Monday, September 20, 2021

अध्याय – 2 : पाषाण-कालीन सभ्यता एवं संस्कृति

धरती का भूगोल एवं जलवायु, धरती पर जीव जगत का निवास संभव बनाते हैं। धरती का जन्म आग के गोले के रूप में हुआ जो धीरे-धीरे ठण्डा होता हुआ इतना ठण्डा हो गया कि उसमें जीव जगत का पनपना संभव हो गया। धरती पर मानव का पदार्पण एक लम्बी यात्रा है जो भू-पर्पटी के ठण्डे और पर्यावरण के गर्म होने के साथ-साथ आगे बढ़ी है।

पाषाण-कालीन मानव का विकास

आस्ट्रेलोपिथेकस: धरती पर मानव का आगमन हिमयुग अथवा अभिनूतन युग (प्लीस्टोसीन) में हुआ जो एक भूवैज्ञानिक युग है। कहा नहीं जा सकता कि अभिनूतन युग का आरम्भ ठीक किस समय हुआ। पूर्वी अफ्रीका के क्षेत्रों में पत्थर के औजारों के साथ लगभग 35 लाख वर्ष पुराने मानव अवशेष मिले हैं। इस युग के मानव को आस्ट्रेलोपिथेकस कहते हैं। इस आदिम मानव के मस्तिष्क का आकार 400 मिलीलीटर था। यह दो पैरों पर तो खड़ा होकर चलता था किंतु चूंकि यह सीधा तन कर खड़ा नहीं हो सकता था और यह शब्दों का उच्चारण करने में असमर्थ था, इसलिये इसे आदमी एवं बंदर के बीच की प्रजाति कहा जा सकता है। यह पहला प्राणी था जिसने धरती पर पत्थर का उपयोग हथियार के रूप में किया। उसके द्वारा उपयोग में लाये गये पत्थरों की पहचान करना संभव नहीं है।

होमो इरेक्टस: होमो इरैक्टस का अर्थ होता है सीधे खड़े होने में दक्ष। इस मानव के 10 लाख वर्ष पुराने जीवाश्म जावा से प्राप्त किये गये हैं। होमो इरैक्टस के मस्तिष्क का आकार 1,000 मिलीलीटर था। इस आकार के मस्तिष्क वाला प्राणी बोलने में सक्षम होता है। इनके जीवाश्मों के पास बहुत बड़ी संख्या में दुधारी, अश्रुबंूद के आकार की हाथ की कुल्हाड़ियां और तेज धारवाले काटने के औजार तथा कच्चे कोयले के अवशेष मिले हैं। अनुमान है कि यह प्राणी कच्चा मांस खाने के स्थान पर पका हुआ मांस खाता था। उसने पशुपालन सीख लिया था तथा वह अपने पशुओं के लिये नये चारागाहों की खोज में अधिक दूरी तक यात्रायें करता था। यह मानव लगभग 10 लाख साल पहले अफ्रीका से बाहर निकला। इसके जीवाश्म चीन, दक्षिण-पूर्व एशिया तथा भारत में नर्मदा नदी की घाटी में भी मिले हैं। वह यूरोप तथा उत्तरी धु्रव में हिम युग होने के कारण उन क्षेत्रों तक नहीं गया। यूरोप में उसने काफी बाद में प्रवेश किया। लगभग 7 लाख साल पहले तक वह 20 या 30 अलग-अलग प्रकार के उपकरण बनाता था जो नोकदार, धारदार तथा घुमावदार थे। होमो इरैक्टस से दो जातियों ने जन्म लिया- पहली निएण्डरतल और दूसरी होमो सेपियन।

निएण्डरतल: आज से लगभग ढाई लाख साल पहले निएण्डरतल नामक मानव अस्तित्व में आया जो आज से 30 हजार साल पहले तक धरती पर उपस्थित था। ये लम्बी-लम्बी भौंह वाले, ऐसे मंद बुद्धि पशु थे जिनकी विशेषतायें आदिम प्रकार की अधिक और मानवों जैसी कम थीं। अर्थात् ये भारी भरकम शरीर वाले ऐसे उपमानव थे जिनमें समझ कम थी। चेहरे मोहरे से नीएण्डरतल आज के आदमी से अधिक अलग नहीं थे फिर भी वे हमसे काफी तगड़े थे। उनका मस्तिष्क भी आज के आदमी की तुलना में भी बड़ा था किंतु उसमें जटिलता कम थी, सलवटें भी कम थीं और वह उसके स्वयं के शरीर के अनुपात में काफी कम था। इस कारण निएण्डरतल अपने बड़े मस्तिष्क का लाभ नहीं उठा पाया। वस्तुतः निएण्डरतल आज की होमोसपियन जाति का ही सदस्य था। आज से 30 हजार साल पहले यह मानव धरती से पूरी तरह समाप्त हो गया।

होमो सेपियन: आज से पांच लाख साल पहले होमो इरेक्टस काफी कुछ हमारी तरह दिखाई देने लगा। इसे होमो सेपियन अर्थात् ‘हमारी जाति के’ नाम दिया गया। इस मानव के मस्तिष्क का औसत आकार लगभग 1300 मिलीलीटर था। भारत में मानव का प्रथम निवास, जैसा कि पत्थर के औजारों से ज्ञात होता है, इसी समय आरम्भ हुआ। इस युग में धरती के अत्यंत विस्तृत भाग को हिम-परतों ने ढक लिया था।

होमोसेपियन सेपियन: आज से लगभग 1 लाख 20 हजार साल पहले आधुनिक मानव अस्तित्व में आ चुके थे। ये होमो सेपियन जाति का परिष्कृत रूप थे। इन्हें होमो सेपियन सेपियन कहा जाता है।

