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हिलाल के खिलाफ क्रॉस का क्रूसेड (25)

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हिलाल के खिलाफ क्रॉस का क्रूसेड

मुसलमानों से लड़ने के लिए पोप के द्वारा दिए गए निर्णय को आलंकारिक भाषा में हिलाल (मुसलमानों का धार्मिक चिह्न- दूज का चांद) के खिलाफ क्रॉस (ईसाइयों का धार्मिक चिह्न- सूली) का क्रूसेड (धर्मयुद्ध) कहा गया।

येरूशलम

येरुशलम को हिब्रू में जेरूशलम तथा अरबी में अल-कुद्स कहा जाता है। यह संसार के सबसे प्राचीन नगरों में से है। यहूदी धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम तीनों इसे पवित्र नगरी मानते हैं। आर्मेनियाइयों के लिए भी यह प्रमुख नगर है। इन चारों समुदायों ने इस नगरी के लिए जितना रक्त बहाया है, उतना और किसी नगरी के लिए नहीं बहाया। येरुशलम प्राचीन यहूदी राज्य का केन्द्र और उसकी मुख्य राजधानी रहा है।

किसी समय यहाँ यहूदियों का पवित्र सोलोमन मन्दिर हुआ करता था, जिसे रोमनों ने नष्ट कर दिया था। इसी शहर में ईसा मसीह को सूली पर लटकाया गया था। ईसाइयत, इस्लाम और यहूदी धर्म अपने उद्गम को बाइबल के पात्र अब्राहम से जोड़कर देखते हैं। वर्तमान समय में येरूशलम में 158 गिरिजाघर तथा 73 मस्जिदें हैं। यह नगर चार खण्डों में विभाजित है जिसमें से दो खण्डों में ईसाई, एक में यहूदी तथा एक खण्ड में मुसलमान रहते हैं।

यहूदी खण्ड

यहूदी खण्ड इस नगर का सबसे पुराना खण्ड है। यह हिस्सा कोटेल या पश्चिमी दीवार का घर भी है। यहाँ कभी पवित्र मंदिर खड़ा था। यह दीवार उसी की बची हुई निशानी है। यहाँ के मंदिरों में यहूदियों का सबसे पवित्रतम स्थान ‘होली ऑफ होलीज’ है। यहूदी मानते हैं यहीं पर सबसे पहली उस शिला की नींव रखी गई थी, जिस पर दुनिया का निर्माण हुआ तथा जहाँ अब्राहम ने अपने बेटे इसाक की कुरबानी दी। पश्चिमी दीवार, ‘होली ऑफ होलीज’ की सबसे निकटतम जगह है, जहाँ से यहूदी प्रार्थना कर सकते हैं। इसका प्रबंध पश्चिमी दीवार के रब्बी करते हैं।

आर्मेनियाई खण्ड

ईसाइयों के दो खण्डों में से एक में आर्मेनियाई रहते हैं जो संसार में सबसे पहले ईसाई बनने वाले लोगों के वंशज हैं। उन्होंने जीवित बने रहने के लिए सदियों से कठोर संघर्ष किया है। कहा जाता है कि जेरूसलम का राजा टिरिडेटस (तृतीय) तथा उसकी सम्पूर्ण प्रजा ईसा की चौथी शताब्दी में ईसाई बन गई थी। ऐसा करने वाला यह संसार का पहला राज्य था। कैथोलिक तथा ऑर्थोडॉक्स ईसाई इनके बाद अस्तित्व में आए। आर्मेनियाई खण्ड, येरूशलम नगर के चारों खण्डों में सबसे छोटा है। माना जाता है कि येरूशलम का यह खण्ड, संसार का प्राचीनतम आर्मेनियाई केंद्र है।

ईसाई खण्ड

बड़े ईसाई खण्ड में पवित्र सेपुलकर चर्च है जहाँ ईसा मसीह को सूली पर लटकाया गया था। इसे गोलगाथा भी कहा जाता है। यह विश्व भर के ईसाइयों के आकर्षण का केन्द्र है। यहीं पर वह स्थान भी है जहाँ ईसा फिर से जीवित हो गए थे। इस चर्च का प्रबंध संयुक्त रूप से रोमन कैथोलिक चर्च, आर्मेनियाई पैट्रिआरकट, ग्रीक ऑर्थोडोक्स पैट्रिआरकट, फ्रांसिस्कन फ्रिएर्स आदि ईसाइयों के अलग-अलग संप्रदाय करते हैं। इथियोपियाई, कॉप्टिक्स और सीरियाई ऑर्थोडोक्स चर्च की भी इसमें भूमिका रहती है। यहीं पर ईसा मसीह का खाली मकबरा है।

मुस्लिम खण्ड

मुस्लिम हिस्सा चारों में सबसे बड़ा है। इस हिस्से में गुंबदाकार ‘डोम ऑफ़ रॉक’ यानी क़ुब्बतुल सख़रह और अल-अक्सा मस्जिद स्थित है। यह एक पठार पर स्थित है जिसे मुस्लिम हरम अल शरीफ़ या पवित्र स्थान कहते हैं। मुसलमान मानते हैं कि पैगंबर मुहम्मद अपनी रात्रि-यात्रा में मक्का से यहीं आए थे और उन्होंने आत्मिक तौर पर सभी पैगंबरों से दुआ की थी। क़ुब्बतुल सख़रह से कुछ दूरी पर एक शिला रखी है जिसके बारे में मुसलमान मानते हैं कि मुहम्मद यहीं से स्वर्ग की ओर गए थे।

इस्लाम की आंधी में येरूशलम

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अत्यंत प्राचीन काल से येरूशलम यहूदियों का मुख्य केन्द्र था। जब ईसा धर्म अस्तित्व में आया तो यह ईसाइयों के लिए भी महत्त्वपूर्ण हो गया और उन्होंने इसे यहूदियों से छीन लिया। इस कार्य में रोमन सेनाओं ने प्रमुख भूमिका निभाई। जब ई.632 में हजरत मुहम्मद ने येरूशलम से स्वर्ग को प्रस्थान किया तो मुसलमान भी इस नगर पर अपना अधिकार जताने लगे। हजरत मुहम्मद की मृत्यु के लगभग 10 साल बाद ई.642 में अरब के मुसलमानों ने फिलीस्तीन तथा उसकी राजधानी जेरूसलम पर अधिकार कर लिया। जेरूसलम के साथ ही ईसा मसीह की समाधि तथा उसके निकट स्थित बड़ा चर्च भी मुसलमानों के अधिकार वाले क्षेत्र में चले गए। पूरा ईसाई समाज इस घटना से सन्न रह गया किंतु कोई कुछ नहीं कर सका। फिर भी ईसाई श्रद्धालु, यीशू मसीह के जीवन प्रसंगों से जुड़े स्थलों को देखने एवं उनकी कब्र पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए जेरूसलम जाते रहे। 7वीं शताब्दी ईस्वी से लेकर 10वीं शताब्दी के समाप्त होने तक जेरूसलम के अरबी मुसलमान शासकों ने ईसाइयों की इन तीर्थ-यात्राओं पर कभी प्रतिबंध नहीं लगाया। न ही कभी इन तीर्थयात्रियों को मुसलमानों द्वारा तंग किया गया। 

ईसा की ग्यारहवीं सदी का अंतिम दशक आरम्भ हो चुका था। इस समय तक ईसाई धर्म को अस्तित्व में आए हुए 1000 साल पूरे हो चुके थे। ईसाइयों की एक पुरानी पुस्तक में लिखा था कि जब ईसाई धर्म 1000 साल का हो जाएगा तो वह पूरी तरह नष्ट हो जाएगा। इस कारण समूचे ईसाई जगत में विचित्र सी बेचैनी व्याप्त थी।

इसी समय दो बड़ी घटनाएं हुईं जिन्होंने यूरोपीय देशों के ईसाइयों को झकझोर कर रख दिया। पहली घटना ई.1071 में सेल्जुक तुर्कों द्वारा कैस्पियन सागर से लेकर जेरूसलम तक के क्षेत्र पर अधिकार कर लेने के रूप में घटित हुई। सेल्जुक तुर्क भी इस समय तक मुसलमान बन चुके थे और वे जेरूसलम के पूर्ववर्ती अरबी मुसलमानों की अपेक्षा अधिक संकीर्ण विचारों के थे।

ईसा की ग्यारहवीं सदी का आरम्भ

उन्होंने जेरूसलम आने वाले ईसाई तीर्थयात्रियों को सताना आरम्भ किया और उन्हें अपमानित करने लगे। क्रोध और अपमान से भरे हजारों ईसाई तीर्थयात्रियों ने यूरोप लौटकर तुर्कों द्वारा किए जा रहे अत्याचारों का मार्मिक वर्णन किया।

पीटर नाम का एक ईसाई साधु हाथ में लाठी लेकर पूरे यूरोप की यात्रा पर निकल पड़ा और देश-देश घूमकर मुसलमानों द्वारा ईसाई श्रद्धालुओं पर किए जा रहे अत्याचारों का वर्णन करने लगा और ईसाइयों से उनका प्रतिकार करने की पुकार लगाने लगा। वह चाहता था कि संसार के सारे ईसाई एकत्रित होकर जेरूसलम पर धावा बोल दें तथा यीशू मसीह की पवित्र कब्र को जेरूसलम के मुसलमानों से मुक्त करवा लें।

उन्हीं दिनों एक बड़ी घटना और हुई। सेल्जुक तुर्कों ने बड़ी भारी तैयारी के साथ कुस्तुंतुनिया को घेर लिया ताकि पूर्वी रोमन साम्राज्य को जड़ से उखाड़ कर फैंका जा सके। कुस्तुंतुनिया के कमजोर हो चुके ईसाई एम्परर के लिए यह संभव नहीं था कि वह सेल्जुक तुर्कों की विशाल सेना का सामना कर सके। इसलिए उसने तत्काल रोम के पोप ग्रेगरी (सप्तम्) से सहायता की याचना की। कुस्तुंतुनिया का एम्परर इस समय रोम के साथ अपनी पुरानी शत्रुता को भूल गया। रोम ने भी सदाशयता दिखाने में कोई कसर नहीं दिखाई तथा कुस्तुंतुनिया बच गया।

ईसाइयों को लगा कि ईसाई धर्म की स्थापना के 1000 साल बाद इसके नष्ट हो जाने की जो भविष्यवाणी प्राचीन ईसाई ग्रंथ में की गई थी, उसके सत्य सिद्ध होने के लक्षण प्रकट होने लगे थे। पोप उरबान (द्वितीय) ने ईसाई जगत की इस बेचैनी को समझा और इस संकट में ईसाई जगत् का नेतृत्व करने का निर्णय लिया। उसने ई.1095 में दक्षिणी फ्रांस के ‘क्लेरमोंट’ नामक शहर में ईसाई संघ की एक महापरिषद् बुलाई जिसमें ईसाई धर्म के यूनानी और लैटिन सम्प्रदायों सहित अन्य सम्प्रदायों के ईसाई भी सम्मिलित हुए।

इस परिषद् में पोप अरबान (द्वितीय) ने एक जोशीले भाषण में समस्त अच्छे ईसाइयों से आग्रह किया- ‘पवित्र भूमि को दुष्ट जाति से छीन लो तथा उसे अपने कब्जे में ले लो। जो लोग इस अभियान में मारे जाएंगे उनको पापों से तत्काल छुटकारा मिल जाएगा, धर्म-युद्ध शुरू हो गया है।’

पोप के इस निर्णय को आलंकारिक भाषा में हिलाल (मुसलमानों का धार्मिक चिह्न- दूज का चांद) के खिलाफ क्रॉस (ईसाइयों का धार्मिक चिह्न- सूली) का क्रूसेड (धर्मयुद्ध) कहा गया। मुसलमानों के ‘जिहाद‘ के विरुद्ध ‘क्रूसेड’ की घोषणा वस्तुतः मुसलमानों को उनकी ही भाषा में जवाब देने जैसा था। इस महापरिषद् के बाद संसार भर में क्रूसेड आरम्भ हो गए। जिहाद तो इस्लाम के जन्म के समय से चल ही रहा था।

दुनिया के तीन हिस्से

ध्यान से देखा जाए तो इस समय दुनिया तीन हिस्सों में बंट गई थी। पहले हिस्से अर्थात् ईसाइयों के झण्डों में तारे झिलमिला रहे थे, दूसरे हिस्से अर्थात् मुसलामनों के झण्डों में चंद्रमा टेढ़ा होकर बैठा था और तीसरे हिस्से अर्थात् हिन्दुओं एवं बौद्धों के झण्डों पर सूर्य जगमगा रहा था। चंद्रमा वाला हिस्सा एक ओर तारों वाले हिस्से को और दूसरी ओर सूर्य वाले हिस्से को निगल जाना चाहता था।

तारों वाले हिस्से द्वारा क्रूसेड की घोषणा किए जाने के पीछे इसी चाहत को नष्ट करने का संकल्प था। सूरज के झण्डों वाले लोग परस्पर लड़ने में लगे थे, उन्होंने कभी भी संगठित होने की बात नहीं सोची। वे स्वयं को सूर्यवंशी कहते थे किंतु प्रतिहार, परमार, चौलुक्य एवं चौहान आदि राजवंशों में बंटकर एक दूसरे को शत्रुवत् देखते थे। चीन, जापान एवं इण्डोनेशिया आदि में भी सूरज के झण्डों वाले लोग रहते थे किंतु वे चांद के झण्डों वाले लोगों से स्वयं को बहुत दूर समझते थे।

क्रूसेड के अंतर्गत आने वाले युद्ध

यूरोप के ईसाइयों ने ई.1095 से ई.1291 के बीच, फिलिस्तीन और उसकी राजधानी जेरूसलम में स्थित ईसा मसीह की कब्र एवं उसके निकट स्थित बड़े गिरजाघर को मुसलमानों से वापस प्राप्त करने के लिए जो युद्ध किए उनको सलीबी युद्ध, ईसाई धर्मयुद्ध, क्रूसेड अथवा क्रूश-युद्ध कहा जाता है। इतिहासकार कुल सात क्रूसेड घटित होने मानते हैं। इनमें से कुछ तो ईसाइयों के परस्पर संघर्ष ही थे तथा उन संघर्षों का धर्म से कोई लेना-देना नहीं था, वे विशुद्ध राजनीति एवं परस्पर ईर्ष्या-द्वेष की उपज थे।

प्रथम क्रूसेड (ई.1096-1099)

ई.1095 में पोप उरबान (द्वितीय) ने ईसाई संघ के माध्यम से विश्व भर के ईसाई समुदाय को आदेश दिया कि- ‘वे पवित्र नगर के उद्धार के लिए सेनाएं सजाएं।’

पोप के आदेश के साथ ही हिलाल के खिलाफ क्रूसेड (धर्मयुद्ध) आरम्भ हो गए। ये कब और कहाँ जाकर समाप्त होने वाले थे, किसी को कुछ पता नहीं था। ये युद्ध ईसाई जगत के घमण्ड की उपज नहीं थे, उनकी विवशता थे।

यदि वे सलीब के युद्धों का मार्ग नहीं अपनाते तो उस काल में चल रही इस्लाम की आंधी में इतनी बुरी तरह नष्ट हो जाते कि आने वाले कुछ ही दशकों में दुनिया में ईसाइयों का नामोनिशान तक नहीं रह जाता। क्योंकि इस्लाम अब अरबी खलीफाओं के हाथों में नहीं रह गया था जो इस्लाम को अरब तथा उसके निकटवर्ती क्षेत्रों तक फैला कर विश्राम की मुद्रा में चले गए थे। इस्लाम का झण्डा इस समय तुर्कों के हाथों में था जो अरबी खलीफाओं की अपेक्षा अधिक युद्ध-प्रिय थे तथा कुछ ही समय पहले मुसलमान बनाए जाने के कारण अधिक उत्साह में थे।

क्रूसेड्स के रूप में ईसाइयों की तरफ से धर्म नामक संस्था को दिया गया विश्व का सबसे बड़ा बलिदान था। लगभग ढाई सौ वर्षों तक ईसाई सेनाएं, इस्लामिक सेनाओं से मोर्चा लेती रहीं। बीच-बीच में युद्ध थम भी जाता था किंतु बंद नहीं होता था। लाखों ईसाई परिवारों ने अपने लाड़ले पुत्रों को धर्म की रक्षा करने के लिए भेज दिया।

प्रथम क्रूसेड में दो प्रकार के क्रूशधरों (धर्म-सैनिकों) ने भाग लिया। पहले वर्ग में फ्रांस, जर्मनी और इटली के जन-सामान्य लोग थे जो मार्च 1096 में लाखों की संख्या में पोप और सेंट पीटर की प्रेरणा से अपने बाल-बच्चों के साथ गाड़ियों पर सामान लादकर ‘ईसाई साधु पीटर’ और अन्य ईसाई प्रेरकों के पीछे पवित्र भूमि की ओर थलमार्ग से कुस्तुंतुनिया होते हुए जेरूसलम की ओर चल दिए। कई लाख युवक अपनी इच्छा से ही अपना घर-बार छोड़कर जेरूसलम में लड़ने-मरने चले गए।

उनमें यह उच्च भावना काम कर रही थी कि चाहे जो हो जाए, ईसा की पवित्र भूमि जेरूसलम को विधर्मियों के चंगुल से मुक्त करवाया जाना चाहिए। कुछ लोगों द्वारा जेरूसलम में मृत्यु को गले लगाने के पीछे पोप द्वारा दिया गया यह आश्वासन कार्य कर रहा था कि ईसा की भूमि पर शरीर गंवाने से ईश्वर के दरबार में उनके अपराध क्षमा कर दिए जाएंगे।

ईसाइयों का यह बलिदान ठीक वैसा ही था, जैसा कि बाद में भारत-भूमि पर मुगल बादशाह औरंगजेब के शासन-काल में भारतीय सिक्खों ने धर्म की रक्षा के लिए अपने लाड़ले बेटों को हँसते-हँसते बलिदान कर दिया था।

अधिकांश ईसाई धर्म-सैनिकों में जोश तो था किंतु उनके पास भोजन सामग्री और परिवहन के साधन नहीं थे। इस कारण वे मार्ग में लूट-खसोट और यहूदियों की हत्या करते गए। इन झगड़ों में बहुत से ईसाई-क्रूशधर जेरूसलम पहुँचने से पहले ही मारे गए।

यह लूट-खसोट इतनी भयावह थी कि पूर्वी रोमन साम्राज्य के एम्परर ने इन क्रूशधरों के कुस्तुंतुनिया नगर पहुँचने पर, दूसरे क्रूशधर दलों की प्रतीक्षा किए बिना ही, उन्हें बास्फोरस के पार उतरवा दिया ताकि वे कुस्तुंतुनिया की जनता के साथ लूट-खसोट नहीं करें। ये धर्म सैनिक जब बास्फोरस से आगे बढ़कर तुर्कों के अधिकार-क्षेत्र में प्रविष्ट हुए तो उनमें से बहुत से, तुर्कों द्वारा बेरहमी से मार दिए गए।

वे नेतृत्व विहीन थे और उन्हें पता नहीं था कि सशस्त्र सेनाओं से किस प्रकार लड़ा जाता है! इस कारण ईसाई क्रूशधरों में दिग्भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई कि अब वे क्या करें! ईसाई धर्म-सैनिकों के बीच उत्पन्न दिग्भ्रम की स्थिति में बुइलों गांव का नॉर्मन नामक एक ईसाई युवक सामने आया। उसने जेरूसलम की ओर बढ़ रहे नेतृत्व-विहीन ईसाई युवकों को संगठित एवं अनुशासित किया तथा उन्हें एक व्यवस्थित सेना का रूप दे दिया।

क्रूशधरों का दूसरा दल पश्चिमी यूरोप के कई सामंतों की सेनाओं के रूप में था जो अलग-अलग मार्गों से कुस्तुंतुनिया पहुँचे। इनमें लरेन का ड्यूक गाडफ्रे और उसका भाई बाल्डविन, दक्षिण फ्रांस स्थित तूलू का ड्यूक रेमोंय, सिसिली के विजेता नार्मनों का नेता बोहेमों आदि सम्मिलित थे।

पूर्वी रोमन सम्राट् ने इन सामंती-सेनाओं को मार्ग, परिवहन, रसद इत्यादि की सुविधाएँ और सैनिक सहायता दी तथा बदले में इन सामंतों से प्रतिज्ञा कराई कि पूर्वी रोमन साम्राज्य के वे भूतपूर्व प्रदेश जो तुर्कों ने हथिया लिए थे, ईसाई राजाओं एवं सामंतों द्वारा जीत लिए जाने पर पूर्वी रोमन साम्राज्य को लौटा दिए जाएँगे।

यद्यपि यूरोपीय राजाओं ने इस प्रतिज्ञा का पालन नहीं किया तथा पूर्वी रोमन सम्राट् ने भी यूरोपीय राजाओं को यथेष्ट सहायता नहीं दी तथापि क्रूशधर सेनाओं को इस युद्ध में पर्याप्त सफलता मिली।

जब कई यूरोपीय देशों की सेनाएं एक साथ तुर्कों के अधिकार वाले क्षेत्र में पहुँचीं तो लाखों की संख्या में पहले से ही प्रतीक्षा कर रहे साधारण ईसाई नागरिक भी धर्मसैनिकों के रूप में इनके साथ हो लिए। तुर्कों ने ईसाइयों की इतनी बड़ी संख्या देखकर, बिना लड़े ही निकाया नगर और उससे संबंधित प्रदेश पूर्वी रोमन सम्राट् को दे दिए तथा उससे समझौता करने का प्रयास किया।

चूंकि यह क्रूसेड पूर्वी रोमन साम्राज्य के खोए हुए हिस्सों को फिर से पाने के लिए नहीं हो रहा था, इसका उद्देश्य तो जेरूसलम पर अधिकार प्राप्त करना था। इसलिए ईसाई सेनाएं आगे बढ़ती रहीं और दोरीलियम नामक स्थान पर उन्होंने तुर्कों को परास्त कर दिया।

वहाँ से आगे बढ़कर ये सेनाएं अंतिओक पहुँचीं। अंतिओक पर आठ महीने के घेरे के बाद उसे भी जीत लिया गया। इससे पहले ही बाल्डविन ने अपनी सेना अलग करके पूर्व की ओर अर्मीनिया के अंतर्गत ‘एदेसा’ नामक प्रदेश पर अधिकार कर लिया। यह भी ईसाइयों की एक बड़ी जीत थी।

नवम्बर 1098 में, सम्मिलित ईसाई सेनाएँ अंतिओक से चलकर मार्ग में स्थित त्रिपोलिस, तीर तथा सिजरिया के शासकों से दंड-राशि वसूल करते हुए जून 1099 में जेरूसलम पहुँची। पाँच सप्ताह के घेरे के बाद जुलाई 1099 में यूरोपीय देशों से आई हुई स्थाई सेनाएं तथा धर्म-सैनिक बनकर आए हुए साधारण नागरिकों के समूह एक दिन जेरूसलम में घुस गए और सेलजुक तर्कों पर टूट पड़े। जेरूसलम में भयानक मारकाट मच गई।

दोनों ही तरफ के लोग लड़ने के जोश में थे तथा जेरूसलम को किसी भी कीमत पर हाथ से नहीं जाने देना चाहते थे। अंत में जेरूसलम पर ईसाई सेनाओं का अधिकार हो गया। जेरूसलम में उपस्थित समस्त मुसलमान और यहूदी नागरिकों की, स्त्रियों और बच्चों सहित निर्मम हत्या कर दी गई। इस प्रकार साढ़े चार सौ साल से अधिक समय बाद जेरूसलम को मुसलमानों से मुक्त करवाया जा सका।

एक फ्रैंच ईसाई युवक ने इस युद्ध के आंखों देखे विवरण में लिखा है- ‘मसजिद की बरसाती के नीचे घुटनों तक खून था जो घोड़ों की लगाम तक पहुँच जाता था।’

इस वियज के बाद लरेन का ड्यूक गॉडफ्रे जेरूसलम का राजा बन गया तथा क्रूशधरों ने जीते हुए प्रदेशों में अपने चार राज्य स्थापित कर लिए। इस कारण पूर्वी रोमन सम्राट् उनसे अप्रसन्न हो गया किंतु इन नए राज्यों को वेनिस तथा जेनोआ आदि नौ-सैनिक शक्तियों ने समर्थन एवं सैनिक सहायता दे दी ताकि इन नए ईसाई राज्यों के सहारे वेनिस एवं जेनोआ से लेकर एशिया तक के पुराने वाणिज्यिक मार्ग को पुनः खोला जा सके।

धर्म-सैनिकों के दो दल, जो नाइट्स टेंप्लर्स (मठ-रक्षक) तथा नाइट्स हॉस्पिटलर्स (स्वास्थ्य-रक्षक) के नाम से प्रसिद्ध हैं, भी इन नए राज्यों के सहायक बन गए। नाइट्स टेंप्लर्स एवं नाइट्स हॉस्पिटलर्स नामक धर्म-सैनिक भी पादरियों और भिक्षुओं की तरह पोप से दीक्षा पाते थे और आजीवन ब्राहृचर्य रखने तथा धर्म, असहाय स्त्रियों और बच्चों की रक्षा करने की शपथ लेते थे।

