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अमरसिंह राठौड़ की गर्जना (60)

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अमरसिंह राठौड़ की गर्जना - bharatkaitihas.com
अमरसिंह राठौड़ की गर्जना

औरंगजेब ने जब शिवाजी को लाल किले में सिंहगर्जना करते हुए सुना तो उसे अमरसिंह राठौड़ की याद आ गई। औरंगजेब ने अमरसिंह राठौड़ को भी लाल किले में ऐसी ही गर्जना करते हुए देखा था। अमरसिंह राठौड़ की गर्जना से से भी लाल किले की दीवारें इसी प्रकार कांपने लगी थीं।

औरंगजेब के हरम की औरतें भले ही शिवाजी को प्राणदण्ड दिए जाने के लिए एक सुर से हाय-तौबा कर रही थीं किंतु शिवाजी की सिंहगर्जना से औरंगजेब बुरी तरह से सहम गया था। वह तो स्वयं ही चाहता था कि किसी तरह शिवाजी को मार डाला जाए किंतु आम्बेर के कच्छवाहे शिवाजी को अपने संरक्षण की गारण्टी पर आगरा लाए थे इसलिए औरंगजेब को पूरा विश्वास था कि यदि औरंगजेब ने शिवाजी को मारने की चेष्टा की तो कुंअर रामसिंह उसी समय विद्रोह कर देगा।

इतना ही नहीं, उस के साथ समस्त कच्छवाहे, राठौड़, भाटी और चौहान शासक भी औरंगजेब के प्रबल शत्रु बन जाएंगे जबकि सिसोदिए, जाट, मराठे और सतनामी तो पहले से ही औरंगजेब के लिए भारी मुसीबत बने हुए थे!

औरंगजेब वह दिन भूल नहीं पाता था जब नागौर के राव अमरसिंह राठौड़ ने औरंगजेब के पिता शाहजहाँ की आंखों के सामने ही भरे दरबार में बादशाह के बख्शी सलावत खाँ को मार डाला था और अमरसिंह राठौड़ की गर्जना लाल ने किले की दीवारों को कंपा दिया था।

वह सारा दृश्य औरंगजेब की आंखों के सामने एक बार फिर से घूम गया। औरंगजेब के पिता शाहजहाँ के शासन-काल में जोधपुर के महाराजा गजसिंह ने अपने छोटे कुंअर जसवंतसिंह को जोधपुर राज्य का उत्तराधिकारी घोषित किया। इस पर बड़ा कुंअर अमरसिंह राठौड़ अपने पिता गजसिंह से नाराज होकर शाहजहाँ के पास नौकरी मांगने के लिए आया।

कुंअर अमरसिंह के बाबा जोधपुर नरेश सूरसिंह की बहिन जगत गुसाइन शाहजहाँ की माँ थी। इस नाते शाहजहाँ, अमरसिंह को निकट से जानता था और उसकी वीरता का कायल था। इसलिए शाहजहाँ ने अमरसिंह को अपनी सेवा में रख लिया तथा उसे जोधपुर राज्य का नागौर परगना स्वतंत्र राज्य के रूप में दे दिया। शाहजहाँ ने अमरसिंह को राव की उपाधि भी दी।

अमरसिंह के राज्य नागौर के उत्तर में बीकानेर का मरुस्थलीय राज्य था, वह भी ई.1488 में जोधपुर राज्य के राजकुमार बीका द्वारा स्थापित किया गया था। इस प्रकार जोधपुर, नागौर एवं बीकानेर के राज्य एक ही राजकुल के राजकुमारों द्वारा स्थापित किए गए थे।

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

ईस्वी 1631 में बीकानेर के पुराने राजा सूरतसिंह का निधन हो गया और उसका पुत्र कर्णसिंह बीकानेर राज्य का स्वामी हुआ। महाराजा कर्णसिंह अपने युग की विभूति था और उसमें हिन्दू नरेशों के सभी उच्च आदर्श देखे जा सकते थे। वह उस काल के भारत के महान राजाओं में गिने जाने योग्य था किंतु परिस्थतियों के वशीभूत होकर उसे मुगल बादशाह की सेवा करनी पड़ी थी।

उन दिनों नागौर और बीकानेर राज्यों की सीमा पर बीकानेर राज्य का जाखणिया नामक गांव स्थित था। ई.1644 में इस गांव के एक किसान के खेत में एक छोटी सी घटना घटित हुई जिसने इतना विकराल रूप ले लिया कि उसकी आंच शाहजहाँ के दरबार तक जा पहुंची।

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हुआ यह कि बीकानेर राज्य के जाखणिया गांव के एक किसान के खेत में मतीरे की बेल लगी। मतीरा एक रेगिस्तानी फल है जो देखने में तरबूज जैसा होता है। यह बेल फैलकर नागौर राज्य की सीमा में चली गयी और फल भी उधर ही लगे। जब बीकानेर राज्य का किसान अपनी बेल के फल लेने के लिये नागौर राज्य की सीमा वाले खेत में गया तो नागौर की तरफ के किसान ने कहा कि फल हमारे राज्य की सीमा में लगे हैं अतः उन पर हमारा अधिकार है।

इस बात पर दोनों किसानों में झगड़ा हो गया। बात राज्याधिकारियों तक पहुंची और दोनों राज्यों के अधिकारियों में भी झगड़ा हो गया। इस झगड़े में तलवारें चलीं जिससे नागौर राज्य के कई सिपाही मारे गये। उन दिनों नागौर नरेश अमरसिंह राठौड़ तथा बीकानेर नरेश कर्णसिंह दोनों ही शाहजहाँ के दरबार में थे। दोनों राज्यों के अधिकारियों ने अपने-अपने राजा को इस घटना की जानकारी भिजवाई।

अमरसिंह ने अपने आदमियों से कहलवाया कि वे सेना लेकर जाएं तथा जाखणिया गांव पर अधिकार कर लें। नागौर की सेना द्वारा ऐसा ही किया गया तथा बीकानेर की सेना के कई सिपाही मारे गए।

जब यह बात बीकानेर नरेश कर्णसिंह को ज्ञात हुई तो उसने अपने दीवान मुहता जसवंत को नागौर पर हमला करने के लिये भेजा। अमरसिंह के सेनापति केसरीसिंह ने बीकानेर की सेना का सामना किया किंतु बीकानेर की सेना भारी पड़ी और नागौर की तरफ के कई सिपाही मारे गये। बीकानेर के विशाल राज्य की सेना के सामने नागौर की छोटी सी सेना परास्त हो गई।

बीकानेर नरेश कर्णसिंह ने शाहजहाँ को जाखणिया गांव में हुई घटना एवं उसके बाद हुए युद्ध की सारी बात बता दी। राव अमरसिंह राठौड़ ने भी बादशाह से मिलकर उसे सारी बात बतानी चाही तथा उससे छुट्टी लेकर नागौर जाना चाहा। इसलिए अमरसिंह ने बादशाह के बख्शी सलावत खाँ से कहा कि वह अमरसिंह की बादशाह सलामत से बात करवाए किंतु बादशाह ने बख्शी को पहले ही संकेत कर दिया था कि वह अमरसिंह को बादशाह से मिलने नहीं दे।

जब कई दिनों तक बख्शी ने अमरसिंह की बात बादशाह से नहीं करवाई तो अमरसिंह ने एक दिन बख्शी से अनुमति लिए बिना ही, बादशाह को मुजरा कर दिया। इस पर बख्शी सलावत खाँ ने अमरसिंह को गंवार कहकर उसकी भर्त्सना की। राव अमरसिंह बहुत स्वाभिमानी व्यक्ति था, वह अपना अपमान सहन नहीं कर सका, इसलिए उसने क्रुद्ध होकर उसी समय अपनी कटार निकाली और बख्शी सलावत खाँ को बादशाह के सामने ही मार डाला।

शाही सिपाहियों ने उसी समय अमरसिंह को घेर लिया। जब अमरसिंह ने देखा कि वह चारों तरफ मुस्लिम सैनिकों से घिर गया है तो उसने दरबार में भयंकर सिंह-गर्जना की जिसे सुनकर अमरसिंह के अंगरक्षक भी तलवार सूंतकर अपने स्वामी की सहायता के लिए आ गए।

देखते ही देखते दोनों तरफ से तलवारें चलने लगीं और शाही सैनिक कट-कट कर फर्श पर गिरने लगे। शाहजहाँ की आंखों के सामने उसके अपने दरबार में इतनी बड़ी घटना के अचानक घटित होे जाने पर शाहजहाँ सकते में आ गया। उसने स्वप्न में भी इस दृश्य की कल्पना नहीं की थी कि राजपूत उसके दरबार में तलवार निकाल कर खड़े हो जाएंगे!

मुगलिया सल्तनत तो इन्हीं राजपूतों के बल पर टिकी हुई थी। आज वही तलवारें सूंतकर बादशाह के आदमियों की गर्दनें काट रहे थे। थोड़ी ही देर में आगरा का लाल किला मुगलों एवं राजपूतों के खून से नहा गया। अमरसिंह तथा उसके अंगरक्षक तलवार चलाते हुए बादशाह के सामने से सही-सलामत निकल गए किंतु तब तक दरबार के बाहर तैनात मुगल सिपाही, भीतर हो रहे शोर को सुनकर दरबार में आ गए और उन्होंने दरबार से बाहर निकल चुके अमरसिंह और उसके अंगरक्षकों को एक पतले गलियारे में रोककर मार दिया।

अमरसिंह राठौड़ की गर्जना के समय औरंगजेब 26 साल का युवक था और संयोगवश अपने पिता के दरबार में उपस्थित था। उसने इस दृश्य को अपनी आंखों से देखा था। आज जब मराठों के राजा छत्रपति शिवाजी ने औरंगजेब के दरबार में सिंह-गर्जना की तो औरंगजेब को वह समस्त दृश्य स्मरण हो आया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शिवाजी का पलायन (61)

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शिवाजी का पलायन - bharatkaitihas.com
शिवाजी का पलायन

औरंगजेब ने शिवाजी को आगरा में नजरबंद कर रखा था किंतु उसके सैनिक शिवाजी का पलायन नहीं रोक पाए। लाल किले की दीवारें इतनी मजबूत नहीं थीं कि शिवाजी को रोककर रख सकें।

शिवाजी रामसिंह कच्छवाहे के कड़े पहरे में थे। शिवाजी ने अपनी रिहाई के अनेक प्रयास किए किंतु उनका कोई परिणाम नहीं निकला। अंत में शिवाजी ने औरंगजेब के पास तीन प्रस्ताव भिजवाए-

1. बादशाह मुझे क्षमादान दे और मिर्जाराजा जयसिंह द्वारा अब तक छीने गए मेरे समस्त दुर्ग मुझे वापस लौटा दे। इसके बदले में, मैं बादशाह को दो करोड़ रुपए दूंगा तथा दक्षिण के युद्धों में सदैव मुगलों का साथ दूंगा।

2. बादशाह मेरी जान बख्श दे और मुझे सन्यासी होकर काशी में अपना जीवन व्यतीत करने दे।

3. बादशाह मुझे सकुशल घर जाने की अनुमति दे, इसके बदले में वे समस्त शाही दुर्ग जो अब मेरे अधिकार में हैं, बादशाह को सौंप दिए जाएंगे।

औरंगजेब ने इनमें से एक भी बात मानने से इन्कार कर दिया। शिवाजी को लगा कि उन्हें मृत्यु-दण्ड दिया जाएगा। इसलिए उन्होंने बादशाह को एक और पत्र भिजवाया जिसमें कहा गया कि मुझे भले ही आगरा में रोककर रखा जाए किंतु मेरे साथियों को आगरा से महाराष्ट्र लौट जाने की अनुमति दी जाए।

शिवाजी का यह प्रस्ताव बादशाह के काम को सरल बनाने वाला था, इसलिए इसकी तुरंत स्वीकृति मिल गई। इस स्वीकृति के मिलते ही शिवाजी एवं शंभाजी तथा उनके निजी सेवकों एवं अंगरक्षकों को छोड़कर शेष व्यक्ति आगरा छोड़कर चले गए। अब बादशाह द्वारा शिवाजी को आसानी से मारा जा सकता था।

