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महाराणा सांगा की शपथ (32)

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महाराणा सांगा की शपथ

जब मेवाड़ी सरदार युद्धक्षेत्र में बेहोश हो गए सांगा को युद्धक्षेत्र से बाहर निकाल लाए। होश में आने पर महाराणा सांगा को बहुत दुख हुआ। उसने अपने सरदारों को बहुत कोसा तथा फिर से लड़ने के लिए तैयार हो गया। महाराणा की शपथ थी कि वह बाबर को जीते बिना चित्तौड़ वापस नहीं जाएगा! 

बंदूकों और तोपों तथा तूलगमा टुकड़ियों के बल पर बाबर ने खानवा का युद्ध जीत लिया तथा महाराणा सांगा के घायल हो जाने के कारण सांगा के सामंत सांगा को युद्ध-क्षेत्र से बाहर ले गए। बाबर तोपों और बंदूकों के बल पर ही काबुल से आगरा तक आया था किंतु खानवा के मैदान में मिली जीत उसके लिए अप्रत्याशित थी। सलहदी के 30 हजार सैनिकों का युद्ध-क्षेत्र में सांगा को छोड़कर बाबर की तरफ जाना भी बाबर की विजययात्रा में मील का पत्थर सिद्ध हुआ था।

बाबर ने लिखा है- ‘शत्रुओं को पराजित करके हमने उन्हें एक-एक करके घोड़ों से गिराते हुए उनका पीछा किया। काफिरों का शिविर हमारे शिविर से दो कोस दूरी पर रहा होगा। हमने सांगा के शिविर में पहुंच कर मुहम्मदी, अब्दुल अजीज, अली खाँ तथा कुछ अन्य लोगों को सांगा का पीछा करने के लिए भेजा।’

बाबर ने पश्चाताप करते हुए लिखा है- ‘काफिर के शिविर से लगभग एक कोस आगे निकल जाने के उपरांत दिन का अंत हो गया। इस कारण मैं लौट आया। मैंने सांगा का पीछा करने में थोड़ी शिथिलता कर दी। मुझे स्वयं जाना चाहिए था और जिस कार्य की मुझे इच्छा थी, उसे अन्य लोगों पर नहीं छोड़ना चाहिए था। मैं अपने शिविर में सोने के समय की नमाज के वक्त पहुंचा।’

बाबर ने लिखा है- ‘मुहम्मद शरीफ ज्योतिषी ने मेरी पराजय की भविष्यवाणी करके मुझे परेशानी और चिंता में डाल दिया था किंतु वह मुझे बधाई देने के लिए आया। मैंने उसे बहुत सारी गालियां देकर उसे खूब अपमानित किया किंतु उसकी पिछली सेवाओं का विचार करके उसे एक लाख मुद्राएं दीं तथा उससे कहा कि अब वह मेरा राज्य छोड़कर चला जाए। मेरे राज्य में न ठहरे।’

अगले दिन बाबर ने खानवा में ही पड़ाव किया तथा खानवा की पहाड़ी पर हिन्दुओं के कटे हुए सिरों की मीनार बनवाकर गाजी की उपाधि धारण की जिसका अर्थ होता है काफिरों पर बिजली गिराने वाला या काफिरों पर बिजली बनकर गिरने वाला।

शेख जैनी ने लिखा है कि खानवा की जीत के बाद शाही तुगरा में बाबर को गाजी लिखा जाने लगा। बाबर ने लिखा है कि फतहनामा के तुगरा के नीचे मैंने यह रुबाई लिखी-

इस्लाम के लिए मैं वनों में चक्कर लगाता रहा।

काफिरों तथा हिन्दुओं से युद्ध की तैयारी करता रहा।

मैंने शहीदों के समान मरना निश्चय किया

अल्लाह को धन्यवाद है, मैं गाजी हो गया।

कुछ समय बाद जब बाबर ने राजपूतों के विरुद्ध कई युद्ध जीत लिए तब उसने भारत के क्षत्रियों का विश्लेषण करते हुए लिखा- ‘राजपूत मरना जानते हैं पर जीतना नहीं जानते!’ खानवा के मैदान से भी केवल यही कटु-सत्य सामने आया था। खानवा में राजपूत बड़ी संख्या में मृत्यु को प्राप्त हुए किंतु जीत नहीं सके!

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उधर जब मूर्च्छित महाराणा को लेकर उसके सामंत आम्बेर राज्य में स्थित बसवा गांव में पहुंचे, तब महाराणा सचेत हुआ और उसने अपने मंत्रियों से पूछा कि सेना की क्या हालत है तथा विजय किसकी हुई? अपने सामंतों से युद्ध-क्षेत्र का समस्त वृत्तांत सुनकर महाराणा ने अपने मंत्रियों एवं सेनापतियों पर रोष प्रकट किया कि वे उसे युद्धस्थल से इतना दूर क्यों ले आए हैं! सांगा ने अपने मंत्रियों एवं सेनापतियों को आदेश दिया कि यहीं डेरा डाल दें तथा बाबर से पुनः युद्ध की तैयारी आरम्भ करें। महाराणा की शपथ थी कि जब तक बाबर को विजय न कर लूंगा, चित्तौड़ नहीं लौटूंगा। राणा अपनी सेना एवं सामंतों को लेकर बसवा से रणथंभौर चला गया। अपनी पराजय के कारण महाराणा बहुत उदास रहा करता था। एक दिन टोडरमल चांचल्या नामक एक चारण सांगा के पास आया। उसने महाराणा को एक गीत सुनाया जिसमें महाभारत एवं रामायण के महान् योद्धाओं पर आए संकटों के बारे में बताया गया था। इस गीत को सुनकर महाराणा के मन में फिर से उत्साह का संचार हुआ तथा उसने चारण को एक गांव पुरस्कार में दिया। महाराणा सांगा की शपथ थी और पक्की हो गई।

जनवरी 1528 में बाबर ने चंदेरी पर आक्रमण करने का निश्चय किया। पाठकों को स्मरण होगा कि चंदेरी का किला महाराणा सांगा के अधीन था और उसने मेदिनीराय को चंदेरी का शासक नियुक्त किया था। बाबर कालपी, इरिच और खजवा होता हुआ 19 जनवरी 1528 को चंदेरी पहुंचा।

जब राणा सांगा को सूचना मिली कि बाबर चंदेरी पहुंच गया है तो सांगा ने भी बाबर के पीछे चंदेरी जाने का निर्णय लिया ताकि बाबर से अपनी पराजय का बदला लिया जा सके तथा महाराणा की शपथ पूरी हो सके। कुछ ही समय में सांगा भी कालपी के निकट इरिच गांव पहुंच गया।

कविराज श्यामलदास ने वीरविनोद में, हर विलास सारड़ा ने महाराणा सांगा में, गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने उदयपुर राज्य का इतिहास में लिखा है कि इरिच में सांगा के साथी राजपूतों ने जो नए युद्ध के विरोधी थे, सांगा को फिर से युद्ध में प्रवष्टि होता देखकर उसे विष दे दिया। विष का प्रभाव बढ़ता देखकर राणा के मंत्री एवं सामंत सांगा को लेकर वापस रणथंभौर लौटने लगे किंतु 30 जनवरी 1528 को कालपी में सांगा की मृत्यु हो गई। महाराणा सांगा की शपथ अधूरी रह गई।

इस प्रकार उस समय के सबसे प्रतापी हिन्दूपति महाराणा सांगा की जीवन-लीला का अंत हुआ। डॉ. के. एस. गुप्ता ने लिखा है कि राणा सांगा का स्वास्थ्य पुनः खराब हो जाने से सांगा का निधन हुआ। वीरविनोद में महाराणा की मृत्यु अप्रेल 1527 में होनी लिखी है जो कि स्वीकार्य नहीं है। चतुरकुल चरित्र में महाराणा की मृत्यु 30 जनवरी 1528 को होनी लिखी है, यह तिथि सत्य जान पड़ती है।

महाराणा की पार्थिव देह माण्डलगढ़ लाई गई और वहीं उसका अंतिम संस्कार किया गया। अमरकाव्य के अनुसार महाराणा का निधन कालपी में हुआ तथा माण्डलगढ़ में दाहक्रिया हुई। कविराज श्यामलदास ने खानवा के युद्ध-क्षेत्र से महाराणा को बसवा में लाये जाने, बसवा में ही निधन होने एवं बसवा में ही अंतिमक्रिया होने का उल्लेख किया है। गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने अमर काव्य के विवरण को सही माना है। अर्थात् महाराणा की मृत्यु कालपी में हुई तथा अंतिम क्रिया माण्डलगढ़ में हुई।

महाराणा की मृत्यु होते ही दिल्ली की सल्तनत पर बाबर का अधिकार पक्का हो गया। भारत में अब बाबर का मार्ग रोक सकने योग्य कोई शक्ति शेष न रही। खानवा के युद्ध में महाराणा सांगा की पराजय ने भारत का इतिहास बदल दिया।

यदि बाबर का आगमन न हुआ होता तो इस बात की पूरी संभावना थी कि महाराणा संग्रामसिंह दिल्ली पर अधिकार कर लेता और जो दिल्ली, पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के बाद तुर्कों के अधिकार में चली गई थी, एक बार पुनः हिन्दुओं के पास आ जाती किंतु भारत के भाग्य में ऐसा होना लिखा नहीं था!

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

खानवा में हिन्दुओं ने हिन्दुस्तान खो दिया! (33)

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खानवा में हिन्दुओं ने हिन्दुस्तान खो दिया

खानवा के युद्ध में हिन्दू राजाओं के पास एक अवसर था जब वे म्लेच्छों के शासन से सदैव के लिए मुक्ति पा सकते थे किंतु हिन्दुओं की पुरानी युद्ध पद्धति ने तथा महाराणा सांगा द्वारा सलहदी तथा खानजादा जैसे मुसलमान राजाओं पर भरोसा किए जाने की भूल ने यह अवसर खो दिया। खानवा में हिन्दुओं ने हिन्दुस्तान खो दिया!

जब महाराणा सांगा का कालपी में निधन हो गया तो राजपूतों का संघ बिखर गया। सांगा के बाद राजपूतों का नेतृत्व करने वाला कोई प्रभावशाली हिन्दू नरेश नहीं रहा। इस कारण हिन्दुओं के प्रभाव को बड़ा धक्का लगा और पास-पड़ौस के मुसलमान राज्यों में राजपूतों का भय समाप्त हो गया।

इब्राहीम लोदी के समय में लोदी-सल्तनत के कमजोर पड़ जाने के समय से ही हिन्दू-शासक उत्तरी भारत में अपनी शक्ति बढ़ाने का स्वप्न देख रहे थे किंतु खानवा के मैदान में हिन्दू-राजाओं की हार के कारण वह स्वप्न बिखर गया। भारत पर राज्य करने के लिए तुर्क भले ही जीवित नहीं बचे थे किंतु अब उनका स्थान मुगलों ने ले लिया।

इस प्रकार खानवा की पराजय हिन्दुओं के लिए अतीत में हो चुकी एवं भविष्य में होने वाली ढेर सारी पराजयों की तरह एक सामान्य पराजय नहीं थी अपितु यह एक युगांतकारी पराजय थी। इस युद्ध में पराजय के कारण हिन्दू नरेशों के हाथों से हिन्दुस्तान का राज्य मुट्ठी में बंद रेत की तरह फिसल गया। खानवा में हिन्दुओं ने हिन्दुस्तान खो दिया!

