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महाराजा अजीतसिंह

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महाराजा अजीतसिंह

महाराजा अजीतसिंह ने जोधपुर दुर्ग को गंगाजल से धुलवाया!

ईस्वी 1678 में महाराजा जसवंतसिंह का निधन हो जाने के बाद औरंगजेब ने मारवाड़ राज्य खालसा कर लिया था तथा शिशु महाराजा अजीतसिंह की सुन्नत करके उसे मुसलमान बनाने का षड़यंत्र रचा था किंतु वह षड़यंत्र विफल हो गया था। जब ईस्वी 1707 में महाराजा अजीतसिंह ने फिर से जोधपुर दुर्ग पर अधिकार किया तो दुर्ग को गंगाजल से धुलवाकर पवित्र करवाया।

औरंगजेब ने शिशु राजकुमार अजीतसिंह को मुसलमान बनाने के लिए बहुत षड़यंत्र रचे थे किंतु राजपूत सरदार अपने स्वामी को औरंगजेब की दाढ़ में से निकाल लाए थे। राजपूतों ने राजकुमार अजीतसिंह को कुछ दिनों तक सिरोही राज्य के कालंद्री गांव में छिपाकर रखा किंतु बाद में महाराणा राजसिंह के संरक्षण में मेवाड़ में ले जाकर रखा।

शिशु अजीतसिंह के दिल्ली से निकल जाने पर पर औरंगजेब ने एक बालक को पकड़कर उसे अजीतसिंह घोषित किया तथा उसका खतना करके उसे अपने हरम के साथ पालने-पोसने की व्यवस्था की। उस बालक का नाम मुहम्मदी राज रखा गया। जब ई.1682 में औरंगजेब दक्खिन के मोर्चे पर गया तो वह मुहम्मदी राज को भी अपने साथ दक्षिण के मोर्चे पर ले गया किंतु वहाँ प्लेग फैल जाने के कारण बालक मुहम्मदीराज की मृत्यु हो गई।

इधर शिशु अजीतसिंह महाराणा राजसिंह के संरक्षण में पलकर बड़ा हो गया। ई.1687 में जब अजीतसिंह आठ साल का हुआ तो वीर मुकुंद दास खींची ने मारवाड़ के सरदारों के आग्रह पर बालक अजीतसिंह को मारवाड़ के समस्त सरदारों के समक्ष प्रकट कर दिया। उस समय वीर दुर्गादास दक्षिण के मोर्चे पर था।

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सबसे पहले बूंदी के राजा दुर्जनसिंह हाड़ा को अवसर दिया गया कि वह महाराजा अजीतसिंह से मिलकर उन्हें उपहार भेंट करे। उसी अवसर पर अजीतसिंह का राज्यतिलक करके उसे मारवाड़ का राजा घोषित कर दिया गया।

अधर जब शहजादा अकबर दक्खिन भारत छोड़कर ईरान चला गया तो वीर दुर्गादास भी दक्षिण का मोर्चा छोड़कर महाराजा अजीतसिंह के पास आ आया। कुछ समय पश्चात् वीर दुर्गादास तथा दुर्जनशाल हाड़ा ने मिलकर मुगल राज्य पर चढ़ाई की तथा रोहन, रोहतक एवं रेवाड़ी को लूट लिया। राजपूतों के चढ़ आने का समाचार सुनकर दिल्ली में हड़कम्प मच गया तथा चालीस हजार सैनिक इनका मार्ग रोकने के लिए भेजे गए। इस पर दुर्गादास और दुर्जनशाल अपनी सेना को लेकर वापस मारवाड़ आ गए।

जब औरंगजेब को यह ज्ञात हुआ कि राजकुमार अजीतसिंह प्रकट हो गया है तो उसने जोधपुर एवं अजमेर के सूबेदारों को आज्ञा दी कि वे अजीतसिंह को पकड़ लें किंतु मुगल अधिकारियों को इस कार्य में कभी भी सफलता नहीं मिल सकी।

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इसके बाद वीर दुर्गादास तथा उसके साथी औरंगजेब की सेनाओं से संघर्ष करते रहे और औरंगजेब से मांग करते रहे कि वह बालक अजीतसिंह को मारवाड़ का राजा स्वीकार कर ले किंतु औरंगजेब यही जवाब देता रहा कि जिसे राजपूत अजीतसिंह बता रहे हैं, वह अजीतसिंह नहीं है क्योंकि उसकी तो मृत्यु हो गई है। अंत में जब ई.1686 में शहजादा अकबर अपने परिवार को वीर दुर्गादास के संरक्षण में छोड़कर ईरान भाग गया तो ई.1695 में औरंगजेब को राजपूतों से संधि करनी पड़ी।

औरंगजेब ने दुर्गादास को तीन हजारी जात और एक हजार सवारों का मनसब दिया जबकि महाराजा अजीतसिंह को डेढ़ हजारी जात तथा पांच सौ सवार का मनसब दिया। इसके साथ ही दुर्गादास तथा अजीतसिंह को मारवाड़ राज्य के कुछ परगनों की जागीरी भी दी गई। हालांकि यह प्रस्ताव राजकुमार अजीतसिंह के लिए अपमानजनक था किंतु दुर्गादास तथा अजीतसिंह दोनों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया क्योंकि इस प्रस्ताव के माध्यम से औरंगजेब ने पहली बार अजीतसिंह को उसके पैतृक राज्य के कुछ हिस्से लौटाना स्वीकार कर लिया था।

अजीतसिंह पूरे मारवाड़ राज्य का स्वामी था किंतु औरंगजेब ने उसे अपने ही राज्य में एक छोटा सा जागीरदार बनाने की साजिश की थी। इसलिए अजीतसिंह ने मनसब और जागीर तो स्वीकार कर ली किंतु उसने मारवाड़ में स्थित शाही थानों को लूटना जारी रखा।

जदुनाथ सरकार ने हिस्ट्री ऑफ औरंगजेब में लिखा है कि औरंगजेब ने महाराजा अजीतसिंह को कई बार संदेश भिजवाए कि वह बादशाह के दरबार में उपस्थित होकर अपना राज्य प्राप्त कर ले, यहाँ तक कि औरंगजेब ने महाराजा अजीतसिंह को सात हजारी मनसब देने का भी आश्वासन दिया तथा इस फरमान पर अपने पंजे का निशान भी लगाया किंतु अजीतसिंह जानता था कि औरंगजेब पर विश्वास नहीं किया जा सकता इसलिए वह कभी भी औरंगजेब के दरबार में उपस्थित नहीं हुआ।

औरंगजेब की मृत्यु 3 मार्च 1707 को हुई थी। यह सुनते ही 12 मार्च 1707 को महाराजा अजीतसिंह ने जोधपुर पर आक्रमण किया। उस समय जफरकुली जोधपुर के दुर्ग का किलेदार था। उसने महाराजा अजीतसिंह से युद्ध किया किंतु अंत में दुर्ग खाली करके भाग गया।

अजितोदय नामक ग्रंथ में महाराजा अजीतसिंह का विश्वसनीय इतिहास लिखा गया है। इसके अनुसार महाराजा ने अपने पूर्वजों की राजधानी पर अधिकार कर लिया तथा अपने पूर्वज राव जोधा द्वारा बनवाए गए मेहरानगढ़ दुर्ग को गंगाजल एवं तुलसीदल से पवित्र करवाया गया। उसने स्वयं को स्वतंत्र रूप से जोधपुर का राजा घोषित कर दिया।

मारवाड़ राज्य का इतिहास लिखने वाले पण्डित विश्वेश्वर नाथ रेउ ने लिखा है कि विगत 28 वर्षों से जोधपुर पर मुसलमानों का अधिकार था, उन्होंने जोधपुर नगर में स्थित सैंकड़ों प्राचीन मंदिरों को तुड़वाकर उनके स्थान पर मस्जिदें बनवा दी थीं। जब महाराजा अजीतसिंह ने जोधपुर में प्रवेश किया, तब पूरे शहर में मस्जिदों से आने वाली अजान की आवाजें सुनाई देती थीं। महाराजा अजीतसिंह ने इन मस्जिदों को तुड़वा कर फिर से मंदिर बनवा दिए और शहर में घण्टे एवं शंखनाद सुनाई पड़ने लगे।

अजितोदय एवं अन्य ख्यातों में लिखा है कि अजीतसिंह द्वारा शहर में रह रहे काजियों एवं अन्य मुसलमानों के विरुद्ध भी कार्यवाही की गई जिससे बहुत से मुसलमान शहर छोड़कर भाग गए और बहुत से मुसलमानों ने दाढ़ी कटवाकर अपना वेश बदल लिया!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शाहे बेखबर

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शाहे बेखबर

बादशाह शाहआलम (प्रथम) को बहादुरशाह (प्रथम) तथा शाहे बेखबर भी कहा जाता है। बादशाह शाहआलम (प्रथम) को बहादुरशाह (प्रथम) तथा शाहे बेखबर भी कहा जाता है। उसके बाप-दादे सुन्नी मुसलमान थे किंतु शाहे बेखबर अपने बाप औरंगजेब से इतनी घृणा करता था कि शाहे बेखबर ने स्वयं को शिया घोषित कर दिया। इस कारण शाहे बेखबर का दरबार शिया और सुन्नी में बंट गया!

औरंगजेब के पुत्र मुअज्जमशाह ने जजाऊ के युद्ध में अपने भाई आजमशाह तथा उसके तीनों पुत्रों को मारकर दिल्ली एवं आगरा पर पूरी तरह अधिकार कर लिया। हालांकि औरंगजेब के तीसरे पुत्र कामबख्श ने भी स्वयं को बीजापुर में बादशाह घोषित कर दिया था किंतु जब जजाऊ के युद्ध में मुअज्जम और आजम तलवार के जोर पर अपने भाग्यों का फैसला कर रहे थे, तब कामबख्श बीजापुर में चुपचाप बैठा रहा।

जजाऊ युद्ध की विजय के बाद मुअज्जम शाह ने स्वयं को बहादुरशाह के नाम से मुगलों का बादशाह घोषित कर दिया। इस अवसर पर उसने अपने समर्थकों को नई पदवियाँ तथा ऊंचे दर्जे प्रदान किए। उसने लाहौर के नायब सूबेदार मुनीम ख़ाँ को अपना वज़ीर नियुक्त किया जिसने हर मुश्किल समय में बहादुरशाह का साथ दिया था और जजाऊ की जीत का सेहरा उसी की सेवाओं के कारण बहादुरशाह के सिर पर सज सका था।

मरहूम बादशाह औरंगज़ेब के वज़ीर असद ख़ाँ तथा उसके बेटे ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ ने जजाऊ के मैदान में शहजादे आजमशाह का साथ दिया था किंतु मुअज्जमशाह ने उन दोनों को क्षमा कर दिया तथा उनके द्वारा औरंगजेब के समय सल्तनत को दी गई सेवाओं को स्मरण ररखते हुए पुरस्कृत किया।

बादशाह ने असद खाँ को वकील-ए-मुतलक़ तथा उसके बेटे ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ को मीर बख्शी नियुक्त किया। इतने महत्वपूर्ण पदों पर अपने शत्रु पक्ष के अमीरों की नियुक्तियों को बहादुरशाह की दूरदृष्टि एवं उदारता के उदाहरण के रूप में देखा जाना चाहिए।

