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आलमगीर की हत्या

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आलमगीर की हत्या- bharatkaitihas.com
आलमगीर की हत्या

बादशाह आलमगीर (द्वितीय) का वजीर इमादुलमुल्क लाल किले पर फहरा रहे अफगानी झण्डे को उतारना चाहता था किंतु भयभीत आलमगीर अफगानी झण्डे को हटाने के लिए तैयार नहीं था, इस पर इमादुलमुल्क ने आलमगीर की हत्या करवा दी।

ईस्वी 1757 में जब बंगाल के नवाब अली वर्दी खाँ की मृत्यु हो गई तो बादशाह आलमगीर (द्वितीय) ने उसके उत्तराधिकारी सिराजुद्दौला के नाम फरमान जारी करके उसे बंगाल का नवाब नियुक्त किया। 23 जून 1757 को अंग्रेजों ने सिराजुद्दौला पर आक्रमण कर दिया। कलकत्ता के पास प्लासी के मैदान में दोनों सेनाओं के बीच यह युद्ध लड़ा गया।

नवाब की सेना में लगभग 50,000 सैनिक थे जबकि अंग्रेज गवर्नर लॉर्ड क्लाइव के पास केवल 800 यूरोपियन तथा 2200 भारतीय सैनिक थे। नवाब ने अपनी सेना को चार सेनापतियों के अधीन नियुक्त किया किंतु चार में से तीन सेनापति युद्ध आरम्भ होते ही सिराजुद्दौला को छोड़कर लॉर्ड क्लाइव की ओर चले गए। इनका नेतृत्व मीर जाफर कर रहा था।

इस प्रकार बिना किसी युद्ध के ही क्लाइव ने प्लासी का युद्ध जीत लिया। नवाब जब पटना की ओर भाग रहा था, तब उसे बन्दी बना लिया गया। 28 जून 1757 को अँग्रेजों ने मीर जाफर को बंगाल का नवाब बना दिया। 2 जुलाई 1757 को मीर जाफर के पुत्र मीरन ने नवाब सिराजुद्दौला की हत्या कर दी। इतिहासकार के. एम. पणिक्कर ने लिखा है- ‘प्लासी एक ऐसा सौदा था, जिसमें बंगाल के धनी लोगों और मीर जाफर ने नवाब को अँग्रेजों के हाथों बेच दिया।’

आलमगीर (द्वितीय) कम्पनी की इस कार्यवाही से नाराज था परंतु मीर बख्शी इमादुलमुल्क ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के इस कदम को उचित ठहराया। इस युद्ध के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी बंगाल पर हावी हो गई और मुगल बादशाह का अब तक चला आ रहा नाम मात्र का नियंत्रण भी जाता रहा।

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मीर बख्शी इमादुलमुल्क ने बादशाह आलमगीर से कहा कि अब अहमदशाह अब्दाली वापस चला गया है इसलिए लाल किले पर लगा हुआ अफगानी झण्डा उतार दिया जाए किंतु बादशाह ने कहा कि अहमदशाह अब्दाली हमारा मित्र एवं सम्बन्धी है। हमने उसके साथ संधि की है इसलिए उसका झण्डा लाल किले से नहीं उतारा जाएगा। इस विषय पर बादशाह एवं मीर बख्शी की लड़ाई खुलकर सामने आ गई।

इस पर बादशाह आलमगीर (द्वितीय) ने अपने पुत्र अली गौहर से कहा कि वह मीर बख्शी इमादुलमुल्क की हत्या कर दे। इमादुलमुल्क को इस बात की जानकारी हो गई। इमादुलमुल्क को यह भी ज्ञात हुआ कि बादशाह फिर से अहमदशाह अब्दाली को दिल्ली बुलवा रहा है ताकि इमादउलमुल्क को समाप्त किया जा सके।

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इस पर इमादुलमुल्क ने मराठा सरदार सदाशिवराव भाऊ को दिल्ली आने का न्योता दिया जो कि पेशवा नाना साहब का भतीजा था। जब सदाशिवराव भाऊ दिल्ली के निकट पहुंच गया तो इमादुलमुल्क ने उसके साथ मिलकर बादशाह आलगमीर (द्वितीय) तथा उसके परिवार की हत्या करने का षड़यंत्र रचा। इस षड़यंत्र के तहत 29 नवम्बर 1759 को आलमगीर (द्वितीय) को सूचना दी गई कि कोटला फतेहशाह में एक फकीर बादशाह से मिलना चाहता है। बादशाह उसी समय उस फकीर से मिलने के लिए लाल किले से बाहर निकलकर फतेहशाह कोटला चला गया। बादशाह के वहाँ पहुंचते ही इमादुलमुल्क द्वारा नियुक्त कुछ हत्यारों ने अपने खंजरों से बादशाह पर ताबड़तोड़ वार किए। बादशाह आलमगीर (द्वितीय) की वहीं पर मृत्यु हो गई।

इमादुलमुल्क ने बादशाह का शव यमुनाजी के तट पर फिंकवा दिया तथा यह प्रचारित कर दिया कि बादशाह पैर फिसलने से मर गया। बादशाह की हत्या कर देने के बाद इमादुल्मुल्क दिल्ली से भागकर महाराजा सूरजमल की शरण में चला गया जहाँ उसका परिवार पहले से ही रह रहा था।

फादर वैंदेल ने लिखा है- ‘इस प्रकार उसने महान मुगलों का वजीर होने का अपना गौरव जाटों को अर्पित कर दिया। उसे एक जमींदार जाट से, एक भिखारी की तरह हाथ जोड़कर दया की भीख मांगते और उसके प्रजाजनों में शरण लेते तनिक भी लाज न आई। जबकि इससे पहले वह उससे पिण्ड छुड़ाने के लिये सारे हिन्दुस्तान को शस्त्र-सज्जित कर चुका था। इससे पहले मुगलों के गौरव को इतना बड़ा और इतना उचित आघात नहीं लगा था। इस अप्रत्याशित घटना ने उनके गौरव को घटा दिया और नष्ट कर दिया।’

आलमगीर की छः बेगमों तथा कई पुत्रों के नाम मिलते हैं जिनमें अली गौहर, मुहम्मद अली असगर, हारून हिदायत बख्श, ताली मुरादशाह, जमियत शाह, मुहम्मद हिम्मत शाह, अहसानउद्दीन मुहम्मद तथा मुबारक शाह आदि सम्मिलित हैं। आलमगीर (द्वितीय) की हत्या की सूचना मिलते ही बादशाह आलमगीर का बड़ा पुत्र अली गौहर लाल किले से भाग निकला और पटना चला गया। अलीगौहर को मुगलों के इतिहास में शाहआलम (द्वितीय) के नाम से जाना जाता है।

कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि आलमगीर की हत्या हो जाने पर पेशवा नाना साहब ने अपने पुत्र विश्वासराव को दिल्ली के तख्त पर बैठाने का प्रयास किया। सदाशिव राव ने इमादुलमुल्क को इस कार्य के पुरस्कार स्वरूप बड़ी रकम देने का लालच दिया किंतु इमादुलमुल्क कतई नहीं चाहता था कि भारत से मुगल वंश का शासन समाप्त करके दिल्ली का तख्त हिंदुओं को सौंप दिया जाए। अन्य मुस्लिम अमीरों ने भी मराठों का यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया।

इस काल में दिल्ली के मुस्लिम अमीरों की राजनीति समझ में नहीं आने वाली चीज बन गई थी। एक ओर तो वे दिल्ली का शासन हिंदुओं के अधिकार में सौंपने को तैयार नहीं थे और दूसरी ओर वे किसी भी मुगल बादशाह को चैन के साथ शासन नहीं करने दे रहे थे। उनकी हत्याएं कर-करके उन्हें हुमायूँ के मकबरे और कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह में दफना रहे थे। हुमायूँ के मकबरे में इतने बादशाहों के शव दफनाए गए कि उसे मुगलों का कब्रिस्तान कहा जाने लगा।

यदि दिल्ली के मुस्लिम अमीरों ने उस समय दिल्ली का तख्त मराठों को सौंप दिया होता तो इससे भारत की राजनीति पूरी तरह बदल जाती। संभवतः आगे चलकर पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठों को इतनी क्षति नहीं उठाने पड़ती और न कुछ ही वर्ष बाद शाह आलम (द्वितीय) को भारत की सत्ता अंग्रेजों के हाथों में सौंपनी पड़ती।

जब सदाशिव राव भाउ पेशवा के पुत्र विश्वासराव को दिल्ली के तख्त पर नहीं बैठा सका तो उसने इमादुलमुल्क के समक्ष शर्त रखी कि अगला बादशाह सदाशिव राव की पसंद से चुना जाएगा। इमादुलमुल्क ने मराठों की यह बात स्वीकार कर ली।

10 दिसम्बर 1759 को मुइन-उल-मिल्लत नामक एक मुगल शहजादे को नया बादशाह बनाया गया। उसे मुगलों के इतिहास में शाहजहाँ (तृतीय) के नाम से जाना जाता है। इस स्थान पर मुइन-उल-मिल्लत के बारे थोड़ी जानकारी देना समीचीन होगा।

पाठकों को स्मरण होगा कि औरंगजेब के सबसे बड़े पुत्र का नाम कामबख्श था जो औरंगजेब के पुत्र बहादुरशाह (प्रथम) द्वारा युद्ध के मैदान में मार दिया गया था। कामबख्श के बड़े पुत्र का नाम मुहि-उस-सुन्नत था। इसी मुहि-उस-सुन्नत का पुत्र मुइन-उल-मिल्लत था जो शाहजहाँ (तृतीय) के नाम से बादशाह हुआ। वह 10 महीने ही शासन कर सका।

10 अक्टूबर 1760 को मराठों ने शाहजहाँ (तृतीय) को गद्दी से उतार कर जेल में डाल दिया तथा उसके स्थान पर मरहूम बादशाह आलमगीर (द्वितीय) के बड़े बेटे अली गौहर को शाहआलम (द्वितीय) के नाम से बादशाह बना दिया जो इन दिनों पूर्वी भारत के शहरों में भटक रहा था। बादशाह शाहजहाँ (तृतीय) ई.1772 तक जेल में पड़ा सड़ता रहा और जेल में ही मृत्यु को प्राप्त हुआ।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सदाशिव राव भाऊ

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सदाशिव राव भाऊ

सदाशिव राव भाऊ मराठों का बड़ा सेनापति था। वह पेशवा नाना साहब प्रथम का चचेरा भाई था। अपने घमण्डी स्वभाव के कारण उसने मराठों की सेना को बड़े संकट में डाल दिया। जब अहमदशाह अब्दाली भारत के घावों से फिर से रक्त निकालने के लिए आया तो सदाशिव राव भाऊ नितांत अविवेकी सिद्ध हुआ।

हम चर्चा कर चुके हैं कि ई.1756 में अहमदशाह अब्दाली ने अपने पुत्र तिमूरशाह को लाहौर का सूबेदार बनाया था तथा मुगल बादशाह आलमगीर (द्वितीय) ने तिमूरशाह से अपनी पुत्री जौहरा बेगम का विवाह करके तिमूरशाह को लाहौर का सूबेदार स्वीकार कर लिया था किंतु ई.1758 में मराठों ने तिमूरशाह को लाहौर से मार भगाया तो अहमदशाह अब्दाली के लिए आवश्यक हो गया कि वह एक बार फिर भारत पर आक्रमण करे।

