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धरमत का युद्ध (17)

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धरमत का युद्ध

धरमत का युद्ध (War of Dharmat) न केवल मुगलिया राजनीति (Mughal Politics) का खतरनाक मोड़ सिद्ध हुआ अपितु महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswant Singh) के जीवन की भी अग्नि परीक्षा सिद्ध हुआ। महाराजा जसवंतसिंह की सम्पूर्ण सेना नष्ट हो गई और वह अकेला ही जीवित जोधपुर पहुंच सका! इस युद्ध ने औरंगजेब (Aurangzeb) को शाही तख्त के और अधिक निकट धकेल दिया।

अगली सुबह भगवान सूर्य के क्षितिज पर प्रकट होने से पहले ही औरंगज़ेब और मुरादबक्श की सेनाओं ने नावों में बैठकर क्षिप्रा नदी पार कर ली। चूंकि महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) के शिविर तथा क्षिप्रा के बीच में कासिम खाँ ने शिविर लगा रखा था और महाराजा जसवंतसिंह को उसकी गद्दारी के बारे में जानकारी नहीं मिल पाई थी, इसलिए महाराजा की सेनाएं औरंगजेब की सेनाओं के आगमन के सम्बन्ध में जान नहीं सकीं।

महाराजा जसवंतसिंह ने जहाँ शिविर लगा रखा था, उसके ठीक पीछे धरमत गांव स्थित था। जब शाही सेना की कुछ टुकड़ियों ने धरमत गांव में घुसकर महाराजा की सेना की पीछे से घेराबंदी आरम्भ की तो भी महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) के आदमियों को इस कार्यवाही का बिल्कुल भी पता नहीं चला।

इस प्रकार महाराजा और उसके राजपूत, मुगलिया राजनीति (Mughal Politics) की खूनी चौसर में ऐसे स्थान पर घेर लिए गए जहाँ से न तो महाराजा जसवंतसिंह के लिए और न उसके राजपूतों के लिए बचकर निकल पाना संभव था।

देखते ही देखते दोनों पक्षों में धरमत का युद्ध (War of Dharmat) आरम्भ हो गया। महाराजा जसवन्तसिंह (Maharaja Jaswantsingh) तथा उसके राजपूत बड़ी वीरता के साथ लड़े किंतु आगे से औरंगजेब (Aurangzeb) तथा मुराद की सेना ने और पीछे से दुष्ट कासिम खाँ की शाही सेना ने महाराजा की सेना को ऐसे पीस दिया जैसे दो पाटों के बीच अनाज पीसा जाता है।

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जब महाराजा के सिपाही आगे की ओर भागने का प्रयास करते थे तो औरंगजेब (Aurangzeb) की तोपों की मार में आ जाते थे, साथ ही धरती में दबा हुआ बारूद भी फट जाता था। इस पर भी जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) तथा उसके राठौड़ सरदार जी-जान लगाकर लड़ते रहे। अंत में जब महाराजा बुरी तरह घायल हो गया तथा किसी अनहोनी की आशंका होने लगी तब महाराजा के सामंत, अपने महाराजा को जबर्दस्ती युद्ध क्षेत्र से बाहर ले गए।

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युद्ध आरम्भ होने से पहले, महाराजा के साथ अठारह हजार राजपूत योद्धा थे जिनमें से अब केवल छः सौ जीवित बचे थे और उनमें से भी अधिकांश घायल तथा बीमार थे। औरंगजेब (Aurangzeb) चाहता था कि महाराजा को जीवित ही पकड़ लिया जाए किंतु महाराजा के राजपूत, महाराजा को लेकर मारवाड़ की तरफ भाग लिए। स्थान-स्थान पर राजपूत योद्धा, मुगलों से लड़कर गाजर-मूली की तरह कटते रहे। अंत में जब महाराजा अपनी राजधानी जोधपुर पहुँचा तो उसके साथ केवल पंद्रह राजपूत सिपाही जीवित बचे थे। जब आगरा में बैठे शाहजहाँ ने ये समाचार सुने तो वह दुःख और हताशा से बेहोश हो गया। होश आने पर उसने अपने बड़े बेटे दारा शिकोह को अपने पास बुलाया जो कहने को तो वली-ए-अहद था किंतु वास्तव में अपने साथ दस से ज्यादा आदमी लेकर राजधानी आगरा में नहीं घुस सकता था और एक रात भी लाल किले में नहीं गुजार सकता था! बादशाह ने दारा शिकोह पर लगीं समस्त पाबंदियां हटा दीं तथा महाराजा रूपसिंह (Maharaja Roop Singh) को अपनी सेवा में से हटाकर वली-ए-अहद का संरक्षक नियुक्त कर दिया। धरमत की पराजय के समाचारों से शाही दरबार में खलबली मच गई।

किसी को विश्वास नहीं होता था कि महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswant Singh) धरमत का युद्ध (war of Dharmat) हार चुका है। आगरा से बहुत से अमीर-उमराव भागकर औरंगजेब के खेमे में पहुंचने लगे। शहजादी जहाँआरा (Jahanara Begum) ने शाही प्रतिष्ठा बचाने के लिए मुराद तथा औरंगजेब (Aurangzeb) को बादशाह की तरफ से तथा स्वयं अपनी ओर से बहुत मधुर भाषा में चिट्ठियां भेजकर उनसे समझौता करने के प्रयास किए परन्तु दोनों ही शहजादों ने न तो बादशाह की चिट्ठियों के कोई जवाब दिए और न जहाँआरा की चिट्ठियों के।

धरमत का युद्ध (war of Dharmat) समाप्त होने के बाद औरंगजेब (Aurangzeb) और मुराद की विजयी सेनाएँ धरमत से आगे बढ़ीं तो बनारस से आगरा की तरफ बढ़ रहे शहजादे सुलेमान शिकोह ने अपनी गति और तेज कर दी।

बनारस से बंगाल की तरफ बढ़ते हुए शाहशुजा (Shah Shuja) को यह जानकर हैरानी हुई कि शहजादा सुलेमान शिकोह शाही सेना को लेकर ताबड़तोड़ आगरा की ओर भागा जा रहा था। शाहशुजा को लगा कि आगरा में कुछ अनहोनी हुई है। इसलिए शाहशुजा ने बंगाल की तरफ बढ़ना छोड़कर पटना में ही अपने डेरे लगा दिए।

इस पर सुलेमान शिकोह (Suleman Shikoh) और मिर्जा राजा जयसिंह भी अपनी सेना के साथ मार्ग में ही ठहर गए, उन्हें आशंका हुई कि कहीं शाहशुजा (Shah Shuja) ने अपना इरादा तो नहीं बदल लिया और वह फिर से आगरा की तरफ बढ़ने की तो नहीं सोच रहा है। इधर दारा और शाहजहाँ (Shahjahan) की बेचैनी बढ़ती जा रही थी और वह बार-बार सुलेमान शिकोह को तत्काल आगरा लौटने के फरमान दोहराने लगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दारा शिकोह की हताशा (18)

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दारा शिकोह की हताशा

औरंगजेब (Aurangzeb) दिन प्रति दिन आगरा के निकट पहुंचता जा रहा था और दारा शिकोह (Dara Shikoh) के समर्थकों की संख्या निरंतर घटती जा रही थी। यह देखकर दारा शिकोह की हताशा बढ़ती जा रही थी। दारा को चकमा देकर औरंगजेब आगरा के दरवाजे तक आ पहुँचा!

जब महाराजा जसवंतसिंह की सेना धरमत की लड़ाई में नष्ट हो गई और मिर्जाराजा जयसिंह (Mirza Raja Jaisingh) तथा सुलेमान शिकोह (Suleman Shikoh) की सेनाएं शाहशुजा (Shah Shuja) के कारण बनारस से अधिक आगे नहीं बढ़ सकीं तो दारा शिकोह (Dara Shikoh) ने सल्तनत के तमाम विश्वसनीय दोस्तों से सम्पर्क किया और उनकी सेनाओं को आगरा से साठ मील दूर चम्बल नदी के किनारे एकत्रित होने के संदेश भिजवाए।

आगरा में घुसने के लिए औरंगजेब (Aurangzeb) को हर हाल में चम्बल नदी पार करनी ही थी तथा दारा की योजना थी कि उसे चम्बल पार नहीं करने दी जाए।

दारा शिकोह (Dara Shikoh) के निमंत्रण पर विभिन्न हिन्दू राजाओं, जागीरदारों एवं मुगलिया तख्त के पुराने खैरख्वाहों के एक लाख घुड़सवार सैनिक, बीस हजार पैदल सैनिक तथा अस्सी तोपें चम्बल के किनारे एकत्रित हो गईं। दारा के खेमे में इस समय सबसे प्रमुख उपस्थिति महाराजा छत्रसाल की थी।

इस विशाल सैन्य समूह के सामने औरंगजेब (Aurangzeb) और मुराद के पास कुल मिलाकर चालीस हजार घुड़सवार ही थे जो धरमत का युद्ध करने और लगातार चलते रहने के कारण थक कर चूर हो रहे थे।

