Thursday, April 18, 2024
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अध्याय – 38 – मुगल स्थापत्य कला (अ)

ई.1526 में मंगोल-वंशी बाबर भारत में अपनी सत्ता स्थापित करने में सफल हो गया। भारत में बाबर तथा उसके वंशज ‘मुगलों’ के नाम से जाने गए। बाबर के वंशज थोड़े बहुत व्यवधानों के साथ ई.1526 से ई.1765 तक भारत के न्यूनाधिक क्षेत्रों पर शासन करते रहे। बाबर के वंशजों में हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ तथा औरंगजेब प्रभावशाली शासक हुए तथा उनके समय देश में अनेक विशाल भवनों का निर्माण हुआ। इस काल की स्थापत्य शैली मुगल शैली कहलाती है।

फारसी और भारतीय शैली के मिश्रण से बनी मुगल शैली

मुगल अपने साथ स्थापत्य कला की कोई विशिष्ट शैली लेकर नहीं आए थे। उनकी स्मृतियों में समरकंद के मेहराबदार भवन, ऊँचे गुम्बद, बड़े दालान, कोनों पर बनी पतली और ऊँची मीनारें तथा विशाल बागीचे थे। उन्हीं स्मृतियों को मुगलों ने हिन्दू, तुर्की एवं फारसी वास्तुकला में थोड़े-बहुत परिवर्तनों के साथ मिला दिया। इन सबके मिश्रण से जो स्थापत्य शैली सामने आई उसे मुगल स्थापत्य शैली कहा गया।

हालांकि मुगलों के स्थापत्य की सभी प्रमुख विशेषताएं यथा तिकोने या गोल मेहराब (।तबी), पतली और लम्बी मीनारें, झरोखेदार बुर्ज और गोलाकार गुम्बद पहले से ही तुर्कों के स्थापत्य में समाहित थे। अंतर केवल इतना था कि मुगलों के मेहराब, मीनारें, बुर्ज और गुम्बद पहले की अपेक्षा अधिक बड़े, कीमती पत्थरों से युक्त एवं हिन्दू तथा फारसी विशेषताओं को समेटे हुए थे। मुगल-इमारतों के भीतर विशाल कक्षों का एवं बाहर सुंदर एवं विशाल उद्यानों का निर्माण किया गया।

दिल्ली सल्तनत के तुर्की सुल्तानों द्वारा निर्मित भवनों के स्थापत्य को मुगलों के स्थापत्य से भिन्न करने के लिए कहा जा सकता है कि तुर्की सुल्तानों के भवनों में पुरुषोचित दृढ़ता का समावेश है जबकि मुगलों के स्थापत्य में स्त्रियोचित-स्थापत्य-सौंदर्य के दर्शन होते हैं।

मुगल शैली की विशेषताएँ

भारत में बने मुगल भवनों के स्थापत्य की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं-

(1.) भवन के ऊपरी भाग में विशालाकाय प्याज की आकृति का गुम्बद बनता था जिसके चारों तरफ छोटे गुम्बद बनते थे।

(2.) इमारतों में लाल बलुआ पत्थर एवं सफेद संगमरमर का उपयोग।

(3.) पत्थरों पर नाजुक सजावटी अलंकरण, दीवारों के बाहरी एवं भीतरी हिस्सों पर पच्चीकारी एवं दीवारों और खिड़कियों में पत्थरों की अलंकृत जालियों का उपयोग।

(4.) मस्जिदों, मकबरों एवं महलों की भीतरी दीवारों पर फ्रैस्को अर्थात् भित्तिचित्र।

(5.) चारों ओर उद्यान से घिरे हुए स्मारक भवनों का निर्माण।

(6.) महलों एवं उद्यानों में जलापूर्ति के लिए कलात्मक नहरों, नालियों, फव्वारों एवं कृत्रिम झरनों का व्यापक स्तर पर उपयोग।

(7.) विशाल सहन सहित मस्जिदों का निर्माण।

(8.) फारसी एवं अरबी के अलंकृत शिलालेख, कुरान की आयतों का कलात्मक लेखन।

(9.) भवन परिसर के विशाल मेहराब युक्त मुख्य द्वारों का निर्माण।

(10.) दो तरफ या चार तरफ ईवान का निर्माण।

(11.) भवनों की छतों पर कलात्मक बुर्ज एवं छतरियों का निर्माण।

(12.) भवन के चारों ओर लम्बी एवं पतली मीनारों का निर्माण।

(13.) मुगल शैली में स्थानीय शैलियों के मिश्रण से उप-मुगल शैलियों का निर्माण यथा- राजपूत स्थापत्य शैली, सिक्ख स्थापत्य शैली, इण्डो सारसैनिक स्थापत्य शैली, ब्रिटिश राज स्थापत्य शैली।

लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर

मुगल स्थापत्य शैली की सबसे बड़ी विशेषता उत्तर भारत में बहुतायत से मिलने वाला लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर का व्यापक उपयोग है जिसे काटकर, घिसकर तथा पॉलिश करके सुंदर कलात्मक स्वरूप प्रदान किया गया। मुगलों ने भवन निर्माण में बहुत कम मात्रा में काला संगमरमर, क्वाट्जाईट एवं ग्रेनाइट का उपयोग किया।

मुगल भवनों की चिनाई सामान्यतः चूना-कंकर के गारे में होती थी। दीवारों के भीतरी हिस्से में अनगढ़ पत्थरों को चिना जाता था और बाहरी भाग को लाल बलुआ पत्थर अथवा सफेद संगमरमर की पट्टियों से ढका जाता था। कुछ भवनों के निर्माण में ईंटों का प्रयोग किया गया।

बाबर, हुमायूँ एवं अकबर के काल में बने भवनों में राजस्थान के करौली से मिलने वाले लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग किया गया किंतु जहाँगीर के काल में बने भवनों में राजस्थान के मकराना से मिले सफेद संगमरमर का व्यापक स्तर पर उपयोग हुआ। दिल्ली के दीवाने खास, मोती मस्जिद एवं जामा मस्जिद, आगरा के ताजमहल, एतमादुद्दौला का मकबरा एवं मुस्समन बुर्ज, औरंगाबाद का बीबी का मकबरा आदि भवनों का निर्माण मकराना के संगमरमर से हुआ है। चिनाई के लिए उत्तम कोटि के चूने की आपूर्ति भी राजस्थान के नागौर जिले से होती थी।

महंगे रत्नों की भरमार

मुगलों ने अपने महलों में नीला लाजवर्त, लाल मूंगा, पीला पुखराज, हरा पन्ना, कत्थई गोमेद, सफेद मोती आदि मूल्यवान एवं अर्द्धमूल्यवान पत्थरों का भरपूर उपयोग किया। गहरे नीले रंग का लाजवर्त अफगानिस्तान से आता था। जबकि अन्य महंगे रत्न विश्व के अनेक देशों से मंगवाए जाते थे। शाही महलों एवं शाही मकबरों में संगमरमर में बने फूल-पत्तियों की डिजाइनों में वैदूर्य, गोमेद, सूर्यकान्त, पुखराज आदि कीमती रत्नों को जड़ा गया। उनसे पहले भारत के मुस्लिम भवनों में रत्नों का प्रयोग कभी नहीं हुआ था।

मुगलों की बहुत ही सुंदर और संगमरमर की कलाकृतियों में सोने और कीमती पत्थरों का जड़ाऊ काम भी मिलता है। सोने-चांदी के पतरों में रत्नों की ऐसी जड़ाई प्राचीन हिन्दू स्थापत्य में भी मिलती थी किंतु मुस्लिम आक्रमणों के कारण हिन्दू स्थापत्य कला का लगभग पूरी तरह विनाश हो चुका था।

नहरों एवं फव्वारों से युक्त मुगल उद्यान

मुगलों ने समरकंद के तैमूर शैली के उपवनों के अनुकरण पर भारत में कई बाग बनवाए जिन्हें मुगल उद्यान एवं चारबाग कहा जाता है। बाबर ने ई.1528 में आगरा में एक बाग बनवाया जिसे आराम बाग कहा जाता था। यह भारत का सबसे पुराना मुग़ल उद्यान था। इसे अब रामबाग कहा जाता है। जहाँगीर काल में निर्मित हुमायूँ का मकबरा एक बड़े चारबाग के भीतर स्थित है।

जहाँगीर की बेगम नूरजहाँ द्वारा निर्मित एतमादुद्दौला का मकबरा भी चारबाग शैली के विशाल उद्यान के भीतर बना हुआ है। जहाँगीर ने काश्मीर में शालीमार बाग बनवाया। नूरजहाँ के भाई आसफ खान (जो कि शाहजहाँ का श्वसुर और मुमताज महल का पिता था) ने ई.1633 में कश्मीर में निशात बाग बनवाया। प्रयागराज का जहाँगीर कालीन खुसरो बाग भी चारबाग शैली में बना हुआ है।

