ममताबनर्जी की असली ताकत कौन है, वह जनता जिसने ममता के दल को वोट देकर चुना, या विदेशी घुपैठिए? या फिर कोई अन्य विदेशी शक्ति जो पड़ौसी बांगलादेश में शेख हसीना की सरकार का तख्ता पलट करके हिन्दुओं के खून से होली खेल रही है?
आखिर किस रहस्यमयी ताकत के बल पर ममता बनर्जी ने 28 अगस्त को देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम लेकर पूरे देश को धमकाया कि यदि ममता की सरकार अस्थिर हुई तो वे भारत की राजधानी सहित अनेक प्रांतों में आग लगा देंगी?
तो क्या अब ममता बनर्जी पश्चिमी बंगाल की निरंकुश मालकिन बन गई हैं और वे स्वयं ही इतनी ताकतवर हो गई हैं कि देश में आग लगा सकती हैं! या फिर उनकी ताकत के पीछे वास्तव में कोई और है?
ममता बनर्जी के अतिरिक्त और किसी मुख्यमंत्री ने 1947 से लेकर आज तक देश के प्रधानमंत्री के लिए इतने अपमानजनक शब्दों का प्रयोग नहीं किया और न ही कभी भारत की अस्मिता को चुनौती दी।
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर, इंदिरा गांधी, नरसिम्हा राव तथा अटल बिहारी वाजपेयी तक की सरकारों ने विभिन्न कारणों से राज्य सरकारों को बर्खास्त किया किंतु किसी भी मुख्यमंत्री ने न तो कभी प्रधानमंत्री के लिए जवाहर बाबू या अटल बाबू जैसे हल्के शब्दों का प्रयोग किया और न कभी देश में आग लगाने की धमकी दी।
जहाँ तक मुझे स्मरण है, जब अटलबिहारी वाजपेयी ने बिहार की सरकार बर्खास्त की थी, तब राबड़ी देवी हाथ में डण्डा लेकर बिहार की सड़कों पर उतरी थीं और उन्होंने बिहार के तत्कालीन राज्यपाल सुंदरसिंह भण्डारी के लिए कहा था कि इसकी एक टांग तो पहले से ही टूटी हुई है, दूसरी टांग मैं तोड़ डालूंगी।
ममता बनर्जी किसे धमका रही हैं, इसे समझना कठिन नहीं है किंतु इस धमकी की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसे समझना अत्यंत कठिन है। ममता बनर्जी को ऐसी भाषा का प्रयोग करने की हिम्मत कौन दे रहा है! भारत के विभिन्न प्रांतों में बैठे रोहिंग्या या बांगलादेश और नेपाल के बॉर्डर से आए वे विदेशी घुसपैठिए जो दीमक की तरह भीतर ही भीतर अपनी संख्या बढ़ा चुके हैं? इनमें से ममताबनर्जी की असली ताकत कौन है?
निश्चित रूप से नेताओं को जो भी शक्ति मिलती है, जनता के वोट से मिलती है। किसी भी नेता में यह शक्ति सदा के लिए नहीं रहती। जैसे ही नेता जनता की नजरों से उतरता है, स्वतः शक्तिविहीन हो जाता है। ममता को भी यह बात अच्छी तरह से ज्ञात होगी! इतना होने पर भी ममता आग से खेलने की तैयारी कर रही हैं तो किस ताकत के बल पर!
लोकतंत्र में जनता के द्वारा विधिवत् चुनी गई सरकार को भंग किया जाना श्रेयस्कर नहीं माना जा सकता किंतु जब चुनी हुई सरकार निरंकुश आचरण करने लगे अथवा प्रदेश में अराजकता फैल जाए तो उसे भंग करके जनता को फिर से अपनी पसंद की सरकार चुनने का अवसर देना पूरी तरह लोकतांत्रिक पद्धति है।
भारत के संविधान ने केन्द्र सरकार को जिम्मदारी दी है कि वह राज्य की जनता को अराजकता एवं निरंकुश शासन से बचाए। ममता की सरकार निरंकुश आचरण कर रही है तथा राज्य में अराजकता फैल गई है, इसलिए केन्द्र सरकार को शीघ्र ही कोई निर्णय लेना चाहिए।
यदि ममता की धमकी प्रधानमंत्री के अपमान तक सीमित रहती तो एक अलग तरह का मामला होता किंतु ममता की धमकी देश की अस्मिता के लिए खतरे के रूप में दिखाई दे रही है। इसलिए इस बात पर विचार किया जाना आवश्यक है कि ममताबनर्जी की असली ताकत कौन है?
इससे पहले कि पश्चिमी बंगाल में स्थितियां भयावह मोड़ लें, केन्द्र सरकार को कोई समुचित कदम उठाना चाहिए। यदि केन्द्र सरकार पश्चिमी बंगाल की जनता के हितों की रक्षा करने में अक्षम रहती है तो केन्द्र सरकार भी भारत की जनता का विश्वास खो देगी। जनता का विश्वास ही लोकतंत्र की असली ताकत है।
लोकतंत्र हो अथवा राजतंत्र राजनीति में सत्य को प्रायः दूसरा स्थान मिलता है, पहला स्थान पाखण्ड को मिलता है। इसी पाखण्ड को राजनीति और कूटनीति कहा जाता है। यही कारण है कि कंगना रनौत सत्य बोलकर कई बार विरोधियों के निशाने पर आ जाती हैं। हर बार उन्हें अपने द्वारा बोले गए सत्य के लिए विरोध सहन करना पड़ता है। महाराष्ट्र में भी उनके साथ ऐसा ही कुछ हुआ था।
इस बार जब कंगना रनौत ने यह कहा कि किसान आंदोलन के नाम पर कुछ उपद्रवी तत्व भारत में वैसा ही कुछ करना चाहते थे जैसा कि बांगलादेश में हुआ, तो कंगना की अपनी पार्टी ने ही कंगना के वक्तव्य से किनारा कर लिया। यदि ईमानदारी से देखा जाए तो कंगना रनौत ने गलत क्या कहा?
कंगना रनौत ने वही तो कहा जो राकेश टिकैत ने खुलेआम स्वीकार किया! टिकैत ने कहा कि भारत में बंगलादेश जैसा काम अवश्य होकर रहेगा, हमारी पूरी तैयारी है! यह काम तो उसी दिन हो लेता जिस दिन हम प्रधानमंत्री निवास की बजाय लाल किले की तरफ मुड़ गए थे। हमें किसी न बहकाया नहीं होता तो हम लाल किले की तरफ नहीं जाते, मोदी की तरफ जाते।
कांग्रेस के सारे नेता अलग-अलग शब्दों में यह बात कह चुके हैं कि भारत में भी एक दिन वह होगा जैसा बंगलादेश में हुआ है। बंगलादेश में हुए प्रकरण के बाद सबसे पहले उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना के प्रवक्ता संजय राउत ने बड़ी कठोर शब्दावली में कहा था कि भारत एक दिन बंगलादेश बनेगा और यह भी बताया था कि क्यों बनेगा!
राउत, टिकैत और अन्य विपक्षी नेताओं के वक्तव्यों के बाद कंगना रनौत ने जो कुछ कहा, उसमें गलत क्या था? फिर भी यदि भारतीय जनता पार्टी ने उनके इस बयान से किनारा कर लिया तो उसका एकमात्र कारण यह दिखाई देता है कि इन दिनों भारत की राजनीति मिथ्या नरेटिव गढ़ने के आधार पर चल रही है। हालांकि सत्य के आधार पर तो शायद ही कभी चली।
विपक्ष के नेता आए दिन एक झूठा नरेटिव गढ़ते हैं और भाजपा को उसमें घेरने का प्रयास करते हैं कि भाजपा किसान विरोधी है, भाजपा मजदूर विरोधी है, भाजपा दलित विरोधी है, भाजपा ओबीसी विरोधी है, भाजपा मुसलमान विरोधी है, भाजपा आरक्षण विरोधी है, भाजपा छात्र विरोधी है, भाजपा महिला विरोधी है। यदि ऐसा है तो फिर देश में ऐसा कौन बच जाता है, भाजपा जिसकी विरोधी नहीं है।
यही कारण है कि यदि भाजपा स्वयं को कंगना के वक्तव्य से अलग नहीं करती तो अवश्य ही विपक्षी दल भाजपा के विरुद्ध इस नरेटिव को और गहरा करने का प्रयास करते कि भाजपा और नरेन्द्र मोदी किसानों को आतंकवादी और खालिस्तानी मानते हैं।
विपक्षी दलों ने किसान आंदोलन को लेकर जो हो-हल्ला मचाया, उसके कारण भारत सरकार और भाजपा कभी भी देश के आम किसान तक यह संदेश नहीं पहुंचा पाईं कि दिल्ली की सीमाओं पर जो कुछ हुआ वह किसान आंदोलन नहीं था, अपति भारत के अरबन नक्सलियों एवं कनाडा में बैठे खालिस्तानी आतंकियों द्वारा किसानों को उकसाकर किया गया एक नक्सली षड़यंत्र था जिसका उद्देश्य देश में अराजकता फैलाकर सरकार की छवि को खराब करना था।
यदि यह नक्सली एवं खालिस्तानी षड़यंत्र नहीं था तो फिर लाल किले से तिरंगा उतारकर क्यों फैंका गया। आंदोलन के दौरान सिक्खों का धर्मग्रंथ फाड़ने से लेकर बलात्कार जैसी तमाम तरह की गैरकानूनी हरकतें क्यों हुईं? यदि यह नक्सली आंदोलन नहीं था तो ‘हाय-हाय मोदी मरजा तू’ जैसे नारे क्यों लगाए गए?