ईस्वी 1760 में अहमदशाह अब्दाली ने फिर से दिल्ली का रुख किया। इस बार वह पहले से भी अधिक विशाल सेना लेकर आया।

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इस बार उसके तीन लक्ष्य थे। उसका पहला लक्ष्य था मीर बख्शी इमादुलमुल्क जिसने अब्दाली द्वारा नियुक्त नजीब खाँ को मीर बख्शी के पद से हटा दिया था। अहमदशाह का दूसरा लक्ष्य था मराठा सरदार सदाशिव राव भाउ जिसने तिमूरशाह को लाहौर से मारकर भगा दिया था। अब्दाली का तीसरा लक्ष्य था महाराजा सूरजमल जाट जिसने पिछले अभियान में 10 लाख रुपए देने का वादा किया था किंतु उसने अब्दाली को फूटी कौड़ी भी नहीं दी थी।

जिस समय अहमदशाह अब्दाली अफगानिस्तान से रवाना हुआ, ठीक उसी समय दक्षिण भारत में स्थित मैसूर राज्य के शासक हैदर अली ने दक्षिण की ओर से मराठों पर आक्रमण किया। हैदरअली ने कुछ ही समय पहले मैसूर के हिन्दू शासक एवं उसकी माता को बंदी बनाकर मैसूर का राज्य हड़प लिया था। नए बादशाह शाहआलम (द्वितीय) ने सोचा कि उत्तर की ओर से अहमदशाह अब्दाली तथा दक्षिण की ओर से हैदर अली मराठों को पीसकर नष्ट कर देंगे। इसलिए बादशाह ने मराठों की पसंद के वजीरों को हटाकर अवध के नवाब शुजाउद्दौला को अपना मुख्य वजीर तथा रूहेला सरदार नजीबउद्दौला उर्फ नजीब खाँ को मुख्तार खास नियुक्त कर दिया।

जब मराठों को यह ज्ञात हुआ कि अहमदशाह अब्दाली फिर से दिल्ली की ओर आ रहा है तो पेशवा नानासाहब ने अब्दाली का मार्ग रोकने के लिये अपने भतीजे सदाशिव राव भाऊ के नेतृत्व में एक विशाल सेना दिल्ली की ओर रवाना की। 7 मार्च 1760 को सदाशिव राव भाऊ दक्षिण से चला।

सदाशिव राव अब तक राजपूताना से लेकर दिल्ली, गंगा-यमुना के दोआब एवं पंजाब में लाहौर तथा मुल्तान तक कई लड़ाइयां जीत चुका था इसलिए वह अपनी जीत के प्रति आवश्यकता से अधिक आश्वस्त था। सदाशिवराव भाउ तथा अन्य मराठा सदार अपने साथ भारी-भरकम लवाजमा लेकर रवाना हुए। उन्होंने अपने परिवारों की स्त्रियों, नृत्यांगनाओं, रखैलों और दासियों को भी अपने साथ ले लिया। लगभग चालीस हजार मराठा स्त्री-पुरुष एवं बच्चे उत्तर भारत के तीर्थों की यात्रा के उद्देश्य से इस मराठा सेना के साथ हो लिए।

युद्ध क्षेत्र में पहुंचने से पहले मराठा सेनापतियों एवं उनके परिवारों ने पुष्कर, गढ़मुक्तेश्वर और प्रयागराज आदि तीर्थों में डुबकियां लगाईं और काशी में विश्वनाथ के दर्शन किये। वे बड़ी ही लापरवाही से दिल्ली की ओर बढ़े।

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सदाशिव राव भाऊ पेशवा नाना साहब का भतीजा तथा चिम्माजी अप्पा का सिरफिरा और घमण्डी पुत्र था। उसे शत्रु और मित्र की पहचान नहीं थी। फिर भी उसे महाराजा सूरजमल के महत्व की जानकारी थी और उसने महाराजा तथा उसकी सेना को अब्दाली के विरुद्ध अपने साथ ले चलने की इच्छा व्यक्त की। भाऊ ने महाराजा सूरजमल को मराठों की तरफ से लड़ने का निमंत्रण भिजवाया।

महाराजा सूरजमल इस शर्त पर मराठों को अपने 10 हजार सैनिकों सहित सहायता देने को तैयार हो गया कि मराठे भरतपुर राज्य में उपद्रव नहीं करेंगे तथा चौथ वसूली के लिये तकाजे करके उसे तंग नहीं करेंगे।

मराठों ने सूरजमल की ये शर्तें स्वीकार कर लीं। 8 जून 1760 को सदाशिव राव भाऊ ने मराठा सैनिकों पर, जाटों को सताने या उनके क्षेत्र में लूटपाट करने पर रोक लगा दी। इसके बदले में सूरजमल ने मराठों को एक माह के उपयोग जितनी खाद्य सामग्री प्रदान की।

आगरा से 20 मील दूर बाणगंगा नदी के तट पर सदाशिव राव भाऊ ने डेरा लगाया। वहीं से उसने महाराजा सूरजमल को लिखा कि वह अपनी सेना को लेकर आ जाये। महाराजा को भाऊ पर विश्वास नहीं हुआ। इस पर मल्हारराव होल्कर तथा सिन्धिया ने सूरजमल की सुरक्षा के लिये शपथ-पूर्वक वचन दिया।

30 जून 1760 को सूरजमल अपने 10 हजार सैनिक लेकर भाऊ के शिविर में पहुंचा। भाऊ ने स्वयं दो मील आगे आकर सूरजमल का स्वागत किया। भाऊ ने यमुनाजी का जल हाथ में लेकर सूरजमल के प्रति अपनी मित्रता की प्रतिज्ञा दोहराई।
सदाशिव राव भाऊ ने महाराजा सूरजमल की सलाह पर मथुरा में एक युद्ध परिषद आहूत की जिसमें मीर बख्शी इमादुलमुल्क को भी बुलाया गया। इस युद्ध परिषद में सबसे सुझाव मांगे गये कि अहमदशाह अब्दाली का सामना किस प्रकार किया जाये।

महाराजा सूरजमल ने सदाशिव राव भाऊ को सलाह दी कि मराठा महिलाएं, अनावश्यक सामान और बड़ी तोपें जो इस लड़ाई में कुछ काम न देंगी, चम्बल के पार ग्वालियर तथा झांसी के किलों में भेज दी जायें और सदाशिवराव हल्के शस्त्रों से सुसज्जित रहकर अब्दाली का सामना करे। यदि मराठा सरदार अपनी महिलाओं को इतनी दूर न भेजना चाहें तो भरतपुर राज्य के किसी भी किले में भिजवा दें।

महाराजा सूरजमल ने भाऊ को यह भी सलाह दी कि अब्दाली से आमने-सामने की लड़ाई करने के स्थान पर छापामार युद्ध किया जाये तथा बरसात तक उसे अटकाये रखा जाये। जब बरसात आयेगी तो अब्दाली हिल भी नहीं पायेगा और संभवतः तंग आकर वह अफगानिस्तान लौट जाये।

सूरजमल को विश्वास था कि मराठों को सिक्खों तथा बनारस के हिन्दू राजा से भी सहायता प्राप्त होगी। क्योंकि अब्दाली ने सिक्खों का बहुत नुक्सान किया था। इसी प्रकार बनारस का राजा बलवंतसिंह अवध के नवाब शुजाउद्दौला का शत्रु था।
मल्हारराव होलकर ने महाराजा सूरजमल के बहुमूल्य सुझावों का समर्थन किया किंतु सदाशिव राव भाऊ अविवेकी व्यक्ति था, उसने सूरजमल के व्यावहारिक सुझावों को मानने से मना कर दिया।

वह न तो बरसात तक रुकने के पक्ष में था, न मराठा औरतों को युद्ध के मैदान से दूर रखने के पक्ष में था और न छापामार युद्ध करने के पक्ष में था। सदाशिव राव को अपने घमण्ड के कारण अब्दाली और उसकी सेना मच्छरों की भांति निर्बल लगती थी। इसलिए वह अब्दाली तथा उसकी सेना को तत्काल ही मसल कर नष्ट कर देना चाहता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जाट मराठा संघ

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जाट मराठा संघ

जब अहमदाशाह अब्दाली ने दिल्ली पर दूसरी बार आक्रमण किया तो मराठों के नेता सदाशिव राव भाऊ ने महाराजा सूरजमल से मिलकर जाट मराठा संघ बनाया ताकि अब्दाली को दिल्ली से दूर रखा जा सके।

मथुरा की युद्ध परिषद् के बाद मराठों और जाटों ने मथुरा से आगे बढ़कर दिल्ली पर अधिकार कर लिया। मुगल बादशाह मूक दर्शक की भांति बैठे रहने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सका। दिल्ली हाथ में आते ही सदाशिव राव भाऊ तोते की तरह आंख बदलने लगा। महाराजा सूरजमल के लाख मना करने पर भी भाऊ ने लाल किले के दीवाने खास की छतों से चांदी के पतरे उतार लिये और नौ लाख रुपयों के सिक्के ढलवा लिये।

सदाशिव राव भाऊ के सैनिकों ने दिल्ली एवं आगरा के लाल किलों, शाही महलों, मस्जिदों ताजमहल तथा अन्य मकबरों में लगे हीरे-मोती उतारने शुरु कर दिए। दिल्ली की मोती मस्जिद में औरंगजेब ने बहुत कीमती रत्न लगवाए थे, मराठों ने इन रत्नों को उतार लिया जिसके कारण मोती मस्जिद बुरी तरह से विरूपित हो गई।

सूरजमल स्वयं दिल्ली का शासक बनना चाहता था। उसे यह बात बुरी लगी और उसने भाऊ को रोकने का प्रयत्न किया किंतु भाऊ नहीं माना। सूरजमल चाहता था कि इमादुलमुल्क को फिर से दिल्ली का वजीर बनाया जाये किंतु भाऊ ने घोषणा की कि वह नारोशंकर को दिल्ली का वजीर बनायेगा। इससे सूरजमल और इमादुलमुल्क का भाऊ से मोह भंग हो गया। इस कारण जाट मराठा संघ टूटने के कगार पर आ गया। फिर भी महाराजा सूरजमल ने शांति से काम लेने का निश्चय किया।

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महाराजा सूरजमल चाहता था कि दिल्ली के बादशाह शाहआलम (द्वितीय) को मार डाला जाये क्योंकि उसने अहमदशाह अब्दाली को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया है किंतु बादशाह, भाऊ को अपना धर्मपिता कहकर उसके पांव पकड़ लेता था।

सदाशिव राव भाऊ का बादशाह शाहआलम (द्वितीय) के प्रति अनुराग देखकर सूरजमल नाराज हो गया। सूरजमल चाहता था कि दिल्ली की सुरक्षा का भार सूरजमल पर छोड़ा जाये किंतु सदाशिव राव भाऊ ने दिल्ली के महलों पर अपनी सेना का पहरा बैठा दिया। इन सब बातों से महाराजा सूरजमल खिन्न हो गया।

