Tuesday, June 25, 2024
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अध्याय – 38 – मुगल स्थापत्य कला (य)

शाहजहाँ कालीन स्थापत्य

इतिहासकारों की दृष्टि में शाहजहाँ का शासन-काल स्थापत्य कला का स्वर्णयुग था। इस काल में स्थापत्य कला अपने चरम पर पहुँच गई। शाहजहाँ ने अनेक इमारतें बनवाईं। वह स्वयं स्थापत्य कला का ज्ञाता था। शाहजहाँ युगीन भवन कला अकबर एवं जहाँगीर के काल की भवन कला से आगे का विकास है।

क्योंकि इस समय तक भारत के सुदूर क्षेत्र भी मुगलों के अधीन आ चुके थे और उन क्षेत्रों की स्थापत्य कला भी मुगलों द्वारा अपने भवनों में शामिल की गई। शाहजहाँ ने इतनी अधिक इमारतें बनवाईं कि उसे ‘निर्माताओं का शहजादा’ कहा जाता है।

अकबर ने अपने समय के सबसे सुंदर महल बनाए थे। जहाँगीर के काल में मुगल स्थापत्य में ‘यूरोपीय मोटिफ’ शामिल किए गए। शाहजहाँ के काल में तकनीक में आमूलचूल परिवर्तन हो गया तथा निर्माण कला के साधनों और सिद्धान्तों में अनेक परिवर्तन हुए। उसके काल में पत्थर काटने में निपुण कारीगरों का स्थान संगमरमर काटने और पॉलिश करने में निपुण कारीगरों ने ले लिया।

आयताकार भवनों का स्थान चौकोर लहरदार सजावटपूर्ण महलों ने ले लिया। सबसे अधिक मौलिक परिवर्तन मेहराब की बनावट में हुआ। इनमें सजावट, पच्चीकारी और नजाकतपूर्ण सौन्दर्य आ गया। आगरा, लाहौर, दिल्ली आदि नगरों में पुराने महलों का नव-निर्माण हुआ और नवीन भवन बने।

शाहजहाँ के काल की स्थापत्य शैली के सम्बन्ध में अनेक विद्वानों की राय है कि इन कृतियों के कलाकार विदेशी थे और शाहजहाँ ने अकबर कालीन हिन्दू प्रभाव वाली स्थापत्य शैली को त्यागकर पुनः शुद्ध ईरानी शैली को अपनाने का प्रयास किया था।

कतिपय अन्य विद्वान इसे भारतीय शैली से ही उत्पन्न बताते हैं। डॉ. बनारसी प्रसाद के अनुसार यह शैली दो संस्कृतियों के समन्वय का परिणाम थी। वस्तुतः इस काल में भी बहुत से प्राचीन हिन्दू भवनों को मुगल स्थापत्य में ढाला गया।

इस काल में नक्काशी युक्त या पर्णिल मेहराब (फोलिएटेड आर्च) बनने लगे। गुम्बद ने भी फारसी आकार ले लिया। भवनों के आकार, शैली और सजावट की दृष्टि से इस काल में बने भवन सम्पूर्ण मुगल काल में बने भवनों से अधिक महत्वपूर्ण थे। शाहजहाँ के काल में बने भवनों की कुछ विशेषताएं इस प्रकार से हैं-

(1.) इस काल में मेहराब ने नया आकार ग्रहण कर लिया जिसमें घुमावदार फूल-पत्ती का प्रयोग और संगमरमर का तोरण-पथ (छतयुक्त मेहराबों की शृंखला) प्रमुख था। इस काल में नक्काशीयुक्त एवं दांतेदार मेहराब भी बने।

(2.) शाहजहाँ के काल में बने भवनों में अलंकरण की प्रचुरता है। इनमें मूल्यवान् रत्नों और पत्थरों का प्रचुर उपयोग हुआ है।

