Saturday, June 22, 2024
spot_img

अध्याय – 6 : जहाँगीर के शासन-काल में बने भवन

अकबर को अपने वैवाहिक जीवन से बहुत समय तक किसी पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। इसलिए अकबर ने सूफी फकीर शेख सलीम चिश्ती से अपने लिए पुत्र का आशीर्वाद मांगा। जब अकबर को पुत्र की प्राप्ति हुई तो उसका नाम उसी फकीर के नाम पर सलीम रखा गया। बाद में अकबर के दो पुत्र और हुए- दानियाल तथा मुराद। बड़े पुत्र सलीम का जन्म 30 अगस्त 1569 को फतहपुर सीकरी के महलों में आम्बेर की राजकुमारी हरखू बाई अथवा हीराकंवर की कोख से हुआ था जो विवाह के बाद मरियम उज्मानी के नाम से जानी जाती थी।

अकबर शराब पीने का शौकीन था और वह अक्सर शराब के नशे में कुंवर मानसिंह के साथ कुश्ती लड़ा करता था। शराब पीने की लत उसके तीनों पुत्रों को भी लग गई। शराब के अत्यधिक सेवन के कारण शहजादे दानियाल और मुराद की, अपने पिता अकबर के जीवनकाल में ही मृत्यु हो गई। सलीम भी अत्यधिक शराब पीता था और शराब के नशे में अपनी पत्नी मानबाई, अपने पिता के मित्र अबुल फजल तथा अकबर के एक निजी सेवक सहित कई महत्वपूर्ण व्यक्तियों की हत्या कर चुका था। इसलिए अकबर ने अपनी वृद्धावस्था में सलीम को कसकर थप्पड़ लगाया और हमाम में बंद कर दिया। सलीम कई दिन तक हमाम में पड़ा रहा किंतु उसने वहाँ भी चोरी-छिपे शराब मंगवाने का प्रबंध कर लिया।

इस पर अकबर ने सलीम की ओर से निराश होकर सलीम के बड़े पुत्र खुसरो को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहा किंतु सलीम ने मृत्यु-शैया पर पड़े अकबर के पास रखी हुमायूँ की तलवार उठा ली। इस पर अकबर ने अपनी पगड़ी भी सलीम के सिर पर रख दी। इस घटना के कुछ ही दिन बाद अकबर की मृत्यु हो गई और 25 अक्टूबर 1605 को सलीम आगरा में नूरूद्दीन मुहम्मद जहाँगीर के नाम से मुगलों के तख्त पर बैठा। जहाँगीर ने अपने बड़े पुत्र खुसरो की आंखें फोड़कर बुरहानपुर के दुर्ग में कैद कर लिया ताकि वह फिर कभी जहाँगीर के मार्ग में बाधा उत्पन्न न कर सके।

बादशाह बनने के बाद जहाँगीर अपनी राजधानी आगरा ले आया। उसने अपने राज्य से शराब के उत्पादन तथा विक्रय का निषेध कर दिया। उसने सड़कों के किनारे सराय तथा नगरों में औषधालयों का निर्माण करवाया। जहाँगीर ने आगरा में अपने महल के समक्ष सोने की जंजीर से एक घंटी लटकाई जिसका नाम न्याय की घंटी रखा। कोई भी परिवादी इस जंजीर को खींचकर अपनी फरियाद बादशाह तक पहुँचा सकता था परन्तु सम्भवतः कभी किसी को यह जंजीर खींचने का दुस्साहस नहीं हुआ।

जहाँगीर को भवन निर्माण में अकबर जैसी रुचि नहीं थी। इसलिए उसके शासन में स्थापत्य का कोई विशेष विकास नहीं हुआ। जहाँगीर ने स्थापत्य की अपेक्षा चित्रकला को अधिक महत्व दिया। यद्यपि जहाँगीर के शासन-काल में बहुत कम इमारतें बनी थीं परन्तु इस काल में उपवन लगाने की नई शैली विकसित हुई। काश्मीर में जहाँगीर द्वारा बनवाया हुआ शालीमार बाग और उसके साले आसफ खाँ का बनवाया हुआ निशात बाग आज भी मौजूद हैं।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

अकबर ने आगरा के बाहर सिकन्दरा में अपना अकबर बनाने की योजना बनाई। संभवतः उसके जीवनकाल में ही इसका निर्माण कार्य भी आरम्भ हो गया किंतु इस इमारत को बाद में जहाँगीर ने पूरा करवाया। जहाँगीर की प्रिय बेगम नूरजहाँ ने आगरा में यमुना नदी के तट पर सफेद संगमरमर से अपने पिता एतिमादुद्दौला का विशाल मकबरा बनवाया। नूरजहाँ ने लाहौर के निकट जहाँगीर का मकबरा भी बनवाया। दिल्ली में बना खानखाना का मकबरा भी जहाँगीर काल की प्रमुख इमारतों में से है।

जहाँगीर के समय आगरा में निर्मित भवन

अकबर का मकबरा

सिकन्दरा में बने इस विशाल भवन की योजना स्वयं अकबर ने बनाई थी। संभवतः उसके शासन के अंतिम वर्षों में यह भवन बनना आरम्भ हो गया किंतु यह भवन अकबर की मृत्यु के आठ साल पश्चात् पूरा हो सका। जब यह बनकर तैयार हुआ तो जहाँगीर को इसके कुछ भाग पसंद नहीं आए, इसलिए उसने इनको फिर से बनाने के आदेश दिए।

जहाँगीर ने लिखा है– ‘सोमवार 17 रजब को हम अपने पिता के मकबरे को देखने गए। जब हमें इस पवित्र यात्रा का सौभाग्य प्राप्त हुआ तब हमने कब्रिस्तान पर बनी इमारत देखी परन्तु वह हमारी इच्छा के अनुकूल नहीं लगी। हमारी इच्छा थी कि राहगीर उसे देखकर यह कहें कि ऐसी इमारत हमने संसार में और कहीं नहीं देखी है। इसका कारण यह था कि जिस समय यह बन रही थी उस समय दुर्भाग्य से खुसरू की घटना घटी थी और हम लाहौर चले गए तथा कारीगरों ने उसे अपने मन के अनुसार बना डाला। फलतः सारा धन भी व्यय हो गया और तीन-चार वर्ष इसे बनने में लग गए। हमने आज्ञा दी कि अनुभवी कारीगर अन्य अनुभवी लोगों की सम्मति से निश्चित ढंग पर कई स्थानों पर नीवें डालें।’