जब शिवाजी के सिपाही आगरा से चले गए तो शिवाजी ने अपने हाथी-घोड़े, सोना, चांदी, कपड़े आदि बांटने आरम्भ कर दिए।

उधर जब दक्षिण के मोर्चे पर बैठे कच्छवाहा राजा जयसिंह को आगरा की घटनाओं के बारे में ज्ञात हुआ तो उसे शिवाजी के प्राणों की चिंता हुई। उसने बादशाह को पत्र लिखा कि शिवाजी मेरी जमानत पर आपके सम्मुख आया था, इसलिए उसके प्राण नहीं लिए जाएं।

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अंत में औरंगजेब ने एक खतरनाक जाल बुना। उसने शिवाजी के समक्ष प्रस्ताव रखा कि वह अफगानिस्तान जाकर मुगल सेना की तरफ से लड़ाई करे। इस समय अफगानिस्तान में लड़ रही उस सेना का सेनापति रदान्द खाँ नामक एक दुष्ट व्यक्ति था। औरंगजेब की योजना यह थी कि शिवाजी को रदान्द खाँ के हाथों मरवाया जाए ताकि सबको लगे कि यह एक हादसा था।

शिवाजी पहले ही मना कर चुके थे कि वे मुसलमान बादशाह की नौकरी नहीं करेंगे। इसलिए उन्होंने भी औरंगजेब के चंगुल से छूटने की एक योजना बनाई। औरंगजेब की तरफ से अफगानिस्तान जाने का प्रस्ताव मिलते ही शिवाजी बीमार पड़ गए और प्रतिदिन सायंकाल में भिखारियों एवं ब्राह्मणों को फल और मिठाइयां बांटकर उनसे आशीर्वाद लेने लगे।

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प्रतिदिन संध्याकाल में कहार, बांस की बड़ी-बड़ी टोकरियों में फल और मिठाइयां लाते और शिवाजी उन्हें स्पर्श करके, दान करने के लिए बाहर भेज देते। यह क्रम कई दिनों तक चलता रहा। उन टोकरियों की गहराई से छान-बीन होती थी। जब इस प्रकार फल बांटते हुए कई दिन हो गए तो टोकरियों की जांच में ढिलाई बरती जाने लगी।

17 अगस्त 1666 को बादशाह ने आदेश दिया कि शिवाजी तथा उसके पुत्र संभाजी को राजकुमार रामसिंह के सरंक्षण से हटाकर एक मुस्लिम सेनापति की कैद में रखा जाए।

उसी दिन संध्याकाल में हीरोजी फरजंद नामक एक सेवक शिवाजी के कपड़े पहनकर शिवाजी के पलंग पर सो गया तथा शिवाजी एवं सम्भाजी, फलों की अलग-अलग टोकरियों में बैठ गए। इन टोकरियों को शिवाजी के अनुचरों ने उठाया तथा ब्राह्मणों को वितरित किए जाने वाले फलों की टोकरियों के साथ ही, रामसिंह की हवेली से बाहर निकल गए।

कुछ दूर जाने पर शिवाजी और सम्भाजी टोकरियां से बाहर निकले तथा वेष बदल कर यमुनाजी के किनारे-किनारे चलते हुए एक निर्जन स्थान पर पहुंचे। यहाँ रात के अंधेरे में उन्होंने नदी पार की। पूर्व-निर्धारित योजना के अनुसार शिवाजी के सिपाही घोड़े लेकर तैयार खड़े थे। शिवाजी और सम्भाजी उन घोड़ों पर बैठकर मथुरा की ओर रवाना हो गए।

उधर रामसिंह की हवेली में हीरोजी फरजंद शिवाजी के पलंग पर सुबह तक सोया रहा। उसके हाथ में पहना हुआ शिवाजी का सोने का कड़ा दूर से ही चमक रहा था। इसलिए पहरेदार भ्रम में रहे कि पलंग पर बीमार शिवाजी सो रहे हैं।

प्रातः होने पर हीरोजी ने पहरेदारों से कहा कि छत्रपति महाराज बहुत बीमार हैं अतः बाहर किसी तरह का शोर नहीं किया जाए। थोड़ी देर में वह भी महल से निकलकर भाग गया। किसी को कुछ भी भनक नहीं लग सकी। दोपहर में शहर कोतवाल शिवाजी के कमरे की जांच करने आया तो उसने पलंग की भी जांच की तो उसे ज्ञात हुआ कि शिवाजी का पलायन हो चुका है।

कोतवाल ने तत्काल बादशाह के महल में पहुंचकर बादशाह को शिवाजी का पलायन हो जाने की सूचना दी। कुछ ही देर में पूरे आगरा में यह अफवाह फैल गई कि शिवाजी अपनी जादुई शक्ति के बल पर रामसिंह की हवेली से अदृश्य हो गए। मुगल सिपाही और जासूस चप्पे-चप्पे पर मौजूद थे किंतु किसी भी व्यक्ति या पहरेदार ने शिवाजी को भागते हुए नहीं देखा था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

संभाजी की वापसी (62)

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संभाजी की वापसी - bharatkaitihas.com
संभाजी की वापसी

जिस तरह शिवाजी की आगरा से रायगढ़ तक वापसी अत्यंत कठिनाईयों से भरी थी, उसी प्रकार संभाजी की वापसी भी आसान नहीं थी। सबसे बड़ी कठिनाई थी, उनकी पहचान छिपाना ! एक बार तो एक ब्राह्मण दम्पत्ति ने संभाजी को अपनी थाली में भोजन खिलाकर सिद्ध किया कि यह ब्राह्मण पुत्र है, शिवाजी का पुत्र नहीं है।

शिवाजी को आगरा शहर में जोर-शोर से ढूंढा जाने लगा किंतु तब तक 18 घण्टे बीत चुके थे और शिवाजी मथुरा पहुंचकर अदृश्य हो गए थे। शिवाजी ने अपने पुत्र सम्भाजी को मथुरा में एक मराठी ब्राह्मण के घर रख दिया तथा स्वयं एक साधु का वेश बनाकर बुंदेलखण्ड होते हुए गौंडवाना प्रदेश की तरफ रवाना हो गए। उनके अंगरक्षक उनके शिष्यों के रूप में उनके साथ हो लिए, उन्होंने भी भगवा कपड़े पहन लिए थे जिनके भीतर तलवारें छिपी हुई थीं।

शिवाजी के सैंकड़ों सिपाही वस्तुतः आगरा से निकल कर महाराष्ट्र नहीं गए थे अपितु पहले से ही निर्धारित योजना के अनुसार एक निश्चित स्थान पर रुककर अपने स्वामी के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। शिवाजी के सैनिक भी किसानों एवं साधुओं के वेश में शिवाजी से कुछ दूरी पर चलते रहे। ताकि संकट की किसी घड़ी में शिवाजी को सहायता पहुंचाई जा सके।

 जब शिवाजी और उनके साथी गौंडवाना से कर्नाटक जा रहे थे, तब मार्ग में एक किसान, कुछ साधुओं को भोजन करवा रहा था। शिवाजी को भी सन्यासी समझकर भोजन के लिए आमंत्रित किया गया। जब शिवाजी, साधुओं के साथ पंक्ति में बैठकर भोजन कर रहे थे तब अचानक उस किसान की औरत यह कहकर साधुओं से क्षमा मांगने लगी कि हमोर घर में कुछ भी नहीं है इसलिए साधुओं को इतना साधारण भोजन करवाया जा रहा है। यदि मराठे हमारे परिवार का धन लूट कर नहीं ले गए होते तो हम साधुओं को अच्छा भोजन करवाते।

शिवाजी को उस गृहिणी की बात सुनकर अपार कष्ट हुआ और उनका सामना एक कड़वी सच्चाई से हुआ कि उनके अपने मराठा सैनिक मुगलों के राज्य में रहने वाली हिन्दू प्रजा को भी लूट रहे थे।

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रामसिंह कच्छवाहा के पहरे से निकलने के पच्चीसवें दिन शिवाजी, सन्यासी के वेश में अपनी माता जीजाबाई के समक्ष राजगढ़ में प्रकट हुए। जीजा ने अपने शेर को छाती से लगा लिया। समर्थ गुरु रामदास का शिष्य अपने हौंसले के बल पर आगरे के लाल किले की नाक काट लाया था। जहाँ से चिड़िया का भी बच निकलना कठिन था, वहाँ से शिवाजी अपनी सेना सहित पूर्णतः सुरक्षित निकल आए थे, यह बात उस युग की किसी चमत्कारी घटना से कम नहीं थी!

अपनी राजधानी में पहुंचकर शिवाजी ने सबसे पहले उसी किसान परिवार को अपने महल में आमंत्रित किया जिसके यहाँ उन्होंने सन्यासी के वेश में भोजन किया था तथा किसान की पत्नी को मराठा सैनिकों को कोसते हुए सुना था। शिवाजी ने उस महिला से क्षमा-याचना की तथा उसे बहुत सारा धन देकर संतुष्ट किया।

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उधर मथुरा में मुगल सिपाही उस मराठी-ब्राह्मण के घर पहुंच गए जहाँ एक नया बालक रहने के लिए आया था। जब मुगल अधिकारियों ने ब्राह्मण दम्पत्ति से पूछा कि यह कौन है तो उन्होंने कहा कि यह हमारा भतीजा है तथा कुछ दिन हमारे साथ रहने के लिए महाराष्ट्र से आया है। इस पर मुगलों को ब्राह्मण दम्पत्ति का विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि यदि यह भतीजा है तो ब्राह्मण दम्पत्ति उसके साथ एक ही थाली में भोजन करके दिखाए।

महाराष्ट्र में शिवाजी का कुल कुछ नीचा समझा जाता था इसलिए एक ब्राह्मण के लिए यह संभव नहीं था कि वह संभाजी के साथ एक ही थाली में भोजन करे किंतु ब्राह्मण को अपना धर्म बचाने के स्थान पर शरणागत संभाजी के प्राणों की रक्षा करना अधिक आवश्यक प्रतीत हुआ। इसलिए ब्राह्मण दम्पत्ति ने मुगलों के समक्ष संभाजी को अपने पास बैठाकर अपनी थाली में भोजन करवाया।

मुगल अधिकारी आश्वस्त होकर चले गए। जब यह बात शिवाजी तक पहुंची तो शिवाजी उस समय मार्ग में ही थे। इसलिए उन्होंने रायगढ़ पहुंचकर यह प्रचारित कर दिया कि मार्ग में सम्भाजी की मृत्यु हो गई है। शिवाजी ने रायगढ़ में सम्भाजी के समस्त संस्कार एवं क्रियाकर्म विधि-पूर्वक सम्पन्न कराए ताकि मुगलों को भ्रम में डाला जा सके और वे सम्भाजी को ढूंढने का प्रयास नहीं करें। एक तरफ तो यह झूठी खबर फैलाई गई और दूसरी तरफ संभाजी की वापसी की नए सिरे से पूरी व्यवस्था की गई।

कुछ दिनों बाद मथुरा का ब्राह्मण परिवार स्वयं ही 8 वर्ष के बालक सम्भाजी को लेकर रायगढ़ पहुंच गया। शिवाजी एवं सम्भाजी के सकुशल रायगढ़ पहुंचने का समाचार देश भर में फैल गया। पूरे महाराष्ट्र में दीपावली मनाई गई। जनता के बीच शिवाजी की रहस्यमयी शक्तियों के बारे में और अधिक विस्तार से प्रचार हो गया। उनकी सकुशल वापसी पर देश के अनेक हिस्सों में हर्ष मनाया गया और मिठाइयां वितरित की गईं। शिवाजी के पड़ौसी मुस्लिम राज्यों में शिवाजी का आतंक और भी अधिक गहरा गया। आखिर वे लाल किले का मानभंग करके अपनी राजधानी सकुशल लौट आए थे!

