बहुत प्रसिद्ध है। सिसरो की भाषा में यूनानी प्रभाव दिखाई देता है। सीज़र की हत्या के बाद सिसरो की भी हत्या कर दी गई।

क्लियोपैट्रा द्वारा रोम का त्याग

सीजर की हत्या के बाद क्लियोपैट्रा ने उसकी उत्तराधिकारी बनने का प्रयास किया किंतु सीजर के भाई के पोते ऑक्टेवियन जो कि सीजर का दत्तक पुत्र भी था, ने क्लियोपैट्रा से विद्रोह कर दिया और वह जूलियस सीजर का उत्तराधिकारी बना। रोमन इतिहास में इस राजा को ऑगस्टस सीजर कहा जाता है। रोम में सफलता न मिलने पर क्लियोपैट्रा पुनः मिस्र लौट गई किंतु मिस्र के राजा तथा क्लियोपैट्रा के पति टॉलेमी (चौदहवें) ने उसे स्वीकार नहीं किया। इस कारण दोनों के बीच झगड़ा हुआ।

क्लियोपैट्रा ने अपने इस पति को भी मार डाला और अपने पुत्र कैसरियन के साथ मिस्र की संयुक्त शासक बन गई जिसे मिस्र के इतिहास में पंद्रहवाँ टॉलेमी कहा जाता है। यह जूलियस सीजर का पुत्र था। इस प्रकार जूलियस सीजर का दत्तक पुत्र रोम का तथा जूलियस का अवैध पुत्र मिस्र का सम्राट हुआ।

कुछ समय बाद रोमन सम्राट ऑक्टेवियन ने मिस्र पर भी अधिकार कर लिया तथा राज्य पुनः क्लियोपैट्रा तथा उसके पुत्र टॉलेमी पंद्रहवें को सौंप दिया। ऑक्टेवियन ने रोम की ही तरह मिस्र की राजसभा में तीन सदस्यों का एक समूह गठित किया जिसका अध्यक्ष रोमन सम्राट ऑक्टेवियन स्वयं था तथा उसकी सहायता के लिए रोमन सेनापति मार्क एंटोनी तथा मारकस एमिलिअस लेपिडस नियुक्त किए गए।

इस समूह को ‘ऑक्टेवियन की तिकड़ी’ कहा जाता था तथा यह समूह मिस्र की रानी क्लियोपैट्रा एवं राजा टॉलेमी (पंद्रहवें) की गतिविधियों पर नियंत्रण रखता था।

ई.पू.42 में रोम में पुनः गृहयुद्ध छिड़ गया। मिस्र की रानी क्लियोपैट्रा ने रोम की इन परिस्थितियों से लाभ उठाने के लिए, अपने पूर्व प्रेमी जूलियस सीजर के दत्तक पुत्र ऑक्टेवियन द्वारा गठित तिकड़ी का पक्ष लिया। इसके साथ ही क्लियोपैट्रा ने इस तिकड़ी को तोड़ने के लिए एक चाल चली।

ई.पू.41 में टारसस नामक स्थान पर क्लियोपैट्रा ने इस तिकड़ी के सदस्यों से भेंट की और जनरल मार्क एंटोनी पर प्रेमपाश फैंका। मार्क उसके प्रेमपाश में फंस गया। दोनों ने अलेक्जेंड्रिया में एक साथ शीत ऋतु व्यतीत की और उनका प्रेम प्रसंग काफी लम्बा चला। जनरल एंटोनी से क्लियोपैट्रा के तीन बच्चे हुए। मार्क एंटोनी तथा क्लियोपैट्रा ने बाद में प्रकट रूप में विवाह भी किया।

क्लियोपैट्रा ने मिस्र में अपने और एंटोनी के संयुक्त नाम से सिक्के भी ढलवाए। अब रानी क्लियोपैट्रा ने निर्वासन भोग रही अपनी बहिन आरसीनोए (चतुर्थ) से छुटकारा पाने का प्रयास किया तथा उस पर अपने दरबार में मुकदमा चलाया। इस कार्य में जनरल मार्क एटोंनी ने प्रमुख भूमिका निभाई। आरसीनोए को दोषी घोषित करके मौत के घाट उतार दिया गया। आज से कुछ साल पहले ही आरसीनोए की कब्र खोजी गई है।

रोमन सम्राट का मिस्र पर अभियान

जब जनरल मार्क एण्टोनी ने पार्थियन सम्राज्य तथा अरमेनिया राज्य पर सैनिक अभियान किए तो क्लियोपैट्रा ने मार्क एण्टोनी को धन और सेनाएं उपलब्ध करवाईं। इस सहायता के बदले में मार्क के अधीन क्षेत्रों पर क्लियोपैट्रा के बच्चों को शासक बनाया गया जो कि मार्क के भी बच्चे थे। रोम की एक राजकुमारी ऑक्टेविया  माइनर, जनरल मार्क की पत्नी थी जो कि रोम के नए शासक ऑक्टेवियन सीजर की बहिन थी।

जब ऑक्टेविया माइनर को मार्क द्वारा क्लियोपैट्रा से शादी करने के बारे में ज्ञात हुआ तो ऑक्टेविया माइनर ने मार्क से सम्बन्ध तोड़ लिए तथा उसके भाई एवं रोम के सम्राट ऑक्टेवियन सीजर ने जनरल मार्क और रानी क्लियोपैट्रा के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। रानी क्लियोपैट्रा एवं जनरल मार्क अपनी-अपनी सेनाएं लेकर रोम के सम्राट से लड़ने के लिए आए।

यह एक विचित्र स्थिति थी। रोम का सम्राट ऑक्टेवियन सीजर न केवल मिस्र की रानी क्लियोपैट्रा के पूर्व पति जूलियस सीजर के भाई का पौत्र तथा सीजर का दत्तक पुत्र था अपितु वह जनरल मार्क की पत्नी का भाई भी था। भारतीय परिप्रेक्ष्य में इन सम्बन्धों की व्याख्या नहीं की जा सकती थी कि कौन किसका क्या था तथा रोमन परिप्रेक्ष्य में इन सम्बन्धों की व्यख्या की आवश्यकता नहीं थी।

क्लियोपैट्रा के पिता के काल में रोम, मिस्र के अधीन रहा था तथा कुछ समय के लिए स्वयं क्लियोपैट्रा के भी अधीन रहा था, बाद में मिस्र रोम का संरक्षित राज्य बन गया था। जब मिस्र की साम्राज्ञी क्लियोपैट्रा रोम के सम्राट के महल में रहती थी, तब ऐसा लगने लगा था कि दोनों राज्य मिलकर एक हो गए हैं।

अब दोनों राज्यों की सेनाएं फिर एक दूसरे से युद्ध कर रही थीं। उस काल में मिस्र तथा रोम की राजनीति, मिस्र तथा रोम के राजाओं, रानियों, सेनापतियों एवं सामंतों की व्यक्तिगत आकांक्षाओं के कारण इसी प्रकार उलझ कर रह गई थी।

ई.पू.31 में एक्टियम नामक स्थान पर रोमन सेनापति एग्रिप्पा की नौसेना तथा मार्क एंटोनी एवं क्लियोपैट्रा की संयुक्त नौसेनाओं में भयानक युद्ध हुआ। क्लियोपैट्रा तथा मार्क एंटोनी की सेनाएं लगातार जीत रही थीं किंतु युद्ध के दौरान अचानक अफवाह फैलाई गई कि रानी क्लियोपैट्रा मर गई है।

इस सूचना को सुनकर मार्क एंटोनी कमजोर पड़ गया और उसकी फौजों को ऑक्टेवियन की सेनाओं से पराजित हो जाना पड़ा। इसके बाद रोमन सेनाएं लगातार जीतती रहीं और ई.पू. 30 में मिस्र में घुस गईं। क्लियोपैट्रा अपने 60 जहाजों के साथ युद्धस्थल छोड़कर सिकंदरिया भाग गई। मार्क एंटोनी भी उससे यहीं पर आ मिला। रोमन सम्राट ऑक्टेवियन की सेनाएं अब भी एंटोनी तथा क्लियोपैट्रा के पीछे लगी हुई थीं।

रानी क्लियोपैट्रा का आत्मघात

रोमन सम्राट ऑक्टेवियन सीजर चाहता था कि वह मिस्र की रानी क्लियोपैट्रा को पकड़कर रोम ले जाए तथा अपने विजय जुलूस में, पराजित क्लियोपैट्रा का सार्वजनिक प्रदर्शन करे। जब क्लियोपैट्रा को ऑक्टेवियन के इस भयानक निश्चय की जानकारी मिली तो उसने अपने अंतिम पति मार्क एंटोनी के साथ आत्मघात करने का निर्णय लिया। क्लियोपैट्रा मरना नहीं चाहती थी किंतु वह अपमानित होकर जीना भी नहीं चाहती थी इसलिए उसे मरने का निर्णय लेना पड़ा।

उसने जीना चाहा था किंतु उसकी महत्त्वाकांक्षाओं ने उसके जीने के लिए कोई रास्ता नहीं छोड़ा था। क्लियोपैट्रा संसार की सुंदरतम महिलाओं में से थी। वह चाहती थी कि दुनिया उसे इसी रूप के लिए याद करे और उसके किस्से आने वाली पीढ़ियों की जीभ पर बने रहें। इसके लिए आवश्यक था कि मृत्यु के बाद भी उसका शरीर, सौंदर्य से दमदमाता हुआ दिखाई दे और लोग उस सुंदर रानी की मृत देह को देखकर भी आहें भरें।

क्लियोपैट्रा अपने शरीर को काटना-फाड़ना नहीं चाहती थी। न मौत के बाद जहर से काला पड़ा हुआ दिखाना चाहती थी। इसलिए उसने अपने लिए एक रहस्यमय मौत का चयन किया। वह जनरल मार्क एंटोनी को लेकर एक गुप्त-गृह में चली गई। एक जहरीला कोबरा भी उनके साथ था जिसकी विष-थैली निकाली जा चुकी थी। क्लियोपैट्रा तथा मार्क ने एक ऐसे मादक पदार्थ का सेवन किया जिससे उनकी तुरंत मृत्यु हो जाए तथा शरीर भी काला नहीं पड़े।

कोबरा की उपस्थिति के कारण लोग समझें कि उनकी मृत्यु सांप के काटने से हुई है किंतु वे ये भी समझें कि रहस्यमयी शक्तियों के स्वामी होने के कारण उनका शरीर काला नहीं पड़ा। ऐसा ही हुआ। कुछ ही समय बाद जब ऑक्टेवियन सीजर के सैनिकों ने उस स्थान में प्रवेश किया तो उन्होंने दोनों की निर्जीव देह को देखा। उनकी देह पर सर्पदंश के चिह्न मौजूद थे किंतु त्वचा का रंग दमक रहा था। इतिहास के पन्नों में क्लियोपैट्रा की मृत्यु एक रहस्य बन कर रह गई। उसके बारे में तरह-तरह की बातें कही जाने लगीं।

