Home Blog Page 85

बाबर की पंजाब विजय (17)

0
बाबर की पंजाब विजय - www.bharatkaitihas.com
बाबर की पंजाब विजय

बाबर (Babur) की पंजाब विजय (Babur’s Punjab Victory) उसकी अब तक की विजयों में सबसे महत्वपूर्ण थी। इतिहास की दृष्टि से बाबर की पंजाब विजय का मूल्यांकन भविष्य में होने वाली भारत विजय का पूर्वाभ्यास समझा जाना चाहिए।

17 नवम्बर 1525 को बाबर 25 हजार नौजवानों की एक सेना लेकर काबुल (Kabul) से भारत के लिए चल पड़ा। उसने बदख्शां से अपने बड़े पुत्र हुमायूँ (Humayun) को भी उसकी सेना के साथ बुलवा लिया ताकि वह भी इस अभियान पर चले। जब बाबर की सेना बीगराम पहुंची तो उसे लाहौर के शासक ख्वाजा हुसैन ने सूचना भिजवाई कि पंजाब का शासक दौलत खाँ तथा उसका पुत्र गाजी खाँ लगभग 30 हजार सैनिकों के साथ आ रहे हैं।

उन्होंने कालानूर पर अधिकार कर लिया है तथा लाहौर के लिए बढ़ रहे हैं। इस कारण बाबर ने (Babur) अपनी गति बढ़ा दी तथा 14 दिसम्बर 1525 को सिंधु नदी, 16 दिसम्बर को कचाकोट नदी और 24 दिसम्बर 1525 को झेलम नदीे पार करके पंजाब पहुंच गया।

बाबर ने इस मार्ग में स्थित जूद पर्वत का भी उल्लेख किया है जिसका प्राचीन नाम नमक की पहाड़ी था। बाबर ने इस क्षेत्र में रहने वाले बुगियालों का भी उल्लेख किया है जहाँ बरगोवह कबीला रहता था। बाद के इतिहासकारों ने इन्हें गक्खर कहा है। कुछ लोग इन्हें खोखर जाट मानते हैं।

25 दिसम्बर को बाबर ने लाहौर के लिए संदेशवाहक रवाना किए तथा वहाँ के गवर्नर को कहलवाया कि वह दौलत खाँ लोदी (Daulat Khan Lodi) की सेना से युद्ध न करे तथा सियालकोट आकर मुझसे भेंट करे।

बाबर के जासूसों ने बाबर को सूचना दी कि पंजाब के शासक दौलत खाँ लोदी (Daulat Khan Lodi) ने वृद्धावस्था के बावजूद अपनी कमर में दो तलवारें बांध ली हैं तथा उसके पुत्र गाजी खाँ ने 30-40 हजार सैनिक एकत्रित कर लिए हैं। 27 दिसम्बर 1525 को बाबर चिनाब नदी के किनारे पहुंच गया।

29 दिसम्बर 1525 को बाबर तथा उसकी सेना ने सियालकोट पहुंचकर डेरा लगाया। बाबर ने लिखा है- ‘इस इलाके में जाट तथा गूजर बड़ी संख्या में रहते हैं जो रात में सैनिक शिविरों में घुसकर बैलों तथा भैंसों की लूटमार करते हैं। वे बड़े ही अभागे तथा निष्ठुर होते हैं। हमारा उनसे अभी तक पाला नहीं पड़ा था किंतु उस रात वे हमारे शिविर में घुस गए और लूटपाट करके भाग छूटे। मैंने उनकी खोज करवाई तथा जो भी पकड़े गए, उनके टुकड़े-टुकड़े करवा दिए।’

सैयद अतहर अब्बास रिजवी ने लिखा है- ‘बाबर ने इन्हें जाट तथा जट लिखा है, ये लोग पंजाब, सिंधु नदी के तट और सिविस्तान के मुसलमान किसान थे तथा यमुना के पश्चिम एवं आगरा तथा आसपास के जाटों से इनका कोई सम्बन्ध नहीं था।’

TO READ THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

1 जनवरी 1526 को बाबर ने पंजाब के कालानूर नामक स्थान पर अधिकार कर लिया। 5 जनवरी को बाबर (Babur) तथा उसकी सेना ने मिलवट का किला घेर लिया। पंजाब का शासक दौलत खाँ लोदी (Daulat Khan Lodi) तथा उसका पुत्र गाजी खाँ इसी किले में मौजूद थे। जब दौलत खाँ को लगा कि बाबर से पार पाना कठिन है तो दौलत खाँ ने बाबर के पास प्रस्ताव भिजवाया कि- ‘मेरा पुत्र गाजी खाँ बाबर के भय से जंगलों में भाग गया है। यदि मुझे क्षमा कर दिया जाए तो मैं मिलवट का किला आपको समर्पित करने तथा आपकी सेवा में उपस्थित होने को तैयार हूँ।’ इस पर बाबर ने दौलत खाँ लोदी को अभयदान देते हुए अपने पास बुलवाया। जब दौलत खाँ बाबर के समक्ष उपस्थित हुआ तो बाबर ने उससे कहा कि वह घुटनों के बल झुककर सलाम करे। दौलत खाँ लोदी ने वैसा ही किया। इसके बाद बाबर ने एक दुभाषिये की सहायता से दौलत खाँ को फटकारा कि- ‘मैंने तुझे अपना पिता कहा, मैंने तेरी अभिलाषा से अधिक तुझे सम्मान दिया, मैंने तुझे तथा तेरे पुत्रों को बिलोचियों के दरवाजों की ठोकरें खाने से बचाया। तेरे परिवार तथा हरम को इब्राहीम लोदी की कैद से मुक्त करवाया। तातार खाँ की विलायत में तीन करोड़ तुझे प्रदान किया। मैंने तेरे साथ कौनसी बुराई की थी जो तूने इस प्रकार अपनी कमर में दोनों ओर तलवारें लटका कर मेरे राज्य पर आक्रमण किया?’

बाबर के इस कथन से ऐसा प्रतीत होता है कि जब दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) ने दौलत खाँ लोदी से नाराज होकर उसके परिवार को कैद कर लिया था तथा दौलत खाँ लोदी (Daulat Khan Lodi) बलोचों से सहायता की याचना कर रहा था। तब बाबर ने दौलत खाँ की सहायता की थी तथा दौलत खाँ को न केवल दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी के कोप से बचाया था अपितु दौलत खाँ के पिता तातार खाँ के राज्य में से हिस्सा भी दिलवाया था।

बाबर (Babur) द्वारा लिखे गए विवरण से यह भी ज्ञात होता है कि दौलत खाँ लोदी (Daulat Khan Lodi) का बड़ा पुत्र गाजी खाँ तो अपने पिता के पक्ष में था किंतु दौलत खाँ का एक अन्य पुत्र दिलावर खाँ बाबर के पक्ष में था। इस कारण दौलत खाँ ने दिलावर खाँ को काफी समय तक जेल में भी रखा था। संभवतः ई.1519 में जब बाबर सिंधु नदी को पार करके पंजाब तक आया था, संभवतः उसी समय ये घटनाएं घटी होंगी। दौलत खाँ के समर्पण के साथ ही बाबर की पंजाब विजय का कार्य सम्पन्न हो चुका था।

7 जनवरी 1526 को बाबर ने मिलवट के दुर्ग के भीतर जाकर निरीक्षण किया। वहाँ बाबर ने एक विशाल पुस्तकालय देखा। यह पुस्तकालय दौलत खाँ लोदी के पुत्र गाजी खाँ का था। बाबर ने उस पुस्तकालय की कुछ श्रेष्ठ पुस्तकें अपने पुत्र हुमायूँ (Humayun) को दे दीं तथा कुछ श्रेष्ठ पुस्तकें कांधार दुर्ग की रक्षा कर रहे अपने दूसरे पुत्र कामरान को भिजवा दीं।

बाबर को संदेह था कि गाजी खाँ जंगल में नहीं भागा है अपितु इसी दुर्ग में कहीं पर छिपा हुआ है। गाजी खाँ तो इस दुर्ग में नहीं मिला किंतु उसकी बेगमें तथा बच्चे दुर्ग में ही मौजूद थे। बाबर ने दौलत खाँ लोदी (Daulat Khan Lodi) तथा उसके कुछ अमीरों को भेरा के किले में ले जाकर बंद करने के आदेश दिए।

जब बाबर का अमीर कित्ता खाँ बेग इन लोगों को लेकर जा रहा था, तब मार्ग में सुल्तानपुर नामक स्थान पर दौलत खाँ की मृत्यु हो गई।

बाबर (Babur) ने मिलवट के दुर्ग से मिली सम्पत्ति बाकी नामक एक कर्मचारी को दी तथा उसे आदेश दिए कि- ‘वह यह सम्पत्ति लेकर बल्ख जाए तथा इसे वहाँ के सम्मानित लोगों और मेरे रिश्तेदारों को सौंप दे। साथ ही वहाँ से एक सेना लेकर तुरंत दिल्ली आ जाए।’

दौलत खाँ लोदी (Daulat Khan Lodi) पर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में, 10 जनवरी 1526 को बाबर की सेना ने जमकर शराब पी। बाबर ने लिखा है- ‘गजनी का गवर्नर ख्वाजा कलां कई ऊंटों पर शराब लदवाकर लाया था। उस रात ज्यादातर लोगों ने वही शराब पी, कुछ लोगों ने अरक भी पिया।’

अगले दिन बाबर (Babur) ने अपनी सेना का एक टुकड़ा गाजी खाँ को ढूंढने के लिए आसपास के जंगलों में भिजवाया तथा स्वयं शेष सेना के साथ दिल्ली के लिए रवाना हो गया। इसी दौरान दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) का भाई अल्लाउद्दीन लोदी अपनी सेना के साथ बाबर की शरण में आया।

इसे आलम खाँ भी कहा जाता था। बाबर ने लिखा है कि- ‘वह अपने भाई इब्राहीम लोदी से हारने के बाद पैदल तथा नंगा-बुच्चा मेरे पास पहुंचा। मैंने अपने कुछ अमीरों तथा सम्बन्धियों को उसके स्वागतार्थ घोड़ा देकर भेजा।’

अल्लाउद्दीन खाँ ने बाबर (Babur) के समक्ष उपस्थित होकर उसकी अधीनता स्वीकार की। बाबर ने उसे भी अपने साथ ले लिया। जब बाबर जसवान घाटी में पहुंचा तो दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) के कई अमीरों ने बाबर को पत्र भिजवाकर भारत विजय के लिए शुभकमानाएं प्रेषित कीं।

जसवान घाटी में कई छोटे-छोटे किले थे। हुमायूँ को इन किलों पर अधिकार करने भेजा गया। हुमायूँ (Humayun) ने न केवल इन किलों पर अधिकार कर लिया अपितु इन किलों से बड़ी राशि प्राप्त करके बाबर को समर्पित की। बाबर की पंजाब विजय ने हमेशा-हमेशा के लिए बाबर के भाग्य रूपी महल के दरवाजे खोल दिए।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हुमायूँ की हिसार विजय पर बाबर ने एक करोड़ रुपए दिए (18)

0
हुमायूँ की हिसार विजय - www.bharatkaitihas.com
हुमायूँ की हिसार विजय पर बाबर ने एक करोड़ रुपए दिए

बाबर (Babur) ने अपने बड़े पुत्र हुमायूँ (Humayun) को हिसार (Hisar) की तरफ भेजा। हुमायूँ की हिसार विजय पर बाबर ने उसे एक करोड़ रुपए का पुरस्कार दिया।

दौलत खाँ लोदी (Daulat Kahan Lodi) की पराजय के साथ ही बाबर की पंजाब विजय (Babur’s Hisar Victory) का कार्य पूरा हो चुका था किंतु फिर भी बाबर ने अपने सेनापतियों को पंजाब के विभिन्न क्षेत्रों पर आक्रमण करने भेजा ताकि स्थानीय शासकों को भी अधीन किया जा सके।

जनवरी 1526 में पंजाब के शासक दौलत खाँ लोदी (Daulat Kahan Lodi) का पुत्र गाजी खाँ जंगलों में भाग गया तथा दौलत खाँ ने बाबर की अधीनता स्वीकार कर ली। बाबर ने दौलत खाँ को बंदी बनाकर भेरा के किले में भेज दिया किंतु मार्ग में ही दौलत खाँ की मृत्यु हो गई। पंजाब के शासक का इस प्रकार समाप्त हो जाना, बाबर के लिए बहुत लाभप्रद सिद्ध हुआ। अब पंजाब से लेकर दिल्ली तक के मार्ग में एक भी ऐसी शक्ति नहीं बची थी जो बाबर का मार्ग रोक पाती।

बाबर काबुल (Kabul) से 25 हजार सैनिक लेकर चला था। अपनी आत्मकथा में बाबर ने बड़ी चालाकी से अपने सैनिकों की यही संख्या बताई है। उसमें गजनी के गवर्नर ख्वाजा कलां की सेना तथा बदख्शां (Badakhshan) के गवर्नर हुमायूँ (Humayun) की सेना को बाबर ने अपनी सेना में नहीं जोड़ा है। क्योंकि ये सेनाएं बाद में बाबर की सेना से आकर मिली थीं।