जहाँगीर के इस आदेश के बाद अकबर के मकबरे की ऊँची इमारत बनी। उस मकबरे के चारों ओर बाग लगाया गया तथा एक बड़ा एवं ऊँचा दरवाजा सफेद पत्थर की मीनारों सहित बनाया गया। इस ऊँची इमारत पर 15 लाख रुपए खर्च हुए जो ईरान के 50 हजार ‘तूमान’ और तूरान के 45 हजार ‘खानी’ के बराबर होते हैं।

जहाँगीर के इस कथन से अनुमान लगाया जा सकता है कि इस मकबरे के बनने में जहाँगीर ने पूरी दिलचस्पी ली। यह मकबरा परम्परागत इस्लामी शैली का मकबरा नहीं है। मुसलमानों के मकबरों में गुम्बद बनाने की प्रथा प्राचीन समय से प्रचलित थी किन्तु इस मकबरे पर कोई गुम्बद नहीं है। इसकी बनावट बौद्ध विहार जैसी है और इसका आकार पिरामिड के जैसा है। यह मकबरा एक विस्तृत एवं सुनियोजित उद्यान के मध्य में स्थित है। इस बाग की परिधि डेढ़ मील है और इसके चारों ओर दीवार घिरी हुई है। इसके चारों ओर प्रवेश द्वार हैं और सभी द्वार वैभवशाली हैं लेकिन इसका मुख्य प्रवेश-द्वार सर्वाधिक आकर्षक है जिस पर संगमरमर का जड़ाऊ कार्य किया गया है। इसके चारों ओर तथा चारों कोनों पर संगमरमर की एक-एक ऊँची मीनार है। प्रवेश द्वार पर कुशलतापूर्वक की गई पच्चीकारी इसकी शोभा बढ़ाती है। पर्सी ब्राउन के अनुसार ‘अब तक इस प्रकार की एक भी मीनार भारतीय स्थापत्य कला में प्रयुक्त हुई दिखाई नहीं देती है।’

यह मकबरा पाँच मंजिली इमारत है जिसमें प्रत्येक ऊपर की मंजिल नीचे की मंजिल की अपेक्षा आकार में छोटी होती गई है। इसके प्रत्येक प्रवश द्वार पर फारसी की पंक्तियां खुदी हुई हैं। ये पंक्तियां अकबर के जीवन पर प्रकाश डालती हैं। अकबर की कब्र संगमरमर की बनी हुई है। भू-तल पर बनी कब्र असली है जबकि पहली मंजिल पर बनी कब्र नकली है। दोनों कब्रों का निर्माण संगमरमर के पत्थरों से किया गया है तथा उन पर विभिन्न प्रकार के फूल बनाए गए हैं। कब्र के सिराहने अल्लाहु अकबर और पैरों की तरफ जल्ले-जलालहु उभरे हुए अक्षरों में खुदा हुआ है। मकबरे में अल्लाह के निन्यानवे नामों के साथ हिन्दुओं का स्वास्तिक चिह्न तथा ईसाइयों का क्रॉस भी बना हुआ हैं।

फर्ग्यूसन ने लिखा है- ‘मकबरे की ऊपरी मंजिल की डिजाइन में सिरे पर एक गुम्बद की व्यवस्था अवश्य रही होगी। इस गुम्बद के बिना यह स्मारक दबा हुआ एवं अर्थहीन सा लगता है …… इमारत की ऊँचाई अब कोने के मण्डपों से 100 फुट से कुछ ही अधिक है। अगर केन्द्रीय गुम्बद 20-40 फुट और ऊँचा होता तो यह नीचे के आधार से उचित अनुपात में होता। यह मकबरा जैसी बारीक बनावट का है, वैसा ही सुंदर एवं आनुपातिक बनाने के लिए केन्द्रीय कक्ष बड़ा बनाने की आवश्यकता प्रतीत होती है। अगर यह ऐसा बना होता तो भारतीय मकबरों में इसे ताज के बाद, दूसरा स्थान दिया जाता।’

 पर्सी ब्राउन ने फर्ग्यूसन से असहमति व्यक्त करते हुए लिखा है- ‘यह मकबरा ऊपर की मंजिल सहित जैसा बना है, वैसा पूर्ण है। इसकी खुली हई छत और सुरुचिपूर्ण बनावट इस इमारत के लिए उपयुक्त ही है।’

एतमादुद्दौला का मकबरा

 जहाँगीर काल का दूसरा प्रमुख भवन एतमादुद्दौला का मकबरा है। इसका निर्माण ई.1625 में नूरजहाँ ने अपने पिता घियासुद्दीन बेग की स्मृति में लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से आगरा में करवाया था। घियासुद्दीन बेग को जहाँगीर ने एतमादुद्दौला की उपाधि दी थी। इस मकबरे में बाद में, एतमादुद्दौला के कई रिश्तेदारों को भी दफनाया गया।

मुगल काल के अन्य मकबरों से अपेक्षाकृत छोटा होने से, इसे शृंगारदान भी कहा जाता है। यह मकबरा यमुना नदी के बाएं किनारे पर स्थित है। यहाँ के बाग, पैट्रा ड्यूरा से सजावट की गई तथा कई अन्य घटक ताजमहल से साम्य रखते हैं। इस कारण इसे ‘बेबी ताज’ भी कहा जाता है। कई जगह इस मकबरे की नक्काशी ताजमहल से भी अधिक सुंदर है। इस मकबरे के मध्य में एशियाई शैली का गुम्बद स्थित है। यहाँ के बगीचे और रास्ते इसकी सुंदरता को और भी बढ़ाते हैं।

यह भारत में बना पहला मकबरा है जो पूरी तरह सफेद संगमरमर से बनाया गया था। इसकी दीवारों पर पेड़ पौधों, जानवरों और पक्षियों के चित्र उकेरे गए हैं। कहीं-कहीं आदमियों के चित्रों को भी देखा जा सकता है यद्यपि इस्लाम में मनुष्य आकृति को सजावट के रूप में इस्तेमाल करने की मनाही है। ‘बटेश्वर’ से मिले शिलालेख के अनुसार यह मूलतः कच्छवाहा राजा परमार्दिदेव का महल था