औरंगजेब को जब शिवाजी और उनके पुत्र संभाजी की वापसी के समाचार मिले तो वह अपमान और क्रोध से तिलमिलका कर रह गया। उसे रह-रह कर हरम की औरतों की चीख-पुकार याद आ रही थी। यदि औरंगजेब ने हरम की औरतों का कहना मान लिया होता और शिवाजी को उसी समय मरवा दिया होता तो आज औरंगजेब को अपमान का यह कड़वा घूंट नहीं पीना पड़ता! किंतु अब कुछ नहीं हो सकता था, अब तो चिड़िया खेत चुग कर फुर्र हो चुकी थी।

औरंगजेब ने शिवाजी के आगरा से निकल भागने के लिए मिर्जाराजा जयसिंह के पुत्र रामसिंह को जिम्मेदार ठहराया। उसने राजकुमार रामसिंह को औरंगजेब के दरबार में आने से मनाही कर दी तथा उसका पद भी छीन लिया। उधर मिर्जाराजा जयसिंह भी दक्षिण में चुपचाप बैठकर औरंगजेब के अगले आदेश की प्रतीक्षा करता रहा। शिवाजी की रायगढ़ वापसी की तरह संभाजी की वापसी भी मराठा इतिहास के लिए एक महत्वपूर्ण घटना थी।

आगरा से लौट आने के बाद शिवाजी कुछ दिन तक पूरी तरह शांत होकर बैठे रहे किंतु वे मुगलों का आक्रमण होने की स्थिति में प्रजा की सुरक्षा करने का प्रबंध भी करते रहे। अंततः औरंगजेब ने मिर्जाराजा जयसिंह को दक्षिण से हटा दिया तथा आगरा आकर दरबार में उपस्थिति देने के आदेश दिए।

औरंगजेब के शहजादे मुअज्जम को पुनः दक्षिण का सूबेदार बनाया गया तथा महाराजा जसवंतसिंह को मुअज्जम के साथ फिर से दक्षिण जाने के आदेश दिए गए। सेनापति दिलेर खाँ को दक्षिण में रहने के आदेश दोहराए गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हिन्दू राजाओं की सुन्नत (63)

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हिन्दू राजाओं की सुन्नत

औरंगजेब अपने जीवन काल में ही भारत को मुसलमानों की भूमि बनाना चाहता था। इसके लिए उसने जीवन भर भयानक षड़यंत्र रचे। एक बार उसने हिन्दू राजाओं की सुन्नत करने का षड़यन्त्र रचा!

बाबर से लेकर औरंगजेब तक सारे मुगल बादशाहों की इच्छा रही कि पूरे हिन्दुस्तान को इस्लाम में परिवर्तित कर लिया जाये किंतु हिन्दू जनता के प्रतिरोध और हिन्दू धर्म-गुरुओं के प्रयत्नों के कारण ऐसा करना संभव नहीं हो सका। हिन्दू धर्म और इस्लाम में बहुत सी ऐसी बातें थीं जिनके कारण ये दोनों एक दूसरे के निकट नहीं आ सके।

हिन्दू सदियों से चले आ रहे मूर्ति-पूजन, गौ-संरक्षण, गंगा-स्नान, बहुदेव-पूजन, जाति-प्रथा एवं सगोत्रीय-विवाह-निषेध आदि बातों को छोड़ने को तैयार नहीं थे जबकि इस्लाम इन बातों को सहन करने को तैयार नहीं था। हिन्दू, चोटी तिलक एवं जनेउ को छोड़ने को तैयार नहीं थे जबकि इस्लाम सुन्नत, अजान और हज में विश्वास रखता था। इसी प्रकार के और भी बहुत से कारण थे जिनके कारण देनों के बीच की दूरियां बनी रहीं।

जब छत्रपति शिवाजी आगरा से निकल भागे तो औरंगजेब को लगा कि समस्त हिन्दू राजाओं ने मिलकर औरंगजेब के विरुद्ध षड़यंत्र किया है तथा शिवाजी को आगरा से निकल भागने में सहायता पहुंचाई है। इसलिए औरंगजेब मन ही मन समस्त हिन्दू राजाओं के विनाश का उपाय सोचने लगा।

ई.1192 में सम्राट पृथ्वीराज चौहान की हत्या से लेकर ई.1666 में शिवाजी के आगरा से भाग निकलने तक अर्थात् विगत लगभग 500 साल से मुस्लिम शासक भारत पर केन्द्रीय शक्ति के रूप में शासन कर रहे थे। भारत के बहुत से प्रांतों में भी मुस्लिम सूबेदार एवं सुल्तान हो गए थे किंतु अब भी हिन्दू-शासक इतनी बड़ी संख्या में थे तथा इतने शक्तिशाली थे कि उन्हें एक साथ नष्ट करना किसी भी केन्द्रीय शक्ति के लिए संभव नहीं था।

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यदि कोई भी मुस्लिम शासक इन्हें एक साथ नष्ट करने का प्रयास करता तो वह स्वयं ही नष्ट हो जाता। इसके विपरीत, यदि हिन्दू राजाओं को एक-एक करके नष्ट किया जाता तो इस कार्य में सदियां बीत जातीं। इसलिए औरंगजेब ऐसी योजना बनाने में लग गया जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी नहीं टूटे! स्वातंत्र्यपूर्व राजस्थान के सुप्रसिद्ध इतिहासकार महामहोपध्याय गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने बीकानेर राज्य का इतिहास नामक ग्रंथ में एक घटना का उल्लेख किया है।

यद्यपि यह घटना किसी भी मुस्लिम तवारीख में उपलब्ध नहीं है तथापि बीकानेर राज्य की कुछ प्राचीन ख्यातों एवं जयपुर राज्य की ख्यात में इस घटना का उल्लेख किया गया है जिसके अनुसार ई.1666 में औरंगजेब ने हिन्दू राजाओं के विरुद्ध एक भयानक षड़यंत्र रचा।

उसने अपने अधीनस्थ समस्त बड़े हिन्दू राजाओं और मुस्लिम अमीरों को इकट्ठा करके ईरान की ओर प्रस्थान किया। उसकी योजना थी कि वह समस्त हिन्दू राजाओं को ईरान ले जाकर एक साथ हिन्दू राजाओं की सुन्नत करवा दे ताकि सभी बड़े हिन्दू राजा एक साथ मुसलमान बन जाएं और भारत से कुफ्र का सफाया किया जा सके।

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बीकानेर की ख्यातों के अनुसार साहबे के एक सैयद फकीर को अस्तखां नामक एक मुगल अमीर से मालूम हुआ कि बादशाह सब को एक-दीन अर्थात् मुस्लिम करना चाहता है। उस फकीर ने इस बात की खबर बीकानेर नरेश महाराजा कर्णसिंह को दी। इस पर हिन्दू राजाओं ने एक गुप्त-बैठक की कि अब क्या करना चाहिये? उस समय औरंगजेब तथा समस्त हिन्दू राजा अटक नदी के इस तरफ डेरा डाले हुए थे जो कि भारत की अंतिम सीमा थी।

उन्हीं दिनों आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह की माता की मृत्यु का समाचार पहुंचा, जिससे हिन्दू राजाओं को 12 दिन तक वहीं पर रुक जाने का अवसर मिल गया। इसके बाद सारे राजा, महाराजा कर्णसिंह के पास गए और उससे कहा कि आपके बिना हमारा उद्धार नहीं हो सकता। आप यदि नावें तुड़वा दें तो हमारा बचाव हो सकता है, क्योंकि ऐसा होने से देश को प्रस्थान करते समय शाही सेना हमारा पीछा नहीं कर सकेगी।

बीकानेर नरेश कर्णसिंह ने धर्म की रक्षा के लिये अपना सिर कटवाने का निश्चय करके योजना निर्धारित की कि बादशाह को अटक नदी के पार चले जाने दिया जाए। जब बादशाह चला जाए तब सारे हिन्दू सरदार नदी पार करने की बजाय अपनी-अपनी नावें जलाकर अपने-अपने राज्य को लौट जायें।

इस निश्चय के अनुसार, जैसे ही बादशाह ने नदी पार की वैसे ही हिन्दू नरेशों ने नावें इकट्ठी करके उनमें आग लगा दी। इसके बाद वहाँ उपस्थित समस्त हिन्दू राजाओं ने महाराजा कर्णसिंह का बड़ा सम्मान किया और उसे जंगलधर पादशाह की उपाधि दी। इस उपलक्ष्य में बीकानेर नरेश ने साहिबे के फकीर को बीकानेर राज्य में प्रतिघर प्रतिवर्ष एक पैसा उगाहने का अधिकार प्रदान किया।

जैसे ही औरंगजेब को हिन्दू राजाओं के निश्चय का पता लगा तो वह कुरान हाथ में लेकर फिर से नदी पार करके अटक के इस पार आया। उसने राजाओं से नावें जलाने का कारण पूछा। तब राजाओं ने जवाब दिया कि- ‘तुमने तो हमें मुसलमान बनाने का षड़यंत्र रच लिया इसलिये तुम हमारे बादशाह नहीं। हमारा बादशाह तो बीकानेर का राजा है। जो वह कहेगा वही करेंगे, धर्म छोड़कर जीवित नहीं रहेंगे।’

तब औरंगजेब ने समस्त राजाओं के सामने कुरान हाथ में रखकर कसम खाई कि- ‘अब ऐसा नहीं होगा, जैसा तुम लोग कहोगे, वैसा ही करूंगा। आप लोग मेरे साथ दिल्ली चलो। आप लोगों ने कर्णसिंह को जंगलधर बादशाह कहा है तो वह जंगल का ही बादशाह रहेगा।’

इस प्रकार हिन्दू राजाओं की सुन्नत तो नहीं हो सकी। हिन्दू नरेशों की एकता एवं दृढ़ता को देखकर औरंगजेब की हिम्मत नहीं हुई कि उनके साथ कोई जबर्दस्ती करे किंतु कुछ समय बाद औरंगजेब ने अपनी सेना को बीकानेर राज्य पर आक्रमण करने के आदेश दिए। कुछ दिन बाद औरंगजेब ने सेना के अभियान को रोक दिया तथा एक संदेशवाहक को बीकानेर भेजकर महाराजा कर्णसिंह को बादशाह के समक्ष उपस्थित होने के आदेश भिजवाए।

महाराजा कर्णसिंह अपने दो कुंवरों केसरीसिंह तथा पद्मसिंह को अपने साथ लेकर औरंगजेब के दरबार में उपस्थित हुआ। औरंगजेब की योजना थी कि महाराजा कर्णसिंह को आगरा में मरवा दिया जाए तथा उसके बाद महाराजा कर्णसिंह के दासी-पुत्र वनमालीदास को बीकानेर का शासक बना दिया जाए जिसने राज्य मिलने के बाद मुसलमान हो जाने का वचन दिया था।

जब औरंगजेब ने देखा कि कि हिन्दू राजाओं की सुन्नत को रोकने वाले महाराजा कर्णसिंह के साथ राजकुमार केसरीसिंह तथा पद्मसिंह भी आए हैं तो औरंगजेब महाराजा कर्णसिंह की हत्या करवाने का साहस नहीं कर सका। क्योंकि ये वही केसरीसिंह तथा पद्मसिंह थे जिन्होंने शाहशुजा और औरंगजेब के बीच हुई खजुआ की लड़ाई में औरंगजेब के पक्ष में युद्ध किया था तथा विपुल पराक्रम का प्रदर्शन करके औरंगजेब को जीत दिलाई थी।

उस समय औरंगजेब इन दोनों राजकुमारों के अहसान के तले इतना दब गया था कि युद्ध समाप्त होने के बाद औरंगजेब ने अपनी जेब से रूमाल निकालकर केसरी सिंह तथा पद्म सिंह के बख्तरबंदों की धूल झाड़ी थी। अब वह उन्हीं राजकुमारों की आंखों के सामने उनके पिता कर्णसिंह की हत्या कैसे कर सकता था!

