Monday, May 20, 2024
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16. पूर्वी रोमन साम्राज्य

जब सम्राट कॉन्स्टेन्टीन अपनी राजधानी रोम से बिजैन्तिया ले आया तब उसकी माँ ने फिलीस्तीन की राजधानी जेरूसलम में ईसा की समाधि के पास एक बड़ा चर्च बनवाया। इस काल में रोमन लैटिन भाषा का प्रयोग करते थे किंतु पूर्वी साम्राज्य में यूनानी भाषा बोली जाती थी। इन दोनों क्षेत्रों की संस्कृतियां भी अलग-अलग थीं।

रोमन संस्कृति स्वयं को श्रेष्ठतम् मानती थी इसलिए उसने बिजैन्तिया क्षेत्र की संस्कृति को दबाने का प्रयास किया किंतु रोमन संस्कृति इस कार्य में पूरी तरह सफल नहीं हो सकी। रोमन साम्राज्य की नई राजधानी ‘कांस्टेंटिनोपल’ को  भारत में कुस्तुन्तुनिया तथा मुस्लिम देशों में ‘रोम’ की तर्ज पर ‘रूम’ एवं ‘रोमानिया’ कहा जाता था।

कई शताब्दियों तक यही नाम प्रचलन में रहने के कारण आज भी विश्व के कई देशों में कुस्तुन्तुनिया को ‘रूम’ एवं ‘रोमानिया’ कहा जाता है। रोमन साम्राज्य की यह नई राजधानी यूरोप की पूर्वी सीमा पर स्थित थी जहाँ से एशिया महाद्वीप की ओर आसानी से झांका जा सकता था।

रोम के महत्त्व में कमी

रोमन साम्राज्य के राजधानी परिवर्तन से विश्व का राजनैतिक एवं धार्मिक मानचित्र बदल गया। पुराना रोम तथा उसका प्राचीन धर्म लगभग महत्त्वहीन हो गए और उनके स्थान पर नई राजधानी कुस्तुन्तुनिया एवं नया ईसाई धर्म सर्वोपरि हो गए। उस समय यूरोप एवं एशियाई देशों के बीच होने वाले व्यापार का अधिकांश माल इसी रास्ते से होकर निकलता था।

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इस कारण नई राजधानी को बहुत सा कर मिलने लगा किंतु नई राजधानी की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि रोम, गॉल और ब्रिटेन सहित यूरोप के प्रमुख शहर इस नई राजधानी से बहुत दूर थे।

रोमन साम्राज्य का विभाजन

साम्राज्य का शासन सुगमता से चलाने के के लिए रोम एवं कुस्तुन्तुनिया में दो अलग-अलग एम्परर की व्यवस्था की गई जो संयुक्त रूप से सम्पूर्ण रोमन साम्राज्य पर शासन करते थे। इनमें से कुस्तुंतुनिया के शासक को एम्परर तथा रोम के शासक को को-एम्परर कहा जाता था। ई.395 में रोम के सह-सम्राट थियोडियस (प्रथम) ने रोम को कुस्तुंतुनिया से अलग कर लिया। उस समय कुस्तुंतुनिया पर कॉन्स्टेन्टीन का दूसरा या तीसरा उत्तराधिकारी शासन कर रहा था।

इस प्रकार रोमन साम्राज्य दो भागों में बँट गया- पश्चिमी रोमन साम्राज्य जिसकी राजधानी रोम थी और दूसरा था पूर्वी रोमन साम्राज्य जिसकी राजधानी कुस्तुन्तुनिया थी। ई.395 से ई.480 तक पूर्वी रोमन साम्राज्य के सम्राट पश्चिमी रोमन साम्राज्य के शासकों को मान्यता प्रदान करते रहे।

काफिर जूलियन

कॉन्स्टेन्टीन के ‘जूलियन’ नामक चौथे उत्तराधिकारी ने ईसाई धर्म को छोड़कर फिर से प्राचीन रोमन धर्म अर्थात् पैगन धर्म की तरफ लौटना चाहा जो कि प्राचीन रोमन देवी-देवताओं की मूर्ति-पूजा वाला धर्म था किंतु वह जनता को पुराने धर्म की तरफ लौटने के लिए तैयार नहीं कर सका। इस समय तक ईसाइयत तेजी से हावी हो रही थी। ईसाइयों ने इस एम्परर का नाम ‘काफिर जूलियन’ रख दिया। आज भी इतिहास में उसे इसी नाम से जाना जाता है।

थियोदोसी महान

जूलियन के बाद ‘थियोदोसी महान्’ पूर्वी रोमन साम्राज्य का शासक हुआ। हुआ। वह प्राचीन रोमन धर्म से घृणा करता था। इसलिए उसने प्राचीन धर्म के देवी-देवताओं की मूर्तियों एवं मंदिरों को बड़ी संख्या में नष्ट करवाया। इसी कारण ईसाइयों ने उसे महान् कहा। थियोदोसी ने न केवल गैर-ईसाई लोगों को ही मौत के घाट उतारा अपितु उन ईसाइयों को भी मौत के घाट उतार दिया जो थियोदोसी की दृष्टि में कट्टर ईसाई नहीं थे।

ई.392 में थियोदोसी ने पूर्वी एवं पश्चिमी रोमन साम्राज्यों को जोड़कर फिर से एक कर दिया किंतु ई.395 में सम्राट थियोदोसी ने राज्य का अपने दो पुत्रों में विभाजन कर दिया। इस कारण पश्चिमी रोमन साम्राज्य एवं पूर्वी रोमन साम्राज्य पुनः प्रकट हो गए।