राजाओं और व्यापारियों के उद्देश्य

जहाँ एक ओर ईसाई युवक उच्च भावनाओं के वशीभूत होकर अपने प्राणों एवं परिवारों का बलिदान दे रहे थे, वहीं दूसरी ओर रोम और कुस्तुंतुनिया अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेक रहे थे। रोम का लैटिन ईसाई संघ स्वयं को कुस्तुंतुनिया के यूनानी ईसाई संघ से श्रेष्ठ एवं बड़ा समझता था जबकि कुस्तुंतुनिया का यूनानी ईसाई संघ पोप की सत्ता को उपेक्षा भरी निगाह से देखता था।

क्रूसेड्स की आड़ में लैटिन और यूनानी ईसाई अर्थात् रोम और कुस्तुंतुनिया एक दूसरे से बड़े हो जाने तथा एक दूसरे पर हावी हो जाने का खेल खेलने लगे जो कभी-कभी आम ईसाई युवकों की समझ में भी आ जाता था।

क्रूसेडों के पीछे वेनिस और जेनोआ के उद्देश्य दूसरे ईसाइयों की अपेक्षा अलग थे। सेल्जुक तुर्कों ने जेरूसलम पर अधिकार करने से पहले, यूरोपीय देशों विशेषकर वेनिस एवं जेनोआ के बंदरगाहों से पूर्व की ओर जाने वाले अर्थात् एशियाई देशों को जाने वाले व्यापारिक मार्गों को अवरुद्ध कर दिया था।

इससे वेनिस एवं जेनोआ के व्यापारियों को बड़ा नुक्सान हो रहा था। यदि क्रूसेड्स में ईसाइयों की विजय हो जाती तो सेल्जुक तुर्क पीछे धकेल दिए जाते तथा पूर्व की ओर जाने वाले व्यापारिक मार्ग पहले की भांति खुल जाते।

जब जन-साधारण महान् उद्देश्यों के लिए स्वयं को बलिदान कर रहा होता है, तब राजनीतिक लोग और व्यापारी अपने-अपने लाभ-हानि का गणित कर रहे होते हैं। वे बलिदान के उच्च आदर्शों से शायद ही कभी अनुप्राणित होते हैं। वे जनता को महानता का पाठ पढ़ाते हैं और अपने वास्तविक उद्देश्यों को बड़ी चतुराई से छिपाकर रखते हैं। ऐसा ही कुछ यहाँ भी हो रहा था।

क्रूसेड का घृणित पक्ष

जब जेरूसलम के आसपास लाखों ईसाई स्त्री-पुरुष एवं बच्चे जमा हो गए और दूर-दूर तक उनके खेमे दिखाई देने लगे तो बहुत से चोर-उचक्के और लुटेरे भी आ-आकर जमा होने लगे ताकि अवसर मिलते ही उनका सामान उठाकर भाग सकें। कुछ ईसाई युवक ऐसे भी थे जो इस धर्मयुद्ध की वास्तविक दिशा को नहीं समझ सके।

उन्होंने मार्ग में मिलने वाले यहूदियों पर आक्रमण करके उन्हें मारना शुरु कर दिया। कुछ उद्दण्ड ईसाई युवकों ने मार्ग में पड़ने वाले गांवों एवं खेतों से अन्न, दूध, मांस आदि की लूट मचानी आरम्भ कर दी। इससे जेरूसलम के चारों तरफ के गांवों में आतंक फैल गया और वे इन युवकों को खदेड़ने के लिए संगठित हो गए। इससे क्रूसेड की दशा और दिशा दोनों बिगड़ने लगी। जेरूसलम के चारों ओर लूट, बलवा, हिंसा, बलात्कार, चोरी और हत्याओं का वातावरण बन गया।

पं. जवाहरलाल नेहरू ने क्रूसेडों में सम्मिलित इन युवकों पर टिप्पणी करते हुए लिखा है- ‘क्रूसेड में शामिल होने वाले लोगों में पुण्यात्मा और धर्मात्मा लोग भी थे और आबादी का वह कूड़ा-कर्कट भी जो हर तरह का जुर्म कर सकता था। इनमें से ज्यादातर ने नीच से नीच और महाघृणित अपराध किए।’

द्वितीय क्रूसेड (ई.1147-1149)

ई.1144 में मोसुल के तुर्क शासक इमादउद्दीन जंगी ने ईसाई शासक से अर्मीनिया के अंतर्गत स्थित ‘एदेसा’ प्रदेश छीन लिया जो ई.1096 से ईसाइयों के अधीन था। एदेसा के ईसाई शासक ने पोप से सहायता मांगी। उस काल के प्रसिद्ध ‘ईसाई संत बर्नार्ड’ ने भी मुसलमान आक्रांता के विरुद्ध क्रूसेड करने के लिए प्रचार किया।

इस पर पश्चिमी यूरोप के दो प्रमुख राजा- फ्रांस का शासक लुई सप्तम् एवं जर्मनी का शासक कोनराड (तृतीय) तीन लाख सैनिकों के साथ थलमार्ग से कुस्तुंतुनिया होते हुए एशिया माइनर पहुँचे। इन राजाओं में परस्पर वैमनस्य और पूर्वी रोमन सम्राट् की उदासीनता के कारण इन्हें कोई सफलता नहीं मिली।

ई.1147 में जर्मन सेना, ‘इकोनियम के युद्ध’ में परास्त हो गई। इसी प्रकार ई.1148 में फ्रांस की सेना भी ‘लाउदीसिया के युद्ध’ में पराजित हो गई। ये सेनाएँ समुद्री मार्ग से अंतिओक होती हुई जेरूसलम पहुँची और वहाँ के ईसाई शासक के सहयोग से दमिश्क पर घेरा डाला परन्तु यहाँ भी इन सेनाओं को कोई सफलता नहीं मिली। इस प्रकार द्वितीय क्रूसेड असफल हो गया तथा ‘एदेसा’ मुसलमानों के ही अधिकार में बना रहा।

तृतीय क्रूसेड (ई.1188-1192)

ई.1187 में मिस्र के सुलतान सलाउद्दीन ने जेरूसलम पर हमला बोल दिया। उसने जेरूसलम के ईसाई राजा को ‘हत्तिन के युद्ध’ में परास्त करके बंदी बना लिया और जेरूसलम पर अधिकार कर लिया। इस कारण पूरे यूरोप में पुनः क्रूसेड भड़क गए। ई.1188 में सुलतान सलाउद्दीन ने फिलीस्तीन के समुद्री तट पर स्थित ‘तीर’ नामक ‘बंदरगाह’ पर आक्रमण किया किंतु वह इस बंदरगाह को ईसाइयों से छीनने में विफल रहा।

अगस्त 1189 में ईसाई सेना ने ‘एकर’ नामक बंदरगाह पर घेरा डाला जो सलाउद्दीन के अधिकार में था। यह घेरा 23 महीने तक चला किंतु इसका कोई परिणाम नहीं निकला। जब अप्रैल 1191 में फ्रांस की सेना और जून 1191 में इंग्लैण्ड की सेना ईसाइयों की सहायता के लिए वहाँ पहुँची तो सलाउद्दीन ने अपनी सेना हटा ली। इस प्रकार जेरूसलम के राज्य में से (जो 1099 में स्थापित चार ईसाई राज्यों में प्रमुख था) केवल समुद्र-तट का वह भाग, जिसमें ये बंदरगाह (एकर तथा तीर) स्थित थे, शेष रह गया।

जेरूसलम में इस बार हिलाल के खिलाफ क्रूसेड ठीक वैसा ही था जिस प्रकार सोलहवीं सदी से लेकर बीसवीं सदी के अंत तक हिन्दू धर्मावलम्बियों ने अयोध्या की रामजन्म भूमि को मुक्त कराने के लिए संघर्ष का मार्ग अपनाया एवं हजारों लोगों ने अपने राजाओं सहित बलिदान दिए। आज इक्कीसवीं सदी में भी न तो जेरूसलम पूरी तरह मुक्त हो पाया है और न अयोध्या की रामजन्म भूमि।

इस क्रूसेड के लिए यूरोप के तीन प्रमुख राजाओं ने बड़ी तैयारी की थी पर अपने स्वार्थों एवं अहंकारों के कारण एक-दूसरे से सहयोग नहीं कर सके और विफल रहे। जर्मन सम्राट् फ्रेडरिक (प्रथम) जिसकी आयु 80 वर्ष से अधिक थी और जिसे यूरोप के इतिहास में लालमुँहा (बार्बरोसा) कहा जाता है, ई.1189 के आरंभ में थलमार्ग से एशिया माइनर (जिसे पहले एशिया कोचक कहते थे और अब तुर्की कहते हैं) की ओर रवाना हुआ।

उसने एशिया माइनर के तुर्क अधिकृत क्षेत्र में प्रवेश करके कुछ प्रदेश जीत लिए किंतु फ्रेडरिक (प्रथम) जून 1190 में आर्मीनिया की एक पहाड़ी नदी को तैरकर पार करते समय डूबकर मर गया। उसके बहुत से सैनिक भी मारे गए। जो सैनिक किसी तरह जीवित बचे, वे आर्मीनिया से भागकर सम्राट के पौत्र फ्रेडरिक (द्वितीय) से ‘एकर’ के घेरे में जा मिले।

फ्रांस का राजा फिलिप ओगुस्तू ‘जेनोआ’ के बंदरगाह से अपनी सेना को पानी के जहाजों में भरकर रवाना हुआ किंतु सिसिली पहुँचने पर उसका इंग्लैण्ड के राजा से विवाद हो गया जो कि अब तक उसका परम मित्र रहा था। इस विवाद के कारण फ्रांस का राजा एक वर्ष तक सिसली से आगे नहीं बढ़ सका और अप्रैल 1191 में एकर पहुँच पाया। तब तक बहुत देर हो चुकी थी। मुस्लिम सेनाएं अपनी स्थिति पर्याप्त मजबूत कर चुकी थीं।

हिलाल के खिलाफ इस क्रूसेड का प्रमुख, इंग्लैण्ड का राजा रिचर्ड (प्रथम) था, जो फ्रांस के एक प्रदेश का ड्यूक भी था और अपने पिता के राज्यकाल में फ्रांस के राजा का परम मित्र रहा था। इसने अपनी सेना फ्रांस में ही एकत्र की और वह फ्रांस की सेना के साथ ही समुद्रतट तक गई। इंग्लैण्ड का समुद्री बेड़ा ई.1189 में ही वहाँ से चलकर ‘मारसई’ के बंदरगाह पर पहुँच गया।

इस सेना का कुछ भाग रिचर्ड के साथ इटली होता हुआ सिसिली पहुँचा। यहाँ फ्रांस नरेश से अनबन हो जाने के कारण लगभग एक वर्ष निकल गया। वहाँ से दोनों अलग हो गए और रिचर्ड ने साइप्रस का द्वीप जीतने के बाद थोड़ा समय अपना विवाह करने में व्यय किया। इस कारण वह फ्रांस के राजा से दो महीने बाद ‘एकर’ के बंदरगाह पर पहुँचा। फिर भी एकर मुक्त करा लिया गया किंतु इसके बाद राजाओं में पुनः मतभेद भड़क गया। इससे नाराज होकर फ्रांस का राजा अपने देश लौट गया।

रिचर्ड ने अकेले ही तुर्कों से नौ लड़ाइयाँ लड़ीं। वह जेरूसलम से लगभग 10 किलोमीटर दूर रह गया किंतु जेरूसलम पर घेरा नहीं डाल सका। अतः उसने युद्ध का मैदान छोड़ दिया और वहाँ से लौटकर सितंबर 1192 में समुद्र तट पर स्थित ‘जफ्फा’ में सुल्तान सलाउद्दीन से संधि कर ली जिससे ईसाई यात्रियों को बिना रोक-टोक के जेरूसलम की यात्रा करने की सुविधा दे दी गई और तीन वर्ष के लिए युद्ध-विराम घोषित कर दिया गया।

युद्ध विराम की अवधि बीत जाने पर जर्मन सम्राट् हेनरी (षष्ठम्) ने जेरूशलम पर आक्रमण किया। ईसाई राजाओं की दो सेनाएँ समुद्री मार्ग से उसकी सहायता के लिए आईं किंतु सेनाओं में समन्वय न होने के कारण हेनरी (षष्ठम्) को कोई सफलता नहीं मिली।

क्रूसेड में शामिल होने वाले राजाओं के व्यवहार एवं आचरण पर टिप्पणी करते हुए जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है- ‘क्रूसेड में शामिल होने वाले बादशाह और एम्परर इस बात पर आपस में ही झगड़ते थे कि बड़ा कौन है और एक दूसरे से ईर्ष्या रखते थे। ये क्रूसेड वीभत्स और क्रूर लड़ाइयों की और अक्सर साजिशों और नीच अपराधों की कहानी हैं।’

क्रूसेड के बीच मानवता के दर्शन

क्रूसेड्स के दौरान दोनों तरफ से होने वाली अमानवीयताओं के बीच कुछ बहुत अच्छे उदाहरण भी देखने को मिले।  एक बार इंग्लैण्ड का राजा ‘शेरदिल रिचर्ड’ फिलीस्तीन में युद्ध के मैदान में लू लगने से गंभीर रूप से बीमार हो गया। वह संसार भर के राजाओं में अपने शारीरिक बल, शौर्य एवं उदारता के लिए विख्यात था।

जब सुल्तान सलाउद्दीन को रिचर्ड को लू लगने की जानकारी हुर्ह तो उसने पहाड़ों से बर्फ की बड़ी-बड़ी सिल्लियां कटवाकर मंगवाई और इंग्लैण्ड के राजा के शिविर में भिजवाईं ताकि राजा के शिविर को ठण्डा रखा जा सके। क्रूसेड्स की पृष्ठभूमि पर 18वीं शताब्दी ईस्वी में वॉल्टर स्कॉट नामक एक अंग्रेजी लेखक ने ‘टैलिसमैन’ शीर्षक से एक उपन्यास लिखा जो पूरी दुनिया में विख्यात हुआ।

लैटिन ईसाइयों का कुस्तुंतुनिया पर अधिकार (चौथा क्रूसेड)

इस क्रूसेड का प्रवर्त्तक रोम का पोप इन्नोसेंट (तृतीय) था। वह ईसाई मत के लैटिन कैथोलिक सम्प्रदाय और यूनानी ऑर्थोडॉक्स सम्प्रदाय को मिलाकर एक करने का प्रबल इच्छुक था। इस कारण वह पूर्वी रोमन साम्राज्य के एम्परर को भी अपने अधीन करना चाहता था। पोप की शक्ति इस समय चरम पर थी।

वह जिस ईसाई राजा को चाहता राज्य दे देता था या राज्य से हटा देता था।। उसकी इस नीति को उस समय के नौसेना और वाणिज्य में सबसे शक्तिशाली राज्य वेनिस और नार्मन जाति की भी सहानुभूति और सहयोग प्राप्त था। संयोगवश पोप को कुस्तुंतुनिया की राजनीति में सीधे-सीधे हस्तक्षेप करने का अवसर मिल गया।

ई.1202 में पूर्वी रोमन साम्राज्य के सम्राट् ईजाक्स को उसके भाई आलेक्सियस ने बंदी बना लिया और उसे अंधा करके स्वयं पूर्वी रोमन साम्राज्य का सम्राट् बन बैठा। इस पर पोप इन्नोसेंट (तृतीय) के आदेश से पश्चिमी रोमन साम्राज्य की सेनाएँ समुद्री मार्ग से कुस्तुंतुनिया पहुँचीं और आलेक्सियस को हटाकर ईजाक्स को फिर से पूर्वी रोमन साम्राज्य की गद्दी पर बैठा दिया।

कुछ समय बाद ईजाक्स की मृत्यु हो जाने पर पश्चिमी-रोमन सेनाओं द्वारा फिर से कुस्तुंतुनिया पर घेरा डाला गया। पश्चिमी-रोमन साम्राज्य की सेनाओं ने कुस्तुंतुनिया पर अधिकार कर लिया तथा कुस्तुंतुनिया को जमकर लूटा। उन्होंने राजकोष से धन, रत्न और कलाकृतियों को निकाल लिया तथा कुस्तुंतुनिया के प्रसिद्ध ‘सेंट साफिया चर्च’ को भी लूट लिया जिसे सम्राट कोंस्टेन्टीन की माता ने बनाया था और जिसकी छत में, कुस्तुंतुनिया के एक एम्परर ने 18 टन सोना लगाया था।

कुस्तुंतुनिया में भी रोमन ईसाई संघ की स्थापना कर दी गई। इसके बाद पोप के आदेश से बैल्जियम के सामंत बल्डिविन को पूर्वी रोमन साम्राज्य का शासक नियुक्त किया गया। इस प्रकार पूर्वी साम्राज्य भी पश्चिमी रोमन साम्राज्य के अधीन हो गया। अगले 60 वर्ष तक यही स्थिति बनी रही। अंत में यूनानी ईसाइयों ने अपनी पुरानी राजधानी पर अधिकार करने का निर्णय लिया और वे संगठित होकर लौट आए। उन्होंने लैटिन ईसाइयों को कुस्तुंतुनिया से मार भगाया। पोप को चुप होकर बैठना पड़ा।

बच्चों का क्रूसेड

हिलाल के खिलाफ क्रूसेड युग की सबसे दुर्दांत घटनाओं में से एक है- ‘बच्चों का क्रूसेड’। प्रत्येक मनुष्य को अपना सम्प्रदाय सच्चे और एक मात्र अनुकरणीय धर्म के रूप में दिखाई देता है। उसके मन में निवास करने वाली यह भावना उसे अपने धर्म को ऊँचा ले जाने तथा दूसरों के मत या सम्प्रदाय को नीचा दिखाने की ओर प्रवृत्त करती है। कभी-कभी यह भावना बच्चों को भी भीतर से जकड़ लेती है। इसी बालसुलभ मनोविज्ञान के चलते बच्चों के क्रूसेड की अत्यंत विनाशकारी दुर्घटना घटित हुई।

हालांकि मानव जाति का इतिहास एक से बढ़कर एक क्रूर घटनाओं से भरा पड़ा है किंतु बच्चों का क्रूसेड इतिहास की उन क्रूरतम घटनाओं में से एक है जिसकी मिसाल अन्यत्र मिलना कठिन है। ई.1212 में फ्रांस और जर्मनी के नागरिकों में जेरूसलम को मुक्त करवाने की भावना अपने चरम पर थी। उन्हीं दिनों फ्रांस में स्तेफाँ नामक एक किसान ने, जो कुछ चमत्कार भी दिखाता था, घोषणा की कि- ‘उसे ईश्वर ने मुसलमानों को परास्त करने के लिए धरती पर भेजा है और यह पराजय बालकों के द्वारा होगी।’ 

इस प्रकार बालकों के धर्मयुद्ध का प्रचार हुआ। 30,000 बालक-बालिकाएँ, जिनमें से अधिकांश 12 वर्ष से कम अवस्था के थे, क्रूसेड के पवित्र उद्देश्य के लिए सात जहाजों में बैठकर फ्रांस के दक्षिणी बंदरगाह ‘मारसई’ से रवाना हुए। उन्हें विश्वास दिलाया गया कि वे मार्ग में आने वाले अन्य समुद्रों की यात्राओं को पैदल चलकर ही संपन्न कर लेंगे।

दुर्भाग्यवश दो जहाज समस्त यात्रियों सहित समुद्र में डूब गए। शेष जहाजों के यात्री सिकंदरिया में पकड़ लिए गए और दास बनाकर बेच दिए गए। इनमें से कुछ बच्चे 17 वर्ष उपरांत ईसाइयों एवं मुसलमानों में हुई एक संधि के बाद गुलामी से मुक्त हुए।

उसी वर्ष अर्थात् ई.1212 में ही 20,000 बच्चों का दूसरा दल जर्मनी में तैयार किया गया। जब यह दल ‘जेनोआ’ पहुँचा तो वहाँ के चर्च के सबसे बड़े पादरी ने बच्चों को वापस अपने घरों को लौट जाने का परामर्श दिया। जब ये बालक जर्मनी लौट रहे थे तो उनमें से बहुत से बच्चे पहाड़ी-यात्रा की कठिनाइयों के कारण भूख-प्यास एवं बीमारियों से मर गए।

जब फ्रांस और जर्मनी से बालकों के दल क्रूसेड के लिए रवाना हुए तो अन्य ईसाई देशों के बच्चों में भी क्रूसेड के लिए जोश उत्पन्न हुआ और वे भी ईसा मसीह की पवित्र कब्र को मुसलमानों से मुक्त करवाने के लिए फिलीस्तीन के लिए भाग खड़े हुए। उनमें से कितने ही बच्चे मार्ग की कठिनाइयों, भूख-प्यास और बीमारियों से मर गए। कुछ बदमाशों ने फिलीस्तीन की तरफ भाग रहे बच्चों को अगुआ करके गुलामों के रूप में मुस्लिम देशों में भेज दिया।

‘मार्सेल्स’ में इस काम के लिए बड़े गिरोह संगठित हो गए। वे इन बच्चों से वायदा करते थे कि उन्हें फिलीस्तीन पहुँचा दिया जाएगा। जब बच्चे उनके विश्वास में आ जाते तो बदमाशों के गिरोह इन बच्चों को गुलामों के व्यापारियों के हाथों में बेच देते। गुलामों के व्यापारी इन बच्चों को अपने जहाजों में भरकर मिस्र ले जाते जहाँ उनका खतना करके मुसलमान बना दिया जाता और मुस्लिम अमीरों को बेच दिया जाता।

क्रूसेड की बड़ी दुर्घटनाएं

न तो फिलीस्तीन ईसाइयों के हाथ आता था और न हिलाल के खिलाफ क्रूसेड्स का अंत आता था। ईसाई जन-समुदाय यीशू की पवित्र भूमि को पाने के लिए अपना रक्त बहाए जा रहा था। इस दौरान कई बड़ी दुर्घटनाएं भी हुईं। जब इंग्लैण्ड का सम्राट रिचर्ड स्वस्थ होकर वापस अपने देश लौट रहा था तो मार्ग में उसे मुसलमानों ने पकड़ लिया।

उसे बड़ी रकम देकर छुड़ाया गया। फ्रांस के सम्राट को फिलीस्तीन में ही पकड़ लिया गया। उसे भी बड़ी राशि देकर छुड़ाया गया। पवित्र रोमन साम्राज्य का एम्परर फ्रेडरिक (प्रथम) अर्थात् फ्रेडरिक बारबरोसा क्रूसेड में भाग लेने के लिए फिलीस्तीन गया और आर्मीनिया क्षेत्र में तैर कर नदी पार करते हुए मर गया।

मंगोलों की आंधी

बारहवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में, मध्य-एशिया में मंगोलों की आंधी उठी। हिंसक मंगोल लुटेरे टिड्डी दलों की तरह मध्य-एशिया से निकल कर चारों दिशाओं में स्थित दुनिया को बर्बाद कर देने के लिए बेताब हो रहे थे। यही कारण था कि सम्पूर्ण मुस्लिम जगत् एवं सम्पूर्ण ईसाई जगत् इस आंधी की भयावहता को देखकर थर्रा उठे।

मंगोल सेनाएं जिस दिशा में मुड़ जाती थीं, उस दिशा में बर्बादी की निशानियों के अलावा और कुछ नहीं बचता था। इस काल में भारत तथा दक्षिण-पूर्वी ऐशिया के बहुत से हिन्दू राज्य, मध्य एशिया से आए तुर्कों के अधीन थे और पहले से ही भारी विपत्ति में पड़े हुए थे।

जब मंगोल नेता चंगेज खाँ अपने भयानक इरादों के साथ दुनिया पर चढ़ बैठा तो दुनिया का नक्शा तेजी से बदलने लगा। इस क्रूर आक्रांता का नाम सुनते ही यूरोपीय देशों के एम्पररों और अरब देशों के सुल्तानों की घिघ्घियाँ बंध जाती थीं। भारत के तुर्क सुल्तान, मंगोलों का नाम सुनते ही अपनी राजधानी छोड़कर दूर कहीं जाकर किलों में बंद हो जाते थे। ई.1227 में जब चंगेज खाँ मरा तब वह संसार के सबसे बड़े साम्राज्य का स्वामी था।

मंगोलों को ईसाई बनाने के प्रयास

ई.1252 में मंगूखाँ मंगोलों का नेता हुआ। मंगोलों के इतिहास में उसे ‘खान महान’ कहा जाता है। इस काल तक मंगोल लोग किसी धर्म को नहीं मानते थे। मुसलमानों, ईसाइयों तथा बौद्धों में होड़ मची कि किसी तरह मंगूखाँ को प्रसन्न करके उसे अपने धर्म में सम्मिलित कर लिया जाए।

पोप ने भी रोम से अपने एलची भेजे। नस्तोरियन ईसाई भी पूरी तैयारी के साथ मंगोल सरदार के चारों ओर मण्डराने लगे। मुसलमान और बौद्ध प्रचारक भी तेजी से अपने काम में जुट गए किंतु मंगूखाँ को धर्म जैसी चीज में अधिक रुचि नहीं थी

फिर भी वह ईसाई बनने को तैयार हो गया। जब रोम के एलचियों ने मंगूखाँ को पोप तथा उसके चमत्कारों की कहानियां सुनाईं तो मंगूखाँ भड़क गया और उसने कोई भी धर्म स्वीकार करने से मना कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि मंगूखाँ के बाद जो मंगोल सरदार जिस क्षेत्र में राज्य करता था, उसने वहीं के लोगों का धर्म अपना लिया। चीन और मंगोलिया के मंगोल बौद्ध हो गए। मध्य एशिया के मंगोल मुसलमान हो गए। रूस और हंगरी में रह रहे मंगोल ईसाई हो गए। 