यह पराजय इतनी ही दुर्भाग्यपूर्ण थी जितनी कि ई.1192 में हुई सम्राट पृथ्वीराज चौहान की पराजय, जितनी कि ई.1556 में हुई दिल्ली के हिन्दू सम्राट विक्रमादित्य हेमचंद्र की पराजय, जितनी कि ई.1761 में हुई मराठा सेनापति सदाशिव राव भाऊ की पराजय।

खानवा युद्ध की पराजय के बाद राजपूताना एक बार फिर असुरक्षित हो गया और उस पर पास-पड़ोस के राज्यों के आक्रमण आरम्भ हो गये। राजपूताना की स्वतन्त्रता फिर से खतरे में पड़ गई। खानवा युद्ध ने भारत में विशाल मुगल साम्राज्य की स्थापना का मार्ग खोल दिया। अब बाबर की रुचि अफगानिस्तान से समाप्त होकर पूरी तरह भारत में हो गई।

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खानवा विजय के उपरान्त बाबर बयाना चला गया। उन दिनों बयाना को राजपूताने का दरवाजा कहा जाता था जहाँ से बाबर राजपूताना के भीतर घुसना चाहता था परन्तु भीषण गर्मी के कारण वह अलवर से आगे नहीं बढ़ सका। चूंकि हसन खाँ मेवाती की मृत्यु हो चुकी थी और उसके पुत्र नाहर खाँ को बाबर ने फिर से बंदी बना लिया था, इसलिए मेवात की रक्षा करने वाला कोई नहीं था। यही कारण था कि बाबर ने थोड़े से ही प्रयास से मेवात पर अधिकार कर लिया। बाबर ने लिखा है कि मेवात से सालाना चार करोड़ रुपए मालगुजारी प्राप्त होती थी। सांगा से मुक्ति पाने के बाद बाबर को अपने पक्ष की आंतरिक समस्याओं पर ध्यान देने का समय मिला। बाबर ने बदख्शां, काबुल, कांधार, गजनी एवं मध्य-एशिया के अन्य देशों से अपने साथ आए सिपाहियों से वायदा किया था कि जब खानवा का युद्ध समाप्त हो जाएगा, तब जो भी सिपाही अपने देश जाना चाहेगा, उसे लौटने की अनुमति दी जाएगी। अब वे सिपाही फिर से अपने देश जाने की मांग करने लगे। इस पर बाबर ने हुमायूँ को आदेश दिया कि वह इन सिपाहियों को अपने साथ लेकर काबुल चला जाए।

इसका कारण यह था कि बाबर की सेना में अधिकांश सैनिक बदख्शां तथा उसके आसपास के क्षेत्रों के रहने वाले थे और वे किसी भी कीमत पर भारत में रहने को तैयार नहीं थे।

बाबर का दायां हाथ समझा जाने वाला महदी ख्वाजा भी अपने देश लौट जाने को बड़ा व्याकुल था। उसे भी काबुल जाने की अनुमति दी गई। महदी ख्वाजा के पुत्र जाफर ख्वाजा ने भारत में रहना स्वीकार किया इसलिए उसे इटावा का गवर्नर नियुक्त किया गया। खानवा के युद्ध के बाद बाबर ने फतहनामा लिखवाया जिसमें उसने अपनी भारत- विजय का वर्णन विस्तार से करवाया तथा उसे मोमिन अली तवाची के साथ काबुल भेजा गया।

बाबर ने अपनी पुस्तक बाबरनामा में लिखा है- ‘इस दौरान हसन खाँ मेवाती का पुत्र नाहर खाँ अब्दुर्रहीम की निगरानी से भाग गया।’

बाबर ने चंदवार तथा रापरी के लिए कुछ सैनिक टुकड़ियां रवाना कीं जहाँ इन स्थानों के पुराने तुर्क शासकों ने बाबर को खानवा के युद्ध में व्यस्त जानकर अधिकार कर लिया था। कुछ ही दिनों में चंदवार तथा रापरी फिर से बाबर के अधीन हो गए।

इटावा पर भी कुतुब खाँ ने अधिकार कर लिया था किंतु जब उसे ज्ञात हुआ कि महदी ख्वाजा का पुत्र जाफर ख्वाजा इटावा आ रहा है तो कुतुब खाँ इटावा छोड़कर भाग गया। इस प्रकार इटावा भी पुनः बाबर के अधिकार में आ गया।

बाबर ने सुल्तान मुहम्मद दूल्दाई को कन्नौज का गवर्नर नियुक्त किया था किंतु कन्नौज वालों ने उसे मारकर भगा दिया। इस पर बाबर ने दूल्दाई को सरहिंद का गवर्नर नियुक्त कर दिया तथा कन्नौज मुहम्मद सुल्तान मिर्जा को प्रदान कर दिया। कासिम हुसैन सुल्तान को बदायूं का गवर्नर नियुक्त किया गया।

मेवात पर विजय प्राप्त करने के बाद बाबर सम्भल गया और वहाँ से चन्देरी पर आक्रमण करने की योजनाएँ बनाने लगा। चन्देरी का दुर्ग चन्देरी नगर के सामने 230 फुट ऊँची चट्टान पर स्थित था। यह दुर्ग मालवा तथा बुन्देलखण्ड की सीमाओं पर स्थित था और मालवा से राजपूताना जाने वाली सड़क पर बना हुआ था। इस कारण चंदेरी व्यापारिक तथा सामरिक दोनों ही दृष्टियों से अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। चन्देरी दुर्ग पर इन दिनों राणा सांगा के दुर्गपति मेदिनी राय का अधिकार था तथा चन्देरी नगर में बहुत से धनपति रहते थे।

राणा सांगा की पराजय के बाद भी मेदिनी राय ने बाबर के प्रभुत्व को स्वीकार नहीं किया था। इसलिए जनवरी 1528 में बाबर अपनी सेना के साथ चन्देरी पहुँचा। बाबर ने अपने सैनिकों को युद्ध के लिये प्रेरित करने हेतु इस युद्ध को भी ‘जेहाद’ का नाम दिया।

बाबर ने चन्देरी के दुर्ग पर आक्रमण कर दिया। राजपूतांे ने अपनी पराजय निश्चित जानकर अपनी स्त्रियों को मौत के घाट उतार दिया तथा मरते दम तक मुगलों का सामना करते हुए रणखेत रहे। भीषण युद्ध के उपरान्त बाबर ने दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इस युद्ध में भी राजपूतों का भीषण संहार हुआ। अहमदशाह को चन्देरी का शासक नियुक्त किया गया। राजा मेदिनी राय की दो कन्याएँ इस युद्ध में पकड़ी गईं जिनमें से एक कामरान को और दूसरी हुमायूँ को भेजी गई।

बाबर ने मेदिनी राय की कन्याओं के पकड़े जाने का उल्लेख नहीं किया है। वह लिखता है- ‘जब मेरे सैनिक मेदिनीराय के घर में घुसे तो उन्होंने देखा कि मेदिनीराय के आदमी मेदिनीराय के घर के सदस्यों की हत्या कर रहे थे। एक आदमी हाथ में तलवार लेकर खड़ा होता था और घर के सदस्य उस तलवार के नीचे गर्दन रखकर गर्दन कटवाते थे।’ यहाँ बाबर ने आधा सत्य बोला है। वस्तुतः मेदिनी राय के आदेश से उसके परिवार की महिलाओं की गर्दनें काटी गई थीं ताकि वे शत्रु के हाथों में न पड़ें और दुर्गति होने से बच सकें।

चंदेरी विजय बाबर की बड़ी विजयों मे से एक मानी जाती है। यहाँ से बाबर को विपुल धन राशि प्राप्त हुई। इस प्रकार पानीपत, चंदेरी एवं खानवा में हिन्दुओं ने हिन्दुस्तान खो दिया!

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाबर की बेगमें और बेटे एक-एक करके हिन्दुस्तान आने लगे (34)

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बाबर की बेगमें और बेटे एक-एक करके हिन्दुस्तान आने लगे

बाबर ने पानीपत, खानवा एवं चंदेरी के युद्धों में जीत हासिल करके भारत में अपना राज्य जमा लिया था किंतु उसका परिवार अभी तक अफगानिस्तान में था। इसलिए बाबर ने अपने परिवार को भारत बुलाने का निश्चय किया। इस कारण बाबर की बेगमें और बेटे एक-एक करके हिन्दुस्तान आने लगे।

खानवा का युद्ध जीतने के बाद बाबर ने चंदेरी पर आक्रमण किया। चंदेरी का शासक मेदिनीराय इस युद्ध में काम आया जो महाराणा सांगा का सामंत था। चंदेरी से अवकाश पाकर बाबर ने उन क्षेत्रों पर फिर से अधिकार कर लिया जो उसकी खानवा एवं चंदेरी युद्धों की व्यस्तताओं के कारण अफगानों ने दबा लिए थे।

पाठकों को स्मरण होगा कि बाबर ने हुमायूँ को बदख्शां के सैनिकों के साथ अफगानिस्तान लौट जाने की आज्ञा दी थी। बाबर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- ‘मुझे सूचना मिली कि हुमायूँ ने दिल्ली पहुंचकर दिल्ली के किले में रखा खजाना खुलवाया तथा उसमें से बहुत सा खजाना मेरी अनुमति के बिना अपने अधिकार में ले लिया। मुझे हुमायूँ से ऐसी आशा नहीं थी। इसलिए मैंने हुमायूँ को बड़ी कठोर चिट्ठियां लिखकर उसे भविष्य में ऐसा न करने की चेतावनी दी।’

बाबर ने अपनी पुस्तक में अपनी सेना में नियुक्त तरदी बेग खाकसार नामक एक सेनापति का उल्लेख किया है जो एक दरवेश था और बाबर के कहने से दरवेश का जीवन त्यागकर सैनिक बन गया था किंतु अब वह फिर से दरवेश बनना चाहता था। बाबर ने उसे ऐसा करने की अनुमति दे दी तथा उसे अपना राजदूत नियुक्त करके कामरान के पास कांधार भेज दिया।

बाबर ने उसके हाथों कामरान के लिए 3 लाख रुपए भी भिजवाए। अब बाबर ने कभी भी काबुल या कांधार न लौटने तथा आगरा में ही रहने का निश्चय कर लिया था इसलिए उसने अपनी बेगमों को संदेश भिजवाया कि वे आगरा आ जाएं। बाबर का परिवार बहुत लम्बा-चौड़ा था। बाबर की कई बेगमें थीं जिनमें आयशा सुल्तान बेगम, जैनब सुल्तान बेगम, मासूमा सुल्तान बेगम, बीबी मुबारिका, गुलरुख बेगम, दिलदार बेगम, गुलनार बेगम, नाजगुल अगाचा तथा सलिहा सुल्तान बेगम के नाम मिलते हैं।

इन बेगमों से बाबर को ढेर सारी औलादें प्राप्त हुईं। इनमें हुमायूँ मिर्जा, कामरान मिर्जा, हिंदाल मिर्जा, अस्करी मिर्जा, अहमद मिर्जा, शाहरुख मिर्जा, बरबुल मिर्जा, अलवार मिर्जा, फारूख मिर्जा, फख्रउन्निसा बेगम, ऐसान दौलत बेगम, मेहर जहान बेगम, मासूमा सुल्तान बेगम, गुलजार बेगम, गुलरुख बेगम, गुलबदन बेगम, गुलचेहरा बेगम तथा गुलरांग बेगम के नाम प्रमुखता से मिलते हैं। इनमें से कुछ पुत्रों एवं पुत्रियों की मृत्यु बाबर के जीवनकाल में हो गई थी। बाबर की कुछ बेगमों एवं पुत्रियों के नाम एक जैसे मिलते हैं।

यद्यपि बाबर का परिवार बहुत बड़ा था तथापि बाबर अपने परिवार से बहुत प्रेम करता था। इसका एक बहुत बड़ा कारण यह था कि बाबर की तरह बाबर के परिवार ने भी जीवन भर अनेक कष्ट सहे थे और दर-दर की ठोकरें खाई थीं किंतु हर हालत में बाबर का साथ दिया था। इन बेगमों के अतिरिक्त बाबर की बहिनें, बुआएं, मौसियां, मामियां आदि भी बाबर के साथ ही रहती थीं।

बाबर का पिता बहुत कम आयु में अचानक ही मृत्यु को प्राप्त हो गया था। इसलिए वह बाबर की बहिनों का विवाह नहीं कर सका था। बाबर स्वयं भी 11 वर्ष की आयु से ही युद्धों में व्यस्त हो गया था इस कारण उसे भी अपनी बहिनों एवं पुत्रियों का विवाह करने का अवसर नहीं मिला था। बाबर की कुछ विधवा बुआएं, मौसियां एवं मामियां भी बाबर के हरम में रहा करती थीं। इनमें से कइयों की पुत्रियों के साथ बाबर ने विवाह कर लिए थे।

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बाबर को अपने पुत्रों से विशेष स्नेह था क्योंकि बाबर के बेटों ने भी बाबर की तरह ही बहुत कम आयु में जिम्मेदारियों का बोझ अपने कंधों पर ले लिया था और कदम-कदम पर अपने पिता का साथ दिया था। इनमें हुमायूँ तथा कामरान प्रमुख थे। जब बाबर काबुल, कांधार, गजनी तथा बदख्शां पर अधिकार करने में सफल हो गया तो उसने हुमायूँ को बदख्शां का और कामरान को कांधार का गवर्नर नियुक्त किया था। बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम ने लिखा है कि सबसे पहले 23 नवम्बर 1527 को दादी बेगमें फख्रेजहाँ बेगम तथा खदीजा सुल्तान बेगम का भारत आगमन हुआ। बादशाह उनके स्वागत के लिए सिकंदराबाद में उपस्थित हुआ। बाबर ने भी अपने संस्मरणों में बेगमों के प्रथम दल के आगमन की यही तिथि दी है। गुलबदन बेगम ने लिखा है कि राणा सांगा पर विजय के एक वर्ष बाद आकाम माहम बेगम काबुल से हिन्दुस्तान आई। मैं भी उन्हीं के साथ अपनी बहिनों के आगे ही आकर अपने पिता से मिली। जब आकाम आगरा से कुछ दूरी पर स्थित अलीगढ़ पहुंची तब बादशाह ने दो पालकी तीन सवारों के साथ भेजीं।

