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जूना खाँ ने सुल्तान को तम्बू के नीचे दबाकर मार दिया (125)

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जूना खाँ - www.bharatkaitihas.com
जूना खाँ ने सुल्तान को तम्बू के नीचे दबाकर मार दिया

खिलजियों के पतन के बाद भारत में मुस्लिम सल्तनत की इमारत डोलने लगी थी किंतु गयासुद्दीन तुगलक ने भारत में मुस्लिम राज्य को फिर से मजबूत कर दिया। उसके दुर्भाग्य से उसका पुत्र जूना खाँ अत्यंत महत्त्वाकांक्षी था जो जल्दी ही दिल्ली का सुल्तान बनना चाहता था, इसलिए जूना खाँ ने छल से सुल्तान गयासुद्दीन की हत्या कर दी।

गाजी तुगलक अर्थात् गयासुद्दीन तुगलक ने सुल्तान बनने के बाद मुस्लिम प्रजा की आर्थिक एवं धार्मिक उन्नति के लिए कई कदम उठाए तथा हिन्दू प्रजा को धन-सम्पत्ति का संग्रहण करने से वंचित कर दिया। गयासुद्दीन ने अनुभव किया कि अल्लाउद्दीन खिलजी के जीवन काल में ई.1312 में दिल्ली सल्तनत का जो क्षरण आरम्भ हुआ था, वह अब भी निरंतर जारी था।

कई मुस्लिम गवर्नर तथा हिन्दू राजा स्वतंत्र होकर दिल्ली से सम्बन्ध तोड़ चुके थे। इसलिए उसने तख्त पर बैठने के बाद उन प्रांतों एवं राज्यों को फिर से जीतने के लिए सैनिक अभियान किए। ये अभियान पांच साल तक निरंतर चलते रहे।

ई.1321 में गयासुद्दीन तुगलक ने तेलंगाना पर आक्रमण किया जिसकी राजधानी वारांगल थी। इन दिनों तेलंगाना में काकतीय वंश का राजा प्रताप रुद्रदेव (द्वितीय) शासन कर रहा था। यह राज्य अल्लाउद्दीन खिलजी के समय से दिल्ली को खिराज दे रहा था किंतु अल्लाउद्दीन की मृत्यु के बाद उसने दिल्ली को खिराज देना बन्द कर दिया और स्वतन्त्र होने का प्रयास करने लगा।

गयासुद्दीन तुगलक ने अपने पुत्र जूना खाँ को एक विशाल सेना देकर वारांगल पर आक्रमण करने भेजा। जूना खाँ ने वारांगल पर घेरा डाल दिया। छः माह तक घेरा चलने पर भी दिल्ली की सेना को विजय प्राप्त नहीं हुई। इसी बीच शहजादे जूना खाँ को सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक के मरने की आशंका हुई और वह घेरा उठाकर दिल्ली की ओर रवाना हो गया। दिल्ली पहुँच कर उसे अपनी भूल का अहसास हुआ। उसने सुल्तान से क्षमा याचना की और ई.1323 में पुनः वारांगल के लिए रवाना हो गया।

इस युद्ध में राजा प्रताप रुद्रदेव (द्वितीय) की पराजय हुई और वह सपरिवार बन्दी बनाकर दिल्ली भेज दिया गया। तेलंगाना का राज्य, दिल्ली में मिला लिया गया और वहाँ पर एक मुसलमान शासक नियुक्त कर दिया गया। इस विजय से जूना खाँ ने अपने पिता का विश्वास पुनः अर्जित कर लिया।

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वारांगल अभियान के पूरा होते ही ई.1323 में सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक ने अपने पुत्र जूना खाँ को उड़ीसा प्रांत में स्थित जाजनगर पर अभियान करने के आदेश दिए क्योंकि जाजनगर के राजा भानुदेव (द्वितीय) ने वारांगल के राजा प्रताप रुद्रदेव (द्वितीय) की सहायता की थी।

इस अभियान में शहजादे को सामरिक विजय के साथ-साथ लूट का बहुत सा माल तथा 50 हाथी मिले। जूना खाँ लूट का माल लेकर दिल्ली लौट आया। राजा भानुदेव (द्वितीय) ने दिल्ली की अधीनता स्वीकार कर ली तथा वार्षिक कर देने का वचन दिया इसलिए गयासुद्दीन तुगलक ने जाजनगर राज्य को दिल्ली सल्तनत में नहीं मिलाया।

अभी शहजादा जूना खाँ जाजनगर में ही था कि सुल्तान गयासुद्दीन को पश्चिमोत्तर सीमा पर मंगोल आक्रमण की सूचना मिली। मंगोल ई.1307 से भारत से दूर थे। पूरे 17 साल बाद उन्होंने भारत पर आक्रमण किया तथा वे समाना तक आ गए।

सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक ने समाना के हाकिम अल्लाउद्दीन की सहायता के लिए दिल्ली से एक सेना भेजी। इस सेना ने पहली बार शिवालिक पहाड़ी के पास तथा दूसरी बार व्यास नदी के किनारे मंगोलों को परास्त किया। अनेक प्रमुख मंगोल योद्धा बंदी बना लिए गए तथा बचे हुए मंगोल दिल्ली सल्तनत की सीमा से बाहर भाग गए।

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जिस समय गयासुद्दीन तुगलक दिल्ली का सुल्तान हुआ, उन दिनों बंगाल में शमसुद्दीन के तीन पुत्रों- शिहाबुद्दीन, गयासुद्दीन बहादुर तथा नासिरूद्दीन में उत्तराधिकार का युद्ध चल रहा था। इस झगड़े में गयासुद्दीन बहादुर को सफलता प्राप्त हुई। उसने अपने दोनों भाइयों शिहाबुद्दीन तथा नासिरूद्दीन को लखनौती से मार भगाया और स्वयं को बंगाल का सुल्तान घोषित कर दिया। शिहाबुद्दीन तथा नासिरूद्दीन ने सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक से हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया। गयासुद्दीन ने उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया तथा राजधानी दिल्ली का प्रबन्ध अपने पुत्र जूना खाँ को सौंप कर, स्वयं एक सेना लेकर बंगाल के लिए चल दिया। बंगाल के सुल्तान गयासुद्दीन बहादुर ने दिल्ली के सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक का सामना किया परन्तु परास्त हो गया और कैद कर लिया गया। गयासुद्दीन तुगलक ने नासिरूद्दीन को लखनौती का शासक बना दिया। इस प्रकार बंगाल पर फिर से दिल्ली सल्तनत का अधिकार स्थापित हो गया। जब सुल्तान लखनौती से दिल्ली लौट रहा था तब उसने मार्ग में मिथिला क्षेत्र में स्थित तिरहुत राज्य पर आक्रमण किया। इन दिनों राजा हरिसिंहदेव तिरहुत पर शासन कर रहा था। हरिसिंह पराजित होकर जंगलों में भाग गया। तिरहुत दिल्ली सल्तनत में सम्मिलित कर लिया गया। अहमद खाँ को वहाँ का गवर्नर बनाया गया।

तिरहुत पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त सुल्तान ने दिल्ली के लिए प्रस्थान किया। इब्नबतूता के अनुसार सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक ने शहजादे जूना खाँ के पास आज्ञा भेजी कि राजधानी से कुछ दूरी पर एक महल बनाया जाये जिससे सुल्तान उसमें रात्रि व्यतीत करके, दूसरे दिन समारोह के साथ राजधानी में प्रवेश कर सके। इस पर शहजादे ने मीर-इमारत अहमद अयाज को लकड़ी का एक महल बनाने की आज्ञा दी।

जब सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक वापस आया तब शहजादे ने तुगलकाबाद में बड़े समारोह के साथ उसका स्वागत किया। तुगलकाबाद से तीन-चार मील दूर अफगानपुर में सुल्तान को प्रीतिभोज देने के लिए एक शामियाना लगवाया गया। जब भोजन समाप्त हो गया, तब समस्त आमन्त्रित व्यक्ति शामियाने के बाहर निकल आए।

केवल सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक तथा उसका एक छोटा पुत्र, जिसमें सुल्तान की विशेष अनुरक्ति थी, शामियाने के भीतर रह गए। इसी समय शहजादे जूना खाँ ने सुल्तान से अनुमति मांगी कि बंगाल से जो हाथी लाये गए हैं, उनका संचालन किया जाए। सुल्तान सहमत हो गया। जब हाथियों का संचालन हो रहा था तब अचानक शामियाना गिर पड़ा और सुल्तान तथा उसके अल्पवयस्क पुत्र महमूद खाँ की मृत्यु हो गई।

उसी रात सुल्तान का शरीर तुगलकाबाद के मकबरे में दफना दिया गया। जियाउद्दीन बरनी ने सुल्तान की मृत्यु का सारा दोष प्रकृति पर डाला है। उसने लिखा है- ‘बलाए आसमानी वर जमीनान नाजिलशुद्ध’ अर्थात् आकाश से धरती पर बिजली गिर गई। जबकि वास्तविकता यह है कि फरवरी के महीने में न तो बरसात होती है और न आसमन से बिलजियां गिरा करती हैं।

हरिशंकर शर्मा ने अपनी पुस्तक मध्यकालीन भारत में निजामुद्दीन अहमद के संदर्भ से लिखा है कि गयासुद्दीन तुगलक के सम्बन्ध निजामुद्दीन औलिया से अच्छे नहीं थे। अतः उसने बंगाल आक्रमण के उपरांत दिल्ली पहुंचकर, निजामुद्दीन औलिया को दण्डित करने की घोषणा की।

इस पर निजामुद्दीन औलिया ने कहा था- ‘हनूज दिल्ली इरस्त’ अर्थात् अभी दिल्ली दूर है। इसका अर्थ यह निकाला जाता हे कि सुल्तान गयासुद्दीन कभी भी दिल्ली जीवित नहीं पहुंचेगा। वास्तव में ऐसा हुआ भी। इसलिए कहा जाता है कि इस घटना में निजामुद्दीन औलिया का हाथ था।

तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों ने गयासुद्दीन तुगलक को न्यायप्रिय शासक बताया है और लिखा है कि वह दिन में दो बार दरबार लगाकर लोगों के झगड़े निबटाता था। उसने दिल्ली सल्तनत के गौरव को बढ़ाया। उसके दुर्भाग्य से उसका पुत्र जूना खाँ अत्यंत महत्त्वाकांक्षी था जो जल्दी से जल्दी दिल्ली का सुल्तान बनना चाहता था इसलिए जूना खाँ ने छल से सुल्तान की हत्या कर दी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मुहम्मद तुगलक (126)

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मुहम्मद तुगलक - www.bharatkaitihas.com
मुहम्मद तुगलक

शहजादे जूना खाँ ने अपने पिता सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक की हत्या कर दी और स्वयं मुहम्मदशाह तुगलक के नाम से दिल्ली का सुल्तान बन गया। निजामुद्दीन औलिया और अब्बासी खलीफा ने मुहम्मद बिन तुगलक को दिल्ली का सुल्तान मान लिया!

सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक के अति महत्त्वाकांक्षी पुत्र जूना खाँ ने ई.1325 में अपने पिता की हत्या करके उसका शव तुगलकाबाद के मकबरे में दफना दिया। इस कारण गयासुद्दीन तुगलक केवल 5 साल ही शासन कर सका था।

उस काल की दिल्ली अपने सुल्तानों को इसी प्रकार मरते हुए देखने के लिए अभिशप्त थी। इस प्रकार दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों की बेरहम हत्याओं का जो सिलसिला ई.1210 में आम्भ हुआ, वह ई.1325 में भी इसी प्रकार जारी रहा।

सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक के चार पुत्र थे जिनमें से जूना खाँ सबसे बड़ा था। उसका पूरा नाम फखरुद्दीन मुहम्मद जूना खाँ था। जूना खाँ अपने भाइयों में सर्वाधिक महत्त्वाकांक्षी एवं सर्वाधिक प्रतिभावान था। उसका पालन-पोषण एक सैनिक की भांति हुआ था। पिता गाजी तुगलक ने उसकी शिक्षा का अच्छा प्रबन्ध किया। सुल्तान खुसरोशाह ने उसे कुछ घोड़ों का अध्यक्ष नियुक्त किया।

सुल्तान खुसरोशाह के विरुद्ध सर्वप्रथम जूना खाँ ने ही षड़यंत्र रचना आरम्भ किया था जिसमें उसका पिता गाजी तुगलक भी शामिल हो गया था। जब यह षड़यंत्र सफल हो गया तो गाजी खाँ सुल्तान बन गया तथा जूना खाँ को उसका उत्तराधिकारी घोषित किया गया। कुछ दिन बाद सुल्तान ने जूना खाँ को उलूग खाँ की उपाधि दी। जूना खाँ ने अपने पिता के अधीन काम करते हुए वारांगल तथा जाजनगर पर विजय प्राप्त करके ख्याति अर्जित कर ली।

जूना खाँ प्रारम्भ से ही महत्त्वाकांक्षी था। खुसरोशाह के विरुद्ध किये गए विद्रोह के सफल रहने के बाद वह ‘वली ए अहद’ (युवराज) पद से संतुष्ट नहीं था। उसकी दृष्टि सुल्तान के तख्त पर थी। इसलिए ई.1321 में जब वह वारांगल के मोर्चे पर था, पिता गयासुद्दीन की मृत्यु होने का संदेह होते ही वारांगल से घेरा उठाकर दिल्ली लौट आया था किंतु पिता को जीवित देखकर वह बड़ा निराश हुआ। ई.1325 में जब सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक बंगाल विजय के लिए गया तब जूना खाँ ने उसके विरुद्ध षड़यंत्र रचना आरम्भ किया तथा सुल्तान के दिल्ली में प्रवेश करने से पहले ही उसकी हत्या करवा दी।

