Wednesday, July 28, 2021

6. महान् रोमन गणराज्य

रोम की स्थापना के लगभग बाद पाँच सौ सालों तक रोम में राजा का राज्य चलता रहा किंतु ई.पू. 509 में रोमन गणराज्य की स्थापना हुई। यह एक विचित्र प्रकार का गणराज्य था जिस पर जमींदार वर्ग के कुछ धनी कुटुम्बों का वर्चस्व था। उन्हें सम्मिलित रूप से ‘सीनेट’ कहते थे। इस सीनेट को रोम-वासियों द्वारा चुने हुए रोमन-पदाधिकारी नामांकित करते थे जिन्हें ‘कौन्सिल’ कहा जाता था।

सीनेट ‘गणराज्य पद्धति’ पर रोम का शासन चलाती थी। रोमन गणराज्य में दो प्रकार के लोग रहते थे। पहला वर्ग जमींदारों का था और दूसरा वर्ग जन-साधारण का था। उच्च वर्ग को ‘पैट्रिशियन’ और साधारण जनता के वर्ग को ‘प्लेबियन’ कहा जाता था। सभी लोग सीनेट का आदर करते थे किंतु केवल धनी एवं प्रभुत्व सम्पन्न व्यक्ति अर्थात् ‘पैट्रिशियन’ ही सीनेटर हो सकते थे।

इस कारण रोमन गणराज्य के आरम्भिक कई सौ वर्षों तक धनी जमींदार वर्ग एवं जन-साधारण वर्ग में प्रभुत्व को लेकर रक्त-रंजित संघर्ष होते रहे। जमींदार वर्ग के प्रभावशाली लोग भी सीनेट में स्थान पाने के लिए एक-दूसरे के विरुद्ध षड़यंत्र रचा करते थे तथा एक-दूसरे की हत्या तक कर देते थे। इसका मुख्य कारण यह था कि रोमन गणराज्य का प्रमुख सामान्यतः सीनेट का ही कोई सदस्य होता था।

उस काल के रोम में जमींदार वर्ग एवं जन-साधारण वर्ग के अतिरिक्त एक वर्ग गुलामों का भी था जिन्हें अफ्रीका के उत्तरी तटों से पकड़कर लाया जाता था। इनकी जिंदगी पशुओं के समान थी तथा इन्हें रोम का नागरिक नहीं माना जाता था। वृद्ध-गुलाम अपने स्वामियों द्वारा मुक्त कर दिए जाते थे। वे भी बड़ी संख्या में रोम में रहते थे।

गुलामों एवं स्वतंत्र गुलामों को कौंसिल के सदस्यों को चुनने का अधिकार नहीं होता था। यह एक आश्चर्य की ही बात थी कि कौंसिल के सदस्यों का चुनाव जमींदार वर्ग एवं जन साधारण वर्ग के सम्मिलित वोटों से होता था किंतु कौंसिल के सदस्यों द्वारा सीनेट के लिए केवल जमींदार वर्ग के व्यक्ति ही नामित किए जा सकते थे तथा गण-प्रमुख का चुनाव सीनेट के सदस्यों में से ही होता था।

इस प्रकार गण-प्रमुख के निर्वाचन में जन-सामान्य की भूमिका नगण्य एवं निष्प्रभावी बन कर रह जाती थी। रोम के धनी वर्ग अर्थात् ‘पैट्रिशियन’ के हाथों में रोम की लगभग सारी सम्पत्ति केन्द्रित थी। जन-साधारण वर्ग अर्थात् ‘प्लेबियन’ दिन-रात परिश्रम करके भी कठिनाई से पेट भर पाता था। जन-साधारण ने कई बार इन धनी लोगों के विरुद्ध आवाज उठाई किंतु हर बार जमींदारों द्वारा उन्हें बुरी तरह से कुचला गया। अंत में जन-साधारण ने रोम छोड़ने का निर्णय लिया।

