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भारत के देशी राज्य

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भारत के देशी राज्य – राजाओं के मन में कांग्रेस की ओर से आशंका

जिस समय भारत को स्वतंत्रता मिली, उस समय भारत में 11 ब्रिटिश प्रांत एवं 565 देशी राज्य थे। भारत के देशी राज्य हजारों सालों से अस्तित्व में थे जबकि ब्रिटिश प्रांतों का निर्माण ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन के दौरान किया गया था।

जब भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 घोषित हुआ तो उसकी धारा 8 में प्रावधान किया गया कि देशी राज्यों पर से 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश सरकार की परमोच्चता समाप्त हो जाएगी तथा यह पुनः देशी राज्यों को हस्तांतरित कर दी जाएगी। बहुत से राजाओं ने अंग्रेजों द्वारा दी जा रही इस सुविधा का लाभ उठाने का मन बनाया। इस सुविधा के आधार पर देशी राज्य अपनी इच्छानुसार भारत अथवा पाकिस्तान में से किसी भी देश में सम्मिलित होने अथवा पृथक अस्तित्व बनाये रखने के लिये स्वतंत्र थे।

मुहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम लीग के आंदोलन के माध्यम से बनने वाले भावी पाकिस्तान में पूरे पंजाब और पूरे बंगाल की मांग की थी किंतु भारत-पाकिस्तान की वास्तविक सीमाओं का खुलासा पाकिस्तान बनने से पहले तक नहीं किया गया। इन कारणों से भारतीय राजाओं के मन में यह भ्रम बना रहा कि पूरा पंजाब पाकिस्तान में जाएगा।

इस कारण जैसलमेर, बीकानेर, अलवर, जोधपुर आदि बहुत सी रियासतों को लगता था कि देश का विभाजन होने के बाद उनका राज्य भारत एवं पाकिस्तान दोनों की सीमाओं के बीच में स्थित होगा इसलिए वे अपनी मर्जी से भारत या पाकिस्तान में से किसी को भी चुनने की स्थिति में होंगे। चूंकि कांग्रेस शुरु से ही राजाओं को धमका रही थी कि रियासतों पर से परमोच्चता का अधिकार ब्रिटिश क्राउन से समाप्त होकर संघीय सरकार को मिल जाएगा इसलिए राजा लोग कांग्रेस-शासित भारत में मिलने से डरने लगे।

29 जनवरी 1947 को बंबई के ताजमहल होटल में नरेंद्र मण्डल की बैठक हुई जिसमें 60 राजा और 100 राज्यों के मंत्री उपस्थित थे। बैठक में नरेन्द्र मण्डल के चांसलर भोपाल नवाब ने कहा- ‘हमें कहा जा रहा है कि या तो हम हट जायें या फिर हाशिये पर जियें। हमारे लिये इन धमकियों के आगे घुटने टेक देना अशोभनीय होगा।’

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नवाब ने वे आधारभूत सिद्धांत भी गिनाये जिन पर राज्य समझौता करने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने मांग की कि कैबीनेट मिशन योजना का पूर्ण अनुसरण किया जाये। त्रावणकोर के दीवान सर सी. पी. रामास्वामी ने संविधान सभा पर आरोप लगाया कि वह राज्यों में सरकार का प्रारूप निश्चित करने की चेष्टा कर रही है। सम्मेलन में पारित एक प्रस्ताव के माध्यम से राजाओं ने इच्छा प्रकट की कि कैबीनेट मिशन योजना के तहत प्रस्तावित भारत संघ में संविधान के निर्माण के लिये शासकगण अपना हर संभव सहयोग देने को तैयार हैं।

अलवर नरेश ने 3 अप्रेल 1947 को बम्बई में आयोजित नरेंद्र-मंडल की बैठक में कहा कि- ‘देशी राज्यों के अधिपतियों को हिंदी संघ राज्य में नहीं मिलना चाहिये’ किंतु 10 अप्रेल 1947 को बड़ौदा, पटियाला, बीकानेर, उदयपुर, जयपुर, जोधपुर तथा रीवां ने संविधान सभा में सम्मिलित होने की घोषणा की। अब भी बहुत से राजा संविधान सभा से बाहर थे। इसलिए 18 अप्रेल 1947 को जवाहरलाल नेहरू ने अखिल भारतीय देशी राज्य प्रजा परिषद के आठवें अधिवेशन में राजाओं को चेतावनी दी कि जो राजा इस समय संविधान सभा में सम्मिलित नहीं होंगे उन्हें देश का शत्रु समझा जायेगा और उन्हें इसके दुष्परिणाम भोगने होंगे।

लियाकत अली ने राजाओं का आह्वान किया कि वे नेहरू की धमकियों में न आयें। नेहरू, गांधी प्यारेलाल आदि कांग्रेसी नेताओं द्वारा देशी राज्यों के प्रति प्रयुक्त की जा रही कठोर भाषा से बहुत से राजा कांग्रेस से नाराज एवं भयभीत थे। इसलिए वे पाकिस्तान में मिलने या स्वतंत्र रहने या देशी राज्यों का अलग समूह बनाकर उसमें मिलने पर विचार कर रहे थे।

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत में अधिकांश राज्य, हिंदू राज्य थे। हैदराबाद, भोपाल, जूनागढ़ एवं टोंक राज्यों के शासक तो मुसलमान थे किंतु वहाँ की बहुसंख्यक जनता हिन्दू थी। जबकि काश्मीर का राजा हिन्दू था किंतु उसकी बहुसंख्यक प्रजा मुसलमान थी। इस प्रकार जातीय आधार पर भारत के राज्य और उनकी जनता ब्रिटिश-भारत के हिंदू बहुल क्षेत्र से जुड़े हुए थे।

आजादी के समय भारत में 566 देशी रियासतें थीं जिनमें से 12 रियासतें- बहावलपुर, खैरपुर, कलात, लास बेला, मकरान, खरान, अम्ब (तनावल), चित्राल, हुंजा, धीर, नगर तथा स्वात, पाकिस्तानी क्षेत्रों से घिरी हुई थीं। इसलिये उन्हें पाकिस्तान में सम्मिलित किया जाना था। शेष 554 रियासतें भारत में रह जानी थीं।

मुस्लिम शासकों द्वारा शासित जूनागढ़ (सौराष्ट्र), हैदराबाद (दक्षिण भारत) एवं भोपाल (मध्य भारत) तथा हिन्दू शासक द्वारा शासित किंतु मुस्लिम बहुल राज्य काश्मीर भारत में मिलने को तैयार नहीं हुए। कुछ हिन्दू राज्य भी भारत एवं पाकिस्तान से स्वतंत्र रहने का स्वप्न देखने लगे।

पाकिस्तानी क्षेत्र में स्थित कलात नामक रियासत ने पाकिस्तान में मिलने से मना कर दिया। जिन्ना उस समय तो चुप लगा गया किंतु मार्च 1948 में पाकिस्तानी सेना ने कलात पर आक्रमण करके उसे बलपूर्वक पाकिस्तान में मिला लिया।

छोटे राज्यों के पास भारत संघ में मिल जाने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था किंतु बड़े एवं सक्षम राज्यों की स्थिति अलग थी। त्रावणकोर, हैदराबाद, जम्मू एवं काश्मीर, मैसूर, इन्दौर, भोपाल, नवानगर यहाँ तक कि बिलासपुर की बौनी रियासत ने भी पूर्णतः स्वतंत्र रहने का स्वप्न देखा। भोपाल नवाब नरेन्द्र मण्डल के चांसलर पद का दुरुपयोग करते हुए केन्द्र में एक मजबूत संघ का निर्माण नहीं होने देना चाहते थे।

ऐसी परिस्थति में बीकानेर नरेश सादूलसिंह राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर देश के राजाओं का नेतृत्व करने के लिये आगे आये और उन्होंने नवाब द्वारा रचे गये चक्रव्यूह को भेद डाला। 10 अप्रेल 1947 को बड़ौदा, पटियाला, बीकानेर, उदयपुर, जयपुर, जोधपुर तथा रीवां जैसे महत्वपूर्ण राज्यों ने संविधान सभा में सम्मिलित होने की घोषणा करके नवाब के मंसूबों को पूरी तरह नष्ट कर दिया।

शासकगण चाहते थे कि परमोच्चता की समाप्ति तुरंत हो ताकि वे अपने अधिकारों के लिये अधिक मजबूती से मोल भाव कर सकें किंतु ब्रिटिश सरकार का मानना था कि ब्रिटिश-भारत के लिये सम्प्रभुता की समाप्ति तथा रियासती-भारत के लिये परमोच्चता की समाप्ति की अलग-अलग तिथियां नहीं हो सकतीं। राजपूताना के राज्यों ने आजादी के द्वार पर खड़े देश के इतिहास के रुख को सदा-सदा के लिये सही दिशा में मोड़ दिया। राजपूताना के राजाओं ने इस समय इस बात का विशेष ध्यान रखा कि उन पर भारत की संवैधानिक प्रगति का शत्रु होने का आरोप न लगे।

5 जून 1947 को भोपाल तथा त्रावणकोर ने स्वतंत्र रहने के निर्णय की घोषणा की। हैदराबाद को भी यही उचित जान पड़ा। काश्मीर, इन्दौर, जोधपुर, धौलपुर, भरतपुर तथा कुछ अन्य राज्यों के समूह के द्वारा भी ऐसी ही घोषणा किये जाने की संभावना थी। इस प्रकार कुछ देशी रियासतों के शासकों की महत्वाकांक्षायें देश की अखण्डता के लिये खतरा बन गयीं। मद्रास के तत्कालीन गवर्नर तथा बाद में स्वतंत्र भारत में ब्रिटेन के प्रथम हाईकमिश्नर सर आर्चिबाल्ड नेई को रजवाड़ों के साथ किसी प्रकार की संधि होने में संदेह था।

माउंटबेटन ने सरदार पटेल से कहा- ‘यदि राजाओं से उनकी पदवियां न छीनी जायें, महल उन्हीं के पास बने रहें, उन्हें गिरफ्तारी से मुक्त रखा जाये, प्रिवीपर्स की सुविधा जारी रहे तथा अंग्रेजों द्वारा दिये गये किसी भी सम्मान को स्वीकारने से न रोका जाये तो वायसराय राजाओं को इस बात पर राजी कर लेंगे कि वे अपने राज्यों को भारतीय संघ में विलीन करें और स्वतंत्र होने का विचार त्याग दें।’