पाँचवा क्रूसेड (ई.1228-29)

पवित्र रोमन साम्राट का एम्परर फ्रेडरिक (द्वितीय) अपने समय का बहुत प्रभावशाली राजा हुआ। वह फ्रेडरिक (प्रथम) का पौत्र था तथा अपने दादा की ही तरह पोप की बिल्कुल परवाह नहीं करता था। उसके काल में पोप और एम्परर के बीच झगड़ा इतना बढ़ा कि पोप ने ‘एम्परर’ को ईसाई संघ से बाहर निकाल दिया किंतु एम्परर फ्रेडरिक (द्वितीय) ने पोप की ओर कोई ध्यान नहीं दिया।

फ्रेडरिक को संसार का चलता-फिरता आश्चर्य कहा जाता था। वह दुनिया की कई भाषाएं जानता था जिनमें अरबी भी शामिल थी। इन भाषाओं के बल पर वह किसी को भी प्रभावित करने की क्षमता रखता था।

इस समय तक यद्यपि चंगेज खाँ मर चुका था तथापि दुनिया पर मंगोलों के आक्रमणों का खतरा अभी टला नहीं था। इसलिए फ्रेडरिक (द्वितीय) ने क्रूसेड्स को समाप्त करने के लिए मुसलमानों से युद्ध करने की बजाय सुलह-समझौते का मार्ग अपनाया। पोप उसके विचार से सहमत नहीं हुआ किंतु ई.1228-29 में तुर्कों से सुलह-समझौता करने के लिए फ्रेडरिक स्वयं फिलीस्तीन गया और उसने मिस्र के सुल्तान से भेंट करके अपनी ओर से शांति का प्रस्ताव रखा ताकि उस पवित्र समाधि को प्राप्त किया जा सके जिसे पाने के लिए ईसाई विगत सौ साल से भी अधिक समय से लड़-मर रहे थे।

अंत में दोनों पक्षों में शांति-सुलह हो गई। फ्रेडरिक ने पवित्र भूमि के मुख्य स्थान येरूशलम, बेथलहम, नजरथ, टौर, सिडान तथा उनके आसपास के क्षेत्र प्राप्त कर लिए। इस बार उसने किसी ईसाई देश के सामंत को जेरूसलम की राजगद्दी पर नहीं बैठाया अपितु वह स्वयं ही जेरूसलम की राजगद्दी पर बैठ गया।

छठा क्रूसेड (ई.1248-54)

पोप की ही तरह अधिकांश तुर्कों को भी, मिस्र के सुल्तान एवं ईसाइयों के राजा के बीच हुई यह संधि अच्छी नहीं लगती थी। इसलिए वे फिर से जेरूसलम पर अधिकार करने की तैयारी करने लगे। अंत में ई.1244 में खोबा के शासक जलालुद्दीन ख्वारिज्मशाह ने जेरूसलम पर अधिकार कर लिया।

उसने जेरूसलम के पवित्र स्थानों को क्षति पहुँचाई और जेरूसलम के ईसाइयों की हत्या कर दी। फ्रांस के राजा लुई (नवम्) ने (जिसे संत की उपाधि प्राप्त हुई) ई.1248 और 1254 में दो बार इन स्थानों को फिर से लेने के प्रयास किए किंतु उसे सफलता नहीं मिली।

वह ई.1248 में फ्रांस से समुद्र-मार्ग से रवाना होकर साइप्रस होता हुआ ई.1249 में ‘दमएता’ पहुँचा। उसने दमएता पर विजय प्राप्त कर ली किंतु ई.1250 में ‘मारसई की लड़ाई’ में परास्त हो गया। उसे अपनी पूरी सेना के साथ अपमानजनक आत्मसमर्पण करना पड़ा। लुई (नवम्) ने चार लाख स्वर्ण-मुद्राएं तथा दमएता मुसलमानों को देकर बड़ी कठिनाई से मुक्ति पाई। इसके उपरांत चार वर्ष तक वह ‘एकर बंदरगाह’ को बचाने का प्रयास करता रहा।

सातवां क्रूसेड (ई.1270-72)

जब ई.1268 में तुर्कों ने ईसाइयों से अंतिओक भी छीन लिया, तब फ्रांस के राजा लुई (नवम्) ने हिलाल के खिलाफ एक और क्रूसेड किया। उसे आशा थी कि उत्तरी अफ्रीका में ‘त्यूनास’ का राजा ईसाई हो जाएगा। लुई (नवम्) उत्तरी अफ्रीका पहुँचा किंतु वहाँ पहुँचकर प्लेग से मर गया। इंग्लैण्ड के राजकुमार एडवर्ड ने इस युद्ध को जारी रखा जो आगे चलकर ई.1272 में एडवर्ड (प्रथम) के नाम से इंग्लैण्ड का राजा हुआ।

उसने अफ्रीका में और कोई कार्यवाही नहीं की। वह सिसली होता हुआ फिलिस्तीन पहुँचा। उसने मुलसमानों द्वारा किए गए ‘एकर’ के घेरे को तोड़ डाला और मुसलमानों को दस वर्ष के लिए युद्ध-विराम करने को बाध्य किया। फिलिस्तीन में अब केवल ‘एकर’ बंदरगाह ही ईसाइयों के हाथ में बचा था और अब वही उनके छोटे से राज्य की राजधानी था। ई.1291 में तुर्कों ने उसे भी ले लिया।

तुर्कों का कुस्तुंतुनिया पर अधिकार

इस समय ईसाई जगत् एक ओर तो मुसलमानों से लड़ने के कारण और दूसरी ओर परस्पर झगड़ों के कारण लगातार छीजता जा रहा था जबकि मुसलमानों का राज्य पूरी दुनिया में तेजी से विस्तार पाता जा रहा था। अंत में ई.1453 में तुर्कों ने यूनानी ईसाइयों को परास्त करके कुस्तुंतुनिया से उनका सफाया कर दिया और कुस्तुंतुनिया हमेशा के लिए मुसलमानों के अधिकार में चला गया जिसका वर्णन हम पूर्व में कर चुके हैं।

बीसवीं सदी में जेरूसलम के एक हिस्से पर ईसाइयों का अधिकार

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ई.1918 में इंग्लैण्ड के एक सेनापति ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर तुर्कों से जेरूसलम छीन लिया। वर्तमान समय में जेरूसलम के एक हिस्से पर मुसलमानों का, दूसरे हिस्से पर यहूदियों का, तीसरे हिस्से पर आर्मेनियन ईसाइयों का तथा चौथे हिस्से पर कैथोलिक ईसाइयों का अधिकार है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पोप एवं रोमन सम्राट में टकराव का चरम (26)

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पोप एवं रोमन सम्राट में टकराव का चरम

पोप एवं रोमन सम्राट में टकराव सत्ता में अधिकारों को लेकर आरम्भ हुआ और जब दोनों में शक्ति संतुलन स्थापित नहीं हो सका तो यह टकराव चरम पर पहुंच गया।

फ्रेडरिक लालमुँहा

बारहवीं एवं तेरहवीं शताब्दी ईस्वी में रोमन साम्राज्य की बागडोर ‘होहेन्तॉफेन’ नामक ईसाई राजवंश के हाथों में रही। होहेन्तॉफेन जर्मनी का एक छोटा सा कबीला या गांव  था। इस कबीले या गांव से सम्बन्धि होने के कारण यह वंश ‘होहेन्तॉफेन’ राजवंश कहलाता था। इस वंश का राजा फ्रेडरिक (प्रथम) ई.1152 में रोम का एम्परर हुआ। इसे फ्रेडरिक लालमुँहा (बार्बरोसा) भी कहते हैं।

कहा जाता है कि पवित्र रोमन साम्राज्य में उसका शासन सबसे शानदार था। जर्मन लोगों के लिए तो वह एक आदर्श ही था। उसकी वीरता के किस्से इतने बढ़-चढ़ कर यूरोप में विख्यात हो गए थे कि वह काल्पनिक कहानियों का राजकुमार बन गया। जर्मन लोगों को सदियों तक यह विश्वास रहा कि फ्रेडरिक किसी गुफा में सो रहा है और यदि कभी भी जर्मनी पर संकट आएगा तो वह नींद से उठकर हमें बचाएगा।

फ्रेडरिक उन राजाओं में से था जो राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि मानते थे और प्रजा पर शासन करना अपना नैसर्गिक अधिकार समझते थे। उसका कहना था कि- ‘प्रजा का काम यह नहीं है कि वह राजा को कानून बताए। उसका काम, राजा का आदेश मानना है।’

फ्रेडरिक अपने राज्य को अपने ढंग से जमाना चाहता था तथा उसमें अनुशासन लाना चाहता था किंतु इस काम में रोम का पोप तथा उसके अपने सामंत सबसे बड़ी बाधा थे। इस कारण फ्रेडरिक के सामाने तीन मोर्चों से एक साथ निबटने की चुनौती थी। पहली चुनौती पोप, दूसरी चुनौती रोम के सामंत तथा तीसरी चुनौती फिलीस्तीन के मोर्चे पर चल रहा क्रूसेड!

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फ्रेडरिक ने बहुत आत्म-विश्वास के साथ पोप की अवहेलना की किंतु पोप ने उसे ईसाई संघ से बाहर निकाल दिया। इस प्रकार पोप, एम्परर पर भारी पड़ गया और फ्रेडरिक को नीचा देखना पड़ा। सामंतों के साथ हुए झगड़े में एम्परर ने सामंतों के अधिकारों को कुचलने का प्रयास किया किंतु यहाँ भी उसे सफलता नहीं मिली। बड़े-बड़े सामंतों के प्रभाव के कारण इस काल में इटली में बड़े-बड़े नगर पनप रहे थे किंतु एम्परर ने इन नगरों को पनपने से रोकने का प्रयास किया ताकि सामंतों की बढ़ती हुई शक्ति पर अंकुश लगाया जा सके किंतु सम्राट को इस कार्य में सफलता नहीं मिल सकी। फ्रेडरिक के काल में जर्मनी में भी बड़े-बड़े नगर पनप रहे थे। आज के कोलोन, हैम्बर्ग तथा फ्रैंकफर्ट उसी काल में बसे हुए जर्मन नगर हैं। इन नगरों के सम्बन्ध में फ्रैडरिक की नीति इटली के नगरों से बिल्कुल उलटी थी। इटली में जहाँ वह बड़े नगरों को पनपने से रोक रहा था, वहीं अपने मूल देश में वह बड़े नगरों के विकास के लिए राज्य की ओर से सहायता कर रहा था। अंत में फ्रेडरिक (प्रथम) क्रूसेड में भाग लेने के लिए एक बड़ी सेना के साथ फिलीस्तीन चला गया।

यहाँ भी उसे विशेष सफलता नहीं मिली और दुर्भाग्यवश एक नदी पार करते समय उसी में डूब कर मर गया। फ्रेडरिक के जीवन को देखने से लगता है कि वह हर तरह से असफल राजा था किंतु वास्तव में ऐसा नहीं है। इतनी सारी असफलताओं के उपरांत भी उसकी झोली में अनेक सफलताएं थीं। उसके समय में रोम का राज्य बहुत अनुशासित हो गया था जिससे प्रजा को सुख मिला था तथा प्रजा उसका गुणगान करती थी। वह न केवल जर्मनी या इटली में अपितु पूरे यूरोप में बहुत लोकप्रिय था।

फ्रेडरिक (द्वितीय)

फ्रेडरिक बार्बरोसा के पोते का नाम भी फ्रेडरिक था। उसे इतिहास में फ्रेडरिक (द्वितीय) के नाम से जाना जाता है। वह ई.1212 में रोम का शासक बना। उस समय उसकी आयु बहुत कम थी। फ्रेडरिक (प्रथम) की तरह फ्रेडरिक (द्वितीय) भी ‘रोम के पोप’ को प्रजा की उन्नति में बाधक समझता था तथा पोप के अधिकारों को सीमित करके शासन में उसके हस्तक्षेप को समाप्त करना चाहता था।

इस कारण शीघ्र ही उसकी पोप से ठन गई। फ्रेडरिक (द्वितीय) अपने दादा के स्वभाव से बिल्कुल उलटा था। उसने पोप के सामने सिर नहीं झुकाया और अपनी सत्ता के सर्वोपरि होने की स्पष्ट घोषणा करता रहा। पोप ने फ्रेडरिक के नाम कुछ आदेश जारी किए जिन्हें फ्रेडरिक ने मानने से मना कर दिया। पोप और सम्राट के बीच पत्रों के माध्यम से तीखी बहस हुई।

इस पर पोप ने फ्रेडरिक को ईसाई संघ से बाहर कर दिया। यह पोप का पुराना हथियार था जिसके बल पर वह रोम के जर्मन राजाओं पर आदेश चलाता रहा था किंतु इस बार उसका पाला फ्रेडरिक (द्वितीय) से पड़ा था जिसने न केवल पोप का उपहास उड़ाया अपितु यूरोप के बहुत से राजाओं को पोप के कारनामों के बारे में लम्बे-लम्बे पत्र भिजवाए।

इन पत्रों के अंत में दुनिया भर के राजाओं से यह अपील की गई थी कि वे पोप के आदेशों को न मानें, पोप की भूमिका केवल धार्मिक मामलों तक सीमित है। उसे राजाओं को आदेश देने और राजकाज में बाधा उत्पन्न करने का कोई अधिकार नहीं है। उसने अपने पत्रों में बहुत से पादरियों के कारनामों की जानकारी देते हुए रोम के पादरियों में पनप रहे भ्रष्टाचार का कच्चा चिट्ठा पूरी दुनिया के शासकों को लिख भेजा। उसने पोप को कुछ पत्र लिखकर पोप पर कई आरोप लगाए तथा इन पत्रों के माध्यम से पोप को अपमानित किया।

एम्परर द्वारा किए गए इस आक्रामक पत्राचार से पोप की प्रतिष्ठा को बहुत आघात पहुँचा। यूरोप के अधिकांश राजा फ्रेडरिक (द्वितीय) की बातों से सहमत हो गए तथा उन्होंने पोप को राजा के काम में हस्तक्षेप न करने की सलाहें लिख भेजीं। इस कारण पोप ने स्वयं को बहुत अपमानित एवं निरुत्साहित अनुभव किया। पोप की असली शक्ति ये राजा ही तो थे जो उसके आदेशों पर अपने-अपने राज्य की जनता को हांकते थे। पोप इस बात को अच्छी तरह समझता था कि यदि राजाओं ने ही पोप को दूर कर दिया तो फिर ईसाई जगत् में पोप की प्रतिष्ठा एवं हैसियत क्या रह जाएगी!

फ्रेडरिक के दरबार में यहूदी तथा अरबी दार्शनिक भी आते थे। अरबी दार्शनिकों के माध्यम से ही फ्रेडरिक ने यूरोप में अरबी अंकों और बीज गणित का प्रचलन आरम्भ किया। ये अंक भारत से अरब एवं अरब से यूरोप पहुँचे। फ्रेडरिक ने नेपल्स में विश्वविद्यालय तथा एक बड़ा मेडिकल स्कूल आरम्भ किया।

वह ई.1250 तक रोमन साम्राज्य पर राज्य करता रहा। वह ‘होहेन्तॉफेन’ वंश का अंतिम सम्राट सिद्ध हुआ। उसकी मृत्यु के बाद रोमन साम्राज्य बिखरने लगा। इटली अलग हो गया। लुटेरे एवं डाकू पूरे साम्राज्य में लूटमार करते थे और इन्हें रोकने वाला कोई नहीं था।

जर्मन राज्य के लिए रोमन साम्राज्य का बोझ इतना भारी पड़ा कि वह उसे सहन नहीं कर सका और टुकड़े-टुकड़े हो गया। इंग्लैण्ड और फ्रांस के शासक अपनी-अपनी स्थिति मजबूत करने लगे और अपने अधीन सामंतों की शक्ति को दबाकर अपने अधीन करने लगे। जर्मनी का सम्राट पोप एवं इटली के अन्य राज्यों से लड़ने में इतना व्यस्त हो गया कि वह जर्मनी के सामंतों को नहीं दबा सका।

इस कारण इंग्लैण्ड और फ्रांस ने जर्मनी की अपेक्षा बहुत पहले राष्ट्रों का स्वरूप धारण करना आरम्भ कर दिया जबकि जर्मनी में बीसवीं सदी के आरम्भ तक छोटे-छोटे राजाओं का जमघट लगा रहा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इनक्विजिशन की स्थापना (27)

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इनक्विजिशन की स्थापना

कैथोलिक चर्च के इतिहास में इनक्विजिशन का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इनक्विजिशन का अर्थ है जाँच-पड़ताल। यह एक तरह का न्यायाधिकरण है जिसकी स्थापना कैथोलिक धर्म के सिद्धान्तों से भटकने वाले व्यक्तियों का पता लगाकर उन्हें दण्ड दिलवाने के लिए सरकार को सौंपने के उद्देश्य से हुई थी।

कैथोलिक धर्म के अधिकारी अपने धार्मिक विश्वासों के अनुरक्षण तथा भ्रामक सिद्धान्तों के प्रचार को रोकने के प्रति आरम्भ से ही सतर्क रहे ताकि धर्म का पवित्र स्वरूप सुरक्षित रखा जा सके। चौथी शताब्दी ईस्वी में कैथोलिक धर्म को रोमन साम्राज्य की ओर से मान्यता मिली।

इसके साथ ही अन्य धर्मों पर प्रतिबंध लगा दिया गया किंतु बहुत से लोग चोरी-छिपे प्राचीन रोमन धर्म को मानते रहे तथा बहुत से लोग ईसाई धर्म को अपनाने से मना करते रहे। इसे धर्म-द्रोह के साथ-साथ राजद्रोह भी माना गया और ऐसे लोगों को ढूंढ-ढूंढ कर दण्डित किया जाने लगा। बाद में यूरोप के अधिकांश देशों में कैथोलिक ईसाई-धर्म ‘राज-धर्म’ के रूप में स्वीकृत हो गया।

उन देशों में भी कैथोलिक धर्म के प्रति विद्रोह करना राजद्रोह माना जाने लगा। वहाँ की सरकारें कैथोलिक धर्म के विरोध में प्रचार करनेवालों को निर्वासन, संपत्ति की जब्ती, जेल एवं जीवित जला देने जैसे दंड देती थी।

इस काल में पोप की दृष्टि इतनी संकुचित हो गई थी कि जो ईसाई समूह, कैथोलिक धर्म की मान्यताओं के साथ-साथ अपनी स्थानीय परम्पराओं को भी मानते थे या कैथोलिक मत की किसी मान्यता पर अपना स्वतंत्र मत प्रस्तुत करते थे, उन्हें गैर-ईसाई घोषित किया जाने लगा तथा उनके विरुद्ध क्रूसेड की घोषणा करके उन समूहों का सफाया किया जाने लगा। इसके पीछे मंशा यह थी कि कैथोलिक धर्म का स्वरूप हर जगह ठीक एक जैसा दिखे तथा वह वैसा ही हो जैसा कि रोमन चर्च कह रहा था। 

आर्नोल्ड को मृत्युदण्ड

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कुछ लोगों ने अनुभव किया कि पोप तथा उसके शिष्य विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं तथा विलासिता पर अपार धन व्यय करते हैं। इस कारण कुछ लोग पोप एवं धर्म की अवहेलना करने लगे। कुछ लोगों को तो कैथोलिक मत से ही विश्वास समाप्त होने लगा और वे अन्यत्र प्रकाश ढूंढने लगे अर्थात् किसी दूसरे धर्म की भी तलाश करने लगे। सम्राट और पोप के बीच चलने वाले विवादों तथा क्रूसेड की असफलताओं एवं दीर्घकालिकता ने भी कुछ ईसाइयों को ईसाई धर्म से दूर करने का काम किया। इस पर ईसाई संघ के कुछ पदाधिकारियों ने जनता पर जोर-जबर्दस्ती आरम्भ कर दी। ईसाई धर्म की मान्यताओं एवं पदाधिकारियों के आचरण पर अंगुली उठाने वाले लोगों की शंकाओं का समाधान प्रेम एवं सद्व्यवहार से करने की बजाय डण्डे एवं सूली का प्रयोग किया गया। इस कारण स्थिति और अधिक बिगड़ गई। डण्डे से बदमाश को काबू में किया जा सकता है किंतु जन-सामान्य को नेतृत्व करने वालों के उच्च नैतिक जीवन एवं सदाचरण से ही विश्वास एवं नियंत्रण में लिया जा सकता है। ई.1155 में इटली के ‘ब्रेशिया’ नगर में आर्नोल्ड नामक एक लोकप्रिय धर्मोपदेशक हुआ जो पादरियों के भ्रष्टाचरण और विलासमय जीवन के विरुद्ध प्रचार करता था।

ईसाई-संघ ने उसे पकड़ कर फांसी पर लटका दिया तथा उसके शव को जलाकर उसकी राख को टाइबर नदी में फैंक दिया। आर्नोल्ड अंतिम समय तक अपनी बातों को दोहराता रहा और शांत रहा। 

फ्रांसिस संघ से टकराव

ई.1181 में इटली के असीसी नामक एक गांव में फ्रांसिस नामक धनवान व्यक्ति हुआ। उसने अपनी सम्पत्ति का त्याग कर दिया और वह धर्म के मार्ग का अनुसरण करके निर्धनता में जीवन व्यतीत करने लगा तथा स्थान-स्थान पर घूमकर निर्धनों एवं बीमारों की सेवा करने लगा। बाद में वह कोढ़ियों की सेवा करने लगा क्योंकि संसार में वे सबसे अधिक दुःखी और बेसहारा थे।

बहुत से लोग उसके अनुयायी हो गए। फ्रांसिस ने उन लोगों की सहायता से एक संघ का निर्माण किया जिसे ‘सेंट फ्रांसिस संघ’ कहा जाता था। यह संघ भारतीय बौद्ध संघ से मिलता-जुलता था जो दीन-दुखियों की सेवा के लिए समर्पित था। फ्रांसिस का पूरा जीवन लोगों की सेवा करते हुए एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमने तथा सेवा-धर्म का प्रचार करने में बीता। यह ठीक ईसा मसीह के जीवन की तरह था। हजारों ईसाई उसकी शरण में आते और उसका शिष्यत्व स्वीकार कर लेते।

संत फ्रांसिस क्रूसेड्स के दौरान फिलीस्तीन और मिस्र भी गया और उसने अपने शिष्यों को साथ लेकर वहाँ भी दीन-दुखियों एवं बीमारों की सेवा की। हालांकि वह ईसाई था और क्रूसेड्स का युग चल रहा था फिर भी मुसलमान इस ईसाई संत की बहुत इज्जत करते थे तथा उसके काम में बाधा उत्पन्न नहीं करते थे।

ई.1226 में इस संत का निधन हो गया। उसकी मृत्यु के बाद ईसाई संघ के पदाधिकारियों एवं फ्रांसिस संघ के पदाधिकारियों में टक्कर हो गई। इस युग का ईसाई संघ नहीं चाहता था कि लोग गरीबी का जीवन जीने पर इतना अधिक जोर दें किंतु फ्रांसिस संघ के साधुओं ने अपने सिद्धांत त्यागने से मना कर दिया।

अब ईसाई संघ कोई ऐसी व्यवस्था ढूंढने लगा कि लोग चर्च द्वारा बताए गए मार्ग से अलग कोई सिद्धांत, नियम, व्यवहार एवं आचरण न अपनाएं। शीघ्र ही उन्होंने ‘इनक्विजिशन’ के रूप में एक एक उपकरण ढूंढ लिया।

अल्बीजंसस सम्प्रदाय का उदय

12वीं शताब्दी ईस्वी में जर्मनी एवं फ्रांस आदि यूरोपीय देशों में कुछ अलग सिद्धांतों वाले ईसाई सम्प्रदायों के प्रचार के कारण कैथोलिक सम्प्रदाय वालों एवं अन्य सम्प्रदाय वालों में झगड़े होने लगे। इससे यूरोपीय देशों में सामाजिक तथा राजनीतिक अशांति फैलने लगी। फ्रांस के दक्षिणी भागों में ‘अल्बीजंसस’ नामक सम्प्रदाय अधिक लोकप्रिय हो गया।

इस सम्प्रदाय के लोगों की धारणा थी कि- ‘समस्त भौतिक जगत् (प्रकृति) किसी दुष्ट पुरुष की सृष्टि है तथा मानव शरीर भी दूषित है। इसलिए आत्महत्या करना उचित है किंतु विवाह करना बुरा है क्योंकि वह शारीरिक जीवन को बनाए रखने का साधन है।’

इस सम्प्रदाय के ‘सिद्ध’ लोग ब्रह्मचर्य का पालन करते थे किंतु अपने साधारण अनुयायियों को यह शिक्षा देते थे कि- ‘यदि कोई पूर्ण संयम न रख सके तो उसके लिए विवाह की अपेक्षा व्यभिचार करना ही अच्छा है।’

इस सम्प्रदाय के विरुद्ध फ्रांस की ईसाई जनता की ओर से उग्र प्रतिक्रिया हुई। इस कारण फ्रांस की सरकार ने ‘अल्बीजंसस’ के अनुयायियों को प्राणदंड देने का निर्णय किया।

