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वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो

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मुस्लिम लीग की दुष्टता का वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने फायदा उठाया

वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ईस्वी 1936 से 1944 तक पूरे आठ साल तक भारत में वायसराय एवं गवर्नर जनरल रहा। वह इस पद पर सर्वाधिक अविध तक रहने वाला अधिकारी था। उसके कार्यकाल में दूसरा विश्वयुद्ध लड़ा गया। इस कारण भारत की आजादी की लड़ाई कुछ समय के लिए रुक गई किंतु पाकिस्तान की मांग तेजी से उभर गई।

दिसम्बर 1940 में मुहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान योजना के पक्ष में यह तर्क दिया कि जिस प्रकार किसी एक सम्मिलित परिवार में दो भाइयों के लिए मिलकर रहना असम्भव हो जाने की स्थिति में सम्पत्ति विभाजन के पश्चात् वे शांति पूर्वक रह सकते हैं उसी प्रकार भारत विभाजन भी लाभदायक होगा किंतु जब ई.1944 में गांधीजी ने यही तर्क प्रस्तुत किया तो जिन्ना ने उसे स्वीकार नहीं किया क्योंकि तब मुसलमानों को एक केन्द्रीय व्यवस्था के अधीन रहना पड़ता।

सितम्बर 1944 में गांधीजी भारत को दो राष्ट्रों का देश मानने को तैयार नहीं थे। वे इसे एक संयुक्त परिवार मान सकते थे जिसके वे मुसलमान सदस्य जो उत्तर-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी भागों में बहुमत में थे, अलग रहना चाहते थे। गांधीजी मुस्लिम लीग के लाहौर प्रस्ताव को निम्नलिखित शर्तों पर स्वीकार करना चाहते थे –

(1) निर्धारित क्षेत्रों के निवासियों की इच्छा किसी निर्वाचन अथवा अन्य पद्धति द्वारा जान ली जाए।

(2) यदि उनका उत्तर हाँ में हो तो भारत को स्वतंत्रता मिलने के पश्चात् उन्हें अलग स्वतंत्र राज्यों में संगठित कर दिया जाए।

(3) एक संधि द्वारा बाह्य सुरक्षा, आंतरिक संचार साधन, आयात-निर्यात आदि विषयों का संचालन किया जाए।

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इस प्रकार लाहौर प्रस्ताव के परिणाम स्वरूप जो व्यवस्था उत्पन्न हो सकती थी, उसे गांधीजी ने स्वीकार तो किया किंतु वे दो राष्ट्रों के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करते थे। जिन्ना ने गांधीजी के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। इस समय तक जिन्ना के लाहौर प्रस्ताव में एक परिवर्तन आ चुका था। वह अब उत्तर-पूर्वी और उत्तर-पश्चिमी भागों को पाकिस्तान के दो क्षेत्र मानने लगा था तथा दोनों भागों को दो पृथक् राज्य बनाने के विरुद्ध हो चुका था। जिन्ना उपरोक्त विभाजन के बाद एक केन्द्रीय व्यवस्था के भी विरुद्ध था क्योंकि वह इस प्रकार के सम्मिलित प्रबन्धों का उत्तरदायित्व दोनों देशों की अलग संवैधानिक सभाओं को देना चाहता था।

कांग्रेस विगत पचास सालों से भी अधिक समय से भारत की आजादी के लिए संघर्ष कर रही थी। उसकी इस मांग को न केवल पूरे भारत में अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक समर्थन मिल रहा था। इस मांग का एक ही अर्थ था कि अंग्रेज सरकार कांग्रेस को सत्ता सौंप कर यहाँ से चली जाये।  

किंतु मुस्लिम लीग द्वारा पाकिस्तान की मांग का फच्चर फंसा देने से तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने अगस्त 1940 के अपने प्रसिद्ध प्रस्ताव में कहा- ‘बिना कहे यह स्पष्ट है कि ब्रिटिश सरकार भारत की शांति और कल्याण की अपनी वर्तमान जिम्मेदारियां किसी ऐसी सरकार को नहीं सौंप सकतीं जिसके प्रभुत्व को भारत के राष्ट्रीय जीवन में विशाल और महत्वपूर्ण तत्वों द्वारा अस्वीकार कर दिया गया हो।’

वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो की इस घोषणा से मुस्लिम लीग को अपनी पाकिस्तान की मांग के प्रति नैतिक समर्थन मिल गया।

ई.1941 में पाकिस्तान की मांग और पुष्ट हो गयी

मुस्लिम लीग के ई.1941 के मद्रास वार्षिक सत्र में पाकिस्तान की मांग और भी जोरदार तरीके से की गयी। इस सत्र में जिन्ना द्वारा इस मांग की विस्तृत व्याख्या भी की गयी।

 उसने कहा कि- “ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग का लक्ष्य है कि हम भारत के उत्तर-पश्चिम और पूर्वी क्षेत्रों में पूर्ण रूप से स्वतंत्र, अलग राष्ट्र की स्थापना करें जिसमें रक्षा, विदेश मामलों, संचार, कस्टम, मुद्रा विनिमय आदि पर पूरा हमारा नियंत्रण रहेगा। हम किसी भी परिस्थिति में एक केन्द्रीय सरकार के साथ संपूर्ण भारतीय संविधान नहीं चाहते। हम इसके लिये कभी सहमत नहीं होंगे।”

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

क्रिप्स मिशन

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देशी रियासतों के भारत संघ में सम्मिलिन पर विचार विमार्श करते हुए मेवाड़ महाराणा भोपाल सिंह

क्रिप्स मिशन की भारत-संघ योजना

दिसम्बर 1941 में द्वितीय विश्वयुद्ध में अमरीका का प्रवेश हुआ जिससे ब्रिटिश सरकार पर भारत प्रकरण को सुलझाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ने लगा। अमरीकी राष्ट्रपति इलियट रूजवेल्ट ने भारत की स्वतंत्रता के लिए ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाया। ब्रिटिश सरकार अमरीकी सरकार की सलाह की अनदेखी नहीं कर सकी क्योंकि अमरीकी सहायता के कारण ही युद्ध में ब्रिटेन की स्थिति में सुधार आया था तथा ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था स्थिर रह पायी थी।

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मार्च 1942 में जापान की शाही फौज भारत के इतने नजदीक आ गई कि उसका आक्रमण कभी भी आरम्भ हो सकता था। यह आक्रमण भारत पर नहीं, भारत में डटे अंग्रेजों पर होना था। अंग्रेज जानते थे कि यदि भारत में स्वयं भारतीयों का सहयोग नहीं मिला तो जापानियों के सामने टिकना असम्भव हो जाएगा। बदली हुई परिस्थितियों में ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने नरम रुख अपनाया। इस प्रकार ब्रिटिश सरकार को प्रथम गोलमेज सम्मेलन में आरम्भ हुई ‘भारत संघ योजना’ को फिर से आरम्भ करना पड़ा।

11 मार्च 1942 को इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने हाउस ऑफ कॉमन्स में एक वक्तव्य दिया जिसमें कहा गया- ‘युद्ध मंत्रिमंडल, सर स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेज रहा है ताकि ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों की इच्छाओं के अनुसार जिन सुधारों का प्रस्ताव किया है उनके बारे में भारतीयों के भय और शंकाओं का निवारण किया जा सके। क्रिप्स को राजतंत्रीय सरकार का पूरा विश्वास प्राप्त है। क्रिप्स अपने साथ जो प्रस्ताव ला रहे हैं, वह या तो पूर्णतः स्वीकृत किया जाना चाहिए या फिर पूर्णतः अस्वीकृत।’

22 मार्च 1942 को क्रिप्स दिल्ली पहुंचे। वे साम्यवादी चिंतन वाले नेता थे तथा उन्हें भारतीयों के साथ सहानुभूति थी किंतु वे राजाओं और राजशाही को पसंद नहीं करते थे। यही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई। उनकी तैयारी केवल कांग्रेस और मुस्लिम लीग से निबटने की थी, उन्हें पता ही नहीं था कि भारत में उनके मिशन के लिए इन दोनों से बड़ी मुसीबत भारतीय राजाओं की है।

राजाओं के पक्ष को लगभग अनसुना करने के कारण ही क्रिप्स मिशन सफल नहीं हो सका। भारत में उन्होंने कांग्रेस, मुस्लिम लीग सहित विभिन्न भारतीय पक्षों से बात की तथा भारतीय क्या लेना चाहते हैं और इंग्लैण्ड की गोरी सरकार उन्हें क्या देना चाहती है, इस अंतर को समझने का प्रयास किया। वी. बी. कुलकर्णी ने लिखा है- क्रिप्स भारत का मित्र और शुभचिंतक समझा जाता था।

28 मार्च 1942 को क्रिप्स मिशन ने नरेन्द्र मण्डल के प्रतिनिधि मण्डल से वार्ता की। क्रिप्स ने राजाओं को बताया कि ‘यदि भारत संघ अस्तित्व में आता है तो देशी-राज्यों के सम्बन्ध स्वतंत्र उपनिवेश अर्थात् भारत संघ से होंगे न कि ब्रिटिश क्राउन से। परमोच्चता वाली संधियां तब तक अपरिवर्तित रहेंगी जब तक कि कोई राज्य नवीन परिस्थतियों में अपने आप को समायोजित करने के लिए इसे समाप्त करने की इच्छा प्रकट न करे।’

राजाओं ने क्रिप्स के इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। वे अपना भाग्य कांग्रेस के हाथों में नहीं सौंपना चाहते थे। इसलिए भारत की आजादी के बाद भी वे अपने राज्यों को ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा पूर्व में की गई संधियों के दायरे में ब्रिटिश क्राउन के अधीन रखना चाहते थे।

29 मार्च 1942 को क्रिप्स मिशन ने एक पत्रकार वार्ता में विभिन्न पक्षों के मध्य समझौते के लिए एक योजना का प्रारूप प्रस्तुत किया जिसमें कहा गया कि-

‘युद्ध की समाप्ति के बाद, भारतीय संघ की स्थापना के उद्देश्य से नया संविधान बनाने हेतु संविधान सभा का गठन किया जाएगा। संविधान सभा में ब्रिटिश प्रांतों एवं देशी राज्यों की भागीदारी का प्रावधान किया जाएगा। यदि ब्रिटिश-भारत का कोई प्रांत नए संविधान को स्वीकार न करे तो वह अपनी यथावत स्थिति में रह सकता है। उसे भारत संघ के बराबर का दर्जा दिया जाएगा।