अब तो दौलत खाँ लोदी (Daulat Kahan Lodi) के पुत्र दिलावर खाँ की सेना भी बाबर के साथ हो गई थी, उसकी संख्या भी बाबर ने नहीं जोड़ी। इब्राहीम लोदी का भाई आलम खाँ भी अपने सैनिक लेकर बाबर से आ मिला, उनकी संख्या भी नहीं जोड़ी गई। अफगान अमीर बिबन के सैनिकों की संख्या भी इसमें नहीं जोड़ी गई।

इस दौरान बाबर (Babur) के मामा सुल्तान अहमद चगताई के पुत्र भी अपनी सेना लेकर बाबर की सेवा में आ गए थे, उन सैनिकों की संख्या भी बाबर के सैनिकों की संख्या में नहीं जोड़ी गई। यदि इन सबके सैनिकों की संख्या जोड़ ली जाए तो बाबर के सैनिकों की संख्या पच्चीस हजार से बहुत अधिक बैठती है।

दूसरी ओर बाबर ने इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) के सैनिकों की संख्या एक लाख बताई है जबकि कुछ समय पहले ही इब्राहीम लोदी तथा उसके अमीरों के बीच भयानक संघर्ष हुआ था जिसमें कई हजार तुर्की सैनिक मारे गए थे। इसलिए इब्राहीम के पास मुट्ठी भर सैनिक ही बचे थे जिनमें ग्वालियर का राजा विक्रमादित्य तोमर प्रमुख था।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

संभवतः संख्याओं के गड़बड़-झाले से बाबर यह दिखाना चाहता था कि उसने 25 हजार सैनिकों के बल पर एक लाख सैनिकों को परास्त कर दिया। बाबर ने लिखा है कि इब्राहीम लोदी के अमीरों एवं वजीरों के हाथियों की संख्या एक हजार थी। यह बात भी नितांत मिथ्या है। जब बाबर की सेना सरहिंद के निकट करनाल पहुंची तो एक व्यक्ति बाबर की सेवा में उपस्थित हुआ। उसने स्वयं को इब्राहीम लोदी का दूत बताया। उसके पास इब्राहीम का कोई पत्र नहीं था किंतु उसने बाबर से निवेदन किया कि मेरे सुल्तान ने कहलवाया है कि बाबर अपने दूत इब्राहीम लोदी की सेवा में भेजे। इस पर बाबर ने अपने कुछ आदमी उसके साथ भेज दिए। जब ये लोग इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) के पास पहुंचे तो इब्राहीम लोदी ने उन्हें बंदी बना लिया। इससे स्पष्ट है कि जो व्यक्ति स्वयं को इब्राहीम का दूत बता रहा था, वह झूठ बोल रहा था। इस झूठ के पीछे उसका क्या उद्देश्य था, इसका पता नहीं चलता। 25 फरवरी 1526 को कित्ता खाँ बेग बदख्शां से एक सेना लेकर अम्बाला में बाबर से आ मिला। बिबन नामक एक अफगान भी अपनी सेना लेकर इसी स्थान पर बाबर की सेना से आ मिला। वह बाबर की तरफ से लड़ने के लिए आया था।

बाबर ने लिखा है कि- ‘ये अफगान बड़े गंवार तथा मूर्ख थे।’

बाबर ने ऐसा इसलिए लिखा है क्योंकि बाबर के समक्ष कोई बैठने की हिम्मत नहीं करता था किंतु बिबन ने बाबर के समक्ष बैठने की अनुमति मांगी। बाबर ने बिबन की असभ्यता की अनदेखी करके, उसकी बात का जवाब नहीं दिया।

बाबर ने लिखा है- ‘बिबन को इतना ज्ञान भी नहीं था कि दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी का भाई अल्लाउद्दीन खाँ और पंजाब के शासक दौलत खाँ लोदी (Daulat Kahan Lodi) का पुत्र दिलावर खाँ भी मेरे समक्ष अदब से खड़े हुए थे।’

जब बाबर करनाल में ठहरा हुआ था तब हुमायूँ को हमीद खाँ नामक किसी तुर्क सरदार के विरुद्ध अभियान करने भेजा गया। हुमायूँ (Humayun) ने हमीद खाँ की सेना को परास्त कर दिया तथा उसके एक सौ सैनिकों को बंदी बना लिया। उसने हमीद खाँ के 7-8 हाथी भी पकड़ लिए। जब हुमायूँ ने इन बंदियों को बाबर के सम्मुख प्रदर्शित किया तो बाबर ने आदेश दिया कि इन सभी को एक मैदान में खड़े करके बंदूक से गोली मार दी जाए।

बाबर के आदेश की पालना की गई। संभवतः बाबर भारत वालों को यह संदेश देना चाहता था कि बाबर का सामना करने की हिम्मत नहीं करें क्योंकि बाबर के पास ऐसे शस्त्र हैं जो भारतीयों ने पहले कभी देखे भी नहीं हैं। इसके बाद हुमायूँ को हिसार पर आक्रमण करने भेजा गया।

हिसार तथा उसके आसपास से हुमायूँ (Humayun) को काफी धन प्राप्त हुआ। हुमायूँ ने यह धन बाबर को समर्पित कर दिया। बाबर ने इस विजय के उपलक्ष्य में हुमायूँ को एक करोड़ रुपए पुरस्कार-स्वरूप प्रदान किए। हिसार-विजय के बाद बाबर की सेना करनाल से चलकर शाहाबाद पहुंच गई जो अब हरियाणा प्रांत की थानेश्वर तहसील में स्थित है। यहीं पर हुमायूँ 18 साल का हुआ तथा उसने अपने मुँह पर पहली बार उस्तरा चलवाया।

13 मार्च 1526 को शाहाबाद के पड़ाव पर ही बाबर को सूचना मिली कि दिल्ली का सुल्तान इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) एक-एक दो-दो कोस चलता हुआ आगे बढ़ रहा है तथा प्रत्येक मंजिल पर वह दो-तीन दिन पड़ाव करता है। यह समाचार सुनकर बाबर भी दिल्ली की तरफ बढ़ने लगा और 16 मार्च 1526 को यमुना नदी के तट पर सिरसावा के सामने उतर पड़ा।

यहीं पर बाबर को सूचना मिली कि इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) ने दाउद खाँ लोदी तथा हातिम खाँ लोदी को पांच-छः हजार सैनिकों सहित दो-आब के पार भेज दिया है और अब वे इब्राहीम लोदी के शिविर से 3-4 कोस आगे पड़ाव किए हुए हैं। बाबर ने भी अपने कुछ वजीरों को सेना देकर उनके सामने भेजा। अफगान अमीर बिबन भी बाबर की इस सेना के साथ इब्राहीम लोदी की सेना पर आक्रमण करने गया। जैसे ही बाबर की सेना मेंयमुना नदी पार की, बिबन अपनी सेना लेकर भाग गया।

 2 अप्रेल 1526 को इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) के अमीरों की एक सेना शक्ति-प्रदर्शन करती हुई बाबर के वजीरों की सेना के निकट चली आई। बाबर के वजीरों ने लोदियों की इस छोटी सेना को परास्त कर दिया तथा 60-70 सैनिक एवं 6-7 हाथी पकड़ लिए। बाबर के वजीरों ने लोदियों के सेनापति हातिम खाँ लोदी को पकड़ कर बाबर के सामने प्रस्तुत किया। बाबर ने पकड़े गए समस्त सैनिकों एवं हातिम खाँ लोदी की हत्या करवा दी।

बाबर ने लिखा है- ‘अगले दिन मैंने अपनी सेना को पंक्तिबद्ध किया तथा उसकी गिनती करवाई किंतु सैनिकों की संख्या मेरे अनुमान से कम थी।’

यहाँ भी बाबर (Babur) बड़ी चतुराई से अपने सैनिकों की संख्या छिपा गया किंतु आगे चलकर बाबर ने इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) से हुए युद्ध से पहले अपने सैनिकों की संख्या केवल 12 हजार बताई है। पाठकों को स्मरण होगा कि बाबर काबुल (Kabul) से सात सौ तोपें घोड़ों एवं खच्चरों की पीठ पर लदवा कर लाया था। अब बाबर ने उन तोपों के लिए लकड़ी की गाड़ियां बनवाईं तथा तोपों को उन पर जमा दिया।

इन तोपों को सेना के आगे रखा गया। रूमियों की प्रथा के अनुसार इन तोपों को आपस में जोड़ दिया गया। तोपों को आपस में जोड़ने के लिए लोहे की जंजीरों के स्थान पर पशुओं की कच्ची खाल से बनी रस्सियों का प्रयोग किया गया। तापों के पीछे आड़ बनाकर पैदल बंदूकचियों को तैनात किया गया। बंदूकचियों के पीछे घुड़सवारों को रखा गया।        

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दिल्ली सल्तनत विजय में बाबर को पांच घण्टे लगे (19)

0
दिल्ली सल्तनत विजय - www.bharatkaitihas.com
दिल्ली सल्तनत विजय

बाबर Babur) मुग़ल साम्राज्य (Mughal Sultanate) के संस्थापक और पहले शासक था बाबर द्वारा दिए गए विवरण के अनुसार दिल्ली सल्तनत (Delhi Sultanate) विजय में बाबर को पांच घण्टे लगे!

पानीपत के निकट पहुंच कर बाबर ने अपनी तोपों को गाड़ियों पर चढ़ाकर सेना के आगे तैनात करवा दिया। इधर दिल्ली सल्तनत (Delhi Sultanate) विजय का सपना आंखों में लिए हुए बाबर तेजी से अपनी सेना को जमा रहा था और उधर दिल्ली का सुल्तान इब्राहीम लोदी एक दिन में दो-तीन कोस चलता हुआ तथा प्रत्येक पड़ाव पर दो-तीन दिन विश्राम करता हुआ आगे बढ़ रहा था।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) के पास संभवतः इतने सैनिक नहीं थे, जिनके बल पर वह युद्ध लड़ने एवं जीतने की आशा कर सके। कुछ समय पहले ही इब्राहीम लोदी का अपने अमीरों से भयानक संघर्ष हुआ था जिसमें इब्राहीम लोदी के कई हजार सैनिक मारे गए थे। बहुत से अमीर एवं सेनापति विद्रोही होकर अपने-अपने प्रांतों में चले गए थे और स्वतंत्र शासक की तरह व्यवहार कर रहे थे। वे इस युद्ध में इब्राहीम की सहायता करने के लिए नहीं आए थे। इसलिए इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) को न तो इस बात की जल्दी थी कि वह शत्रु को तैयारी करने का अवसर दिए बिना ही उस पर टूट पड़े और न इस बात की चिंता थी कि वह किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंच कर मोर्चा बांधे। जबकि बाबर ने न केवल पानीपत के बाहर एक सुरक्षित स्थान देखकर अपनी तोप गाड़ियों, बंदूकचियों एवं घुड़सवारों को क्रमबद्ध कर लिया अपितु अपने दोनों पार्श्व तथा पीछे की तरफ खाइयां खुदवाकर उनमें पेड़ों की शाखाएं काटकर डलवा दीं ताकि शत्रु सेना बाबर की सेना में नहीं घुस सके। बाबर ने अपने कुछ घुड़सवारों को सौ-सौ की संख्या में बांट दिया तथा उन्हें इस प्रकार खड़ा किया कि आवश्यकता पड़ने पर वे तुरंत सक्रिय होकर शत्रु सेना पर छापा मार सकें।

बाबर ने लिखा है- ‘इतनी तैयारियों के बावजूद मेरी सेना में घबराहट थी क्योंकि उन्हें लगता था कि वे एक ऐसी सेना से युद्ध करने जा रहे हैं जिसके लड़ने के तरीकों के बारे में बाबर की सेना को कुछ भी जानकारी नहीं थी।’

बाबर ने अपने संस्मरणों में लिखा है- ‘इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) की सेना में एक लाख सैनिक थे तथा उसके पास अपने दादा बहलोल लोदी तथा अपने पिता सिकंदर लोदी द्वारा संचित खजाना था जिसके बल पर वह लाख – दो लाख सैनिक और भरती कर सकता था किंतु इब्राहीम लोदी स्वभाव से कंजूस था इसलिए वह अपने सैनिकों पर खजाना नहीं लुटा सका। वह एक अनुभवहीन नौजवान था। उसने अपनी सेना को किसी प्रकार का अनुभव नहीं करवाया था, न बढ़ने का, न खड़े रहने का और न युद्ध करने का।’

इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) के इन कृत्यों को देखकर कोई भी कह सकता था कि बाबर को दिल्ली सल्तनत (Delhi Sultanate) विजय करने से रोकना उसके वश की बात नहीं है।

इब्राहीम लोदी पानीपत से कुछ दूर ही ठहर गया। इस पर बाबर ने कुछ घुड़सवार तीरंदाजों को इब्राहीम लोदी की सेना पर हमला करने के लिए भेजा ताकि इब्राहीम लोदी क्रोध में आकर बाबर की सेना पर आक्रमण करे। इब्राहीम लोदी की सेना मुगल तीरंदाजों को मारकर भगा देती थी किंतु अपने स्थान से हिलती नहीं थी। सात-आठ दिन तक ऐसा ही होता रहा। इस पर बाबर ने एक रात लगभग 5 हजार सैनिकों को इब्राहीम के शिविर पर हमला करने भेजा।