चर्च ने इस सम्प्रदाय के लोगों का पता लगाने की जिम्मेदारी ली। इस उद्देश्य से ई.1233 में इनक्विजिशन नामक संस्था की स्थापना हुई और बाद में वह प्रायः समस्त ईसाई देशों में फैल गई। यह एक तरह का न्यायालय था। इसके पदाधिकारी रोमन चर्च की ओर से नियुक्त होते थे तथा वे पूरे देश का दौरा किया करते थे।

अभियुक्तों से अनुरोध किया जाता था कि वे अपने भ्रामक सिद्धान्त त्यागकर पश्चाताप करें। जो लोग इसके लिए तैयार नहीं होते थे, उन्हें पकड़कर सरकार को सौंप दिया जाता था ताकि उन्हें दण्ड दिलवाया जा सके।

कुछ लोगों पर संदेह होने पर अथवा किसी के द्वारा उनके विरुद्ध शिकायत किए जाने पर न्यायाधिकरण के पदाधिकारों द्वारा अभियुक्त से सवाल-जवाब किए जाते थे तथा उनके माध्यम से उनके विश्वासों का परीक्षण किया जाता था। इस परीक्षण में खरा नहीं उतरने वालों को यंत्रणाएं दी जाती थीं। अभियोक्ताओं के नाम गुप्त रखे जाते थे तथा ‘अपश्चत्तापी दोषियों’ को जीते जी जला दिया जाता था। इन कारणों से इतिहासकारों ने इनक्विजिशन की घोर निन्दा की है।

संत फ्रांसिस संघ के साधुओं को जीवित जलाने की सजा

ई.1318 में संत फ्रांसिस संघ तथा रोमन ईसाई संघ का विवाद अत्यंत बढ़ गया। संत फ्रांसिस संघ विलासिता पूर्ण जीवन को उचित नहीं मानता था जबकि चर्च का कहना था कि निर्धनता पूर्वक जीवन जीने पर इतना जोर दिया जाना ईसाई धर्म की दृष्टि से उचित नहीं है। इस विवाद के बाद इस संघ के चार साधुओं का इनक्विजिशन किया गया और उन्हें मार्साई में जीवित जला दिया गया। रोमन चर्च इस पर भी फ्रांसिस संघ को पूरी तरह नष्ट नहीं कर सका।

जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है- ‘काफिरों को बाकायदा ढूंढ-ढूंढ कर पकड़ा गया और उनमें से सैंकड़ों को जिंदा जला दिया गया। जिन्दा जला देने से ज्यादा बुरी बात यह थी कि लोगों से प्रायश्चित्त करवाने के लिए उन्हें यातनाएं दी जाती थीं। बहुत सी गरीब अभागी औरतों पर डायन होने का अपराध लगाया जाता था और वे जला दी जाती थीं किंतु प्रायः यह काम इंग्लैण्ड और स्कॉटलैण्ड में दंगाई भीड़ किया करती थी।

इनक्विजशन के आदेश से ऐसा नहीं होता था। पोप ने एडिक्ट ऑफ फेथ नामक आदेश जारी करके प्रत्येक व्यक्ति को मुखबिर बनने का आदेश दिया। पोप ने रसायन-विज्ञान के विरुद्ध फतवा दे दिया और इसे शैतानी हुनर करार दिया। ये तमाम अत्याचार और आतंक सच्चे विश्वास के साथ किए जाते थे।

इनका विश्वास था कि किसी आदमी को जिन्दा जलाकर वे उसकी आत्मा को या दूसरों की आत्माओं को पापों से बचा रहे हैं। मजहबी लोगों ने अक्सर अपनी बात दूसरों से जबर्दस्ती मनवाने की कोशिश की है। अपने विचार जबर्दस्ती दूसरे लोगों के गले में उतारे हैं और वे समझते रहे हैं कि वे जनता की सेवा कर रहे हैं।

ईश्वर के नाम पर इन्होंने लोगों को मारा है और हत्याएं की हैं। अमर आत्मा को बचाने की बात करते हुए इन्होंने नश्वर शरीर को जलाकर राख करने में जरा भी संकोच नहीं किया है। मजहब का लेखा बड़ा खराब रहा है परन्तु जल्लादी और बेरहमी में इनक्विजिशन को मात करने वाली कोई चीज दुनिया में मेरे विचार से नहीं हुई।’

स्पेन का इनक्विजिशन

स्पेन के कुछ हिस्सों पर सात शताब्दियों तक मुसलमानों का शासन था। मुसलमानों का शासन समाप्त होने के बाद अधिकांश मुसलमान या तो स्पेन छोड़कर चले गए या उन्होंने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया। फिर भी कुछ मुसलमान चोरी-छिपे स्पेन में रहते थे। इसी प्रकार कुछ यहूदी भी छिपकर स्पेन में रहते थे। स्पेन के राजा ने ऐसे मुसलमानों एवं यहूदियों को आदेश दिया कि- ‘वे या तो ईसाई बन जाएं अन्यथा देश छोड़ कर चले जाएं।’

तेरहवीं शताब्दी ईस्वी में स्पेन में दोमिनिक नामक एक ईसाई संत ने ईसाई संघ के भीतर ‘दोमिनिक संघ’ की स्थापना की। यह संघ उग्र एवं कट्टर था। इस संघ के लोगों ने स्पेन के ईसाइयों के लिए कुछ धार्मिक आदेश जारी किए तथा लोगों को उन पर चलने के लिए विवश किया। जो लोग उनकी बात नहीं मानते थे, उन्हें मार-पीट कर सहमत किया जाता था लेकिन यह संघ अधिक समय तक नहीं चल सका।

ई.1478 में स्पेन के राजा ने स्पेन में इनक्विजिशन की स्थापना की ताकि स्पेन में रह रहे गुप्त मुसलमानों तथा यहूदियों का पता लगाया जा सके। स्पेन की सरकार को नए ईसाइयों के विषय में संदेह बना रहता था कि वे भीतर ही भीतर मुसलमान अथवा यहूदी तो नहीं हैं।

उनका बार-बार परीक्षण किया जाता था तथा परीक्षण में खरे नहीं उतरने वालों को जिंदा जला दिया जाता था। स्पेन के इनक्विजिशन का उन्मूलन 19वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में हुआ।

रोमन इनक्विजिशन

मध्यकालीन इनक्विजिशन 13वीं तथा 14वीं शताब्दी में सक्रिय रहा। ई.1542 में इसका पुनर्संगठन तथा परिष्करण हुआ। उस समय इसका नाम ‘रोमन इनक्विजिशन’ रखा गया जिसे बाद में बदलकर ‘होली ऑफिस’ कर दिया गया। यह संस्था आज भी इसी नाम से विद्यमान है। कैथोलिक धर्म की पवित्रता की रक्षा करना तथा धार्मिक सिद्धान्तों का ठीक-ठीक सूत्रीकरण एवं व्याख्या करना इस संस्था का मुख्य उत्तरदायित्व है। मध्यकालीन तथा स्पेन के इनक्विजिशन के कारण कैथोलिक चर्च को लाभ की अपेक्षा हानि अधिक हुई।

यद्यपि इनक्विजिशन के अत्याचार के वर्णन में प्रायः अतिरंजना का सहारा लिया गया है तथा दंडितों की संख्या को अत्यधिक बढ़ा दिया गया है, फिर भी यह अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि इस संस्था द्वारा मनुष्य के मूल अधिकारों की उपेक्षा की जाती थी। आजकल प्रचलित कैथोलिक धर्म (चर्च) के विधान में स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि किसी भी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध कैथोलिक नहीं बनाया जा सकता।

सर्वव्यापी-चर्च व्यवस्था

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि जिस प्रकार के अत्याचार सहन करके ईसाई संतों ने इस धर्म को जीवित रखने का गौरव प्राप्त किया, ठीक वैसे ही अत्याचार राज्य द्वारा ईसाईकरण के दौरान किए गए। चर्च और पंथाधिकरण, उसके पापमोचक प्रमाण-पत्र तथा उनके कठोर नियंत्रण ने यीशू मसीह की मूल शिक्षाओं पर ग्रहण लगा दिया। रोम का चर्च तथा सम्राट की शक्ति एकाकार हो गए। नया सिद्धांत प्रतिपादित हुआ- ‘साम्राज्य, चर्च का सेकुलर एवं शस्त्र-सज्जित शासन तंत्र है, जिसे पोप ने गढ़ा और जो केवल पोप के प्रति उत्तरदायी है।’

यही कारण है कि यूरोपीय उपनिवेशवाद और ईसाई पंथ का एक गहरा नाता है। पहली सदी में इसाई धर्म का उद्भव हुआ। आरम्भ में यह एक प्रगतिशील धर्म था। इसने रोमन साम्राज्य को कड़ी चुनौती दी। इसका स्वरूप सादा और आडम्बर-मुक्त था।

संत पॉल तथा संत ऑस्टाइन ने इसाई धर्म की सादगी तथा मानव-मुक्ति के लिए आस्था पर बल दिया परन्तु 8वीं सदी और उसके बाद पीटर लोम्बार्ड और टॉमस एक्वेनाश नामक दो संतों ने पुराने संतों की शिक्षा को उलटते हुए कहा कि आस्था नहीं बल्कि अच्छे कार्य मानव-मुक्ति के लिए आवश्यक हैं।

इन संतों ने अच्छे कार्यों का अर्थ पुरोहितवाद एवं संस्कारवाद से लगाया। उनके विचार में पादरी ईश्वर द्वारा चयनित व्यक्ति है इसलिए प्रत्येक इसाई को उसका निर्देश मानना चाहिए। इस समय में इसाई पंथ में कर्मकांड घर कर गया तथा मध्ययुगीन चर्च व्यवस्था की शुरुआत हुई।

इसे सर्वव्यापी चर्च व्यवस्था का नाम दिया गया क्योंकि इसका मुख्यालय रोम तथा इसकी शाखाएं संपूर्ण यूरोप में फैली हुई थी। अब यूरोपीय लोगों के जीवन पर रोमन कैथोलिक चर्च का गहरा प्रभाव हो गया। शिक्षा एवं कला पर भी चर्च का नियंत्रण था, प्राचीन यूनानी और रोमन विद्वानों द्वारा जो ग्रंथ लिखे गए, वे ग्रंथ इसाई धर्म के प्रचार के बाद पूरी तरह लुप्त कर दिए गए। इसलिए आगे आने वाले बदलाव के मार्ग में एक बड़ी बाधा सर्वव्यापी चर्च व्यवस्था थी।

मध्यकालीन यूरोप के पुनर्जागरण के काल में सर्वकालीन चर्च व्यवस्था ने अपने लाभ के लिए कभी राजतंत्र तो कभी कुलीन वर्ग के साथ सांठगांठ की। रोमन साम्राज्य के पतन और यूरोप के अंधकारमय युग के लिए उत्तरदायी कारणों में आडम्बरों से युक्त चर्च व्यवस्था भी एक कही जाती है।

पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन के कई कारण थे, जिनमें से एक कारण ईसाई धर्म का रोम में फैलना था। पोप का यूरोप की राजनीति में हस्तक्षेप हो जाने से सम्राट की शक्ति कमजोर हुई। इस कारण सम्राट और पोप के बीच कई बार संघर्ष की स्थिति बनी जिसमें आम आदमी पिसता चला गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पोप की प्रतिष्ठा को धक्का (28)

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पोप की प्रतिष्ठा- bharatkaitihas.com
पोप की प्रतिष्ठा को धक्का

ई.1377 तक पोपों को फ्रांस के सम्राट के अंगूठे के अधीन रहना पड़ा। इससे पोप की प्रतिष्ठा को बड़ा धक्का लगा। कनौजा में पोप से मिलने के लिए सम्राट को घण्टों बर्फ में नंगे-पैर खड़े रहने की सजा अब इतिहास का पन्ना बनकर रह गई थी।

पोप के शयनागार में फ्रांसीसी सम्राट का दूत

जब पोप यूरोप के ऊपर इनक्विजिशन का कहर बरपा कर रहे थे तब उधर उनकी वह ऊंची हैसियत कम होती जा रही थी जो उन्होंने रोम, जर्मनी, फ्रांस के राजाओं के सरताज बनकर जमा रक्खी थी।

धीरे-धीरे वे दिन लद गए जब वे किसी सम्राट को बिरादरी से बाहर का रास्ता दिखाकर या केवल धमकी देकर उसके घुटने टिकवा सकते थे। जब पवित्र रोमन साम्राजय की हालत खराब हो रही थी और पवित्र रोमन सम्राट रोम से दूर जर्मनी में रहा करता था तब फ्रांस का सम्राट पोप के कामों में हस्तक्षेप करने लगा।

ई.1303 में पोप की किसी बात से फ्रांस का शासक नाराज हो गया। उसने पोप के पास एक आदमी भेजा जिसने पोप के महल में बलपूर्वक घुसकर उसके शयन कक्ष में प्रवेश किया तथा पोप के मुँह पर उसका बड़ा अपमान किया। पोप के साथ बेइज्जती भरे बर्ताव को किसी भी देश ने नापसंद नहीं किया। स्थिति पूरी तरह बदल चुकी थी। कनौजा में पोप से मिलने के लिए सम्राट को घण्टों बर्फ में नंगे-पैर खड़े रहने की सजा अब इतिहास का पन्ना बनकर रह गई थी।

दो पोप – दो नगर

ई.1309 में ‘फ्रांसीसी’ नामक पोप हुआ। उसके काल में पोप रोम के भीतर इतना असुरक्षित हो गया कि वह रोम छोड़कर फ्रांस के आविन्यो नगर में चला गया और वहाँ जाकर रहने लगा। फ्रांस के सम्राट ने पोप को संरक्षण दिया। कैथोलिक चर्च के इतिहास में यह एक अद्भुत घटना थी। चर्च रोम में था और पोप फ्रांस में था। ई.1377 तक पोपों को फ्रांस के सम्राट के अंगूठे के अधीन रहना पड़ा। इससे पोप की प्रतिष्ठा को बड़ा धक्का लगा।

ई.1378 में पोप का चुनाव करने वाले बड़े पादरियों के मण्डल में फूट पड़ गई। इसे ‘महान् मतभेद’ कहा जाता है। बड़े पादरियों के दो दल हो गए जिन्होंने अपना-अपना पोप चुन लिया। इनमें से एक पोप रोम चला गया और वहीं रहने लगा। रोमन सम्राट तथा यूरोप के बहुत से देशों ने उसी को पोप मान लिया। दूसरा पोप फ्रांस के अविन्या नगर में रहता रहा। फ्रांस के सम्राट तथा उसके समर्थक इस पोप का समर्थन करते रहे तथा केवल इसी पोप को मान्यता देते रहे। लगभग 40 वर्ष तक यही स्थिति रही।

प्रोफेसर वाइक्लिफ की हड्डियाँ आग में

रोम के पोप तथा फ्रांस के पोप दोनों ही स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि कहते और दूसरे पोप को कोसते थे। यूरोप की जनता इन दोनों पोपों को संदेह की दृष्टि से देखती थी। लोग अब सार्वजनिक रूप से पोप की आलोचना करने लगे थे। उन्हीं दिनों इंग्लैण्ड में वाइक्लिफ नामक एक पादरी हुआ।

उसने बाइबिल का पहली बार अंग्रेजी में अनुवाद किया। वह ऑक्सफोर्ड में प्रोफसर था तथा पोपों के आचरण का कटु-आलोचक था। अपने जीवन काल में तो वह पोपों की पहुँच से दूर रहा किंतु उसकी मृत्यु के 31 साल बाद ई.1415 में पोप ने आदेश दिया कि उसकी हड्डियों को उसकी कब्र से खोद निकाला जाए और उन्हें जला दिया जाए। ऐसा ही किया गया। इस आदेश से पोप की प्रतिष्ठा को बड़ा धक्का लगा।

जॉन हस का अग्नि-दाह

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वाक्लिफ की हड्डियाँ तो जल गईं किंतु पोप उसके विचारों को नष्ट नहीं कर सके। उसके विचार बोहेमिया (चेकोस्लोवाकिया) तक पहुँच गए। जॉन हस उसके विचारों से बहुत प्रभावित हुआ। उसने पोप की बड़ी आलोचना की। पोप ने उसे ईसाई धर्म से बाहर निकाल दिया किंतु पोप, ‘जॉन हस’ का इससे अधिक कुछ नहीं बिगाड़ सका। इसलिए ई.1415 में रोमन सम्राट को इस बात के लिए तैयार किया गया कि वह हस को कॉन्सटैन्स में बुलाए जहाँ ईसाई-संघ की परिषद् का आयोजन हो रहा था। सम्राट ने अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा का वचन देकर हस को परिषद् स्थल पर बुलाया। जब हस परिषद् में उपस्थित हुआ तो उससे कहा गया कि वह अपनी गलती स्वीकार कर ले। हस ने ईसाई परिषद् के पदाधिकारियों के समक्ष एक शर्त रखी कि- ‘वे मुझे तर्क में परास्त करके अपने विचारों से सहमत कर लें, मैं अपनी गलती स्वीकार कर लूंगा।’ इस पर उसे वहीं पर जिंदा जला दिया गया। सम्राट की व्यक्तिगत सुरक्षा की गारण्टी हस की रक्षा नहीं कर सकी। चेकोस्लोवाकिया में आज भी जॉन हस को नायक माना जाता है, एक ऐसा नायक जिसने अपनी अंतरआत्मा की आवाज को बचाने के लिए शरीर को नष्ट हो जाने दिया।

बोहेमिया (चेकोस्लोवाकिया) में पोप के विरुद्ध क्रूसेड

जब जॉन हस को ईसाई संघ द्वारा जीवित ही जला दिए जाने के समाचार बोहेमिया (आज इसे चेकोस्लावाकिया कहते हैं) में पहुँचे तो वहाँ के लोग पोप के विरुद्ध सड़कों पर उतर आए। वे पोप के इस कृत्य की सार्वजनिक रूप से निंदा करने लगे। इस पर पोप ने इन विद्रोहियों के विरुद्ध क्रूसेड का आह्वान किया। समाज में सदा विद्यमान रहने वाले बदमाशों को इसी तरह के अवसरों की तलाश रहती है।

वे बोहेमिया के भद्र समाज के विरुद्ध क्रूसेड करने के लिए निकल पड़े। देखते ही देखते उनके समूह टिड्डीदल की भांति बोहेमिया की राजधानी के चारों तरफ दिखाई देने लगे। संकट की इस घड़ी में बोहेमिया के लोगों को बचाने वाला कोई नहीं था।

अतः बोहेमिया के लोगों ने अपने बच्चों, घरों एवं सम्पत्तियों को बचाने के लिए स्वयं ही मोर्चा लेने का निर्णय लिया और वे शहर के बीच एकत्रित होकर हमलावरों की तरफ बढ़ने लगे। वे लोग बोहेमिया में गाया जाने वाला वीररस का गीत ‘कड़खा’ गाते हुए हमलावरों के सामने पहुँच गए।

जैसे ही हमलावर बदमाशों ने नगरवासियों को इस तरह एकत्रित होकर आते हुए देखा तो उनके हौंसले जवाब दे गए। वे अपने हथियारों सहित वहीं से उलटे पैरों भाग लिए। बोहेमिया की जनता जीत गई, पोप के क्रूसेड का आह्वान उन्हें झुका नहीं सका। इससे पोप की प्रतिष्ठा को बड़ा धक्का लगा।

बोहेमिया प्राग की यह घटना पूरे यूरोप के लिए एक मिसाल बन गई जो उन देशों में राष्ट्रवाद के उदय, आजादी की लड़ाई एवं गणतंत्र की स्थापना में प्रेरक तत्व सिद्ध हुई। प्राग की इस घटना को यूरोप में प्रोटेस्टेण्ट-आंदोलन के जनक के रूप में देखा जाता है। इस आंदोलन ने ईसाई-संघ को दो टुकड़ों में विभक्त कर दिया।

दोनों पोपों में समझौता

 ई.1417 में रोम के पोप तथा फ्रांस के पोप में समझौता हो गया और दोनों दलों ने मिलकर एक नया पोप चुन लिया जो अपनी पूर्व राजधानी रोम में रहता था।

इटली की दुर्दशा

15वीं शताब्दी के अंत में इटली अल्पकाल के लिए विदेशी जर्मन शासन से मुक्त हुआ किंतु 16वीं शताब्दी के आरंभ में वह फिर यूरोपीय राजनीति के शिकंजे में जकड़ लिया गया। इस काल में स्पेनी सत्ता अपने चरमोत्कर्ष पर थी। फ्रांस के साथ उसके युद्ध चल रहे थे। रोमन साम्राज्य इतना कमजोर हो चुका था कि स्पेन, फ्रांस और ऑस्ट्रिया तीनों में रोम के प्रदेशों पर अधिकार करने के लिए प्रतिस्पर्धा चलने लगी। यह स्थिति नेपोलियन के आक्रमण के समय तक बनी रही।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पूर्वी रोमनसाम्राज्य का अंत (29)

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पूर्वी रोमनसाम्राज्य का अंत

ई.1453 में उस्मानिया तुर्कों अर्थात् ओट्टोमन तुर्कों ने पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी कुस्तुन्तुनिया को घेर लिया और कुस्तुंतुनिया के शासक कॉन्स्टेन्टीन ग्यारहवें को मार दिया। इस प्रकार पूर्वी रोमनसाम्राज्य का अंत हुआ।

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हमें पूर्वी रोमन साम्राज्य का इतिहास बीच में ही छोड़ना पड़ा था किंतु यहाँ उसकी चर्चा फिर से करनी होगी। पूर्वी रोमन साम्राज्य ई.395 से चल रहा था तथा ई.480 तक वह पश्चिमी रोमन साम्राज्य के राजाओं की नियुक्ति करता रहा था। ई.480 से ई.565 तक रोम के फ्रैंक राजा, पूर्वी रोम साम्राज्य के शासकों को अपना स्वामी मानते रहे किंतु यह सैद्धांतिक रूप से किया गया प्रदर्शन मात्र था, व्यावहारिक रूप से इस अवधि में रोम के शासक कुस्तुंतुनिया से पूरी तरह स्वतंत्र थे। इस सैद्धांतिक प्रदर्शन का कारण यह था कि ई.480 से 565 तक रोम के शासक फ्रैंक नामक विदेशी कबीले से थे। उन्हें रोम में विदेशी नहीं माना जाए इसलिए वे कुस्तुंतुनिया के राजाओं को अपने स्वामी होने की मान्यता देते थे। पूर्वी रोमन साम्राज्य के शक्तिशाली होने के उपरांत भी कुस्तुंतुनिया की तुलना में रोम का अधिक महत्त्व बना रहा तो इसका श्रेय रोम के कैथोलिक चर्च तथा पोप को जाता है। ईसाई जगत्, विशेषकर कैथोलिक ईसाई जगत् के लिए पूर्वी रोमन साम्राज्य की बजाय रोम तथा पोप अधिक आदरणीय एवं महत्त्वपूर्ण थे। फिर भी समस्त अच्छाइयों एवं बुराइयों, मजबूतियों एवं कमजोरियों को समेटे हुए पूर्वी रोमन साम्राज्य ई.1453 तक चलता रहा किंतु ई.1453 में विनाश के काले बादल कुस्तुंतुनिया पर मण्डराने लगे।

पोप के ताज से रसूल की पगड़ी अच्छी है

ई.1453 में उस्मानिया तुर्कों (ओट्टोमन तुर्कों) ने पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी कुस्तुन्तुनिया को घेर लिया। उस समय कुस्तुंतुनिया के लोग पोप से इतने नाराज चल रहे थे कि जब कुस्तुंतुनिया को मुसलमानों ने घेर लिया तो कुस्तुंतुनिया के कुछ सामंतों ने रोम के पोप से सहायता प्राप्त करने का सुझाव दिया। इस पर एक प्रभावशाली बेजंटाइन ईसाई सामंत ने सार्वजनिक रूप से यह वक्तव्य दिया कि ‘पोप के ताज से रसूल की पगड़ी अच्छी है।’

इस मानसिकता के चलते कुस्तुंतुनिया ने मुसलमानों का विशेष विरोध नहीं किया तथा स्वयं को उनके हाथों में सौंप दिया। कॉन्स्टेन्टीन (ग्यारहवां) इस साम्राज्य का अंतिम शासक था। 29 मई 1453 को उसे ऑटोमन सल्तनत के मुस्लिम सुल्तान द्वारा मार डाला गया। इस प्रकार पूर्वी रोमनसाम्राज्य का अंत हो गया।

ई.326 से ई.1453 तक सम्पूर्ण-प्रभुत्व-सम्पन्न 194 सम्राटों तथा 6 साम्राज्ञियों ने पूर्वी रोमन साम्राज्य अथवा बैजंटाइन एम्पायर पर शासन किया। इस सूचि में सह-सम्राट एवं कनिष्ठ सह-सम्राटों की गिनती शामिल नहीं है।

मुस्लिम सुल्तानों द्वारा सीजर की उपाधि छीनी गई

ऑटोमन तुर्कों ने कुस्तुन्तुनिया को इस्ताम्बूल कहकर पुकारा। उन्होंने सम्राट जस्टीनियन द्वारा छठी सदी में निर्मित ‘सांक्टा सोफिया’ के सुंदर गिरिजाघर को ‘आया सूफिया’ नामक मस्जिद में बदल दिया तथा चर्च की सम्पूर्ण सम्पदा लूट ली।