जब बादशाह को समाचार मिला कि आकाम बेगम आगरा के निकट पहुंच गई है, तब बाबर पैदल ही बेगम की अगवानी के लिए रवाना हो गया तथा पैदल चलकर ही बेगम को अपने महल तक लाया, बेगम अपनी पालकी में बैठी रही।

आकाम के साथ सौ मुगलानी दासियां अच्छे घोड़ों पर सवार होकर आई थीं और बेहद सजी-धजी थीं। बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम तथा उसकी कुछ अन्य बहिनें भी इसी दल के साथ हिन्दुस्तान आई थीं किंतु उन्हें एक बाग में रोक दिया गया और अगले दिन बादशाह के समक्ष प्रस्तुत होने को कहा गया। बाबर ने अगले दिन अपने मंत्री निजामुद्दीन अली मुहम्मद खलीफा को उसकी औरत के साथ शहजादियों की अगवानी करने भेजा।

बेगमों के इस दल के आगरा पहुंचने के कुछ दिन बाद ही बेगमों का एक और दल काबुल से आगरा पहुंचा। इस दल में बाबर की बड़ी बहिन खानजाद बेगम थी जिसका नाम आकः जानम था। अपनी बड़ी बहिन के स्वागत के लिए बाबर आगरा से चलकर नौग्राम तक गया। आकः जानम के साथ बाबर के कुल की बहुत सी बेगमें आई थीं जिनमें बाबर की मौसियां, मामियां, ताइयां आदि शामिल थीं। बाबर इन सबको बड़े प्रेम से आगरा लेकर आया और उन्हें रहने के लिए आवास प्रदान किए।

18 सितम्बर 1528 को बाबर का पुत्र मिर्जा अस्करी भी बाबर के आदेश पर भारत आ गया। इस समय तक मिर्जा अस्करी 12 साल का हो चुका था। बाबर ने उसे मुल्तान का गवर्नर नियुक्त किया। संभवतः अस्करी को मुल्तान में नियुक्त किए जाने से कुछ समय पहले ही कामरान की नियुक्ति कांधार से मुल्तान की जा चुकी थी किंतु अब बाबर ने कामरान की जगह अस्करी को मुल्तान का गवर्नर बनाया और कामरान को काबुल का गवर्नर बनाकर भेज दिया। इस समय हुमायूँ बदख्शां के गवर्नर के पद पर नियुक्त था और बाबर के आदेश पर बदख्शां में ही निवास कर रहा था।

बाबर ने लिखा है कि 15 अक्टूबर 1528 को मैंने आगरा पहुंचकर खदीजा बेगम से भेंट की तथा 17 अक्टूबर 1528 को अपनी तीन दादी बेगमों गौहर शाद बेगम, बदी उल जमाल बेगम तथा आकः बेगम और अन्य छोटी बेगमों सुल्तान मसऊद मिर्जा की पुत्री खानजादा बेगम, सुल्तान बख्त बेगम की पुत्री मेरी यीनका और जैनम सुल्तान बेगम से भेंट की। अर्थात् इस समय तक लगभग सारी बेगमें काबुल से भारत आ चुकी थीं। बाबर ने लिखा है कि वह मुगल बेगमों को आगरा, सीकरी, धौलपुर एवं बयाना आदि स्थानों पर बाबर द्वारा बनवाए गए बगीचे, पानी के हौज तथा भवन आदि दिखाने ले गया।

एक दिन बाबर ने बेगमों के सामने उस्ताद अली कुली द्वारा बनाई गई विशाल तोप का प्रदर्शन करवाया जो बहुत दूरी तक पत्थर के गोले फैंकती थी। प्रदर्शन के दौरान यह तोप फट गई जिससे आठ सैनिकों की मृत्यु हो गई किंतु फटने से पहले तोप ने पत्थर का गोला काफी दूरी तक फैंक दिया था।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

फजल अब्बास कलंदर ने बाबर से अयोध्या में मस्जिद बनाने को कहा (35)

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फजल अब्बास कलंदर ने बाबर से अयोध्या में मस्जिद बनाने को कहा

फकीर फजल अब्बास कलंदर ने कहा कि जन्मस्थान मंदिर तुड़वा कर मेरी नमाज के लिए एक मस्जिद बनवा दो। बाबर ने कहा कि मैं आपके लिए इसी मंदिर के पास एक मस्जिद बनवा देता हूँ। इस पर फकीर फजल अब्बास कलंदर ने कहा मैं इस मंदिर को तुड़वाकर उसकी जगह मस्जिद बनवाना चाहता हूँ। तू न मानेगा तो मैं तुझे बद्दुआ दूंगा। बाबर को फकीर की बात माननी पड़ी।

खानवा और चंदेरी के युद्धों से निबटकर बाबर ने हुमायूँ को बदख्शां का, कामरान को काबुल का तथा मिर्जा अस्करी को मुल्तान का गवर्नर नियुक्त कर दिया और स्वयं आगरा में रहने लगा। अब बाबर ने अपने हरम में रहने वाली कई पीढ़ियों की बहुत सारी बेगमों और शहजादियों को भारत बुला लिया।

पाठकों को स्मरण होगा कि पानीपत के युद्ध में इब्राहीम लोदी की मृत्यु के बाद उसका भाई मुहम्मद खाँ लोदी अपने बाप-दादों के राज्य को मुक्त करवाने के लिए संघर्ष कर रहा था। लोदियों के समय के बहुत से अफगान गवर्नर भी अपने-अपने प्रांतों पर फिर से कब्जा करने के लिए प्राण-प्रण से जूझ रहे थे। यही कारण था कि पंजाब एवं सिंध से लेकर बदायूं, रापरी, कन्नौज एवं बिहार तक के विशाल क्षेत्र में अफगान स्थान-स्थान पर बाबर की सेनाओं से युद्ध कर रहे थे।

महमूद खाँ लोदी, दिल्ली के मरहूम सुल्तान सिकन्दर लोदी का पुत्र और दिल्ली के मरहूम सुल्तान इब्राहीम लोदी का भाई था। पानीपत के युद्ध के उपरान्त हसन खाँ मेवाती तथा राणा सांगा ने महमूद खाँ लोदी को इब्राहीम लोदी का उत्तराधिकारी स्वीकार कर लिया था। खानवा के युद्ध में वह बाबर के विरुद्ध लड़ा भी था और परास्त होकर कुछ दिनों के लिये मेवाड़ चला गया जहाँ से वह बिहार पहुँचा और अफगानों को मुगलों के विरुद्ध संगठित करने लगा।

बाबर भारत में अब तक पंजाब, दिल्ली, खानवा, मेवात तथा चन्देरी सहित अनेक युद्ध जीत चुका था। अब वह रायसेन, भिलसा, सारंगपुर तथा चित्तौड़ पर आक्रमण करना चाहता था परन्तु इसी समय उसे कन्नौज की तरफ से अफगानों के बड़े उपद्रव की सूचना मिली।

इसलिये बाबर अपनी योजना बदल कर अफगानों के दमन के लिए चल पड़ा। बहुत से अफगान सेनापति भयभीत होकर बिहार तथा बंगाल की ओर भाग गये और महमूद खाँ लोदी की अध्यक्षता में संगठित होने लगे।

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मारूफ का पुत्र भी बाबर की सेना आने से पहले ही भाग खड़ा हुआ। बिबन, बायजीद तथा मारूफ गंगाजी के पूर्वी घाट पर कन्नौज के सामने बाबर का मार्ग रोककर खड़े हो गए। इस पर बाबर की सेना ने गंगाजी पर पुल बनाने का निर्णय लिया। अफगान अमीरों को गंगाजी पर पुल बनाने का बाबर का विचार बड़ा ही हास्यास्पद प्रतीत हुआ इसलिए वे बाबर की खिल्ली उड़ाने लगे और पुल बनाने वालों पर तीर फैंकने लगे। अफगानों को पुल के काम में बाधा उत्पन्न करने से रोकने के लिए उस्ताद अली कुली ने गंगाजी के किनारे पत्थर फैंकने की तोपें लगा दीं। मुस्तफा रूमी ने भी जर्जबन की गाड़ियां पुल के आसपास तैनात कर दीं तथा बंदूकचियों को भी पुल का निर्माण करने वालों की रक्षा पर तैनात किया। बाबर की जीवनी पढ़ने से ऐसा लगता है कि उस काल में जो मशीन पत्थर फैंकती थी, उसे तोप कहा जाता था और जो मशीनें बारूद फैंकती थीं, उन्हें फिरंगी और जर्जबन कहा जाता था। बंदूकों को तुफंग कहा जाता था।

उस्ताद अली कुली ने गाजी नामक तोप का निर्माण किया जो पत्थर दागने में बड़ी सफल मानी गई। इस तोप ने राणा सांगा के विरुद्ध खानवा के मैदान में भी कहर ढाया था। उस्ताद अली ने एक और बड़ी तोप बनाई थी जो बेगमों के सामने किए गए प्रदर्शन के दौरान फट जाने से बेकार हो गई थी।

जब गंगाजी पर पुल बनकर तैयार हो गया तब 13 मार्च 1528 को बाबर की सेना उस पर चढ़कर पार हो गई। अफगानियों को आशा नहीं थी कि बाबर इतनी चौड़ी नदी पर पुल बनाने में सफल हो जाएगा। इसलिए वे बाबर की सेना को अपनी तरफ आता देखकर हैरान रह गए। फिर भी अफगान सेना किसी भी स्थिति से निबटने को तैयार थी। अफगान सेना हाथियों पर चढ़कर बाबर की सेना से लड़ने के लिए आई।

इस दौरान बाबर के बंदूकचियों ने अच्छा काम किया। उन्होंने अफगानियों को पीछे धकेल दिया और जो अफगान गोली लगने से घोड़ों से गिर गए थे, उनके सिर कलम कर दिए। 15 मार्च 1528 को बाबर की तोपगाड़ियों को भी नदी के पार उतार दिया गया। उस दिन बाबर ने युद्ध का नक्कारा बजाया जिसे सुनकर अफगानी भाग खड़े हुए।

चीन तीमूर तथा सुल्तान खाँ आदि अनेक सेनापतियों को आदेश दिया गया कि वे अपनी-अपनी टुकड़ियां लेकर अफगानियों का पीछा करें और उन्हें मौत के घाट उतारें। इन सभी सेनापतियों को आदेश दिया गया कि वे चीन तीमूर के आदेशों का पालन करें। बाबर इस बार कुछ ऊंट भी अपने साथ लाया था ताकि युद्ध का मैदान छोड़कर भाग रहे शत्रु का तेजी से पीछा किया जा सके। फिर भी बाबर की सेना अफगानियों का पीछा करने में विशेष सफलता प्राप्त नहीं कर सकी। इस विजय के बाद बाबर अयोध्या पहुंचा।

बाबर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि मार्च 1528 में बाबर अवध पहुंचा था किंतु बाबर ने यह नहीं लिखा है कि वह अवध क्यों गया था? बाबर की आत्मकथा में उल्लिखित अवध की यह यात्रा भारत के इतिहास को दिया गया ऐसा घाव है जिसका बाबर ने उल्लेख तक नहीं किया है किंतु लाला सीताराम बीए आदि कुछ लेखकों ने बाबर की इस यात्रा का विस्तार से वर्णन किया है।

लाला सीताराम बी ए ने अपनी पुस्तक अयोध्या का इतिहास में लिखा है कि ईस्वी 1528 में बाबर दलबल सहित अयोध्या की ओर बढ़ा और उसने घाघरा के संगम पर डेरा डाला। यह संगम अयोध्या से तीन कोस पूर्व में स्थित था। यहाँ वह एक सप्ताह तक आसपास के क्षेत्रों का प्रबंध करता रहा। एक दिन वह अयोध्या के फकीर फजल अब्बास कलंदर के दर्शन करने आया। उस कलंदर ने बाबर को एक चमत्कार दिखाया जिसे देखकर बाबर हैरान रह गया और प्रतिदिन फकीर के दर्शन को आने लगा।