औरंगजेब की सेना का एक बड़ा हिस्सा महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) से हुई लड़ाई में नष्ट हो गया था। फिर भी नमकहराम कासिम के साथ भेजी गई शाही सेनाएं अब औरंगजेब (Aurangzeb) के नियंत्रण में थीं जिनके पास तोपें और बारूद भी पर्याप्त मात्रा में थे।

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सुलेमान शिकोह (Suleman Shikoh) और मिर्जा राजा जयसिंह (Mirza Raja Jaisingh अब भी आगरा नहीं पहुँचे थे और दारा शिकोह की हताशा बढ़ती जा रही थी। दारा शिकोह (Dara Shikoh) को भय होने लगा कि कहीं सुलेमान तथा जयसिंह से पहले औरंगजेब (Aurangzeb) और मुराद चम्बल नदी तक न पहुंच जाएं। इसलिए वह हाथी पर बैठकर युद्ध क्षेत्र के लिए रवाना हो गया।

शाहजहाँ (Shahjahan) ने उसे मशवरा दिया कि वह सुलेमान के लौट आने तक इंतजार करे किंतु दारा किसी तरह का खतरा मोल लेने को तैयार नहीं था। उसे भय था कि जिस तरह नमक हराम कासिम खाँ, धोखा देकर औरंगजेब (Aurangzeb) की तरफ हो गया था, उसी तरह कुछ और मुस्लिम सरदार भी ऐसा न कर बैठें। इसलिए दारा सेनाओं के साथ मौजूद रहकर ही अपनी पकड़ को मजबूत बनाए रख सकता था।

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मई के महीने में जब उत्तर भारत में गर्मियां अपने चरम पर थीं, दारा शिकोह (Dara Shikoh) आगरा से निकला और तेजी से चलता हुआ कुछ ही दिनों में अपने दोस्तों की सेनाओं से जा मिला। औरंगजेब, दारा की हर गतिविधि पर दृष्टि रखे हुए था। उसने अपनी सेना का बहुत थोड़ा हिस्सा उस तरफ बढ़ाया जिस तरफ दारा की सेनाओं का शिविर था तथा स्वयं अपनी सेना के बड़े हिस्से को साथ लेकर राजा चम्पतराय की सहायता से बीहड़ जंगल में चम्बल के पार उतर कर तेजी से आगरा की तरफ बढ़ने लगा। इस समय गर्मियां इतनी तेज थीं कि औरंगज़ेब अपनी सेनाओं को लेकर नर्बदा, क्षिप्रा, चम्बल और यमुना नदियों का सहारा लेकर ही आगे बढ़ पाया था। इस बार भी जब उसने चम्बल का किनारा छोड़ा तो सीधा यमुना के किनारे जाकर दम लिया। जब दारा को औरंगजेब (Auranzeb) के इस छल के बारे में मालूम हुआ तब तक बहुत देर हो चुकी थी। फिर भी दारा ने अपने ऊंटों को औरंगज़ेब के पीछे दौड़ाया जिनकी पीठों पर छोटी तोपें बंधी थीं। दारा की पैदल सेना भी पंक्ति बांधकर हाथों में बंदूकें थामे, औरंगजेब (Aurangzeb) के शिविर की तरफ बढ़ने लगी। हाथियों की गति तो और भी मंथर थी। फिर भी महाराजा रूपसिंह (Maharaja Roop Singh) को उजबेकों (UZbeks) के साथ छापामारी का लम्बा युद्ध था, इसलिए कुछ देर की अव्यवस्था के बाद दारा शिकोह और महाराजा रूपसिंह की सेनाएं संभल गईं।

जब तक दारा की सेनाएं औरंगज़ेब के निकट पहुँचीं तब तक औरंगजेब शामूगढ़ तक पहुँच गया था। यहाँ से आगरा केवल आठ मील दूर रह गया था। एक ऊबड़-खाबड़ सी जगह देखकर औरंगजेब (Aurangzeb) ने अपनी सेनाओं के डेरे गढ़वा दिए।

इस समय औरंगजेब (Auranzeb) की सेनाओं की स्थिति ऐसी थी कि औरंगजेब के सामने की तरफ आगरा था और औरंगजेब की पीठ की तरफ दारा की सेनाएं। इसलिए औरंगजेब की सेनाएं आगरा की तरफ पीठ करके बैठ गईं।

औरंगजेब की कुटिल चाल के आगे वली ए अहद दारा शिकोह (Dara Shikoh) तथा महाराजा रूपसिंह (Maharaja Roop Singh) की समस्त योजनाएं धरी रह गई थीं तथा अब उन्हें औरंगजेब की योजना के अनुसार ही लड़ाई करनी थी।

औरंगजेब (Aurangzeb) को महाराजा रूपसिंह का भय सता रहा था!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

रूपसिंह राठौड़ (19)

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रूपसिंह राठौड़

औरंगजेब (Aurangzeb) को राजा रूपसिंह राठौड़ (Maharaja Roop Singh Rathore)का भय सता रहा था! इस समय किशनगढ़ का राजा रूपसिंह ही शाहजहाँ और दारा शिकोह (Dara Shikoh) के चारों ओर एक अभेद्य दीवार बनकर खड़ा था।

औरंगजेब (Aurangzeb) द्वारा गुपचुप चम्बल पार करके आगरा तक आ पहुंचने के कारण रणक्षेत्र का नक्शा पूरी तरह अप्रत्याशित हो गया था। आगरा के दरवाजों के बाहर की तरफ दारा शिकोह को होना चाहिए था किंतु वहाँ औरंगजेब की सेनाएं खड़ी थीं और जहाँ औरंगजेब को होना चाहिए था, वहाँ दारा की सेनाएं खड़ी थीं।

इस समय यदि आगरा में सेना की एक अतिरिक्त टुकड़ी होती तो वह शहर के दरवाजे खोलकर पीछे से औरंगजेब पर हमला बोल सकती थी और सामने से दारा की सेनाएं औरंगजेब को कुचल सकती थीं किंतु दुर्भाग्य से दारा शिकोह (Dara Shikoh) के पास इस समय आगरा में कोई बड़ी सैनिक टुकड़ी नहीं थी। शहर के भीतर तो महाराजा रूपसिंह (Maharaja Roop Singh Rathore) के मुट्ठी भर सैनिक ही थे जो बादशाह की सुरक्षा में नियुक्त थे।

बादशाह ने राजा रूपसिंह राठौड़ (Maharaja Roop Singh Rathore) को दारा शिकोह (Dara Shikoh) का सरंक्षक नियुक्त किया था। इसलिए सेना का संचालन मुख्य रूप से महाराजा रूपसिंह के ही हाथों में था। उसने दारा को सलाह दी कि दारा का सैन्य शिविर, औरंगजेब के शिविर के इतनी पास लगना चाहिए कि यदि औरंगजेब (Aurangzeb) चकमा देकर आगरा में घुसने का प्रयास करे तो हमारी सेनाएं बिना कोई समय गंवाए, उसका पीछा कर सकें। हालांकि ऐसा करने में कई खतरे थे किंतु दारा के पास महाराजा की सलाह मानने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं था।

औरंगजेब ने भी घनघोर आश्चर्य से देखा कि राजा रूपसिंह राठौड़ (Roop Singh Rathore) अपनी सेनाओं को औरंगजेबके सैन्य शिविर के इतनी निकट ले आया था कि जहाँ से वह तोप के गोलों की सीमा से कुछ ही दूर रह गया था। औरंगजेब (Aurangzeb) राठौड़ राजाओं से बहुत डरता था।

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हालांकि वह जोधपुर के राजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) की पूरी सेना को नष्ट करके युद्ध के मैदान से भगा चुका था फिर भी किशनगढ़ नरेश रूपसिंह राठौड़ (Roop Singh Rathore) का भय अब भी उसके मस्तिष्क में बना हुआ था। वह जानता था कि रूपसिंह राठौड़ तलवार का जादूगर है। जाने कब वह कौनसा चमत्कार कर बैठे! बलख और बदखशां की पहाड़ियों पर बिखरा हुआ उजबेकों का खून आज भी रूपसिंह राठौड़ के नाम को याद करके सिहर उठता था।