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उसने भाऊ से कहा कि वह दीवाने आम की चांदी की छत फिर से बनवाये तथा इमादुलमुल्क को दिल्ली का वजीर बनाने की घोषणा करे, अन्यथा भाऊ को सूरजमल की सहायता नहीं मिल सकती।  इस पर भाऊ ने तैश में आकर जवाब दिया- ‘क्या मैं दक्खन से तुम्हारे भरोसे यहाँ आया हूँ। जो मेरी मर्जी होगी, करूंगा। तुम चाहो तो यहाँ रहो, या चाहो तो अपने घर लौट जाओ। अब्दाली से निबटने के बाद मैं तुमसे निपट लूंगा।’

मल्हारराव होलकर तथा दत्ताजी सिन्धिया ने महाराजा सूरजमल की सुरक्षा की जिम्मेदारी ली थी किंतु वे समझ गये थे कि अब सूरजमल दिल्ली में सुरक्षित नहीं है। इसलिये उन्होंने सूरजमल के सलाहकार रूपराम कटारिया से कहा कि जैसे भी हो, सूरजमल को दिल्ली से निकल जाना चाहिये। रूपराम कटारिया ने यह बात सूरजमल को बताई। सूरजमल उसी दिन मराठों को त्यागकर बल्लभगढ़ के लिये रवाना हो गया। मल्हार राव होलकर और दत्ताजी सिन्धिया ने सूरजमल के निकल भागने की सूचना बहुत देर बाद भाऊ को दी। इस पर भाऊ, सूरजमल से बहुत नाराज हो गया। उसने सोचा नहीं था कि जाट मराठा संघ इतनी जल्दी बिखर जाएगा।

इमाद-उस-सादात का कथन है- ‘भाऊ ने सूरजमल से दो करोड़ रुपये मांगे और उसे संदेहजनक पहरे में रख दिया। संभवतः सूरजमल को इस पहरे में से निकलने के लिये विशेष प्रबंध करने पड़े।’

महाराजा सूरजमल द्वारा मराठों का त्याग करते ही मराठों पर विपत्तियां आनी आरम्भ हो गईं। अहमदशाह अब्दाली की सेनाओं को रूहेलों के राज्य से अनाज की आपूर्ति हो रही थी तथा मराठों को सूरजमल के राज्य से अनाज मिल रहा था किंतु सूरजमल के चले जाने से दिल्ली में अनाज की कमी होने लगी और अनाज के भाव अचानक बढ़ गये।

दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों को विगत कुछ वर्षों में इतना अधिक रौंदा गया था कि वहाँ से अनाज प्राप्त करना सम्भव नहीं रह गया था। भाऊ के बुरे व्यवहार के उपरांत भी सूरजमल की सहानुभूति मराठों से बनी रही। उसने मराठों को किसी तरह की क्षति पहुंचाने का प्रयास नहीं किया।

अहमदशाह अब्दाली ने सूरजमल से समझौता करने का प्रयास किया। वह चाहता था कि सूरजमल, भावी युद्ध से तटस्थ रहने की घोषणा कर दे ताकि मराठों को पूरी तरह से अकेला बनाया जा सके किंतु महाराजा सूरजमल ने अब्दाली से किसी तरह का समझौता करने का प्रस्ताव ठुकरा दिया।

जैसे-जैसे अब्दाली की सेनाएं दिल्ली के निकट आती गईं, वैसे-वैसे दिल्ली, आगरा और अन्य क्षेत्रों में रहने वाले लोग अपने परिवारों को लेकर भरतपुर राज्य में शरण लेने के लिये आने लगे। महाराजा सूरजमल ने इन शरणार्थियों के लिये अपने राज्य के दरवाजे खोल दिये। यहाँ तक कि घायल मराठा सरदार जनकोजी सिंधिया और उसका परिवार भी कुम्हेर आ गया।

मुगल बादशाह के वजीर इमादुलमुल्क ने भी अपना परिवार सूरजमल के संरक्षण में भेज दिया। उदारमना महाराजा सूरजमल ने अपने प्रबल शत्रुओं और उनके परिवारों को दिल खोलकर शरण दी। जाट मराठा संघ बिखर जाने पर भी सूरजमल मराठों के प्रति उदार बना रहा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मराठों का कत्ल

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मराठों का कत्ल

अहमदशाह अब्दाली से दिल्ली की रक्षा करने के लिए मराठों ने मोर्चा संभाला किंतु मराठा सेनापतियों की अदूरदर्शिता ने मराठों को संकट में डाल दिया तथा अब्दाली ने एक लाख मराठों का कत्ल कर दिया।!

अहमदशाह अब्दाली तेजी से दिल्ली की ओर बढ़ रहा था और दिल्ली की जनता उतनी ही तेजी से दिल्ली से दूर भाग रही थी। अहमदशाह अब्दाली राजनीति का शातिर खिलाड़ी था। उसे ज्ञात था कि इस बार उसका मुकाबला मराठों से है न कि भय से कांपती हुई कमजोर दिल्ली से।

इसलिए अब्दाली ने भारतीय मुस्लिम सेनापतियों का समर्थन प्राप्त करने के लिये घोषित किया कि हम दिल्ली के मुगल राज्य को मराठों की लूटमार से बचाने के लिए आए हैं। इसलिए भारत के समस्त मुसलमान शासकों, अमीरों एवं सैनिकों को चाहिए कि वे मराठों का साथ छोड़कर हमारे साथ आ जाएं ताकि भारत के दो सौ साल पुराने मुगल राज्य को समाप्त होने से बचाया जा सके।

अब्दाली द्वारा की गई इस घोषणा के बाद, उत्तर भारत के अधिकांश मुस्लिम शासक अहमदशाह अब्दाली के साथ हो गये। रूहेले तो इस घोषणा से पहले ही अहमदशाह अब्दाली के साथ हो गये थे। अवध का नवाब शुजाउद्दौला भी अब्दाली की तरफ हो गया। उन दिनों गंगा-यमुना के दो-आब में कुछ अफगान जागीरें थीं, जो मुगल बादशाह की कमजोरी का लाभ उठाकर स्वतंत्र राज्य बन बैठी थीं। उन जागीरों की मुस्लिम सेनाएं भी अहमदशाह अब्दाली की तरफ हो गईं।

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पाठकों को स्मरण होगा कि जब ई.1739 में नादिरशाह ईरान से भारत आया था तब अवध के नवाब सआदत खाँ ने नादिरशाह की सहायता की थी और जब ई.1748 में अहमदशाह अब्दाली पहली बार दिल्ली आया था तब रूहेला सरदार नजीब खाँ ने दिल्ली की मुगल सत्ता के विरुद्ध अब्दाली का साथ दिया था।

इस बार भी अवध के नवाब, रूहेले सरदार और अफगान अमीर भारत से गद्दारी करके आक्रांता की तरफ हो गए। और तो और मुगल बादशाह शाहआलम (द्वितीय) स्वयं भी अब्दाली के पक्ष में था, उसने तो स्वयं ही अब्दाली को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया था।

इस प्रकार जब भारत की मुस्लिम शक्तियां अहमदशाह अब्दाली के साथ हो गईं तो मराठा सरदार सदाशिवराव भाऊ ने घोषित किया कि वह विधर्मी विदेशियों को भारत से खदेड़ने के लिए यह लड़ाई लड़ रहा है; इसलिये समस्त भारतीय शक्तियाँ इस कार्य में सहयोग दें किंतु मराठों की लूटमार से संत्रस्त उत्तर भारत की किसी भी शक्ति ने मराठों का साथ नहीं दिया।

न तो पंजाब के सिक्ख मराठों की सहायता के लिए आगे आए क्योंकि अभी कुछ साल पहले ही मराठों ने पंजाब से भारी चौथ वसूली की थी, न बनारस का राजा बलवंतसिंह मराठों के पक्ष में लड़ने आया क्योंकि उसे भय था कि यदि मराठा जीत गए तो वे फिर से उसका देश उजाड़ने के लिए आ धमकेंगे।

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इस काल में उत्तर भारत की बड़ी शक्तियों में से एक राजा सूरजमल को तो स्वयं सदाशिव राव भाऊ ने ही नाराज करके चले जाने पर विवश कर दिया था। मराठों ने दिल्ली के निकटवर्ती राजपूत राज्यों से सहायता मांगी किंतु राजपूत राज्य तो पहले से ही मराठों द्वारा जर्जर कर दिये गये थे। इसलिये राजपूत राज्य अपने प्रबल मराठा शत्रुओं का साथ देने को तैयार नहीं हुए। इस प्रकार मराठे अकेले पड़ गए। उस काल में उत्तर भारत की कोई शक्ति उन पर विश्वास नहीं करती थी। विगत पचास वर्षों में मराठा सेनापतियों ने अपनी छवि लुटेरों वाली बना ली थी।

फिर भी सदाशिव राव भाऊ ने हिम्मत नहीं हारी। उसने मराठा सेनाओं के बल पर ही यह युद्ध लड़ने का निर्णय लिया। अगस्त 1760 में सदाशिवराव ने दिल्ली के निकट अफगानों के प्रमुख केन्द्र कंुजपुरा पर आक्रमण किया। कुंजपुरा में 15 हजार अफगान सैनिकों का जमावड़ा था, मराठों ने उन्हें नष्ट करके उनकी रसद सामग्री को छीन लिया। यहाँ से मराठों को कुछ युद्ध सामग्री भी प्राप्त हुई। मराठों ने दिल्ली से लगभग 60 मील दूर स्थित पानीपत में अहमदशाह अब्दाली से लड़ने का निर्णय लिया और वे यमुना पार करके पानीपत की तरफ बढ़े।

इससे पहले कि मराठे पानीपत पहुंच पाते, अहमदशाह अब्दाली पानीपत पहुंच कर अपने डेरे गाढ़ने में सफल हो गया। अब्दाली ने यमुना पार करके मराठों पर पीछे से आक्रमण करने की योजना बनाई।

नवम्बर 1760 में दोनों सेनाएँ आमने-सामने हो गईं। पानीपत के मैदान ने इससे पहले भी दो बार हिन्दुओं का साथ नहीं दिया था। इस बार भी पानीपत की तीसरी लड़ाई में हिन्दुओं का दुर्भाग्य उनके आड़े आ गया।

इस युद्ध में दोनों तरफ के सैनिकों की संख्या अलग-अलग बताई जाती है किंतु सर्वमान्य धारणा के अनुसार अहमदशाह अब्दाली के पक्ष में 60 से 70 हजार तथा मराठों की सेना में 40 से 50 हजार सैनिक थे। मराठों की सेना के साथ लगभग 40 हजार तीर्थयात्री भी थे जो मराठा सेना के संरक्षण में उत्तर भारत में तीर्थ यात्रा के लिए आए थे।

मराठा सेना के साथ कई हजार मनुष्य ऐसे थे जो युद्ध नहीं लड़ते थे अपितु वे भोजन बनाने, भार ढोने, गाड़ियां हांकने, पशुओं को चारा-पानी देने आदि काम करते थे। मराठा स्त्रियां भी पानीपत के निकट बनाए गए शिविरों में ठहराई गई थीं।