एक दिन फकीर फजल अब्बास कलंदर ने कहा कि जन्मस्थान मंदिर तुड़वा कर मेरी नमाज के लिए एक मस्जिद बनवा दो। बाबर ने कहा कि मैं आपके लिए इसी मंदिर के पास एक मस्जिद बनवा देता हूँ। मंदिर तोड़ना मेरे उसूल के खिलाफ है। इस पर फकीर फजल अब्बास कलंदर ने कहा मैं इस मंदिर को तुड़वाकर उसकी जगह मस्जिद बनवाना चाहता हूँ। तू न मानेगा तो मैं तुझे बद्दुआ दूंगा। भयभीत बाबर को फकीर की बात माननी पड़ी और वह मीर बाकी को फकीर की इच्छा पूरी करने की आज्ञा देकर आगरा लौट गया।

‘तारीख पानीना मदीनतुल औलिया’ नामक पुस्तक में लिखा है कि बाबर अपनी किशोरावस्था में एक बार हिंदुस्तान आया था और अयोध्या के दो मुसलमान फकीरों से मिला था। एक का नाम फजल अब्बास कलंदर था और दूसरे का नाम मूसा अशिकान था।

बाबर ने इन फकीरों से प्रार्थना की कि मुझे आशीर्वाद दीजिए जिससे मैं हिन्दुस्तान का बादशाह बन जाऊं। फकीरों ने उत्तर दिया कि तुम जन्मस्थान मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनवाने की प्रतिज्ञा करो तो हम तुम्हारे लिए दुआ करें। बाबर ने फकीरों की बात मान ली और अपने देश को लौट गया। इतिहास गवाह है कि तारीख पानीना मदीनतुल औलिया में लिखी गई ये बातें बिल्कुल झूठी हैं। बाबर अपनी किशोरावस्था में कभी हिन्दुस्तान नहीं आया था।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

राजगुरु देवीनाथ पांडे

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राजगुरु देवीनाथ पांडे

राजगुरु देवीनाथ पांडे ने श्रीराम जन्मभूमि हेतु पहला बलिदान दिया!

जिस समय बाबर के सेनापति मीर बाकी ने राममंदिर तोडने के लिए अयोध्या पर अभियान किया, उस समय राजगुरु देवीनाथ पांडे पहला व्यक्ति था जिसने सेना लेकर मीर बाकी का मार्ग रोका तथा अपने प्राणों का बलिदाऩ दिया।

बाबर मार्च 1528 में अफगानियों से लड़ने के लिए पूरब में गया तो उसने घाघरा के किनारे पर अपना शिविर लगाया तथा अयोध्या में रहने वाले फकीर फजल अब्बास कलंदर से मिला। कलंदर ने बाबर से कहा कि मेरे लिए अयोध्या में रामजन्म भूमि मंदिर के स्थान पर मस्जिद बनाई जाए।

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कुछ लेखकों के अनुसार यह अनुरोध फजल अब्बास कलंदर और मूसा अशिकान दोनों ने किया था। महात्मा बालकराम विनायक ने अपनी पुस्तक कनकभवन रहस्य में लिखा है- ‘बाबर के शिया सेनापति मीर बाकी ने ई.1528 में अयोध्या की तरफ अभियान किया। 17 दिनों तक हिंदुओं से लड़ाई होती रही। अंत में हिन्दुओं की हार हुई।’ कुछ अन्य लेखकों ने लिखा है कि भाटी नरेश महताबसिंह तथा हँसवर नरेश रणविजयसिंह ने अयोध्या में मीरबाकी का मार्ग रोका। उनका नेतृत्व हँसवर के राजगुरु देवीनाथ पांडे ने किया। सर्वप्रथम राजगुरु ने ही अपनी सेना के साथ मीर बाकी पर आक्रमण किया। वह स्वयं भी तलवार हाथ में लेकर मीरबाकी के सैनिकों पर टूट पड़ा। मीरबाकी ने छिपकर राजगुरु देवीनाथ पांडे को गोली मारी। हिन्दू सैनिक तलवार लेकर लड़ रहे थे जबकि मीर बाकी ने तोपों का सहारा लिया। लखनऊ गजट के लेखक कनिंघम के अनुसार इस युद्ध में 1,74,000 हिन्दू सैनिकों ने प्राणों की आहुति दी। हिंदुओं से हुए युद्ध में मीर बाकी विजयी हुआ। उसने राम जन्मभूमि पर एक मस्जिद का निर्माण करवाया।

कनिंघम द्वारा दी गई संख्या बहुत अधिक लगती है किंतु संभवतः यह संख्या मीर बाकी द्वारा अयोध्या पर आक्रमण किए जाने से लेकर कनिंघम द्वारा गजेटियर लिखे जाने तक हिंदुओं द्वारा दिए गए बलिदानों की कुल संख्या है। लाला सीताराम बीए ने लिखा है- ‘जब मीर बाकी ने जन्मभूमि मंदिर के भीतर प्रवेश करना चाहा तो मंदिर का पुजारी चौखट पर खड़ा होकर बोला कि मेरे जीते जी तुम भीतर नहीं जा सकते। इस पर बाकी झल्लाया और तलवार खींचकर उसे कत्ल कर दिया। जब मीर बाकी मंदिर के भीतर गया तो उसने देखा कि मूर्तियां नहीं हैं, वे अदृश्य हो गई हैं। वह पछताकर रह गया। कालांतर में लक्ष्मणघाट पर सरयूजी में स्नान करते हुए एक दक्षिणी ब्राह्माण को ये मूर्तियां मिलीं। वह बहुत प्रसन्न हुआ। उसने स्वर्गद्वारम् मंदिर में उन मूर्तियों की स्थापना की।’

लाला सीताराम बीए ने लिखा है- ‘इस मंदिर के ठाकुर काले रामजी के नाम से प्रसिद्ध थे। इसमें एक बड़े काले पत्थर पर राम पंचायतन की पांच मूर्तियां खुदी हुई थीं। बाकी बेग ने मंदिर की ही सामग्री से मस्जिद बनवाई थी। मस्जिद के भीतर बारह और बाहर फाटक पर दो काले कसौटी पत्थर के स्तम्भ लगे हुए हैं। केवल वे स्तम्भ ही अब प्राचीन मंदिर के स्मारक रह गए हैं। इस मंदिर के चार स्तम्भ शाह की कब्र पर लगवाए गए थे जिनमें से दो स्तम्भ अब फैजाबाद के संग्रहालय में रखे हुए हैं।’

लाला सीताराम बीए ने लिखा है- ‘जब मूसा आशिकान मरने लगा तो उसने अपने चेलों से कहा कि जन्मस्थान मंदिर हमारे ही कहने से तोड़ा गया है, इसके दो खंभे बिछाकर हमारी लाश रखी जाए और दो खंभे हमारे सिरहाने गाड़ दिए जाएं। मूसा के चेलों द्वारा ऐसा ही किया गया। मीर बाकी ने इस ढांचे के फाटक पर तीन पंक्तियों का एक लेख लगवाया जिसमें लिखा था-

बनामे आँ कि दाना हस्त अकबर

कि खालिक जुमला आलम लामकानी।

हरूदे मुस्तफ़ा बाहज़ सतायश

कि सरवर अम्बियाए दोजहानी।

फिसाना दर जहाँ बाबर कलंदर

कि शुद दर दौरे गेती कामरानी।’

अर्थात्- उस अल्लाह के नाम से जो महान् और बुद्धिमान है, जो सम्पूर्ण जगत् का सृष्टिकर्ता और स्वयं निवास-रहित है। अल्लाह के बाद मुस्तफ़ा की कथा प्रसिद्ध है जो दोनों जहान और पैगम्बरों के सरदार हैं। संसार में बाबर और कलंदर की कथा प्रसिद्ध है जिससे उसे संसार-चक्र में सफलता मिलती है।

मस्जिद के भीतर भी तीन पंक्तियों का एक लेख था जिसमें लिखा गया था-

बकरमूद ऐ शाह बाबर कि अहलश

बनाईस्त ता काखे गरहूं मुलाकी।

बिना कर्द महबते कुहसियां अमीरे स आहत निशां मीर बाकी।

बुअह खैर बाकी यूं साले बिनायश।

अर्थात्- बादशाह बाबर की आज्ञा से जिसके न्याय की ध्वजा आकाश तक पहुंची है। नेकदिल मीर बाकी ने फरिश्तों के उतरने के लिए यह स्थान बनवाया है। उसकी कृपा सदा बनी रहे।

इस लेख के आधार पर माना जाता है कि इसमें वर्णित फरिश्तों के उतरने के स्थान का आशय रामजी की जन्मभूमि से है। जबकि मुसलमानों का मानना है कि यहाँ जिन फरिश्तों के उतरने के लिए स्थान बनाया गया है वह मस्जिद है न कि मंदिर। उनके अनुसार यह स्थान इस्लाम में वर्णित उन फरिश्तों से सम्बन्धित है जो धरती पर अल्लाह का संदेश लेकर आते हैं।

इस लेख को बाद के वर्षों में तोड़कर वहीं पटक दिया गया किंतु इसके टुकड़ों से इस इमारत के बनाने का वर्ष 935 हिजरी (ई.1528) भी ज्ञात हो जाता है। चूंकि इस शिलालेख में बाबर के आदेश का उल्लेख हुआ है इसलिए इस इमारत को बाबरी ढांचा कहा जाने लगा। इस मंदिर को फिर से प्राप्त करने के लिए हिन्दू पांच सौ सालों तक संघर्ष करते रहे और तब तक अपने प्राणों का बलिदान देते रहे जब तक कि ई.2019 में यह मंदिर हिंदुओं को वापस नहीं मिल गया।

सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी में ऑस्ट्रिया के एक पादरी, फादर टाइफैन्थेलर ने अयोध्या की यात्रा की तथा लगभग 50 पृष्ठों में अयोध्या यात्रा का वर्णन किया। इस वर्णन का फ्रैंच अनुवाद ई.1786 में बर्लिन से प्रकाशित हुआ। उसने लिखा- ‘अयोध्या के रामकोट मौहल्ले में तीन गुम्बदों वाला ढांचा है जिसमें काले रंग की कसौटी के 14 स्तम्भ लगे हुए हैं। इसी स्थान पर भगवान श्रीराम ने अपने तीन भाइयों सहित जन्म लिया। जन्मभूमि पर बने मंदिर को बाबर ने तुड़वाया। आज भी हिन्दू इस स्थान की परिक्रमा करते हैं और साष्टांग दण्डवत करते हैं।’

भारत की आजादी के बाद 22 दिसम्बर 1949 की रात्रि में लगभग तीन बजे अचानक बाबरी ढांचे में भगवान का प्राकट्य हुआ वर्ष 1992 में बाबर द्वारा बनाए गए ढांचे को तोड़ दिया गया तथा रामलला को कपड़े के एक टैंट में विराजमान कर दिया गया। वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने यह मंदिर फिर से हिन्दुओं को लौटा दिया। देश के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने एक ट्रस्ट का गठन करके इस स्थान पर भव्य राममंदिर का निर्माण आरम्भ करवाया है।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार जिस ढांचे को बाबरी-मस्जिद अथवा बाबरी ढांचा कहा जाता था, उसे वास्तव में इल्तुतमिश के पुत्र तथा अयोध्या के गवर्नर नासिरुद्दीन ने बनवाया था। मीर बाकी ने उस ढांचे की मरम्मत करवाकर उसमें अपने शिलालेख लगवा दिए ताकि बाबर को खुश किया जा सके और स्वयं इस मस्जिद को बनाने का श्रेय लिया जा सके।

कुछ इतिहासकारों ने सिद्ध करने की चेष्टा की है कि यह मस्जिद औरंगजेब के समय में बनी तथा इसे बाबरी मस्जिद कहा गया किंतु औरंगजेब के समकालीन इतिहासकारों ने अयोध्या का श्रीराम जन्मभूमि मंदिर तोड़े जाने और उसके स्थान पर मस्जिद बनवाए जाने का कोई उल्लेख नहीं किया है। औरंगजेब के काल के सरकारी फरमानों में भी इस बात का कोई उल्लेख नहीं मिलता है।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दिल्ली सल्तनत का स्वामी बन गया बाबर (37)

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दिल्ली सल्तनत का स्वामी बन गया बाबर

समरकंद और फरगना से लुट-पिट कर आया बाबर पानीपत का युद्ध, खानवा का युद्ध, चंदेरी का युद्ध और घाघरा का युद्ध जीतकर दिल्ली सल्तनत का स्वामी बन गया। यह भारत भूमि का दुर्भाग्य ही था कि भारत के बड़े-बड़े हिन्दू राजा देखते ही रह गए और एक असभ्य लुटेरा गंगा-यमुना के हरे-भरे मैदानों का मालिक बन बैठा। 