कुछ लेखकों ने लिखा है कि जब क्लियोपैट्रा ने देखा कि ऑक्टेवियन की सेनाओं से बचा नहीं जा सकता तो उसने अंतिम दांव खेला। उसने रोमन सम्राट ऑक्टेवियन पर प्रेम का जाल फैंका। ऑक्टेवियन ने उसका प्रेम-प्रस्ताव स्वीकार कर लिया तथा क्लियोपैट्रा से कहा कि वह एंटोनी को मार डाले।

क्लियोपैट्रा ने एंटोनी को बहला-फुसलाकर साथ-साथ मरने के लिए तैयार किया और वह उसे एक समाधि भवन में ले गई। वहाँ क्लियोपैट्रा ने एक कोबरा सांप से अपने वक्ष पर दंश लगवाया जिसकी विष-थैली पहले ही निकाली जा चुकी थी। जनरल एंटोनी ने इस भ्रम में अपने जीवन का अंत कर लिया कि क्लियोपैट्रा आत्महत्या कर चुकी है। इस प्रकार एंटेानी मर गया और क्लियोपैट्रा बच गई।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि रोमन सम्राट ऑक्टेवियन ने भी क्लियोपैट्रा के साथ षड़यंत्र किया तथा मार्क के मरने के बाद एक जहरीले जंतु से कटवाकर क्लियोपैट्रा की भी हत्या कर दी। उस समय क्लियोपैट्रा केवल 39 वर्ष की थी किंतु उसके सौंदर्य का ढलान अभी बहुत दूर था।

कुछ इतिहासकार मानते हैं कि रानी क्लियोपैट्रा ने जनरल मार्क को धोखा नहीं दिया। उसने मार्क के सामने ही कोबरा से अपने शरीर पर दंश लगवाकर आत्महत्या की और जब मार्क ने देखा कि क्लियोपैट्रा मर गई है तब उसने भी आत्महत्या कर ली। वे दोनों जानते थे कि उन्हें ऑक्टेवियन के सैनिक इससे भी कहीं अधिक दर्दनाक एवं अपमान-जनक मृत्यु देंगे।

अधिकांश इतिहासकार मानते हैं कि क्लियोपैट्रा ने एक सर्प से अपने स्तन पर दंश लगवाकर आत्महत्या की थी जबकि बहुत कम इतिहासकार यह भी मानते हैं कि उसकी मौत मादक पदार्थ के सेवन से हुई थी। जर्मनी के एक शोधकर्ता ने दावा किया है कि क्लियोपैट्रा की मौत सर्पदंश से नहीं, बल्कि अफीम और हेम्लाक के मिश्रण के सेवन से हुई थी।

इस मिश्रण के प्रयोग से प्राण तुरंत निकल जाते थे तथा शरीर भी काला नहीं पड़ता था। जबकि सर्पदंश से प्राण निकलने में काफी समय लगता था और मृत्यु के समय शरीर काला पड़ जाता था।

रानी क्लियोपैट्रा के चित्रों एवं मूर्तियों के अवलोकन से मैंने यह पाया है कि उसका बायाँ वक्ष खुला रखा जाता है। इससे अनुमान होता है कि रानी ने अपने बाएं वक्ष पर सर्पदंश लगवाया होगा। रानी के चित्रों में खुला वक्ष इसी तरफ संकेत करता हुआ प्रतीत होता है।

अंतिम फराओ शासक थी क्लियोपैट्रा

यूनिवर्सिटी ऑफ ट्राइवर के इतिहासकार प्रोफेसर क्रिस्टॉफ शेफर ने अपने शोधपत्र में दावा किया है कि क्लियोपैट्रा का निधन ईसा-पूर्व 30 के अगस्त माह में हुआ था। क्लियोपैट्रा ने ईसा-पूर्व 51 से ईसा-पूर्व 30 तक मिस्र पर शासन किया था। वह मिस्र पर शासन करने वाली अंतिम फराओ शासक थी। वह यूनानी या कॉकेशियस (अफ्रीकी) रक्त-वंश की थी, इस पर आज तक बहस एवं शोध जारी है।

आधी यूनानी आधी अफ्रीकी

माना जाता रहा है कि क्लियोपैट्रा यूनानी मूल की थी किन्तु विशेषज्ञों ने उसकी बहिन आरसीनोए के अवशेषों के आधार पर यह पता लगाया है कि क्लियोपैट्रा के भाई-बहन आधे अफ्रीकी रक्त के थे। अर्थात् क्लियोपैट्रा शुद्ध रूप से यूनानी या कॉकेशियन (अफ्रीकी) नस्ल की नहीं थी बल्कि आधी यूनानी और आधी

अफ्रीकी नस्ल की थी। कुछ वर्ष पहले बीबीसी ने एक वृत्तचित्र ‘क्लियोपाट्रा पोर्ट्रेट ऑफ ए किलर’ प्रदर्शित किया था। इसमें तुर्की के इफेसस नामक स्थान पर बने एक मकबरे से प्राप्त मानव अवशेषों पर की गई खोज का विश्लेषण किया गया। इस मकबरे का फोरेंसिक तकनीक के साथ मानव विज्ञान और वास्तुशास्त्रीय अध्ययन करने के बाद विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हुए कि मकबरे में पाया गया नरकंकाल क्लियोपैट्रा की बहन राजकुमारी आरसीनोए (चतुर्थ) का है।

इस अध्ययन दल का नेतृत्व करने वाले ऑस्ट्रियाई विज्ञान अकादमी के पुरातत्व-विज्ञानी हाइक थुयेर के अनुसार क्लियोपैट्रा की बहन आरसीनोए (चतुर्थ) की माँ अफ्रीकन महिला थी। यह खुलासा एक सनसनीखेज बात है, जो टॉलेमी राजवंश के वैवाहिक सम्बन्धों पर नवीन प्रकाश डालता है।

किंवदन्तियों का संसार

इतिहास में क्लियोपैट्रा का उल्लेख अत्यंत सुंदर रानी के रूप में किया जाता है। क्लियोपैट्रा से सम्बन्धित खोजों के आधार पर यह भी दावा किया जाता है कि क्लियोपैट्रा प्रतिदिन 700 गधियों के दूध से नहाती थी जिससे उसकी त्वचा खूबसूरत बनी रहती थी। अनेक कलाकारों ने क्लियोपैट्रा के रूप-रंग और उसकी मादकता पर कई चित्र बनाए और मूर्तियां गढ़ीं।

रोमन इतिहास, ग्रीक काव्य तथा विश्व भर के साहित्य में वह इतनी लोकप्रिय हुई कि आगे चलकर विश्व की अनेक भाषाओं के साहित्यकारों ने उसे अपनी कृतियों की नायिका बनाया।

साहित्य में उसकी लोकप्रियता प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल और आधुनिक काल में भी लगातार बनी हुई है। अंग्रेजी साहित्य के तीन नाटककारों- शेक्सपियर, ड्राइडन और बर्नाड शॉ ने अपने नाटकों में उसके व्यक्तित्व के कई पहलुओं का विस्तार किया। सबसे पहला नाटक ई.1608 में विलियम शेक्सपीयर द्वारा ‘एण्टोनी एण्ड क्लियोपैट्रा’ शीर्षक से लिखा गया जो पिछले चार सौ सालों से पूरी दुनिया में पढ़ा और खेला जाता है।

दुनिया के अन्य लेखकों ने भी क्लियोपैट्रा पर नाटक लिखे और मंचित किए। क्लियोपैट्रा पर कई फिल्में भी बन चुकी हैं। दुनिया भर के कलाकारों ने क्लियोपैट्रा के रूप वर्णन के आधार पर मूर्तियाँ गढ़ीं जो बाजारों में ऊंची कीमतों पर बिकीं और संग्रहालयों की शोभा बनीं।

रोम, मिस्र तथा सीरिया में रानी क्लियोपैट्रा के चित्रों वाले सिक्के जारी किए गए। पूरी दुनिया में उसकी पेंटिंग बनाई गईं। आज संसार में जितने चेहरे और चित्र क्लियोपैट्रा के मिलते हैं, उतने शायद ही किसी अन्य रानी के मिलते हों।  क्लियोपैट्रा एक चतुर औरत थी और प्रभावशाली पुरुषों के राज जानने के लिए उनसे अंतरंग सम्बन्ध बनाती थी।

अपने शासन और अस्तित्व को बचाए रखने के लिए क्लियोपैट्रा ने हर दांव खेला। वह अनेक भाषाएँ बोल सकती थी और दूसरे देशों के राजदूतों से एक ही समय में उनकी भाषाओं में बात किया करती थी। क्लियोपैट्रा भारत के गरम मसालों, मलमल और मोतियों की दीवानी थी। वह इतनी अधिक धनी थी कि सिकंदरिया के बंदरगाह में भारतीय सामान के पूरे के पूरे जहाज खरीदा करती थी।

 क्लियोपैट्रा और मार्क एंटोनी विश्व इतिहास के दो ऐसे पात्र हैं, जिनकी प्रेम कहानी को अमर कहा जाता है किंतु निश्चित रूप से यह एक दुःखान्तिका है।

फराओ राजाओं के युग का अंत

रानी क्लियोपैट्रा की मौत के साथ ही मिस्र के इतिहास में एक साथ कई युग समाप्त होते हैं। वह यूनान से आए टॉलेमी वंश की अंतिम शासक थी इसलिए क्लियोपैट्रा के अंत के साथ ही मिस्र में यूनानी राजाओं के युग का अंत हो जाता है। वह अंतिम फराओ राजा थी, इसलिए मिस्र में फराओ राजाओं के युग का समापन हो जाता है।

इन्हीं फराओ राजाओं ने मिस्र में रहस्यमय विशाल पिरामिडों का निर्माण किया था तथा उनमें देवताओं के रहस्यों के साथ विपुल स्वर्ण छिपा दिया था। क्लियोपैट्रा मिस्र के इतिहास में पिछली तीन शताब्दियों से चल रहे ‘हैलेन्सिटिक युग’ की अंतिम शासक थी इसलिए उसके अंत के साथ हैलेन्सिटिक युग का भी अंत हो जाता है।

अब मिस्र एक स्वतंत्र राज्य न रहकर रोमन साम्राज्य का हिस्सा बन जाता है। जो रोम कुछ समय के लिए ही सही, कभी मिस्र के अधीन हुआ करता था, आज वही रोम, मिस्र का स्वामी बन गया।

जूलियस सीजर एवं क्लियोपैट्रा तो काल के गाल में समा गए किंतु उनके किस्से संसार भर में छा गए। आज सैंकड़ों साल बाद भी जूलियस सीजर एवं क्लियोपैट्रा संसार के इतिहास में जीवित हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महान् रोमन साम्राज्य का उदय (9)

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महान् रोमन साम्राज्य का उदय

जब रोमनगणराज्य का नैतिक पतन हो गया और रोमनगणराज्य बिखरने लगा तब महान् रोमन साम्राज्य की स्थापना का मार्ग स्वतः ही प्रशस्त होता चला गया। पूरी दुनिया राजतंत्र से गणतंत्र की ओर जाती है किंतु रोम के लोग गणतंत्र से तंग आकर राजतंत्र की ओर अग्रसर हुए।