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30 मई 1658 को सूरज निकलते ही महाराजा रूपसिंह (Roop Singh Rathore) ने दारा (Dara Shikoh) के पक्ष की विशाल सेनाओं को योजनाबद्ध तरीके से सजाया। महाराजा रूपसिंह राठौड़ तथा महाराजा छत्रसाल (Maharaja Chhatrasal) के राजपूत सिपाही इस योजना का मुख्य आधार थे किंतु कठिनाई यह थी कि औरंगजेब (Aurangzeb) और मुराद के पास मुगलों का सधा हुआ तोपखाना था। जबकि राजपूत सिपाही अब भी हाथों में बर्छियां और तलवारें लेकर लड़ते थे तथा राजपूत घुड़सवार अब भी धनुषों पर तीर रखकर फैंकते थे। उनके पास मुगलों जैसी बंदूकें और तोपें नहीं थीं। इसलिए महाराजा ने योजना बनाई कि दारा का तोपाखाना और शाही सेना की बंदूकें आगे की ओर रहें तथा राजपूत सेनाएं युद्ध के मैदान में तब तक दुश्मन के सामने न पड़ें, जब तक कि औरंगजेब (Aurangzeb) की तोपों का बारूद खत्म न हो जाए। महाराजा ने सबसे आगे ऊंटों पर बंधी हुई तोपों वाली सेना को तैनात किया, जिन्हें सबसे पहले आगे बढ़कर धावा बोलना था। ऊँटों की तोप-सेना के ठीक पीछे दारा की शाही सेना नियुक्त की गई जिसका नेतृत्व स्वयं वली-ए-अहद दारा कर रहा था। दारा की पीठ पर स्वयं महाराजा रूपसिंह राठौड़ और छत्रसाल अपनी-अपनी सेनाएं लेकर सन्नद्ध हुए। राजपूतों की सेना के एक ओर खलीलुल्ला खाँ को तैनात किया गया जिसके अधीन तीन हजार घुड़सवार थे तथा बायीं ओर रुस्तम खाँ को उसकी विशाल सेना के साथ रखा गया।

इस समय दारा शिकोह (Dara Shikoh) का सबसे बड़ा सहयोगी महाराजा रूपसिंह राठौड़ (Roop Singh Rathore) ही था। उसे बादशाह ने दारा शिकोह का संरक्षक नियुक्त किया था तो स्वयं दारा ने उसे अपनी सेना का प्रधान सेनापति नियुक्त कर रखा था। इसलिए रणभूमि में जो कुछ भी हो रहा था, उसकी सारी योजना महाराजा रूपसिंह ने स्वयं तैयार की थी।

रूपसिंह नहीं चाहता था कि युद्ध के मैदान में दारा शिकोह पल भर के लिए भी महाराजा रूपसिंह की आँखों से ओझल हो। इसलिए वह अपने घोड़े पर सवार होकर दारा की हथिनी के ठीक पीछे तलवार सूंतकर खड़ा हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शामूगढ़ का युद्ध (20)

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शामूगढ़ का युद्ध
शामूगढ़ का युद्ध

दारा शिकोह (Dara Shikoh) और औरंगजेब (Aurangzeb) की सेनाएं शामूगढ़ के मैदान में आमने-सामने खड़ी थी। शामूगढ़ का युद्ध (War of Shamugarh) शाहजहाँ (Shahjahan) के शहजादों के भाग्य पर अंतिम मुहर लागने वाला था।

महाराजा रूपसिंह राठौड़ (Maharaja Roopsingh Rathore) की तलवार औरंगजेब (Aurangzeb) की गर्दन तक पहुँच ही गई! महाराजा रूपसिंह के सिर पर आज जैसे रणचण्डी स्वयं आकर सवार हो गई थी। इसलिए महाराजा रूपसिंह का अप्रतिम रूप, युद्ध के उन्माद से ओत-प्रोत होकर और भी गर्वीला दिखाई देने लगा था।

महाराजा रूपसिंह राठौड़ (Maharaja Roopsingh Rathore) ने दारा शिकोह (Dara Shikoh) को सलाह दी कि वह शामूगढ़ का युद्ध (War of Shamugarh) प्रत्यक्ष रूप से न लड़े। अपितु अपना ध्यान औरंगजेब (Aurangzeb) पर केन्द्रित रखे तथा मौका मिलते ही उसके निकट जाकर उसे पकड़ ले। मैं अपने राजपूतों सहित आपकी पीठ दबाए हुए बढ़ता रहूंगा। मेरे पीछे राजा छत्रसाल (Maharaja Chhatrasal) रहेंगे। यदि भाग्य लक्ष्मी ने साथ दिया तो दुष्ट औरंगज़ेब का खेल आज शाम से पहले ही खत्म हो जाएगा।

महाराजा की बातों से दारा शिकोह (Dara Shikoh) को बड़ी तसल्ली मिली। दारा ने बलख और बदखशां में महाराजा की तलवार के जलवे देखे थे। इसलिए वह दूने उत्साह में भरकर एक ऊँची सी सिंहलद्वीपी हथिनी पर सवार हो गया जो हर प्रकार की बाधा के बावजूद भागने में बहुत तेज थी तथा दुश्मन के घोड़ों के पैर, अपने पैरों में बंधी तलवारों से गाजर-मूली की तरह काटती हुई चलती थी।

ज्यों ही शामूगढ़ का युद्ध (War of Shamugarh) शुरू हुआ, दोनों तरफ की मुगल सेनाओं ने आग बरसानी शुरू कर दी। राजपूत सेनाओं को इसीलिए शाही सेनाओं के बीच में रखा गया था ताकि वे तोपों की मार से दूर रहें। थोड़ी ही देर में मैदान में बारूद का धुआं छा गया और कुछ भी दिखाई देना मुश्किल हो गया।

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ठीक इसी समय महाराजा रूपसिंह राठौड़ (Maharaja Roopsingh Rathore) ने दारा शिकोह को आगे बढ़ने का संकेत किया और दारा शिकोह (Dara Shikoh) पहले से ही तय योजना के अनुसार औरंगजेब (Aurangzeb) के हाथी की दिशा को अनुमानित करके उसी तरफ बढ़ने लगा। महाराजा रूपसिंह उसकी पीठ दबाए हुए दारा के पीछे-पीछे औरंगजेब का काल बना हुआ चल रहा था।

बारूद के धुंए के कारण कोई नहीं जान पाया कि कब और कैसे दारा शिकोह (Dara Shikoh) की हथिनी, औरंगज़ेब के हाथी के काफी निकट पहुँच गई। सब कुछ योजना के अनुसार हुआ था। इस समय औरंगजेब (Aurangzeb) के चारों ओर उसके सिपाहियों की संख्या कम थी और दारा शिकोह तथा महाराजा रूपसिंह थोड़े सी हिम्मत और प्रयास से औरंगज़ेब पर काबू पा सकते थे किंतु विधाता को यह मंजूर नहीं था। उसने औरंगज़ेब के भाग्य में दूसरी ही तरह के अंक लिखे थे।

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दारा शिकोह (Dara Shikoh) और रूपसिंह अपनी योजना को कार्यान्वित कर पाते, उससे पहले ही आकाश से बारिश शुरू हो गई और मोटी-मोटी बूंदें गिरने लगी। इस बारिश का परिणाम यह हुआ कि धुंआ हट गया और मैदान में सारे हाथी-घोड़े तथा सिपाही साफ दिखने लगा। औरंगजेब ने दारा की हथिनी को बिल्कुल अपने सिर पर देखा तो घबरा गया लेकिन औरंगज़ेब के आदमियों ने औरंगजेब (Aurangzeb) पर आए संकट को भांप लिया और वे भी तेजी से औरंगज़ेब के हाथी की ओर लपके। उधर जब औरंगजेब के तोपखाने के मुखिया ने देखा कि बारिश के कारण उसकी तोपें बेकार हो गई हैं, तो उसने तोपखाने के हाथी खोलकर दारा की सेना पर हूल दिए। इससे दारा की सेना में भगदड़ मच गई। बहुत से सिपाही हाथियों की रेलमपेल में फंसकर कुचल गए। इधर महाराजा रूपसिंह हाथ आए इस मौके को गंवाना नहीं चाहता था। इसलिए जब उसने देखा कि दारा अपनी हथिनी को आगे बढ़ाने में संकोच कर रहा है तो महाराजा अपने घोड़े से कूद गया और हाथ में नंगी तलवार लिए हुए औरंगजेब की तरफ दौड़ा। दारा ने महाराजा रूपसिंह को तलवार लेकर पैदल ही औरंगजेब के हाथी की तरफ दौड़ते हुए देखा तो दारा शिकोह (Dara Shikoh) की सांसें थम सी गईं। उसे इस प्रकार युद्ध लड़ने का अनुभव नहीं था।

महाराजा रूपसिंह राठौड़ (Maharaja Roopsingh Rathore) तीर की तेजी से बढ़ता जा रहा था और दारा कुछ भी निर्णय नहीं ले पा रहा था। इससे पहले कि औरंगजेब (Aurangzeb) का रक्षक दल कुछ समझ पाता महाराजा उन्हें चीरकर औरंगज़ेब के हाथी के बिल्कुल निकट पहुँच गया। महाराजा ने बिना कोई क्षण गंवाए औरंगज़ेब के हाथी के पेट पर बंधी रस्सी को अपनी तलवार से काट डाला।

यह औरंगजेब (Aurangzeb) की अम्बारी की मुख्य रस्सी थी जिसके कटने से औरंगज़ेब नीचे की ओर गिरने लगा। महाराजा ने चाहा कि औरंगजेब के धरती पर गिरकर संभलने से पहले ही वह औरंगज़ेब की गर्दन उड़ा दे ताकि शामूगढ़ का युद्ध (War of Shamugarh) दारा शिकोह के माथे पर जीत का सेहरा बांध सके किंतु तब तक औरंगजेब (Aurangzeb) के सिपाही, महाराजा रूपसिंह के निकट पहुँच चुके थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जहाँआरा का शोक (21)

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जहाँआरा का शोक

महाराजा रूपसिंह राठौड़ (Maharaja Roopsingh Rathore) की मृत्यु का समाचार सुनकर शहजादी जहाँआरा (Jahanara Begum) ने काले कपड़े पहन लिए! जहाँआरा का शोक शब्दों में व्यक्त करने योग्य नहीं था। किसी हिन्दू राजा की मृत्यु पर मुगलिया खानदान की कोई शहजादी शायद ही कभी इतनी शोकातुर हुई होगी!