बहादुरशाह ने अपनी ताजपोशी के समय स्वयं को शिया मुसलमान घोषित कर दिया था। मुगलिया सल्तनत के हिसाब से यह एक आश्चर्यजनक बात थी क्योंकि उससे पहले कोई भी मुगल शासक शिया नहीं था। फिर भी भारत के मुगल बादशाह इस मामले में उदार थे और वे शिया शहजादियों से विवाह करते आए थे तथा शिया योद्धाओं को निःसंकोच अपना मंत्री एवं सेनापति बनाते रहे थे।

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औरंगजेब का चरित्र इस मामले में बड़ा विचित्र था। औरंगजेब की प्रमुख बेगम दिलरास बानो ईरान के शाही वंश की शहजादी थी जो कि शिया मत का अनुयाई था। औरंगजेब का प्रमुख वजीर असद खाँ भी शिया था किंतु औरंगजेब ने न केवल असद खाँ को अपना सबसे विश्वसनीय वजीर बना रखा था अपितु उसके पुत्र जुल्फिकार खाँ को भी शासन में महत्वपूर्ण पद दे रखा था। जबकि दूसरी ओर औरंगजेब शियाओं से इतनी घृणा करता था कि उन्हें कुफ्र मानता था। यहाँ तक कि वह दक्षिण के मुस्लिम राज्यों को केवल इसीलिए नष्ट कर देना चाहता था क्योंकि वे सुन्नी नहीं थे, शिया थे।

मुअज्जमशाह ने बादशाह बनते समय शिया मत क्यों ग्रहण किया, इस सम्बन्ध में ऐतिहासिक विवरण प्राप्त नहीं होता है किंतु कुछ ऐतिहासिक तथ्यों पर ध्यान दिए जाने से इस विषय पर तस्वीर कुछ स्पष्ट होने लगती है। मुअज्जमशाह की माँ नवाब बाई एक हिन्दू स्त्री थी, वह औरंगजेब की दूसरी बेगम थी।

उसकी कोख से औरंगजेब के सबसे बड़े पुत्र सुल्तान मुहम्मद तथा दूसरे नम्बर के पुत्र मुअज्जमशाह का जन्म हुआ था किंतु जब सुल्तान मुहम्मद ने शाहजहाँ के समय हुए उत्तराधिकार के युद्ध में अपने पिता औरंगजेब की बजाय अपने श्वसुर शाहशुजा का साथ दिया था तब से औरंगजेब और नवाबबाई के सम्बन्ध खराब हो गए थे।

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नवाब बाई की इच्छा के विरुद्ध औरंगजेब ने शहजादे सुल्तान मुहम्मद को जीवन भर जेल में डाले रखा था। जब ई.1682 में नवाब बाई के दूसरे पुत्र मुअज्जमशाह ने औरंगजेब से पहली बार विद्रोह किया तो औरंगजेब नवाब बाई से बुरी तरह नाराज हो गया। उसने नवाब बाई के माध्यम से ही मुअज्जमशाह को विद्रोह करने से रोका था और औरंगजेब ने मुअज्जमशाह को जेल में नहीं डाला था।

जब मुअज्जमशाह ने ई.1687 में दूसरी बार औरंगजेब से विद्रोह किया था तो औरंगजेब ने सात साल के लिए मुअज्जमशाह को जेल में डाल दिया तथा उसके बाद उसे लाहौर एवं काबुल का सूबेदार बनाकर स्वयं से लगभग दो हजार किलोमीटर दूर नियुक्त कर दिया। संभवतः यही कारण था कि मुअज्जम को अपने पिता से इतनी घृणा हो गई कि उसने अपने पिता का सुन्नी मत छोड़कर शिया मत अपना लिया था। संभवतः असद खाँ और जुल्फिकार खाँ को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देने का कारण भी यही रहा होगा कि वे शिया थे।

जब कोई शहजादा या व्यक्ति बादशाह बनता था तो उसके नाम का खुतबा पढ़ा जाता था। प्रत्येक शुक्रवार को सल्तनत की समस्त मस्जिदों में बादशाह के नाम के खुतबे को दोहराया जाता था। मुगल बादशाहों के खुतबे में उन्हें वली कहा जाता था किंतु मुअज्जमशाह अर्थात् बहादुरशाह ने अपने नाम का जो खुतबा पढ़वाया उसमें स्वयं को वली के स्थान पर अली घोषित किया।

इस खुतबे पर सुन्नी मुल्ला-मौलवियों ने बहुत ऐतराज किया किंतु बहादुरशाह ने उनकी एक न सुनी। लाहौर में तो कुछ इमामों ने बादशाह के खिलाफ सेना भी तैयार की किंतु वह कोई कार्यवाही नहीं कर सकी।

भारत के मुगल बादशाहों के दरबार में परम्परागत रूप से सुन्नी अमीरों का बोलबाला था किंतु बहादुशाह के दरबार में शियाओं को प्राथमिकता मिलने लगी इससे दरबारी अमीरों में गुटबंदी तेज हो गई और वे एक दूसरे के विरुद्ध षड्यन्त्र करने लगे। समस्त दरबारी दो दलों में बंट गए जिन्हें ईरानी और तूरानी दल कहा जाता था। ईरानी दल शिया मत को मानने वालों का था जिसमें असद ख़ाँ तथा उसके बेटे जुल्फिकार ख़ाँ जैसे प्रबल अमीर थे। जबकि तूरानी दल सुन्नी मतावलम्बियों का था जिसमें चिनकुलिच ख़ाँ तथा फ़िरोज़ ग़ाज़ीउद्दीन जंग जैसे प्रबल अमीर थे।

बहादुरशाह मुगलों की गद्दी पर बैठने वाला सबसे वृद्ध शासक था। उसका पूर्वज बाबर 11 वर्ष की आयु में, हुमायूँ 22 वर्ष की आयु में, अकबर 14 वर्ष की आयु में, जहांगीर 36 वर्ष की आयु में, शाहजहाँ 36 वर्ष की आयु में तथा औरंगजेब 39 वर्ष की आयु में बादशाह बने थे।

जब बहादुरशाह बना तो उस समय उसकी उम्र 63 वर्ष से अधिक थी। अपने पूर्ववर्ती समस्त मुगल बादशाहों की अपेक्षा वह अत्यन्त उदार था जबकि मुस्लिम इतिहासकारों ने उस पर आलसी तथा उदासीन होने का आरोप लगाया है।

मुगल कालीन इतिहासकार ख़फ़ी ख़ाँ ने लिखा है कि, बादशाह राजकीय कार्यों में इतना अधिक लापरवाह था, कि लोग उसे ‘शाहे-बेख़बर’ कहने लगे थे किंतु इतिहासकारों का यह आरोप सही नहीं लगता है। उसके शासनकाल में सिक्खों ने बंदा बहादुर के नेतृत्व में, राजपूतों ने दुर्गादास के नेतृत्व में तथा मुसलमानों ने कामबख्श के नेतृत्व में विद्रोह किए किंतु उन सभी विद्रोहों को सफलता पूर्वक दबा दिया गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शहजादा कामबक्श

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शहजादा कामबक्श

जिस समय बहादुरशाह और उसका छोटा भाई आजमशाह जजाऊ के मैदान में अपने भाग्य का निर्णय कर रहे थे, उस समय उस समय औरंगजेब का सबसे छोटा शहजादा कामबक्श दक्खिन में शांत बैठा रहा।

0 दिसम्बर 1708 को शाहआलम (प्रथम) उर्फ बहादुरशाह (प्रथम) ने हैदराबाद के लिए सैनिक अभियान आरम्भ किया। उसके पास तीन सौ ऊंट और 20 हजार घुड़सवार थे। उसने अपने पुत्र जहांदारशाह के नेतृत्व में सेना की एक टुकड़ी को अग्रिम टुकड़ी के रूप में आगे बढ़ाया।

12 जनवरी 1709 को बहादुरशाह स्वयं भी हैदराबाद पहुंच गया। एक नजूमी ने घोषणा की कि बहादुरशाह इस युद्ध में आश्चर्यजनक रूप से विजय प्राप्त करेगा।

तत्कालीन इतिहासकार विलियम इरविन ने लिखा है-

‘जैसे-जैसे बहादुरशाह की सेना हैदराबाद की तरफ बढ़ती रही, वैसे-वैसे शहजादा कामबक्श के सिपाही कामबख्श का साथ छोड़कर बहादुरशाह की शरण में आते गए। अंत में कामबख्श के पास केवल 2500 घुड़सवार एवं 5000 पैदल सिपाही रह गए।

जब शहजादा कामबक्श ने अपने सेनापति से पूछा कि सिपाही हमारी फौज छोड़कर क्यों भाग रहे हैं तो सेनापति ने जवाब दिया कि हमारी सेनाओं को कुछ महीनों से वेतन नहीं दिया गया है, इस कारण वे हमें छोड़कर बहादुरशाह की तरफ जा रहे हैं।

इस पर कामबख्श ने जवाब दिया कि मैंने अपनी तरफ से सबका भला किया है तथा अल्लाह पर मेरा पूरा विश्वास है। जो कुछ भी सर्वश्रेष्ठ होगा, वही घटित होगा।’

उधर शहजादा कामबक्श अपने सैनिकों की संख्या घटने से चिंतित था और इधर बहादुरशाह को लगने लगा था कि अब कामबख्श भारत छोड़कर ईरान भाग जाएगा। इसलिए बहादुशाह ने अपने सेनापति जुल्फिकार खाँ नुसरत जंग को आदेश दिया कि वह मद्रास प्रेसीडेंसी के गवर्नर थॉमस पिट्ट से समझौता करे कि कि यदि अंग्रेज कामबख्श को पकड़कर हमें सौंप देंगे तो उन्हें दो लाख रुपए दिए जाएंगे।

13 जनवरी 1709 को बहादुरशाह की सेना ने कामबख्श पर आक्रमण किया। बहादुरशाह ने अपने 20 हजार सिपाहियों को दो भागों में विभक्त किया। इनमें से एक भाग का नेतृत्व मुनीम खाँ कर रहा था जिसकी सहायता के लिय बहादुरशाह के दो शहजादे रफीउश्शान तथा जहानशाह को नियुक्त किया गया।

सेना के दूसरे भाग का नेतृत्व जुल्फिकार खाँ नुसरत जंग कर रहा था। इन दोनों सेनाओं ने मिलकर कामबख्श के शिविर को चारों तरफ से घेर लिया तथा जुल्फिकार खाँ ने बड़ी बेसब्री से एक छोटी टुकड़ी को साथ लेकर कामबख्श के शिविर पर हमला बोला।

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इस युद्ध में कामबख्श बुरी तहर से घायल हो गया तथा उसके शरीर से रक्त बह जाने के कारण वह बेहोश हो गया। जब यह सूचना बहादुरशाह को दी गई तो बहादुरशाह ने अपने सिपाहियों को आदेश दिए कि वह कामबक्श तथा उसके पुत्र बरीकुल्लाह को बंदी बनाकर ले आएं।

बुरी तरह घायल शहजादा कामबक्श को एक पालकी में डालकर बहादुरशाह के शिविर में लाया गया। बादहशाह ने अपने भाई के घावों को अपने रूमाल से साफ किया तथा उन पर मरहम-पट्टी करवाई किंतु कामबख्श के शरीर से इतना रक्त बह चुका था कि अगली सुबह होने से पहले ही उसका निधन हो गया।

इस प्रकार औरंगजेब के पांच पुत्रों में से अब धरती पर केवल एक ही पुत्र जीवित बचा था तथा वह औरंगजेब द्वारा छोड़ी गई विशाल मुगल सल्तनत का अकेला स्वामी था। कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि बहादुरशाह बहुत उदार शासक था किंतु बहादुरशाह ने केवल पौने पांच साल शासन किया एवं इस दौरान वह अपने शत्रुओं से घिरा रहा। उसे शासन की नीति में परिवर्तन करने का कोई अवसर ही नहीं मिला। इसलिए उसके शासन काल में वही सब नीतियां चलती रहीं जो औरंगजेब के शासन काल में चलती थीं।

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हिन्दुओं से जजिया और तीर्थकर अब भी उसी तरह लिए जाते थे। हिन्दू किसानों से मुस्लिम किसानों की अपेक्षा दो-गुना लगान अब भी लिया जाता था। शासन में हिन्दू कर्मचारियों को रखने पर अब भी रोक यथावत् थी। बहादुरशाह ने अपने भाइयों के प्रति भी वही नीति अपनाई थी जो उसके पिता औरंगजेब ने अपनाई थी। अर्थात् भाइयों को युद्धों में मारकर पूरी मुगलिया सल्तनत पर अधिकार कर लिया। औरंगजेब और बहादुरशाह के शासन में यदि कोई अंतर आया था तो वह केवल इतना था कि अब बादशाह तथा उसकी सरकार शियाओं के प्रति उदार हो गए थे। बादशाह के वजीर पहले की तुलना में ज्यादा ताकतवर हो गए थे तथा बादशाह के पास इतने शहजादे नहीं थे जिन्हें वह एक-एक करके जेल में बंद कर सके!