संगमरमर की संरचना और मकबरे का गूढ़ इस्लामी स्थापत्य, ताजमहल के अग्रगामी भवन के रूप में इसको और अधिक लोकप्रिय बनाते हैं। मकबरे को एक बड़े बगीचे के केंद्र में स्थापित किया गया है जिसमें पानी का बहाव बीच में है और आस-पास पैदल चलने वालों के लिए पगडंडियाँ बनाई गई हैं। मकबरे की दीवारें पर अर्ध-कीमती पत्थरों, जैस्पर और टोपाज एवं शराब की सुरोहियों के रूप में उकेरी हुई नक्काशी की गई है। मकबरे में रोशनी लाने के लिए जालीदार संगमरमर लगाया गया है।

इस मकबरे पर ईरानी शैली का प्रभाव है। यह हौजों और फव्वारों की पंक्तियों के बीच लाल पत्थर के 149 फुट लम्बे एवं इतने ही चौड़े वर्गाकार चबूतरे पर बना हुआ है। यह दो मंजिला भवन है जिसकी निचली मंजिल की योजना 70 फुट गुणा 70 फुट है। इसके केन्द्रीय भवन के प्रत्येक कोण पर मीनारों जैसी अष्टकोणीय बुर्जियों और एक मण्डप  अथवा छत के ऊपर से निकली हुई ऊपरी मंजिल है। इसके प्रत्येक ओर बने मेहराबदार दरवाजे इसे गहराई प्रदान करते हैं। जबकि कोष्ठकों पर आधारित कार्निसों और ऊपरी मंजिल का छज्जा चौड़ा है जो इसे समतल आकृति प्रदान करता है। इसका मुख्य हॉल वर्गाकार है जिसका फर्श संगमरमर से बना हुआ है और उस पर मोजेक का काम किया गया है। इसी हॉल में एतमादुद्दौला और उसकी बेगम की कब्रें हैं।

हॉल की दीवारों पर कुरान और अन्य इस्लामी धर्मग्रंथों की आयतें तुगरा में लिखी गई हैं। इसके ऊपर का कक्ष वर्गाकार है जिसकी दीवारों की जालियां बहुत अच्छे संगमरमर से बनाई गई हैं। इसके फर्श पर बहुत सुंदर डिजाइनों का जड़ाऊ काम किया गया है। पर्सी ब्राउन के अनुसार- ‘यह इमारत अपनी सूक्ष्म (मिनियेचर) कला के उदाहरण के रूप में अपने बगीचों और प्रवेश द्वारों सहित अपनी तरह की सर्वाधिक पूर्ण इमारतों में से एक है।’

यद्यपि इस भवन में सजावट की अधिकता है किंतु सजावट में पूर्ण सावधानी बरती गई है ताकि उसका कलात्मक प्रभाव सुरक्षित रहे। इसमें उभरी हुई नक्काशी का काम थोड़ा सा ही है। अधिकांश सतह को जड़ाऊ पत्थरों के काम से हल्का रंगीन बना दिया गया है। इसके परिणाम स्वरूप सफेद संगमरमर की चमक हल्के रंग की नक्काशी से कम हो गई है। यह नक्काशी अन्य भागों में रंग-बिरंगी डिजाइनों में फैली हुई है। यह अधिकतर केवल ऐसी रंगीन डिजाइनों में ही है कि इससे केवल तितली के पंख ही स्पर्द्धा कर सकते हैं।

एतमादुद्दौला के मकबरे में की गई रंगीन पत्थरों की सजावट, पूर्ववर्ती इमारतों से भिन्न है। इसलिए जहाँगीर के बाद की इमारतें न केवल कला-शैली में अपितु सजावट की पद्धति में भी एक नई शैली का श्रीगणेश करती हैं। इस मकबरे के बनने से पहले के भवनों की सजावट ‘ऑपस ड्यूरा’ शैली में की जाती थी जिसमें पत्थरों के ऊपर गहरे एवं गाढ़े रंगों से चित्रकारी की जाती थी। मुगलों की बहुत ही सुंदर और संगमरमर की पूर्ण कलाकृतियों में जो सोने और कीमती पत्थरों का जड़ाऊ काम मिलता है, उसकी पहल इसी मकबरे से हुई थी जिसे ‘पैट्रा ड्यूरा’ कहा जाता है। इस शैली में नूरजहाँ का परिष्कृत स्त्रियोचित सौंदर्य भी प्रकट होता है।

अंगूरी बाग, आगरा

शाहजहाँ ने ई.1637 में आगरा में अंगूरी बाग का निर्माण करवाया। इसके भीतर चारबाग शैली में उद्यान लगा हुआ है तथा संगमरमर की बारादरियां, हौज फव्वारे एवं बरामदे बने हुए हैं। बाग के उत्तर-पूर्व में शाही हम्माम बना हुआ है जिसमें आकर्षक भित्ति चित्र बने हुए हैं। यह उद्यान खास बाग का हिस्सा है तथा शाहजहाँ के हरम की औरतों द्वारा प्रयुक्त किया जाता था। उस काल में इस बाग में उत्तम किस्म के अंगूरों की बेलें लगाई गई थीं।

जहाँगीर के समय लाहौर में निर्मित भवन

जहाँगीर अपने शासन के शुरुआती वर्षों में लाहौर में काफी समय तक रहा। इस अवधि में उसने लाहौर तथा उसके आसपास के नगरों में कई इमारतें बनवाईं।

अनारकली का मकबरा, लाहौर

पाकिस्तान में पंजाब सिविल सेक्रेटरिएट के पास सफेद रंग के पत्थरों से बना एक भवन है जिसे अनारकली का मकबरा कहा जाता है। अनारकली का वास्तविक नाम नादिरा बेगम था। उसे शर्फुन्निसा भी कहा जाता था। वह अकबर के शासनकाल में व्यापारियों के एक काफिले के साथ ईरान से लाहौर आई थी। ब्रिटिश पर्यटक विलियम फिंच ई.1608 से 1611  तक लाहौर में रहा था। उसने लिखा है कि अनारकली अकबर की कई पत्नियों में से एक थी। अनारकली से अकबर को एक पुत्र भी हुआ जिसे दानियाल कहा जाता था। अकबर के पुत्र सलीम से अनारकली के सम्बन्धों की अफवाह के कारण अकबर ने अनारकली को लाहौर के दुर्ग में चिनवा दिया। जहाँगीर ने उसकी स्मृति में अनारकली का मकबरा बनवाया। यह आज भी बहुत अच्छी दशा में है। भवन के ऊपर एक खूबसूरत गुम्बद बना हुआ है तथा चारों कोनों पर गुम्बदाकार गुमटियां हैं। मकबरे के चारों ओर खूबसूरत बाग है।