बाबर की सेना का हमला होने पर इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) के सैनिक मशालें जलाकर अपने सुल्तान के खेमे के चारों ओर सिमट गए किंतु उन्होंने शिविर से बाहर आकर युद्ध नहीं किया। इस पर बाबर की सेना प्रातः होने से पहले ही लौट आई। अगले दिन बाबर ने हुमायूँ को सेना देकर इब्राहीम के शिविर की तरफ भेजा। यह सेना भी शक्ति का प्रदर्शन करके लौट आई।

20 अप्रेल 1526 को बाबर को प्रातः कुछ उजाला होते ही सूचना मिली कि शत्रु की सेना पंक्तिबद्ध होकर बाबर के शिविर की तरफ बढ़ रही है। इस पर बाबर की सेना तुरंत तैयार हो गई। बाबर के सैनिकों ने कवच पहन लिए तथा हथियार लेकर घोड़ों पर सवार हो गए। तोपचियों ने भी अपनी तोपों में बारूद भरना शुरु कर दिया। बंदूकची भी कंधों पर बंदूकें रखकर तैनात हो गए।

बाबर (Babur) ने अपनी सेना में कुछ तूलगमा दस्ते तैनात किए थे। इन्हें अनुभवी सेनानायकों के नेतृत्व में रखा गया। इनका काम यह था कि जब युद्ध अपने चरम पर पहुंच जाए तब ये दस्ते शत्रु सेना के दोनों पार्श्वों पर एवं पीछे पहुंचकर अचानक हमला बोल दे। जब इब्राहीम की सेना बाबर की सेना के निकट पहुंची तो कुछ दूरी पर ही ठिठक कर खड़ी हो गई।

बाबर के अनुसार- ‘ऐसा लगता था मानो इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) की सेना सोच रही हो कि इन तोपों के सामने जाए या न जाए, यहाँ रुके अथवा न रुके किंतु कुछ देर की असमंजस के बाद इब्राहीम की सेना ने आगे बढ़ना आरम्भ किया।’

बाबर (Babur) को इसी क्षण की प्रतीक्षा थी। शत्रु मौत के मुँह में स्वयं ही बढ़ा चला आ रहा था। जैसे ही इब्राहीम की सेना तोपों की मार की सीमा में आई, बाबर की तोपों ने आग और बारूद उगलने आरम्भ कर दिए। इब्राहीम के सैनिक बारूदी गोलों की चपेट में आकर हवा में उछलने लगे। उन्होंने आज से पहले कभी तोप नहीं देखी थी। न वे यह जानते थे कि इनमें से क्या निकलेगा और सैनिकों को कैसे मारेगा!

जब इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) की सेना पीछे की ओर मुड़ने लगी तो उसी समय तूलगमा दस्तों ने दाईं ओर से, बाईं ओर से और पीछे की ओर से हमला बोल दिया। अब तो इब्राहीम की सेना चारों ओर से मुगल सेना से घिर गई। इब्राहीम के सैनिक चारों तरफ भाग खड़े हुए। इस कारण वे आपस में ही उलझ गए। किसी को भागने का रास्ता नहीं मिला।

बाबर ने लिखा है- ‘जब युद्ध आरम्भ हुआ, तब सूर्य एक नेजा बलंद हो चुका था। अर्थात् दिन के 9-10 बजे का समय था। मध्याह्न तक घनघोर युद्ध होता रहा। मध्याह्न समाप्त होने तक युद्ध भी समाप्त हो चुका था। जिस स्थान पर इब्राहीम खड़ा था, उस स्थान पर ही 5-6 हजार आदमी मारे गए थे। अन्य स्थानों पर जो लाशें पड़ी थीं उनकी संख्या अनुमानतः 15-16 हजार रही होगी किंतु आगरा पहुंचने पर हिन्दुस्तानियों की बातों से पता चला कि इस युद्ध में 40-50 हजार आदमी मारे गए होंगे।’

बाबर (Babur) ने यहाँ भी बड़ी चालाकी से झूठ बोला है कि उसने अपने 12 हजार सैनिकों के बल पर इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) के 40-50 हजार सैनिक मार दिए। बाबर ने सुल्तान इब्राहीम लोदी के निकट मरे हुए शवों की संख्या 5-6 हजार बताई है, संभवतः यही संख्या सही है। शेष दोनों संख्याएं गलत हैं तथा बढ़ा-चढ़ाकर बताई गई हैं ताकि बाबर स्वयं को महान् विजेता सिद्ध कर सके।

फ़रिश्ता ने लिखा है- ‘इब्राहीम लोदी मृत्यु-पर्यन्त लड़ा और एक सैनिक की भाँति मारा गया।’

नियामतुल्लाह ने लिखा है- ‘सुल्तान इब्राहीम लोदी के अतिरिक्त भारत का कोई अन्य सुल्तान युद्ध-स्थल में नहीं मारा गया।’

बाबर द्वारा दिए गए विवरण के अनुसार दिल्ली सल्तनत विजय में बाबर को पांच घण्टे लगे! जिस दिल्ली सल्तनत (Delhi Sultanate) की सम्पन्नता के आश्चर्यजनक किस्से रोम और मिस्र से लेकर बगदाद, कुस्तुंतुनिया, समरकंद, फारस, काबुल तथा कांधार की गलियों में गूंजते थे, उस दिल्ली को जीतने में बाबर (Babur) को पांच घण्टे ही लगे थे।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

इब्राहीम लोदी का सिर मिल गया बाबर को (20)

0
इब्राहीम लोदी का सिर - www.bharatkaitihas.com
इब्राहीम लोदी का सिर मिल गया बाबर को!

वह शोकप्रद दृश्य देखकर बाबर (Babur) कांप उठा और इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) का सिर मिट्टी में से उठाकर कहा, तेरी वीरता को धन्य है। उसने आदेश दिया कि जरवफ्त के थान लाए जाएं और मिश्री का हलुआ तैयार किया जाए तथा सुल्तान के जनाजे को नहलाकर वहाँ दफ्न किया जाए, जहाँ वह शहीद हुआ था।

20 अप्रेल 1526 को पानीपत की लड़ाई (Panipat Ki Ladai or Battle of Panipat) में काबुल के बादशाह बाबर (Babur) ने दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी की सेना को परास्त कर दिया। यह युद्ध प्रातः 9-10 बजे आरम्भ हुआ और मध्याह्न समाप्त होने से पहले समाप्त हो गया था।

बाबर ने लिखा है- ‘जब शत्रु की पराजय हो गई तब उसकी सेना का पीछा करके शत्रु-सैनिकों को घोड़ों से गिराना आरम्भ किया गया। हजारों सैनिकों के सिर काट दिए गए तथा हजारों सैनिक बंदी बना लिए गए। हमारे आदमी प्रत्येक श्रेणी के अमीर तथा सरदार को बंदी बनाकर लाए। महावतों ने हाथियों के झुण्ड के झुण्ड पकड़कर मेरे समक्ष प्रस्तुत किए।’

इब्राहीम के विषय में बाबर के सेनापतियों एवं मंत्रियों का मानना था कि वह युद्ध-क्षेत्र से भाग गया। इसलिए बहुत से सैनिक एवं सेनापति विभिन्न दिशाओं में दौड़ाए गए ताकि उसे पकड़ा जा सके। कुछ सरदारों को आगरा तक भेजा गया तथा कुछ सैनिकों ने इब्राहीम लोदी के सैनिक शिविर की बारीकी से जांच की।

शाम होने से पहले ही बाबर (Babur) के मंत्री निजामुद्दीन अली मुहम्मद खलीफा का छोटा साला ताहिर तीबरी इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) का सिर लेकर आया। यह सिर लाशों के एक ढेर में पड़ा था। अब्दुल्ला नामक एक लेखक ने लिखा है- ‘वह शोकप्रद दृश्य देखकर बाबर कांप उठा और इब्राहीम लोदी का सिर मिट्टी में से उठाकर कहा, तेरी वीरता को धन्य है। उसने आदेश दिया कि जरवफ्त के थान लाए जाएं और मिश्री का हलुआ तैयार किया जाए तथा सुल्तान के जनाजे को नहलाकर वहाँ दफ्न किया जाए, जहाँ वह शहीद हुआ था।’

नियामतुल्ला ने लिखा है- ‘इब्राहीम की मजार पर बहुत से मुसलमान शुक्रवार के दिन एकत्रित हुआ करते थे और नरवर तथा कन्नौज के यात्री भी श्रद्धांजलि अर्पित करने आते थे।’

युद्ध की समाप्ति के बाद बाबर (Babur) मृतक शत्रुओं के सिरों का चबूतरा बनवाया करता था जिसे मुडचौरा कहा जाता था। पानीपत में भी बाबर ने मुडचौरा बनवाया।

‘ग्वालियर के तोमर’ (Gwalior Ke Tomar) नामक पुस्तक में हरिहर प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है- ‘चूंकि इस युद्ध में शत्रुओं के सिर कम थे इसलिए दोनों ओर के मृतकों के सिरों से मुडचौरा बनवाया गया।’

TO READ THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

उसी दिन अर्थात् 20 अप्रेल 1526 को हुमायूँ (Humayun) को एक छोटी सेना लेकर तेजी से आगरा पहुंचने तथा आगरा के किले में रखे खजाने पर पहरा लगाने के आदेश दिए गए। महदी ख्वाजा को आदेश दिया गया कि वह एक छोटी सेना लेकर तुरंत दिल्ली पहुंचे तथा वहाँ के खजाने को अपनी सुरक्षा में ले ले। 21 अप्रेल को बाबर स्वयं भी सम्पूर्ण सेना के साथ दिल्ली के लिए रवाना हुआ तथा दिल्ली से बाहर यमुनाजी के निकट डेरा लगाया। 24 अप्रेल को वह यमुनाजी के तट पर स्थित निजामुद्दीन औलिया की मजार पर पहुंचा तथा उसी रात उसने दिल्ली के किले में प्रवेश करके, रात्रि विश्राम वहीं किया। 25 अप्रेल 1526 को बाबर अपने मंत्रियों को साथ लेकर ख्वाजा कुतुबुद्दीन काकी की मजार पर गया। उसने सुल्तान गयासुद्दीन बलबन तथा सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के मकबरों, उनके द्वारा बनवाए गए महलों, कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनवाई गई कुतुबमीनार, शम्सुद्दीन इल्तुतमिश द्वारा बनवाया गया हौजे शम्सी, अलाउद्दीन खिलजी द्वारा बनवाया गया हौजे खास, सुल्तान बहलोल लोदी का मकबरा, सुल्तान सिकंदर लोदी का मकबरा एवं सिकंदर लोदी द्वारा बनवाए गए बागीचों की सैर की।

इसके बाद बाबर (Babur) बड़े ठाठ से यमुनाजी में नौका विहार करने के लिए निकला। नौका में बैठकर उसने अरक पिया। अगले दिन बाबर ने वली किजील नामक एक सेनापति को दिल्ली का शिकदार एवं दोस्तबेग को दिल्ली का दीवान नियुक्त किया और दिल्ली के लाल किले (Red Fort of Delhi) के खजाने पर मुहर लगाकर वह खजाना शिकदार एवं दीवान की सुरक्षा में सौंप दिया। 26 अप्रेल को बाबर ने यमुना नदी पर तुगलुकाबाद के सामने पड़ाव किया।

27 अप्रेल 1526 को शुक्रवार था। उस दिन बाबर के सिपाहियों, सेनापतियों एवं सैनिकों ने दिल्ली की मस्जिदों में सामूहिक नमाज पढ़ी तथा बाबर के नाम का खुतबा पढ़ा। इस अवसर पर फकीरों में धन वितरित किया गया। 28 अप्रेल को बाबर आगरा के लिए रवाना हो गया।

हुमायूँ (Humayun) बाबर (Babur) से सात दिन पहले ही आगरा पहुंच चुका था। जब हुमायूँ ने आगरा के लाल किले (Red Fort of Agra) में प्रवेश करना चाहा तो आगरा के किलेदार ने किले के फाटक नहीं खोले। इस पर हुमायूँ ने आगरा नगर के चारों ओर की सड़कों पर कड़ा पहरा लगा दिया ताकि कोई भी व्यक्ति आगरा के किले से खजाना लेकर न भाग सके। अन्ततः हुमायूँ ने दबाव बनाकर आगरा दुर्ग के फाटक खुलवा लिए। इब्राहीम लोदी का विशाल खजाना इसी किले में मौजूद था।

ग्वालियर के राजा विक्रमादित्य तोमर का परिवार भी अपने खजाने के साथ इसी किले में रहता था। विक्रमादित्य तोमर (Vikramaditya Tomar) का पूरा इतिहास हम ‘दिल्ली सल्तनत की दर्दभरी दास्तान’ में विस्तार पूर्वक बता चुके हैं।

राजा विक्रमादित्य तोमर ही पानीपत के युद्ध (Panipat Ki Ladai or Battle of Panipat) में सुल्तान इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) का एकमात्र सच्चा साथी था जिसके लिए बाबर ने लिखा है कि वह भी (अर्थात् राजा विक्रमादित्य तोमर) इस युद्ध में नरकगामी हुआ।