क्रो-मैगनन मैन: आज से लगभग 40 हजार वर्ष पहले होमो सेपियन सेपियन जाति के कुछ मनुष्य यूरोप में जा बसे। वे बौद्धिक रूप में अपने समकालीन नीएण्डरतलों से अधिक श्रेष्ठ थे। उनमें नये काम करने की सोच थी। वे अधिक अच्छे हथियार बना सकते थे जिनके फलक अधिक बारीक थे। वे शरीर को ढकना सीख गये थे। उनके आश्रय स्थल अच्छे थे और उनकी अंगीठियां खाना पकाने में अधिक उपयोगी थीं। वे बोलने की शक्ति रखते थे। इन्हें क्रो-मैगनन मैन कहा जाता है। यह मानव लगभग 10 हजार वर्षों तक नीएण्डरतलों के साथ रहा जब तक कि नीएण्डरतल समाप्त नहीं हो गये। क्रो-मैगनन का शरीर निएण्डरथल के शरीर से बड़ा था। इसके मस्तिष्क का औसत आकार लगभग 1600 मिलीलीटर था। आज से 30 हजार साल पहले जब नीएण्डरतल समाप्त हो गये तब पूरी धरती पर केवल क्रो-मैगनन मानव जाति का ही बोलबाला हो गया जो आज तक चल रहा है। वस्तुतः क्रो-मैगनन मानव ही प्रथम वास्तविक मानव है जो आज से लगभग 40 हजार साल पहले अस्तित्व में आया। इस समय धरती पर उत्तरवर्ती हिमयुग आरम्भ हो रहा था तथा लगभग पूरा यूरोप हिम की चपेट में था।

गर्म युग: आज से 12 हजार वर्ष पहले धरती पर होलोसीन काल आरंभ हुआ जो आज तक चल रहा है। यह गर्म युग है तथा वर्तमान हिमयुग के बीच में स्थित अंतर्हिम काल है। इस गर्म युग में ही आदमी ने तेजी से अपना मानसिक विकास किया और उसने कृषि, पशुपालन तथा समाज को व्यवस्थित किया। आज तक धरती पर वही गर्म युग चल रहा है और मानव निरंतर प्रगति करता हुआ आगे बढ़ रहा है। आज से लगभग 10 हजार साल पहले आदमी ने कृषि और पशु पालन आरंभ किया। यह इस गर्म युग की सबसे बड़ी देन है। पश्चिम एशिया से मिले प्रमाणों के अनुसार आज से लगभग 8000 साल पहले अर्थात् 6000 ई.पू. में आदमी ने हाथों से मिट्टी के बर्तन बनाना और उन्हें आग में पकाना आरंभ कर दिया था।

पाषाण काल

पाषाण-काल मानव सभ्यता की उस अवस्था को कहते हैं जब मनुष्य अपने दिन प्रतिदिन के कामों में पत्थर से बने औजारों एवं हथियारों का प्रयोग करता था तथा धातु का प्रयोग करना नहीं जानता था। मनुष्य ने प्रथम बार पृथ्वी पर आखें खोलीं तथा पत्थर को अपना हथियार बनाया। उस काल का मनुष्य, नितांत अविकसित अवस्था में था और जंगली जीवन व्यतीत करता था। जैसे-जैसे उसके मस्तिष्क का विकास होता गया, वह पत्थरों के हथियारों तथा औजारों को विकसित करता चला गया। इसी के साथ वह सभ्य जीवन की ओर आगे बढ़ा।

मानव की इस अवस्था के बारे में सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है कि मनुष्य औजार प्रयुक्त करने वाला पशु है। निःसंदेह संस्कृति की समस्त उन्नति, जीवन को सुखी एवं आरामदायक बनाने के लिये प्रकृति के साथ चल रहे युद्ध में, औजारों तथा उपकरणों के बढ़ते हुए उपयोग के कारण हुई है। मनुष्य का भौतिक इतिहास, मनुष्य के औजार विहीन अवस्था से निकलकर वर्तमान में पूर्ण मशीनी अवस्था में पहुँचने तक का लेखा जोखा है। 

अध्ययन की दृष्टि से पाषाण युग को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है-

(1.) पूर्व-पाषाण काल

(2.) मध्य-पाषाण काल

(3.) नव-पाषाण काल

संस्कृति के ये तीनों काल एक के बाद एक करके अस्तित्व में आये किंतु ऐसे स्थल बहुत कम मिले हैं जहाँ तीनों अवस्थाओं के अवशेष देखने को मिलते हैं। विंध्य के उत्तरी भागों तथा बेलन घाटी में पूर्व-पाषाण-काल, मध्य-पाषाण-काल और नव-पाषाण-काल की तीनों अवस्थाएं क्रमानुसार देखने को मिलती हैं।

(1.) पूर्व-पाषाण काल (पेलियोलिथिक पीरियड)

मानव-सभ्यता के प्रारम्भिक काल को पूर्व-पाषाण-काल के नाम से पुकारा गया है। इसे पुरा पाषाण काल तथा उच्च पुरापाषाण युग भी कहते हैं। मानव की ‘होमो सेपियन’ प्रजाति इस संस्कृति की निर्माता थी।

काल निर्धारण: भारत में इस काल का आरम्भ आज से लगभग पाँच लाख वर्ष पहले हुआ। भारत में मानव आज से लगभग दस हजार साल पहले तक संस्कृति की इसी अवस्था में रहा। आज से लगभग दस हजार वर्ष पहले अर्थात् 8000 ई.पू. में, पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति का अन्त हुआ।

पूर्व-पाषाण-कालीन स्थल: पूर्व-पाषाण-कालीन स्थल कश्मीर, पंजाब की सोहन नदी घाटी (अब पाकिस्तान), मध्यभारत, पूर्वी भारत तथा दक्षिणी भारत में पाये गये हैं। इस संस्कृति के औजार छोटा नागपुर के पठार में भी मिले हैं। ये 1,00,000 ई.पू. तक पुराने हो सकते हैं। बिहार के सिंहभूमि जिले में लगभग 40 स्थानों पर पूर्व पाषाण कालीन स्थल मिले हैं। बंगाल के मिदनापुर, पुरुलिया, बांकुरा, वीरभूम, उड़ीसा के मयूरभंज, केऊँझर, सुंदरगढ़ तथा असम के कुछ स्थानों से भी इस काल के पाषाण निर्मित औजार प्राप्त हुए हैं। आन्ध्र प्रदेश के कुर्नूल नगर से लगभग 55 किलोमीटर की दूरी पर ऐसे औजार मिले हैं जिनका समय 25,000 ई.पू. से 10,000 ई.पू. के बीच का है। इनके साथ हड्डी के उपकरण और जानवरांे के अवशेष भी मिले हैं। आंध्रप्रदेश के चित्तूर जिले से भी इस युग के औजार मिले हैं। कर्नाटक के शिमोगा जिले तथा मालप्रभा नदी के बेसिन से भी इस युग के औजार मिले हैं। नागार्जुन कोंडा से भी पत्थर के फाल एवं अन्य उपकरण मिले हैं।