निश्चित रूप से किसानों की आड़ में नक्सली तत्व ही ऐसे नारे लगा रहे थे और खालिस्तानी तत्व भारत का झण्डा उतारकर फैंक रहे थे। यदि उनका उद्देश्य बंगलादेश में हुई घटना जैसा कार्य करने का नहीं था तो और क्या था? यह तो हमारा सौभाग्य है कि देश बहुत बड़ा है और देश की अधिकांश जनता अहिंसक एवं धर्मप्राण है।
जब तक भारत की जनता अपने इस नैसर्गिक स्वरूप में अर्थात् अहिंसक एवं धर्मप्राण बनी रहेगी, तब तक भारत में वैसा कुछ नहीं होगा जैसा श्रीलंका एवं बंगलादेश में हुआ है। जहाँ तक कंगना रनौत का प्रश्न है, उन्होंने कुछ भी गलत नहीं कहा अपितु भारत की जनता को षड़यंत्रकारियों के चंगुल में फंसने से रोकने का प्रयास किया है।
योगी आदित्यनाथ ने जन्माष्टमी के दिन जो कुछ कहा, वैसा कहने की हिम्मत वर्ष 2014 से पहले देश में केवल दो ही राजनेताओं में थी, एक तो स्वयं योगी आदित्यनाथ जिन्होंने भारत की संसद में सनातन की रक्षा के लिए राजनीतिक दलों से बार-बार गुहार लगाई और दूसरे गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी।
आदित्यनाथ योगी और नरेन्द्र मोदी में अंतर केवल इतना है कि जो बात योगी खुलकर बोलते हैं, उसे नरेन्द्र मोदी संकेतों में कहते हैं, उदाहरण भर देते हैं जैसे कि कपड़ों से पहचान लो, कार के पिछले पहिए के नीचे आदि-आदि।
अभी उन बातों को अधिक दिन नहीं हुए हैं जब नई संसद में प्रतिपक्ष के नेता की हैसियत से राहुल गांधी ने हिन्दुओं को हिंसक कहा। इस पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में कहा था कि अब सनातन को भी सोचना होगा।
नरेन्द्र मोदी सनातन को क्या सोचने के लिए कह रहे थे! आदित्यनाथ योगी ने वही स्पष्ट किया है कि बंटेंगे तो कटेंगे! एक रहेंगे तो नेक रहेंगे। स्वाभाविक है कि राहुल, अखिलेश एवं औबेसी जैसे नेता हायतौबा मचाएं कि योगी ने ऐसा क्यों कहा!
क्या विगत एक शताब्दी में अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांगलादेश में सनातन के साथ जो कुछ हो गया है और उन्हें निरीह पशुओं की तरह काट दिया गया है, उसे देखकर सनातन को अपने लिए सोचने का अधिकार नहीं है! क्या सनातन को अपने बचाव के लिए एक रहने का अधिकार नहीं है!
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद में और योगी आदित्यनाथ ने सार्वजनिक मंच से जो कुछ कहा है, वही चिंता कुछ महीने पहले असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा भी सार्वजनिक रूप से प्रकट कर चुके हैं। उन्होंने देश को स्पष्ट शब्दों में बताया कि असम की डेमोग्राफी तेजी से बदल रही है, कुछ ही दशकों में असम में हिन्दू अल्पसंख्यक हो जाएंगे। यह मेरे लिए अस्तित्व का प्रश्न है।
क्या होता है, जब देश की डेमोग्राफी बदलती है! इसे समझने के लिए अयोध्या संसदीय क्षेत्र के चुनाव परिणाम को देखना पर्याप्त है। भाजपा जैसा मजबूत राजनीतिक दल, राममंदिर बनवाकर भी, धारा 370 हटाकर भी, निशुल्क आटा खिलाकर भी, अलग लद्दाख क्षेत्र बनवाकर भी, सिटीजनशिप अमेंडमेंट कानून लाकर भी, अयोध्या संसदीय क्षेत्र का चुनाव हार जाता है और अखिलेख यादव जैसा सनातन विरोधी नेता 37 सीटें पाकर एवं राहुल गांधी जैसा सनातन विरोधी नेता 99 सीटें पाकर सनातन धर्म वालों का संसद के भीतर और बाहर उपहास करते हैं, उसे हिंसक बताते हैं।
पूरी दुनिया में लेबनान देश में डेमोग्राफिक परिवर्तन से हुए विनाश की चर्चा हो रही है। कुछ दशक पहले तक लेबनान ईसाई देश हुआ करता था, चुपचाप वहाँ की डेमोग्राफी बदल दी गई। आज लेबनान मुस्लिम देश है। कभी इजराइल के समर्थन में खड़ा रहने वाला लेबनान आज इजराल से भयानक युद्ध कर रहा है।
इस बात पर विचार करने की आवश्यकता है कि योगी आदित्यनाथ को यह क्यों कहना पड़ा कि बंटेंगे तो कटेंगे! योगी आदित्यनाथ ने यह बात राहुल गांधी और अखिलेश यादव आदि सनातन विरोधी राजनीति करने वाले नेताओं द्वारा की जा रही जातीय जनगणना की मांग के विरोध में कही है। जातीय जनगणना सनातन को बांटने का षड़यंत्र है।
देश में जातीय आधार पर लागू की गई आरक्षण व्यवस्था पहले ही सनातन को एससी, एसटी, ओबीसी और जनरल में बांट चुकी है, अब सनातन के बारीक टुकड़े करने की तैयारी है। हालांकि कांग्रेस इस दिशा में बहुत पहले से ही जुटी हुई है। इसे इस बात से समझा जा सकता है कि अंग्रेजों ने जब 1931 में जातीय आधारित जनगणना करवाई थी, तब भारत में 4147 जातियां पाई गई थीं किंतु कांग्रेस की सरकार द्वारा वर्ष 2011 के आर्थिक सर्वेक्षण में 46 लाख से अधिक जातियों के नामों की सूची तैयार करवाई गई थी।
इतना तो कोई भी सामान्य समझ वाला व्यक्ति जानता है कि भारत में 46 लाख जातियां नहीं रहतीं। कांग्रेस इस सूची की आड़ में क्या खेल करना चाहती थी, इसे समझना कठिन है।
राहुल गांधी, मुलायमसिंह के सुपुत्र अखिलेश यादव और चिराग पासवान आदि नेता जातीय जनगणना करवाकर उससे कौनसा सामाजिक अथवा आर्थिक लक्ष्य प्राप्त करना चाहते हैं?
जातीय जनगणना के आधार पर न तो खेती की भूमि का फिर से बंटवारा होगा, न पशुपालकों की भैंसें बांटी जाएंगी। ट्रैक्टर भी जहाँ खड़े हैं, वहीं रहेंगे। लोकसभा में 545 के आसपास सीटें हैं, इन सीटों को हजारों अथवा लाखों जातियों में कैसे बांटा जाएगा! सरकार नौकरियों को भी जातीय आधार पर कैसे बांटा जाएगा।
जातीय जनगणना से केवल एक ही लक्ष्य प्राप्त होगा कि सनातन के सामाजिक ताने-बाने में असंतोष को चरम पर पहुंचाकर उसे आपस में ही लड़वा कर बिखेर दिया जाए। अतः योगी आदित्यनाथ की बात समय रहते सुनी जानी चाहिए। एक रहिए, नेक रहिए। सनानत को एक मजबूत शक्ति के रूप में स्थापित कीजिए।
सनातन के सामाजिक एवं आर्थिक ताने-बाने को सुधारने के लिए वैज्ञानिक पद्धति से एवं योजनाबद्ध ढंग से काम किया जाना चाहिए न कि जातीय जनगणना करवाकर भारत राष्ट्र के अस्तित्व के लिए कोई बड़ा खतरा पैदा करना चाहिए।
भगवान् श्रीकृष्ण ने मानव जाति को ज्ञान, कर्म एवं भक्ति पर आधारित जीवन व्यतीत करने का मार्ग दिखाया। इस कारण कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् कहकर उनके अवदान की प्रतिष्ठा की जाती है।
विष्णु वैदिक देवों में एक हैं। उन्हें सृष्टिकर्त्ता, सृष्टिपालक एवं सृष्टिनियंता होने के साथ-साथ जीव को भवसागर से मुक्ति देने वाला परमात्मा कहा गया। इस कारण वेदों को मानने वालों में विष्णु की पूजा का प्रचलन हुआ। विष्णु को संकर्षण एवं वासुदेव भी कहा जाता है। जब भगवान श्रीकृष्ण इस जगत् में अवतार के रूप में प्रतिष्ठित हुए तो उन्हें संकर्षण होने के कारण श्रीकृष्ण कहा गया तथा वैकुण्ठवासी वासुदेव का अवतार माना गया। वसुदेव के पुत्र होने के कारण भी श्रीकृष्ण को वासुदेव कहा गया।
विष्णु तथा उनके अवतारों की पूजा करने वालों को वैष्णव कहा गया और उनका सम्प्रदाय भागवत धर्म के नाम से प्रसिद्ध हुआ। श्रीकृष्ण-भक्ति का प्रभाव भारत की सीमाओं को पार करके सुदूर पूर्व एवं पश्चिम तक फैला। श्रीकृष्ण के मुख से निकली गीता दार्शनिक जगत की अमूल्य निधि घोषित हुई।
श्रीकृष्ण ने हिन्दुओं के दार्शनिक चिंतन में क्रान्तिकारी परिवर्तन किये जिससे वैदिक धर्म का काया-कल्प होकर उसे लोक में अधिक प्रसिद्धि प्राप्त हुई। श्रीकृष्ण के समय में ब्रजक्षेत्र में इन्द्रदेव की पूजा होती थी जो एक प्राचीन वैदिक देवता था और जिसके बारे में मान्यता थी कि इन्द्र अपनी पूजा से प्रसन्न होकर धरती पर वर्षा करता है तथा उसके अप्रसन्न होने से अतिवृष्टि अथवा अनावृष्टि होती है।
भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को अपने अलौकिक स्वरूप के दर्शन करवाकर निष्ठुर इन्द्रदेव की पूजा समाप्त करवा दी तथा वैदिक यज्ञों को पुनः प्रतिष्ठित किया। उन्होंने धर्मराज युधिष्ठर से सात्विक ढंग का राजसूय यज्ञ करवाया और झूठी पतलों को उठाने का कार्य स्वयं अपने हाथों से किया। श्रीकृष्ण ने राधारानी की प्रतिष्ठा को अपने समकक्ष करके लौकिक जगत में स्त्री-पुरुष के आध्यात्मिक भेद को समाप्त किया।
श्रीकृष्ण ने गीता के माध्यम से ज्ञान, भक्ति एवं कर्म की त्रयी प्रवाहित की तथा मनुष्य को निरासक्त रहकर कर्म करने का उदपेश दिया। उन्होंने स्वयं ग्वाला बनकर गोपालों के साथ क्रीड़ की, गोपियों को प्रेम का संदेश दिया, तथा गायों की सेवा करके मनुष्य को सहज-सरल धर्म का पालन करने का मार्ग दिखाया। श्रीकृष्ण ने कंस आदि बुरी शक्तियों का संहार करके मनुष्य के समक्ष बुराइयों से लड़ने का मार्ग प्रशस्त किया।
भगवान श्रीकृष्ण ने अपने धर्मनिष्ठ पाण्डवों को अतिशय विनम्रता के कारण उत्पन्न अकृमण्यता की स्थिति से बाहर निकाला तथा अपना नैसर्गिक अधिकार प्राप्त करने के लिए प्राणों की बाजी तक लगाने का उपदेश दिया।
श्रीकृष्ण ने ही भारत के समस्त अच्छे और बुरी क्षत्रियों को कुरुक्षेत्र के मैदान में खींचकर उनके बीच महाभारत जैसे विशाल युद्ध की रचना की किंतु युद्ध से पहले शांति के समस्त प्रयास भी किये। वे स्वयं शान्ति दूत बनकर दुर्योधन आदि के पास गए और अंत में महाभारत के युद्ध में अर्जुन के रथ पर सारथी बनकर बैठ गए।
श्रीकृष्ण चाहते तो स्वयं भी लड़ सकते थे किंतु उन्होंने युद्ध न करके और सरथी बनके, मानव मात्र को संदेश दिया कि जीवन का संघर्ष जीव को स्वयं करना है, ईश्वर तो उसे कर्म करने की छूट देता है तथा स्वयं उस कर्म का साक्षी बनकर उसके कर्मों एवं उसकी वृत्ति के अनुसार उसे कर्म का फल देता है।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध अर्थात् कर्म करने के लिए प्रेरित करते समय ईश् एवं जीव के वास्तविक स्वरूप, उनके परस्पर सम्बन्ध एवं मानव के लिए करणीय कर्म आदि का ज्ञान करवाया। ऐसा करने के लिए उन्होंने समस्त उपनिषदों का ज्ञान निचोड़कर अर्जुन के समक्ष बहुत ही सरल भाषा में प्रस्तुत किया। इसी कारण गीता के लिए कहा जाता है-
अर्थात्- श्रीकृष्ण रूपी गोपाल ने उपनिषदों रूपी गायों को दुह कर गीता रूपी अमृत प्राप्त किया, अर्जुन रूपी बछड़े ने उस अमृत का पान किया।
श्रीकृष्ण ने यादव वंश में जन्म लिया था। पुराणों में यादवों को क्षत्रिय, गौपालक एवं आभीर नामक तीन जातियों में रखा है। श्रीकृष्ण ने क्षत्रिय होने के कारण प्रजा की रक्षा करने का धर्म निभाया, पशुपालक जैसे छोटे कहे जाने वाले वंश में जन्म लेकर मानव मात्र में सहयोग एवं मैत्री का मार्ग दिखाया। यदि यादवों को आभीर स्वीकार कर लिया जाए तो श्रीकृष्ण विदेशी कुल में अवतार लेने वाले, विष्णु के पहले अवतार थे।
श्रीकृष्ण ने अपनी शरण में आने वाले मानवों के योगक्षेम वहन करने का आश्वासन दिया जिसका आशय यह है कि वे ब्राह्मण से लेकर स्त्री एवं शूद्र तक समस्त मानवों को अपनी शरण में लेते हैं तथा उनका योगक्षेम वहन करते हैं। श्रीकृष्ण ने कर्मयोग पर दृढ़ रहने वालों के लिए समान रूप से मुक्ति के द्वार खोल दिये।
जन साधारण ने कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् कहकर श्रीकृष्ण को अपना रक्षक एवं गुरु माना-
ज्ञान, कर्म एवं योग को जीवन का अंग बनाने का उपदेश श्रीकृष्ण से पहले किसी और दार्शनिक, चिंतक एवं समाज सुधारक ने नहीं दिया इसलिए श्रीकृष्ण ही वे प्रथम दार्शनिक थे जिनकी वंदना कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् कहकर की गई।
श्रीकृष्ण के प्रयासों से वैदिक धर्म ने नया रूप धारण किया। मन की उदारता और हृदय की विशालता को हिन्दुओं ने अपनी संस्कृति का अभिन्न अंग बना लिया। इसी उदारता और विशालता के कारण हिन्दुओं ने जैनियों के तीर्थंकर आदिनाथ ऋषभदेव को एवं तथागत बुद्ध को भी विष्णु के अवतारों में स्वीकार कर लिया।
भगवान श्रीकृष्ण का आविर्भाव भगवान श्रीराम के लगभग दो हजार साल बाद हुआ किंतु सनातन धर्म में अवतारवाद की धारणा श्रीकृष्ण के आविर्भाव के बाद ही आई क्योंकि वाल्मीकि रामायण लिखे जाने तक भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम एवं महापुरुष माना जाता था।
पुराणों की रचना श्रीकृष्ण के आविर्भाव के बहुत बाद में हुई। पुराणों में ही अवतारवाद की संकल्पना स्वीकार की गई। पुराणों ने ही विष्णु के दशावतारों की संकल्पना हिन्दू समाज के समक्ष रखी। पुराणों ने ही सबसे पहले मर्यादा पुरुषोत्तम राम को विष्णु का अवतार स्वीकार किया। पुराणों ने ही देवकीनंदन श्रीकृष्ण को विष्णु का अवतार घोषित किया।
पुराणों की रचना से पहले महाभारत की रचना हो चुकी थी, अतः पुराणों की दशावतार की संकल्पना के आधार पर मूल महाभारत का कई बार पुनर्लेखन हुआ। वाल्मीकि रामायण में भी बहुत से परिवर्तन करके श्रीराम को परब्रह्म परमेश्वर श्री विष्णु का अवतार घोषित किया गया।
जैन साहित्य में उल्लेख मिलता है कि महावीर स्वामी एक बार श्रीकृष्ण मन्दिर में ठहरे। इससे स्पष्ट है कि आज से 2600 वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण को भगवान के रूप में पूजा जाता था।
इस प्रकार श्रीकृष्ण ने केवल सनातन धर्म को अपति सम्पूर्ण मानवता को ज्ञान, कर्म एवं भक्ति की त्रयी पर चलने का व्यावहारिक, दार्शनिक एवं तात्विक मार्ग दिखाया। इस कारण वे लोक में पूज्य हैं तथा कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् कहकर वंदना किए जाने के योग्य हैं।
छत्रपति शिवाजी संघर्ष एवं उपलब्धियाँ शीर्षक से लिखी गई इस पुस्तक में हिन्दू हृदय सम्राट छत्रपति शिवाजी राजे की जीवनी, इतिहास, उपलब्धियों एवं संघर्षों को उस काल की परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में लिखा गया है।
प्रायद्वीपीय भारत के उत्तरी केन्द्र में तथा भारत के दक्षिण-पश्चिम में स्थित महाराष्ट्र में भारत की कई महान् विभूतियों का जन्म हुआ है। ई.1630 में इसी महाराष्ट्र प्रदेश में छत्रपति महाराज शिवाजी राजे का जन्म हुआ। उनका वास्तविक नाम शिवाजी भौंसले था। उनके जन्म से सवा चार सौ साल पहले से भारत विचित्र राजनीतिक परिस्थितियों में फंसा हुआ था।
उत्तर भारत पर ई.1206 से 1526 तक कट्टर सुन्नी तुर्कों ने शासन किया। उन्होंने बड़ी संख्या में हिन्दुओं को निर्धनता और दुर्भाग्य के समुद्र में डुबोकर मुसलमान बना लिया था। ई.1526 से दिल्ली पर समरकंद से आए मंगोल शासन कर रहे थे। वे भी तुर्क थे तथा दिल्ली सल्तनत के तुर्कों की तरह कट्टर सुन्नी मुसलमान थे।
भारत में मुगलिया राज्य के संस्थापक बाबर ने भारत को दारूल-हरब (काफिरों का देश) घोषित किया तथा स्वयं को जेहाद (धार्मिक यात्रा) पर बताया जिसका उद्देश्य काफिरों को मारना या मुसलमान बनाना होता है। उसके पौत्र अकबर ने उत्तर भारत के अधिकांश प्रबल हिन्दू राजाओं को अपने अधीन करके उनकी राजकुमारियों से या तो स्वयं ने विवाह कर लिए या अपने पुत्र सलीम के साथ कर दिये।
अकबर की इसी नीति को आजकल अकबर की हिन्दू-मुस्लिम एकता तथा उदारता कहा जाता है। जबकि मुगलों के हरम में गईं इन हिन्दू राजकुमारियों की कोख से जन्मे तुर्क शहजादों ने हिन्दुओं को पहले से कहीं अधिक दुर्भाग्य, निर्धनता और मृत्यु प्रदान की।
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उत्तर भारत में चित्तौड़ का प्रबल राज्य सदियों से शासन करता आया था जिसने मुगलों के समक्ष घुटने टेकने तथा अपनी कन्याओं के विवाह मुसलमानों के साथ करने से मना कर दिया। इसलिए अकबर ने चित्तौड़ दुर्ग में तीस हजार से अधिक हिन्दुओं का कत्लेआम करवाया। उसने हिन्दू राजाओं को अपना सेनापति नियुक्त किया तथा हिन्दुओं के हाथों ही हिन्दुओं को मरवाया। इसके बदले में उसने हिन्दुओं पर से जजिया हटाया ताकि हिन्दू राजा एवं इतिहासकार, अकबर की उदारता के गुण गाते रह सकें।