संविधान सभा का निर्माण विभिन्न प्रांतों की विधान सभाओं के निम्न सदनों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से किया जाएगा। इस हेतु नए चुनाव करवाए जाएंगे। समस्त निम्न सदनों में जितने सदस्य होंगे उनकी दशांश संख्या, संविधान सभा की होगी। संविधान सभा में भारतीय रियासतों को अपनी जनसंख्या के अनुपात से प्रतिनिधि भेजने के लिए आमंत्रित किया जाएगा।

रियासती प्रतिनिधियों के अधिकार ब्रिटिश-भारतीय प्रतिनिधियों के समान होंगे। रियासतों को यह छूट होगी कि वे नया संविधान स्वीकार करें या न करें। संविधान सभा में कुल 207 सदस्य होंगे जिनमें से 158 ब्रिटिश-भारत के तथा 49 रियासतों के होंगे।

जब तक नवीन संविधान का निर्माण न हो जाए, सम्राट की सरकार, भारत के विश्व-युद्ध उपक्रम का हिस्सा होने के कारण, भारत की रक्षा का भार अपने हाथ में रखेगी परन्तु सेना, साहस तथा सामग्री संसधान उपलब्ध करवाने का दायित्व भारत के नागरिकों के सहयोग से भारत सरकार पर होगा।

सरकार की इच्छा है कि प्रमुख भारतीय दलों के नेताओं को अपने देश की कौंसिलों, कॉमनवेल्थ तथा यूनाईटेड नेशन्स में परामर्श के लिए तुरन्त और प्रभावोत्पादक ढंग से भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाए जिससे वे भारत की स्वतत्रंता के लिए आवश्यक एवं महत्वपूर्ण सक्रिय तथा निर्माणकारी सहयोग देने में समर्थ हो सकें।’

योजना प्रस्तुत किए जाने के बाद पत्रकारों के प्रश्नों का जवाब देते हुए क्रिप्स ने कहा- ‘भारत संघ के निर्माण के लिए तत्काल प्रयास किए जाएंगे। युद्ध समाप्त होने की प्रतीक्षा नहीं की जाएगी। विभिन्न पक्षों में सहमति बनते ही प्रांतीय चुनाव करवाए जाएंगे। चुनाव परिणाम प्राप्त होते ही संविधान निर्माण सभा स्थापित की जाएगी। हम भारत पर कुछ भी थोपना नहीं चाहते यहाँ तक कि समय सीमा भी नहीं।’

पत्रकारों ने पूछा कि- ‘क्या आपको पता है कि इंगलैण्ड का इतिहास अपने वायदों से मुकर जाने का रहा है? क्या आप इन प्रस्तावों की गारण्टी प्रेसिडेण्ट रूजवेल्ट से दिलवा सकते हैं?’

क्रिप्स का उत्तर था कि- ‘यदि आपको मुझ पर विश्वास नहीं है तो किसी चीज की कोई प्रत्याभूति नहीं है। इसके लिए प्रेसिडेण्ट रूजवेल्ट उपलब्ध नहीं होंगे।’

क्रिप्स से पूछा गया कि- ‘इन प्रस्तावों के तहत संविधान सभा में देशी राज्यों की जनता की भागीदारी के बारे में कुछ नहीं कहा गया है।’

इस पर क्रिप्स ने कहा कि- ‘यदि किसी राज्य में निर्वाचन का कोई तरीका है तो उनका उपयोग किया जाएगा किंतु यदि किसी राज्य में चुनी हुई संस्थायें नहीं हैं तो वहाँ यह कार्य नामित प्रतिनिधियों द्वारा किया जाएगा।’

पत्रकारों ने पूछा- ‘आप कैसे पता लगायेंगे कि देशी राज्य, भारत संघ में शामिल होने जा रहे हैं?’

क्रिप्स ने कहा- ‘देशी राज्यों से पूछकर।’

पत्रकारों ने पूछा- ‘क्या राज्यों के नागरिकों की कोई आवाज होगी?’

क्रिप्स ने कहा- ‘इसका निर्णय उन राज्यों की वर्तमान सरकारों द्वारा किया जाएगा। हम किसी प्रकार की नई सरकारों का निर्माण नहीं करेंगे। राज्यों के साथ ब्रिटिश सरकार के सम्बन्ध संधियों के माध्यम से हैं, वे संधियां तब तक बनी रहेंगी जब तक कि राज्य उन्हें बदलने की इच्छा प्रकट न करें। यदि भारतीय राज्य, संघ में सम्मिलित होते हैं तो वे ठीक उसी परिस्थिति में रहेंगे जिसमें कि वे आज हैं।’

पत्रकारों ने पूछा- ‘यदि कोई प्रांत या राज्य सम्मिलित न होना चाहे तो उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाएगा?’

क्रिप्स ने कहा- ‘वे दूसरे राज्यों के साथ उसी प्रकार का व्यवहार करेंगे जैसा कि वे अन्य शक्तियों यथा जापान, स्याम, चायना, बर्मा अथवा अन्य किसी देश के साथ करते हैं।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

क्रिप्स मिशन की असफलता

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बिड़ला हाउस नई दिल्ली में सर रिचर्ड क्रिप्स एवं गांधी

ई.1943 में क्रिप्स मिशन को भारत भेजा गया ताकि वह भारत की आजादी की एक सर्वसम्मत योजना बना सके किंतु जब मुसलमान अपनी मांगों पर अड़े रहे तो क्रिप्स मिशन की असफलता तय हो गई। भारत की देशी रियासतों के राजा भी नहीं चाहते थे कि देश आजाद हो और अंग्रेजों का स्थान कांग्रेसी नेता ले लें। कांग्रेस भी क्रिप्स के प्रस्तावों से सहमत नहीं हुई।

क्रिप्स योजना में प्रावधान किया गया था कि यदि भारत की आजादी के बाद भी भारतीय राज्य, भारत संघ में सम्मिलित नहीं होते और ब्रिटिश क्राउन के सहयोगी बने रहते हैं तो गोरी सरकार ई.1818 में देशी-राज्यों के साथ की गई संधियों के तहत उन राज्यों की रक्षा करने के लिए उन राज्यों में इम्पीरियल ट्रूप्स (साम्राज्यिक सेना) रखेगी।

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योजना में प्रावधान किया गया था कि यदि कोई देशी-राज्य संविधान सभा में भाग लेता है किंतु संविधान निर्माण के पश्चात संघ में सम्मिलित नहीं होता है तो वह राज्य फिर से अपनी वर्तमान स्थिति को प्राप्त कर लेगा किंतु उसे नवीन संघ के साथ रेलवे, डाक और तार जैसे सामुदायिक महत्व के विषयों पर समायोजन करने पड़ेंगे। क्रिप्स का कहना था कि ब्रिटिश सरकार की यह इच्छा है कि सभी देशी-राज्य भारत संघ में सम्मिलित हों किंतु सरकार, संधि-दायित्वों को भंग करके उनसे जबर्दस्ती ऐसा करने को नहीं कहेगी।

क्रिप्स ने देशी राज्यों को सलाह दी कि छोटे राज्यों को पहला कदम यह उठाना चाहिए कि वे अपने समूह बनायें अथवा संघीय सम्बन्ध स्थापित करें ताकि सहकारिता पर आधारित समूहों की भावना को बड़ी इकाईयों तक विस्तारित किया जा सके। एक राजा ने क्रिप्स से पूछा कि क्या नवीन परिस्थितियों में राजाओं को ब्रिटिश-भारत के राजनीतिक दलों से सम्पर्क करना चाहिये? इस सवाल के जवाब में क्रिप्स ने कहा कि मेरी सलाह है कि राज्यों के शासक, ब्रिटिश-भारत के नेताओं से सम्पर्क स्थापित करें ताकि भविष्य में होने वाले संवैधानिक परिवर्तनों के दौरान राजाओं को सुविधा रहे।

2 अप्रेल को क्रिप्स ने तीन नरेशों को, जो उनसे मिलने आए थे, गुस्से में आकर कहा- ‘उन्हें अपना फैसला कांग्रेस या गांधी से करना होगा क्योंकि हम तो अब बिस्तर बोरिया बांधकर भारत से कूच करने वाले हैं।’

इस प्रस्ताव के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने पहली बार भारत की स्वाधीनता के दावे को स्वीकार करते हुए कहा कि भारत को स्वतंत्र उपनिवेश का दर्जा दे दिया जाएगा। ब्रिटिश राष्ट्रमंडल में रहना उसकी इच्छा पर निर्भर करेगा। योजना का सबसे विवादित बिंदु यह था कि भारत का कोई भी प्रांत अपना संविधान बनाकर स्वतंत्र हो सकता था। ऐसा पाकिस्तान की मांग को ध्यान में रखकर किया गया था। क्रिप्स-मिशन में औपनिवेशिक स्वराज्य देने की कोई अवधि निश्चित नहीं की गई थी। इसका स्वरूप अस्पष्ट और अनिश्चित था।

क्रिप्स मिशन में मुस्लिम लीग द्वारा पाकिस्तान की माँग को एक कदम और आगे बढ़ा दिया गया। इसमें देशी राज्यों और मुस्लिम लीग को प्रसन्न रखने के लिए उन राज्यों और प्रान्तों को यह छूट दी गई कि वे स्वेच्छानुसार भारतीय संघ में सम्मिलित हो सकते हैं। मुस्लिम-बहुल प्रान्तों को भारतीय संघ से अलग रहने का अधिकार प्राप्त हो गया।

देशी राज्यों में जनता की राय जानने को कोई महत्त्व नहीं दिया गया था। देशी नरेशों को उनके राज्यों के प्रतिनिधियों की नियुक्ति का अधिकार दिया गया। इस प्रकार संविधान-निर्मात्री परिषद् में चौथाई सदस्य अप्रजातांत्रिक ढंग से आते और वे रुढ़िवादी होने के कारण प्रगतिशील सुधारों का विरोध करते।