लिखित उल्लेख: पुराणों में पूर्व पाषाण कालीन मानवों के उल्लेख मिलते हैं जो कंद-मूल खाकर गुजारा करते थे। ऐसी पुरानी पद्धति से जीविका चलाने वाले लोग पहाड़ी क्षेत्रों में और गुफाओं में आधुनिक काल तक मौजूद रहे हैं।

शैल चित्र: विंध्याचल की पहाड़ियों में भीमबेटका नामक स्थान है जहाँ 200 से अधिक गुफाएं पाई जाती हैं। इन गुफओं में पूर्व-पाषाण कालीन मानव द्वारा बनाये गये कई प्रकार के शैल चित्र प्राप्त हुए हैं। इन चित्रों की संख्या कई हजार है। इनका काल एक लाख वर्ष पूर्व माना जाता है। इन गुफाओं में वे औजार भी मिले हैं जिनसे ये गुफाएं बनाई गई होंगी तथा इन चित्रों को उकेरा गया होगा। इन गुफाओं से 5000 से भी अधिक वस्तुएं मिली हैं जिनमें से लगभग 1500 औजार हैं।

जीवाश्म: कुर्नूल जिले की गुफाओं से बारहसिंघे, हिरन, लंगूर तथा गेंडे के जीवाश्म भी मिले हैं। ये जीवाश्म पूर्व-पाषाण युग के हैं। इन जीवाश्मों के पाये जाने वाले क्षेत्र में पूर्व-पाषाण कालीन औजार भी मिले हैं।

पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति एवं उसकी विशेषताएं

इस काल का मानव पूर्णतः आखेटक अवस्था में था। वह कृषि, पशुपालन, संग्रहण आदि मानवीय कार्यकलापों से अपरिचित था। इस काल के मानव ने जिस संस्कृति का निर्माण किया उसकी विशेषताएं इस प्रकार से हैं-

निवासी: इतिहासकारों, पुरातत्ववेत्ताओं एवं समाजशास्त्रियों की धारणा है कि पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के लोग हब्शी जाति के थे। इन लोगों का रंग काला और कद छोटा था। इनके बाल ऊनी थे और नाक चिपटी थी। ऐसे मानव आज भी अण्डमान एवं निकोबार द्वीपों में पाये जाते हैं।

औजार: पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति का मानव, पत्थर के अनगढ़ और अपरिष्कृत औजार बनाता था। वह कठोर चट्टानों से पत्थर प्राप्त करता था तथा उनसे हथौड़े एवं रुखानी आदि बनाता था जिनसे वह ठोकता, पीटता तथा छेद करता था। ये औजार अनगढ़ एवं भद्दे आकार के होते थे। पत्थर के औजारों से वह पशुओं का शिकार करता था। पत्थर के इन औजारों में लकड़ी तथा हड्डियों के हत्थे लगे रहते थे, लकड़ी तथा हड्डियों के भी औजार होते थे परन्तु अब वे नष्ट हो गये हैं।

आवास: पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति का मानव किसी एक स्थान पर स्थिर नहीं रहता था वरन् जहाँ कहीं उसे शिकार, कन्द, मूल, फल आदि पाने की आशा होती थी वहीं पर चला जाता था। प्राकृतिक विषमताओं एवं जंगली जानवरों से बचने के लिये वह नदियों के किनारे स्थित जंगलों में ऊँचे वृक्षों एवं पर्वतीय गुफाओं का आश्रय लेता था। समझ विकसित होने पर इस युग के मानव ने वृक्षों की डालियों तथा पत्तियों की झोपड़ियां बनानी आरम्भ कीं।

आहार: पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के लोग अपनी जीविका के लिये पूर्ण रूप से प्रकृति पर निर्भर थे। भोजन प्राप्त करने के लिये जंगली पशुओं का शिकार करते थे और नदियों से मछलियाँ पकड़ते थे। वनों में मिलने वाले कन्द-मूल एवं फल भी उनके मुख्य आहार थे।

कृषि: पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति का मानव कृषि करना नहीं जानता था।

पशुपालन: उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले की बेलन घाटी में मिले घरेलू पशुओं के अवशेषों से अनुमान होता है कि 25,000 ई.पू. के आसपास बकरी, भेड़ और गाय-भैंस आदि पाले जाते थे।

वस्त्र: पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के मानव पूर्णतः नंगे रहते थे। प्राकृतिक विषमताओं से बचने के लिये उन्होंने वृक्षों की पतियों, छाल तथा पशुओं की खाल से अपने शरीर को ढंकना प्रारम्भ किया होगा।

सामाजिक संगठन: पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के मानव टोलियां बनाकर रहते थे। प्रत्येक टोली का एक प्रधान होता होगा जिसके नेतृत्व में ये टोलियॉं आहार तथा आखेट की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान को जाया करती होंगी।

शव-विसर्जन: अनुमान है कि पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के आरंभिक काल में शवों को जंगल में वैसे ही छोड़ दिया जाता था जिन्हें पशु-पक्षी खा जाते थे। बाद में शवों के प्रति दायित्व की भावना विकसित होने पर वे शवों को लाल रंग से रंगकर धरती में गाड़ देते थे।

(2.) मध्य-पाषाण काल (मीजोलिथिक पीरियड)

8000 ई.पू. में धरती पर अब तक के अंतिम हिमयुग की समाप्ति हुई। इसी के साथ धरती की जलवायु शुष्क तथा उष्ण हो गई जलवायु में हुए परिवर्तनों के साथ-साथ वनस्पति एवं जीव-जन्तुओं में भी परिवर्तन हुए। इस काल में धरती पर क्रो-मैगनन मानव का बोलबाला था। उसका मस्तिष्क पूर्वपाषाण कालीन मानव से काफी विकसित था। इस कारण इस मानव ने तेजी से सभ्यता एवं संस्कृति का विकास किया जिससे उसके जीवन में पहले की अपेक्षा बहुत बड़ा परिवर्तन आ गया। यह मानव अपने अधिवास के लिये अधिक अनुकूल एवं नये क्षेत्रों की तरफ बढ़ा तथा इसने एक नई संस्कृति को जन्म दिया। इस संस्कृति को मध्य-पाषाण-कालीन संस्कृति अथवा उत्तर-पाषाण-कालीन संस्कृति कहते हैं।