वे बहुत बड़ी संख्या में रोम छोड़कर चले गए और उन्होंने एक अलग नगर बसा लिया। इससे रोम के धनी लोगों को बड़ी कठिनाई हो गई और उनके दैनिक कामकाज ठप्प हो गए। अंत में रोम के जमींदार वर्ग ने जन-साधारण से समझौता कर लिया और उन्हें नागरिक जीवन में कुछ अधिकार दे दिए। इन अधिकारों में समय के साथ वृद्धि होने लगी और इस वर्ग के कुछ लोग सीनेट के सदस्य भी बनने में सफल होने लगे।

रोम के आंतरिक राजनीतिक एवं नागरिक तनाव तथा संघर्ष के बीच भी इस काल में रोम न केवल इटालवी प्रायःद्वीप अपितु भूमध्य सागरीय क्षेत्र के विशाल क्षेत्र पर राज्य करता था। स्पेन, उत्तरी अफ्रीका, औबेरियन प्रायद्वीप, दक्षिणी फ्रांस, यमन और पूर्वी भूमध्य सागर के अधिकतम भाग पर रोम की सेनाओं का डंका बजता था तथा वहाँ रोमन गवर्नर नियुक्त थे। दुनिया उसे महान् रोमन गणराज्य के नाम से जानती थी। रोमन समाज को उस समय सबसे आधुनिक समाज माना जाता था।

रोमन गणराज्य के नेताओं ने शांति और युद्ध के समय मजबूत परम्पराओं का निर्माण किया और समय-समय पर उच्च नैतिकता का प्रदर्शन किया। रोमन सीनेटरों ने कई कानूनी और विधायी संरचनाओं का निर्माण किया जिनकी व्याख्या ‘नेपोलियन संहिता’ और ‘जस्टीनियन संहिता’ में देखने को मिलती है। रोमन गणराज्य में स्थापित हुई कई परम्पराओं को आज भी यूरोप तथा विश्व के कई आधुनिक राष्ट्रों एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में देखा जा सकता है।

रोमन अपमान का खूनी बदला

जिस समय रोम की नींव पड़ी, उन्हीं दिनों अफ्रीका के उत्तरी समुद्र-तट पर फीनिश लोगों ने ‘कार्थेज’ नामक नगर की स्थापना की। बाद में रोम तथा कार्थेज उन्नति करते हुए शक्तिशाली हो गए तथा इन दोनों शहरों में व्यापारिक वर्चस्व को लेकर लम्बे समय तक युद्ध हुए। उन दिनों रोम तथा कार्थेज के बीच दक्षिणी इटली, सिसली और मेसीना में छोटे-छोटे यूनानी-उपनिवेश स्थित थे।

रोम तथा कार्थेज दोनों ही इन उपनिवेशों को समाप्त करके उन पर अपना अधिकार जमाना चाहते थे। अंत में यूनानियों को इन उपनिवेशों से बाहर निकालने के लिए रोम एवं कार्थेज आपस में मिल गए। जब यूनानियों को इटली एवं सिसली से बाहर निकाल दिया गया तब रोमन सेनाओं ने सिसली पर कब्जा कर लिया और रोम ‘बूट की शक्ल’ (जूते की आकृति) वाले इटली की दक्षिणी नोक तक पहुँच गया।

रोम और कार्थेज की दोस्ती स्वार्थ-प्रेरित थी अतः अधिक दिनों तक बनी नहीं रह सकी। भूमध्य सागर के दोनों किनारों पर दोनों शक्तियां अपनी-अपनी सेनाओं का डेरा डालकर बैठ गईं। उन दिनों कार्थेज की शक्ति बहुत बढ़ी हुई थी और वह रोम को अधिक महत्त्व नहीं देता था। रोम भी जोश में था। इस कारण दोनों देशों की सेनाएं लगभग 100 साल तक एक-दूसरे से लड़ती रहीं।