अकबर के पुत्र जहांगीर ने भी हिन्दुओं को नष्ट करने की यही रेशमी फंदे वाली नीति अपनाई। जहांगीर के पुत्र शाहजहाँ को भारतीय इतिहासकारों ने प्रेम का देवता घोषित किया किंतु कड़वी सच्चाई यह है कि शाहजहाँ ने बड़ी संख्या में हिन्दुओं का संहार करवाया तथा हिन्दू मंदिर तुड़वाए। शाहजहाँ का पुत्र औरंगजेब कट्टर सुन्नी बादशाह सिद्ध हुआ। उसने भारत से काफिरों को समाप्त करके दारूल-इस्लाम अर्थात् मुस्लिम राज्य की स्थापना करने का काम तेजी से आगे बढ़ाया। औरंगजेब ने भारत के हिन्दुओं पर जजिया तथा तीर्थकर फिर से लगा दिए जिन्हें अकबर ने समाप्त कर दिया था।
इस काल में दक्षिण भारत, पांच छोटे-छोटे मुस्लिम राज्यों में बंटा हुआ था। बरार में इमादशाही राज्य, अहमदनगर में निजामशाही राज्य, बीजापुर में आदिलशाही राज्य, गोलकुण्डा में कुतुबशाही राज्य तथा बीदर में बरीदशाही वंश के शासक राज्य करते थे। इन पांचों राज्यों के शासक शिया थे।
इन शिया मुस्लिम राज्यों ने दक्षिण भारत के शक्तिशाली विजयनगर हिन्दू साम्राज्य का अंत कर दिया और हिन्दू-प्रजा को लूटकर अपने महल खजानों से भर लिए। उन्होंने इस पूरे क्षेत्र में हिन्दुओं के सैंकड़ों तीर्थों एवं हजारों देवालयों को नष्ट कर दिया। एक तरफ तो दक्षिण भारत के शिया राज्य, दक्षिण के हिन्दुओं को नष्ट कर रहे थे तो दूसरी ओर उत्तर भारत के कट्टर सुन्नी शासक, इन शिया राज्यों को फूटी आंखों से भी नहीं देखना चाहते थे। सुन्नी शासकों की दृष्टि में शिया भी वैसे ही काफिर थे जैसे कि हिन्दू।
उत्तर एवं दक्षिण भारत की इन्हीं परिस्थितियों के काल में छत्रपति शिवाजी का जन्म अहमदनगर के निजामशाह राज्य के प्रभावशाली जागीरदार शाहजी भौंसले के दूसरे पुत्र के रूप में हुआ। शिवाजी के जन्म के कुछ समय बाद शाहजी भौंसले ने शिवाजी की माता जीजाबाई को स्वयं से अलग करके शिवनेर दुर्ग में रख दिया क्योंकि जीजाबाई का पिता जाधवराय, निजामशाह के शत्रुओं अर्थात् मुगलों की सेवा में चला गया था।
ई.1636 में मुगलों ने अहमदनगर का राज्य समाप्त कर दिया तब शाहजी भौंसले ने अहमदनगर छोड़ दिया तथा बीजापुर राज्य में जाकर नौकरी कर ली। जीजाबाई के पिता जाधवराय की भी जल्दी ही मृत्यु हो गई, इस कारण जीजाबाई का वह आश्रय भी समाप्त हो गया और वह कई वर्षों तक अपने पुत्र के प्राणों की रक्षा के लिए जंगलों में बने किलों में भटकती रहीं।
मुगल सेनाएं शाहजी के पुत्र शिवा को मार डालना चाहती थीं क्योंकि शाहजी भौंसले, पहले तो निजामशाह की ओर से और अब आदिलशाह की ओर से मुगलों का शत्रु था। बालक शिवा कई बार मुगल सिपाहियों के हाथों में पड़ते-पड़ते बचा किंतु जीजाबाई के धैर्य और साहस से प्रत्येक बार, बालक शिवा के प्राणों की रक्षा हुई।
इस प्रकार शिवाजी ने अपने बाल्यकाल में ही मुस्लिम सैनिकों द्वारा किए जा रहे हिन्दू-प्रजा के कत्ल और शोषण को बहुत निकट से देखा। इन्हीं परिस्थितियों में शिवाजी 16 साल के हो गए और उन्होंने हिन्दू-प्रजा के उद्धार के लिए स्वयं को तैयार करने तथा किलों को जीतने के लिए सेना बनाने का निश्चय किया।
पुराने किलों को जीतने और नए किलों को बनाने के लिए यह आयु बहुत कम थी, किंतु शिवाजी के निश्चय उनकी आयु से कहीं बहुत आगे थे। उनके हृदय में भारत की निरीह जनता के लिए पीड़ा थी। इसी पीड़ा को दूर करने के लिए उन्होंने मुस्लिम राज्यों को समाप्त करके हिन्दू राज्य की स्थापना का सपना देखा जिसे वह ‘हिन्दू पदपादशाही’ कहते थे।
शिवाजी का मानना था कि मुगल अजेय नहीं हैं, उन्हें यह प्रेरणा अपने पिता शाहजी से मिली थी। शाहजी ने भी, अहमदनगर तथा बीजापुर के लिए मुगलों के विरुद्ध संघर्ष किया था और मुगलों के दांत खट्टे किए थे, जिससे शाहजी की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई थी। शाहजी की प्रेरणा से शिवाजी के नेतृत्व में मराठा शक्ति का फिर से उदय हुआ।
दक्षिण भारत में बहमनी राज्य की स्थापना से पहले मराठे ही इस क्षेत्र पर शासन करते थे। जीवन-पर्यंत किए गए संघर्ष के बल पर शिवाजी ने स्वतंत्र हिन्दू राज्य की स्थापना की। औरंगजेब जैसा क्रूर एवं मदांध शासक भी शिवाजी द्वारा संगठित की गई मराठा शक्ति का दमन नहीं कर सका। अंत में यह मराठा शक्ति भारत से मुगल शासन को उखाड़ फैंकने के लिए यम की फांस सिद्ध हुई।
छत्रपति शिवाजी संघर्ष एवं उपलब्धियाँ पुस्तक में सत्रहवीं शताब्दी के महानायक छत्रपति महाराज शिवाजी राजे की जीवनी के साथ-साथ उनके संघर्ष एवं उनकी उपलब्धियों का ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर लेखन एवं विश्लेषण किया गया है। इस पुस्तक में शिवाजी के समकालीन लेखकों द्वारा लिखे गए तथ्यों को काम में लेने का यथासंभव प्रयास किया गया है। शिवाजी के समकालीन ग्रंथों में से कुछ ग्रंथों का उल्लेख किया जाना समीचीन होगा जिनमें मुन्तखब-उल-लुबाब (तारीखे-खाफीखाँ), नुश्खा-ए-दिलकुशा, स्टोरिया डी मोगोर (मोगेल इण्डिया) आदि प्रमुख हैं।
औरंगजेब ने अपने समय का इतिहास लिखने पर पाबन्दी लगा दी थी परन्तु मोहम्मद हाशिम खाफी खाँ नामक एक मुगल सेनापति ने गुप्त रूप से मुन्तखब-उल-लुबाब (तारीखे-खाफी खाँ) नामक ग्रन्थ की रचना की। यह एक विशाल ग्रन्थ है जो ई.1519 में बाबर के समरकंद एवं फरगना आक्रमणों से आरम्भ होकर बाबर के वंशज मुहम्मदशाह रंगीला के शासन के 14वें साल के इतिहास के साथ समाप्त होता है।
इस ग्रन्थ का महत्व ई.1605 से 1733 तक की घटनाओं, विशेषतः औरंगजेब के शासनकाल के आरम्भ (ई.1658) से लेकर औरंजबेब के शासनकाल के अंत (ई.1707) तक के लिए अधिक है। उसने औरंगजेब की धार्मिक नीति का समर्थन और छत्रपति शिवाजी की निन्दा की है। औरंगजेब के समकालीन प्रसिद्ध हिन्दू सेनापति भीमसेन ने नुश्खा-ए-दिलकुशा नामक फारसी ग्रंथ में औरंगजेब के शासनकाल का आंखों देखा इतिहास लिखा।
उसने महाराजा जसवन्तसिंह राठौड़ तथा दलपतराव बुल्देला के अधीन काम किया था। उसने दक्षिण के युद्धों तथा औरंगजेब के बाद लड़े गए उत्तराधिकार युद्ध को अपनी आँखों से देखा था। उसने शिवाजी की गतिविधियों तथा उनकी संगठन प्रतिभा का अच्छा वर्णन किया है।
यूरोपीय पर्यटक जॉन फ्रॉयर शिवाजी के जीवन काल में भारत घूमने आया। उसने अपनी आंखों से मुगलों की सेनाओं को शिवाजी का राज्य बर्बाद करते हुए देखा। उसने भारत में हुए अनुभवों के आधार पर ‘न्यू एकाउंट ऑफ ईस्ट इण्डिया कम्पनी एण्ड पर्शिया’ नामक एक पुस्तक लिखी।
इस पुस्तक में एक स्थान पर उसने लिखा है- ‘मुगल सेनाएं अपने मार्ग में आने वाली हर चीज को गिरा देती थीं। गांव के गांव जलाए जा रहे थे। खेतों में खड़ी मक्का की फसलें भूमि पर गिराई जा रही थीं। पशुओं को पकड़कर मुगलों के राज्य को ले जाया जा रहा था तथा शिवाजी के राज्य में रहने वाले स्त्री-पुरुषों एवं बच्चों को बलपूर्वक दास बनाया जा रहा था।’
औरंगजेब के समय में इटली के वेनिस नगर का निवासी निकोलोआ मनूची ई.1650 में सूरत होता हुआ दिल्ली पहुँचा। वह तुर्की और फारसी भाषाओं का ज्ञाता था। उसने लम्बे समय तक भारत में प्रवास किया तथा औरंगजेब के बड़े भाई दारा शिकोह की तरफ से उत्तराधिकार के युद्ध में भाग लिया।
जब दारा, औरंगजेब से पराजित होकर सिन्ध की ओर पलायन कर गया तो निकोलोआ मनूची भी उसके साथ सिन्ध तक गया था। मनूची वहाँ से वापस दिल्ली होते हुए कश्मीर आया और वहाँ से बिहार तथा बंगाल के भ्रमण पर गया।