सैयद अब्दुल लतीफ ने अपनी पुस्तक ‘तारीख-ए-लाहौर’ में लिखा है कि अनारकली अकबर की बेगम थी किंतु जहाँगीर से इश्क के चलते ही उसकी जान गई। जहाँगीर ने उसकी कब्र पर लिखवाया कि- ‘अगर मैं अपनी महबूबा को एक बार भी पकड़ सकता तो कयामत तक अल्लाह का शुक्रिया करता।’ मकबरे में स्थित कब्र पर ई.1599 और 1615 की तिथियां हैं जो अनारकली की मृत्यु एवं मकबरा पूर्ण होने की सूचना देती हैं।

कन्हैया लाल नामक लेखक ने अपनी पुस्तक ‘तारीख-ए-लाहौर’ में लिखा है कि अनारकली की मृत्यु बीमारी से हुई थी। बाद में अकबर ने उसका मकबरा बनवाया। सिख राजाओं ने उसे तुड़वा दिया और अंग्रेजों ने उस पर चर्च बनवा दिया। कन्हैयालाल का वर्णन सही प्रतीत नहीं होता जबकि सैयद अब्दुल लतीफ के विवरण अधिक सही जान पड़ते हैं क्योंकि मकबरे के शिलालेख, मकबरे के होने की सूचना देते हैं न कि चर्च की; आज भी वहाँ मेहराबों, गुम्बद एवं बुर्जों से युक्त मकबरा बना हुआ है। अकबर ई.1605 में मर गया था जबकि मकबरे पर शिलालेख की तिथि ई.1615 की है।

मकातिब खाना, लाहौर

जहाँगीर ने लाहौर में मकातिब खाना का निर्माण करवाया। मकातिब का अर्थ क्लर्क अथवा लिपिक होता है। उस काल में लिपिक को मुहर्रिर भी कहा जाता था। मुगलिया सजावट से दूर इस भवन का स्थापत्य अत्यंत साधारण है तथा फारसी शैली में बना हुआ लघु कार्यालय भवन है। यह लाहौर की प्रसिद्ध मोती मस्जिद के पास स्थित है। इस भवन के चारों ओर के आर्च (मेहराब) अत्यंत नुकीले हैं तथा ईवान भी गहरे बने हुए हैं। इस भवन के ऊपर एक शिलालेख लगा हुआ है जिस पर ई.1617-18 की एक तिथि का उल्लेख किया गया है तथा इस भवन को मा’मुर खान नामक व्यक्ति की देखरेख में बनाए जाने की सूचना अंकित है। इसी शिलालेख से ज्ञात होता है कि इस भवन का मूलतः नामकरण ‘दौलत खाना ए जहाँगीर’ किया गया था। संभवतः बाद में इसे जहाँगीर के सचिवालय के रूप में काम लिया जाने लगा।

बेगम शाही मस्जिद, लाहौर

जहाँगीर ने अपनी माँ मरियम जमानी बेगम जो कि अकबर की पत्नी थी तथा आम्बेर के कच्छवाहों की बेटी हीरा कंवर थी, के नाम पर ई.1611 से 1614 की अवधि में लहौर में बेगम शाही मस्जिद बनवाई। कर्नल टॉड तथा उसके बाद के कुछ इतिहासकारों ने उसे गलती से जोधा बाई लिख दिया है किंतु वह वास्तव में शाही बेगम के नाम से जानी जाती थी। अब लाहौर में इससे पहले की मुगल कालीन मस्जिदें अस्तित्व में नहीं हैं। मुगलों के काल में लाहौर में बनी वजीर खान मस्जिद, बेगम शाही मस्जिद के कुछ दशकों बाद बनी थी। लाहौर दुर्ग के अकबरी दरवाजे से बेगम शाही मस्जिद का दृश्य साफ दिखाई देता था किंतु बाद में इनके बीच में बड़ी संख्या में अवैध दुकानें बन गईं। जहाँगीर के काल में मुगल अमीरों के लिए यही प्रमुख शाही मस्जिद थी।

मस्जिद की दीवारों एवं गुम्बदों पर जहाँगीर काल की शैली के फ्रैस्को (भित्ति-चित्र) बनाए गए हैं। किसी भी भवन की दीवार पर जब प्लास्टर किया जाता है तो उसके गीले होने की अवस्था में रंगों से चित्र बना दिए जाते हैं जो सूखकर स्थाई प्रभाव देते हैं। इन्हीं को फ्रैस्को या भित्तिचित्र कहा जाता है। अधिकतर चित्र फूलों की डिजाइन में बनाए गए हैं। दीवारों पर कैलीग्राफी (अक्षर लिखाई) का काम भी किया गया है। कुछ आयतें कुरान से ली गई हैं तथा कुछ कुरान से बाहर की बातें भी लिखी गई हैं। इस मस्जिद के भित्तिचित्र आगे चलकर वजीर खाँ मस्जिद के भित्तिचित्रों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने।

एक दरवाजे के ऊपर लिखी इबारत में कहा गया है- ‘अल्लाह का शुक्रिया है कि उसकी मेहरबानी से बादशाह ने इस मस्जिद को पूरा किया। जन्नत की तरह दिखने वाली इस मस्जिद की नींव बेगम मरियम जमानी ने रखी। यह इबारत जहाँगीर की ओर से लिखी गई है जिसमें उसने इस मस्जिद की सुंदरता की भी प्रशंसा की है।’

मस्जिद के पूर्वी दरवाजे पर एक और इबारत लिखी गई है जिसमें कहा गया है- ‘हे अल्लाह! संसार को जीतने वाला बादशाह नूरूद्दीन मुहम्मद आकाश में सूर्य और चंद्र की तरह चमता रहे।’ मस्जिद के उत्तर की दिशा में बनी एक मेहराब के ऊपर लिखा है- ‘जिस प्रकार मछली पानी में विश्वास रखती है, उसी प्रकार श्रद्धालु इस मस्जिद में विश्वास रखते हैं, उन पर अल्लाह की दया और आशीर्वाद बना रहे।’

