उड़ीसा का स्थापत्य प्राचीनकाल में विकसित कलिंग वास्तुकला शैली में निर्मित है। उड़ीसा के मंदिर कलिंग मंदिर शैली के सबसे अच्छे उदाहरण हैं।
कोणार्क का सूर्य मंदिर
कोणार्क का सूर्य मंदिर 13वीं शताब्दी ईस्वी में गंगा राजवंश के राजा नरसिंघेव (प्रथम) ने बनवाया था। यह कलिंग शैली में बना है तथा भगवान बिरंचि-नारायण (सूर्य) को समर्पित है। कोणार्क शब्द, कोण और अर्क शब्दों के मेल से बना है। अर्क का अर्थ होता है सूर्य, जबकि कोण से अभिप्राय कोने या किनारे से रहा होगा।
प्रस्तुत कोणार्क सूर्य-मन्दिर का निर्माण लाल रंग के बलुआ पत्थरों तथा काले ग्रेनाइट के पत्थरों से हुआ है। इसे ई.1236-54 में गंग वंश के राजा नृसिंहदेव द्वारा बनवाया गया। यह मन्दिर, भारत के सबसे प्रसिद्ध स्थलों में से एक है। कलिंग शैली में निर्मित इस मन्दिर में सूर्य देव को रथ में विराजमान किया गया है तथा पत्थरों को उत्कृष्ट नक्काशी के साथ उकेरा गया है।
मन्दिर को बारह जोड़ी चक्रों के साथ सात घोड़ों से खींचते हुए निर्मित किया गया है, जिसमें सूर्य देव को विराजमान दिखाया गया है। वर्तमान में केवल एक घोड़ा बचा है। मन्दिर के आधार को सुन्दरता प्रदान करते ये बारह चक्र साल के बारह महीनों को व्यक्त करते हैं तथा प्रत्येक चक्र आठ अरों से मिल कर बना है, जो दिन के आठ पहरों को दर्शाते हैं। मुख्य मन्दिर तीन मंडपों में बना है।
इनमें से दो मण्डप ढह चुके हैं। तीसरे मण्डप में जहाँ मूर्ति थी, अंग्रेज़ों ने सभी द्वारों को रेत एवं पत्थर भरवा कर बंद करवा दिया था ताकि मन्दिर और क्षतिग्रस्त नहीं हो। मन्दिर में सूर्य भगवान की तीन प्रतिमाएं हैं- (1.) बाल्यावस्था-उदित सूर्य – 8 फुट, (2.) युवावस्था-मध्याह्न सूर्य – 9.5 फुट, (3.) प्रौढ़ावस्था-अपराह्न सूर्य- 3.5 फुट।
प्रवेश-द्वार पर दो सिंह हाथियों पर आक्रमण के लिए तत्पर दिखाये गए हैं। दोनों हाथी, एक-एक मानव के ऊपर स्थापित हैं। ये प्रतिमाएं एक ही पत्थर की बनीं हैं। ये 28 टन की 8.4 फुट लम्बी, 4.9 फुट चौड़ी तथा 9.2 फुट ऊंची हैं। मंदिर के दक्षिणी भाग में दो सुसज्जित घोड़े बने हैं, जिन्हें उड़ीसा सरकार ने अपने राजचिह्न के रूप में अंगीकार किया है।
ये 10 फुट लम्बे एवं 7 फुट चौड़े हैं। मंदिर सूर्य देव की भव्य यात्रा को दिखाता है। इसके प्रवेश द्वार पर नट मंदिर है। यहाँ मंदिर की नर्तकियां, सूर्यदेव को प्रसन्न करने के लिये नृत्य करतीं थीं। मंदिर में फूल, बेल और ज्यामितीय आकृतियों की नक्काशी की गई है। इनके साथ ही मानव, देव, गंधर्व, किन्नर आदि की प्रतिमाएं भी एन्द्रिक मुद्राओं में प्रदर्शित की गई हैं। इनकी मुद्राएं कामुक हैं और कामसूत्र से लीं गई हैं।
मंदिर लगभग खंडहर हो चुका है। यहाँ की शिल्प कलाकृतियों का एक संग्रह, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के सूर्य मंदिर संग्रहालय में सुरक्षित है। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इस मन्दिर के बारे में लिखा है-‘कोणार्क जहाँ पत्थरों की भाषा मनुष्य की भाषा से श्रेष्ठतर है।’
यह सूर्य मन्दिर भारतीय मन्दिरों की कलिंग शैली का है, जिसमें कोणीय अट्टालिका (मीनार रूपी संरचना) के ऊपर मण्डप की तरह छतरी होती है। आकृति में, यह मंदिर उड़ीसा के अन्य शिखर मंदिरों से भिन्न नहीं लगता है। 229 फुट ऊंचा मुख्य गर्भगृह 128 फुट ऊंची नाट्यशाला के साथ बना है।
इसमें बाहर को निकली हुई अनेक प्रतिमाएं हैं। मुख्य गर्भ में प्रधान देवता का वास था, किंतु वह अब ध्वस्त हो चुका है। नाट्यशाला अभी पूरी बची है। नट मंदिर एवं भोग मण्डप के कुछ ही भाग ध्वस्त हुए हैं। मंदिर का मुख्य प्रांगण 857 फुट गुणा 540 फुट आकार का है। मंदिर पूर्व-पश्चिम दिशा में बना है।
जगन्नाथ मंदिर: पुरी के जगन्नाथ मंदिर की वास्तुकला प्राचीन काल की है। मंदिर के गर्भगृह में मुख्य देव की प्रतिमा स्थापित है तथा गर्भगृह के ऊपर ऊंचा शिखर बना हुआ है। उसके चारों ओर सहायक शिखर हैं। मंदिर परिसर एक दीवार से घिरा हुआ है, जिसमें से प्रत्येक तरफ एक द्वार है, जिसके ऊपर एक पिरामिड-आकार की छत है। राज्य में सबसे बड़ा मंदिर होने के कारण, इसमें रसोईघर सहित दर्जनों सहायक भवन स्थित हैं। मंदिर के शीर्ष पर अष्टधातुओं के मिश्रण से बना एक पहिया है।
कलिंग मंदिर शैली का मुक्तेश्वर मंदिर
यह छोटा मंदिर 10.5 मीटर ऊंचा है। इसके बाहरी हिस्सों पर मूर्तियों का अंकन किया गया है जिनमें देवी-देवताओं के साथ पौराणिक दृश्य भी दर्शाए गए हैं। मंदिर का तोरण द्वारा नक्काशीदार युक्त है। सभा भवन की छत में प्रत्येक पंखुड़ी पर मूर्ति के साथ एक अष्ट-दल कमल की सुंदर चंदवा बनाई गई है।
कलिंग मंदिर शैली का लिंगराज मंदिर
भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर 12वीं सदी में बना। यह मंदिर उड़ीसा की स्थापत्य कला का चरम माना जाता है। इसकी ऊँचाई 150 फुट है। इसकी वास्तुकला कलिंग शैली की सर्वोच्च उपलब्धियों में से एक है।
राजारानी मंदिर
भुवनेश्वर के राजारानी मंदिर का निर्माण ई.1000 के आसपास हुआ। इस मंदिर ने मध्य भारत के अन्य मंदिरों के वास्तुकला के विकास के लिए विशेष रूप से खजुराहो के मंदिरों का मार्गदर्शन किया। अप्सराओं और मिथुन मूर्तियों की कामुक नक्काशी के कारण प्रेम मंदिर के रूप में भी जाना जाता है।
हिन्दू दुर्ग स्थापत्यअत्यंत प्राचीन काल से अस्तित्व में है। ऋग्वेद में इंद्र को पुरंदर कहा गया है जिसका अर्थ दुर्ग का राजा होता है। अर्थात् ऋग्वैदिक काल में भी भारतीयों को दुर्ग बनाने एवं उसमें रहने के महत्व का ज्ञान था।
‘दुः’ का तात्पर्य दुष्कर (कठिन) से है तथा ‘ग’ का तात्पर्य गमन करने से है। अर्थात् दुर्ग का तात्पर्य उस रचना से है जिस तक गमन करना कठिन होता है। दुर्ग से ही दुर्गम बना है। अतः कहा जा सकता है कि ‘दुर्ग’ स्थापत्य की वह रचना है जो शत्रु से सुरक्षा तथा युद्ध के लिये विशेष रूप से तैयार की गई हो।
सामान्य शब्दों में कहें तो जिस भवन अथवा भवन-समूह के चारों ओर ‘प्राकार’ (प्राचीर अथवा परकोटा) हो, जिसमें सैनिक सन्नद्ध हों, जिसकी प्राचीर पर युद्ध उपकरण लगे हों, जिसमें शत्रु आसानी से प्रवेश न कर सके, जिसका मार्ग दुर्गम हो, शत्रु जिसमें प्रवेश करके भी राजा तक न पहुँच पाये, आदि गुणों से युक्त भवन को दुर्ग कहा जा सकता है।
हिन्दू दुर्ग स्थापत्य
हिन्दू दुर्ग स्थापत्य हिन्दू दुर्ग स्थापत्य के अनुसार यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक दुर्ग में ये सभी गुण हों। सामान्यतः वह भवन जिसके चारों ओर सुदृढ़ एवं ऊँचा परकोटा हो, दुर्ग कहा जा सकता है। मानव जाति ने दुर्ग अथवा दुर्ग की तरह का परिघा (प्राकार अथवा परकोटा) तथा परिखा (खाई) से युक्त आवासीय बस्तियों की रचना करने की कला मध्य-पाषाण काल में ही सीख ली थी ताकि वह वन्य पशुओं तथा अचानक आक्रमण करने वाले शत्रुओं से अपनी और अपने समूह की रक्षा कर सके।
जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया, प्राकार निर्माण मानव सभ्यता की आवश्यकता बन गया। जब ‘राज्य’ नामक व्यवस्था आरम्भ हुई तो राजा के लिये दुर्ग का निर्माण करना आवश्यक हो गया। ऋग्वेद में दुर्ग अथवा पुर के कई उदाहरण मिलते हैं। उस काल में दुर्ग चौड़े (पृथ्वी), विस्तृत (उर्वी) और और आयस (लौहवर्ण) होते थे और उनके अंदर विस्तृत क्षेत्र होता था-
रामायण काल के आते-आते हिन्दू दुर्ग स्थापत्य के सिद्धांतों में काफी उन्नति हो गई। रामायण में चार प्रकार के किलों का वर्णन आता है। शुक्रनीति में राज्य के सात अंग- राजा, मंत्री, सुहृत, कोष, राष्ट्र, दुर्ग तथा सेना बताए गए हैं। अर्थात् इन सात चीजों के होने पर ही राज्य स्थापित हो सकता था। शुक्रनीति में दुर्ग को राज्य का हाथ और पैर कहा गया है-
मनुस्मृति में कहा गया है कि दुर्ग में स्थित एक धनुर्धारी, दुर्ग से बाहर खड़े सौ योद्धाओं का सामना कर सकता है तथा दुर्ग में स्थित सौ धनुर्धारी, दस हजार सैनिकों से युद्ध कर सकते हैं-
एकः शतं योधयति प्राकारस्थो धनुर्धरः।
शतं दशसहस्राणि तस्माद्दुर्ग विधीयते।।
आगे चलकर जब जनपदों, महाजनपदों एवं चक्रवर्ती साम्राज्यों की स्थापना हुई तो एक-एक सम्राट के अधीन कई-कई दुर्ग होने लगे तथा हिन्दू दुर्ग स्थापत्य में भी परिवर्तन आने लगे। सम्राट अपने साम्राज्य की सुरक्षा के लिये दुर्गों की विशाल शृंखला खड़ी करने लगे। ये दुर्ग-शृंखलाएं बड़े-बड़े साम्राज्यों का आधार बन गईं। यही कारण है कि राजा, महाराजा, सामंत, ठिकानेदार तथा सेनापतियों ने अपनी तथा अपने राज्य अथवा क्षेत्र की सुरक्षा के लिये विभिन्न प्रकार के दुर्गों का निर्माण करवाया।