मार्च 1528 में बाबर के आदेश से उसके सेनापति मीर बाकी ने अयोध्या में स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर को तोड़कर उसके स्थान पर एक ढांचा बनवाया तथा उसके बाहर फरिश्तों के उतरने का स्थान शब्दों से युक्त दो शिलालेख लगवाए जिनमें अपना और अपने बादशाह बाबर के नाम का उल्लेख किया।

18 सितम्बर 1528 को बाबर का पुत्र मिर्जा अस्करी मुल्तान से आकर बाबर की सेवा में उपस्थित हुआ। उसे बाबर ने ही बुलाया था। उन्हीं दिनों बाबर को सूचना मिली कि सिकंदर लोदी के पुत्र महमूद खाँ लोदी ने पुनः 10 हजार सैनिकों की एक सेना एकत्रित कर ली है और उसने बिहार पर अधिकार कर लिया है। बाबर ने 20 दिसम्बर 1528 को मिर्जा अस्करी तथा कुछ अमीरों को महमूद खाँ लोदी का दमन करने के लिए भेजा।

महमूद खाँ लोदी ने मिर्जा अस्करी की सेना को पराजित कर दिया। इस पर 20 जनवरी 1529 को बाबर स्वयं भी बिहार के लिए रवाना हो गया। उधर महमूद खाँ लोदी भी अपनी सेना के साथ गंगा नदी के किनारे-किनारे चुनार की ओर बढ़ा। 31 मार्च 1529 को बाबर चुनार पहुँच गया। बहुत से अफगान डरकर बाबर की शरण में आ गये और बहुत से अफगान बंगाल की ओर भाग गये। बाबर निरंतर आगे बढ़ता हुआ गंगा तथा कर्मनाशा नदी के संगम पर पहुँच गया।

बाबर ने अफगानों से अन्तिम संघर्ष करने का निश्चय किया। एक मई 1529 को बाबर ने गंगा नदी को पार कर लिया। तीन दिन बाद बाबर की सेना ने घाघरा नदी को पार करने का प्रयत्न किया किंतु अफगानों ने बाबर की सेना को रोकने का भरसक प्रयास किया। घाघरा नदी तिब्बत से निकलकर नेपाल होती हुई भारत में प्रवेश करती है तथा उत्तर प्रदेश एवं बिहार में प्रवाहित होती हुई बलिया एवं छपरा के बीच गंगाजी में मिल जाती है।

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5 मई 1529 को घाघरा के तट पर अफगानों तथा मुगलों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध को भारत के इतिहास में घाघरा का युद्ध कहा जाता है। इस युद्ध में बाबर ने अफगान सेना को चित कर दिया। बहुत से अफगान अमीर भयभीत होकर मैदान से भाग खड़े हुए। वस्तुतः इब्राहीम लोदी की मृत्यु के बाद अफगान अमीर अपने क्षेत्रों पर फिर से अधिकार करने के लिए बड़े-बड़े मंसूबे बांधते थे और बाबर के विरुद्ध सैनिक अभियान भी आरम्भ करते थे किंतु उनके पास बाबर की तोपों, तुफंगों, फिरंगियों और जर्जबानों का तोड़ नहीं था। इसलिए वे बाबर से एक भी युद्ध नहीं जीत पाए। इन अफगानियों को अपने ही किए की सजा मिल रही थी। इनमें से किसी ने भी पानीपत के मैदान में अपने बादशाह इब्राहीम लोदी का साथ नहीं दिया था जिसके कारण एक विदेशी बादशाह को दिल्ली सल्तनत पर अधिकार करने का सहजता से ही अवसर प्राप्त हो गया था। अब पछताने से कुछ होने वाला नहीं था, बाबर रूपी चिड़िया दिल्ली सल्तनत रूपी दाना चुग चुकी थी। बाबर ने महमूद खाँ लोदी को परास्त करने के बाद बंगाल के शासक नसरतशाह को संधि करने के लिये विवश किया। नसरतशाह ने बाबर की अधीनता स्वीकार कर ली तथा भविष्य में विद्रोह नहीं करने का वचन दिया। यह बाबर की भारत में चौथी तथा अन्तिम विजय थी

अब तक बाबर ने पानीपत के मैदान में इब्राहीम लोदी को, खानवा के मैदान में महाराणा सांगा को, चंदेरी के युद्ध में मेदिनी राय को तथा घाघरा के तट पर महमूद खाँ लोदी को परास्त करके सिंधु नदी से लेकर गंगा और सोन नदी के संगम तक स्थित विशाल भूभाग को अपने अधीन कर लिया था। पंजाब से लेकर दिल्ली, मेवात, आगरा, अवध, कन्नौज, बिहार और बंगाल के सम्पन्न क्षेत्र अब बाबर के चरणों में लोटते थे। अब तक बाबर न केवल सम्पूर्ण दिल्ली सल्तनत का स्वामी बन चुका था अपितु उससे भी आगे बढ़ चुका था।

सिंधु, रावी, चिनाब, झेलम, सतलुज और व्यास के तटों पर स्थित धान के कटोरे, गंगा-यमुना के मैदानों में पेरे जाने वाले गन्नों के कोल्हू, कपास और नील के खेत, यमुना-तट की गायें, उनके स्तनों से बहने वाली दूध की अमल-धवल धाराएं, सरयू से लेकर सोन, घाघरा से लेकर कर्मनाशा और जूट पैदा करने वाली बंगाल की वसुंधरा, सब कुछ उस निर्धन बाबर के अधिकार में चले गए थे जो एक दिन दिखकाट की बुढ़िया के घर की लकड़ियां चीरकर पेट भरने को विवश हुआ था।

पाठकों को स्मरण होगा कि समरकंद से निकाले जाने के बाद बाबर जूतों की जगह पशुओं का चमड़ा पैरों पर लपेटता था और बदन पर ऊनी कम्बल से बना लबादा पहनता था। उसकी सेना के पास हथियारों के नाम पर मोटी-मोटी लकड़ियां थीं। अब बाबर न केवल दिल्ली सल्तनत का स्वामी था, अपितु उसकी पगड़ी में दुनिया का सबसे कीमती हीरा जगमगाता था जिसे वह कोहिनूर कहता था। दिल्ली और आगरा के भव्य महल और किले बाबर के रहने के मकान बनकर रह गए थे। ग्वालियर, कालिंजर और चंदेरी के दुर्गम किले बाबर के समक्ष शीश झुकाए बैठे थे।

जिस बाबर को कभी काबुल, कांधार और गजनी जैसे निर्धन और अनुपजाऊ प्रदेशों पर संतोष करना पड़ता था, अब वही बाबर दिल्ली, आगरा, बदायूं, चंदेरी और कन्नौज जैसे अनगिनत समृद्ध नगरों का स्वामी था।

बाबर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि सांगा के बाद उसका पुत्र रत्नसिंह चित्तौड़ का स्वामी हो गया था और सांगा का दूसरा पुत्र विक्रमाजीत अपनी माता पद्मावती (कर्मवती) के साथ रणथंभौर दुर्ग में रहता था। जब सांगा जीवित था तब उसने माण्डू के सुल्तान महमूद खिलजी को परास्त करके उससे रत्नजटित सोने की पेटी एवं रत्ननजटित सोने का मुकुट प्राप्त किया था। इस समय वे दोनों वस्तुएं विक्रमाजीत की माता पद्मावती के पास थीं। राणा रत्नसिंह इन दोनों चीजों की मांग कर रहा था किंतु विक्रमाजीत ये दोनों वस्तुएं अपने सौतेले बड़े भाई रत्नसिंह को देने को तैयार नहीं था।

बाबर ने लिखा है कि 29 सितम्बर 1528 को विक्रमाजीत ने अपने एक सम्बन्धी अशोक को मेरे पास भेजकर कहलवाया कि विक्रमाजीत बाबर की अधीनता स्वीकार करने को तथा महमूद के रत्नजटित कमरपेटी एवं मुकुट बाबर को देने को तैयार है यदि विक्रमाजीत को 70 लाख रुपए की जीविकावृत्ति दी जाए।

इस पर बाबर ने विक्रमाजीत से कहलवाया कि यदि विक्रमाजीत रणथंभौर का किला बाबर को समर्पित कर दे तो विक्रमाजीत को उसकी इच्छानुसार परगने दिए जाएंगे। इस पर विक्रमाजीत ने प्रस्ताव भिजवाया कि वह रणथंभौर के स्थान पर बयाना का किला दे सकता है। बाबर ने इस सम्बन्ध में आगे और कुछ नहीं लिखा है। संभवतः यह वार्त्ता आगे नहीं बढ़ पाई। बाबर दिल्ली सल्तनत का स्वामी तो बना किंतु कभी भी रणथंभौर दुर्ग का स्वामी नहीं बन सका।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

हुमायूँ की माता ने बाबर से कहा आप हमारे पुत्र को भूल जाइए (38)

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हुमायूँ की माता ने बाबर से कहा आप हमारे पुत्र को भूल जाइए

हुमायूँ की माता माहम बेगम ने शोक से कातर होकर कहा- ‘मेरा तो केवल यही एक पुत्र है, इसलिए मैं दुःखी होती हूँ किंतु आप बादशाह हैं, आपको क्या दुःख है? आपके कई अन्य पुत्र भी हैं। हमारे पुत्र को आप भूल जाइए!’

बाबर ने घाघरा के युद्ध में महमूद खाँ लोदी के नेतृत्व में एकत्रित 10 हजार अफगानियों को 5 मई 1529 को कड़ी शिकस्त दी और स्वयं आगरा लौट आया। आगरा आकर बाबर का स्वास्थ्य तेजी से बिगड़ने लगा। इसलिए अब वह किसी युद्ध-अभियान पर जाने की सोच भी नहीं सकता था।

इस समय बाबर का बड़ा पुत्र मिर्जा हुमायूँ बदख्शां में था। बाबर का दूसरे नम्बर का पुत्र मिर्जा कामरान काबुल में था और तीसरे नम्बर का पुत्र मिर्जा अस्करी बाबर के पास हिन्दुस्तान में था। बाबर का चौथा पुत्र मिर्जा हिंदाल इस समय हुमायूँ के पास बदख्शां में था। हालांकि बाबर की ढेरों बेगमों से ढेरों औलादें पैदा हुई थीं किंतु संभवतः बाबर के जीवनकाल के अंतिम भाग में यही चार पुत्र जीवित बचे थे क्योंकि आगे के इतिहास में बाबर के इन्हीं चार बेटों के नाम मिलते हैं।

हुमायूँ बाबर का बड़ा बेटा था और योग्य एवं आज्ञाकारी भी। इसलिए बाबर कामरान, हिंदाल तथा मिर्जा अस्करी की बजाय हुमायूँ को अपने साथ रखता था। यद्यपि हुमायूँ ने कई बड़ी गलतियां की थीं और बाबर ने उसे कई बार प्रताड़ित भी किया था किंतु बाबर जानता था कि उसके शहजादों में हुमायूँ सर्वाधिक योग्य एवं विश्वसनीय है।

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पाठकों को स्मरण होगा कि जब बाबर काबुल से अंतिम बार भारत पर आक्रमण करने के लिए आ रहा था तो उसने हुमायूँ को आदेश भिजवाया था कि वह तुरंत अपने सैनिकों को लेकर बदख्शां से बागेवफा आ जाए। उस समय बाबर अफगानिस्तान में बागेवफा नामक स्थान पर ठहरा हुआ था। बाबर को काफी समय तक हुमायूँ की प्रतीक्षा करनी पड़ी थी क्योंकि हुमायूँ बदख्शां से चलकर काबुल पहुंचा था और अपनी माता के कहने पर कई दिनों तक काबुल में रहा था। इस कारण जब हुमायूँ बाबर के पास पहुंचा था तो बाबर ने उसे कड़ी फटकार लगाई थी और इतना विलम्ब करने का कारण पूछा था। इसी तरह का एक और प्रकरण बाबर ने लिखा है कि जब हूमायूं को बदख्शां के सैनिकों के साथ काबुल जाने की आज्ञा दी गई तो हुमायूँ आगरा से चलकर दिल्ली पहुंचा। उसने दिल्ली के किले में रखे खजाने को जबरदस्ती खुलवाया तथा बहुत से खजाने को अपने अधिकार में ले लिया। बाबर को हुमायूँ से ऐसी आशा नहीं थी। इसलिए बाबर ने हुमायूँ को कड़ी फटकार लगाते हुए चिट्ठियां लिखीं और भविष्य में ऐसा फिर नहीं करने की चेतावनी भी दी। जब हुमायूँ आज्ञाकारी बालक की तरह बदख्शां चला गया तब बाबर ने उसे कई बार पुरस्कार तथा पत्र भिजवाकर उसका उत्साहवर्द्धन किया।