अतः औरंगजेब ने महाराजा कर्णसिंह की हत्या करने का विचार त्याग दिया तथा उसे पदच्युत करके औरंगाबाद भेज दिया। बीकानेर का राज्य महाराजा कर्णसिंह के बड़े पुत्र अनूपसिंह को दे दिया गया। औरंगाबाद पहुंचने के बाद महाराजा कर्णसिंह एक साल तक जीवित रहा। 22 जून 1669 को औरंगाबाद में ही महाराजा कर्णसिंह का निधन हुआ जहाँ आज भी उसकी छतरी बनी हुई है। महाराजा कर्णसिंह ने औरंगाबाद में कर्णसिंह पुरा नामक एक उपनगर बसाया जिसे आज भी कर्णपुरा मौहल्ले के नाम से जाना जाता है।

महाराजा कर्णसिंह का पुत्र महाराजा अनूपसिंह अपने समय का विख्यात राजा हुआ। उसने औरंगजेब की तरफ से दक्षिण के मोर्चे पर दीर्घकाल तक सेवाएं दीं तथा दक्षिण के मोर्चे पर तोड़े जाने वाले हिन्दू मंदिरों से प्रतिमाएं निकालकर बीकानेर भिजवाईं। महाराजा कर्णसिंह के छोटे कुंअर पद्मसिंह एवं केसरीसिंह औरंगजेब की तरफ से दक्षिण के मोर्चे पर लड़ते हुए मारे गए।

राजकुुमार पद्मसिंह को बीकानेर राजवंश का अब तक का सबसे वीर पुरुष माना जाता है। उसकी तलवार का वजन आठ पौण्ड तथा खाण्डे का वजन पच्चीस पौण्ड था। वह घोड़े पर बैठकर बल्लम से शेर का शिकार किया करता था। इस प्रकार बीकानेर का वीर राजवंश भी लाल किले के षड़यंत्रों एवं कुचक्रों से बचा नहीं रह सका।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मिर्जाराजा जयसिंह (64)

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मिर्जाराजा जयसिंह

शिवाजी महाराज के आगरा से भाग जाने के बाद, औरंगजेब द्वारा कुंअर रामसिंह को अपदस्थ किए जाने तथा उसके पिता मिर्जाराजा जयसिंह को दक्खिन की सूबेदारी से च्युत किए से आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह बुरी तरह आहत हो गया। औरंगजेब का आदेश मिलते ही मिर्जाराजा जयसिंह तत्काल दक्षिण का मोर्चा छोड़कर औरंगाबाद की तरफ रवाना हो गया।

जयसिंह तथा उसके पूर्वज अकबर के समय से मुगलों की सेवा करते आए थे तथा मुगलों और कच्छवाहों की मैत्री को अब सौ साल से अधिक हो गए थे। पिछले सौ साल में कच्छवाहों ने अपने राज्य में एक गज धरती भी नहीं बढ़ाई थी, वे हर समय मुगलों का राज्य स्थिर करने एवं उसका विस्तार करने में लगे रहे थे।

जब ई.1621 में औरंगजेब के बाबा जहांगीर ने देखा कि आम्बेर रियासत में कोई वयस्क राजकुमार जीवित नहीं बचा है तो जहांगीर ने अपनी इच्छा से 11 वर्षीय राजकुमार जयसिंह को आम्बेर का राजा बनाया था। तब से जयसिंह मुगलों की नौकरी करता आ रहा था। उसने 6 वर्ष तक जहांगीर की और 31 वर्ष तक शाहजहाँ की सेवा की थी तथा अब विगत 6 वर्षों से औरंगजेब की सेवा कर रहा था।

ई.1635 में जयसिंह ने शिवाजी के पिता शाहजी भौंसले के 3 हजार सिपाही और 8 हजार बैल पकड़े थे। इन बैलों पर बड़ा भारी तोपखाना और बारूद लदा हुआ था। इससे प्रसन्न होकर ई.1636 में शाहजहाँ ने जयसिंह को ‘मिर्जा-राजा’ की उपाधि दी थी। तब से मिर्जाराजा जयसिंह शाहजी एवं शिवाजी को हानि पहुंचाता आ रहा था।

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मिर्जाराजा जयसिंह को रह-रह कर वे पुराने दिन याद आते थे जब ई.1647 में शाहजहाँ बल्ख और बदख्शां में असफल होकर काबुल में फंस गया था और धन की कमी के कारण उसकी हालत पतली हो गई थी, तब मिर्जाराजा जयसिंह आगरा से 1 करोड़ 20 लाख रुपये, बारूद तथा रसद लेकर काबुल पहुंचा था जिसके कारण शाहजहाँ का काबुल से जीवित बच निकलना संभव हो पाया था।

शाहजहाँ के जीवन काल में ही एक बार औरंगजेब भी बल्ख में फंस गया। तब मिर्जाराजा जयसिंह उसे उजबेगों से बचाकर काबुल ले आया था। जब शाहजहाँ के पुत्रों में उत्तराधिकार का युद्ध हुआ तब वली-ए-अहद दारा शिकोह द्वारा मिर्जाराजा जयसिंह को दारा शिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह का संरक्षक बनाया गया था किंतु जयसिंह ने दारा शिकोह का साथ छोड़कर औरंगजेब का साथ दिया था, अजमेर के युद्ध की जीत का बहुत बड़ा श्रेय मिर्जाराजा जयसिंह को ही था। इतना ही नहीं जयसिंह ने औरंगजेब के धुर विरोधी महाराजा जसवंतसिंह को भी औरंगजेब के पक्ष में कर रखा था।

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औरंगजेब पर मिर्जाराजा जयसिंह के उपकारों की सूची बहुत लम्बी थी। उत्तराधिकार के युद्ध के दौरान औरंगजेब के ओदश से मिर्जाराजा जयसिंह दारा शिकोह की जान के पीछे हाथ धोकर पड़ गया था। जहाँ-जहाँ दारा गया, जयसिंह उसका दुर्भाग्य बनकर उसके पीछे लगा रहा। अंत में जयसिंह की सहायता से ही दारा को पकड़ा गया था और उसे भयानक अपमान एवं पीड़ादायक मृत्यु के हवाले किया गया था। औरंगजेब मिर्जाराजा जयसिंह से इतना प्रसन्न था कि उसने मिर्जाराजा जयसिंह को शिवाजी को पकड़ने या मारने की विशेष जिम्मेदारी सौंपी थी।

दक्खिन में पहुंचकर जयसिंह ने शिवाजी की सेना को बहुत क्षति पहुंचाई थी जिसके परिणाम स्वरूप 11 जून 1665 को छत्रपति शिवाजी तथा मुगलों के बीच पुरंदर की दुर्भाग्यपूर्ण संधि हुई थी। इस संधि के लिये छत्रपति को मिर्जाराजा जयसिंह ने अपनी तलवार के जोर पर विवश किया था। यह संधि मिर्जाराजा के जीवन की सबसे बड़ी सफलता और शिवाजी के जीवन की सबसे बड़ी विफलता थी। इस संधि के परिणाम स्वरूप शिवाजी ने अपने अधिकार वाले 35 दुर्गों में से 23 दुर्ग औरंगजेब को सौंप दिये थे।

इस प्रकार औरंगजेब का पिता शाहजहाँ तथा स्वयं औरंगजेब मिर्जाराजा जयसिंह के अहसानों के बोझ तले दबे हुए थे किंतु शिवाजी के आगरा से भाग निकलने के कारण औरंगजेब जयसिंह तथा उसके पूर्वजों के समस्त पिछले उपकारों और अहसानों को भूल गया तथा उसने जयसिंह को आगरा में बुलाकर अपमानित करने का निश्चय किया।

औरंगजेब के आदेश से मिर्जाराजा जयसिंह औरंगाबाद होता हुआ बुरहानपुर के लिए रवाना हुआ। 28 अगस्त 1667 को बुरहानपुर में ही मिर्जाराजा जयसिंह की मृत्यु हो गई। वह भी अपने बाबा मानसिंह की तरह टूटा हुआ हृदय लेकर इस असार संसार से गया। जीवन भर की गई मुगलों की सेवा का यही अंतिम पुरस्कार जयसिंह को मिला जैसा कि उसके बाबा मानसिंह को भी पूर्व में अपमानजनक मृत्यु के रूप में मिला था।

अंग्रेज इतिहासकार वी. ए. स्मिथ ने ऑक्सफोर्ड हिस्ट्री ऑफ इण्डिया के पृष्ठ संख्या 427-428 पर लिखा है- ‘औरंगजेब के कहने से आम्बेर नरेश जयसिंह के पुत्र कीरतसिंह ने अपने पिता मिर्जाराजा जयसिंह को जहर दे दिया जिससे महाराजा की मृत्यु हो गई।’ हालांकि जयपुर राज्य की ख्यातें तथा मुगल तवारीखें इस तथ्य की पुष्टि नहीं करतीं। वे केवल मिर्जाराजा की बुरहानपुर में मृत्यु हो जाने का उल्लेख करती हैं।

औरंगजेब का इतिहास लिखने वाले इतिहासकार जदुनाथ सरकार ने लिखा है- ‘जयसिंह की मृत्यु एलिजाबेथ के दरबार के सदस्य वॉलघिंम की भांति हुई जिसने अपना बलिदान ऐसे स्वामी के लिये किया जो काम लेने में कठोर तथा काम के मूल्यांकन में कृतघ्न था।’

छत्रपति तथा उनका पुत्र शंभाजी, कच्छवाहा राजकुमार रामसिंह के पहरे से भाग निकले थे, इस बात को औरंगजेब जीवन-पर्यंत नहीं भुला सका। यहाँ तक कि अपने वसीयतनामे में भी औरंगजेब ने इस घटना का उल्लेख इन शब्दों में किया- ‘देखो, किस प्रकार उस अभागे शिवा का पलायन जो असावधानी के कारण हुआ, मुझे मृत्यु-पर्यंत परेशान करने वाली मुहिमों में उलझाये रहा।’

शिवाजी द्वारा औरंगजेब को इतना अपमानित किए जाने पर भी औरंगजेब ने अपनी मक्कारी नहीं छोड़ी। उसने शिवाजी को पत्र लिखकर उसे फिर से आगरा बुलवाया। 6 मई 1667 के फारसी रोजनामचे में लिखा है- ‘बादशाह ने वजीरे आजम को हुक्म दिया कि शिवा के वकील को बुलाए, उसे आश्वस्त करे और दो महीने में लौटने की शर्त पर शिवा को सूचित करे कि हुजूरे अनवर ने उसके गुनाहों को माफ कर दिया है। उसके पुत्र सम्भाजी को 5000 का मनसब बहाल किया गया है। वह अपनी शक्ति के अनुसार बीजापुर का जितना इलाका छीन सकता है, छीन ले। अन्यथा अपने स्थान पर डटा रहे और बादशाह के बेटे का हुक्म माने।’

शिवाजी ने औरंगजेब के आदेश की अनदेखी कर दी तथा दोनों ओर से शांति बनी रही। इस पर 9 मार्च 1668 को शहजादे मुअज्जम ने शिवाजी को पत्र लिखकर सूचित किया- ‘जहांपनाह ने आपको राजा की उपाधि देकर आपका सिर ऊंचा किया है जो कि आपकी उच्चतम अभिलाषा है।’

औरंगजेब द्वारा शिवाजी के प्रति इस प्रकार आदर और सम्मान प्रकट किए जाने पर शिवाजी ने अपने पुत्र संभाजी को मुगल शहजादे मुअज्जम के शिविर में जाने की अनुमति दे दी क्योंकि औरंगजेब ने संभाजी को पांच हजारी मनसबदार घोषित किया था। मुअज्जम और संभाजी के समवयस्क होने के कारण उन दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई।

औरंगजेब के सेनापति दिलेर खाँ को मुअज्जम और संभाजी की यह दोस्ती अच्छी नहीं लगी। उसने औरंगजेब को पत्र लिखकर सूचित किया कि शहजादा मुअज्जम, मराठों के साथ मिलकर स्वयं बादशाह बनने का षड़यंत्र रच रहा है। दिलेर खाँ का पत्र पाकर औरंगजेब ने मुअज्जम को आदेश भिजवाया कि वह सम्भाजी को दिल्ली भेज दे।