काल निर्धारण: मध्य-पाषाण-काल, पूर्व-पाषाण-काल और नव-पाषाण- काल के बीच का संक्रांति काल है। इसे उत्तर पाषाण युग भी कहते हैं। भारत में इस संस्कृति का आरम्भ 8000 ई.पू. के आसपास हुआ और लगभग 4000 ई.पू. तक चला।

मध्य-पाषाण-संस्कृति स्थल: मध्य-पाषाण-संस्कृति के कई स्थल छोटा- नागपुर, मध्य भारत और कृष्णा नदी के दक्षिण में मिले हैं। मध्य भारत में नर्मदा के तटों पर, गोदावरी के नदीमुख-क्षेत्र में और तुंगभद्रा तथा पेन्नार के बीच के क्षेत्र में भी मध्य-पाषाण-कालीन संस्कृति स्थल मिले हैं। बेलन की घाटी में भी इस युग के मानव के आवास मिले हैं। इस संस्कृति के स्थल सोहन नदी घाटी में भी मिले हैं। यहाँ हिमालय क्षेत्र के तृतीय हिमाच्छादन के समकालीन स्तर में हम एक अनगढ़ प्रस्तर उपकरण उद्योग को देखते हैं।

मध्य-पाषाण-कालीन संस्कृति की विशेषताएं

औजार: मध्य-पाषाण-संस्कृति के विशिष्ट औजार लघु-पाषाण हैं। इस संस्कृति के मानव ने प्रमुखतः शल्क औजारों का उत्पादन किया। ये शल्क समस्त भारत में पाए गए हैं और इनमें क्षेत्रीय भेद भी देखने को मिले हैं। इनमें मुख्य औजार शल्कों से निर्मित विभिन्न प्रकार की खुरचनियां हैं। बरमे और धार वाले उपकरण भी भारी संख्या में मिले हैं। हाथ की कुल्हाड़ियों का उपयोग इस काल की प्रमुख विशेषता है। भारत में प्राप्त ऐसी कुल्हाड़ियाँ काफी सीमा तक वैसी ही हैं जैसी की पश्चिमी एशिया, यूरोप और अफ्रीका में मिली कुल्हाड़ियाँ हैं। पत्थरों के औजारों का उपयोग मुख्यतः काटने एवं छीलने के लिए होता था। भोपाल से 40 किलोमीटर दक्षिण में स्थित भीमबेटका से हाथ की कुल्हाड़ियाँ, विदारक, पत्तियां और खुरचनियां तथा कुछ तक्षणियाँ पायी गयी हैं। गुजरात के टिब्बों के ऊपरी स्तरों में पत्तियां, तक्षणियां, खुरचनियां आदि मिले हैं। हाथ की कुल्हाड़ियां हिमालय के दूसरे हिमनद निक्षेप में भी मिली हैं। नर्मदा तट के अनेक स्थानों पर और तुंगभद्रा के दक्षिण में भी अनेक स्थानों पर इस युग के औजार मिले हैं।

औजारों का विकास: मध्य-पाषाण-कालीन संस्कृति का मानव भी अपने औजार पत्थर से ही बनाता था परन्तु उसके औजार पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति के औजारों की अपेक्षा अधिक साफ तथा सुन्दर होते थे। अब वे उतने भद्दे नहीं रह गये थे। इन औजारों को रगड़ एवं घिस कर चिकना कर लिया जाता था। इससे वे सुडौल तथा चमकीले हो जाते थे। इस काल में औजार एवं हथियार बनाने के लिये लकड़ी तथा हड्डियों का प्रयोग पहले से भी अधिक होने लगा। इससे औजारों में विविधता आ गई और धनुष, बाण, भाले, चाकू, कुल्हाड़ी के अतिरिक्त हल, हँसिया, घिरनी, सीढ़ी, डोंगी, तकली आदि भी बनायी जाने लगी।

आवास: बेलन घाटी में गुफाओं और चट्टानों से बने शरण-स्थल पाये गये हैं जो विशेष मौसमों में मनुष्यों द्वारा शिविर के रूप में उपयोग किये जाते रहे होंगे। भोपाल से 40 किलोमीटर दक्षिण में भीम बेटका में भी मनुष्यों के उपयोग में आने वाली गुफाएं और चट्टानों से बने शरण-स्थान पाये गये हैं।

जलवायु: हिम काल की समाप्ति के बाद धरती पर शुष्क एवं उष्ण जलवायु आरंभ हुआ था। मध्य-पाषाण काल में धरती की जलवायु कम आर्द्र थी। इस काल के आरंभ होने के बाद से धरती की जलवायु की परिस्थितियों में अब तक कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ है।

कृषि का आरम्भ: मध्य-पाषाण-काल के मानव ने हल तथा बैलों की सहायता से कृषि करना आरम्भ कर दिया। वह पौधों को काटने के लिए हँसिया तथा अनाज पीसने के लिए चक्कियों का प्रयोग करने लग गया। इस काल का मानव गेहूँ, जौ, बाजरा आदि की खेती करता था।

पशु-पालन: पशु पालन पूर्व-पाषाण-काल में आरम्भ हो गया था। मध्य-पाषाण-काल के मानव ने पशुओं की उपयोगिता को अनुभव करके पशु-पालन का काम बड़े स्तर पर आरम्भ कर दिया। इस काल का मानव गाय, बैल, भैंस, भेड़, बकरी, कुत्ता, घोड़ा आदि जानवरों को पालता था।

मिट्टी के बर्तनों का निर्माण: मध्य-पाषाण-काल के मानव ने मिट्टी के बर्तन बनाना आरम्भ किया। कृषि तथा पशु-पालन का काम आरम्भ हो जाने से इस संस्कृति के मानव के पास सामान अधिक हो गया। अपने सामान को सुरक्षित रखने के लिए इस युग के मानव ने मिट्टी के छोटे-बड़े बर्तन बनाने आरम्भ किये। इस काल का मानव चाक का अविष्कार नहीं कर पाया था। अतः बर्तन हाथ से ही बनाये जाते थे।