प्रिन्सेप्स ऑगस्टस ऑक्टेवियन सीजर

जूलियस सीजर की हत्या ने रोम गणराज्य के पतन की गति को और भी तीव्र कर दिया। सीजर के दत्तक पुत्र ऑगस्टस ऑक्टेवियन जो कि सीजर के एक भाई का पौत्र था, ने तथा जूलियस सीजर के मित्र मार्क एण्टोनी ने जूलियस की हत्या का बदला लिया। सीजर के महल में उसकी रानी के रूप में रह रही क्लियोपैट्रा ने रोम के शासन पर अधिकार करने का प्रयास किया किंतु ऑक्टेवियन ने विद्रोह कर दिया जिसके कारण क्लियोपैट्रा रोम छोड़कर मिस्र चली गई।

ऑक्टेवियन रोमन सीनेट का सदस्य था। उसने  जूलियस सीजर की समस्त संतानों को मार दिया तथा कुछ वर्ष बाद सीनेट के दूसरे प्रमुख सदस्य मार्क एन्टोनी (क्लियोपैट्रा के अंतिम पति) को भी परास्त करके आत्मघात करने पर विवश कर दिया। इसके बाद ऑक्टेवियन ‘ऑगस्टस सीजर’ के नाम से सीनेट का प्रमुख बन गया तथा व्यावहारिक रूप में रोमन गणराज्य का एकछत्र राजा बन गया। इसी के साथ महान् रोम गणराज्य इतिहास के नेपथ्य में चला गया और राजतंत्र का उदय हो गया।

ऑक्टेवियन ने अपने नाम के साथ सीजर शब्द का प्रयोग किया ताकि लोग उसे जूलियस सीजर की ही शासन परम्परा का हिस्सा समझें। आगे चलकर ‘सीजर’ पारिवारिक उपनाम की बजाय सम्राट की पदवी के रूप में प्रयुक्त होने लगा। इस प्रकार 16 जनवरी ई.पू.27 को ऑक्टेवियन रोमन साम्राज्य का पहला निरंकुश राजा बन गया।

सीनेट काम करती रही किंतु उसके हाथों में शासन की कोई शक्ति नहीं रह गई और रोम गणराज्य से साम्राज्य बनने की तरफ अग्रसर हुआ। प्रारम्भ में उसने ‘प्रिन्सेप्स सीनेटुअस’ की उपाधि धारण की जिसका अर्थ होता है ‘सीनेट में सबसे प्रथम।’ कुछ समय बाद उसने ‘प्रिन्सेप्स सिविटैटिस’ की उपाधि धारण की जिसका अर्थ होता है ‘नागरिकों में सबसे प्रथम।’

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कुछ समय बाद उसने ‘इम्परेटर‘ की उपाधि धारण की जिसका अर्थ होता है- ‘आदेश देने वाला।’ अब वह ‘सीजर डिवि फिलियस ऑगस्टस’ के नाम से रोम का शासक बना। उसने अपने राज्य को ‘किंगडम’ (राज्य) न कहकर ‘प्रिंसीपेट’ कहा किंतु शासन के अधिकार पूरी तरह अपने अधीन कर लिए और निरंकुश राजा बन गया। ऑगस्टस के पिता जूलियस सीजर ने कभी भी स्वयं को ‘किंग’ अर्थात् राजा नहीं कहा उसी तरह ऑगस्ट सीजर ने भी स्वयं को ‘किंग’ नहीं कहा किंतु इस शब्द का प्रयोग नहीं करने के पीछे दोनों के कारण अलग-अलग थे। जूलियस सीजर रोमन गणराज्य की प्रचलित परम्परा के कारण स्वयं को ‘किंग’ कहलाने में संकोच करता था जबकि ऑगस्ट सीजर ‘किंग’ के पद को अपने योग्य नहीं समझता था। इसलिए उसने ‘इम्परेटर’ अर्थात् ‘आदेश देने वाला’ की उपाधि ग्रहण की। यही शब्द अंग्रेजी भाषा में ‘एम्परर’ बन गया। ऑक्टेवियन ने 44 साल तक शासन किया। इतिहासकारों एवं समकालीन कवियों ने उसके शासनकाल को रोम के इतिहास का स्वर्ण-युग कहा है। उनके अनुसार उसके राज्य में भले लोगों को पुरस्कार एवं अपराधियों को कड़ा दण्ड दिया जाता था। इसी रोमन सम्राट के शासनकाल में महान् रोमन साम्राज्य के नासरत नामक शहर में ईसा मसीह का जन्म हुआ था।

जूलियस सीजर की हत्या, उसके बाद उसके शत्रुओं की हत्या, मार्क एंटोनी द्वारा आत्मघात, जूलियस के समस्त पुत्र-पुत्रियों की हत्या के सिलसिले के कारण रोम में गृहयुद्ध छिड़ गया। दूसरे देशों में स्थित बहुत से रोमन गवर्नर एवं वहाँ के राजा रोम से अलग हो गए। इस कारण रोमन प्रातों (रीजन) की संख्या 50 से घटकर केवल 28 रह गई।

इम्प्रेटर ऑगस्टस सीजर ने अपनी सेनाओं को इल्लीरिया, मोएसिया, पैन्नोनिया और जर्मेनिया नामक राज्यों पर चढ़ाई करने के आदेश दिए। उसके प्रयासों से रोमन साम्राज्य फिर से फैल गया तथा राइन और डैन्यूब नदियाँ उत्तर में रोमन साम्राज्य की नई सीमा-रेखा बन गईं।

उसने यूरोप के अधिकांश भागों, उत्तरी अफ्रीका तथा पश्चिमी एशिया के भूभागों को भी जीत लिया। ऑक्टेवियन के काल में रोम में वर्जिल, आविद, होरेस आदि कई विख्यात लैटिन लेखक हुए जिन्होंने ऑक्क्टेवियन के शासन की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की है।

इसका कारण यह है कि ऑक्टेवियन से पहले के रोमन गणराज्य में सीनेट के सदस्यों एवं सेनापतियों के बीच गहरे संघर्ष एवं घृणित षड़यंत्र चला करते थे जिन पर ऑक्टेवियन ने पूरी तरह विजय प्राप्त करके राज्य में शांति स्थापित कर दी थी। इस कारण महान् रोमन साम्राज्य में व्यापार फलने-फूलने लगा था और जन-सामान्य पर होने वाले अत्याचारों में भारी कमी आई थी।

रोमन भेड़ें देती हैं साल में दो बार बच्चे

रोमन महाकवि ‘वर्जिल’ ने इसी काल में ‘ईनिद’ नामक काव्य की रचना की जिसे इटली का राष्ट्रीय महाकाव्य माना जाता है। वर्जिल ने इस महाकाव्य में इस काल में इटली की सम्पन्नता की प्रशंसा करते हुए लिखा है-

ईरान अपने सुंदर और घने वनों सहित,

अथवा गंगा अपनी जलप्लावित लहरों सहित,

अथवा हरमुश नदी जिसके कणों में सोना मिलता है,

इनमें से कोई इटली की समता नहीं कर सकते,

इटली जहाँ सदा बसंत रहता है,

जहाँ भेड़ें वर्ष में दो बार बच्चे देती हैं और

जहाँ वृक्ष वर्ष में दो बार फल देते हैं।

दुनिया में छा गए इम्परेटर और सीजर

ऑक्टेवियन ने सीनेट में तथा प्रजा के बीच स्वयं को इतना महत्त्वपूर्ण बना लिया कि प्रजा के बीच वह देवता के रूप में स्थापित हो गया। उसके जीवन काल में ही उसकी पूजा होने लगी। इस कारण ‘इम्परेटर’ की उपाधि ‘किंग’ से भी ऊँची समझी जाने लगी। कुछ समय बाद ‘इम्परेटर’ शब्द ‘एम्परर’ में बदल गया तथा ‘सीजर’ को ‘एम्परर’ का पर्यायवाची माना जाने लगा।

इस कारण यूरोप के बहुत से देशों के राजा स्वयं को एम्परर एवं सीजर कहलाना पसंद करने लगे। सीजर शब्द ही जर्मनी में ‘कैसर’ तथा रूस में ‘जार’ बन गया। बाद में जब रोम साम्राज्य का विभाजन हुआ और पूर्वी रोमन साम्राज्य मुसलमानों के अधीन चला गया तो कुस्तुंतुनिया का मुस्लिम शासक स्वयं को ‘कैसेरे रूम’ कहता था। इंग्लैण्ड की क्वीन विक्टोरिया तथा एम्परर जॉर्ज पंचम को ‘कैसरे हिन्द’ की उपाधि दी गई थी।

सम्राट टाइबेरियस

19 अगस्त 14 को 75 वर्ष की आयु में ऑगस्टस सीजर की मृत्यु हो गई तथा टाइबेरियस रोम का इम्प्रेटर हुआ। वह ऑगस्टस सीजर की तीसरी पत्नी के, पहले विवाह से पैदा हुआ था। अर्थात् उसका पिता ऑगस्टस सीजर नहीं था। टाइबेरियस का शासन अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा। टाइबेरियस के शासनकाल में येरूशलम में ईसा मसीह को उपद्रवी एवं धर्म-विरोधी घोषित करके सूली पर लटकाया गया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ईसा मसीह को सूली (10)

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ईसा मसीह को सूली

जेरूसलम और रोमन साम्राज्य में ईसा मसीह को सूली उस समय इतनी महत्त्वहीन थी कि रोमवासियों को तो कुछ पता ही नहीं चला कि उनके साम्राज्य के एक गवर्नर ने ‘प्रभु के पुत्र’ को सूली पर चढ़ाया है। यहाँ तक कि जेरूसलम में भी कोई हलचल नहीं हुई।

ईसा मसीह का जन्म ईस्वी 4 में होना माना जाता है। वे नासरत के एक यहूदी परिवार में पैदा हुए। उनके जन्म से पहले ही जूलियस सीजर का उत्तराधिकारी प्रिन्सेप्स ऑगस्टस ऑक्टेवियन सीजर ‘महान् रोमन साम्राज्य’ की स्थापना कर चुका था। ईसा मसीह का जन्म स्थल नासरत इसी विशाल रोमन साम्राज्य में स्थित था। ईसाई मानते हैं कि ईसा मसीह ही वह मसीहा है जिसके बारे में यहूदियों के धर्मग्रंथ ‘तनख़’ में लिखा है कि यहूदी धर्म में एक मसीहा जन्म लेगा जो ईश्वर का दूत होगा तथा यहूदियों का उद्धार करेगा।

ईसा मसीह का जन्म ईश्वरीय अनुकम्पा से एक कुंवारी माता के गर्भ से हुआ था। ईसा मसीह ने गैलिली नामक शहर में अपने विचारों का प्रचार आरम्भ किया। मध्य एशिया के बहुत से देशों, भारत के लद्दाख एवं कश्मीर प्रांतों एवं तिब्बत क्षेत्र के निवासियों में मान्यता है कि ईसा मसीह भ्रमण करते हुए उनके यहाँ भी आए थे।