औरंगजेब ने राजपूत शासकों को ताकत के बल पर अपने अधीन रखा था, बहादुरशाह ने भी वही नीति जारी रखी किंतु अब मुगल शक्ति सिक्खों, जाटों एवं मराठों की टक्करों से कमजोर हो चुकी थी और राजपूत शक्ति मुगलों से विमुख हो चुकी थी इसलिए अब राजपूतों को ताकत के बल पर अधीन नहीं रखा जा सकता था।

बहादुरशाह के समय में सिक्खों के प्रति नीति में भी कोई परिवर्तन नहीं आया किंतु सिक्खों के गुरु गोविंदसिंह ने उत्तराधिकार के युद्ध के समय बहादुरशाह का साथ दिया था, इसलिए कुछ समय के लिए सिक्खों से युद्ध रुक गया। लगभग डेढ़ साल बाद बंदा बैरागी के नेतृत्व में सिक्खों ने फिर से युद्ध छेड़ दिया जिसे बहादुरशाह दबा नहीं सका।

गुरु गोविंदसिंह की तरह बूंदी के राजा बुद्धसिंह हाड़ा ने उत्तराधिकार के युद्ध में बहादुरशाह का साथ दिया था, इसलिए बूंदी के राजा को मुगल दरबार में बहुत महत्व मिलने लगा और उसे अनुमति दी गई कि वह अपने पड़ौसी कोटा राज्य पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर ले।

आम्बेर के राजकुमार विजयसिंह ने भी उत्तराधिकार के युद्ध में बहादुरशाह का साथ दिया था जिसे चीमाजी भी कहा जाता था। बहादुरशाह ने विजयसिंह को पुरस्कृत करने का निर्णय लिया।

बहादुरशाह ने शहजादा कामबक्श को पराजित करने के बाद जुल्फिकार खाँ को दक्खिन का सूबेदार बना दिया जो कि पहले से ही बक्शी के पद पर नियुक्त था। बाबर से लेकर औरंगजेब तक किसी भी बादशाह ने कभी भी इतने बड़े दो पद किसी एक व्यक्ति को नहीं दिए थे।

बहादुरशाह की इस गलती का परिणाम यह हुआ कि आगे चलकर दक्खिन का सूबेदार इतना ताकतवर हो गया कि उसने दिल्ली से पृथक् सल्तनत खड़ी कर ली। चूंकि जुल्फिकार खाँ ईरानी था इसलिए बादशाह के दरबार में ताकतवर बनता जा रहा तूरानी गुट बादशाह से असंतुष्ट हो गया।

बहादुरशाह ने दरबार में अपना प्रभाव कायम रखने के लिए अपने धाय भाई कोकलताश की शक्तियों में वृद्धि की। कोकलताश ने बहुत से दरबारियों को अपनी तरफ करके एक अलग गुट खड़ा कर लिया जिसने इस दिशा में कार्य करना आरम्भ कर दिया कि बादशाह की शक्ति बादशाह के हाथों में रहे।

इस कारण दूसरे तूरानी अमीरों में कोकलताश के प्रति ईर्ष्या उत्पन्न हो गई और दरबार में गुटबंदी बढ़ गई। इस प्रकार दरबारी कई गुटों में बंट गए जिन्होंने आगे चलकर मुगलिया सल्तनत की जड़ ही खोद डाली।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सवाई जयसिंह से दुश्मनी

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सवाई जयसिंह से दुश्मनी

जब औरंगजेब मर गया और उसके पुत्रों में सल्तनत पर अधिकार को लेकर युद्ध हुआ तो आम्बेर नरेश सवाई जयसिंह ने औरंगजेब के पुत्र आजमशाह का साथ दिया। इस कारण नए बादशाह आलमशाह उर्फ बहादुरशाह ने सवाई जयसिंह से दुश्मनी बांध ली। इस कारण कच्छवाहों, राठौड़ों और सिसोदियों ने लाल किले के विरुद्ध संघ बना लिया!

दिसम्बर 1608 में बहादुरशाह ने अपने छोटे भाई कामबख्श को समाप्त करने के लिए हैदराबाद पर अभियान किया था। जिस समय वह दिल्ली से हैदराबाद जा रहा था, तब वह मार्ग में कच्छवाहों की राजधानी आम्बेर में रुका। आम्बेर रियासत के सम्बन्ध में वह मन ही मन बड़ा निर्णय करके आया था जिसे अब वह कार्यान्वित करना चाहता था। इस घटना पर चर्चा करने से पहले मुगलों और कच्छवाहों की दोस्ती का संक्षिप्त इतिहास जानना आवश्यक है।

आम्बेर नरेश भारमल ने 6 फरवरी 1562 को बहादुरशाह के बाबा के बाबा शहंशाह अकबर से अपनी पुत्री हीराकंवर का विवाह करके मुगलों और कच्छवाहों की मैत्री की शुरुआत की थी। तब से लेकर बहादुरशाह के बादशाह बनने तक राजा भारमल की सात पीढ़ियां मुगल बादशाहों की सेवा करती आई थीं।

भारत के मुगलों की जमीनी सच्चाई यह थी कि उनकी सल्तनत का विस्तार आम्बेर के कच्छवाहों के कंधों पर बैठ कर ही किया गया था। ई.1658 में जब औरंगजेब बादशाह हुआ तो उसमें भी आम्बेर के मिर्जाराजा जयसिंह की सबसे बड़ी भूमिका थी किंतु कृतघ्न औरंगजेब ने अपने निष्ठावान मित्र मिर्जाराजा जयसिंह को ई.1667 में जहर देकर मरवाया था। उसके बाद रामसिंह और रामसिंह के बाद बिशनसिंह आम्बेर के राजा हुए।

ई.1700 में राजा बिशनसिंह की मृत्यु हो गई। राजा बिशनसिंह के दो पुत्र थे। इनमें से बड़े पुत्र का नाम विजयसिंह और छोटे पुत्र का नाम जयसिंह था, जयसिंह को चीमाजी भी कहते थे। जब 10 वर्ष की आयु में विजयसिंह पहली बार औरंगजेब के समक्ष ले जाया गया तो उसे देखते ही औरंगजेब को उसके बाबा मिर्जाराजा जयसिंह की याद आई। इसलिए औरंगजेब ने विजयसिंह का नाम जयसिंह रख दिया और उसके छोटे भाई चीमाजी उर्फ जयसिंह का नाम बदलकर विजयसिंह कर दिया।

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औरंगजेब ने 12 वर्ष के अल्पायु सवाई राजा जयसिंह को दक्खिन के मोर्चे पर बुला लिया। तब से लेकर औरंगजेब की मृत्यु होने तक यही जयसिंह आम्बेर का राजा था। जयसिंह ने औरंगजेब के लिए कई लड़ाइयां जीतीं जिनके कारण औरंगजेब ने जयसिंह को सवाई की उपाधि दी। इस कारण यह राजा इतिहास में सवाई जयसिंह तथा जयसिंह (द्वितीय) के नाम से जाना गया।

जब औरंगजेब के पुत्रों में उत्तराधिकार का युद्ध हुआ तो सवाई जयसिंह का छोटा भाई चीमाजी अर्थात् विजयसिंह मुअज्जमशाह के साथ था। इसलिए चीमाजी ने इस युद्ध में बहादुरशाह का पक्ष लिया।

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जिस समय औरंगजेब की मृत्यु हुई उस समय आम्बेर नरेश सवाई जयसिंह आजमशाह के पुत्र बेदारबख्त के साथ गुजरात में नियुक्त था। जब आजमशाह का पुत्र बेदारबख्त जजाऊ की लड़ाई लड़ने गया तो वह कच्छवाहा राजा सवाई जयसिंह को भी अपने साथ ले गया। इस कारण जजाऊ के युद्ध में जयसिंह को आजमशाह की तरफ से युद्ध लड़ना पड़ा था। इस कारण बहादुरशाह सवाई जयसिंह से दुश्मनी मानने लगा। जजाऊ के युद्ध में आजमशाह तथा बेदारबख्त की मृत्यु हो गई तथा सवाई जयसिंह के भी बहुत से राजपूत सिपाही मारे गए। इस कारण सवाई जयसिंह के पास केवल 1000 सिपाही ही बचे। सवाई जयसिंह इन सिपाहियों को लेकर आम्बेर चला आया।

बहादुरशाह की दृष्टि में सवाई जयसिंह ने दो अपराध किए थे। उसका पहला अपराध यह था कि वह जजाऊ के मैदान में आजमशाह की तरफ से तथा बहादुरशाह के खिलाफ लड़ने के लिए आया था तथा उसका दूसरा अपराध यह था कि सवाई जयसिंह युद्ध समाप्त होने के बाद बहादुरशाह के समक्ष उपस्थित होने के स्थान पर आम्बेर भाग आया था।

इसलिए ई.1708 में बहादुरशाह दिल्ली से हैदराबाद जाते समय कच्छवाहों की राजधानी आम्बेर आया ताकि सवाई जयसिंह से दुश्मनी निकाली जा सके और सवाई राजा जयसिंह को दण्डित किया जा सके। सवाई जयसिंह ने बहादुरशाह का स्वागत किया तथा उसे अपने महलों में रहने के लिए आमंत्रित किया।

बहादुरशाह ने कुछ दिनों तक आम्बेर के महलों में निवास किया तथा अपने पूर्वज शहंशाह अकबर द्वारा बनाई गई मस्जिद में बैठकर नमाज पढ़ी। इसके बाद बहादुरशाह ने जयसिंह का राज्य छीनकर आम्बेर का नाम मोमिनाबाद रख दिया तथा सवाई जयसिंह की जगह उसके छोटे भाई चीमाजी अर्थात् विजयसिंह को मोमिनाबाद का शासक बना दिया।

बहादुरशाह द्वारा की गई इस कार्यवाही के बाद ही जयसिंह की समझ में आया कि बहादुरशाह सवाई जयसिंह से दुश्मनी बांधकर बैठा है। इस कार्यवाही के कारण सवाई जयसिंह मुगलों का मनसबदार बनकर रह गया। उसके पास अपना कोई राज्य नहीं था। सवाई जयसिंह की लगभग पूरी सेना जजाऊ के मैदान में समाप्त हो चुकी थी इसलिए वह बहादुरशाह का प्रतिरोध नहीं कर सका।