समय के साथ, दुर्ग के स्थापत्य एवं शिल्प में विकास होता गया और दुर्गों की रचना जटिल होती चली गई। दुर्ग का प्राकार दोहरा और कहीं-कहीं तो तिहारा भी हो गया। भरतपुर के दुर्ग में दुर्ग-प्राचीर के बाहर मिट्टी की प्राचीर बनवाई गई थी ताकि तोप के गोले मिट्टी की दीवार में धंस जायें और दुर्ग का वास्तविक प्राकार सुरक्षित रह सके। दुर्ग के चारों ओर खाई खोदकर उसमें पानी भरने की व्यवस्था की गई ताकि शत्रु आसानी से दुर्ग की प्राचीर तक नहीं पहुँच सके।
भारत के अनेक प्राचीन ग्रंथों में हिन्दू दुर्ग स्थापत्य सम्बन्धी विवेचन किया गया है जिनमें शुक्रनीति, नरपति जयचर्चा, मनुस्मृति, विष्णुधर्म सूत्र, नीति वाक्यामृत, याज्ञवलक्य स्मृति आदि प्रमुख हैं। वायु पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, मत्स्य पुराण, श्रीमद्भागवत् पुराण आदि में भी विभिन्न दुर्गों के सम्बन्ध में संदर्भ आए हैं।
मत्स्य पुराण में दुर्ग निर्माण की विधि तथा राज्य द्वारा दुर्ग के संगृहीत उपकरणों के सम्बन्ध में विस्तृत विवरण दिया गया है। महाभारत में छः प्रकार के दुर्ग बताये गए हैं। मनु स्मृति में भी छः प्रकार के दुर्ग बताये गए हैं। मनु ने गिरि दुर्ग को अधिक गुणों वाला बताया है, इसमें नाना प्रयत्नों से शत्रु का संहार किया जा सकता है-
सर्वेण तु प्रयत्नेन गिरिदुर्गं समाश्रयेत्।
एषां हि बहुगुण्येन गिरिदुर्ग विशिष्यते।
मौर्य कालीन सुप्रसिद्ध लेखक कौटिल्य ने दुर्गों की चार प्रमुख कोटियां निर्धारित की हैं- औदुक, पार्वत, धान्वन तथा वन दुर्ग। शुक्रनीति में नौ तरह के दुर्ग- एरण दुर्ग, पारिख दुर्ग, पारिघ दुर्ग, वन दुर्ग, धन्व दुर्ग, जल दुर्ग, गिरि दुर्ग, सैन्य दुर्ग तथा सहाय दुर्ग बताये गए हैं। नरपति जयाचार्य ने आठ प्रकार के दुर्ग बताये हैं। विष्णुधर्मसूत्र में दुर्गों के छः प्रकार इस प्रकार बताये हैं-
(1.) धन्व दुर्ग: जलविहीन, खुली भूमि पर पांच योजन के घेरे में।
(2.) महीदुर्ग: प्रस्तर खण्डों या ईंटों से निर्मित प्राकारों वाला।
(3.) वार्क्ष दुर्ग: जो चारों ओर से एक योजन तक कंटीले एवं लम्बे वृक्षों, कंटीले लता गुल्मों एवं झाड़ियों से युक्त हो।
(4.) जल दुर्ग: चारों ओर जल से आवृत्त।
(5.) नृदुर्ग: जो चारों ओर से चतुरंगिणी सेना से सुरक्षित हो।
(6.) गिरि दुर्ग: पहाड़ों वाला दुर्ग जिस पर कठिनाई से चढ़ा जा सके और जिसमें केवल एक ही संकीर्ण मार्ग हो।
किला और गढ़ सामान्यतः एक-दूसरे के पर्याय माने जाते हैं, किंतु वस्तुतः इनमें थोड़ा अंतर है। किला पहाड़ी पर बनाया जाता है, जबकि गढ़ का निर्माण भूमि पर होता है। दोनों के चारों ओर सुदृढ़ प्राचीर बनाई जाती थी किंतु गढ़ चूंकि भूमि पर निर्मित होता है, अतः उसके चारों ओर खाई भी खोदी जाती थी।
धीरे-धीरे गढ़ और किले का अंतर लुप्त हो गया और वर्तमान में गढ़, किला, अरसाल, कोट, बरण, आसेद तथा दुर्ग समान अर्थ वाले प्रतीत होते हैं। दुर्ग मूलतः राज्य की सुदृढ़ता एवं सामरिक-शक्ति का प्रतीक माना जाता था। दुर्ग के निर्माण का बुनियादी सिद्धांत प्रायः एक समान रहा है- चारों ओर ऊँचे परकोटे, मजबूत दरवाजे, बुर्ज, कंगूरे, घुमावदार मार्ग इत्यादि।
संस्कृत साहित्य में गढ़ की रचना के संदर्भ में ‘कपिशीश’ नामक एक संरचना का उल्लेख मिलता है। बाद में इन्हें जीवरखा एवं अंगरखा भी कहा जाना लगा। जीवरखा, टेढ़-मेढ़े ढलान युक्त मार्गों पर बनाया गया एक छोटा गढ़ होता था जिसमें सैनिक रखे जाते थे। दुर्ग के ऊपर चार-पांच अश्वों के एक साथ चल सकने योग्य चौड़ी प्राचीर बनाई जाती थी इन्हीं पर घुमटियों के रूप में जीवरखे अथवा अंगरखे बनाये जाते थे।
यहाँ से दुर्गरक्षक सैनिक, आक्रांता सैनिकों पर तीर, गर्म तेल, पत्थर आदि फैंकते थे। जब तोपों का प्रचलन हो गया तो प्राचीर के ऊपरी हिस्से में मोखे बनाये जाने लगे जिनमें तोपों के मुंह खुलते थे। दुर्ग की प्राचीर को मजबूत बनाने के लिये उसके बीच-बीच में गोलाकार बुर्ज बनाई जाने लगी जो भीतर से पोली होती थी। यह एक प्रकार से कपिशीश का ही परिष्कृत रूप थी।
इसके भीतर सैनिक एवं युद्ध सामग्री संगृहीत की जाती थी। दुर्ग में स्थित राजा अथवा सम्राट के आवास तक पहुँचने के लिये एक से अधिक संख्या में दरवाजों का निर्माण होता था जिन्हें पोल कहते थे। इन पोलों पर सैनिकों का कड़ा पहरा रहता था। पूर्व की तरफ का दरवाजा सूरजपोल, पश्चिम की ओर का चांदपोल तथा उत्तर की ओर का धु्रवपोल कहलाता था।
दुर्ग की प्राचीरों पर पत्थर फैंकने के यंत्र लगाये जाते थे। यह चड़स जैसा यंत्र होता था जिसके माध्यम से पत्थर के गोले दूर तक फैंके जा सकते थे। इन यंत्रों का आविष्कार मनुष्य द्वारा उत्तर-वैदिक-काल में कर लिया गया था। इन्हें, ढेंकुली, नालि, भैंरोयंत्र तथा मरकटी यंत्र आदि नामों से पुकारा जाता था। इन यंत्रों का उपयोग सोलहवीं शताब्दी ईस्वी तक अर्थात् तब तक होता रहा जब तक कि भारतीय शासकों को तोपें और बंदूकें प्राप्त नहीं हो गईं।
हिन्दू दुर्ग स्थापत्य के सिद्धांतों पर बने किलों को तोड़ना अत्यंत कठिन होता था। मुगलों ने हिन्दू किलों को तोड़ने में मुख्यतः तीन प्रकार की रचनाएं काम में लीं- पाशीब, साबात तथा बारूद। किले की प्राचीर के बाहर किले की ऊंचाई तक मिट्टी तथा पत्थरों की सहायता से चबूतरा बनाया जाता था जिसे पाशीब कहते थे। पाशीब का निर्माण सरल नहीं था क्योंकि पाशीब बनाने वाले शिल्पियों एवं सैनिकों पर दुर्ग की प्राचीर से पत्थर के गोले एवं तीर बरसाये जाते थे। उन्हें सुरक्षा देने के लिये साबात बनाये जाते थे।
साबात गाय, बैल, भैंस या भैंसे आदि पशुओं के मोटे चमड़े की छावन को कहते थे। किले से बरसने वाले पत्थरों एवं तीरों की मार से बचने के लिये मोटे चमड़े की लम्बी छत बनाई जाती थी जिसके नीचे रहकर सैनिक दुर्ग की दीवार तक पहुँच जाते थे तथा दुर्ग की नींव एवं दीवारों में बारूद भरकर उसमें विस्फोट करते थे। अकबर ने चित्तौड़ के किले को तोड़ने के लिये ये तीनों तरीके काम में लिए थे।
दुर्ग के भीतर सम्पूर्ण नगर बसाने, खेती करने एवं पशु पालन करने की भी परम्परा थी ताकि यदि दुर्ग को शत्रु द्वारा घेर लिया जाये तो लम्बे समय तक दुर्ग के भीतर खाद्य एवं अन्य जीवनोपयोगी सामग्री की उपलब्धता बनी रह सके।
चित्तौड़ दुर्ग, रणथंभौर दुर्ग, जालोर दुर्ग तथा सिवाना दुर्ग सहित अनेक किलों पर मुसलमान शासकों ने कई-कई वर्ष लम्बे घेरे डाले किंतु दुर्ग के भीतर की स्वावलम्बी व्यवस्था के कारण वे दुर्ग पर तभी विजय प्राप्त कर सके जब या तो दुर्ग के भीतर रसद सामग्री समाप्त हो गई या किसी अपने ने दुर्ग के गुप्त-मार्गों के भेद, आक्रमणकारी को दे दिये। जालोर, सिवाना, रणथंभौर, जैसलमेर आदि दुर्गों का पतन ऐसे ही धोखों से हुआ था।
राज-प्रासादों का स्थापत्य
हिन्दू दुर्ग स्थापत्य में राज-प्रासादों का एक विशिष्ट रूप दिखाई देता है। नगर-निर्माण में अथवा दुर्ग-निर्माण में राज-प्रासाद का होना अनिवार्य माना जाता था। प्रसिद्ध शिल्पी मण्डन ने राजप्रासाद बनाने का स्थान या तो नगर के बीच में या नगर के एक कोने में ऊँचे स्थान पर ठीक माना है। राजप्रासादों के निर्माण में जो भव्यता को प्रधानता दी गयी वह राजपूत शासकों की बढ़ती हुई शक्ति को प्रदर्शित करती है।
राज-प्रासादों में जनानी ड्योढ़ी एवं मर्दानी ड्योढ़ी, अनिवार्यतः बनायी जाती थीं तथा दोनों को सुगम मार्ग से जोड़ा जाता था। मर्दानी ड्योढ़ी में दरबार लगाने, आम जनता तथा दरबारियों से मिलने, राजकुमारों के निवास आदि की व्यवस्था होती थी।
जनानी ड्योढ़ी में राजपरिवार की महिलाओं के निवास व रसोड़े आदि की व्यवस्था होती थीं। राजप्रासाद के इन समस्त अंगों को जोड़कर एक पूर्ण इकाई का रूप दिया जाता था तथा दुर्ग-स्थापत्य के समान बुर्ज आदि भी बनवाये जाते थे। राजपूत शासकों के राज-प्रासादों के स्थापत्य में बहुत साम्य पाया जाता है।
मुगलों से सम्पर्क स्थापित होने के बाद राज-प्रासादों को चमक-दमक वाले बनाने का क्रम आरम्भ हो गया। उनमें फव्वारे, छोटे उद्यान, पतले खम्भे और उन पर बेल-बूटों की नक्काशी तथा संगमरमर का प्रयोग होने लगा। राजप्रासादों का अलंकरण विशेष रूप से आरम्भ हुआ। बारीक खुदाई, नक्काशी, अलंकृत छज्जे,गवाक्ष आदि राजस्थानीय राजप्रासादों की अपनी विशेषता रही है।
उदयपुर के अमरसिंह महल, पिछोला झील में स्थित जगनिवास और जगमन्दिर, जोधपुर दुर्ग में स्थित फूल महल, आमेर व जयपुर में दीवाने आम व दीवाने खास, बीकानेर में रंगमहल, शीशमहल व अनूप महल आदि में राजपूत स्थापत्य की प्रधानता होते हुए भी सजावट में मुगल शैली अपनायी गयी है।