(3.) गुम्बद कंदीय आकृति (बल्ब शेप) में बनने लगे और दोहरे गुम्बद का प्रचलन आम हो गया। इस काल के गुम्बद ऊँचे उठे हुए हैं।

(3.) अलंकरण और पच्चीकारी के लिए रंगीन टाइलों का प्रयोग तथा पच्चीकारी के रूप में पैट्रा ड्यूरा तकनीक का प्रचुर रूप से प्रयोग हुआ।

(4.) भवनों के निर्माण में लाल बलुआ पत्थर की जगह सफेद संगमरमर को प्रमुखता दी गई। हालांकि लाल बलुआ पत्थर का उपयोग भी जारी रहा।

(5.) इस काल के भवनों में बंगला शैली के कंगूरे भी देखे जाते हैं।

(6.) शाहजहाँ कालीन भवनों में कुछ बड़े परिवर्तन भी दिखाई देते हैं। इस काल में आयताकार महलों के स्थान पर वृत्ताकार महल भी बने।

(7.) आगरा की मोती मस्जिद तथा दिल्ली की जामा मस्जिद में शाहजहाँ ने स्थापत्य सम्बन्धी कुछ ऐसे प्रयोग किए जिनसे मस्जिद में आने वाले नमाजियों को प्रसन्नता का अनुभव हो। इन मस्जिदों के विभिन्न निर्माणों में संतुलन स्थापित किया गया तथा उन्हें विस्तृत आकार में बनाया गया।

शाहजहाँ कालीन आगरा के भवन: शाहजहाँ ने आगरा के दुर्ग में पहले से ही बने हुए बलुआ पत्थर के बहुत से भवनों को संगमरमर से सजाया। इस दुर्ग में शाहजहाँ की बनवाई इमारतों में दीवाने-आम, दीवाने-खास, मुसम्मन-बुर्ज, शीश महल, खास महल, नगीना मस्जिद तथा मोती मस्जिद मुख्य हैं। खास महल और आठकोर मीनार के मध्य में झरोखा दर्शन है।

यह सफेद संगमरमर का बना हुआ है। इसकी छतें चमकदार हैं। यहाँ से शाहजहाँ जनता को दर्शन देता था। शाहजहाँ ने इन भवनों के साथ ताजमहल की तरफ उन्मुख आलिन्द (छज्जे) वाला एक बड़ा अष्टभुजाकार बुर्ज़ बनवाया था जिसे मुसम्मन बुर्ज तथा शाह बुर्ज कहते थे।

यह सफेद संगमरमर से निर्मित चार मंजिला भवन है। इसकी चौथी मंजिल में सुन्दर नक्काशी है। इसके बीच में एक हौज बना हुआ है जिसका रूप गुलाब के फूल जैसा है। उसके सामने एक झरना भी बना हुआ है।

शाहजहाँ की पुत्री जहांआरा ने ई.1648 में आगरा के किले के उत्तर-पश्चिम में जामा मस्जिद का निर्माण करवाया। इसकी मेहराबें सामने की ओर चौड़ा स्थान छोड़कर बनाई गई हैं जो इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। मस्जिद की छत के प्रत्येक कोने पर एक-एक अष्टकोणीय गुम्बददार छतरी है। इसके ऊपरी भाग पर तीन बड़े गुम्बद तथा चार सुंदर मीनारें स्थित हैं।

वी. पी. सक्सेना ने लिखा है- ‘यह साहसी विधवा की एक सुंदर कृति है।’ आगरा स्थित चीनी का रौजा में शाहजहाँ के मंत्री अल्लामा अफज़ल खान मुल्ला की कब्र है। मकबरे का मुख्य द्वार मक्का की ओर रखा गया है। इस मकबरे के बाहरी भाग पर चमकदार टायल्स लगाई गई हैं जिन्हें ‘कशीकारी’ एवं ‘चीनी कला’ भी कहा जाता है।