इस मस्जिद के स्थापत्य की सबसे बड़ी विशेषता इसके ऊपरी भाग में बने कम ऊँचाई वाले गुम्बद हैं। इस मस्जिद के स्थापत्य में मुगल स्थापत्य के साथ-साथ पूर्ववर्ती लोदी सल्तनत-कालीन स्थापत्य की विशेषताएं भी दिखाई देती हैं। मस्जिद में बनी बालकनी एवं पार्श्वकक्ष तथा चित्रकला मुगलकालीन है जबकि नीची ऊँचाई के गुम्बद लोदी कालीन स्थापत्य से प्रेरित हैं। इस मस्जिद का निर्माण ‘फाइव बे चैम्बर’ पद्धति से किया गया है जो बाद के मुगल स्थापत्य में उपलब्ध नहीं होता। इस मस्जिद का ‘सेंट्रल बे’ फारसी शैली के अनुकरण पर बनाया गया है जिसे ‘चाहर तक’ अथवा ‘चार तक’ कहते हैं। इसमें प्रमुख कक्ष के चारों ओर चार मेहराब  बनाए जाते हैं। फारस में यह स्थापत्य शैली इस्लाम के उदय से शताब्दियों पहले से प्रयुक्त होती थी। बाद में यह इस्लामी स्थापत्य की अनिवार्य पहचान बन गई।

मस्जिद का प्रार्थना कक्ष 130.5 फुट लम्बा और 34 फुट चौड़ा है। हॉल पाच हिस्सों में विभक्त है जिनके ऊपर तीन मेहराब हैं। इनमें सबसे बड़ी मेहराब केन्द्रीय कक्ष पर बनी है। इस मस्जिद के बाहर 128 गुणा 82 फुट का दालान है। इसी में वजू करने का कुण्ड बना हुआ है। महाराजा रणजीतसिंह के काल में इस मस्जिद में गनपाउडर बनने की फैक्ट्री स्थापित की गई। उस समय इसे बारूदखाना वाली मस्जिद कहा जाता था। ई.1850 में यह मस्जिद मुसलमानों को लौटा दी गई। वर्तमान में यह मस्जिद लाहौर नगर के परकोटे के भीतर मस्ती गेट के निकट स्थित है। इस मस्जिद के तीन दरवाजे थे जिनमें से अब दो बचे हैं।

वजीर खाँ मस्जिद, लाहौर

लाहौर की ‘वजीर खाँ मस्जिद’ का निर्माण शाहजहाँ के काल में ई.1634 में आरम्भ हुआ तथा ई.1642 में पूर्ण हुआ। इसे मुगल कल की सर्वाधिक अलंकृत मस्जिद माना जाता है। इसे टैराकोटा की अलंकृत टायलों से सजाया गया है। यह ईरानी कला है जिसे ‘कशीकारी’ कहा जाता है। इसकी लगभग सम्पूर्ण भीतरी दीवारों को मुगल कालीन उभरी हुई फ्रैस्को (भित्तिचित्र कला) से सजाया गया है। मस्जिद के फ्रैस्को पर स्थानीय पंजाबी शैली का प्रभाव है। मस्जिद के निकट शाही हम्माम बने हुए हैं।

यह मस्जिद परकोटे में स्थित लाहौर नगर के भीतरी भागों में दक्षिण की तरफ गुजरगाह अथवा शाही रोड पर बनी हुई है। मुगल अमीर एवं दरबारी अधिकारी दुर्ग में स्थित शाही महलों के लिए इसी मार्ग से होकर जाया करते थे। यह दिल्ली गेट से लगभग 260 मीटर की दूरी पर स्थित है। मस्जिद के ठीक सामने वजीर खाँ चौक तथा चिट्टा गेट है। इस मस्जिद में सूफी दरवेश सैयद मुहम्मद ईशाक गुजारनी की मजार भी है जो इस स्थान पर मस्जिद बनने से पहले भी मौजूद थी। ईशाक गुजारनी को ‘मीरन बादशाह’ भी कहा जाता था। इस मस्जिद में कई दुकानें बनी हुई हैं जिन्हें इमला (कैलीग्राफर्स) तथा जिल्दसाज (बुक बाइण्डिर्स) का बाजार कहा जाता था।

मस्जिद को ऊँचे प्लेटफॉर्म पर बनाया गया है तथा इसका निर्माण ईंटों से किया गया है। ईंटों की चिनाई के लिए चूना कंकर पीसकर गारा बनाया गया है। इसका मुख्य द्वार वजीर खाँ चौक में खुलता है। बाहर की ओर से इस मस्जिद की लम्बाई 279 फुट तथा चौड़ाई 159 फुट है। मस्जिद का निर्माण इयामुद्दीन अंसारी नामक शाही हकीम ने करवाया था। उसे वजीर खाँ भी कहा जाता था। उसे शाहजहाँ ने पंजाब का सूबेदार नियुक्त किया था। उसने लाहौर में कई भवन बनवाए। दिल्ली गेट के पास वजीर खाँ की बहुत बड़ी निजी सम्पत्ति थी।

इस मस्जिद के बनने के बाद लोग मरियम जमानी मस्जिद में न जाकर वजीर खाँ मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए आने लगे। ई.1880 के दशक में प्रसिद्ध लेखक रूदियार्ड किपलिंग के पिता लॉकवुड किपलिंग ने ‘जर्नल ऑफ दी इण्डियन आर्ट’ में इस मस्जिद तथा उसकी सजावट के बारे में एक लेख लिखा था। ई.1903 में ब्रिटिश लेखक फ्रेड हेनरी ने लिखा कि यह मस्जिद मरम्मत के अभाव में जर्जर हो गई है।