यह एक विचित्र लड़ाई थी जिसमें दोनों पक्ष यह दावा कर रहे थे कि वे मुगल बादशाह आलमगीर (द्वितीय) के राज्य को बचाने के लिए युद्ध कर रहे हैं किंतु इन दोनों ही पक्षों में मुगल बादशाह का एक भी सिपाही शामिल नहीं था।

मराठों को युद्ध का इतना उत्साह था कि वे लगभग दो माह तक अब्दाली के शिविर के पास चारों तरफ चक्कर काटते रहे। जब कोई इक्का-दुक्का अफगान सैनिक मराठों को मिल जाता था तो मराठे उसे मारकर बड़ी खुशी मनाते थे। अब्दाली को हमला करने की कोई जल्दी नहीं थी। वह मराठों की सेना के बारे में पूरी जानकारी एकत्रित कर रहा था। दो माह की अवधि में उसने मराठों की कमजोरियों का पता लगा लिया।

इस दौरान अहमदशाह अब्दाली को रूहेलों की तरफ से रसद आपूर्ति की जा रही थी जबकि मराठों की रसद आपूर्ति का कोई प्रबंध नहीं था। इस कारण दो महीनों में मराठों के पास अनाज की कमी होने लगी। इसी प्रकार मराठों के साथ आए हुए परिवारों को उत्तर भारत में पड़ने वाली कड़ाके की ठण्ड का भी पूरा अनुमान नहीं था। इसलिए वे सर्दी में बीमार पड़ने लगे। इसलिए अब वे शीघ्र युद्ध चाहते थे।

अंततः 14 जनवरी 1761 को दोनों सेनाओं के बीच अन्तिम निर्णायक युद्ध लड़ा गया। उस दिन मकर संक्रांति थी तथा पानीपत में कड़ाके की ठण्ड पड़ रही थी। मराठे अपनी जीत के प्रति इतने आश्वस्त और इतने मदमत्त थे कि उन्होंने युद्ध के सामान्य नियमों का पालन भी नहीं किया। न ही उन्होंने शत्रु की गतिविधियों पर दृष्टि रखी।

वे सीधे ही युद्ध के मैदान में धंस गये जबकि अब्दाली ने उस मैदान के तीन तरफ अपनी सेनाएं छिपा रखी थीं। जब मराठे युद्ध के मैदान में उतरे तो तीन तरफ से आई मुसलमानों की सेनाओं ने उन्हें घेर लिया। पाँच घण्टे के भीषण युद्ध के बाद दिन में लगभग दो बजे नाना साहब पेशवा का पुत्र विश्वास राव, शत्रु की गोली से मारा गया। 

यह सुनते ही सदाशिवराव भाऊ अपना संयम खो बैठा और अन्धाधुन्ध लड़ते हुए वह भी मारा गया। जसवंतराव पंवार, तुकोजी सिंधिया तथा मराठों के अनेक प्रसिद्ध सेनापति भी वीरगति को प्राप्त हुए। शाम होते-होते अब्दाली की सेना ने चालीस हजार मराठा सैनिक युद्ध के मैदान में काट डाले। नाना साहब फणनवीस युद्ध क्षेत्र से भाग खड़ा हुआ। जनकोजी सिंधिया युद्ध में घायल होकर भरतपुर राज्य की तरफ भागा। इसके बाद मराठों का कत्ल आरम्भ हो गया।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार मल्हारराव होलकर इस युद्ध में दोहरी नीति अपनाए हुए था। वह युद्ध के मैदान में लड़ रहा था किंतु स्वयं को बचाए रखना चाहता था। इसलिए युद्ध की स्थिति के प्रतिकूल होते ही वह सेना सहित भाग खड़ा हुआ। इस कारण बड़ी संख्या में मराठों का कत्ल होने की संभावना बढ़ गई।

अहमदशाह अब्दाली, अपने शत्रुओं को युद्ध के मैदान से इस तरह बच कर नहीं जाने दे सकता था। भागते हुए मराठों का कत्ल करने के लिए अहमदशाह अब्दाली ने पहले से ही कई हजार सैनिक युद्ध क्षेत्र के निकट अलग खड़े कर रखे थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मराठा परिवारों की दुर्दशा

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मराठा परिवारों की दुर्दशा

मराठा लोग वीर एवं युद्धजीवी थे किंतु पानीपत के मैदान में मराठा सैनिकों के कत्लेआम के बाद मराठा परिवारों की भयानक दुर्दशा हुई।

14 जनवरी 1761 को पानीपत के मैदान में अहमदशाह अब्दाली ने चालीस हजार मराठा सैनिकों को मार दिया तथा हजारों मराठा सैनिक युद्ध क्षेत्र से प्राण बचाकर भाग निकले। अहमदशाह अब्दाली ने अपने सैनिकों को भागते हुए मराठा सैनिकों के पीछे दौड़ाया। कई हजार मराठा सैनिकों को इस दौरान मार डाला गया।

मराठों की पराजय का समाचार मिलते ही हजारों मराठा स्त्रियां अपने बच्चों के साथ अपने शिविरों से निकलकर पानीपत शहर में शरण लेने के लिए भागीं। इसके साथ ही मराठा परिवारों की दुर्दशा आरम्भ हो गई। अब्दाली के सैनिकों ने पानीपत की गलियों में भागती मराठा औरतों एवं उनके बच्चों को पकड़ लिया। हजारों औरतों ने अब्दाली के सैनिकों के हाथों में पड़ने से बचने के लिए पानीपत के कुओं एवं तालाबों में छलांग लगा दी।

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युद्ध समाप्त होने के कुछ देर बाद ही अंधेरा हो गया। घायल मराठा सैनिक पूरी रात युद्ध के मैदान में पड़े रहे। उन्हें रोटी-पानी एवं दवा देने के लिए कोई नहीं आया। इस कारण कई हजार सिपाही रात में ठण्ड, भूख एवं प्यास से मर गए।  इस युद्ध में भाग ले रहे अवध के नवाब शुजाउद्दौला के दीवान काशीराज ने लिखा है- ‘इस युद्ध के बाद अफगानियों ने चालीस हजार मराठों को पकड़कर मार डाला तथा उनके सिरों को काटकर टीले बनाकर अहमदशाह अब्दाली को दिखाए।’

बॉम्बे गजट के रिपोर्टर हैमिल्टन ने लिखा है- ‘इस समय पानीपत में लगभग आधा मिलियन मराठे मौजूद थे जिनमें से 40 हजार पकड़ लिए गए।’ सरसरी दृष्टि से देखने पर आधा मियिन वाली संख्या सही नहीं लगती किंतु जब हम पानीपत के युद्ध में मारे गए सैनिकों की संख्या, युद्ध के बाद मारे गए स्त्री-पुरुषों की संख्या, युद्ध के बाद दास बनाए गए स्त्री एवं बच्चों की संख्या तथा भरतपुर राज्य में शरणार्थी के रूप में पहुंचे मराठा स्त्री-पुरुषों की संख्या को जोड़ते हैं तो पानीपत में आधा मिलियन मराठों का उपस्थित होना, सत्य जान पड़ता है।

सियार-उत-मुताखिरिन नामक ग्रंथ में लिखा है- ‘शोकसंतप्त कैदियों को लम्बी कतारों में लगा दिया गया तथा उनसे पैदल परेड करवाई गई। उन्हें कुछ भुना हुआ अनाज एवं थोड़ा सा पानी पीने के लिए दिया गया और उनके सिर काट दिए गए। बीस हजार बच्चों और औरतों को गुलाम बना लिया गया। ये सब लोग उच्च मराठा परिवारों के थे।’

कुछ अन्य स्रोतों के अनुसार 14 जनवरी की शाम तक पानीपत एवं आसपास के क्षेत्रों से लगभग 40 हजार स्त्री-बच्चे एवं पुरुष पकड़े गए। इन्हें ऊंटों, बैलगाड़ियों एवं हाथियों पर लादकर अब्दाली के शिविर में लाया गया तथा बांस से बनाए गए बाड़ों में ठूंस दिया गया और उन्हें अगले दिन कत्ल कर दिया गया।

बचे हुए मराठे जान हथेली पर रखकर भरतपुर तथा राजपूताना राज्यों में होते हुए महाराष्ट्र की तरफ भागे। मार्ग में किसानों तथा निर्धन लोगों ने भागते हुए मराठा सैनिकों एवं उनके परिवारों को लूटना और मारना आरम्भ किया। इस कारण भरतपुर राज्य में मराठा परिवारों की दुर्दशा अपने चरम पर पहुंच गई।

इस संग्राम पर टिप्पणी करते हुए जदुनाथ सरकार ने लिखा है- ‘इस देशव्यापी विपत्ति में संम्भवतः महाराष्ट्र का कोई ऐसा परिवार नहीं होगा जिसका कोई भी सदस्य मारा न गया हो!’

पूरे आलेख के लिए देखें यह वी-ब्लॉग-

यदि निष्पक्ष होकर विश्लेषण किया जाए तो पानीपत में मराठों की हार के कारण स्वयं मराठों ने ही उत्पन्न किए थे। पेशवा नाना साहब ने इस अभियान के लिए सदाशिवराव भाऊ का चयन किया था तथा मल्हार राव होलकर और रघुराथ राव को उसके साथ जाने के आदेश दिए थे।

रघुनाथ राव ने अपने घमण्डी भतीजे सदाशिवराव के साथ जाने से मना कर दिया। जबकि पेशवा को चाहिए था कि वह सदाशिव राव के स्थान पर रघुनाथ राव को इस अभियान का कमाण्डर नियुक्त करता क्योंकि उसे उत्तर भारत की राजनीति का अच्छा ज्ञान था तथा उसके कई मुगल अधिकारियों एवं जाट मंत्रियों से अच्छे सम्बन्ध थे।

मराठा सेनाओं का कमाण्डर सदाशिव राव भाऊ एक अविवेकी एवं तुनकमिजाज सेनापति था। वह किसी की सलाह नहीं मानता था और पूर्व में मिली सफलताओं के कारण उसका दिमाग फिर गया था। इस कारण उसने अपने सबसे बड़े दो सहायकों को नाराज कर लिया था। उनमें से एक था मल्हार राव होलकर तथा दूसरा था महाराजा सूरजमल।  

मल्हार राव होलकर जो कि इस युद्ध में सदाशिव राव भाऊ का सबसे बड़ा सहायक था, उसे भी भाऊ ने अपने व्यवहार से क्षुब्ध कर दिया था। इसलिए होलकर बहुत अनमने ढंग से इस युद्ध में उतरा और युद्ध में अब्दाली का पलड़ा भारी होते ही अपनी सेना लेकर भाग खड़ा हुआ। इतिहासकारों ने लिखा है कि यदि मल्हारराव होलकर कुछ देर और मैदान में टिका रहता तो संभवतः मराठों की ऐसी विकट पराजय नहीं हुई होती।

सदाशिव राव भाऊ के व्यवहार से क्षुब्ध होने वाला दूसरा सबसे बड़ा सहायक था महाराजा सूरजमल जिसे सदाशिव राव भाऊ ने लाल किले में बंदी बनाने का प्रयास किया था और सूरजमल मराठों का साथ छोड़कर भाग खड़ा हुआ था।  मराठों ने अपने साथ चालीस हजार तीर्थयात्रियों को लाकर भी बहुत बड़ी गलती की थी। सैनिकों के भोजन, आवास के साथ-साथ इन तीर्थयात्रियों के भोजन, आावस एवं सुरक्षा के प्रबंधन में मराठों की बहुत ऊर्जा एवं शक्ति व्यय हो गई तथा सेना को रसद पानी का अभाव भी झेलना पड़ा।

मराठा सेनापतियों का अपने परिवारों एवं स्त्री-बच्चों को साथ में लेकर आना भी मराठों के लिए अनिष्टकारी सिद्ध हुआ। इससे मराठों का ध्यान युद्ध से भटक गया। महाराजा सूरजमल ने सदाशिवराव भाउ को सुझाव दिया था कि वह मराठा स्त्रियों एवं बच्चों को युद्ध क्षेत्र तक ले जाने की बजाय भरतपुर राज्य के किसी दुर्ग में रख दे किंतु घमण्डी सदाशिवराव ने उसका यह सुझाव अस्वीकार कर दिया था।

महाराजा सूरजमल ने सदाशिव राव को यह भी सुझाव दिया था कि अब्दाली को मराठों की परम्परागत गुरिल्लामार युद्ध पद्धति से नष्ट किया जाए किंतु सदाशिवराव ने सम्मुख युद्ध करने का निर्णय लेकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जाटों की राजमाता

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जाटों की राजमाता

पानीपत के मैदान में मराठा सैनिकों का कत्लेआम हो जाने के कारण हजारों मराठा परिवार भरतपुर राज्य में घुस गए। जब इन्हें किसान लूटने लगे तो जाटों की राजमाता किशोरी देवी मराठा परिवारों की रक्षा के लिए आगे आई। जाटों की राजमाता ने कहा मराठा सैनिक मेरे बच्चे हैं इन्हें मत मारो!