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सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक की मृत्यु के तीन दिन बाद ही जूना खाँ, मुहम्मद बिन तुगलक के नाम से दिल्ली के तख्त पर बैठ गया तथा चालीस दिन तक काले वस्त्र पहनकर अफगानपुरी में शोक मनाता रहा। जब गयासुद्दीन के समस्त अन्तिम संस्कार सम्पन्न हो गए तब उसने दिल्ली के लिए प्रस्थान किया। दिल्ली पहुँचने के बाद फरवरी अथवा मार्च 1325 में भव्य समारोह के साथ मुहम्मद बिन तुगलक का राज्याभिषेक हुआ।

मुहम्मद बिन तुगलक को अपने पिता से अत्यन्त सुसंगठित तथा सुव्यवस्थित विशाल साम्राज्य प्राप्त हुआ था। मेहदी हुसैन के अनुसार इतना विशाल साम्राज्य आज तक किसी तुर्क सुल्तान को अपने पिता से नहीं मिला था। उसके पिता का राजकोष भी धन तथा रत्नों से परिपूर्ण था। इब्नबतूता ने लिखा है- ‘सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक ने तुगलकाबाद में एक भव्य महल बनवाया जिसकी ईंटें सोने से मंढ़ी गईं।’

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सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक ने इस महल के भीतर बहुमूल्य वस्तुओं का संग्रहण किया और एक तालाब बनवाया जिसमें सोना पिघलाकर भरा गया था। अतः मुहम्मद बिन तुगलक को सुल्तान बनते समय किसी भी प्रकार से धन की कमी नहीं थी। तख्त पर बैठते समय उसके दो भाई जीवित थे किंतु किसी ने भी मुहम्मद बिन तुगलक का विरोध नहीं किया। सल्तनत की आर्थिक स्थिति की तरह इस काल में सल्तनत की सीमाएं भी सुरक्षित थीं। सुल्तान को न बाहरी आक्रमणों का भय था और न आन्तरिक विद्रोह का। दिल्ली का सुल्तान बनते समय मुहम्मद बिन तुगलक के समक्ष केवल एक समस्या थी कि लोग उसे पिता का हत्यारा एवं राज्य का लुटेरा न समझें। यदि एक बार मुहम्मद बिन तुगलक की ऐसी छवि बन जाती तो सल्तनत में उसके विरुद्ध वातावरण बनता तथा सुल्तान को हटाने के षड़यंत्र आरम्भ हो जाते। इसलिए मुहम्मद बिन तुगलक ने लोकप्रियता अर्जित करने तथा सुल्तान के पद को दृढ़ता प्रदान करने के लिए कुछ उपाय किए। जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है कि मुहम्मद बिन तुगलक के नगर प्रवेश से पूर्व दिल्ली को बहुत सुंदर ढंग से सजाया गया। गुम्बजें निर्मित की गईं तथा मार्गों को सुंदर वस्त्रों से अलंकृत किया गया। सुल्तान बनने के उपलक्ष में राजधानी में ढोल बजाये गए। सुल्तान ने जनता में सोने-चांदी की बिखेर की।

दिल्ली की जनता तथा सल्तनत की सेना को हर बार सुल्तान के बदलने पर सोने-चांदी की इसी बरसात की प्रतीक्षा रहती थी। प्रत्येक सुल्तान धन लुटाकर तख्त हासिल करता था और कुछ ही वर्षों में जनता से इस धन को फिर से छीन लेता था। यदि कोई सुल्तान अपने पूर्ववर्ती सुल्तान की हत्या करके तख्त हासिल करता था, तो जनता पर उतनी ही अधिक धनवर्षा होती थी। इस बार भी जनता पर अत्यधिक धन की वर्षा हुई।

मुहम्मद द्वारा जनता पर की गई इस धनवर्षा ने दिल्ली की जनता को अल्लाद्दीन खिलजी द्वारा की गई धनवर्षा की याद आ गई। मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा किए गए धनवर्षा समारोह का जन-साधारण पर बड़ा प्रभाव पड़ा। सुल्तान ने सड़कों पर सोने, चांदी तथा मोतियों की वर्षा करके जनता को मुग्ध कर लिया और लोग उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। बहुत से लोग तो इतने मालामाल हो गए कि अपना धन लेकर राजधानी दिल्ली से दूर चले गए जहाँ वे अपना धन छिपा सकें तथा सरकार की नजरों से छिपकर शांति से जीवन यापन कर सकें।

सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाने के लिए सल्तनत के महत्त्वपूर्ण पदों तथा पदवियों का नये सिरे से वितरण किया। उसने विद्वानों, कवियों तथा दीन-दुखियों को वार्षिक पेन्शनें, जागीरें तथा इनाम दिए। इस प्रकार धन, पद तथा पदवियों का वितरण करके सुल्तान ने ऐसी लोकप्रियता अर्जित की कि लोगों को उसे पिता का हत्यारा अथवा राज्य का लुटेरा कहने का साहस नहीं हुआ।

उन दिनों दिल्ली में शेख निजामुद्दीन औलिया का बड़ा प्रभाव था। मुहम्मद बिन तुगलक ने औलिया को उसी समय अपने पक्ष में कर लिया था जिस समय गयासुद्दीन तुगलक बंगाल के अभियान पर था। औलिया को मुहम्मद बिन तुगलक के पक्ष में आया देखकर जनसामान्य ने भी नये सुल्तान का विरोध नहीं किया।

भारत के प्रारंभिक तुर्की सुल्तान खलीफा से सुल्तान पद की स्वीकृति प्राप्त करके मुस्लिम जगत में अपनी धाक जमाते थे किंतु बाद में दिल्ली के तुर्की सुल्तानों ने इस परम्परा को तोड़ दिया था। मुहम्मद बिन तुगलक इस परम्परा को पुनः आरम्भ किया। मुहम्मद ने मिस्र के अब्बासी खलीफा के पास अपना दूत भेजकर उसे विपुल धन प्रदान किया तथा उससे अनुरोध किया कि वह मुहम्मद बिन तुगलक को भारत का सुल्तान स्वीकार कर ले।

खलीफा ने मुहम्मद बिन तुगलक के इस प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लिया तथा सुल्तान के लिए सनद भिजवाई। इस सनद के मिलने पर मुहम्मद बिन तुगलक ने अपने सिक्कों एवं खुतबों पर खलीफा का नाम अंकित करवाया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

किसानों की हत्या कर दी मुहम्मद तुगलक ने (127)

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किसानों की हत्या कर दी मुहम्मद तुगलक ने

मुहम्मद तुगलक भारत में इस्लाम का राज्य स्थापित करना चाहता था। इसलिए वह हिन्दू किसानों की आर्थिक स्थिति नष्ट करके मुसलमानों की सम्पत्ति बढ़ाना चाहता था। उसने बहुत बड़ी संख्या में जंगलों में छिपे हुए हिन्दू किसानों की हत्या कर दी।

मुहम्मद बिन तुगलक ने दिल्ली का सुल्तान बनने के बाद जनता में सोने-चांदी की बखेर करके जनता का समर्थन प्राप्त किया तथा निजामुद्दीन औलिया एवं अब्बासी खलीफा से स्वयं को भारत का सुल्तान स्वीकार करवाया। इसके बाद मुहम्मद बिन तुगलक ने अपने सपनों पर अमल करना आरम्भ किया। वह अति-महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति था। अपने पिता गाजी तुगलक की हत्या से लेकर मुहम्मद ने वह हर जघन्य कार्य किया जो उसने अपने सपनों को साकार करने के लिए आवश्यक समझा!

इतिहास के अध्ययन की दृष्टि से हम मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल को दो भागों में बांट सकते हैं- पहला है योजनाओं का काल तथा दूसरा है विद्रोहों का काल। मुहम्मद बिन तुगलक ने ई.1325 से ई.1335 तक के काल में कई योजनाएं बनाकर लागू कीं जिनमें उसे आंशिक सफलता तथा आंशिक विफलता प्राप्त हुई।

ई.1335 से ई.1351 तक के काल को विद्रोहों का काल कहा जाता है जिसमें साम्राज्य के विभिन्न भागों में सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह हुए और सुल्तान का जीवन इन विद्रोहों का दमन करने में खप गया।

दिल्ली का सुल्तान बनते ही मुहम्मद बिन तुगलक ने राजस्व सुधार के लिए कई कानून बनाये। उसने समस्त सूबेदारों को अपने-अपने सूबों के हिसाब भेजने के आदेश दिए तथा उन सूबों की आय-व्यय का हिसाब रखने के लिए एक रजिस्टर तैयार करवाया। ऐसा करने के पीछे मुहम्मद बिन तुगलक का उद्देश्य यह था कि सल्तनत के समस्त सूबों में एक-समान लगान-व्यवस्था लागू की जाये और कोई भी गांव लगान देने से मुक्त न रहे।

गयासुद्दीन तुगलक की तरह मुहम्मद बिन तुगलक ने भी कृषि की उन्नति के लिए प्रयास किये। उसने अलग से कृषि विभाग की स्थापना की। उस विभाग का नाम ‘दीवाने-कोही’ था। सुल्तान ने साठ वर्ग मील का एक भू-भाग चुनकर उसमें विभिन्न फसलों की बुवाई करवाई तथा उनमें खाद-बीज सम्बन्धी प्रयोग करवाए। इस कार्य पर तीन वर्ष में 70 लाख टंका व्यय किया गया किंतु सरकारी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार, किसानों की उदासीनता तथा समय की कमी के कारण यह योजना असफल रही और बंद कर दी गई।

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दिल्ली का सुल्तान बनने के थोड़े ही दिन बाद मुहम्मद बिन तुगलक ने दो-आब के किसानों पर करों में वृद्धि की। जियाउद्दीन बरनी के अनुसार बढ़ा हुआ कर, प्रचलित करों का दस तथा बीस गुना था। किसानों पर भूमि कर के अतिरिक्त ‘घरी’ अर्थात गृहकर और ‘चरही’ अर्थात् चरागाहकर भी लगाया गया। प्रजा को इन करों से बड़ा कष्ट हुआ।

दुर्भाग्य से उन्हीं दिनों दो-आब क्षेत्र में अकाल पड़ा और चारों ओर विद्रोह की अग्नि भड़क उठी। शाही सेनाओं ने विद्रोही किसानों को कठोर दण्ड दिए। इस पर किसान जंगलों में भाग गए। शाही सेना ने जंगलों से किसानों को पकड़कर उन्हें यातनाएं दीं। बहुत से किसानों की हत्या करने के लिए उन्हें आग में झौंक दिया गया। उनके घर जला दिए गए तथा उनकी स्त्रियों के साथ बलात्कार किए गए। सरकार द्वारा किए जा रहे इस दमन के कारण दो-आब के किसानों का सर्वनाश हो गया।

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बड़ी संख्या में हिन्दू किसानों की हत्या होने से गांव-गांव चीत्कार होने लगा तथा गली-गली से धुंआ उठने लगा। जब शाही सैनिकों द्वारा किए जा रहे अत्याचारों के समाचार सुल्तान के कानों तक पहुंचे तो सुल्तान ने सेनाओं को आदेश किया कि वे दमन रोक दें परन्तु तब तक प्रजा का सर्वनाश हो चुका था। इस कारण प्रजा सुल्तान की कृपा से कोई लाभ नहीं उठा सकी। इतिहासकारों ने मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा दो-आब में की गई कर-वृद्धि के अलग-अलग कारण बताये हैं। बदायूनीं का कहना है कि यह अतिरिक्त कर दो-आब की विद्रोही प्रजा को दण्ड देने तथा उस पर नियन्त्रण रखने के लिए लगाया गया था। सर हेग ने भी इस मत का अनुमोदन किया है। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि सुल्तान ने अपने रिक्त-कोष की पूर्ति के लिए दो-आब पर अतिरिक्त कर लगाया था। गार्डनर ब्राउन का कहना है कि दो-आब साम्राज्य का सबसे अधिक धनी तथा समृद्धिशाली भाग था। इसलिए इस भाग से साधारण दर से अधिक कर वसूला जा सकता था। अधिकांश विद्वानों का मानना है कि दो-आब का कर, शासन-प्रबन्ध को सुधारने के विचार से बढ़ाया गया था। सुल्तान की यह योजना सफल नहीं हुई। इतिहासकारों की दृष्टि में इसके दो प्रमुख कारण थे। पहला कारण यह था कि प्रजा बढ़े हुए कर को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी।

यह स्वाभाविक ही था क्योंकि कोई भी व्यक्ति अधिक कर देना पसन्द नहीं करता। दूसरा कारण यह था कि इन्हीं दिनों दो-आब में अकाल पड़ गया था जिसके कारण जनता बढ़े हुए कर को नहीं चुका पाई।

इस प्रकार बदायूनीं, सर हेग तथा गार्डनर ब्राउन आदि इतिहासकारों ने दो-आब में कर वृद्धि के लिए मुहम्मद बिन तुगलक की नीति का समर्थन किया है तथा किसानों को दोषी बताया है जबकि जियाउद्दीन बरनी ने मुहम्मद बिन तुगलक की कर-नीति की कटु आलोचना की है।

कुछ इतिहासकारों ने जियाउद्दीन बरनी पर ही आक्षेप लगाये हैं कि बरनी द्वारा की गई आलोचना में अतिरंजना है क्योंकि जियाउद्दीन बरनी स्वयं उलेमा वर्ग से था जिसके साथ सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक की बिल्कुल भी सहानुभूति नहीं थी। इसलिए सुल्तान की निन्दा करना बरनी के लिए स्वाभाविक ही था।

इसके अतिरिक्त जियाउद्दीन बरनी स्वयं भी बरान का रहने वाला था और बरान के किसानों को भी दो-आब में की गई कर-वृद्धि का शिकार होना पड़ा था। इसलिए जियाउद्दीन में अपने क्षेत्र के किसानों के प्रति प्रेम का आवेश था। जियाउद्दीन बरनी के आलोचकों का कहना है कि दो-आब में हिन्दू किसानों से पहले से ही पचास प्रतिशत कर लिया जा रहा था, ऐसी स्थिति में करों में दस-बीस गुना वृद्धि कैसे की जा सकती थी!