जहाँगीर का मकबरा, लाहौर

जहाँगीर के काल का अंतिम स्मारक लाहौर के पास रावी नदी के तट पर शहादरा में स्थित जहाँगीर का मकबरा है। इसका नक्शा जहाँगीर ने बनाया था तथा इसका निर्माण उसकी बेगम नूरजहाँ की देखरेख में हुआ था। इस मकबरे का निर्माण भी सिकंदरा स्थित अकबर के मकबरे के नमूने पर हुआ था किंतु यह उससे कम ऊँचा है। इसके ऊपर संगमरमर का एक मण्डप था जिसे बाद में सिक्खों ने उतार दिया था। यह एक मंजिला वर्गाकार भवन है जिसके प्रत्येक कौने पर एक मीनार है। इसके ऊपर के चबूतरे के मध्य भाग में संगमरमर का एक मण्डप बना हुआ है जो केन्द्र में स्थित है तथा दूर से ही आकर्षित करता है। इसे जड़ाऊ संगमरमर, रंगीन टाइलों तथा विभिन्न रंगों के पत्थरों से अलंकृत किया गया है। मकबरे का भीतरी भाग संगमरमर की पच्चीकारी से सुशोभित है। चिकने और रंगीन खपरैल इसकी सुन्दरता को अधिक बढ़ा देते हैं। पर्सी ब्राउन का कथन है कि सारी इमारत प्रभावशाली प्रतीत नहीं होती है।

जहाँगीर के समय  अन्य नगरों में निर्मित भवन

खुसरो, शाह ब्रेगम और निथार बेगम के मकबरे, प्रयागराज

प्रयागराज नगर के पश्चिम छोर पर रेलवे स्टेशन के निकट स्थित खुसरो बाग का निर्माण जहाँगीर ने करवाया था। यह उद्यान 17 बीघा क्षेत्र में फैला हुआ है तथा चारों ओर मोटे परकोटे से घिरा हुआ है। परकोटे में चारों दिशाओं में एक-एक दरवाजा है। जहाँगीर के सबसे बड़े पुत्र खुसरो मिर्जा के नाम पर इसका नाम खुसरो बाग पड़ा। इस बाग में तीन मकबरे हैं। पहला मकबरा शहजादे खुसरो का है तथा दूसरा मकबरा खुसरो की माँ मानबाई का है जो ई.1604 में मृत्यु को प्राप्त हुई थी तथा ई.1606 में यह मकबरा बनकर तैयार हुआ था। मानबाई जहाँगीर की पहली पत्नी थी तथा आम्बेर के राजा भगवानदास की पुत्री और मानसिंह की बहिन थी। इसे शाह बेगम का सम्मान प्राप्त था किंतु इसे जहाँगीर ने शराब के नशे में कोड़ों से पीट-पीट कर मार डाला था। तीसरा मकबरा खुसरो की बहिन सुल्ताना निथार बेगम का है। शाह बेगम और निथार बेगम की कब्रों के ऊपर एक-एक छतरी बनी हुई है।

इस बाग के प्रवेश द्वार, उद्यान और सुल्ताना बेगम के त्रि-स्तरीय मक़बरे की डिज़ाइन आक़ा रज़ा ने तैयार की थी। जहाँगीर से विद्रोह करने के बाद ई.1606 में खुसरो मिर्जा की आंखें फोड़कर उसे इसी बाग में बंदी बनाकर रखा गया था। ई.1622 में खुसरो, उसके छोटे भाई खुर्रम को सौंप दिया गया। खुर्रम ने उसे बुरहानपुर के किले में रखा तथा वहीं पर खुसरो की हत्या करवा दी। इसके बाद खुसरो के शव को प्रयागराज लाया गया तथा खुसरो बाग में उसकी कब्र बनवाकर उस पर मकबरे का निर्माण करवाया गया। खुसरो की कब्र, खुसरो की माँ मानबाई (शाहबेगम) की कब्र के पास बनाई गई। ई.1624-25 में इन दोनों कब्रों के बीच में निथार बेगम की कब्र का निर्माण करवाया गया जो कि जहाँगीर तथा मानबाई की पुत्री थी।

खुसरो बाग बाग मुग़ल वास्तुकला का सुन्दर उदाहरण है। बाग के अन्दर जाने का मुख्य द्वार अत्यंत विशाल है। इसमें बड़ी संख्या में घोड़े की नाल लगी हुई हैं। मान्यता हैं कि किसी घोड़े ने अपने स्वामी की जान बचाई थी इसलिए उसकी मनौती मांगते हैं तथा अपना कार्य पूरा होने पर दरवाजे में घोड़े की नाल लगाते हैं। ई.1857 के सिपाही विद्रोह में क्रांतिकारी सैनिकों ने कुछ समय के लिए इस बाग में शरण ली। खुसरो बाग में अमरूद के कई बगीचे हैं। यहाँ के अमरूदों को विदेशों में निर्यात किया जाता हैं।

शालीमार बाग, काश्मीर

शालीमार बाग जम्मू और कश्मीर राज्य की राजधानी श्रीनगर में स्थित है। इसका निर्माण मुगल बादशाह जहाँगीर ने अपनी प्रिय बेगम मेहरुन्निसा के उपयोग के लिये डल झील के किनारे पर करवाया था। मेहरुन्निसा को जहाँगीर ने नूरजहाँ की उपाधि दी थी। इस बाग में चार स्तर पर उद्यान बने हैं एवं जलधारा बहती है। इसकी जलापूर्ति निकटवर्ती हरिवन बाग से होती है। उच्चतम स्तर का उद्यान हरम की महिलाओं के उपयोग के लिए बना था। यह निचले स्तर से दिखाई नहीं देता है। यह उद्यान ग्रीष्म एवं पतझड़ में सर्वोत्तम स्थिति में होता है। इस ऋतु में पत्तों का रंग बदलता है एवं अनेक फूल खिलते हैं। उद्यान में सुंदर बारादरियां बनी हैं।

नूरमहल सराय, पंजाब

पुराने समय में भारतीय शासकों द्वारा प्रमुख मार्गों पर धर्मशालाएं बनाई जाती थीं जिनमें यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था होती थी। मुस्लिम सुल्तानों एवं बादशाहों ने भी यह परम्परा जारी रखी। ऐसी ही एक सराय लाहौर से दिल्ली जाने के मार्ग पर स्थित जालंधर से 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जिसे नूरमहल सराय कहा जाता है। जब नूरजहाँ का पिता मिर्जा ग्यास मुहम्मद बेग अपने परिवार के साथ ईरान से दिल्ली आ रहा था तब उसका काफिला इस स्थान पर आराम करने के लिए रुका। संभवतः उस समय यहाँ कोई पुरानी सराय रही होगी। इसी स्थान पर ग्यास की बेगम ने नूरजहाँ को जन्म दिया। बाद में जब नूरजहाँ का विवाह जहाँगीर के साथ हुआ तो ई.16018 में नूरजहाँ ने उसी स्थान पर नूरमहल सराय का निर्माण करवाया। दोआब के सूबेदार जकरिया खाँ ने इस सराय का निर्माण अपनी देख-रेख में करवाया।