ब्रिटिश प्रान्तों को संघ में सम्मिलित होने या न होने का अधिकार देकर सरकार ने साम्प्रदायिक तत्त्वों को प्रोत्साहन दिया। मुस्लिम लीग पाकिस्तान बनाने की माँग पर अड़ी रही किंतु पंजाब के सिक्खों ने मुस्लिम लीग की इस मांग का घोर विरोध किया। मुस्लिम लीग द्वारा मांगे जा रहे पाकिस्तान में पूरा पंजाब शामिल था किंतु पंजाब के सिक्ख किसी भी कीमत पर भारत से बाहर किसी अन्य देश में जाने को तैयार नहीं थे। क्रिप्स-मिशन ने अल्पसंख्यकों के हितों और उनके अधिकारों की रक्षा की बात तो की किंतु उनकी स्पष्ट व्याख्या प्रस्तुत नहीं की।

दलित एवं पिछड़े वर्ग के लोग भी क्रिप्स-मिशन की रिपोर्ट से असंतुष्ट थे। उनका कहना था कि क्रिप्स-योजना में उनके हितों की सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। क्रिप्स मिशन ने भारत की रक्षा का दायित्व भारतीयों के हाथ में न देकर ब्रिटिश सरकार के पास रखने का प्रावधान किया।

यह बात कांग्रेस को मान्य नहीं थी। इस प्रकार सभी पक्ष क्रिप्स-प्रस्ताव से असंतुष्ट हो गए। कांग्रेस, हिंदू-महासभा और मुस्लिम लीग ने इन प्रस्तावों को मानने से अस्वीकार कर दिया।

क्रिप्स प्रस्ताव में ब्रिटिश-प्रांतों एवं देशी रियासतों को तो अपना पृथक संघ बनाने या संघ से अलग रहने की आजादी थी परन्तु यदि उन्हें ऐसा करने दिया जाता तो भारत में बाल्कन-राष्ट्र जैसी परिस्थिति उत्पन्न हो जाती। पूरा देश अनुभव कर रहा था कि क्रिप्स के इस प्रस्ताव में व्यावहारिकता का अभाव था क्योंकि देश के समस्त रजवाड़ों की सीमा ब्रिटिश-भारत के क्षेत्र से संलग्न थी। अतः इस तरह का कोई संघ कैसे काम कर सकता था!

11 अप्रेल को कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग ने क्रिप्स प्रस्ताव को अस्वीकृत कर दिया। 22 अप्रेल 1942 को क्रिप्स लंदन चले गए। उनका मिशन असफल हो गया जिससे राजाओं ने चैन की सांस ली। राजाओं की इस दोहरी चाल से कांग्रेस को विशेष निराशा हुई। उन्होंने राजाओं के विरुद्ध वक्तव्य दिए। नेहरू ने उन लोगों की पीठ थपथपाई जो राजाओं को धूर्त, झक्की अथवा मूर्ख कहते थे।

क्रिप्स कमीशन असफल होकर लौट गया किंतु क्रिप्स मिशन की असफलता वस्तुतः ब्रिटिश सरकार की सबसे बड़ी कूटनीतिक सफलता थी। योजना में किसी संशोधन तथा आश्वासन के प्रति निस्पृह रहने के लिए चर्चिल ने क्रिप्स को हार्दिक बधाई दी। चर्चिल कतई नहीं चाहता था कि भारत को आजादी दी जाए।

क्रिप्स मिशन की असफलता पर विंस्टन चर्चिल ने मित्र राष्ट्रों को सूचित किया- ‘कांग्रेस की मांगों को मानने का एक ही अर्थ होता कि हरिजनों तथा अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यक हिंदुओं की दया पर छोड़ दिया जाता। चर्चिल ने अमरीकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट को समझा दिया कि भारतीय नेता परस्पर एकमत नहीं हैं।’

क्रिप्स मिशन की असफलता पर यह शक किया जाने लगा कि या तो क्रिप्स की पीठ में ब्रिटिश सरकार ने छुरा भौंक दिया है अथवा डीक्वेंस के शब्दों में- ‘चालाक क्रिप्स महज धोखेबाजी, छल कपट, विश्वासघात और दुहरी चालों से काम ले रहे थे और उन्हें इस पर जरा भी पश्चाताप नहीं था!’

लॉर्ड वैवेल ने 27 जुलाई 1943 को अपनी डायरी में लिखा- ‘प्रधानमंत्री चर्चिल भारत और उससे सम्बन्धित हर बात से घृणा करता है। … भारत को स्वतंत्र करने के विचार मात्र से ब्रिटिश साम्राज्यवाद का वह उपासक पागल हो जाता था।’

गांधीजी के अनुसार क्रिप्स मिशन की असफलता इसलिए हुई क्योंकि ‘क्रिप्स योजना आगे की तारीख का चैक था जिसका बैंक खत्म होने वाला था।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सुभाष चंद्र बोस

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हम दिल्ली की सड़कों पर सुभाष चंद्र बोस का स्वागत तलवारों से करेंगे!

जवाहर लाल नेहरू के मन में सुभाष चंद्र बोस के विरुद्ध इतना जहर भरा हुआ था कि नेहरू ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि हम हम दिल्ली की सड़कों पर सुभाष का स्वागत तलवारों से करेंगे।

ई.1942 में द्वितीय विश्वयुद्ध जोरों पर था। जब सुभाष चंद्र बोस को पूर्वी भारत में हवाई हमलों एवं जमीनी हमलों में सफलताएं मिलने लगीं तो कांग्रेसी नेता सुभाष की सफलताओं से घबरा गए। उन्हें लगा कि यदि सुभाष चंद्र बोस के विमान दिल्ली में उतर गए तो अंग्रेजों को भारत की सत्ता सुभाष बाबू को सौंपनी पड़ेगी।

इस स्थिति की कल्पना भी कांग्रेसी नेताओं के रोंगटे खड़े कर देती थी। इसलिए जवाहरलाल नेहरू ने सार्वजनिक रूप से वक्तव्य दिया- ‘हम दिल्ली की सड़कों पर सुभाष चंद्र बोस का स्वागत तलवारों से करेंगे।’

इस प्रकार कांग्रेसियों की अहिंसा का हिमालय अपनी पराजय की आशंका उत्पन्न होते ही पिघल गया। 9 अगस्त 1942 को कांग्रेस ने बम्बई में एक सम्मेलन आयोजित किया जिसमें गांधीजी ने ‘डू और डाई’ तथा ‘नाउ ऑर नेवर’ के नारे लगाए तथा अंग्रेजों से कहा कि वे आज रात ही भारत छोड़ कर चले जाएं। इसे अगस्त क्रांति एवं भारत छोड़ो आंदोलन कहा जाता है। उसी रात बहुत से कांग्रेसी नेता जेलों में डाल दिए गए। सरकार के इस कदम के विरोध में देश में व्यापक हिंसा फैल गई। बड़ी संख्या में जन-धन की हानि हुई।

मुस्लिम लीग को लाभ

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जब कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ किया तो मुस्लिम लीग बड़ी कठिनाई में पड़ गई। वह अब तक ‘पहले पाकिस्तान फिर आजादी’ के लिए लड़ती आई थी किंतु कांग्रेस पाकिस्तान की बात किए बिना ही आजादी मांग रही थी। यदि अंग्रेज भारत का विभाजन किए बिना चले जाएंगे तो मुस्लिम लीग को नए सिरे से पाकिस्तान के लिए संघर्ष करना पड़ेगा और इस बार उनका मुकाबला मुस्लिम लीग से सहानुभूति रखने वाले अंग्रेजों से नहीं अपितु मुस्लिम लीग को समाप्त करने की मंशा रखने वाले कांग्रेसियों से होगा। इसलिए जिन्ना ने कांग्रेस के खिलाफ असभ्य भाषा में भाषण दिये।

उसने कहा- ‘कांग्रेस ने सरकार के खिलाफ लड़ाई का ऐलान किया है। ऐसा करते वक्त कांग्रेस ने सिर्फ अपना स्वार्थ देखा है, दूसरों का नहीं।’ जिन्ना ने मुसलमानों का आह्वान किया कि वे इस आंदोलन से बिल्कुल अलग रहें।’

इस आंदोलन के आरम्भ होने से पहले ही कांग्रेस के बड़े नेता जेल भेज दिए गए। इस कारण आंदोलन का नेतृत्व छोटे स्तर के कार्यकताओं के हाथों में चला गया जिन्होंने गांधीजी के अहिंसा के सिद्धांत को ताक पर रखकर पूरे देश में व्यापक हिंसा की। इस कारण मुस्लिम लीग के पक्ष वाली प्रेस ने इस पूरे आंदोलन के दौरान ब्रिटिश शासन से लड़ रहे कांग्रेसियों को ‘गुण्डे’ शब्द से संबोधित किया।

कांग्रेसी नेताओं के खिलाफ उतनी सख्त बातें ब्रिटिश प्रेस ने भी नहीं कीं जितनी मुस्लिम लीग प्रेस ने कहीं। मुस्लिम लीग वर्किंग कमेटी ने मित्र-राष्ट्रों का ध्यान हिन्दुस्तान के 10 करोड़ मुसलमानों की उन अंचलों में सार्वभौम राज्यों की स्थापना की मांग की तरफ खींचा, जो उनका निवास स्थान है और जहाँ उनका बहुमत है।

भारत-छोड़ो आंदोलन का सबसे ज्यादा लाभ मुस्लिम लीग को मिला। आंदोलन के कारण कांग्रेसी नेता तो जेल में चले गए जबकि मुस्लिम लीगी नेता स्वतंत्र रहे तथा उन्होंने अंग्रेजों के युद्ध-प्रयासों में सक्रिय सहयोग देकर अंग्रजों की सहानुभूति जीत ली ताकि मुसलमानों को अलग पाकिस्तान देने का जो इरादा अंग्रेज पहले से दिखा रहे थे, वह और पक्का हो जाए।

नवम्बर 1942 के मध्य में दिल्ली में जिन्ना ने भारत के मुसलमानों से पाकिस्तान हासिल करने के लिए कटिबद्ध रहने की अपील करते हुए कहा कि- ‘या तो हम पाकिस्तान लेकर रहेंगे और या फिर अपना अस्तित्व ही मिटा देंगे।’

 हिन्दू महासभा के अध्यक्ष वीर सावरकर ने दिसम्बर 1942 में कानपुर में आयोजित अधिवेशन में जिन्ना की मांग का विरोध करते हुए कहा कि– ‘पाकिस्तान की मांग किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जाएगी।’

सावरकर ने श्यामाप्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में एक कमेटी सम्मानपूर्ण शर्तों पर भारत-ब्रिटिश समझौते के लिए अंतिम प्रयास करने के लिए बैठाई। मुखर्जी ने भी जिन्ना से बात की किंतु कोई नतीजा नहीं निकला।