 यह सही है कि जियाउद्दीन बरनी द्वारा की गई मुहम्मद बिन तुगलक की आलोचना में अतिश्योक्ति है किंतु जियाउद्दीन की बातों को बिल्कुल निर्मूल भी नहीं कहा जा सकता। सुल्तान द्वारा कर वृद्धि की गई थी, इस तथ्य को समस्त इतिहासकारों ने स्वीकार किया है। निश्चित रूप से यह कर-वृद्धि अत्यधिक थी अन्यथा किसान अपने खेतों एवं गांवों को छोड़कर जंगलों में नहीं भागे होते तथा सैनिकों ने किसानों की औरतों के साथ बलात्कार नहीं किए होते!

गार्डनर ब्राउन ने कर-वृद्धि के मामले में सुल्तान मुहम्मद-बिन तुगलक को बिल्कुल निर्दोष सिद्ध करने का प्रयत्न किया है और प्रजा की हालत खराब होने का सारा दोष जनता पर एवं अकाल पर डाला है परन्तु यदि ऐसा था तो सुल्तान को अकाल आरम्भ होते ही अतिरिक्त कर हटा देना चाहिए था और प्रजा की सहायता की व्यवस्था करनी चाहिए थी। उसे शाही कर्मचारियों पर भी पूरा नियन्त्रण रखना चाहिए था। जबकि सुल्तान ने ऐसा कुछ नहीं किया। इसलिए सुल्तान को उसके उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं किया जा सकता।

दिल्ली सल्तनत का एक भी सुल्तान ऐसा नहीं था जिसने हिन्दू किसानों का शोषण नहीं किया हो किंतु हिन्दू किसानों की हत्या करवाने वाला वह पहला सुल्तान था। यह कार्य तो अल्लाउद्दीन खिलजी तक ने भी नहीं किया था।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

धरती उबलने वाली है

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धरती उबलने वाली है

अब यह कोई अनुमान की बात नहीं है, न ही कोई भविष्यवाणी है, अब यह एक सत्य है जो सबको नंगी आंखों से दिखाई दे रहा है कि धरती उबलने वाली है।

धरती का तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है। यदि आगामी 50 वर्षों में धरती पर तापक्रम बढ़ने की यही गति बनी रहती है तो वर्तमान में समुद्रों के किनारे स्थित संसार के कई बड़े महानगर आंशिक अथवा पूर्णतः समुद्र की गोद में समा जायेंगे जिनमें भारत के मुम्बई, मद्रास, कलकत्ता जैसे महानगरों को विशेष रूप से क्षति होगी।

ऐसा कैसे होता है!

पूरे संसार में स्थित ऊँचे पर्वतों पर तथा उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुवों पर तापक्रम कम होता है जिसके कारण वहां पानी अपनी ठोस अवस्था में जमा रहता है जिन्हें ग्लैशियर कहते हैं। इन ग्लैशियरों से पिघल कर बहने वाला पानी नदियों के रूप में धरती के ढलान की तरफ बहता हुआ समुद्रों तक पहुंचता है।

यदि धरती का तापक्रम संतुलित रहता है तो प्रतिवर्ष जितनी बर्फ पिघलती है उतनी ही बर्फ इन स्थानों में होने वाली वर्षा के पानी के जम जाने से फिर से बन जाती है। जब धरती पर तापक्रम बढ़ता है तो यह चक्र असंतुलित हो जाता है और पर्वतों पर स्थित ग्लैशियर तेजी से पिघलने लगते हैं।

ध्रुवों एवं ग्लैशियरों से जितने जल की क्षति होती है, उसकी तुलना में वर्ष के दौरान वर्षा से मिलने वाले जल की मात्रा कम रह जाती है जिससे समुद्रों में जल का स्तर बढ़ने लगता है तथा उनके किनारों पर स्थित धरती जल में डूबने लगती है। इसी को ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं।

ऐसा क्यों होता है!

विकसित एवं विकासशील देशों में धरती का तापक्रम बढ़ाने वाले कारण अलग-अलग हैं। ऐशिया एवं अफ्रीका के गरम देशों में जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है जिसके कारण जंगलों की कटाई बड़े पैमाने पर हो रही है। जितने जंगल काटे गये हैं, उनके मुकाबले में वृक्षारोपण नहीं किया गया है।

यदि किया भी गया है तो पेड़ों के जीवित रहने का प्रतिशत कम है। जबकि यूरोपीय एवं अमरीकी देशों में विकास की गति तीव्र होने से वहां ऊर्जा की खपत अधिक हो रही है जिसके कारण वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साईड, कार्बन मोनो ऑक्साईड तथा क्लोरो फ्लोरो कार्बन जैसी गैसों की मात्रा बढ़ रही है।

कार्बन डाई ऑक्साईड में दो विशिष्ट गुण हैं। पहला यह कि यह भारी होती है तथा धरती की सतह के निकट रहती है। दूसरा यह कि यह तापक्रम की अवशोषक होती है। जब वायुमण्डल का तापक्रम बढ़ता है तो कार्बन डाई ऑक्साईड उस तापक्रम को सोख कर धरती की सतह को गर्म कर देती है। परिणामतः तापक्रम वायुमण्डल से बाहर नहीं जा पाता और धरती का तापक्रम स्थायी रूप से बढ़ जाता है। इसे ग्रीन हाउस इफैक्ट कहते हैं।

धरती उबलने वाली है – इसे कैसे रोका जा सकता है!

इस प्रश्न का समाधान खोजने से पहले आदमी को दो चुनौतियों से जूझना है। आम आदमी के जीवन स्तर में गिरावट न आये तथा विकास की गति को और तेज किया जाये। इन दोनों चुनौतियों ने ग्लोबल वार्मिंग को भस्मासुर की तरह विश्वव्यापी कर दिया है। हम जानते हैं कि आबादी पर नियंत्रण करके वनों की कटाई को रोका जा सकता है तथा ऊर्जा की खपत को कम किया जा सकता है किंतु यह उपाय अब तक असफल रहा है। क्यों?

चूक कहाँ हो रही है!

सामाजिक मान्यताओं, धार्मिक विश्वासों एवं स्थापित परम्पराओं के चलते स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में जनसंख्या का भयानक विस्फोट हुआ है। हम चालीस करोड़ से एक सौ दस करोड़ का आंकड़ा पार कर चुके हैं। पुत्र की इच्छा में संतति की संख्या का विस्तार, बाल विवाह, बहु विवाह, संतति ईश्वर की देन, परिवार नियोजन के साधनों को ईश्वरीय इच्छा में रुकावट मानने की परम्परा आदि ऐसे कारण हैं जो हमें जनसंख्या के भस्मासुर से जीतने नहीं दे रहे।

धरती उबलने वाली है – क्या आप जानते हैं!

हमारे द्वारा उपयोग में लायी जाने वाली हर वस्तु एवं हर सेवा में जबर्दस्त ऊर्जा की खपत होती है। कागज, दियासलाई, कपड़े, चीनी, तथा फर्नीचर आदि वस्तुओं से लेकर आवास, वाहन, सड़क एवं बिजली आदि सेवाओं के सृजन में असीमित ऊर्जा की खपत होती है जिससे वायुमण्डल का तापक्रम बढ़ता है।

क्या धरती को बचाया जा सकता है!

निश्चित रूप से धरती को बचाया जा सकता है। अभी बहुत देर नहीं हुई है। हमारे पास धरती को गरम होने से रोकने के लिये बहुत से उपाय हैं। वस्तुतः हम ही धरती को नष्ट होने से रोकने के उपाय हैं।

धरती उबलने वाली है –हम क्या करें!

केवल दो काम करें! पहला काम तो यह कि अपनी मानसिकता बदलें और दूसरा काम यह कि अपनी आदतें बदलें। इन दोनों में समन्वय एवं संतुलन स्थापित करके अपनी जीवन शैली को ऐसे ढांचे में ढालें जिससे आपको कुछ शारीरिक श्रम करना पड़े, जीवन चलाने के लिये कम पैसों की आवश्यकता हो तथा आप दीर्घ आयु तक स्वस्थ जीवन जियें।

कैसी हो जीवन शैली!

परिवार को सीमित रखें। बच्चों को बड़ा होने देने पर ही उनका विवाह करें। लड़का और लड़की में भेद न करें। दो संतान के बाद परिवार नियोजन के साधन अपनायें। केवल लड़का वंश नहीं चला सकता जब तक लड़की नहीं होगी किसी का भी वंश कैसे चलेेगा!

बच्चों के शादी विवाह में व्यर्थ का दिखावा न करें। अपने परिवार के सदस्यों तथा निकटतम मित्रों को ही शादी विवाह का निमंत्रण दें। शादी विवाह में बड़ी मात्रा में भोजन व्यर्थ ही नष्ट होता है। बिजली एवं सजावट पर अत्यधिक ऊर्जा खर्च की जाती है।

घर में पानी का आवश्यकतानुसार उपयोग करें। व्यर्थ न बहने दें। घरों को प्रतिदिन धोने की आवश्यकता नहीं है। घर की पूर्ण सफाई के लिये झाड़ू एवं पौंछा पर्याप्त होता है। सार्वजनिक स्थलों पर लगे नलों को खुला न छोड़ें और न उन्हें तोड़ें। घर में आवश्यकता होने पर ही बिजली व पंखे चलायें।

जितने कागज की आवश्यकता हो, उतना कागज ही इस्तेमाल करें। उसे फाड़कर नष्ट न करें। जितने कपड़ों की आवश्यकता हो उतने ही कपड़े सिलवायें। अधिक संख्या में एक साथ सिलवाये गये कपड़े काम नहीं आते। वर्षों तक पड़े रहने से उनके रंग खराब हो जाते हैं, वे छोटे हो जाते हैं तथा फैशन से बाहर हो जाने के कारण छोड़ दिये जाते हैं जिससे ऊर्जा की जबर्दस्त बरबादी होती है।

आवश्यकता होने पर ही ईधन चालित वाहन का उपयोग करें। साइकिल पर चलना या पैदल चलना स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अच्छा है। इसे अपनी शान के खिलाफ न समझें। इन छोटे-छोटे उपायों से न केवल आपके धन की बचत होगी अपितु आप तथा आपका परिवार स्वस्थ एवं दीर्घायु बनेंगे। साथ ही आप बचा सकेंगे अपनी प्यारी धरती माँ को नष्ट होने से।

निर्णय आपको करना है, आप किससे प्रेम करते हैं, अपनी खराब आदतों खराब स्वास्थ्य, खराब माली हालत और मुसीबतों से या अपनी अच्छी आदतों, अच्छी सेहत, सुख चैन की जिंदगी और धरती माता की सेहत से!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कोलवी की बौद्ध गुफाएं

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कोलवी की बौद्ध गुफाएं

कोलवी की बौद्ध गुफाएं राजस्थान के झालावाड़ जिले में स्थित हैं। इन्हीं गुफाओं के पास हात्यागौड़ की बौद्ध गुफाएं भी स्थित हैं। मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में स्थित बौद्ध गुफाएं तथा कोलवी की बौद्ध गुफाएं भी अधिक दूरी पर स्थित नहीं हैं।

भगवान बुद्ध कभी राजस्थान नहीं आये किंतु उनके निर्वाण के बाद के 1000 सालों में राजस्थान बौद्ध धर्म के बहुत बड़े केन्द्र के रूप में उभरा। यह एक विस्मयकारी बात थी कि जब गुप्त शासक चौथी शताब्दी इस्वी के मध्य से लेकर छठी शताब्दी इस्वी के मध्य तक पूरे भारत में वैष्णव धर्म का प्रचार-प्रसार बड़े उत्साह के साथ कर रहे थे, तब राजस्थान में वैष्णव धर्म की तरह ही बौद्ध एवं जैन धर्म भी अपने चरम पर थे।

इन तीन महान धर्मों की गरिमामय उपस्थिति से राजस्थान का वातावरण कला, साहित्य, अध्यात्म एवं ज्ञान-विज्ञान से युक्त हो गया था तथा उस काल में पाणिनी से लेकर ब्रह्मगुप्त तक हुए अनेक विद्वानों ने ऐसी धूम मचाई कि 14-15 शताब्दियां बीत जाने पर भी उनकी धमक पूरी धरती पर आज भी सुनाई दे रही है।

राजस्थान के बौद्ध स्मारक

राजस्थान में अनेक स्थानों से बौद्ध धर्म से सम्बन्धित स्थल के अवशेष अथवा उनके लिखित प्रमाण मिले हैं जिनमें बैराठ, बीजक की पहाड़ी, लालसोट, रैढ़, भीनमाल, चित्तौड़ तथा कोटा प्रमुख हैं। शेरगढ़ में बौद्ध मंदिर और बौद्ध विहार का उल्लेख करने वाला संस्कृत भाषा का छठी-सातवीं शताब्दी ईस्वी का एक शिलालेख मिला है जिसे एक बौद्ध भिक्षु ने उत्कीर्ण किया।

बीजक की पहाड़ी पर अशोक का भब्रू शिलालेख मिला था जिसे एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल के संग्रहालय में रखा गया। बीजक की पहाड़ी आजकल निर्जन है किंतु निश्चित रूप से उस काल में इस क्षेत्र में सघन मानव बस्ती रही होगी, इसीलिये इस शिलालेख को यहां लगाया गया होगा। यहां से 27 फुट व्यास के एक गोलाकार बौद्ध मंदिर के अवेशष मिले हैं। यह एक प्राचीन बौद्ध चैत्य था।

बैराठ से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित भीमजी की डूंगरी के नीचे भी एक शिलालेख मिला है जो बीजक की पहाड़ी के शिलालेख की ही अनुकृति है। चित्तौड़ के कालिका मंदिर से लगभग आधा किलोमीटर दूरी पर उत्तर-पश्चिम की ओर 10 स्तूप पाये गये हैं। इनमें सबसे बड़ा 3 फुट तीन इंच ऊंचा था। इसका आधार एक फुट आठ इंच वर्गाकार है।