पटेल ने माउंटबेटन के सामने शर्त रखी कि- ‘वे माउंटबेटन की शर्त को स्वीकार कर लेंगे यदि माउंटबेटन सारे रजवाड़ों को भारत की झोली में डाल दें।’

 तेजबहादुर सप्रू का कहना था- ‘मुझे उन राज्यों पर, चाहे वह छोटे हों अथवा बड़े, आश्चर्य होता है कि वे इतने मूर्ख हैं कि वे समझते हैं कि वे इस तरह से स्वतंत्र हो जायेंगे और फिर अपनी स्वतंत्रता बनाए रखेंगे।’

दुर्दिन के मसीहाओं ने भविष्यवाणी की थी कि- ‘हिंदुस्तान की आजादी की नाव रजवाड़ों की चट्टान से टकरायेगी।’

इस प्रकार जिस समय भारत को स्वतंत्रता मिली, उस समय कांगेस के समक्ष दो बड़ी समस्याएं थीं- मुसलमानों द्वारा किए जा रहे नरसंहार पर कैसे नियंत्रण पाया जाएगा तथा भारत के देशी राज्य किस प्रकार भारत में मिलाए जाएंगे!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जिन्ना का षड़यंत्र

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जिन्ना ने इस सिद्धांत पर अलग पाकिस्तान लिया था कि हिन्दु और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते किंतु जब पाकिस्तान बन गया तब जिन्ना ने प्रयास किया कि वह भारत के हिन्दू राज्यों को पाकिस्तान में शामिल करे। इसके लिए उसने हर संभव प्रयास किया किंतु सरदार पटेल के प्रयासों से जिन्ना का षड़यंत्र सफल नहीं हो सका।

संभालिए अपने बच्चे

भारत को स्वतंत्र किये जाने की घोषणा के बाद लंदन इवनिंग स्टैण्डर्ड में कार्टूनिस्ट डेविड लो का एक ‘Your Babies Now’ शीर्षक से छपा था जिसमें भारत के राष्ट्रीय नेताओं के समक्ष भारतीय राजाओं की समस्या का सटीक चित्रण किया गया था। इस कार्टून में नेहरू तथा जिन्ना को अलग-अलग कुर्सियों पर बैठे हुए दिखाया गया था जिनकी गोद में कुछ बच्चे बैठे थे।

ब्रिटेन को एक नर्स के रूप में दिखाया गया था जो यूनियन जैक लेकर दूर जा रही थी। नेहरू की गोद में बैठे हुए बच्चों को राजाओं की समस्या के रूप में दिखाया गया था जो नेहरू के घुटनों पर लातें मार कर चिल्ला रहे थे।

जिन्ना का षड़यंत्र

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एक ओर कांग्रेस देशी राज्यों के प्रति कठोर नीति का प्रदर्शन कर रही थी तो दूसरी ओर मुस्लिम लीग ने देशी राज्यों के साथ बड़ा ही मुलायम रवैया अपनाया। मुस्लिम लीग के लिये ऐसा करना सुविधाजनक था। जिन्ना यह प्रयास कर रहा था कि अधिक से अधिक संख्या में देशी राज्य अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दें अथवा पाकिस्तान में सम्मिलित हो जायें ताकि भारतीय संघ स्थायी रूप से दुर्बल बन सके।

जिन्ना राजाओं के गले में यह बात उतारना चाहता था कि कांग्रेस, मुस्लिम लीग तथा देशी राजाओं की साझा शत्रु है। जिन्ना ने लुभावने प्रस्ताव देकर राजपूताना की रियासतों को पाकिस्तान में सम्मिलित करने का प्रयास किया। उसने घोषित किया कि देशी राज्यों में मुस्लिम लीग बिल्कुल हस्तक्षेप नहीं करेगी और यदि देशी राज्य स्वतंत्र रहें तो भी मुस्लिम लीग की ओर से उन्हें किसी प्रकार की तकलीफ नहीं दी जायेगी। लीग की ओर से राजस्थान के राजाओं में गुप्त प्रचार किया जा रहा था कि उन्हें पाकिस्तान में मिलना चाहिये, हिंदी संघ राज्य में नहीं। निजाम हैदराबाद के प्रति माउंटबेटन का रवैया अत्यंत नरम था। जिन्ना ने कोरफील्ड और भोपाल नवाब का उपयोग भारत को कमजोर करने में किया।

पाकिस्तान के प्रति कतिपय हिन्दू राजाओं का रवैया

त्रावणकोर के महाराजा ने 11 जून 1947 को एक व्यापारी दल अपने यहाँ से पाकिस्तान भेजना स्वीकार कर लिया। महाराजा जोधपुर और बहुत सी छोटी रियासतों के शासक बड़े ध्यान से यह देख रहे थे कि बड़ी रियासतों के विद्रोह का क्या परिणाम निकलता है, उसी के अनुसार वे आगे की कार्यवाही करना चाहते थे।

बड़ौदा महाराजा प्रतापसिंह की पदच्युति

बड़ौदा महाराजा प्रतापसिंह ने अपने हाथ से सरदार पटेल को पत्र लिखा कि जब तक उनको भारत का राजा नहीं बनाया जाता और भारत सरकार उनकी समस्त मांगें नहीं मान लेती तब तक वे कोई सहयोग नहीं देंगे और न ही जूनागढ़ के नवाब की बगावत दबाने में सहयोग देंगे। इस पर भारत सरकार ने महाराजा प्रतापसिंह की मान्यता समाप्त करके उनके पुत्र फतहसिंह को महाराजा बड़ौदा स्वीकार किया।

भारत सरकार का कठोर रवैया देखकर राजा विनम्र देश-सेवकों जैसा व्यवहार करने लगे। जो राज्य संघ उन्होंने रियासतों का विलय न होने देने के लिये बनाया था, उसे भंग कर दिया गया। उन्होंने समझ लिया कि अब भारत सरकार से मिल जाने और उसका संरक्षण प्राप्त करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। वे यह भी सोचने लगे कि शासक बने रह कर विद्रोही प्रजा की इच्छा पर जीने के बजाय भारत सरकार की छत्रछाया में रहना कहीं अधिक उपयुक्त होगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भोपाल नवाब हमीदुल्ला खाँ

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भोपाल नवाब हमीदुल्ला खाँ का षड़यंत्र

भोपाल नवाब हमीदुल्ला खाँ छिपे तौर पर मुस्लिम परस्त, पाकिस्तान परस्त तथा कांग्रेस विरोधी के रूप में काम कर रहा था किंतु जब देश का विभाजन होना निश्चित हो गया तो तीसरे मोर्चे के नेता भोपाल नवाब ने अपनी मुट्ठी खोल दी और प्रत्यक्षतः विभाजनकारी मुस्लिम लीग के समर्थन में चला गया तथा जिन्ना का निकट सलाहकार बन गया। वह जिन्ना की उस योजना में सम्मिलित हो गया जिसके तहत राजाओं को अधिक से अधिक संख्या में या तो पाकिस्तान में मिलने के लिये प्रोत्साहित करना था या फिर उनसे यह घोषणा करवानी थी कि वे अपने राज्य को स्वतंत्र रखेंगे।

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रियासती मंत्रालय के सचिव ए. एस. पई ने पटेल को एक नोटशीट भिजवायी कि भोपाल नवाब, जिन्ना के दलाल की तरह काम कर रहा है। भोेपाल नवाब शासक मंडल के चांसलर के महत्वपपूर्ण पद पर था, उसने नए वायसराय लॉर्ड माउण्टबेटन से कहा कि वह कांग्रेस से नफतरत करता है और कांग्रेस शासित भारत से उसका कोई सम्बन्ध नहीं होगा। भारत के विभाजन के निश्चय से उसकी विध्वंसकारी गतिविधियां तेज हो गईं। उसने जोधपुर, इन्दौर और उदयपुर के शासकों को अपने साथ मिलाने की कोशिश की ताकि वह अपनी रियासत के लिए भौगोलिक निकटता पा सके और उसे पाकिस्तान के हवाले कर सके।

नवाब चाहता था कि भोपाल से लेकर कराची तक के मार्ग में आने वाले राज्यों का एक समूह बने जो पाकिस्तान में मिल जाये। इसलिये उन्होंने जिन्ना की सहमति से एक योजना बनायी कि बड़ौदा, इंदौर, भोपाल, उदयपुर, जोधपुर और जैसलमेर राज्य पाकिस्तान का अंग बन जायें। इस योजना में सबसे बड़ी बाधा उदयपुर और बड़ौदा की ओर से उपस्थित हो सकती थी। महाराजा जोधपुर ने उक्त रियासतों से सहमति प्राप्त करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली। इस प्रकार भारत के टुकड़े-टुकड़े करने का एक मानचित्र तैयार हो गया।

धौलपुर के राजराणा षड़यंत्र में सम्मिलित

भोपाल रियासत के नवाब हमीदुल्ला खाँ ने धौलपुर के महाराजराणा उदयभानसिंह को हिन्दू रियासतों को पाकिस्तान में मिलाने की योजना में सम्मिलित कर लिया। उदयभानसिंह जाटों की प्रमुख रियासत के बहुपठित, बुद्धिमान एवं कुशल राजा माने जाते थे किंतु वे किसी भी कीमत पर धौलपुर को भारत संघ में मिलाने को तैयार नहीं थे।

इसलिए वे जिन्ना के चक्कर में आ गए। जिन्ना के संकेत पर नवाब तथा महाराजराणा ने जोधपुर, जैसलमेर, उदयपुर तथा जयपुर आदि रियासतों के राजाओं से बात की तथा उन्हें जिन्ना से मिलने के लिये आमंत्रित किया। नवाब का साथ देने वाले हिंदू राजाओं में अलवर महाराजा भी थे।