धरती के विभिन्न स्थानों का भ्रमण करते हुए ईसा मसीह तीस वर्ष की आयु के बाद यहूदियों के मुख्य केन्द्र जेरूसलम पहुँचे जहाँ उन्होंने अपने विचारों का प्रचार करना आरम्भ किया। कुछ यहूदियों को आशा बंधी कि यही वह मसीहा है जिसकी प्रतीक्षा यहूदियों को पिछले दो हजार सालों से है।

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यहूदियों को अपनी कल्पनाओं के मसीहा से आशा थी कि वह यहूदियों को धन-ऐश्वर्य एवं सुख प्रदान करेगा तथा उन संकटों का निवारण करेगा जिनके कारण यहूदी सदैव दुनिया के अन्य धर्मों के मतावलम्बियों के निशाने पर रहते थे किंतु यीशू ने यहूदियों के काल्पनिक स्वर्ग का विरोध किया तथा उन कहानियों का भी विरोध किया जिनके अनुसार मनुष्यों को स्वर्ग की प्राप्ति के लिए अपना सर्वस्व लुटा देना चाहिए। यहूदियों को यह देखकर निराशा हुई कि ईसा मसीह यहूदी धर्म में प्रचलित कर्मकाण्डों, व्रत-उपवासों तथा अमीरों एवं पाखण्डियों की बातों का विरोध कर रहे हैं। इसलिए उन्होंने यीशू को पकड़कर येरूशमल के रोमन गवर्नर पॉन्टियस पाइलेट के न्यायालय में प्रस्तुत किया तथा उन पर धर्म के प्रति विद्रोह करने का मुकदमा चलाया। रोमन साम्राज्य बहुत विशाल था तथा उसमें बहुत से धर्मों एवं विश्वासों के लोग रहते थे। इसलिए रेाम के सम्राट धर्म के मामले में संकीर्ण विचारों वाले नहीं थे। यहाँ तक कि यदि कोई व्यक्ति रोमन देवी-देवताओं को गाली देता था तो भी उसे सजा नहीं दी जाती थी। तत्कालीन रोमन सम्राट टाइबेरियस का कहना था कि ‘यदि कोई व्यक्ति देवी-देवताओं का अपमान करता है तो देवी-देवताओं को उनसे स्वयं ही निबट लेने दो।’

इसलिए जब यीशू को पकड़कर रोमन गवर्नर पॉन्टियस पाइलेट के समक्ष प्रस्तुत किया गया तो उसने इस मामले के धार्मिक पक्ष की बिल्कुल भी चिंता नहीं की। यीशू को जहाँ यहूदी-धर्मावलम्बी धर्म-द्रोही समझते थे, वहीं रोमन साम्राज्य के अधिकारी उन्हें राजनीतिक-विद्रोही तथा यूनानी-धर्मावलम्बी सामाजिक-विद्रोही समझते थे। अतः यीशू पर इन सब मिले-जुले आरोपों के लिए मुकदमा चलाया गया।

रोमन गवर्नर के न्यायालय द्वारा यीशू को मृत्यु-दण्ड की सजा सुनाई तथा गोलगोथा नामक स्थान पर ईसा मसीह को सूली पर लटकाया गया। पीड़ा के इन निर्दयी क्षणों में में यीशू के अपनों ने भी उन्हें छोड़ दिया। इस विश्वासघात ने यीशू की पीड़ा को इतना असह्य बना दिया कि उनके मुँह से निकला- ‘मेरे ईश्वर! मेरे ईश्वर! तूने मुझे क्यों त्याग दिया है!’

जेरूसलम और रोमन साम्राज्य में ईसा मसीह को सूली उस समय इतनी महत्त्वहीन थी कि रोमवासियों को तो कुछ पता ही नहीं चला कि उनके साम्राज्य के एक गवर्नर ने ‘प्रभु के पुत्र’ को सूली पर चढ़ाया है। यहाँ तक कि जेरूसलम में भी कोई हलचल नहीं हुई।

तब रोम में कोई भी यह नहीं सोच सकता था कि आने वाली शताब्दियों में रोम ही प्रभु के इस पुत्र के नाम पर भविष्य में चलाए जाने वाले नए धर्म की सबसे बड़ी राजधानी बनेगा तथा रोम के चर्च का एक ईसाई बिशप ही पोप के नाम से विश्व भर के समस्त ईसाई-राजाओं एवं ईसाई-जनता को अनुशासित करेगा तथा उन्हें दण्डित अथवा पुरस्कृत करने की सामर्थ्य रखने वाला होगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महान् रोमन शासक (11)

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महान् रोमन शासक

जिन राजाओं, राजकुमारों, रानियों एवं राजकुमारियों को महान् रोमन शासक कहा जाता है, वे वास्तव में कितने महान् थे, इसका विवरण तत्कालीन इतिहास की पुस्तकों से मिलता है। उनमें अधिकांश अपने ही वंश के रक्त के प्यासे, हत्यारे, लालची एवं बहुत छोटे दिमागों वाले मनुष्य थे किंतु उनकी कथाओं को इतना बढ़ा-चढ़ाकर लिख गया कि रोम के राजा-रानी महान् रोमन शासक कहलाने लगे।

16 मार्च 37 को ऑगस्टस सीजर के प्रपौत्र कैलिगुला ने तत्कालीन रोमन सम्राट टाइबेरियस की हत्या कर दी। उस समय टाइबेरियस की आयु 77 वर्ष थी। उसके बाद कैलिगुला इम्प्रेटर हुआ। वह केवल पौने चार साल ही शासन कर सका। 24 जनवरी 41 को मात्र 28 वर्ष की आयु में सीनेट के सदस्यों एवं उसके अंगरक्षकों द्वारा सम्राट कैलिगुला की हत्या कर दी गई।

इंग्लैण्ड पर रोमन सेनाओं का अधिकार

अब सीजर परिवार का एक मात्र जीवित वारिस कैलिगुला का चाचा क्लाउडियस (प्रथम) अर्थात् ऑगस्टस सीजर का पौत्र रोम का शासक बना। अब तक यूरोप के जर्मनी, गॉल (फ्रांस) तथा इटली आदि देश महान् रोमन साम्राज्य के अधीन रहते आए थे किंतु क्लाउडियस ने ई.43 में ब्रिटेन पर विजय प्राप्त करके उसे भी रोमन उपनिवेश बना दिया। वह लगभग 14 साल तक रोम पर शासन करता रहा।

राजकुमारी ऐग्रिप्पिना

ऑगस्टस सीजर की प्रपौत्री ऐग्रिप्पिना अत्यंत महत्त्वाकांक्षिणी राजकुमारी थी। उसका विवाह किसी रोमन सामंत से हुआ था जिससे उसे ‘नीरो‘ नामक एक पुत्र हुआ। ऐग्रिप्पिना ने नीरो को रोम का एम्परर बनाने के लिए अपने पति को छोड़ दिया तथा रोम के सम्राट क्लाउडियस (प्रथम) से विवाह कर लिया जो कि राजकुमारी ऐग्रिप्पिना का मामा भी था। ऐग्रिप्पिना ने सम्राट को इस बात के लिए सहमत कर लिया कि क्लाउडियस के बाद नीरो ही रोम का सम्राट होगा।

क्लाउडियस ने नीरो को अपना दत्तक पुत्र मान लिया तथा उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। ई.54 में ऐग्रिप्पिना ने 64 वर्षीय सम्राट क्लाउडिअस को जहर दिलवाकर उसकी हत्या कर दी और अपने पुत्र नीरो को रोम का सम्राट बना दिया।

नीरो

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रोमनवसियों ने नीरो का स्वागत और समर्थन किया क्योंकि वह पितृ-परम्परा और मातृ-परम्परा दोनों से सम्राट् आगस्टस का वंशज था। अपने शासन काल के आरम्भ में नीरो ने अपने गुरु ‘सेनेका’ के मार्गदर्शन में राज्य का शासन किया किंतु शीघ्र ही नीरो में दुर्गुण प्रकट होने लगे। ई.55 में उसने अपने प्रतिद्वंद्वी ‘ब्रिटेनिकस’ को जहर देकर मरवा डाला जो स्वर्गीय सम्राट क्लाडिअस का अपना पुत्र होने के कारण राज्य का वास्तविक अधिकारी होने का दावा कर रहा था। चार वर्ष बाद नीरो ने अपनी माता ‘ऐग्रिप्पिना’ की भी हत्या करा दी। फिर उसने अपनी पत्नी ‘आक्टेविया’ को भी मरवा डाला और एक दिन अपनी दूसरी स्त्री ‘पापीया’ को भी क्रोध में आकर मार डाला। उसने एक तीसरी स्त्री से विवाह करना चाहा परन्तु उस स्त्री ने मना कर दिया। इस पर नीरो ने उसे भी मौत के घाट उतार दिया गया। इसके बाद नीरो ने एक और स्त्री के पति को मरवा डाला ताकि वह उसे अपनी पत्नी बना सके। एक षड़यंत्र का सुराग पाकर उसने अपने गुरु सेनेका को आत्महत्या करने का आदेश दिया। सम्राट नीरो ने इन लोगों के अतिरिक्त और भी कई प्रसिद्ध स्त्री-पुरुषों को मृत्युदंड दिया। सम्राट के इन दुर्गुणों के कारण राज्य में उसके प्रति असंतोष बढ़ने लगा।

फिर भी वह एक शक्तिशाली राजा था जिसका जनता कुछ भी नहीं कर सकती थी। नीरो ने ई.58-63 के बीच पार्थियनों (फारसी साम्राज्य) के साथ शांति समझौता कर लिया। यह उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

सेंट पीटर का रोम में प्रवेश

यीशू के 12 शिष्यों में से एक ‘सेंट पीटर’ ईसा की मृत्यु के बाद रोम आए। सेंट पीटर ही रोम के चर्च के पहले बिशप हुए। इस कारण दुनिया भर के ईसाइयों की दृष्टि में रोम एक पवित्र शहर हो गया तथा रोम के चर्च के बिशप, दुनिया भर के चर्चों के बिशपों में विशेष महत्त्व के माने जाने लगे। उस समय रोम में नीरो का शासन था। नीरो ने ई.64 अथवा ई.68 में सेंट पीटर को फांसी पर चढ़ा दिया क्योंकि सेंट पीटर प्राचीन रोमन धर्म के स्थान पर ईसाई धर्म के प्रचार का प्रयास कर रहे थे।

सेंट पीटर का शरीर रोम नगर के मध्य में वेटिकन सिटी के चर्च में दफनाया गया जिसे अब ‘सेंट पीटर बेसिलिका’ तथा ‘पापल बेसिलिका ऑफ सेंट पीटर इन वेटिकन सिटी’ कहा जाता है। वेटिकन सिटी अब एक स्वतंत्र देश के रूप में स्थित है।

यद्यपि सेंट पीटर प्रभु यीशू के प्रिय शिष्यों में से एक थे तथापि उस काल में रोम के लोगों पर सेंट पीटर अथवा उनके चर्च का विशेष प्रभाव नहीं पड़ सका क्योंकि रोम के शासक ईसाई धर्म के विरुद्ध थे और प्राचीन रोमन धर्म में आस्था रखते थे। यही कारण है कि अगले लगभग ढाई सौ साल तक रोमवासी अपने प्राचीन रोमन धर्म को मानते रहे।