सम्राट जस्टीनियन की संहिता

ई.527 में जस्टीनियन नामक राजा पूर्वी रोमन साम्राज्य का स्वामी हुआ। उसने उत्तरी अफ्रीका के समृद्ध क्षेत्रों और इटली की प्राचीन रोमन भूमि के साथ-साथ हिस्पैनीसिया के कुछ हिस्सों को जीत लिया। उसने गोथों को इटली से निकाल दिया तथा कुछ समय के लिए इटली एवं सिसली को अपने साम्राज्य में मिला लिया किंतु बाद में गोथों ने फिर से इटली पर अधिकार कर लिया। कुछ समय बाद सिसली भी पूर्वी रोमन साम्राज्य के अधिकार से बाहर हो गया।

जस्टीनियन ने कुस्तुन्तुनिया में सांक्ता सोफिया का सुंदर गिरिजाघर बनवाया। जस्टीनियन ने अपने काल में प्रचलित समस्त रोमन कानूनों को एक जगह एकत्रित करवाया तथा योग्य वकीलों की सहायता से उन्हें क्रमबद्ध रूप में जमाया। इस पुस्तक को ‘कन्स्टीट्यूटिओनम ऑफ जस्टीनियन’ तथा Code Constitutionum कहा जाता है।

यह संहिता आधुनिक यूरोपीय विधि का प्रमुख स्रोत बनी। यह संहिता मनु के धर्मशास्त्र की तुलना में नागरिकों को कम अधिकार प्रदान करती है। रोमन विधि लगभग निर्बाध अधिकार (Patria potesta) घर अथवा कुटुंब के मुखिया (pater familias) को देती थी।

वही सभी सम्पत्ति एवं गुलामों का स्वामी था। पत्नी एवं पुत्री को सम्पत्ति तथा गुलामों पर कोई अधिकार नहीं था। पुत्री भी विवाह होने तक पिता के अधिकार में थी और विवाह के बाद पति के अधिकार में चली जाती थी। रोमन संहिता में गुलाम वर्ग को कुछ भी अधिकार नहीं दिए गए थे और वे अपने स्वामी की संपत्ति मात्र थे।

यह मनु की मूल धारणाओं के बिलकुल विपरीत बात थी। मनु संहिता में पुत्र को संयुक्त परिवार की संपत्ति में स्वत्व प्राप्त था और स्त्री-धन की व्यवस्था थी। यहाँ तक कि सेवक की सम्पत्ति पर सेवक का ही अधिकार था। मनु के अनुसार सभी नागरिक बराबर थे।

नागरिकों के अधिकारों का यह अंतर इसलिए था कि रोमन विधि सम्राट-रचित थी न कि ऋषि-मुनियों या विद्वानों द्वारा। जबकि मनु का धर्मशास्त्र एक ऋषि द्वारा रचा गया था। जस्टीनियन ने कुस्तुन्तुनिया में प्लेटो (अफलातून) द्वारा एक हजार साल पहले स्थापित प्राचीन यूनानी दर्शनशास्त्र की शिक्षण संस्था को बंद करके उसके स्थान पर ईसाई धर्म की शिक्षाओं पर आधारित एक नया विश्वविद्यालय बनवाया। यह एक आश्चर्यजनक बात थी कि इस युग में कुस्तुन्तुनिया रोम के विचारों से काफी दूर हो चुका था तथा यूनानी वैचारिक साम्राज्य का हिस्सा बन गया था किंतु वह यूनान के एक हजार साल साल पुराने दर्शनशास्त्र से पीछा छुड़ाकर पाँच सौ साल पहले अस्तित्व में आए ईसाई दर्शन की ओर तेजी से बढ़ रहा था।

लालची राजाओं एवं रानियों का जमावड़ा

कुस्तुन्तुनिया के राजपरिवार में सत्ता प्राप्ति के लिए गहरे षड़यंत्र चला करते थे। ई.780 में एम्परर ‘लियो चतुर्थ’ का नौ वर्षीय पुत्र ‘कॉन्स्टेन्टीन षष्ठम्’ पूर्वी रोमन साम्राज्य का शासक हुआ। उसकी माता आयरीन ई.790 तक रीजेंसी के माध्यम से पूर्वी रोमन साम्राज्य पर शासन करती रही।

वह एथेंस की राजकुमारी थी तथा कॉन्स्टेन्टीन षष्ठम् उसका इकलौता पुत्र था किंतु आयरीन को सत्ता का इतना चस्का लगा कि जब राजा 26 साल का था, तब ई.797 में आयरीन ने उसे बंदी बना लिया तथा उसे अंधा कर दिया। आंखों के घावों के कारण कुछ ही दिनों में राजा की मृत्यु हो गई तथा आइरीन कुस्तुन्तुनिया की साम्राज्ञी बनी।

संसार में संभवतः यह एकमात्र उदाहरण है जब किसी माता ने अपने पुत्र को मारकर उसकी गद्दी हथियाई हो। अंत में इस रानी को भी मार डाला गया। ऐसी बहुत से घटनाओं के उपरांत भी पूर्वी रोमन साम्राज्य अगले सात सौ साल तक और चलता रहा किंतु चूंकि हमारा केन्द्रीय विषय रोम है, इसलिए हमें पूर्वी रोमन साम्राज्य की कहानी किंचित् संक्षेप में समेटनी पड़ेगी।

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