उधर औरंगजेब (Aurangzeb) हाथी से नीचे गिर रहा था और इधर महाराजा रूपसिंह राठौड़ का ध्यान भटककर उन सिपाहियों की तलवारों की ओर चला गया जो रूपसिंह के प्राण लेने के लिए हवा में जोरों से लपलपा रही थीं। महाराजा ने चीते की सी फुर्ती से उछलकर एक मुगल सिपाही की गर्दन उड़ा दी। फिर दूसरी, फिर तीसरी और इस तरह से महाराजा रूपसिंह राठौड़ (Maharaja Roopsingh Rathore), औरंगजेब (Aurangzeb) के अंगरक्षकों के सिर काटता रहा किंतु उनकी संख्या खत्म होने में ही नहीं आती थी।

दारा यह सब हाथी पर बैठा हुआ देखता रहा, उसकी हिम्मत नहीं हुई कि वह अपनी हथिनी औरंगजेब (Aurangzeb) के हाथी पर हूल दे। महाराजा, औरंगजेब के अंगरक्षकों के सिर काटता जा रहा था और उसका सारा ध्यान अपने सामने लपक रही तलवारों पर था किंतु अचानक औरंगजेब के एक अंगरक्षक ने महाराजा की गर्दन पर पीछे से वार किया।

खून का एक फव्वारा छूटा और महाराजा रूपसिंह का सिर भुट्टे की तरह कटकर दूर जा गिरा। तब तक औरंगजेब (Aurangzeb) के बहुत से अंगरक्षकों ने हाथी से गिरते हुए अपने मालिक को हाथों में ही संभाल लिया, उसे धरती का स्पर्श नहीं करने दिया।

महाराजा रूपसिंह राठौड़ (Maharaja Roopsingh Rathore) का सिर कटकर गिर गया था किंतु उसका धड़ अब भी तलवार चला रहा था। महाराजा की तलवार ने दो-चार मुगल सैनिकों के सिर और काटे तथा फिर स्वयं भी एक ओर का लुढ़क गया।

ठीक इसी समय दारा की हथिनी का महावत, अपनी हथिनी को दूर भगा ले गया। दुश्मन की निगाहों से छिपने के लिए दारा थोड़ी ही दूर जाकर हथिनी से उतर गया। दारा की हथिनी का हौदा खाली देखकर, उसके सिपाहियों ने सोचा कि दारा मर गया और वे सिर पर पैर रखकर भाग लिए। युद्ध का निर्णय हो चुका था।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

महाराजा रूपसिंह (Maharaja Roopsingh Rathore) का कटा हुआ सिर और धड़ एक-दूसरे से दूर पड़े थे जिन्हें उठाने वाला कोई नहीं था। अपने भक्त के देहोत्सर्ग का यह दृश्य देखकर आकाश में स्थित रूपसिंह के इष्टदेव भगवान कल्याणराय की आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। न केवल शामूगढ़ का मैदान अपितु दूर-दूर तक पसरे हुए यमुना के तट भी बारिश की तेज बौछारों में खो से गए।

भक्त तो भगवान के लिए नित्य ही रोते थे किंतु भक्तों के लिए भगवान को रोने का अवसर कम ही मिलता था। आज भगवान की यह इच्छा एक बार फिर से पूरी हो रही थी।

महाराजा के राठौड़ों को मुगल सेनाओं की अंधी रेलमपेल में पता ही नहीं चल सका कि महाराजा के साथ क्या हुआ और वह कहाँ गया! जब शामूगढ़ के समाचार आगरा के लाल किले में पहुँचे तो शाहजहाँ (Shahjahan) एक बार फिर से बेहोश हो गया। शहजादी जहाँआरा (Jahanara Begum) ने बादशाह की ख्वाबगाह के फानूस बुझा दिए और काले कपड़े पहन लिए। जहाँआरा का शोक मुगलिया इतिहास के भविष्य को व्यक्त करने में पूर्णतः सक्षम था।

जहाँआरा (Jahanara Begum) का शोक भारत के मुगलों के इतिहास (Mughal History) की एक बड़ी घटना समझा जाना चाहिए। उसके काले कपड़ों में लाल किले के दुर्दिनों की झलक स्पष्ट दिखाई देती थी।

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शामूगढ़ के मैदान (War of Shamugarh) से भागकर दारा शिकोह आगरा आया और किसी तरह शहर का दरवाजा खुलवाकर अपने महल में पहुंचा। इस समय उसके पास इतना समय नहीं था कि वह बादशाह के हुजूर में पेश हो सके। दारा ने अपनी बेगमों को तत्काल दिल्ली कूच करने का आदेश दिया। जिस समय दारा आगरा के किले से किसी चोर दरवाजे से बाहर निकला, उस समय केवल उसकी बेगमें ओर मुट्ठी भर अंगरक्षक ही उसके साथ थे। मिर्जा राजा जयसिंह (Mirza Raja Jai Singh) और सुलेमान शिकोह (Suleman Shikoh) अब भी आगरा की तरफ दौड़े चले आ रहे थे किंतु उनके आगरा पहुंचने से पहले ही शामूगढ़ में हुई दारा की पराजय के समाचार उन तक पहुंच गए। महाराजा रूपसिंह और दारा शिकोह शामूगढ़ का मैदान (War of Shamugarh) हार चुके हैं, यह सुनते ही मिर्जा राजा जयसिंह ने औरंगजेब के शिविर की राह ली। उसे अब औरंगजेब में ही अपना भविष्य दिखाई दे रहा था। अपने पिता की पराजय के समाचार से दुःखी सुलेमान शिकोह (Suleman Shikoh) अपने पिता दारा को ढूंढता हुआ किसी तरह आगरा पहुंचा किंतु तब तब तक दारा शिकोह अपने हरम (Mughal Harem) के साथ लाल किला (Red Fort) छोड़ चुका था।

सुलेमान शिकोह ने भी उसी समय अपने पिता की दिशा में गमन किया।

कुछ ही दिनों में महाराजा रूपसिंह के बलिदान के समाचार किशनगढ़ भी जा पहुंचे। महाराजा रूपसिंह की रानियों ने महाराजा की वीरगति के समाचार उत्साह के साथ ग्रहण किए और वे अग्निरथ पर आरूढ़ होकर फिर से महाराजा रूपसिंह का वरण करने स्वर्गलोक में जा पहुँचीं। 

जिस समय महाराजा रूपसिंह (Maharaja Roopsingh Rathore) मुगलिया राजनीति (Mughal Politics) की खूनी चौसर पर बलिदान हुआ, उस समय रूपसिंह के वंश में उसका तीन साल का पुत्र मानसिंह ही अकेले दिए की तरह टिमटिमा रहा था और आगरा में औरंगजेब (Aurangzeb) नामक आंधी बड़ी जोरों से उत्पात मचा रही थी। किशनगढ़ की राजकुमारी चारुमती (Charumati) के कोमल हाथों को अब न केवल इस टिमटिमाते हुए दिए की रक्षा करनी थी अपितु स्वयं को भी औरंगजेब नामक आंधी के क्रूर थपेड़ों से बचाना था!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शाहजहाँ की कैद (22)

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शाहजहाँ की कैद
शाहजहाँ की कैद

शाहजहाँ (Shahjahan) की कैद न केवल अकबर (Akbar) के समय से लेकर अब तक चली आ रही मुगलिया राजनीति (Mughal Politics) का पटाक्षेप थी अपितु आने वाले क्रूर शासन की पक्की सबूत थी।

शामूगढ़ के मैदान (War of Shamugarh) में जिस समय औरंगजेब महाराजा रूपसिंह का सामना कर रहा था, उस रामसिंह राठौड़ के नेतृत्व में राजपूतों के एक समूह ने शहजादे मुरादबक्श (Murad Bakhsh) को घेर रखा था। रामसिंह राठौड़ अपने राजपूतों सहित मुरादबक्श के हाथी पर झपटा और जोर से चिल्लाया- ‘तू दारा से सिंहासन छीनने चला है?’