अलवर राज्य में पाकिस्तान में सम्मिलित होने का प्रचार

भोपाल नवाब का साथ करने वाले हिंदू राजाओं में अलवर महाराजा भी थे, यह बात बम्बई के उनके भाषण से स्पष्ट हो गई थी। अर्थात् एक तरफ से अलवर राज्य में लीग की राजनीति का प्रचार हो रहा था और दूसरी तरफ राज्य के राजपूत सरदारों, जमींदारों द्वारा प्रचार किया जा रहा था कि अलवर राज्य को न हिन्दी संघराज्य में मिलना चाहिए और न पाकिस्तान में। राज्य को अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखना चाहिए।

उसमें भी कतिपय विशिष्ट स्वार्थ-सम्बद्ध लोगों ने महाराज के मन में इस बात को जमा दिया था कि हिन्दी संघ राज्य में तो अलवर को कदापि शामिल नहीं होना चाहिए। इन सब चक्करों के कारण अलवर राज्य हिन्दी संघराज्य में शामिल होन के सम्बन्ध में निराश हो गया था।

खरे ने लिखा है कि यदि पूरे पंजाब को पाकिस्तान में शामिल करने की मुस्लिम लीग की मांग मान ली जाती तो अलवर राज्य की सीमा पाकिस्तान से मिल जाती किंतु पंजाब का विभाजन होने और पूर्वी पंजाब के भारत में रह जाने से यह संभावना समाप्त हो गई। अलवर नरेश फिर भी अपनी जिद पर पूर्ववत् दृढ़ रहा। 16-17 अप्रेल 1947 को ग्वालियर में अखिल भारतीय देशी राज्य प्रजापरिषद् का सम्मेलन हुआ ।

इस सम्मेलन में महाराज अलवर ने नेहरू द्वारा देशी राज्यों को सम्बोधित करके कही गई कठोर घोषणाओं का उल्लेख करते हुए कहा-

‘जो लोग हमारा निःपात करने पर आज ही तुले हुए हैं, उन लोगों से हम क्यों सहयोग करें। कांग्रेस के इन नेताओं से हमें भय है। वे हमें नष्ट कर देंगे। इसके विपरीत मुस्लिम लीग वाले हमें निश्चित आश्वासन दे रहे हैं कि देशी राज्यों की स्वतंत्रता अबाधित रहेगी। इसलिए हम उन्हें ही क्यों न मिलें? इस विषय में धर्म का कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। यद्यपि हम कट्टर हिन्दू हैं तथापि पाकिस्तान में मिलने से हमारे हिन्दुत्व पर क्या आंच आने वाली है?’

अलवर महाराजा अपने भाषणों में भले ही कुछ भी कहता रहा हो किंतु राज्य के प्रधानमंत्री द्वारा सरदार पटेल के साथ हुई बैठक के बाद 1 जुलाई 1947 को राज्य के मंत्रिमण्डल ने हिन्दी संघराज्य में शामिल होने का निर्णय लिया तथा उसी दिन तार एवं पत्र द्वारा हिन्दुस्थान सरकार को सूचित किया गया कि हिन्दी संघराज्य की संविधान समिति में अलवर राज्य के शामिल होने की प्रकट घोषणा की गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

सुकार्णो पुत्री ! तुम्हारा स्वागत है!

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सुकार्णो पुत्री! तुम्हारा स्वागत है!

आज उस बात को 56 साल ही बीते हैं। इस बीच इतिहास का पहिया तेजी से घूम गया है तथा सुकार्णो की बेटी सुकार्णो पुत्री ने फिर से हिन्दू धर्म में लौटने की घोषणा की है जिसका सुकार्णो के परिवार ने स्वागत किया है।

इण्डोनेशिया कभी भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा था। पांचवीं शताब्दी ईस्वी में फाह्यान ने इण्डोनेशिया के द्वीपों के हिन्दुओं को यज्ञ-हवन करते हुए देखा था। चौदहवीं शताब्दी ईस्वी में इण्डोनेशिया में इस्लाम का प्रसार हुआ तथा इण्डोनेशियाई द्वीपों से हिन्दू संस्कृति लगभग नष्ट होकर केवल बाली द्वीप में सिमट कर रह गई। आज इण्डोनेशिया में लगभग 2 प्रतिशत हिन्दू रह गए हैं।

इण्डोनेशिया को भारत से पहले आजादी मिली तथा ईस्वी 1945 में सुकार्णो इण्डोनेशियाई स्वतंत्रता सेनानी इण्डोनेशिया का राष्ट्रपति बना। वह 1967 तक इस पद पर रहा। उसके समय में इण्डोनेशिया में दस प्रधानमंत्री बदल गए। इण्डोनेशियाई लोगों ने इस्लाम को भले ही अपना लिया था किंतु अपने पूर्वजों की संस्कृति को नहीं छोड़ा था।

इसलिए आज भी इण्डोनेशिया में सार्वजनिक स्थलों पर हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियां एवं रामायण तथा महाभारत के प्रसंगों वाली पुस्तकें, नाटक, गीत आदि प्रचलन में हैं। वहां की मुद्रा पर भी हिन्दू देवी-देवताओं के चित्र छपते हैं।

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इतना होने पर भी जब ई.1965 में पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण किया था तब इण्डोनेशिया के राष्ट्रपति सुकार्णो ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वक्तव्य देकर समूचे संसार को हैरान कर दिया था कि पाकिस्तान हमारा भाई है, हम उसकी सहायता करेंगे। आज उस बात को 56 साल ही बीते हैं। इस बीच इतिहास का पहिया तेजी से घूम गया है तथा सुकार्णो की बेटी सुकार्णो पुत्री ने फिर से हिन्दू धर्म में लौटने की घोषणा की है जिसका सुकार्णो के परिवार ने स्वागत किया है। सुकार्णो की बेटी का नाम सुकुमावती सुकार्णो पुत्री है क्योंकि आज भी इण्डोनेशिया में संस्कृत एवं हिन्दी के बहुत से शब्द प्रचलित हैं। इण्डोनेशिया में आज भी हिन्दू धर्म ग्रंथ पढ़े जाते हैं। बहुत से मुसलमान वहां पर गीता एवं रामायण का अध्ययन करते हैं। सुकुमावती सुकार्णो पुत्री ने विगत वर्षों में हिन्दू धर्मग्रंथों का अध्ययन किया तथा वे इस निष्कर्ष पर पहुंचीं कि उन्हें हिन्दू धर्म में लौट जाना चाहिए। उनके पुरखे भी हजारों सालों तक हिन्दू रहे थे। वे फिर से अपने पुरखों का धर्म अपना रही हैं।

हिन्दू धर्मग्रंथ हमें बताते हैं कि हिन्दू धर्म नहीं, जीवन शैली है। इस जीवन शैली में, सभी अपने हैं, कोई पराया नहीं है, न किसी को नीचा दिखाया जाने की भावना रखी जाती है। यह दया और सहिष्णुता का धर्म है तथा ब्रह्माण्ड में मौजूद, दिखने वाले एवं न दिखने वाले, जड़ एवं चेतन अस्तित्वों के प्रति सहानुभूति अनुभव करने का चिंतन है। वस्तुतः यह कोई मजहब या पंथ नहीं है, यह तो मनुष्य को जैसा वह प्रकृति द्वारा बनाया गया है, उसी प्रकार निर्बंध रखने, सभी बंधनों से मुक्त रखने का दर्शन है।

इसीलिए भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने लिखा था-

हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय!

हे सुकार्णोपुत्री सुकुमावती अपने पुरखों की जीवनशैली में तुम्हारा स्वागत है। हिन्दू चिंतन, हिन्दू दर्शन हिन्दू जीवन में आपका बार-बार स्वागत है!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कोनार्ड कोरफील्ड

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कोनार्ड कोरफील्ड के दुष्प्रयास

कोनार्ड कोरफील्ड भारत सरकार के राजनीतिक विभाग का सचिव था तथा देशी रियासतों को ही असली भारत मानता था जिनसे उसे गहरी सहानुभूति थी। इसलिए कोरफील्ड ने रेजीडेंटों और पॉलिटिकल एजेंटों के माध्यम से देशी राजाओं को भारतीय संघ से पृथक रहने के लिये प्रेरित किया। कोरफील्ड चाहता था कि कम से कम दो-तीन राज्य जिनमें हैदराबाद प्रमुख था, कांग्रेस के चंगुल से बच जायें।

बाकी रजवाड़ों का भी भारत में सम्मिलित होना जितना मुश्किल हो सके बना दिया जाये। कोरफील्ड ने रजवाड़ों के बीच घूम-घूम कर प्रचार किया कि उनके सामने दो नहीं तीन रास्ते हैं, वे दोनों उपनिवेशों में से किसी एक में सम्मिलित हो सकते हैं अथवा स्वतंत्र भी रह सकते हैं। कोनार्ड कोरफील्ड के प्रयासों से त्रावणकोर तथा हैदराबाद ने घोषणा कर दी कि वे किसी भी उपनिवेश में सम्मिलित नहीं होंगे अपितु स्वतंत्र देश के रूप में रहेंगे।

रियासती विभाग का गठन

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कोनार्ड कोरफील्ड के दुष्चक्र को तोड़ने के लिए 5 जुलाई 1947 को सरदार पटेल के नेतृत्व में रियासती विभाग अस्तित्व में आया। कांग्रेस को आशा थी कि यह लौह-पुरुष अपनी धोती समेट कर राजाओं के पीछे पड़ जायेगा। हमीदुल्ला खाँ, कोरफील्ड तथा रामास्वामी अय्यर की योजना से निबटने तथा स्वतंत्र हुई रियासतों को भारत संघ में घेरने के लिये पटेल अकेले ही भारी थे। वी. पी. मेनन को पटेल का सलाहकार व सचिव नियुक्त किया गया।