बीच-बीच में कुछ समय के लिए शांति होती थी किंतु कुछ समय बाद दोनों देशों की सेनाएं एक दूसरे पर भूखे-भेड़ियों की तरह टूट पड़तीं जिनमें हजारों सैनिक मारे जाते अथवा अंग-भंग होकर हमेशा के लिए अपंग हो जाते। इन दोनों शक्तियों के बीच तीन बड़े युद्ध हुए जिन्हें ‘प्यूनिक युद्ध’ कहते हैं।

पहला प्यूनिक युद्ध ई.पू.264 से ई.पू.241 तक अर्थात् 23 साल तक चला। इस युद्ध में रोम की जीत हुई। 22 वर्ष बाद दूसरा प्यूनिक युद्ध आरम्भ हुआ। कार्थेज की ओर से इस युद्ध का नेतृत्व उस काल के प्रसिद्ध योद्धा ‘हैनिवाल’ ने किया। उसने 15 वर्ष तक रोम के लोगों को सताया। अंत में ई.पू.216 में कैनी की लड़ाई में हैनिवाल ने रोम को हरा दिया किंतु रोम के लोगों ने हिम्मत नहीं हारी।

उन्होंने रोम और कार्थेज के बीच के समुद्री मार्ग पर अधिकार कर लिया ताकि हैनिवाल बचकर कार्थेज न जा सके तथा कार्थेज से नई सेना आकर हैनिवाल तक नहीं पहुँच सके। इसके बाद रोम-वासियों ने छापामार युद्ध आरम्भ किया। वे जान गए थे कि सम्मुख लड़ाई में हैनिवाल को हरा पाना अत्यंत कठिन है।

 रोम का सेनापति ‘फैबियस’ अपनी पराजय के बावजूद हैनिवाल से लड़ाई जारी रखने का साहस रखता था। हैनिवाल ने इटली के बहुत बड़े हिस्से को वीरान कर दिया किन्तु वह रोम को अपने अधिकार में नहीं ले सका।

अंत में ई.पू.202 में ‘जामा की लड़ाई’ में हैनिवाल को परास्त कर दिया गया। इसके बाद हैनिवाल प्राण बचाने के लिए भागता रहा किंतु वह जहाँ भी गया रोम की न बुझने वाली नफरत उसका पीछा करती रही और अंत में वह विषपान करके मर गया। इसके बाद रोम ने कार्थेज को बहुत नीचा दिखाया किंतु रोम के मन में सुलग रही बदले की आग बुझी नहीं!

पराजित कार्थेज पचास साल तक रोम द्वारा किए जा रहे अपमान को सहता रहा। अंत में रोम ने कार्थेज को इतना परेशान किया कि कार्थेज तीसरे प्यूनिक युद्ध के लिए विवश हो गया। इस लड़ाई में भी भारी मारकाट हुई और कार्थेज पूरी तरह नष्ट हो गया। जिस कार्थेज को ‘भूमध्य सागर की रानी’ कहा जाता था, उस कार्थेज की भूमि पर रोम ने हल चलवा दिए।

कार्थेज से लिए गए बदले से, पूरे यूरोप और भूमध्य सागरीय क्षेत्र में रोमन सेनाओं का आतंक स्थापित हो गया। इन क्षेत्रों के शासक रोम के नाम से भय खाने लगे। अब यूरोप में रोम का कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं रहा। रोम ने भू-मध्य सागर में स्थित समस्त यूनानी उपनिवेशों पर पहले ही अधिकार कर लिया था।

अब कार्थेज भी रोम के अधिकार में आ गया। इसके बाद रोम ने कार्थेज के प्रभाव वाले समस्त उपनिवेशों पर भी अधिकार कर लिया। यहाँ तक कि स्पेन भी रोम के नियंत्रण में आ गया। इतना होने पर भी उत्तरी और मध्य यूरोप अब भी रोमन गणराज्य के अधिकार क्षेत्र से बाहर था। महान् रोमन गणराज्य जितनी जल्दी हो सके, उसे निगल जाना चाहता था।

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