ज्यों-ज्यों राजपूत शासक एवं सामन्त मुगल दरबार में अधिकाधिक जाने लगे, उनमें मुगलों के वैभव के अनुरूप स्थापत्य में रुचि बढ़ने लगी। मुगलों के पतन के बाद मुगल-आश्रित अनेक शिल्पकारों के परिवारों को राजपूत शासकों ने आश्रय दिया। इनके द्वारा न केवल शासकों के महलों के स्थापत्य में, अपितु सामन्तों के राज-प्रासादों में भी मुगल शैली प्रगति करने लगी।
हिन्दू जल स्थापत्य अथवा जल संग्रहण स्रोतों की स्थापत्य कला अत्यंत प्राचीन काल से ही उन्नत दशा में थी। भारत में जल को देवता के रूप में सम्मान दिया जाता था और जल की पूजा की जाती थी इसलिए जलाशयों को तीर्थ की तरह पवित्र बनाया जाता था।
भारत में सार्वजनिक उपयोग हेतु कुओं, तालाबों, बावड़ियों एवं अन्य प्रकार के जलाशयों के निर्माण की सुदीर्घ परम्परा रही है। ऋग्वेद में पुष्करिणी (तालाब) का उल्लेख हुआ है। ऋग्वेद का यह उल्लेख हिन्दू जल स्थापत्य का संसार भर में सबसे पहला लिखित उल्लेख है। शांखायनगृह्यसूत्र, अपरार्क, हेमाद्रि, दानक्रिया कौमुदी, जलाशयोत्सर्गतत्व, प्रतिष्ठामयूख, उत्सर्गमयूख, राजधर्म कौस्तुभ आदि ग्रंथों में विभिन्न प्रकार के कूप, तालाब एवं जलाशयों को खुदवाने एवं उनकी प्रतिष्ठा करवाने की विधि लिखी है।
विष्णुधर्मसूत्र में कहा गया है कि जो व्यक्ति जनहित के लिए कूप खुदवाता है, उसके आधे पाप उसमें पानी निकालने के समय नष्ट हो जाते हैं। जो व्यक्ति तालाब खुदवाता है वह सदा निष्पाप रहता है एवं वरुण लोक में निवास करता है। जनकल्याण हेतु खुदवाए गए जलाशय चार प्रकार के होते हैं- कूप, वापी, पुष्करिणी एवं तड़ाग्। कुछ ग्रंथों में लिखा है कि चतुर्भुजाकार या वृत्ताकार होने से कूप का व्यास 5 हाथ से 50 हाथ तक हो सकता है।
इसमें साधारणतः पानी तक पहुँचने के लिए सीढ़ियां नहीं होतीं। वापी वह कूप है जिसमें चारों ओर से अथवा तीन अथवा दो अथवा एक ओर से जल तक पहुँचने के लिए सीढ़ियां बनी होती हैं तथा जिसका मुख 50 से 100 हाथ तक हो। पुष्करिणी 100 से 200 हाथ व्यास की होती है। तड़ाग 200 से 300 हाथ लम्बा होता है।
मत्स्य पुराण के अनुसार वापी 10 कुओं के बराबर एवं हृद (गहरा जलाशय) 10 वापियों के बराबर होता है। एक पुत्र 10 हृदों के बराबर एवं एक वृक्ष 100 पुत्रों के बराबर होता है। वसिष्ठ संहिता के अनुसार पुष्करिणी 400 हाथ लम्बी और तड़ाग उसका 5 गुना बड़ा होता है। मिताक्षरा के अनुसार तड़ागों की सुरक्षा के लिए बने नियमों की पालना करना राजा का कर्त्तव्य है।
विवादरत्नाकर के अनुसार जब कोई व्यक्ति वाटिका, कूप, बांध, जलाशय को तोड़ दे तो उनका जीर्णोद्धार होना चाहिए तथा अपराधी को 800 पणों का दण्ड मिलना चाहिए।
हिन्दू जल स्थापत्य : वापी एवं रहट
भारत में रहट (जलपात्रों के चक्र से युक्त कुंआ) और बावड़ी (सीढ़ीदार कुआँ) का निर्माण अत्यंत प्राचीन काल से होता था। वासुदेव शरण अग्रवाल का अनुमान है कि रहट और बावड़ी, दो विशेष प्रकार के कुएं शकों द्वारा भारत में लाये गये। बावड़ी के लिये प्राचीन नाम शकन्धु (शक देश का कुंआ) और रहट के लिये कर्कन्धु थे।
बाण ने भी हर्षचरित में रहट का उल्लेख किया है। राजस्थान के प्राचीन शिलालेखों में उल्लेखित अरहट्ट भी इसी का द्योतक है। संभव है कि राजस्थान में वापी और रहट दोनों ही विदेशी सम्पर्क के कारण प्रचलित हुए हों।
जयपुर क्षेत्र में नगर नामक प्राचीन स्थल के विक्रम संवत् 741 (ई.684) के शिलालेख में एक वापी निर्माण का श्रेय मारवाड़ भीनमाल के कुशल शिल्पियों को दिया गया है और उन वास्तुविद्या विशारद सूत्रधारों की पर्याप्त प्रशंसा की गई है कि वे तो वास्तुविद्या के प्रगाढ़ पण्डित थे। सातवीं शती की यह वापी आज तक ज्ञात प्राचीनतम वापी है।
कुछ वर्ष पूर्व तक मृदभाण्डों वाले रहटों का राजस्थान के कुछ भागों में प्रयोग किया जाता रहा है और यही स्थिति बैलगाड़ी की भी है। भीनमाल में मध्य-कालीन, आयताकार वापी चण्डीनाथ मंदिर में आज भी स्थित है इसमें पूर्वमध्य-युगीन दो स्तंभ जडे़ हैं। भीनमान के वास्तुकारों का वापी निर्माण कला में अत्यन्त दक्ष होना इसी बात को इंगित करता है कि शकों ने इस क्षेत्र पर शासन किया और उनके साथ आई वास्तुकला को सीखकर यहाँ के शिल्पी उस विद्या में पारंगत हुए जिन्हें वापी निर्माण हेतु दूर-दूर तक बुलाया जाता था।
परमार शासक पूर्णपाल के वि.सं.1102 (ई.1045) के भडुण्ड अभिलेख के अनुसार पूर्णपाल के शासनकाल में 22 ब्राह्मण और 1 क्षत्रिय द्वारा एक बावड़ी का निर्माण करवाया गया। अभिलेख के अनुसार भडुण्ड गांव के ब्राह्मणों ने संसार की असारता का अनुभव करते हुए सज्जनों और साधुओं के हृदयों को आनंदित करने वाली सुंदर वापी बनवाई।
रानी की वाव
गुजरात के पाटण में रानी की वाव नामक एक प्राचीन वापिका अथवा बावड़ी है। इसे ई.1063 में चौलुक्य राजा भीमदेव (प्रथम) की रानी उदयामति ने बनवाया था। इस सीढ़ी युक्त बावड़ी में किसी समय सरस्वती नदी का जल आता था। यह वापिका 64 मीटर लंबी, 20 मीटर चौड़ी तथा 27 मीटर गहरी है। यह संसार भर में अपनी तरह की अकेली वापिका है।
रानी की वाव के स्तम्भ चौलुक्य कालीन वास्तुकला के अनुपम उदाहरण हैं। वापिका की भीतरी दीवारों और स्तंभों पर भगवान विष्णु के दशावतारों, राम, वामन, कल्कि तथा महिषासुरमर्दिनी आदि की प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं।
यह बावड़ी सात मंजिला है तथा मारू-गुर्जर शैली में बनी है। जब सरस्वती नदी का जल कम पड़ने लगा तब यह बावड़ी जल के साथ आई गाद (मिट्टी) से भर गई। धीरे-धीरे यह मिट्टी में दब गई और लोग इसके बारे में भूल गए। भारतीय पुरातत्व सर्वे ने इस बावड़ी को खोजकर उसका उद्धार किया।
राजपूत काल में हिन्दू जल स्थापत्य
न्यून वर्षा वाले क्षेत्रों में जल संग्रहण की सुदीर्घ परम्परा रही है। इस कड़ी की मजबूती सिर्फ शासकों पर नहीं छोड़ी गई थी अपितु समाज के वे अंग जो आज भी आर्थिक दृष्टि से कमजोर माने जाते हैं, बंध-बंधा, ताल-तलाई, जोहड़-जोहड़ी, नाडी, तालाब, सरवर, सर, झील, देईबंध, डहरी, खडीन आदि बनाते थे।
राजपूत स्थापत्य शैली में बने जलाशयों पर कलात्मक भित्तियों एवं घाटों का निर्माण करवाया जाता था जिनके ऊपरी भाग में छतरियाँ बनी रहती थीं। जलाशय के निकट एक कलात्मक स्तम्भ लगाया जाता था जिसके ऊपरी भाग में शिखर बना रहता था और नीचे चारों ओर बनी ताकों में देव प्रतिमाएं उत्कीर्ण की जाती थीं। स्तम्भ के मध्य में जलाशय के निर्माण से सम्बन्धित सूचना लिखी जाती थी।
जलाशय तक पहुँचने के लिए कलात्मक सीढ़ियां एवं घाट बनाए जाते थे। इस काल में जैसलमेर में कौशिकराम का कुण्ड, जैत सागर तथा ब्रह्म्रासागर; बूँदी में फूलसागर और सूरसागर; जोधपुर में बालसमन्द, गुलाब सागर, चौखेलाव तालाब और सरूप सागर; बीकानेर में सूरसागर, अनूपसागर, नाथूसर आदि जलाशय बनाए गए।
17वीं शताब्दी में उदयपुर में महाराणा राजसिंह द्वारा निर्मित राजसंमद जलाशय निर्माण-कला का श्रेष्ठतम उदाहरण है जिसके तोरण द्वार विशुद्ध हिन्दू शैली के हैं किन्तु मण्डपों में बनी जालियां तथा बेल-बूटों के अलंकरण पर मुगल शैली का प्रभाव है। जलाशय-निर्माण की यह पद्धति 19वीं शताब्दी तक काम में ली गई।
दिल्ली सल्तनत काल में मुस्लिम शासकों द्वारा भारत में बनाए गए भवनों की कला को मुस्लिम कला, तुर्क स्थापत्य कला एवं इण्डो-सारसैनिक वास्तुकला कहा जाता है। यह कला भारत में प्रचलित प्राचीन हिन्दू स्थापत्य एवं मध्यकालीन राजपूत स्थापत्य से तो अलग थी ही, तुर्कों के बाद स्थापित होने वाली मुगल स्थापत्य कला से भी अलग थी।
इण्डो-सारसैनिक वास्तुकला के तीन चरण
मुस्लिम वास्तु के तीन क्रमिक चरण स्पष्ट हैं-
(1.) पहला चरण
पहला चरण विजेता आक्रांताओं के विजय-दर्प एवं धर्मांधता से प्रेरित होकर हिन्दू स्थापत्य को नष्ट करने का था। मुहम्मद गौरी के साथ भारत आए हसन निज़ामी ने लिखा है कि प्रत्येक किला जीतने के बाद उसके स्तंभ और नींव तक महाकाय हाथियों के पैरों तले रौंदकर धूल में मिला दिए जाते थे। अनेक भारतीय नगर, दुर्ग एवं मंदिर इसी प्रकार नष्ट किए गए।
(2.) दूसरा चरण
दूसरा चरण सोद्देश्य और आंशिक विध्वंस का था जिसमें हिन्दू इमारतें इसलिए तोड़ी गईं ताकि विजेताओं की मस्जिदों और मकबरों के लिए तैयार शिल्प-सामग्री उपलब्ध हो सके। बड़ी-बड़ी धरनें और स्तम्भ मंदिरों एवं अन्य हिन्दू भवनों से निकालकर नई जगह ले जाए गए। इस काल में मंदिरों को विशेष क्षति पहुँची जो मुसलमानों द्वारा विजित प्रांतों की नई राजधानियों के निर्माण के लिए तैयार सामग्री की खान के रूप में प्रयुक्त हुए और उत्तर भारत से हिंदू वास्तु प्रायः सम्पूर्ण रूप से नष्ट हो गया।