आम्बेर के राजा को सफलतापूर्वक हटा देने के बाद बहादुरशाह ने जोधपुर के महाराजा अजीतसिंह के साथ भी एक गहरी चाल चली। उसने अजीतसिंह को मेड़ता नामक स्थान पर मिलने के लिए बुलवाया तथा वहाँ एक आम दरबार का आयोजन करके अजीतसिंह को साढ़े तीन हजार जात और तीन हजार सवारों का मनसब प्रदान करके उसे अपना मनसबदार बना लिया किंतु साथ ही साथ बहादुरशाह ने कपट का सहारा लेते हुए उसी समय जोधपुर में अपनी सेना भेजकर जोधपुर पर कब्जा कर लिया।

इस प्रकार महाराजा अजीतसिंह भी बिना राज्य का हो गया किंतु महाराजा अजीतसिंह के पास भी इतनी सेना नहीं थी कि वह बहादुरशाह पर सीधा आक्रमण कर सके, इसलिए वह भी चुप रहा।

आम्बेर और मारवाड़ से निबटकर बहादुरशाह ने कामबख्श को समाप्त करने के लिए दक्खिन की ओर प्रस्थान किया तथा महाराजा जयसिंह और महाराजा अजीतसिंह को भी अपने साथ दक्खिन के मोर्चे पर चलने के निर्देश दिए। दोनों महाराजा अपना राज्य और कोष खो चुके थे इसलिए मन मारकर अपनी-अपनी सेनाओं को लेकर बहादुरशाह के साथ रवाना हुए किंतु मार्ग में जैसे ही बहादुरशाह ने नर्मदा नदी पार की, ये दोनों महाराजा, वीर दुर्गादास के साथ वापस राजपूताने को लौट आए तथा उदयपुर के महाराणा अमरसिंह के पास पहुंचे।

महाराणा अमरसिंह ने इन दोनों राजाओं का कई कोस आगे आकर स्वागत किया तथा उनकी हर तरह से सहायता करने का आश्वासन दिया। इसके बदले में अजीतसिंह तथा जयसिंह ने मेवाड़ के महाराणा को वचन दिया कि वे मुगलों से अपने सम्बन्ध तोड़ लेंगे तथा आज के बाद मुगलों की चाकरी नहीं करेंगे।

इस अवसर पर महाराणा अमरसिंह ने अपनी एक राजकुमारी का विवाह इस शर्त पर आम्बेर नरेश जयसिंह से कर दिया कि आम्बेर की राजकुमारी की कोख से उत्पन्न होने वाली लड़की का विवाह मुगल शहजादों से नहीं किया जाएगा तथा यदि मेवाड़ की राजकुमारी के गर्भ से पुत्र उत्पन्न हुआ तो वह आम्बेर का भावी राजा होगा।

शाहआलम उर्फ बहादुरशाह ने सवाई जयसिंह से दुश्मनी कर तो ली किंतु आगे चलकर यह दुश्मनी मुगल सल्तनत के लिए बहुत भारी पड़ने वाली थी।

मेवाड़ के महाराणा से नए सिरे से मित्रता स्थापित करने के बाद महाराजा अजीतसिंह तथा सवाई जयसिंह जोधपुर आए तथा उन्होंने जोधपुर पर आक्रमण करके जोधपुर के किलेदार मेहराब खाँ को भगा दिया और जोधपुर राज्य पर फिर से अधिकार कर लिया। इस सफलता के बाद दोनों मित्रों ने आम्बेर पर आक्रमण किया और चीमाजी को गद्दी से उतारकर सवाई जयसिंह को फिर से आम्बेर की गद्दी पर बिठा दिया। बयाना का मुगल सूबेदार हुसैन खान बारहा आम्बेर पर चढ़कर आया किंतु उसे भी मार दिया गया।

इस पूरी कार्यवाही के दौरान बहादुरशाह दक्खिन के अभियान में व्यस्त रहा अतः वह महाराजा अजीतसिंह तथा सवाई जयसिंह के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं कर सका। हालांकि कुछ समय बाद जब अजीतसिंह ने अजमेर पर अधिकार किया तो अजीतसिंह और जयसिंह की मित्रता भंग हो गई क्योंकि जयसिंह स्वयं अजमेर पर अधिकार करना चाहता था। इन दोनों राजाओं की दुश्मनी यहाँ तक बढ़ी कि आगे चलकर सवाई जयसिंह ने महाराजा अजीतसिंह की हत्या करवाई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बंदासिंह बैरागी

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बंदासिंह बैरागी

बंदासिंह बैरागी को बन्दा बहादुर भी कहते हैं। उसका असली नाम माधवदास बैरागी था। बंदासिंह बैरागी ने गुरु गोविंदसिंह का आदेश मानकर सिक्खों को नेतृत्व प्रदान किया। इस कारण लाल किले को बंदासिंह बैरागी के रूप में नया दुश्मन मिल गया!

औरंगजेब ने गुरु गोविंदसिंह को समझौते के लिए दक्षिण भारत में आमंत्रित किया था किंतु जब गुरु गोविंदसिंह दक्षिण में पहुंचे तो उन्हें ज्ञात हुआ कि 3 मार्च 1707 को औरंगजेब की मृत्यु हो गई है। अतः गुरु की औरंगजेब से भेंट नहीं हो सकी।

औरंगजेब की मृत्यु के बाद 18 जून 1707 को उसके पुत्र मुअज्जमशाह एवं आजमशाह के बीच जजाऊ का युद्ध हुआ। इस लड़ाई में गुरु गोविन्द सिंह ने मुअज्जमशाह अर्थात् बहादुरशाह का साथ दिया जिसके कारण मुअज्जमशाह विजयी रहा। जब मुअज्जमशाह बहादुरशाह के नाम से बादशाह बन गया तब उसने गुरु गोविन्दसिंह को आगरा बुलवाया।

बहादुरशाह ने गुरु को एक कीमती सिरोपाव और एक धुकधुकी भेंट की जिसकी कीमत 60 हजार रुपए थी। सिरोपाव में एक कीमती चोगा होता था तथा धुकधुकी गर्दन में पहनने का मर्दाना गहना होता था।

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इस बात की प्रबल संभावना थी कि बहादुरशाह तथा गुरु गोविंदसिंह के बीच कोई स्थाई समझौता हो जाएगा। अभी बात चल ही रही थी कि बहादुरशाह को अपने भाई कामबख्श के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए दक्षिण भारत की तरफ जाना पड़ा। बहादुरशाह ने गुरु गोविंदसिंह से अनुरोध किया कि वे भी उसके साथ चलें। बादशाह के निमंत्रण पर गुरु गोबिंदसिंह एक बार फिर दक्षिण भारत के लिए रवाना हो गए।

जब सरहिंद के सूबेदार को ज्ञात हुआ कि गुरु गोबिंदसिंह बहादुरशाह के साथ दक्षिण भारत को जा रहे हैं तो उसने गुरु की हत्या करवाने की योजना बनाई। उसने जमशेद खाँ तथा वसील बेग नामक दो अफगानों को गुरु गोविंदसिंह की हत्या के लिए नियुक्त किया। जब गुरु गोविंदसिंह का शिविर गोदावरी नदी के तट पर नांदेड़ नामक स्थान पर लगा हुआ था, तब इन अफगानियों ने धोखे से गुरु के शिविर में प्रवेश करके उन पर घातक प्रहार किया जिससे गुरु बुरी तरह घायल हो गए।

गुरु की छाती पर हृदय से ठीक नीचे गहरा घाव लगा किंतु गुरु ने अपनी कटार निकालकर उसी समय हमलावर का काम तमाम कर दिया। हमलावर के साथी ने भागने का प्रयास किया किंतु उसे गुरु के अंगरक्षकों ने मार डाला।

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जब गुरु रोगशैय्या पर थे, तब माधवदास नामक एक अड़तीस वर्षीय बैरागी, गुरु के दर्शनों के लिए आया। वह काश्मीर के पंुछ जिले का रहने वाला डोगरा राजपूत था तथा उसके बचपन का नाम लक्ष्मण देव था किंतु वह वैराग्य धारण करके माधवदास बैरागी बन गया था और नांदेड़ में ही एक आश्रम बनाकर रहता था। जब उसे ज्ञात हुआ कि कुछ अफगानी मुसलमानों ने गुरु गोविंदसिंह को छुरा मारकर घायल कर दिया है तो वह गुरु से मिलने के लिए उनके शिविर में आया।

माधवदास बैरागी ने गुरु गोविंदसिंह के सामने प्रतिज्ञा ली कि वह मुगलों द्वारा की गई गुरुपुत्रों की हत्या का बदला लेगा। गुरु गोविंदसिंह ने उस युवक के भीतर चमक रहे तेज को पहचाना तथा उसे अपना शिष्य बना लिया और उसका नाम गुरुबख्शसिंह रखा। गुरु गोविंदसिंह ने उससे कहा कि वह सिक्खों के राजनीतिक संघर्ष को जारी रखे। माधवदास बैरागी, गुरु गोविंदसिंह की बातों से इतना अधिक प्रभावित हुआ कि उसने स्वयं को गुरु का बन्दा कहना आरम्भ कर दिया। तब से उसका नाम बन्दा बहादुर पड़ गया। इतिहास की पुस्तकों में उसे बंदासिंह बैरागी भी लिखा गया है।

गुरु ने बंदासिंह बैरागी को सिक्खों की सुरक्षा का दायित्व सौंपा तथा अपने पाँच मुख्य अनुयायी एवं कुछ अन्य अनुयाइयों के साथ पंजाब जाने का आदेश दिया। बन्दा जब दिल्ली पहुँचा तब उसे समाचार मिला कि 7 अक्टूबर 1708 को गुरु गोविंदसिंह का नांदेड़ में निधन हो गया।

गुरु गोविन्दसिंह की मृत्यु के साथ भारतीय संस्कृति के एक महत्वपूर्ण अध्याय की समाप्ति हो जाती है। भारत भूमि गुरु गोविंदसिंह की सेवाओं के प्रति युगों तक कृतज्ञ रहेगी। उन्होंने चण्डी शतक लिखकर अपनी भगवत्भक्ति का परिचय दिया तथा गुरुग्रंथ साहिब को नए सिरे से संकलित करवाकर भारत के महत्वपूर्ण भक्त-कवियों की रचनाओं को मानव मात्र के लिए सुलभ करवाया।

गुरु गोबिंदसिंह ने पिछले गुरुओं के समय से चली आ रही सिक्ख परम्पराओं में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन किए। उन्होंने सिक्खों में गुरु बनाने की प्रथा को समाप्त कर दिया और कहा कि जहाँ भी पाँच सिक्ख एकत्रित होंगे, वहाँ मैं उपस्थित रहूँगा। इस प्रकार, उन्होंने सिक्ख सम्प्रदाय के हितों के बारे में निर्णय करने का अधिकार सिक्ख पंचायत को सौंप दिया। गुरु गोविंदसिंह ने कहा- ‘सब सिक्खन को हुकुम है, गुरु मानियो ग्रंथ!’ कुछ लोग इसे इस प्रकार भी कहते हैं– ‘गुरु मानो ग्रंथ, प्रगट गुरु दी देह!’