जनवरी 1757 की कड़कड़ाती ठण्ड में पानीपत के मैदान से जान बचाकर भागे हुए मराठा सैनिकों ने भरतपुर राज्य का मार्ग पकड़ा। उनके पास न तो खाने को अनाज था और न पीने को पानी। उनके कपड़े फट गए थे, बहुतों के पैरों में तो जूते भी नहीं बचे थे। सर्द अंधेरी रातों में भीषण जाड़े एवं पाले में ठिठुरने के अतिरिक्त उनके पास और कोई उपाय नहीं था।

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पानीपत से पूना एक हजार मील दूर था। इतनी दूर तक भूखे-नंगे और पैदल चलते हुए पूना पहुंच पाना एक असंभव सा काम था। फिर भी मनुष्य जीना चाहता है और जीने के लिए हर संभव संघर्ष करना चाहता है। वह अपने घर से कितनी भी दूर क्यों न हो, हर हाल में अपनी धरती और अपने लोगों के बीच पहुंचना चाहता है। हजारों मराठा सैनिक, तीर्थयात्री एवं अन्य स्त्री-पुरुष तथा बच्चे भी इसी भावना के वशीभूत होकर महाराष्ट्र की तरफ भागे जा रहे थे।

जो मराठे कुछ दिन पहले तक अपने समक्ष किसी को कुछ गिनते नहीं थे, उन भागते हुए मराठा सैनिकों के हथियार, उनकी जेबों में रखे हुए रुपए और वस्त्र, उत्तर भारत के निर्धन लोगों ने छीन लिये। मराठा सैनिकों द्वारा पूर्व के काल में उत्तर भारत के सैंकड़ों गांव लूटे गए थे इसलिए इस क्षेत्र के लोग मराठों को पसंद नहीं करते थे और उन पर दया करने को तैयार नहीं थे। ऐसी विकट स्थिति में भरतपुर के जाटों की राजमाता किशोरी देवी को मराठों पर बड़ी दया आई। राजमाता ने घोषणा की कि मराठा सैनिक मेरे बच्चे हैं, इन्हें नहीं मारें।

जाटों की राजमाता ने समस्त भारतीयों और भारतीय राजाओं का आह्वान किया कि वे मराठा सैनिकों के प्राणों की रक्षा करें और उन्हें भोजन तथा शरण प्रदान करें। जो दुर्दशा मराठों ने उत्तर भारत के किसानों, जागीरदारों एवं राजाओं की, की थी, ठीक उसी दुर्दशा में स्वयं मराठे भी जा पहुंचे। भूखे और नंगे मराठा सैनिक किसी तरह प्राण बचाकर, महाराजा सूरजमल के राज्य में प्रविष्ठ हुए। सूरजमल ने उनकी रक्षा के लिये अपनी सेना भेजी। उन्हें भोजन, वस्त्र और शरण प्रदान की।

जाटों की राजमाता किशोरी देवी ने देश की जनता का आह्वान किया कि वे भागते हुए मराठा सैनिकों को न लूटें। मराठा सैनिकों को मेरे बच्चे जानकर उनकी रक्षा करें। राजमाता किशोरी देवी ने मराठा शरणार्थियों के लिये भरतपुर में अपने भण्डार खोल दिए। उसने सात दिन तक चालीस हजार मराठों को भोजन करवाया। ब्राह्मणों को दूध, पेड़े और मिठाइयां दीं। महाराजा सूरजमल ने प्रत्येक मराठा सैनिक को एक रुपया, एक वस्त्र और एक सेर अन्न देकर अपनी सेना के संरक्षण में मराठों की सीमा में ग्वालियर भेज दिया।

जदुनाथ सरकार ने भरतपुर राज्य में पहुंचे शरणार्थियों की संख्या 50,000 तथा अंग्रेज पादरी फादर वैंदेल ने एक लाख बताई है। ग्राण्ट डफ ने मराठा शरणार्थियों के साथ सूरजमल के व्यवहार की चर्चा करते हुए लिखा है- ‘जो भी भगोड़े उसके राज्य में आए, उनके साथ सूरजमल ने अत्यन्त दयालुता का बर्ताव किया। मराठे उस अवसर पर किये गये जाटों के व्यवहार को आज भी कृतज्ञता तथा आदर के साथ याद करते हैं।’

नाना फड़नवीस के एक पत्र में लिखा है- ‘सूरजमल के व्यवहार से पेशवा के चित्त को बड़ी सान्त्वना मिली।’

फादर वैंदेल लिखता है- ‘जाटों के मन में मराठों के प्रति इतनी दया थी कि उन्होंने उनकी सहायता की जबकि जाटों की शक्ति इतनी अधिक थी कि यदि सूरजमल चाहता तो एक भी मराठा लौटकर दक्षिण नहीं जा सकता था।’

जाटों की राजमाता किशोरीदेवी का यह कार्य भारत के इतिहास में सदा के लिए अमर हो गया।

एक लाख मराठा सैनिकों के मारे जाने के कारण मराठों की सैन्य शक्ति का बहुत ह्रास हुआ। यदुनाथ सरकार ने लिखा है- ‘इस भयंकर संघर्ष में मराठों को बुरी तरह मार खानी पड़ी। सम्पूर्ण महाराष्ट्र में शायद ही कोई ऐसा सैनिक परिवार बचा हो, जिसने पानीपत के इस पवित्र संघर्ष में अपना एक सदस्य न खोया हो।’

एक लाख मराठों का कत्ल हो जाने पर पूरा महाराष्ट्र विधवा मराठनों के करुण क्रंदन से गूंज उठा। मराठों की इस भारी पराजय से पेशवा बालाजी बाजीराव का हृदय टूट गया और 23 जून 1761 को वह हृदयाघात से मर गया। उसका पुत्र विश्वासराव पहले ही मारा जा चुका था, ऐसी स्थिति में मराठा सरदारों पर नियंत्रण रखने वाला कोई नहीं रहा। वे अपने क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिये एक-दूसरे के विरुद्ध षड्यंत्र रचने लगे।

पानीपत के युद्ध के बाद मराठों की तो दुर्दशा हुई ही थी किंतु मुगलों के धूल-धूसरित होने का पता पूरे देश को लग गया। वैसे तो औरंगजेब के समय से ही मुगलों की सत्ता पतन की तरफ जा रही थी तथा इस समय अपने पतन के चरम पर थी किंतु पानीपत का युद्ध समाप्त हो जाने के बाद मुगल सत्ता का नैतिक पतन भी हो गया।

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विजय मद में चूर अब्दाली ने हाथी पर बैठकर दिल्ली में प्रवेश किया। उसने बादशाह शाहआलम (द्वितीय) को एक साधारण कोठरी में बंद कर दिया। अहमदशाह अब्दाली तथा उसके सैनिकों ने बादशाह शाहआलम (द्वितीय) तथा उसके अमीरों की औरतों और बेटियों को लाल किले में निर्वस्त्र करके दौड़ाया और उन पर दिन-दहाड़े बलात्कार किये। निकम्मा शाहआलम (द्वितीय), अब्दाली के विरुद्ध कुछ नहीं कर सका।

अहमदशाह अब्दाली ने ई.1757 से ई.1761 के बीच महाराजा सूरजमल से कई बार रुपयों की मांग की। अपने राज्य की रक्षा के लिये महाराजा ने अब्दाली को कभी दो करोड़़, कभी 65 लाख, कभी 10 लाख तो कभी 6 लाख तथा अन्य बड़ी-बड़ी राशि देने के वचन दिये किंतु महाराजा ने अब्दाली को फूटी कौड़ी नहीं दी।

पानीपत की लड़ाई जीतने के बाद अब्दाली ने सूरजमल से एक करोड़ रुपया मांगा। सूरजमल ने अब्दाली के आदमियों का स्वागत किया तथा उन्हें बड़े इनाम-इकरार देकर कहा कि उसे कुछ मुहलत दी जाये, रुपये पहुंच जायेंगे। अब्दाली के आदमियों को भरोसा हो गया कि इस बार सूरजमल अवश्य ही रुपये दे देगा। इसलिये उन्हांने अब्दाली को भी आश्वस्त करने का प्रयास किया किंतु अब्दाली का धैर्य जवाब दे गया। उसने सूरजमल पर आक्रमण करने की योजना बनाई किंतु वह कार्यान्वित नहीं हो सकी। इस पर अब्दाली अड़ गया कि इस बार तो वह कुछ लेकर ही मानेगा।

महाराजा ने कहा कि उसे 6 लाख रुपये दिये जायेंगे किंतु अभी हमारे पास केवल 1 लाख रुपये ही हैं। अब्दाली केवल एक लाख रुपये ही लेकर चलता बना। उसके बाद महाराजा ने उसे कभी कुछ नहीं दिया।

जब अहमदशाह अब्दाली, लाल किले का पूरा गर्व धूल में मिलाकर अफगानिस्तान लौट गया तब मुगल शाहजादियाँ पेट की भूख मिटाने के लिये दिल्ली की गलियों में फिरने लगीं। इस प्रकार पानीपत के तृतीय युद्ध के बाद मुगल सल्तनत का लगभग अन्त हो गया। मुगलों तथा मराठों के पराभव ने अँग्रेजों के लिये मैदान साफ कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महाराजा सूरजमल की विजय

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महाराजा सूरजमल की विजय

मुगल शक्ति अहमदशाह अब्दाली के पहले आक्रमण में ही टूट चुकी थी, अब्दाली के दूसरे आक्रमण ने कुछ समय के लिए मराठों की भी कमर तोड़ दी। इस परिस्थिति का लाभ उठाते हुए महाराजा सूरजमल ने मुगल क्षेत्रों को जीत लिया। महाराजा सूरजमल की विजय भारत के इतिहास में नया मोड़ लाने वाली थी।