इतना कहकर रामसिंह ने अपना भाला मुरादबक्श (Murad Bakhsh) की ओर बड़े वेग से फैंका। मुरादबक्श एक ओर को झुक गया और रामसिंह का भाला अपने लक्ष्य को भेद नहीं सका।

रामसिंह के राजपूत सिपाही भी मुरादबक्श पर टूट पड़े। इस कारण मुरादबक्श (Murad Bakhsh) के हाथी का महावत वहीं मारा गया तथा हाथी का हौदा राजपूतों के बाणों से भर गया। इसी समय बूंदी का महाराजा छत्रसाल हाड़ा (Maharaja Chhatrsal Hada) भी अपने राजपूतों सहित आ धमका। अब तो शहजादे मुरादबक्श के प्राण सचमुच ही संकट में पड़ गए।

मुरादबक्श (Murad Bakhsh) के अंगरक्षकों को लगा कि यदि उन्होंने अपने प्राणों के प्रति किंचित् भी मोह दिखाया तो शहजादे के प्राण जाने निश्चित हैं। इसलिए वे प्राण हथेली पर लेकर राजपूत सिपाहियों पर टूट पड़े। देखते ही देखते ऐसा घमासान मचा, जैसा आज से पहले कभी नहीं देखा गया था।

बूंदी नरेश छत्रसाल हाड़ा (Maharaja Chhatrsal Hada) ने 52 लड़ाइयां लड़ी थीं और उनमें से एक भी लड़ाई नहीं हारी थी किंतु आज की लड़ाई का परिणाम जानने से पहले ही वह रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हुआ।

राजा रामसिंह राठौड़, भीमसिंह गौड़, शिवराम गौड़ आदि कई वीर योद्धा इसी संघर्ष में वीरगति को प्राप्त हुए। ठीक इसी समय औरंगजेब (Aurangzeb) भी महाराजा रूपसिंह से अपना पीछा छुड़ाकर  मुराद को ढूंढता हुआ इसी ओर आ निकला।

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राजपूत अब भी मैदान में टिके हुए थे और लड़ रहे थे किंतु जिस दारा शिकोह (Dara Shikoh) के लिए वे लड़ रहे थे वह तो मैदान छोड़कर कभी का भाग चुका था।

इस युद्ध में दारा शिकोह (Dara Shikoh) की तरफ के नौ बड़े राजपूत राजा एवं सरदार खेत रहे जबकि औरंगजेब (Aurangzeb) की तरफ के 19 बड़े अमीर एवं उमराव मारे गए। शाम होते-होते युद्ध थम गया। जो सैनिक प्राण गंवा चुके थे, उनके शव हाथियों के पैरों के नीचे कुचले जाकर क्षत-विक्षत हो चुके थे। घायल सिपाही धरती पर पड़े-पड़े पानी-पानी चिल्ला रहे थे किंतु उन्हें पानी की बूंद पिलाने वाला वहां कोई नहीं था।

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जो सैनिक अभी जीवित थे, वे भी थक चुके थे और वे अपने हाथों में पकड़ी हुई तलवारों और भालों पर नियंत्रण खोते जा रहे थे। इसलिए युद्ध अपने-आप ही बंद हो गया। औरंगजेब (Aurangzeb) तथा मुराद ने वह रात नूरमंजिल में व्यतीत की। यहाँ उन्हें बादशाह का पत्र मिला जिसमें कहा गया था कि दोनों शहजादे तत्काल बादशाह से आकर मिलें। औरंगजेब (Aurangzeb) ने अपने साथी अमीरों से सलाह की तो उन्होंने औरंगजेब से कहा कि उस बूढ़े बादशाह के धोखे में न आए। यदि औरंगजेब वहाँ गया तो बादशाह की तातारी जनाना अंगरक्षक औरंगजेब को धोखे से मार डालेंगी। औरंगजेब को यह सलाह उचित लगी इसलिए उसने बादशाह के निमंत्रण का कोई जवाब नहीं दिया तथा यमुना नदी से लाल किले में जाने वाली नहर को बंद कर दिया। शाहजहाँ (Shahjahan) ने औरंगजेब (Aurangzeb) को पत्र लिखा कि वह अपने बूढ़े और बीमार बाप को प्यासा न मारे। इस बार औरंगजेब ने अपने बाप को जवाब भिजवाया- ‘यह सब आपकी करनी का ही फल है।’ तीन दिन में पानी के बिना किले के भीतर रह रहे लोगों की हालत खराब हो गई। इस पर 9 जून 1658 को प्यास से तड़पते हुए बादशाह ने अपने सैनिकों को आदेश दिए- ‘लाल किले के दरवाजे खोल दिए जाएं।’

उसी दिन औरंगजेब (Aurangzeb) के शहजादे मुहम्मद ने लाल किले (Red Fort) में घुसकर अपने दादा शाहजहाँ (Shahjahan) को कैद कर लिया तथा उस पर सख्त पहरा बैठा दिया। शाहजहाँ (Shahjahan) की कैद न केवल शाहजहाँ को ही आश्चर्य चकित करने वाली थी अपितु समूची मुगलिया सल्तनत को भौंचक्की कर देने वाली थी।

जिन अदने से मुगल सिपाहियों की आंखें कभी बादशाह की तरफ उठने का साहस नहीं करती थीं, अब वे दिन-रात बादशाह को घूरा करती थीं और बादशाह की तरफ से की गई छोटी सी हरकत की खबर औरंगजेब (Aurangzeb) के पुत्र मुहम्मद तक पहुंचाया करती थीं।

दस दिनों से औरंगजेब (Aurangzeb) और मुराद नूरमंजिल में रह रहे थे किंतु जैसे ही बादशाह को बंदी बनाया गया, दोनों शहजादे लाल किले में घुस गए।

औरंगजेब (Aurangzeb) लाल किले (Red Fort) में आ रहा है, यह सुनकर बहिन जहाँआरा (Jahanara Begum) ने अपने काले कपड़े उतार कर फिर से रंगीन कपड़े पहन लिए और औरंगजेब के लिए आरती का थाल सजाने लगी। अब बीमार और बूढ़े बादशाह तथा स्वयं जहाँआरा (Jahanara Begum) का भविष्य औरंगज़ेब के रहमोकरम पर आकर टिक गया था।

औरंगजेब (Aurangzeb) न तो बादशाह से मिला और न जहाँआरा (Jahanara Begum) से। शहजादी रोशनआरा (Roshanara Begum) ने अपने विजेता भाई की आरती उतारी और बलैयाएं लेकर ऊपर वाले से दुआ मांगी कि उसका नेकदिल भाई बुरी नजरों से दूर रहे। शेष तीनों शहजहादियां अपने अपने कमरों में बंदियों की तरह पड़ी हुई अपने दुर्भाग्य पर आंसू बहाती रहीं।

शाहजहाँ (Shahjahan) की शहजादियों ने जिस पिता को तख्त से उतारने के लिए हजार षड़यंत्र रचे थे, आज उसी शाहजहाँ की कैद उनके समस्त दुखों का कारण बन गई थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शाहजहाँ के दुर्दिन (23)

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शाहजहाँ के दुर्दिन

आदमी कुदरत से अपने लिए बेटे मांगता है तथा बेटे न होने पर जीवन भर दुखी रहता है किंतु शाहजहाँ (Shahjahan) उन बदनसीबों में से था जिसे कुदरत ने ढेरों बेटे दिए थे, ढेरों बेटियां दी थीं किंतु यही बेटे-बेटी शाहजहाँ के दुर्दिन लाने वाले सिद्ध हुए।

औरंगजेब (Aurangzeb) के आदेश से शाहजहाँ (Shahjahan) को कैद करके आगरा के लाल किले (Red Fort) के भीतर जनाना महल में रख दिया गया। शासन के समस्त अधिकार औरंगजेब ने अपने हाथों में ले लिए। सल्तनत में किए गए इतने बड़े परिवर्तनों के लिए किसी तरह का कोई शाही फरमान जारी नहीं हुआ। अब न किसी को बादशाह के दस्तखतों की आवश्यकता थी और न उसकी मुहर की। इस प्रकार औरंगजेब न केवल लाल किले (Red Fort) का अपितु कोहिनूर हीरे और तख्ते ताउस का भी स्वामी हो गया।

औरंगजेब के परबाबा अकबर (Akbar The Great) के समय से मुगलों का खजाना भरना आरम्भ हो गया था। पिछले सौ सालों से गंगा-यमुना के दो-आब से लेकर, रावी, चिनाव, झेलम सतलुज और व्यास नदियों के हरे-भरे पंजाब, मालवा और दक्कन के पठार तथा कृष्णा और कावेरी के दो-आब मुगलों का खजाना दिन-दूनी रात-चौगुनी गति से भर रहे थे। अकबर, जहांगीर तथा शाहजहाँ ने अनेक हिन्दू राजवंशों द्वारा विगत कई शताब्दियों में संचित किए गए खजाने छीनकर आगरा में लाकर जमा कर लिए थे।