इसके गुम्बद मुगल शैली के अन्य गुम्बदों की तरह आनुपातिक नहीं हैं। नीची गुम्बदों के आधार पर कहा जा सकता है कि यह ईरानी शैली का मकबरा है। गुंबद की भीतरी छत पर तस्वीरों और इस्लामिक लिखावट के चिह्न देखे जा सकते हैं। गुंबद के ऊपर कुरान की कुछ आयतें खुदी हुई हैं।

शाहजहाँ कालीन दिल्ली के भवन: ई.1638 में शाहजहाँ ने यमुना नदी के दाएं तट पर एक सुनिश्चित योजना के अनुसार शाहजहाँनाबाद बसाना आरम्भ किया। इसके मुख्य दरवाजों से दो बड़े आम रास्ते निकलते थे जो नगर की दीवारों में बने दरवाजों तक जाते हैं और इस प्रकार जो कोण बनता है उसी में जामा मस्जिद बनाई गई है। शाहजहाँनाबाद उत्तर से दक्षिण की ओर समानांतर चतुर्भुज के आकार का बना हुआ है।

आगरा के किले की तरह यह भी एक परकोट से घिरा हुआ है। शाहजहाँ ने ई.1638 में लाल किले का निर्माण आरम्भ करवाया। यह ई.1647 में बनकर तैयार हुआ। दिल्ली के लाल किले को प्रारम्भ में किला-ए-मुल्ला कहा जाता था। यह आगरा के लाल किले की तुलना में बहुत छोटा है। किले की दीवारें ऊँची तथा कँगूरेदार हैं। इसकी पश्चिमी दीवार में मुख्य दरवाजा बनाया गया।

दिल्ली के दुर्ग के भीतर की इमारतों की प्रशंसा करते हुए डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- ‘दिल्ली दुर्ग के भीतर की इमारतें अत्यधिक अलंकृत थीं और चीन की कला के लिए स्पर्धा की चीज बन गई थीं।’

दिल्ली के लाल किले के मध्य विशाल दीवाने आम बना हुआ है। इसका आकार चतुर्भुजी है। इसके बाहरी भाग में 9 मेहराबें दोहरे खम्बों पर आधारित हैं। तीनों ओर का मार्ग स्तम्भों पर आधारित दाँतेदार डाटों से बना हुआ है। इन स्तम्भों की कुल संख्या 40 है। इस भवन में पीछे की दीवार में एक मेहराबदार ताख है। इस ताख में शाहजहाँ का प्रसिद्ध तख्ते ताउस रखा रहता था। इस ताख की दीवार में अत्यन्त सुन्दर शिल्पकारी की गई थी तथा पत्थरों को खोदकर उनमें रत्नों की जड़ाई की गई थी।

लाल किले की इमारतों में दीवान-ए-खास सर्वाधिक अलंकृत भवन है। इसके बाहरी भाग में पाँच मेहराबदार रास्ते हैं। इसका फर्श सफेद संगमरमर का है। इनकी मेहराबें दाँतेदार हैं। छतें बहुत ही सुन्दर हैं। इन छतों में स्वर्ण तथा जवाहरातों की सजावट की गई है। इस छत को टिकाये रखने के लिये स्तम्भों का प्रयोग नहीं किया गया है।

यह छत 12 कोनों के सेतुबन्ध से सधी हुई है। प्रत्येक भाग में सुन्दर जड़ाई तथा रंग का काम हुआ है। दीवारों तथा मेहराबों पर फूलों की सुन्दर आकृतियाँ बनी हुई हैं। इसके मेहराब स्वर्ण तथा रंग से सजे हुए हैं और पंक्तियों से भरे हुए से लगते हैं।