रोम में आग और नीरो का वायलिन-वादन

मान्यता है कि नीरो बहुत विचित्र स्वभाव का राजा था। ई.64 में रोम नगर में अत्यंत रहस्यमय ढंग से आग की लपटें भड़क उठीं जिनसे आधे से अधिक नगर जलकर राख हो गया। कहा जाता है कि जब रोम धू-धू करके जल रहा था, तब नीरो एक स्थान पर खड़ा होकर वायलिन बजा रहा था। आग बुझ जाने के बाद नीरो ने नगर के पुनर्निर्माण का कार्य आरंभ किया और अपने लिए ‘स्वर्ण मंदिर’ नामक भव्य प्रासाद बनवाया। मंदिर निर्माण के लिए धन प्राप्त करने हेतु जनता पर कर-भार बढ़ा दिया गया। इससे जनता में भी अपने राजा के विरुद्ध असंतोष फैल गया।

राज्य में चारों ओर फैले असंतोष का लाभ उठाने के लिए स्पेन के रोमन गवर्नर ने अपनी फौजों के साथ रोम पर हमला बोल दिया। नीरो की अंगरक्षक सेना भी विद्रोही गवर्नर के साथ मिल गई। इस कारण नीरो को राज्य से पलायन करना पड़ा। इसी बीच सिनेट ने उसे फाँसी पर चढ़ा देने का निर्णय किया। गिरफ्तारी के अपमान से बचने के लिए 9 जून 68 को केवल 30 वर्ष की आयु में नीरो ने आत्महत्या कर ली।

जूलियस सीजर के वंश का अंत

नीरो के बाद ‘गायस’ नामक एक युवक ‘जूलियस सीजर ऑक्टावियानस’ के नाम से रोम की राजगद्दी पर बैठा किंतु कुछ दिन बाद ही उसे हटा दिया गया। इसके साथ ही रोम से जूलियस सीजर के वंश का शासन समाप्त हो गया। इसके बाद रोम में अराजकता छा गई और गृहयुद्ध छिड़ गया।

फ्लेवियन वंश

ई.68 में रोम में फ्लेवियन वंश की स्थापना हुई किंतु यह वंश केवल ई.96 तक ही शासन कर सका। 8 जून 68 को 71 वर्षीय गल्बा रोमन सम्राट हुआ किंतु केवल 7 माह बाद 15 जनवरी 69 को उसके अंगरक्षकों द्वारा उसकी हत्या कर दी गई। हत्यारों का नेतृत्व ओथो नामक एक सैन्य अधिकारी ने किया। वही रोम का अगला राजा हुआ। वह केवल 91 दिन ही शासन कर सका।

विटिलियस नामक एक योद्धा ने विद्रोह कर दिया। दोनों पक्षों में हुई लड़ाई में ओथो हार गया और उसने 16 अप्रेल 69 को 36 वर्ष की आयु में आत्मघात कर लिया। विटिलयस अगला राजा हुआ किंतु वह केवल 8 महीने ही शासन कर सका। उसे वेस्पेसियन की सेना ने मार डाला। वेस्पेसियन ने साढ़े नौ साल रोम पर शासन किया। उसने जनता पर करों को कम करके राज्य में नगारिक असंतोष को शांत किया तथा सेना में अनुशासन स्थापित किया।

उसके समय में रोम में विशाल कोलोजियम का निर्माण हुआ। उसके समय में रोम का कोई व्यक्ति किसी का कर्जदार नहीं था। उसने स्पेन के शासन में भी सुधार किए। उसने अपने पुत्र टाइटस को सह-सम्राट बनाया। 24 जून 79 को 69 वर्ष की आयु में वेस्पेसियन की मृत्यु हो गई तथा टाइटस रोम का शासक हुआ।

उसके समय में रोमन साम्राज्य में बड़ा ज्वालामुखी फटा। सम्राट टाइटस ने इस विपत्ति में प्रजा की बड़ी सहायता की जिससे वह प्रजा में बहुत लोकप्रिय हो गया। 13 सितम्बर 81 को मात्र 41 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो गई तथा वैस्पेसियन का दूसरा पुत्र डोमिशियन अगला राजा हुआ। वह 15 साल तक शासन करता रहा। 12 सितम्बर 96 को मात्र 44 वर्ष की आयु में उसके दरबारियों ने उसकी हत्या कर दी। उसके साथ ही फ्लैवियन राजवंश की समाप्ति हो गई। 

नेरवा-एण्टोने राजवंश

ई.96 में नेरवा-एण्टोने राजवंश की स्थापना हुई। इस वंश ने ई.192 तक शासन किया किंतु ई.96-180 के काल को पाँच अच्छे सम्राटों का काल कहा जाता है जिन्होंने साम्राज्य में शांतिपूर्ण ढंग से शासन किया। पूर्व में स्थित पार्थियन साम्राज्य से भी उनके सम्बन्ध शांति-पूर्ण बने रहे।

हालांकि फारसियों  (ईरानियों) से अर्मेनिया तथा मेसोपोटामिया (इराक) में इन रोमन सम्राटों के युद्ध हुए पर उनकी विजयों और शांति समझौतों से साम्राज्य का विस्तार बना रहा। इसे नेरवा-एण्टोने राजवंश कहा जाता है। इस वंश का पहला शासक नेरवा था जिसे सीनेट द्वारा सम्राट नियुक्त किया गया। केवल सवा साल के बाद 67 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो गई।

महान् रोमन साम्राज्य का चरम

नेरवा के दत्तक पुत्र ट्राजन को महान् विजेता माना जाता है। उसके समय रोमन सेनाओं ने डेसिया, अरब, मेसोपोटामिया और अर्मेनिया पर विजय प्राप्त की तथा उसके काल में महान् रोमन साम्राज्य अपने चरम विस्तार को प्राप्त कर गया। उसे सीनेट ने सर्वश्रेष्ठ एम्परर का सम्मान दिया। वह लगभग 20 साल तक रोम पर शासन करता रहा। 7 अगस्त 117 को 63 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हुई।

ट्राजन के उत्तराधिकारी हैड्रियन के काल में रोम में वास्तुकला अपने चरम पर पहुँच गई। उसके समय में रोम में विशाल भवनों का निर्माण हुआ तथा भवनों के नए डिजाइन विकसित हुए।

ईसाई धर्म को रोकने के प्रयास

हैड्रियन के बाद एण्टोनियस पायस तथा उसके बाद ल्यूसियस वेरस सम्राट हुए। ल्यूसियस ने मार्कस ऑरलियस को सह-सम्राट बनाया। मार्च 169 में 39 वर्ष की आयु में प्लेग हो जाने से ल्यूसियस की मृत्यु हो गई। उसके उत्तराधिकारी मार्कस ऑरलियस को रोम के महान् विचारक राजा के रूप में ख्याति प्राप्त हुई।

उसने राज्य में बढ़ रहे ईसाई धर्म को रोकने के बड़े प्रयास किए तथा ईसाई प्रचारकों को कठोर दण्ड दिए। वह 19 साल तक शासन करता रहा तथा 58 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हुई। उसने अपने पुत्र कॉमोडोस को सह-शासक बनाया।

नेरवा-एण्टोने राजवंश की समाप्ति

ई.180 में कॉमोडोस रोम का शासक बना। वह अपने पिता के काल में तीन साल सह-शासक तथा उसके बाद 12 साल तक एकल शासक के रूप में शासन करता रहा। उसका शासन पहले तो शांतिपूर्ण रहा परन्तु बाद में उसके विरुद्ध विद्रोह होने लगे और उसकी हत्या के प्रयत्न हुए। इस कारण उसने भी कुछ विद्रोहियों पर अत्याचार किए।

इससे राज्य में गृहयुद्ध छिड़ गया। 31 दिसम्बर 192 को उसके अंगरक्षकों ने उसे महल में ही घेर लिया तथा स्नानागार में गला घोंट कर मार डाला। उसके साथ ही नेरवा-एण्टोने राजवंश की समाप्ति हो गई।

उसके बाद 1 जनवरी 193 को प्रीटोरियन गार्ड द्वारा परटीनैक्स को राजा बनाया गया। उसे 86 दिन के शासन के बाद ही उसके अंगरक्षकों ने मार डाला। अगले राजा डिडियस जूलियानस को केवल 65 दिन ही शासन करने दिया गया तथा सीनेट ने उसे मुकदमा चलाकर मरवा दिया। इस कारण रोमन साम्राज्य में अराजकता उत्पन्न हो गई। महान् रोमन शासक इस अराजकता को नहीं रोक सके।

सेवरन वंश

ई.193 से 235 तक रोम में सेवरन वंश का शासन रहा। मात्र 42 वर्ष की अवधि में इस वंश के 6 राजा रोम की गद्दी पर बैठे। 9 अप्रेल 193 को रोमन सेनाओं ने अपने कमाण्डर सेप्टिमियस सेवेरस को रोम का सम्राट घोषित कर दिया। सेप्टिमियस सेवेरस का जन्म उत्तरी अफ्रीका में हुआ था तथा उसने अपना जीवन एक सैनिक के रूप में आरम्भ किया था। शीघ्र ही वह एक सैनिक कमाण्डर बन गया।

जब उसकी सेना ने उसे रोम का सम्राट घोषित कर दिया तो उसने राज्य पर अधिकार करने के लिए राजधानी रोम में प्रवेश किया। एक भी व्यक्ति उसका विरोध करने के लिए नहीं आया। आगे चलकर वह रोमन साम्राज्य का सबसे सफल सम्राट सिद्ध हुआ।

उसने नागरिकों एवं सामंतों के दंगों और षड्यंत्रों को दबा दिया। वह 18 साल तक रोम पर शासन करता रहा। उसने अपने पुत्र कैराकैला को सह-शासक बनाया। 65 वर्ष की आयु में ई.211 में सेप्टिमियस सेवेरस की मृत्यु हुई तथा उसका पुत्र कैराकैला रोम का शासक हुआ। उसने अपने भाई गेटा को सह-शासक बनाया।

केवल 10 माह बाद ही कैराकैला के आदेश से गेटा की हत्या कर दी गई। कैराकैला 6 साल तक ही शासन कर पाया। केवल 29 वर्ष की आयु में एक सैनिक द्वारा उसकी हत्या कर दी गई। उसकी हत्या के लिए राज्य में बड़ा षड़यंत्र रचा गया।

उसकी अंगरक्षक सेना का प्रमुख मैकरीनस इस षड़यंत्र में शामिल था। कैराकैला की हत्या हो जाने के बाद मैकरीनस रोम का शासक हुआ। उसने अपने 10 वर्षीय पुत्र डियाड्युमेनियन को सह-शासक बनाया।

13 माह के संक्षिप्त शासन के बाद ही सीनेट ने बाप-बेटे को मुकदमा चला कर हटा दिया तथा 14 साल के लड़के एल्गाबैलस को सम्राट बनाया।