(3.) तीसरा चरण
मुस्लिम वास्तु का तीसरा एवं अंतिम चरण तब आरंभ हुआ जब मुस्लिम आक्रांता देश के अनेक भागों में मस्जिदें एवं मकबरे बनाने लगे।
इण्डो-सारसैनिक वास्तुकला की तीन शैलियाँ
मुस्लिम वास्तु-शैलियों को तीन वर्गों में रखा जा सकता है-
(1.) दिल्ली वास्तु शैली (ई.1193-1554)
इसे पठान शैली एवं शहंशाही शैली भी कहा जाता है। इस शैली का अनुसरण दिल्ली सल्तनत के मध्य एशिया से आए तुर्की सुल्तानों एवं अफगानिस्तान से आए पठान सुल्तानों ने किया। इस शैली में दिल्ली की कुतुबमीनार (ई.1200), सुल्तान गढ़ी (ई.1231), अल्तमश का मकबरा (ई.1236), अलाई दरवाज़ा (ई.1305), निजामुद्दीन (ई.1320), गयासुद्दीन तुगलक (ई.1325) और फीरोजशाह तुगलक (ई.1388) के मकबरे, कोटला फीरोजशाह (ई.1354-1490), मुबारकशाह का मकबरा (ई.1434), मेरठ की मस्जिद (ई.1505), शेरशाह की मस्जिद (ई.1540-45) सहसराम का शेरशाह का मकबरा (ई.1540-45) और अजमेर का अढ़ाई दिन का झोंपड़ा (ई.1205) आदि उल्लेखनीय हैं।
(2.) प्रांतीय वास्तु शैलियाँ
मध्ययुगीन प्रांतीय मुस्लिम शैलियों में निम्नलिखित शैलियों को रखा जा सकता है-
पंजाब शैली (ई.1150-1325) : इस शैली में शाह यूसुफ गर्दिजी (ई.1150), तब्रिजी (ई.1276), बहाउलहक (ई.1262) मुल्तान के श्रकने आलम (ई.1320) के मकबरे प्रमुख हैं।
बंगाल शैली (1203-1573) : इस शैली में पंडुआ की अदीना मस्जिद (ई.1364), गौर के फतेहखाँ का मकबरा (ई.1657), कदम रसूल (ई.1530) तथा तांतीमारा मस्जिद (ई.1475) प्रमुख हैं।
गुजरात शैली (ई.1300-1572) : इस शैली में कैम्बे (ई.1325), अहमदाबाद (ई.1423), भड़ौंच और चमाने (ई.1523) की जामा मस्जिदें एवं नगीना मस्जिद (ई.1525) प्रमुख हैं।
जौनपुर शैली (ई.1376-1479) : इस शैली में जौनपुर की अटाला मस्जिद (ई.1408), लाल दरवाजा मस्जिद (ई.1450) और जामा मस्जिद (ई.1470) प्रमुख हैं।
मालवा शैली (1405-1569) : इस शैली में माण्डू के जहाज-महल (ई.1460), होशंग का मकबरा (ई.1440), जामा मस्जिद (ई.1440), हिंडोला महल (ई.1425), धार की लाट मस्जिद (ई.1405), चंदेरी का बदल महल फाटक (ई.1460), कुशक महल (ई.1445), शहज़ादी का रौजा (ई.1450) आदि प्रमुख हैं।
दक्षिणी शैली (1347-1617) : इस शैली में गुलबर्ग की जामा मस्जिद (ई.1367) और हफ्त गुंबज (ई.1378), बीदर का मदरसा (ई.1481), हैदराबाद की चारमीनार (ई.1591) आदि प्रमुख हैं।
बीजापुर खानदेश शैली (1425-1660) : इस शैली में बीजापुर के गोलगुंबज (ई.1660), रौजा इब्राहीम (ई.1615) और जामा मस्जिद (ई.1570), थालनेर खानदेश के फारूकी वंश के मकबरे (15वीं शती) आदि प्रमुख हैं।
कश्मीर शैली (15-17 वीं शती) : इस शैली में श्रीनगर की जामा मस्जिद (1400), शाह हमदन का मकबरा (17 वीं शती) आदि सम्मिलित हैं।
(3.) मुगल वास्तु शैली
तीसरे वर्ग में मुगल शैली आती है जिसके उत्कृष्टतम नमूने दिल्ली, आगरा, फतेहपुर सीकरी, लखनऊ, लाहौर, इलाहाबाद, औरंगाबाद आदि में किलों, मकबरों, मस्जिदों राजमहलों, उद्यान-मंडपों आदि के रूप में स्थित है। इसी काल में स्थापत्य-कला लाल-बलुआ पत्थर से आगे बढ़कर संगमरमर तक पहुँची और दिल्ली के दीवाने खास, मोती मस्जिद, जामा मस्जिद और आगरा के ताजमहल जैसी विश्व प्रसिद्ध भवन बने।
हिन्दू-मुस्लिम शैलियों के समन्वय के कारण
हिन्दू-मुस्लिम शैलियों के समन्वय से इण्डो-सारसैनिक स्थापत्य का विकास हुआ। हिन्दू-मुस्लिम शैलियों के समन्वय की प्रक्रिया बहुत तेजी से घटित हुई इसके कुछ विशेष कारण थे-
(1.) मुसलमान शासकों ने जब भारत में महल, मस्जिद एवं मकबरे बनवाने आरम्भ किए तो उन्हें भारत में मुस्लिम स्थापत्य के शिल्पी उपलब्ध नहीं हुए। इसलिए कुछ शिल्पी फारस आदि स्थानों से बुलवाए गए। उनके निर्देशन में भारतीय शिल्पियों ने काम किया। अतः स्वाभाविक ही था कि मुस्लिम स्थापत्य में हिन्दू स्थापत्य के तत्व शामिल हो जाएं।
(2.) मुसलमानों ने बहुत तेजी से भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रसार किया जिसके कारण उन्हें बड़ी संख्या में महलों, मस्जिदों एवं मकबरों आदि की आवश्यकता हुई। इन भवनों के निर्माण के लिए बहुत सामग्री की आवश्यकता थी जिसकी पूर्ति शीघ्रता से नहीं हो सकती थी, इस कारण बहुत से हिन्दू भवनों के अलंकरण को नष्ट करके उनके मूल निर्माण को काम में लेते हुए उन्हें इस्लामिक शैली में ढाल दिया गया। उन भवनों में हिन्दू एवं मुस्लिम शैलियों की छाप दिखाई देती है।
(3.) बहुत से मुस्लिम नवनिर्माण के लिए पुराने हिन्दू मंदिरों, महलों आदि को तोड़कर उनकी सामग्री काम में ली गई। इस कारण भी मुस्लिम शैली पर हिन्दू शैली का प्रभाव दिखाई देने लगा।
मध्यकालीन हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य का अंतर बहुत स्पष्ट है।इस काल में हिन्दू स्थापत्य को बड़े स्तर पर क्षतिग्रस्त किया गया तथा हिन्दू भवनों को तोड़कर उसी सामग्री से मुस्लिम स्थापत्य का निर्माण किया गया।
बारहवीं शताब्दी ईस्वी में दिल्ली सल्तनत की स्थापना के साथ ही भारत में मुस्लिम स्थापत्य कला का प्रवेश हुआ। दिल्ली सल्तनत के तुर्क शासक अपने साथ जिस स्थापत्य कला को लेकर आए, उसका विकास ट्रान्स-ऑक्सियाना, ईरान, इराक, मिस्र, अरब, अफगानिस्तान, उत्तरी अफ्रीका तथा दक्षिण पश्चिम यूरोप की शैलियों के मिश्रण से हुआ था। इस मिश्रित स्थापत्य को ही भारत में मुस्लिम स्थापत्य कला कहा गया।
इस शैली की कुछ विशेषताएं इसे भारतीय स्थापत्य शैलियों से अलग करती थीं, जैसे- नोकदार तिपतिया मेहराब, मेहराबी डाटदार छतें, अष्टकोणीय भवन, ऊंचे गोल गुम्बज, पतली मीनारें आदि। इस शैली को सारसैनिक या इस्लामिक कला भी कहा जाता है।
हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य में अंतर
हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य में कई अंतर थे जिनमें से कुछ इस प्रकार से हैं-
(1.) भारतीय स्थापत्य में आदर्शवाद, काल्पनिकता, अलंकरण एवं रहस्य का समावेश था जबकि मुस्लिम स्थापत्य में यथार्थवाद, सादगी एवं वास्तविकता के तत्व अधिक थे।
(2.) भारतीय मंदिर पत्थरों में उत्कीर्ण एक मनोरम संसार का परिदृश्य प्रतीत होते हैं जबकि मुस्लिम स्थापत्य में बनी मस्जिदें सादगी का प्रतिबिम्ब प्रतीत होती हैं और उनका मुख सुदूर मक्का की दिशा में होता है।
(3.) मंदिर की दीवारों एवं शिखरों पर देवी-देवताओं एवं पौराणिक कथाओं का अंकन होता है जबकि मस्जिद की दीवारों पर कुरान की आयतें उत्कीर्ण की जाती हैं।
(4.) मंदिरों में देवी-देवताओं का मानवीय स्वरूप अंकित किया जाता है जबकि मस्जिद की दीवारों पर मानवीय आकृतियों का अंकन निषिद्ध होता है।
(5.) हिन्दू मंदिरों पर शिखर होते थे जबकि मुस्लिम इमारतों पर गोल गुम्बद होते थे।
(6.) हिन्दू मन्दिरों का गर्भगृह प्रकाश एवं वायु से रहित होता था जबकि मस्जिद का भीतरी भाग प्रकाश एवं वायु से युक्त होता था।
(7.) मंदिर का गर्भगृह छोटा होता था जबकि मस्जिद का मुख्यकक्ष विशाल होता था ताकि उसमें अधिक से अधिक लोग नमाज पढ़ सकें।
(8.) हिन्दू स्थापत्य में अलंकृत स्तम्भों एवं सीधे पाटों पर रखी अलंकृत छतों को प्रमुखता दी जाती थी जबकि इस्लामिक स्थापत्य में तिकाने मेहराबों, गोल गुम्बदों और लम्बी मीनारों को अधिक महत्त्व दिया जाता था।
(9.) हिन्दू मंदिरों के शिखरों पर कमल एवं कलश बनाए जाते थे, मंदिर के भीतरी स्तम्भों पर घण्टों, जंजीरों, घटपल्लवों, हथियों, कमल पुष्पों आदि का अंकन किया जाता था तथा खम्भों एवं छतों के जोड़ों पर कीचकों का अंकन किया जाता था किंतु मुस्लिम स्थापत्य में इस तरह के अलंकरणों का कोई प्रावधान नहीं था।
मुगल स्थापत्य कला मुगलों के साथ भारत में नहीं आई थी। इसका विकास भारत में आने के बाद हिन्दू एवं फारसी शैलियों के मिश्रण से हुआ।
ई.1526 में मंगोल-वंशी बाबर भारत में अपनी सत्ता स्थापित करने में सफल हो गया। भारत में बाबर तथा उसके वंशज ‘मुगलों’ के नाम से जाने गए। बाबर के वंशज थोड़े बहुत व्यवधानों के साथ ई.1526 से ई.1765 तक भारत के न्यूनाधिक क्षेत्रों पर शासन करते रहे। बाबर के वंशजों में हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ तथा औरंगजेब प्रभावशाली शासक हुए तथा उनके समय देश में अनेक विशाल भवनों का निर्माण हुआ। इस काल की स्थापत्य शैली मुगल शैली कहलाती है।
फारसी और भारतीय शैली के मिश्रण से बनी मुगल शैली