वायसराय को भारत की भौगोलिक एकता का स्मरण

वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो (ई.1936-44) अपनी नियुक्ति के समय भारत संघ के निर्माण का सपना लेकर आए थे जिसे इंग्लैण्ड की सरकार के अधीन स्वायत्तता दी जा सके किंतु परिस्थितियां तेजी से लिनलिथगो के हाथों से निकलती जा रही थीं। पहले तो देशी-राज्यों के राजाओं ने प्रस्तावित संघ में मिलने से मना कर दिया और अब कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग न केवल आपस में लड़ रही थीं अपितु कांग्रेस अंग्रेजों को बिना किसी संघ के निर्माण के भारत से बाहर चले जाने के लिए संघर्ष कर रही थी।

लिनलिथगो ने स्थिति संभालने का प्रयास करने के लिए 17 दिसम्बर 1942 को एसोसिएटेड चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स की वार्षिक सभा में एक ऐसा वक्तव्य दिया जो अंग्रेज शासक मुस्लिम लीग की स्थापना के बाद से कभी नहीं देते थे।

वह वक्तव्य इस प्रकार था- ‘भारत की भौगोलिक एकता बनाए रखी जाए क्योंकि विभाजित भारत का विश्व में कोई महत्त्व नहीं रह जाएगा।’

बाँटो और भागो

लिनलिथगो के इस बयान पर मुस्लिम लीग के नेता आग-बबूला हो गए। वायसराय न केवल मुस्लिम लीग के अब तक के परिश्रम पर पानी फेर रहा था अपितु वह सीधे-सीधे उन कांग्रेसियों का पक्ष ले रहा था जो अंग्रेजों को आधी रात में ही भारत छोड़कर चले जाने को कह रहे थे। इसलिए मुस्लिम लीग के नेताओं ने पाकिस्तान की मांग के समर्थन में अपनी आवाज और अधिक मुखर की ताकि वह भारत की सरहदों को पार करके, विश्वयुद्ध लड़ रहे मित्र-राष्ट्रों के कानों तक अच्छी तरह पहुंच जाए।

मुस्लिम लीग द्वारा अपनी आवाज तीखी कर दिए जाने के बावजूद जब इंग्लैण्ड के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी और पाकिस्तान की मांग एक इंच भी आगे नहीं सरकी तो दिसम्बर 1943 में मुस्लिम लीग ने कराची अधिवेशन में ‘भारत छोड़ो’ नारे के विरुद्ध एक विचित्र नारा दिया- ‘बाँटो और भागो’ इस नारे के माध्यम से अंग्रेजों का आह्वान किया गया था कि वे भारत को हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में बाँटकर यहाँ से भाग जाएं।

बंगाल में अकाल की विभीषिका

इसी बीच एक बड़ी मानव त्रासदी हुई। अंग्रेजों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के मोर्चों पर लड़ रही अपनी फौज के लिए भारत से इतना चावल और गेहूं पानी के जहाजों में भरकर सैनिकों को भिजवा दिया कि ई.1943 में बंगाल में अकाल पड़ गया और बंगाल में 30 लाख आदमी मर गए।

इससे भारतीयों में अंग्रेजों के प्रति नफरत अपने चरम पर पहुंच गई। देश भर में कम्युनिस्ट आंदोलन एवं क्रांतिकारी गतिविधियां बढ़ गईं। फिर भी मुस्लिम लीग मानवता की इस भयानक त्रासदी से तथा क्रांतिकारी आंदोलन से असंपृक्त रहकर केवल पाकिस्तान-पाकिस्तान की रट लगाती रही।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारत संघ योजनाएं

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अंग्रेज ईस्वी 1927 से ही भारत में एक संघ की स्थापना करने का प्रयास कर रहे थे जिसमें ब्रिटिश प्रांत एवं देशी राज्यों के प्रांत शामिल हों तथा देश का शासन एक संघीय सरकार द्वारा चलाया जाए। इस दिशा में अनेक लोगों द्वारा भारत संघ योजनाएं बनाकर अंग्रेज सरकार के समक्ष प्रस्तुत की गईं।

सप्रू योजना

दिसम्बर 1944 में तेज बहादुर सप्रू की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। प्रांतों एवं राज्यों के प्रस्तावित भारतीय संघ में सम्मिलित होने अथवा अलग रहने के प्रश्न पर समिति ने सिफारिश की कि ब्रिटिश-भारत के किसी भी प्रांत को संघ में शामिल नहीं होने का विकल्प नहीं होगा। ब्रिटिश-भारत का प्रांत हो या देशी राज्य, एक बार सम्मिलित होने के बाद उसे संघ से अलग होने का अधिकार नहीं होगा। ब्रिटिश-भारत, जिस तरह से किसी भी ब्रिटिश-भारतीय प्रांत को अलग होने की आज्ञा देना स्वीकार नहीं कर सकता उसी तरह देशी राज्यों को भी इसकी अनुमति नहीं दे सकता।

सप्रू समिति में राज्यों का प्रतिनिधित्व नहीं था, इसलिए समिति ने अपनी इच्छा से संघ में शामिल होने के अतिरिक्त रियासतों के विषय में कोई और सिफारिश नहीं की। समिति द्वारा यह सिफारिश भी की गई कि जहाँ तक हो सके राज्य प्रमुख, राज्यों के शासकों में से ही चुना जाना चाहिए। साथ ही उसमें राज्यों के मंत्री पद की भी व्यवस्था हो जिसकी सहायता के लिए राज्यों की सलाहकार समिति हो।

सप्रू समिति की अवधारणा के अनुसार भारतीय संघ केवल एक राज्य होगा जिसमें संघीय इकाइयां होंगी चाहे वह प्रांतों की हों या राज्यों की। संघ से असंबद्ध राज्य भी होंगे। किसी भी विदेशी शक्ति का इन इकाइयों पर कोई अधिकार नहीं होगा चाहे वे संघ में शामिल हों या न हों।

रैडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी का प्रस्ताव

रैडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से एम. एन. राय द्वारा स्वतंत्र भारत के संविधान का प्रारूप तैयार किया गया। 6 जनवरी 1945 को ऑल इण्डिया कान्फ्रेन्स ऑफ दी रैडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी के द्वारा इस प्रारूप को पृष्ठांकित किया गया जिसमें कहा गया कि अंतरिम सरकार को संपूर्ण भारत के लिए संविधान की घोषणा करनी चाहिये तथा उसे भारतीय रियासतों पर भी लागू किया जाना चाहिये।

इसे पूर्व में ब्रिटिश सरकार तथा भारतीय राजाओं के मध्य हुए द्विपक्षीय संधियों के माध्यम से किया जाना चाहिये जिसके माध्यम से भारतीय राजाओं को कुछ वित्तीय अनुदानों के बदले अपने अधिकार भारत सरकार के समक्ष समर्पित करने होंगे।

अन्य विद्वानों के प्रस्ताव

प्रो. कूपलैण्ड ने नदियों को आधार बनाकर जनसंख्या के अनुसार उनके क्षेत्रीय विभाजन की योजना प्रस्तुत की। सर सुल्तान अहमद ने भारत तथा यूनाइटेड किंगडम के मध्य संधि के माध्यम से भारत-पाक विभाजन की योजना प्रस्तुत की। इनमें देशी राज्यों के बारे में कोई स्थिति स्पष्ट नहीं की गयी।

ई.1943-44 में अर्देशिर दलाल, डा. राधा कुमुद मुखर्जी तथा डा. भीमराव अम्बेडकर ने भी अपनी योजनाएं प्रस्तुत कीं जिनमें भारत की सांप्रदायिक समस्या का समाधान ढूंढने की चेष्टा की गयी किंतु इन सभी योजनाओं में देशी राज्यों की समस्या को अधिक महत्त्व नहीं दिया गया।

राजगोपालाचारी प्लेटफॉर्म

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6 मई 1944 को गांधीजी को जेल से रिहा कर दिया गया। इसी के साथ भारत छोड़ो आंदोलन भी समाप्त हो गया। लिब्ररल पार्टी के नेता तेज बहादुर सप्रू एवं राजगोपालाचारी ने कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के नेताओं से बात करके गांधी और जिन्ना के बीच समझौता करवाने का प्रयास किया। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी भी चाहती थी कि गांधी और जिन्ना भारत की आजादी के लिए लड़ें न कि एक दूसरे के खिलाफ लड़कर देश की शक्ति व्यर्थ करें। इसलिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने देश भर में एक नारा उछाला- ‘गांधी-जिन्ना फिर मिलें’ । इन प्रयासों ने असर दिखाया तथा राजगोपालाचारी ने एक प्रस्ताव तैयार किया जिसमें निम्नलिखित बिंदु सम्मिलित किए गए-

(1) युद्ध के दौरान मुस्लिम लीग को पूर्ण स्वाधीनता की मांग का समर्थन करना चाहिए तथा संक्रमण काल के लिए अस्थाई अंतरिम सरकार बनाने में कांग्रेस का सहयोग करना चाहिए।

(2) युद्ध के बाद मुस्लिम बहुमत के क्षेत्रों की सीमा के निर्धारण के लिए एक आयोग नियुक्त किया जाना चाहिए। उन क्षेत्रों के समस्त निवासियों के जनमत या साधारण मतदान के किसी भी अन्य स्वरूप द्वारा निश्चित किया जाना चाहिए कि उनका अलग राज्य बनना चाहिए या नहीं।

(3) जनमत संग्रहण के पहले अपने-अपने दृष्टिकोण का समर्थन करने का अधिकार सब दलों का होगा। अगर अलगाव हो जाए तो दोनों राज्यों के प्रतिरक्षा, व्यवसाय और अन्य उद्देश्यों के लिए समझौता करना चाहिए।

(4) जनसंख्या का कोई भी स्थानांतरण बिल्कुल ऐच्छिक आधार पर होगा।

(5) ये शर्तें तभी लागू होंगी जब ब्रिटेन भारत के शासन की सारी सत्ता और जिम्मेदारी हस्तांतरित कर देगा।