राजा विक्रमादित्य की विधवा रानी को अपना सारा खजाना हुमायूँ को समर्पित करना पड़ा। इसमें कोहिनूर का विख्यात हीरा भी सम्मिलित था। हुमायूँ ने यह हीरा बाबर को समर्पित कर दिया। बाबर ने इस हीरे का मूल्य ‘संसार के ढाई दिन के भोजन के बराबर’ लगाया तथा हीरा वापस हुमायूँ को दे दिया।

हुमायूँ (Humayun)के सैनिकों ने आगरा के लाल किले (Red Fort Of Agra) के महलों का बहुत सा अनुपयोगी सामान बाहर निकाला ताकि उसमें आग लगाई जा सके क्योंकि लाल किले के पुरानी स्वामी अर्थात् लोदी हमेशा के लिए नष्ट हो गए थे और अब यह सामान नए स्वामियों अर्थात् मुगलों के किसी भी काम का नहीं था। जब इस सामान में आग लगाई जा रही थी तब संयोगवश हुमायूँ भी वहाँ पहुंच गया।

हुमायूँ की दृष्टि इस कबाड़ में पड़े एक चित्र पर पड़ी। यह एक हिन्दू संत की तस्वीर थी जिनके चेहरे का तेज हुमायूँ को प्रभावित किए बिना नहीं रह सका। हुमायूँ ने उस चित्र को उस ढेर से उठवा लिया तथा स्थानीय लोगों से पूछताछ करवाई कि यह चित्र किसका है! लाल किले के पुराने दास-दासियों ने बताया कि यह चित्र हिंदुओं के गुसाईं वल्लभाचार्य (Gusai Vallabhacharya) का है जिसे सुल्तान सिकंदर लोदी (Sikandar Lodi) ने संत को अपने सामने बैठाकर बनवाया था।

सेवकों की बात सुनकरहुमायूँ (Humayun) ने उस चित्र को सुल्तान के महल की उसी दीवार पर फिर से लगवा दिया जिस पर वह लोदी सुल्तानों के समय में लगा हुआ था। आज गुसाईं वल्लभाचार्यजी का केवल यही एक चित्र उपलब्ध है जिसके आधार पर वल्लभाचार्यजी के अन्य चित्र बनाए गए हैं।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

पानीपत के मैदान में बदायूनीं ने प्रेतों की आवाजें सुनीं (21)

0
पानीपत के मैदान में - www.bharatkaitihas.com
पानीपत के मैदान में बदायूनीं ने प्रेतों की आवाजें सुनीं

पानीपत (Panipat) के मैदान में पश्चिम की ओर से आने वाले आक्रांताओं एवं भारतीय राजाओं की सेनाओं के बीच कई युद्ध हुए थे। यह मैदान कई बार सैनिकों के क्षत-विक्षत शवों से पटा था। जब अकबर का दरबारी मुल्ला मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी (Badayuni) पानीपत के मैदान से होकर गुजरा तो उसने प्रेतों की मारकाट की आवाजें सुनीं।

पानीपत का युद्ध (Panipat Ki Ladai or Battle of Panipat) जीतने के बाद बाबर ने उसी शाम हुमायूँ (Humayun) को आगरा तथा महदी ख्वाजा को दिल्ली के लिए रवाना किया ताकि वे लोग आगरा और दिल्ली के किलों (Red Fort of Agra and Red Fort of Delhi) में रखे खजाने पर अधिकार कर सकें। बाबर के इतिहास में आगे बढ़ने से पहले हमें एक बार पुनः कुछ देर के लिए पानीपत के मैदान में चलना होगा।

पानीपत के युद्ध-क्षेत्र को मुगलों के शासनकाल में प्रेतग्रस्त माना जाता था। ई.1588 में अकबर (Akbar) के दरबारी मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनीं को पानीपत के मैदान में जाने का अवसर मिला।

उसने लिखा है कि मैंने एक दिन प्रातःकाल उस ओर से गुजरते समय, योद्धाओं के मारकाट की आवाजें सुनीं। पाठकों की सुविधा के लिए बताना समीचीन होगा कि यह वही मुल्ला बदायूनी है जिसने हल्दीघाटी के युद्ध-क्षेत्र में उपस्थित रहकर, मुगल सेना एवं महाराणा प्रताप के बीच हुए युद्ध का आंखों-देखा विवरण लिखा था।

वर्तमान समय में पानीपत (Panipat) भारत के हरियाणा प्रांत में स्थित है। इस प्रांत में स्थित कुरुक्षेत्र, तराईन, पानीपत तथा करनाल अनेक बड़े युद्धों के स्थल रहे हैं। पानीपत के मैदान में चार बड़े युद्ध लड़े गए। ई.1240 में दिल्ली की सुल्तान रजिया तथा उसके भाई बहरामशाह की सेनाओं के बीच भी पानीपत के मैदान में भयानक युद्ध हुआ।

ई.1526 में बाबर एवं इब्राहीम लोदी के बीच हुए युद्ध को पानीपत का पहला युद्ध (First Battle of Panipat) कहा जाता है। ई.1556 में इसी स्थान पर दिल्ली के शासक महाराज हेमचंद्र विक्रमादित्य Hem Chandra Vikramaditya) तथा अकबर की सेनाओं के बीच युद्ध लड़ा गया जिसे पानीपत का दूसरा युद्ध कहा जाता है। ई.1761 में अफगान आक्रांता अहमदशाह अब्दाली (Ahmad Shah Abdali) एवं मराठा सेनापति सदाशिवराव भाऊ के बीच पानीपत का तीसरा युद्ध भी इसी स्थान पर हुआ था। इसे पानीपत का दूसरा युद्ध कहा जाता है।

महाभारत के युद्ध का मैदान कुरुक्षेत्र पानीपत से केवल 70 किलोमीटर दूर है। तराइन का युद्ध-क्षेत्र पानीपत से केवल 50 किलोमीटर दूर है जहाँ ई.1191 एवं ई.1192 में अफगान आक्रांता मुहम्मद गौरी तथा सम्राट पृथ्वीराज चौहान के बीच दो युद्ध हुए थे जिन्हें क्रमशः तराइन की पहली लड़ाई एवं तराइन की दूसरी लड़ाई कहा जाता है।

ई.1739 में पानीपत से मात्र 30 किलोमीटर दूर स्थित करनाल में ईरानी आक्रांता नादिरशाह (Nadirshah) एवं दिल्ली के शासक मुहम्मदशाह रंगीला की सेनाओं के बीच युद्ध हुआ था।

ई.1526 के बाबर-इब्राहीम युद्ध में मिली विजय की स्मृति में बाबर ने पानीपत (Panipat) कस्बे से एक मील उत्तर-पूर्व में एक मस्जिद का निर्माण करवाया। बाद में शेरशाह सूरी (Shershah Suri) ने इस स्थान पर दो स्मारक बनवाए। पहला था सुल्तान इब्राहीम लोदी का और दूसरा उन चगताई सैनिकों का था जिन्हें शेरशाह ने स्वयं मारा था। जब अंग्रेज इस देश के स्वामी हुए, तब ई.1910 में उन्होंने इस स्थान पर अहमदशाह अब्दाली का विजय-स्मारक बनवाया।

आगरा पहुंचने पर बाबर ने अपने संस्मरणों में लिखा- ‘मैं भारत को जीतने वाला तीसरा बादशाह हूँ। पहला था महमूद गाजी, दूसरा था शिहाबुद्दीन गौरी तथा तीसरा मैं हूँ।’

बाबर (Babur) ने इस सूची में अपने पूर्वज तैमूर लंग (Timur Lang) का स्मरण नहीं किया है। उसका कारण यह प्रतीत होता है कि महमूद गजनवी के वंशजों ने भारत के कुछ हिस्से पर लम्बे समय तक शासन किया। महमूद गौरी के गुलामों ने भी भारत के बहुत बड़े हिस्से पर बहुत लम्बे तक शासन किया जबकि तैमूर लंग के किसी उत्तराधिकारी ने भारत के किसी भी हिस्से पर शासन नहीं किया।

भारत को जीतने वाले तीन बादशाहों में भी बाबर ने स्वयं को सबसे बड़ा ठहराया है। वह लिखता है-

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

‘महमूद गजनवी (Mahmud Ghaznavi) खुरसान (Khurasan) का शासक होने के कारण साधन सम्पन्न था। खुरासान, दारुल मर्ज तथा समरकंद के बादशाह उसके अधीन थे और महमूद की सेना में 2 लाख सैनिक थे। मुहम्मद गौरी भी साधन-सम्पन्न था क्योंकि खुरासान का बादशाह गयासुद्दीन गौरी मुहम्मद गौरी का भाई था। उसने एक 1,20,000 सैनिकों के साथ भारत पर आक्रमण किया था। जबकि मैं उन दोनों बादशाहों की तुलना में, साधनहीन था। जब मैंने पहली बार भारत के भेरा शहर को जीता तब मेरे पास केवल डेढ़ हजार सैनिक थे। जब पांचवीं बार मैंने भारत को जीता, तब मेरे पास नौकर-चाकर, व्यापारी तथा अन्य सेवकों सहित केवल 12 हजार थी। मेरे पास बदख्शां, कंदूज, काबुल तथा कांधार जैसे गरीब देश थे जिनसे मुझे कुछ विशेष लाभ नहीं होता था। मेरे ये समस्त देश, शत्रुओं से घिरे हुए थे, इसलिए मुझे उनकी रक्षा पर बहुत अधिक खर्च करना पड़ता था। उजबेग मेरे शत्रु थे जिनकी सेना में एक लाख सैनिक थे। भेरा से लेकर बिहार तक इब्राहीम लोदी का शासन था। राज्य-विस्तार की दृष्टि से उसके सैनिकों की संख्या पांच लाख होनी चाहिए थी किंतु उसके अमीर उससे नाराज थे इसलिए केवल एक लाख सैनिक ही उसकी तरफ से लड़ने के लिए आए थे।’ 

इस प्रकार बाबर ने अपने संस्मरणों में आत्मप्रशंसा के साथ-साथ झूठ का भी पूरा सहारा लिया है।

बाबर ने लिखा है- ‘अब मैं भारत का बादशाह था किंतु चारों ओर अफगान-शत्रुओं से घिरा हुआ था। जौनपुर का सुल्तान हुसैन शर्की, गुजरात का सुल्तान मुजफ्फरशाह, दक्षिण में बहमनी सुल्तान थे, मालवा में महमूद खिलजी का राज्य था। बंगाल में नुसरतशाह सैयद का शासन था। काफिर शासकों में विजयनगर एवं चित्तौड़ के राज्य बड़े शक्तिशाली थे। चित्तौड़ के राणा ने रणथंभौर, सारंगपुर, भिलसा और चंदेरी पर अधिकार जमा लिया था। मैंने जल्दी ही चंदेरी के काफिरों का नाश करा दिया तथा जो स्थान वर्षों से दारुल-हर्ब बना हुआ था, उसे दारुल-इस्लाम बना दिया। इन राज्यों के अतिरिक्त हिन्दुस्तान में चारों ओर राय एवं राजा बड़ी संख्या में फैले हुए हैं। इनमें से बहुत से, मुसलमानों के आज्ञाकारी हैं किंतु कुछ दूरस्थ राजा मुसलमान बादशाहों के अधीन नहीं हैं।’

बाबर ने अपनी पुस्तक में भारत के भूगोल, नदियाँ, पर्वत, जलवायु, कृषि, सिंचाई के संसाधन आदि का उल्लेख किया है और लिखा है- ‘हिन्दुस्तान की विलायतों अर्थात् प्रांतों तथा नगरों में कोई आकर्षण नहीं है। समस्त नगर एवं समस्त भूमि एक ही प्रकार की है। यहाँ के उद्यानों में चाहरदीवारी नहीं होती।’

बाबर ने अपनी पुस्तक में भारत के वनों एवं नगरों में पाए जाने वाले तोता, मैना, मोर, तीतर, चकोर, जंगली मुर्ग, बटेर, बत्तख तथा नीलकण्ठ आदि ढेर सारे पक्षियों का बड़ा रोचक वर्णन किया है। बाबर ने बहुत सारे जलचरों के साथ-साथ पानी पर बारह फुट तक लम्बी दौड़ लगाने वाले मेंढकों का रोचक वर्णन किया है।

उसने हाथी, गेंडा, बारहसिंहगा, जंगली भैंसा तथा नील गाय आदि भारतीय वन्यपशुओं का भी बड़ा रोचक वर्णन किया है क्योंकि ये पशु अफगानिस्तान एवं उज्बेकिस्तान में नहीं पाए जाते थे।

बाबर के वर्णन में भारत में पाई जाने वाली ‘गीनी गाय’ नामक एक पशु का उल्लेख किया गया है जो मेंढे अर्थात् नरभेड़ के बराबर होती थी और जिसका मांस बड़ा नरम होता था। बाबर (Babur) ने अपने वर्णन में कई प्रकार के हिरणों, बंदरों, गिलहरियों एवं नेवलों आदि का भी उल्लेख किया है। उसने उत्तर भारत के मैदानों में पाए जाने वाले विविध प्रकार के फलों एवं फूलों का भी बड़ा रोचक वर्णन किया है।  

                                                           – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

भारतीयों की लंगोट का मजाक उड़ाता था बाबर (22)

0
भारतीयों की लंगोट - www.bharatkaitihas.com
भारतीयों की लंगोट का मजाक उड़ाता था बाबर

बाबर (Babur) स्वयं एक भूखे नंगे देश से आया था किंतु वह भारतीयों की गरीबी देखकर सहानुभूति व्यक्त करने के स्थान पर भारतीयों की लंगोट तक का मजाक बनाता था। बाबर यह नहीं समझ सका कि भारतीयों के शरीर के कपड़े तो अफगानिस्तान, ईरान तथा समरंकद के लुटेरे ले गए। अब केवल यह लंगोट ही भारतीयों को जीवित रखे हुए है!