जब शाहजहाँ (Shahjahan) को बंदी बनाया गया तो यह सारा खजाना सहज रूप से औरंगजेब (Aurangzeb) के अधिकार में चला गया। हालांकि दारा शिकोह युद्ध में जाने से पहले खजाने का बहुत बड़ा हिस्सा ऊटों और घोड़ों सहित अलग करके रख गया था ताकि यदि युद्ध का परिणाम विपरीत आए तो दारा इस खजाने को लेकर भाग सके तथा दारा ने ऐसा ही किया था किंतु शाहजहाँ को यह बात ज्ञात नहीं थी।

जब शाहजहाँ (Shahjahan) को ज्ञात हुआ कि दारा सामूगढ़ की लड़ाई (War of Shamugarh) में परास्त होकर भाग गया है तो शाहजहाँ ने भी बहुत से ऊँटों एवं घोड़ों की पीठ पर सोने की अशर्फियां लादकर दारा के पीछे दौड़ाई थीं ताकि उसका दुर्भाग्यशाली पुत्र धन के अभाव में दर-दर की ठोकरें न खाए तथा समय आने पर इसी धन की सहायता से नई सेना खड़ी कर ले।

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इतना होने पर भी मुगलों के खजाने का बहुत थोड़ा सा हिस्सा ही दारा के साथ जा पाया था। आगरा के लाल किले (Red Fort of Agra) से जो खजाना औरंगजेब के हाथ लगा, वह इतना अधिक था कि उसका वर्णन करना संभव नहीं है।

शाहजहाँ (Shahjahan) पर औरंगजेब (Aurangzeb) के पुत्र मुहम्मद का सख्त पहरा लगा दिया गया। अब शाहजहाँ मर कर ही इस पहरे से बाहर जा सकता था। वह केवल अपने पौत्र मुहम्मद की उपस्थिति में ही परिवार के किसी अन्य सदस्य से बात कर सकता था। बादशाह को किसी से भी पत्र-व्यवहार करने की अनुमति नहीं थी। बादशाह जो कुछ करता था अथवा कहता था, उसकी सूचना तुरन्त औरंगजेब तक पहुँचाई जाती थी।

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जहाँआरा (Jahanara Begum) ने अपने भाई औरंगजेब को कई बार संदेश भिजवाए कि वह एक बार औरंगजेब से मिलकर उसे बधाई देना चाहती है किंतु औरंगजेब उसके संदेशों के जवाब नहीं देता था। जब शहजादी बार-बार अपना अनुरोध दोहराती रही तो 11 जून 1658 को औरंगजेब ने अपनी बड़ी बहिन जहाँआरा को बुलवाया। जहाँआरा ने औरंगजेब को उसकी सफलता के लिए बधाई दी तथा उसके सामने प्रस्ताव रखा कि वह अपने पिता शाहजहाँ को कैद से मुक्त कर दे। इसक बदले में बादशाह द्वारा चारों भाइयों में सल्तनता का बंटवारा कर दिया जाएगा किंतु औरंगजेब (Aurangzeb) ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इस पर जहाँआरा (Jahanara) ने आंखों में आंसू भरकर अपने पत्थर-दिल भाई से कहा कि बेशक वह अपने बाप-दादों की सल्तनत पर शासन करे किंतु शहजादी जहाँआरा को वृद्ध और बीमार पिता की सेवा में रहने की अनुमति दे दे। औरंगजेब ने अपनी बड़ी बहिन की यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। यह जहाँआरा के लिए बड़ी उपलब्धि थी। शाहजहाँ जब तक जीवित रहा, लाल किले की खिड़की में बैठकर सूनी आँखों से ताजमहल की ओर ताकता रहा। शाहजहाँ के जिन ढेरों बच्चों को जन्म देते हुए मुमताज महल (Mumtaz Mahal) मौत के मुंह में समा गई थी, उन्हीं बच्चों ने शाहजहां से उसके ताज और तख्त, उसके प्रिय आभूषण और रत्न तथा महल और किले छीन लिए थे। शाहजहाँ (Shahjahan) के दुर्दिन उसे और भी नीचा दिखाने वाले थे।

शाहजहाँ (Shahjahan) यह सोच-सोच कर हैरान होता था कि नेकदिल मुमताज के पेट से कैसी बेरहम औलादों ने जन्म लिया था जिन्होंने अपने पिता को बंदी बनाकर उसे जिल्लत भरी जिंदगी जीने पर विवश कर दिया था।

केवल जहाँआरा (Jahanara Begum) ही शाहजहाँ के दुर्दिन जानकर उसके साथ रहती थी। बाकी सब तो महलों, किलों तथा सोने-चांदी के टुकड़ों के लिए एक-दूसरे को मारने पर तुले थे। शाहजहाँ की ढेरों बेगमों में से एक भी बेगम अब बादशाह का मुंह देखने नहीं आती थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुरादबक्श की हत्या (24)

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मुरादबक्श की हत्या

मुरादबक्श (Murad Bakhsh) की हत्या औरंगजेब (Aurangzeb) की योजना के प्रारम्भिक भाग में कल्पित नहीं की गई थी किंतु मुरादबक्श की उतावली ने औरंगजेब को मजबूर कर दिया कि दारा शिकोह (Dara Shikoh) की हत्या करने से पहले औरंगजेब मुरादबक्श की हत्या करे।

बादशाह शाहजहाँ (Shahjahan) तथा शहजादी जहाँआरा (Jahanara Begum) को कैद करने के बाद औरंगजेब ने उन समस्त प्रतिद्वन्द्वियों को समाप्त करने का निश्चय किया जो मुगलिया तख्त के दावेदार हो सकते थे। इस समय तक दारा शिकोह (Dara Shikoh) दिल्ली पहुंच चुका था तथा उसके पास पांच हजार सैनिक हो गए थे।

औरंगजेब (Aurangzeb) ने सबसे पहले उससे ही निबटने का निर्णय लिया। 14 जून 1658 को वह अपने छोटे भाई मुरादबक्श (Murad Bakhsh) को अपने साथ लेकर आगरा से दिल्ली के लिए रवाना हो गया।

मुरादबक्श औरंगजेब के साथ आगरा से दिल्ली के लिए चल तो दिया किंतु वह अनुभव कर रहा था कि औरंगजेब ने मुरादबक्श को यह वचन दिया था कि आगरा हाथ में आ जाने के बाद मुरादबक्श को बादशाह घोषित कर दिया जाएगा किंतु वह मुरादबक्श को बादशाह घोषित नहीं कर रहा था। शासन के सारे अधिकार औरंगजेब ने अपने हाथों में ले लिए थे। यहाँ तक कि लाल किले (Lal Qila) से लेकर बूढ़े बादशाह तथा मुगलिया खजाने पर भी औरंगजेब (Aurangzeb) के आदमियों का पहरा लगा दिया गया था।

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औरंगजेब अपनी मर्जी से समस्त निर्णय ले रहा था तथा मुरादबक्श (Murad Bakhsh) उसके हाथों की कठपुतली बनकर रह गया था। मुराद के मंत्री एवं सलाहकार भी  मुराद को औरंगजेब के विरुद्ध भड़का रहे थे। इसलिए मुराद औरंगजेब से नाराज हो गया और उसने औरंगजेब से मिलना-जुलना बंद कर दिया।

अब मुराद किसी भी समय औरंगजेब से विद्रोह कर सकता था। औरंगजेब को मुराद के इरादों की भनक लग गई। उसने मुराद को समझाया कि एक बार दुष्ट दारा पकड़ में आ जाए तब वह अपने हाथों से बाबा मरहूम हुमायूं का ताज मुराद के सिर पर रख देगा और हुमायूं की तलवार भी मुराद की कमर में बांध देगा।

मुरादबक्श (Murad Bakhsh) को खुश करने के लिए औरंगजेब ने उसे 233 घोड़े और 20 लाख रुपए भी दिए। औरंगजेब (Aurangzeb) द्वारा दी गई भेंट तथा आश्वासन से मुराद शांत हो गया किंतु अब औरंगजेब समझ गया कि मुराद को अधिक दिन तक शांत नहीं रखा जा सकेगा। इसलिए औरंगजेब ने दारा शिकोह (Dara Shikoh) से भी पहले मुराद से निबटने का निर्णय लिया। सामूगढ़ की लड़ाई (War of Shamugarh) में मुराद के चेहरे पर राजपूतों के कुछ तीर लग गए थे जिनके कारण उसके चेहरे पर घाव हो गए थे।