सराय 551 वर्गफुट क्षेत्र में बनी हुई है। इसके मुख्य भवन को किनारों पर अष्टकोणीय बनाया गया है। इसके पश्चिमी दरवाजे को लाहौर दरवाजा कहा जाता है। यह लाल पत्थर से बना हुआ दो मंजिला भवन है। इसके बाहरी पैनल्स पर कई तरह के पशु-पक्षियों की खुदाई की गई है। सराय के मुख्य द्वार पर पालकी बनी है जिस पर दो हाथी सूंड उठाए स्वागत मुद्रा में बने हैं। हाथियों की लड़ाई तथा घुड़सवारों द्वारा चौगान खेलने के दृश्य भी बनाए गए थे।

मुख्य द्वार पर लगे एक शिलालेख में कहा गया है- ‘अकबर शाह के पुत्र जहाँगीर शाह के शासन-काल में नूरजहाँ बेगम के आदेश से फलोर परगने में इस सराय को बनवाया गया। इस सराय की आधारशिला हिजरी 1028 में नूरजहाँ ने अपने हाथों से रखी थी तथा यह सराय हिजरी 1030 में बनकर पूरी हुई।’

इस सराय में एक रंगमहल, बहुत से कमरे, एक कुआं, एक मस्जिद तथा दो बुर्ज भी बनवाए गए थे जिन्हें आज भी देखा जा सकता है। नूरजहाँ पक्षियों से बहुत प्रेम करती थी। इसलिए सराय में पक्षियों के लिए 48 कोष्ठ बनवाए गए थे। जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-जहाँगीरी’ में भी इस सराय का उल्लेख किया है। वह लिखता है- ‘मैंने नूरसराय में निवास किया। इस स्थान पर नूरजहाँ के वकील ने बहुत उम्दा मकान बनाया है तथा शाही बाग भी लगाया है। अब यह बनकर पूरा हो गया है। इसके पूरा होने के अवसर पर बेगम के अनुरोध पर यहाँ बड़ा जलसा किया गया। इसमें कई तरह के मनोरंजन किए गए, दावत की गई तथा दान दिए गए। नूरजहाँ की प्रसन्नता के लिए मैं दो दिन तक सराय में रहा।’

अब यह भवन जर्जर हालत में है तथा इसके एक हिस्से में स्कूल और पुलिस थाने चल रहे हैं। पंजाबी लोकगीतों में भी नूरमहल को याद किया जाता है। ‘दो तारा वजदा वे रांझणा नूरमहल दे मोरी’ गीत भी इसी तर्ज पर बना। किसी जमाने में यहाँ एक मेला भी लगता था।

हिरन मीनार, शेखूपुरा (पाकिस्तान)

ई.1707 में जहाँगीर ने पंजाब में लौहार से 38 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में शेखुपुरा नामक उपनगर की स्थापना की जो अब पाकिस्तान में है। किसी समय यहाँ जाट जाति के लोग बड़ी संख्या में रहते थे तथा एक पुराना किला भी था जिसे विर्कगढ़ कहते थे। जहाँगीर ने इस उपनगर का नाम जहाँगीरपुर रखा था किंतु जहाँगीर की माँ ‘हीराकंवर’ जहाँगीर को शेखू कहा करती थी। इस कारण इस नगर को शेखूपुरा के नाम से जाना गया। जहाँगीर ने यहाँ स्थित प्राचीन दुर्ग में कई निर्माण करवाए तथा अपने एक प्रिय हिरन ‘मनसिराज’ की स्मृति में ‘हिरन मीनार’ का निर्माण करवाया।

दौलत बाग, अजमेर

जहाँगीर ने 18 नवम्बर 1613 से 10 नवम्बर 1616 तक अजमेर में प्रवास किया। इस दौरान उसने आनासागर झील के किनारे पर दौलत बाग बनवाया जिसमें संगमरमर की बारादरियां एवं मेहराबयुक्त दरवाजे बनवाए। जहाँगीर ने दौलत बाग से कैसर बाग जाने वाले मार्ग पर कुछ महल बनवाये जिनके कुछ खण्डहर आज भी देखे जा सकते हैं। जहाँगीर ने यहां पर कुछ बारादरियां भी बनवाईं जिनमें से कुछ को आज भी देखा जा सकता है। दौलतबाग की तरफ आनासागर झील की सुंदर रेलिंग भी संभवतः जहाँगीर द्वारा बनवाई गई थी। यह बहुत सुंदर है तथा इसमें बीच-बीच में झील में उतरने के लिए सीढ़ियां भी बनाई गई हैं। झील के तट पर बने ऊंचे चबूतरे पर जहाँगीर द्वारा कुछ खूबसूरत मेहराबदार दरवाजे बनाए गए थे। ये दरवाजे भी संगमरमर से बने हैं। चूंकि ये दरवाजे किसी भवन पर नहीं लगे थे इसलिए जनसाधारण में इन्हें खामखा (व्यर्थ) के दरवाजे कहा जाता था। अंग्रेजों ने इस बाग में बनी बारादरियों को तोड़कर उनके पत्थर को मैगजीन के कुछ भवनों में काम में लिया था।

चश्मा-ए-नूर, अजमेर

तारागढ़ की पश्चिमी घाटी में उसने सुन्दर और विशाल महल का निर्माण करवाया जो ई.1615 में बनकर तैयार हुआ। अजमेर से चार मील दक्षिण में तारागढ़ की पहाड़ियाँ एक तंग घाटी में बदल जाती हैं, इसे नूर चश्मा कहते हैं। इसी तंग घाटी में जहाँगीर के महल के खण्डहर खड़े हैं। यहाँ से एक मार्ग इंदरकोट की घाटी होता हुआ अजमेर नगर की ओर जाता था। इस प्राकृतिक झरने का नाम जहाँगीर ने नूरचश्मा रखा था। जहाँगीर ने यहाँ अपने लिये शिकारगाह बनवाया।