ऐसा माना जाता था कि वे एकमात्र ऐसे अधिकारी थे जो देशी राज्यों की जटिल समस्या को सुलझा सकते थे। पटेल का जोरदार व्यक्तित्व और मेनन के लचीले दिमाग का संयोग इस मौके पर और भी अधिक खतरनाक सिद्ध हुआ। नेपथ्य में मंजे हुए राजनीतिज्ञ जैसे सरदार के. एम. पन्निकर, वी. टी. कृष्णामाचारी तथा भारतीय रियासतों के प्रतिष्ठित मंत्री और भारतीय सिविल सेवा के वरिष्ठ अधिकारी जैसे सी. एस. वेंकटाचार, एम. के. वेल्लोदी, वी. शंकर, पण्डित हरी शर्मा आदि अनुभवी लोग कार्य कर रहे थे। पटेल ने मेनन से कहा कि– ‘पाकिस्तान इस विचार के साथ कार्य कर रहा है कि सीमावर्ती कुछ राज्यों को वह अपने साथ मिला ले। स्थिति इतनी खतरनाक संभावनायें लिये हुए है कि जो स्वतंत्रता हमने बड़ी कठिनाईयों को झेलने के पश्चात् प्राप्त की है वह राज्यों के दरवाजे से विलुप्त हो सकती है।’

केवल तीन विषयों पर विलय

आजादी की तिथि में पाँच सप्ताह शेष रह गये थे। एक ओर कोनार्ड कोरफील्ड अंग्रेजों की सत्ता समाप्ति से पहले रजवाड़ों से केन्द्रीय सत्ता का विलोपन करने के काम में लगा हुआ था जिससे एक-एक करके सारी व्यवस्थायें रद्द होती जा रही थीं। दूसरी ओर सरदार इस उधेड़-बुन में थे कि 15 अगस्त से पहले राजाओं की प्रत्येक व्यवस्था, जिन्हें अंग्रेजों ने रद्द करना आरंभ कर दिया था, जैसे सेना, डाक आदि को बनाये रखने के सम्बन्ध में कैसे बात की जाये?

मेनन ने सरदार को सुझाव दिया कि राजाओं से केवल तीन विषयों में विलय करने के लिये कहा जाये। ये तीन विषय रक्षा, विदेशी मामले और संचार से सम्बन्धित थे। पटेल से अनुमति लेकर मेनन ने माउंटबेटन से इस कार्य में सहयोग मांगा। मेनन ने वायसराय से कहा कि- ‘यदि सारे रजवाड़े भारत में मिल जाते हैं तो विभाजन का घाव काफी कम हो जायेगा तथा यदि इस काम में माउंटबेटन ने सहयोग दिया तो भारत की जनता सदियों तक उनकी ऋणी रहेगी।’ माउंटबेटन ने इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया।

5 जुलाई 1947 को पटेल ने राजाओं से अपील की कि– ‘वे 15 अगस्त 1947 से पूर्व भारत संघ में सम्मिलित हो जायें। देशी राज्यों को सार्वजनिक हित के तीन विषय- रक्षा, विदेशी मामले और संचार संघ को सुपुर्द करने होंगे जिसकी स्वीकृति उन्होंने केबीनेट मिशन योजना के समय दी थी। भारतीय संघ इससे अधिक उनसे और कुछ नहीं मांग रहा। संघ देशी राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने की मंशा नहीं रखता। राज्यों के साथ व्यवहार में रियासती विभाग की नीति अधिकार की नहीं होगी। कांग्रेस राजाओं के विरुद्ध नहीं रही है। देशी नरेशों ने सदैव देशभक्ति व लोक कल्याण के प्रति अपनी आस्था प्रकट की है।’

पटेल ने राजाओं को चेतावनी भी दी कि- ‘यदि कोई नरेश यह सोचता हो कि ब्रिटिश परमोच्चता उसको हस्तांतरित कर दी जायेगी तो यह उसकी भूल होगी। परमोच्चता तो जनता में निहित है।’ एक प्रकार से यह घोषणा, राजाओं को समान अस्तित्व के आधार पर भारत में सम्मिलित हो जाने का निमंत्रण था। सरदार के शब्दों में यह प्रस्ताव, रजवाड़ों द्वारा पूर्व में ब्रिटिश सरकार के साथ की गयी अधीनस्थ संधि से बेहतर था।

इस प्रकार पटेल व मेनन द्वारा देशी राजाओं को घेर कर भारत संघ में विलय के लिये पहला पांसा फैंका गया जिसका परिणाम यह हुआ कि बीकानेर नरेश सादूलसिंह ने सरदार पटेल की इस घोषणा का एक बार फिर तुरंत स्वागत किया और अपने बंधु राजाओं से अनुरोध किया कि वे इस प्रकार आगे बढ़ाये गये मित्रता के हाथ को थाम लें और कांग्रेस को पूरा समर्थन दें ताकि भारत अपने लक्ष्य को शीघ्रता से प्राप्त कर सके किंतु अधिकांश राजाओं का मानना था कि उन्हें पटेल की बजाय कोनार्ड कोरफील्ड की बात सुननी चाहिये।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

जोधपुर राज्य को पाकिस्तान में मिलाने का षड़यंत्र

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मुहम्मद अली जिन्ना द्वारा जोधपुर राज्य को पाकिस्तान में मिलाने का षड़यंत्र इसलिए किया गया क्योंकि जोधपुर राज्य की सीमा पाकिस्तान से मिलती थी।

16 जुलाई 1947 को वी. पी. मेनन ने इंगलैण्ड में भारत उपसचिव सर पैट्रिक को एक तार दिया कि वायसराय ने मैसूर, बड़ौदा, ग्वालियर, बीकानेर, जयपुर और जोधपुर के प्रतिनिधियों से भारत में विलय के विषय में बातचीत की। उन सबकी प्रतिक्रिया सकारात्मक थी। 2 अगस्त 1947 को मेनन ने पैट्रिक को सूचित किया कि भारत के लगभग समस्त राजा अपने राज्यों का भारतीय संघ में विलय करने के लिए तैयार हो गये हैं।

केवल हैदराबाद, भोपाल और इंदौर हिचकिचा रहे हैं। वायसराय ने देशी नरेशों से बात की है और इन राज्यों के नरेशों ने भारतीय संघ में सम्मिलित होने पर सहमति दर्शायी है- ग्वालियर, पटियाला, कोटा, जोधपुर, जयपुर, रामपुर, नवानगर, झालावाड़, पन्ना, टेहरी गढ़वाल, फरीदकोट, सांगली, सीतामऊ, पालीताना, फाल्टन, खैरागढ़, सांदूर।

यद्यपि जोधपुर राज्य 28 अप्रेल 1947 से संविधान सभा में भाग ले रहा था तथा जोधपुर के युवा महाराजा हनवंतसिंह दो बार भारत में मिलने की घोषणा कर चुके थे किंतु वे देश को स्वतंत्रता मिलने से ठीक 10 दिन पहले पाकिस्तान का निर्माण करने वाले मुहम्मद अली जिन्ना और उनका साथ देने वाले नवाब भोपाल एवं धौलपुर के महाराजराणा के चक्कर में आ गये।

जब राजपूताना के राज्यों का स्वतंत्र समूह गठित करने की योजना विफल हो गयी तो राजनीतिक विभाग के पाकिस्तान-परस्त सदस्यों ने राजपूताना के राज्यों को सलाह दी कि वे पाकिस्तान में मिल जायें क्योंकि भारत पाकिस्तान की सीमा पर स्थित होने के कारण कानूनन वे ऐसा कर सकते थे। इनमें से जोधपुर राज्य एक था। महाराजा हनवंतसिंह कांग्रेस से घृणा करते थे तथा जोधपुर की रियासत पाकिस्तान से लगी हुई थी। इसलिए हनवंतसिंह ने जिन्ना से भेंट करने की सोची।

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जिन्ना और मुस्लिम लीग के नेताओं की जोधपुर नरेश से कई बार भेंट हुई थी और अंतिम भेंट में वे जैसलमेर के महाराजकुमार को भी साथ ले गये थे। बीकानेर नरेश ने उनके साथ जाने से मना कर दिया था और हनवंतसिंह जिन्ना के पास अकेले जाने में हिचकिचा रहे थे। उन लोगों को देखकर जिन्ना की बांछें खिल गयीं। जिन्ना जानते थे कि अगर ये दोनों रियासतें पाकिस्तान में सम्मिलित हो गयीं तो अन्य राजपूत रियासतें भी पाकिस्तान में सम्मिलित हो जायेंगी।

इससे पंजाब और बंगाल के बंटवारे की कमी भी पूरी हो जायेगी तथा समस्त प्रमुख रजवाड़ों को हड़पने की कांग्रेसी योजना भी विफल हो जायेगी। जिन्ना ने एक कोरे कागज पर हस्ताक्षर करके अपनी कलम के साथ जोधपुर नरेश को दे दिया और कहा कि आप इसमें जो भी शर्तें चाहें, भर सकते हैं। इसके बाद कुछ विचार विमर्श हुआ। इस पर हनवंतसिंह पाकिस्तान में मिलने को तैयार हो गये।

फिर वे जैसलमेर के महाराजकुमार की ओर मुड़े और उनसे पूछा कि क्या वे भी हस्ताक्षर करेंगे? महाराजकुमार ने कहा कि वे एक शर्त पर हस्ताक्षर करने को तैयार हैं कि यदि कभी हिंदू और मुसलमानों में झगड़ा हुआ तो जिन्ना हिन्दुओं के विरुद्ध मुसलमानों का पक्ष नहीं लंेगे। यह एक बम के फटने जैसा था जिसने महाराजा हनवंतसिंह को अचंभे में डाल दिया। जिन्ना ने हनवंतसिंह पर बहुत दबाव डाला कि वे दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दें।

जब महाराजकुमार जैसलमेर ने पाकिस्तान में विलय से मना कर दिया तो महाराजा डांवाडोल हो गये। इस अवसर का लाभ उठाकर महाराजा के ए. डी. सी. कर्नल केसरीसिंह ने महाराजा को सलाह दी कि वे अंतिम निर्णय लेने से पहले अपनी माताजी से भी सलाह ले लें। महाराजा को यह बहाना मिल गया और उन्होंने यह कह कर जिन्ना से विदा ली कि वे इस विषय में सोच समझ कर अपने निर्णय से एक-दो दिन में अवगत करायेंगे।