पानीपत का युद्ध (Panipat Ki Ladai or Battle of Panipat) जीतने के बाद बाबर आगरा आ गया। आगरा आकर बाबर ने भारत के सम्बन्ध में कुछ संस्मरण लिखे। सोलहवीं शताब्दी की प्रथम चतुर्थांशी में लिखे गए इस विवरण में बाबर ने बहुत सी रोचक और उपयोगी बातें लिखी हैं किंतु भारतीयों का वर्णन करते समय उसने भारत के लोगों की बहुत निंदा की है तथा उन पर भूखे-नंगे एवं निकम्मे होने के आरोप लगाए हैं। इस पुस्तक को बाबरनामा (Baburnama or Memoirs of Babur) कहा जाता है।

बाबर ने लिखा है- ‘भारत में अधिकांश लोग कारीगर तथा श्रमिक हैं। वे पीढ़ियों से यही काम करते आ रहे हैं। हिन्दुस्तान में बहुत कम आकर्षण है। यहाँ के निवासी न तो रूपवान् होते हैं और न सामाजिक व्यवहार में कुशल होते हैं। ये न तो किसी से मिलने जाते हैं और न कोई इनसे मिलने आता है।

न इनमें प्रतिभा होती है और न कार्यक्षमता। न इनमें शिष्टाचार होता है और न उदारता! भारतीय लोग कला-कौशल में न तो किसी अनुपात पर ध्यान देते हैं और न नियम तथा गुण पर। न तो यहाँ अच्छे घोड़े होते हैं और न अच्छे कुत्ते। न अंगूर होता है, न खरबूजा और न उत्तम मेवे। यहाँ न तो बरफ मिलती है और न ठण्डा जल।

यहाँ के बाजारों में न तो अच्छी रोटी ही मिलती है और न अच्छा भोजन ही प्राप्त होता है। यहाँ न हम्माम अर्थात् गरमपानी के गुसलखाने हैं, न मदरसे, न शमा, न मशाल और न शमादान! शमा तथा मशाल के स्थान पर यहाँ बहुत से मैले कुचैले लोगों का एक समूह होता है जो डीवटी कहलाते हैं। वे अपने बाएं हाथ में एक छोटी सी तीन पांव की लकड़ी लिए रहते हैं।

उसके एक किनारे पर मोमबत्ती की नोक के समान एक वस्तु सी लगी रहती है। इसमें अंगूठे के बराबर एक मोटी सी बत्ती लगी रहती है। वे अपने दाएं हाथ में एक तुम्बी सी लिए रहते हैं। उसमें एक बारीक छेद होता है जिससे बत्ती में तेल की धार टपकाई जाती है। धनी लोग सौ-दो सौ दीवटियों को अपने यहाँ रखते हैं। जब बादशाह या बेगम को आवश्यकता होती है तो यही मैले-कुचैले दीवटी बत्ती लेकर उनके निकट खड़े हो जाते हैं।’

बाबर ने लिखा है- ‘हिन्दुस्तान में बड़ी नदियों एवं तालाबों के अतिरिक्त कहीं जलधाराएं नहीं होतीं। इनके उद्यानों तथा भवनों में भी जलधाराएं नहीं होतीं। इनके घरों में कोई आकर्षण नहीं होता। न उनमें हवा जाती है, न उनमें सुडौलपन होता है और न अनुपात।

कृषक तथा निम्नवर्ग के लोग अधिकांशतः नंगे ही रहते हैं। भारतीयों की लंगोट बड़ी विचित्र है। वे लोग लत्ते का एक टुकड़ा बांध लेते हैं जो लंगोटा कहलाता है। नाभि से नीचे एक लत्ते के टुकड़े को दोनों जांघों के नीचे से लेते हुए पीछे ले जाकर बांध देते हैं। स्त्रियां भी लुंगी बांधती हैं। इसका आधा भाग कमर के नीचे होता है ओर दूसरा सिर पर डाल लिया जाता है।’

बाबर ने अपनी पुस्तक बाबरनामा (Baburnama or Memoirs of Babur) में अनेक विरोधाभासी बातें लिखी हैं। एक स्थान पर वह भारत एवं भारतवासियों की प्रशंसा करते हुए कहता है- ‘भारत वालों को समय, संख्या एवं तौल सम्बन्धी ज्ञान बहुत अधिक है जिससे ज्ञात होता है कि यह एक धनी देश है। हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह बहुत बड़ा देश है।

यहाँ अत्यधिक सोना-चांदी है। वर्षा ऋतु में यहाँ की हवा बड़ी ही उत्तम होती है। कभी-कभी दिन भर में 15-20 बार वर्षा हो जाती है। स्वास्थ्यवर्द्धक एवं आकर्षक होने के कारण उसकी तुलना असम्भव है। केवल वर्षा ऋतु में ही नहीं सर्दियों एवं गर्मियों में भी यहाँ बहुत अच्छी हवा चलती है।’

बाबर ने लिखा है- ‘हिन्दुस्तान में भीरा (भेरा) से लेकर बिहार तक जो प्रदेश इस समय मेरे अधीन हैं, उनका वार्षिक राजस्व संग्रह 52 करोड़ रुपए है।’

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

जिस देश के लोगों को बाबर (Babur) ने अपनी पुस्तक बाबरनामा में बार-बार भूखा-नंगा और निकम्मा कहा है, उस देश के एक छोटे से हिस्से से बाबर को 52 करोड़ रुपए का राजस्व मिलता था। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि भारत के लोग भूखे-नंगे थे या बाबर स्वयं जो हजारों किलोमीटर की यात्रा के कष्ट सहकर भारत का सोना-चांदी और सुंदर औरतें लूटने आया था! बाबर ने स्वयं ही अपने संस्मरणों में रहंट, डोल, चरस तथा नहरों की जानकारी दी है जो इस बात के प्रमाण हैं कि भारत के किसान पूर्णतः बरसात पर निर्भर नहीं थे, वे धरती के गर्भ से जल लेकर खेतों में सिंचाई करते थे। ऐसे लोग भूखे-नंगे कैसे हो सकते थे! यदि थे तो उसके लिए क्या वे तुर्क एवं अफगान लुटेरे जिम्मेदार नहीं थे जो विगत साढ़े तीन सौ सालों से उत्तर भारत के मैदानों पर राज करते आ रहे थे! बाबर ने अपनी पुस्तक में भारत के गांवों एवं नगरों के सम्बन्ध में एक रोचक बात लिखी है जो भारत के लोगों की दुर्दशा के कारण का कच्चा चिट्ठा अनायास ही खोल देती है।

बाबर ने लिखा है- ‘हिन्दुस्तान में पुरवे, गांव तथा नगर क्षण भर में बस जाते हैं और उसी प्रकार नष्ट भी हो जाते हैं। इस प्रकार बड़े-बड़े नगरों के निवासी जो वर्षों से वहाँ बसे होते हैं, यदि वहाँ से भागना चाहते हैं तो वे एक या डेढ़ दिन में वहाँ से इस प्रकार भाग जाते हैं कि लेश-मात्र भी उनका वहाँ कोई चिह्न नहीं रह पाता।

दि उन्हें किसी स्थान को आबाद करना होता है तो उन्हें न तो नहर खोदने की आवश्यकता पड़ती है और न बंद बंधवाने की, क्योंकि यहाँ वर्षा के सहारे ही कृषि होती है। जनसंख्या की तो कोई सीमा ही नहीं। लोग एकत्र हो ही जाते हैं। कुआं अथवा तालाब खोद लेते हैं। घरों तथा दीवारों के बनाने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती। घास बहुत होती है, वृक्षों की तो कोई संख्या ही नहीं बताई जा सकती। झौंपड़ियां बना ली जाती हैं और तत्काल ग्राम अथवा नगर बस जाता है।’

यदि हम बाबरनामा (Baburnama) में बाबर (Babur) के उक्त कथन पर विचार करें कि उस काल के भारत में गांवों एवं नगरों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर बिना कोई समय गंवाए स्थानांतरित कर देने की प्रवृत्ति क्यों विकसित हो गई थी तो हम पाएंगे कि विगत सैंकड़ों सालों से पश्चिम की ओर से हो रहे विदेशी आक्रमणों के कारण भारत के लोगों को अपने गांव या नगर खाली करके बार-बार इधर-उधर भागना पड़ता था, इस कारण लोगों में यह प्रवृत्ति विकसित हो गई थी।

गांवों एवं नगरों के त्वरित पलायन की इस प्रवृत्ति के माध्यम से एक और बात पर ध्यान जाता है कि उस काल में भारतीयों के पास इतना सामान ही नहीं होता था जिसे लेकर भागना पड़े। अधिकांश लोग निर्धन थे, उनके पास एकाध कपड़े, थोड़े से अनाज और मिट्टी के दो-चार बर्तनों के अतिरिक्त और कुछ होता ही नहीं था। सारा धन महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी और तैमूर लंग (Timur Lang) जैसे तुर्क आक्रांता लूट कर ले जा चुके थे और तीन सौ सालों से दिल्ली के अफगान शासक लूट रहे थे।

उस काल के भारत में बहुत कम हिन्दू थे जिनके पास थोड़ा बहुत धन था किंतु वे भी निर्धनों की तरह रहते थे और अपना धन धरती में गाढ़ कर रखते थे। तुर्क एवं अफगान शासकों ने कई सौ सालों के शासन में हिन्दुओं पर यह प्रतिबंध लगा रखा था कि वे धन नहीं रख सकते, घोड़ा नहीं रख सकते, पक्का घर नहीं बना सकते, नए कपड़े नहीं पहन सकते। ऐसी स्थिति में लोगों को अपना शहर छोड़कर दूसरा शहर बसाने में भला क्या समय लग सकता था!

यदि बाबरनामा (Baburnama) की बात सही मान ली जाए तो भी भारतीयों को भूखा, नंगा और कुरूप बनाने के लिए कौन जिम्मेदार था! भारतीयों की लंगोट यदि भारतीयों का तन नहीं ढंक पाती थी तो इसके लिए जिम्मेदार कौन था? केवल और केवल बाबर के पूर्वज जो कभी हूण कबीलों (Hun Tribes) के रूप में, कभी तुर्की कबीलों (Turk Tribes) के रूप में, कभी मंगोल कबीलों (Mongol Tribes) के रूप में, कभी अफगानों (Afghans) के रूप में और कभी मुगलों (Mughals) के रूप में भारत में घुसते आ रहे थे और भारत की जनता का सर्वस्व हरण करते जा रहे थे।

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि भारतीयों की लंगोट उन जूतों और कोट से अच्छी थी जिन्हें पहनकर बाबर और उसके सिपाही भारत आए थे।

  – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हिन्दुस्तान की इच्छा करूं तो मेरा मुँह काला हो (23)

0
हिन्दुस्तान की इच्छा - www.bharatkaitihas.com
हिन्दुस्तान की इच्छा करूं तो मेरा मुँह काला हो

अबूशका नामक एक लेखक ने लिखा है कि ख्वाजा कलां ने हौजे खास के निकट एक संगमरमर पर एक शेर खुदवाया जिसका अर्थ था कि मैं यदि हिन्दुस्तान की इच्छा करूं तो मेरा मुँह काला हो। जब बाबर (Babur) ने इस शेर को पढ़ा तो उसके क्रोध का पार नहीं रहा।

 पानीपत की लड़ाई (Panipat Ki Ladai or Battle of Panipat) में विजयी होने के बाद पहले हुमायूँ और फिर बाबर (Babur) आगरा पहुंचे। बाबर के आगरा पहुंचने से पहले ही हुमायूँ (Humayun) ने आगरा के लाल किले (Red Fort of Agra) में रखे खजाने पर अधिकार जमा लिया था।

जब बाबर आगरा के लाल किले में पहुंचा तब उसने उन लोगों को बुलवाया जिन्होंने हुमायूँ (Humayun) को किला सौंपने में आनाकानी की थी। ये लोग इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) के शासन में बहुत ही प्रतिष्ठित हुआ करते थे किंतु बाबर ने उन्हें जान से मारने के आदेश दिए। उनमें एक अधिकारी का नाम मलिक दाद करारानी था। उसे भी मौत की सजा सुनाई गई किंतु आगरा के सैंकड़ों लोग बाबर के पैरों में गिरकर मलिक दाद करारानी के प्राणों की भीख मांगने लगे क्योंकि वह अत्यंत ही प्रतिष्ठित था। इसलिए बाबर ने उसे क्षमा कर दिया तथा उसकी समस्त सम्पत्ति भी लौटा दी।

इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) की माता बुआ बेगम आगरा के लाल किले में स्थित एक महल में रहा करती थी। बाबर ने उसे राजमाता जैसा सम्मान दिया तथा उसे सेवकों सहित रहने के लिए आगरा से एक कोस दूरी पर नदी के उतार की ओर एक महल रहने के लिए दिया। 10 मई 1526 को बाबर आगरा के लाल किले (Red Fort of Agra) में प्रविष्ट हुआ तथा सुल्तान इब्राहीम लोदी के महल में रहने लगा।

बाबर ने अपने संस्मरणों में लिखा है- ‘आगरा के लोग मुझसे एवं मेरे सैनिकों से बहुत घृणा करते थे। हमें देखते ही वे दूर भाग जाते थे। आगरा के अधिकांश लोग शहर छोड़कर भाग गए। इस कारण हमारे घोड़ों के लिए चारा भी उपलब्ध नहीं हुआ। गांव वालों ने हमसे शत्रुता एवं घृणा के कारण चोरी तथा डकैती करनी आरम्भ कर दी। इस समय आगरा में बहुत गर्मी थी और जहरीली हवा के कारण मेरे लोग मरने लगे। इस कारण मेरे सैनिकों ने हिंदुस्तान छोड़ने का निर्णय लिया और वे वापस अफगानिस्तान जाने को तैयार हो गए।’

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

अपने स्वयं के मंत्रियों एवं सेनापतियों की बेरुखी का वर्णन करते हुए बाबर ने लिखा है- ‘जब मैं काबुल से चला था तो मैंने बहुत कम अनुभव एवं पद वाले लोगों को बेग अर्थात् मंत्री बना दिया था। इस कारण मुझे विश्वास था कि यदि मैं आग या जल में भी प्रवेश करूंगा तो ये लोग मेरे साथ वहाँ भी प्रवेश करेंगे किंतु अब उन्हें अपने घरों की याद सता रही थी। ऐसे बेग ही मेरा सबसे अधिक विरोध कर रहे थे। कुछ पुराने बेग जो वर्षों से मेरी सेवा कर रहे थे, वे भी हर कीमत पर वापस जाने के लिए शोर मचाने लगे। इनमें गजनी का सूबेदार ख्वाजा कलां भी शामिल था। मैंने अपने समस्त बेगों की एक सभा बुलाई तथा उनसे कहा कि जिस हिंदुस्तान को जीतने का सपना हर बादशाह देखता है, उस हिंदुस्तान को आप सबने अपने प्राणों की बाजी लगाकर जीता है। अब ऐसी क्या बात हुई जो हम ऐसा धनी देश छोड़कर वापस काबुल जाएं तथा जीवन भर निर्धनता भोगें? क्या हमारे भाग्य में सदा ही गरीबी भोगते रहना लिखा है?’

बाबर आगे लिखता है- ‘मेरी बातों का इन बेगों पर अच्छा असर हुआ तथा वे असमंजस से मुक्त हो गए किंतु ख्वाजा कलां तथा मुल्ला हसन भारत में रुकने को तैयार नहीं हुए। इस पर मैंने उन दोनों को अफगानिस्तान लौट जाने की अनुमति दे दी। मैंने ख्वाजा कलां को बहुत सारे उपहार देकर कहा कि वह इन उपहारों को गजनी जाकर अपने रिश्तेदारों को दे दे। इसी प्रकार मैंने मुल्ला हसन को भी बहुत से उपहार दिए तथा उससे कहा कि वह काबुल जाकर अपने और मेरे परिवार वालों को ये उपहार प्रदान कर दे।’

बाबर (Babur) ने ख्वाजा कलां को गजनी (Ghazni) तथा गिरदीज के इलाके प्रदान किए और सुल्तान मसऊदी को हजारा के इलाके तथा भारत में स्थित कुहराम नामक परगना भी दे दिया जो पंजाब में स्थित था और जिसकी आमदनी 3-4 लाख रुपए सालाना थी। इससे अनुमान होता है कि ये दोनों सेनापति बाबर के अत्यंत विश्वसनीय थे किंतु किसी भी तरह भारत में नहीं रुकना चाहते थे।

ख्वाजा कलां को हिन्दुस्तान के गर्म जलवायु से इतनी घृणा हो गई कि जब वह आगरा से दिल्ली होता हुआ अफगानिस्तान के लिए रवाना हुआ तो उसने दिल्ली में अपने घर के बाहर एक पत्थर पर शेर खुदवाया-

अगर ब खैर सलामत गुजारे सिन्द कुनम।

सियाह रु शवम गर हवाए हिन्द कुनम।

अर्थात्- ‘यदि मैं कुशलतापूर्वक सिंधु पार कर लूं तो मेरा मुँह काला हो जाए यदि मैं हिन्दुस्तान की इच्छा करूं!’

अबूशका नामक एक लेखक ने लिखा है कि ख्वाजा कलां ने यह शेर हौजे खास के निकट एक संगमरमर पर खुदवाया था। बाबर तो वैसे ही ख्वाजा कलां के गजनी चले जाने के कारण उससे नाराज था किंतु जब बाबर ने इस शेर को पढ़ा तो उसके क्रोध का पार नहीं रहा।

बाबर लिखता है- ‘मेरे हिन्दुस्तान में रहते इस प्रकार का व्यंग्यपूर्ण शेर लिखकर जाना, शिष्टता के विरुद्ध था। यदि उसके प्रस्थान पर मुझे एक क्रोध था तो इस व्यंग्य से वह दो हो गया। मैंने तत्काल एक रूबाई लिखकर उसे भिजवाई- सैंकड़ों धन्यवाद दे बाबर को जो उदार और क्षमा करने वाला है जिसने तुझे सिंध तथा हिन्द के साथ-साथ बहुत से राज्य दिए हैं। यदि तू इन स्थानों की गरमी सहन नहीं कर सकता और केवल ठण्डी दिशा ही देखनी है तो तेरे लिए केवल गजनी है।’

इस रूबाई से प्रतीत होता है कि बाबर ने ख्वाजा कलां से नाराज होकर, गिरदीज आदि प्रांत वापस छीन लिए जो बाबर ने उसे भारत से रवाना होते समय दिए थे।

बाबर ने लिखा है- ‘दिल्ली और आगरा के किलों (Red fort of Delhi and Red Fort of Agra)पर तो मेरा अधिकार हो चुका था किंतु आसपास के किलों के स्वामियों ने अपने किलों की मजबूती से मोर्चाबंदी कर ली थी। सम्भल में कासिम सम्भली, बयाना में निजाम खाँ, धौलपुर में मुहम्मद जेतून, ग्वालियर में तातार खाँ सारंगखानी, रापरी में हुसैन खाँ नोहानी, इटावा में कुतुब खाँ, कालपी में आलम खाँ तथा मेवात में हसन खाँ मेवाती मेरे विरोधी थे। इनमें सबसे अधिक दुष्ट वही मुलहिद था।’

 बाबर (Babur) ने दुष्ट मुलहिद शब्द का प्रयोग हसन खाँ मेवाती के लिए किया है। काफिर की तरह मुलहिद का अर्थ भी विधर्मी होता है। अतः अनुमान होता है मेवात का शासक हसन खाँ मेवाती शिया मुसलमान था। इन शब्दों से बाबर के चरित्र का दोहरापन उजागर होता है। समरकंद के उज्बेकों को जीतने के लिए बाबर ने ईरान के शाह के आदेश पर स्वयं शिया बनना स्वीकार किया था किंतु अब वह भारत आकर शियाओं को मुलहिद अर्थात् काफिर कह रहा था!

बाबर ने लिखा है- ‘कन्नौज तथा गंगापार के अफगान भी मेरा खुल्लम-खुल्ला विरोध कर रहे थे। इन लोगों ने दरया खाँ नोहानी के पुत्र बिहार खाँ को अपना बादशाह बनाकर उसे सुल्तान मुहम्मद की उपाधि दे रखी थी। ये लोग कन्नौज से चलकर आगरा की तरफ दो-तीन पड़ाव आगे आकर डेरा डालकर बैठ गए।’

   – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाबर की तोपें (24)

0
बाबर की तोपें - www.bharatkaitihas.com
बाबर की तोपें

बाबर की तोपें (canons of Babur) भारत का इतिहास बदलने के लिए पर्याप्त सिद्ध हुईं। न तो दिल्ली का सुल्तान इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) और न चित्तौड़ का महाराणा सांगा (Maharana Sanga) जैसे वीर भारतीय राजा, कोई भी इन तोपों के आगे नहीं टिक सके! भारतीय सिपाही इन तोपों के सामने आकर मर तो सकते थे किंतु लड़ नहीं सकते थे! जीतने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी!

दिल्ली और आगरा के लाल किलों (Red Forts Of Delhi and Agra) में संचित खजाने तथा भेरा से लेकर बिहार तक के हरे-भरे मैदान अधिकार में आने के साथ ही बाबर Babur) का जीवन भर का सपना पूरा हो गया था किंतु अब वह भारत में रहकर, भारत पर शासन करना चाहता था।

बाबर वापस काबुल या कांधार जाकर जीवन भर की निर्धनता नहीं भोगना चाहता था किंतु बाबर के कई विश्वस्त सेनापतियों एवं मंत्रियों ने आगरा की गर्मी से परेशान होकर भारत में रहने से मना कर दिया तथा वे बाबर को छोड़कर गजनी, काबुल एवं कांधार लौट गए।

बाबर ने सम्भल, बयाना तथा धौलपुर के तुर्की एवं अफगान अमीरों को संदेश भिजवाए कि वे बाबर की अधीनता स्वीकार कर लें। इन तीनों स्थानों पर इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) के अमीरों का शासन था। उन तीनों ने ही बाबर का आदेश मानने से मना कर दिया।

बाबर (Babur) ने उस्ताद अली कुली से कहा कि वह बड़ी-बड़ी तोपें ढाले जो बाबर के दुश्मनों पर काफी दूर से गोलों की बरसात कर सकें। उस्ताद अली ने आगरा में बड़ी-बड़ी आठ भट्टियां लगवाईं। इन भट्टियों में पिघला हुए लोहा पानी की तरह बहता हुआ बाहर निकलता था और नालियों से होता हुआ सांचों में भर जाता था। जब इन सांचों के ठण्डा होने पर उन्हें हटाया जाता था तो तोपें तैयार हो जाती थीं।

उस्ताद अली अपने काम में बड़ा निष्णात था, वह अपने काम को इतने समर्पण भाव से करता था कि बाबर ने उसे कई बार सम्मानित किया ताकि वह पूरे जोश से अपने काम में लगा रहे। जब ये बड़ी तोपें ढल गईं तथा उनके लिए बारूद के पर्याप्त गोले बन गए तब बाबर ने संभल, बयाना, धौलपुर तथा रापरी के लिए एक-एक सेना भिजवाई। बाबर की तोपें (Canons of Babur) हिन्दुस्तानियों को भूनने के लिए तैयार थीं।

इस समय आगरा और कन्नौज के बीच सत्ता-च्युत अफगानों ने एक सैनिक-शिविर लगा रखा था। इनका उल्लेख करते हुए बाबर ने लिखा है- ‘हुमायूँ को एक सेना के साथ कन्नौज की तरफ भेजा गया जिसके रास्ते में 30-40 हजार अफगान सैनिक जमा हो रखे थे। जब उन्होंने सुना कि हुमायूँ आ रहा है, तब वे लोग भाग खड़े हुए।’

उपरोक्त विवरण को पढ़कर कोई भी व्यक्ति बड़ी आसानी से समझ सकता है कि बाबर ने अपनी सेना की वास्तविक संख्या के बारे में आरम्भ से लेकर अंत तक झूठ लिखा है। बाबर ने लिखा है कि- ‘पानीपत के मैदान में मेरे पास केवल 12 हजार सैनिक थे, जिनमें से आधे बावर्ची, खानसामा, भिश्ती और कुली थे।’

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

इस प्रकार बाबर ने अपने वास्तविक सैनिकों की संख्या 6 हजार ही बताई है। इन 6 हजार सैनिकों में से दो-चार हजार सैनिक पानीपत के युद्ध (Battle of Panipat) में मारे भी गए होंगे। कुछ हजार सैनिक इटावा, धौलपुर, बयाना तथा रापरी के अभियानों पर भेजे जा चुके होंगे और कुछ हजार सैनिकों को गजनी का गवर्नर ख्वाजा कलां और हजारा का गवर्नर सुल्तान मसऊदी भी अपने साथ ले गए होंगे। कुछ सैनिकों को आगरा और दिल्ली की सुरक्षा में भी नियुक्त किया गया होगा! ऐसीस्थिति में हुमायूँ को अपने साथ ले जाने के लिए 2-4 हजार सैनिक भी नहीं मिलने चाहिए थे! अतः हुमायूँ के आगमन का समाचार सुनकर ही 30-40 हजार अफगान सैनिक कैसे भाग सकते थे! स्पष्ट है कि बाबर झूठ बोल रहा था, पानीपत से लेकर महाराणा सांगा (Maharana Sanga) के विरुद्ध किए गए अभियान तक बाबर के पास सैनिकों की संख्या 40-50 हजार से लेकर एक लाख से कम नहीं रही होगी! पाठकों को स्मरण होगा कि हमने दिल्ली की दर्दभरी दास्तान में आजम हुमायूँ नामक एक तुर्की अमीर का इतिहास बताया था। वह दिल्ली सल्तनत में बड़ा शक्तिशाली माना जाता था और दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी का बड़ा विरोधी था।