ऊपरी भाग वर्तुलाकार था उसके ऊपर गुम्बद की आकृति थी। नीचे, चारों तरफ बैठी भगवान बुद्ध की 16 प्रतिमाएं थीं। चित्तौड़ दुर्ग में नगरी से सामग्री लाकर लाई गई थी। नगरी शुंग कालीन नगर था। यहां से प्राप्त सामग्री में एक शिलालेख में लिखा है- ‘‘स वा भूतानाम् दयाथम् कारिता।’’ अर्थात् इस शिलालेख में भगवान बुद्ध द्वारा समस्त जीवों के प्रति दया करने के उपदेश की ओर संकेत किया गया है।

झालावाड़ जिले की बौद्ध गुफाएं

यदि हम झालावाड़ जिले के भवानीमण्डी कस्बे से मंदसौर को जाने वाली सड़क पर चलें तो झालावाड़ जिले में कोलवी, हात्यागोड़, बिनायगा तथा गुनाई और मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में धर्मराजेश्वर नामक स्थान पर बौद्ध भिक्षुओं की छठी से आठवीं शताब्दी की बौद्ध गुफाएं मिलती हैं।

ऐसा प्रतीत होता है कि सैंकड़ों बौद्ध भिक्षुओं ने घने जंगलों में छिपी हुई इन पहाड़ियों में गुफाएं बनाकर इनमें निवास किया। इन गुफाओं के आकार तथा उनमें बने कक्ष, शैयाएं, साधना कक्ष, बौद्ध मंदिर, बारामदों तथा दो मंजिली गुफाओं आदि की उपस्थिति से अनुमान होता है कि बौद्ध भिक्षुओं ने लम्बे समय तक इनमें निवास किया होगा।

यहां उन्होंने गुफाओं के साथ-साथ कलात्मक स्तूप तथा भगवान बुद्ध की प्रतिमाएं भी उत्कीर्ण कीं। बौद्ध भिक्षुओं के सधे हुए हाथों की छैनियों की टंकार आज भी इन गुफाओं के वीराने में गूंजती हुई प्रतीत होती हैं। अंग्रेज अधिकारी डॉक्टर इम्पे ने कोलवी की गुफाओं को खोजा था।

जनरल कनिंघम ने भी इन गुफाओं को देखा था। झालावाड़ जिले से मंदसौर तक फैली हुई ये गुफाएं भुरभुरे लैटेराइट पत्थर की बनी हुई हैं जिन पर छैनी चलाकर आसानी से काटा जा सकता है। इस पूरे क्षेत्र में बोधिसत्व की प्रतिमाओं का अभाव है जिससे सिद्ध होता है कि ये समस्त गुफाएं बौद्धों के हीनयान मत के भिक्षुओं की हैं।

कोलवी की बौद्ध गुफाएं संख्या में लगभग 50 हैं जिनमें से कुछ गुफाएं नष्ट हो गयी हैं। इन गुफाओं का सामान्यतः आकार 15 फुट लम्बा, 13 फुट चौड़ा तथा 22 फुट ऊंचा है। इन गुफाओं में सामान्यतः एक हिस्से में लगभग दो फुट ऊंचे मिट्टी तथा पत्थर के मिश्रण से चबूतरे बने हुए हैं जो शैयाएं जान पड़ते हैं।

कोलवी की बौद्ध गुफाएं विशिष्ट क्रम में बनी हुई हैं। इनके एक तरफ मिट्टी-पत्थरों का ही सिराहना बना हुआ है जबकि पैताणा (पैरों की तरफ का भाग) नीचे की ओर ढलान लिये हुए है। आयुर्वेद कहता है कि यदि भोजन करने के बाद धरती पर 180 डिग्री पर सीधे सोने की बजाय यदि पेट से सिर तक का हिस्सा कुछ उठा हुआ हो तो भोजन जल्दी पचता है तथा वायु एवं अपच आदि विकार नहीं होते।

बौद्ध गुफाओं में बनी हुई ये शैयाएं इसी सिद्धांत पर बने हुए प्रतीत होती हैं। कुछ गुफाओं के भीतर, दोनांे किनारों पर इस तरह के शैयाएं बनी हुई हैं। अधिकतर गुफाओं में एक ही कक्ष बना हुआ है जबकि कुछ गुफाओं के भीतर एक से अधिक कक्ष भी बने हुए हैं। कुछ कक्षों के साथ छोटे कक्ष भी बने हुए हैं जो साधना कक्ष के रूप में अथवा भण्डार गृह के रूप में काम आते होंगे। कोलवी में एक गुफा में कुंआ भी बना हुआ है जो कि एक असाधारण बात है। पहाड़ के कठोर पत्थर की खुदाई करके कुंआ बनाना उन दिनों में पर्याप्त श्रम भरा कार्य रहा होगा। क्योंकि तब न तो उन्नत प्रकार के उपकरण थे और न बारूद जैसे विस्फोटक।

कोलवी में एक चट्टान पर 12 फुट उंची भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमा भी उत्कीर्ण है जो उपदेश देने की मुद्रा में है। काफी संख्या में कलात्मक स्तूप हैं जो चट्टानों को काटकर वर्गाकार एवं अष्टभुजा आधार पर बनाये गये हैं। इनमें से कुछ स्तूप आज भी अच्छी अवस्था में हैं। एक गुफा में भगवान बुद्ध की पद्मासन मुद्रा की प्रतिमा है। इसे प्रकार की गुफाएं चैत्य कहलाती हैं।

इनकी छत हाथी के पीठ की तरह होती हैं। कोलवी में कुछ अन्य चैत्य भी मौजूद थे जो अब नष्ट प्रायः हैं। कोलवी से 13 किलोमीटर दूर बिनायगा गांव के निकट की पहाड़ी में लगभग 20 गुफाएं स्थित हैं जिनका आकार कोलवी की गुफाओं की अपेक्षा छोटा है। हात्यागोड़ नामक गांव की पहाड़ी में 5 गुफाएं हैं। गुनाई गांव में भी 4 गुफाएं हैं।

झालावाड़ जिले में डग के निकटवर्ती क्षेत्र में भी कुछ गुफाएं बताई जाती हैं जो कि निरंजनी गुफाएं कहलाती हैं। कोलवी, बिनायगा तथा हात्यागोड़ की गुफाएं एक ही जैसी बनी हुई हैं। बिनायगा तथा हात्यागोड़ की गुफाओं में भी कोलवी की गुफाओं की भांति पत्थर और मिट्टी के शैयाएं बनी हुइ हैं।

कोलवी में कुछ गुफाएं दो मंजिल की हैं जबकि बिनायगा में एक मंजिल की ही गुफाएं हैं। इसी सड़क पर लगभग 100 किलोमीटर आगे चलने पर मंदसौर जिला आरम्भ हो जाता है। यहां धर्मराजेश्वर नामक स्थान पर 524 मालव संवत का एक शिलालेख मिला है जिनमें भगवान बुद्ध को सुगत नाम से सम्बोधित किया गया है।

राजस्थान सरकार ने कोलवी तथा बिनायगा की गुफाओं तक जाने के लिये पत्थर के पक्के मार्ग तथा उसके साथ रक्षा दीवार बनवा दी है। इससे इन गुफाओं तक पहुंचना सुगम हो गया है। फिर भी पर्यटकों को यहां तब तक नहीं लाया जा सकता जब तक कि ये राज्य के पर्यटन मानचित्र पर प्रमुख स्थान नहीं पा जातीं।

कोलवी की बौद्ध गुफाएं विशिष्ट क्यों ?

बौद्ध स्मारक एवं बौद्ध स्थल पूरे भारत में बड़ी संख्या में मिले हैं और इनका मिलना इतिहास की दृष्टि से एक स्वाभाविक बात है किंतु झालावाड़ क्षेत्र की बौद्ध गुफाएं अपने आप में विशिष्ट हैं। ये भारत के इतिहास के एक भयानक मोड़ की गवाह हैं तथा आततायी हूणों के मालवा क्षेत्र पर आक्रमण करने तथा बौद्ध धर्म के राजस्थान एवं मालवा से विलुप्त हो जाने की क्रूर कहानी कहती हुई प्रतीत होती हैं।

हूणों की विनाश लीला

बुद्ध के निर्वाण के लगभग 1000 साल तक राजस्थान में बौद्ध धर्म निर्विघ्न रूप से फलता-फूलता रहा किंतु पांचवी शताब्दी ईस्वी में बैक्ट्रिया से एक विप्लवकारी तूफान उठा। बैक्ट्रिया भारत और ईरान के मध्य में तथा हिन्दुकुश पर्वत के पश्चिम में स्थित था। इसे ईसा के जन्म से लगभग 325 वर्ष पहले, एलेक्जेण्ड्रिया के राजा सिकन्दर ने मध्य एशिया में अपनी प्रांतीय राजधानी के रूप में स्थापित किया था।

बैक्ट्रिया से उठा विनाशकारी तूफान हूंगनू नामक एक प्राचीन चीनी जाति की विध्वंसकारी विजय यात्रा के कारण उत्पन्न हुआ था जिन्हें भारत में हूण कहा जाता है तथा जिन्हें यूचियों के कारण अपना मूल स्थान छोड़कर बैक्ट्रिया में आकर रहना पड़ा था। पांचवी शताब्दी ईस्वी में हूणों के नेता अत्तिल ने मध्य एशिया की दो बड़ी राजधानियों- रवेन्ना तथा कुस्तुंतुनिया पर भयानक आक्रमण करके उन्हें तहस-नहस कर डाला तथा ईरान को परास्त करके वहाँ के राजा को मार डाला।

उनकी बर्बर सेनाओं ने डैन्यूब नदी पार करके सिंधु नदी तक के क्षेत्र को रौंद डाला। ऐसे विषम समय में गुप्तों के महान राजा स्कन्दगुप्त (415-455 ई.) ने हूणों को भारत भूमि से परे धकेलकर राष्ट्र एवं प्रजा की रक्षा की किंतु इस कार्य में गुप्त साम्राज्य की इतनी शक्ति क्षीण हो गई कि बाद के गुप्त-सम्राट्, भारत को हूणों के प्रहारों से नहीं बचा सके।

पांचवी शताब्दी के अन्त में (484 ईस्वी के आसपास) हूणों ने तोरमाण के नेतृत्व में भारत पर आक्रमण किया। उसने पहले गान्धार पर और बाद में गुप्त साम्राज्य के पश्चिमी भागों पर प्रभुत्व स्थापित किया तथा मालवा को भी जीत लिया। आधुनिक झालावाड़ जिला, कोटा तथा मंदसौर क्षेत्र इसी मालवा में स्थित थे। मेवाड़ के कुछ हिस्से भी इसमें आते थे।

इस प्रकार तोरमाण भारत के उत्तर-पश्चिमी प्रदेश के बहुत बडे़ भू-भाग पर अधिकार करके, स्यालकोट (पंजाब में) को राजधानी बनाकर शासन करने लगा। तोरमाण के बाद उसका पुत्र मिहिरकुल हूणों का राजा हुआ। उत्तर भारत में उसके सिक्के पर्याप्त संख्या में मिले हैं जिनसे ज्ञात होता है कि उस काल में काश्मीर, पंजाब, राजस्थान, मालवा आदि विशाल प्रदेश हूणों के आधिपत्य में चले गये थे।

मिहिरकुल बड़ा ही निर्दयी तथा रक्त पिपासु था। उसने गुप्त सम्राट बालादित्य पर आक्रमण किया। बालादित्य ने मिहिरकुल को जीवित ही बंदी बनाया। वह मिहिरकुल का वध करना चाहता था किन्तु राजमाता के आदेश पर उसे जिंदा छोड़ दिया गया। मिहिरकुल ने भाग कर कश्मीर में शरण ली किंतु कुछ समय बाद विश्वासघात करके वहां के राजा को मार दिया तथा स्वयं कश्मीर का राजा बन गया। उसने गान्धार नरेश को मारकर गान्धार पर भी अधिकार कर लिया।

जब मिहिरकुल गुप्तों के हाथों से फिसल गया तब मालवा के राजा यशोधर्मा (यशोवर्मन) ने मिहिरकुल पर आक्रमण किया तथा उसे बुरी तरह परास्त किया। मन्दसौर अभिलेख कहता है कि यशोधर्मा से पराजित होने के पूर्व मिहिरकुल ने स्थाण् (भगवान शिव) के अतिरिक्त अन्य किसी के सामने अपना सिर नहीं झुकाया।

ह्वेनसांग का वर्णन

631 ईस्वी में भारत की यात्रा पर आये चीनी बौद्ध भिक्षुयात्री ह्वेनसांग ने मिहिरकुल के बारे में लिखा है कि उसने बौद्धों पर बड़ा अत्याचार किया। उनके मठों, विहारों तथा स्तूपों को लूटा और बड़़ी निर्दयता से उनका सामूहिक वध किया। मिहिरकुल ने अपने सम्पूर्ण राज्य में बौद्ध संघ के पूर्ण विनाश की आज्ञा दी।

ह्वेनसांग लिखता है कि मिहिरकुल ने 1600 बौद्ध स्तूपों और विहारों को ध्वस्त कर दिया और 9 करोड़ बौद्ध उपासकों की हत्या कर दी। ह्वेनसांग के वर्णन में अतिरंजना हो सकती है किंतु यह निश्चित है कि तोरमाण तथा मिहिरकुल ने राजस्थान के बौद्धों को बहुत क्षति पहुंचाई। उनके मठ उजाड़ दिये, पुस्तकालय जला दिये। विहारों को धूल में मिला दिया तथा लाखों बौद्ध भिक्षुओं को मार डाला। गुप्त शासक बालादित्य तथा मालवा का शासक यशोधर्मा हूणों को भारत से बाहर नहीं निकाल सके।