वस्त्र-निर्माण: मध्य-पाषाण-काल के मानव ने पौधों के रेशों तथा ऊन के धागों की कताई आरम्भ की। इन धागों को बुनकर वह वस्त्र बनाने लगा। खुदाई में बहुत-सी तकलियाँ तथा करघे मिले हैं। इस संस्कृति का मानव वस्त्रों को रंगना भी सीख गया था।

गृह-निर्माण: मध्य-पाषाण-काल के मानव ने अपने निवास के लिये स्थाई घर बनाना आरम्भ किया। इस काल के घरों की दीवारें लट्ठों तथा नारियल के तनों से बनी होती थीं और उन पर मिट्टी का लेप लगाया जाता था। इनकी छतें लकड़ी, पत्ती, छाल आदि से बनती थी और फर्श कच्ची मिट्टी से बनता था।

कार्य-विभाजन तथा वस्तु-विनिमय: मध्य-पाषाण-काल के मानव ने भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्यों को करना आरम्भ कर दिया था। कोई खेती करता था तो कोई मिट्टी के बर्तन बनाता था और कोई लकड़ी के काम किया करता था। इस प्रकार सबका काम अलग-अलग बंट गया। इससे वस्तु-विनिमय आरम्भ हो गया। एक गाँव के लोग अपनी विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं को पूरा करने लिए चीजों की अदली-बदली किया करते थे। बढ़ई तथा कुम्हार अपनी वस्तुएँ किसान को देकर उनसे अन्न प्राप्त कर लेते थे।

युद्ध का प्रारम्भ: पुरा-पाषाण-काल का मानव झुण्डों में रहता था जिनमें प्रायः संघर्ष हो जाया करता था। मध्य-पाषाण-काल में विभिन्न मानव बस्तियों के बीच युद्ध होने आरम्भ हो गए। इसलिये आत्म-रक्षा के लिए गांव के चारों और खाई बनाई जाने लगी ताकि शत्रु अचानक गांव में न घुस सकें। इस काल का मानव, युद्ध में पत्थर के हथियारों का प्रयोग करता था।

धर्म: खुदाई में कुछ नारी-मूर्तियाँ मिली हैं जिनसे अनुमान लगाया गया है कि मध्य-पाषाण-संस्कृति का मानव मातृदेवी का उपासक था। देवी को प्रसन्न करने के लिए वह सम्भवतः पशुओं की बलि भी देता था। उसका विश्वास था कि ऐसा करने से पृथ्वी माता प्रसन्न होती है और पशु तथा कृषि में वृद्धि होती है।

शव-विसर्जन: मध्य-पाषाण-काल का मानव भी शवों को धरती में गाड़ता था। इस कार्य के लिये अलग से स्थान निर्धारित किया जाता था। कभी-कभी घर के भीतर अथवा उनके निकट ही शव को गाड़ा जाता था। शव के साथ उपयोगी वस्तुएँ रखी जाती थीं। इस काल में शव को जलाने की प्रथा भी आरम्भ हो गई थी। शव दहन के पश्चात् उसकी राख को मिट्टी के बर्तन में रख कर आदरपूर्वक भूमि में गाड़ा जाता था।

निष्कर्ष: मध्य-पाषण-कालीन संस्कृति में मानव जीवन में आये परिवर्तन अत्यंत क्रान्तिकारी थे। इस काल का मानव, सभ्यता की दौड़ में बहुत आगे बढ़ गया था। कृषि तथा पशु-पालन का कार्य आरम्भ हो जाने के कारण उसमें सहकारिता की भावना विकसित हो गई थी जिससे वह एक स्थान पर गाँवों में स्थायी रूप से निवास करने लगा था। उसे अपनी धरती से प्रेम होने लगा था। इस कारण मध्य-पाषण-कालीन संस्कृति के मानव में मातृभूमि की धारणा विकसित हो गई। मानव के पास भूमि, घर, पशु, अन्न तथा अन्य उपयोगी वस्तुएँ होने से व्यक्तिगत सम्पत्ति का उदय हो गया और लोगों में सम्पन्नता तथा दरिद्रता का भाव भी जन्म लेने लगा था। अपनी सम्पत्ति की रक्षा के लिए विभिन्न प्रकार की व्यवस्थाएँ भी की जाने लगीं। सारांश यह है कि मध्य-पाषाण-काल, पूर्व-पाषाण-काल की अपेक्षा सभ्यता तथा संस्कृति के क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ गया था।

(3.) नव-पाषाण-काल (निओलिथिक पीरियड)

पूर्व-पाषाण-कालीन संस्कृति से निकलकर मध्य-पाषाण-कालीन संस्कृति तक पहुंचने में मानव को लगभग 35 लाख वर्ष लगे। भारत में यह कार्य लगभग 5 लाख साल में हुआ। इतने लम्बे समय तक मानव का संस्कृति के एक ही चरण में बने रहने का कारण यह है कि पूर्वपाषाण कालीन संस्कृति को जन्म देने वाले होमो सेपियन मानव का मस्तिष्क अधिक विकसित नहीं था। जबकि मध्यपाषाण कालीन संस्कृति को जन्म देने वाले क्रोमैगनन मानव अधिक बड़े एवं विकसित मस्तिष्क का स्वामी था। इस कारण उसने लगभग दो से पांच हजार साल में ही मध्यपाषाण-कालीन संस्कृति को त्यागकर नव-पाषाण कालीन संस्कृति को जन्म दिया।

काल निर्धारण: पश्चिमी एशिया के इतिहास में 9000-3000 ई.पू. के बीच की अवधि में पहली प्रौद्योगिक क्रंाति घटित हुई, क्योंकि इसी अवधि में कृषि, कपड़़ा बुनाई, गृह-निर्माण आदि कलाओं का आविष्कार हुआ परन्तु भारतीय प्रायद्वीप में नवपाषाण युग का आरम्भ ईसा पूर्व चौथी सहस्राब्दि के लगभग हुआ। इसी युग में प्रायद्वीप में चावल, गेहूँ और जौ जैसे कुछ महत्त्वपूर्ण अनाजों की खेती आरम्भ हुई। इस भूभाग में आरंभिक गांवों की स्थापना भी इसी युग में हुई। मानव अब सभ्यता की देहली पर पैर रखने जा रहा था। दक्षिणी भारत और पूर्वी भारत में ऐसी कुछ बस्तियों की स्थापना 1000 ई.पू. में भी होती रही।