बाबर हुमायूँ को लिखे गए अपने पत्रों का आरम्भ इस प्रकार करता था- ‘हुमायूं! जिसे देखेने की मेरी बड़ी अभिलाषा है।’

संभवतः बाबर को इस बात का अंदेशा था कि हुमायूँ तथा कामरान के सम्बन्ध मधुर नहीं हैं। इसलिए बाबर ने अपने पत्रों के माध्यम से कामरान को कई बार आदेश दिए कि वह सदैव हुमायूँ के आदेशों का पालन करे। इसके साथ ही बाबर हुमायूँ को लिखा करता था कि वह अपने भाइयों से स्नेह करे तथा उनकी त्रुटियों को क्षमा करे।

हुमायूँ को लिखे अपने पत्रों में बाबर लगातार संदेश भिजवाता रहता था कि जब भी अवसर मिले वह समरकंद, बल्ख, हिसार फिरोजा अथवा किसी अन्य राज्य पर आक्रमण करके अपने राज्य की वृद्धि करे। बाबर की बड़ी इच्छा थी कि हुमायूँ समरकंद को अपनी राजधानी बना ले तथा कामरान बल्ख पर राज्य करे। अपनी इस इच्छा को बाबर कई पत्रों में व्यक्त कर चुका था।

दूसरी ओर हुमायूँ की रुचि अफगानिस्तान और मध्य-एशिया की बजाय भारत में अधिक थी। वह भारत की प्राकृतिक सम्पदा और आगरा तथा दिल्ली के किलों में रखे खजानों को देख चुका था इसलिए हुमायूँ का मन अब मध्य-एशिया में नहीं लगता था। ई.1529 में हुमायूँ को समाचार मिला कि बादशाह बाबर बीमार रहने लगा है। इस पर हुमायूँ ने बाबर के आदेशों की परवाह किए बिना भारत जाने का निर्णय लिया।

बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि जब हुमायूँ बदख्शां में था, तब हुमायूँ को समाचार मिले कि बादशाह बाबर आगरा में बीमार हो गया है। इस पर हुमायूँ बदख्शां का शासन अपने दस वर्षीय छोटे भाई हिंदाल को देकर स्वयं आगरा चला आया।

तारीखे अलफी में लिखा है कि ई.1530 के आरम्भिक महीनों में बाबर ने हुमायूँ को बदख्शां से भारत बुला लिया तथा मिर्जा हिंदाल को बदख्शां के शासन हेतु भेजा जबकि गुलबदन ने स्पष्ट लिखा है कि हुमायूँ के आने पर बाबर बेहद नाराज हुआ। गुलबदन बेगम ने यह भी लिखा है कि अंत में बादशाह ने हुमायूँ को क्षमा करके संभल की जागीर पर भेज दिया।

कुछ दिनों बाद बाबर को सूचना मिली कि हुमायूँ गंभीर रूप से बीमार हो गया है और उसके जीवन की आशा बहुत कम रह गई है। उस समय हुमायूँ दिल्ली में था।

मौलाना मुहम्मद फर्गली ने हुमायूँ की माता माहम बेगम को सूचना भिजवाई- ‘हुमायूँ मिर्जा मंदे हैं, हाल विचित्र है। बेगम साहब यह समाचार सुनते ही बहुत जल्दी आवें क्योंकि मिर्जा बहुत घबराए हुए हैं।’

गुलबदन बेगम ने लिखा है कि हुमायूँ की माता माहम बेगम तुरंत दिल्ली पहुंची और हुमायूँ को अपने साथ आगरा ले आई। जब बाबर ने हुमायूँ को देखा तो बाबर का चमकता हुआ चेहरा शोक से उतर गया और उसकी घबराहट बढ़ती ही चली गई।

माहम बेगम ने शोक से कातर होकर कहा- ‘मेरा तो केवल यही एक पुत्र है, इसलिए मैं दुःखी होती हूँ किंतु आप बादशाह हैं, आपको क्या दुःख है? आपके कई अन्य पुत्र भी हैं। हमारे पुत्र को आप भूल जाइए!’

इस पर बादशाह ने कहा- ‘माहम! हालांकि और पुत्र हैं किंतु तुम्हारे हुमायूँ के समान हमें किसी पर भी प्रेम नहीं है। यह संसार में अद्वितीय है। इसकी कार्यशैली में इसकी बराबरी और कोई नहीं कर सकता। मैं अपने प्रिय पुत्र हुमायूँ के लिए ही इस राज्य और संसार की इच्छा रखता हूँ, दूसरों के लिए नहीं!’

गुलबदन बेगम ने लिखा है- ‘बादशाह ने उसी दिन से मुर्तजाअली करमुल्ला की परिक्रमा आरम्भ की। यह परिक्रमा बुधवार से करते हैं किंतु बादशाह ने दुःख और घबराहट में मंगलवार से ही आरम्भ कर दी। हवा बहुत गरम थी तथा बादशाह का मन बहुत घबराया हुआ था। बादशाह ने परिक्रमा के दौरान प्रार्थना की कि हे अल्लाह! यदि प्राण के बदले प्राण दिया जाता हो तब मैं, बाबर अपनी अवस्था और प्राण हुमायूँ को देता हूँ। उसी दिन बादशाह फिर्दौस-मकानी मांदे हो गए और हुमायूँ ने स्नान करके बाहर आकर दरबार किया। लगभग दो-तीन महीने बादशाह पलंग पर ही रहे।’

इस बीच हुमायूँ स्वस्थ होकर कालिंजर चला गया। जब बाबर का रोग बढ़ने लगा तो हुमायूँ को बुलाने के लिए आदमी भेजे गए। हुमायूँ कालिंजर से वापस आगरा आ गया।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाबर का व्यक्तित्व विकृति का शिकार था (39)

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बाबर का व्यक्तित्व इतिहासकारों के लिए जटिल पहले बनकर रह गया है। एक तरफ तो वह उच्च कोटि की कविताएं लिखता था और दूसरी ओर जीवन भर युद्ध के मैदानों में रहकर क्रूरतम अत्याचार करता था। एक ओर तो वह अपने परिवार से अनन्य प्रेम करता था और दूसरी ओर वह हिन्दुओं के सिर कटवाकर उनकी मीनारें चिनवाया करता था। तैमूर लंग और चंगेज खाँ के रक्त मिश्रण से उत्पन्न बाबर का व्यक्तित्व गंभीर मनोविकृति का शिकार था।

बाबर चाहता था कि उसका पुत्र हुमायूँ मध्य-एशिया को जीतकर समरकंद को अपनी राजधानी बनाए किंतु हुमायूँ बाबर के आदेशों की अवहेलना करके भारत आ गया। भारत आकर हुमायूँ गंभीर रूप से बीमार हो गया। इस बार बाबर ने मुर्तजाअली करमुल्ला की परिक्रमा करके प्रार्थना की कि हे अल्लाह! यदि प्राण के बदले प्राण दिया जाता हो तब मैं बाबर, अपनी अवस्था और प्राण हुमायूँ को देता हूँ। उसी दिन से बाबर बीमार पड़ गया और हुमायूँ ठीक हो गया।

चिकित्सकों के अनुसार बाबर पर उस विष के दुष्प्रभाव दृष्टिगत हो रहे थे जो कुछ माह पहले इब्राहीम लोदी की माता बुआ बेगम ने बावर्चियों के माध्यम से बाबर को दिया था। इस कारण बाबर पर किसी औषधि का असर नहीं हो रहा था। हालांकि बाबर के चार पुत्र थे जिनमें से दो पुत्र हुमायूँ तथा अस्करी बाबर के पास आगरा में थे, कामरान काबुल में था एवं हिंदाल बदख्शां में था तथापि बाबर अपनी बीमारी की हालत में हिंदाल को बहुत याद किया करता था। बाबर ने मीर खुर्द बेग के पुत्र मीर बर्दी बेग को आदेश भिजवाए कि वह हिंदाल को लेकर भारत आ जाए।

बाबर बेसब्री से हिंदाल के आने की प्रतीक्षा करने लगा। जो कोई भी मुनष्य अफगानिस्तान से आता था, बाबर बहुत कातर होकर उससे पूछता था कि हिंदाल कहाँ है और क्या करता है? आखिर एक दिन मीर बर्दी बेग आगरा पहुंचा। बाबर ने उससे पूछा कि हिंदाल कहाँ है? कब आएगा? मीर बर्दी ने कहा कि शहजादा दिल्ली पहुंच गया है, आज या कल हुजूर की सेवा में आएगा। इस पर बाबर ने कहा कि अरे अभागे! हमने सुना है कि तेरी बहिन का विवाह काबुल में और तेरा लाहौर में हुआ है, इन्हीं विवाहों के कारण तू मेरे पुत्र को जल्दी लेकर नहीं आया!

अगले दिन हिंदाल बाबर की सेवा में उपस्थित हुआ। इसके कुछ दिन बाद बाबर इस असार-संसार से चला गया। कौन जाने इब्राहीम लोदी की माता द्वारा दिए गए जहर का असर था या हुमायूँ को अपनी जिंदगी देने की प्रार्थना का किंतु यह तय है कि बाबर की मृत्यु असमय हुई।

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बाबर के पिता मिर्जा उमर शेख की मृत्यु के समय बाबर 11 साल का बालक था, तभी से वह अपना जीवन युद्ध के मैदानों में तीरों, तलवारों और तोपों के बीच बिता रहा था। इसीलिए इतिहासकारों ने बाबर को असमय प्रौढ़ बालक कहा है किंतु वास्तविकता यह थी कि जीवन भर संघर्षों की ज्वाला में झुलसकर बाबर व्यक्तित्व-विकृति (पर्सनल्टी डिसऑर्डर) का शिकार हो गया था। एक ओर तो बाबर के भीतर एक ऐसा श्रेष्ठ इंसान रहता था जो कविता से प्रेम करता था, पुस्तकें पढ़ता और आत्मकथा लिखता था, अपने परिवार पर प्राण छिड़कता था और अपने पुत्रों को आसमान की ऊंचाइयों तक पहुंचाना चाहता था तो दूसरी ओर बाबर के भीतर एक ऐसा खूंखार आदिम हिंसक मनुष्य बसता था जो हर समस्या का हल तलवार से निकालना चाहता था। एक ओर तो बाबर अपने परिवार से अत्यंत प्रेम करता था तो दूसरी ओर अपने शत्रुओं से धोखा करने, उनके सिर काटने, कटे हुए सिरों की मीनारें बनवाने और और मीनारों के सामने खड़े होकर गाजी की उपाधि धारण करने में लेशमात्र संकोच नहीं करता था। इंसानों के शरीरों से बहता हुआ खून, उनके कण्ठों से निकलती हुई चीखें और रहम के लिए गिड़गिड़ातीं भयाक्रांत-आवाजें बाबर को आनंद देती थीं।

एक ओर तो बाबर अपने पुरखों की राजधानी समरकंद से इतना प्रेम करता था कि अपने बड़े पुत्र हुमायूँ को समरकंद का बादशाह बनते हुए देखना चाहता था और दूसरी ओर बाबर स्वयं अपनी मातृभूमि मध्य-एशिया को लौटने के लिए तैयार नहीं था।

यह जानकर बहुत आश्चर्य होता है कि जो बाबर इंसानों का रक्त बहाने के लिए सदैव तत्पर रहता था, वह कविता लिखने और सुनने का बड़ा शौकीन था। बाबर ने अपने कुछ सैनिकों के नाम लिखे हैं जो अच्छी कविता करते थे। वे लोग नाव की यात्रा के समय अथवा रात्रिकाल में सिपाहियों को कविताएं सुनाकर उनका मनोरंजन किया करते थे। बाबर ने लिखा है कि मुहम्मद सालेह नामक एक सैनिक सबका मजाक उड़ाया करता था। उसने एक दिन नाव पर यात्रा करने के दौरान यह कविता सुनाई-

हे प्रियतम! तेरे सरीखे हावभाव वाले के होते हुए

किसी अन्य प्रियतम का कोई क्या करे?

जिस स्थान पर तू हो, वहाँ किसी और का कोई क्या करे?

इस पर बाबर ने सालेह मुहम्मद का मजाक बनाते हुए यह कविता बनाई-

तुझ सरीखे बदमस्त करने वाले का कोई क्या करे?