बौद्धों के अस्तित्व पर संकट

हूणों की भयानक विनाशलीला के कारण बौद्ध भिक्षुओं के समक्ष अस्तित्व का संकट उत्पन्न हो गया। बहुत से बौद्ध भिक्षुओं ने भागकर तिब्बत, चीन, बर्मा, श्रीलंका आदि देशों में शरण ली। राजस्थान के बौद्ध भिक्षु जंगलों और गुफाओं में चले गये तथा वहीं छिपकर, भगवान बुद्ध के बताये नियमों का पालन करते हुए साधना करने लगे।

इन गुफाओं में छिपे बौद्ध भिक्षुओं का क्या अंत हुआ होगा, यह बताने वाला कोई शिलालेख अथवा लिखित प्रमाण नहीं मिला है। केवल अनुमान के सहारे ही आगे बढ़ा जा सकता है और यही कहा जा सकता है कि अपने आप को बचाने का प्रयास करने वाले ये भिक्षु अंततः या तो हूणों के भालों की नोकों के नीचे आ गये होंगे या फिर उन्हें भी भागकर चीन, बर्मा अथवा श्रीलंका को भाग जाना पड़ा होगा।

अंततः नष्ट हो ही गये

सातवीं शताब्दी में भारत में राजपूतों का तथा भारत की पश्चिमी सीमा पर तुर्कों का उत्कर्ष हुआ। हूण इन दोनों शक्तियों के बीच पिसकर नष्ट हो गये। हूणों के पराभव के बाद बौद्ध धर्म ने फिर से संभलने का प्रयास किया। सातवीं शताब्दी में जब चीनी बौद्ध भिक्षु भारत आया तब उसने भीनमाल नगर में एक बौद्ध विहार देखा था जिसमें 100 से अधिक भिक्षु रहते थे।

यह राजस्थान में संभवतः बौद्धों के बुझते हुए दीपक की अंतिम चमक थी क्योंकि सातवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक राजस्थान पर शासन करने वाले राजपूत शासक, शक्ति के उपासक थे उनके राज्य में अहिंसावादी बौद्धों के लिये कोई विशेष स्थान नहीं था। कोलवी, विनायगा, हात्यागोड़ तथा गुनाई गांव की गुफाएं काल के गाल में समा गये बौद्ध भिक्षुओं का रहस्य छिपाये मौन खड़ी हैं।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

स्वात में बामियान दोहराया जायेगा

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स्वात में बामियान दोहराया जायेगा

पाकिस्तान के धुर पश्चिम में स्वात क्षेत्र स्थित है। यह हरी-भरी पहाड़ियों वाला अत्यंत सुंदर क्षेत्र है। इसीलिये इसे स्वात कहा जाता है। स्वात शब्द ‘‘स्वाति’’ का अपभ्रंश है जिसका अर्थ होता है- सूर्य की पत्नी।

यह क्षेत्र सचमुच इतना सुंदर है कि इसे सूर्य की पत्नी कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। किसी समय यहाँ सैंकड़ों नदियों और झरनों के किनारों पर वैदिक ऋचाऐं गूंजा करती थीं। सैंकड़ों ऋषि मुनि यहां बैठकर सृष्टि की रचना और मनुष्य जीवन के उद्देश्यों के बारे में चिंतन और सृष्टिकर्त्ता का स्तवन किया करते थे। इसी स्वात घाटी के पश्चिम में स्थित है बामियान। अब स्वात पकिस्तान में है तथा बामियान अफगानिस्तान में।

जब सैंकड़ों बौद्ध भिक्षु, भगवान बुद्ध के संदेश लेकर दुनिया के विभिन्न हिस्सों में गये तो उनमें से कुछ भिक्षु स्वात घाटी तथा उससे लगे हुए बामियान को संसार की सबसे सुंदर तपस्थली मानकर यहीं रुक गये। उन्होंने यहां की पहाड़ियों में भगवान बुद्ध की हजारों मूर्त्तियों का उत्कीर्णन किया।

बुद्ध की इन मूर्त्तियों ने इस क्षेत्र में नये स्वर्ग की रचना की। जब कोई भूला बिसरा यात्री इस क्षेत्र में अचानक पहुँच जाता से इस स्वर्ग को देखकर हैरान रह जाता। जब सूर्य रश्मियां हरियाली से ढकी हुई पहाड़ियों और उनमें उत्कीर्णित भगवान बुद्ध की हजारों मूर्त्तियों पर अठखेलियां करतीं तो लगता कि रश्मिरथी सूर्य की पत्नी स्वाति ने स्वयं प्रकट होकर भगवान सूर्य की रश्मियों से अपना शृंगार किया है।

जब सिकन्दर विश्व विजय का स्वप्न लेकर भारत आने के लिये इस क्षेत्र से होकर गुजरा तो वह इस सुंदर स्थान को देखकर हैरान रह गया। वह कुछ समय तक इस घाटी में रुका और भारत विजय के पश्चात् पुनः इस क्षेत्र में कुछ दिन निवास करने का संकल्प लेकर आगे बढ़ गया। कुछ समय बाद जब सिकंदर ने घायल होकर विश्व विजय का स्वप्न त्याग दिया और वह वापस यूनान जाने के लिये लौटा तो उसने बामियान क्षेत्र पर अपना अधिकार बनाये रखने के लिये अपनी सेना का एक हिस्सा यहीं छोड़ दिया।

सिकन्दर के आदेश से हजारों यूनानी सैनिक अपने परिवारों सहित यहीं बस गये। नीली आँखों और लाल बालों के सैंकड़ों सुंदर यूनानियों के आ बसने से यह क्षेत्र और भी सुंदर हो गया। उनके देह सौंदर्य के कारण ही अफगानिस्तान के लोग इस क्षेत्र को नूरिस्तान कहने लगे।

जब अफगानिस्तान में इस्लाम का प्रसार हुआ तो नूरिस्तान के लोगों ने इस्लाम को मानने से मना कर दिया। इस्लाम के प्रचारक नूरिस्तान के बहादुर यूनानी लोगों को परास्त नहीं कर सके, न ही अन्य किसी तरह से उन्हें इस्लाम कबूल करवा सके। हार-थक कर इस्लाम के प्रचारकों ने इस क्षेत्र का नाम बदलकर काफिरिस्तान कर दिया।

जब चंगेज खाँ बामियान घाटी में पहुँचा तो वह यहाँ के नैसर्गिक सौंदर्य, शिल्प सौंदर्य और मानव सौंदर्य को देखकर आश्चर्य चकित रह गया। काफिरिस्तान के सुंदर इंसानों को मारने में चंगेज खाँ को बड़ा आनंद आया। नीली आँखों और लाल बालों वाले इंसानों की भयाक्रांत चीखों ने उसके तन-मन में आनंद भर दिया। वह उन्हें तड़पा-तड़पा कर मारने लगा।

बहादुर होने पर भी यूनानी लोग चंगेज खाँ के सैनिकों की क्रूरता का सामना नहीं कर सके। हजारों स्त्री-पुरुष और बच्चे प्राण बचाने के लिये पहाड़ों में भाग गये। चंगेज खाँ ने उन्हें ढूंढ-ढूंढ कर मौत के घाट उतारा।

काफिरिस्तान से निबट कर चंगेज खाँ ने बामियान घाटी में ही बसे सुर्ख शहर को जा घेरा। सुर्ख शहर की प्राकृतिक बनावट तथा दुर्ग की सुरक्षा व्यवस्था ऐसी थी कि उस पर कोई भी सेना बाहर से आक्रमण करके अधिकार नहीं कर सकती थी, चाहे शत्रु सेना सौ वर्षों तक ही शहर को घेर कर क्यों न बैठी रहे।

सुर्ख के राजा को नित्य नये विवाह करने का शौक था इसलिये वह चंगेज खाँ जैसे दुर्दांत शत्रु की परवाह किये बिना अपना विवाह करने के लिये कहीं और चला गया तथा शहर को राजकुमारी के भरोसे छोड़ गया। सुर्ख शहर की राजकुमारी अद्वितीय सुंदरी थी तथा विवाह के योग्य भी। उसे अपने पिता का इस तरह चले जाना अच्छा नहीं लगा। उसने चंगेज खाँ को गुप्त संदेश भिजवाया कि यदि चंगेजखाँ उसे अपनी रानी बना ले तो वह शहर पर उसका अधिकार करवा देगी।

चंगेज खाँ ने राजकुमारी की शर्त स्वीकार कर ली। राजकुमारी ने चंगेज खाँ के आदमियों को वह पहाड़ी बता दी जहाँ से सुर्ख शहर को पानी मिलता था। चंगेज खाँ ने पानी का प्रवाह रोक दिया। पानी न मिलने के कारण सुर्ख शहर में हाहाकार मच गया और सुर्ख की सेना को आत्म-समर्पण करना पड़ा।

सुर्ख पर अधिकार करते ही चंगेज खाँ ने राजकुमारी के महल को छोड़कर शेष शहर में कत्ले आम करने का आदेश दिया। चंगेज खाँ की वहशी सेना ने कई दिन तक शहर में कहर बरपाया किंतु राजकुमारी का महल लूट, हत्या और बलात्कार से बचा रहा।

एक दिन शाम के समय चंगेज खाँ ने राजकुमारी को संदेश भिजवाया- ‘कल सवेरे फौज कूच करेगी। आप बाहर आ जाइये।’

राजकुमारी सफर के लिये तैयार होकर बाहर आ गयी। फौज पंक्तिबद्ध होकर प्रस्थान के लिये तैयार खड़ी थी। चंगेजखाँ राजकुमारी के स्वागत में उठ कर खड़ा हुआ। राजकुमारी दोनों बाहें फैलाकर आगे बढ़ी किंतु उसके आश्चर्य का पार नहीं रहा जब उसने चंगेजखाँ के आदेश को सुना। वह अपने सैनिकों से कह रहा था- ‘प्रत्येक सिपाही इस दुष्टा राजकुमारी के सिर पर एक पत्थर मारे। जो अपने बाप की नहीं हुई वह मेरी क्या होगी?’

चंगेज खाँ के आदेश का पालन हुआ। राजकुमारी चीख मार कर नीचे गिर पड़ी। थोड़ी देर बाद उसकी लोथ ही वहाँ रह गयी। राजकुमारी के महल की ईंट से ईंट बजा दी गयी। चंगेज खाँ की सेना लूट-खसोट और कत्ले-आम के नये अध्याय लिखने के लिये आगे चल पड़ी। पीछे छोड़ गयी सुर्ख शहर के खण्डहर जो आज भी चंगेजखाँ के क्रूर कारनामों और राजकुमारी के पितृद्रोह की कहानी सुनाने के लिये मौजूद हैं।

जब चंगेज खाँ अपनी सेना के साथ बामियान की घाटी में एक पहाड़ी क्षेत्र से होकर निकला तो उसने एक अद्भुत दृश्य देखा। चंगेज खाँ ने देखा कि एक पहाड़ी से सट कर दो विशाल बुत खड़े हैं जो बहुत दूर से दिखाई पड़ते हैं। चंगेज खाँ ने अपना घोड़ा उसी और मोड़ लिया।

निकट पहुँचने पर उसने पाया कि इन विशाल बुतों के पास छोटे-छोटे हजारों बुत बिखरे पड़े हैं। सारे के सारे बुत बुरी तरह से टूटे हुए हैं। यहाँ तक कि दोनों विशाल बुतों की आँखें और नाक भी टूटी हुई हैं। इतना ही नहीं उसने उन पहाड़ियों में बनी हुई हजारों गुफाओं को भी देखा जो पत्थरों को काटकर बनाई गयी थीं। इन गुफाओं की दीवारों पर भी हजारों बुत खड़े थे जिनमें बहुत से बुत टूटे हुए थे। इस अद्भुत दृश्य को देखकर उसकी आँखें हैरानी से फैल गयीं। कहाँ से आये इतने सारे बुत! किसने बनायीं हजारों गुफायें!

दरअसल चंगेज खाँ उन पहाड़ियों में पहुँच गया था जहाँ उसके पहुँचने से लगभग सवा हजार साल पहले बौद्ध भिक्षुओं ने हजारों पहाड़ियों को काटकर विशाल बौद्ध मठों का निर्माण किया था तथा एक पहाड़ी के बाहरी हिस्से को काटकर भगवान बुद्ध की दो विशाल मूर्तियाँ बनाईं थीं। इन मूर्तियों के ऊपर विशाल मेहराबों का निर्माण किया गया था। मेहराबों में भगवान बुद्ध के जीवन चरित्र से सम्बन्धित कई रंगीन चित्र भी बनाये थे। भिक्षुओं ने आसपास की पहाड़ियों को काटकर हजारों गुफाओं का निर्माण भी किया था तथा उनमें सुंदर मूर्तियों का उत्कीर्णन किया था।

जब चंगेज खाँ ने इन मूर्तियों और गुफाओं को देखा तो उसके आश्चर्य का पार न रहा। वह बुतों की विशालता से भी अधिक हैरान इस बात पर था कि दोनों बुत ऊपर से लेकर नीचे तक पूरी तरह सलामत थे किंतु उनकी आँखों और नाक को किसी ने तोड़ दिया था। दोनों विशाल बुतों के आसपास हजारों की संख्या में अन्य बुतों को भी भग्न अवस्था में देखकर वह आश्चर्य चकित रह गया था। आखिर किसने बनाया होगा इन्हें? और फिर क्यों तोड़ डाला होगा? कौन लोग रहे होंगे वे!