पानीपत की तीसरी लड़ाई के बाद उत्तर भारत की राजनीति में शून्यता आ गई। इस स्थिति का लाभ उठाते हुए भरतपुर के जाट राजा सूरजमल ने आगरा के लाल किले पर अधिकार करने का निर्णय लिया। ऐसा करके ही वह दो-आब क्षेत्र में एक ऐसी सशक्त शासन व्यवस्था स्थापित कर सकता था जो विदेशी आक्रांताओं का सामना कर सके तथा मराठों को भी दूर रख सके। 3 मई 1761 को सूरजमल के 4000 जाट सैनिक आगरा पहुंचे। उनका नेतृत्व बलराम कर रहा था।

बलराम ने आगरा नगर में अपनी चौकियां स्थापित करके प्रमुख स्थानों पर अधिकार जमा लिया। जब इन सैनिकों ने आगरा के लाल किले में प्रवेश करने की चेष्टा की तो दुर्गपति ने विरोध किया। इस झगड़े में 200 सैनिक मारे गये। इस दौरान महाराजा सूरजमल स्वयं मथुरा में बैठकर आगरा में हो रही गतिविधियों पर दृष्टि रख रहा था। 24 मई 1761 को सूरजमल यमुना पार करके कोइल पहुंच गया जिसे अब अलीगढ़ कहते हैं। जाट सेना ने कोइल तथा जलेसर पर अधिकार कर लिया।

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सूरजमल की सेना ने आगरा के लाल किले के किलेदार के परिवार को पकड़ लिया तथा किलेदार पर दबाव बनाया कि वह लाल किला सूरजमल को समर्पित कर दे। इस पर किलेदार ने एक लाख रुपये तथा पांच गांवों की जागीर मांगी। उसकी मांगें स्वीकार कर ली गईं। 12 जून 1761 को सूरजमल ने आगरा में प्रवेश किया तथा लाल किले पर अधिकार कर लिया। आगरा दुर्ग पर अधिकार के रूप में मिली महाराजा सूरजमल की विजय ने भारत भर में तहलका मचा दिया। आगारा दुर्ग से सूरजमल को बड़ी संख्या में विशाल तोपें, बारूद तथा हथियार प्राप्त हुए।

सूरजमल ने ताजमहल पर भी अधिकार कर लिया तथा उस पर लगे हुए चांदी के दो दरवाजे उखड़वा लिये और उन्हें पिघलवाकर चांदी निकलवा ली। ई.1774 तक आगरा, जाटों के अधिकार में रहा। पानीपत की लड़ाई के बाद रूहेलों ने मराठा सरदारों को भगाकर उनसे भौगांव, मैनपुरी, इटावा आदि क्षेत्र छीन लिये थे। सूरजमल ने रूहेलों पर आक्रमण करके उन्हें काली नदी के दूसरी ओर धकेल दिया तथा वहाँ की प्रजा को रूहेलों से मुक्ति दिलवाई।

अब्दाली ने रूहेलों को बुलंदशहर, अलीगढ़, जलेसर, सिकन्दराबाद, कासंगज तथा सोरों के क्षेत्र प्रदान किये थे। इससे पहले ये क्षेत्र महाराजा सूरजमल के अधिकार में हुआ करते थे। सूरजमल ने रूहेलों को खदेड़ कर अपने पुराने क्षेत्रों पर फिर से अधिकार कर लिया। इसी प्रकार अनूपशहर, सियाना, गढ़ मुक्तेश्वर एवं हापुड़ आदि क्षेत्रों से भी रूहेलों एवं अफगानियों को भगा दिया गया।

आगरा पर अधिकार करने के बाद महाराजा ने फरह, किरावली, फतहपुर सीकरी, खेरागढ़, कोलारी, तांतपुर, बसेड़ी तथा धौलपुर परगनों पर भी अधिकार कर लिया। इस प्रकार मुगलों की दो राजधानियां आगरा एवं फतेहपुर सीकरी सूरजमल के अधिकार में आ गईं। महाराजा सूरजमल की विजय यात्रा निरंतर जारी रही और उनके शत्रु मुंह की खाकर पीछे हटते रहे।

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महाराजा सूरजमल ने अपने दो पुत्रों जवाहरसिंह तथा नाहरसिंह को सेनाएं देकर हरियाणा के क्षेत्रों पर अधिकार करने के लिये भेजा। इस भू-भाग में इन दिनों मेव एवं बलूच मुसलमानों ने अपनी गढ़ियां स्थापित कर रखी थी।

रूहेलों एवं अफगानियों के बाद मेवों और बलूचों की बारी आनी ही थी। इन्हें मिटाये बिना दिल्ली पर सशक्त राजनीतिक सत्ता की स्थापना नहीं की जा सकती थी। इसलिये जाटों की एक टुकड़ी ने फरीदाबाद, बटेश्वर और राजाखेड़ा पर अधिकार कर लिया। सिकरवार राजपूतों से सिकरवाड़ ठिकाना एवं भदौरिया राजपूतों से भदावर ठिकाना भी जीत लिया गया।

इस प्रकार जाटों द्वारा ई.1762 से 1763 तक हरियाणा प्रदेश के विस्तृत क्षेत्र पर अधिकार कर लिया गया। जाटों के राजकुमार जवाहरसिंह की सेना ने रूहेलों से रेवाड़ी, झज्झर, पटौदी, चरखी दादरी, सोहना तथा गुड़गांव छीन लिये।

ई.1763 में फर्रूखनगर पर अधिकार करने को लेकर जाटों एवं बलोचों में युद्ध हुआ। जाटों का नेतृत्व राजकुमार जवाहरसिंह ने किया तथा बलोचों का नेतृत्व मुसावी खाँ ने किया। जब बलोचों का पलड़ा भारी पड़ने लगा तो स्वयं सूरजमल को युद्ध क्षेत्र में आना पड़ा। दो माह तक और घेरा डाला गया तथा जबर्दस्त दबाव बनाया गया।

अंत में मुसावी खाँ ने इस शर्त पर दुर्ग खाली करना स्वीकार किया कि राजा सूरजमल स्वयं गंगाजल हाथ में रखकर शपथ ले कि वह मुसावी तथा उसके आदमियों को दुर्ग से निरापद रूप से हट जाने देगा। महाराजा ने शपथ लेने से मना कर दिया। कुछ दिनों बाद महाराजा सूरजमल ने मुसावी खाँ को बंदी बनाकर भरतपुर भेज दिया। 12 दिसम्बर 1763 को दुर्ग पर सूरजमल का अधिकार हो गया।

गढ़ी हरसारू एक पक्की गढ़ी थी जो बड़ी संख्या में मेव डाकुओं को शरण देती थी। इसके नुकीले दरवाजों को तोड़ने में हाथियों का प्रयोग किया गया किंतु वे सफल नहीं हो सके। इस पर जवाहरसिंह ने अपने कुल्हाड़ी दल को गढ़ी का दरवाजा तोड़ने के लिये भेजा।

इन सैनिकों ने अपने सरदार सीताराम कोटवान के नेतृत्व में गढ़ी के दरवाजों पर हमला किया और दरवाजे को तोड़ दिया। जाट सेना तीव्र गति से गढ़ी में घुस गई और उसमें छिपे बैठे समस्त डाकुओं को मार डाला।

जाटों द्वारा रोहतक पर भी अधिकार कर लिया गया। इसके बाद सूरजमल ने दिल्ली से 12 कोस दूर स्थित बहादुरगढ़ का रुख किया। यहाँ पर बलोच सरदार बहादुर खाँ का अधिकार था। उसने नजीबुद्दौला से सम्पर्क किया किंतु सूरजमल ने किसी की नहीं सुनी और बहादुरगढ़ पर अधिकार कर लिया।

इस प्रकार सूरजमल ने दिल्ली, फतहपुर सीकरी एवं आगरा के चारों ओर के क्षेत्र रूहेलों, अफगानियों, मेवों और बलूचों से छीन लिए। ऐसा लगने लगा था कि दिल्ली पर भी एक दिन महाराजा सूरजमल की विजय होनी निश्चित है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महाराजा सूरजमल की हत्या

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महाराजा सूरजमल की हत्या

महाराजा सूरजमल के उत्थान से भारत के इतिहास को एक नई दिशा मिलने लगी थी किंतु मुसलमानों द्वारा धोखे से की गई महाराजा सूरजमल की हत्या ने भारत के इतिहास का रुख उलट दिया।

अब तक सूरजमल ने दिल्ली के चारों तरफ के इलाके छीन लिये थे। वह मुगलों की दो पुरानी राजधानियों- आगरा तथा फतहपुर सीकरी पर अधिकार कर चुका था तथा बहादुरगढ़ पर अधिकार करके दिल्ली के अत्यंत निकट पहुंच गया था। इसलिये दिल्ली की मुस्लिम सत्ता को अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ने के अतिरिक्त ओर कोई चारा नहीं रहा।

इस समय रूहेले ही नजीब खाँ उर्फ नजीबुद्दौला के नेतृत्व में दिल्ली की रक्षा कर रहे थे। रूहेला सरदार नजीबुद्दौला शाहआमल (द्वितीय) के मुख्तार खास के पद पर नियुक्त था। उसने सूरजमल पर नकेल कसने का विचार किया। सूरजमल ने नजीबुद्दौला से समझौता करने का प्रयास किया किंतु नजीबुद्दौला सहमत नहीं हुआ।

इस पर सूरजमल ने जवाहरसिंह को फर्रूखाबाद के दुर्ग में रुकने को कहा और स्वयं 23 दिसम्बर 1763 को यमुना पार करके गाजियाबाद चला गया। महाराजा सूरजमल ने गाजियाबाद के आसपास के कई गांवों को जला दिया तथा यमुना के पश्चिमी किनारे पर डेरा लगाया।

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कुछ दिनों बाद जाट सेना दिल्ली के दक्षिण में आकर बैठ गई। इस पर रूहेला सरदार नजीबुद्दौला दिल्ली से बाहर निकला और जाटों से चार मील पहले खिज्राबाद में आकर बैठ गया। इस पर सूरजमल फिर से यमुना पार करके अपनी पुरानी जगह पर जाकर बैठ गया। 24 दिसम्बर को नजीबुद्दौला ने सूरजमल से कहलवाया कि वह अपने राज्य को लौट जाये। महाराजा सूरजमल ने नजीबुद्दौला को दिल्ली से बाहर आने की चुनौती दी।

इस पर नजीबुद्दौला रात्रि के अंधेरे में दिल्ली से बाहर निकला और 25 दिसम्बर का सूरज निकलने से पहले ही दिल्ली से 16 किलोमीटर दूर हिण्डन नदी के पश्चिमी तट पर आकर डेरा गाढ़ लिया। उसके साथ लगभग 10 हजार सिपाही थे। महाराजा सूरजमल के पास 25 हजार सिपाही थे। सूरजमल ने नजीबुद्दौला को तीन तरफ से घेरने की योजना बनाई और अपने 5 हजार सिपाहियों को नजीबुद्दौला के पीछे की तरफ भेज दिया। 25 दिसम्बर की शाम के समय राजा सूरजमल अपनी सेना की स्थिति का अवलोकन करने के लिये अपनी एक छोटी सी टुकड़ी के साथ चक्कर लगाने के लिये निकला।