रंगमहल तथा दीवाने खास में जड़ाई, नक्काशी, पच्चीकारी तथा सजावट का काम बहुत उत्तम है। इन दोनों की बनावट एक जैसी है। दिल्ली के लाल किले में स्थित रंगमहल एक महत्त्वपूर्ण इमारत है। यह शाहजहाँ का हरम था। इसके मध्य में एक बड़ा कक्ष है तथा चारों कोनों में छोटे-छोटे कक्ष बने हुए हैं। यह अलंकृत सेतबन्धों द्वारा 15 भागों में विभाजित है तथा रंग एवं चमक में अद्वितीय है।

शाहजहाँ की बनवाई हुई दिल्ली की इमारतों में जामा-मस्जिद सबसे विशाल है। इसका निर्माण ई.1650 में आरम्भ करवाया गया और ई.1656 में पूरा हुआ। यह भारत की सबसे विशाल मस्जिद है। यह लाल पत्थर से निर्मित शाही ढंग की इमारत है। इसके तीनों विशाल दरवाजों पर बुर्ज बने हुए हैं। पूर्व का द्वार शाही परिवार के उपयोग के लिये था। उत्तर और दक्षिण के द्वारों से जन-साधारण प्रवेश करता था।

मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिये विशाल स्थान उपलब्ध है। इसके सामने के सहन में वजू करने का कुण्ड है। नमाज स्थल के बीच के बाहरी दरवाजे के दोनों ओर पाँच-पाँच दाँतेदार मेहराबों के रास्ते हैं। इसके दोनों कोनों पर चार मंजिला लम्बी-लम्बी मीनारें हैं।

इसका मुख्य कक्ष बहुत सुंदर है। इसमें ग्यारह मेहराब हैं जिसमें बीच वाला मेहराब अन्य से कुछ बड़ा है। इसके ऊपर बने तीन विशाल गुंबदों को सफेद और काले संगमरमर से सजाया गया है जो निजामुद्दीन दरगाह की याद दिलाते हैं।

शाहजहाँ ने दिल्ली में चांदनी चौक का निर्माण करवाया। इसकी योजना शहजादी जहाँआरा ने तैयार की। इसमें मूल रूप से एक दूसरे को काटने वाली सीधी नहरें बनाई गई थीं जिनमें चंद्रमा की चांदनी झिलमिलाया करती थी। इसीलिए इसका नाम चांदनी चौक पड़ा।

शाहजहाँ कालीन अन्य इमारतें: शाहजहाँ ने आगरा, दिल्ली और लाहौर के अतिरिक्त काबुल, अजमेर, कन्धार, अहमदाबाद और काशमीर आदि नगरों में भी लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर की अनेक इमारतें बनवाईं। शाहजहाँ के पुत्र दाराशिकोह ने कश्मीर में मौलवी अखूंद मस्जिद और परी महल बनवाए तथा आगरा एवं दिल्ली में पुस्तकालयों का निर्माण करके ईरान आदि देशों से महत्वपूर्ण पुस्तकें मंगवाकर उनके अनुवाद एवं प्रतिलिपियां तैयार करवाईं।

शाहजहाँ की पुत्री जहांआरा में भी वास्तुकला सहित विभिन्न प्रकार की कलाओं के प्रति प्रेम था। शाहजहाँ के काल में मुगल शहजादों एवं शहजादियों ने जो भवन बनवाए, वैसे उत्कृष्ट भवन फिर कभी मुगलों द्वारा नहीं बनाए जा सके। सिंध प्रांत के थट्टा नगर में शाहजहाँ ने एक मस्जिद बनवाई जिसे शाहजहाँ मस्जिद कहा जाता है।

नूरजहाँ के बड़े भाई आसफ खाँ ने ई.1633 में श्रीनगर की डल झील के पूर्वी तट पर निशात बाग बनवाया। यह कश्मीर घाटी का सबसे बड़ा उद्यान है। इसे सीढ़ीदार शैली में बनाया गया है जिसे अंग्रेजी में ‘टैरेस गार्डन’ कहते हैं।

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