मुगल अपने साथ स्थापत्य कला की कोई विशिष्ट शैली लेकर नहीं आए थे। उनकी स्मृतियों में समरकंद के मेहराबदार भवन, ऊँचे गुम्बद, बड़े दालान, कोनों पर बनी पतली और ऊँची मीनारें तथा विशाल बागीचे थे। उन्हीं स्मृतियों को मुगलों ने हिन्दू, तुर्की एवं फारसी वास्तुकला में थोड़े-बहुत परिवर्तनों के साथ मिला दिया। इन सबके मिश्रण से जो स्थापत्य शैली सामने आई उसे मुगल स्थापत्य शैली कहा गया।
हालांकि मुगलों के स्थापत्य की सभी प्रमुख विशेषताएं यथा तिकोने या गोल मेहराब (।तबी), पतली और लम्बी मीनारें, झरोखेदार बुर्ज और गोलाकार गुम्बद पहले से ही तुर्कों के स्थापत्य में समाहित थे। अंतर केवल इतना था कि मुगलों के मेहराब, मीनारें, बुर्ज और गुम्बद पहले की अपेक्षा अधिक बड़े, कीमती पत्थरों से युक्त एवं हिन्दू तथा फारसी विशेषताओं को समेटे हुए थे। मुगल-इमारतों के भीतर विशाल कक्षों का एवं बाहर सुंदर एवं विशाल उद्यानों का निर्माण किया गया।
दिल्ली सल्तनत के तुर्की सुल्तानों द्वारा निर्मित भवनों के स्थापत्य को मुगलों के स्थापत्य से भिन्न करने के लिए कहा जा सकता है कि तुर्की सुल्तानों के भवनों में पुरुषोचित दृढ़ता का समावेश है जबकि मुगलों के स्थापत्य में स्त्रियोचित-स्थापत्य-सौंदर्य के दर्शन होते हैं।
मुगल स्थापत्य कला की विशेषताएँ
भारत में बने मुगल भवनों के स्थापत्य की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं-
(1.) भवन के ऊपरी भाग में विशालाकाय प्याज की आकृति का गुम्बद बनता था जिसके चारों तरफ छोटे गुम्बद बनते थे।
(2.) इमारतों में लाल बलुआ पत्थर एवं सफेद संगमरमर का उपयोग।
(3.) पत्थरों पर नाजुक सजावटी अलंकरण, दीवारों के बाहरी एवं भीतरी हिस्सों पर पच्चीकारी एवं दीवारों और खिड़कियों में पत्थरों की अलंकृत जालियों का उपयोग।
(4.) मस्जिदों, मकबरों एवं महलों की भीतरी दीवारों पर फ्रैस्को अर्थात् भित्तिचित्र।
(5.) चारों ओर उद्यान से घिरे हुए स्मारक भवनों का निर्माण।
(6.) महलों एवं उद्यानों में जलापूर्ति के लिए कलात्मक नहरों, नालियों, फव्वारों एवं कृत्रिम झरनों का व्यापक स्तर पर उपयोग।
(7.) विशाल सहन सहित मस्जिदों का निर्माण।
(8.) फारसी एवं अरबी के अलंकृत शिलालेख, कुरान की आयतों का कलात्मक लेखन।
(9.) भवन परिसर के विशाल मेहराब युक्त मुख्य द्वारों का निर्माण।
(10.) दो तरफ या चार तरफ ईवान का निर्माण।
(11.) भवनों की छतों पर कलात्मक बुर्ज एवं छतरियों का निर्माण।
(12.) भवन के चारों ओर लम्बी एवं पतली मीनारों का निर्माण।
(13.) मुगल शैली में स्थानीय शैलियों के मिश्रण से उप-मुगल शैलियों का निर्माण यथा- राजपूत स्थापत्य शैली, सिक्ख स्थापत्य शैली, इण्डो सारसैनिक स्थापत्य शैली, ब्रिटिश राज स्थापत्य शैली।
लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर
मुगल स्थापत्य शैली की सबसे बड़ी विशेषता उत्तर भारत में बहुतायत से मिलने वाला लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर का व्यापक उपयोग है जिसे काटकर, घिसकर तथा पॉलिश करके सुंदर कलात्मक स्वरूप प्रदान किया गया। मुगलों ने भवन निर्माण में बहुत कम मात्रा में काला संगमरमर, क्वाट्जाईट एवं ग्रेनाइट का उपयोग किया।
मुगल भवनों की चिनाई सामान्यतः चूना-कंकर के गारे में होती थी। दीवारों के भीतरी हिस्से में अनगढ़ पत्थरों को चिना जाता था और बाहरी भाग को लाल बलुआ पत्थर अथवा सफेद संगमरमर की पट्टियों से ढका जाता था। कुछ भवनों के निर्माण में ईंटों का प्रयोग किया गया।
बाबर, हुमायूँ एवं अकबर के काल में बने भवनों में राजस्थान के करौली से मिलने वाले लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग किया गया किंतु जहाँगीर के काल में बने भवनों में राजस्थान के मकराना से मिले सफेद संगमरमर का व्यापक स्तर पर उपयोग हुआ। दिल्ली के दीवाने खास, मोती मस्जिद एवं जामा मस्जिद, आगरा के ताजमहल, एतमादुद्दौला का मकबरा एवं मुस्समन बुर्ज, औरंगाबाद का बीबी का मकबरा आदि भवनों का निर्माण मकराना के संगमरमर से हुआ है। चिनाई के लिए उत्तम कोटि के चूने की आपूर्ति भी राजस्थान के नागौर जिले से होती थी।
महंगे रत्नों की भरमार
मुगलों ने अपने महलों में नीला लाजवर्त, लाल मूंगा, पीला पुखराज, हरा पन्ना, कत्थई गोमेद, सफेद मोती आदि मूल्यवान एवं अर्द्धमूल्यवान पत्थरों का भरपूर उपयोग किया। गहरे नीले रंग का लाजवर्त अफगानिस्तान से आता था। जबकि अन्य महंगे रत्न विश्व के अनेक देशों से मंगवाए जाते थे। शाही महलों एवं शाही मकबरों में संगमरमर में बने फूल-पत्तियों की डिजाइनों में वैदूर्य, गोमेद, सूर्यकान्त, पुखराज आदि कीमती रत्नों को जड़ा गया। उनसे पहले भारत के मुस्लिम भवनों में रत्नों का प्रयोग कभी नहीं हुआ था।
मुगलों की बहुत ही सुंदर और संगमरमर की कलाकृतियों में सोने और कीमती पत्थरों का जड़ाऊ काम भी मिलता है। सोने-चांदी के पतरों में रत्नों की ऐसी जड़ाई प्राचीन हिन्दू स्थापत्य में भी मिलती थी किंतु मुस्लिम आक्रमणों के कारण हिन्दू स्थापत्य कला का लगभग पूरी तरह विनाश हो चुका था।
नहरों एवं फव्वारों से युक्त मुगल उद्यान
मुगलों ने समरकंद के तैमूर शैली के उपवनों के अनुकरण पर भारत में कई बाग बनवाए जिन्हें मुगल उद्यान एवं चारबाग कहा जाता है। बाबर ने ई.1528 में आगरा में एक बाग बनवाया जिसे आराम बाग कहा जाता था। यह भारत का सबसे पुराना मुग़ल उद्यान था। इसे अब रामबाग कहा जाता है। जहाँगीर काल में निर्मित हुमायूँ का मकबरा एक बड़े चारबाग के भीतर स्थित है।
जहाँगीर की बेगम नूरजहाँ द्वारा निर्मित एतमादुद्दौला का मकबरा भी चारबाग शैली के विशाल उद्यान के भीतर बना हुआ है। जहाँगीर ने काश्मीर में शालीमार बाग बनवाया। नूरजहाँ के भाई आसफ खान (जो कि शाहजहाँ का श्वसुर और मुमताज महल का पिता था) ने ई.1633 में कश्मीर में निशात बाग बनवाया। प्रयागराज का जहाँगीर कालीन खुसरो बाग भी चारबाग शैली में बना हुआ है।
शाहजहाँ ने लाहौर में शालीमार बाग बनवाया जिसकी प्रेरणा काश्मीर के शालीमार बाग से ली गई थी। शाहजहाँ द्वारा निर्मित ताजमहल भी चारबाग शैली के एक बड़े उद्यान के बीच स्थित है।
ताजमहल की सीध में यमुना के दूसरी ओर भी शाहजहाँ द्वारा निर्मित एक उद्यान है जिसे मेहताब बाग कहा जाता है। यह भी चारबाग शैली में बना हुआ है। औरंगजेब ने पंजाब में पिंजोर बाग बनवाया जो हरियाणा के पंचकूला जिले में अपने बदले हुए स्वरूप में अब भी मौजूद हैं तथा यदुवेन्द्र बाग कहलाता है। चारबाग शैली एक विशिष्ट प्रकार की शैली थी जिसमें उद्यान के केन्द्रीय भाग से चारों दिशाओं में चार नहरें जाती थीं जिनसे पूरे उद्यान को जल की आपूर्ति होती थी।
ये चार नहरें, कुरान में वर्णित जन्नत के बाग में बहने वाली चार नदियों का प्रतीक होती थीं। भारत में मुगलों द्वारा बनाए गए छः उद्यानों को यूनेस्को विश्व धरोहर की संभावित सूचि में सम्मिलित किया गया है। इनमें जम्मू-कश्मीर के परी महल, निशात बाग, शालीमार बाग, चश्म-ए-शाही, वेरिनाग गार्डन तथा अचबल गार्डन सम्मिलित हैं।
भारत में मुगल स्थापत्य कला के प्रसिद्ध उदाहरण
भारत में मुगल स्थापत्य शैली के उत्कृष्टतम नमूने दिल्ली, आगरा, फतेहपुर सीकरी, लखनऊ, लाहौर (अब पाकिस्तान), काबुल (अब अफगानिस्तान), कांधार (अब अफगानिस्तान), ढाका (अब बांगलादेश) आदि नगरों में हैं। मुगल शैली के कुछ प्रसिद्ध भवन इस प्रकार हैं-
(1.) मकबरे
एतमादुद्दौला का मकबरा (आगरा), हुमायूँ का मकबरा (दिल्ली), अकबर का मकबरा (आगरा के निकट सिकंदरा), जहाँगीर का मकबरा (लाहौर), ताजमहल (आगरा), अनारकली का मकबरा (लाहौर), बीबी का मकबरा (औरंगाबाद) आदि।
(2.) मस्जिद
दिल्ली, आगरा एवं फतेहपुर सीकरी की जामा मस्जिदें, लाहौर, दिल्ली एवं आगरा की मोती मस्जिदें, आगरा की नगीना मस्जिद, फतेहाबाद की मस्जिद, दिल्ली की किला-ए-कुहना मस्जिद आदि।
(3.) किले
दिल्ली का दीन पनाह, आगरा एवं दिल्ली के लाल किले, लाहौर का किला, प्रयागराज का किला, अजमेर का दौलताबाद किला।
(4.) महल
फतेहपुर सीकरी के महल, आगरा एवं दिल्ली के लाल किलों के महल।
बाबर कालीन स्थापत्य मस्जिद एवं मकबरों के निर्माण तक सीमित था। बाबर एक क्रूर विध्वंसक था, इसलिए उसने भगवान श्रीराम का जन्मभूमि मंदिर तोड़कर वहाँ भी मस्जिद बनवाई।
ई.1526 में बाबर ने पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहीम लोदी को परास्त करके दिल्ली एवं आगरा पर अधिकार कर लिया। इसके बाद बाबर ने खानवा, चंदेरी एवं घाघरा के युद्ध जीतकर भारत में मुगल सल्तनत की स्थापना की। वह भारत में केवल चार साल राज्य कर सका। इतने कम समय में वह अपना राज्य भी ढंग से व्यवस्थित नहीं कर सका इसलिए भवन निर्माण के बारे में सोचना भी कठिन था। फिर भी बाबर ने भारत में कुछ विध्वंस एवं कुछ निर्माण किए।