चंगेज खाँ ने स्थानीय लोगों को पकड़ कर मंगवाया और उनसे इन बुतों को बनाने वालों और उनको तोड़ने वालों के बारे में पूछा। चंगेज खाँ को बताया गया कि इन्हें सवा हजार साल पहले भारत से आये बुत-परस्त बौद्ध-भिक्षुओं ने बनाया था किंतु अरब से आये बुत-शिकनों ने इन बुतों को तोड़-तोड़ कर आग में झौंक दिया।

हजारों अलंकृत गुफाओं को भी उसी समय तहस-नहस किया गया तथा पहाड़ियों में उकेरा गया वह सारा शिल्प नष्ट कर दिया गया जो बौद्ध-दरवेशों की छैनियों से निकला था। इन दो बड़े बुतों को पूरी तरह नष्ट न करके केवल इनकी आँखें और नाक तोड़ दीं ताकि इस बात की यादगार बनी रहे कि कभी यहाँ इतने विशाल बुत थे।

स्थानीय लोगों की बात सुनकर चंगेज खाँ क्रोध से चीख पड़ा! उसे उन लोगों पर तो क्रोध था ही जो संसार में सुंदर बुत बनाने का काम करते हैं किंतु उससे भी अधिक क्रोध उसे उन लोगों पर था जिन्होंने इन बुतों को चंगेजखाँ के वहाँ पहुँचने से पहले ही तोड़ डाला था। आखिर यह कार्य उसे अपने हाथों से करना चाहिये था। कितना आनंद आता इन बुतों को तोड़ने में! वह तो इन बुतों को भी ऐसी क्रूरता के साथ तोड़ता कि ये बुत भी नीली आँखों और लाल बालों वाले इंसानों की तरह चीखने लगते! क्यों किया गया उसे इस आनंद से वंचित!

चंगेज खाँ काल के प्रवाह में बह गया। फिर आये अंग्रेज जिन्होंने बर्मा से लेकर भारत,नेपाल, श्रीलंका और अफगानिस्तान पर अपना अधिकार किया। अंग्रेज शासकों ने बामियान और स्वात क्षेत्र में बिखरी हुई मूर्त्तियों को फिर से सहेजने का काम किया। इस क्षेत्र में बिखरी सैंकड़ों मूर्त्तियों को एकत्रित करके एक म्यूजियम में रखवाया गया। आज ये मूर्त्तियां पाकिस्तान के स्वात क्षेत्र में बने एक राजकीय संग्रहालय में रखी हैं जिसे ‘‘स्वात म्यूजियम’’ के नाम से जाना जाता है।

इन मूर्त्तियों को देखने के लिये दुनिया भर के हजारों पर्यटक प्रतिवर्ष स्वात क्षेत्र पहुंचते हैं। इन पर्यटकों में यूरोपीय देशों के पर्यटक तो होते ही हैं, सााथ ही चीन, जापान, कोरिया आदि उन एशियाई देशों के पर्यटक भी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं जिन देशों में बौद्ध धर्म की व्यापक स्तर पर मान्यता है।

वर्ष 1998 में अफगानिस्तान में तालिबान अपने चरम उफान पर था। तालिबान के कमाण्डरों को यह बात सहन नहीं हुई कि भगवान बुद्ध की ये मूर्त्तियां यहाँ खड़ी रहें। उन्होंने अपनी तोपों के मुंह उन मूर्त्तियों की ओर मोड़ दिये। कई दिनों तक तोपें गरजती रहीं और हरी-भरी घाटियां बारूद की गंध से भर गईं। साथ ही भगवान बुद्ध की सैंकड़ों मूर्त्तियां एक बार फिर तोड़ डाली गईं।

जब अमरीका ने तालिबान को अफगानिस्तान से खदेड़ दिया तब तालिबान ने भागकर पाकिस्तान में शरण ली। अब स्वातघाटी का वह हिस्सा जो पाकिस्तान में है, तालिबान के चंगुल में है। तालिबान ने धमकी दी है कि वह पाकिस्तान सरकार के राजकीय संग्रहालय ‘‘स्वात म्यूजियम’’ को तोड़ कर नष्ट कर देगा क्योंकि वह यह सहन नहीं कर सकता कि किसी मकान में बुतों को रखा जाये या फिर उन्हें प्रदर्शित किया जाये।

यह तो समय बतायेगा कि तालिबान स्वात म्यूजियम को निगल जायेगा या उससे पहले पाकिस्तान उन पर कोई कार्यवाही करने में सफल होगा किंतु यह निश्चित है कि यदि तालिबान स्वात म्यूजियम को निगलने में कामयाब हुआ तो उसका अगला निशाना यहां से केवल 40 किलोमीटर दूर स्थित तक्षशिला होगा।

वही तक्षशिला जो किसी समय ज्ञान-विज्ञान और दर्शन का केन्द्र था और अब पूरी तरह खण्डहर के रूप में मौजूद है। यदि तालिबान इसी तरह 40-40 किलोमीटर बढ़ता रहा तो कौन जाने उसका यह विध्वंस कहाँ जाकर रुकेगा।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

दिल्ली से दौलताबाद (128)

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दिल्ली से दौलताबाद

जब मुहम्मद बिन तुगलक अपनी राजधानी दिल्ली से दौलताबाद ले गया तब दिल्ली के लोग गालियां लिखे कागज तीरों में बांधकर मुहम्मद बिन तुगलक के महल में फैंकते थे!

मुहम्मद बिन तुगलक ने दो-आब के क्षेत्र में खेती पर लगने वाले कर में अतिशय वृद्धि कर दी जिसके कारण हिन्दू किसान अपने घरों एवं खेतों को छोड़कर जंगलों में भाग गए। इस पर शाही सैनिकों ने जंगलों से पकड़कर हिन्दू किसानों की हत्या कर दी तथा उनके घरों में आग लगाकर उनकी औरतों के साथ बलात्कार किए।

जब सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक को इन अत्याचारों के बारे में ज्ञात हुआ तो उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे किसानों का दमन न करें किंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी। बड़ी संख्या में किसान बर्बाद हो चुके थे। इसके बाद मुहम्मद बिन तुगलक ने अपनी राजधानी को दिल्ली से हटाकर दक्षिण भारत में स्थित देवगिरि में ले जाने का निश्चय किया और उसका नाम दौलताबाद रखा। सुल्तान द्वारा राजधानी परिवर्तन का निर्णय लेने के पीछे कई कारण बताये जाते हैं।

इस समय तक दिल्ली सल्तनत का अत्यधिक विस्तार हो चुका था। पुरानी राजधानी दिल्ली मुहम्मद बिन तुगलक की सल्तनत के उत्तरी भाग में स्थित थी जबकि नई राजधानी देवगिरि दिल्ली सल्तनत के केन्द्र में स्थित थी जहाँ से सल्तनत के विभिन्न भागों पर मजबूती से नियन्त्रण रखा जा सकता था।

राजधानी बदलने के पीछे यह कारण भी कार्य कर रहा था कि दिल्ली के सुल्तान दक्षिण भारत पर अपनी सत्ता को स्थायी रूप से बनाए नहीं रख पा रहे थे। इसलिए मुहम्मद बिन तुगलक दक्षिण में अपनी राजधानी बनाकर वहाँ भी अपनी सत्ता को सुदृढ़ बना सकता था।

याहया नामक एक लेखक का कहना है कि दो-आब में कर-वृद्धि तथा अकाल के कारण दिल्ली में बड़ा असन्तोष एवं अशान्ति फैल गई। इसलिए यहाँ की हिन्दू जनता को दण्ड देने के लिए सुल्तान ने समस्त दिल्लीवासियों को देवगिरि जाने की आज्ञा दी।

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इब्नबतूता के अनुसार कुछ लोग सुल्तान की नीति से असन्तुष्ट थे। ये लोग पत्रों में गालियाँ लिख कर और उन्हें तीरों में बाँध कर रात्रि के समय सुल्तान के महल में फेंका करते थे। चंूकि तीर फेंकने वालों का पता लगाना कठिन था इसलिए सम्पूर्ण दिल्ली निवासियों को उन्मूलित करने के लिए सुल्तान ने राजधानी के परिवर्तन करने की योजना बनाई। जियाउद्दीन बरनी के अनुसार सुल्तान ने मध्यम श्रेणी तथा उच्च-वर्ग के लोगों का विनाश करने के लिए राजधानी परिवर्तन की योजना तैयार की थी। कुछ विद्वानों की धारणा है कि मंगोल आक्रमणों से राजधानी को सुरक्षित रखने के लिए सुल्तान ने देवगिरि को राजधानी बनाने की योजना बनाई।

विभिन्न इतिहासकारों द्वारा बताये गए उपरोक्त कारणों में से याहया, इब्नबतूता तथा बरनी द्वारा बताये गए मत निराधार हैं। मंगोलों के आक्रमणों से राजधानी को सुरक्षित बनाने के लिए उसे दूर ले जाने का तर्क भी अमान्य है क्योंकि राजधानी दिल्ली में रहते हुए ही अल्लाउद्दीन खिलजी तथा बलबन अपनी सीमा की सुरक्षा तथा समुचित व्यवस्था करने में सफल सिद्ध हुए थे। अतः निश्चित रूप से केवल इतना ही कहा जा सकता है कि शासन की सुविधा तथा दक्षिण भारत में अपनी सत्ता सुदृढ़ करने के लिए सुल्तान ने राजधानी परिवर्तन की योजना बनाई थी।

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इतिहासकारों का अनुमान है कि साम्राज्य की सुव्यवस्था के लिए सुल्तान ने दो राजधानियाँ रखने का निश्चय किया। उत्तरी साम्राज्य की राजधानी दिल्ली और दक्षिण की देवगिरि होनी थी। देवगिरि के महत्त्व को बढ़ाने के लिए सुल्तान ने राज परिवार के सदस्यों, तुर्की अमीरों, विद्वानों, फकीरों एवं दरवेशों को वहाँ पर बसाने का निश्चय किया। इन लोगों के बसने पर ही देवगिरि मुस्लिम सभ्यता के प्रसार का केन्द्र बन सकती थी। दक्षिण में मुस्लिम जनसंख्या के बढ़ जाने पर ही दक्षिण भारत पर पूर्ण सत्ता स्थापित रह सकती थी। अतः सुल्तान ने सबसे पहले अपनी माता मखदूम-जहाँ को देवगिरि भेज दिया। उसके साथ दरबार के अमीरों, विद्वानों, घोड़ों, हाथियों, राजकीय भण्डारों आदि को भी भेजा। इन लोगों की सुविधा के लिए सुल्तान ने अनेक प्रकार के प्रबन्ध किए। दिल्ली से दौलताबाद जाने वाली सड़क की मरम्मत कराई गई और उसके किनारे आवश्यक वस्तुओं के विक्रय की व्यवस्था की गई। लोगों के लिए सवारियों का भी प्रबन्ध किया गया। यात्रियों को कई प्रकार की सुविधायें दी गईं। दौलताबाद में भव्य भवनों का निर्माण कराया गया और समस्त प्रकार की सुविधाओं को देने का प्रयत्न किया गया।

राजधानी परिवर्तन एक ऐसी योजना थी जिसके बारे में इससे पहले किसी भी सुल्तान ने कल्पना तक नहीं की थी। दिल्ली के तुर्की अमीर, राजपरिवार के सदस्य, सेठ-साहूकार एवं अन्य प्रभावी लोग भी इस बात को सोचकर सिहर उठते थे कि एक दिन उन्हें दिल्ली छोड़कर जाना पड़ेगा। इस कारण इस योजना के आरम्भ होने से पहले ही इसका विरोध होने लगा और इस योजना के दुष्परिणाम सामने आने लगे।

जब कुछ लोगों ने सुल्तान से कहा कि देवगिरि में उनका मन नहीं लगेगा तथा उन्हें दिल्ली की बहुत याद आएगी तो सुल्तान ने दिल्ली के भिखारियों एवं कुत्ते-बिल्लियों को भी पकड़कर देवगिरि भेज दिया। बहुत से बीमारों, विकलांगों एवं वृद्धों की मार्ग में ही मृत्यु हो गई।

जिन हजारों लोगों को जबर्दस्ती पकड़कर दिल्ली से देवगिरि के लिए रवाना किया गया, वे लोग कभी भी इस परिवर्तन से सन्तुष्ट नहीं हुए। उन्हें दिल्ली की स्मृतियाँ वेदना पहुँचाया करती थीं। उन्हें यह स्थानान्तरण दण्ड के समान प्रतीत हुआ। इसलिए वे सुल्तान की निंदा करने लगे।

जब सुल्तान को लोगों के असन्तोष की जानकारी हुई तब उसने असन्तुष्ट लोगों को फिर से दिल्ली लौटने की अनुमति दे दी। जियाउद्दीन बरनी के अनुसार दौलताबाद जाने वाले लोगों में से बहुत कम लोग वापस दिल्ली जीवित लौट सके। इस योजना को कार्यान्वित करने में सुल्तान को बड़ा धन व्यय करना पड़ा जिससे राजकोष को हानि हुई। प्रजा में असन्तोष फैलने से सुल्तान की लोकप्रियता को बहुत बड़ा धक्का लगा और उसे पुराना गौरव नहीं मिल सका।

यद्यपि दौलताबाद के सुदृढ़ दुर्ग तथा वहाँ के राजकोष के परिपूर्ण हो जाने से आरम्भ में दक्षिण के विद्रोहियों का दमन करने में बड़ी सुविधा हुई परन्तु अन्त में जब दक्षिण में विद्रोहों का विस्फोट हुआ तब दुर्ग तथा कोष का यही बल साम्राज्य के लिए बड़ा घातक सिद्ध हुआ क्योंकि इसका प्रयोग सुल्तान के विरुद्ध होने लगा।

मुहम्मद बिन तुगलक की इस योजना की विद्वानोें ने तीव्र आलोचना की है और सुल्तान को क्रूर, अदूरदर्शी तथा प्रजापीड़क बताया है। कुछ इतिहासकारों ने उसे पागल तक कहा है परन्तु वास्तव में राजधानी का परिवर्तन कोई पागलपन भरी योजना नहीं थी। इसके पहले भी हिन्दू राजाओं ने अपनी राजधानियों का परिवर्तन किया था।

आधुनिक काल में भी राजधानियों का परिवर्तन होता रहता है। सुल्तान की यह आलोचना तर्क तथा उपयोगिता पर आधारित थी। फिर भी अमीरों एवं जनता के असहयोग के कारण वह अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सका।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

तुगलक की सांकेतिक मुद्रा को जनता ने विफल कर दिया (129)