कोई बैल वाला किसी गधी का क्या करे।

बाबर ने लिखा है- ‘इस कविता को कहने के बाद मुझे बहुत ग्लानि हुई। मुझे लगा कि जब हम अपनी वाणी से बहुत सुंदर शब्द बोल सकते हैं तब हम उस वाणी का उपयोग गंदे शब्दों के लिए क्यों करें। इस कारण मैंने उसी दिन से हास्य-व्यंग्य वाली कविता करना छोड़ दिया।’

खराब कविता लिखने के पश्चाताप-स्वरूप बाबर ने तुर्की भाषा में एक बहुत अच्छी कविता लिखी जिसके भाव इस प्रकार थे-

हे वाणी! मैं तेरे साथ किस प्रकार व्यवहार करूं

क्योंकि तेरे कारण मेरे हृदय से रक्त प्रवाहित है

वह वाणी उत्कृष्ट थी जिससे ऐसे गीत निकले

व्यंग्य क्षुद्र तथा अश्लील असत्य तुझसे निकले।

यदि तू कहे, इस प्रतिज्ञा के कारण मैं न जलूंगा

तो तू अपनी लगाम को इस कलह के मैदान से मोड़ दे!

एक अन्य कविता में बाबर ने लिखा-

‘हे ईश्वर! हमने अपनी आत्मा के प्रति अत्याचार किया है। यदि तू हमें क्षमा न करेगा और हमारे प्रति दया न करेगा तो हम निःसंदेह उन लोकों में होंगे जो नष्ट होने वाले हैं।’

बबर लिखता है- ‘मैंने नए सिरे से पश्चाताप करते हुए तौबा की और अश्लील तथा नीच विचारों एवं बातों को त्यागकर अपने हृदय को सांत्वना दी। मैंने अपनी लेखनी तोड़ डाली। ईश्वर की ओर से पापी मनुष्य के लिए इस प्रकार की चेतावनी महान् सौभाग्य है। जो कोई भी इन चेतावनियों से सन्मार्ग पर आ जाए तो यह उसका बहुत बड़ा सौभाग्य है।’

यह बात समझ में नहीं आती कि जिस बाबर ने भारत में हिन्दुओं के सिर काटकर उनके ढेर बनवाए, जो बाबर विधर्मियों के प्रति अत्यंत क्रूर, हिंसक तथा रक्त-पिपासु चरित्र का प्रदर्शन करता था, वह आत्मा और परमात्मा जैसी अच्छी बातें कैसे सोच लेता था! संभवतः पर्सनल्टी डिसऑर्डर अर्थात् व्यक्तित्व की विकृति इसी को कहते हैं। बाबर का व्यक्तित्व पर्सनल्टी डिसऑर्डर का शिकार था।

बाबर के पिता मिर्जा उमर बेग ने बाबर की शिक्षा-दीक्षा की निश्चय ही अच्छी व्यवस्था की होगी क्योंकि उमरबेग का दरबार उस समय के विद्वान व्यक्तियों से भरा हुआ था। बाबर का नाना यूनुस खाँ अपने समय का ख्यातिनाम विद्वान था। उसे चित्रकला, संगीतकला एवं अन्य कलाओं में अच्छी रुचि थी। नाना यूनुस खाँ ने बाबर को बहुत प्रभावित किया था। इस कारण बाबर में विभिन्न कलाओं के प्रति स्वाभाविक रूप से प्रेम पनप गया।

बाबर की माँ कूतलूक निगार खानम तुर्की एवं फारसी की अच्छी ज्ञाता थी। इस कारण बाबर में साहित्य के प्रति प्रेम जन्मा। बाबर प्रतिदिन कुछ न कुछ अवश्य लिखता था। वह अपने जीवन में जिस भी स्थान पर गया, उसने वहाँ का वर्णन अवश्य किया। वह उस स्थान के पक्षियों, वनस्पतियों, पहाड़ों, झीलों, नदियों, पशुओं, मनुष्यों, नगरों, बगीचों एवं भवनों आदि का बारीकी से वर्णन करता था जिससे स्पष्ट होता है कि उसे नगरों के निर्माण एवं भवनों की भी अच्छी जानकारी थी।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाबर ने भारत के अतिरिक्त और कहीं भी भवन नहीं तोड़े (40)

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बाबर ने भारत के अतिरिक्त और कहीं भी भवन नहीं तोड़े।

बाबर ने भारत के अतिरिक्त और कहीं भी भवन नहीं तोड़े । इसका मुख्य कारण यह प्रतीत होता है कि बाबर के समय तक हिन्दू धर्म भारत के अतिरिक्त उस किसी भी क्षेत्र में स्थित नहीं जिन क्षेत्रों पर बाबर ने आक्रमण किए थे। न वहाँ कोई मंदिर एवं देवालय आदि ही बचे थे। बाबर से पहले यह कार्य तुर्क, मंगोल एवं हूण आदि विध्वसंक जातियां कर चुकी थीं।

बाबर का पूर्वज तैमूर लंग भारत की अपार सम्पदा लूटना चाहता था, भारत के लोगों को मारना और गुलाम बनाना चाहता था तथा इस प्रकार भारत से कुफ्र अर्थात् मूर्तिपूजा समाप्त करके इस्लाम का प्रसार करना चाहता था किंतु उसका काम अधूरा रह गया था। बाबर ने भारत में मुगलों के राज्य की स्थापना करके भारत की अपार सम्पदा पर अधिकार कर लिया, जनता को अपना गुलाम बना लिया, उनके कटे हुए सिरों की मीनारें बनवाईं, गाजी की उपधि धारण की और इस तरह से बाबर ने तैमूर लंग के अधूरे सपने को पूरा किया।

महाराणा तथा मेदिनी राय को मारकर बाबर ने हिन्दुओं को अपने ही देश भारत की केन्द्रीय-राजनीतिक-शक्ति बनने से सदा के लिये वंचित कर दिया। उसने लोदियों को निपात करके अफगानों को भी नष्ट-प्रायः कर दिया किंतु अफगान पूरी तरह नष्ट नहीं हुए। उनमें अफगान-राज्य के पुनरुत्थान की आशा अब भी जीवित बची थी।

भारत में बाबर की सांस्कृतिक उपलब्धियाँ रचनात्मक कम और विध्वंसात्मक अधिक थीं। इस्लाम के सिपाही के रूप में उसने भारत में काफिर-हिन्दुओं का बड़े पैमाने पर विनाश किया। यही कारण था कि बाबर ने भारत के अतिरिक्त और कहीं भी भवन नहीं तोड़े! उसने शियाओं का भी दमन किया।

बाबर ने पंजाब पर कम से कम पांच बार आक्रमण करके उसके विभिन्न भागों को अपने नियंत्रण में ले लिया। उसने पानीपत की पहली लड़ाई में इब्राहीम लोदी को परास्त किया। खानवा के युद्ध में राणा सांगा को परास्त किया। चंदेरी के युद्ध में मेदिनी राय को परास्त किया। घाघरा के युद्ध में महमूद खाँ लोदी को परास्त किया।

भले ही बाबर की ये विजयें भारत के इतिहास को गहरे घाव देने वाली थीं किंतु मुगलों की दृष्टि से ये चारों विजयें बाबर की शानदार सामरिक उपलब्धियाँ थीं। बाबर की सामरिक विजयों की तरह बाबर की राजनीतिक उपलब्धियाँ भी अत्यंत घातक थीं। उसने दिल्ली सल्तनत को सदा के लिये समाप्त कर दिया और उसके स्थान पर भारत में एक नवीन तुर्को-मंगोल राज्य की स्थापना की जो मुगल सल्तनत के नाम से जाना गया। बाबर द्वारा भारत में स्थापित इस राज्य पर बाबर के वंशज अगले 200 वर्षों तक शासन करते रहे।

बाबर ने अयोध्या के राममंदिर एवं कुछ अन्य मंदिरों को तोड़कर देश की प्रजा को प्राचीन भवनों एवं स्थापत्य के शानदार उदाहरणों से वंचित कर दिया। हालांकि बाबर आदमियों को मारने में किंचत् भी संकोच नहीं करता था किंतु उसमें भवनों को तोड़ने, किसी कलाकृति को नष्ट करने अथवा नगरों को जलाने की प्रवृत्ति बहुत कम थी। देवालय एवं प्रतिमाएं तोड़ने का यह काम बाबर ने भारत के अतिरिक्त और कहीं नहीं किया। इसका मुख्य कारण यह था कि उस काल तक अफगानिस्तान में देवालय एवं प्रतिमाएं अपवाद-स्वरूप ही बचे थे।

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बाबर में नई चीजों को देखने और समझने का प्रबल उत्साह था। जब उसने 11 मार्च 1519 को झेलम पार करने के बाद जीवन में पहली बार बाल्टियों सहित रहट को चलते हुए देखा तब उसने काफी देर तक वहीं पर रुककर रहट की कार्य-विधि को जानने के लिए कई बार पानी निकलवाया। बाबर ने कांधार में ‘पेशताक’ नामक एक भवन बनवाया। इसके लिए उसने ‘सरपूजा’ (पूज्य-सरोवर) नामक पहाड़ से पत्थर कटवाकर मंगवाए। पत्थर काटने वाले 80 कारीगरों ने 9 वर्ष तक प्रतिदिन काम करके इस भवन को पूरा किया। बाबर ने काबुल में भी एक बाग बनवाया जिसे ‘बाग-ए-बाबर’ कहा जाता था। इसमें पानी की नहरें, बारादरियां, बैठक के कमरे आदि अनेक निर्माण करवाए गए जिन्हें पाकिस्तान बनने के बाद तालिबानी आतंकियों ने बर्बाद कर दिया। वर्तमान में इस बाग के अवशेष ही देखे जा सकते हैं। बाबर को दिल्ली और आगरा में तुर्क तथा अफगान सुल्तानों द्वारा निर्मित इमारतें पसंद नहीं आईं। वह ग्वालियर में राजा मानसिंह तोमर एवं राजा विक्रमादित्य तोमर के महलों की स्थापत्य-शैली से अत्यधिक प्रभावित हुआ।

बाबर ने अपनी आत्मकथा में इन महलों का विस्तार से वर्णन करते हुए लिखा है कि ये महल बड़े मजबूत एवं सुंदर हैं। महलों की दीवारों पर अच्छा प्लास्टर किया गया है और कुछ महलों में सुरंगें बनी हुई हैं।

बाबर के काल में ग्वालियर के महल ही हिन्दूकला के सुंदर उदाहरण के रूप में शेष बचे थे। यद्यपि बाबर के अनुसार इनके निर्माण में किसी निश्चित नियम एवं योजना का पालन नहीं हुआ था तथापि वे बाबर को सुंदर एवं हृदयग्राही प्रतीत हुए। बाबर ने आगरा, सीकरी एवं धौलपुर में अपने लिए ग्वालियर के अनुकरण पर महल बनवाए।

बाबर ने स्वयं अपनी प्रशंसा करते हुए लिखा है- ‘मैंने आगरा, सीकरी, बयाना, धौलपुर, ग्वालियर एवं कोल अर्थात् अलीगढ़ नामक स्थानों पर भवन निर्माण के कार्य में संगतराशों को लगाया।’

बाबर के भारत आगमन के समय रूहेलखण्ड क्षेत्र में राप्ती नदी के तट पर एक पौराणिक नगर स्थित था जिसे मुगल काल में सम्भल कहा जाता था। इस नगर में पौराणिक युगीन ‘हरिहर मंदिर’ स्थित था। बाबर ने इस मंदिर को तोड़कर उसके ध्वंसावशेषों पर एक मस्जिद का निर्माण करवाया जिसे जामा मस्जिद कहा गया। 

सतीश चन्द्र ने लिखा है- ‘बाबर के लिए स्थापत्य का सबसे महत्वपूर्ण पहलू नियम-निष्ठता एवं समरूपता थी जो उसे भारतीय इमारतों में दिखाई नहीं दी। इसलिए बाबर ने प्रसिद्ध अल्बानियाई कलाकार ‘सिनान’ के शिष्यों को भारत बुलाया। बाबर को भारत में अधिक समय नहीं मिला और उसने जो कुछ बनवाया उनमें से अधिकतर भवन नष्ट हो चुके हैं।’

ऐसा प्रतीत होता है कि बाबर ने आगरा, सीकरी, बयाना आदि स्थानों पर बड़े निर्माण अर्थात् महल एवं दुर्ग आदि नहीं बनवाकर मण्डप, स्नानागार, कुएं, तालाब एवं फव्वारे जैसी लघु-रचनाएं ही बनवाई थीं या फिर बाबर द्वारा निर्मित इमारतें मजबूत सिद्ध नहीं हुईं। क्योंकि वर्तमान में पानीपत के काबुली बाग की विशाल मस्जिद एवं रूहेलखण्ड में संभल की जामा मस्जिद को छोड़कर, बाबर द्वारा निर्मित कोई भी इमारत उपलब्ध नहीं है। या तो वे बनी ही नहीं थीं या फिर वे खराब गुणवत्ता के कारण नष्ट हो चुकी हैं।