नव-पाषाण-कालीन संस्कृति की विशेषताएं

नव-पाषाण-कालीन संस्कृति के मानव का जीवन: नव-पाषाण-कालीन संस्कृति के मानव का जीवन पर्याप्त कष्टमय था। उसे पत्थरों के औजारों और हथियारों पर ही पूर्णतः आश्रित रहना पड़ता था, इसलिए वह पहाड़ी क्षेत्रों से अधिक दूरी पर अपनी बस्तियों की स्थापना नहीं कर पाया। बहुत अधिक परिश्रम करने पर भी वह केवल अपने निर्वहन भर के लिए अनाज पैदा कर पाता था।

नव-पाषाण-कालीन संस्कृति के औजार: नव-पाषाण-कालीन संस्कृति के मानव ने पॉलिशदार पत्थर के औजारों का उपयोग किया। पत्थर की कुल्हाड़ियां उसका प्रमुख औजार थीं जो प्रायः समस्त भारत में बड़ी संख्या में मिली हैं। उस युग के लोगों ने काटने के इस औजार का कई प्रकार से उपयोग किया। कुल्हाड़ी चलाने में प्रवीण वीर परशुराम का प्रचीन आख्यान प्रसिद्ध है। इस युग के पॉलिशदार औजारों में लघुपाषाणों के फलक भी हैं।

            नव-पाषाण-कालीन संस्कृति के स्थल: नवपाषाण युग के निवासियों की बस्तियों को, उनके द्वारा प्रयुक्त कुल्हाड़ियों की किस्मों के आधार पर, तीन महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में बांटा जा सकता है- (1.) उत्तर दिशा में बर्जेहोम, (2.) पूर्व दिशा में चिरंड तथा (3.) दक्षिण दिशा में गोदावरी नदी के दक्षिण में।

            (1.) बुर्जहोम: कश्मीर की घाटी में श्रीनगर से 20 किलोमीटर दूर बर्जेहोम नामक स्थान है। यहाँ के नव-पाषाण-कालीन मानव, एक प्लेट पर, गड्ढे वाले घरों में रहते थे। पशुओं और मछलियों के आखेट पर ही उनका जीवन आश्रित था। अनुमान होता है कि वे कृषि अथवा पालतू पशुओं से परिचित नहीं थे। वे पत्थर के पॉलिशदार औजारों का उपयोग करते थे, उनके बहुत से औजार और हथियार हड्ड्यिों से बने हुए हैं। बुर्जहोम के लोग अपरिष्कृत धूसर मृद्भाण्डों का उपयोग करते थे। बुर्जहोम में पालतू कुत्ते भी स्वामियों के शवों के साथ शवाधानों में गाढ़े जाते थे। गड्ढों वाले घरों में रहने और स्वामी के शव के साथ उसके पालतू कुत्ते को गाढ़ने की प्रथा भारत में नवपाषाण युगीन लोगों में अन्यत्र कहीं भी देखने को नहीं मिलती। बुर्जहोम की बस्ती 2400 ई.पू. की है।

(2.) चिरंड: भारत में दूसरा स्थान चिरंड है जहाँ से पर्याप्त मात्रा में हड्डियों के औजार मिले हैं। यह स्थल पटना से 40 किलोमीटर पश्चिम में गंगा के उत्तर में स्थित है। ये औजार उत्तर नवपाषाण युगीन स्तरों वाले एक ऐसे क्षेत्र में मिले हैं जहाँ लगभग 100 सेंटीमीटर वर्षा होती है। यहाँ पर चार नदियों- गंगा, सोन, गंडक और घाघरा का मिलन-स्थल होने के कारण खुली धरती उपलब्ध थी। इस कारण यहाँ बस्ती की स्थापना सम्भव हुई। चिरंड से प्राप्त हड्डियों के औजार 1600 ई.पू. के लगभग के हैं।

(3.) गोदावरी नदी: नवपाषाण युगीन लोगों के एक समूह का निवास दक्षिण भारत में गोदावरी नदी के दक्षिण में निवास करता था। इन्होंने अपनी बस्तियां सामान्यतः ग्रेनाइट की पहाड़ियों के ऊपर अथवा नदी तट के समीप के टीलों पर स्थापित कीं। ये लोग पत्थर की कुल्हाड़ियों के साथ-साथ एक प्रकार के प्रस्तर-फलकों का भी उपयोग करते थे। आग में पकायी गयी लघु मृण्मूर्तियों को देखने से अनुमान होता है कि वे कई पशुओं को पालते थे। वे गाय-बैल, भेड़ और बकरियां रखते थे। वे सिलबट्टे का उपयोग करते थे, जिससे ज्ञात होता है कि वे अनाज पैदा करने की कला जानते थे।

(4.) अन्य स्थल: भारत के पूर्वोत्तर में स्थित असम की पहाड़ियों से नवपाषाण युगीन औजार प्राप्त हुए हैं। भारत के मेघालय की गारो पहाड़ियों में भी नव-पाषण-संस्कृति के औजार मिले हैं। इनका काल निर्धारित नहीं किया जा सका है। इनके अतिरिक्त विंध्याचल के उत्तरी भागों में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर और इलाहाबाद जिलों से भी अनेक नवपाषाण युगीन स्थल मिले हैं। इलाहाबाद जिले के नवपाषाण युगीन स्थलों की विशेषता यह है कि यहाँ ईसा पूर्व की छठी सहस्राब्दी में भी चावल की खेती की जाती थी। बिलोचिस्तान में भी नवपाषाण युग के कुछ स्थल मिले हैं जो सबसे प्राचीन अनुमानित होते हैं।