सुल्तान मोहम्मद (द्वितीय) ने स्वयं को ईसाई-संघ का सर-परस्त घोषित कर दिया तथा उसके बाद के एक सुल्तान ने जो ‘शानदार सुलेमान’ के नाम से विख्यात है, स्वयं को सीजर घोषित कर दिया। मुसलमान शासकों द्वारा सीजर की उपाधि धारण किए जाने के बाद यूरोपीय जाति के अजेय होने का दंभ चूर-चूर होकर बिखर गया।

मिस्ट्रास एवं ट्रेबिजोंड का पतन

कुस्तुंतुनिया पर तुर्कों का अधिकार हो जाने के बाद भी पूर्वी रोमन साम्राज्य के कुछ हिस्सों में ग्रीकों (यूनानी गर्वनरों) के राज्य कुछ और सालों तक चलते रहे। अंत में मिस्ट्रास नामक राज्य ई.1460 में और ट्रेबिजोंड नामक राज्य ई.1461 में समाप्त हो गए।

रोम पर खतरे के बादल

पूर्वी रोमनसाम्राज्य का अंत होने के बाद उस्मानिया तुर्कों के मन में नई आशाएं जन्म लेने लगीं। यहाँ से यूरोप के लिए रास्ता खुल जाता था। उस्मानिया तुर्क इसी रास्ते से यूरोप की तरफ बढ़ने लगे। उन्होंने जर्मनी और हंगरी को जीत लिया तथा अब वे रोम और वियेना की तरफ ललचाई दृष्टि से देखने लगे।

हंगरी की जीत के बाद इटली की सीमाओं तथा वियेना के दीवारों तक उनकी पहुँच सरल हो गई किंतु वियेना उन दिनों अपनी शक्ति के चरम पर था। इसलिए वियेना ने रोम के लिए ढाल का काम किया। फिर भी जब तक तुर्क यूरोप में थे, रोम के आकाश से खतरे के बादल टल नहीं सकते थे।

जांनिसार मुसलमान

तुर्कों ने कुस्तुंतुनिया के लोगों के इस्लामीकरण का एक विचित्र तरीका निकाला। वे ईसाइयों से कर नहीं लेकर उसके बदले में उनके छोटे-छोटे लड़कों को ले लेते थे। इन लड़कों को सैनिक-रईस की तरह पाला जाता था तथा इस्लामी शिक्षा दी जाती थी। इन लड़कों को जांनिसार कहा जाता था। कुछ ही वर्षों में कुस्तुंतुनिया क्षेत्र में ‘जांनिसार’ सेना बन गई।

इस प्रकार यूरोपीय मूल के मुसलमानों का एक समूह अस्तित्व में आया। इनका रक्त रोमन था किंतु शिक्षा इस्लामी थी। रहन-सहन रईसाना था किंतु काम युद्ध करना था। इनका जन्म ईसाई माता की कोख से हुआ था किंतु इनका लक्ष्य ईसाई धर्म का सफाया करना था।

इन जांनिसार मुसलमानों ने इस्लाम की बड़ी सेवा की तथा कुस्तुंतुनिया से ईसाइयत का नाम तक मिटा दिया। यूरोप के बहुत से देशों ने अपनी ताकत तुर्कों के विरुद्ध झौंक दी किन्तु फिर भी वे अगले 455 सालों तक कुस्तुंतुनिया पर अधिकार नहीं कर सके।

कुस्तुंतुनिया के गौरव का अंत

प्रथम विश्व युद्ध (ई.1914-19) के बाद ही तुर्कों को यूरोप से बाहर धकेला जा सका। यहाँ तक कि कुस्तुन्तुनिया भी यूरोप द्वारा फिर से हासिल कर लिया गया। उसके बाद कुस्तुन्तुनिया का मुस्लिम सुल्तान अंग्रेजों के हाथों की कठपुतली बन गया किंतु यह स्थिति अधिक दिनों तक नहीं रही।

कुछ ही वर्षों बाद तुर्की नेता कमाल पाशा ने अंग्रेजों को कुस्तुन्तुनिया से मार भगाया। उसने तुर्की में एक गणराज्य की स्थापना की और इस प्रकार पूर्वी रोमन साम्राज्य की सैंकड़ों साल पुरानी राजधानी एक नवीन मुस्लिम गणराज्य की राजधानी बन गया।

तुर्की के शासक शीघ्र ही अपनी राजधानी अंगोरा अथवा अंकारा में ले गए और कुस्तुन्तुनिया एक उपेक्षित एवं सामान्य नगर बन कर रह गया। वह महान् पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी होने का गौरव तो खो ही चुका था, अब किसी छोटे से राज्य की राजधानी भी नहीं रहा था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रिनेंसाँ नामक युग का प्रारम्भ (30)

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रिनेंसाँ नामक युग का प्रारम्भ

पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी पर ईसाइयों का शासन समाप्त होने के साथ ही यूरोप के इतिहास में मध्य.युग की समाप्ति होती है तथा यूरोप मानो गहरी नींद से जागता है। उसे अपने पतन का अहसास होता है और वह अपने अस्तित्व को बचाने लिए अपने पुनरुत्थान के लिए प्रयास करता है। यूरोप के इतिहास में इसे रिनेंसाँ कहते हैं।

पूर्वी रोमन साम्राज्य के अंत के साथ यूरोप में अंधकार का युग आरम्भ होना चािहए था किंतु यूरोप में ज्ञान एवं चेतना के नवीन युग की शुरुआत होती है। मानो बड़ी ठोकर खाकर यूरोप नींद से जागकर खड़ा हो गया हो और अपने अस्तित्व को बचाने तथा खोए हुए गौरव को फिर से प्राप्त करने के लिए कमर कस कर सन्नद्ध हो गया हो।

इसे ‘रिनेंसाँ’ (Renaissance) अर्थात् ‘कला एवं विद्या के युग का पुनर्जन्म’ भी कहते हैं। पुराने यूनानियों का सौन्दर्य प्रेम फिर प्रकट होता है और पूरा यूरोप मूर्तिकला एवं चित्रकला का सम्बल पाकर फिर से किसी सुंदर पुष्प की तरह खिल उठता है। इसके पीछे एक बड़ा कारण यह था कि जब कुस्तुंतुनिया गिर रहा था तो बहुत से विद्वान एवं मनीषी अपनी-अपनी पुस्तकों, चित्रों एवं मूर्तियों का खजाना लेकर पश्चिमी यूरोप एवं इटली भाग आए ताकि उन्हें मुसलमानों के हाथों से नष्ट होने से बचाया जा सके।

इन्हीं विद्वानों, मूर्तिकारों एवं चित्रकारों ने इटली एवं रोम सहित यूरोप के बहुत से देशों को चित्रकला, मूर्तिकला एवं ज्ञान-विज्ञान से समृद्ध कर दिया। इन लोगों के पुरखे पिछले सैंकड़ों सालों में अपनी पुस्तकों, चित्रों एवं मूर्तियों को लेकर रोम से कुस्तुंतुनिया भागे थे क्योंकि कैथोलिक ईसाई संघ, प्राचीन रोमन धर्म एवं प्राचीन यूनानी धर्म की इन पुस्तकों, मूर्तियों एवं चित्रों को नष्ट करने पर तुल गया था। समय का चक्र घूमकर फिर से वहीं आ गया था, जहाँ से वह चला था। रोम की मूर्तियां, पुस्तकें एवं चित्र फिर से रोम लौट आए थे।

‘रिनेंसाँ’ सबसे पहले इटली में आरम्भ हुआ। फ्लोरेंस ने इस मामले में इटली का नेतृत्व किया। पिछले एक हजार साल में इटली के लोग प्राचीन रोमन धर्म एवं यूनानी धर्म की महान् बातों को भूल चुके थे। उन्हें इन पुस्तकों में लिखी बातों को समझने एवं स्वीकार करने में थोड़ी कठिनाई हुई किंतु शीघ्र ही उन्होंने इन पुस्तकों को गले लगा लिया। उन्हें पुराने धर्म पर आधारित चित्रों एवं मूर्तियों के महत्त्व को समझा और उन्हें अपना गौरव घोषित कर दिया।

पोप के रोम में, पोप की नाक के नीचे पुराना रोमन धर्म फिर से लौट आया था किंतु इस बार पोप कुछ नहीं कर सका। इनक्विजिशन का युग समाप्त हो रहा था, पुराना खोया हुआ उजाला पूरब से, फिर पश्चिम को लौट आया था। इटली के लोगों की तरह इंग्लैण्ड एवं फ्रांस ने भी ‘रिनेंसाँ’ को अत्यंत हर्ष के साथ स्वीकार कर लिया।

हृदय एवं मस्तिष्क का संघर्ष

 लोगों का हृदय अब भी ईसाई धर्म में श्रद्धा रखता था किंतु उनका मस्तिष्क इससे आगे की बात अर्थात् विज्ञान की बात भी करना चाहता था। यद्यपि रोमवासियों के मस्तिष्क पर ईसाई-संघ का कब्जा ढीला पड़ने लगा था किंतु उनका हृदय अब भी यह सोचने का साहस नहीं कर पा रहा था कि धरती गोल है या धरती ब्रह्माण्ड के केन्द्र में नहीं है या सूरज धरती के चारों ओर चक्कर नहीं काट रहा है या तारे अपने स्थान पर जड़े हुए नहीं हैं।

उन्हें खगोल के बारे में अब भी वही बातें माननी थीं जो लगभग डेढ़ हजार साल पहले उनके धर्म-ग्रन्थ में लिख दी गई थीं। इस काल में भी ईसाई संघ, धर्म-ग्रन्थ में लिखी गई बातों को मानने से अस्वीकार करने वालों को जिंदा जला सकता था। ब्रूनो और गैलीलियो को इन्हीं अपराधों में सजा दी जानी अभी शेष थी।

‘रिनेंसाँ’ को कई तरह से व्याख्यायित किया जा सकता है। ‘रिनेंसाँ’ रोमन ईसाई-संघ के विरुद्ध ‘विद्रोह’ था। ‘रिनेंसाँ’ यूरोप के राजाओं का पोप के उस दावे के विरुद्ध ‘विद्रोह’ था जिसमें पोप को यूरोप के समस्त राजाओं से ऊपर मान लिया गया था। ‘रिनेंसाँ’ ईसाई संघ को भीतर से सुधारने का ‘प्रयास’ था।

पुस्तकों का चमत्कार

‘रिनेंसाँ’ में सबसे बड़ी भूमिका छापाखाने के आविष्कार ने निभाई थी। बड़ी संख्या में लोगों को अब किताबें उपलब्ध हो रही थीं और लोग उन्हें पढ़कर वैचारिक क्रांति के युग में पहुँचने लगे थे। अब तक लोग बाइबिल को केवल लैटिन भाषा में सुनते आए थे किंतु उसे समझ नहीं सकते थे।

जबकि छापाखाने ने बाइबिल को यूरोपीय देशों की स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध कराना आरम्भ कर दिया। लोग बाइबिल के मूल संदेश को स्वयं समझ सकते थे, उन्हें पादरियों द्वारा की जा रही व्याख्याओं पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं थी।

चंचल फ्लोरेंस के चित्रकार और मूर्तिकार

उत्तरी इटली में एक प्राचीन शहर है- फ्लोरेंस। इसे चंचल फ्लोरेंस भी कहा जाता है। मध्यकाल में यह यूरोप की आर्थिक राजधानी बन गया था जहाँ यूरोप के बड़े-बड़े सेठ-साहूकार एकत्रित होते थे। यह धनवानों एवं बुद्धिजीवियों का छोटा सा गणराज्य था।

चूंकि इस शहर के गणतंत्र को सेठों द्वारा चलाया जाता था, इसलिए साम्यवादी विचारों से प्रभावित जवाहरलाल नेहरू ने इस गणतंत्र को हिकारत की दृष्टि से देखा है किंतु वास्तविकता यह है कि यह दुनिया के श्रेष्ठ गणतंत्रों में से एक था तथा इसमें सेठों के साथ-साथ बुद्धिजीवियों की भी पूरी भूमिका थी।

यही कारण था कि इस शहर में कला एवं चिंतन का विकास इटली के अन्य देशों की तुलना में अधिक हुआ था। इटली के दो महान् कवि दान्ते (ई.1265-1321) तथा पेत्रार्क (ई.1304-74) इसी नगर में पैदा हुए थे।

मैकियावेली

निकोलो मैकियावेली का जन्म 3 मई 1469 को फ्लोरेंस में हुआ। वह फ्लोरेंस रिपब्लिक का अधिकारी था किंतु उसकी ख्याति इटली के राजनैतिक दार्शनिक, संगीतज्ञ, कवि एवं नाटककार के रूप में थी। वह पुनर्जागरण काल के इटली का एक प्रमुख व्यक्तित्व था।

मैकियावेली की ख्याति उसकी रचना ‘द प्रिंस’ के कारण है जिसे व्यावहारिक राजनीति का महान् ग्रन्थ स्वीकार किया जाता है। मैकियावेली को आधुनिक राजनीति विज्ञान के प्रमुख संस्थापकों में से एक माना जाता है। ई.1498 में गिरोलामो सावोनारोला के निर्वासन और फांसी के बाद मैकियावेली को फ्लोरिडा चांसलेरी का सचिव चुना गया। लियोनार्डो द विंची की तरह, मैकियावेली भी इटली में पुनर्जागरण का पुरोधा था।

मैकियावेली ने ‘द डिसकोर्स’ और ‘द हिस्ट्री’ नामक पुस्तकें भी लिखीं जिनका प्रकाशन उसकी मृत्यु के पाँच साल बाद, ई.1532 में हुआ। हालांकि मैकियाविली ने अपने जीवन काल में इन पुस्तकों को निजी रूप अपने दोस्तों में बांटा था। उसकी एकमात्र रचना जो उसके जीवनकाल में छपी, वह थी- ‘द आर्ट ऑफ वार’। यह रचना युद्ध-कौशल पर आधारित थी।

आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में कुटिल राजनीति को ‘मैकियावेलीवाद’ कहा जाता है। उसके विचारों ने इटली के लोगों को राजनीतिक एवं धार्मिक नींद से जगाने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। उसने ‘द प्रिंस’ में लिखा है- ‘सरकार के लिए धर्म की आवश्यकता है, इसलिए नहीं कि जनता को सदाचारी बनाए, अपितु इसलिए कि उस पर शासन करने में सहायता मिले और उसे दबाकर रखा जा सके। शासक का यह कर्त्तव्य भी हो सकता है कि वह ऐसे धर्म का समर्थन करे जिसे वह झूठा समझता हो।’

मैकियाविली ने एक स्थान पर लिखा है- ‘राजा को जानना चाहिए कि एक ही साथ मनुष्य और पशु का, शेर और लोमड़ी का नाटक कैसे खेला जा सकता है। उसे न तो अपने वादे का पालन करना चाहिए और न ही वह कर सकता है, जबकि वैसा करने से उसका नुकसान होता हो…..। मैं साहस के साथ कह सकता हूँ कि हमेशा ईमानदार होना बहुत हानिकारक होता है किंतु इसके विपरीत ईश्वर के प्रति अनुगत, धार्मिक, दयालु और भक्त होने के स्वांग रचना, लाभदायक हैं। नेकी के आडम्बर से अधिक लाभदायक और दूसरी वस्तु नहीं है।’

आसानी से समझा जा सकता है कि मैकियाविली अपनी पुस्तकों में आग उगल रहा था और जनता के समक्ष राजाओं के ढोंग की पोल खोल रहा था। यही कारण था कि उसने अपने जीवन काल में अपनी पुस्तकों को नहीं छपवाया। इसलिए वह इन पुस्तकों के असर को अपनी आंखों से नहीं देख सकता था किंतु वह जानता था कि जब ये पुस्तकें छपकर जनता के हाथों में पहुँचेंगी तो यूरोप के राजाओं की क्या हालत होगी!  21 जून 1527 को मात्र 58 साल की आयु में उसका निधन हो गया।

मध्यकाल की तिकड़ी

पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी में लियोनार्डो दा विंची (ई.1452-1519), माइकेल एंजिलो (ई.1475-1564) तथा  राफिएलो सैंजिओ (ई.1483-1530) नामक तीन बड़े चित्रकार पैदा हुए। इन तीनों को ‘मध्यकाल की तिकड़ी’ भी कहा जाता है। ये चित्रकार होने के साथ-साथ मूर्तिकार, आर्चिटैक्चर,  कवि तथा दार्शनिक भी थे।

ये तीनों ही पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी कुस्तुंतुनिया के पतन के बाद के युग में पैदा हुए थे तथा ठीक उस काल में मौजूद थे जब पूर्वी रोमन साम्राज्य के कवि, लेखक, बुद्धिजीवी, मूर्तिकार एवं चित्रकार अपनी-अपनी कला-सम्पदा को मुसलमानों से बचाने के लिए रोम तथा इटली के अन्य शहरों की ओर भागे चले आ रहे थे।

इस कारण फ्लोरेंस के इन तीनों चित्रकारों ने दुनिया को ईसाई-संघ की आँख से न देखकर प्राचीन रोमन एवं प्राचीन यूनानी ज्ञान की आँख से देखा और ईसाई संघ की परवाह किए बिना, ‘रिनेंसाँ’ को जन्म दिया तथा अपनी कला से पूरे यूरोप में ऐसा वातावरण बना दिया कि ईसाई संघ इनका अधिक विरोध नहीं कर सका।

इनसे प्रेरित होकर गली-गली में चित्रकार, मूर्तिकार, संगीतकार और कवि पैदा होने लगे। इन कलाकारों की कला के प्रशंसकों की भी कमी नहीं थी। इसी कारण फ्लोरेंस को ‘चंचल फ्लोरेंस’ कहा जाने लगा।

लियोनार्डो दा विंची

लियोनार्डो इन तीनों में सबसे बड़ा था और कई बातों में सबसे अद्भुत था। चित्रकार और मूर्तिकार होने के साथ-साथ वह महान् इंजीनियर भी था। माना जाता है कि आधुनिक विज्ञान की नींव उसी ने रखी। वह सदैव कुछ न कुछ प्रयोग करता रहता था। उसका कहना था- ‘कृपालु प्रकृति इस बात के प्रयास में रहती है कि तुम दुनिया में हर स्थान पर कुछ न कुछ सीखो।’

तीस वर्ष की आयु में उसने लैटिन भाषा एवं गणित का अध्ययन आरम्भ किया। उसी ने सबसे पहले पता लगाया था कि रक्त हर समय शरीर में चक्कर लगाता रहता है। वह मनुष्य शरीर की बनावट पर मुग्ध था। उसका कहना था- ‘बुरी आदतों एवं तंग विचारों के लोग मनुष्य शरीर जैसे सुंदर औजार और हड्डी-चमड़े के जटिल साधन के योग्य नहीं हैं। उन्हें तो खाना भरने और फिर उसे बाहर निकालने के लिए सिर्फ एक थैला चाहिए, क्योंकि वे अन्न-नली के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं।’

लियोनार्डो शाकाहारी था और पशु-पक्षियों से बेहद प्रेम करता था। वह बाजार में पिंजरा-बंद पक्षियों को खरीदकर उसी समय स्वतंत्र कर देता था। लियोनार्डो ने हवाई जहाजों के चित्र बनाए तथा हवाई जहाज उड़ाने की दिशा में कई प्रयोग किए। इन प्रयोगों को बड़ी सीमा तक सफलता मिल गई थी किंतु उसकी मृत्यु के बाद कोई ऐसा मनुष्य नहीं हुआ जो उसके प्रयोगों को आगे बढ़ाता। अन्यथा मनुष्य को उड़ने के लिए हवाई जहाज पंद्रहवीं शताब्दी में ही मिल गया होता।

लियोनार्डो के बारे में यूरोप में यह भी लोक-मान्यता है कि उसका सम्पर्क इटली के पहाड़ों में रहने वाले कुछ परग्रही जीवों से हो गया था जिन्होंने उसे अपनी रहस्यमय गुफाओं में ले जाकर तरह-तरह की मशीनें दिखाई थीं। लियोनार्डो ने इन्हीं मशीनों का चित्रांकन अपने चित्रों में किया है किंतु इन बातों की वैज्ञानिक अथवा आधिकारिक स्वीकार्यता नहीं हो पाई है।

माइकिल एंजिलो

माइकिल एंजिलो अद्भुत मूर्तिकार था। वह ठोस संगमरमर से विशाल मूर्तियां गढ़कर निकालता था। वह अपने युग का वास्तु-शिल्पकार भी था। रोम के सेंट पीटर चर्च का वर्तमान नक्शा उसी ने तैयार किया था। वह लगभग 90 साल की आयु तक जिया तथा मृत्यु के दिन भी वह सेंट पीटर चर्च में काम कर रहा था। वह मानवता की बुरी हालत देखकर अंदर से बहुत दुःखी था तथा चीजों की सतहों के नीचे झांककर कुछ ढूंढने का प्रयास करता था। वह हमेशा सोचता रहता था और सदैव अद्भुत कामों की योजना बनाया करता था। एक बार उसने कहा था- ‘आदमी मस्तिष्क से चित्र बनाता है, हाथ से नहीं।’

राफिएलो सैंजिओ

राफिएलो एक चित्रकार था। उसे केवल 37 वर्ष का संक्षिप्त जीवन मिला। इस अवधि में ही उसने इतनी बड़ी संख्या में चित्र बनाए कि उन्हें देखकर आश्चर्य होता है। इन चित्रों की विषय-वस्तु एवं शैली अत्यंत क्रांतिकारी थी। आश्चर्य इस बात को देखकर भी होता है कि उसके बनाए हुए बहुत से चित्र वेटिकन सिटी के महल के कमरों की दीवारों पर बने हुए हैं।

इन चित्रों की इन महलों में उपस्थिति से कहा जा सकता है कि इन तीनों चित्रकारों के समकालीन पोप जूलियस (द्वितीय) को इन वैचारिक क्रांतिकारियों से कोई दिक्कत नहीं थी। पोप चाहता था कि कला का विकास हो और लोग स्वतंत्र होकर सोचें। हालांकि उसके बाद के पोप उसकी तरह नहीं सोचते थे। राफिएलो के बनाए चित्रों में स्कूल ऑफ एथेंस सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है जो वेटिकन के स्टेंजा डेला सेग्नेचुरा  (Stanza della Segnatura) नामक चर्च में पाया गया है।

इस चित्र ने रोम में बड़ी क्रांति खड़ी कर दी। इस चित्र में लोगों को एथेंस के स्कूल में पुस्तक पढ़ते, विचार-विमर्श करते तथा एकांत में बैठकर चिंतन करते हुए दिखाया गया है। रिनेंसाँ के यही तीन (अध्ययन, विचार-विमर्श एवं एकांत चिंतन) मुख्य उपकरण थे।

क्या गणतंत्र व्यवस्था ने रिनेंसाँ को जन्म दिया था?