जहाँगीर ने अपनी पुस्तक तुजुक ए जहाँगीरी में इस स्थान का वर्णन करते हुए लिखा है- ‘इस स्थान का पानी, अजमेर में अन्य किसी भी स्थान पर पाये जाने वाले पानी से अधिक मीठा है। मेरे आदेश से इस स्थान पर एक वर्ष की अवधि में एक भवन तैयार किया गया, उसके जैसा दूसरा भवन अन्यत्र कहीं नहीं था। इस महल के निकट एक विशाल टांका बनाया गया जिसमें पानी की आपूर्ति एक फव्वारे के माध्यम से की जाती थी। इस फव्वारे का पानी 12 गज ऊँचा उठता था। टांके का आकार 40 गज गुणा 40 गज था। टांके के किनारे सुंदर दालान बनाया गया था। इसके ऊपर जहाँ झील और झरना थे, रहने और सोने के लिये स्थान बनाये गये जो अत्यंत आनंद देने वाले थे। इनमें से कुछ कक्षों में कुशल चित्रकारों द्वारा अद्भुत चित्र बनाये गये थे। मैंने इस स्थान का नाम चश्मा ए नूर रखा। इस स्थान में कमी यह है कि यह न तो अजमेर नगर के भीतर है और न ही सड़क पर स्थित है। मैं केवल बृहस्पतिवार और शुक्रवार को इस स्थान पर रहने के लिये जाता हूँ। मेरे आग्रह पर सादी गिलानी ज़रगाबाशी ने एक ऐसी कविता बनाई जिसके शब्दों का गणितीय मूल्य, इसके निर्माण की तिथि (हिज्री 1024) को दर्शाता है। उसने बड़ी चतुराई से एक कविता की रचना की जिसकी अंतिम पंक्ति में इस महल का नामकरण किया गया है- महल शाह नूर-उद-दिन जहाँगीर। मैंने इस पंक्ति को एक पत्थर पर उत्कीर्ण करके उसे इस निचले भवन की मेहराब पर लगाने के आदेश दिये।’ यह पंक्ति आज भी इस मेहराब पर लगे पत्थर पर देखी जा सकती है।

पूरी कविता का अनुवाद इस प्रकार से था- ‘वह बहुत सौभाग्यशाली है। वह सात भूमियों का बादशाह है। उसके सद्गुणों को भाग्य के लेखे में नहीं रखा जा सकता। वह बादशाह अकबर के परिवार का प्रकाश है। वह आज के समय का बादशाह जहाँगीर है। जब वह इस झरने पर आया तो उसकी कृपा से इस झरने का जल प्रवाहित हो उठा तथा यहाँ की रेत जीवन दायिनी अक्सीर (पारस) बन गई। बादशाह ने इसे चश्मा ए नूर नाम दिया। जिसका अर्थ होता है जीवन का जल, जो इसके वास्तविक सद्गुण के अनुरूप है। बहादुर बादशाह के शासन के दसवें वर्ष में, बादशाह के आदेश से, चश्मा ए नूर के पास यह भवन बनाया गया है। यह सकल विश्व का आभूषण बन गया है। इसके निर्माण से पूर्व ऐसा ही विचार किया गया था। खिराद (कवि का नाम) ने इसके निर्माण की तिथि का लेखन इन शब्दों में किया है- महल शाह नूर-उद-दीन जहाँगीर।’

सर टॉमस रो ने ई.1616 में अपनी पुस्तक में इस स्थान का उल्लेख इन शब्दों में किया है- ‘1 मार्च 1616 को मैं अजमेर से दो मील दूर बादशाह के एक आनंददायी भवन देखने गया जो कि बादशाह के साले आसफ खाँ ने बादशाह को दिया था। इसकी शक्तिशाली चट्टानें इस स्थान की, सूर्य की किरणों से इसे, ऐसी सुरक्षा देती थीं कि मार्ग में कुछ भी दिखाई नहीं देता था। इसका आधार भाग तथा कुछ कक्ष चट्टानों को काटकर बनाये गये थे तथा शेष भवन का निर्माण स्वतंत्र प्रस्तरों से किया गया था। एक छोटा सुंदर उद्यान जिसमें पाँच फव्वारे लगे हुए थे, दो विशाल टांके बने हुए थे, ये एक दूसरे से 31 सीढ़ियां ऊपर थे। इसका मार्ग अलंघ्य है किंतु इसके सामने एक-दो मार्ग हैं जो सीधे चढ़ाईदार एवं चट्टानी हैं। यह विषादपूर्ण प्रसन्नता देने वाला सुरक्षित स्थान है। इस स्थान तक आने वाले मार्ग पर जंगली मोर, कछुए, मुर्गे तथा झूलते हुए बंदर देखने को मिलते हैं।’

ब्रिटिश काल में इस स्थान को ‘हैप्पी वैली’ नाम दिया गया। इस उद्यान तथा फव्वारों को लुप्त हुए सौ साल से भी अधिक समय हो चुका है। दो टांकों में से अब केवल एक ही बचा है। लाल पत्थर से निर्मित दालान अब भी हैं जिन पर ऊपर जाने के लिये सीढ़ियां बनी हुई हैं। दालानों के भीतर मार्बल प्लास्टरिंग की गई है जो स्थान-स्थान पर खराब हो चुकी है। दक्षिण की तरफ का दालान कुछ ठीक अवस्था में है। इसी दालान में बैठकर जहाँगीर और नूरजहाँ फव्वारों एवं पुष्पावलियों को देखने का आनंद लेते थे।

शाहपीर का मकबरा, मेरठ

मेरठ नगर में इंदिरा चौक के निकट नूरजहाँ द्वारा ई.1620 में बनवाया गया शाहपीर रहैमतुल्लाह का मकबरा स्थित है। इस मकबरे पर छत नहीं है। शाहपीर के वंशज ईरान के ‘शिराज’ शहर से भारत आए थे। नूरजहाँ शाहपीर को अपना अध्यात्मिक गुरु मानती थी।

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

21,585FansLike
2,651FollowersFollow
0SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

Latest Articles

// disable viewing page source