मुअज्जम को दिलेर खाँ के षड़यंत्र के बारे में पता लग गया और उसने सम्भाजी को सावधान कर दिया। इस पर सम्भाजी शिकार खेलने के बहाने से एक दिन अपने साथियों सहित मुगलों के शिविर से बाहर निकला और भागकर पूना चला गया।

इस प्रकार दक्षिण भारत में कुछ दिनों के लिए हुई शांति में एक बार फिर से विघ्न पड़ गया और लाल किला अपने षड़यंत्रों में सफल नहीं हो सका।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

वीर गोकुला जाट (65)

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वीर गोकुला जाट

औरंगजेब ने आगरा के लाल किले में वीर गोकुला जाट के टुकड़े करवाए! औरंगजेब किसी भी कीमत पर भारत से हिन्दू धर्म को मिटाना चाहता था। ब्राह्मण, वैश्य, मराठे, राजपूत, सिक्ख, सतनामी आदि कोई भी ऐसी जाति नहीं थी जिसे कुचलने के लिए औरंगजेब ने कोई न कोई षड़यंत्र न किया हो। वीर गोकुला जाट भी उसी की एक कड़ी थी।

जाट एक अत्यंत प्राचीन भारतीय समुदाय है। यह प्रायः कृषि एवं पशुपालन से जुड़ा हुआ, सम्पन्न, परिश्रमी एवं संघर्षशील विशेषताओं से युक्त है जो उत्तर भारत के उपाजाऊ मैदानों एवं मध्य भारत के उपाजाऊ पठार में बड़ी संख्या में निवास करता आया है। उत्तर भारत के दिल्ली, पंजाब, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश के  भरतपुर, धौलपुर, आगरा, मथुरा, मेरठ हिसार, सीकर, चूरू, झुंझुनूं, बीकानेर, नागौर, जोधपुर तथा बाड़मेर आदि जिलों में बड़ी संख्या में जाट निवास करते हैं।

गंगा-यमुना के दो-आब में निवास करने के कारण जाटों को मुसलमान शासकों के हाथों दीर्घकाल तक उत्पीड़न झेलना पड़ा जिसके कारण इनमें संघर्ष करने की प्रवृत्ति विकसित हो गई।

पहले तुर्कों एवं बाद में मुगलों के शासन काल में ब्रज-क्षेत्र के जाट मुस्लिम सैनिकों के अत्याचारों के बावजूद अपनी जमीनों पर अपना नियंत्रण बनाये रखने में सफल रहे। इस कारण उनमें संगठित होकर लड़ने की प्रवृत्ति का निरंतर विकास हुआ। मुस्लिम सेनाओं के विरुद्ध छोटे-छोटे समूहों में संगठित होकर अपनाई गई लड़ाका प्रणाली, जाटों के राजनीतिक उत्थान के लिये वरदायिनी शक्ति सिद्ध हुई।

सत्रहवीं शताब्दी में आगरा, मथुरा, अलीगढ़, मेवात, मेरठ, होडल, पलवल तथा फरीदाबाद से लेकर दक्षिण में चम्बल नदी के तट के पार गोहद तक जाट जाति का खूब प्रसार हो गया था। इस कारण यह विशाल क्षेत्र जटवाड़ा कहलाता था। इस क्षेत्र पर नियंत्रण रख पाना शाहजहाँ के लिये भारी चुनौती का काम हो गया। शाहजहाँ के काल में जाटों को घोड़े की सवारी करने, बन्दूक रखने तथा दुर्ग बनाने पर प्रतिबंध था।

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ई.1636 में शाहजहाँ ने ब्रजमण्डल के जाटों को कुचलने के लिये मुर्शीद कुली खाँ तुर्कमान को कामा, पहाड़ी, मथुरा और महाबन परगनों का फौजदार नियुक्त किया। उसने जाटों के साथ बड़ी नीचता का व्यवहार किया जिससे जाट मुर्शीद कुली खाँ के प्राणों के पीछे हाथ धोकर पड़ गये।

हुआ यह कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को मथुरा के पास यमुना के पार स्थित गोवर्धन में हिन्दुओं का बड़ा भारी मेला लगता था। मुर्शीद कुली खाँ भी हिन्दुओं का छद्म वेश धारण करके सिर पर तिलक लगाकर और धोती बांधकर उस मेले में आ पहुंचा। उसके पीछे-पीछे उसके सिपाही चलने लगे। उस मेले में जितनी सुंदर स्त्रियां थीं, उन्हें छांट-छांटकर उसने अपने सिपाहियों के हवाले कर दिया। उसके सिपाही उन स्त्रियों को पकड़कर नाव में बैठा ले गये। उन स्त्रियों का क्या हुआ, किसी को पता नहीं लगा।

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उस समय तो मुर्शीद कुली खाँ से कोई कुछ नहीं कह सका किंतु कुछ दिन बाद में ई.1638 में सम्भल के निकट स्थित जाटवाड़ नामक स्थान पर जाटों ने मुर्शीद कुली खाँ की हत्या कर दी। तब से जाटों और मुगलों में बुरी तरह से ठन गई।

शाहजहाँ ने जाटों को कुचलने के लिये आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह को नियुक्त किया। मिर्जाराजा जयसिंह ने जाटों, मेवों तथा गूजरों का बड़ी संख्या में सफाया किया तथा अपने विश्वस्त राजपूत परिवार इस क्षेत्र में बसाये।

जब भारत पर औरंगजेब का शासन हुआ तो औरंगजेब ने जाटों पर कड़ाई से नियंत्रण स्थापित करने की चेष्टा की। इस कारण जाट और अधिक भड़क गए। ई.1666 के आसपास ब्रज क्षेत्र के जाट तिलपत गांव के जमींदार गोकुला जाट के नेतृत्व में संगठित हुए।

इस पर औरंगजेब की सेना ने वीर गोकुला जाट को तंग करना शुरु कर दिया। मुगल सेना के अत्याचारों से तंग होकर गोकुला तिलपत छोड़कर महावन आ गया। उसने जाटों, मेवों, मीणों, अहीरों, गूजरों, नरूकों तथा पवारों को अपनी ओर मिला लिया तथा उन्हें इस बात के लिये उकसाया कि वे मुगलों को कर न दें।

कुछ समय बाद औरंगजेब के आदेश से मुगल सेनापति अब्दुल नबी खाँ ने गोकुला पर आक्रमण किया। उस समय गोेकुला सहोर गांव में था। जाटों ने अब्दुल नबी खाँ को मार डाला तथा मुगल सेना को लूट लिया। इसके बाद गोकुला ने सादाबाद गांव को जला दिया और उस क्षेत्र में भारी लूट-पाट की। अंत में औरंगजेब स्वयं मोर्चे पर आया और उसने जाटों को घेर लिया।

मुगल सैनिकों की विशाल संख्या के समक्ष जाटों की छोटी सी सेना का टिक पाना संभव नहीं था इसलिए जाटों की स्त्रियों ने जौहर किया तथा जाट वीर प्राण हथेली पर लेकर मुगलों पर टूट पड़े। इस संघर्ष में हजारों जाट मारे गये। उनके नेता वीर गोकुला जाट को हथकड़ियों में जकड़कर औरंगजेब के समक्ष ले जाया गया। औरंगजेब ने उससे कहा कि वह इस्लाम स्वीकार कर ले। गोकुला ने इस्लाम मानने से मना कर दिया।

इस पर औरंगजेब ने 1 जनवरी 1670 को आगरा के लाल किले में स्थित कोतवाली के समक्ष वीर गोकुला जाट का एक-एक अंग कटवाकर फिंकवा दिया। पराजय, पीड़ा और अपमान का विष पीकर तिल-तिल प्राण गंवाता हुआ गोकुला अपनी स्वतंत्रता को बनाये रखने के लिये विमल कीर्ति के अमल-धवल अमृत पथ पर चला गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

औरंगजेब को चुनौती (66)

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औरंगजेब को चुनौती

छत्रपति शिवाजी महाराज का सम्पूर्ण अस्तित्व ही धूर्त औरंगजेब को चुनौती था। औरंगजेब के समक्ष शिवाजी की शक्ति कुछ भी नहीं थी किंतु औरंगजेब शिवाजी को छू भी नहीं पाता था।

शिवाजी की आगरा यात्रा के लिए मिर्जाराजा जयसिंह के माध्यम से शिवाजी को शाही खजाने से 1 लाख रुपए दिए गए थे। जब शिवाजी आगरा से भाग निकले तो औरंगजेब ने मिर्जाराजा को आदेश दिए कि या तो वह शिवाजी से इस राशि की वसूली करे या वह स्वयं यह राशि शाही खजाने में जमा करवाए। इस बात से नाराज होकर छत्रपति शिवाजी ने दक्षिण में अब तक चली आ रही शांति को भंग करने तथा औरंगजेब को चुनौती देने का निर्णय लिया।

हम पूर्व में चर्चा कर चुके हैं कि दक्षिण में नियुक्त फौजदार दिलेर खाँ ने औरंगजेब को पत्र लिखकर शिकायत की थी कि शहजादा मुअज्जम मराठों के साथ मिल गया है तथा उनकी सहायता से बादशाह बनना चाहता है। जब यह बात मुअज्जम को पता लगी तो उसने भी औरंगजेब को एक पत्र लिखकर दिलेर खाँ की शिकायत की।

मुअज्जम के साथ-साथ महाराजा जसवंतसिंह ने भी औरंगजेब को पत्र लिखकर दिलेर खाँ के विरुद्ध शिकायत की। इस पर दिलेर खाँ भयभीत हो गया और उसे डर लगा कि शहजादा मुअज्जम किसी भी दिन दिलेर खाँ की हत्या करवा सकता है। इसलिए दिलेर खाँ ने मुअज्जम से मिलना बंद कर दिया तथा गुजरात के सूबेदार बहादुर खाँ से औरंगजेब को एक पत्र लिखवाया कि दिलेर खाँ को दक्खिन से हटाकर गुजरात का फौजदार बना दिया जाए।

बादशाह ने बहादुर खाँ की यह सिफारिश स्वीकार कर ली। जब दिलेर खाँ गुजरात चला गया तो अक्टूबर 1670 में छत्रपति ने सूरत को दूसरी बार लूटने का निर्णय लिया ताकि दिलेर खाँ को दण्डित किया जा सके तथा औरंगजेब को युद्ध की खुली चुनौती दी जा सके।

जब यह बात दिलेर खाँ को ज्ञात हुई तो उसने गुजरात के अंग्रेज व्यापारियों से बादशाह को एक पत्र लिखवाया जिसमें शिवाजी तथा मुअज्जमशाह दोनों की शिकायत की गई थी।

इस पत्र में अंग्रेजों ने बादशाह को लिखा कि पहिले शिवाजी चोरों की तरह से आता था और लूटपाट करके जल्दी ही चला जाता था किंतु अब वह तीस हजार सैनिकों की एक बड़ी फौज लेकर देश पर देश जीतता हुआ आगे बढ़ता जाता है और शहजादे मुअज्जमशाह के इतने निकट होकर निकलता है जिससे ज्ञात होता है कि वह शहजादे की तनिक भी परवाह नहीं करता।

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1 अक्टूबर 1670 को सूरत के सरकारी कर्मचारियों को सूचना मिली कि शिवाजी 15 हजार घुड़सवारों की एक विशाल सेना लेकर सूरत से केवल 20 मील दूरी पर आ पहुंचा है। इस पर सरकारी कर्मचारी सूरत छोड़कर भागने लगे। अगले दिन 2 अक्टूबर को व्यापारियों ने भी सूरत छोड़ दिया। सूरत में केवल शाही सेना, ब्राह्मण परिवार, श्रमिक, निर्धन जनता और भिखारी ही बच गए।