कुछ समय के लिए उसने दिल्ली तथा आगरा में चिकित्सक का कार्य भी किया। उसने मिर्जा राजा जयसिंह के द्वारा छत्रपति शिवाजी के विरुद्ध किए गए अभियान में भाग लिया। उसने स्टोरिया डी मोगोर (मोगेल इण्डिया) नामक पुस्तक लिखी जिसमें शिवाजी के समय का आंखों देखा इतिहास भी उपलब्ध है।
आधुनिक इतिहासकारों में जदुनाथ सरकार ने शिवाजी के संघर्ष और उपलब्धियों का अच्छा वर्णन किया है। आधुनिक काल के अनेक मराठी एवं अंग्रेजी लेखकों ने भी शिवाजी के संघर्ष एवं उपलब्धियों को निरपेक्ष होकर लिखा है।
शिवाजी और मुगलों के बीच बहुत लम्बा-चौड़ा पत्र व्यवहार हुआ जिनसे हार-जीत के दावों को सफलतापूर्वक कसौटी पर कसा जा सकता है। इन ग्रंथों एवं पत्रों का उपयोग करते हुए इस ग्रंथ का प्रणयन किया गया है तथा सत्रहवीं शताब्दी के उस अप्रतिम, अतुल्य एवं महान राजा शिवाजी को विनम्र श्रद्धांजलि देने का प्रयास किया गया है।
छत्रपति शिवाजी संघर्ष एवं उपलब्धियाँ को लिखते समय मुझे शिवाजी के पिता शाहजी का जीवन चरित्र पढ़ने का अवसर मिला। मुझे यह देखकर दुःख हुआ कि भारत के इस वीर योद्धा के प्रति इतिहासकारों ने बहुत अन्याय किया है जिसके कारण विद्यालयी एवं विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों में शाहजी की छवि नकारात्मक बन गई है।
उन्हें शिवाजी तथा उनकी माता जीजाबाई को त्यागने वाला तथा मुसलमान बादशाहों की नौकरी करने वाला साधारण एवं छोटा सा सेनानायक बताया गया है। जबकि शाहजी अपने समय में भारत के विख्यात योद्धाओं में गिने जाते थे। छत्रपति शिवाजी संघर्ष एवं उपलब्धियाँ पुस्तक में उस अप्रतिम योद्धा के सम्बन्ध में ऐतिहासिक तथ्यों का पता लगाकर सत्य को सामने लाने का प्रयास किया गया है।
सरदार वल्लभ भाई पटेल प्रेरक एवं रोचक प्रसंग शीर्षक से लिखी गई इस पुस्तक में स्वतंत्रता सेनानी एवं आधुनिक भारत के निर्माता सरदार पटेल के जीवन से जुड़े हुए 117 रोचक प्रसंग लिखे गए हैं जिनमें सरदर वल्लभ भाई पटेल के विराट् व्यक्त्वि के दर्शन होते हैं।
आधुनिक भारत के निर्माताओं में सबसे पहला नाम यदि किसी व्यक्ति का लिया जा सकता है तो वे हैं- सरदार वल्लभ भाई पटेल। अंग्रेजों ने जिस भारत को आजाद किया था, वह भारत 566 रियासतों, 11 ब्रिटिश प्रांतों एवं 6 ब्रिटिश शासित कमिश्नरियों में बंटा हुआ था।
इन रियासतों, प्रांतों एवं कमिश्नरियों में रहने वाली जनता अपनी पहचान इन्हीं प्रशासनिक इकाइयों से समझती थी। इस कारण जिस प्रकार पाकिस्तान भारत से अलग हुआ था, उसी प्रकार रियासतें एवं ब्रिटिश प्रांत भी भारत से अलग हो सकते थे। पाकिस्तान में जाने से शेष बचे प्रांतों, रियासतों एवं कमिश्नरियों को जोड़कर एक देश का निर्माण करना सरल कार्य नहीं था किंतु पटेल ने यह कर दिखाया।
सरदार पटेल के व्यक्तित्व का आकर्षण न केवल उस समय के ब्रिटिश शासकों, भारतीय नेताओं और देशवासियों के सिर चढ़कर बोलता था अपितु आज भी देशवासियों के दिलों की धड़कनें बढ़ा देता है। आने वाले अनेक युगों तक पटेल, देशवासियों के लिये श्रद्धा और आदर का पात्र बने रहेंगे।
वे गुजरात के एक छोटे से गांव में जन्मे और उन्होंने दुनिया की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति से लोहा लेकर देश को आजादी दिलवाने में अग्रणी भूमिका निभाई। देश की आजादी में भूमिका निभाने वाले और भी सैंकड़ों नेता थे किंतु सरदार पटेल ने स्वातंत्र्य समर में प्रखर राष्ट्रवाद का जो अनोखा तत्व घोला, वैसा तत्व बहुत कम नेता घोल पाये।
यह सही समय है जब देश के नौजवानों तक सरदार पटेल की पूरी कहानी पहुँचे। कौन थे पटेल? क्या किया था उन्होंने? क्यों वे ऐसा कुछ कर सके जो दूसरे नेता नहीं कर सके? कैसे उन्होंने अपने युग के बड़े नेताओं की भीड़ में स्वयं को अलग पहचान दी? कैसे हाड़-मांस से बने लोहे के सरदार ने भारत में रह गई 562 रियासतों को एक सूत्र में पिरोकर भारत राष्ट्र का निर्माण किया।
वे राष्ट्र के अनोखे सपूत थे, राष्ट्रहित के लिये किसी से भी टक्कर ले लेते थे और स्वहित के लिये कभी किसी से कुछ नहीं मांगते थे। उन्होंने संघर्ष, जेल और यातनाओं को अपने लिये रखा तथा स्वतंत्रता के श्रेय से लेकर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक को दूसरों के लिये अर्पित कर दिया।
सोने का दिल और लोहे के हाथों वाले इस अनोखे नेता की पूरी कहानी पढ़िये इस पुस्तक में।
इस पुस्तक में भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या एवं हिन्दू प्रतिरोध का संक्षिप्त इतिहास लिखा गया है।
हिन्दू धर्म, भारतवर्ष की भूमि पर आकार लेने वाला प्रथम धर्म है। जब हम भारतवर्ष की बात करते हैं तो उसका आशय आज के ‘यूनियन ऑफ इण्डिया जो कि भारत’ से नहीं अपितु हिन्दुकुश पर्वत से लेकर आज के अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, बांगला देश, बर्मा, थाईलैण्ड, श्रीलंका, मलेशिया, वियतनाम, कम्बोडिया आदि देशों एवं जावा, सुमात्रा तथा बाली आदि इण्डोनेशियाई द्वीपों से है।
भारत वर्ष की धरती पर प्रकट हुआ यह धर्म वैदिक धर्म के रूप में प्रकट हुआ जिसमें से अनेकानेक शाखाएं विकसित हुईं जो सम्मिलित रूप से सनातन धर्म के नाम से जानी गईं। इस धर्म की मुख्य शाखा भागवत धर्म तथा ब्राह्मण धर्म के नाम से विख्यात हुई। यही सनातन धर्म अथवा ब्राह्माण धर्म, भारत भूमि के साथ सिमटता हुआ अब ‘यूनियन ऑफ इण्डिया जो कि भारत’ में हिन्दू धर्म कहलाता है।
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हिन्दू धर्म का मूल स्वरूप इतना उदार, व्यापक, सहिष्णु, परोपकारी एवं समावेशी भाव लिए हुए है कि इसका कोई आकार-प्रकार निश्चित नहीं है। तेतीस करोड़ देवी देवताओं वाले इस धर्म में, किसी भी हिन्दू धर्मावलम्बी पर यह दबाव नहीं डाला जाता कि वह किसी निश्चित देवता की पूजा करे या किसी निश्चित प्रकार की पूजा पद्धति काम में ले। या कि वह किसी निश्चित धार्मिक पुस्तक को पढ़े या किसी निश्चित प्रकार से विवाह करे या वह किसी निश्चित प्रकार से शव की अंत्येष्टि करे।
हिन्दू धर्म के अंतर्गत समाहित भिन्न-भिन्न पूजा पद्धतियों को मानने वाले लोग, सामूहिक रूप से विभिन्न धार्मिक आयोजनों में भाग लेते हैं। कुछ हिन्दू, शव का दहन करते हैं तो कुछ मिट्टी में गाढ़ते हैं तो कुछ हिन्दू, शव को जल में बहा देते हैं। कुछ हिन्दू मतावलम्बी देवी-देवताओं की मूर्तियों की पूजा करते हैं, कुछ नहीं करते हैं। कुछ हिन्दू, वेद और ईश्वर को मानते हैं और कुछ हिन्दू, वेद या ईश्वर को नहीं मानते हैं, फिर भी वे सब हिन्दू धर्म के भीतर बने हुए हैं।
वैदिक देवी-देवताओं से लेकर पौराणिक देवी-देवताओं को मानने वाले तथा लोक देवियों एवं लोक देवताओं को मानने वाले, सभी लोग समान रूप से हिन्दू कहलाते हैं। विभिन्न क्षेत्रों के हिन्दुओं के खान-पान, वेषभूषा, वैवाहिक पद्धतियां, रीति-रिवाज एवं परम्पराएं अलग हैं। उत्तर भारत के हिन्दू, मामा की लड़की तथा मामा के गौत्र की लड़की से विवाह करने को पाप मानते हैं तो दक्षिण भारत में मामा की लड़की से विवाह करना अत्यंत साधारण बात है।
हिन्दू धर्म की इतनी विविधताओं के कारण ही हिन्दू धर्म के सम्बन्ध में कहा जाता है कि यह धर्म नहीं, जीवन शैली है। युगों-युगों से चले आने के कारण इसे सनातन धर्म भी कहते हैं। बौद्ध, जैन, सिक्ख आदि कई पंथ इसी धर्म से निकले और पृथक् धर्म के रूप में पहचान बनाने में सफल रहे। आगे चलकर कबीर पंथियों, दादू पंथियों, ब्रह्म समाजियों एवं आर्य समाजियों आदि ने भी अपने आप को सनातन हिन्दू धर्म से अलग दिखाने की चेष्टा की जो आज तक जारी है। वर्तमान समय में वीर शैव, लिंगायत जैसे पुराने सम्प्रदाय तथा नारायण स्वामी एवं ब्रह्मकुमारी जैसे नवोद्भव सम्प्रदाय भी हिन्दू धर्म से विलग दिखने का प्रयास कर रहे हैं।