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तुगलक की सांकेतिक मुद्रा

चौदहवीं शताब्दी ईस्वी में मुहम्मद बिन तुगलक ने सोने-चांदी के सिक्कों के स्थान पर ताम्बे के सिक्के चलाए। इसे तुगलक की सांकेतिक मुद्रा कहा जाता है। लोगों ने अपने घरों में ताम्बे के सिक्के ढाल लिए तथा उनके बदले में राजकोष से सोने-चांदी के सिक्के ले लिए।

मुहम्मद बिन तुगलक ने दक्षिण भारत में स्थाई अधिकार बनाए रखने के लिए अपनी राजधानी को दिल्ली से देवगिरि स्थानांतरित कर दिया किंतु लोगों के असहयोग के कारण उसे अपनी राजधानी को फिर से दिल्ली में लाना पड़ा।

इस योजना से राज्यकोष का बहुत सा धन व्यय हो गया क्योंकि इस कार्य के लिए दिल्ली से देवगिरि तक सड़कों का निर्माण एवं मरम्मत कार्य करवाए गए तथा देवगिरि में बहुत से महलों, मकानों, गलियों एवं बाजारों आदि का निर्माण करवाया गया।

राजकोष के रीत जाने पर सुल्तान ने सोने-चांदी की मुद्राओं के स्थान पर ताँबे की संकेत मुद्राएँ चलाईं। तुगलक की सांकेतिक मुद्रा का विचार मन में आने से पहले मुहम्मद बिन तुगलक ने भिन्न-भिन्न प्रकार की मुद्राएँ ढलवाईं थीं जो कला की दृष्टि से बड़ी सुन्दर थीं। उसने दीनार नामक स्वर्ण मुद्रा चलाई तथा अदली नामक रजत-मुद्रा का पुनरुद्धार किया।

अब ऐसी मुद्राएं ढालने के लिए सुल्तान के पास पर्याप्त सोना-चांदी नहीं था। इसलिए उसने ताँबे की संकेत मुद्राएँ चलाईं। इतिहासकारों का मानना है कि उन दिनों न केवल भारतवर्ष में, अपितु सम्पूर्ण विश्व में चाँदी की कमी अनुभव की जा रही थी। चाँदी की मुद्रा के अभाव में लोगों को व्यापार तथा लेन-देन में बड़ी असुविधा हो रही थी। इस असुविधा को दूर करने के लिए ही मुहम्मद तुगलक ने ताँबे की मुद्रा चलाने की योजना बनाई थी। कहा जा सकता है कि तुगलक की सांकेतिक मुद्रा का चलन वैश्विक परिदृश्य के दबाव में हुआ।

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कुछ इतिहासकारों के अनुसार मुहम्मद तुगलक की सांकेतिक मुद्रा इसलिए चलाई गई क्योंकि उसे नई योजनाएँ बनाने का व्यसन था। वह सदैव नई-नई योजनाओं की कल्पना किया करता था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार मुहम्मद बिन तुगलक सांकेतिक मुद्रा चलाकर ख्याति प्राप्त करना चाहता था। वह अपने नवीन कृत्यों द्वारा अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देना चाहता था तथा इतिहास में अपना नाम अमर करना चाहता था।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार रिक्त कोष को भरने के लिए तुगलक की सांकेतिक मुद्रा की योजना बनाई गई। विद्रोहों को दबाने, अकाल-पीड़ितों की सहायता करने, नई योजनाओं को कार्यान्वित करने, नवीन भवनों का निर्माण करने तथा मुक्त-हस्त से पुरस्कार देने से राजकोष रिक्त हो गया था और सुल्तान बड़े आर्थिक संकट में पड़ गया था। इस आर्थिक संकट को दूर करने के लिए सुल्तान ने संकेत मुद्रा के चलाने की योजना बनाई।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार मुहम्मद बिन तुगलक अस्थिर विचारों का व्यक्ति था। जब उसने देखा कि चीन, फारस आदि देशों में संकेत मुद्रा का प्रचलन है, तब उसने भी अपने राज्य में संकेत मुद्रा चलाने की आज्ञा दी।

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कुछ इतिहासकारों के अनुसार मुहम्मद बिन तुगलक विश्व-विजय की कामना से प्रेरित था और इस ध्येय की पूर्ति के लिए उसे एक विशाल सेना की आवश्यकता थी जिसके व्यय के लिए धन आवश्यक था। अतः तुगलक की सांकेतिक मुद्रा की योजना गई। प्रारम्भ में लोगों को संकेत मुद्रा से बड़ी सुविधा हुई परन्तु बाद में लोगों को आशंका हुई कि सरकार ने चाँदी की मुद्राओं का अपहरण करने के लिए यह योजना चलाई है। सरकार जनता से चाँदी की मुद्राएँ लेकर अपने राजकोष में भर लेगी और इनके स्थान पर ताँबे की मुद्राएँ प्रयुक्त होंगी। इस आशंका का परिणाम यह हुआ कि लोगों ने चाँदी तथा सोने की मुद्राओं को छिपा दिया तथा केवल ताँबे की मुद्राओं को व्यवहार में लाने लगे। स्वर्णकारों ने अपने घरों में टकसालें बना लीं और ताँबे की नकली मुद्राएं ढालने लगे। जियाउद्दीन बरनी ने लिखा है कि प्रत्येक हिन्दू का घर टकसाल बन गया। इसका परिणाम यह हुआ कि ताम्बे की मुद्राओं में अत्यन्त दु्रतगति से वृद्धि होने लगी। लोगों की ऐसी मनोवृत्ति हो गई कि देने के समय वे ताँबे की मुद्रा देना चाहते थे और लेने के समय चाँदी अथवा सोेने की मुद्रा प्राप्त करने का प्रयत्न करने लगे। इस मनोवृत्ति का व्यापार पर बुरा प्रभाव पड़ा। व्यापारियों ने तांबे की मुद्रा के बदले सामान देना बन्द कर दिया।

ऐसी स्थिति में सरकार का हस्तक्षेप करना अनिवार्य हो गया। फलतः सुल्तान ने यह आदेश निकाल दिया कि संकेत मुद्रा का प्रयोग बन्द कर दिया जाय और जिसके पास ताँबे की मुद्राएँ अर्थात् तुगलक की सांकेतिक मुद्रा हो, उनके बदले में वे सोने-चाँदी की मुद्राएँ ले लें। इस घोषणा का परिणाम यह हुआ कि सरकारी खजाने में ताँबे की मुद्राओं के ढेर लग गए तथा राजकोष से रहा-सहा सोना-चांदी भी निकल गया।

जब सुल्तान को इस बात की जानकारी हुई तो उसने अपनी सेना को आदेश दिया कि वह लोगों के घरों की तलाशी ले तथा जहाँ कहीं भी सोने-चांदी की मुद्राएं मिलें, उन्हें छीनकर शाही खजाने में जमा करवा दे। इस आदेश की तत्काल पालना हुई।

तुगलक के हजारों सैनिक दिल्ली की गलियों में छा गए। उन्होंने घर-घर जाकर तलाशी ली। लोगों को मारा-पीटा और सड़कों पर घसीटा गया ताकि वे धरती में छिपाई गई सोने-चांदी की मुद्राओं के बारे में बता दें। बहुत से लोग मार डाले गए और किसी के पास कुछ नहीं बचा। जनता फिर से कंगाल हो गई।

मुस्लिम प्रजा की बजाय हिन्दू प्रजा को इन अत्याचारों का अधिक शिकार होना पड़ा क्योंकि मुस्लिम प्रजा के पास कहने के लिए था कि उन्हें यह धन सुल्तानों द्वारा ईनाम के रूप में दिया गया जबकि हिंदुओं को तो धन संग्रहण करना मना था!

इतिहासकारों ने मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा चलाई गई संकेत मुद्रा की तीव्र आलोचना की है और उस पर पागल होने का आरोप लगाया है परन्तु वास्तव में यह योजना मुहम्मद बिन तुगलक के पागलपन की नहीं, वरन् उसकी बुद्धिमता की परिचायक है। चीन तथा फारस में पहले से ही संकेत मुद्रा चल रही थी। आधुनिक काल में भी पूरे विश्व में संकेत मुद्रा का प्रचलन है।

चौदहवीं शताब्दी के भारत में संकेत मुद्रा का असफल हो जाना अवश्यम्भावी था क्योंकि साधारण जनता के लिए चांदी और ताँबे में बहुत अंतर था। वह संकेत मुद्रा विनिमय के महत्त्व को नहीं समझ सकी। यह योजना इसलिए भी असफल हो गई क्योंकि सरकार ने सुनारों को ताम्बे की मुद्रा ढालने से नहीं रोका।

सुल्तान को चाहिए था कि वह टकसाल पर राज्य का एकाधिकार रखता और ऐसी व्यवस्था करता जिससे लोग अपने घरों में तुगलक की सांकेतिक मुद्रा को नहीं ढाल पाते। अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सुल्तान की योजना गलत नहीं थी अपितु उसके कार्यान्वयन का ढंग गलत था तथा लोगों ने नकली मुद्राएं ढाल कर इस योजना को विफल कर दिया।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

कराजल पर हमला कर दिया मुहम्मद बिन तुगलक ने (130)

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कराजल पर हमला

सुंदर कराजली औरतें पाने के लिए मुहम्मद बिन तुगलक ने कराजल पर हमला कर दिया किंतु मुहम्मद और उसके सैनिक उन सुंदर औरतों को छू भी नहीं पाए।

मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल में भारत में घट रही घटनाओं के समाचार मध्यएशिया तक भी पहुंच रहे थे। दो-आब में कर बढ़ा देने तथा राजधानी के परिवर्तन से भारत की जनता में जो असंतोष उत्पन्न हो रहा था, उससे प्रोत्साहित होकर ई.1328 में मंगोलों ने तरमाशिरीन के नेतृत्व मेंं भारत पर आक्रमण कर दिया।

मंगोल सिंध नदी को पार करके दिल्ली के निकट आ गए। मुहम्मद बिन तुगलक ने मंगोलों से युद्ध करने के स्थान पर उन्हें बहुत-सा धन देकर उनसे अपना पीछा छुड़ाया।

मुहम्मद बिन तुगलक की मंगोलों को धन देने की नीति की तीव्र आलोचना की गई है। इससे मंगोलों को सुल्तान की दुर्बलता का पता लग गया और उनका भारत पर आक्रमण करने का प्रलोभन बढ़ गया परन्तु वास्तविकता यह है कि सुल्तान उन दिनों ऐसी परिस्थिति में नहीं था कि मंगोलों का सामना कर सके। सुल्तान के पास सल्तनत को नष्ट-भ्रष्ट होने तथा पराजय से बचाने का कोई दूसरा उपाय नहीं था।

मंगोलों से दोस्ती हो जाने के कुछ बरसों बाद मुहम्मद बिन तुगलक ने खुरासान पर विजय प्राप्त करने की योजना बनाई थी। इस योजना का सबसे बड़ा कारण मुहम्मद बिन तुगलक की महत्त्वाकांक्षा थी। इस समय सम्पूर्ण भारत दिल्ली सल्तनत के अधीन था और और अब मुहम्मद बिन तुगलक विदेश विजय का गौरव प्राप्त करना चाहता था।

सुल्तान के दरबार में उन दिनों कुछ खुरासानी अमीर रहते थे जिन्होंने सुल्तान को खुरासान की शोचनीय दशा के बारे में जानकारी देकर खुरासान पर आक्रमण करने के लिए प्रोत्साहित किया। इन दिनों खुरासान में अबू सईद नामक बादशाह का शासन था। वह अल्पवयस्क तथा दुराचारी था।

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अबू सईद के अमीर उससे असन्तुष्ट होकर षड्यन्त्र रच रहे थे तथा उसका संरक्षक अमीर चौगन राज्य को छीनने का प्रयास कर रहा था। अबू सईद ने चौगन की हत्या करवा दी। इससे खुरासान में बड़ी गड़बड़ी फैल गई और चौगन के पुत्र अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने का अवसर ढूँढने लगे। खुरासान के विभिन्न प्रान्तों में भी गड़बड़ी फैली हुई थी। इन परिस्थितियों में सुल्तान के लिए खुरासान विजय की योजना बनाना अस्वाभाविक नहीं था।

मुहमद बिन तुगलक ने अपनी इस योजना को कार्यान्वित करने के लिए एक विशाल सेेना तैयार की। इन सैनिकों को एक वर्ष का वेतन पहले से ही दे दिया परन्तु परिस्थितियाँ बदल जाने से सुल्तान को खुरासान योजना त्याग देनी पड़ी।

योजना को त्यागने का पहला कारण यह था कि मिस्र के राजा ने खुरासान के सुल्तान अबू सईद से मैत्री कर ली और मुहमद बिन तुगलक की सहायता करने से इन्कार कर दिया।

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खुरासान आक्रमण की योजना को त्यागने का दूसरा कारण यह था कि इन्हीं दिनों चगताई अमीरों ने विद्रोह करके तरमाशिरीन को तख्त से उतार दिया जिससे अबू सईद को अपने राज्य की पूर्वी सीमा की ओर से आक्रमण की आंशका नहीं रह गई। तीसरा कारण यह था कि ऐसे दूरस्थ प्रदेश में हिन्दूकुश पर्वत के उस पार सेना तथा रसद भेजना और अपने सहधर्मियों से युद्ध करके विजय प्राप्त करना सरल कार्य नहीं था। इतिहासकारों द्वारा मुहमद बिन तुगलक की इस योजना की तीव्र आलोचना की गई है। आलोचकों का कहना है कि मार्ग की कठिनाइयों को ध्यान में नहीं रखते हुए ऐसे सुदूरस्थ देश की विजय की योजना बनाना पागलपन था परन्तु मुहमद बिन तुगलक के समर्थकों का कहना है कि यदि खुरासान से भारत पर आक्रमण करना सम्भव है, तब भारत से खुरासान पर आक्रमण करना क्यों सम्भव नहीं है। आलोचकों के अनुसार दो-आब के अकाल, राजधानी के परिवर्तन तथा संकेत मुद्रा की योजना विफल हो जाने से राज्य भयानक आर्थिक संकट में था, तब इस प्रकार की योजना बनाना मूर्खता ही थी परन्तु ऐसी कामनाएँ, अल्लाउद्दीन खिलजी भी कर चुका था। वास्तव में सुल्तान की योजना तर्कहीन नहीं थी। सम्भवतः परिस्थितियों के कारण ही मुहम्मद ने इस योजना को त्याग दिया था।