बाबर को तुर्क तथा अफगान सुल्तानों द्वारा दिल्ली और आगरा में निर्मित इमारतें पसंद नहीं आईं। उस काल में ग्वालियर के महल ही हिन्दू कला के सुंदर उदाहरण के रूप में शेष बचे थे। यद्यपि बाबर के अनुसार इनके निर्माण में किसी निश्चित नियम एवं योजना का पालन नहीं हुआ था तथापि वे बाबर को सुंदर एवं हृदयग्राही प्रतीत हुए। बाबर ने अपने लिए ग्वालयिर के अनुकरण पर महल बनवाए।
बाबर ने स्वयं अपनी प्रशंसा करते हुए लिखा है कि ‘मैंने आगरा, सीकरी, बयाना, धौलपुर, ग्वालियर एवं कोल नामक स्थानों पर भवन निर्माण के कार्य में संगतराशों को लगाया।’
सतीश चन्द्र ने लिखा है- ‘बाबर के लिए स्थापत्य का सबसे महत्वपूर्ण पहलू नियम-निष्ठता एवं समरूपता थी जो उसे भारतीय इमारतों में दिखाई नहीं दी। बाबर भारतीय कलाकारों के साथ काम करने के लिए उत्सुक था। इस कार्य हेतु उसने प्रसिद्ध अलबानियाई कलाकार ‘सिनान’ के शिष्यों को बुलाया। बाबर को भारत में स्थापत्य के क्षेत्र में ज्यादा कुछ करने का समय नहीं मिला और उसने जो कुछ बनवाया उसमें से अधिकतर भवन अब नष्ट हो चुके हैं।’
बाबर ने या तो आगरा, सीकरी, बयाना आदि स्थानों पर बड़े निर्माण अर्थात् महल एवं दुर्ग आदि नहीं बनवाकर मण्डप, स्नानागार, कुएं, तालाब एवं फव्वारे जैसी लघु रचनाएं ही बनवाई थीं या फिर बाबर द्वारा निर्मित इमारतें मजबूत सिद्ध नहीं हुईं। क्योंकि वर्तमान में पानीपत के काबुली बाग की विशाल मस्जिद एवं रूहेलखण्ड में संभल की जामा मस्जिद को छोड़कर, बाबर द्वारा निर्मित कोई भी इमारत उपलब्ध नहीं है। या तो वे बनी ही नहीं थीं या फिर वे समस्त इमारतें खराब गुणवत्ता के कारण नष्ट हो चुकी हैं।
यद्यपि पानीपत के काबुली बाग की मस्जिद एवं रूहेलखण्ड की मस्जिद पर्याप्त विशाल रचनाएं हैं तथापि उनमें शिल्प, स्थापत्य एवं वास्तु का कोई सौंदर्य दिखाई नहीं देता। इन दोनों भवनों के बारे में स्वयं बाबर ने स्वीकार किया है कि इनकी शैली पूरी तरह भारतीय थी। यहाँ भारतीय शैली से तात्पर्य मुगलों के पूर्ववर्ती दिल्ली सल्तनत-काल की पठान शैली से है। बाबर को भारत में समरकंद जैसी इमारतें बना सकने योग्य कारीगर उपलब्ध नहीं हुए। न बाबर के पास इतना धन एवं इतना समय था कि वह इमारतों का निर्माण करवा सके।
बाबर के शिया सेनापति मीर बाकी ने अयोध्या में भगवान राम के ‘जन्मस्थानम्’ मंदिर को तोड़कर, उसी सामग्री से वहीं एक ढांचा खड़ा किया जिसे मुगल रिकॉर्ड्स में ‘मस्जिद-जन्मस्थानम्’ कहा गया। मीर बाकी ने इस ढांचे पर दो शिलालेख लगवाए। इन शिलालेखों में बाबर के नाम का उल्लेख होने के कारण इस ढांचे को जन-साधारण की भाषा में ‘बाबरी-मस्जिद’ कहा जाने लगा।
इस ढांचे को वर्ष 1992 में एक जन-आंदोलन में ढहा दिया गया। ई.1528 में बाबर ने आगरा में आरामबाग था का निर्माण करवाया। यह भारत का सबसे पुराना मुग़ल उद्यान है। इस उद्यान में विभिन्न प्रकार की ज्यामितीय रचनाएं बनाई गई हैं। यह बाग ऊँची चाहरदिवारी से घिरा है जिसके कोने की बुर्जियों के ऊपर स्तम्भयुक्त मंडप हैं। नदी के किनारे दो-दो मंजिले भवनों के बीच में एक ऊँचा पत्थर का चबूतरा है।
जहाँगीर ने इस बाग की संरचनाओं में कुछ परिवर्तन किए। ब्रिटिश शासनकाल में भी कुछ नव-निर्माण करवाए गए। इस स्मारक के उत्तरी-पूर्वी किनारे पर एक और चबूतरा है जहाँ से हम्माम के लिए रास्ता है। हम्माम की छत मेहराबदार है। नदी से पानी निकालकर एक चबूतरे से बहते हुए चौड़े नहरों, कुंडों एवं झरनों के रास्ते दूसरे चबूतरे तक लाया जाता था।
बाबर ने आगरा के लोदी किले में जामा मस्जिद बनवाई। वह राजपूताने की सीमा पर ऐसे भवन बनवाना चाहता था जो ठण्डे हों। इसलिए उसके आदेश से आगरा, सीकरी, बयाना, धौलपुर, ग्वालियर तथा अन्य नगरों में कुछ भवनों का निर्माण किया गया जो अब शेष नहीं बचे हैं। धौलपुर नगर के बाहर स्थित कमलताल के निकट बाबर कालीन स्थापत्य के ध्वंसावशेष देखे जा सकते हैं। जब बाबर खानवा के युद्ध के लिए धौलपुर पहुँचा था तब यह कमलताल मौजूद था।
हुमायूँ कालीन स्थापत्य कुछ मस्जिदों तक सीमित था। उसने दिल्ली के पुराने किले में निवास स्थापित करने के लिए उसका परकोटा मरम्मत करवाया तथा वहाँ एक पुस्तकालय भी बनवाया।
बाबर के पुत्र नासिरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ ने ई.1533 में दिल्ली में यमुना के किनारे दीनपनाह नामक नवीन नगर का निर्माण आरम्भ करवाया। यह नगर ठीक उसी स्थान पर निर्मित किया गया जिस स्थान पर पाण्डवों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ स्थित थी। इस परिसर से मौर्य एवं गुप्तकालीन मुद्राएं, मूर्तियाँ एवं बर्तन आदि मिले हैं तथा भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर भी मिला है जिसे कुंती का मंदिर कहा जाता है।
दीनपनाह नामक शहर में हुमायूँ ने अपने लिए कुछ महलों का निर्माण करवाया। इन महलों के निर्माण में स्थापत्य-सौंदर्य के स्थान पर भवनों की मजबूती पर अधिक ध्यान दिया गया। जब ई.1540 में शेरशाह सूरी ने हुमायूँ का राज्य भंग कर दिया तब शेरशाह ने दीनपनाह को नष्ट करके उसके स्थान पर एक नवीन दुर्ग का निर्माण करवाया जिसे अब दिल्ली का पुराना किला कहते हैं।
दीनपनाह के भीतर शेरमण्डल नामक एक भवन है। इसका निर्माण हुमायूँ ने अपने लिए पुस्तकालय के रूप में करवाया। शेरशाह सूरी कि समय में यह शेरमण्डल कहलाने लगा। यह अष्टकोणीय एवं दो मंजिला भवन है जो एक कम ऊँचाई के चबूतरे पर टावर की आकृति में खड़ा किया गया है। इसके निर्माण में लाल बलुआ पत्थर काम में लिया गया है।
हुमायूँ ने आगरा में एक मस्जिद बनवाई थी जिसके भग्नावशेष ही शेष हैं। इसकी मीनारें भी ध्वस्त प्रायः हैं जिसके कारण इसकी स्थापत्य सम्बन्धी विशेषताओं को समझा नहीं जा सकता। हिसार के फतेहाबाद कस्बे में भी हुमायूँ ने एक मस्जिद बनवाई जिसे हुमायूँ मस्जिद कहा जाता है। हुमायूँ ने यह मस्जिद दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह तुगक द्वारा निर्मित लाट के निकट बनवाई।
मस्जिद में लम्बा चौक है। इस मस्जिद के पश्चिम में लाखौरी ईंटों से बना हुआ एक पर्दा है जिस पर एक मेहराब बनी हुई है। इस पर एक शिलालेख लगा हुआ है जिसमें बादशाह हूमायूँ की प्रशंसा की गई है। यह मस्जिद ई.1529 में बननी शुरु हुई थी किंतु हुमायूँ के भारत से चले जाने के कारण अधूरी छूट गई। ई.1555 में जब हुमायूँ लौट कर आया तब इसका निर्माण पूरा करवाया गया।
अकबर ने भारत में प्रचलित तत्कालीन स्थापत्य शैलियों की बारीकी को समझा और अपने शिल्पकारों को इमारतें बनाने के लिए नये विचार दिये। अकबर कालीन स्थापत्य कला वास्तव में हिन्दू-मुस्लिम शैलियों का समन्वय थी।
अकबर कालीन स्थापत्य
अकबर ने लगभग 50 वर्ष भारत पर शासन किया। इस अवधि में उसका राज्य काफी विस्तृत हो गया था तथा मुगल सल्तनत की आय बहुत बढ़ गई थी। इसलिए उसने भारत के अनेक नगरों में भवनों का निर्माण करवाया। अकबर का शासन-काल शासन के प्रत्येक क्षेत्र में हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति के सम्मिश्रण और समन्वय का काल था।
इस कारण उसके समय में स्थापत्य एवं भवन निर्माण में भी सम्मिश्रण की नई शुरुआत हुई। अकबर द्वारा निर्मित भवनों में ईरानी तथा भारतीय तत्त्व दृष्टिगोचर होते हैं पर इनमें प्रधानता भारतीय तत्त्वों की ही है। कुछ विद्वानों की धारणा है कि मुगल कला का आरम्भ अकबर से ही मानना चाहिये।
अबुल फजल का कथन है- ‘बादशाह सुन्दर इमारतों की योजना बनाता है और अपने मस्तिष्क एवं हृदय के विचार को पत्थर और गारे का रूप देता है।’
अकबर ने तत्कालीन शैलियों की बारीकी को समझा और अपने शिल्पकारों को इमारतें बनाने के लिए नये-नये विचार दिये। अकबर कालीन स्थापत्य की शैली वास्तव में हिन्दू-मुस्लिम शैलियों का समन्वय थी।
अकबर कालीन स्थापत्य की कुछ प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार थीं-
(1.) भवन निर्माण में अधिकांशतः लाल बलुआ पत्थर का उपयोग हुआ है, कहीं-कहीं पर सफेद संगमरमर का प्रयोग किया गया है।
(2.) अकबरी स्थापत्य शैली में मेहराबी और शहतीरी शैलियों का समान अनुपात में प्रयोग किया गया है।
(3.) आरम्भ में गुम्बद लोदी शैली में बनते रहे जो भीतर से खोखले होते थे किंतु तकनीकी दृष्टि से यह दोहरा गुम्बद नहीं था।
(4.) स्तम्भ का अग्रभाग बहुफलक युक्त था और इनके शीर्ष पर बै्रकेट या ताक होते थे।
(5.) भवनों का अलंकरण प्रायः नक्काशी या पच्चीकारी द्वारा होता था और उनमें चमकीले रंग भरे जाते थे।
अकबर कालीन स्थापत्य का विकास दो चरणों में हुआ। प्रथम चरण में फतेहपुर सीकरी से पहले के स्थापत्य को रखा जाता है जिसमें आगरा, इलाहाबाद और लाहौर के किला शामिल हैं। दूसरे चरण में फतेहपुर सीकरी के निर्माण हैं।