यह एक आश्चर्य की ही बात थी कि जब सम्पूर्ण यूरोप में ईसाई धर्म हावी था और ईसाई धर्म के विरुद्ध सोचने तक पर मनाही थी, उस युग में फ्लोरेंस ने ‘रिनेंसाँ’ के मामले में इटली का नेतृत्व किया। संभवतः फ्लोरेंस को यह शक्ति गणतंत्र ने प्रदान की थी।

एक बार फिर से वह कहावत सही सिद्ध हो रही थी कि राजतंत्र, ‘धर्म’ को अपनी ढाल बनाकर चलता है और उसकी आड़ में धर्म भी खूब फलता-फूलता है जबकि गणतंत्र को ‘धर्म’ की उतनी परवाह नहीं होती।  फ्लोरेंस को भी नहीं थी, न धर्म की, न पोप की। रोम के महान् संग्रहालयों, ब्रिटिश म्यूजियम तथा यूरोप के सैंकड़ों संग्रहालयों में मूर्तियों, चित्रों एवं पुस्तकों के जो अनंत भण्डार भरे हुए हैं, उनमें से अधिकांश सम्पदा उसी महान् युग की देन है।

आज भी रोम और फ्लोरेंस की गलियां इन मूर्तियों से पटी हुई हैं और इन शहरों की सुंदर गलियों एवं दूर-दूर तक चली गई शांत सड़कों के किनारे बैठे हुए चित्रकारों को चित्र बनाने में डूबे हुए देखा जा सकता है। कहीं किसी झील के शांत किनारे पर या किसी व्यस्त बाजार की गली में या किसी नुक्कड़ पर कहीं कोई लड़की किसी छतरी के नीचे वायलिन या गिटार बजाती हुई दिख जाती है।

यह सब देखकर दर्शक आज भी स्वयं को ‘रिनेसाँ’ के युग में चले जाने का अनुभव करने लगते हैं। इन चित्रकारों एवं मूर्तिकारों को देखकर लगता है कि ये कभी नहीं चाहते कि रिनेसाँ-युग को भूतकाल की बात माना जाए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

धर्म एवं विज्ञान में संघर्ष (31)

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धर्म एवं विज्ञान में संघर्ष

धर्म एवं विज्ञान एक दूसरे के पूरक हैं। भारत में तो धर्म को ही विज्ञान कहा जाता है तथा माना जाता है कि जब मनुष्य को आत्मा और परमात्मा के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो जाता है तो उसे मोक्ष मिल जाता है किंतु ईसाइयत में धर्म एवं विज्ञान को एक दूसरे के शत्रु के रूप में देखा गया।

यद्यपि इटली में पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य में रिनेंसाँ नामक आंदोलन आरम्भ हो चुका था तथा लोग नए तरीके से सोचने लगे थे तथापि रोमन चर्च ने स्वयं को इतना परिपक्व एवं अपरिवर्तनीय मान लिया था कि उसमें नवीन विचारों, दार्शनिक मीमांसाओं एवं वैज्ञानिक प्रयोगों के आधार पर उद्घाटित तथ्यों, प्रश्नों एवं बहसों की स्वीकार्यता ही नहीं थी।

ईसाई धर्म ने न केवल पुराने रोमन धर्म एवं यूनानी धर्म के ग्रंथों, प्रतिमाओं, मंदिरों, प्रतीकों, उपदेशकों, दार्शनिकों एवं संतों को ढूंढ-ढूंढकर नष्ट किया था अपितु स्वयं को ऐसे लौह-पिंजर में बंद कर लिया जिसमें नवीन वायु के प्रवेश के लिए कोई छिद्र ही उपलब्ध नहीं था।

चर्च हर समय और हर बार विज्ञान एवं दार्शनिक विचारों को न केवल संदेहयुक्त दृष्टि से देखता था अपितु उन्हें धर्म-विरोधी घोषित कर देता था। इस कारण पंद्रहवीं शताब्दी के बाद न केवल रोम अथवा इटली में अपितु सम्पूर्ण यूरोप में धर्म और विज्ञान के बीच संघर्ष छिड़ गया।

शीघ्र ही यह संघर्ष खूनी जंग में बदल गया। दुर्भाग्य से यह जंग लम्बी चली। इस जंग में प्रायः विज्ञान एवं दर्शन हार जाता था तथा उसके प्रतिपादकों को चर्च द्वारा पकड़ कर जीवित ही आग में जला दिया जाता था।

बाइबिल के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति ईसा से ठीक 4004 साल पहले हुई थी, प्रत्येक वृक्ष एवं पशु अलग-अलग उत्पन्न किया गया था तथा सबसे अंत में मनुष्य बनाया गया था। ईसाई-संघ मानता था कि जल-प्रलय हुआ था और नूह की नाव में सारे जानवरों के जोड़े रखे गए थे ताकि किसी भी जाति का लोप न हो जाए।

बाइबिल के बहुत से विचार, संसार भर में विभिन्न स्थानों पर ‘प्रकट हो चुके’ तथा ‘प्रकट हो रहे’ ज्ञान से मेल नहीं खाते थे।

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चीन में ईसा से लगभग 600 साल पहले ‘त्सोन त्से’ नामक एक दार्शनिक हुआ। उसने बताया कि समस्त प्राणियों की उत्पत्ति एक ही प्रजाति के जीवों से हुई है। इस अकेली प्रजाति के जीवों में समय के साथ लगातार परिवर्तन होते गए जिससे अलग-अलग तरह के प्राणी बन गए। इन परिवर्तनों में हजारों-लाखों साल का समय लगा। यह बात ईसाई धर्म के सिद्धांत से मेल नहीं खाती थी, इसलिए यदि यूरोप में कोई व्यक्ति इस तरह की बातें करता था तो उसे धर्म-द्रोही घोषित कर दिया जाता था। चर्च का मानना था कि पाप और दुःख सभी मनुष्यों को अनिवार्यतः भोगने पड़ते हैं। इस धारणा के माध्यम से संसार में निर्धनता एवं संकट को एक स्थाई सम्मान प्रदान करने का प्रयास किया गया था। संसार के लगभग सभी धर्म इस मामले में ईसाई मत का समर्थन एवं पुष्टि करते हुए दिखाई देते हैं। महाभारत में महारानी कुंती भगवान श्रीकृष्ण से वरदान के रूप में अपने लिए विपत्तियों एवं दुःखों की मांग करती हैं ताकि संकट में उसे परमात्मा याद आएं और वह परमात्मा को कभी भूले नहीं। ईसाई धर्म सहित संसार के किसी भी धर्म में यह विचार नहीं के बराबर है कि मानव सभ्यता से गरीबी, दुःख एवं संकट के स्थाई निष्कासन की बात सोची जाए किंतु विज्ञान ने ऐसा सोचने का साहस निरंतर दिखाया है।

हालांकि रामराज्य में समस्त मनुष्यों एवं प्राणियों के सुखी होने की कल्पना की गई है।

निकोलस कोपर्निकस

ई.1543 में पोलैंड का रहनेवाला एक कैथोलिक वृद्ध अपनी चारपाई पर लेटा हुआ अपनी अंतिम साँसें ले रहा था और बड़ी कठिनाई से कुछ कागज पढ़ने का प्रयास कर रहा था। ये कागज उसी ने लिखे थे और अब मुद्रण के लिए तैयार थे। इस समय इस वृद्ध की आयु सत्तर साल थी और आने वाली दुनिया उसे महान् खगोल-विज्ञानी कोपर्निकस के नाम से जानने वाली थी।

अपनी मृत्यु शैय्या पर कोपर्निकस को संभवतः यह अनुमान नहीं था कि उसकी लिखी यह पुस्तक विश्व-मंडल के बारे में मानवीय दृष्टिकोण में एक महान् परिवर्तन लाने जा रही थी। इससे यूरोप के ईसाई जगत् में भी एक जोरदार बहस छिड़ जाने वाली थी।

निकोलस कोपर्निकस की पुस्तक का नाम है- ‘आकाश मंडल के दृष्टिकोण की कायापलट।’ इस पुस्तक में यह सिद्धांत प्रतिपादित किया गया कि- ‘सौर मंडल का केंद्र पृथ्वी नहीं अपितु सूर्य है।’

इस सिद्धांत से ईसाई जगत् में इतनी बड़ी जंग छिड़ेगी, इसका पहले-पहल किसी को अनुमान नहीं था। यद्यपि कैथोलिक चर्च, पृथ्वी को सौर मंडल का केंद्र मानता था किंतु कोपर्निकस के सिद्धांत को आसानी से नकारा नहीं जा सकता था क्योंकि कोपर्निकस की अपनी प्रतिष्ठा थी। ईसाई संघ ने इस सिद्धांत पर बहुत आपत्तियां खड़ी कीं किंतु जब तक यह पुस्तक उनके हाथों में आती, कोपर्निकस इस नश्वर दुनिया से सदा के लिए निकल चुका था।

जब यह पुस्तक प्रकाशित हुई तो भयभीत संपादक ने इसकी प्रस्तावना में लिखा- ‘सूर्य-केंद्र के सिद्धांत का अर्थ यह नहीं कि विश्व-मंडल में सचमुच ऐसा है, यह सिर्फ गणित के हिसाब से निकाला गया परिणाम है।’

चर्च द्वारा दार्शनिक ब्रूनो को दर्दनाक मृत्युदण्ड

जैसे-जैसे मानवता आगे बढ़ रही थी, ऐशिया की भांति यूरोप में भी ज्ञान एवं विज्ञान प्रकट होना चाहता था किंतु रोम की धार्मिक व्यवस्था ज्ञान एवं विज्ञान के प्राकट्य को मानवता के लिए अत्यंत खतरनाक समझती थी।

कोपरनिकस की मृत्यु के केवल पाँच साल बाद ई.1548 में इटली के नेपल्स राज्य में जियोर्डानो ब्रूनो नामक विश्व-प्रसिद्ध दार्शनिक का जन्म हुआ। उसने कहा कि– ‘तारे दूर-दूर स्थित सूर्य ही हैं जिनके अपने ग्रह हैं। ब्रह्माण्ड अनंत है तथा उसका कोई केन्द्र नहीं है।’

ब्रूनो की ये बातें कैथोलिक चर्च की धार्मिक मान्यताओं से उलटी थीं। इसलिए बू्रनो को पकड़कर रोम के टॉवर ऑफ नोना में बंद कर  दिया गया तथा उस पर धर्म-विरोधी बातों के लिए मुकदमा चलाया गया। यह मुकदमा सात साल तक चला।

ब्रूनो पर आरोप लगाया गया कि उसके विचार अरब के दार्शनिकों पर आधारित हैं। उसने कैथोलिक मान्यताओं के विरुद्ध बातें कही हैं, ईसा मसीह की दिव्यता, उनके अवतार तथा जीसस की माता मैरी की पवित्रता एवं सरकारी मंत्रियों के विरुद्ध विचार व्यक्त किए हैं तथा उन्हें जनता में फैलाया है।

उसने कई ब्रह्मण्डों के अस्तित्व में होने एवं उनकी शाश्वतता का दावा किया है जबकि संसार तो एक ही है तथा वह नश्वर है। ब्रूनो पर आरोप लगाया गया कि उसने ईसाई मत की इस बात को गलत बताया है कि- ‘पशुओं में आत्मा नहीं होती।’

ब्रूनो ने अपना बचाव किया कि वह वेनिस में चर्च की शिक्षाओं को स्वीकार कर चुका है तथा वह तो केवल दार्शनिक बात कहने का प्रयास कर रहा है। उसका पक्का विश्वास है कि- ‘ब्रह्माण्ड अनेक हैं।’

रोम के कैथोलिक चर्च ने ब्रूनो के विचारों के लिए उसकी भर्त्सना की तथा उससे कहा कि वह अपने विचारों का पूर्ण परित्याग करके क्षमा याचना करे। ब्रूनो ने ऐसा करने से मना कर दिया। एक प्राचीन पुस्तक ‘जैस्पर शूप ऑफ ब्रेसलाओ’ के अनुसार ब्रूनो पर यह आरोप लगाया गया कि उसने अपने मुकदमे के न्यायाधीश को धमकी देते हुए कहा कि- ‘संभवतः तुम्हें मेरे विरुद्ध यह वाक्य बोलने पर उससे अधिक भय लगता है जिस भय के साथ मैं उसे सुनता हूँ।’ अर्थात् मुझसे ज्यादा तो तुम डरे हुए हो!

20 जनवरी 1600 को पोप क्लेमेंट (अष्टम्) ने ब्रूनो को धर्म विरोधी घोषित करके  उसे मृत्यु-दण्ड सुनाया। 17 फरवरी 1600 के दिन बू्रनो को रोम के मुख्य बाजार में स्थित चौक ‘कैम्पो डे फियोरी’ में नंगा करके सूली पर उलटा लटकाया गया। उस समय उसकी जीभ बंधी हुई थी क्योंकि उसने धर्म के विरुद्ध शैतानियत भरे शब्द उच्चारित किए थे। उसी हालत में ब्रूनो को जीवित जला दिया गया। उसकी राख टिबेर नदी में फैंक दी गई।

ब्रूनो के विरुद्ध मुकदमे का फैसला करने वाले पैनल में उस समय के अनेक विख्यात कार्डिनल शामिल किए गए थे जो विभिन्न यूरोपीय देशों के विख्यात चर्चों के बिशप थे। इनमें से कार्डिनल कैमिलो बोर्गसे आगे चलकर रोम के पोप भी बने तथा उन्हें पोप पॉल (पंचम्) के नाम से जाना गया।

गैलीलियो गैलिली

चर्च द्वारा ब्रूनो को सूली पर चढ़ाए जाने के कुछ समय बाद, धर्म और विज्ञान की खूनी-जंग में हिस्सा लेने वाला एक और युवा वैज्ञानिक सामने आया। वह था, इटली का खगोल-विज्ञानी, गणित-शास्त्री और भौतिक-विज्ञानी गैलिलियो गैलिली। इस महान् विचारक का जन्म 15 फरवरी 1564 को इटली के पीसा नामक नगर में एक संगीतज्ञ परिवार में हुआ था। वह एक कैथोलिक ईसाई था तथा धार्मिक प्रवृत्ति का वैज्ञानिक था।

उसके प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्षों ने ईसाई धर्म की कई पुरानी मान्यताओं को नए सिरे से चुनौती दी तथा अपने पूर्ववर्ती चिंतकों, दार्शनिकों एवं वैज्ञानिकों द्वारा बताई गई बातों का वैज्ञानिक प्रयोगों के आधार पर समर्थन किया। इसे आधुनिक विज्ञान का पिता कहा जाता है क्योंकि उसने भौतिक यंत्रों से किए जाने वाले प्रयोगों की आवृत्ति को दुहराने एवं उनसे प्राप्त परिणामों की सफलताओं एवं असफलताओं का विष्लेषण करके अंतिम निष्कर्ष प्राप्त करने की विधि निकाली थी।

ईश्वर की भाषा गणित है!

गैलीलियो ने अनुभव किया कि प्रकृति के नियम विभिन्न कारकों से प्रभावित होते हैं और किसी एक के बढ़ने और घटने के बीच गणित के समीकरणों जैसे ही सम्बन्ध होते हैं। इसलिए उसने कहा कि- ‘ईश्वर की भाषा गणित है।’

प्रकाश की गति का मापन

इस महान् गणितज्ञ और वैज्ञानिक ने प्रकाश की गति को नापने का साहस किया। इसके लिए गैलीलियो और उसका एक सहायक अंधेरी रात में कई मील दूर स्थित पहाड़ की दो अलग-अलग चोटियों पर जा बैठे।

गैलीलियो ने अपने पास एक लालटेन रखी, अपने सहायक का संकेत पाने के बाद उन्हें लालटेन और उसके खटके के माध्यम से प्रकाश का संकेत देना था। दूसरी पहाड़ी पर स्थित उनके सहायक को लालटेन का प्रकाश देखकर अपने पास रखी दूसरी लालटेन का खटका हटाकर पुनः संकेत करना था।

इस प्रकार दूसरी पहाड़ की चोटी पर चमकते प्रकाश को देखकर गैलीलियो को प्रकाश की गति का आकलन करना था। इस प्रकार गैलीलियो ने जो परिणाम पाया वह बहुत सीमा तक वास्तविक तो नहीं था परन्तु प्रयोगों की आवृत्ति और सफलता-असफलता के बाद ही अभीष्ट परिणाम पाने की जो शृंखला उनके द्वारा प्रारंभ की गयी वह अद्वितीय थी। कालान्तर में प्रकाश की गति और उर्जा के संबंधों की जटिल गुत्थी को सुलझाने वाले महान् वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टीन ने इसी कारण गैलीलियो को ‘आधुनिक विज्ञान का पिता’ कहकर संबोधित किया।

सूर्य भी बदलता है

गैलिलियो ने कुछ ही समय पहले आविष्कार किए गए एक लैन्स का प्रयोग करके ‘टेलीस्कोप’ नामक यंत्र बनाया। गैलिलियो पहला मनुष्य था जिसने टेलीस्कोप के जरिए इतनी सूक्ष्मता से अंतरिक्ष का अवलोकन किया। उसे पक्का विश्वास हो गया कि कोपर्निकस की बातें सच हैं। गैलिलियो ने सूरज में काले धब्बे भी देखे, जिन्हें अब सूर्य-धब्बे कहा जाता है। इस तरह उसने ‘धर्म’ की एक और प्रमुख धारणा पर वार किया कि ‘सूर्य कभी नहीं बदलता और ना ही उसका तेज कम होता है।’

पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है

ई.1609 में गैलीलियो को एक ऐसी दूरबीन का पता चला जिसका आविष्कार हॉलैंड में हुआ था। इस दूरबीन की सहायता से दूरस्थ खगोलीय पिंडों को देख कर उनकी गति का अध्ययन किया जा सकता था। गैलीलियो ने इसका विवरण सुनकर स्वयं ऐसी दूरबीन का निर्माण कर लिया जो हॉलैंड में आविष्कृत दूरबीन से कहीं अधिक शक्तिशाली थी।

इसके आधार पर किए गए प्रयोगों के माध्यम से गैलीलियो ने यह पाया कि पूर्व में व्याप्त मान्यताओं के विपरीत ब्रह्माण्ड में स्थित पृथ्वी समेत सभी ग्रह, सूर्य की परिक्रमा करते हैं। इससे पूर्व कॉपरनिकस ने भी यह कहा था कि ‘पृथ्वी समेत सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते है ‘ जिसके लिए उसे चर्च का कोपभाजन बनना पड़ा था।

यहाँ तक कि ईसा से लगभग साढ़े पाँच सौ साल पहले स्वयं पाइथोगोरस यह कह चुका था ‘कि पृथ्वी और अन्य खगोलीय पिण्ड किसी अग्नि के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। ‘

हालांकि पाइथोगोरस इस अग्नि की पहचान सूर्य के रूप में नहीं कर सका था। पाइथोगोरस को दिव्य शक्ति प्राप्त थी जिसके आधार पर पाइथोगोरस ने यह बात कही थी जबकि कोपरनिकस नक्षत्रों की गति का अध्ययन करके और गैलीलियो दूरबीन से देखकर यह बात कह रहा था।

चर्च का कोपभाजन

गैलिलियो का स्वभाव कोपर्निकस से बिलकुल अलग था। वह पूरे जोश के साथ और बेधड़क होकर अपने विचार व्यक्त करता था। दुर्भाग्य से इस युग का धार्मिक वातावरण मैत्रीपूर्ण नहीं था। कैथोलिक चर्च कोपर्निकस के विचारों का प्रबल विरोध करता था। इसलिए जब गैलिलियो ने दावा किया कि सूर्य-केंद्र का सिद्धांत सिर्फ वैज्ञानिक तौर पर ही सही नहीं, अपितु बाइबिल से भी मेल खाता है, तो चर्च को उसकी बातों में धर्म-द्रोह की गंध आई।

जब गैलीलियों ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि सूर्य-केंद्र का सिद्धांत बाइबल से मेल खाता है, तो उसने यह दिखाया मानो धर्म के बारे में उसे बहुत जानकारी है। इससे चर्च के अधिकारी और भी भड़क उठे। गैलिलियो अपने सिद्धांत का स्पष्टीकरण देने के लिए पीसा से रोम आया किंतु कुछ लाभ नहीं हुआ। ई.1616 में चर्च ने उसे आदेश दिया कि वह कोपर्निकस के विचारों को फैलाना बंद करे।

कुछ समय के लिए गैलिलियो चुप होकर बैठ गया किंतु ई.1632 में उसने कोपर्निकस के विचारों को पुनः सही ठहराते हुए एक और पुस्तक प्रकाशित की। उसके ठीक एक साल बाद रोमन कैथोलिक अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा दी किन्तु बाद में गैलीलियो के माफी मांग लेने पर उसकी वृद्धावस्था को देखते हुए उसकी सजा को ‘नजरबंदी’ में बदल दिया ताकि वह धर्म विरुद्ध वैज्ञानिक प्रयोगों को आगे जारी नहीं रख सके।

बहुत से लोगों का मानना है कि चर्च के विरुद्ध गैलिलियो का यह संघर्ष वास्तव में विज्ञान और धर्म के बीच की लड़ाई थी जिसमें विज्ञान की जीत हुई। क्योंकि समय के साथ लोगों ने मान लिया कि गैलीलियो जो कुछ भी कह रहा था, वह सही था। ई.1642 में गैलीलियो की मृत्यु हो गई।

चर्च द्वारा गलती सुधार

गैलीलियो की मृत्यु के ठीक साढ़े तीन सौ वर्ष बाद ई.1992 में वेटिकन सिटी स्थित कैथोलिक चर्च ने स्वीकार कर लिया कि गैलीलियो के मामले में निर्णय लेने में उनसे चूक हुई थी। यह संभवतः पहली बार था अन्यथा चर्च का यह दावा था कि वह सत्य की व्याख्या अचूक ढंग से करने में सक्षम है।

विज्ञान को आजादी

यूरोप में रोम के कैथोनिक चर्च के नेतृत्व में धर्म और विज्ञान की इस खूनी-जंग में प्राण गंवाने वाले वैज्ञानिकों की सूची अभी पूरी नहीं हुई है किंतु चूंकि हमारा केन्द्र-बिंदु रोम तथा इटली है, इसलिए हमें इस विषय को यहीं विराम देना पड़ेगा। अठारहवीं शताब्दी आते-आते यूरोप में ईसाई संघ की कट्टरता कम होने लगी तथा यूरोप में बुद्धिवाद का प्रचार हुआ जिससे विज्ञान को खुलकर सोचने की शक्ति मिल गई।

अठारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में अंग्रेज विज्ञानी आइजक न्यूटन (ई.1642-1727) ने गुरुत्वाकर्षण के नियमों की व्याख्या की तथा बताया कि चीजें पृथ्वी पर क्यों गिरती हैं। उसने सूर्य एवं ग्रहों की चालों के भेद को भी समझाया। इस वैज्ञानिक को पूरे संसार में बहुत आदर मिला।

इसी प्रकार उन्नीसवीं सदी के मध्य में ई.1859 के आसपास चार्ल्स डार्विन की पुस्तक ‘ओरिजिन ऑफ स्पीसीज’ प्रकाशित हुई। उसने बताया कि पृथ्वी पर विभिन्न प्रजातियों के प्राणियों का उद्भव एवं विकास कैसे हुआ है!

इस प्रकार चीनी दार्शनिक ‘त्सोन त्से’ की बात को स्वीकार करने में यूरोप ने चार हजार साल लगा दिए। डार्विन ने सम्पूर्ण मानव जाति का सोचने का तरीका बदल दिया तथा अब धर्म नामक संस्था, अपनी मनमर्जी से विज्ञान को धर्म-विरोधी कहकर विज्ञान के उपासकों को आग या जेल में नहीं झौंक सकती थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कैथोलिक धर्म से अलग सम्प्रदायों का उदय (32)

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कैथोलिक धर्म से अलग सम्प्रदायों का उदय

ईसाइयत में कैथोलिक धर्म ही अकेला पंथ या सम्प्रदाय नहीं है। कैथोलिक धर्म से अलग भी बहुत से सम्प्रदाय हैं। ये पंथ एवं सम्प्रदाय भी ईसाई धर्म के अंतर्गत हैं किंतु कैथोलिक मान्यताओं से अलग मान्यताएं रखते हैं।

मार्टिन लूथर का आंदोलन

धर्म एवं विज्ञान के बीच हुए संघर्ष में वैज्ञानिकों पर किए गए अत्याचारों ने तथा इनक्विजीशन के माध्यम से ईसाई साधुओं पर किए गए जुल्मों ने बहुत से कैथोलिक ईसाइयों को दूसरे ढंग से सोचने के लिए प्रेरित किया। सोलहवीं सदी के आरम्भ में जर्मनी में मार्टिन लूथर नामक एक महान् नेता उत्पन्न हुआ।

वह एक ईसाई पादरी था। एक बार जब वह रोम गया तो वहाँ ईसाई संघ के भ्रष्टाचार एवं विलास ने उसके हृदय को ग्लानि से भर दिया। उसने कैथोलिक धर्म में फैले भ्रष्टाचार का विरोध करना आरम्भ किया। इस कारण रोमन ईसाई संघ दो टुकड़ों में विभक्त हो गया। पूर्वी यूरोप और रूस का प्राचीन काल से चला आ रहा यूनानी ईसाई संघ इस झगड़े से अलग ही रहा। वह तो पहले से ही रोम को सच्ची ईसाइयत से बहुत दूर समझता था।

मार्टिन लूथर के नेतृत्व में शुरु हुआ आंदोलन ‘प्रोटेस्टेण्ट विद्रोह’ कहलाया। चूंकि ये लोग प्रोटेस्ट अर्थात् विरोध करते थे इसलिए ‘प्रोटेस्टेण्ट-ईसाई’ कहलाए। बहुत से राजाओं ने भी इस आंदोलन को सहयोग दिया। ये राजा चाहते थे कि पोप उन पर आदेश चलाना बंद करे। बहुत से ईसाई पादरी जो अंतर्मन से चाहते थे कि धर्म नामक संस्था में घुस आए भ्रष्टाचार एवं विलासिता को समाप्त हो जाना चाहिए, वे भी इस आंदोलन से जुड़ गए।

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इटली अभी रिनेंसाँ के युग में चल ही रहा था, इसलिए जनता में भी बहुत से विचार उमड़-घुमड़ रहे थे। कुछ लोग मैकियावेली की पुस्तकों को पढ़कर राजाओं एवं पोप आदि सत्ताओं से चिढ़ गए थे और वे भी कुछ करना चाहते थे। इस कारण पश्चिमी यूरोप में रोमन चर्च के विरोध का जर्बदस्त माहौल बन गया। पूरे पश्चिमी यूरोप में यह आंदोलन इतना अधिक फैल गया कि ईसाइयत दो संघों में बंट गई- रोम कैथोलिक तथा प्रोटेस्टेण्ट। रोमन संघ के विरुद्ध हुए इस आंदोलन को रिफॉर्मेशन भी कहा जाता है। प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल एवं आधुनिक काल में रोम तथा पोप के विरुद्ध जितने भी आंदोलन हुए उनमें प्रोटेस्टेण्ट आंदोलन सबसे बड़ा सिद्ध हुआ। यह किसी एक या दो देशों में नहीं था अपितु यूरोप के अधिकांश देशों में फैल गया था। बाद में प्रोटेस्टेण्ट्स भी बहुत से फिरकों में बंट गए। सोलहवीं सदी में फ्रांसिस्कन एवं डोमिनिकन नामक ईसाई सम्प्रदाय अस्तित्व में आए। जब मार्टिन लूथर प्रोटेस्टेण्ट आंदोलन कर रहा था, तब उन्हीं दिनों लोयोला निवासी इग्नेशियस नामक एक स्पेनिश पादरी ने एक नया ईसाई संघ स्थापित किया। उसने इसका नाम ‘सोसायटी ऑफ जीसस’ रखा। इसके सदस्य जेजुइट कहलाए।