इस्लाम तथा ईसाई मत भारत में बाहर से आए। इस्लाम ने आक्रांताओं के धर्म के रूप में भारत में प्रवेश किया। आक्रांता तो शक, कुषाण, हूण, बैक्ट्रियन तथा यूनानी भी थे किंतु उन्होंने इस देश में अपना धर्म थोपने के स्थान पर भारत के स्थानीय धर्मों को अपना लिया। उनमें से कुछ शैव, वैष्णव अथवा बौद्ध हो गए तो कुछ जैन। जबकि इस्लाम को मानने वाले आक्रांताओं ने ऐसा नहीं किया। वे न केवल स्वयं के लिए इस्लाम को एकमात्र विकल्प के रूप में देखते थे अपितु उन्होंने भारत की जनता में भी इस्लाम के बलपूर्वक प्रसार का प्रयास किया।
यदि इस्लाम भारत की भूमि पर उत्पन्न हुआ होता तथा इस्लाम के अनुयाइयों ने कट्टरता नहीं दिखाई होती तो संभवतः हिन्दुओं और मुसलमानों तथा सिक्खों और मुसलमानों के बीच इतनी व्यापक साम्प्रदायिक हिंसा नहीं हुई होती। इस्लाम की इस कट्टरता के चलते न तो मुसलमान कभी यह भूल पाए कि उनकी पहचान इस्लाम से है और न हिन्दू कभी भूल पाए कि इस्लाम आक्रांताओं का धर्म है।
इस्लामी आक्रांताओं द्वारा बल-पूर्वक भारत की जनता को इस्लाम में प्रवेश कराने के प्रयासों के कारण भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या आठवीं शताब्दी इस्वी में उत्पन्न हुई जिसका विकास पूरे मुस्लिम शासन काल में होता रहा। मुसलमानों द्वारा साम्प्रदायिकता की समस्या को इतना अधिक बढ़ाया गया कि देश में करोड़ों लोग हिन्दू धर्म छोड़कर मुसलमान बन गए ताकि उन्हें सुरक्षा तथा रोजगार प्राप्त हो। जो लोग हिन्दू बने रहे, वे निर्धनता, दुर्भाग्य और मृत्यु के अंधेरों में धकेल दिए गए।
ईसाई धर्म यद्यपि पंद्रहवीं शताब्दी में भारत में प्रवेश कर गया था किंतु ईसाइयों ने सामान्यतः तलवार के जोर पर अपने धर्म का प्रसार नहीं किया। वे एक हाथ में धर्म का तथा दूसरे हाथ में व्यापार का झण्डा रखते थे, धर्म का झण्डा उन्होंने भी पकड़ने का प्रयास किया किंतु इस पर अधिक जोर नहीं दिया। जब अठारहवीं शताब्दी में उन्होंने भारत में राजनीतिक शक्ति प्राप्त की तब भी वे ईसाई धर्म के प्रसार के बारे में कम ही उत्सुक थे।
उनका पूरा जोर भारत से धन बटोरने और अपने राज्य को मजबूत करने में लगा रहा किंतु जब बीसवीं सदी में भारत में स्वाधीनता संग्राम अपने चरम पर पहुंचने लगा, तब अँग्रेजों ने हिन्दुओं एवं मुसलमानों के बीच की साम्प्रदायिक समस्या को देश पर राज्य करने के मजबूत हथियार के रूप में काम में लिया जिससे यह समस्या मध्यकाल की ही तरह विकराल स्वरूप को प्राप्त हो गई।
अंग्रेजों द्वारा, साम्प्रदायिकता की समस्या को इतनी हवा दी गई कि यह समस्या हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बन कर खड़ी हो गई। इस कारण देश की प्रजा को स्वाधीनता प्राप्त करने में अधिक पसीना बहाना पड़ा तथा स्वातंत्र्य-रथ मंद गति से आगे बढ़ा। ऐसा कई बार हुआ जब निकट आती हुई स्वतंत्रता, साम्प्रदायिकता की समस्या के कारण दूर खिसक गई।
इस समस्या के कारण देश का विभाजन हुआ और देश के तीन टुकड़े हुए। करोड़ों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े। लाखों स्त्रियों के साथ बलात्कार हुए तथा लाखों स्त्री-पुरुष एवं बच्चे मौत के घाट उतार दिए गए, तब कहीं जाकर भारत को आजादी मिली किंतु साम्प्रदायिकता की समस्या का अंत देश की आजादी के बाद भी नहीं हो सका।
आज भी देश की निरीह जनता साम्प्रदायिक हिंसक घटनाओं में बेरहमी से मारी जाती है। यह मानव मात्र की मानसिक समस्या है जो सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है। जब तक साम्प्रदायिकता की समस्या के मूल कारणों को पहचानकर उनका वास्तविक समाधान नहीं ढूंढा जाएगा, तब तक न तो इस समस्या का उन्मूलन हो सकेगा और न मानव सुखी हो सकेगा।
आशा है इस पुस्तक को लिखने में लगा मेरा श्रम विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं रुचिवान पाठकों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा।
भारत की लुप्त सभ्यताएँ शीर्षक से लिखी गई इस पुस्तक में बंदर के आदमी में बदलने की प्रक्रिया से लेकर हर्ष के काल तक विकसित हुई सभ्यताओं का इतिहास लिखा गया है।
विगत डेढ़ करोड़ वर्ष के कालखण्ड में भारत की धरती पर इतनी सभ्यताएँ प्रकट एवं लुप्त हुई हैं कि यदि भारत को प्राक्-सभ्यताओं एवं प्राच्य-संस्कृतियों का संग्रहालय कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। जैसे-जैसे पुरातत्व की खुदाइयाँ एवं इतिहास सम्बन्धी शोध-कार्य आगे बढ़ रहे हैं, इस क्षेत्र में नवीन जानकारियाँ उजागर होती जा रही हैं। इनके आधार पर कहा जा सकता है कि धरती के गर्भ में अभी बहुत सी सभ्यताओं के स्थल दबे पड़े हैं।
भारत की लुप्त सभ्यताओं को, अध्ययन की सुविधा के लिए दो भागों में रखा जा सकता है- 1. प्रागैतिहासिक काल एवं 2. ऐतिहासिक काल। ‘प्रागैतिहास’ शब्द का निर्माण दो शब्दों- प्राक् + इतिहास से हुआ है अर्थात् प्राचीन इतिहास। अंग्रेजी भाषा में इसे श्च्तमीपेजवतलश् अर्थात् इतिहास से पहले का इतिहास कहा जाता है। इसे अन-ऐतिहासिक काल भी कहा जाता है।
प्रागैतिहासिक काल की मानव-सभ्यताओं के अध्ययन के लिए किसी तरह की लिखित सामग्री, शिलालेख, सिक्के आदि प्राप्त नहीं होते हैं। इसलिए इतिहासकार इस काल के इतिहास को जीवविज्ञानी शोधों, पुरातत्त्व उत्खननों एवं मानवशास्त्रियों द्वारा की जा रही खोजों को आधार सामग्री बनाकर लिखते हैं।
जिस कालखण्ड से मनुष्य द्वारा लिखित सामग्री अर्थात् शिलालेख, सिक्के, बर्तनों पर उत्कीर्ण लिपियाँ, मूर्तियों के लेख, धर्मग्रंथ, शासकीय आदेश आदि प्राप्त होते हैं, उस कालखण्ड के विवरण को इतिहास कहा जाता है। प्रागैतिहास तथा इतिहास में भेद करने के लिए यह एक सामान्य सिद्धांत है किंतु इसके अपवाद भी हैं।
उदाहरण के लिए सिंधु सभ्यता के बर्तनों एवं मूर्तियों पर लिपिबद्ध संदेश हैं किंतु उन्हें अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। फिर भी इस कालखण्ड के विवरण को हम इतिहास में ही सम्मिलित करते हैं क्योंकि इस काल की सभ्यता काफी विकसित थी।
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अर्थात् यहाँ हम इस सिद्धांत पर चल रहे हैं कि जिस कालखण्ड में मानव सभ्यता का भलीभांति विकास नहीं हुआ, उस कालखण्ड को प्रागैतिहास में रखा गया है और जिस कालखण्ड में मानव एक विकसित सभ्यता की अवस्था में दिखाई देता है, उस कालखण्ड को हम ऐतिहासिक काल में रख रहे हैं।
प्रागैतिहासिक मनुष्य के विकसित सभ्यता में पहंचने की घटना धातुकाल में प्रवेश करने के साथ ही होती हुई दिखाई देती है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि मानव सभ्यता के उस कालखण्ड को जिसमें मानव अर्थात् ‘आदिमानव’ पत्थर, लकड़ी एवं हड्डी के औजार और उपकरण काम में ले रहा था, प्रागैतिहासिक कालखण्ड है और जहाँ से मानव अर्थात् ‘विकसित मानव’ धातुकालीन सभ्यता में प्रवेश करता है, वहीं से मानव सभ्यता का ऐतिहासिक काल आरम्भ होता है।
मानव जाति का प्रागैतिहासिक काल, ऐतिहासिक काल की तुलना में बहुत बड़ा है। प्रागैतिहासिक काल के अध्ययन के लिए हमें लगभग डेढ़ करोड़ वर्ष के कालखण्ड को टटोलना होता है जबकि ऐतिहासिक काल के अध्ययन के लिए हमें पिछले लगभग दस हजार वर्षों को खंगालना होता है।
लगभग डेढ़ करोड़ वर्ष की अवधि में फैले प्रागैतिहासिक काल का विभाजन, विभिन्न प्रजातियों के आदिमानवों द्वारा प्रयुक्त औजारों एवं हथियारों तथा उनमें प्रयुक्त सामग्री की सहायता से किया जाता है। इसलिए प्रागैतिहासिक काल के प्रत्येक खण्ड को उस कालखण्ड में प्रयुक्त निर्माण सामग्री से पहचाना जाता है तथा उस कालखण्ड का नामकरण भी उसी सामग्री के आधार पर किया जाता है।