कर्नल केसरीसिंह ने जोधपुर लौटकर प्रधानमंत्री सी. एस. वेंकटाचार को तथ्यों से अवगत करवाया। षड़यंत्र की गंभीरता को देखकर वेंकटाचार ने 6 अगस्त 1947 को बीकानेर राज्य के प्रधानमंत्री सरदार पन्निकर के पास पत्र भिजवाया। पत्र में लिखा था कि भोपाल नवाब महाराजा जोधपुर को जिन्ना से मिलाने ले गये थे। जिन्ना ने पेशकश की थी कि वे जोधपुर को स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता देकर संधि करने को तैयार हैं।

उन्होंने यह भी पेशकश की कि जोधपुर राज्य को जो हथियार चाहिये वे पाकिस्तान के बंदरगाह से बिना ‘सीमांत-कर’ दिए, लाये जा सकते हैं। जिन्ना ने महाराजा जोधपुर को राजस्थान का सर्वेसर्वा बनाने की पेशकश की जिससे जोधपुर महाराजा चकित रह गये और उनके मन में इच्छा जागी कि वे राजस्थान के सम्राट बन जायेंगे। महाराजा के सेक्रेटरी कर्नल केसरीसिंह जिन्ना के निवास पर महाराजा के साथ गये थे किंतु उन्हें अंदर नहीं जाने दिया गया।

अतः उन्हें पूरी शर्तों के बारे में पता नहीं था। जब महाराजा दूसरे दिन भोपाल नवाब के साथ जिन्ना से मिलने गये तो संधि का प्रारूप हस्ताक्षरों के लिए तैयार था। उस समय महाराजा ने केसरीसिंह से कहा कि मैं संधि पर हस्ताक्षर करके राजस्थान का बादशाह हो जाउंगा। केसरीसिंह ने उन्हें समझाया कि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिये और ऐसा करने से पहले अपनी माता व अन्य सम्बन्धियों से विचार विमर्श करना चाहिये।

इस पर महाराजा ने यह आश्वासन देकर जिन्ना से विदा ली कि वे अपने परिवार के अन्य सदस्यों से सलाह करके 8 अगस्त को संधि पर हस्ताक्षर करेंगे। केसरीसिंह ने भी इस आश्वासन को दोहराया। जोधपुर लौटकर हनवंतसिंह ने सरदार समंद पैलेस में राज्य के जागीरदारों की एक बैठक बुलायी तथा उनकी राय जाननी चाही। दामली ठाकुर के अतिरिक्त और कोई जागीरदार भारत सरकार से संघर्ष करने के लिए तैयार नहीं हुआ।

महाराजा तीन दिन जोधपुर में रहे। पाकिस्तान में मिलने के प्रश्न पर जोधपुर के वातावरण में काफी क्षोभ था। जब हनवंतसिंह तीन दिन बाद दिल्ली लौटे तो मेनन को बताया गया कि यदि मेनन ने महाराजा को शीघ्र नहीं संभाला तो वे पाकिस्तान में मिल सकते हैं। मेनन ने माउंटबेटन से निवेदन किया कि वे जोधपुर महाराजा को भारत में सम्मिलित होने के लिए सहमत करें।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महाराजा हनवंतसिंह

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वी. पी. मेनन इंपीरियल होटल गये और महाराजा हनवंतसिंह से कहा कि लॉर्ड माउंटबेटन उनसे बातचीत करना चाहते हैं। इसके बाद वी. पी. मेनन महाराजा हनवंतसिंह को लेकर वायसराय भवन गये। वायसराय ने अपने आकर्षक व्यक्त्त्वि एवं दृढ़ निश्चय से महाराजा से इस प्रकार बात की जैसे कोई अध्यापक अपने अनुशासनहीन छात्र को समझाता है। उन्होंने महाराजा से कहा कि उन्हें अपने राज्य को पाकिस्तान में मिलाने का पूरा अधिकार है किंतु उन्हें इसके परिणामों का भी ध्यान रखना चाहिये।

वे स्वयं हिन्दू हैं एवं उनकी अधिकांश प्रजा हिन्दू है। महाराजा हनवंतसिंह का यह कदम इस सिद्धांत के विरुद्ध होगा कि भारत के टुकड़े केवल दो भागों में होंगे जिनमें से एक मुस्लिम देश होगा और दूसरा गैर मुस्लिम देश। उनके पाकिस्तान में विलय से जोधपुर में सांप्रदायिक दंगे होंगे। कांग्रेस के भी आंदोलन करने की संभावना है। महाराजा ने माउंटबेटन को बताया कि जिन्ना ने खाली कागज पर अपनी शर्तें लिखने के लिए कहा है जिन पर जिन्ना हस्ताक्षर कर देंगे।

इस पर मेनन ने कहा कि मैं भी ऐसा कर सकता हूँ किंतु उससे महाराजा को ठीक उसी तरह कुछ भी प्राप्त नहीं होगा जिस तरह जिन्ना के हस्ताक्षरों के बावजूद महाराजा को पाकिस्तान से कुछ नहीं मिलेगा। इस पर माउंटबेटन ने मेनन से कहा कि मेनन भी जिन्ना की तरह महाराजा को कुछ विशेष रियायतें दें। महाराजा हनवंतसिंह ने अपने राज्य का विलय भारत में करने की बात मान ली और प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर दिए। महाराजा तथा मेनन के बीच कुछ विशेषाधिकारों पर सहमति हुई जिन्हें लिखित रूप में आ जाने पर मेनन स्वयं जोधपुर लेकर गये।

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8 अगस्त 1947 को माउंटबेटन द्वारा भारत सचिव को भेजे गये प्रतिवेदन में कहा गया कि जोधपुर के प्रधानमंत्री वेंकटाचार ने सूचित किया है कि- ‘जोधपुर के युवक महाराजा ने दिल्ली में वायसराय के साथ दोपहर का खाना खाने के पश्चात् यह कहा था कि वे भारतीय संघ में मिलना चाहते हैं परंतु इसके तुरंत बाद ही धौलपुर महाराजा ने जोधपुर महाराजा को दबाया कि वे भारतीय संघ में सम्मिलित नहीं हों। जोधपुर महाराजा को जिन्ना के पास ले जाया गया और नवाब भोपाल तथा उनके वैधानिक सलाहकार जफरुल्ला खाँ की उपस्थिति में जिन्ना ने यह पेशकश की कि यदि महाराजा 15 अगस्त को अपने राज्य को स्वतंत्र घोषित कर दें तो उन्हें ये रियायतें दी जायेंगी-

(1)कराची के बंदरगाह की समस्त सुविधाएं  जोधपुर राज्य को दी जायेंगी। (2) जोधपुर राज्य को शस्त्रों का आयात करने दिया जायेगा। (3) जोधपुर-हैदराबाद (सिंध) रेलवे पर जोधपुर का अधिकार होगा। (4) जोधपुर राज्य के अकाल ग्रस्त जिलों के लिए पूरा अनाज उपलब्ध करवाया जायेगा।

……. महाराजा अब भी यह सोचते हैं कि जिन्ना द्वारा की गयी पेशकश सर्वोत्तम है और उन्होंने भोपाल नवाब को तार द्वारा सूचित किया है कि उनकी स्थिति अनिश्चित है और वे उनसे 11 अगस्त को मिलेंगे।

7 अगस्त को महाराजा हनवंतसिंह बड़ौदा गये जहाँ उन्होंने महाराजा गायकवाड़ को समझाया कि प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर नहीं करें। भोपाल नवाब भी प्रयास कर रहे हैं कि जोधपुर, कच्छ व उदयपुर के नरेश भी प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर नहीं करें। मैंने (माउण्टबेटन ने) जोधपुर के महाराजा को इस विषय पर तार भेजा है कि वे शीघ्रातिशीघ्र आकर मुझसे मिलें। मुझे सबसे अधिक दुःख इस बात का है कि भोपाल नवाब मेरे मुँह पर तो मित्र की भांति व्यवहार करते हैं परंतु पीठ पीछे मेरी योजना को विफल करने का षड़यंत्र करते हैं। मैं उनकी चालाकियों के विषय में उनके दिल्ली आने पर स्पष्ट बात करूंगा।’

11 अगस्त 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने देशी राज्यों के नरेशों से वार्तालाप किया तथा नवाब भोपाल से उस सूचना पर स्पष्टीकरण मांगा जो सरदार पटेल को प्राप्त हुई थी, जिसके अनुसार नवाब ने जोधपुर महाराजा पर दबाव डाला था कि वे उनके साथ चलकर जिन्ना से मिलें।

भोपाल नवाब ने अपने उत्तर में वायसराय को सूचित किया- ‘6 अगस्त को महाराजा धौलपुर व दो अन्य राजाओं ने मुझे सूचना दी कि महाराजा जोधपुर मुझसे (भोपाल नवाब से) मिलना चाहते हैं। मैंने (नवाब ने) उन्हें उत्तर दिया कि मुझे उनसे मिलकर प्रसन्नता होगी। जब महाराजा मेरे पास आये तो उन्होंने कहा कि वे जिन्ना से शीघ्र मिलकर उनकी शर्तों का ब्यौरा जानना चाहते हैं। जिन्ना दिल्ली छोड़कर हमेशा के लिए कराची जाने वाले थे। इस कारण अत्यंत व्यस्त थे। फिर भी मैंने महाराजा के लिए साक्षात्कार का समय ले लिया। हमें दोपहर बाद का समय दिया गया जिसकी सूचना महाराजा को भिजवा दी गयी।

महाराजा मेरे निवास स्थान पर तीसरे पहर आये और हम दोनों जिन्ना से मिलने गये। महाराजा ने जिन्ना से पूछा कि जो राजा पाकिस्तान से सम्बन्ध स्थापित करना चाहते हैं, उनको वे क्या रियायत देंगे? जिन्ना ने उत्तर दिया कि मैं पहले ही यह स्पष्ट कर चुका हूँ कि हम राज्यों से संधि करेंगे और उन्हें अच्छी शर्तें देकर स्वतंत्र राज्य की मान्यता देंगे। फिर महाराजा ने बंदरगाह की सुविधा, रेलवे का अधिकार, अनाज तथा शस्त्रों के आयात के विषय में वार्त्ता की। वार्त्ता के दौरान इस बात की कोई चर्चा नहीं हुई कि वे प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करें या न करें।