दिल्ली में निर्मित भवन
अकबर के समय दिल्ली में बने प्रमुख भवनों में हुमायूं का मकबरा (ई.1562) सर्वप्रमुख है। इस मक़बरे की चारबाग शैली भारत में पहली बार प्रयुक्त हुई थी। इसके अनुकरण पर ही आगे चलकर ताजमहल तथा उसके चारों ओर के उद्यान का निर्माण हुआ। समकालीन इतिहासकार अब्द-अल-कादिर बदायूनीं के अनुसार इस भवन का मुख्य वास्तुकार मिराक मिर्जा घियास था जिसे अफगानिस्तान के हेरात शहर से इस मकबरे के निर्माण के लिए विशेष रूप से बुलवाया गया था।
उसने हेरात में कई भवन बनाए थे। मकबरे का निर्माण पूर्ण होने से पहले ही मिराक मिर्जा घियास की मृत्यु हो गई। अतः शेष कार्य उसके पुत्र सैयद मुहम्मद इब्न मिराक घियाथुद्दीन ने पूरा करवाया। मकबरे का मुख्य भवन ई.1571 में बनकर तैयार हुआ। यह मुगल सल्तनत की पहली इमारत थी जिसमें लाल बलुआ पत्थर का इतने बड़े स्तर पर प्रयोग हुआ था।
इस भवन-समूह में बादशाह हुमायूँ तथा शाही परिवार के सदस्यों की कब्रें हैं जिनमें हुमायूँ की बेगम हमीदा बानो, हुमायूँ की छोटी बेगम, शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दाराशिकोह, मुगल बादशाह जहांदारशाह, फर्रूखशीयर, बादशाह रफीउद्दरजात, रफीउद्दौला एवं आलमगीर (द्वितीय) आदि की कब्रें शामिल हैं।
मकबरा निर्माण की यह शैली पूर्ववर्ती मंगोल शासक तैमूर लंग के समरकंद (उजबेकिस्तान) में बने मकबरे पर आधारित थी तथा यही मकबरा आगे चलकर भारत में मुगल स्थापत्य के मकबरों की प्रेरणा बना। ताजमहल के निर्माण के साथ ही मकबरा निर्माण की यह स्थापत्य शैली अपने चरम पर पहुँच गई।
हुमायूं के मकबरे के दक्षिण-पूर्वी कौने में ई.1590 में निर्मित शाही-नाई का गुम्बद है। यह मकबरा एक ऊँचे चबूतरे पर बना है जिस तक पहुँचने के लिये दक्षिणी ओर से सात सीढ़ियां बनी हुई हैं। यह वर्गाकार है और इसके अकेले कक्ष के ऊपर एक दोहरा गुम्बद बना हुआ है। भीतर स्थित दो कब्रों पर कुरआन की आयतें खुदी हुई हैं। इनमें से एक कब्र पर 999 अंकित है जिसका अर्थ हिजरी सन् 999 अर्थात् ई.1590-91 से है।
हुमायूँ के मकबरे की मुख्य चहारदीवारी के बाहर स्थित स्मारकों में ‘बूहलीमा का मकबरा’ प्रमुख है। इसका स्थापत्य एक आयताकार साधारण मकान के रूप में है जिस पर कोई गुम्बद, मीनार, बुर्ज, ईवान, मेहराब आदि फारसी संरचनाएं नहीं हैं। इस मकान को स्थानीय क्वार्टजाइट पत्थरों से बनाया गया है। बूहलीमा के मकबरे के निकट ‘अरब सराय’ स्थित है जिसे हुमायूं की विधवा हमीदा बेगम ने अरब से आए 300 कारीगरों के लिए बनवाया था।
इस सराय का मुख्य द्वारा एक बड़े ईवान के रूप में बनाया गया है जिसमें दो विशाल मेहराब बनाए गए हैं। इस द्वारा से प्रवेश करने पर सराय का मुख्य हिस्सा दो भागों में बंटा हुआ दिखाई देता है जिनमें एक जैसी मेहराबदार कोठरियां बनी हुई हैं तथा अब भग्न अवस्था में हैं। इस मेहंदी बाजार भी कहा जाता है जिसके बारे में मान्यता है कि इसे जहाँगीर के मुख्य हींजड़े मिहर बानू ने बनाया था।
अरब सराय के निकट एक प्लेटफार्म पर अफसर वाला मकबरा तथा अफसरवाली मस्जिद निर्मित हैं तथा दोनों इमारतें स्थानीय क्वार्टजाईट पत्थर से बनी हैं। दोनों भवनों की बाहरी दीवारों पर लाल बलुआ पत्थर से सजावट की गई है। लाल बलुआ पत्थर में सफेद संगमरमर से पर्चिनकारी की गई है।
इन इमारतों के भीतर की बनावट फारसी शैली पर आधारित है तथा सादगी पूर्ण है। दोनों ही भवन अब जीर्ण अवस्था में हैं। मस्जिद का मुख्य कक्ष ‘थ्री बे’ बना हुआ है। बीच की ‘बे’ के चारों ओर मेहराब बने हुए हैं जिनके ऊपर एक गुम्बद स्थित है।
गुम्बद के भीतरी हिस्से में चित्रों का एक पूरा पैनल है। मस्जिद का ‘तिहरा ईवान’ फारसी शैली में निर्मित है। अफसरवाला मकबरे के भीतर एक ही कक्ष है जिसमें संगमरमर की कब्रें बनी हुई हैं जिनमें से एक कब्र पर कुरान की नौ सौ चौहत्तरवीं आयत लिखी गई है जो संभवतः हिजरी 974 की द्योतक है। अफसर वाला मकबरा के ऊपर दो गुम्बद बने हुए हैं। यह मकबरा बाहर से अष्टकोणीय है।
इनमें से चार तरफ की दीवारों में मेहराबदार चार प्रवेशद्वार बने हैं जो सीधे ही कब्र वाले कमरे में खुलते हैं। मेहराबों को लाल बलुआ पत्थरों के अलंकरणों से सजाया गया है। गुम्बद के ऊपर एक उलटा कमल लगा है जो कलश के लिए आधार बनाता है। इस आधार पर एक मंगल-कलश रखा हुआ है। अकबर कालीन भवन में इस प्रकार का कमल एवं कलश बहुत कम दिखाई देता है।
अकबर ने अपनी धाय माहम अनगा के पुत्र आदम खाँ अथवा (अदहम खाँ) के लिए दिल्ली में एक मकबरा बनवाया। यह मक़बरा दक्षिणी दिल्ली के लालकोट की दीवार पर बने एक चबूतरे पर बना है। इस अष्टकोणीय इमारत के गुम्बद को 15-16वीं सदी के सैयद और लोदी शासन-काल में बनी इमारतों की शैली में बनाया गया है। मक़बरे में चारों तरफ मेहराबदार बरामदे बने हैं। प्रत्येक बरामदे में तीन दरवाजे हैं।
आगरा में निर्मित भवन
आगरा का किला एक प्राचीन हिन्दू दुर्ग था जिसमें लोदी शासकों ने कुछ निर्माण करवाए थे। बाबर ने भी इस दुर्ग में एक बावली बनवाई थी। अकबर, जहाँगीर एवं शाहजहाँ ने भी इस दुर्ग में कुछ महल बनवाए तथा पुराने महलों का जीर्णोद्धार किया। अबुल फजल ने लिखा है- ‘यह किला ईंटों से बना हुआ था और बादलगढ़ के नाम से जाना जाता था। यहाँ लगभग पाँच सौ सुंदर इमारतें, बंगाली व गुजराती शैली में बनी थीं।’
यह किला अत्यंत जीर्ण-शीर्ण स्थिति में था इसलिए अकबर ने इस दुर्ग का जीर्णोद्धार करवाया। उसने धौलपुर के निकट करौली से लाल पत्थर मंगवाकर ईंटों की दीवारों पर चढ़वा दिया और लगभग सम्पूर्ण दुर्ग का पुनर्निर्माण करवाया। 8 साल तक लगभग 4,000 कारीगर एवं श्रमिक इस दुर्ग का जीर्णोद्धार करते रहे। ई.1573 में यह दुर्ग दुबारा से बनकर तैयार हुआ और अकबर अपने परिवार सहित इसमें निवास करने लगा। किले का मुख्य द्वार अर्थात् दिल्ली दरवाजा और जहाँगीरी महल अकबर के समय के ही निर्मित हैं।
आगरा दुर्ग का ई.1566 में निर्मित दिल्ली दरवाजा अकबर के प्रारम्भिक काल की स्थापत्य कला विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करता है। इस किले का निर्माण तराशे हुए लाल बलुआ पत्थर से किया गया है। इन भवनों के मेहराब, दोनों ओर झुकी हुई अष्टकोणीय दीवारें, तोरणयुक्त छतें, मण्डप, कंगूरे, लाल बलुआ पत्थर पर सफेद पत्थर का अलंकरण प्रमुख हैं। अकबरी महल की स्थापत्य शैली, जहाँगीरी महल के स्थापत्य की तुलना में कम कलात्मक है एवं भद्दी सी दिखाई देती है। अकबरी महल में बंगाली शैली के बुर्ज बने हुए हैं तथा यह महल जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है।
इलाहाबाद दुर्ग में निर्मित भवन
प्रयागराज (इलाहाबाद) का किला मूलतः किसी हिन्दू राजा ने बनवाया था जिसे अकबर ने नए सिरे से बनवाया। नदी की कटान से यहाँ की भौगोलिक स्थिति स्थिर न होने से इसका नक्शा अनियमित ढंग से तैयार किया गया। अनियमित नक्शे पर किले का निर्माण कराना ही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। दुर्ग में जहाँगीर महल, तीन बड़ी गैलरी तथा ऊँची मीनारें हैं। मुगलों ने दुर्ग में कई फेरबदल कराये।
अजमेर दुर्ग में निर्मित भवन
अकबर पहाड़ी दुर्ग में रहने का अभ्यस्त नहीं था। वह आगरा, लाहौर, इलाहाबाद तथा फतहपुर सीकरी के मैदानी दुर्गों में रहना पसंद करता था जहाँ बड़े-बड़े बाग बनाए जा सकें। इसलिये उसने अजमेर में भी एक प्राचीन हिन्दू दुर्ग को मुस्लिम शैली में ढालकर उसका जीर्णोद्धार करवाया। इसके भीतर अकबर ने अपने लिये एक महल बनवाया।
यह दुर्ग फतहपुर सीकरी के महल की अनुकृति है और विशाल चतुष्कोणीय आकृति में है। इसके चारों कोनों पर अष्टकोणीय मीनारें हैं। इसका द्वार नगर की तरफ मुंह किये हुए है। केन्द्रीय भाग में विशाल बैठक बनी है। दुर्ग के चारों कोनांे में एक-एक बुर्ज बनी हुई है। इसकी पश्चिमी दिशा में एक सुंदर दरवाजा है तथा इसके मध्य में भवन बना हुआ है। इस दुर्ग का दरवाजा 84 फुट ऊँचा तथा 43 फुट चौड़ा है।
फतहपुर सीकरी का स्थापत्य
फतेहपुर सीकरी, आगरा से 23 मील दक्षिण-पश्चिम में एक ढालू पहाड़ी पर स्थित है। इस नगर के तीन ओर दीवारें और एक ओर कृत्रिम झील थी। यह नगर ई.1571 में बनना आरम्भ हुआ और ई.1580 में बनकर तैयार हुआ। फतेहपुर सीकरी के भवनों को तीन श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है-
(1.) मजहबी इमारतें- जामा मस्जिद, शेख सलीम चिश्ती की दरगाह, बुलंद दरवाजा, इबादतखाना (केन्द्रीय कक्ष या दीवाने आम) आदि।
क्या फतेहपुर सीकरी की शैली राष्ट्रीय स्थापत्य शैली है?