इस प्रस्ताव के आधार पर 4 सितम्बर 1944 को गांधीजी एवं जिन्ना के बीच बम्बई में वार्तालाप आरम्भ हुआ जो कि 17 सितम्बर तक चलता रहा। यह वार्तालाप बहुत गुप्त होता था तथा पत्रों के आदान-प्रदान से होता था। ये पत्र वार्तालाप पूरा होने के बाद प्रकाशित कर दिए गए। यह वार्तालाप असफल हो गया।

असफलता का कारण जिन्ना की जिद था। जिन्ना चाहता था कि किसी भी प्रकार का जनमत संग्रहण करने से पहले ही और ब्रिटिश राज के रहते ही कांग्रेस मान ले कि पाकिस्तान स्थापित किया जाएगा।

जिन्ना ने यह भी कहा कि पाकिस्तान के अंदर पूरा पंजाब, पूरा बंगाल, पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश, बलूचिस्तान और असम को पाकिस्तान में शामिल करना होगा। गांधीजी किसी भी कीमत पर जिन्ना को पाकिस्तान देने के लिए तैयार नहीं थे। इसलिए वार्तालाप विफल हो गया और पूरे देश को इस विफलता से बड़ी निराशा हुई।

इस प्रकार एक के बाद एक करके भारत संघ योजनाएं प्रस्तावित की जाती रहीं और मुस्लिम लीग उन्हें ठुकराती रही। बहुत सी योजनाएं कांग्रेस ने ठुकरा दीं तो बहुत सी योजनाओं का राजाओं ने विरोध किया। अंग्रेज भी अपनी तरफ से प्रयास कर रहे थे। भारत संघ की योजनाएं परवान नहीं चढ़ सकीं क्योंकि प्रत्येक पक्ष अपने-अपने उद्देश्य की पूर्ति तो चाहता था किंतु दूसरे पक्ष की अनदेखी करता था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

शिमला सम्मेलन

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कांग्रेस और मुस्लिम लीग में अस्थाई सरकार के गठन के लिए समझौता करवाने हेतु भारत के वायसराय लॉर्ड वेवेल ने शिमला सम्मेलन आयोजित किया। इस सम्मेलन में गांधीजी ने जोर डाला कि भारत में बनने वाली सरकार में मौलाना अबुल कलाम आजाद कांग्रेस की ओर से सदस्य होंगे किंतु जिन्ना ने कहा कि सरकार में मुस्लिम मंत्रियों की नियुक्ति केवल मुस्लिम लीग ही करेगी। गांधी और जिन्ना के झगड़े में शिमला सम्मेलन विफल हो गया।

मई 1945 में केन्द्रीय विधान सभा में कांग्रेस के नेता भूलाभाई देसाई और मुस्लिम लीग के नेता लियाकत अली के बीच केन्द्र में अस्थाई सरकार बनाने के बारे में एक समझौता हुआ। इसमें निश्चित किया गया कि इस सरकार में 40 प्रतिशत कांग्रेस के, 40 प्रतिशत लीग के और शेष 20 प्रतिशत पद अन्य गुटों के लिए होंगे।

यह प्रस्ताव लॉर्ड वैवेल के समक्ष रखा गया। वह ब्रिटिश सरकार से सलाह करने के लिए लंदन गया। लम्बे विचार-विमर्श के बाद मई के अंत में ब्रिटिश सरकार ने इस समझौते को अपनी स्वीकृति दे दी। 14 जून 1945 को भारत सचिव एल. एस. एमरी ने हाउस ऑफ कॉमन्स में भारत के सम्बन्ध में नई नीति की घोषणा की। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश सरकार भारत में कांग्रेस और मुस्लिम लीग की सरकार स्थापित करने के लिए तैयार है।

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25 जून 1945 को लॉर्ड वैवेल ने शिमला में एक सम्मेलन आयोजित किया। वायसराय की घोषणा के अनुसार इसमें कांग्रेस और मुस्लिम लीग के अध्यक्षों, परिगणित जातियों और सिक्खों के प्रतिनिधियों, केन्दीय विधानसभा में कांग्रेस दल के नेता और मुस्लिम लीग के उपनेता, केन्द्रीय राज्यपरिषद में कांग्रेस दल और मुस्लिम लीग के नेता, विधान सभा में नेशनलिस्ट पार्टी और यूरोपीय ग्रुप के नेता एवं उस समय की प्रान्तीय सरकारों के मुख्यमंत्री निमंत्रित किए गए थे।

सम्मेलन में वायसराय की कार्यकारिणी के गठन को लेकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच विवाद हो गया। वैवेल ने 14 सदस्यों की एक्जीक्यूटिव कौंसिल का प्रस्ताव रखा जिसमें कहा गया कि इसमें 5 नाम कांग्रेस द्वारा, 5 नाम मुस्लिम लीग द्वारा और 4 नाम वायसराय द्वारा दिए जाएंगे। कांग्रेस ने आजाद, नेहरू, पटेल, एक पारसी और एक भारतीय ईसाई का नाम दिया। वैवेल ने एक सिक्ख, दो परिगणित जातियों और पंजाब के मुख्यमंत्री खिजिर हयात का नाम दिया।

जिन्ना ने कांग्रेस के द्वारा दिए गए मौलाना अबुल कलाम आजाद के नाम पर आपत्ति कर दी। उसका कहना था कि कौंसिल में कोई भी मुस्लिम सदस्य केवल मुस्लिम लीग से हो सकता है। कांग्रेस मौलाना की बजाय कोई दूसरा नाम दे। इस मुद्दे पर इतनी टसल हुई कि यह सम्मेलन विफल हो गया।

मुस्लिम लीग की यह जिद्द पूरे देश को हैरान करने वाली थी। क्योंकि इस समय पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश, पंजाब और सिंध में मुस्लिम जनसंख्या का बहुमत होते हुए भी वहाँ मुस्लिम लीग की सरकारें नहीं बन सकी थीं। पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी के नेता खिजिर हयात खाँ मुख्यमंत्री थे। सिंध में सर गुलाम हुसैन की कांग्रेस समर्थित सरकार थी। यही हालत असम की थी।

बंगाल में गवर्नर शासन था। ऐसी स्थिति में मुस्लिम लीग यह दावा कैसे कर सकती थी कि मुस्लिम लीग ही समूचे भारत के मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करती हैै। जिन्ना का रवैया इसलिए भी हैरान करने वाला था क्योंकि यदि जिन्ना इस कौंसिल के गठन को स्वीकार कर लेता तो 14 सदस्यों की इस कौंसिल में मुसलमानों की संख्या 7 अर्थात् 50 प्रतिशत होती जो कि भारत की मुस्लिम जनंसख्या के अनुपात की तुलना में दो गुनी होती। यदि यह सरकार बनती तो जिन्ना और मुसलमान लाभ में रहते किंतु जिन्ना को ‘लाभ’ नहीं ‘पाकिस्तान‘ चाहिए था।

जिन्ना और गांधीजी का मतभेद केवल एक बिंदु पर रहता था। जिन्ना कहता था कि मुस्लिम लीग ही एकमात्र वह संस्था है जो मुसलमानों का प्रतिनिधित्व कर सकती है जबकि गांधीजी का कहना था कि कांग्रेस हिन्दू और मुसलमान दोनों का प्रतिनिधित्व करती है।

केवल इसी विवाद के कारण कांग्रेस और मुस्लिम लीग में कभी कोई समझौता नहीं हो पाया, यदि हुआ भी तो शीघ्र ही इसी बिंदु पर आकर भंग हो गया। शिमला सम्मेलन में भी यही सब दोहराया गया। शिमला सम्मेलन विफल होने के बाद लॉर्ड वैवेल को भारतीय राजनीति में असफल माना जाने लगा।

21 नवम्बर 1945 को जिन्ना ने पेशावर में दिए एक भाषण में, मुस्लिम लीग द्वारा भारतीय प्रतिनिधियों की अस्थाई सरकार न बनने देने के सम्बन्ध में स्पष्टीकरण देते हुए कहा-

‘एक अच्छा सेना संचालक उस समय तक आक्रमण करने का आदेश नहीं देता जब तक उसे विजय का विश्वास न हो अथवा उसे सम्मानपूर्ण पराजय का विश्वास तो निश्चित तौर पर होना ही चाहिए।’

…… भारत में एक राज्य बने रहने के सुझाव को जिन्ना मुसलमानों की दासता का सुझाव कहता था।

भारत में साम्प्रदायिक दंगों की लहर

जब क्रिप्स मिशन असफल हो गया, राजगोपालाचारी फार्मूले की हवा निकल गई, भारतीयों की अस्थाई सरकार का गठन नहीं हो सका और पाकिस्तान की मांग एक इंच भी आगे नहीं बढ़ सकी तो मुस्लिम लीग हिंसा पर उतर आई। वर्ष 1946 का प्रारम्भ साम्प्रदायिक दंगों के साथ ही हुआ और वर्ष के अंत तक पूरा देश दंगामय हो गया। दंगों की शुरुआत अलीगढ़ से हुई और उसका विशाल रूप बंगाल, बिहार और पंजाब ने ले लिया।

जनवरी 1946 में देश में प्रांतीय विधानसभाओं के लिए चुनाव हुए जिनमें मिली विजय के बाद सिंध एवं बंगाल में मुस्लिम लीग ने सरकार बनाई। इसके बाद इन दोनों ही प्रांतों में हिन्दुओं को भगाने का काम आरम्भ हो गया। इन प्रांतों में हिन्दुओं के समक्ष तीन ही विकल्प थे या तो वे इस्लाम स्वीकार कर लें या मर जाएं या प्रांत छोड़कर भाग जाएं।

केन्दीय शासन से कोई मदद नहीं मिली, इस कारण हिन्दुओं का धर्मांतरण, इस्लाम स्वीकार न करने पर उनका कत्ल, उनकी स्त्रियों के साथ बलात्कार तथा उनकी सम्पत्ति को लूटने का कार्य बंगाल के प्रधानमंत्री सुहरावर्दी के शासन में चल रहा था।

इन जघन्य हत्याओं के प्रति जिन्ना और सुहरावर्दी मूक बने रहे। इस कारण असहाय हिन्दू बिहार आदि प्रांतों में भाग आए। हिन्दुओं में इसकी प्रतिक्रिया होनी स्वाभाविक थी इसलिए हिन्दू महासभा की प्रेरणा से महाराष्ट्र में हिन्दू राष्ट्र सेना का गठन हुआ और महाराष्ट्र में ही रामसेना एवं बजरंग सेना आदि की भी स्थापना हुई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कैबीनेट मिशन