मैं इस साक्षात्कार के बाद भोपाल लौट गया जहाँ मुझे महाराजा धौलपुर का टेलिफोन पर संदेश मिला कि महाराजा जोधपुर शनिवार (9 अगस्त) को दिल्ली लौट रहे हैं अतः मुझे (नवाब को) दिल्ली पहुँच जाना चाहिये। मैं शनिवार को दिल्ली पहुँचा तो हवाई अड्डे पर मुझे महाराजा का संदेश मिला कि मैं सीधे महाराजा जोधपुर के निवास स्थान पर पहुँचूं। वहाँ पहुँचने पर महाराजा धौलपुर ने कहा कि मुझे कुछ प्रतीक्षा और करनी पड़ेगी क्योंकि जोधपुर महाराजा वायसराय से मिलने गये हुए हैं और कुछ ही देर में लौटने वाले हैं परंतु महाराजा वायसराय के पास अधिक समय तक ठहर गये और हमारे पास आने का समय नहीं मिला।

उन्होंने टेलिफोन द्वारा यह संदेश भिजवाया कि वे जोधपुर जा रहे हैं और संध्या को वापस लौटेंगे….शनिवार संध्या को महाराजा धौलपुर आये और कहा कि जोधपुर महाराजा अभी तक नहीं लौटे हैं, प्रतीत होता है कि वे रविवार सवेरे लौटेंगे। रविवार (10 अगस्त) को लगभग डेढ़ बजे मुझे धौलपुर नरेश का निमंत्रण मिला कि मैं उनके (धौलपुर नरेश के) साथ दोपहर के खाने पर सम्मिलित होऊं। वहाँ पहुँचने पर पता चला कि जोधपुर नरेश भी वहाँ थे। वे अपने गुरु को साथ लेकर आये थे।

महाराजा ने मुझसे उनका परिचय करवाते हुए कहा कि ये मेरे दार्शनिक व मार्गदृष्टा हैं। जिन्ना से भेंट के बाद मैं उसी दिन जोधपुर महाराजा से मिला था। महाराजा ने कहा कि हम लोग उनके गुरु से बातचीत करें। धौलपुर व अन्य राजाओं ने गुरु से विस्तृत वार्तालाप किया जिसमें मैंने बहुत कम भाग लिया। जब मैं विदा लेने लगा तो महाराजा जोधपुर ने कहा कि वे सोमवार (11 अगस्त) को सवेरे मुझसे मिलने आयेंगे। अपने निश्चय के अनुसार वे सोमवार 10 बजे मुझसे मिलने आये तथा कहा कि उनके गुरु अभी किसी निर्णय पर नहीं पहुँचे हैं परंतु स्वयं उन्होंने निर्णय कर लिया है कि वे भारतीय संघ में ही रहेंगे। मैंने महाराजा हनवंतसिंह से कहा कि आप अपने राज्य के मालिक हैं और कुछ भी निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं।’

महाराजा हनवंतसिंह की भूमिका

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जिस समय मुहम्मद अली जिन्ना और भोपाल नवाब हमीदुल्ला खाँ हिन्दू राज्यों को पाकिस्तान में मिलाने का प्रयास कर रहे थे, उस समय जोधपुर नरेश हनवंतसिंह ने जिन्ना से भेंट की। इस कारण महाराजा महाराजा हनवंतसिंह की भूमिका विवादास्पद हो गई!

वायसराय लॉर्ड माउण्टबेटन ने भोपाल नवाब हमीदुल्ला खाँ द्वारा भेजे गये तथ्यों को सही माना है। महाराजा शीर्षक से लिखी गई एक पुस्तक के लेखक ओंकारसिंह ने इस विवरण के आधार पर यह माना है कि जिन्ना और जोधपुर नरेश की भेंट के समय कर्नल केसरीसिंह महाराजा के साथ नहीं थे अन्यथा भोपाल नवाब ने उनका उल्लेख अवश्य किया होता।

ओंकारसिंह के अनुसार अवश्य ही केसरीसिंह ने यह मिथ्या भ्रम फैलाया था कि इस भेंट के दौरान केसरीसिंह भी उपस्थित थे और इसी भ्रम के कारण मानकेकर और पन्निकर आदि ने तथ्यों को विकृत कर दिया है। इन विकृत तथ्यों के कारण महाराजा हनवंतसिंह की भूमिका और अधिक विवादास्पद दिखाई देती है।

16 अगस्त 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन द्वारा भारत सचिव को अपना अंतिम प्रतिवेदन भेजा गया जिसके अनुच्छेद 41 में कहा गया-

‘8 अगस्त को मैंने महाराजा जोधपुर को बुलाया तो वे उसी रात्रि को विलम्ब से जोधपुर से दिल्ली पहुंचे और अगले दिन सेवेरे (9 अगस्त को) मुझसे मिले। महाराजा ने निःसंकोच स्वीकार किया कि वे जिन्ना से मिले थे और नवाब भोपाल का विवरण सही है। पटेल को जब जोधपुर महाराजा की चाल का पता चला तो वे महाराजा को मनाने के लिए किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार हो गये। पटेल ने यह बात मान ली कि महाराजा जोधपुर राज्य में बिना किसी रुकावट के शस्त्रों का आयात कर सकेंगे। राज्य के अकालग्रस्त जिलों को पूरे खाद्यान्न की आपूर्ति की जायेगी और इस हेतु भारत के अन्य क्षेत्रों की अवहेलना की जायेगी। महाराजा द्वारा जोधपुर रेलवे की लाइन कच्छ राज्य के बंदरगाह तक मिलाने में कोई रुकावट नहीं की जायेगी। पटेल की इस स्वीकृति से महाराजा संतुष्ट हो गये और उन्होंने निश्चय किया कि वे भारत के साथ रहेंगे।’

ओंकारसिंह का मानना है कि महाराजा हनवंतसिंह न तो पाकिस्तान में मिलना चाहते थे और न ही राजस्थान के सम्राट बनना चाहते थे अपितु वे तो अपने राज्य के लिए अधिकतम सुविधायें प्राप्त करने के लिए सरदार पटेल पर दबाव बनाना चाहते थे। यदि ओंकारसिंह का स्पष्टीकरण स्वीकार कर लिया जाए तब भी इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि भारत सरकार को बताए बिना जिन्ना से से की गई भेंट के कारण महाराजा हनवंतसिंह की भूमिका विवादास्पद हो गई।

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स्वतंत्रता सेनानी प्रवीण चंद्र छाबड़ा के अनुसार यदि सरदार पटेल ने जोधपुर महाराजा को गिरफ्तार करने की चेतावनी नहीं दी जोती तो इतिहास अन्य भी हो सकता था। गोकुल भाई भट्ट ने लिखा है- ‘तब जोधपुर का मामला बहुत पेचीदा हो रहा था, क्योंकि जोधपुर के महाराजा की पाकिस्तान के साथ सांठ-गांठ हो रही थी। उनसे पत्र-व्यवहार भी हुआ था। समझौते का मसौदा भी तैयार हो गया था। वहाँ से कुछ एक्ट्रैस (अभिनेत्रियां) भी भेजी गई थीं। इस तरह से बहुत कुछ हुआ था।’

सरदार पटेल ने जोधपुर महाराजा को दिल्ली बुलाया और कहा- ‘क्या पाकिस्तान के साथ जाना है आपको? तो वे घबरा गए, कुछ जवाब नहीं दे पाए और सरदार ने जरा कड़ाई से कहा कि देखिए! अगर आपको जाना है तो आपको भेज दूँ, रियासत नहीं जाएगी। इस प्रकार कुछ डांट-डपट भी की गई। राजमाता ने जब यह सुना कि हनुवंतसिंह को इस तरह सरदार ने कहा है तो उन्होंने मुझसे (गोकुल भाई भट्ट से) कहा कि व्यक्तिगत रूप से गोकुल भाई आप ही ध्यान रखिए कि कोई ऐसी बात न हो। अपने को तो देश के साथ, भारत के साथ रहना है और मेरे लड़के ने कुछ भी किया हो या नहीं किया हो, उसे भूल जाना चाहिए। सरदार साहब उसके ऊपर इतना कुछ न करें। रूआंसी माँ ने भट्टजी से अनुरोध किया कि मेरे सिर पर हाथ रखिए और इसमें मदद करें, ये सब बातें तो हैं। आखिर जोधपुर महाराजा ने मान लिया और भारत संघ में विलय के पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए।’

उपरोक्त तथ्यों के आलोक में यह कहा जा सकता है कि जोधपुर नरेश अवश्य ही भोपाल नवाब और महाराजराणा धौलपुर की चाल में फँस कर उन संभावनाओं का पता लगाने के लिए जिन्ना तक पहुँच गये थे कि उनका अधिक लाभ किसमें है, भारत संघ में मिलने में, पाकिस्तान में मिलने में अथवा इन दोनों देशों से स्वतंत्र रहकर अलग अस्तित्व बनाये रखने में?

गणेश प्रसाद बरनवाल ने लिखा है- ‘जोधपुर और त्रावणकोर के हिन्दू राजाओं ने कुछ अलगाववादी चालाकियां करनी चाहीं किंतु पटेल की सजगता ने उन्हें पानी-पानी कर दिया।’

सबसे पहले सुमनेश जोशी ने जोधपुर से प्रकाशित समाचार पत्र ‘रियासती’ में जोधपुर नरेश के पाकिस्तान में मिलने के इरादे का भण्डाफोड़ किया। 20 अगस्त 1947 के अंक में ‘राजपूताने के जागीरदारों और नवाब भोपाल के मंसूबे पूरे नहीं हुए’ शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार जोधपुर राज्य के संघ प्रवेश से जो प्रसन्नता यहाँ के राजनैतिक क्षेत्र में हुई है उसके पीछे आश्चर्य भी है कि नये महाराजा ने बावजूद अपने तिलकोत्सव के भाषण के, संघ प्रवेश में क्यों हिचकिचाहट दिखायी?