ई.1337 में मुहम्मद बिन तुगलक ने नगरकोट पर विजय प्राप्त करने का प्रयास किया, जो हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा जिले में स्थित है। नगरकोट का दुर्ग एक पहाड़ी पर स्थित था और अभेद्य समझा जाता था। मुहम्मद बिन तुगलक ने एक लाख सैनिकों के साथ नगरकोट के किले पर आक्रमण कर दिया और उस पर विजय प्राप्त कर ली परन्तु सुल्तान ने फिर से वह किला वहाँ के राय को लौटा दिया और दिल्ली चला आया।

फरिश्ता का कहना है कि सुल्तान ने चीन तथा हिमाचल पर विजय प्राप्त करने की योजना बनाई। हिमाचल विजय की योजना चीन अभियान को सरल बनाने के लिए की गई थी। जियाउद्दीन बरनी का कहना है कि सुल्तान ने कराजल के पर्वतीय प्रदेश पर विजय प्राप्त करने की योजना बनाई जो चीन तथा हिन्द के मार्ग में स्थित है।

बरनी का कहना कि मुहमद बिन तुगलक ने कराजल पर हमला करने की योजना को इस उद्देश्य से बनाया था जिससे वह खुरासान पर सरलता से विजय प्राप्त कर सके परन्तु चंूकि कराजल खुरासान के मार्ग में नहीं पड़ता, अतः बरनी का मत अमान्य है।

हजीउद्दबीर का कहना है चूंकि कराजल की स्त्रियाँ अपने रूप तथा अन्य गुणों के लिए प्रसिद्ध थीं, इसलिए मुहमद बिन तुगलक उनसे विवाह करके उन्हें अपने रनिवास में लाना चाहता था। इसी ध्येय से उसने कराजल पर हमला करने की योजना बनाई थी। हजीउद्दबीर का मत भी अमान्य है क्योंकि तत्कालीन इतिहासकारों के अनुसार मुहमद बिन तुगलक का आचरण बड़ा पवित्र था।

अधिकांश इतिहासकारों की धारणा है कि मुहमद बिन तुगलक ने हिमाचल प्रदेश के कुछ विद्रोही सरदारों को दिल्ली सल्तनत के अधीन करने के लिए कराजल पर हमला करने की योजना बनाई थी। फरिश्ता का कहना है कि सुल्तान ने चीन से धन लूटने के लिए यह योजना बनाई थी। अनुमान है कि मुहमद ने तराई प्रदेश के किसी सरदार को दबाने के लिए हिमाचल पर आक्रमण किया था।

कराजल पर हमला करने के आरम्भ में मुहमद बिन तुगलक की सेना को अच्छी सफलता मिली परन्तु जब वर्षा ऋतु आरम्भ हुई तब मुहम्मद की सेना का पतन आरम्भ हो गया। वर्षा के कारण रसद का पहुँचना कठिन हो गया। इस भयानक परिस्थिति में शत्रु ने मुहमद बिन तुगलक की सेना पर आक्रमण कर दिया और उसे नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।

कहा जाता है कि केवल दस सैनिक इस दुःखद घटना को सुनाने के लिए दिल्ली लौट सके। इतनी बड़ी क्षति होने पर भी मुहमद बिन तुगलक को अपने ध्येय में सफलता प्राप्त हो गई। चूंकि उस पहाड़ी सरदार के लिए पहाड़ के निचले प्रदेश में सुल्तान से विरोध करके बने रहना संभव नहीं था इसलिए उसने मुहमद बिन तुगलक की अधीनता स्वीकार कर ली।

कुछ इतिहासकारों ने मुहमद बिन तुगलक की कराजल पर हमला करने की योजना की बड़ी आलोचना की है और उसे पागल कहा है परन्तु इसमें पागलपन की कोई बात नहीं थी। पर्वतीय प्रदेश में जन-धन की क्षति होना स्वाभाविक था। अंग्रेजों को भी अफगानिस्तान एवं नेपाल में बड़ी क्षति उठानी पड़ी थी।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

बागी अमीरों का दमन करने के लिए उनकी खाल में भूसा भरा गया (131)

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बागी अमीरों का दमन

अफगानिस्तान में मंत्रियों को अमीर कहा जाता था। मुहम्मद बिन तुगलक के अमीरों ने बड़ी संख्या में विद्रोह किए। बागी अमीरों का दमन करने के लिए मुहम्मद बिन तुगलक ने उनकी खाल में भूसा भरवा कर देश भर में घुमाया।

पिछली कड़ी में हमने चर्चा की थी कि मुहम्मद बिन तुगलक ने करांचल, हिमाचल, नगरकोट एवं चीन पर आक्रमण करके अपनी सेनाओं को बहुत बड़ी क्षति पहुंचाई तथा ये योजनाएं असफल हो गईं जिससे सल्तनत की वास्तविक शक्ति को बहुत बड़ा आघात पहुंचा। इस कारण सल्तनत में चारों ओर विनाश के लक्षण दिखाई देने लगे।

इतिहासकारों के अनुसार मुहम्मद तुगलक के शासन काल के अन्तिम 16 वर्ष विपत्ति भरे थे। इस अवधि में सल्तनत के विभिन्न भागों में विद्रोह उठ खड़े हुए। ये विद्रोह अत्यन्त व्यापक क्षेत्र में विस्तृत थे। यदि एक विद्रोह उत्तर में होता तो दूसरा दक्षिण में और यदि एक विद्रोह पश्चिम में होता तो दूसरा सुदूर पूर्व में।

इससे सेना के संचालन में बड़ी कठिनाई होती थी। मुहम्मद बिन तुगलक के समय में चौंतीस विद्रोह हुए जिनमें से 27 दक्षिण भारत में हुए। इन विद्रोहों के कारण सल्तनत बिखरने लगी और कई स्वतन्त्र राज्यों की स्थापना हो गयी। बागी अमीरों का दमन करना आवश्यक हो गया।

सबसे पहला विद्रोह ई.1327 में मुहम्मद बिन तुगलक के चचेरे भाई वहाबुद्दीन गुर्शस्प ने किया जो गुलबर्गा के निकट सागर का सूबेदार था। शाही सेना ने इस विद्रोह को दबा दिया। मुहम्मद बिन तुगलक ने गुर्शस्प की खाल में भूसा भरवाकर उसे भारत के कई शहरों में प्रदर्शित करवाया और उसके शरीर का मांस चावल के साथ पकाकर उसके परिवार के पास खाने के लिए भेजा।

दूसरा विद्रोह ई.1328 में मुल्तान के सूबेदार बहराम आईबा उर्फ किश्लू खाँ ने किया। स्वयं मुहम्मद बिन तुगलक ने इस विद्रोह का दमन किया। बहराम आईबा का वध कर दिया गया। लाहौर का सूबेदार अमीर हुलाजू एक शक्तिशाली अमीर था। उसने भी मुहमद बिन तुगलक के विरुद्ध विद्रोह किया तथा शाही सेना द्वारा मारा गया।

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मुहम्मद बिन तुगलक के विरुद्ध तीसरा विद्रोह ई.1335 में मदुरा के गवर्नर जलालुद्दीन एहसान शाह ने किया। इस समय दो-आब में अकाल था और प्रजा में असन्तोष फैला हुआ था। इससे लाभ उठाकर जलालुद्दीन ने विद्रोह कर दिया। सुल्तान ने अपने प्रधानमन्त्री ख्वाजाजहाँ को इस विद्रोह का दमन करने के लिए भेजा परन्तु वह धार से वापस लौट आया।

अब मुहमद बिन तुगलक ने स्वयं दक्षिण के लिए प्रस्थान किया। जब सुल्तान तेलंगाना पहुँचा, तब वहाँ बड़े जोरों का हैजा फैल गया और मुहमद बिन तुगलक के बहुत से सैनिक मर गए। फलतः सुल्तान ने बागी अमीरों का दमन बीच में ही छोड़कर दिल्ली लौटने का निश्चय किया और एहसान शाह स्वतन्त्र हो गया।

एहसान शाह के विद्रोह का प्रभाव सल्तनत के अन्य भागों पर भी पड़ा। उत्तर तथा दक्षिण भारत में यह अफवाह फैल गई कि सुल्तान की मृत्यु हो गई है। फलतः ई.1335 में दौलताबाद के सूबेदार मलिक हुशंग ने विद्रोह कर दिया। सुल्तान की उस पर विशेष कृपा रहती थी परन्तु वह बड़ा महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति था। अतः अवसर पाकर उसने विद्रोह कर दिया। अन्त में उसे भाग कर हिन्दू सरदारों के यहाँ शरण लेनी पड़ी। हालांकि मुहम्मद तुगलक बागी अमीरों का दमन करता था, उन्हें क्षमा नहीं करता था किंतु उसने मलिक हुशंग को क्षमा कर दिया।

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मुहमद बिन तुगलक की मृत्यु की सूचना पाकर उत्तर में एहसान शाह के पुत्र सैयद इब्राहिम ने भी विद्रोह कर दिया। इब्राहिम, सुल्तान का बड़ा विश्वासपात्र था। अन्त में उसने आत्म-समर्पण कर दिया। फिर भी उसकी हत्या करवा दी गई। इन दिनों पूर्वी बंगाल में बहराम खाँ शासन कर रहा था। उसके अंगरक्षक फखरूद्दीन ने ई.1337 में उसकी हत्या कर दी और स्वयं पूर्वी बंगाल का शासक बन गया। दिल्ली सल्तनत की दुर्दशा देखकर उसने स्वयं को बंगाल का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और अपने नाम की मुद्राएँ चलाने लगा। इस प्रकार मुहमद बिन तुगलक की असमर्थता के कारण बंगाल भी स्वतंत्र हो गया। बंगाल के विद्रोह की सफलता देखकर कड़ा के सूबेदार निजाम भाई ने भी विद्रोह कर दिया। ई.1338 में उसकी जीवित खाल खिंचवा ली गई। अलीशाह दिल्ली सल्तनत का एक उच्च अधिकारी था। उसे मुहमद बिन तुगलक ने दक्षिण में मालगुजारी वसूल करने के लिए गुलबर्गा भेजा परन्तु उसने गुलबर्गा के हाकिम की हत्या करके शाही खजाने पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उसने बीदर पर भी अधिकार कर लिया। कुतलुग खाँ ने उसे परास्त करके बन्दी बना लिया। कुछ दिनों बाद उसका वध कर दिया गया।

आइन-उल-मुल्क अवध तथा जफराबाद का गवर्नर था। उसने दिल्ली सल्तनत की बड़ी सेवाएँ की थी। एक बार मुहमद बिन तुगलक दक्षिण के गवर्नर कुतलुग खाँ ख्वाजा के काम से असन्तुष्ट हो गया। इसलिए उसने कुतलुग खाँ ख्वाजा को वापस बुला लिया। सुल्तान ने आइन-उल-मुल्क को दक्षिण का गवर्नर नियुक्त करके उसे अपने परिवार के साथ दक्षिण जाने की आज्ञा दी।

यद्यपि आइन-उल-मुल्क के लिए यह बड़े गौरव की बात थी परन्तु उसे लगा कि सुल्तान ने उसे अवध से हटाने के लिए ऐसा किया है। इसलिए उसने विद्रोह कर दिया। उसका विद्रोह सबसे भयानक था। फिर भी शाही सेना ने उसे परास्त करके बंदी बना लिया। जब वह सुल्तान के सामने लाया गया तो सुल्तान ने उसकी सेवाओं तथा उसकी विद्वता को देखते हुए उसे क्षमा कर दिया।

मुहमद बिन तुगलक को विपत्ति में देखकर शाहू अफगान लोदी ने मुल्तान के सूबेदार को कैद करके स्वयं को मुल्तान का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया। विद्रोह की सूचना पाते ही मुहमद बिन तुगलक ने दिल्ली से मुल्तान के लिए प्रस्थान किया।

इसकी सूचना पाते ही शाहू अफगान मुल्तान छोड़कर पहाड़ों में भाग गया और सुल्तान के पास एक प्रार्थना पत्र भेजकर क्षमादान की याचना की। बागी अमीरों का दमन करने का निश्चय त्यागकर मुहमद बिन तुगलक दिपालपुर से ही दिल्ली लौट आया।

सुल्तान के एक लाख सैनिक करांचल के अभियान में मारे जा चुके थे। उसके हजारों सैनिकों को हिन्दुओं ने अन्य अभियानों में मार डाला था, इसलिए अब उसमें इतनी शक्ति नहीं बची थी कि वह पहाड़ों में जाकर शाहू अफगान का पीछा करे।

अब वे दिन लद चुके थे जब सुल्तान अमीरों की खाल में भूसा भरवाकर उन्हें पूरे भारत में घुमा सके। यदि सुल्तान शाहू अफगान के पीछे जाता तो दिल्ली सल्तनत मुट्ठी में बंद रेत की तरह उसके हाथों से फिसल जाती। यह भी संभव था कि पहाड़ों में स्वयं मुहम्मद का भी वही हाल होता जो करांचल के अभियान में उसकी सेना का हो चुका था।

इसलिए सुल्तान ने दिपालपुर से ही लौटने में भलाई समझी किंतु सुल्तान का यह निर्णय खतरे की किसी घण्टी से कम नहीं था। दिल्ली सल्तनत की कमजोरी पूरे देश के समक्ष आ गई जिसके दूरगामी परिणाम हुए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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