नव-पाषाण युगीन स्थलों का उत्खनन: भारत में अब तक जिन नवपाषाण युगीन स्थलों अथवा स्तरों का उत्खनन हुआ है, उनमें प्रमुख हैं- कर्नाटक में मास्की, ब्रह्मगिरी, हल्लुर, कीड़कल, संगनकल्लु, टी. नरसीपुर तथा तैक्कलकोट, तमिलनाडु में पेयमपल्ली, आन्ध्रप्रदेश में पिकलीहल और उतनूर। यहाँ नवपाषाण अवस्था का चरण लगभग 2500 ई.पू. से 1000 ई.पू. तक रहा, यद्यपि उतनूर के लिए प्राचीनतम कार्बन-तिथि 2300 ई.पू. है।

आवास: नव-पाषाण युगीन मानव ने प्राकृतिक आवासों अर्थात् पर्वतीय गुफाओं एवं पेड़ों का आश्रय त्यागकर नदी तटों एवं पर्वतों के समतल स्थानों पर पेड़ों की टहनियों, तनों, सूखी लकड़ियों, घास एवं पशुओं की हड्डियों तथा खालों आदि से आवास बनाने आरम्भ किये। ये आवास झुण्ड में बनते थे।

औजार: इस युग के औजार एवं हथियार पत्थर से ही बनाये जाते थे किंतु अब उनमें पहले की अपेक्षा अधिक वैविध्य, कौशल एवं सौन्दर्य का समावेश किया गया। नव-पाषाण-कालीन औजारों एवं हथियारों पर पॉलिश की जाने लगी। इनके निर्माण के लिये अच्छे दाने के गहरे हरे रंग के ट्रप का उपयोग किया जाने लगा। इस युग के औजारों में कुल्हाड़ियाँ, चाकू, तीर, ओखली, मूसल, पीसने के औजार, स्क्रैपर तथा पॉइण्टर उपलब्ध हुए हैं।

कृषि: नवपाषाण युग की कुल्हाड़ियां उड़ीसा के पहाड़ी क्षेत्रों में भी मिली हैं। देश के इस भाग में चावल की खेती और छोटे पैमाने की बस्तियों की शुरूआत काफी पहले हुई थी। बाद के नवपाषाण युगीन अधिवासी ऐसे कृषक थे जो मिट्टी और सरकंडों से बनाए गए गोलाकार अथवा चौकोर घरों में रहते थे। गोलाकार घरों में रहने वाले लोगों की सम्पत्ति सामूहिक होती थी। यह निश्चित है कि ये लोग स्थायी अधिवासी बन गए थे। ये रागी और कुलथी पैदा करते थे।

पशुपालन: पिकलीहल के नवपाषाण युगीन अधिवासी पशुपालक थे। उन्होंने गाय-बैल, भेड़-बकरी आदि को पालतू बना लिया था। ये लोग मौसमी पड़ाव डालकर इनके इर्द-गिर्द खंभेे और खूँटे गाड़कर गौशालाएं खड़ी करते थे। ऐसे बाड़ों के भीतर वे गोबर का ढेर लगाते थे। फिर इस समस्त पड़ाव स्थल को आग लगाकर आगामी मौसम के पड़ाव के लिए इसे साफ करते थे। पिकलीहल में ऐसे राख के ढेर ओर पड़ावस्थल दोनों ही मिले हैं।

बर्तन: चूँकि नवपाषाण अवस्था के कई अधिवासी समूह अनाजों की खेती से परिचित हो गए थे और पालतू पशु भी रखने लगे थे, इसलिए उन्हें अनाज और दूध आदि रखने के लिए बर्तनों की आवश्यकता थी। पकाने और खाने के लिए भी उन्हे बर्तनों की आवश्यकता थी। चाक पर मिट्टी के बर्तन बनाना इस युग का महत्त्वपूर्ण अविष्कार था। इसी युग में मानव ने मिट्टी के बर्तनों को आग में पकाकर मजबूत बनाना सीखा।

धर्म: नव-पाषाण-काल में धार्मिक अनुष्ठान प्रारंभ हो गये। चूंकि शवों के साथ दैनिक आवश्यकता की वस्तुएं भी शवाधानों से प्राप्त हुई हैं इसलिये अनुमान होता है कि इस काल का मानव पुर्नजन्म में अथवा मृत्यु के बाद के किसी विशेष तरह के जीवन में विश्वास करता था।

तीनों सभ्यताओं का तुलनात्मक अध्ययन

काल का अंतर: पूर्व पाषाण काल आज से लगभग पांच लाख साल पहले आरंभ होकर आज से लगभग 10 हजार साल पहले तक अर्थात् 8000 ई.पू. तक चला। मध्य-पाषाण-काल आज से 10 हजार साल पहले आरम्भ होकर आज से लगभग 6 हजार साल पहले तक अर्थात् 4000 ई.पू. तक चला। नव-पाषाण-काल आज से लगभग 6 हजार साल पहले आरंभ हुआ तथा लगभग 1000 ई.पू. तक चलता रहा।

स्थल: पूर्व पाषाण कालीन स्थल कश्मीर, पंजाब, सोहन नदी घाटी, छोटा नागपुर के पठार, विंध्याचल की पहाड़ियों में भीम बेटका, बिहार का सिंहभूम जिला, बंगाल, असम, आंध्र प्रदेश कर्नाटक मालप्रभा नदी बेसिन आदि विस्तृत क्षेत्र से प्राप्त हुए हैं। मध्य पाषाण कालीन स्थल हिमालय के द्वितीय हिमनद निक्षेप, बेलन घाटी, भीम बेटका, गुजरात, नर्मदा तट तथा तुंगभद्रा के दक्षिण में मिले हैं। नवपाषाण काल के स्थल कश्मीर की घाटी में बुर्जहोम, पटना के निकट चिरंड, गोदावरी नदी के दक्षिणी क्षेत्र, असम की पहाड़ियां, मेघालय की गारो पहाड़ियां, उड़ीसा, कर्नाटक में मास्की, ब्रह्मगिरि, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश आदि स्थानों पर पाये गये हैं।