भोपाल नवाब ने हवाई जहाजों के जरिये 16 रियासतों के साथ सम्पर्क कायम करने का प्रयास किया। उन्होंने जोधपुर के मामले में इसलिए कामयाबी हासिल कर ली क्योंकि उनके चारों तरफ जागीरदार थे जो रियासत को पाकिस्तान में मिलाने के पक्ष में थे। जैसा कि महाराजा साहब के ननिहाल ठिकाने के प्रेस से प्रकाशित क्षत्रिय वीर के एक लेख में इशारा था, पाकिस्तान जागीरी प्रथा के प्रति उदार है जबकि हिन्दुस्तान इस प्रथा को उठाना चाहता है।

अतः पैलेस के जागीरदार स्वभावतः हिन्दुस्तान से पाकिस्तान को ज्यादा पंसद करते हैं। इससे जोधपुर रियासत की काफी बदनामी हुई है। हिन्दुस्तान यूनियन से दूर रहने का जो षड़यंत्र किया गया था उसमें यह भी प्रचारित किया गया था कि सर स्टैफर्ड क्रिप्स हिन्दुस्तान आयेंगे तथा उनसे बातचीत करके रियासतों का सम्बन्ध सीधा इंगलैण्ड से करवा दिया जायेगा। इस नाम पर बहुत लोग बेवकूफ बनने वाले थे।

अतः और लोगों को भी पाकिस्तान की तरफ से स्वतंत्र रहने का लोभ दिया गया। जोधपुर की अस्थायी हिच, इन समस्त बातों का सामूहिक परिणाम था। जाम साहब के पास भी भोपाल का संदेश गया था पर उन्होंने उसे ठुकरा दिया। उदयपुर महाराजा के पास जोधपुर का संदेश गया जिसका महाराणा ने कड़ा उत्तर दिया। ऐसेम्बली लॉबी में भी जोधपुर का यूनियन में प्रवेश अत्यंत चर्चा का विषय है।

इतिहास में बहुत से तथ्य ऐसे होते हैं जिनके बारे में सही या गलत का निर्णय करना कठिन होता है। महाराजा हनवंतसिंह की भूमिका के सम्बन्ध में ठीक ऐसा ही हुआ था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

थारपारकर

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जोधपुर राज्य के पश्चिमी भाग में थारपारकर नामक एक भौगोलिक एवं सास्कृतिक क्षेत्र था। इस क्षेत्र में आबादी कम थी तथा यह सोढ़ा राजपूतों द्वारा शासित क्षेत्र था। सोढ़ा राजपूत विख्यात परमारा राजपूतों की ही एक शाखा थे जो अपने किसी पूर्वज के नाम पर सोढ़ा कहलाने लगे थे। जब भारत को आजादी मिली तो रैडक्लिफ आयोग ने थारपारकर को पाकिस्तान में मिला दिया। इससे सोढ़ा राजपूतों में बड़ी बेचैनी फैली।

थारपारकर के इतिहास की चर्चा करने से पहले हमें दिल्ली में जोधपुर महाराजा हनवंतसिंह, मुहम्मद अली जिन्ना एवं सरदार पटेल के बीच चल रही रस्साकशी पर चर्चा करनी होगी जिसके सम्बन्ध में हम विगत कुछ कड़ियों में चर्चा कर आए हैं।

रियासती विभाग के सचिव की कनपटी पर पिस्तौल

जब 9 अगस्त 1947 को वी. पी. मेनन महाराजा हनवंतसिंह को लेकर वायसराय के पास गये तथा वायसराय के कहने पर मेनन ने महाराजा को विशेष रियायतें देने की बात मान ली तब वायसराय ने मेनन से कहा कि वे महाराजा से प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर करवा लें और वायसराय हैदराबाद के प्रतिनिधि मण्डल से मिलने अंदर चले गये।

वायसराय की अनुपस्थिति में महाराजा ने एक रिवॉल्वर निकाली और मेनन से कहा कि- ‘यदि तुमने जोधपुर की जनता को भूखों मारा तो मैं तुम्हें कुत्ते की मौत मार दूंगा परंतु महाराजा ने प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर दिए। मेनन के अनुसार हनवंतसिंह द्वारा प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर कर देने के बाद माउंटबेटन दूसरे कमरे से चले गये और महाराजा ने अपना रिवॉल्वर निकालकर मेनन की तरफ करके कहा- ‘मैं तुम्हारे संकेत पर नहीं नाचूंगा।’

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मेनन ने कहा कि- ‘यदि आप सोचते हैं कि मुझे मारकर या मारने की धमकी देकर प्रविष्ठ संलेख को समाप्त कर सकते हैं तो यह आपकी गंभीर भूल है। बच्चों जैसा नाटक बंद कर दें। इतने में ही माउंटबेटन लौट आये। मेनन ने उन्हें पूरी बात बतायी। माउंटबेटन ने इस गंभीर बात को हलका करने का प्रयत्न किया और हँसी-मजाक करने लगे। जब तक जोधपुर नरेश की मनोदशा सामान्य हो गयी। मैं उन्हें छोड़ने के लिए उनके निवास तक गया।’

ओंकारसिंह के अनुसार महाराजा के पास रिवॉल्वर नहीं, एक छोटा पैन-पिस्तौल था जिसे उन्होंने स्वयं ही बनाया था। इसी पैन-पिस्तौल से उन्होंने प्रविष्ठ संलेख पर हस्ताक्षर किए थे। हस्ताक्षर करने के पश्चात् महाराजा ने मजाक में मेनन से कहा था कि मैंने जिस पैन से हस्ताक्षर किए हैं, उसी से तुम्हें भी मार सकता हूँ। मेनन भयभीत हो गये। इस पर महाराजा खूब हँसे। जब महाराजा ने पैन का एक हिस्सा खोलकर बताया कि वह पैन, पिस्तौल का भी काम कर सकता है तो मेनन भौंचक्के रह गये।

उसी समय लॉर्ड माउंटबेटन कमरे में दाखिल हुए। उन्होंने सारे प्रकरण को परिहास के रूप में लिया। महाराजा हनवंतसिंह ने ये तथ्य नवम्बर 1947 में ओंकारसिंह को बताये थे। महाराजा ने यह पैन-पिस्तौल लॉर्ड माउंटबेटन को दे दिया। माउंटबेटन उसे लंदन ले गये तथा लंदन के मैजिक सर्कल के संग्रहालय में रखने हेतु भेंट कर दिया। यह पैन-पिस्तौल आज भी लंदन में सुरक्षित है। अंत में महाराजा को विलय पत्र पर हस्ताक्षकर करने पड़े।

सोढ़ों का थारपारकर पाकिस्तान में चला गया

सिंध में सोढ़ा हिन्दू राजपूतों का सदियों पुराना ऊमरकोट नामक राज्य था। मुगलों के भारत आगमन से पूर्व से लेकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी से समझौता होने तक ऊमरकोट क्षेत्र जोधपुर राज्य का भाग था और एक संधि के अंतर्गत भारत की आजादी से लगभग एक शताब्दी पूर्व ब्रिटिश सरकार को दिया गया था। जोधपुर महाराजा उम्मेदसिंह इसे फिर से प्राप्त करने के लिए प्रयत्नरत रहे थे किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली। जब भारत विभाजन योजना स्वीकार कर ली गयी तो सिंध के सोढ़ा राजपूतों के एक शिष्टमंडल ने जोधपुर आकर महाराजा हनवंतसिंह से प्रार्थना की कि सिंध प्रांत के थारपारकर जिले को भारत व जोधपुर राज्य में मिलाने का प्रयत्न करें।

हनवंतसिंह ने वायसराय को लिखा कि ऊमरकोट को फिर से जोधपुर राज्य को लौटाया जाये परंतु वायसराय ने यह कहकर इस विषय पर विचार करने से इन्कार कर दिया कि देश के विभाजन व स्वतंत्रता के दिन निकट हैं और सीमा के सारे विवाद रैडक्लिफ आयोग के विचाराधीन हैं अतः अब इस विषय में कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती।

सोढ़ा राजपूतों ने इस विषय पर एक पत्र केंद्र सरकार को लिखा और उसकी प्रतिलिपियां नेहरू को भी दीं कि उनकी भाषा व संस्कृति मारवाड़ राज्य की भाषा और संस्कृति से काफी मिलती है। उनके अधिकांश विवाह सम्बन्ध भी जोधपुर राज्य में होते रहे हैं। अतः उनके क्षेत्र को जोधपुर राज्य में मिला दिया जाये। सोढ़ों की इस मांग का समर्थन अखिल भारतीय हिन्दू धर्मसंघ ने भी किया। धर्मसंघ की मांग थी कि हिन्दू बहुलता के आधार पर सिंध प्रांत के दो टुकड़े कर दिए जायें एवं नवाबशाह, हैदराबाद, थारपारकर तथा कराची जिले के एक भाग को जोधपुर राज्य में मिला दिया जाये। सिंध की प्रांतीय कांग्रेस ने भी इस मांग का समर्थन किया।

सिंध प्रांतीय कांग्रेस के अध्यक्ष डा. चौइथराम गिडवाणी ने भारत सरकार से अपील की कि थारपारकर जिले में हिन्दुओं का स्पष्ट बहुमत है अतः उसे जोधपुर राज्य में मिलाना न्यायसंगत होगा। महाराजा हनवंतसिंह ने दिल्ली में अनेक नेताओं से बातचीत की किंतु इस विषय पर श्यामाप्रसाद मुखर्जी के अतिरिक्त किसी अन्य नेता ने रुचि नहीं ली। मुखर्जी केंन्द्रीय मंत्रिमण्डल में अल्पमत में थे अतः उनके प्रयासों का कोई परिणाम नहीं निकला और सोढ़ा हिन्दू जागीरदारों का सदियों पुराना थारपारकर राज्य सदैव के लिए पाकिस्तान में चला गया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हिन्दू शरणार्थियों की समस्या

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जोधपुर राज्य में पाकिस्तान से आए हिन्दू शरणार्थियों की समस्या