फतेहपुर सीकरी की अकबर कालीन समस्त इमारतें हिंदू-मुस्लिम मिश्रित स्थापत्य शैली की हैं। इनमें हिन्दू स्थापत्य की प्रधानता है। इनमें से कुछ की सजावट, जैसे- दीवाने खास में लगे हुए स्तम्भों के तोड़े, पंचमहल और जोधाबाई के महल में लगे हुए उभरे घण्टे तथ जंजीर और मरियम के महल में पत्थर खोदकर बनाये गये पशु-पक्षियों के चित्र इत्यादि हिन्दू और जैन मन्दिरों की ही नकल हैं।
संगमरमर और बलुआ लाल पत्थर से बना हुआ बुलन्द दरवाजा स्थापत्य का उत्कृष्ट नमूना है। डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है- ‘फतेहपुर सीकरी की स्थापत्य कला की शैली भारतीय प्राचीन संस्कृति के विभिन्न तत्त्वों को समन्वित करने और मिलाने की अकबर की नीति को ही जैसे पाषाण रूप में प्रस्तुत करती हैं।’
डा. श्रीवास्तव ने अकबर की इस समन्वित स्थापत्य शैली को राष्ट्रीय स्थापत्य कला शैली कहा है। अकबर ने स्थापत्य की जो नई शैली विकसित की, उसका प्रभाव सारे देश पर और राजस्थान के राजपूत राजाओं पर पड़ा। अकबर के शासनकाल में अजमेर, बीकानेर, जोधपुर, आम्बेर, ओरछा और दतिया में जो महल बने, उन पर मुगल कला का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
हिन्दुओं के मन्दिर भी इस शैली के प्रभाव से नहीं बच सके। हिन्दू राजाओं के महलों के बारे में पर्सी ब्राउन ने लिखा है- ‘राजपूत भवनों को देखकर कोई भी कल्पना कर सकता है कि उनमें प्रारम्भिक मुगली कला, जैसे-कटोरेदार मेहराबें, काँच की पच्चीकारी, दरीखाना, पलस्तर की रँगाई किस प्रकार हिन्दू राजाओं की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये अपना लिये गये थे।’
इन इतिहासकारों ने अकबर-कालीन इमारतों में हिन्दू-मुस्लिम एकता के तत्व ढूंढे हैं जबकि इस वास्तविकता को भी भुलाया नहीं जाना चाहिए कि फतेहपुर सीकरी के अधिकांश महलों का निर्माण सिकरवार राजपूतों ने करवाया था, अकबर ने तो केवल उनके बाहरी रूप को बदला था। अंग्रेजी इतिहासकार, लेखक एवं पुरातत्ववेत्ता इस बात को नहीं समझ पाए थे, इसलिए उन्होंने मुगल कालीन इमारतों में हिन्दू-मुस्लिम मिश्रित शैली के दर्शन किए।
बाद के भारतीय लेखकों ने भी उन्हीं के लिखे हुए को सच मान लिया। बहुत से भारतीय लेखकों ने तो इन भवनों को अपनी आंखों से देखे बिना ही यूरोपीय लेखकों का अनुसरण किया। यहाँ तक कि कुछ इतिहासकारों ने फतेहपुर सीकरी के भवनों को राष्ट्रीय स्थापत्य शैली भी घोषित कर दिया। न तो फतहपुर सीकरी की शैली कोई अलग है और न फतहपुर सीकरी के स्थापत्य का देश के किसी भी हिस्से में अनुसरण हुआ, इसलिए इसे राष्ट्रीय स्थापत्य शैली नहीं कहा जा सकता।
जहाँगीर कालीन स्थापत्य का सबसे पहला उदाहरण आगरा से बाहर बना हुआ सिकन्दरा का मकबरा है जिसकी योजना स्वयं अकबर ने बनाई थी किंतु इसका निर्माण जहाँगीर ने अकबर की मृत्यु के बाद अपनी निगरानी में करवाया। यह मकबरा परम्परागत इस्लामी शैली का मकबरा नहीं है।
जहाँगीर कालीन स्थापत्य
जहाँगीर को भवन निर्माण में अकबर जैसी रुचि नहीं थी। इसलिए जहाँगीर कालीन स्थापत्य का कोई विशेष विकास नहीं हुआ। जहाँगीर ने स्थापत्य की अपेक्षा चित्रकला को अधिक महत्व दिया। यद्यपि जहाँगीर के शासन-काल में बहुत कम इमारतें बनी थीं परन्तु इस काल में उपवन लगाने की नई शैली विकसित हुई। काश्मीर में जहाँगीर द्वारा बनवाया हुआ शालीमार बाग और उसके साले आसफ खाँ का बनवाया हुआ निशात बाग आज भी मौजूद है।
अकबर ने अपने जीवन काल में आगरा के बाहर सिकन्दरा में अपना मकबरा बनाने की योजना बनाई। संभवतः उसके जीवनकाल में ही इसका निर्माण कार्य भी आरम्भ हो गया किंतु इस इमारत को बाद में जहाँगीर ने पूरा करवाया। जहाँगीर की प्रिय बेगम नूरजहाँ ने आगरा में यमुना नदी के तट पर सफेद संगमरमर से अपने पिता एतिमादुद्दौला का विशाल मकबरा बनवाया। नूरजहाँ ने लाहौर के निकट जहाँगीर का मकबरा भी बनवाया। दिल्ली में बना खानखाना का मकबरा भी जहाँगीर काल की प्रमुख इमारतों में से है।
जहाँगीर के समय आगरा में निर्मित भवन
आगरा से बाहर सिकन्दरा में स्थित अकबर के मकबरे की योजना स्वयं अकबर ने बनाई थी किंतु इसका निर्माण जहाँगीर ने अकबर की मृत्यु के बाद अपनी निगरानी में करवाया। मकबरे के चारों ओर बाग लगाया गया तथा एक बड़ा एवं ऊँचा दरवाजा सफेद पत्थर की मीनारों सहित बनाया गया। यह मकबरा परम्परागत इस्लामी शैली का मकबरा नहीं है।
मुसलमानों के मकबरों में गुम्बद बनाने की प्रथा प्राचीन समय से प्रचलित थी किन्तु इस मकबरे पर कोई गुम्बद नहीं है। इसकी बनावट बौद्ध विहार जैसी है और इसका आकार पिरामिड के जैसा है। मकबरे के बाहर बने उद्यान के चारों ओर सुंदर प्रवेशद्वार हैं किंतु इसका मुख्य प्रवेश-द्वार सर्वाधिक आकर्षक है जिस पर संगमरमर का जड़ाऊ कार्य किया गया है। इसके चारों ओर तथा चारों कोनों पर संगमरमर की एक-एक ऊँची मीनार है। प्रवेश द्वार पर कुशलतापूर्वक की गई पच्चीकारी इसकी शोभा बढ़ाती है।
पर्सी ब्राउन के अनुसार ‘अब तक इस प्रकार की एक भी मीनार भारतीय स्थापत्य कला में प्रयुक्त हुई दिखाई नहीं देती है।’
यह मकबरा पाँच मंजिली इमारत है जिसमें प्रत्येक ऊपर की मंजिल नीचे की मंजिल की अपेक्षा आकार में छोटी होती गई है। इसके प्रत्येक प्रवेशद्वार पर फारसी की पंक्तियां खुदी हुई हैं। ये पंक्तियां अकबर के जीवन पर प्रकाश डालती हैं। अकबर की कब्र संगमरमर की बनी हुई है। भू-तल पर बनी कब्र असली है जबकि पहली मंजिल पर बनी कब्र नकली है।
दोनों कब्रों का निर्माण संगमरमर के पत्थरों से किया गया है तथा उन पर विभिन्न प्रकार के फूल बनाए गए हैं। कब्र के सिराहने अल्लाहु अकबर और पैरों की तरफ जल्ले-जलालहु उभरे हुए अक्षरों में खुदा हुआ है। मकबरे में अल्लाह के निन्यानवे नामों के साथ हिन्दुओं का स्वास्तिक चिह्न तथा ईसाइयों का क्रॉस भी बना हुआ हैं।
जहाँगीर काल का दूसरा प्रमुख भवन एतमादुद्दौला का मकबरा है। इसका निर्माण ई.1625 में नूरजहाँ ने अपने पिता घियासुद्दीन बेग की स्मृति में लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर से आगरा में करवाया था। मुगल काल के अन्य मकबरों से अपेक्षाकृत छोटा होने से, इसे शृंगारदान भी कहा जाता है। इस मकबरे पर पैट्रा ड्यूरा की सजावट की गई है। इस मकबरे का स्थापत्य ताजमहल से साम्य रखता है। इस कारण इसे ‘बेबी ताज’ भी कहा जाता है।
कई जगह इस मकबरे की नक्काशी ताजमहल से भी अधिक सुंदर है। इस मकबरे के मध्य में एशियाई शैली का गुम्बद स्थित है। यहाँ के बगीचे और रास्ते इसकी सुंदरता को और भी बढ़ाते हैं। यह भारत में बना पहला मकबरा है जो पूरी तरह सफेद संगमरमर से बनाया गया। मकबरे को बड़े बगीचे में बनया गया है। मकबरे में रोशनी लाने के लिए जालीदार संगमरमर लगाया गया है।
मकबरे की दीवारों पर पेड़ पौधों, जानवरों और पक्षियों एवं मनुष्यों के चित्र उकेरे गए हैं। जबकि इस्लाम में मनुष्य आकृति को सजावट के रूप में इस्तेमाल करने की मनाही है। बटेश्वर से मिले शिलालेख के अनुसार यह मूलतः कच्छवाहा राजा परमार्दिदेव का महल था।
शाहजहाँ ने ई.1637 में आगरा में अंगूरी बाग का निर्माण करवाया। यह चारबाग शैली का उद्यान है तथा इसमें संगमरमर की बारादरियां, हौज, फव्वारे एवं बरामदे बने हुए हैं। बाग के उत्तर-पूर्व में शाही हम्माम बना हुआ है जिसमें आकर्षक भित्ति चित्र बने हैं। यह उद्यान लाल किले के खास बाग का हिस्सा है तथा शाहजहाँ के हरम की औरतों द्वारा प्रयुक्त किया जाता था। उस काल में इस बाग में उत्तम किस्म के अंगूरों की बेलें लगाई गई थीं।
जहाँगीर के समय अन्य नगरों में निर्मित भवन
प्रयागराज में स्थित खुसरो बाग का निर्माण जहाँगीर ने कवाया था। उसने इस उद्यान में अपनी कच्छवाही बेगम मानबाई, उसके पुत्र खुसरो मिर्जा तथा पुत्री सुल्ताना निथार बेगम के मकबरे बनवाए। ये मकबरे मुगल शाहजादों एवं बेगमों के मकबरों की तुलना में बहुत छोटे तथा साधारण हैं।
जहाँगीर ने अपनी बेगम मेहरुन्निसा के लिये श्रीनगर में डल झील के किनारे शालीमार बाग बनवाया। इस बाग में चार स्तर पर उद्यान बने हैं एवं जलधारा बहती है। इसकी जलापूर्ति निकटवर्ती हरिवन बाग से होती है। जहाँगीर की बेगम नूरजहां ने जालंधर से 40 किलोमीटर दूर नूरमहल सराय का निर्माण करवाया। यह लाल पत्थर से बना हुआ दो मंजिला भवन है। इसे अष्टकोणीय बनाया गया है।
इसके पश्चिमी दरवाजे को लाहौर दरवाजा कहा जाता है। इसके बाहरी पैनल्स पर पशु-पक्षी उत्कीर्ण हैं। हाथियों की लड़ाई तथा घुड़सवारों द्वारा चौगान खेलने के दृश्य भी बनाए गए थे।
ई.1607 में जहाँगीर ने पंजाब में लौहार से 38 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में शेखुपुरा नामक उपनगर की स्थापना की जो अब पाकिस्तान में है। जहाँगीर ने यहाँ स्थित प्राचीन दुर्ग में कई निर्माण करवाए तथा अपने एक प्रिय हिरन ‘मनसिराज’ की स्मृति में ‘हिरन मीनार’ का निर्माण करवाया। यह संभवतः अकेला स्मारक है जो मुगलों ने किसी पशु की स्मृति में करवाया था।
फतेहपुर सीकरी में भी हिरन मीनार है किंतु वह हिरनों के शिकार के लिए है। हिरन मीनारों के नाम से अन्य स्थानों पर भी मीनारें मिलती हैं। अकबर ने कोस मीनारों पर उन हिरनों के सींग लगाए थे जिना शिकार उसने या उसके सैनिकों ने किया था।
जहाँगीर ने अजमेर में आनासागर झील के किनारे दौलत बाग बनवाया जिसमें संगमरमर की बारादरियां एवं मेहराबयुक्त दरवाजे बनवाए। जहाँगीर ने दौलत बाग से कैसर बाग जाने वाले मार्ग पर कुछ महल बनवाये जिनके कुछ खण्डहर आज भी देखे जा सकते हैं। जहाँगीर ने यहाँ पर कुछ बारादरियां भी बनवाईं। दौलतबाग की तरफ आनासागर झील की सुंदर रेलिंग भी संभवतः जहाँगीर द्वारा बनवाई गई थी। झील के तट पर बने ऊंचे चबूतरे पर जहाँगीर द्वारा कुछ खूबसूरत मेहराबदार दरवाजे बनाए गए थे। ये दरवाजे भी संगमरमर से बने हैं।
तारागढ़ की पश्चिमी घाटी में जहाँगीर ने सुन्दर और विशाल महल का निर्माण करवाया जो ई.1615 में बनकर तैयार हुआ। तारागढ़ की घाटी में जहाँगीर ने एक शिकारगाह का भी निर्माण करवाया। जहाँगीर तथा उसके अमीरों एवं बेगमों ने लाहौर तथा उसके आसपास के नगरों में कई इमारतें बनवाईं। इनमें अनारकली का मकबरा, मकातिब खाना, बेगम शाही मस्जिद, वजीर खाँ मस्जिद, जहाँगीर का मकबरा अधिक प्रसिद्ध हैं।
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