चौदह वर्षीय एल्गाबैलस सेप्टिमियस सेवेरस के भाई का पोता था। कैराकैला के बाद एल्गाबैलस को ही शासक बनया जाना था किंतु उस समय उसे यह आरोप लगाकर राजगद्दी से वंचित कर दिया गया था कि वह कैराकैला का अवैध पुत्र था। अब एल्गाबैलस को सीरियाई सेनाओं की सहायता प्राप्त हो गई थी अतः उनके बल पर वह रोम का राजा बन गया किंतु पौने चार साल के शासन के बाद उसे भी रोमन अंगरक्षक सेना ने मार डाला।

उस समय उसकी आयु केवल 18 वर्ष थी। इसके बाद सेप्टिमियस सेवेरस के भाई का अन्य पोता सेरेवस एलैक्जेण्डर जो कि एलगाबैलस का चचेरा भाई था, गद्दी पर बैठा। वह 13 साल तक रोम पर शासन करता रहा किंतु उसे भी 18 मार्च 235 को 27 साल की आयु में अंगरक्षक सेना द्वारा मार डाला गया।

सेवेरन वंश के समय रोम के समस्त प्रांतों एवं उपनिवेशों के नागरिकों को रोमन नागरिकता दी गई। यह वंश ई.235 तक महान् रोमन साम्राज्य पर शासन करता रहा। इसके बाद रोम में संकट का काल आया। पूर्व में फारसी साम्राज्य शक्तिशाली होता जा रहा था। साम्राज्य के अन्दर भी गृहयुद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई थी।

गोर्डियन वंश

 ई.235 में रोम में गोर्डियन राजवंश की स्थापना हुई। यह वंश केवल 50 वर्ष तक रोम पर शासन कर सका। इस वंश के पहले शासक मैक्सीमिनस थ्रैक्स को केवल सवा तीन साल के शासन के बाद अंगरक्षक सेना ने मार डाला। इसके बाद गोर्डियन (प्रथम) रोम का राजा हुआ। राजसिंहासन पर बैठने के कुछ दिनों बाद उसे अपने पुत्र गोर्डियन (द्वितीय) की कार्थेज के युद्ध में मृत्यु होने का समाचार मिला। यह सुनकर गोर्डियन (प्रथम) ने आत्मघात कर लिया।

उस दिन उसे राजसिंहासन पर बैठे हुए केवल 21 दिन हुए थे। गोर्डियन के बाद 73 वर्षीय प्यूपीनस रोम का राजा हुआ किंतु 97 दिन बाद ही उसे अंगरक्षक सेना ने मार डाला। उसके बाद बल्बीनस रोम का सम्राट हुआ किंतु उसे केवल 93 दिन बाद ही रोम की अंगरक्षक सेना ने मार डाला।

इसके बाद गोर्डियन (तृतीय) सिंहासन पर बैठा। वह गोर्डियन (प्रथम) का पौत्र तथा गोर्डियन (द्वितीय) का भतीजा था। वह लगभग 6 साल तक राज्य करता रहा किंतु केवल 19 वर्ष की आयु में अंगरक्षकों की सेना के प्रमुख फिलिप अरब (प्रथम) के षड़यंत्र के कारण मार दिया गया।

उसके बाद फिलिप अरब (प्रथम) राजसिंहासन का अधिकारी हुआ। उसने अपने पुत्र फिलिप (द्वितीय) को सहशासक बनाया। फिलिप अरब पाँच साल तक ही शासन कर पाया था कि अपने सामंत डेसियस के विरुद्ध वेरोना के युद्ध में लड़ते हुए मारा गया। उसके पुत्र फिलिप (द्वितीय) को उसके अंगरक्षकों ने मार डाला।

सितम्बर 249 में डेसियस रोम का शासक हुआ। उसने अपने पुत्र हेरेनियस एट्रुस्कस को सह-शासक बनाया। जून 251 में ये दोनों ही ‘गोथ’ नामक जर्मन कबीले की सेना से लड़ते हुए मारे गए। इसके बाद डेसियस के दूसरे पुत्र हॉस्टिलियन को सीनेट ने उसका उत्तराधिकारी मान लिया किंतु वह भी केवल 4-5 माह के शासन के बाद मात्र 21 वर्ष की आयु में मृत्यु को प्राप्त हुआ।

उसके बाद मोएसिया का गवर्नर ट्रेबोनियानस गैलुस ई.251 में गद्दी पर बैठा। उसने अपने पुत्र वोल्यूसियानस को सह-शासक घोषित किया किंतु 2 साल बाद ही सम्राट ट्रेबोनियानस को उसके अपने सैनिकों ने मार डाला तथा एमीलियन शासक हुआ। उसने गोथों पर भारी विजय प्राप्त की थी किंतु वह भी 2 माह बाद उसके अपने सैनिकों द्वारा मार डाला गया।

अब नॉरीकम एवं रेटिया का गवर्नर वेलेरियन रोम का राजा हुआ। उसे सात साल शासन करने के बाद 65 वर्ष की आयु में पर्सियन सेना द्वारा ऐडेसा के युद्ध में बंदी बना लिया गया, बंदी अवस्था में ही उसकी मृत्यु हुई। उसके बाद वेलेरियन का पुत्र गैलीनस रोम का सम्राट हुआ।

उसने अपने पुत्र सैलोनस को सह-शासक बनाया। गैलीनस को 15 साल के शासन के बाद ई.268 में 50 वर्ष की आयु में एक्वीलिया में अपने ही सेनापतियों द्वारा मार डाला गया। गैलीनस के दूसरे पुत्र क्लॉडियस गॉथिकस ने सिंहासन पर अधिकार कर लिया।

वह लगभग डेढ़ साल शासन करने के बाद प्लेग से मर गया। उसकी मृत्यु के बाद उसके भाई क्विण्टिलस ने गद्दी पर अधिकार कर लिया। कुछ ही दिन बाद या तो उसकी हत्या कर दी गई या उसे आत्मघात करना पड़ा।

ई.270 में ऑरेलियन शासक हुआ, उसने रोमन साम्राज्य की एकता को पुनः स्थापित किया किंतु पाँच साल के शासन के बाद सितम्बर 275 में उसकी भी उसके अंगरक्षकों ने हत्या कर दी। इसके बाद ऑरेलियन की रानी यूल्पिया सेवेरेना ने रोम का शासन संभाला किंतु कुछ ही दिन बाद 25 सितम्बर 275 को उसे सीनेट ने हटा दिया और 76 वर्षीय टैक्टियस को रोम का सम्राट बनाया किंतु जून 276 में उसकी भी हत्या हो गई।

इस पर पश्चिम में नियुक्त रोम की सेनाओं ने टैक्टियस के भाई फ्लोरियानस को रोम का सम्राट बना दिया किंतु तीन माह के भीतर सितम्बर 276 में वह भी रोमन सेनाओं द्वारा मार डाला गया। अब सेना पूर्वी प्रांत के गवर्नर प्रोबस को सम्राट बनाना चाहती थी।

प्रोबस केवल 6 साल तक शासन कर सका और अक्टूबर 282 में उसकी भी उसके अंगरक्षकों ने हत्या कर दी तथा कारुस रोम का सम्राट हुआ। केवल 10-11 माह के शासन के बाद ही बिजली गिर जाने से उसकी मृत्यु हो गई। उसका पुत्र कैरीनस राजा हुआ किंतु दो वर्ष बाद ही ई.284 में वह डियोक्लेटियन से युद्ध करता हुआ मारा गया। इसके बाद कारुस का पुत्र नुमेरियन राजा हुआ किंतु नवम्बर 284 में उसकी भी हत्या कर दी गई। इसके साथ ही गोर्डियन वंश की समाप्ति हो गई। इसके साथ ही एक और महान् रोमन शासक वंश समाप्त हो गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दो ऑगस्टस तथा दो सीजर (12)

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दो ऑगस्टस तथा दो सीजर

डियोक्लेटियन ने ‘चार राजाओं के शासन’ का सिद्धांत बनाया जिसके तहत दो ऑगस्टस तथा दो सीजर की नियुक्ति की गई। सम्राट डियोक्लेटियन ने स्वयं को ऑगस्टस की उपाधि दी तथा ई.286 में अपने पुराने एवं विश्वस्त सैनिक साथी मैक्सीमियन को अपने अधीन सह-सम्राट (दूसरा ऑगस्टस) नियुक्त किया।

नवम्बर 284 से अप्रेल 305 तक डियोक्लेटियन रोम का राजा हुआ। वह रोमन मिलिट्री के एक साधारण सिपाही से बढ़ता हुआ सम्राट कारुस की सेना में कमाण्डर बना था। इम्परेटर नुमेरियन की मृत्यु हो जाने के बाद डियोक्लेटियन ने स्वयं को रोम का शासक घोषित कर दिया।

डियोक्लेटियन ने ऑगस्टस की उपाधि धारण की तथा रोमन शासन में कई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए। उसने अनुभव किया कि रोम के कई अति-महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति रोम का सम्राट बनना चाहते हैं। इस कारण वे सम्राट की हत्या करने के षड़यंत्र रचते रहते हैं।

इस कारण पिछली तीन शताब्दियों से भी अधिक समय से सम्राटों की हत्या होती आ रही है। एक सम्राट के राज्यासीन होते ही दूसरे महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति उसकी हत्या का प्रयास आरम्भ कर देते हैं। इस घृणित कार्य में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका साम्राज्य के मुख्य सेनापति एवं सम्राट की अपनी अंगरक्षक सेनाओं की होती है।

इसलिए डियोक्लेटियन ने राज्य के अति-महत्त्वाकांक्षी व्यक्तियों को शासन में भागीदारी देने का अनोखा उपाय खोजा ताकि उन्हें सम्राट की हत्या का षड़यंत्र रचने का समय ही नहीं मिले और वे अपना पद सुरक्षित करने की चिंता में व्यस्त रहें।

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इतना ही नहीं, नई व्यवस्था के तहत वे लोग अपने-अपने क्षेत्रों में शांति एवं सुरक्षा बनाए रखने तथा अपनी-अपनी सीमाओं पर आक्रमण कर रहे शत्रुओं की तरफ ध्यान केन्द्रित करने में व्यस्त हो जाएं। डियोक्लेटियन ने ‘चार राजाओं के शासन’ का सिद्धांत बनाया जिसके तहत दो ऑगस्टस तथा दो सीजर की नियुक्ति की गई। सम्राट डियोक्लेटियन ने स्वयं को ऑगस्टस की उपाधि दी तथा ई.286 में अपने पुराने एवं विश्वस्त सैनिक साथी मैक्सीमियन को अपने अधीन सह-सम्राट (दूसरा ऑगस्टस) नियुक्त किया। डियोक्लेटियन स्वयं तो पूर्वी रोमन साम्राज्य पर शासन करने लगा तथा उसने मैक्सीमियन को पश्चिमी प्रांतों का शासक नियुक्त किया। 1 मार्च 293 को डियोक्लेटियन ने गैलेरियस तथा कॉन्स्टेन्टियस नामक दो सामंतों को दो अलग-अलग क्षेत्रों का सीजर नियुक्त किया। ये सीजर, सम्राट ऑगस्टस डियोक्लेटियन तथा सह-सम्राट ऑगस्टस मैक्सीमियन के अधीन ‘कनिष्ठ सह-सम्राट’ थे। इस प्रकार रोमन साम्राज्य चार महाप्रांतों में विभक्त हो गया। इसके बाद सम्राट डियोक्लेटियन जितने भी दिन जीवित रहा, उसे अपने राज्य के भीतर षड़यंत्रों का सामना नहीं करना पड़ा। अब वह अपना ध्यान साम्राज्य के विस्तार पर केन्द्रित कर सकता था।