पाकिस्तान से लगने वाली 325 किलोमीटर लम्बी सीमा पर शरणार्थियों का तांता लगा हुआ था। जोधपुर राज्य की सरकार ने हिन्दू शरणार्थियों की समस्या को बहुत ही सामान्य ढंग से सुलझाने का प्रयास किया। इसका सबसे बड़ा कारण महाराजा हनवंतसिंह का दिल्ली की राजनीति में व्यस्त होना था। जोधपुर राज्य के कर्मचारियों में घूसखोरी का बोलबाला था। इस कारण हन्दू शरणार्थियों की समस्या विकराल हो गई।

28 अगस्त 1947 को मारवाड़ जंक्शन में एस. के. मुखर्जी की अध्यक्षता में एक शरणार्थी शिविर खोला गया जिसमें 2 लाख शरणार्थियों के अस्थायी निवास, भोजन, आश्रय तथा चिकित्सा सुविधायें उपलब्ध करवायी गयीं। शिविर में कई महिलाओं ने बच्चों को भी जन्म दिया जिन्हें स्वास्थ्य सेवायें उपलब्ध करवायी गयीं।

शिशुओं के लिए दूध की व्यवस्था की गयी। बहुत सी संस्थाओं तथा दानी लोगों ने इस शिविर को धन, दवायें, कपड़े तथा भोजन प्रदान किया। बहुत से लोगों ने शिविर में उपस्थित होकर निशुल्क सेवायें प्रदान कीं। महाराजा जोधपुर के अतिरिक्त बी. डी. एण्ड सी. आई. रेलवे, श्री उम्मेद मिल्स पाली तथा सोजत रोड प्रजा मण्डल ने भी शिविर को महत्त्वपूर्ण सहायता उपलब्ध करवायी।

सितम्बर 1947 में सिंध प्रांत के प्रधानमंत्री एम. ए. खुसरो ने अपने सलाहकार एवं सिंध के बड़े नेता मोहम्मद हसीम गजदर को इस आशय से जोधपुर भेजा कि वे जोधपुर के मुसलमानों को समझायें कि वे जोधपुर के सुशासित एवं शांतिपूर्ण राज्य को छोड़कर पाकिस्तान नहीं आयें। जोधपुर राज्य में आये हुए हिन्दू शरणार्थियों की समस्या सुलझाने एवं शरणार्थियों को सुविधायें देने के लिए मारवाड़ शरणार्थी एक्ट 1948 बनाया गया।

इस एक्ट के तहत पंजीकृत शरणार्थियों को मारवाड़ राज्य में मारवाड़ियों के समान अधिकारों के आधार पर नौकरियां दी गयीं। जोधपुर राज्य में लगभग 46 हजार शरणार्थी पाकिस्तान से आये जिन्हें राज्य की ओर से मकान, भूखण्ड एवं कर्ज उपलब्ध करवाये गये। शरणार्थियों के लिए राज्य की ओर से विद्यालय तथा नारी-शालायें बनायी गयीं। सिंध से आने वाले अधिकांश शरणार्थी जोधपुर नगर में ही बस गये।

उमरकोट में रहने वाले पुष्करणा ब्राह्मणों ने महाराजा जोधपुर से प्रार्थना की कि महाराजा इस क्षेत्र के पुष्करणा परिवारों को पाकिस्तान से निकालने की व्यवस्था करें क्योंकि इस क्षेत्र से बाहर निकलने के लिए केवल उँट ही एकमात्र सवारी है तथा बड़े आकार वाले गरीब पुष्करणा ब्राह्मण परिवारों के लिए उँट की पीठ पर इतना लम्बा मार्ग पार करके निकल पाना संभव नहीं है। इन परिवारों ने स्वयं को मूलतः जोधपुर राज्य के शिव एवं पोकरण क्षेत्र की प्रजा बताते हुए महाराजा से रोजगार, काश्त हेतु भूमि एवं आवास की भी मांग की।

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मीरपुरखास के डिप्टी कलक्टर कार्यालय के हैडक्लर्क शामदास ताराचंद ने महाराजा को पत्र लिखकर मांग की कि इस क्षेत्र में पुष्करणा ब्राह्मणों के परिवारों से कुल 50 व्यक्ति राजकीय सेवा में हैं उन्हें जोधपुर राज्य की सेवा में नौकरी दी जाये। इनमें से 1 डिप्टी सुपरिंटेंडेण्ट ऑफ पुलिस, 1 मैडिकल ऑफीसर, 1 नायब तहसीलदार एवं सैकेण्ड क्लास मजिस्ट्रेट, 1 सबइंसपेक्टर ऑफ पुलिस, 5 अंग्रेजी के अध्यापक, 15 हिन्दी के अध्यापक, 10 महिला अध्यापक, 4 कम्पाउण्डर, 5 पुलिस हैडकांस्टेबल तथा 5 राजस्व विभाग के लिपिक हैं।

जोधपुर से हज यात्रा पर गये हुए कुछ मुस्लिम परिवारों ने 2 अक्टूबर 1947 को मक्का से महाराजा हनवंतसिंह को लिखा कि हम अपने परिवारों को खुदा के भरोसे पर जोधपुर में छोड़कर आये थे किंतु यहाँ हमें अपने बच्चों तथा परिवारों से लगातार सूचना मिल रही है कि जोधपुर राज्य में उनकी जान को खतरा है। यद्यपि हमें विश्वास है कि जोधपुर राज्य के हिन्दू, मुसलमानों से झगड़ा नहीं करेंगे किंतु जोधपुर राज्य में बाहर से आने वाले सिक्खों के दबाव में वे ऐसा कर सकते हैं। अतः आपसे प्रार्थना है कि आप उनके जीवन की रक्षा करें।

इस पत्र की प्रति राजमाता को भी भेजी गयी। पाकिस्तानी नेता एच. एस. सुहरावर्दी ने 18 अक्टूबर 1947 को जोधपुर महाराजा को पत्र लिखकर जोधपुर राज्य में सांप्रदायिक स्थितियों पर कड़ी आपत्ति जताई। उसने लिखा कि मुझे शिकायत प्राप्त हुई है कि अहमदाबाद-कराची के बीच यात्रा करने वाले मुस्लिम यात्रियों को लूनी एवं हैदराबाद-सिंध के बीच स्थित बाड़मेर रेलवे स्टेशन पर लूटा जा रहा है जो कि आपके क्षेत्राधिकार में है। राजस्थान की रियासतों में शरणार्थियों की समस्याओं पर विचार करने के लिए 6 नवम्बर 1947 को भारत सरकार के गृह-मंत्रालय ने अलवर, भरतपुर, बीकानेर, जयपुर तथा जोधपुर राज्य के राजाओं की एक बैठक बुलाई।

टाण्डो मुहम्मद खान से महाराज किशनचंद्र शर्मा ने 29 अक्टूबर 1947 को पत्र लिखकर जोधपुर महाराजा से मांग की कि सिंध-हैदराबाद जिले के टाण्डो डिवीजन में 5-6 गौशालायें हैं जिनमें 1000-1500 गायें हैं। चूंकि इस क्षेत्र के सम्पन्न परिवार मारवाड़ को पलायन कर गये हैं इसलिए इन गौशालाओं की देखभाल करने वाला अब कोई नहीं है तथा गायों की स्थिति करुणा जनक है। उनके लिए 20-25 गरीब ब्राह्मण परिवार ही शेष बचे हैं। अतः आप इम्पीरियल बैंक के माध्यम से गौशालाओं के लिए धन भिजवायें।

सिंध से आये कई पुष्करणा ब्राह्मणों ने जो कि ज्योतिष का काम करते थे, हनवंतसिंह को अलग-अलग पत्र लिखकर अनुरोध किया कि हमें राजज्योतिषी नियुक्त किया जाये। इन पत्रों में इच्छा व्यक्त की गयी कि महाराजा हमसे आशीर्वाद लेने के लिए हमें बुलाये। जोधपुर महाराजा की फाइल में एक गुमनाम पत्र लगा हुआ है। यह पत्र महाराजा के निजी सचिव के कार्यालय में 18 नवम्बर 1947 को प्राप्त हुआ था।

इस पत्र में किसी व्यक्ति ने महाराजा से शिकायत की है कि जो हिन्दू शरणार्थी पाकिस्तान से आ रहे हैं उन्हें रेलवे कर्मचारियों एवं कस्टम वालों द्वारा तंग किया जा रहा है और रिश्वत मांगी जा रही है। शरणार्थियों द्वारा लाये गये सामान की मात्रा अधिक बताकर उसका किराया मांगा जा रहा है तथा पैसा न होने पर सामान छीन लिया जाता है। उधर तो हिन्दुओं को पाकिस्तान ने लूट लिया और इधर हिन्दूओं को हिन्दू ही लूट रहे हैं।

महाराजा अपने गुप्तचरों के माध्यम से पता लगवायें तथा शरणार्थियों की रक्षा करें। शरणार्थियों के साथ समानता का व्यवहार नहीं हो रहा। कल की ही बात है कि जो मुसलमान हज करके लौटे हैं उनके पास बहुत सामान था किंतु न तो कस्टम वालों ने चैक किया और न रेलवे वालों ने सामान तोल कर देखा। ऐसे ही एक टंकित गुमनाम पत्र में महाराजा को शिकायत की गयी है कि सिंध से आये शरणार्थियों को राशन एवं आवास के स्थान पर लातें और मुक्के मिल रहे हैं जबकि पाकिस्तान पहुंचने वाले शरणार्थियों को पाकिस्तान में पूरा राशन, रोजगार और सुविधायें मिल रही हैं।

जो हिन्दू अपने घरों को छोड़कर भारत भाग आये हैं, पाकिस्तानी अधिकारी उन हिन्दुओं के घरों के ताले तोड़कर उन्हें उन मकानों में घुसा रहे हैं। इसके विपरीत जोधपुर राज्य के मकान मालिक हिन्दू शरणार्थियों से 10-15-20 गुना किराया मांग रहे हैं। 6 से 12 माह तक का किराया एक साथ लिया जा रहा है। शरणार्थियों को अपने आभूषण बेचने पड़ रहे हैं। शरणार्थियों के लिए अलग से कॉलोनी बनायी जाये।

इस प्रकार जोधपुर राज्य में पाकिस्तान से आए हिन्दू शरणार्थियों की समस्या सुलझाने के लिए बहुत ही सामान्य प्रयास किए गए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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