3 अक्टूबर 1670 को शिवाजी ने सूरत पर आक्रमण किया। अब तक सूरत शहर के चारों ओर एक मजबूत परकोटा बनाया जा चुका था। इसलिए मुगल सेना इस प्राचीर पर खड़े होकर शिवाजी की सेना पर गोलियां दागने लगीं किंतु शिवाजी की सेना ने मुगलों पर इतनी तेजी से दबाव बनाया कि मुगल सेना सूरत का परकोटा खाली करके किले के अंदर जा छिपी।

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शिवाजी के सैनिक सूरत में घुस गए और उन्होंने भारतीय व्यापारियों के साथ-साथ अंग्रेज डच, फ्रैंच, पुर्तगाली व्यापारियों की कोठियां एवं कारखाने घेर लिए। तुर्कों और ईरानी व्यापारियों ने कुछ समय पहले ही सूरत में एक नई सराय बनाई थी, जिसमें विदेशों से आए मुस्लिम व्यापारियों का जमावड़ा रहता था।

सूरत की तातार सराय में काशनगर के अपदस्थ बादशाह अब्दुल्ला खाँ ने डेरा डाल रखा था। वह कुछ दिन पहले ही हज करके लौटा था। इन सबको शिवाजी के सैनिकों ने अपने अधिकार में ले लिया।

फ्रांसीसियों ने शिवाजी को बड़े उपहार भेंट किए, इसलिए शिवाजी ने फ्रांसीसियों को भी छोड़ दिया। अंग्रेजों को इस समय तक मुगलों की दोस्ती का खुमार चढ़ चुका था इसलिए उन्होंने इस बार पहले जैसी दीनता नहीं दिखाई अपितु अपने कोठी पर नौसैनिक तैनात कर दिए जिन्होंने शिवाजी के सैनिकों से डटकर मुकाबला किया।

तातारों ने भी दिन भर मराठों का सामना किया। संध्याकाल में अवसर पाकर तातारी सैनिक अपने बादशाह अब्दुल्ला खाँ को लेकर किले के भीतर भाग गए। शिवाजी के सैनिकों ने तातारी सेना तथा उसके बादशाह का बहुमूल्य सामान लूट लिया।

उधर नई सराय में जो विदेशी तुर्क डेरा डाले हुए थे, उन्होंने मराठा सैनिकों को क्षति पहुंचाई। इस पर भी मराठों ने बड़ी आसानी से सूरत शहर के बड़े-बड़े घर लूट लिए और आधे सूरत शहर को जला कर राख कर दिया। 5 अक्टूबर 1670 को शिवाजी एवं उनकी सेना ने शहर खाली कर दिया। शिवाजी ने सूरत से आगे बढ़कर भड़ौंच तक धावे मारे तथा मुगलों की बहुत सी सम्पत्ति लूट ली।

जब मुगल सेना ने फिर से शहर में प्रवेश किया तो आकलन किया गया कि इस लूट में शिवाजी 66 लाख रुपए का माल ले गए थे। इस लूट के बाद धनी व्यापारियों ने हमेशा के लिए सूरत से मुंह मोड़ लिया। इसके बाद शिवाजी की सेना सूरत शहर में कभी नहीं आई किंतु जब तक शिवाजी जीवित रहे, तब तक कई बार यह अफवाह सूरत शहर में फैली कि शिवाजी अपनी सेना लेकर आ रहे हैं।

इस अफवाह के फैलते ही व्यापारी अपना माल-असबाब समुद्र में खड़े जहाजों में भरकर समुद्र में दूर-दूर तक भाग जाते थे। यूरोपीय व्यापारियों ने सुवाली में अपना ठिकाना बना लिया था। अब वे अपना कीमती सामान सुवाली में ही रखते थे। विदेशी सामान लेकर आने वाले जहाजों ने भी अब सूरत से मुंह मोड़ लिया। इससे औरंगजेब तथा जहानआरा दोनों को ही राजस्व की बड़ी हानि हुई किंतु वे शिवाजी के विरुद्ध कोई सख्त कार्यवाही नहीं कर सके।

यह शिवाजी द्वारा सूरत में की गई दूसरी बार की लूट थी। इसके माध्यम से छत्रपति ने शाहबेगम जहानआरा को संदेश दिया कि तू मुझे आगरा के लाल किले में मरवाना चाहती थी किंतु मैं फिर से सूरत को लूट रहा हूँ, मुगलिया सल्तनत जो कर सकती है कर ले!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

छत्रसाल बुंदेला (67)

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छत्रसाल बुंदेला

औरंगजेब के दुश्मनों में छत्रसाल बुंदेला का नाम सबसे ऊपर आता है। इस छोटे से राजा ने औरंगजेब को जीवन भर युद्ध के मैदान में उलझाए रखा।

भारत के मध्य में स्थित बुंदेलखंड विंध्याचल का पहाड़ी क्षेत्र है। यह आल्हा-ऊदल जैसे वीरों की भूमि रही है। अकबर के समय रानी दुर्गावती बुंदेलखण्ड पर शासन करती थी। शाहजहाँ ने चम्पतराय बुंदेला को बुंदेलखण्ड क्षेत्र में कौंच की जागीर प्रदान की थी जिसे राजा चम्पतराय ने छोटे से राज्य में परिवर्तित कर लिया था।

आगे चलकर जब शाहजहाँ के पुत्रों में उत्तराधिकार का युद्ध हुआ तो आम्बेर नरेश मिर्जाराजा जयसिंह, जोधपुर नरेश महाराजा जसवंतसिंह आदि की तरह बुंदेला राजा चम्पतराय ने भी औरंगजेब का साथ दिया था किंतु जब औरंगजेब ने हिन्दुओं का दमन करना आरम्भ किया तो चम्पतराय औरंगजेब का विरोधी हो गया।

इस पर औरंगजेब ने अपनी सेना को चम्पतराय पर आक्रमण करने के निर्देश दिए। मुगलों की विशाल सेना के सामने राजा चम्पतराय अपनी छोटी सी सेना लेकर रणक्षेत्र में उतरा। राजा चम्पतराय की रानी लालकुंवरि भी युद्ध क्षेत्र में चंपतराय के साथ रहकर युद्ध करती थी।

जब राजा और रानी मुग़ल सेना से घिर गए और ऐसा लगने लगा कि मुगल उन्हें जीवित ही पकड़ लेंगे तो राजा चम्पतराय तथा उसकी रानी लाल कुंवरि ने अपने-अपने पेट में कटार भौंककर देह छोड़ दी। उस समय उनके दो राजकुमार अंगद राय तथा छत्रसाल जीवित थे। वे दोनों अपने मामा के पास चले गए। 

कुछ समय बाद राजकुमार अंगदराय ने आम्बेर के शासक मिर्जाराजा जयसिंह के यहाँ नौकरी कर ली जबकि राजकुमार छत्रसाल बुंदेला ने अपनी स्वर्गीय माता के आभूषण बेचकर गुरु प्राणनाथ के मार्गदर्शन में 30 घुड़सवार और 347 पैदल सैनिकों की एक छोटी सी सेना तैयार की। इस सेना के भरोसे ही केवल 22 वर्ष की आयु में छत्रसाल ने अपने जीवन का पहला युद्ध लड़ा।

आरम्भ में तो छत्रसाल बुंदेला दूसरे राजाओं को अपनी सेना के साथ सेवा देता रहा किंतु बाद में उसकी सेना का विस्तार हो गया जिसमें 72 प्रमुख सरदार थे। स्त्रियों, साधु-सन्यांसियों एवं शरण में आए हुए लोगों की रक्षा करने के कारण छत्रसाल को बुंदेल खण्ड की जनता में लोकप्रियता प्राप्त हो गई।

कुछ समय बाद छत्रसाल भी मिर्जाराजा जयसिंह की सेना में शामिल हो गया। राजा छत्रसाल बुंदेला ने वसिया के युद्ध में अप्रतिम शौर्य का प्रदर्शन किया। इस युद्ध में मिली सफलता के बाद औरंगजेब ने छत्रसाल बुंदेला को राजा की मान्यता प्रदान की।

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जब औरंगजेब ने मिर्जाराजा जयसिंह की दक्खिन के मोर्चे पर नियुक्ति की तो छत्रसाल अपनी सेना के साथ दक्खिन में चला गया। वहाँ छत्रसाल ने अनेक मोर्चों पर शिवाजी की सेना के विरुद्ध युद्ध किया। धीरे-धीरे छत्रसाल को समझ में आने लगा कि मिर्जाराजा जयसिंह गलत पक्ष में है तथा शिवाजी का पक्ष ही सही है।

इसलिए ईस्वी 1668 में राजा छत्रसाल एक दिन अपनी पत्नी और मित्रों के साथ शिकार खेलने के बहाने से मुगल खेमे से निकला और चुपचाप पूना जा पहुंचा। शिवाजी नेे उसका स्वागत किया और उसे राजनीति, छद्मनीति एवं छापामार युद्ध के बारे में जानकारी दी। छत्रसाल ने शिवाजी के साथ मिलकर औरंगजेब की सेना से युद्ध करने की इच्छा व्यक्त की।

इस पर शिवाजी ने उसे सलाह दी कि वह अपनी मातृभूमि बुंदेलखण्ड लौट जाए और अपनी मातृभूमि को मुगलों से मुक्त कराए। वहाँ उसे अपने ही देश के बहुत से साथी मिल जाएंगे। छत्रसाल को यह सलाह उचित लगी। छत्रपति शिवाजी ने अपने हाथों से राजा छत्रसाल की कमर में तलवार बांधी तथा उसका तिलक किया।

इस घटना का वर्णन करते हुए भूषण ने लिखा है-

करो देस के राज छतारे, हम तुम तें कबहूं नहीं न्यारे।

दौर देस मुग़लन को मारो, दपटि दिली के दल संहारो।

तुम हो महावीर मरदाने, करि हो भूमि भोग हम जाने।

जो इतही तुमको हम राखें, तो सब सुयस हमारे भाषें।

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शिवाजी से हुई भेंट के बाद राजा छत्रसाल मुगलों की नौकरी छोड़कर अपनी सेना सहित अपने पैतृक राज्य महोबा जाने का विचार करने लगा किंतु अपनी सेना को मुगलों के सैन्य-शिविर से अलग करके निकालना आसान कार्य नहीं था। अंततः ई.1670 में राजा छत्रसाल को अवसर मिल गया और वह अपनी सेना लेकर बुंदेलखण्ड चला आया। बुंदेलखण्ड आकर राजा छत्रसाल बुंदेला ने अपने सम्बन्धी राजाओं से औरंगजेब के विरुद्ध सहायता मांगी। किसी भी राजा ने छत्रसाल का समर्थन नहीं किया। दतिया नरेश शुभकरण ने छत्रसाल का सम्मान तो किया परन्तु बादशाह से बैर न करने की सलाह दी। ओरछा नरेश सुजान सिंह ने राजा छत्रसाल का अभिषेक तो किया पर स्वयं औरंगजेब के विरुद्ध संघर्ष से अलग रहा। छत्रसाल के बड़े भाई अंगदराय ने भी छत्रसाल का साथ देना स्वीकार नहीं किया।

राजाओं से सहयोग न मिलने पर राजा छत्रसाल ने जन-साधारण से सहयोग मांगा। छत्रसाल के बचपन के साथी महाबली तेली ने छत्रसाल की सहायता की तथा उसे कुछ धन प्रदान किया जिससे छत्रसाल ने नए सिरे से अपनी सेना का गठन किया तथा ई.1671 में औरंगजेब के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। राजा छत्रसाल ने कालिंजर का क़िला जीत लिया और मांधाता चौबे को कालिंजर का किलेदार नियुक्त किया।

औरंगज़ेब ने छत्रसाल के विरुद्ध सेना भेजी किंतु यह सेना छत्रसाल को पराजित करने में सफल नहीं हो सकी। इस पर औरंगजेब ने रणदूलह के नेतृत्व में 30 हज़ार सैनिकों की टुकड़ी छत्रसाल के पीछे भेजी। राजा छत्रसाल ने इटावा, खिमलासा, गढ़ाकोटा, धामौनी, रामगढ़, कंजिया, मडियादो, रहली, रानगिरि, शाहगढ़, वांसाकला सहित अनेक स्थानों पर मुगलों से लड़ाई लड़ी तथा बड़ी संख्या में मुगल सरदारों को बंदी बनाकर उनसे दंड वसूल किया।

मुग़ल सेनापति तहव्वर ख़ाँ, अनवर ख़ाँ, सहरूदीन तथा हमीद खाँ छत्रसाल से मार खा-खाकर बुन्देलखंड छोड़कर भाग गए। बहलोद ख़ाँ छत्रसाल के साथ हुई लड़ाई में मारा गया था। मुरादबक्श ख़ाँ, दलेह ख़ाँ, सैयद अफगन जैसे सिपहसलार भी बुन्देला वीरों से पराजित होकर दिल्लीपति की शरण में भाग गये।

औरंगजेब यह देख-देखकर हैरान होता था कि आखिर छत्रपति शिवाजी ने राजा छत्रसाल को कौनसी घुट्टी पिला दी थी कि एक साधन विहीन छोटा सा जागीरदार, मुगलों की विशाल सेना में लगातार मार लगाता जा रहा था!