गुरु गोविन्दसिंह ने सिक्खों को पूर्णतः सैनिक समुदाय बनाया और खालसा पंथ तथा खालसा सेना की स्थापना की। उन्होंने जीवन भर मुगलों से संघर्ष किया। बंदा बैरागी ने गुरु गोविंदसिंह का आदेश मानकर सिक्खों को नेतृत्व प्रदान किया। उसने सिक्खों को गुरु का संदेश पहुँचाया और मुगलों के अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करने का आह्नान किया। उसने सोनीपत से मुगल अधिकारियों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष आरम्भ किया तथा वहाँ के मुगल फौजदार को युद्ध में परास्त कर दिया।

इसके बाद बंदासिंह बैरागी ने कैथल, समाना, शाहबाद, अम्बाला, मुस्तफाबाद, क्यूरी तथा सधौरा पर अधिकार कर लिया। अब बंदा बैरागी ने पंजाब क्षेत्र के प्रमुख सूबे सरहिन्द पर आक्रमण किया जहाँ के फौजदार वजीर खाँ ने गुरु के दो पुत्रों को जीवित ही दीवार में चिनवाया था। इस युद्ध में वजीर खाँ मारा गया। उसकी अपार सम्पत्ति बन्दा बैरागी के हाथ लगी। बन्दा बैरागी ने सरहिन्द के 28 परगने अपने अधीन कर लिये। बन्दा बैरागी की इन सफलताओं ने उसे अत्यन्त लोकप्रिय बना दिया।

मई 1710 में बंदा बैरागी के नेतृत्व में सिक्खों ने लाहौर एवं दिल्ली के बीच सतलुज नदी के दक्षिण में स्थित पंजाब का विशाल क्षेत्र जीत लिया। बंदा बैरागी ने गुरु गोबिन्द सिंह द्वारा संकल्पित खालसा राज्य की स्थापना की जिसकी राजधानी लोहगढ़ थी। बंदा बैरागी ने गुरु नानक देव और गुरु गोबिन्द सिंह के नाम के सिक्के ढलवाए।

सिक्खों द्वारा सरहिंद के सूबेदार वजीर खाँ को मार दिए जाने से बहादुरशाह के कान खड़े हुए। उसने अपने प्रमुख अमीरों को सिक्खों का दमन करने के लिए पंजाब की तरफ रवाना किया तथा वह स्वयं भी विशाल सेना लेकर पंजाब की तरफ चल पड़ा।

दिसम्बर 1710 में मुगलों ने बन्दा बैरागी के मुख्य केन्द्र लौहगढ़ पर अधिकार कर लिया परन्तु बन्दा बैरागी वहाँ से भाग निकला। इससे पहले कि सिक्ख विद्रोह पूर्ण रूप से कुचल दिया जाता, फरवरी 1712 में बहादुरशाह की मृत्यु हो गई।

इसके बाद बन्दा बैरागी ने बिना कोई समय खोए, फिर से अपने राज्य के एक बड़े भाग पर अधिकार कर लिया और इसे उत्तर-पूर्व तथा पहाड़ी क्षेत्रों की ओर लाहौर और अमृतसर की सीमा तक विस्तृत कर लिया। बन्दा बैरागी ने सरहिन्द क्षेत्र से मुगल अधिकारियों को हटाकर सिक्ख अधिकारियों को नियुक्त किया।

इस प्रकार उसने प्रथम सिक्ख राज्य की स्थापना की किंतु बन्दा बहादुर ने स्वयं न तो कोई पदवी धारण की और न कभी दरबार लगाया। उसने सभी कार्य गुरु के नाम से किये।

बहादुरशाह के बाद मुगलों की गद्दी पर बैठे अल्पकालिक मुगल बादशाह सत्ता के लिए हो रहे खूनी संघर्षों, दक्षिण भारत के विद्रोहों तथा राजपूतों के हमलों से निबटने में लगे रहे और वे सिक्खों की तरफ ध्यान नहीं दे सके। बंदा बहादुर ने मुगलों की कमजोरी का लाभ उठाते हुए पंजाब से बाहर निकलकर गंगा-यमुना दोआब में सहारनपुर और उसके निकट के क्षेत्रों तक आक्रमण किये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

चूड़ामन जाट

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चूड़ामन जाट

चूड़ामन जाट सिनसिनी के जाट परिवार में उत्पन्न हुआ था। उसके पिता का नाम भज्जा सिंह था। चूड़ामन को ही भरतपुर के राजवंश का संस्थापक माना जाता है। एक समय ऐसा भी आया जब दिल्ली के लाल किले ने चूड़ामन जाट के सामने घुटने टेक दिए!

शाहजहाँ के समय से ही आगरा-मथुरा क्षेत्र में जाट संगठित एवं शक्तिशाली होने लगे थे। ईस्वी 1670 में औरंगजेब ने वीर गोकुला जाट के टुकड़े करवाकर जाटों को कुचलने का प्रयास किया था किंतु जाटों का आंदोलन ब्रजराज सिंह, भज्जासिंह तथा बदनसिंह आदि जाट नेताओं के नेतृत्व में निरंतर गति पकड़ता रहा।

ईस्वी 1688 में वीर राजाराम जाट ने औरंगजेब के पूर्वज शहंशाह अकबर की हड्डियाँ आग में डाल दीं थीं।  इसके बाद जाटों और मुगलों में नए सिरे से ठन गई थी।

जब औरंगजेब दक्षिण भारत में अंतिम सांसें गिन रहा था तब जाटों का नेतृत्व चूड़ामन जाट के हाथों में था। औरंगजेब ने चूड़ामन को कुचलने का बहुत प्रयास किया किंतु चूड़ामन आगरा, मथुरा, अलीगढ़, हाथरस, धौलपुर, रतनपुर, होडल आदि के जाटों के बल पर मुगलों से संघर्ष करता रहा।

उन दिनों दिल्ली से ग्वालियर, आगरा से अजमेर तथा मालवा की ओर जाने वाले शाही काफिले तथा व्यापारिक काफिले जाटों द्वारा लूटे जा रहे थे। जाटों ने गारू, हलैना, सौंख, सिनसिनी, थून आदि स्थानों पर गढ़ियां बना रखी थीं। ये गढ़ियां लूट के माल से भरती जा रही थीं जिनसे जाट वीरों को वेतन, अनाज एवं हथियार उपलबध करवाए जाते थे।

इस काल में राजपूतों एवं मुगलों को किसानों से भूराजस्व प्राप्त होता था जबकि मराठों, जाटों एवं सिक्खों की सेनाएं लूट तथा चौथ से प्राप्त पैसे पर खड़ी थीं। जब जून 1708 में औरंगजेब के शहजादे मुअज्जमशाह और आजमशाह जजाऊ के मैदान में लड़ने पहुंचे तो चूड़ामन भी एक विशेष योजना के साथ जाट बंदूकचियों को लेकर जजाऊ में जाकर बैठ गया। उसने इस युद्ध में किसी का भी पक्ष नहीं लिया।

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उन दिनों के युद्धों में यह एक आम प्रचलन था कि युद्ध के पश्चात् विजेता सैनिक, पराजित पक्ष की सेना के डेरे लूटता था किंतु चूड़ामन की योजना यह थी कि जब युद्ध के दौरान दोनों पक्षों की काफी क्षति हो चुकी होगी, तब वह कमजोर पक्ष वाले शहजादे के डेरे लूटकर भाग जाएगा।

मुअज्जमशाह और आजमशाह दोनों ही पक्ष चूड़ामन जाट के इरादों को नहीं भांप सके। उन्होंने जाटों को जजाऊ के निकट आकर जमा होते हुए देखा किंतु इस समय वे जाटों से बात करके उनके इरादों का पता लगाने की स्थिति में नहीं थे। परिस्थितियां भी कुछ ऐसी बन गई थीं कि युद्ध बिना किसी योजना के अचानक आरम्भ हो गया था अतः किसी भी पक्ष को जाटों की तरफ ध्यान देने का अवसर भी नहीं मिला।

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आगरा एवं धौलपुर का क्षेत्र उत्तर भारत के सबसे गर्म क्षेत्रों में से है। यदि चम्बल एवं यमुना को छोड़ दिया जाए तो गर्मियों में दूर-दूर तक कहीं पानी उपलब्ध नहीं होता। यही कारण था कि आजम और मुअज्जम चम्बल में पानी की उपलब्धता को देखते हुए जजाऊ में लड़ने के लिए आए थे।

20 जून 1708 को जिस समय अचानक युद्ध आरम्भ हुआ, उस समय सूर्य भगवान आकाश के मध्य में थे और धरती पर मानो आग बरस रही थी। भीषण गर्मी के कारण सैनिकों की आंखें बंद हो रही थीं और पानी के अभाव में उनके अंग शिथिल हो रहे थे। जब दोनों ओर से तोपें चलनी शुरु हुईं तो दोनों पक्षों के सिपाही बार-बार युद्ध का मैदान छोड़कर दूर-दूर भागने लगे। इस दौरान तोप का एक गोला लगने से मुअज्जमशाह के शिविर में आग लग गई। चूड़ामन जाट इसी अवसर की प्रतीक्षा में था। उसने जाट बंदूकचियों को मुअज्जमशाह के डेरे लूटने के आदेश दिए। जाटों ने मुअज्जमशाह के खेमे में जमकर लूट मचाई तथा जितना अधिक सामान उठा सकते थे उसे ऊंटों एवं घोड़ों पर लादकर भाग लिए।

जाटों का एक समूह अब भी मैदान के निकट जमा था। जैसे ही उन्हें ज्ञात हुआ कि मुअज्जमशाह का पलड़ा भारी हो गया है और आजमशाह की हार हो रही है तो जाट फिर से सक्रिय हो गए। इस बार उन्होंने आजमशाह के डेरों को लूटा।

इस लूट में चूड़ामन जाट को इतना अधिक धन एवं माल प्राप्त हुआ कि अब वह आराम से एक विशाल सेना खड़ी कर सकता था। चूड़ामन को दोनों खेमों से अपार खजाना, बहुमूल्य आभूषण, हीरे-जवाहरात, बड़ी संख्या में ऊंट, घोड़े एवं बैल हाथ लगे थे। जब तक मुअज्जमशाह युद्ध समाप्त करके अपने खेमे में लौटता तब तक चूड़ामन तथा उसके जाट जजाऊ से बहुत दूर जा चुके थे।

युद्ध की समाप्ति के बाद बहुत से मुगल एवं राजपूत सैनिक धौलपुर तथा ग्वालियर की ओर भागे। इन भागते हुए सैनिकों पर जाटों तथा रूहेलों ने आक्रमण किए। जान बचाने के लिए भागते हुए सैनिकों को पकड़-पकड़कर मारा गया। उनके शवों से चम्बल की खारें भर गईं। इरविन तथा नत्थनसिंह नामक आधुनिक लेखकों ने लिखा है कि एक भी मुगल सैनिक, जाटों की लूट से नहीं बच सका।

जजाऊ के युद्ध के बाद जब मुअज्जमशाह विजयी हुआ और बहादुरशाह के नाम से बादशाह बना तो उसने चूड़ामन जाट को अपने दरबार में बुलाया। बहादुरशाह ने अपने विरोधियों एवं शत्रुओं के प्रति एक विशेष प्रकार की नीति अपनाई थी। इस नीति के अनुसार वह अपने विरोधियों को अपने पक्ष में आने का अवसर देता था ताकि वे मित्र बनकर रहें।

इसी नीति के तहत बहादुरशाह ने चूड़ामन जाट को आगरा के लाल किले में बुलाया। उसने चूड़ामन को 1500 जात तथा 500 सवार का मनसब देकर शाही नौकरी में रख लिया। इस प्रकार लाल किले ने पहली बार जाटों के समक्ष घुटने टेक दिए। चूड़ामन साधारण किसान का बेटा था किंतु अब वह राजाओं-महाराजाओं की श्रेणी में 1500 जात का मनसबदार बन गया था।

जब बहादुरशाह ने सवाई जयसिंह को आम्बेर राज्य से हटाया तो बहादुरशाह ने चूड़ामन जाट को आम्बेर राज्य के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए नियुक्त किया। बाद में जब मुगल बादशाह कमजोर पड़ गए तो चूड़ामन ने आम्बेर नरेश जयसिंह से समझौता करके उत्तर भारत की राजनीति में जाटों के प्रभाव को और अधिक बढ़ा दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बहादुरशाह की मृत्यु

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बहादुरशाह की मृत्यु

औरंगजेब का पुत्र मुअज्जमशाह मुगलों के इतिहास में शाहआलम (प्रथम) तथा बहादुरशाह (प्रथम) के नाम से जाना जाता है। जब बहादुरशाह की मृत्यु हुई तो उसका शव ढाई माह तक नहीं दफनाया जा सका!