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कैबीनेट मिशन का भारत आगमन

क्रिप्स मिशन की असफलता से अंतर्राष्ट्रय स्तर पर ब्रिटेन की बहुत किरकिरी हुई। अमरीका सहित अनेक देशों ने इंगलैण्ड पर आरोप लगाया कि वह भारत को स्वतंत्र नहीं करना चाहता इसलिए क्रिप्स मिशन को जानबूझ कर विफल किया गया। इस दाग को धोने के लिए ब्रिटिश सरकार ने कैबीनेट मिशन को भारत भेजा ताकि भारत को आजादी दी जा सके।

भारत में सैनिक विद्रोह

18 अगस्त 1945 को सुभाषचंद्र बोस की एक विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई। उसके बाद अंग्रेजों ने आजाद हिंद फौज के सिपाहियों को पकड़ कर फांसी पर लटकाना आरम्भ कर दिया। कांग्रेस अब तक आजाद हिन्द फौज को अपने शत्रु के रूप में देखती रही थी। उसने आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं दिखायी। भारतीय सिपाहियों को यह बात बहुत बुरी लगी। उन्होंने आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों से सहानुभूति दिखाते हुए सशस्त्र विद्रोह कर दिया।

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20 जनवरी 1946 को बम्बई, लाहौर तथा दिल्ली के वायु सैनिक, हड़ताल पर चले गए। 19 फरवरी 1946 को जल सेना में भी हड़ताल हो गई। हड़तालियों ने आजाद हिंद फौज के बिल्ले धारण किए। कराची, कलकत्ता और मद्रास के नौ-सैनिक भी हड़ताल पर चले गए। अंग्रेज सैन्य अधिकारियों ने इस हड़ताल को बंदूक से कुचलना चाहा। इस कारण दोनों तरफ से गोलियां चलीं। ठीक इसी समय जबलपुर में भारतीय सिगनल कोर में भी 300 जवान हड़ताल पर चले गए। इन हड़तालों से अंग्रेज सरकार थर्रा उठी।

मुस्लिम लीग द्वारा की जा रही मार-काट एवं भारतीय सेनाओं में हो रहे विद्रोहों के बाद इंग्लैण्ड की गोरी सरकार को समझ में आने लगा कि अब एक भी दिन की देरी किए बिना भारत को आजादी देनी होगी चाहे कांग्रेस, मुस्लिम लीग, दलित पक्ष एवं भारतीय-राजाओं द्वारा कितने ही अड़ंगे क्यों न लगाए जाएं। इंग्लैण्ड की सरकार ने भारत को शीघ्र से शीघ्र आजादी देने के लिए उच्चस्तरीय मंत्रिमंडल मिशन भेजने की घोषणा की।

कैबीनेट मिशन का भारत आगमन

15 मार्च 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने हाउस ऑफ कॉमन्स में घोषणा की कि ग्रेट-ब्रिटेन की लेबर सरकार, ब्रिटेन और हिन्दुस्तान तथा कांग्रेस और मुस्लिम लीग के गतिरोध को समाप्त करने का प्रयास करने के लिए एक कैबीनेट मिशन भारत भेज रही है।

उन्होंने कहा- ‘मुझे आशा है कि ब्रिटिश-भारत तथा रियासती-भारत के राजनीतिक एक महान नीति के तहत, इन दो भिन्न प्रकार के अलग-अलग भागों को साथ-साथ लाने की समस्या का समाधान निकाल लेंगे। हमें देखना है कि ‘भारतीय राज्य’ अपना उचित स्थान पायें। मैं एक क्षण के लिए भी इस बात पर विश्वास नहीं करता कि भारतीय राजा भारत के आगे बढ़ने के कार्य में बाधा बनने की इच्छा रखेंगे अपितु जैसा कि अन्य समस्याओं के मामले में हुआ है, भारतीय इस समस्या को भी स्वयं सुलझायेंगे।’

इंग्लैण्ड की सरकार द्वारा इस कमीशन (आयोग) में तीन कैबीनेट मंत्री रखे गए- (1) भारत सचिव लॉर्ड पैथिक लारेन्स, (2) व्यापार मंडल के अध्यक्ष सर स्टैफर्ड क्रिप्स और (3) फर्स्ट लॉर्ड आफ द एडमिरेल्टी ए. वी. अलैक्जेंडर। इस कमीशन को ‘कैबीनेट मिशन’ भी कहा जाता है। 24 मार्च 1946 को यह आयोग भारत पहुंच गया।

इसके साथ ही प्रधानमंत्री एटली ने भारत के वायसराय लॉर्ड वैवेल के नाम एक तार भेजा जिसमें लिखा था- ‘लेबर गवर्नमेंट वायसराय को नजर-अंदाज नहीं करना चाहती किंतु यह अनुभव करती है कि ऐसा दल जो वहीं फैसला कर सके, समझौते की बातचीत को काफी सहारा देगा और हिंदुस्तानियों को यह विश्वास दिलाएगा कि इस बार हम इसे कर दिखाना चाहते हैं।’

इस मिशन के आगमन से राजनीतिक विभाग ने समझ लिया कि अब राज्यों को नये ढांचे में समाहित करने की शीघ्रता करने का समय आ गया है। 25 मार्च को एक प्रेस वार्त्ता के दौरान लॉर्ड पैथिक लॉरेंस ने कहा- ‘हम इस आशा से भारत में आये हैं कि भारतीय एक ऐसे तंत्र का निर्माण कर सकें जो सम्पूर्ण भारत के लिए एक संवैधानिक संरचना का निर्माण कर सके।’

उनसे पूछा गया कि राज्यों का प्रतिनिधित्व राजाओं के प्रतिनिधि करेंगे या जनता के प्रतिनिधि? इस पर पैथिक लॉरेंस ने जवाब दिया कि- ‘हम जैसी स्थिति होगी वैसी ही बनी रहने देंगे। नवीन संरचनाओं का निर्माण नहीं करेंगे। ‘

2 अप्रेल 1946 को कैबीनेट मिशन तथा वायसराय के साथ हुई बैठक में नरेन्द्र मण्डल के चांसलर भोपाल नवाब हमीदुल्ला खाँ ने देशी राज्यों के लिए भारत एवं पाकिस्तान से अलग देश की मांग की। उसने कहा कि साइमन कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर देशी-राज्यों तथा ब्रिटिश-भारत के प्रांतों का एक प्रिवी कौंसिल बनाया जाना चाहिये। जब भारत में दो देशों (भारत एवं पाकिस्तान) का निर्माण हो सकता है तब तीसरे भारत को मान्यता क्यों नहीं दी जा सकती जो देशी-राज्यों से मिलकर बना हो?

कोई भी भारतीय राजा, भारत सरकार अधिनियम 1935 में दी गई संवैधानिक संरचना को स्वीकार नहीं करना चाहता। परमोच्चता भारत सरकार को स्थानांतरित नहीं की जानी चाहिये। कैबीनेट मिशन के सदस्य सर स्टैफर्ड क्रिप्स का मानना था कि यदि देशी राजाओं को भारतीय संघ से अलग रहने की स्वीकृति दी जाती है तो इससे भौगोलिक समस्याएं पैदा होंगी।

उसी संध्या को कैबीनेट मिशन ने नरेन्द्र मण्डल की स्थाई समिति के प्रतिनिधियों से बात की जिनमें भोपाल, पटियाला, ग्वालियर, बीकानेर तथा नवानगर के शासक सम्मिलित थे। इस बैठक में लॉर्ड पैथिक लॉरेंस ने कहा कि यदि ब्रिटिश-भारत स्वतंत्र हो जाता है तो परमोच्चता समाप्त हो जाएगी तथा ब्रिटिश सरकार भारत में आंतरिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सैनिक टुकड़ियां नहीं रखेगी। राज्यों को संधि दायित्वों से मुक्त कर दिया जाएगा क्योंकि ब्रिटिश क्राउन संधि दायित्वों के निर्वहन में असक्षम हो जाएगा।

अंग्रेजों को स्वाभाविक तौर पर भारतीय राज्यों के साथ लम्बे समय से चले आ रहे सम्बन्धों को बनाए रखने में रुचि थी किंतु ये सम्बन्ध नवीन भारत में राज्यों की स्थिति पर निर्भर होने थे। यदि राज्य अपनी प्रभुसत्ता का समर्पण आजादी के समय बनने वाले भारतीय संघ को करते हैं तो ये सम्बन्ध केवल भारतीय-संघ के माध्यम से ही हो सकते थे। कैबीनेट मिशन भारत को आजादी देने का सर्वसम्मत फार्मूला ढूंढने के लिए कांग्रेस, मुस्लिम लीग एवं भारतीय राजाओं के संघ ‘नरेन्द्र मण्डल’ से वार्ता कर रहा था। इस वार्तालाप से राजाओं की समझ में आ गया कि अब अंग्रेज देश में नहीं रहेंगे।

इसलिए अंग्रेजों की कृपाकांक्षा प्राप्त करने के बजाय इस बात पर ध्यान लगाना चाहिए कि कहीं भविष्य में बनने वाला आजाद भारत राजाओं के राज्यों को न निगल जाए। दूसरी तरफ छोटे राजा इस बात को लेकर आशंकित थे कि कहीं बड़े राजा ही उन्हें न निगल जाएं। रियासती-भारत में अजीब सी बेचैनी और कई तरफा घमासान मचने लगा था। राजाओं और उनके प्रतिनिधियों से निबटने के बाद कैबीनेट मिशन ने कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के नेताओं से भी बात की।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

अलीगढ़ में साम्प्रदायिक दंगे

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जब मुहम्मद अली जिन्ना ने देखा कि गांधीजी हिन्दुओं के साथ-साथ मुसलमानों के भी नेता बने रहना चाहते हैं तथा किसी भी कीमत पर मुसलमानों को पाकिस्तान नहीं देना चाहते हैं तो जिन्ना ने देश में साम्प्रदायिक दंगे करने की नीति अपनाई। इस दिशा में पहले प्रयोग के रूप में अलीगढ़ में साम्प्रदायिक दंगे करवाए गए।