डियोक्लेटियन ने ई.285 से 299 के बीच महान् रोमन साम्राज्य पर आक्रमण करने वाली सरमाटियन्स तथा कार्पी कबीलों की सेनाओं को कई बार पराजित किया।

ई.288 में उसने अलामन्नी कबीले को भी परास्त किया। ई.297 से 298 के बीच उसने मिस्र को अपने अधीन कर लिया। उसने कनिष्ठ सह-सम्राट गैलेरियस के साथ मिलकर सेसेनिड पर्सिया को भी परास्त किया तथा ई.299 में उनकी राजधानी क्टेसीफोन पर अधिकार कर लिया।

डियोक्लेटियन ने सैन्य एवं नागरिक प्रशासन के अधिकारियों को अलग-अलग किया तथा केन्द्र एवं समस्त प्रांतों में सुव्यवस्थित प्रशासनिक सरकारों का निर्माण किया। उसने रोमन साम्राज्य की सीमाओं के निकट निकोमेडिया, मेडियोलानम, सिरमियम तथा ट्रेवोरम में प्रशासनिक केन्द्र स्थापित किए ताकि सीमावर्ती प्रजा को अच्छा प्रशासन दिया जा सके।

ई.297 में डियोक्लेटियन ने प्रजा पर करों में वृद्धि की तथा समस्त प्रजा पर एक जैसे कर लगाए ताकि विभिन्न मोर्चों पर लड़ रही सेनाओं तथा इटली में चल रहे निर्माण कार्यों के लिए लगातार राजस्व की प्राप्ति हो सके। उसने क्रोशिया में अपने लिए एक भव्य राजधानी का निर्माण करवाया।

इस  प्रकार सम्राट, सह-सम्राट तथा कनिष्ठ सम्राटों की त्रिस्तरीय व्यवस्था करके डियोक्लेटियन 20 वर्ष से अधिक समय तक रोम का शासक बने रहने में सफल रहा। 67 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो गई। मैक्सीमियन भी लगभग 19 साल तक रोम पर शासन करता रहा। डियोक्लेटियन तथा मैक्सीमियन की मृत्यु का काल लगभग एक ही था।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

ईसाइयों को प्राणदण्ड (13)

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ईसाइयों को प्राणदण्ड

रोमन लोग ईसाइयों को झगड़ालू और संकीर्ण मनोवृत्ति वाला समझने लगे। सम्राट की मूर्ति के समक्ष सिर नहीं झुकाना राजद्रोह समझा गया तथा इसके लिए बहुत से ईसाइयों को प्राणदण्ड दिया गया। ईसाई लोग मनोरंजन के उद्देश्य से होने वाली पशुओं और मनुष्यों की लड़ाइयों का भी विरोध करते थे।

यीशू के भयग्रस्त अनुयायियों ने राज्याधिकारियों के भय से यीशू के अंतिम क्षणों में उन्हें अपना मानने से मना कर दिया था किंतु यीशू की मृत्यु के कुछ समय बाद ईसा मसीह के बारह प्रमुख शिष्यों ने ईसाई मत का प्रचार करना आरम्भ किया। इन शिष्यों ने एक दूसरे से लगभग स्वतंत्र रहकर ईसा मसीह के संदेश यहूदियों एवं गैर यहूदियों में पहुँचाए।

इस कारण ईसा मसीह की शिक्षाओं के कई रूप प्रचलित हो गए। इन 12 शिष्यों ने अपने-अपने उत्तराधिकारी नियुक्त किए जिन्हें ‘बिशप’ कहा जाता था। उन्हीं दिनों सेंट पॉलुस अथवा संत पॉल नामक एक ईसाई संत हुआ। वह ईसा मसीह के 12 शिष्यों में सम्मिलित नहीं था किंतु उसे यहूदी जगत में ‘गोस्पल‘ का प्रचार करने में सर्वाधिक सफलता प्राप्त हुई। गोस्पल उस शुभ संदेश को कहते हैं जो ईसा मसीह ने दिया था। यह शुभ संदेश यह है कि- ‘धरती पर ईश्वर का राज्य आ रहा है।’

बहुत से लोगों का विचार है कि संत पॉल ने जिस ईसाइयत का प्रचार किया वह यीशू के उपदेशों से बहुत भिन्न है। संत पॉल एक योग्य एवं विद्वान व्यक्ति था किंतु वह यीशू की तरह सामाजिक विद्रोही नहीं था। अर्थात् पॉल ने यहूदियों की सामाजिक परम्पराओं एवं मान्यताओं की आलोचना नहीं की तथा स्वयं को केवल धर्मिक शिक्षाओं पर केन्द्रित किया।

पॉल को अपने उद्देश्य में सफलता मिली और ईसाई मत के प्रचार का काम आगे बढ़ने लगा। कुछ ही समय में ईसाई धर्म जेरूसलम से निकलकर रोम तक जा पहुँचा। हालांकि ईसा मसीह के प्रमुख शिष्य सेंट पीटर ने रोम में चर्च की स्थापना की थी तथा सेंट पीटर ने अपने एक शिष्य को वहाँ का बिशप नियुक्त किया था। फिर भी रोम में जिस ईसाइयत का प्रचार हुआ, वह संत पॉल द्वारा प्रचारित की गई थी।

बाइबिल की रचना

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यहूदियों के तीन प्रमुख धार्मिक ग्रन्थ हैं जिन्हें तनख़, तालमुद तथा मिद्रश कहा जाता है। तनख की रचना ईसा से लगभग 1300 साल पहले की गई थी तथा समय-समय पर इसमें परिवर्तन होते रहे थे। इस पुस्तक का बहुत बड़ा हिस्सा मूसा ने लिखा था। बाइबिल की रचना तनख पर आधारित है जिसे बाइबिल का ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ अर्थात् पुराना नियम कहा जाता है। इसे ‘तालमुद’ एवं ‘तौरा’ भी कहते हैं। ई.50 से ई.100 के बीच बाइबिल का नवविधान अर्थात् ‘न्यू टेस्टामेंट’ लिखा गया। इसे ‘इंजील’ भी कहा जाता है। इसमें ईसा मसीह का जीवन परिचय और उनके उपदेशों का वर्णन है। इसकी मूल भाषा ‘अराम’ तथा ‘ग्रीक’ थी। न्यू टेस्टामेंट को ईसा मसीह के चार शिष्यों ने लिखा था जिनके नाम इस प्रकार हैं- मत्ती, लूका, यूहन्ना और मरकुस। ईसाई धर्म का आरम्भ ‘न्यू टेस्टामेंट’ से माना जाता है। न्यू टेस्टामेंट, बाइबिल का दूसरा भाग या उत्तरार्ध है जिसमें यीशु मसीह की जीवनी, शिक्षाएं, और उनके शिष्यों द्वारा किया गया धर्म-प्रचार सम्मिलित हैं। न्यू टेस्टामेंट में 27 पुस्तकें हैं जो तीन भागों में विभक्त हैं- (1.)  सुसमाचार- चार, (2) कार्य- एक और (3.) पत्रियाँ- बाईस। बाईस पत्रियों में 14 पॉल से 7-कैथोलिक से तथा 1 इल्हाम से सम्बन्धित हैं। न्यूटेस्टामेंट की इन 27 पुस्तकों को ईसाई धर्म में लगभग सर्वमान्य रूप से मान्यता दी गई है।

ई.400 में संत जेरोम ने बाइबिल का ‘लैटिन’ भाषा में अनुवाद प्रस्तुत किया। इसे ‘वुलगाता’ कहा जाता है। शताब्दियों तक बाइबिल का यही रूप प्रचलित रहा। कैथोलिक बाइबिल के ओल्डटेस्टामेंट में 46 तथा न्यू टेस्टामेंट में 27 ग्रंथ हैं। प्रोटेस्टेंट बाइबिल के ओल्डटेस्टामेंट में 39 तथा न्यू टेस्टामेंट में 27 ग्रंथ हैं। ऑर्थोडॉक्स बाइबिल के ओल्डटेस्टामेंट में 49 तथा न्यूटेस्टामेंट में 27 ग्रंथ सम्मिलित हैं।

सुसमाचार

ईसाई धर्म में, सुसमाचार या गॉस्पेल, जिसे इस्लाम में इंजील भी कहा जाता है, परमेश्वर के शासन के आगमन के समाचार को कहते हैं। यह मूलतः एक वर्णनात्मक कथा है जिसमें यीशु मसीह, उनके जन्म, उनके जीवन, सूली पर चढ़ाये जाने और पुनरुत्थान की कथा बताई गई है। बाइबल के विभिन्न अनुवादों में इसे शुभसंदेश भी कहा गया है, जो कि यूनानी शब्द ‘यूआनजेलिऑन’ का पुरानी अंग्रेजी में किया गया अनुवाद है। सुसमाचार की कथा का सार, बाइबल क उन चार प्रारम्भिक संस्करणों में पाया जाता है जिन्हें ईसा के चार शिष्यों मत्ती, मरकुस, लुका तथा यूहन्ना ने लिखा है।

ईसाइयों को प्राणदण्ड

रोमन लोगों ने आरम्भ में ईसाई धर्म पर कोई ध्यान नहीं दिया। उन्होंने समझा  कि यह भी यहूदी धर्म का कोई सम्प्रदाय होगा। धीरे-धीरे ईसाइयों का साहस बढ़ने लगा। वे दूसरे समस्त मतों के विरोधी बन गए। उन्होंने प्राचीन रोमन देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की पूजा करने से मना कर दिया। यहाँ तक कि रोम के सम्राट की मूर्ति की पूजा करने से भी मना कर दिया।

इसलिए रोमन लोग ईसाइयों को झगड़ालू और संकीर्ण मनोवृत्ति वाला समझने लगे। सम्राट की मूर्ति के समक्ष सिर नहीं झुकाना राजद्रोह समझा गया तथा इसके लिए बहुत से ईसाइयों को प्राणदण्ड दिया गया। ईसाई लोग मनोरंजन के उद्देश्य से होने वाली पशुओं और मनुष्यों की लड़ाइयों का भी विरोध करते थे।

जबकि यह रोमन लोगों की हजारों साल पुरानी परम्परा थी तथा इस काल तक आते-आते रोमन लोगों के लिए धर्म का रूप धारण कर चुकी थी। इस कारण ईसाई प्रचारकों को राज्य एवं प्रजा दोनों की तरफ से सताया जाने लगा और उनकी सम्पत्तियां जब्त की जाने लगीं। बहुत से ईसाइयों को शेरों के सामने फैंक दिया गया।