जिस समय बहादुरशाह ने आम्बेर तथा जोधपुर के राजाओं को हटाकर उनके राज्यों पर कब्जा कर लिया था, उस समय उदयपुर का महाराणा अमरसिंह (द्वितीय) भी इन सारी गतिविधियों को सतर्कता पूर्ण दृष्टि से देख रहा था। महाराणा को लगा कि अब बहादुरशाह उदयपुर की तरफ अभियान करेगा। इसलिए महाराणा अमरसिंह अपने पूर्वजों की नीति पर चलते हुए उदयपुर नगर खाली करके गहन पर्वतों में चला गया ताकि यदि बहादुरशाह अमरसिंह के पीछे आए तो उसे पहाड़ों में घेरकर नष्ट किया जा सके।

उधर बहादुरशाह भी अमरसिंह की गतिविधियों पर दृष्टि रख रहा था। इसलिए जब उसे ज्ञात हुआ कि महाराणा अमरसिंह पहाड़ों में चला गया है तो वह समझ गया कि यदि उसने उदयपुर जाने की गलती की तो उसकी सेना भी उसी तरह पीस दी जाएगी जिस तरह उसके पिता औरंगजेब की सेना को महाराणा अमरसिंह के बाबा राजसिंह ने पीस दिया था। अतः बहादुरशाह ने महाराणा के जाल में फंसने की बजाय घोषणा की कि वह उदयपुर पर अभियान करने की बजाय अपने भाई कामबख्श से निबटने के लिए हैदराबाद जाएगा।

जब बहादुरशाह अपने भाई कामबख्श का दमन करके दक्षिण भारत से लौटकर आया तो वह मेवाड़ के घाटे की तरफ बढ़ा। महाराणा अब भी पहाड़ों में था किंतु बहादुरशाह के लिए अब भी परिस्थितियां ऐसी नही हुई थीं कि वह उदयपुर के महाराणा से युद्ध में उलझ सके।

उसे पंजाब की परिस्थितियों की पूरी जानकारी थी जहाँ एक तरफ सिक्खों ने सरहिंद के बड़े इलाके पर कब्जा कर लिया था तथा दूसरी तरफ लाहौर के सुन्नी मुल्ला-मौलवियों ने बादशाह के विरुद्ध बड़ा आंदोलन खड़ा कर लिया था। लाहौर के मुल्ला-मौलवी बादशाह द्वारा अपने खुतबे में वली के स्थान पर अली का प्रयोग किए जाने से नाराज थे। इसलिए बादशाह सिक्खों का दमन करने तथा लाहौर के मुल्ला-मौलवियों से समझौता करने के लिए लाहौर चला गया।

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बादशाह ने राजपूत राजाओं को शांत करने के लिए महाराणा अमरसिंह (द्वितीय) को असद खाँ से पत्र लिखवाकर आश्वस्त किया कि महाराणा आपसे पूर्ववत् मित्रता रखते हैं, इसलिए आपको चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। बादशाह ने महाराजा अजीतसिंह को जोधपुर का तथा महाराजा सवाई जयसिंह को आम्बेर का शासक स्वीकार कर लिया तथा उन्हें बादशाह के समक्ष उपस्थित होकर शाही सेवा करने के आदेश भिजवाए।

लाहौर में बादशाह ने मुल्ला-मौलवियों की एक बैठक बुलाई तथा उनकी बातें सुनकर अपना पक्ष स्पष्ट करने का प्रयास किया किंतु बैठक के दौरान मुल्ला-मौलवियों ने बहुत शोर-शराबा किया और दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात पर अड़े रहे। इस पर मुल्ला-मौलवियों ने बादशाह के विरुद्ध युद्ध करने की धमकी दी। इसके बाद बहादुरशाह ने बैठक बंद कर दी। अभी बहादुरशाह लाहौर में ही प्रवास कर रहा था कि जनवरी 1712 में बहादुरशाह का स्वास्थ्य खराब हो गया। इतिहासकार विलियम इरविन के अनुसार बहादुरशाह 24 फरवरी 1712 को अंतिम बार जनता के समक्ष आया।

इसके बाद वह खाट से नहीं उठ सका और 27-28 फरवरी की रात्रि में बहादुरशाह की मृत्यु हो गई। शाही हकीमों के अनुसार बहादुरशाह की मृत्यु तिल्ली बढ़ जाने से हुई।

बहादुरशाह की मृत्यु के पश्चात् उसके चारों पुत्रों, जहाँदारशाह, अजीमुश्शान, रफ़ीउश्शान और जहानशाह में उत्तराधिकार का युद्ध आरंभ हो गया। फलतः बहादुरशाह का शव लाहौर के दुर्ग में ही पड़ा रहा और उसे दफनाया नहीं जा सका। बहादुरशाह की बेगम मिहिर परवर तथा बादशाह का मंत्री चिनकुलीच खाँ बादशाह के शव की सुरक्षा के लिए उसके पास लाहौर में ही बैठे रहे।

उधर बहादुरशाह के पुत्रों में हुए उत्तराधिकार के संघर्ष में जहाँदारशाह ने मुगल सेनापति जुल्फिकार खाँ की सहायता से अपने बड़े भाई अजीमुश्शन को हरा दिया तथा 29 मार्च 1712 को दिल्ली के तख्त पर अधिकार जमाने में सफलता प्राप्त कर ली। जहाँदारशाह ने अपने पूर्वजों की नीति का अनुसरण करते हुए अपने तीनों भाइयों को मार डाला।

11 अप्रेल 1712 को बहादुरशाह की बेगम मिहिर परवर तथा बहादुरशाह का मंत्री चिनकुलीच खाँ बहादुरशाह का शव लेकर लाहौर से दिल्ली के लिए रवाना हुए। 15 मई 1712 को उसे दिल्ली के महरौली नामक स्थान पर मोती मस्जिद में दफना दिया गया। यह मस्जिद कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह के पास स्थित है।

ई.1707 में औरंगजेब की मृत्यु से लेकर ई.1712 में बहादुरशाह की मृत्यु के समय तक भारत वर्ष की परिस्थितियों में विशेष परिर्वतन नहीं आया था किंतु निकट भविष्य में होने वाले परिवर्तनों की आहट साफ सुनाई देने लगी थी। औरंगजेब अपने जीवन के अंतिम 25 सालों में दक्षिण भारत में रहा था।

औरंगजेब का इतिहास लिखने वाले जदुनाथ सरकार ने लिखा है कि इस दौरान दक्षिण भारत में युद्ध, सूखे, अकाल एवं महामारी के कारण प्रतिवर्ष लगभग 1 लाख मनुष्यों एवं तीन लाख ऊंट, बैल एवं घोड़े आदि मालवाहक पशुओं की मृत्यु होती थी। इस कारण दक्षिण भारत में जगह-जगह पर शव सड़ते हुए दिखाई देते थे तथा पूरा क्षेत्र खेती से रहित होकर शमशान जैसा दिखाई देता था।

जब बहादुरशाह बादशाह हुआ तो उसने पांच साल में केवल तीन युद्ध लड़े थे जिनमें से पहला युद्ध जजाऊ के मैदान में आजमशाह से, दूसरा युद्ध हैदराबाद में अपने भाई कामबख्श से तथा तीसरा युद्ध सरहिंद में बंदा बहादुर से लड़ा था। जजाऊ के युद्ध में बड़ी जन हानि हुई थी किंतु हैदराबाद एवं पंजाब के युद्धों में अधिक विनाश नहीं हुआ था। यही कारण था कि बहादुरशाह के काल में दक्षिण भारत में जीवन के चिह्न फिर से दिखाई देने लगे थे।

फिर भी औरंगजेब अपने शासन के पचास साल में भारत की जनता को जो गहरे जख्म देकर गया था, वे जख्म कई शताब्दियों में भी ठीक नहीं हो सकते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जहाँदारशाह

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जहाँदारशाह

जहाँदारशाह मरहूम बादशाह शाहआलम प्रथम (बहादुरशाह प्रथम) का सबसे बड़ा पुत्र था जिसने अपने भाइयों को हराकर मुगलिया तख्त पर अधिकार कर लिया। वह इतना अय्याश किस्म का आदमी था कि उसने लाल किले को नृत्यांगनाओं का अड्डा बना दिया!

24 फरवरी 1712 को बहादुरशाह की मृत्यु हो गई। उसके चार पुत्र थे- जहाँदारशाह, अजीमुश्शान, रफ़ीउश्शान और जहानशाह। जैसे ही बहादुरशाह की मृत्यु हुई, उसके दो पुत्रों जहाँदारशाह तथा अजीमुश्शान ने स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया।

बहादुरशाह के पुत्रों में से जहाँदारशाह सबसे बड़ा था। उसका वास्तविक नाम मिर्जा मुइज्जुद्दीन बेग मुहम्मद खान था। उसका जन्म 9 मई 1661 को दक्षिण भारत में हुआ था। उसकी माँ निजामबाई हैदराबाद के शिया अमीर फतेहयार की बेटी थी।

जहाँदारशाह की बुआ जीनत उन्निसा जहाँदारशाह को बिल्कुल भी पसंद नहीं करती थी और प्रायः बादशाह औरंगजेब के समक्ष जहाँदारशाह की शिकायत किया करती थी। फिर भी औरंगजेब ने अपने पोते जहाँदारशाह को ई.1671 में बल्ख का सूबेदार नियुक्त किया था। एक बार उसे सिंध का सूबेदार भी नियुक्त किया गया।

जहाँदारशाह को समुद्री मार्ग से दूर देशों के साथ व्यापार करने का बहुत शौक था और वह अपने व्यापारिक जहाजों के साथ हिंद महासागर में दूर-दूर तक घूमा करता था। इस व्यापार के कारण ही जहाँदारशाह ने बहुत पैसा कमा लिया था।

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17 मार्च 1712 को जब बहादुरशाह मर गया तो लाहौर के निकट जहाँदारशाह तथा अजीमुश्शान के बीच बड़ा युद्ध हुआ। इस युद्ध में जहाँदारशाह को अपने पिता के वजीर मीर बख्शी जुल्फिकार खाँ की सहायता प्राप्त हो गई। इस कारण जहाँदारशाह उत्तराधिकार के युद्ध में विजयी रहा। अजीमुश्शन मारा गया।

जहाँदारशाह ने अपने शेष दोनों छोटे भाइयों रफ़ीउश्शान और जहानशाह को भी मार डाला। इसके बाद 29 मार्च 1712 को जहाँदारशाह मुग़लों के तख्त पर बैठा। जिस समय जहाँदारशाह बादशाह बना, वह 51 साल का प्रौढ़ हो चुका था।