रूहेला सैनिकों को महाराजा सूरजमल के आगमन की सूचना मिल गई। वे हिण्डन नदी के कटाव में छिप कर बैठ गये। जब महाराजा वहाँ से होकर निकला तो रूहेलों ने अचानक महाराजा एवं उसके सैनिकों पर हमला बोल दिया। महाराजा एवं उसके सैनिकों को संभलने का अवसर ही नहीं मिला। सैयद मोहम्मद खाँ बलूच ने महाराजा के पेट में दो-तीन बार अपना खंजर मारा, एक सैनिक ने महाराजा की दांयी भुजा काट दी।

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भुजा के गिरते ही महाराजा धराशायी हो गया। उसी समय उसके शरीर के टुकड़े कर दिये गये। एक रूहेला सैनिक महाराजा की कटी हुई भुजा को अपने भाले की नोक में पताका की भांति उठाकर नजीबुद्दौला के पास ले गया। इस प्रकार 25 दिसम्बर 1763 की संध्या में ठीक उस समय हिन्दूकुल गौरव महाराजा सूरजमल की हत्या हो गई जब भगवान भुवन भास्कर दिन भर का कार्य निबटा कर प्रस्थान करने की तैयारी में थे।

किसी के लिए भी अचानक ही विश्वास करना कठिन था कि उस प्रतापी महाराजा सूरजमल की हत्या इस प्रकार के छल से की जा सकती है! महाराजा सूरजमल अठारहवीं सदी के भारत का निर्माण करने के लिये उत्तरदायी प्रमुख व्यक्तियों में से एक थे। उनका जन्म ऐसे समय में हुआ जब उत्तर भारत की राजनीति जबर्दस्त हिचकोले खा रही थी तथा देश विनाशकारी शक्तियों द्वारा जकड़ लिया गया था।

उस काल में नादिरशाह तथा अहमदशाह अब्दाली ने उत्तर भारत में बहुत बड़ी संख्या में मनुष्यों तथा गायों को मार डाला और तीर्थों तथा मंदिरों को नष्ट कर दिया। देश पर चढ़कर आने वाले आक्रांताओं को रोकने वाला कोई नहीं था। श्रीविहीन हो चुके मुगल, न तो दिल्ली का तख्त छोड़ते थे और न अफगानिस्तान से आने वाले आक्रांताओं को रोकते थे।

उस काल में उत्तर भारत के शक्तिशाली राजपूत राज्य, मराठों की दाढ़ में पिसकर छटपटा रहे थे। मराठे स्वयं भी नेतृत्व की लड़ाई में उलझे हुए थे। होलकर, सिंधिया, गायकवाड़ और भौंसले, उत्तर भारत के गांवों को नौंच-नौंच कर खा रहे थे। जब एक मराठा सरदार चौथ और सरदेशमुखी लेकर जा चुका होता था तब दूसरा आ धमकता था।

बड़े-बड़े महाराजाओं से लेकर छोटे जमींदारों की बहुत बुरी स्थिति थी। जाट और मराठे निर्भय होकर भारत की राजधानी दिल्ली के महलों को लूटते थे। जब शासकों की यह दुर्दशा थी तब जन-साधारण की रक्षा भला कौन करता! भारत की आत्मा करुण क्रंदन कर रही थी।

चोरों ओर मची लूट-खसोट के कारण जन-जीवन की प्रत्येक गतिविधि- कृषि, पशुपालन, कुटीर धंधे, व्यापार, शिक्षण, यजन एवं दान ठप्प हो चुके थे। शिल्पकारों, संगीतकारों, चित्रकारों, नृतकों और विविध कलाओं की आराधना करने वाले कलाकार भिखारी होकर गलियों में भीख मांगते फिरते थे। निर्धनों, असहायों, बीमारों, वृद्धों, स्त्रियों और बच्चों की सुधि लेने वाला कोई नहीं था। ऐसे घनघोर तिमिर में महाराजा सूरजमल का जन्म उत्तर भारत के इतिहास की एक अद्भुत घटना थी।

महाराजा ने राजनीति में विश्वास और वचनबद्धता को पुनर्जीवित किया। हजारों शिल्पियों एवं श्रमिकों को काम उपलब्ध कराया। ब्रजभूमि को उसका क्षीण हो चुका गौरव लौटाया। गंगा-यमुना के हरे-भरे क्षेत्रों से रूहेलों, बलूचों तथा अफगानियों को खदेड़कर किसानों को उनकी धरती वापस दिलवाई तथा हर तरह से उजड़ चुकी बृज भूमि को एक बार फिर से धान के कटोरे में बदल दिया।

महाराजा सूरजमल ने मुगलों और दुर्दान्त विदेशी आक्रान्ताओं का भारतीय शक्ति से परिचय कराया तथा अपने पिता की छोटी सी जागीर को न केवल भरतपुर, मथुरा, बल्लभगढ़ और आगरा तक विस्तृत किया अपितु चम्बल से लेकर यमुना तक के विशाल क्षेत्रों का स्वामी बन कर प्रजा को अभयदान दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बक्सर का युद्ध

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बक्सर का युद्ध

ई.1757 के प्लासी के युद्ध की तरह ई.1761 का बक्सर का युद्ध भारत के इतिहास में अधिक प्रसिद्ध नहीं है किंतु बक्सर का युद्ध भारत के इतिहास में युगांतरकारी मोड़ लाने वाला था जिसने मुगल बादशाह शाहआलम की बादशाही छीन ली।

ई.1761 में एक लाख मराठे पानीपत के तीसरे युद्ध में मारे जा चुके थे और मुगल सल्तनत की ईंट से ईंट बजाने वाला अहमदशाह अब्दाली ई.1763 में वापस अफगानिस्तान जा चुका था। ई.1763 में ही महाराजा सूरजमल को भी मार डाला गया था। इस प्रकार उत्तर भारत में अब मुगलों का कोई शत्रु नहीं बचा था।

मुगल बादशाह शाहआलम (द्वितीय) चाहता तो अपने पुराने मुगल सूबेदारों को फिर से अपने झण्डे के नीचे लाकर मुगल सल्तनत को पुनर्जीवित कर सकता था किंतु शाहआलम (द्वितीय) में इतनी प्रतिभा नहीं थी। वह नाम मात्र का बादशाह था, सल्तनत के समस्त अधिकार रूहेला सरदार नजीबुद्दौला के हाथों में थे जो अफगानिस्तान के शाह के प्रतिनिधि के रूप में दिल्ली में नियुक्त था। कोई भी मुगल सूबेदार उसका नियंत्रण क्यों स्वीकार करता! इसलिए लाल किले की विपन्न अवस्था ज्यों की त्यों बनी रही।

लाल किले के दुर्भाग्य से उस काल में पूर्व दिशा से अंग्रेजों का विजय रथ बहुत तेजी से दिल्ली की तरफ बढ़ा आ रहा था और दक्षिण की तरफ से मराठे फिर से शक्तिशाली होने का प्रयास कर रहे थे।

हमने इस धारावाहिक की 147वीं कड़ी में बताया था कि बंगाल के अमीर मीर जाफर ने बंगाल के सूबेदार सिराजुद्दौला से बगावत करके अंग्रेजों को प्लासी के युद्ध में विजय दिलवा दी थी जिसके बाद अंग्रेजों को बंगाल में राजनीतिक सत्ता मिल गई थी। कुछ ही समय बाद अंग्रेजों ने मीर जाफर को हटाकर मीर कासिम को बंगाल का सूबेदार बना दिया। जब मीर कासिम अंग्रेजों की धन सम्बन्धी मांग पूरी नहीं कर सका तो जुलाई 1763 में अंग्रेजों ने मीर कासिम पर हमला कर दिया। मीर कासिम अंग्रेजों से परास्त होकर पटना होता हुआ अवध भाग आया।

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अंग्रेजों ने फिर से मीर जाफर को बंगाल का नवाब बना दिया। मीर जाफर पहली बार अपने श्वसुर सिराजुद्दौला से गद्दारी करके नवाब बना था, उस समय भी उसने बंगाल का खजाना अँग्रेज अधिकारियों पर लुटा दिया था। दूसरी बार वह अपने जामाता को अपदस्थ किये जाने के बाद नवाब बना। इस बार भी कम्पनी के अधिकारियों ने उसे चूसने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

इससे बंगाल में अराजकता मच गई। अंग्रेजों ने जी भर कर बंगाल, बिहार और उड़ीसा को चूसना आरम्भ कर दिया। इन तीन प्रांतों के किसानों से अंग्रेजों को 30 लाख पौण्ड का वार्षिक राजस्व मिलता था। लॉर्ड क्लाइव का अनुमान था कि कम्पनी और उसके कर्मचारियों ने मीर जाफर से तीन करोड़ रुपये से अधिक की रकम ऐंठी थी।

मीर कासिम ने बंगाल से अवध भाग आने के बाद, अवध के नवाब शुजाउद्दौला की सहायता से अंग्रेजों पर पुनः आक्रमण करने की योजना बनाई। जबकि शुजाउद्दौला ने मीर कासिम को पकड़कर अंग्रेजों के हाथों में सौंपने की योजना बनाई किंतु जब मीर कासिम ने शुजाउद्दौला को बताया कि मीर कासिम के पास दस करोड़ रुपये मूल्य के जवाहरात हैं तो शुजाउद्दौला ने मीर कासिम को अंग्रेजों के हाथों में सौंपने का विचार त्याग दिया और मीर कासिम की सम्पत्ति हड़पने का षड़यंत्र रचा।

इन दिनों मुगल बादशाह शाहआलम (द्वितीय) भी शुजाउद्दौला के साथ इलाहाबाद में था। वह भी अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध करने के लिए तैयार हो गया। बादशाह शाहआलम ने भी दोहरी चाल चली। एक ओर तो वह शुजाउद्दौला के साथ अँग्रेजों के विरुद्ध युद्ध करने के लिये चल पड़ा और दूसरी ओर उसने गुप्त रूप से अँग्रेजों को लिख भेजा कि वह विवशता में नवाब शुजाउद्दौला का साथ दे रहा है।

ई.1764 के अंत में बनारस के पूर्व में स्थित बक्सर में शुजाउद्दौला तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी अपनी-अपनी सेनाएं लेकर पहुंच गए। अँग्रेजों ने युद्ध आरम्भ होने से पहले शुजाउद्दौला के कुछ अमीरों को घूस देकर अपनी तरफ मिला लिया। 23 अक्टूबर 1764 को बक्सर में दोनों पक्षों के मध्य संघर्ष हुआ। तीन घण्टे के युद्ध में अवध की सेना बुरी तरह से परास्त होकर मैदान से भाग खड़ी हुई। अँग्रेजों ने चुनार तथा इलाहाबाद के दुर्गों पर अधिकार कर लिया।

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शुजाउद्दौला ने मराठा सेनापति मल्हारराव होलकर से सहायता प्राप्त की परन्तु अपै्रल 1765 में कड़ा के युद्ध में अँग्रेजों ने उन दोनों को अर्थात् शुजाउद्दौला तथा मल्हारराव होलकर को परास्त कर दिया। अन्त में शुजाउद्दौला ने समर्पण कर दिया। मीर कासिम भागकर दिल्ली चला गया।