एण्ड्रोक्लस एण्ड लॉयन

रोमन ईसाई साहित्य में एक यवन साधु और एक सिंह की कथा मिलती है जिसे ब्रिटिश लेखक जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने अपने सुप्रसिद्ध नाटक ‘एण्ड्रोक्लस एण्ड लॉयन’ में बहुत मार्मिक ढंग से लिखा है। यह कथा उस काल की रोमन सभ्यता पर प्रकाश डालती है और ईसा की प्रथम तीन शताब्दियों में रोमन साम्राज्य में ईसाइयों पर हुए अत्याचारों को भी दर्शाती है।

इस कथा के अनुसार एण्ड्रोक्लस नामक ईसाई साधु को एक बार जंगल में एक सिंह मिला जिसके अगले पैर में काँटा गड़ा हुआ था जिसके कारण वह लंगड़ाता हुआ चल रहा था और पीड़ा से कराह रहा था। एण्ड्रोक्लस को सिंह से भय लगा किंतु जब उसने सिंह को बार-बार अपना पंजा चाटते और पीड़ा से कराहते देखा तो एण्ड्रोलक्स ने साहस करके शेर के पंजे से कांटा निकाल दिया।

कुछ समय बाद वह साधु ‘ईसाई’ होने के आरोप में रोमन सैनिकों द्वारा पकड़ लिया गया तथा गुलामों की टोली के रूप में रोम ले जाया गया। यहाँ रोमन सम्राट अपने सामंतों के साथ कोलेाजियम में बैठकर गुलामों की लड़ाई देखता था। इस लड़ाई के दौरान गुलामों के शरीरों से रक्त की धार बह निकलती थी तथा उनके जीवित रहने तक उनके अंग-अंग कटकर भूमि पर गिरते रहते थे।

रोमन सम्राट एवं नागरिक उन गुलामों को तड़पते हुए देखकर बहुत आनंदित होते थे। यदि कोई गुलाम लड़ने से मना कर देता था तो उसे अखाड़े में भूखे शेर के समक्ष छोड़ दिया जाता था और रोमनवासी शेर को गुलाम-मनुष्य पर झपटते और उसके चीथड़े करके खाते हुए देखते। ईसाई साधु एण्ड्रोक्लस को भी इसी कोलोजियम में लाया गया तथा उसे किसी दूसरे आदमी से लड़ने के लिए कहा गया।

दुबले-पतले एण्ड्रोक्लस ने लड़ने से मना कर दिया। इस पर एण्ड्रोक्लस को भूखे सिंह के समक्ष धकेला गया। पिंजरे में बंद भूखा सिंह दहाड़कर अखाड़े में कूदा किंतु जैसे ही सिंह ने उस साधु को देखा तो वह शांत होकर अपने पंजे सिकोड़कर बैठ गया और अपना वही पंजा साधु की ओर बढ़ा दिया।

इस दृश्य को देखकर सम्राट बहुत अचम्भित हुआ उसने एण्ड्रोक्लस तथा सिंह को मुक्त कर दिया। ईसाई साधु उस सिंह को लेकर जंगल की तरफ चला गया।

धर्म के लिए बलिदान

ईसाई प्रचारकों ने रोमन शासकों द्वारा किए जा रहे इन अत्याचारों को धर्म के लिए आवश्क बलिदान माना और वे सहर्ष अपने प्राणों का उत्सर्ग करने को तैयार हो गए। ईसाई प्रचारकों के इस धैर्य-पूर्ण आचरण ने रोम के लोगों को प्रभावित किया और वे ईसाइयों की बातों को सुनने लगे जिसका परिणाम यह हुआ कि बहुत से रोमनवासी अपना प्राचीन धर्म छोड़कर ईसाई बनने लगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रोमन साम्राज्य का विभाजन (14)

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रोमन साम्राज्य का विभाजन

चौथी शताब्दी ईस्वी के अंत तक पूर्वी रोमन साम्राज्य के सम्राट द्वारा पश्चिमी रोमन साम्राज्य के शासक को सह.शासक के रूप में नियुक्त किया जाता था किंतु पश्चिमी साम्राज्य पर पूर्वी सम्राट का नियंत्रण नाम मात्र का ही था। धीरे-धीरे रोमन साम्राज्य का विभाजन हो गया।

ई.305 में कॉन्स्टेंटीन (प्रथम) रोम का शासक हुआ। उसे कॉन्स्टेंटीन द ग्रेट भी कहा जाता है। वह 14 वर्ष की आयु से सम्राट डियोक्लेटियन के साथ सैन्य-अभियानों में भाग लेने लगा था। पूर्ववर्ती सम्राट डियोक्लेटियन के समय से ही महान् रोमन साम्राज्य दो महाप्रांतों- पूर्वी रोमन साम्राज्य एवं पश्चिमी रोमन साम्राज्य में विभक्त हो चुका था तथा सम्राट डियोक्लेटियन रोम में न रहकर पूर्वी रोमन साम्राज्य में स्थित क्रोएशिया रहा करता था।

महान् रोमन साम्राज्य की राजधानी का स्थानान्तरण

जब कॉन्स्टेंटीन महान् रोमन साम्राज्य का स्वामी हुआ तो वह ई.324 में अपनी राजधानी रोम से हटाकर अपने साम्राज्य की पूर्वी सीमा पर काला सागर एवं भूमध्य सागर के बीच दर्रे-दानियाल के किनारे पर स्थित ‘बिजैन्तिया’ (बैजेन्टाइन) नामक नगर में ले गया ताकि वह अपने साम्राज्य की पूर्वी सीमाओं पर लड़ रही सेनाओं का नेतृत्व कर सके और उन्हें नियंत्रण में रख सके। कुछ समय बाद उसने बिजैन्तिया के निकट ‘कांस्टेंटिनोपल’ नामक नवीन नगर की आधारशिला रखी और उसी को अपनी राजधानी बनाया। आगे चलकर यह नगर कुस्तुंतुनिया कहलाया। सम्राट कॉन्सटैन्टाइन ने कैथोलिक चर्च और उसके पादरियों को करों से मुक्त कर दिया और उन्हें कई विशेषाधिकार दिए।

कुस्तुंतुनिया द्वारा रोम के लिए सह-शासकों की नियुक्ति

राजधानी के रोम से हटकर बैजेन्टाइन अथवा कुस्तुंतुनिया चले जाने से रोमन साम्राज्य के विभाजन की संभावनाएं प्रबल हो गईं। हालंकि कुस्तुंतुनिया के सम्राटों द्वारा पश्चिमी रोमन साम्राज्य के लिए सह-शासकों की नियुक्ति की जाती रही। ई.306 में सम्राट कॉन्स्टेंटीन द्वारा वेलेरियस सेवेरस को रोम का कनिष्ठ सम्राट (सीजर) घोषित किया गया।

मैक्सेण्टियस द्वारा रोम पर बलपूर्वक अधिकार

ई.307 में उसे मैक्सेण्टियस नामक एक रेामन सामंत ने रोम के अधिकृत शासक वेलेरियस सेवेरस को पकड़ लिया तथा उसे आत्मघात करने के लिए विवश कर दिया। इसके बाद मैक्सेण्टियस ने राजधानी रोम तथा पश्चिमी रोमन साम्राज्य पर जबर्दस्ती अधिकार कर लिया।

कॉन्स्टेन्टीन द्वारा ईसाई धर्म ग्रहण

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ई.308 में कुस्तुंतुनिया के सम्राट कॉन्सटैन्टाइन (प्रथम) ने अपने मामा लिसिनियस (प्रथम) को रोम का सम्राट घोषित किया किंतु मैक्सेण्टियस ने रोम खाली नहीं किया। अंत में ई.312 में सम्राट कॉन्सटैन्टाइन ने मैक्सेण्टियस को मिलिवियान ब्रिज के युद्ध में मार डाला।सम्राट कॉन्स्टेंटीन ईसाई धर्म के प्रति सहिष्णु था किंतु वह स्वयं पेगन धर्म को मानता था। इस काल तक ईसाई धर्म के कुछ प्रचारक शासन तंत्र में अपना प्रभाव जमाने में सफल हो गए थे। कुछ इतिहासकारों के अनुसार ई.337 में सम्राट कॉन्स्टेंटीन को मृत्यु-शैय्या पर जबर्दस्ती ईसाई बनाया गया था। इसके बाद ईसाई धर्म को राजकीय धर्म के रूप में मान्यता दी गई। इसके बाद न केवल पूर्वी रोमन साम्राज्य में अपितु पश्चिमी रोमन साम्राज्य एवं राजधानी रोम में भी ईसाई धर्म का प्रभाव बढ़ने लगा तथा प्राचीन काल से प्रचलित बहुदेववादी एवं मूर्ति-पूजक रोमन धर्म (पेगन धर्म) पर रोक लगा दी गई। राज्य द्वारा की गई जबर्दस्ती के कारण कुछ ही सालों में प्राचीन बहुदेववादी रोमन धर्म, रोमन साम्राज्य से विलुप्त हो गया। इस प्रकार लगभग तीन सौ साल की प्रारम्भिक उपेक्षा के बाद रोम के बिशप की शक्ति धर्माध्यक्ष के रूप में बढ़ गई तथा पोप के रूप में वह रोम के शासन-तंत्र को प्रभावित करने की शक्ति भी प्राप्त कर गया।

कॉन्सटैन्टाइन के उत्तराधिकारी

ई.337 में सम्राट कॉन्सटैन्टाइन (प्रथम) की मृत्यु के बाद उसका पुत्र कॉन्सटैन्टाइन (द्वितीय) रोम का शासक बना। ई.340 में वह अपने भाई कॉन्स्टेन्स (प्रथम) के विरुद्ध युद्ध करता हुआ मारा गया। ई.340-56 तक कॉन्सटैन्टाइन (प्रथम) का पुत्र कॉन्स्टेन्स (प्रथम) और  ई.356-61 तक कॉन्सटैन्टाइन (प्रथम) का अन्य पुत्र कॉन्स्टेन्टियस (द्वितीय) पश्चिमी रोमन साम्राज्य का स्वामी हुआ। उसके बाद इसी परिवार का राजकुमार जूलियन रोम का राजा हुआ।

सम्राट जूलियन ई.363 में एक युद्ध में मृत्यु को प्राप्त हुआ। इसके बाद से रोमन साम्राज्य का तेजी से पतन होता चला गया। जूलियन के बाद जूलियन की सेना का सेनापति जोवियन रोम का राजा हुआ किंतु वह आठ माह बाद ही 33 वर्ष की आयु में आग एवं धुएं में घिर जाने से दम घुट जाने के कारण मर गया। ये समस्त राजा पूर्वी रोमन साम्राज्य एवं पश्चिमी रोमन साम्राज्य दोनों के शासक थे। आगे चलकर पूर्वी एवं पश्चिमी साम्राज्य के शासक पुनः अलग-अलग शासकों में विभक्त हो गए।

हालांकि पूर्वी सम्राट द्वारा पश्चिमी साम्राज्य के शासक को सह-शासक के रूप में नियुक्त किया जाता रहा किंतु पश्चिमी साम्राज्य पर पूर्वी सम्राट का नियंत्रण नाम मात्र का ही था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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