जब सिकंदर लोदी का पुत्र इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) दिल्ली का सुल्तान बना तो इब्राहीम लोदी ने आजम हुमायूँ को ग्वालियर के तोमरों के विरुद्ध अभियान करने भेजा था।

इब्राहीम लोदी का अनुमान था कि इस अभियान से या तो इब्राहीम लोदी को तोमरों पर विजय मिल जाएगी या फिर आजम हुमायूँ मारा जाएगा और उससे छुटकारा मिल जाएगा। जब चार साल की घेरेबंदी के बाद आजम हुमायूँ ग्वालियर दुर्ग पर विजय प्राप्त करने वाला ही था, तब इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) ने आजम हुमायूँ को दिल्ली में बुलाकर कैद कर लिया था और कैद में ही उसकी हत्या करवा दी थी। इस कारण आजम हुमायूँ के पुत्र इब्राहीम लोदी के शत्रु हो गए थे।

उसी आजम हुमायूँ का बड़ा पुत्र फतेह खाँ सरवानी रायबरेली के निकट दलमऊ में बाबर के पुत्र मिर्जा हुमायूँ की सेवा में उपस्थित हुआ। मिर्जा हुमायूँ ने फतेह खाँ सरवानी का बड़ा सम्मान किया तथा उसे महदी ख्वाजा और मुहम्मद सुल्तान मिर्जा के साथ अपने पिता बाबर की सेवा में भेज दिया।

बाबर ने फतेह खाँ को उसके पिता आजम हुमायूँ के अधिकार वाले परगने तथा कुछ अन्य परगने प्रदान किए जिनसे प्रतिवर्ष 1 करोड़ 60 लाख रुपए का भूराजस्व प्राप्त होता था। फतेह खाँ के पिता को आजम हुमायूँ की उपाधि प्राप्त थी किंतु बाबर ने फतेह खाँ को यह उपाधि इसलिए प्रदान नहीं की क्योंकि बाबर के बड़े पुत्र का नाम भी हुमायूँ था। बाबर ने फतेह खाँ को खानेजहाँ की उपाधि प्रदान की। तभी से मुगल दरबार में खाने जहाँ बहुत बड़ी उपाधि मानी जाने लगी जिसका शाब्दिक अर्थ होता है- ‘संसार का राजा।’

बयाना पर उन दिनों निजाम खाँ नामक अफगानी अमीर का अधिकार था। उसका बड़ा भाई आलम खाँ निजाम खाँ को हटाकर स्वयं किले पर अधिकार करना चाहता था। इसलिए उसने बाबर से सम्पर्क करके बाबर को आश्वासन दिया कि यदि बाबर की सेना बयाना पर हमला करेगी तो मैं बाबर की सहायता करूंगा।

इस पर बाबर ने बयाना (Bayana) के लिए एक सेना रवाना की। बयाना के शासक निजाम खाँ ने बाबर की सेना को परास्त कर दिया। बाबर और अधिक सेना भेजने की स्थिति में नहीं था। इसलिए बाबर ने निजाम खाँ से संधि कर ली तथा उसे 20 लाख रुपए वार्षिक आय की जागीर देकर अपनी सेवा में रख लिया। निजाम खाँ की जगह महदी ख्वाजा को बयाना का गवर्नर नियुक्त किया गया। उसके अधीन 70 लाख रुपए वार्षिक आय वाली जागीर रखी गई।

इस समय तातार खाँ सारंगखानी ग्वालियर पर शासन करता था। वह भी इब्राहीम लोदी का अमीर था किंतु जब इब्राहीम लोदी मारा गया तो तातार खाँ के शत्रुओं ने ग्वालियर का किला घेर लिया। इस पर तातार खाँ ने बाबर से सहायता मांगी।

बाबर ने लिखा है कि इस समय मेरे अधिकांश बेग या तो हुमायूँ के साथ थे या अन्य अभियानों पर गए थे, इसलिए मैंने भेरा के अमीर रहीम दाद को आदेश दिया कि वह ग्वालियर जाकर दुर्ग पर अधिकार कर ले। जब रहीम दाद ग्वालियर के निकट पहुंचा तो किले में रह रहे एक दरवेश ने रहीम दाद को सूचना भेजी कि तू किले में मत आना, तातार खाँ दगा करेगा।

इस पर रहीम दाद ने तातार खाँ को संदेश भिजवाया कि मैं काफिरों से घिर गया हूँ, इसलिए मुझे थोड़े से सैनिकों के साथ किले में आने दिया जाए। तातार खाँ ने उसकी बात का विश्वास करके उसे थोड़े से सैनिकों सहित किले के भीतर ले लिया।

रात में तातार खाँ के आदमियों ने किले के दरवाजे भीतर से खोल दिए और रहीम दाद की सेना ग्वालियर के किले Gwalior Fort) में घुस गई। इन लोगों ने तातार खाँ को किले से निकाल दिया। जब तातार खाँ बाबर (Babur) की शरण में आगरा पहुंचा तो बाबर ने उसे भी 20 लाख रुपए आय की जागीर प्रदान करके अपनी सेवा में रख लिया। इस प्रकार बाबर की तोपों (Canons of Babur) ने हिन्दुस्तान का बड़ा हिस्सा फतह कर लिया।              

                                                     – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाबर को जहर दे दिया इब्राहीम लोदी की माता ने (25)

0
- www.bharatkaitihas.com बाबर को जहर
बाबर को जहर दे दिया इब्राहीम लोदी की माता ने

जब बाबर (Babur) ने इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) को मारकर दिल्ली सल्तनत (Delhi Sultanate) पर अधिकार कर लिया तब उसने इब्राहीम के परिवार की औरतों को आदर सहित अपने राज्य में रहने दिया किंतु इब्राहीम की माता बुआ बेगम (Bua Begum) ने बाबर को जहर दे दिया।

आगरा पर अधिकार करने के बाद बाबर कई तरह की कठिनाइयों में घिर गया। फिर भी उसने रापरी, बयाना और ग्वालियर पर अधिकार कर लिया। कन्नौज की तरफ से आकर एकत्रित हुए अफगान विद्रोहियों को भी भगा दिया तथा इटावा एवं धौलपुर के विरुद्ध सैनिक अभियान आरम्भ कर दिए।

बाबर ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि- ’21 दिसम्बर 1526 को एक विचित्र घटना घटी। इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) की माता बुआ बेगम को किसी तरह ज्ञात हो गया कि मैं हिन्दुस्तानी बावर्चियों के हाथ का बना भोजन खाने लगा हूँ तथा मैंने चार हिन्दुस्तानी बावर्ची नियुक्त किए हैं।

उनमें से एक बावर्ची को चार परगनों का लालच देकर इब्राहीम लोदी की माता ने अपनी तरफ मिला लिया। बाबर की माता ने एक दासी के हाथों एक तोला जहर उस बावर्ची के पास भिजवाया। जब मेरे बावर्ची खाना बना रहे थे तब उस हिन्दुस्तानी बावर्ची ने सबकी निगाह बचाकर एक चीनी की प्लेट पर पतली-पतली चपातियां लगाईं और उन पर कागज की पुड़िया में से आधे से कम जहर छिड़क दिया तथा रोटियों पर रोगनदार पका हुआ मांस रख दिया।

उस बावर्ची ने शेष बचा हुआ आधा जहर आग में डाल दिया। उस दिन शुक्रवार था। मैं दोपहर बाद की नमाज पढ़ने के बाद भोजन करने बैठा। मैंने खरगोश का बहुत सा मांस बड़े शौक से खाया तथा कुछ ग्रास विष मिली हुई हिन्दुस्तानी रोटी के भी खाए। मुझे उसके स्वाद में कोई अंतर ज्ञात नहीं हुआ। मैंने कुछ तली हुई गाजरें खाने के बाद सूखा मांस खाया। इसे खाते ही मेरा जी मचलने लगा।’

बाबर ने लिखा है- ‘पहले भी एक बार सूखा मांस खाने पर मेरा जी मचलने लगा था, इसलिए मैंने सोचा कि यह उसी का प्रभाव होगा। थोड़ी ही देर में मुझे उल्टी आने लगी। मुझे लगा कि मैं दस्तरखान पर ही कै कर दूंगा। मैं बड़ी कठिनाई से उठकर आबखाने अर्थात् पानी रखने के स्थान तक जा सका।

वहाँ पहुंचकर मैंने बहुत जोर से उलटी की। मैंने भोजन के बाद कभी वमन नहीं किया था। यहाँ तक कि मदिरापान के बाद भी कभी वमन नहीं किया था। मुझे संदेह हो गया। मैंने बावर्चियों पर दृष्टि रखने के आदेश दिए तथा एक कुत्ते को बुलाकर उसे कै खिलवाई और उस पर दृष्टि रखने के आदेश दिए।

उस दिन तो कुत्ते को कुछ नहीं हुआ किंतु अगले दिन एक पहर के बाद कुत्ते की दशा बिगड़ने लगी। उसका पेट फूल गया। लोग उसे कितने ही पत्थर मारते और हिलाते-डुलाते किंतु वह न उठता। मध्याह्न तक वह उसी दशा में पड़ा रहा। तदुपरांत वह उठ खड़ा हुआ, मरा नहीं। मैंने दो सैनिकों को भी अपनी रकाबी में से भोजन खिलाया था। उन्हें भी दूसरे दिन बड़ी जबर्दस्त कै हुई। एक की दशा तो बड़ी ही खराब हो गई।’

बाबर ने लिखा है- ‘आफत आई थी किंतु कुशलतापूर्वक टल गई। अल्लाह ने मुझे नया जीवन दिकया। मैं परलोक से आ रहा हूँ। मैं अल्लाह की दया से जी रहा हूँ। मैंने आज जीवन का मूल्य समझा। मैंने सुल्तान मुहम्मद बख्शी को आदेश दिया कि वह बावरचियों पर निगरानी रखे। सैनिक उसे दारुण पीड़ा पहुंचाने के लिए ले गए। बावर्ची ने सारी घटना का वर्णन कर दिया।’

TO READ THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

पाठकों को स्मरण होगा कि बाबर ने इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) की माता बुआ बेगम (Bua Begum) का सम्मान अपनी माता की तरह किया था और उसे अपने धन-सम्पत्ति एवं दास-दासियों सहित रहने के लिए यमुनाजी के निचले क्षेत्र में एक महल प्रदान किया था। बाबर के सेवकों द्वारा बुआ बेगम का सम्मान राजमाता की तरह किया जाता था तथा उसके एक पुत्र को भी बहुत इज्जत दी जाती थी। संभवतः इस पुत्र की आयु बहुत कम थी। जब बाबर को ज्ञात हुआ कि शत्रु की माता बुआ बेगम को इतना सम्मान दिए जाने पर भी उसने बाबर के प्राण लेने का षड़यंत्र रचा तो बाबर के क्रोध का पार नहीं रहा। इसलिए उसने यह बात सबके सामने लाने का निश्चय किया। बाबर ने लिखा है- ‘सोमवार को मैंने दरबार का आयोजन किया तथा मैंने आदेश दिया कि उसमें समस्त प्रतिष्ठित एवं सम्मानित लोग, अमीर एवं वजीर उपस्थित हों। उन दोनों पुरुषों तथा स्त्रियों को बुलवाकर उनसे प्रश्न किए जाएं। उन लोगों ने वहाँ सब हाल बताया। मैंने बकावल अर्थात् खाना परोसने वाले के टुकड़े-टुकड़े करवा दिए। भोजन में जहर मिलाने वाले बावर्ची अर्थात् खाना बनाने वाले की जीवित ही खाल खिंचवा ली गई। एक स्त्री को हाथी के पांव के नीचे डलवाया गया। दूसरी स्त्री को तोप के मुँह पर रखकर उड़वा दिया।

बाबर ने लिखा है- ‘मैंने अभागिनी बुआ बेगम अर्थात् इब्राहीम लोदी (Ibrahim Lodi) की माता पर निगरानी रखने का आदेश दिया। वह अपने कुकर्म का फल भोग रही है, उसे इसका परिणाम मिल जाएगा।’

बाबर ने इस विष के प्रभाव से आने के कई उपाय किए। वह लिखता है- ‘शनिवार को मैंने एक प्याला दूध पिया। रविवार को मैंने अरक पिया जिसमें गिले मख्तूम मिली हुई थी। गिले मख्तूम एक विशेष प्रकार की मिट्टी होती है जो मुहर लगाने के काम आती थी। सोमवार को मैंने दूध पिया जिसमें गिले मख्तूम तथा तिर्याक मिला हुआ था। तिर्याक एक प्रकार की औषधि होती थी जिसके सेवन से जहर का असर कम अथवा समाप्त हो जाता था।’

बाबर इस विष के प्रभाव से बच तो गया किंतु इस घटना का बाबर के मन पर गहरा प्रभाव हुआ। अपनी परिवार को काबुल भेजे एक पत्र में बाबर ने इस घटना का विस्तार से उल्लेख करते हुए लिखा-