बक्सर के युद्ध में भारत के तीन प्रमुख व्यक्तियों- मुगल बादशाह शाहआलम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और बंगाल के नवाब मीर कासिम के भाग्य का फैसला हुआ। यहाँ तक कि मल्हारराव होलकर भी अँग्रेजों से परास्त हुआ। बक्सर विजय के परिणाम स्वरूप, सम्पूर्ण अवध सूबे पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी का नियंत्रण हो गया। इससे अँग्रेजों के लिए उत्तरी भारत में साम्राज्य की स्थापना का कार्य सरल हो गया।

अब ईस्ट इण्डिया कम्पनी एक अखिल भारतीय शक्ति बन गई। उसका प्रभाव क्षेत्र बंगाल से दिल्ली तक विस्तृत हो गया। अंग्रेज लेखक ब्रूम ने लिखा है- ‘इस प्रकार बक्सर का प्रसिद्ध युद्ध समाप्त हुआ, जिस पर भारत का भाग्य निर्भर था और जितनी बहादुरी से लड़ा गया, परिणामों की दृष्टि से भी उतना ही महत्त्वपूर्ण था।’

बक्सर का युद्ध समाप्त होने के बाद ई.1765 में अंग्रेजों और मुगल बादशाह के बीच एक संधि हुई। इसे इतिहास में इलाहाबाद की सन्धि कहा जाता है। इस संधि के अन्तर्गत बादशाह शाहआलम ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी अर्थात् राजस्व वसूलने का अधिकार ईस्ट इण्डिया कम्पनी को दे दिया तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने शाहआलम को 26 लाख रुपये वार्षिक पेंशन दे दी। जो मुगल बादशाह किसी समय अफगानिस्तान से लेकर बंगाल और काश्मीर से लेकर मैसूर तक के क्षेत्रों के अबाध स्वामी थे, अब मुगल बादशाह के अधीन केवल इलाहाबाद और कड़ा के सूबे रह गए थे।

अंग्रेजों ने मुगल बादशाह से दिल्ली का लाल किला नहीं छीना था किंतु वजीर नजीबुद्दौला ने शाहआलम को लाल किले में घुसने नहीं दिया। इस कारण शाहआलम छः वर्ष तक अवध के नवाब के संरक्षण में इलाहाबाद में निवास करता रहा।

आधुनिक भारत के इतिहास में पानीपत की तीसरी लड़ाई, प्लासी की लड़ाई तथा बक्सर की लड़ाई को सर्वाधिक निर्णायक युद्धों में से माना जाता है। बक्सर की लड़ाई के बाद बंगाल का नवाब कम्पनी के हाथों की कठपुतली बन कर रह गया जबकि अवध का नवाब कम्पनी पर निर्भर रहने वाला समर्थक मित्र मात्र था। मुगल बादशाह की हालत तो और भी बुरी हुई। उसे पेंशन देकर उसकी बादशाहत छीन ली गई।

जी. बी. मालेसन ने लिखा है- ‘चाहे आप इसे देशी और विदेशियों के बीच द्वंद्व युद्ध समझें या ऐसी एक सारगर्भित घटना जिसका परिणाम स्थाई और विशाल हुआ।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शाहआलम (द्वितीय)

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शाहआलम (द्वितीय)

बादशाह शाहआलम (द्वितीय) के वजीर नजीबुद्दौला ने बादशह को लाल किले से बाहर निकाल दिया। जब तक वजीर जीवित रहा, शाहआलम लाल किले में नहीं घुस सका।

ई.1765 में इलाहाबाद की संधि के अंतर्गत ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने मुगल बादशाह शाहआलम (द्वितीय) को 26 लाख रुपये वार्षिक पेंशन देकर शासन के कार्य से लगभग मुक्त कर दिया किंतु इलाहाबाद और कड़ा के सूबे अब भी मुगल बादशाह के अधिकार में थे।

कहने को तो यह शाहआलम की बादशाहत का अंत था किंतु इस पेंशन से बादशाह का जीवन सुधर गया। इस पेंशन के मिलने से पहलते तक तो बादशाह को दाल-रोटी के भी लाले थे और वह अवध के सूबेदार की मेहरबानी पर जिंदगी काट रहा था किंतु अब हर साल 26 लाख रुपए हाथ में आने से से बादशाह की शानौशौकत और चमक-दमक पहले की तरह लौट आई। बिना कोई युद्ध किए, बिना सल्तनत की परेशानियों में सिर खपाए, बिना वजीरों के झगड़ों में मगज-पच्ची किए, बादशाह मजे से जिंदगी काट सकता था।

इस संधि के अंतर्गत इण्डिया कम्पनी को बंगाल में दीवानी अधिकार प्राप्त हो गए। इन अधिकारों का उपयोग करके कम्पनी के गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स ने बंगाल में द्वैध शासन की व्यवस्था की। इस व्यवस्था के अंतर्गत बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा में किसानों से भूराजस्व की वसूली ईस्ट इण्डिया कम्पनी करती थी जबकि नागरिक प्रशासन के लिए बादशाह शाहआलम की तरफ से बंगाल के नवाब को नियुक्त किया गया था।

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यह सब दिखावटी और कोरी कागजी कार्यवाही थी। कम्पनी बंगाल, बिहार, उड़ीसा एवं अवध की वास्तविक स्वामिनी बन चुकी थी और अपने मनमर्जी से भारतीयों का शोषण कर रही थी। ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बंगाल के दीवानी अधिकार देने के बदले में ही बादशाह को 26 लाख रुपए की वार्षिक पेंशन दी गई थी।

इस काल में आगरा का लाल किला भरतपुर के जाटों के अधिकार में था किंतु दिल्ली का लाल किला अब भी मुगल बादशाह की सम्पत्ति था क्योंकि अंग्रेजों ने मुगल बादशाह से दिल्ली का लाल किला नहीं छीना था।

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इसे एक विडम्बना ही समझा जाना चाहिए कि दिल्ली के लाल किले में बादशाह के वजीर और मीरबख्शी बादशाह की सल्तनत चला रहे थे किंतु वे बादशाह शाहआलम को लाल किले में नहीं घुसने देते थे। इस कारण शाहआलम छः वर्ष तक अवध के नवाब शुजाउद्दौला के संरक्षण में इलाहबाद के किले में निवास करता रहा। इस दौरान शाहआलम का पुत्र मिर्जा जवान बख्त भी नजीबुद्दौला के साथ दिल्ली में था। इस अवधि में दिल्ली नगर का शासन ये दोनों मिलकर चला रहे थे।

ई.1770 में नजीबुद्दौला की मृत्यु हो गई। बादशाह शाहआलम (द्वितीय) ने इसे अपने लिए एक अवसर समझा और ई.1771 में शाहआलम ने मराठा सरदार महादजी शिंदे से एक समझौता किया। इस समझौते के अनुसार बादशाह ने इलाहाबाद और कड़ा के सूबे मराठों को सौंप दिए और इसके बदले में महादजी शिंदे ने बादशाह शाहआलम को दिल्ली के लाल किले में पुनः प्रवेश दिलवा दिया तथा बादशाह के दरबार एवं हरम के खर्चे के रूप में उसे 13 लाख रुपया वार्षिक पेंशन देना स्वीकार किया।

बादशाह द्वारा अंग्रेजों का संरक्षण त्यागकर मराठों से संधि करते ही अंग्रेजों ने बादशाह की पेंशन बंद कर दी तथा अंग्रेजों ने कड़ा तथा इलाहाबाद के जो सूबे बादशाह की निजी जागीर में छोड़े थे, वे भी जब्त कर लिए। महादजी सिंधिया चाहकर भी अंग्रेजों से इन दोनों सूबों को नहीं छीन सका। इस कारण महादजी सिंधिया ने बादशाह की पेंशन घटाकर केवल 17 हजार रुपया महीना कर दी।

26 लाख रुपए वार्षिक पेंशन के बंद होते ही बादशाह की शानौशौकत और चमक-दमक फिर से जाती रही। नौकरों और बांदियों को बादशाह की सेवा से पुनः हटा दिया गया और जीवन की पटरी फिर से दो जून की दाल-रोटी पर लौट आई किंतु बादशाह को संतोष था कि वह अपने पुरखों के बनाए हुए लाल किले में बैठा था और हिंदुस्तान का बादशाह था। ऐसा बादशाह जिसका आदेश किसी पर नहीं चलता था, जिसके पास एक भी सिपाही नहीं था, कोई कोष नहीं था और लाल किले को छोड़कर एक भी किला नहीं था।

कहने को तो लाल किला अब भी लाल किला था किंतु अब वह किसी बादशाह की राजधानी न होकर शाहअलम नामक एक आदमी का मकान बनकर रह गया था। अब मुगल बादशाह का कोई दरबार नहीं था। इस कारण, मुगल दरबार की सदियों से चली आ रही दलबन्दी भी स्वतः समाप्त हो गई थी जिसके चलते कई मुगल बादशाहों के कत्ल हुए थे। 

ई.1771 में जब शाहआलम (द्वितीय) पुनः लाल किले में लौटा तब उसकी आयु 43 वर्ष हो चुकी थी। मुगल अमीरों, वजीरों और सूबेदारों द्वारा साथ छोड़ दिए जाने के बाद अब ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भी शाहआलम का साथ छोड़ दिया था जिसके कारण वह मराठों द्वारा दी जा रही 17 हजार रुपए महीने की पेंशन पर जीवित था। फिर भी वह रोटी खाता रहा और जीवित बना रहा। कोई भी सशस्त्र व्यक्ति लाल किले में घुसकर मुगल बादशाह को जीत सकता था।

इसी दौरान ईरान से आए सफावी वंश के मिर्जा नजफ खाँ ने बादशाह शाहआलम से सम्पर्क किया तथा उसने बादशाह के समक्ष एक मुगल सेना खड़ी करने का प्रस्ताव दिया। बादशाह ने उसे सेना खड़ी करने की अनुमति दे दी। बंगाल के अपदस्थ सूबेदार मीर कासिम की सहायता से मिर्जा नजफ खाँ ने मुगल बादशाह के लिए एक छोटी सी मुगल सेना खड़ी कर ली। इस सेना को कुछ हाथी-घोड़े एवं बंदूकें भी मिल गईं किंतु इस सेना का कोई महत्व अथवा शक्ति नहीं थी। यह सेना किसी से युद्ध नहीं कर सकती थी, न बादशाह को उसका खोया हुआ इकबाल वापस दिलवा सकती थी।

ई.1772 में मराठों ने नजीबुद्दौला उर्फ नजीब खाँ की जागीर रोहिलखण्ड पर आक्रमण किया तथा नजीबुद्दौला के पुत्र जाबिता खाँ को परास्त करके पत्थरगढ़ पर अधिकार कर लिया और पत्थरगढ़ में रखे विशाल खजाने पर अधिकार कर लिया। रूहेलों ने मराठों की इस कार्यवाही के लिए मुगल बादशाह को जिम्मेदार माना और वे शाहआलम (द्वितीय) के शत्रु हो गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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