जिस प्रकार सिसोदिया राजपूत अरावली पर्वत में, कचोट राजपूत कांगड़ा घाटी में तथा मराठे कोंकण में पहाड़ी क्षेत्र के बल पर मुगलों की सेना को छका रहे थे, उसी प्रकार राजा छत्रसाल ने भी विंध्याचल पर्वत का सहारा लेकर बुन्देलखंड से मुग़लों को मार भगाया।

ईस्वी 1678 में राजा छत्रसाल ने पन्ना में अपनी राजधानी स्थापित की। ई.1687 में योगीराज प्राणनाथ के निर्देशन में छत्रसाल का राज्याभिषेक किया गया। जिस प्रकार महाराणा प्रताप की सफलता में उनके मंत्री भामाशाह का और छत्रपति शिवाजी की सफलता में समर्थ गुरु रामदास का हाथ था, उसी प्रकार राजा छत्रसाल की सफलता में उसके गुरु प्राणनाथ का बहुत बड़ी प्रेरणा काम कर रही थी।

पन्ना में आज भी गुरु प्राणनाथ की समाधि बनी हुई है। स्थानीय लोगों में मान्यता है कि गुरु प्राणनाथ ने इस अंचल को रत्नगर्भा होने का वरदान दिया था। इस कारण जहाँ तक छत्रसाल के घोड़े की टापों के पदचाप बनी, वह धरा धनधान्य से परिपूर्ण एवं रत्नों से सम्पन्न हो गयी।

छत्रसाल के विशाल राज्य के विस्तार के बारे में यह पंक्तियाँ कही जाती हैं-

इत यमुना उत नर्मदा इत चंबल उत टोंस

छत्रसाल सों लरन की रही न काहू हौंस !

औरंगजेब तो ई.1707 में छत्रसाल का दमन करने की अधूरी इच्छा के साथ मर गया किंतु राजा छत्रसाल बुंदेला ई.1731 तक मातृभूमि की सेवा करता रहा। उस समय छत्रसाल की आयु 83 वर्ष थी किंतु वह तब भी मुगलों से संघर्ष कर रहा था। अपने जीवन काल में उसने 52 लड़ाइयां लड़ी थीं।

छत्रसाल बुंदेला के राज्य में चित्रकूट, पन्ना, कालपी, सागर, दमोह, झाँसी, हमीरपुर, जालौन, बाँदा, जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद, मण्डला, शिवपुरी, कटेरा, पिछोर, कोलारस, भिण्ड और मोण्डेर के परगने शामिल थे।

छत्रसाल के लिए यह कहावत प्रसिद्ध थी –

छत्ता तेरे राज में, धक-धक धरती होय।

जित-जित घोड़ा मुख करे, तित-तित फत्ते होय।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

छत्रपति शिवाजी का राज्याभिषेक

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छत्रपति शिवाजी का राज्याभिषेक
छत्रपति शिवाजी का राज्याभिषेक

छत्रपति शिवाजी का राज्याभिषेक होते हुए देखना मुगलिया इतिहास के लिए जहर का घूंट पीने के समान थी। औरंगजेब के लिए तो यह और भी शर्मनाक थी किंतु हिन्दू इतिहास को युगों-युगों तक गौरवान्वित करने वाली थी।

शिवाजी को आगरा से लौटकर आए हुए आठ साल बीत गए थे किंतु औरंगजेब के मन का दुःख किसी तरह कम नहीं हेाता था। औरंगजेब ने जब से मिर्जाराजा जयसिंह को अपमानित करने के लिए दक्खिन की सूबेदारी से अलग किया था और जिन रहस्यमय परस्थितियों में मिर्जाराजा की मृत्यु हुई थी, उसके बाद से हिन्दू राजा औरंगजेब से घृणा करने लगे थे तथा मन मारकर औरंगजेब की नौकरी कर रहे थे।

अंग्रेज इतिहासकार लेनपूल ने लिखा है- ‘जब तक वह कट्टरपंथी औरंगजेब, अकबर के सिंहासन पर बैठा रहा, एक भी राजपूत उसे बचाने के लिए अपनी अंगुली भी हिलाने को तैयार नहीं था। औरंगजेब को अपनी दाहिनी भुजा खोकर दक्षिण के शत्रुओं के साथ युद्ध करना पड़ा।’ यहाँ दाहिनी भुजा से लेनपूल का आशय राजपूतों की मित्रता से है।

जोधपुर नरेश जसवंतसिंह अब भी औरंगजेब की नौकरी में थे और उन्हें छत्रपति शिवाजी को नष्ट करने के काम पर लगाया गया था किंतु महाराजा जसवंतसिंह, छत्रपति के विरुद्ध प्रभावी कार्यवाही नहीं करते थे। इस कारण छत्रपति ने अपने राज्य का बहुत विस्तार कर लिया। उनकी आय भी बढ़ गई थी और उनकी सेना का आकार भी काफी बड़ा हो गया था।

इस समय तक शिवाजी की तलवार के घाव खा-खाकर मुगल सेनाएं दक्षिण भारत में पूरी तरह जर्जर हो चुकी थीं। बीजापुर तथा गोलकुण्डा के पुराने सुल्तान मर चुके थे और नए सुल्तानों में शिवाजी का प्रतिरोध करने की शक्ति शेष नहीं बची थी।

इसलिए शिवाजी अब अपने राज्य के सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न स्वामी थे। फिर भी शिवाजी किसी राजा के पुत्र नहीं थे, न उनका कभी राज्याभिषेक हुआ था। इसलिए बहुत से राजा उन्हें अपने बराबर नहीं मानते थे। यहाँ तक कि राजपूत राजाओं एवं काशी के पण्डितों द्वारा शिवाजी का कुल भी नीचा माना जाता था।

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हिन्दू शास्त्रों के अनुसार एक राजा ही प्रजा पर कर लगा सकता है और अपनी प्रजा को न्याय तथा दण्ड दे सकता है। राजा को ही भूमि दान करने का अधिकार प्राप्त है। इसलिए माता जीजाबाई ने शिवाजी से कहा कि वह काशी के ब्राह्मणों को बुलाकर अपना राज्याभिषेक करवाएं। इस प्रकार छत्रपति शिवाजी का राज्याभिषेक माता जीजाबाई के आदेश का परिणाम थी।

शिवाजी ने भी राजनीतिक दृष्टि से ऐसा करना उचित समझा ताकि वे अन्य राजाओं के समक्ष स्वतंत्र राजा का सम्मान और अधिकार पा सकें। ई.1674 में शिवाजी ने छत्रपति की उपाधि धारण करने का निर्णय किया।

कुछ भौंसले परिवार जो कभी शिवाजी के ही समकक्ष अथवा उनसे अच्छी स्थिति में थे, वे शिवाजी की सफलता के कारण ईर्ष्या करते थे तथा शिवाजी को लुटेरा कहते थे जिसने बलपूर्वक बीजापुर तथा मुगल राज्यों के इलाके छीन लिए थे। बीजापुर राज्य अब भी शिवाजी को एक जागीरदार का विद्रोही पुत्र समझता था।

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ब्राह्मणों की मान्यता थी कि शिवाजी किसान के पुत्र हैं इसलिए उनका राज्याभिषेक नहीं हो सकता। इसलिए शिवाजी ने अपने मंत्री बालाजी, अम्बाजी तथा अन्य सलाहकारों को काशी भेजा ताकि इस समस्या का समाधान किया जा सके। इन लोगों ने काशी के पण्डित विश्वेश्वर से सम्पर्क किया जिसे गागा भट्ट भी कहा जाता था। वह राजपूताने के कई राजाओं का राज्याभिषेक करवा चुका था। शिवाजी के मंत्रियों ने गागा भट्ट से शिवाजी की वंशावली देखने का अनुरोध किया। पण्डित गागा भट्ट ने शिवाजी की वंशावली देखने से मना कर दिया। शिवाजी के मंत्री कई दिनों तक उसके समक्ष प्रार्थना करते रहे। अंततः एक दिन गागा, शिवाजी की वंशावली देखने को तैयार हुआ।

उसने पाया कि शिवाजी का कुल मेवाड़ के सिसोदिया वंश से निकला है तथा विशुद्ध क्षत्रिय है। उसने छत्रपति शिवाजी का राज्याभिषेक करने की अनुमति प्रदान कर दी। इसके बाद यह प्रतिनिधि मण्डल राजपूताने के आमेर तथा जोधपुर आदि राज्यों में भी गया ताकि राज्याभिषेक के अवसर पर होने वाली प्रथाओं एवं रीति-रिवाजों की जानकारी प्राप्त की जा सके।

गागा भट्ट की अनुमति मिलते ही रायपुर में राज्याभिषेक की तैयारियां होने लगीं। बड़ी संख्या में सुंदर एवं विशाल अतिथि-गृह एवं विश्राम-भवन बनवाने आरम्भ किए गए ताकि देश भर से आने वाले सम्माननीय अतिथि उनमें ठहर सकें। नए सरोवर, मार्ग, उद्यान आदि भी बनाए गए ताकि शिवाजी की राजधानी सुंदर दिखे।

गागा से प्रार्थना की गई कि वह स्वयं रायपुर आकर राज्याभिषेक सम्पन्न कराए। गागा ने इस निमंत्रण को स्वीकार कर लिया। काशी से महाराष्ट्र तक की यात्रा में गागा भट्ट का महाराजाओं जैसा सत्कार किया गया। उसकी अगवानी के लिए शिवाजी अपने मंत्रियों सहित रायपुर से कई मील आगे चलकर आए तथा उसका भव्य स्वागत किया।

भारत भर से विद्वानों एवं ब्राह्मणों को आमंत्रित किया गया। 11 हजार ब्राह्मण, शिवाजी की राजधानी में आए। स्त्री तथा बच्चों सहित उनकी संख्या 50 हजार हो गई। लाखों नर-नारी इस आयोजन को देखने राजधानी पहुंचे। सेनाओं के सरदार, राज्य भर के सेठ, रईस, दूसरे राज्यों के प्रतिनिधि, विदेशी व्यापारी भी रायपुर पहुंचने लगे। चार माह तक राजा की ओर से अतिथियों को फल, पकवान एवं मिठाइयां खिलाई गईं तथा उन लोगों के राजधानी में ठहरने का प्रबन्ध किया गया।

ब्रिटिश राजदूत आक्सिनडन ने लिखा है कि प्रतिदिन के धार्मिक संस्कारों और ब्राह्मणों से परामर्श के कारण शिवाजी राजे को अन्य कार्यों की देखभाल के लिए समय नहीं मिल पाता था। जीजाबाई इस समय 80 वर्ष की हो चुकी थीं। छत्रपति शिवाजी का राज्याभिषेक होते हुए देखकर वही सबसे अधिक प्रसन्न थीं।