जिस समय कैबीनेट मिशन भारत में था, उस पर मानसिक दबाव बनाने के लिए 29 मार्च 1946 को अलीगढ़ में दंगों से शुरुआत की गई। भारत सरकार के होम डिपार्टमेंट की गोपनीय रिपोर्ट के अनुसार यह दंगा 29 मार्च 1946 को उस समय शुरु हुआ जब अलीगढ़ विश्वविद्यालय के मुस्लिम विद्यार्थियों एवं एक हिन्दू कपड़े के व्यापारी के बीच आपसी झड़पें हुईं। इस दंगे में 17 लोग घायल हुए जिनमें से एक की मौत हो गई। दुकानों के जलने से 5 से 10 लाख रुपए की सम्पत्ति नष्ट होने का अनुमान था।

मुस्लिम लीग का दिल्ली अधिवेशन

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जिस समय कैबीनेट मिशन भारत में विभिन्न पक्षों से बात कर रहा था, उसी दौरान अप्रेल 1946 के प्रारम्भ में नई दिल्ली में मुस्लिम लीग के विधान सभा सदस्यों ने एक अधिवेशन आयोजित किया। इसमें लीग के नेताओं ने कैबीनेट मिशन के सदस्यों पर दबाव बनाने के लिए भड़काऊ भाषण दिए।

जिन्ना ने हर संभव तरीके से विरोध करने की धमकी दी। उसने कहा- ‘यदि कोई भी अंतरिम व्यवस्था मुसलमानों पर थोपी गई तो मैं स्वयं को किसी भी खतरे, परीक्षा या बलिदान जो भी मेरे से मांगा जा सकता है, को झेलने के लिए शपथ लेता हूँ।’

अधिवेशन में सभी मुस्लिम सदस्यों द्वारा पढ़े जाने के लिए एक प्रतिज्ञा तैयार की गई जिसमें कहा गया– ‘मैं अपने आप को मेरे से जो भी बलिदान, परीक्षा या खतरा उठाने हेतु कहा जाएगा, झेलने की शपथ लेता हूँ।’

पंजाबी नेता फिरोज खाँ नून ने कहा- ‘जो विनाश मुस्लिम करेंगे, उससे चंगेज खां और हलाकू ने जो किया, उसे भी शर्म आ जाएगी।’

उसने यह भी कहा कि यदि ब्रिटेन अथवा हिन्दुओं ने पाकिस्तान नहीं दिया तो रूस यह कार्य करेगा। बंगाल के मुख्यमंत्री सुहरावर्दी ने कहा- ‘यदि हिन्दू सम्मान और शांति से रहना चाहते हैं तो कांग्रेस को पाकिस्तान की स्वीकृति देनी चाहिए।’

सीमांत नेता कयूम खाँ ने घोषणा की- ‘मुसलमानों के पास सिवाय तलवार निकालने के और कोई मार्ग नहीं बचेगा।’

बंगाल लीग के जनरल सैक्रेटरी अब्दुल हाशिम ने कहा- ‘जहाँ न्याय और समता असफल हो, चमचमाता इस्पात मसले को तय करेगा।’

पंजाब के शौकत हयात खाँ ने कहा- ‘मेरे प्रांत की लड़ाकू जाति केवल एक उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा कर रही है। आप हमें केवल एक अवसर दीजिए और हम नमूना पेश कर देंगे जबकि ब्रिटिश सेना अभी भी मौजूद है।’

मुस्लिम लीग का आक्रोश मुख्य रूप में अंग्रेज सरकार पर बरसा जिस पर ब्रिटिश मजदूर दल का नियंत्रण था। उसने प्रारम्भिक वर्षों में लीग की अपेक्षा कांग्रेस के प्रति अधिक सहानुभूति का प्रदर्शन किया था।

मुस्लिम लीग के इस रवैये पर कड़ी प्रतिक्रिया करते हुए जवाहरलाल नेहरू ने घोषणा की कि- ‘पृथ्वी पर कोई भी ताकत यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र संघ भी पाकिस्तान को अस्तित्व में नहीं ला सकती जैसा कि जिन्ना चाहते हैं।’

पटेल ने मुसलमानों से कहा कि- ‘मुसलमानों एवं हिन्दुओं के मध्य गृहयुद्ध की कीमत पर ही उन्हें पाकिस्तान मिल सकता है।’

शिमला में त्रिदलीय सम्मेलन

5 मई 1946 को सरकार ने शिमला में त्रिदलीय सम्मेलन बुलाया। इसमें कैबीनेट मिशन द्वारा प्रस्तावित किया गया कि भारत में एक केन्द्र सरकार का गठन किया जाएगा जिसके पास विदेशी मामले, रक्षा एवं संचार मामले रहेंगे। प्रांतों का समूहीकरण होगा जो अन्य मामलों को निबटाएगा और शेष अधिकार भी उन्हीं के पास रहेंगे।

इस सम्मेलन में कांग्रेस ने एक शक्ति सम्पन्न केन्द्र के निर्माण पर जोर दिया तथा मांग की कि प्रस्तावित भारतीय संघ, कैबीनेट मिशन द्वारा सुझाए गए तीन विषयों के अतिरिक्त मुद्रा, कस्टम और ऐसे विषयों को देखे जो उसके अनुकूल हों। संघ को आवश्यकतानुसार आय वसूल करने तथा संविधान के विफल होने की स्थिति में या संकटकाल में आवश्यकतानुसार कार्यवाही करने में सक्षम होना चाहिए।

कांग्रेस के इस प्रस्ताव में ई.1928 के नेहरू कमेटी के प्रस्तावों को ही दोहराया गया था। दूसरी ओर मुस्लिम लीग शक्तिशाली मुस्लिम प्रांतों के समूहों का संगठन चाहती थी जो पाकिस्तान का जन्मदाता बन सके और संघीय सरकार की शक्ति को क्षीण करके न्यूनतम स्तर पर रख सके।

इस प्रकार इस शिमला सम्मेलन में भी कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच का विरोध ज्यों का त्यों बना रहा तथा कांग्रेस द्वारा मुसलमानों के लिए अलग देश बनाने का विरोध और मुस्लिम लीग के लिए अलग देश बनाने की आवश्यकता ज्यों की त्यों बनी रही। इसलिए कैबीनेट मिशन ने अपनी ओर से प्रस्ताव घोषित करने का निर्णय लिया।

मुहम्मद अली जिन्ना अलीगढ़ में साम्प्रदायिक दंगे करवाकर अंग्रेजों की मंशा एवं हिन्दुओं की ताकत को परख चुका था। इसलिए उसने अलीगढ़ के प्रयोग को बंगाल में दोहराने का निश्चय किया जिसकी भयानक तस्वीर शीघ्र ही देश के सामने आने वाली थी।

अलीगढ़ में साम्प्रदायिक दंगे के सफल प्रयोग की पुनरावृत्ति न केवल बंगाल में की जानी थी अपितु पंजाब में भी की जानी थी। बंगाल का भद्रलोक और पंजाब के सिक्ख दोनों ही मुसलमानों की इस हिंसक ज्वाला का सामना करने के लिए तैयार नहीं थे। अतः शीघ्र ही दोनों प्रांत हिंसा की आग में जल उठे। इन दृश्यों को देखकर अंग्रेज दोनों हाथों से तालिया बजा रहे थे।

भारत साम्प्रदायिक दंगों की आग में जलने के कगार पर था किंतु गांधीजी अब भी झुकने को तैयार नहीं थे। वे खुलेआम कहते हुए घूम रहे थे कि भले ही पूरा भारत अग्नि की ज्वाला में जल जाए, मैं मुसलमान भाइयों को स्वयं से अलग नहीं होने दूंगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कैबीनेट मिशन प्लान – संयुक्त भारत योजना

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1945 में इंग्लैण्ड की गोरी सरकार ने भारत को स्वतंत्रता देने की योजना बनाने के लिए कैबीनेट मिशन को भारत भेजा था। इस मिशन ने भारतीयों के समक्ष भारत को आजादी देने तथा भारत का विभाजन करने की जो योजना प्रस्तुत की, उसे कैबीनेट मिशन प्लान कहते हैं। इस प्लान में लगभग वही प्रावधान थे, जो इंग्लैण्ड की सरकार द्वारा बहुत पहले से बताए जा रहे थे।

16 मई 1946 को कैबीनेट मिशन ने अपनी योजना प्रकाशित की। इसे ‘कैबीनेट मिशन प्लान’ तथा ‘संयुक्त भारत योजना’ भी कहते हैं। इसके द्वारा भविष्य में बनने वाले भारत संघ के लिए संघीय संविधान का निर्माण किया जाना प्रस्तावित किया गया जिसके तहत भावी भारत संघ की व्यवस्था की जानी थी। प्रस्तावित संघ में सरकार के तीनों अंग- विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका रखे जाने थे।

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संघ में ब्रिटिश-भारत के 11 प्रांत और समस्त 565 देशी रियासतें शामिल होनी थीं। केन्द्रीय सरकार का अधिकार क्षेत्र रक्षा, वैदेशिक मामले और संचार तक सीमित होना था। शेष सभी विषय और अधिकार रियासतों के पास रहने थे। विधान निर्मात्री परिषद में रियासतों के प्रतिनिधियों की संख्या 93 से अधिक नहीं होनी थी जो बातचीत के द्वारा तय की जानी थी। साम्प्रदायिक प्रश्न उस सम्प्रदाय के सदस्यों द्वारा ही निर्धारित किया जाना था। शेष विषयों पर राज्यों का अधिकार होना था।

कैबीनेट मिशन प्लान में ब्रिटिश-प्रांतों को ‘ए’, ‘बी’ और ‘सी’ समूहों अथवा श्रेणियों में बांटने का प्रस्ताव था। पहले अर्थात् ‘ए’ समूह में हिन्दू बहुसंख्यक प्रांत- मद्रास, बम्बई, मध्य-प्रांत व बरार, संयुक्त प्रांत, एवं बिहार थे। दूसरे अर्थात् ‘बी’ समूह में पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत थे जहाँ मुसलमानों का बहुमत था। तीसरे अर्थात् ‘सी’ समूह में बंगाल और असम थे जहाँ मुसलमानों का हल्का बहुमत था।

ये तीनों ही संविभाग अपने समूह के लिए संविधान बनाने के अधिकारी थे। यह प्रावधान भी किया गया था कि ये प्रांत आपस में मिलकर गुट बना सकेंगे। इस योजना के तहत की गई व्यवस्था की प्रत्येक 10 वर्षों के बाद समीक्षा करने का प्रावधान किया गया। राज्यों के सम्बन्ध में कैबीनेट मिशन ने कहा कि ब्रिटिश-भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही, ब्रिटिश ताज और देशी राज्यों के विद्यमान सम्बन्ध समाप्त हो जाएंगे।