शाहजहाँ ने लाहौर में शालीमार बाग बनवाया जिसकी प्रेरणा काश्मीर के शालीमार बाग से ली गई थी। शाहजहाँ द्वारा निर्मित ताजमहल भी चारबाग शैली के एक बड़े उद्यान के बीच स्थित है।

ताजमहल की सीध में यमुना के दूसरी ओर भी शाहजहाँ द्वारा निर्मित एक उद्यान है जिसे मेहताब बाग कहा जाता है। यह भी चारबाग शैली में बना हुआ है। औरंगजेब ने पंजाब में पिंजोर बाग बनवाया जो हरियाणा के पंचकूला जिले में अपने बदले हुए स्वरूप में अब भी मौजूद हैं तथा यदुवेन्द्र बाग कहलाता है। चारबाग शैली एक विशिष्ट प्रकार की शैली थी जिसमें उद्यान के केन्द्रीय भाग से चारों दिशाओं में चार नहरें जाती थीं जिनसे पूरे उद्यान को जल की आपूर्ति होती थी।

ये चार नहरें, कुरान में वर्णित जन्नत के बाग में बहने वाली चार नदियों का प्रतीक होती थीं। भारत में मुगलों द्वारा बनाए गए छः उद्यानों को यूनेस्को विश्व धरोहर की संभावित सूचि में सम्मिलित किया गया है। इनमें जम्मू-कश्मीर के परी महल, निशात बाग, शालीमार बाग, चश्म-ए-शाही, वेरिनाग गार्डन तथा अचबल गार्डन सम्मिलित हैं।

भारत में मुगल स्थापत्य के प्रसिद्ध उदाहरण

भारत में मुगल स्थापत्य शैली के उत्कृष्टतम नमूने दिल्ली, आगरा, फतेहपुर सीकरी, लखनऊ, लाहौर (अब पाकिस्तान), काबुल (अब अफगानिस्तान), कांधार (अब अफगानिस्तान), ढाका (अब बांगलादेश) आदि नगरों में हैं। मुगल शैली के कुछ प्रसिद्ध भवन इस प्रकार हैं-

(1.) मकबरे: एतमादुद्दौला का मकबरा (आगरा), हुमायूँ का मकबरा (दिल्ली), अकबर का मकबरा (आगरा के निकट सिकंदरा), जहाँगीर का मकबरा (लाहौर), ताजमहल (आगरा), अनारकली का मकबरा (लाहौर), बीबी का मकबरा (औरंगाबाद) आदि।

(2.) मस्जिद: दिल्ली, आगरा एवं फतेहपुर सीकरी की जामा मस्जिदें, लाहौर, दिल्ली एवं आगरा की मोती मस्जिदें, आगरा की नगीना मस्जिद, फतेहाबाद की मस्जिद, दिल्ली की किला-ए-कुहना मस्जिद आदि।

(3.) किले: दिल्ली का दीन पनाह, आगरा एवं दिल्ली के लाल किले, लाहौर का किला, प्रयागराज का किला, अजमेर का दौलताबाद किला। 

(4.) महल: फतेहपुर सीकरी के महल, आगरा एवं दिल्ली के लाल किलों के महल।

(5.) उद्यान: बाग-ए-बाबर (लाहौर), आराम बाग (अगरा), शालीमार बाग (काश्मीर), चारबाग (हुमायूँ का मकबरा), निशातबाग (श्रीनगर), अंगूरी बाग (आगरा) आदि।

(6.) सरकारी कार्यालय: आगरा, फतेहरपुर सीकरी एवं दिल्ली के दीवान-ए-आम तथा दीवान-ए-खास, फतेहपुर सीकरी की ट्रेजरी।

(7.) दरवाजा: फतेहपुर सीकरी का बुलंद दरवाजा, अजमेर में खामख्वा के दरवाजे, दिल्ली का दिल्ली दरवाजा आदि।

(8.) बारादरियां: अजमेर में आनासागर झील की बारादरियां।

(9.) हवामहल: फतेहपुर सीकरी का पंचमहल।

(10.) सराय: जालंधर की नूरमहल सराय।

(11.) बुर्ज: मुसम्मन बुर्ज, जामा मस्जिद की बुर्ज आदि।

(12.) मीनारें: फतेहपुर सीकरी एवं लाहौर की हिरन मीनार आदि।

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