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हकीमों की दवा से वे घाव अब ठीक होने लगे थे। इस खुशी में मुराद मथुरा के पास शिकार खेलने गया। शाम को जब वह थककर वापस अपने शिविर में लौटा तो औरंगजेब ने मुराद को दावत के लिए अपने खेमे में आमंत्रित किया। औरंगजेब ने अपने शिविर से बाहर आकर मुराद का इस्तकबाल किया तथा उसे बधाई दी कि अब वह कुछ ही दिनों में दिल्ली पहुंचकर बादशाह बन जाएगा। औरंगजेब के व्यवहार से मुराद फूल कर कुप्पा हो गया। औरंगजेब के डेरे में मुराद के लिए ईरान से आई शराब एवं ईरानी नृत्यांगनाओं के नाच का प्रबंध किया गया। इसके बाद औरंगजेब ने मुराद से कहा कि चूंकि शराब और नृत्य से मेरा कोई वास्ता नहीं है, इसलिए आप दावत का मजा लीजिए। मैं कहीं और आराम कर लूंगा। औरंगजेब (Aurangzeb) ने अपने आदमियों को पहले से ही समझा रखा था कि उन्हें क्या करना है। औरंगजेब द्वारा नियुक्त हिंजड़ों ने मुराद को खूब शराब पिलाई। ईरानी नृत्यांगनाओं ने भी मुराद का खूब दिल बहलाया। जब मुराद शराब के नशे में धुत्त होकर लुढ़क गया तो हिंजड़ों ने नृत्यांगनाओं को खेमे से बाहर जाने के लिए कहा और मुराद के पाजामे का नाड़ा खोलकर मुराद के हाथ बांध दिए।

हिंजड़ों ने मुराद को कई लातें मारीं किंतु मुराद नशे में इतना धुत्त था कि उसे अपने शरीर का कोई होश नहीं था। इसके बाद औरंगजेब फिर से अपने खेमे में प्रकट हुआ। उसने मुराद को एक बंद घोड़ा-गाड़ी में डालकर उसी समय दिल्ली के लिए रवाना हो गया। जब सुबह मुरादबक्श (Murad Bakhsh) के आदमियों की नींद खुली तब तक मुराद की घोड़ागाड़ी मथुरा से बहुत दूर निकल चुकी थी। मुराद के आदमी कभी नहीं जान सके कि उनका मालिक कहाँ चला गया।

अगली सुबह जब मुराद की शराब उतरी तो उसने देखा कि न तो आगरा का लाल किला (Red Fort of Agra) और न दिल्ली का लाल किला (Red Fort of Delhi), न तो कोहिनूर और न मुगलों का अकूत खजाना, कुछ भी उसके पास नहीं बचा है। शाही तख्त और ताज एक हसीन सपने की तरह उसकी आंखों से बहुत दूर जा चुके हैं।

मुराद को तो दिल्ली ले जाकर सलीमगढ़ के दुर्ग में बन्द कर दिया गया तथा औरंगजेब (Aurangzeb) का दिल्ली के शालीमार बाग में शानदार राज्याभिषेक किया गया।

कुछ दिनों बाद मुरादबक्श (Murad Bakhsh) को ग्वालियर ले जाया गया। तीन साल तक वह ग्वालियर के दुर्ग में अपने दुर्भाग्य पर आंसू बहाता रहा। दिसम्बर 1661 में मुराद पर बगावत करने का आरोप लगाया गया। बादशाह के आदेश से दुर्ग में नियुक्त गुलामों ने शहजादे मुराद की हत्या कर दी गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महाराजा जसवंतसिंह (25)

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महाराजा जसवंतसिंह
महाराजा जसवंतसिंह

महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) मुगलिया राजनीति (Mughal Politics) की चौसर पर खड़ा एक ऐसा मोहरा था जिसकी मिसाल दुनिया भर में और कहीं मिलनी मुश्किल है। जसवंतसिंह से पूरी मुगलिया सल्तनत डरती थी किंतु जसवंतसिंह को वह सब करना पड़ा जो वह कभी भी नहीं करना चाहता था!

जब बनारस और बंगाल के बीच में रुके हुए शाहशुजा (Shah Shuja) ने शामूगढ़ में दारा शिकोह (Dara Shikoh) की पराजय के समाचार सुने तो उसके मन में आशाओं के लड्डू फूटने लगे। शाहशुजा (Shah Shuja) को विश्वास था कि औरंगजेब (Aurangzeb) अपने पुराने वायदे पर कायम रहेगा जिसमें औरंगजेब ने शाहशुजा को हिन्दुस्तान का बादशाह बनाने का वचन दिया था। इसलिए शाहशुजा अपनी सेना लेकर पटना से आगरा की ओर बढ़ा।

मार्ग में शाहशुजा ने सुना कि औरंगजेब ने मुरादबक्श को बंदी बनाकर दिल्ली भेज दिया है तो शाहशुजा को पक्का विश्वास हो गया कि औरंगजेब ने शाहशुजा (Shah Shuja) को बादशाह बनाने के लिए मुरादबक्श को रास्ते से हटाया है।

दिसम्बर 1658 में शाहशुजा इलाहाबाद होता हुआ खानवा नामक स्थान पर पहुँच गया। जब खानवा के मैदान में औरंगजेब (Aurangzeb) का पुत्र सुल्तान मुहम्मद, शाहशुजा का मार्ग रोक कर खड़ा हो गया तब कहीं जाकर शाहशुजा की आंखें खुलीं और वह समझ पाया कि मक्कार औरंगजेब शाहशुजा के साथ भी वही करने वाला है जो उसने अपने बाप शाहजहाँ, बड़े भाई दारा शिकोह (Dara Shikoh) तथा छोटे भाई मुरादबक्श के साथ किया है।

अब शाहशुजा (Shah Shuja) हिन्दुस्तान का ताज और दिल्ली तथा आगरा के लाल किले (Red Forts of Agra and Delhi) औरंगजेब से लड़कर ही प्राप्त कर सकता था। खानवा के मैदान में शाहशुजा अपनी सेना को जमा ही रहा था कि औरंगजेब (Aurangzeb) स्वयं भी अपनी सेनाएं लेकर खानवा आ गया। औरंगजेब के आदेश से मीर जुमला भी दक्षिण से एक बड़ी सेना लेकर आ पहुंचा। इस प्रकार खानवा में औरंगजेब की सेना इतनी विशाल हो गई कि शाहशुजा किसी भी तरह उसे परास्त नहीं कर सकता था।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-


फिर भी शाहशुजा (Shah Shuja) ने हिम्मत नहीं हारी और उसने औरंगजेब की सेना पर हमला किया किंतु शाहशुजा की सेना के बंगाली सैनिक औरंगजेब की सेना के मुकाबले में नहीं टिक सकते थे इसलिए शाहशुजा की सेना शीघ्र ही मैदान छोड़कर भाग खड़ी हुई।

शाहशुजा ने भी अपनी सेना के साथ बंगाल चले जाने में अपनी भलाई समझी। औरंगजेब (Aurangzeb) ने अपने पुत्र मुहम्मद खाँ तथा मीर जुमला को शाहशुजा का पीछा करने के लिए भेजा। इस बीच आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह ने महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) से सम्पर्क किया तथा उसे औरंगजेब के पक्ष में आने के लिए आमंत्रित किया।

महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) मिर्जाराजा जयसिंह (Mirza Raja Jaisingh) की बातों में आकर औरंगजेब से मिलने पहुंचा। औरंगजेब ने महाराजा जसवंतसिंह का भव्य स्वागत किया तथा उसे चांदी के हौदे से सजा हाथी, हीरों से जड़ी तलवार, मोतियों का एक गुच्छा और ढाई लाख रुपए सालाना आय वाला परगना प्रदान किया। औंरगजेब ने महाराजा को दिल्ली की रक्षा करने पर तैनात किया।
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इसी बीच बंगाल की ओर भागता हुआ शाहशुजा (Shah Shuja) खजुआ नामक स्थान पर मोर्चा बांधकर बैठ गया। इस पर औरंगजेब भी अपनी सेनाएं लेकर खजुआ जा पहुंचा और उसने महाराजा जसवंतसिंह को अपनी सेनाओं सहित खजुआ पहुंचने के निर्देश दिए। महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) खजुआ के मैदान में औरंगजेब की तरफ से लड़ने के लिए पहुंच तो गया किंतु महाराजा की आत्मा महाराजा को धिक्कारती थी। यह वही औरंगजेब (Aurangzeb) था जिसने धरमत के मैदान में कासिम खाँ से गद्दारी करवाकर महाराजा की सेना को नष्ट कर दिया था तथा महाराजा के प्राण लेने पर तुल गया था किंतु महाराजा जयसिंह के कहने से आज जसवंतसिंह औरंगजेब की तरफ से लड़ने को तैयार था। महाराजा ने मन ही मन निर्णय लिया कि जिस तरह औरंगजेब ने गद्दारी करके महाराजा की सेना को मार डाला था, अब महाराजा भी उसी छल-विद्या का सहारा लेकर औरंगजेब को मार डालेगा तथा अपने पुराने मित्र शाहजहाँ को कैद से मुक्त करवाकर फिर से बादशाह बनाएगा। जोधपुर राज्य के इतिहासकार विश्वेश्वर नाथ रेउ के अनुसार शाहशुजा ने महाराजा जसवंतसिंह को पत्र लिखकर उसे औरंगजेब के विरुद्ध उकसाया था।