यह जीजस संघ एक अद्भुत संस्था थी। इसका मुख्य उद्देश्य रोमन ईसाई संघ तथा पोप की सेवा के लिए पूरा समय देने वाले समर्पित मनुष्यों का दल तैयार करना था। यह संघ अपने सदस्यों को कठोर प्रशिक्षण देकर हर तरह से मजबूत बनाता था। इस कारण इस संघ के सदस्य रोमन चर्च एवं पोप के बड़े विश्वस्त सिद्ध हुए।

इन लोगों ने अपना सम्पूर्ण जीवन अपने लक्ष्य के लिए समर्पित कर दिया था। इसलिए वे चर्च तथा पोप के आदेश पर किसी तरह की शंका नहीं करते थे अपितु उनके हर आदेश पर आंख मींचकर विश्वास करते थे। ईसाई संघ के हितों के लिए वे अपना जीवन न्यौछावर करने में भी नहीं चूकते थे। इनके लिए ईसाई संघ के हित में सब-कुछ उचित था।

इन लोगों का चरित्र बहुत उज्ज्वल था। इसके कारण लोग उनकी बातों को मानते थे। इन लोगों के प्रभाव का परिणाम यह हुआ कि स्वयं रोम में भ्रष्टाचार बहुत कम हो गया। हालांकि भ्रष्टाचार कम होने का बड़ा कारण प्रोटेस्टेण्ट आंदोलन था। उस काल में हैप्सबर्ग वंश का चार्ल्स (पंचम्) पवित्र रोमन साम्राज्य का सम्राट था। उसे अपने पिता और दादा के विवाहों के परिणामस्वरूप विरासत में बहुत बड़ा साम्राज्य मिल गया था जिसमें ऑस्ट्रिया, जर्मनी, नेपल्स, सिसली, नीदरलैण्ड और स्पेनी अमरीका सम्मिलित थे।

इस प्रकार यह राजा लगभग आधे यूरोप का स्वामी था। उसने प्रोटेस्टेण्ट्स के विरुद्ध पोप की सहायता करने का निर्णय लिया किंतु जर्मनी के बहुत से छोटे-छोटे राजाओं एवं सामंतों ने प्रोटेस्टेण्टों का साथ दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि जर्मनी में रोमन और लूथरन नामक दो झगड़ालू फिरके बन गए। इनके झगड़े इतने अधिक बढ़ गए कि जर्मनी में गृहयुद्ध छिड़ गया।

इंग्लैण्ड के राजा हेनरी (अष्टम्) ने पोप के विरुद्ध प्रोटेस्टेण्ट्स का साथ दिया। उसकी ललचाई आंखें रोमन चर्च तथा ईसाई संघ की सम्पत्ति पर लगी हुई थीं। इसलिए उसने रोम से सम्बन्ध तोड़कर मठों एवं गिरजों की सारी सम्पत्ति जब्त कर ली। हेनरी (अष्टम्) की पोप से नाराजगी का एक बड़ा कारण यह भी था कि हेनरी अपनी पहली रानी को छोड़कर दूसरी स्त्री से विवाह करना चाहता था किंतु पोप इसके लिए अनुमति नहीं दे रहा था। इंग्लैण्ड ने रोम से अपना सम्बन्ध तोड़ लिया तथा राजा हेनरी (अष्टम्) स्वयं इंग्लैण्ड के ईसाई संघ का प्रधान बन गया।

कुछ ही दिनों में इंग्लैण्ड में ईसाई धर्म एक सरकारी कार्यालय के रूप में चलने लगा जिससे राजा को कम ही मतलब था। फ्रांस में भी विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई। वहाँ के सम्राट का प्रधानमंत्री ‘रिशैल्यू’ एक कार्डिनल था और राज्य का असली शासक भी वही था। रिशैल्यू ने फ्रांस को पोप एवं रोम के पक्ष में रखा और फ्रांस में प्रोटेस्टेण्ट्स का दमन किया।

रिशैल्यू इतना गहरा राजनीतिक था कि एक ओर वह अपने राज्य फ्रांस में प्रोटेस्टेण्ट्स का दमन कर रहा था तो दूसरी ओर वह जर्मनी में प्रोटेस्टेण्ट्स को बढ़ावा दे रहा था ताकि जर्मनी में गृहयुद्ध की आग ठण्डी न हो।

मार्टिन लूथर सबसे बड़ा प्रोटेस्टेण्ट था और उसने रोम की सत्ता का जमकर विरोध किया किंतु वह स्वयं भी धर्म के मामले में बहुत कट्टर था। उसने एक नए ढंग के धार्मिक-उन्मत्त पैदा कर दिए- ‘प्यूरिटन’ तथा ‘कैलविनिस्ट’। पोप एवं रोम के इनक्विजीशन एवं कर प्रणाली से दुःखी जन-साधारण ने भी, विशेषकर किसानों ने प्रोटेस्टेण्ट्स का साथ दिया।

देखते ही देखते यूरोप में किसानों का बड़ा आंदोलन आरम्भ हो गया और वह प्रोटेस्टेण्ट्स के आंदोलन से भी आगे बढ़ गया। उनकी मुख्य मांग यह थी कि गुलाम-काश्तकार की प्रथा समाप्त की जाए। इस पर मार्टिन लूथर जो स्वयं को धर्म-सुधारक कहता था, किसानों पर भड़क गया।

लूथर ने सार्वजनिक भाषणों में अपने अनुयाइयों से अपील की कि- ‘इस शर्त से तो सब आदमी बराबर हो जाएंगे और ईसा का आध्यात्मिक राज्य बदलकर एक बाहरी सांसारिक राज्य बन जाएगा। असम्भव! पृथ्वी का कोई ऐसा राज्य रह ही नहीं सकता जिसमें सब व्यक्ति बराबर हों। कुछ को आजाद, दूसरों को गुलाम, कुछ को राजा, दूसरों को प्रजा रहना ही पड़ेगा….

…. आंदोलनकारी किसानों को मार डालना जरूरी है। इसलिए जो लोग भी ऐसा कर सकते हों, वे किसानों को खुल्लम-खुल्ला या छिपकर काट डालें। कत्ल कर डालें और छुरों से भोंक दें, और समझ लें कि एक बागी से बढ़कर जहरीला, बुरा और निपट शैतान कोई नहीं है। तुम उसे मार डालो, जैसे तुम पागल कुत्ते को मार डालते हो। अगर तुम उस पर टूट नहीं पड़ोगे तो वह तुम पर और सारे देश पर टूट पड़ेगा।’

लूथर के समर्थकों द्वारा की गई हिंसात्मक कार्यवाहियों के कारण किसान प्रोटेस्टेण्ट आंदोलन से दूर हो गए तथा इस आंदोलन के अंत में यूरोप का मध्यमवर्ग ही इस आंदोलन के साथ रह गया। उस काल में यूरोप में मध्यम वर्ग तेजी से आगे बढ़ रहा था। मध्यम-वर्ग की उन्नति में कैथोलिक चर्च की बजाय प्रोटेस्टेण्ट विचार अधिक सहायक सिद्ध हो रहे थे।

इसलिए यूरोप के बहुत बड़े हिस्से में तथा बहुत बड़ी संख्या में मध्यम वर्ग के लोग कैथोलिक धर्म छोड़कर प्रोटेस्टेण्ट के अनुयाई हो गये। यूरोप के अधिकांश राजा भी पोप और चर्च के बंधन से मुक्त हो गए। लोग कैथोलिक चर्च से दूर होकर प्रोटेस्टेण्ट बन रहे थे किंतु अब धर्म लोगों के दिमागों में नहीं, गलियों में लड़ रहा था।

कैथोलिकों और प्रोटेस्टेण्टों के खूनी झगड़ों, कैथोलिकों और कैलविनों के रक्तपातों, इनक्विजिशन द्वारा बांटी जा रही दर्दनाक मौतों के साथ-साथ यूरोप में प्यूरिटन नामक सम्प्रदाय द्वारा लाखों स्त्रियों को डायन बताकर की गई हत्याओं का अंततः यही परिणाम होना था कि लोग धर्म से उकता जाएं किंतु इसके लिए यूरोप में आर्थिक समृद्धि एवं वैज्ञानिक खोजों का दौर आरम्भ होना आवश्यक था।

समृद्धि एवं विज्ञान के आालोक में ही यह सम्भव था कि लोग धर्म के वास्तविक स्वरूप एवं आडम्बर में अंतर करके देख सकें किंतु उस दौर को आरम्भ होने के लिए लोगों को अठारहवीं सदी के मध्य तक प्रतीक्षा करनी थी। तब तक के लिए यूरोप में रक्तपात और हिंसा का चक्र इसी प्रकार जारी रहना था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यूरोपीय समाज में भेदभाव एवं शोषण (33)

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यूरोपीय समाज में भेदभाव एवं शोषण

यूरोपीय समाज में भेदभाव एवं शोषण का सिलसिला आदि काल से है। संसार में यूरोप के लोगों को सर्वाधिक सुसभ्य माना जाता है किंतु यह बात सही नहीं है। आज भी यूरोपीय समाज में भेदभाव एवं शोषण संसार की अन्य सभ्यताओं की तुलना में अधिक हैं।

धर्म के नाम पर अत्याचारों का सिलसिला

ईसाई धर्म के उदय के साथ ही धार्मिक झगड़ों एवं साम्प्रदायिक वैमनस्य ने हिंसक रूप ले लिया। यहूदियों ने न केवल ईसा मसीह को सूली पर चढ़वाया अपितु येरूशलम के आसपास चोरी-छिपे ईसाई बन रहे लोगों को को ढूंढ-ढूंढ कर मारा जिसके कारण यहूदियों एवं ईसाइयों के बीच घृणा की स्थाई दीवार खिंच गई।

रोमवासियों ने भी अपने प्राचीन रोमन धर्म को बचाने के लिए ईसाई संतों एवं प्रचारकों की निर्मम हत्याएं कीं। मिस्र के लोगों ने रोमवासियों से बहुत पहले ईसाई धर्म अपना लिया था इस कारण रोमन सेनाओं ने मिस्री ईसाइयों पर बहुत अत्याचार किए जिससे मिस्र के ईसाइयों को भागकर रेगिस्तान में छिप जाना पड़ा।

रेगिस्तान में ईसाइयों के अनेक गुप्त मठ बन गए और इन मठों में रहने वाले साधुओं के चमत्कारों की आश्चर्य युक्त और रहस्यमयी कहानियाँ ईसाई जगत में फैल गईं।

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बाद में जब कुस्तुंतुनिया के सम्राट कान्सेन्टीन ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया, तब ईसाइयत रोमन साम्राज्य का राजकीय धर्म बन गई। इसके बाद रोमन साम्राज्य में ईसाई धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म को मानने की मनाही हो गई। इसलिए रोम के कैथोलिक ईसाइयों ने प्राचीन रोमन धर्म मानने वालों को ढूंढ-ढूंढ कर जिंदा जलाया। जब रोम में ईसाई धर्म को मान्यता मिल गई तो मिस्र के ईसाइयों ने भी भी मिस्र में निवास कर रहे गैर-ईसाइयों पर, अर्थात् प्राचीन मिस्री धर्म को मानने वालों पर बड़े अत्याचार किए। इसके बाद इस्कंदरिया ईसाई शिक्षा का बड़ा केन्द्र हो गया। समय के साथ ईसाई धर्म विभिन्न सम्प्रदायों में टूटता-बिखरता एवं बंटता चला गया तथा ईसाइयत कई फिरकों में बंट गई। ये फिरके अपने-अपने वर्चस्व के लिए परस्पर संघर्ष करते थे। ये रक्त-रंजित संघर्ष जनसामान्य के लिए बहुत दुःखदायी सिद्ध हुए। जब सातवीं सदी में अरब वाले इस्लाम को लेकर आए तो बहुत से मिस्र वासियों ने उनका स्वागत किया। अरबों ने मिस्र और उत्तरी अफ्रीका को सरलता से विजय कर लिया तथा अब इस्लाम को मानने वाले ईसाइयों पर अत्याचार करने लगे और उन्हें ढूंढ-ढूंढ कर मारने लगे। जब पंद्रहवीं सदी में इस्लाम ने कुस्तुंतुनिया पर आक्रमण किया तो कुस्तुंतुनिया के ईसाई सामंतों ने ‘पोप के ताज  से रसूल की पगढ़ी अच्छी है’ कहकर इस्लाम का स्वागत किया।

इंग्लैण्ड द्वारा आयरलैण्ड के कैथोलिकों पर अत्याचार

आयरलैण्ड में चूंकि ईसाई धर्म बहुत पहले आ गया था इसलिए अधिकतर आयरलैण्ड निवासी भी कैथोलिक धर्म को मानते थे। उन्हें इंग्लैण्ड में बड़ी हिकारत की दृष्टि से देखा जाता था। इंग्लैण्ड के धनी सामंत लोग प्रोटेस्टेण्ट्स थे तथा उनकी संख्या बहुत अधिक थी। वे लॉर्ड्स कहलाते थे। जबकि आयरलैण्ड में कैथोलिकों की संख्या अधिक थी तथा वे खेतों में मजदूरी करते थे।

आयरलैण्ड में कैथोलिकों की जनसंख्या बहुत अधिक होने पर भी आयरलैण्ड की पार्लियामेंट प्रोटेस्टेण्ट्स के हाथों में थी। ये लोग इंग्लैण्ड से आकर उत्तरी आयरलैण्ड में बस गए थे। उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में आयरलैण्ड से भी इंग्लैण्ड की पार्लियामेंट के लिए सदस्य चुने जाते थे किंतु किसी भी कैथोलिक को इंग्लैण्ड की पार्लियामेंट में प्रवेश करने का अधिकार नहीं था।

अमरीका में इटली के कैथोलिक मजदूरों से भेदभाव

अठारहवीं एवं उन्नीसवीं सदी में यूरोप के बहुत से देशों के लोग अमरीका में जाकर बसने लगे। इनमें जर्मनी, आयरलैण्ड, इंग्लैण्ड, पोलैण्ड एवं इटली आदि देशों के लोग प्रमुख थे। यह एक आश्चर्य की बात थी कि उत्तरी यूरोप के देशों से आए हुए लोग दक्षिणी यूरोप अर्थात् इटली से आए हुए लोगों को नीची दृष्टि से देखते थे। इटली से आए हुए लोगों को हिकारत से ‘डेगो’ कहा जाता था जिसका शाब्दिक अर्थ है- ‘गेहुएँ रंग वाला विदेशी’

ये लोग अमरीका में मजदूरी करते थे तथा कमजोर एवं बिखरे हुए थे। अन्य यूरोपीय देशों से आए हुए जिन मजदूरों को अच्छा वेतन मिलता था, वे भी इटली के मजदूरों को अलग वर्ग का समझते थे और उन्हें अपने साथ नहीं बिठाते थे।

यूरोप की धन-पिपासा और गुलाम-प्रथा

यूरोपीय समाज में भेदभाव एवं शोषण का सबसे बड़ा माध्यम गुलाम प्रथा थी। यूरोप में गुलामी की प्रथा ईसा के जन्म से शताब्दियों पहले से प्रचलन में थी। यह एक आश्चर्य की ही बात थी कि युग आते थे और जाते थे, राज्य और साम्राज्य बनते थे और मिटते थे किंतु रोम से लेकर यूरोप के अंतिम छोर तक गुलामी की प्रथा ज्यों की त्यों बनी हुई थी।

एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य की देह को पशुओं की तरह हांके जाना, मनुष्यता नामक तत्व पर कलंक के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता था। जब तक कोई समाज गुलामी करने और करवाने की अपनी प्रवृत्ति से दूर नहीं होता, उस समाज में वैचारिक क्रांति को जन्म नहीं मिलता। ऐसा समाज केवल शक्ति, दण्ड एवं पूंजी से चलता है, मानवता के पवित्र गुणों से नहीं।

यूरोपीय समाज में युगों से प्रचलित गुलामी करवाने की मनोवृत्ति के कारण इंग्लैण्ड, हॉलैण्ड, फ्रांस, पुर्तगाल, तथा स्पेन आदि छोटे-छोटे देश पूरी दुनिया में औपनिवेशिक साम्राज्य खड़े करने में सफल रहे। प्राचीन युगों में अफ्रीकी देश, यूरोप की धन-पिपासा की चपेट में रहे किंतु मध्य युग में अमरीकी एवं एशियाई देशों पर भी यूरोपीय उपनिवेशवाद एवं गुलामी लाद दी गई। इसके लिए बड़ी संख्या में मानवों का रक्त बहाया गया।

नए गुलामों की आवश्यकता

सत्रहवीं सदी से लेकर उन्नीसवीं सदी के मध्य तक सम्पूर्ण यूरोप में गुलाम प्रथा अपने चरम पर थी। इस काल में इंग्लैण्ड का विख्यात शहर लिवरपूल गुलामों की बड़ी मण्डी के रूप में जाना जाता था। ये गुलाम विभिन्न देशों से पकड़कर लाए जाते थे जिनमें अफ्रीका के पश्चिमी तट पर स्थित देश प्रमुख थे।

इस स्थान को यूरोप में ‘गुलामों का तट’ कहा जाता था। ई.1730 में लिवरपूल के 15 जहाज गुलामों को पकड़कर लाने के काम में लगे हुए थे जिनकी संख्या ई.1792 में 132 हो गई। इंग्लैण्ड के लंकाशायर में रुई की कताई का उद्योग बहुत उन्नति कर गया था जिसके लिए गुलामों की जरूरत पड़ती थी। यह रुई भारत के खेतों से बलपूर्वक उठाकर पानी के जहाजों के माध्यम से इंग्लैण्ड पहुँचाई जाती थी।

अमरीका के दक्षिण राज्यों में भी रुई की भारी पैदावार होने लगी थी। इन खेतों में भी अफ्रीका से पकड़कर लाए गए हब्शियों से बल पूर्वक कार्य करवाया जाता था। ई.1790 में अमरीका में गुलामों की संख्या लगभग 7 लाख थी जो ई.1861 में बढ़कर 40 लाख हो गई।

गुलाम प्रथा के विरुद्ध कमजोर आवाजें

स्वाभाविक ही था कि कुछ लोग इस बर्बर प्रथा के खिलाफ सोचना शुरु करते और उनके लिए संघर्ष करते। इन्हीं संघर्षों का परिणाम था कि उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में यूरोपीय देशों एवं अमरीका में गुलाम प्रथा के विरुद्ध नियम बनने आरम्भ हुए। इंग्लैण्ड की सरकार ने गुलाम प्रथा को गैर-कानूनी घोषित कर दिया और कठोर सजा के प्रावधान किए किंतु गुलाम प्रथा ज्यों की त्यों जारी रही।

उन्हें रात के अंधेरों में चलने वाले पानी के जहाजों में जानवरों से भी बुरी हालत में एक-दूसरे के ऊपर लाद कर लाया जाता था। अमरीकी लेखक हैरियट बीचर स्टो ने अमरीकी गृहयुद्ध के आरम्भ होने से दस वर्ष पहले ‘अंकल टॉम्’स केबिन’ शीर्षक से एक पुस्तक लिखी जिसमें इन गुलामों की दुःख-भरी जिंदगी का मार्मिक चित्रण किया गया है।

इन गुलामों की दशा में तब तक कोई सुधार नहीं आने वाला था जब तक कि यूरोपीय समुदाय के धन-पिपासु लोगों की आत्मा में ‘मनुष्य’ नामक पशु के लिए सहृदयता, सहानुभूति एवं समता के भाव उदित न हों।

मनुष्य की शारीरिक एवं मानसिक क्षमताएं ही रोटी, कपड़ा और मकान पर अधिकार का मानदण्ड

संसार के अन्य प्राचीन समुदायों की भांति यूरोप का ईसाई समुदाय भी मनुष्य मात्र की स्वतंत्रता और बराबरी के विचार को मान्यता नहीं देता था। कहीं पर राजा ईश्वर का प्रतिनिधि था तो कहीं पर गुलामों के भीतर आत्मा नहीं पाई जाती थी। सभी मनुष्य समान नहीं हो सकते, इस विचार का आधार आदिकाल से ही प्रत्येक मनुष्य की शारीरिक एवं मानसिक क्षमताओं में अंतर पर टिका हुआ था जिनके कारण मनुष्यों की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति में अंतर उत्पन्न होता है।

कई मामलों में तो शारीरिक क्षमताओं को ही सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक मान लिया जाता था तथा इसी आधार पर मनुष्यों के भोजन, वस्त्र, सम्पत्ति एवं आचरण सम्बन्धी अधिकारों को बढ़ा या घटा दिया जाता था। विशेषकर स्त्रियों, गुलामों एवं श्रमिकों के मामले में। स्त्रियों के लिए पुरुषों की तुलना में कम पौष्टिक आहार एवं कम शिक्षा को पर्याप्त मान लिया जाता था और उसे धर्म का हिस्सा बना दिया जाता था ताकि उस विचार का कोई विरोध न करे। यहाँ तक कि स्त्रियों का घर से बाहर आना, सभाओं में अपने विचार अथवा मत व्यक्त करना, खुलकर हंसना, परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त अन्य पुरुषों से बात करना आदि प्रतिबंधित होता था।

ये सब बातें ईसाई धर्म में भी विश्व के दूसरे मत-मतांतरों के अघोषित एवं अलिखित आचरण शास्त्र का अनिवार्य हिस्सा थीं। यहाँ तक कि स्त्रियों एवं पुरुषों की आत्माओं में भी अंतर माना गया था। यूरोपीय समुदाय में यह प्रवृत्ति अठारहवीं एवं उन्नीसवीं सदी में भी जारी रही।

शोषण के धार्मिक महिमामण्डन से मिली सामाजिक स्वीकार्यता

मनुष्य मात्र में अंतर करने की प्रवृत्ति को धार्मिक आवरण से मण्डित कर देने के कारण वह सहज सामाजिक आचरण बन जाता है। यही कारण है कि प्राचीन यूरोपीय समुदाय में मजदूरों एवं गुलामों से अधिक शारीरिक काम लेकर उन्हें बचा-खुचा, बासी, कम पौष्टिक, आधा-पेट भोजन देना सहज सामाजिक व्यवहार माना जाता था।

मनुष्यों में हर स्तर पर अंतर करने की प्रवृत्ति के कारण यूरोप में गणतंत्र अथवा लोकतंत्र जैसे विचारों को पनपने के लिए कम ही अवकाश बचता था। रोम की भांति यूरोप के अधिकतर देशों में निरंकुश शासन-तंत्र था जो शस्त्र एवं शास्त्र के बल पर समाज के श्रमजीवी एवं गुलाम वर्ग को नियंत्रण में रखता था।

जब तक यूरोप में लोकतंत्र का विचार सुदृढ़ नहीं हो गया, तब तक यही शोषणकारी व्यवस्था चलती रही। फिर भी वेनिस, फ्लोरेंस तथा यूरोप के कुछ अन्य राज्यों में सीमित प्रकार की गणतंत्र व्यवस्थाएं चलती थीं जो कि फ्रांस, जर्मनी, इंग्लैण्ड एवं रोम की राजतंत्रात्मक व्यवस्थाओं से निःसंदेह अच्छी थीं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

यूरोप में लोकतांत्रिक विचार (34)

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यूरोप में लोकतांत्रिक विचार

छोटे-छोटे बर्बर कबीलों में बंटा हुआ यूरोप छोटे-छोटे देशों में बदल गया। इस कारण यूरोप में लोकतांत्रिक विचार का जन्म लेना और विकसित होना एक अत्यंत कठिन कार्य था।

भाप के इंजन का आविष्कार

अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ में ई.1712 में इंग्लैण्ड में भाप के ऐसे इंजन का आविष्कार हो गया जो तरह-तरह की मशीनें को लगातार ऊर्जा दे सकता था। इन मशीनों के आगमन ने मजदूरों को अपने भविष्य एवं भाग्य पर नए सिरे से सोचने पर विवश किया। देशों की अर्थव्यवस्थाएं बदलने लगीं और लोगों के रहन-सहन में बदलाव आने लगा।

विगत अठारह सौ सालों में विश्व

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हमने पिछले अध्याय में चर्चा की थी कि कैथोलिक धर्म के विरुद्ध प्रोटेस्टेण्ट सम्प्रदाय के उठ खड़े होने के बाद इंग्लैण्ड के राजा हेनरी (अष्टम्) ने रोम तथा पोप से सम्बन्ध पूरी तरह तोड़ लिए थे तथा हेनरी ने स्वयं को ईसाई-संघ का अध्यक्ष घोषित कर दिया था। उसके बाद इंग्लैण्ड में धर्म केवल सरकारी कार्यालय के रूप में चलने लगा था और लोगों के दिमागों से धर्म का अंकुश कम हो गया था। यही कारण था कि इंग्लैण्ड में बड़ी मशीनों के आविष्कार का रास्ता सबसे पहले खुला और इंग्लैण्ड ने ही यूरोप में औद्योगिक क्रांति को जन्म दिया। इस क्रांति का महत्त्व इस बात से समझा जा सकता है कि जूलियस सीजर के युग से लेकर अठारहवीं सदी के आरम्भ तक पूरी दुनिया में लोगों के आवागमन का मुख्य साधन घोड़ा एवं बग्घी ही बने हुए थे। जूलियस सीजर के समय से लेकर अठारहवीं सदी के आगमन तक यूरोप के लोगों के धर्म भले ही तेजी से बदल गए थे किंतु उनके सोचने का तरीका अठारहवीं सदी में भी वही था जो जूलियस सीजर के समय में था। लोगों की आर्थिक परिस्थितियाँ भी वही थीं और लोगों पर शासन करने के तरीके भी वही थे। कहने का अर्थ यह कि विगत अठारह सौ सालों में दुनिया बहुत कम बदली थी किंतु भाप का इंजन न केवल दुनिया के भौतिक स्वरूप को बदलने वाला था अपितु दुनिया के लोगों के दिमागों में भी भारी परिवर्तन करने वाला था।