उनका पुत्र शिवा आज धर्म का रक्षक, युद्धों का अजेय विजेता तथा प्रजा-पालक था। जिस दिन राज्याभिषेक के समारोह आरम्भ हुए, उस दिन शिवाजी ने समर्थ गुरु रामदास तथा माता जीजाबाई की चरण वंदना की तथा चिपलूण के परशुराम मंदिर में जाकर भगवान के दर्शन किए।

शिवाजी ने अपनी कुल देवी तुलजा भवानी की प्रतिमा पर सवा मन सोने का छत्र चढ़ाया जिसका मूल्य उस समय लगभग 56 हजार रुपए था। शिवाजी ने अपने कुल-पुरोहित के निर्देशन में महादेव, भवानी तथा अन्य देवी-देवताओं की पूजा की। ब्राह्मणों तथा निर्धनों को विपुल दान दक्षिणा दी गई। मुख्य पुरोहित गागा भट्ट को 7000 स्वर्ण-मुद्राएं तथा अन्य ब्राह्मणों को 1700-1700 मुद्राएं दी गईं जिन्हें होन कहा जाता था।

शिवाजी द्वारा जाने-अनजाने में किए गए पापों एवं अपराधों के प्रायश्चित के लिए उनके हाथों से सोना, चांदी, तांबा, पीतल, शीशा आदि विभिन्न धातुओं, अनाजों, फलों, मसालों आदि से तुलादान करवाया गया। इस तुलादान में शिवाजी ने एक लाख होन भी मिलाए ताकि ब्राह्मणों में वितरित किए जा सकें।

कुछ ब्राह्मण इस दान-दक्षिणा से भी संतुष्ट नहीं हुए तथा उन्होंने शिवाजी पर 8 हजार होन का अतिरिक्त जुर्माना लगाया क्योंकि शिवाजी ने अनेक नगर जलाए थे तथा लोगों को लूटा था। शिवाजी ने ब्राह्मणों की बात मान ली। इस प्रकार भारी मात्रा में स्वर्ण दान लेकर ब्राह्मणों ने शिवाजी को पाप-मुक्त, दोष-मुक्त एवं पवित्र घोषित कर दिया।

5 जून का दिन शिवाजी ने आत्म-संयम और इंद्रिय-दमन में व्यतीत किया। उन्होंने गंगाजल से स्नान करके, गागा भट्ट को 5000 होन का दान किया तथा अन्य प्रसिद्ध ब्राह्मणों को सोने की 2-2 स्वर्ण मोहरें दान में दीं और दिन भर उपवास किया।

6 जून 1674 को शिवाजी का राज्याभिषेक कार्यक्रम आयोजित किया गया। राज्याभिषेक के अवसर पर शिवाजी ने छत्रपति की उपाधि धारण की। छत्रपति शिवाजी महाराज की जय-जयकार से आकाश गुंजारित हो गया। राज्याभिषेक हो चुकने के बाद छत्रपति के मंत्री नीराजी पंत ने अंग्रेजों के दूत हेनरी आक्सिनडन को शिवाजी के सम्मुख प्रस्तुत किया।

आक्सिनडन ने पर्याप्त दूरी पर खड़े रहकर छत्रपति का अभिवादन किया तथा दुभाषिए की सहायता से अंग्रेजों की तरफ से हीरे की एक अंगूठी भेंट की। दरबार में कई और विदेशी भी उपस्थित थे, उन्हें भी शिवाजी महाराज ने अपने निकट बुलाया तथा उनका यथोचित सम्मान किया और परिधान भेंट किए।

अपने राज्याभिषेक के पश्चात् महाराज शिवाजी ने अपने नाम से सिक्के ढलवाए तथा नए संवत् का भी प्रचलन किया। भारतीय आर्य राजाओं में यह परम्परा थी कि जब कोई राजा स्वयं को स्वतंत्र सम्राट या चक्रवर्ती सम्राट घोषित करता था तो उसकी स्मृति में नवीन मुद्रा तथा संवत् का प्रचलन किया करता था। प्राचीन भारत में विक्रम संवत, शक संवत तथा गुप्त संवत इसी प्रकार आरम्भ किए गए थे।

शिवाजी का राज्याभिषेक एक युगांतरकारी घटना थी। औरंगजेब के जीवित रहते यह संभव नहीं था किंतु शिवाजी ने औरंगजेब के साथ-साथ बीजापुर एवं गोलकुण्डा के मुसलमान बादशाहों और सुल्तानों से लड़कर अपने राज्य का निर्माण किया तथा स्वयं को स्वतंत्र राजा घोषित किया। उस समय उत्तर भारत में केवल महाराणा राजसिंह तथा दक्षिण भारत में केवल छत्रपति शिवाजी ही ऐसे राजा थे जिनकी मुगलों से किसी तरह की अधीनता, मित्रता या संधि नहीं थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारतीय औरतों से विवाह (68)

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भारतीय औरतों से विवाह

पुर्तगालियों ने अराकानी स्त्रियों के साथ विवाह करने आरम्भ कर दिए क्योंकि पुर्तगाली औरतें भारत में आकर रहने को तैयार नहीं थीं। औरंगजेब को पसंद नहीं था कि पुर्तगाली पुरुष भारतीय औरतों से विवाह करें!

मुगलों के शासनकाल में भारत की उत्तरी-पूर्वी सीमा पर अराकान नामक प्रसिद्ध राज्य था। इस क्षेत्र में सदियों से भारतीय आर्य-राजा राज्य करते आ रहे थे। महाभारत काल में पाण्डवों ने, बौद्ध काल में अशोक ने तथा गुप्त सम्राटों के काल में समुद्रगुप्त ने अराकान के जंगली लोगों को पराजित करके अपने अधीन किया था। इस कारण अराकान के शासक आर्य जाति के थे किंतु अराकान की प्रजा वनवासी थी।

पाठकों को स्मरण होगा कि जब औरंगजेब के बेटों में तख्त और ताज के लिए खून-खच्चर मचा था तो औरंगजेब द्वारा भेजी गई सेनाओं के डर से औरंगजेब का बड़ा भाई शाहशुजा जो कि बंगाल का सूबेदार था, अपनी राजधानी ढाका छोड़कर अराकान के जंगलों में भाग गया था। उस समय अराकान में माघ वंश का शासन था जो कि सदियों से हिन्दू धर्म को मानता आया था।

अराकान के इसी हिन्दू राजा ने शाहशुजा को शरण दी थी किंतु कुछ समय बाद जब कृतघ्न मुगल शहजादे ने अराकान के राजा की हत्या का षड्यन्त्र रचा तो अराकान के राजा ने शाहशुजा का वध करने के आदेश दिए। इस पर शाहशुजा रातों-रात अराकान के राजा का महल छोड़कर जंगलों भाग गया। अराकान के पहाड़ों में रहने वाले जंगली लोगों ने शाहशुजा और उसके हरम को पकड़ लिया तथा उनका सामान लूट कर उन सभी लोगों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए।

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माघ राजाओं की राजधानी चटगांव थी। जब वास्कोडीगामा भारत आया था तो पुर्तगालियों की एक बस्ती गोआ के आसपास बसनी आरम्भ हुई थी। इन्हीं पुर्तगालियों में से कुछ लोग अकबर के समय चटगाँव चले आए और राजधानी चटगाँव में उन्होंने एक व्यापारिक कोठी तथा बस्ती बना ली। इन पुर्तगालियों को स्थानीय लोग फिरंगी कहते थे।

फिरंगियों ने माघ राजाओं से गठबन्धन कर लिया था जिसके अनुसार पुर्तगाली व्यापारी, माघ राजा को कर एवं उपहार देते थे तथा उनके बदले में माघ राजा पुर्तगालियों के जहाजों एवं बस्ती को संरक्षण देते थे ताकि स्थानीय लोग पुर्तगालियों पर हमला न करें।

आगे चलकर पुर्तगालियों ने भारतीय औरतों से विवाह करने आरम्भ कर दिए क्योंकि पुर्तगाली औरतें भारत में आकर रहने को तैयार नहीं थीं। चटगांव के पुर्तगाली जब अमीर हो गए तो उन्होंने अपनी छोटी-मोटी सेना बना ली और वे बंगाल के निचले भाग में समुद्री तट तथा नदियों के तट पर लूट-खसोट करने लगे। भारतीय औरतों से विवाह करना उनके लिए प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया।

भारतीय औरतों से विवाह करना पुर्तगाली मर्दों को इसलिए भी अच्छा लगता था क्योंकि वे पुर्तगाली औरतों से अधिक सुंदर थीं, विशेषकर अराकानी औरतें।

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पाठकों को स्मरण होगा कि जब छत्रपति शिवाजी ने औरंगजेब के मामा शाइस्ता खाँ को पूना से मार भगाया था तो औरंगजेब ने शाइस्ता खाँ को बंगाल का गवर्नर बना दिया था। औरंगजेब ने शाइस्ता खाँ को आदेश दिए कि वह इन पुर्तगालियों को दण्डित करे तथा अराकानियों को नष्ट करके चटगांव पर अधिकार कर ले।

औरंगजेब ने अराकानियों पर आरोप लगाया कि उन्होंने बंगाल के पूर्व सूबेदार शाहशुजा तथा उसके परिवार की हत्या की थी। शाइस्ता खाँ ने एक नौ-सेना तैयार की और ब्रह्मपुत्र नदी के मुहाने पर स्थित सन्द्वीप नामक द्वीप पर अधिकार कर लिया।

उन्हीं दिनों माघ राजा तथा फिरंगियों में झगड़ा हो गया। शाइस्ता खाँ ने इस स्थिति से लाभ उठाते हुए फिरंगियों को अपनी ओर मिला लिया।

अब चटगाँव पर आक्रमण करना सरल हो गया। पुर्तगालियों के एक जहाजी बेड़े ने अराकानियों के जहाजी बेड़े को नष्ट कर दिया। इसके बाद मुगल सेना ने चटगाँव पर अधिकार जमा लिया और चटगांव का नाम इस्लामाबाद रखकर उसे बंगाल प्रांत में सम्मिलित कर लिया।

इस प्रकार ईस्वी 1666 में अराकानियों की शक्ति समाप्त हो गई तथा अब औरंगजेब ने पुर्तगालियों की स्वतंत्रता भी नष्ट करके उन्हें अपने अधीन कर लिया। अराकान के मुगलों के अधीन हो जाने के बाद पुर्तगालियों को भारतीय औरतों से विवाह करने से रोक दिया गया। क्योंकि इससे भारत में ईसाइयों की संख्या बढ़ रही थी जबकि औरंगजेब भारत में मुस्लिम जनसंख्या बढ़ाना चाहता था।

अराकान को जीतने के बाद औरंगजेब की सेना ने आसाम के अहोम शासक पर हमला कर दिया तथा उसके बहुत से प्रदेश छीन लिए। अहोम राजाओं ने मुगलों के विरुद्ध दीर्घकालीन संघर्ष छेड़ दिया ताकि अपने खोये हुए प्रदेशों को फिर से प्राप्त कर सकें।

ई.1667 में अहोम सेनाओं ने गौहाटी पर अधिकार कर लिया। मुगलों ने आसाम पर आक्रमण किया किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके बाद दुर्भाग्यवश अगले ग्यारह वर्ष तक आसाम के राजवंश में गृहयुद्ध चलता रहा। इस छोटी सी अवधि में आसाम की गद्दी पर सात शासक बैठे।

इससे अहोम राजवंश कमजोर पड़ गया। अहोम राजवंश की कमजोरी का लाभ उठाकर ई.1679 में मुगलों ने फिर से आसाम पर अधिकार कर लिया। यह अधिकार दो वर्ष तक ही रह सका। इस प्रकार आसाम अधिक समय तक मुगलों के अधीन नहीं रहा किंतु कूचबिहार के शासकों ने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली।

इस प्रकार बिहार से लेकर बंगाल और आसाम तक का क्षेत्र औरंगजेब के अधीन हो गया। इस पूरे क्षेत्र में औरंगजेब ने इस्लाम का जबर्दस्त प्रसार करवाया और बहुत सी जनसंख्या मुसलमान हो गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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हरम बेगम का कपट जाल (69)

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बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है...