‘अल्लाह को धन्यवाद है कि मुझे कोई हानि नहीं हुई। मुझे आज तक यह पता नहीं था कि प्राण इतने प्यारे हो सकते हैं। इसीलिए यह कहा जाता है कि जो कोई मृत्यु के निकट पहुंच जाता है, उसे जीवन का मूल्य ज्ञात हो जाता है। जैसे ही इस भयंकर दुर्घटना का स्मरण हो जाता है, तो मेरी दशा खराब हो जाती है। यह अल्लाह की महान् कृपा है कि उसने मुझे पुनः जीवन प्रदान किया। मैं उसके प्रति किन शब्दों में कृतज्ञता प्रकट कर सकता हूँ। यद्यपि यह दुर्घटना इतनी भयंकर है कि शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता फिर भी मैंने पूरी घटना का विस्तार से उल्लेख कर दिया है।’

बाबर ने इब्राहीम (Ibrahim Lodi) की माता बुआ बेगम यूनूस अली तथा ख्वाजगी असद नामक मुगल अधिकारियों को सौंप दी। उन लोगों ने बुआ बेगम की समस्त नगदी एवं अन्य सम्पत्ति पर अधिकार कर लिया तथा उसकी दास-दासियों को छीन लिया। बुआ बेगम को अब्दुर्रहीम शगावल नामक सैनिक अधिकारी की निगरानी में रख दिया गया।

बाबर के आदेश से बुआ बेगम (Bua Begum) तथा उसके पुत्र को अत्यधिक सम्मान दिया जाता था किंतु इस घटना के बाद बुआ बेगम को आगरा में रखना उचित नहीं था। इसलिए 3 जनवरी 1527 को बुआ बेगम को कामरान के पास भेज दिया गया। बाबर ने बुआ बेगम के बारे में केवल इतना ही लिखा है किंतु बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम ने हुमायूंनामा में लिखा है कि बुआ बेगम ने काबुल में आत्महत्या कर ली।

उस समय कामरान की नियुक्ति कांधार में थी, संभव है कि कामरान ने बुआ बेगम (Bua Begum) को कांधार की बजाय काबुल में रखने के आदेश दिए थे। गुलबदन ने यह भी लिखा है कि बाबर ने जहर मिली हुई रोटी का टुकड़ा उस बावर्ची को भी खिलाया था जिसने जहर मिलाया था। इसके प्रभाव से बावर्ची अंधा-बहरा हो गया।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

महाराणा सांगा पर आरोप लगाया बाबर ने (26)

0
महाराणा सांगा पर आरोप - www.bharatkaitihas.com
महाराणा सांगा पर आरोप लगाया बाबर ने

बाबर ने महाराणा सांगा पर आरोप लगाया है कि सांगा ने ही बाबर को भारत पर आक्रमण करने का निमंत्रण भिजवाया था ताकि दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम को मारकर उसके राज्य को बाबर तथा सांगा आधा-आधा बांट लें।

इब्राहीम लोदी की माता ने 25 दिसम्बर 1526 को आगरा में बाबर को जहर दे दिया। इस कारण बाबर मरते-मरते बचा। उस समय बाबर की विभिन्न सेनाएं संभल, जौनपुर, गाजीपुर, रापरी, धौलपुर, बयाना, ग्वालियर, इटावा, कालपी तथा हिसार आदि स्थानों पर युद्ध कर रही थीं। भारत के बहुत से अफगान सेनापति एवं गवर्नर या तो पराजय के कारण या फिर पुराने सुल्तान इब्राहीम लोदी से असंतुष्ट होने के कारण बाबर से आ-आ कर मिलते जा रहे थे।

जब बाबर की सेना धौलपुर पहुंची तो वहाँ के अफगान अमीर मुहम्मद जैतून ने धौलपुर का किला बाबर के सेनापतियों को समर्पित कर दिया और वह स्वयं बाबर की सेवा में उपस्थित हुआ। बाबर ने धौलपुर को खालसा में शामिल करके मुहम्मद जैतून को कई लाख रुपए वार्षिक राजस्व वाली जागीर प्रदान करके अपनी सेवा में रख लिया।

TO PURCHASE THIS BOOK, PLEASE CLICK THIS PHOTO

उन्हीं दिनों समाचार मिला कि हिसार फिरोजा के पास हमीद खाँ सारंगखानी चार हजार अफगानों के साथ उपद्रव मचा रहा है। बाबर ने भारत के पंजाब में स्थित हिसार के लिए हिसार फिरोजा नाम का प्रयोग किया है। उस काल में अफगानिस्तान में भी हिसार फिरोजा नामक स्थान था। जब हमीद खाँ सारंगखानी हिसार में उपद्रव मचाने लगा तो बाबर ने एक सेना उसके विरुद्ध भेजी। इस सेना ने तेज गति से हिसार पहुंचकर बहुत से अफगानों के सिर काट लिए तथा कटे हुए सिर बाबर के पास भिजवा दिए। इस समय बाबर का सबसे बड़ा पुत्र हुमायूं अपने पिता बाबर के लिए बहुत बड़ा सहायक सिद्ध हुआ। उसने न केवल कन्नौज की तरफ एकत्रित हुए 30-40 हजार अफगानों को छिन्न-भिन्न कर दिया अपितु जौनपुर एवं अवध पर अधिकार करके वहाँ मुगल अधिकारी तैनात कर दिए। जब हुमायूँ कालपी की ओर रवाना हुआ तो कालपी का गवर्नर आलम खाँ अत्यंत भयभीत होकर हुमायूँ की शरण में पहुंचा। हुमायूँ ने उसे अपनी सेवा में रख लिया। उन्हीं दिनों बाबर को एक ऐसा समाचार मिला जिससे बाबर को अपने पैरों तले से धरती खिसकती हुई प्रतीत हुई।

बाबर के गुप्तचरों ने उसे सूचना दी कि महाराणा सांगा बड़ी सेना लेकर आगरा की तरफ आ रहा है। इसलिए उसने हुमायूँ को संदेश भिजवाया- ‘चूंकि अफगानों को भगाने का तुम्हारा काम पूरा हो गया है, इसलिए तुम तत्काल  अपनी सेना लेकर मेरे पास पहुंचो क्योंकि काफिर राणा सांगा काफी निकट पहुंच चुका है। हमें सर्वप्रथम उसका उपाय करना चाहिए।’ इस पर 6 जनवरी 1527 को हुमायूँ आगरा पहुंच गया।

बाबर ने लिखा है- ‘जब हम लोग काबुल में ही थे, तब राणा सांगा के दूत ने उपस्थित होकर सांगा की तरफ से निष्ठा प्रदर्शित की थी और यह निश्चय प्रकट किया था कि सम्मानित बादशाह काबुल की ओर से दिल्ली के निकट पहुंच जाएं तो मैं इस ओर से आगरा पर आक्रमण कर दूंगा। मैंने इब्राहीम को भी परास्त कर दिया, दिल्ली तथा आगरा पर भी अधिकार जमा लिया किंतु इस काफिर के किसी ओर हिलने के चिह्न दृष्टिगत नहीं हुए। कुछ समय पश्चात् उसने कन्दार नामक किले को घेर लिया जो मकन के पुत्र हसन के अधीन था। हसन ने सहायता पाने के लिए अपने दूत मेरे पास भिजवाए किंतु मैंने उसकी कोई सहायता नहीं की क्योंकि मैं अभी तक इटावा, धौलपुर तथा बयाना पर अधिकार नहीं कर सका था।’

बाबर ने महाराणा सांगा पर आरोप लगाया है कि महाराणा सांगा ने बाबर को भारत आने का निमंत्रण दिया था किंतु राणा सांगा बाबर की सहायता के लिए नहीं आया। बाबर का महाराणा सांगा पर यह आरोप नितांत मिथ्या है।

पाठकों को स्मरण होगा कि ‘दिल्ली सल्तनत की दर्दभरी दास्तान’ में हमने स्पष्ट किया था कि महाराणा सांगा गुजरात, मालवा, अहमदनगर तथा दिल्ली के मुस्लिम शासकों के विरुद्ध लम्बे समय से संघर्ष कर रहा था और उनके क्षेत्रों पर तेजी से अधिकार जमाता जा रहा था।

महाराणा सांगा का उद्देश्य भारत भूमि को मुस्लिम शासकों से मुक्त करवाने का था। ऐसी स्थिति में महाराणा सांगा बाबर को क्यों बुलाता? वह तो स्वयं ही दिल्ली और आगरा पर दृष्टि गढ़ाए बैठा था! इसलिए बाबर द्वारा महाराणा सांगा के सम्बन्ध में लिखी गई बात बिल्कुल झूठी है। किसी अन्य समकालीन लेखक ने इस बात का उल्लेख नहीं किया है।

जब बाबर स्वयं ही अपने संस्मरणों में जमकर झूठ लिख रहा था, तब बाबर के इतिहासकारों द्वारा लिखे गए तथ्यों का कितना विश्वास किया जा सकता है, यह एक विचारणीय प्रश्न है!

बाबर को सूचना मिली कि मकन के पुत्र हसन ने कन्दार का किला राणा सांगा को समर्पित कर दिया। इससे बाबर को समझ में आ गया कि यदि बाबर ने महाराणा सांगा के विरुद्ध कोई कदम नहीं उठाया तो महाराणा सांगा और भी किलों पर अधिकार कर लेगा। कुछ ही समय में बाबर की सेना ने इटावा पर अधिकार कर लिया।

बाबर ने इटावा के तुर्क गवर्नर को निकालकर इटावा महदी ख्वाजा को दे दिया। धौलपुर पर भी बाबर का अधिकार हो गया तथा धौलपुर जुनैद बरलस को प्रदान किया गया। इसी प्रकार कन्नौज सुल्तान मुहम्मद दूल्दाई को दिया गया।

इस प्रकार सांगा की ओर अग्रसर होने से पहले बाबर ने उत्तर भारत के मैदानों में स्थित अनेक नगरों एवं राज्यों पर अधिकार कर लिया जिससे उसके सैनिकों की संख्या में भी अभूतपूर्व वृद्धि हो गई थी।

बाबर चाहता था कि मेवात का शासक हसन खाँ मेवाती भी बाबर की अधीनता स्वीकार कर ले किंतु हसन खाँ मेवाती किसी भी कीमत पर बाबर को मारना चाहता था क्योंकि बाबर ने पानीपत के युद्ध में हसन खाँ मेवाती के पुत्र नाहर खाँ को बंदी बना लिया था जो कि इब्राहीम लोदी की तरफ से युद्ध करने गया था। बाबर ने अब तक नाहर खाँ को बंधक बना रखा था।

हसन खाँ मेवाती कई बार स्वयं आगरा जाकर बाबर से मिला किंतु बाबर ने हसन खाँ से कहा कि यदि उसे अपना पुत्र वापस चाहिए तो उसे बाबर की अधीनता स्वीकार करनी होगी किंतु हसन खाँ मेवाती बाबर की अधीनता स्वीकार करने को तैयार नहीं था।

जब बाबर ने सुना कि हसन खाँ मेवाती महाराणा सांगा से मिल सकता है तो बाबर ने नाहर खाँ को बंदीगृह से बाहर निकालकर उसे खिलअत प्रदान की तथा अपने पिता के पास जाने की अनुमति दे दी। नाहर खाँ ने बाबर को आश्वासन दिया कि वह हर हाल में अपने पिता हसन खाँ को बाबर के पक्ष में ले आएगा।

बाबर ने लिखा है- ‘यह दुष्ट धूर्त अर्थात् हसन खाँ केवल अपने पुत्र की मुक्ति की प्रतीक्षा में चुपचाप बैठा था। जैसे ही उसे ज्ञात हुआ कि उसका पुत्र मुक्त हो गया है और अलवर आ गया है तो हसन खाँ आगरा के निकट टोडा भीम में महाराणा सांगा से मिल गया। हसन खाँ के पुत्र को इस अवसर पर मुक्त करना उचित नहीं था।’                                  

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

- Advertisement -

Latest articles

डिजिटल क्रांति www.bharatkaitihas.com

डिजिटल क्रांति और भविष्य की तैयारी

0
चारों ओर डिजिटल क्रांति का शोर है किंतु हमारे पास भविष्य की क्या तैयारी है! क्या हमने कभी इस पर गंभीरता से विचार किया...
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य - www.bharatkaitihas.com

वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट : नीले पानी में नहाती औरतों का रहस्य

0
वॉयनिच मैन्युस्क्रिप्ट एक ऐसी पहेली, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के दिग्गज कोड-ब्रेकर्स से लेकर आज के सबसे एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सुपर कंप्यूटर्स...
पुष्पक विमान - www.bharatkaitihas.com

पुष्पक विमान विभीषण को क्यों नहीं लौटाया था श्रीराम ने?

0
रावण का वध करने के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो उन्होंने पुष्पक विमान लंका के नए राजा विभीषण को क्यों नहीं लौटाया?...
एनीमल फार्म - www.bharatkaitihas.com

एनीमल फार्म और भारतीय राजनीति

0
क्या आपने उस किताब का नाम सुना है जिसने 1950 के दशक में पूरी दुनिया में आग लगा दी थी! क्या आपने एनीमल फार्म...
हरम बेगम का कपट जाल - www.bharatkaitihas.com

हरम बेगम का कपट जाल (69)

0
बाकी काकशाल नामक एक अमीर ने मिर्जा हकीम से कहा कि यह हरम बेगम का कपट जाल है, इसलिए वहाँ जाना ठीक नहीं है...