यूरोप के निर्धन एंव मध्यमवर्गीय लोग धर्म की बजाय समृद्धि, उत्पादन, वाणिज्य एवं विज्ञान के बारे में सोचने लगे थे। लोग शिक्षा एवं स्वास्थ्य के बारे में सोचने लगे थे। अब उन्हें राजा की जगह प्रजा का राज्य चाहिए था। इस प्रकार यूरोप में लोकतांत्रिक विचार प्रकट होने लगे।

दार्शनिकों एवं लेखकों की लहर

यूरोप के जन-साधारण के चिंतन में आए इस परिवर्तन में केवल मशीनों की ही भूमिका नहीं थी, अपितु अठारहवी शताब्दी के यूरोप में दार्शनिकों, चिंतकों एवं लेखकों की एक लहर सी उत्पन्न हो गई थी जिसने यूरोप में लोकतांत्रिक विचार प्रकट होने की गति को तेज कर दिया।

प्लूमे वाल्टेयर

फ्रांसीसी इतिहासकार एवं दार्शनिक प्लूमे वॉल्टेयर ने अठारहवीं शताब्दी में पुरानी राजनीतिक एवं धार्मिक मान्यताओं को चुनौती देते हुए उनके विरोध में यूरोपीय समाज के समक्ष अनेक नए विचार रखे। वह अपने समय के बुद्धिमान व्यक्तियों में से गिना जाता था। उसने ईसाईयत तथा रोमन कैथोलिक चर्च की कड़ी आलोचना की तथा धर्म की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और चर्च को शासन से अलग करने का समर्थन किया। वस्तुतः रोमन कैथोलिक चर्च की आलोचना इस बात की गारण्टी थी कि अब यूरोप में लोकतांत्रिक विचार प्रकट होने से रोके नहीं जा सकेंगे।

 उसके विचारों ने यूरोपियन सभ्यता को बहुत गहराई तक प्रभावित किया। 5 जनवरी 1767 को रूस के राजा फैड्रिक (द्वितीय) को लिखे एक पत्र में वॉल्टेयर ने लिखा- ‘हमारा धर्म (ईसाईयत) निश्चित रूप से संसार में आज तक हुए धर्मों में अत्यंत हास्यास्पद, अत्यधिक बेतुका तथा अत्यधिक रक्त-रंजित है। आप इस धर्म के अंध-विश्वासों को समाप्त करके मानवता पर शाश्वत उपकार कर सकते हैं। मैं भीड़ में अपनी बात नहीं कहता जो उपदेश दिए जाने योग्य नहीं है, तथा जो हर तरह से गुलामी के उपयुक्त है। मैं अपनी बात ईमानदार लोगों के बीच कहता हूँ जो सोचने-समझने की इच्छा रखते हैं।’  

वॉल्टेयर ने बाइबिल की एडम और ईव की कहानी को अस्वीकार करते हुए बहुजननिक सिद्धांत का प्रतिपादन किया जिसके अनुसार प्रत्येक मनुष्य-प्रजाति का उद्भव पूरी तरह से अलग-अलग हुआ। इस प्रकार वॉल्टेयर के समय से लोग बाइबिल पर टिप्पणियां एवं सहमतियां-असहमतियां व्यक्त करने की हिम्मत करने लगे। इससे भी लोगों में स्वतंत्रता सम्बन्धी विचारों को बढ़ावा मिला।

वाल्टेयर को बंदी बना लिया गया तथा उसे फ्रांस से बाहर निकाल दिया गया। वाल्टेयर जिनेवा के पास फर्नी में जाकर रहने लगा। जेल में उसे कागज, पैन और स्याही उपलब्ध नहीं कराई गई। इसलिए उसने पुस्तकों की लाइनों के बीच में सीसे के टुकड़ों से कविताएं लिखीं। वाल्टेयर को अन्याय और कट्टरपन से सख्त नफरत थी। जनता के नाम उसका संदेश था- ‘इन बदनाम चीजों को नष्ट कर दो।’  वह ई.1778 तक जीवित रहा।

जीन जैक्यूज रूसो

वॉल्टेयर के काल में जिनेवा में रूसो नामक एक शिक्षा-शास्त्री हुआ। उसने धर्म और राजनीति पर इतने उत्तेजक लेख लिखे कि सम्पूर्ण यूरोप में रूसो की धूम मच गई। उसके विचारों ने फ्रांस की राज्य-क्रांति के लिए प्रेरक तत्व का कार्य किया। लोगों के दिमाग में क्रांति की आग सुलग उठी। उसकी सबसे विख्यात पुस्तक ‘सोशियल कॉण्ट्रेक्ट’ है जिसमें कहा गया है कि– ‘मनुष्य जन्म से मुक्त है किंतु वह सब स्थानों पर जंजीरों में जकड़ा हुआ है।’

गिबन

अठारहवीं सदी में ही गिबन नामक एक अंग्रेज लेखक हुआ जिसने ‘डिक्लाइन एण्ड फॉल ऑफ रोमन एम्पायर’ नामक ग्रंथ लिखा। इस ग्रंथ ने कैथोलिक इतिहास की कड़वी सच्चाई लोगों के सामने रखी।

मान्टेस्क्यू

फ्रांस में मान्टेस्क्यू नामक चिंतक हुआ जिसने ‘एस्पिरिट डेस लोइस’ नामक ग्रंथ लिखा।

एडम स्मिथ

 ई.1776 में इंग्लैण्ड में एडम स्मिथ की पुस्तक ‘वैल्थ ऑफ नेशन्स’ प्रकाशित हुई। यह अर्थशास्त्र की पुस्तक थी किंतु इसने लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की आवश्यकता एवं उसके सामाजिक सौन्दर्य पर प्रकाश डाला। इस पुस्तक को चौथी शताब्दी ईस्वी पूर्व के भारतीय लेखक कौटिल्य द्वारा लिखी गई ‘अर्थशास्त्र’ की तरह ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र’ की पुस्तक कहा जाता है।

इसमें देशों की अर्थव्यवस्था को चलाने वाले नैसर्गिक नियमों की व्याख्या की गई है तथा देश के भीतर ऐसी अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने का समर्थन किया गया है जिससे उद्योगों का विकास हो, अधिक से अधिक लोगों को रोजगार मिले तथा प्रजा को भुखमरी, निर्धनता एवं अभावों से छुटकारा मिले।

यद्यपि इस पुस्तक का लोकतंत्र से कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं था तथापि इस प्रकार के विचारों के सामने आने से लोगों को यह सोचने पर विवश होना पड़ा कि देश को धार्मिक मान्यताओं से जकड़ी हुई शासन व्यवस्था से बाहर निकालकर अर्थशास्त्रीय शासन व्यवस्था भी दी जा सकती है। उन्हीं दिनों अमरीका एवं फ्रांस की क्रांतियों ने यूरोप में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के प्रति प्यास बढ़ा दी।

थॉमस पेन

अठारहवीं सदी में थॉमस पेन नामक एक प्रभावशाली अंग्रेज लेखक पैदा हुआ। उसने अमरीका के स्वाधीनता संग्राम (ई.1775-83) में, कुछ समय के लिए अमरीका में रहकर अमरीकियों की सहायता भी की। ई.1783 में अमरीका के स्वतंत्र होने के बाद वह इंग्लैण्ड लौट आया। उस समय फ्रांस में क्रांति आरम्भ हो चुकी थी।

थॉमस पेन ने ई.1791 में फ्रांसीसी क्रांति के समर्थन में ‘दी राइट्स ऑफ मैन’ नामक पुस्तक लिखी जिसमें उसने राजशाही पर तीखा हमला बोला तथा लोकशाही शासन व्यवस्था का प्रबल समर्थन किया। अंग्रेज सरकार ने उसे राजद्रोही घोषित कर दिया, वह भाग कर फ्रांस चला गया। वहाँ उसे लुई (सोलहवें) की हत्या का विरोध करने के कारण बंदी बना लिया गया।

पेरिस के बंदीगृह में रहते हुए ई.1794 में उसने ‘द एज ऑफ रीजन’ (तर्क का युग) नामक एक और पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में उसने शासन के धार्मिक दृष्टिकोण की आलोचना की। इस पुस्तक को कई देशों में प्रकाशित किया गया। इस पुस्तक को यूरोप में मनुष्य जाति के लिए अत्यंत खतरनाक माना गया।

क्योंकि अधिकतर सरकारों को लगता था कि शासन के लिए धर्म का होना अत्यंत आवश्यक है। जनता को धर्म का भय दिखाकर ही अनुशासन में रखा जा सकता है। यदि शासन में धर्म का समावेश नहीं हुआ तो प्रजा निरंकुश और विद्रोही हो जाएगी। इसलिए कई देशों में इस पुस्तक के प्रकाशकों को जेल भेज दिया गया। अंग्रेज कवि शेली उन दिनों जीवित था। उसने इंग्लैण्ड में इस पुस्तक के प्रकाशक को जेल भेजने वाले जज को पत्र लिखकर उसके निर्णय की आलोचना की।

ऑगस्ट कौण्ट

उन्हीं दिनों फ्रांस में ऑगस्ट कौण्ट (ई.1798-1857) नामक विचारक हुआ। उसने कहा कि पुराने धर्म-शास्त्रवाद और कट्टरपंथी धर्म का युग चला गया है किंतु संसार को किसी न किसी धर्म की आवश्यकता है।

इसलिए उसने ‘रिलीजन ऑफ ह्यूमैनिटी’ (मानव-धर्म) की कल्पना की तथा उसका नाम ‘पॉजिटिविज्म’ (धनात्मकवाद) रखा। इस धर्म के आधारभूत तत्व प्रेम, व्यवस्था और प्रगति रखे गए। इस धर्म का आधार ‘अलौकिकता’ न होकर ‘विज्ञान’ था। इस धर्म को शायद ही किसी ने अपनाया किंतु इस धर्म की कल्पना का प्रभाव लगभग सम्पूर्ण यूरोप पर पड़ा। लोगों के मन से धार्मिक रूढ़ियों का भय जाता रहा और वे अब सामाजिक व्यवस्था को वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में दखने लगे।

जॉन स्टुअर्ट मिल

कौण्ट के समय में ही जॉन स्टुअर्ट मिल नामक एक अंग्रेज चिंतक हुआ जिसने इंग्लैण्ड में पहले से ही पनप रहे उपयोगितावाद (यूटिलिटिज्म) के सिद्धांत को लोकप्रिय बनाने का काम किया। इस सिद्धांत का वैचारिक आधार ‘अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख’ में निहित था। इस सिद्धांत के अनुसार भलाई-बुराई की केवल यही एकमात्र कसौटी थी, जिस काम से जितने अधिक लोगों को सुख मिले, वह काम उतना ही अधिक अच्छा है।

इस सिद्धांत के लोकप्रिय हो जाने के बाद यूरोपीय देशों में धर्म से लेकर समाज एवं सरकारों को इसी कसौटी पर परखा जाने लगा। इस प्रकार यूरोप के देशों में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में बौद्धिक उद्वेलन एवं वैचारिक मंथन का युग आ पहुँचा और उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में पूरा यूरोप ही जैसे राजशाही और लोकशाही के विचारों के अन्तर्द्वन्द्व में फंस गया। कुछ देशों में राजशाहियां गिर गईं और लोकशाही का प्राकट्य होने लगा। लोगों को मताधिकार दिए जाने लगे।

राजतंत्र एवं लोकतंत्र में मनुष्य के अधिकारों में अंतर

यद्यपि लोकतंत्र सभी मनुष्यों को जीवन जीने के समान अधिकार देने वाली व्यवस्था का नाम है तथापि उसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि वह मनुष्य की बौद्धिक एवं शारीरिक क्षमताओं के अंतर को नहीं देख पाता।

निरंकुश-तंत्र और लोक-तंत्र दोनों ही मनुष्य की बौद्धिक एवं शारीरिक क्षमताओं के अंतर को देखते एवं जानते हैं किंतु निरंकुश-शासन-तंत्र एवं लोकतंत्र में आधारभूत अंतर यह है कि निरंकुश शासन तंत्र कम-बौद्धिक एवं कम-शारीरिक-क्षमताओं के आधार पर मनुष्य की स्वतंत्रता को बाधित कर देता है जबकि लोकतंत्र समस्त अधिक एवं कम शारीरिक एवं बौद्धिक क्षमताओं वाले लोगों को जीवन यापन के एक जैसे आधारभूत अधिकार प्रदान करता है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में मनुष्यों में आर्थिक एवं शैक्षणिक अंतर बना रहता है किंतु उनकी राजनीतिक एवं सामाजिक हैसियत कम या ज्यादा नहीं आंकी जाती। उदाहरण के लिए मताधिकार की शक्ति। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में निर्धन एवं धनी, शिक्षित एवं अशिक्षित, शारीरिक रूप से बलिष्ठ एवं विकलांग, स्त्री एवं पुरुष सभी प्रकार के व्यक्तियों को एक ही वोट देने का अधिकार होता है।

इस प्रकार समस्त नागरिकों के दिमाग का औसत, यह तय करता है कि उनका शासक कौन होगा! अठारहवीं एवं उन्नीसवीं सदी का यूरोपीय समुदाय लोकतंत्र एवं मनुष्यों की समानता के विचारों से बहुत दूर था, हालांकि उसके लिए पिछले कई सौ सालों से आवाजें उठ रही थीं किंतु अब समय आ गया था जब लोकतंत्र के लिए आवाजें और तेज हो जाएं।

लोकतंत्र से निराशा

उन्नीसवीं शताब्दी आते-आते लोकतंत्र की मांग तेज होने लगी तथा उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक कई यूरोपीय देशों में नागरिकों को वोट देकर पार्लियामेंट चुनने के अधिकार मिल गए। लोगों ने समझा कि अब उनका जीवन बदल जाएगा किंतु कुछ वर्षों बाद उन्हें यह देखकर हैरानी हुई कि लोकतंत्र में भी वे उतने ही निर्धन एवं बेबस हैं जितने पहले थे।

उन्हें सरकार बनाने का अधिकार मिल गया था किंतु सत्ता में भागीदारी नहीं मिली थी, प्राणांतक भूख ज्यों की त्यों मुँह बाए खड़ी थी। इसलिए उन्नीसवीं सदी के अंत तक यूरोपीय देशों में लोकतंत्र के प्रति उत्साह मंदा पड़ने लगा और लड़खड़ाती हुई राजशाहियां एक बार के लिए थम सी गईं। लोगों का ध्यान इस बात पर गया कि शासन-तंत्र कोई भी हो, यह महत्त्वपूर्ण नहीं है, अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि समाज में धन का बंटवारा कैसे होता है।

 जिन देशों में खराब लोकतंत्र आया था, वहाँ के खराब नेताओं ने निर्धन समाज तक धन को पहुँचने ही नहीं दिया। इस तरह समाजवाद के नए विचारों का आगमन होने लगा। विभिन्न देशों के करोड़ों औद्योगिक-मजदूर जानलेवा शोर करने वाली मशीनों, कारखानों के गंदे परिवेश एवं कोयले की खानों की गर्मी से छुटकारा चाहते थे, पेट भरने को निवाला, और काम के घण्टों में अनुशासन चाहते थे न कि लोकशाही।

ये ऐसी सुविधाएं थीं जिन्हें वे राजशाही के भीतर रहकर भी प्राप्त कर सकते थे। बशर्ते कि राजा अच्छा हो, राजकीय कर्मचारी संविधान से बंधे हुए हों और मिल-मालिकों को कानून का भय हो। फिर भी ये सब बातें अंत में लोकशाही पर आकर पूर्णता प्राप्त करती थीं। अतः सामान्य जनता में भले ही लोकतंत्र का विचार अधिक आदर प्राप्त नहीं कर सका किंतु यूरोपीय देशों का बौद्धिक वर्ग लोकतंत्र को ही समस्त दुःखों के अंत का माध्यम समझता था।

कार्ल मार्क्स

उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में ई.1818 में जर्मनी के यहूदी समुदाय में कार्ल मार्क्स नामक एक लेखक ने जन्म लिया। उसे अपने स्वतंत्र विचारों के कारण जर्मनी से निकाल दिया गया और वह पहले फ्रांस चला गया और वहीं रहने लगा। पेरिस में वह एंजेल्स नामक एक अन्य जर्मन के सम्पर्क में आया।

शीघ्र ही वे दोनों गहरे दोस्त बन गए। उन दोनों ने मिलकर कुछ पुस्तकें लिखीं जो यूरोप के लोगों के मस्तिष्क पर तेज रोशनी की तरह प्रभाव डालने वाली सिद्ध हुईं। इन पुस्तकों में लिखी गई बातों से नाराज होकर फ्रांस की सरकार ने भी कार्ल मार्क्स को फ्रांस से निकाल दिया, वह इंग्लैण्ड जाकर रहने लगा और वहाँ उसने एक कारखाना लगा लिया।

ई.1848 को यूरोप में क्रांतियों एवं आंदोलनों का वर्ष कहा जाता है। इनके मूल में श्रमिक आंदोलनों की प्रधानता थी। कार्ल मार्क्स ने अनुभव किया कि यूरोप की मुख्य समस्या श्रमिकों की खराब जीवन-परिस्थितियाँ हैं। यहाँ तक कि फ्रांस की क्रांति के मूल में भी यही समस्या खाद-पानी का काम कर रही है। इसलिए मार्क्स ने मजदूरों के जीवन का गहराई से अध्ययन किया।

सौभाग्य से वह स्वयं एक बड़े कारखाने का मालिक था। इसलिए उसे श्रमिकों की समस्या को समझने में अधिक समय नहीं लगा। ई.1848 में उसने एंजेल्स के साथ मिलकर एक घोषणा पत्र जारी किया जिसे साम्यवादी घोषणापत्र कहा जाता है। इसमें उस समय के स्वतंत्रता, समानता एवं भाईचारे के लोकतांत्रिक नारों की आलोचना की गई तथा कहा गया कि इनकी आड़ में शासकों एवं मिल-मालिकों द्वारा जनता एवं मजदूरों को बेवकूफ बनाकर उनका शोषण किया जा रहा है।

इस घोषणा पत्र के अंत में उन्होंने मजदूरों से अपील की- ‘संसार के मजदूरों एक हो जाओ। तुम्हें खोना कुछ नहीं है सिवाय अपनी गुलामी की जंजीरों के, और पाने को तुम्हारे सामने सारा संसार पड़ा है।’ यह अपील ही इस घोषणापत्र का सार थी।

कार्ल मार्क्स ने यूरोप के समाचार पत्रों एवं पर्चों के माध्यम से साम्यवाद का प्रचार करना आरम्भ कर दिया। इसके साथ ही वह मजदूर संगठनों को एक करने के लिए दिन-रात प्रयास करने लगा। संभवतः उसे यूरोप में कोई बड़ा संकट आता दिखाई दे रहा था और वह चाहता था कि मजदूर न केवल उस संकट के लिए तैयार रहें अपितु उस संकट से लाभ भी उठाएं।

ई.1854 में उसने न्यूयार्क के एक समाचार पत्र में लिखा- ‘फिर भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यूरोप में छठी शक्ति भी है जो विशेष अवसरों पर पाँचों नामदार महान् शक्तियों पर अपनी सत्ता रखती है औ उन सबको थर्रा देती है। यह शक्ति क्रांति की है। बहुत दिन तक चुपचाप एकांतवास के बाद अब संकट और भूख इसे फिर लड़ाई के मैदान में बुला रहे हैं। केवल एक संकेत की आवश्यकता है। फिर से यूरोप की छठी और सबसे महान् शक्ति चमकता हुआ कवच पहने और हाथ में तलवार लिए हुए निकल पड़ेगी, जिस तरह ओलिम्पी के माथे से मिनर्वा प्रकट हुई थी।   यह संकेत यूरोप के शीघ्र आने वाले युद्ध से मिल जाएगा।’

कार्ल मार्क्स ने लंदन में यूरोप के समाजवादियों, मार्क्सवादियों, लोकतंत्र के लिए संघर्ष कर रहे युवकों, क्रांतिकारियों आदि का एक विशाल सम्मेलन बुलाया जिसमें इंग्लैण्ड, इटली, जर्मनी तथा स्पेन सहित कई अन्य देशों के लोग आए।

ई.1867 में मार्क्स की पुस्तक ‘दास कैपिटल’ अर्थात् ‘पूँजी’ प्रकाशित हुई। यह पुस्तक जर्मन भाषा में लिखी गई थी। इसमें यूरोप में प्रचलित तत्कालीन आर्थिक मतों का विश्लेष करके उनकी कमियां बतलाई गई थीं और अपना साम्यवादी मत विस्तार के साथ समझाया गया था।

उसने इधर-उधर की आदर्शवादी बातों को छोड़ड़कर बिना किसी लाग-लपेट के और वैज्ञानिक ढंग से इतिहास और अर्थशास्त्र के विकास की चर्चा की और मनुष्य समाज में वर्गों के क्रम-विकास, इतिहास एवं आपसी अंतर्द्वन्द्वों के बारे में दूर तक असर निकालने वाले नतीजे निकाले। मार्क्स का यह नया समाजवाद, बिल्कुल साफ और तंर्क-संगत था जिसे मार्क्स का समाजवाद, मार्क्सवाद, साम्यवाद एवं कम्यूनिज्म कहा गया।

यह उस धुंधले आदर्शवादी समाजवाद से अलग था, जो अब तक चल रहा था। इस पुस्तक ने न केवल यूरोप के लोगों की अपितु संसार भर के लोगों की बुद्धि पर प्रभाव डाला और यूरोप में साम्यवाद की जड़ें गहराई तक जाने लगीं। इसी के चलते ई.1871 में पेरिस कम्यून की हिंसक घटना हुई। यह संसार में निश्चय-पूर्वक किया गया पहला साम्यवादी विद्रोह था। इस कम्यून के बाद यूरोपीय देशों की सरकारों के मन में मजदूर संगठनों के आंदोलनों से भय बैठ गया तथा उनका रुख मजदूर-संगठनों के विरुद्ध और अधिक कठोर हो गया।

पुरुषों एवं महिलाओं में भेदभाव

उन्नीसवीं सदी में यूरोप के देशों में जब राजनीतिक आंदोलनों के बाद लोकतंत्र ने जन्म लेना आरम्भ किया तो उसके साथ बहुत से किंतु-परन्तु लगे हुए थे। उदाहरण के लिए स्त्रियों को वोट देने का अधिकार नहीं दिया गया। यूरोपीय देशों की महिलाओं एवं राजनीतिक कार्यकर्ताओं द्वारा चलाए गए जबर्दस्त आंदोलनों के बाद वोटिंग अधिकार मिलने आरम्भ हुए।

न्यूजीलैण्ड ने ई.1893 में महिलाओं को वोटिंग अधिकार दिए। उन्नीसवीं सदी में महिलाओं को मताधिकार देने वाला यह एक मात्र देश था। ऑस्ट्रेलिया ने ई.1902 में, फिनलैण्ड ने ई.1906 में, नोर्वे ने ई.1913 में, डेनमार्क एवं आइसलैण्ड ने ई.1915 में अपने देश की महिलाओं को वोटिंग अधिकार प्रदान किए। बहुत से यूरोपीय देशों ने प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद इस दिशा में कदम बढ़ाया।

इंग्लैण्ड में महिलाओं के मताधिकार के लिए ई.1867 से आंदोलन आरम्भ हुआ किंतु उनकी लड़ाई लम्बी चली। ई.1918 में 30 साल एवं उससे अधिक आयु की महिलाओं को मताधिकार प्राप्त हुआ। ई.1928 में इंग्लैण्ड में महिलाओं को पुरुषों के बराबर मताधिकार दिए गए।

अमरीकी महिलाओं को ई.1920 में वोट देने के अधिकार प्राप्त हुए। स्पेन में ई.1931 में, फ्रांस ने ई.1944 में तथा इटली ने ई.1946 में अपने देश की महिलाओं को मत देने के अधिकार दिए। स्विट्जरलैण्ड ने ई.1971 में महिलाओं को मताधिकार तो प्रदान किए किंतु वहाँ आज भी पुरुषों एवं महिलाओं के मताधिकारों में अंतर है तथा वहाँ की महिलाएं इस असमानता को दूर करने के लिए आज भी संघर्ष कर रही हैं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...
पुष्पक विमान - www.bharatkaitihas.com

पुष्पक विमान विभीषण को क्यों नहीं लौटाया था श्रीराम ने?

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रावण का वध करने के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो उन्होंने पुष्पक विमान लंका के नए राजा विभीषण को क्यों नहीं लौटाया?...
एनीमल फार्म - www.bharatkaitihas.com

एनीमल फार्म और भारतीय राजनीति

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क्या आपने उस किताब का नाम सुना है जिसने 1950 के दशक में पूरी दुनिया में आग लगा दी थी! क्या आपने एनीमल फार्म...
हरम बेगम का कपट जाल - www.bharatkaitihas.com

हरम बेगम का कपट जाल (69)

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बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है...