प्रागैतिहासिक साक्ष्य मुख्यतः तीन प्रकार के हैं- (1) प्रागैतिहासिक काल के मानवों की अस्थियों के अवशेष (2) प्रागैतिहासिक काल के मानवों द्वारा शिकार किए गए पशु-पक्षियों की अस्थियों के अवशेष (3) उस काल के मानव द्वारा प्रयुक्त औजारों, हथियारों एवं बर्तनों आदि के अवशेष।
प्रागैतिहासिक सामग्री धरती पर, पहाड़ों पर, गुफाओं में, धरती में दबे हुए तथा प्राचीन नदी-निक्षेपों के साथ मिलती है। प्रागैतिहासिक सामग्री के काल-निर्धारण में कार्बन डेटिंग पद्धति तो सहायता करती ही है, साथ ही वह सामग्री धरती के किस स्तर से प्राप्त हुई है, धरती के किस भाग में प्राप्त हुई है, उस सामग्री को बनाने में किस प्रकार की मिट्टी, पत्थर अथवा धातु का प्रयोग हुआ है और वह सामग्री किन अन्य सामग्रियों के साथ प्राप्त हुई है, आदि तथ्यों से भी उस सामग्री की प्राचीनता का अनुमान लगाया जाता है।
प्राकृतिक गतिविधियों के परिणामस्वरूप धरती में दब गई सामग्री का अध्ययन स्तरक्रम-विज्ञान के नियम के अनुसार किया जाता है। इस नियम के अनुसार किसी भी स्तरीकरण में निम्नतम स्तर सबसे पुराना होता है और ऊपर का स्तर क्रमशः बाद का।
यदि यह निक्षेप किसी नदी का हो, तो नदी का पाट उसमें किसी दूसरी नदी के गिरने से या भूकंप के कारण टुकड़े-टुकड़े हो गया हो, तो यह संभव है, कि क्रमशः बाद वाला स्तर उत्तल संरचना पर जमा हो गया हो। इस संरचना में सबसे नया निक्षेप निम्नतम तल पर होगा, जबकि सबसे पुराना निक्षेप उच्चतम तल पर होगा।
यही नदी के सबसे पुराने पाट का सूचक भी होगा। इसके साथ ही जब किसी बड़े क्षेत्र के सन्दर्भ में एक जैसे अनेक कालक्रम उपलब्ध हों, तब इन निक्षेपों के प्रमुख लक्षणों की तुलना करके उस क्षेत्र में मानव हलचल का संश्लिष्ट काल-क्रम तैयार किया जाता है।
प्रागैतिहासिक सामग्री प्रायः एक क्रम में तथा निरंतरता में नहीं मिलती। इस कारण इस सामग्री का कालक्रम निश्चित करना प्रायः एक जटिल काम होता है। इस सामग्री के आधार पर किसी क्षेत्र में पुरा-पाषाण काल, मध्यपाषाण काल और नवपाषाण काल के स्तर दिखाई पड़ते हैं तो कहीं इनमें से कोई एक या दो स्तर अनुपस्थित होते हैं। भारत के अधिकांश पुरा-पाषाण स्थलों में कालक्रम का व्यवधान एवं अनिश्चितता दिखाई पड़ती है।
यह आवश्यक नहीं है कि विश्व में सभी स्थानों पर एक समय में सभ्यता का एक समान चरण चल रहा हो। यदि किसी स्थान पर जब पुरा-पाषाण काल आरम्भ हो रहा हो तो यह पर्याप्त संभव है कि उसी समय धरती के किसी अन्य क्षेत्र में मध्यपाषाण काल आरम्भ हो गया हो तथा किसी अन्य स्थल पर मानव सभ्यता नव-पाषाण काल में प्रवेश कर गई हो।
कभी-कभी ऐसा भी देखने को मिलता है कि एक ही सभ्यता के लोग पुरा-पाषाण काल से सीधे ही नवपाषाण काल में आ गए, वहाँ मध्यपाषाण काल आया ही नहीं। ऐसा भी देखने को मिला है कि कुछ स्थलों पर मध्यपाषाण काल की सभ्यता अचानक ही धातु-सभ्यता में प्रवेश कर गई, वहाँ नवपाषाण काल आया ही नहीं।
आधुनिक विज्ञान के अनुसार आज से लगभग 2.80 करोड़ वर्ष पहले धरती पर बंदरों का उद्भव हुआ। चार्ल्स डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत के आधार पर यह सिद्धांत स्वीकार किया गया है कि आज से लगभग 38 लाख साल पहले इन्हीं बंदरों में से कुछ बुद्धिमान बंदर अपने मस्तिष्क के आयतन, हाथ-पैरों के आकार, रीढ़ की हड्डी एवं स्वर-रज्जु (वोकल कॉड) की लम्बाई में सुधार करते हुए और विकास की विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हुए, आदिमानवों में बदल गए।
विकास की विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हुए इन्हीं आदि मानवों ने पाषाण सभ्यताओं को जन्म दिया। ये पाषाण सभ्यताएँ भी अनेक चरणों से होकर गुजरीं। यही आदिमानव आगे चलकर विकसित मानव में बदल गए और उन्होंने मानव-सभ्यता का निरंतर परिष्कार करते हुए सभ्यता के विकसित चरणों को पार किया।
भारत की लुप्त सभ्यताएँ पुस्तक में भारत की धरती पर जन्म लेने, विकसित होने एवं लुप्त हो जाने वाली प्राचीन सभ्यताओं का इतिहास लिखा गया है। जिस प्रकार आज का भारत सांस्कृतिक स्तर पर विविधताओं वाला देश है, उसी प्रकार भारत की लुप्त सभ्यताएँ भी इतनी अधिक विविधताएं लिए हुई थीं कि उनके बारे में जानकर आश्चर्य होता है।
कहीं पर बंदर ही पत्थरों के औजार बनाकर अपने आदमी होने का भ्रम उत्पन्न कर रहे हैं तो कहीं आदमी लाखों वर्षों तक हाथों में पत्थर लेकर घूमता हुआ दिखाई देता है। कहीं कच्ची ईंटों का प्रयोग आरम्भ होने में लाखों साल का समय लगता हुआ दिखाई दे रहा है तो कहीं पर आदमी सभ्यता की इतनी लम्बी छलांगें लगाता है कि वह पुरा-पाषाण युग से सीधा नवपाषाण युग में जा रहा है और कहीं पर मनुष्य मध्यपाषाण से सीधा धातुयुग में घुस जाता है।
कहीं पर मनुष्य खेती करना सीख जाता है तो कहीं पर मनुष्य बर्तन बनाना नहीं सीख पाता। कहीं पर मनुष्य हजारों साल तक कच्ची मिट्टी के बर्तनों में खाता हुआ दिखाई देता है तो कहीं पर केवल कुछ सौ साल में ही अपनी सभ्यता को लुप्त करके चल देता है।
आदिम सभ्यताओं की यह उथुल-पुथल न केवल मनुष्य द्वारा प्रयुक्त सामग्री की बनावट और सामग्री के प्रकार की कहानी कहती है अपितु यह भी बताती है कि किस प्रकार मनुष्य अपने मस्तिष्क का विकास करता हुआ, जीवन की कठिनाइयों एवं अभावों को समाप्त करके सुख-सुविधाओं की खोज में कठिन परिश्रम का अवलम्ब ग्रहण किए हुए है।
जब धातु की खोज हो गई तो मनुष्य आदिम अवस्था से निकलकर सभ्यता के ऐतिहासिक युग में प्रवेश कर गया। ऋग्वैदिक काल, सिंधु सभ्यता का काल, राम का काल, उत्तर-वैदिक काल, महाभारत काल, मौर्यकाल, गुप्तकाल तथा हर्षकाल को भारतीय इतिहास के प्राचीन कालखण्ड में रखा जाता है। इसलिए इस पुस्तक में इन कालों की सभ्यताओं का भी संक्षेप में वर्णन किया गया है।
हर्ष की मृत्यु के केवल 65 वर्ष बाद भारत की धरती पर इस्लाम के आक्रमण होने लगते हैं और भारतीय सभ्यता का स्वर्णिम-परिदृश्य चूर-चूर होकर बिखरने लगता है। इसलिए इस पुस्तक को हर्ष कालीन सभ्यता तक ही सीमित रखा गया है।
भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास का लेखन विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों के आधार पर किया गया है।
‘भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति’ विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता और संस्कृतियों में से एक है। इसके उद्भव के समय दक्षिणी अमरीका की माया सभ्यता, अफ्रीका में नील नदी के किनारे विकसित मिश्र की सभ्यता और एशिया में विकसित सुमेरियन सभ्यताएं ही कर सकती हैं। जिनमें से माया सभ्यता और सुमेरियन सभ्यताएं अब काल के गाल में समा चुकी हैं।
भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास पुस्तक में मनुष्य द्वारा भारत में विकसित प्रस्तर युगीन सभ्यताओं से लेकर वर्तमान काल की सभ्यता एवं संस्कृति का इतिहास लिखा गया है। पुस्तक में सभ्यता एवं संस्कृति की परिभाषाएं, सभ्यता एवं संस्कृति में अंतर, भारतीय संस्कृति की विशेषताएं तथा भारतीय संस्कृति के इतिहास को जानने के साधनों पर भी विस्तार से चर्चा की गई है।
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भारत में आर्य सभ्यता के प्रसार से पहले पाषाण, ताम्र एवं कांस्य कालीन सभ्यताओं एवं संस्कृतियों का विकास हुआ। इन सभ्यताओं के संवाहक सैन्धववासी द्रविड़ एवं वनवासी कोल, किरात मुण्डा आदि जनजातियों के लोग थे। माना जाता है कि भारत में लोहे का सर्वप्रथम परिचय आर्यों से हुआ तथा आर्यों ने ही भारत में कृष्ण-अयस अथवा लोहे की संस्कृति को जन्म दिया।