जहाँदारशाह का पहला विवाह ईरान के सफावी राजवंश की पुत्री से हुआ था। जब जहाँदारशाह की पहली बेगम का निधन हो गया तो जहाँदारशाह ने मरहूम बेगम की भतीजी सयैद उन्निसा से विवाह कर लिया। जहाँदारशाह का तीसरा विवाह अनूपबाई नामक एक हिन्दू स्त्री से हुआ था।

इन विवाहों से जहाँदारशाह को तीन पुत्र प्राप्त हुए जिनमें से अनूपबाई का पुत्र अजीजुद्दीन आगे चलकर ई.1754 से 1759 की अवधि आलमगीर (द्वितीय) के नाम से बादशाह बना। जब जहाँदारशाह बादशाह बन गया तो उसने अपनी चहेती नर्तकी लाल कुंवर से विवाह कर लिया तथा उसे इम्तियाज महल का खिताब देकर अपनी मुख्य बेगम घोषित कर दिया।

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औरंगजेब के समय में एक शिया मुसलमान असद खाँ बादशाह का प्रधानमंत्री था। बहादुरशाह ने भी उसे अपना वकीले मुतलक नियुक्त किया था तथा उसके पुत्र ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ को अपना बख्शी बनाया था। चूंकि असद खाँ तथा जुल्फिकार खाँ के सहयोग से ही जहाँदारशाह बादशाह बन सका था इसलिए जहाँदारशाह ने जुल्फिकार खाँ को प्रधान मंत्री एवं उसके पिता असद खाँ को वकीले मुतलक बने रहने दिया। असद खाँ तथा जुल्फिकार खाँ दोनों ही औरंगजेब तथा बहादुरशाह के प्रति पूर्ण निष्ठावान बनकर रहे थे अतः नए बादशाह ने भी उन पर पूर्ण विश्वास कर लिया। ये दोनों ही राजकाज से लेकर युद्धों के मैदान तक कई बार अपनी विश्वसनीयता, योग्यता एवं दक्षता को सिद्ध कर चुके थे।

जिस दिन जहाँदारशाह मुग़लों के तख्त पर बैठा, उस दिन उसके पिता बहादुरशाह को मरे हुए ठीक एक माह हुआ था। तब से बहादुरशाह का शव लाहौर के दुर्ग में पड़ा था। इसलिए प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ ने बादशाह का शव दिल्ली मंगवाकर दफनाया। प्रधानमंत्री जुल्फिकार खाँ तथा उसका पिता असद खाँ शिया मुसलमान थे तथा मुगल दरबार में ईरानी गुट के नेता थे।

तत्कालीन इतिहासकार खफी ख़ाँ ने लिखा है कि जहाँदारशाह के दरबार में चारणों, गायकों, नर्तकों, भाटों एवं भाण्डों का बोलबाला हो गया। इस कारण शासन की बागडोर ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ के हाथों में चली गई तथा जहाँदारशाह का दरबार नृत्यांगनाओं का अड्डा बन गया।

नए बादशाह ने मुगल सल्तनत पर भले ही अधिकार कर लिया था किंतु अपने ही दरबार में उसकी स्थिति मजूबत नहीं थी। उसका दरबार शिया और सुन्नी अर्थात् ईरानी एवं तूरानी गुटों में बंटा हुआ था। हिन्दुस्तानी अमीरों ने अपना अलग गुट बना रखा था। इस काल में बहुत से दरबारी एवं सूबेदार, जहाँदारशाह के अन्य भाइयों के पुत्रों को सुल्तान बनाने का प्रयास कर रहे थे।

शासन की शक्तियां जुल्फिकार खाँ के हाथों में चले जाने से बादशाह की स्थिति बड़ी विचित्र हो गई। एक ओर तो प्रधानमंत्री अपनी मनमर्जी से आदेश जारी करने लगा और दूसरी ओर दरबार के ईरानी एवं तूरानी अमीर, जुल्फिकार खाँ का निर्देशन स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। इस काल में हिन्दू उमराव लगभग पूरी तरह से मुगल दरबार से दूर हो चुके थे।

बहादुरशाह ने हालांकि अपनी मृत्यु से पहले राजपूतों, मराठों एवं जाटों से अपने सम्बन्ध सामान्य बनाने का प्रयास किया था और सिक्खों के अंतिम गुरु गोविंदसिंह से भी उसके सम्बन्ध अच्छे हो गए थे तथापि बंदा बहादुर द्वारा संघर्ष को जारी रखने के कारण बहादुरशाह सिक्खों को अपने पक्ष में नहीं कर सका था। केवल पौने पांच साल के शासन के बाद बहादुरशाह की अचानक मृत्यु हो जाने से वह अपने प्रति निष्ठावान हिन्दू पक्ष खड़ा नहीं कर सका था।

जहांदारशाह इस बात को समझता था कि मुसलमान अमीर चाहे वे शिया हों या सुन्नी, चाहे वे ईरानी हों या तूरानी, चाहे वे विदेशी हों या देशी, हर समय अपनी ताकत बढ़ाने और बादशाह को कमजोर करने में लगे रहेंगे। जबकि हिन्दू सरदार विशेषतः राजपूत राजा यदि एक बार वचन दे देंगे तो जीवन भर बादशाह के प्रति निष्ठावान बने रहेंगे। इसलिए उसने अपने पूर्वज अकबर की मधु-मण्डित सुलह कुल नीति पर लौटने का निर्णय लिया जिसे उसके बाबा औरंगजेब तथा पिता बहादुरशाह ने त्याग दिया था और जिसके कारण मुगल बादशाह की ताकत कमजोर हो गई थी तथा मुस्लिम अमीर बादशाह के विरुद्ध सिर उठाने लगे थे।

जहाँदारशाह ने सबसे पहले आम्बेर के सवाई राजा जयसिंह के पूर्वजों की सेवाओं को ध्यान में रखकर मुगल सल्तनत में उसकी शक्ति को पुनर्स्थापित करने का निर्णय लिया तथा सवाई जयसिंह को मालवा का सूबेदार नियुक्त कर दिया और उसे मिर्जाराजा की पदवी दी। सवाई जयसिंह के कहने से जहाँदारशाह ने पूरी सल्तनत में जजिया कर को भी समाप्त कर दिया।

बादशाह ने इसी तरह की रेशमी नीति मारवाड़ के राजा अजीत सिंह के साथ अपनाई तथा उसे महाराजा की पदवी देकर गुजरात का सूबेदार बना दिया। बादशाह ने चूड़ामन जाट तथा छत्रसाल बुन्देला के साथ भी मेल-मिलाप की नीति को तथा बन्दा बहादुर के विरुद्ध दमन की नीति को जारी रखा।

इस तरह जहाँदारशाह के काल में एक तरफ हिन्दू राजाओं को प्रसन्न करने का प्रयास किया जा रहा था तो दूसरी ओर मुस्लिम अमीरों के ओहदों में पिछले बादशाह के समय में की गई अंधाधुंध वृद्धि पर रोक लगा दी गई थी ताकि सल्तनत की वित्तीय स्थिति सुधर सके। इससे मुस्लिम अमीर जहाँदारशाह से नाराज हो गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जहाँदारशाह की हत्या

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जहाँदारशाह की हत्या

जहाँदारशाह की हत्या से भारत के मुगलों में बादशाहों की हत्या का एक लम्बा सिलसिला शुरु होता है। हत्याओं के इसी सिलसिले ने मुगल सल्तनत को उसके अंत तक पहुंचा दिया। ईरानी वजीरों ने गद्दारी करके जहाँदारशाह की हत्या करवाई!

मुगल बादशाह जहाँदारशाह ने शासन व्यवस्था में बड़े परिवर्तन करने के प्रयास किए। उसने राज्य की आय को बढ़ाने के लिए लगान वसूली के लिए इजारा व्यवस्था को बढ़ावा दिया। इसके अन्तर्गत इजारेदारों अर्थात् लगान वसूलने वाले ठेकेदारों से निश्चित भू-राजस्व वसूल करने के बदले में सरकार ने उन्हें यह अधिकार दे दिया था कि वे किसानों से जितना चाहे लगान वसूल कर लें।

इस व्यवस्था से मुगल सल्तनत में किसानों का शोषण एवं उत्पीड़न बढ़ गया। जहांदारशाह ने सोने, चांदी तथा ताम्बे के सिक्के भी ढलवाए ताकि लोगों के मन में नए बादशाह की महानता के प्रति विश्वास उत्पन्न हो सके।

यहाँ तक की नीतियों में तो वजीर ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ ने बादशाह का साथ दिया किंतु जैसे ही बादशाह ने ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ की शक्तियों में कमी करनी चाही तो ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ ने बादशाह के विरुद्ध षड़यंत्र रचना प्रारंभ कर दिया। इस कारण बादशाह तथा वजीर के सम्बन्ध खराब हो गए।

ई.1712 में जिस समय जहाँदारशाह ने अपने छोटे भाई अजीमउश्शान को मार डाला था, उस समय अजीमुश्शान के दूसरे नम्बर के पुत्र फर्रूखसियर ने आत्महत्या करने का प्रयास किया था किंतु उसे बचा लिया गया।

फर्रूखसियर इस बात को कभी नहीं भूल सका कि उसके पिता को जहांदारशाह ने युद्ध के मैदान में मार गिराया था। वह अपने ताऊ से अपने पिता की मृत्यु का बदला लेना चाहता था। उसने अपनी स्वयं की एक सेना बनाने का प्रयास किया किंतु वह सेना इतनी छोटी थी कि मुगल बादशाह की विशाल सेना का सामना नहीं कर सकती थी।

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फर्रूखसियर ने पटना के सूबेदार सैयद हुसैन अली खाँ से इस सम्बन्ध में बात की। सूबेदार सैयद अली ने फर्रूखसियर को आश्वस्त किया कि यदि फर्रूखसियर, जहांदारशाह पर आक्रमण करेगा तो मैं तथा मेरा भाई सैयद अब्दुल्ला खाँ आपकी सहायता करेंगे। जिस प्रकार सैयद अली पटना का सूबेदार था, उसी प्रकार सयैद अब्दुल्ला खाँ इलाहाबाद का सूबेदार था।

सैयदों से यह आश्वासन मिलने पर फर्रूखसियर ने स्वयं को पटना में मुगलों का बादशाह घोषित कर दिया तथा अपने नाम के सिक्के चलाये। इसके बाद वह सेना लेकर आगरा की तरफ बढ़ा। 10 जनवरी 1713 को आगरा के निकट जहाँदारशाह तथा फर्रूखसियर की सेनाओं में युद्ध हुआ।

वजीर ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ तथा उसका बाप वकीले मुतलक असद खाँ भी फर्रुखसीयर और सैयद बंधुओं से मिल गए। जहांदारशाह के दो बड़े वजीर चिनकुलीच खाँ एवं अमीन खाँ, युद्ध से तटस्थ हो गए। मरहूम बादशाह बहादुरशाह का धायभाई कोकतलाश इस युद्ध में जहांदारशाह के साथ रहा।

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यद्यपि जहाँदारशाह की सेना में 70-80 हजार घुड़सवार तथा बड़ी संख्या में पैदल सैनिक थे और फर्रूखसियर के पास इससे एक-तिहाई फौज भी नहीं थी, फिर भी वजीरों, सूबेदारों एवं अपने ही परिवार के लोगों की गद्दारी के कारण जहाँदारशाह बुरी तरह परास्त हो गया। जहांदारशाह युद्ध के मैदान से भाग कर अगारा शहर में पहुंचा तथा अपने महल में न जाकर वकीले मुतलक असद खाँ की हवेली में पहुंचा किंतु असद खाँ ने जहांदारशाह को पकड़कर फर्रूखसियर के हाथों सौंप दिया। फर्रूखसियर ने अपने ताऊ जहांदारशाह को उसकी बेगम लाल कुंवर के साथ लाल किले में एक कोठरी में बंद कर दिया।