यद्यपि पानीपत के काबुली बाग की मस्जिद एवं रूहेलखण्ड की मस्जिद पर्याप्त विशाल रचनाएं हैं तथापि उनमें शिल्प, स्थापत्य एवं वास्तु का कोई सौंदर्य दिखाई नहीं देता। इन दोनों भवनों के बारे में स्वयं बाबर ने स्वीकार किया है कि इनकी शैली पूरी तरह भारतीय थी।

यहाँ भारतीय-शैली से तात्पर्य मुगलों के पूर्ववर्ती दिल्ली-सल्तनत-काल की स्थापत्य-शैली से है। बाबर को भारत में समरकंद जैसी विशाल इमारतें बना सकने योग्य कारीगर उपलब्ध नहीं हुए। न बाबर के पास इतना धन एवं इतना समय था कि वह इमारतों का निर्माण करवा सके।

बाबर ने ई.1526 में पानीपत की पहली लड़ाई में इब्राहीम लोदी को परास्त करने के बाद अपनी विजय की स्मृति में ई.1527 में पानीपत में एक बाग और मस्जिद का निर्माण करवाया। बाबर की एक बेगम का नाम मुस्समत काबुली था। उसी के नाम पर इस बाग एवं मस्जिद का नाम काबुली बाग एवं काबुली मस्जिद रखा गया। यह एक विशाल एवं मजबूत भवन है किंतु स्थापत्य एवं शिल्प की दृष्टि से अत्यंत सामान्य है।

इस मस्जिद के निर्माण के छः साल बाद हुमायूँ ने सलीमशाह को हराया तथा अपनी  विजय के उपलक्ष्य में इस बाग में एक चबूतरा बनवाया जिसे फतेह मुबारक कहा जाता है। अकबर के काल में ई.1557 में इस मस्जिद में फारसी भाषा में दो शिलालेख लगवाए गए। इस प्रकार कहा जा सकता है कि बाबर स्थापत्य का प्रेमी था किंतु हिन्दू धर्म के देवालयों को सहन नहीं कर सकता था इसलिए बाबर ने भारत के अतिरिक्त और कहीं भी भवन नहीं तोड़े!

                                                    – डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बाबरनामा बाबर की आंखों के सामने नष्ट हो गया (46)

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बाबरनामा बाबर की आंखों के सामने नष्ट हो गया

बाबर के जीवन काल की घटनाओं का सर्वाधिक विस्तृत वर्णन स्वयं बाबर की पुस्तक बाबरनामा से मिलता है किंतु इसके विवरण पूर्णतः विश्वसनीय नहीं हैं। बाबर ने तथ्यों को अपनी सुविधा के अनुसार तोड़-मरोड़ कर लिखा है। हालांकि बाबर ने इस पुस्तक में एक स्थान पर लिखा है कि मैंने प्रण लिया था कि मैं इस पुस्तक में जो कुछ भी लिखूं, सत्य लिखूं।

तैमूर लंग ने भारत में अपनी जिन विध्वंसात्मक गतिविधियों को अधूरा छोड़ा था, उन्हें बाबर ने आगे बढ़ाया। उसने भारत में मुगलों का राज्य स्थापित करके भारत की अपार सम्पदा पर अधिकार कर लिया और जनता को गुलाम बना लिया। बाबर के जीवन काल की घटनाओं का सर्वाधिक विस्तृत वर्णन स्वयं बाबर की पुस्तक बाबरनामा से मिलता है किंतु इसके विवरण पूर्णतः विश्वसनीय नहीं हैं। बाबर ने तथ्यों को अपनी सुविधा के अनुसार तोड़-मरोड़ कर लिखा है। हालांकि बाबर ने इस पुस्तक में एक स्थान पर लिखा है कि मैंने प्रण लिया था कि मैं इस पुस्तक में जो कुछ भी लिखूं, सत्य लिखूं।

बाबर प्रतिदिन इस ग्रंथ को लिखता था। वह लम्बी दूरी की यात्राओं से लेकर युद्ध के दिनों में भी इस पुस्तक को लिखना नहीं छोड़ता था। बाबर ने लगभग 48 वर्ष की जिंदगी पाई किंतु उसका लिखा बाबरनामा केवल 18 वर्ष की अवधि का ही है और वह भी बीच-बीच में अधूरा है। यह स्थिति तो तब है जब बाबरनामा की 15 प्रतिलिपियां संसार के विभिन्न देशों से मिली हैं। इनमें से कुछ प्रतिलिपियां लंदन में, कुछ बुखारा में, कुछ नजरबे तुर्किस्तान में, कुछ भारत में तथा कुछ प्रतिलिपियां सेंट पीटर्सबर्ग में मिली हैं।

आज तो बाबरनामा के अनुवाद यूरोप एवं मध्य-एशिया की अनेक भाषाओं तथा हिन्दी भाषा में मिलते हैं किंतु जब मुद्रणालय का आविष्कार नहीं हुआ था, तब भी अरबी, फारसी, तुर्की, अंग्रेजी एवं उर्दू आदि विभिन्न भाषाओं एवं लिपियों में बाबरनामा की नकलें तैयार हुई थीं। उन्हें अनुवाद की बजाय प्रतिलिपि कहना ही अधिक उचित होगा।

इस बात की संभावना है कि बाबर ने दो पोथियां तैयार कीं। इनमें से पहली पोथी दैनिक डायरी के रूप में थी जिसमें वह उस दिन की घटना का वर्णन रात में बैठकर करता था। दूसरी पोथी में उसने पहली पोथी में वर्णित महत्वपूर्ण घटनाओं के आधार पर आलेख तैयार करके लिखे।

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पहली पोथी और दूसरी पोथी के वर्णनों में भी अंतर है। अब ये दोनों मूल-प्रतियां उपलब्ध नहीं होतीं। बाबरनामा के नाम से जो ग्रंथ उपलब्ध हैं, वे इन्हीं दोनों ग्रंथों की नकलें हैं। बाबर ने अपने ग्रंथ की एक प्रतिलिपि तैयार करके ख्वाजा कलां को भारत से अफगानिस्तान भेजी थी जो बाबर को आगरा में छोड़कर अफगानिस्तान लौट गया था। अब यह पोथी प्राप्त नहीं होती। हुमायूँ के पास भी बाबरनामा की एक प्रतिलिपि रहती थी। इस प्रतिलिपि पर हुमायूँ ने अपने हाथ से कुछ टिप्पणियां भी अंकित की थीं। एल्फिंस्टन ने इस पोथी को पेशावर में खरीदा था। इसी पोथी के आधार पर एल्फिंस्टन ने बाबर-कालीन भारत का इतिहास लिखा था। अब यह पोथी एडिनबरा के पुस्तकालय में है। बाद में अर्सकिन ने भी इसी पोथी से काम किया। बाबरनामा की एक पोथी टीपू सुल्तान के पुस्तकालय में रहा करती थी। जब अंग्रेज इस देश के शासक बने तो इस पोथी को अपने साथ लंदन ले गए। यह पोथी लंदन के इंडिया ऑफिस में रहा करती थी। लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में भी बाबरनामा की एक प्रति बताई जाती है किंतु इस पोथी में बहुत कम पन्ने उपलब्ध हैं।

ई.1617 में रूस के सेंट पीटर्स बर्ग में डॉ. जॉर्ज जैकब केहर ने बाबरनामा की प्रतिलिपि तुर्की भाषा में तैयार की थी। यह प्रति आज भी सेंटपीटर्स बर्ग में उपलब्ध है। बाबरनामा का फ्रैंच अनुवाद इसी प्रतिलिपि से तैयार किया गया था। डॉ. केहर ने बाबरनामा की जिस पोथी को देखकर तुर्की प्रतिलिपि तैयार की थी, वह पोथी अब कहीं नहीं मिलती जबकि डॉ. केहर द्वारा तैयार प्रतिलिपि रूस में आज भी उपलब्ध है।

बाबरनामा की जो प्रतिलिपि बुखारा में होने की बात कही जाती है, उसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती किंतु उस प्रतिलिपि के हवाले से बुखारा के इतिहास में बहुत सी मनगढ़ंत बातें प्रचलित हैं। बाबरनामा की एक पोथी की नकल ई.1700 में तैयार की गई थी। यह पोथी हैदराबाद के सालारजंग संग्रहालय में मिली थी। बाबरनामा की सर्वाधिक विश्वसनीय प्रति इसी पोथी को माना जाता है। आज संसार भर में बाबरनामा के जो अंग्रेजी अनुवाद उपलब्ध हैं, वे इसी पोथी से किए गए अनुवाद की नकलें हैं।

बाबरनामा की एक पोथी एशियाटिक सोसाइटी बंगाल में भी उपलब्ध थी। इस पोथी का उल्लेख ई.1906 में लंदन से प्रकाशित जर्नल ऑफ रॉयल एशिायटिक सोसाइटी के एक लेख में हुआ था। बाबर ने अपनी पुस्तक का नाम क्या रखा था, यह बाबरनामा की एक भी प्रति से पता नहीं चलता।

कोई उसे बाबरनामा कहता है तो कोई बाबर की आत्मकथा। कुछ लेखकों ने उसे बाबर का यात्रा-वृत्तांत कहा है। जब बाबर की मृत्यु हो गई और हुमायूँ उसका उत्तराधिकारी हुआ तो उसने मुगल परिवार के सदस्यों एवं मंत्रियों से कहा कि वे बाबर के सम्बन्ध में अपने संस्मरण लिखें। बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम ने हुमायूंनामा के नाम से अपने संस्मरण लिखे जिसमें उसने बाबर द्वारा लिखी गई पुस्तक का उल्लेख तो किया है किंतु उस पुस्तक का नाम नहीं लिखा।

बाबर ने अपनी पुस्तक में वाकेआत शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ होता है घटनाओं का विवरण। गुलबदन बेगम ने भी वाकेआनामा शब्द का प्रयोग किया है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि संभवतः बाबरनामा का मूल नाम वाकेआते बाबरी जैसा कुछ रहा होगा। बाबरनामा को तुर्की भाषा का ग्रंथ बताया जाता है किंतु वास्तव में उसमें एक तिहाई शब्द अरबी एवं फारसी से लिए गए हैं इसलिए विद्वानों ने इस ग्रंथ में प्रयुक्त भाषा को चगताई-तुर्की कहा है।

बाबरनामा का अधिकांश भाग नष्ट क्यों हो गया, इस विषय पर स्वयं बाबर ने भी कई स्थानों पर पीड़ा व्यक्त की है। बाबर का अधिकांश जीवन यात्राओं एवं युद्धों में बीता था। उसने समरंकद में बहने वाली जेरावशान नदी से लेकर बंगाल में बहने वाली गंगा तक की यात्रा घोड़ों, ऊंटों एवं नावों पर बैठकर की थी। चार हजार किलोमीटर की इस लम्बी यात्रा में शत्रु के अचानक हमलों के कारण बाबर को कई बार अपना शिविर छोड़कर भागना पड़ा, जिसके कारण बाबरनामा के बहुत से भाग पीछे छूट गए और शत्रु द्वारा नष्ट कर दिए गए।

कई बार आंधी, तूफान और बरसात के कारण बाबर का तम्बू नीचे गिर जाता था और बाबरनामा की प्रति भीगकर खराब हो जाती थी। बाबर और उसके आदमी भीगे हुए कागजों को रात-रात भर कम्बल में दबाकर और चिमनियों से गर्मी पहुंचाकर सुखाते थे। इस कारण उन कागजों की स्याही फैल जाती थी और बहुत से कागज भीग जाने के कारण गल कर नष्ट हो जाते थे।

आज बाबरनामा हमारे बीच में उपलब्ध नहीं है, जो है वह नकलों और अनुवादों के रूप में है। ये नकलें और अनुवाद भी थोड़े से पन्नों के हैं, जो पन्ने उपलब्ध हैं वे भी झूठ के पुलिंदे हैं किंतु इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि बाबर-कालीन भारत के इतिहास को जानने का हमारे पास और कोई विश्वसनीय साधन उपलब्ध नहीं है। हम परवर्ती-ग्रंथों में प्राप्त तथ्यों के आधार पर बाबरनामा के विवरण की विवेचना करके ही सच-झूठ का निर्णय करते हैं।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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