औजार: पूर्व-पाषाण-कालीन औजार क्वार्टजाइट से बनते थे। मध्य-पाषाण- कालीन औजार कैल्सेडोनी, जेस्पर, चर्ट और ब्लडस्टोन से बनते थे। नव-पाषाण-काल के औजार अच्छे दाने के गहरे हरे रंग के ट्रप से बनते थे। पूर्व-पाषाण-कालीन औजारों पर किसी तरह की पॉलिश नहीं है। वे अनगढ़, भद्दे और स्थूल हैं। मध्य-पाषाण-कालीन औजार बहुत छोटे हैं इसलिये इन्हें लघुपाषाण, अणुपाषाण ;डपबतवसपजीद्ध तथा लघु औजार भी कहा जाता है। इनका आकार आधा इंच से पौने दो इंच तक पाया गया है। नव-पाषाण-कालीन औजारों पर पॉलिश पाई गई है। अधिकांशतः पूरे औजारों पर पॉलिश की गई है। कुछ औजारों पर ऊपर तथा नीचे की ओर पॉलिश की गई है।

आवास: पूर्व-पाषाण-कालीन मानव पर्वतीय कंदराओं, वृक्षों एवं प्राकृतिक आवासों में आश्रय लेता था। मध्य-पाषाण- कालीन मानव भी आवास बनाने की कला से लगभग अपरिचित था। वह भी प्राकृतिक आवासों पर निर्भर था। नव-पाषाण-कालीन मानव पेड़ों की टहनियों एवं पशुओं की हड्डियों की सहायता से झौंपड़ियां बनाना सीख गया था।

कृषि: पूर्व-पाषाण-कालीन मानव कृषि करना नहीं जानता था। मध्य-पाषाण- कालीन मानव बैलों एवं मानवों की सहायता से कृषि करना सीख गया था। वह पौधों को काटने के लिये हँसिया तथा अनाज को पीसने के लिये चक्कियों का प्रयोग करता था। वह गेहूँ, जौ बाजरा आदि की खेती करता था। नव-पाषाण-काल का मानव चावल, रागी और कुलथी भी पैदा करने लगा था। इनके पॉलिशदार औजारों में लघुपाषाणों के फलक भी हैं।

पशुपालन: पूर्व-पाषाण-कालीन मानव ने 25,000 ई.पू. के आसपास बकरी, भेड़ और गाय-भैंस आदि पालना आरंभ किया। मध्य-पाषाण-काल का मानव गाय, बैल, भैंस, भेड़, बकरी, कुत्ता, घोड़ा आदि जानवरों को पालता था। पशुओं पर उसकी निर्भरता बढ़ गई। नव-पाषाण काल का मानव पशुपालन पर और अधिक निर्भर हो गया। बोझा ढोने से लेकर हल खींचने तक के काम पशुओं से लिये जाने लगे।

बर्तन: पूर्व-पाषाण-कालीन मानव बर्तन बनाना नहीं जानता था। मध्य पाषाण-काल के मानव ने मिट्टी के बर्तन बनाना आरम्भ किया किंतु इस काल के बर्तन न तो चाक पर बनाये जाते थे और न उन्हें आग में पकाया जाता था। नव-पाषाण काल के मानव ने बर्तन बनाने के लिये चाक का अविष्कार किया तथा उन्हें पक्का बनाने के लिये आग में पकाना आरंभ किया।

सामाजिक संगठन: पूर्व-पाषाण-कालीन मानव टोलियां बनाकर रहता था। उसमें परिवार की भावना विकसित नहीं हुई थी। उनका नेतृत्व एक प्रधान मानव करता था। मध्यपाषाण कालीन मानव में सहकारिता की भावना विकसित हो चुकी थी। उसने परिवार का निर्माण कर लिया था। इसलिये वह कार्य विभाजन एवं वस्तु विनिमय की समझ विकसित कर सका। अल्मोड़ा के निकट दलबंद की एक गुफा में मिले एक चित्र में दो वयस्क और दो बालक पांव से पांव एवं हाथ से हाथ मिलाकर चलते हुए दिखाये गये हैं। यह चित्र परिवार की एकता एवं सुबद्धता का परिचायक है। नव-पाषाण-काल में दूर-दूर रहने वाले मानवों ने समुदायों का गठन कर लिया जिससे कबीलाई संस्कृति का जन्म हुआ। एक कबीले में कई परिवार एक साथ रहते थे। कबीले का एक मुखिया होता था, जिसने आगे के युगों में चलकर राजा का रूप ले लिया।

कार्य विभाजन: पूर्व-पाषाण-कालीन मानव आखेटजीवी था इसलिये कार्य विभाजन नहीं हुआ था। वह आवास बनाना तथा खेती करना नहीं जानता था। मध्य-पाषाण-काल का मानव आवास निर्माण, कृषि, पशुपालन एवं मिट्टी के बर्तन बनाने से परिचित हो चुका था इसलिये इस युग के मानव ने कार्य विभाजन आरंभ किया। नव-पाषाण काल में कार्य विभाजन और सुस्पष्ट हो गया।

शव विसर्जन: पूर्व-पाषाण-कालीन सभ्यता के आरंभिक चरण में शवों को जंगल में छोड़ दिया जाता था जहाँ वह पशु-पक्षियों द्वारा खा लिया जाता था। बाद में शवों को लाल रंग से रंगकर धरती में गाढ़ना आरंभ किया गया। मध्य-पाषाण-काल का मानव भी शवों को धरती में गाड़ता था। इस कार्य के लिये अलग से स्थान निर्धारित किया जाता था। कभी-कभी घर के भीतर अथवा उनके निकट ही शव को गाड़ा जाता था। शव के साथ उपयोगी वस्तुएँ रखी जाती थीं। इस काल में शव को जलाने की प्रथा भी आरम्भ हो गई थी। शव दहन के पश्चात् उसकी राख को मिट्टी के बर्तन में रख कर आदरपूर्वक भूमि में गाड़ा जाता था। नव पाषाण काल में भी शव विसर्जन की यही परम्पराएं अपनाई गई।

धर्म: पूर्व-पाषाण-कालीन सभ्यता के बाद के वर्षों में शवों को लाल रंग से रंगकर धरती में गाढ़ना आरंभ कर दिया गया था। इसलिये अनुमान होता है कि उस काल से ही मानव में धार्मिक भावना पनपने लगी। मध्य-पाषाण-संस्कृति का मानव मातृदेवी का उपासक था। देवी को प्रसन्न करने के लिए वह सम्भवतः पशुओं की बलि भी देता था। उसका विश्वास था कि ऐसा करने से पृथ्वी माता प्रसन्न होती है और पशु तथा कृषि में वृद्धि होती है। नव पाषाण काल में धार्मिक भावना और पुष्ट हो गई।

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