सिंधु सभ्यता अत्यंत सुविकसित सभ्यता थी जिसने सुसंस्कृत समाज को जन्म दिया। इस समाज के पास धर्म, अर्थ, युद्धकौशल, धातु-विज्ञान, मूर्ति-कला, नृत्य-कला, लिपि, माप-तोल आदि का ज्ञान था। आर्यों ने जिस संस्कृति को जन्म दिया वह वैदिक ज्ञान पर आधारित थी तथा वही ज्ञान विकसित होता हुआ वर्तमान सभ्यता की आत्मा बना हुआ है। आर्यों की सभ्यता यद्यपि धर्म-प्रधान सभ्यता थी तथापि आर्य युद्ध कौशल, शिल्प, कृषि एवं पशुपालन की दृष्टि से भी श्रेष्ठ थे।
उन्होंने विपुल धर्म-ग्रंथों की रचना की जो अन्य संस्कृतियों में मिलने दुर्लभ हैं। आर्यों ने वर्ण व्यवस्था को जन्म दिया जो आगे चलकर जाति व्यवस्था के रूप में विकसित हुई। आर्यों की आश्रम व्यवस्था संसार की सबसे अद्भुत सामाजिक एवं आध्यात्मिक व्यवस्था थी जो मनुष्य को आजीवन सन्मार्ग पर चलने के लिए मार्ग दिखाती थी।
पुस्तक में सिक्ख धर्म एवं इस्लाम का भी समुचित विवेचन किया गया है। विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों की मांग के अनुसार पुस्तक के अंत में भारतीय कला, साहित्य, मंदिर, राजनीतिक पुनर्जागरण, भारत के प्रमुख वैज्ञानिक एवं भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य प्रभाव का भी विवेचन किया गया है। आशा है यह पुस्तक विश्वविद्यालयों में भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति विषयक पाठ्यक्रम की आवश्यकता को पूरा करने वाली सिद्ध होगी।
इस पुस्तक में निम्नलिखित अध्याय सम्मिलित किए गए हैं-
सभ्यता एवं संस्कृति का अर्थ
भारतीय संस्कृति के प्रधान तत्त्व एवं विशेषताएँ
भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के इतिहास को जानने के साधन
भारत की पाषाण सभ्यताएँ एवं संस्कृतियाँ
भारत में ताम्राश्म संस्कृतियाँ
सैन्धव सभ्यता, धर्म एवं समाज
भारत में लौह युगीन संस्कृति
दक्षिण भारत में महा-पाषाण संस्कृति
वैदिक सभ्यता एवं साहित्य
ऋग्वैदिक समाज एवं धर्म
उत्तर-वैदिक समाज एवं धर्म
उपनिषदों का चिंतन
महाकाव्यकाल में भारतीय संस्कृति तथा रामायण एवं महाभारत का प्रभाव
श्रीमद्भगवत्गीता का धर्म-दर्शन
जैन-धर्म तथा भारतीय संस्कृति पर उसका प्रभाव
बौद्ध धर्म तथा भारतीय संस्कृति पर उसका प्रभाव
पौराणिक धर्म अथवा वैष्णव धर्म का उदय एवं विकास
शैव एवं शाक्त धर्म
संगम युग का साहित्य, समाज एवं संस्कृति
इस्लाम का जन्म एवं प्रसार
भारत में सूफी मत
सिक्ख धर्म एवं उसका इतिहास
प्राचीन भारत में शिक्षा का स्वरूप एवं प्रमुख शिक्षा केन्द्र
आर्यों की वर्ण व्यवस्था
हिन्दुओं की जाति-प्रथा
भारत में परिवारिक जीवन
संस्कार
पुरुषार्थ-चतुष्टय
आर्यों की आश्रम-व्यवस्था
समाज में नारी की युग-युगीन स्थिति
जगद्गुरु शंकराचार्य एवं उनका दर्शन
भारत का मध्य-कालीन भक्ति आंदोलन
मध्य-कालीन भारतीय समाज
भारतीय कलाएँ
भारतीय मूर्ति-कला
भारतीय वास्तु एवं स्थापत्य कला
दक्षिण भारत का मन्दिर स्थापत्य
भारत की चित्रकला
भारतीय साहित्यिक विरासत
उन्नीसवीं एवं बीसवीं सदी के समाज-सुधार आंदोलन
राष्ट्रीय आंदोलन में तिलक, गांधी और सुभाषचंद्र बोस का योगदान
भारत के मुगलकालीन प्रमुख भवन भारत के मध्यकालीन रक्तरंजित इतिहास के प्रत्यक्ष प्रमाणों की तरह हैं जिन पर मुगलों के द्वारा बहाए गए खून के धब्बे स्पष्ट दिखाई देते हैं।
वास्तुकला को समस्त कलाओं की रानी कहा जाता है। इसलिए यह कहावत भी है कि ‘संसार में दो ही चीजें जीवित रहती हैं, या तो गीत या फिर भीत।’ अर्थात् संसार में साहित्य एवं भवन ही चिरस्थाई रहते हैं। भारत में वास्तुकला का विकास उस समय ही होने लगा था जब अधिकांश दुनिया में जंगल स्थित थे और विश्व में बहुत कम सभ्यताएं प्रकाश में आई थीं। यही कारण था कि आठवीं शताब्दी ईस्वी में जब भारत पर मुस्लिम आक्रमण आरम्भ हुए, उस समय से बहुत पहले ही भारत में बड़ी संख्या में विशाल और भव्य भवन बन चुके थे जिनकी होड़ अन्य देशों में स्थित बहुत कम भवन कर सकते थे।
खलीफाओं, तुर्क आक्रांताओं एवं मंगोलों की सेनाओं ने भारत के हजारों विशाल एवं बहुमूल्य भवनों को तोड़कर नष्ट कर दिया तथा उनमें मेहराबों, गुम्बदों, मीनारों एवं आयत लिखी शिलाओं को लगाकर उन्हें मुसलमानों द्वारा निर्मित इमारत घोषित किया।
दिल्ली का विष्णु-स्तम्भ (अब कुतुबमीनार) एवं विष्णु मंदिर (अब जामा मस्जिद), अध्योया का मंदिर-जन्मस्थानम् (बाद में मस्जिद-जन्मस्थान), अजमेर का विष्णु मंदिर (अब ढाई दिन का झौंपड़ा), धार का सरस्वती कण्ठाभरण मंदिर (अब कमलमौला मस्जिद), वाराणसी का विश्वनाथ मंदिर, मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर, जालोर का विष्णु मंदिर एवं संस्कृत पाठशाला (तोपखाना मस्जिद) ऐसे ही अनुपम भवन थे जो मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा नष्ट-भ्रष्ट करके मस्जिदों में बदल दिए गए।
नगरकोट का प्राचीन वज्रेश्वरी देवी मंदिर, काठियावाड़ (गुजरात) का सोमनाथ महालय, अनंतनाग (कश्मीर) का मार्तण्ड सूर्य मंदिर, पाटन (गुजरात) का मोढेरा सूर्य मंदिर, हम्पी (कर्नाटक) के मंदिर, पाटन (गुजरात) का रुद्र महालय, वृंदावन (उत्तर प्रदेश) का मदन मोहन मंदिर एवं केशवराय मंदिर, मदुरै (तमिलनाडु) का मीनाक्षी मंदिर, जालोर जिले के सेवाड़ा शिवालय आदि सैंकड़ों ऐसे मंदिर थे जो मुसलमानों ने भंग कर दिए अथवा उन्हें गंभीर क्षति पहुंचाई।
भारतीय भवनों का यह विध्वंस दिल्ली सल्तनत-काल एवं मुगल सल्तनत-काल में निरंतर जारी रहा किंतु मुगलों ने जहाँ एक ओर मंदिरों को तोड़कर नष्ट किया वहीं नवीन महलों, मकबरों, मस्जिदों, उद्यानों आदि का निर्माण भी किया। विदेशी इतिहासकारों के अनुसार मुगल शासन की स्थापना के साथ ही भारतीय वास्तुकला के इतिहास में एक नवीन युग की शुरुआत हुई। पर्सी ब्राउन ने ‘मुगलकाल को भारतीय वास्तुकला की ग्रीष्म ऋतु’ माना है जो प्रकाश और ऊर्वरा शक्ति का प्रतीक होती है।
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मुगल युग की वास्तुकला के सर्वांगीण विकास का कारण मुगलों में शानो-शौकत के प्रदर्शन की प्रवृत्ति, शिल्प आदि कलाओं के प्रति उनकी अभिरुचि, राजकोष की समृद्धि तथा संसाधनों की विपुल उपलब्धता माना जाता है। बाबर से लेकर औरंगजेब तक के मुगल शासकों ने भारत में महत्वपूर्ण भवन बनाए तथा बड़ी संख्या में हिन्दू भवनों को मुगल-शैली में ढाला।
मुगल काल में न केवल बादशाहों ने अपितु उनकी बेगमों, वजीरों, शहजादों, शहजादियों तथा अन्य लोगों ने भी बड़ी संख्या में छोटे-बड़े भवन बनाए थे जिनकी संख्या का पता लगाना संभव नहीं है। उनमें से बहुत से भवन एवं उद्यान अब काल के गाल में समा चुके हैं तथा बहुत कम भवन ही अपनी गवाही स्वयं देने के लिए उपलब्ध हैं। ये भवन भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान तथा बांगलादेश आदि देशों में मिलते हैं। मुगलकाल में ये समस्त क्षेत्र भारत के ही अंग थे। इसलिए इस पुस्तक में वहाँ के भी प्रमुख मुगल भवनों को सम्मिलित किया गया है।
भारत के समस्त मुगलकलान भवनों का वर्णन करना संभव नहीं है। इसलिए इस ग्रंथ में मुगल काल में बने प्रमुख भवनों के इतिहास एवं स्थापत्य सम्बन्धी विशेषताओं को लिखा गया है। पुस्तक के अंत में पाठकों की सुविधा के लिए मुगलों के शासन-काल में विध्वंस किए गए हिन्दू-स्थापत्य की भी संक्षिप्त जानकारी दी गई है ताकि पाठकों को उस युग की स्थापत्य सम्बन्धी प्रवृत्तियों की वास्तविक तस्वीर के दर्शन हो सकें।
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