ब्रिटिश सरकार न तो अपने हाथ में सर्वोच्च सत्ता रखेगी न ही उसे नई सरकार को हस्तांतरित करेगी। राज्यों को उनके अधिकार वापिस कर दिए जाएंगे। अतः देशी राज्यों को चाहिए कि वे अपने भविष्य की स्थिति उत्तराधिकारी भारतीय सरकार से बातचीत करके व्यवस्थित करें। अर्थात् रजवाड़े अपनी शर्तों पर भारतीय संघ में शामिल हो सकते थे या भारत से बाहर रह सकते थे। कैबीनेट मिशन का विचार था कि यदि ‘एक-सत्तात्मक-भारत’ बना तो रजवाड़े शक्तिशाली तीसरी शक्ति बन जाएंगे।

17 मई 1946 को नवाब भोपाल ने लॉर्ड वैवेल को एक पत्र लिखकर कैबीनेट मिशन से आश्वासान मांगा कि सांप्रदायिकता के प्रश्न पर राज्य अपनी शर्तों पर एक अथवा एक से अधिक समूह बना सकेंगे। राज्यों को यह अधिकार होगा कि वे प्रत्येक 10 वर्ष के अंतराल पर संघीय संविधान के पुनरीक्षण के लिए कह सकें।

संविधान सभा को यह अधिकार नहीं होना चाहिए कि वह राज्यों में सरकार के प्रकार अथवा शासक वंश के सम्बन्ध में किसी तरह का विचार-विमर्श करे या उसके ऊपर अपनी कोई अभिशंसा दे। संविधान सभा में राज्यों के सम्बन्ध में लिया गया निर्णय या अभिशंसा को लागू करने से पूर्व सम्बन्धित राज्यों द्वारा उसकी अभिपुष्टि की जानी आवश्यक होगी।

दुःखों से मुक्ति का बीज

इस प्रकार कैबीनेट मिशन ने स्पष्ट कर दिया कि स्वतंत्र भारत के केवल दो टुकड़े नहीं होंगे अपितु समूह ए, बी एवं सी के रूप में तीन टुकड़े तथा चौथा टुकड़ा देशी-राज्यों का भी होगा जो कि एक अथवा उससे अधिक यहाँ तक कि पांच सौ पैंसठ तक हो सकता था। भारतीय नेताओं के अनुसार कैबीनेट मिशन द्वारा घोषित प्रांतों के समूहीकरण की योजना भारतीय संघ की एकता एवं अखंडता के लिए अत्यधिक घातक और खतरनाक प्रमाणित हो सकती थी।

इस घोषणा ने देशी शासकों को भविष्य में बनने वाली अंतरिम सरकार के साथ समानता का दर्जा दे दिया था। कांग्रेस इस स्थिति से अप्रसन्न थी तथा पहले ही कह चुकी थी कि कैबीनेट मिशन योजना ने केंद्र को केवल रक्षा, विदेश एवं संचार के अधिकारों से युक्त एक कमजोर केंद्र की प्रस्तावना की है। देश को ए, बी एवं सी समूहों में बांटकर, मुस्लिम लीग द्वारा निर्धारित की गई सीमाओं वाले पाकिस्तान की अवधारणा को पुष्ट किया गया है।

कांग्रेस का मानना था कि प्रांतों के समूहीकरण में प्रांतों को छूट रहेगी कि वे अपने लिए उपयुक्त समूह का चुनाव करें अथवा समूह से बाहर रह सकें जबकि मुस्लिम लीग का मानना था कि प्रांतों को उनके लिए निर्धारित समूह में शामिल होना आवश्यक होगा।

कैबीनेट योजना के प्रस्तावों पर गांधीजी का कहना था कि- ‘दुःख-दर्द से भरे इस देश को अभाव और दुःख से मुक्त करने का यह बीज है। वर्तमान परिस्थिति में इससे अच्छा वे कुछ नहीं कर सकते थे।’

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कैबीनेट मिशन कम्पलीट

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ब्रिटिश सरकार के कैबिनेट मंत्रियों के दल अर्थात् कैबीनेट मिशन ने जब भारत की आजादी एवं विभाजन की योजना प्रकाशित कर दी तो कैबीनेट मिशन कम्पलीट हो गया। मिशन ने इस आशा के साथ भारत छोड़ दिया कि अब भारत के लोग आगे का मार्ग स्वयं ढूंढ लेंगे। हमेशा की तरह न्याय करने की आड़ में, गोरी सरकार ने भरपूर अन्याय किया था। वे भारत को एक देश न मानकर सैंकड़ों देशों का झुण्ड मानते थे, कैबीनेट मिशन प्लान में भी यही विचार आगे बढ़ाया गया था।

16 मई 1946 की कैबीनेट मिशन योजना यद्यपि एक अभिशंषा के रूप में प्रस्तुत की गई थी किंतु फिर भी यह किसी पंच-निर्णय से कम नहीं थी। योजना के प्रकाशन के साथ ही भारत में कैबीनेट मिशन का काम पूरा हो चुका था और अब उसे इंग्लैण्ड लौट जाना था।

मिशन ने भारत छोड़ने से पहले भारतीय समाचार पत्रों को एक वक्तव्य दिया- ‘कैबीनेट प्रस्ताव भारतीयों को शीघ्रातिशीघ्र आजादी देने का एक मार्ग है जिसमें आंतरिक उपद्रव एवं झगड़े की संभावनाएं न्यूनतम हैं।’

29 जून 1946 को कैबीनेट मिशन ने इस आशा के साथ भारत छोड़ दिया कि और कुछ नहीं तो कम से कम संविधान सभा का गठन तो होगा ही। क्रिप्स तथा पैथिक लॉरेंस ने ब्रिटिश संसद में घोषणा की कि- ‘मिशन अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल रहा।’

कांग्रेस की हाँ …..!

यद्यपि कैबीनेट योजना कांग्रेस की इच्छा के अनुसार नहीं थी तथापि जवाहरलाल नेहरू को विश्वास था कि कैबीनेट योजना में प्रस्तावित प्रांतों का कोई समूह बनेगा ही नहीं। क्योंकि संविभाग ‘ए’ के सभी और ‘बी’ तथा ‘सी’ के कुछ राज्य समूहीकरण के विरुद्ध रहेंगे। नेहरू का सोचना बिल्कुल सही था क्योंकि पंजाब और बंगाल के हिन्दू इस योजना को स्वीकार करके अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मार सकते थे। इसलिए नेहरू ने 6-7 जुलाई 1946 को कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में कैबीनेट योजना को स्वीकार करने का प्रस्ताव रखा जो 51 के मुकाबले 205 मतों से स्वीकृत हो गया। इस प्रकार कांग्रेस ने कैबीनेट योजना स्वीकार कर ली।

देशी राजाओं की हाँ …..!

कैबीनेट मिशन के माध्यम से राजओं की मुँहमांगी मुराद पूरी होने जा रही थी और वे एक बार फिर से ई.1817-18 से पहले की स्थिति में अर्थात् पूर्ण स्वतंत्र राज्य होने जा रहे थे। इसलिए 17 जुलाई 1946 को आयोजित नरेन्द्र मण्डल के सम्मेलन में राजाओं ने अपने मुँह में आ रहे पानी को छुपाते हुए स्वयं को देशभक्त प्रदर्शित करने का अवसर हाथ से नहीं जाने दिया और घोषणा की कि नरेन्द्र मण्डल देश की इस इच्छा से पूर्ण सहमति रखता है कि भारत को तत्काल राजनीतिक महिमा प्राप्त हो। राजाओं की इच्छा, संवैधानिक समस्याओं के निस्तारण के कार्य में प्रत्येक संभावित योगदान देने की है।

मुहम्मद अली जिन्ना की हाँ …..!

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कैबीनेट मिशन योजना में सीधे-सीधे पाकिस्तान की मांग को स्वीकार नहीं किया गया था किंतु प्रांतीय विधान सभाओं में हिन्दु-बहुमत, मुस्लिम बहुमत तथा मुस्लिमों के हल्के बहुमत के आधार पर ‘ए’, ‘बी’ एवं ‘सी’ समूहों के निर्माण की बात कही गई थी जो अपने-अपने लिए अलग संविधान बना सकते थे। जिन्ना को इस समूहीकरण योजना में भविष्य में पाकिस्तान के निर्माण की आशा दिखाई दे रही थी। इसलिए उसने सीधे-सीधे पाकिस्तान न मिलने पर भी इस योजना को स्वीकार करने का निर्णय लिया। कैबीनेट मिशन योजना पर विचार करने के लिए बुलाई गई

मुस्लिम लीग की बैठक में पारित प्रस्ताव में कहा गया कि- ‘पूर्ण सार्वभौम पाकिस्तान के लक्ष्य की प्राप्ति भारत के मुसलमानों का अपरिवर्तनीय उद्देश्य अब भी बना हुआ है, इसलिए हम इसके दीर्घकालीन और अंतरिम दोनों भागों को स्वीकार करते हैं क्योंकि मिशन की योजना में पाकिस्तान का आधार निहित है।

इस प्रकार जिन्ना कैबीनेट मिशन के जाल में फँस गया और भारत की आजादी का रास्ता साफ होता हुआ दिखाई देने लगा। जो जिन्ना पिछले पंद्रह साल से इस ध्येय के लिए भारतीय जनता का खून और मुस्लिम लीगी नेताओं का पसीना बहाता रहा था कि अंग्रेज भारत को आजाद करने से पहले उसके टुकड़े करें, वही जिन्ना भारत के टुकड़े हुए बिना ही अंग्रेजों को भारत से जाने की अनुमति दे रहा था।

राजनीति के कुछ पन्ने पढ़ा हुआ साधारण व्यक्ति भी अनुमान लगा सकता था कि अपने इस निर्णय के लिए जिन्ना शीघ्र ही पश्चाताप की भयानक अग्नि में झुलसने वाला था।

जहाँ एक ओर इंग्लैण्ड की गोरी सरकार दावा कर रही थी कि कैबीनेट मिशन कम्पलीट हो गया है, वहीं वास्तविकता यह थी कि कैबीनेट मिशन कम्पलीट नहीं हुआ था। असली लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी था। यही कारण था कि वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए लंदन की सरकार को दो साल तक और पसीना बहाना पड़ा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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