11 फरवरी 1713 को फर्रूखसियर ने कुछ पेशेवर हत्यारों के द्वारा जहाँदारशाह की हत्या करवा दी। उसकी प्रेयसी लाल कुंवर को भी उसी के साथ मार डाला गया। जो असद ख़ाँ एवं ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ औरंगजेब और बहादुरशाह के शासनकाल में विश्वसनीयता एवं विनम्रता की प्रतिमूर्ति बने रहते थे, अब उन्होंने ही अपने मालिक से गद्दारी करके उसकी हत्या करवा दी ताकि नए बादशाह के शासन में भी असद ख़ाँ एवं ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ को बड़े पद मिल सकें।

समकालीन मुस्लिम इतिहासकार इरादत ख़ाँ ने जहाँदारशाह के विषय में लिखा है- ‘वह रंगरेलियों में डूबे रहने वाला एक कमज़ोर बादशाह था, जिसने न तो राज्य के कार्यों की चिन्ता की, और न उमरावों में से किसी का उससे लगाव था। जहाँदारशाह के शासनकाल में उल्लू, बाज के घोंसले में रहता था, तथा कोयल का स्थान कौवे ने ले लिया था। वह लम्पट मूर्ख था तथा उसने लाल कुंवर नामक वेश्या को दरबार में हस्तक्षेप करने के अधिकार दे रखे थे।’

इरादत ख़ाँ के आरोप सही प्रतीत नहीं होते क्योंकि जहाँदारशाह ने 11 माह ही शासन किया। इतनी कम अवधि में उसने ऐसा क्या कर दिया था कि ‘उल्लू’ बाज के घोंसले में रहने लगा था, तथा ‘कोयल’ का स्थान कौवे ने ले लिया था। यह एक अनर्गल एवं अनावश्यक टिप्पणी प्रतीत होती है। संभवतः यह मुस्लिम इतिहासकार इरादत खाँ, वजीर जुल्फिकार खाँ के हाथों की कठपुतली था तथा साथ ही साथ धर्मान्ध भी था। इस कारण वह निष्पक्ष रहकर इतिहास नहीं लिख सका।

वास्तविकता यह थी कि उस काल में किसी वजीर को इस बात की चिंता नहीं होती थी कि बादशाह मूर्ख या लम्पट है। वजीर से लेकर तमाम अमीर एवं उमराव तो बादशाह के दुश्मन इसलिए हो गए थे क्योंकि बादशाह ने हिन्दू राजाओं से दोस्ती करके अपने मुस्लिम वजीरों एवं अमीरों पर नकेल कसनी आरम्भ कर दी थी।

मुस्लिम इतिहासकारों का अनुसरण करते हुए अंग्रेज इतिहासकार इरविन ने भी उन्हीं बातों को दोहरा दिया तथा लिखा कि- ‘तैमूर के ख़ानदान में जहाँदारशाह पहला बादशाह था, जिसने स्वयं को बेहद नीचता, क्रूर स्वभाव, दिमाग के छिछलेपन तथा कायरता के कारण शासन करने में पूरी तरह से अयोग्य पाया।’

बाद में जब स्वतंत्र भारत में कम्यूनिस्ट इतिहासकारों का बोलबाला हुआ तो उन्होंने भी बिना सोचे-समझे जहांदारशाह के विरुद्ध यही टिप्पणियां लिख मारीं।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

फर्रूखसियर

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फर्रूखसियर

फर्रूखसियर ई.1713 में जुल्फिकार खाँ, असद खाँ तथा सैयद बन्धुओं की सहायता से बादशाह बना था। इन सभी लोगों ने अपने पुराने बादशाह जहांदारशाह से धोखा करके फर्रूखसियर को बादशाह बनाया था। इस कारण फर्रूखसियर बादशाह बनते ही भयानक षड़यंत्रों में घिर गया!

सैयद बंधुओं द्वारा फर्रूखसियर को सहायता दिए जाने का कारण यह था कि सैयद बंधुओं के उत्थान में फर्रूखसियर के पिता अजीम-उस-शान की बड़ी भूमिका रही थी जबकि जहांदारशाह सैयद बंधुओं को अच्छी दृष्टि से नहीं देखता था।

इसलिये सैयद बंधुओं ने जहाँदारशाह के विरुद्ध विद्रोह करके फर्रूखसियर को तख्त पर बैठाने में सहायता की थी। जुल्फिकार खाँ तथा असद खाँ द्वारा फर्रूखसियर से सहयोग किए जाने का कारण यह था कि बादशाह जहांदारशाह जुल्फिकार खाँ के अधिकारों में कटौती करने का प्रयास कर रहा था।

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बादशाह बनने के बाद फर्रूखसियर ने इलाहाबाद के सूबेदार सैयद अब्दुल्ला खाँ को अपना वजीर नियुक्त किया तथा अब्दुल्ला के छोटे भाई सैयद हुसैन अली को अपनी सेना का प्रधान नियुक्त किया। जुल्फिकार खाँ तथा असद खाँ भी उच्च पदों पर आसीन किए गए।

इन सभी गद्दार अमीरों का अनुमान था कि तीस वर्षीय अनुभवहीन फर्रूखसियर में निर्णय लेने की क्षमता का अभाव है तथा अब तक किसी भी उच्च पद पर कार्य नहीं करने के कारण उसे शासन चलाने का अनुभव नहीं है।

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इस कारण इन वजीरों ने सल्तनत की सम्पूर्ण शक्ति अपने हाथों में रखने के षड़यंत्र आरम्भ कर दिए। ये लोग मनमानी करने लगे तथा सैयद बन्धुओं ने शासन के सूत्र अपने हाथों में ले लिए। यही कारण है कि फर्रूखसियर के शासन काल के आरंभ अर्थात् ईस्वी 1713 से लेकर ईस्वी 1721 तक के काल को मुगलों के इतिहास में सैयद बन्धुओं का युग कहा जाता है। उधर फर्रूखसियर इतना नासमझ नहीं था, जितना कि उसके वजीर समझ रहे थे। फर्रूखसियर को आशा थी कि एक बार बादशाह बन जाने पर परिस्थितियां स्वतः उसके अनुकूल हो जाएंगी तथा सैयद बंधु एवं समस्त वजीर बादशाह का आदेश मानने लगेंगे किंतुु सैयदों ने बादशाह की जरा भी परवाह नहीं की तथा वे बादशाह के आदेशों की उपेक्षा करके अपनी मर्जी से शासन चलाने लगे।

इस कारण फर्रूखसियर एवं सैयद बंधुओं में शीघ्र ही ठन गई। बादशाह ने सैयदों का प्रभाव कम करने के लिये सबसे पहले ईरानी गुट के नेता जुल्फिकार खाँ की हत्या करवा दी तथा तूरानी गुट के नेताओं मीर जुमला, चिनकुलीज खाँ और मुहम्मद अमीन खाँ आदि को अपने पक्ष में करके सैयदों पर नकेल कसने का प्रयास किया।

फर्रूखसियर ने आम्बेर नरेश सवाई जयसिंह तथा जोधपुर नरेश अजीतसिंह से भी इस कार्य में सहायता लेनी चाही किंतु ये दोनों हिन्दू राजा फिर से मुगल बादशाहों के हाथों की कठपुतली नहीं बनना चाहते थे इसलिए उन्होंने फर्रूखसियर की कोई सहायता नहीं की।

इन दिनों चूड़ामन जाटों का नेतृत्व कर रहा था। उसने दिल्ली एवं आगरा के बीच के प्रदेशों में लूट मचा रखी थी। फर्रूखसियर ने आम्बेर नरेश सवाई जयसिंह को निर्देश दिए कि वह जाटों के विरुद्ध कार्यवाही करे किंतु सवाई जयसिंह चूड़ामन को नहीं दबा सका। चूड़ामन के विरुद्ध अभियान जारी रखा गया। इस अभियान पर मुगलों के 2 करोड़ रुपये व्यय हुए। अंत में ईस्वी 1718 में फर्रूखसियर ने चूड़ामन से समझौता कर लिया।

मीर जुमला बादशाह के संवाद-वाहक विभाग का अध्यक्ष था किंतु वह फर्रूखसियर का अत्यंत विश्वसनीय बन गया। इसलिए बादशाह ने उसे शासन के समस्त बड़े निर्णय करने के अधिकार दे दिये। इस पर सैयद बंधुओं के कान खड़े हुए।

कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि जब बादशाह फर्रूखसियर ने हुसैन अली खाँ को मारवाड़ नरेश अजीतसिंह के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही करने के लिए भेजा तब बादशाह ने महाराजा अजीतसिंह को एक गोपनीय पत्र भिजवाया कि यदि महाराजा अजीतसिंह सैयद हुसैन अली को खत्म कर दे तो अजीतसिंह को पुरस्कृत किया जायेगा।

यह बात ऐतिहासिक एवं तार्किक रूप से सही जान नहीं पड़ती क्योंकि महाराजा अजीतसिंह तथा बादशाह फर्रूखसियर के बीच इस तरह के विश्वास का कोई सम्बन्ध ही नहीं था।

जोधपुर के विरुद्ध सफलतापूर्वक कार्यवाही हो जाने के बाद फर्रुखसियर ने सैयद हुसैन अली को दक्षिण का सूबेदार बनाकर दक्षिण भारत जाने के आदेश दिये। साथ ही दक्षिण के कार्यवाहक सूबेदार दाऊद खाँ को गुप्त रूप से लिखा कि वह सैयद को रास्ते में ही खत्म कर दे।

दाऊद खाँ ने सैयद हुसैन अली की हत्या करने का प्रयास किया किंतु इस प्रयास में वह स्वयं मारा गया। बादशाह द्वारा दाऊद खाँ को प्रेषित गोपनीय कागज सैयद हुसैन के हाथ लग गये। उधर दिल्ली में फर्रूखसियर ने बड़े सैयद अब्दुल्ला खाँ को कत्ल करने की योजना बनाई परन्तु अन्य षड्यन्त्रों की भाँति वह भी विफल रही।

इतिहासकार एलफिंस्टन ने फर्रूखसियर पर आरोप लगाया है कि- ‘फर्रूखसियर बड़ी योजनाओं को समझ नहीं सकता था और छोटी योजनाओं को अपनी आलसी प्रकृति के कारण दूसरों की सहायता के बिना पूरी नहीं कर सकता था।’

इस काल में बादशाह की राजनीतिक दुर्दशा के कारणों को बहुत अच्छी तरह समझा जा सकता है। शहंशाह अकबर ने राजपूतों से मित्रता करके अपनी सल्तनत के चारों ओर जो मजबूत सुरक्षा चक्र तैयार किया था, उस सुरक्षा चक्र को मजहबी संकीर्णता के चलते औरंगजेब ने छिन्न-भिन्न कर दिया था।

अब औरंगजेब तो धरती से उठ चुका था किंतु उसके वंशज औरंगजेब की गलतियों का परिणाम भोगने के लिए अभिशप्त थे। फर्रूखसियर के दरबार में अब एक भी प्रबल हिन्दू राजा दिखाई नहीं देता था। वे तो स्वयं ही तलवारें खींचकर मुगलों का सत्यानाश करने पर तुल गए थे!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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