जबकि मुगल इतिहास के लेखक यदुनाथ सरकार के अनुसार महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) ने शाहशुजा (Shah Shuja) को पत्र लिखकर सूचित किया था कि मैं आज रात को पीछे की ओर से औरंगजेब (Aurangzeb) पर हमला करूंगा, इसलिए आप भी उसी समय सामने की ओर से शाही सेना पर टूट पड़िए। इस प्रकार औरंगजेब को मारकर बादशाह को छुड़ा लिया जाएगा।

शाहशुजा (Shah Shuja) ने महाराजा की योजना पर अमल करना स्वीकार कर लिया। आधी रात के बाद महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) ने औरंगजेब की सेना के पीछे से आक्रमण कर दिया किंतु मुगलिया खून में गद्दारी की जो फितरत थी, उसे शाहशुजा ने यहाँ भी निभाया और वह औरंगजेब (Aurangzeb) की सेना पर सामने से आक्रमण करने के लिए नहीं पहुंचा।

जिस समय महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) ने औरंगजेब के शिविर पर आक्रमण किया, उस समय औरंगजेब आधी रात की नमाज पढ़ कर उठा ही था। औरंगजेब की सेना ने महाराजा के विद्रोह को निष्फल कर दिया। इस पर महाराजा के सैनिकों ने शहजादे मुहम्मद तथा कई अमीरों के डेरे लूट लिए तथा उसी समय मारवाड़ के लिए रवाना हो गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शाहशुजा की हत्या (26)

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शाहशुजा की हत्या

औरंगजेब (Aurangzeb) अपने भाई शाहशुजा (Shah Shuja) की हत्या स्वयं करना चाहता था किंतु उसे जंगली लोगों ने पकड़ कर मार डाला!

जब महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) खजुआ के मैदान से पलायन करके मारवाड़ की ओर जा रहा था, तब वह मार्ग में आगरा से होकर निकला। इस समय औरंगजेब (Aurangzeb) का मामा शाइस्ता खाँ (Shaista Khan) आगरा की रक्षा के लिए तैनात था। जब उसने सुना कि महाराजा जसवंतसिंह औरंगजेब से विद्रोह करके आगरा की ओर आ रहा है तो शाइस्ता खाँ बुरी तरह घबरा गया।

औरंगजेब (Aurangzeb) की तरह शाइस्ता खाँ भी राठौड़ राजाओं से बहुत डरता था। उसने सोचा कि महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) के हाथों कैद होने की बजाय स्वयं ही जहर खाकर मरना उचित होगा। इसलिए उसने जहर का प्याला मंगवाया। फ्रैंच इतिहासकार बर्नियर ने लिखा है कि जब औरंगजेब के हरम की औरतों को पता चला कि शाइस्ता खाँ (Shaista Khan) जहर पीने वाला है तो हरम की औरतें वहाँ पहुंच गईं तथा उन्होंने शाइस्ता खाँ के हाथों से जहर का प्याला छीन लिया।

बर्नियर ने लिखा है कि यदि महाराजा चाहता तो वह शाहजहाँ को छुड़वा सकता था क्योंकि इस समय आगरा में अधिक सेना नहीं थी किंतु महाराजा ने आगरा की तरफ देखा तक नहीं।

आगरा पर आक्रमण नहीं करने का महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) का निर्णय, उन परिस्थितियों में एकदम उचित ही था क्योंकि महाराजा के द्वारा विद्रोह किए जाने के बाद औरंगजेब ने नागौर के पूर्व राव अमरसिंह के पुत्र रायसिंह को जोधपुर का राजा नियुक्त करके उसे मारवाड़ पर चढ़ाई करने के लिए रवाना कर दिया था। इसलिए यदि महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) आगरा में रुक जाता तो संभवतः जोधपुर उसके हाथों से निकल जाता।

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जिस समय महाराजा जसवंतसिंह खजुआ के मैदान में आधी रात को औरंगजेब के सेना पर चढ़ बैठा था उस समय शाहशुजा (Shah Shuja) अपने डेरे में छिपकर बैठा किसी शुभ समाचार के आने की प्रतीक्षा कर रहा था। उस कायर ने रात के अंधेरे में अपने डेरे से बाहर निकलने की हिम्मत ही नहीं की। इस प्रकार अपने बड़े भाई दारा शिकोह की तरह शाहशुजा भी हाथ आए मौके को गंवा बैठा।

अगली सुबह 4 जनवरी 1659 को कड़ाके की ठण्ड के बीच शाहशुजा (Shah Shuja) और औरंगजेब के बीच भयानक लड़ाई छिड़ गई। महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) के चले जाने के कारण औरंगजेब का पक्ष काफी कमजोर हो गया था फिर भी इस समय औरंगजेब (Aurangzeb) के पास लगभग 50 हजार सैनिक थे जबकि शाहशुजा के पास केवल 23 हजार सिपाही थे। तोपों, गोलों और बंदूकों की भयंकर गर्जना के बीच दोनों पक्षों में युद्ध हुआ। इस युद्ध में औरंगजेब ने स्वयं युद्ध के मैदान में रहकर अपनी सेना का नेतृत्व किया। इस दौरान कई बार औरंगजेब के प्राणों पर संकट आया किंतु औरंगजेब ने न तो धीरज खोया और न प्राणों की परवाह की।

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युद्ध के दौरान औरंगजेब जिस हाथी पर सवार हुआ था, अंत तक उसी पर डटा रहा। युद्ध के मैदान में शाहशुजा (Shah Shuja) के पक्ष के तीन मदमत्त हाथी जिन्होंने खूब शराब पी रखी थी, बंदूकों से निकली गोलियों की परवाह किए बिना, औरंगजेब की तरफ झपट पड़े। इस पर औरंगजेब का हाथी मुड़कर भागने की कोशिश करने लगा। औरंगजेब ने अपने हाथी के पैरों को लोहे की जंजीरों से बंधवा दिया जिससे औरंगजेब का हाथी अपनी जगह से नहीं हिल सका। अंत में औरंगजेब (Aurangzeb) के सिपाहियों ने शाहशुजा की तरफ से आए तीनों शराबी हाथियों को मार डाला। इस प्रकार औरंगजेब अंत तक युद्ध के मैदान में डटा रहा और अपनी सेना का उत्साह वर्द्धन करता रहा। जबकि दूसरी ओर जो गलती शामूगढ़ के मैदान (War of Shamugarh) में दारा शिकोह ने की थी, वही गलती खजुआ के मैदान में शाहशुजा ने भी दोहराई। शाहशुजा औरंगजेब की तोपों के सामने पड़ गया और तोपों के गोले शाहशुजा के सिर के ऊपर से होकर निकलने लगे। शाहशुजा घबराकर हाथी से उतर कर एक घोड़े पर बैठ गया। जब सेना ने शाहशुजा (Shah Shuja) के हाथी पर शाहशुजा को नहीं देखा तो शाहशुजा की सेना युद्ध छोड़कर भाग खड़ी हुई।

जब शाहशुजा ने देखा कि उसकी सेना युद्ध के मैदान से भाग छूटी है तो वह भी सिर पर पैर रखकर अपनी सेना के पीछे-पीछे भाग लिया। औरंगजेब (Aurangzeb) ने मुहम्मद खाँ तथा मीर जुमला को उसके पीछे लगाया तथा स्वयं अजमेर के लिए रवाना हो गया क्योंकि उसे समाचार मिल चुके थे कि दारा शिकोह अजमेर में मोर्चाबंदी कर रहा है।

12 अप्रेल 1659 को शाहशुजा बड़ी कठिनाई से अपनी पुरानी राजधानी ढाका पहुंच पाया। वह बीस साल तक बंगाल का शासक रहा था किंतु इस बार जब वह औरंगजेब (Aurangzeb) के हाथों परास्त होकर बंगाल पहुँचा तो बंगाल के मुस्लिम जागीरदारों ने शाहशुजा का विरोध किया। अब वे औरंगजेब की मातहती में रहना चाहते थे।

शाहशुजा (Shah Shuja) को ढाका से अराकान भाग जाना पड़ा। अराकान के हिन्दू राजा ने शाहशुजा को शरण दी किंतु कुछ समय बाद कृतघ्न शाहशुजा ने अराकान के राजा की हत्या का षड्यन्त्र रचा। यह षड्यन्त्र विफल हो गया तथा शाहशुजा जान बचाकर जंगलों में भाग गया। शाहशुजा अराकान के जंगलों में रहने वाले जंगली लोगों के हाथ लग गया और मारा गया। उसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए। शाहशुजा की हत्या से औरंगजेब (Aurangzeb) की राह का एक और कांटा नष्ट हो गया।

औरंगजेब के दुर्भाग्य के कारण महाराजा जसवंतसिंह (Maharaja Jaswantsingh) उसे युद्ध के बीच छोड़कर चला गया था किंतु शाहशुजा के दुर्भाग्य के कारण वह (शाहशुजा) युद्ध छोड़कर भाग जाने पर भी जंगली लोगों द्वारा मार डाला गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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